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मोदी सरकार को घेरने के लिए कॉन्ग्रेस ने जारी किया चीनी FDI का फर्जी डाटा, UPA जमाने के आँकड़ों में भी कर डाली हेराफेरी

मोदी सरकार को निशाना बनाने के चक्कर में कॉन्ग्रेस एक बार फिर झूठ फैलाती पकड़ी गई। इस बार उनका झूठ भारत में चीन से आ रहे फॉरेन डाइरेक्ट इन्वेस्टमेन्ट (FDI/ एफडीआई) को लेकर था। 4 जनवरी 2021 को आधिकारिक ट्विटर हैंडल से कॉन्ग्रेस ने एक इंफोग्राफिक ट्वीट किया जिसमें दर्शाया गया कि मोदी काल में चीन का FDI भारत में बढ़ा है।

कॉन्ग्रेस के चार्ट के अनुसार साल 2017 में चीनी एफडीआई $2.8 बिलियन थी। 2018 में यह बढ़कर $3.94 बिलियन और 2019 में $4.19 बिलियन हो गई। पार्टी ने मोदी कार्यकाल से जुड़ी इस डिटेल के बगल में अपने कार्यकाल के दौरान के आँकड़े भी पेश किए। इसमें दिखाया गया कि 2011 में ये राशि $0.3 बिलियन थी, 2012 में $0.31 बिलियन हुई और 2013 में $2.7 बिलियन पहुँची।

कॉन्ग्रेस के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

मोदी सरकार को घेरने के लिए इस इंफोग्राफिक को शेयर करते हुए शायद कॉन्ग्रेस भूल गई कि ऐसा ही उछाल उनके UPA कार्यकाल के दौरान आया था। कहीं न जाकर उनके द्वारा पेश किए आँकड़ों को हीं देखें तो 2012 से 2013 तक में काफी उछाल आया है।

लेकिन, यहाँ सवाल कॉन्ग्रेस कार्यकाल से तुलना करके मोदी सरकार को सही साबित करने का नहीं है, बल्कि तथ्यों पर बात करने का है, जो ये बताते हैं कि कॉन्ग्रेस द्वारा पोस्ट किया गया ये इंफोग्राफिक बेबुनियाद है। हकीकत में दोनों देशों के बीच उपजे विवाद के चलते हाल के सालों में चीन के एफडीआई में गिरावट आई है।

कॉन्ग्रेस के दावों से उलट साल 2019-20 में चीनी FDI इस वित्तीय वर्ष में सिर्फ़ 163.77 मिलियन डॉलर था, न कि 4.14 बिलियन डॉलर था। इसके अलावा, पिछले तीन वर्षों में भी चीनी FDI में कमी आई है। यह 2017-18 में $350.22 मिलियन, और 2018-19 में $229.0 मिलियन था।

साभार: लोकसभा

इन आँकड़ों का खुलासा वित्त राज्य मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर ने पिछले साल 14 सितंबर को लोकसभा में किया था जब उनसे इस संबंध में सवाल किए गए।

अब यहाँ ये भी साफ कर दें कि कॉन्ग्रेस ने सिर्फ़ भाजपा को लेकर झूठ नहीं फैलाया, बल्कि खुद के कार्यकाल को लेकर भी उनके पास जानकारी सही नहीं है। उनका दावा था कि 2013 में $2.7 बिलियन एफडीआई हुई। लेकिन हकीकत यह है कि भारत में कभी भी चीनी FDI ने 1 बिलियन डॉलर का आँकड़ा क्रॉस नहीं किया। 2013 में ये राशि $148 मिलियन थी, जो बाद के साल (2014) में गिरकर 121 मिलियन हो गई। फिर 2015 में यह $505 मिलियन पहुँची, लेकिन उसके बाद से यह लगातार कम हो रही है। 

स्रोत: Statista

उल्लेखनीय है कि कोरोनो वायरस महामारी के कारण कंपनियों की कमजोर वित्तीय स्थिति से अवसर लेने वाली भारतीय कंपनियों के चीनी अधिग्रहण पर अंकुश लगाने के लिए, भारत सरकार ने चीन से एफडीआई के मानदंडों को कड़ा कर दिया है। इस साल अप्रैल में केंद्र सरकार ने एक प्रेस नोट 3 जारी किया था, जिसमें उन्होंने सूचित किया था कि भारत से सीमा साझा करने वाले देशों से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) केवल सरकार की मंजूरी के बाद ही दिया जाएगा।

अब चूँकि इस नियम में चीन का नाम अलग से नहीं है, लेकिन फिर भी इसमें यह लिखा गया है कि यह केवल भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों को लक्षित करता है, जिसका मतलब साफ है कि नियम को बनाने के पीछे मुख्य लक्ष्य चीन को टारगेट करना है।

अमेरिकी संसद हमला: वामपंथ समझ ले, दक्षिण जाग चुका है | Ajeet Bharti explains US Capitol attack

वामपंथियों ने लगातार ऐसी बवाल, उपद्रव, आगजनी, रक्तपात को ‘विरोध’ कह कर जायज ठहराया, उनके लिए यह एक संदेश है कि वही तरीका अब दूसरे भी अपनाएँगे

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मनी लॉन्ड्रिंग में टाइट हुई एजेंसी तो रॉबर्ट वाड्रा को याद आई पॉलिटिक्स, संसद में जाने की जताई इच्छा

गाँधी परिवार द्वारा देश पर राहुल गाँधी को थोपने के बाद अब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद ने राजनीति में उतरने और चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है। रॉबर्ट वाड्रा ने गुरुवार को राजनीति में शामिल होने की इच्छा जाहिर करते हुए कहा कि उन्हें ‘लड़ने के लिए संसद में रहना होगा।” बता दें वाड्रा ने बेनामी संपत्ति मामले में आयकर विभाग द्वारा की गई कड़ी पूछताछ के बाद यह बयान दिया है।

कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “मैं एक ऐसे परिवार से संबंधित हूँ, जिसने पीढ़ियों से इस देश के लोगों की सेवा की है और देश के लिए शहीद भी हुए हैं। मैंने देखा है, सीखा है, अभियान चलाया है और देश के विभिन्न हिस्सों में समय बिताया है। मुझे लगता है कि मुझे इसी शक्ति के साथ लड़ने के लिए संसद में रहना होगा।”

वाड्रा ने आरोप लगाया कि उनके साथ इस तरह का व्यवहार इसलिए किया गया, क्योंकि वह एक प्रमुख राजनीतिक परिवार से संबंधित हैं। उन्होंने कहा कि वह उचित समय पर राजनीति में शामिल होने का निर्णय लेंगे। उन्होंने कहा, “जब मैं एक ऐसी जगह देखूँगा, जहाँ लोग मुझे प्रतिनिधित्व करने के लिए वोट देंगे और मैं उस क्षेत्र के लोगों के जीवन में एक अंतर ला सकता हूँ और अगर मेरा परिवार इसे स्वीकार करता है।”

नई दिल्ली स्थित अपने सुखदेव विहार कार्यालय में मीडिया से बात करते हुए, वाड्रा ने कहा, प्रियंका बहुत सपोर्टिव हैं। मैं पूरे परिवार के बारे में बात कर रहा हूँ और जब वे इसे मंजूरी देंगे, तो मैं राजनीति में हो सकता हूँ और राजनीतिक क्षेत्र में अपने मुद्दों के लिए लड़ सकता हूँ।

गौरतलब है कि इस हफ्ते की शुरुआत में ED ने कथित बेनामी संपत्तियों के मामले में लगातार रॉबर्ट वाड्रा से पूछताछ की है। सोनिया गाँधी के दामाद द्वारा 2005 और 2010 के बीच खरीदी गई इन संपत्तियों का कुल मूल्य 12,000 पाउंड माना जाता है।

दिलचस्प यह है कि पहली बार वाड्रा की राजनीतिक आकांक्षाएँ सामने नहीं आई हैं। वाड्रा ने 2019 में भी संकेत दिया था कि वह ‘लोगों की सेवा करने में बड़ी भूमिका‘ के लिए तैयार हैं। यही नहीं वाड्रा के इस बयान के कुछ ही घंटों बाद ही उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में उनके नाम के पोस्टर भी लगाए गए थे। जिसमें रॉबर्ट वाड्रा से मुरादाबाद लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने का अनुरोध किया गया था।

वहीं इस घटना के एक महीने बाद उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से भी चुनाव लड़ने का आग्रह करने वाले पोस्टर सामने आए थे। हालाँकि 6 मार्च 2019 को एएनआई से बात करते हुए उन्होंने राजनीति में नहीं शामिल होने की कसम खाई थी जब तक कि मनी लॉन्ड्रिंग मामलों से उनका नाम साफ नहीं हो जाता।

उल्लेखनीय है कि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने बेनामी संपत्ति के मामले में प्रियंका गाँधी के पति रॉबर्ट वाड्रा को नोटिस भेजा था, लेकिन वह इनकम टैक्स के दफ्तर नहीं पहुँचे। ऐसे में इनकम टैक्स की टीम पूछताछ के लिए उनके घर पहुँच गई और उनका बयान दर्ज किया। साथ ही लगभग 23,000 दस्तावेज भी जब्त किए हैं।

बता दें ब्रिटेन में कथित तौर पर कुछ अघोषित आय रखने के आरोप में वाड्रा आयकर विभाग की जाँच के दायरे में हैं। प्रवर्तन निदेशालय भी धनशोधन विरोधी कानून के तहत उनके खिलाफ इन आरोपों की जाँच कर रहा है। पेशे से कारोबारी वाड्रा ने अपने खिलाफ लगे आरोपों और कुछ भी गलत करने से इनकार किया है। कॉन्ग्रेस ने कुछ महीने पहले कहा था कि वाड्रा के खिलाफ राजनीतिक प्रतिशोध की भावना से कार्रवाई की जा रही है।

आरोप है कि रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी ने कम दाम में बीकानेर में ज़मीन खरीदी, जिसे आगे अधिक दाम में बेचकर मुनाफा कमाया। इसी से जुड़े एक मामले में प्रवर्तन निदेशालय भी जाँच कर रहा है। प्रियंका गाँधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा पर लंदन में संपत्ति की खरीद के लिए मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है। वाड्रा पर ब्रायनस्टन स्क्वायर में 1.9 मिलियन पाउंड की कीमत का मकान खरीदने का आरोप है। रॉबर्ट वाड्रा फिलहाल अग्रिम जमानत पर हैं।

ईडी ने दिल्ली उच्च न्यायालय से यहाँ तक कहा था कि रॉबर्ट वाड्रा को हिरासत में लेकर पूछताछ किए जाने की आवश्यकता है। जाँच एजेंसी ने दलील दी थी कि धन के लेन-देन की कड़ियों से कथित रूप से उनका सीधा संबंध है। ईडी ने वाड्रा पर आरोप लगाया था कि वे अपने खिलाफ धनशोधन मामले की जाँच में सहयोग नहीं कर रहे हैं।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की बेटी अंजलि को बिना परीक्षा दिए ही UPSC ने सिविल सर्विसेज के लिए चुना? जानें पूरा सच

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला की बेटी अंजलि बिरला को लेकर सोमवार (जनवरी 4, 2021) को खबर आई थी कि उनका चयन यूपीएससी ने सिविल सर्विसेज को लेकर किया है। इसके बाद से सोशल मीडिया में उनके चयन को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे। दावा किया जा रहा है कि बिना परीक्षा दिए ही अंजलि का नाम चयनित अभ्यर्थियों की सूची में आ गया, क्योंकि वह भाजपा नेता की बेटी हैं।

कई कॉन्ग्रेस समर्थक समेत ट्विटर यूजर्स ने इसे नेपोटिज्म और फेवरेटिज्म कहा। उनकी कई मॉर्डन तस्वीरें शेयर करके ये दावा किया गया कि वह तो मॉडल हैं और उन्हें केवल उनके लुक्स पर चुन लिया गया, उन्होंने कोई एग्जाम नहीं दिए।

विपक्षियों ने इस दौरान यह भ्रम फैलाया कि सिविल सर्विस में राजनेताओं का कोटा होता है और अंजलि उसी कोटे के जरिए चुनी गई हैं। अब सच क्या है? क्या देश की सबसे बड़ी परीक्षा में आरक्षण के जरिए कोई बिना परीक्षा दिए चुना जा सकता है? जवाब है- नहीं।

सोशल मीडिया पर लगाए जा रहे इल्जाम पूरी तरह से फर्जी हैं। रिजर्व लिस्ट का मतलब रिजर्व कोटा नहीं होता। हकीकत में यूपीएससी दो लिस्ट बनाती है। एक मेन लिस्ट और दूसरी रिजर्व लिस्ट। मेन लिस्ट तत्काल प्रकाशित कर दिया जाता है, लेकिन रिजर्व लिस्ट गोपनीय रखी जाती है। ये लिस्ट तब पब्लिश होती है जब मेन लिस्ट के सभी कैंडिडेट को सीट अलॉट हो जाती है।

यह सिविल सेवा परीक्षा नियम, 2019 के नियम -16 (4) और (5) के अनुसार किया जाता है। इस नियम के अनुसार, मुख्य सूची में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों की संख्या के आधार पर उम्मीदवारों की कुल संख्या में कटौती की जाती है, जो निर्धारित सामान्य योग्यता स्तर पर या उससे अधिक योग्यता प्राप्त करते हैं। नतीजतन, उम्मीदवारों द्वारा प्राप्त अंकों के अनुसार, उम्मीदवारों की कटौती की गई संख्या के लिए एक आरक्षित सूची तैयार की जाती है।

इस नियम को बनाने की वजह यह है कि आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार जो सामान्य मानकों पर चुने गए होते हैं, वे सामान्य श्रेणी के बजाय अपनी आरक्षित स्थिति के आधार पर सेवाओं और कैडर का चयन करना चाहते हैं, तब सामान्य श्रेणी की सीटें खाली रह जाती हैं। बची हुई सीटों को भरने के लिए आरक्षित सूची के उम्मीदवारों का उपयोग किया जाता है, जिसमें सामान्य और आरक्षित श्रेणी, दोनों उम्मीदवार होते हैं।

अब चूँकि यह ज्ञात नहीं होता कि जनरल कैटेगरी में पास होने वाले कितने रिजर्व कैटेगरी के अभ्यर्थी रिजर्व कैटेगरी की पोस्ट लेते हैं और कितने जनरल कैटेगरी के, तो इसलिए रिजर्व लिस्ट को सिर्फ़ मेन सूची में चुने गए नामों को सीट मिलने के बाद ही जारी किया जाता है। जैसे ही सारी प्रक्रिया पूरी होती है फिर मेरिट के हिसाब से रिजर्व लिस्ट निकलती है।

इसलिए, ये साबित होता है कि यूपीएससी में आरक्षण का कोटा नहीं होता। ये बिलकुल ऐसा है जैसे सेकंड मेरिट लिस्ट निकलती है या कोई वेटिंग लिस्ट निकलती है। ये प्री और मेन परीक्षा देने वाले अभ्यार्थियों में से निकाली जाती है। किसी प्रकार का अलग से आरक्षण नहीं होता।

पिछले साल देखें तो कुल वैकेंसी 927 थी। लेकिन रिजल्ट केवल 829 अभ्यार्थियों का निकला। यानी बाकी की सीट रिजर्व लिस्ट के लिए बची थी। जिसका मतलब साफ है कि 98 आरक्षित छात्रों ने सामान्य सूची के अभ्यार्थियों के लिए तय मानकों पर नंबर पाए और इनमें से 89 कैंडिडेट ने जनरल कैटेगरी के लोगों के लिए खाली सीटों को नहीं चुना। इसलिए अब उन सीट पर रिजल्ट घोषित हुआ। इन्हीं में से एक ओम बिरला की बेटी हैं।

इस 89 अभ्यार्थियों की सूची में 73 सामान्य सूची, 14 ओबीसी, 1 EWS, 1 अनुसूचित जाति के कैंडिडेट हैं। अंजलि का नाम 67वें स्थान पर है। इसका अर्थ है कि उन्होंने परीक्षा दी और उसे उत्तीर्ण करने वाले अंक भी प्राप्त किए। इसलिए ये कहना बिलकुल गलत है कि केवल भाजपा नेता की बेटी होने के नाते उनका चुनाव सिविल परीक्षाओं के लिए किया गया।

पाकिस्तानी बिल्डिंग में इस्लामी संगठन का हेडक्वार्टर, सीलिंग के दौरान जमात के अड़ंगा से चेन्नई में तनाव

चेन्नई के मन्नाडी (Mannady) इलाके में बुधवार (जनवरी 6, 2021) को शत्रु संपत्ति अधिनियम (Enemy Property Act) का उल्लंघन होने पर एक इमारत सील करने पहुँचे कुछ अधिकारियों को देखने के बाद तमिलनाडु तौहीद जमात नाम के इस्लामी संगठन ने हंगामा मचाकर क्षेत्र में तनाव उत्पन्न कर दिया। इस बिल्डिंग से इस संगठन का हेडक्वार्टर संचालित हो रहा था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, स्थानीय पुलिस व राजस्व अधिकारियों के साथ ये ऑफिसर वहाँ पहुँचे थे। जिसे शत्रु अधिनियम संपत्ति 1968 के तहत पाकिस्तान की संपत्ति के रूप में पंजीकृत किया गया है।

तौहीद जमात के कार्यालय पर इससे पहले कई बार अधिनियम का उल्लंघन होने के मामले में नोटिस भेजे जा चुके थे। लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होने पर स्थानीय पुलिस, राजस्व अधिकारियों के साथ कस्टोडियन ऑफ एनिमी प्रॉपर्टी ऑफ इंडिया के अधिकारियों को बिल्डिंग सील करने के लिए पहुँचना पड़ा।

कथिततौर पर यह इमारत संगठन के उपाध्यक्ष अब्दुल रहमान को लुंगी फर्म चलाने के लिए दी गई थी। लेकिन रहमान ने इसका इस्तेमाल हेडक्वार्टर चलाने के लिए किया। जबकि वास्तविकता में रहमान के पास सिर्फ़ इसकी पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी है, लेकिन हकीकत में संपत्ति तूबा खलीली की है, जो अब पाकिस्तान में रहती हैं। 

बता दें कि साल 1965 के भारत-पाक युद्ध के बाद, 1968 में शत्रु संपत्ति अधिनियम बनाया गया, जो ऐसी संपत्तियों को नियंत्रित करता है और संरक्षक की शक्तियों को सूचीबद्ध करता है। यही अधिनियम संशोधित होने के बाद से कस्टोडियन को ही प्रॉपर्टी का मालिक मानता है और उन्हें ही उससे जुड़े अधिकार देता है।

अब ऐसे में जैसे ही इस अधिनियम के उल्लंघन पर अधिकारियों ने मुख्यालय पर कार्रवाई की तो तौहीद जमात के लोग इकट्ठा होकर प्रदर्शन करने लगे। करीब दो घंटों तक विवाद चला। रहमान ने कहा कि जब सरकार ने शत्रु अधिनियम के तहत संपत्ति के निपटान का फैसला किया, तो उन्होंने सरकार को किराया देना शुरू कर दिया। उन्होंने यह भी बताया कि उन लोगों ने जमीन खरीदने का विचार किया था। हालाँकि, बुधवार को बिना किसी जानकारी के पुलिस वहाँ तैनात हुई और उन्हें जाने को कह दिया गया।

उनके अनुसार, “केंद्र सरकार ने बिना सूचना दिए संपत्ति सीज करने को कहा है। ये स्वीकार्य नहीं होगा।” रहमान कहते हैं, “इस कदम के पीछे राजनीतिक उद्देश्य है। सरकार हमें परेशान करना चाहती है, लेकिन हम गुस्सा नहीं करेंगे। अगर हम प्रदर्शन भी करेंगे तो लोकतांत्रित ढंग से।

बता दें कि देश में कुल 9,400 शत्रु संपत्तियाँ हैं, जो कि स्वतंत्रता के बाद पाकिस्तान चले गए लोगों द्वारा छोड़ी या बेची गई जमीन है, इसकी कीमत 1 लाख करोड़ रुपए है। 2017 में, केंद्र सरकार ने शत्रु संपत्ति (संशोधन और सत्यापन) अधिनियम पारित किया, जिसने शत्रु संपत्ति पर उनके कानूनी उत्तराधिकार को अस्वीकार कर दिया था।

मुंबई-लंदन-न्यूयॉर्क के घर, स्विस बैंक अकाउंट; नीरव मोदी की प्रॉपर्टी जब्त करवा बहन-बहनोई बने सरकारी गवाह

पंजाब नैशनल बैंक (PNB) घोटाला मामले में भगोड़े नीरव मोदी की बहन पूर्वी मोदी और उनके पति मयंक मेहता सरकारी गवाह बन गए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पूर्वी और उनके पति मयंक ने मुंबई के विशेष पीएमएलए कोर्ट के समक्ष एक अर्जी दायर करते हुए अदालत से सीआरपीसी की धारा 306 और 307 के तहत माफी माँगी है।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) के अनुसार पूर्वी और मयंक ने बैंक धोखाधड़ी के मामले में नीरव मोदी की 579 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त करने में मदद की। इसमें न्यूयॉर्क में दो फ्लैट, लदंन और मुंबई में 1-1 फ्लैट, दो स्विस बैंक खाते और मुंबई में एक खाता शामिल है। इसके बाद दोनों ने सरकारी गवाह बनने की अनुमति माँगी।

बता दें बेल्जियम की नागरिक पूर्वी ईडी द्वारा दर्ज मामले में आरोपित है, जबकि नीरव मोदी PNB में $2 बिलियन बैंक धोखाधड़ी मामले में मुख्य अभियुक्त है। मनी लांड्रिंग निरोधक कानून (पीएमएलए) के तहत मामलों को देखने वाले विशेष न्यायाधीश वीसी बर्डे ने सोमवार को सरकारी गवाह बनने को लेकर पूर्वी के आवेदन को स्वीकार कर लिया। अदालत ने कहा कि मामले में माफी माँगने के बाद आरोपित (पूर्वी मोदी) अब सरकारी गवाह होगी।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि, “आरोपित फिलहाल विदेश में रह रही है। उसे अदालत के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया जाएगा। इसके लिए अभियोजन पक्ष जरूरी कदम उठाएगा।”

गौरतलब है कि इससे पहले प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बैंक धोखाधड़ी मामले में पूर्वी मोदी, मयंक मेहता और अन्य को विशेष पीएमएलए अदालत के समक्ष सह-अभियुक्त बनाया था। पीएमएलए के तहत जाँच में पता चला था कि पूर्वी मोदी के पास एक दर्जन बैंक खाते हैं और विदेशों में विभिन्न कंपनियों/ट्रस्टों की ओनरशिप है।

बता दें 2 अरब डॉलर के पीएनबी घोटाले में नीरव मोदी मुख्य आरोपित है। पीएनबी घोटाला उजागर होने के बाद वह भारत से भाग गया था। नीरव मोदी और उसका मामा मेहुल चोकसी देश छोड़ कर तब भागे जब पीएनबी ने उनके खिलाफ 11,300 करोड़ के ऋण धोखाधड़ी के मामले रिपोर्ट दर्ज की थी।

एक साल की जाँच-पड़ताल के बाद आखिरकार उसे पिछले साल 20 मार्च को लंदन में गिरफ्तार किया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, वह पश्चिम लंदन के एक अल्ट्रा-लग्जरी अपार्टमेंट में रह रहा था। उसकी जमानत याचिका कई बार ख़ारिज हो चुकी है और वह ब्रिटेन की जेल में है।

मामले में अन्य मुख्य आरोपित नीरव मोदी का मामा मेहुल चोकसी अब एंटीगुआ की नागरिकता ले चुका है और वहीं रह रहा है। भारत सरकार उसके प्रत्यर्पण के लिए भी प्रयास कर रही है। भारत में ED द्वारा नीरव मोदी और चोकसी के प्रॉपर्टी, मकान, लक्ज़री आइटम और व्यापार परिसर समेत कई हजार करोड़ रुपए जब्त किए जा चुके हैं।

इससे पहले जून में ईडी ने हांगकांग में दोनों के हीरे और लक्जरी मोती के आभूषणों की कई खेप बरामद की थी और 1300 करोड़ रुपए से अधिक की विभिन्न संस्थाओं की 108 खेपों को वापस लाया था।

ISIS आतंकी शिहाबुद्दीन को NIA ने किया गिरफ्तार: तमिलनाडु पुलिस के SSI विल्सन हत्याकांड में थी तलाश

नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) ने तमिलनाडु पुलिस के विशेष सब इंस्पेक्टर विल्सन हत्याकांड में शामिल चेन्नई के रहने वाले छठे हत्यारोपित शिहाबुद्दीन (39) उर्फ खालिद (सिराजुद्दीन) को कतर से चेन्नई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा पहुँचने पर गिरफ्तार कर लिया। दरअसल, आरोपित जनवरी 2020 से फरार था। शिहाबुद्दीन हत्याकांड के बाद कतर भाग गया था।

अधिकारियों ने लुकआउट सर्कुलर के आधार पर शिहाबुद्दीन को हिरासत में लिया। जिसके बाद उसे राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) के हवाले कर दिया गया। बता दें हत्या में शामिल अन्य सभी आतंकवादियों को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका हैं।

एनआईए द्वारा जारी प्रेस रिलीज के अनुसार, हत्याकांड 8 जनवरी 2020 को घटित हुआ था। विल्सन कन्याकुमारी में केरल से लगने वाली सीमा पर एक चेक प्वाइंट पर तैनात थे। उसी दौरान आतंकवादी अब्दुल शमीम और तौफीक ने अवैध हथियारों का इस्तेमाल कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया था।

एजेंसी ने 10 जुलाई को विल्सन हत्या मामले में आरोपित अब्दुल शमीम, तौफीक, खाजा मोहीदीन, महबूब पाशा, इजास पाशा और जाफर अली का उल्लेख करते हुए चार्जशीट दायर की थी और उन पर धारा 120बी, 302, 353 और 506 (ii) IPC 34, धारा 16, 18, 18B, 20, 23, 38 और 38 UA (P) अधिनियम, 1967, और धारा 25 (1B) (a) और 27 आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया था।

आतंकी कनेक्शन सामने आने के बाद मामले को तमिलनाडु पुलिस से एनआईए को सौंप दिया गया था। जिसके बाद एनआईए ने 1 फरवरी 2020 को मामला फिर से दर्ज किया था और शमीम और तौफीक को गिरप्तार किया गया था। इस साजिश में शिहाबुद्दीन भी शामिल था। एसएसआई विल्सन की हत्या में प्रारंभिक जाँच से पता चला था कि उनके हत्यारे “स्व-घोषित जिहादी” थे, जिन्होंने तमिलनाडु पुलिस द्वारा अपने ISIS सहयोगी, मोहम्मद हनीफ खान (29), इमरान खान (32) और मोहम्मद जैद (24) की गिरफ्तारी का बदला लेने के लिए पुलिसकर्मी की हत्या कर दी थी।

उन्होंने कहा कि यह मामला पिछले साल आठ जनवरी को अब्दुल शमीम और तौफीक नाम के आतंकवादियों द्वारा तमिलनाडु पुलिस के विशेष उप-निरीक्षक विल्सन की हत्या से संबंधित है। प्रवक्ता ने कहा कि विल्सन की पिछले साल आठ जनवरी की रात को उस वक्त गोली मारकर हत्या कर दी गई थी जब वह कन्याकुमारी में केरल से लगने वाली सीमा पर एक चेक प्वाइंट पर तैनात थे। तमिलनाडु सरकार ने विल्सन के परिवार को एक करोड़ रुपए के मुआवजे और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की घोषणा की थी।

बेंगलुरु में अपने आईएसआईएस के सहयोगियों की गिरफ्तारी के जवाब में आतंकवादियों ने अगले दिन विल्सन को तमिलनाडु के कालियाक्कविलाई (Kaliyakkavilai) में पद्मथलुमुडु (Padanthalumoodu) चेक-पोस्ट पर गोली मार दी थी। पुलिस के मुताबिक, 2014 में हिंदू मुन्नानी नेता की हत्या के मामले में शमीम जमानत लेने के बाद से फरार चल रहा था।

गौरतलब है कि आतंकियों को 15 जनवरी, 2020 को गिरफ्तार किया गया था। जिसके बाद इस बात का खुलासा हुआ था कि उन्होंने यह हमला अपने सहयोगियों की गिरफ्तारी का बदला लेने और लोगों के मन में आतंक फैलाने के लिए किया था।

राजदीप गिरोह का वैचारिक दोगलापन: संसद हमले को ‘महान दिन’ कहने वाले कैपिटल हिल हंगामे से हलकान

अमेरिका के कैपिटल हिल में सैंकड़ों ट्रंप समर्थकों के हंगामे के बाद भारतीय लिबरल सदमे में हैं। यूएस की संसद परिसर में हुए हमले को देखकर लिब्रांडु गिरोह का कहना है कि ये अमेरिका में हुआ हमला भारत जैसे लोकतंत्र के लिए चेतावनी है। 

सोशल मीडिया पर इस गिरोह के नामी गिरामी सदस्य यूएस में हुई घटना को आतंकी हमला जैसा बताकर भारत के प्रति अपनी चिंता जाहिर कर रहे हैं। इस्लामी एजेंडे की सबसे बड़ी वाहक राणा अयूब लिखती हैं, 

“ये एक रिमाइंडर है भारत जैसे लोकतंत्र के लिए। वो दिन दूर नहीं जब हम अपनी मिट्टी पर इस आतंक के गवाह बनेंगे। ऐसे घटिया वर्चस्व को सोशल मीडिया और कॉन्सिपिरेसी थ्योरी के जरिए हमारे पीछे फैलाया जा रहा है। हम इसे दिन पर दिन तैयार होते देख रहे हैं।”

स्वघोषित नेहरू प्रशंसक सागरिका घोष व राजदीप सरदेसाई की पत्नी इस हमले को भारतीय लोकतंत्र से जोड़ती हैं और हमारी डेमोक्रेसी को बेहद नाजुक करार देती हैं। वह लिखती हैं,

”जब ऐसे दृश्य विश्व की सबसे पुराने लोकतंत्र में नजर आ रहे हैं तो उन देशों के लिए यह पूर्वसूचना है जहाँ लोकतंत्र भयावह रूप से कमजोर है। जैसे भारत।”

आरफा खान्नुम शेरवानी ने तो यूएस संसद परिसर में ट्रंप समर्थकों की नाराजगी को बाबरी विध्वंस से जोड़ दिया। शेरवानी ने लिखा, “हाँ, ये अमेरिका का ‘बाबरी मस्जिद विध्वंस’ का क्षण है।” वह भारतीय न्यायव्यवस्था पर तंज कसते हुए कहती हैं कि उन्हें विश्वास है कि अमेरिका के कोर्ट इसके बावजूद कैपिटल हिल को सफेद वर्चस्ववादी आतंकियों को नहीं सौंपेंगे।

सबसे अजीब बात इन लिबरलों के तर्कों में यह है कि इनकी बयानबाजी में सिर्फ़ कुंठा है न कि कोई तथ्य। अगर होता तो सोचिए कैपिटल हिल और बाबरी के बीच कोई तुलना होती? जाहिर है कैपिटल हिल हिंदू मंदिर के मलबे के ऊपर नहीं बनाया गया। अगर कंपैरिजन होना चाहिए तो कैपिटल हिल का भारतीय संसद से होना चाहिए, जहाँ सदस्य इकट्ठा होकर नीति निर्माण आदि करते हैं।

याद करिए, सबसे सटीक तुलना इस हमले की यदि भारतीय परिप्रेक्ष्य में की जाए तो यहाँ 2001 में भारतीय संसद पर हुआ हमला है। लेकिन, ये लिब्रांडु उस पर बात नहीं करेंगे। क्योंकि ये जानते हैं कि इनके गिरोह के सदस्यों ने उस समय कैसी प्रतिक्रियाएँ दी थी। 

राजदीप सरदेसाई एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने भारतीय संसद पर हुए हमले को ‘अ ग्रेट डे (एक महान दिन)’ कहा था। सरदेसाई ने देश की संसद पर हुए हमले पर बात करते हुए कहा था कि कैसे वह संसद के बगीचे में पिकनिक मना रहे थे जब आतंकी पार्लियामेंट पर हमला कर रहे थे।

सरदेसाई ने अपने कैमरामैन से कहा था कि वह बंद गेट को देखें ताकि कोई दूसरा चैनल न घुस पाए। ये वो समय था जब न्यूज पहुँचाने के लिए चैनल बहुत कम थे और सरदेसाई इस बात को लेकर उत्साहित थे कि उन्हें आतंकी हमला कवर करने के लिए एक बड़ी स्टोरी मिल गई।

इसी प्रकार, अफजल गुरु की मौत याद है? भारतीय संसद पर हमला करने के लिए उसे 9 फरवरी 2013 को फाँसी पर लटकाया गया था। राणा ने इसी घटना को आधार बना कर कहा था कि अफजल के साथ जो भारत ने किया वहीं पाकिस्तान सरबजीत के साथ कर रहा है। उन्होंने अफजल की मौत को ‘कट्टरपंथियों का तुष्टिकरण’ और ‘न्यायिक प्रक्रिया पर धब्बा’ कहा था।

अफजल की मौत पर जेएनयू से आवाज उठी थी- अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं। उस समय उसी उमर खालिद के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मामला चला था जिसे हाल ही में 2020 के दंगों के लिए भी आरोपित बनाया गया है।

मगर, भारतीय लिबरल क्या कर रहे हैं? खालिद जैसों का समर्थन और उसे जेल से छुड़ाने की माँग। इसलिए जब ऐसे दो चेहरे वाले लोग यूएस की संसद के बाहर हुए हंगामे पर सदमे में जाने का नाटक करते हैं, तो यह सिर्फ़ उनके पाखंडी चेहरे की हकीकत दिखाता है।

भूख, पिटाई, शोषणः नफीसा ने बताया कैसे औरतों की जिंदगी जहन्नुम बनाता है शफी, कई महिलाओं ने की घर वापसी

एक माँ के लिए अपने बच्चों का पेट भरना सबसे पहली प्राथमिकता होती है। इसके लिए वह खुद हर पीड़ा झेल लेती है। हैदराबाद की नफीसा (बदला हुआ नाम) के लिए भी उसके बच्चे सबसे पहले थे। एक समय तक दो-दो नौकरी से 8000 प्रति माह उपार्जन कर उसने बच्चों का पेट भरा। लेकिन कोविड के कारण उपजी परिस्थितियों में उसके रोजगार छिन गया और वह एक धोखेबाज ट्रैवल एजेंट शफी के जाल में फँसने को मजबूर हो गई। 

शफी ने उसकी मजबूरी का फायदा उठाते हुए उसे दुबई भेजने का लालच दिया। कहा कि उसे वहाँ 40,000 रुपए की नौकरी मिलेगी। वहाँ जाकर उसे नौकरी तो मिली लेकिन सैलरी के बदले उसे असहनीय प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा। भयावह बात यह है कि शफी ने केवल नफीसा की हँसती-खेलती जिंदगी को जहन्नुम में नहीं झोंका, बल्कि उसके साथ कई महिलाओं को भेजकर भी वही हश्र करवाया जो नफीसा का हुआ।

दुबई में भारतीय आव्रजन प्राधिकरण (Indian immigration authorities) के प्रयासों के बाद नफीसा 4 माह बाद हैदराबाद अपने घर लौट आई है। 27 साल की इस महिला ने भारत पहुँच कर आपबीती सुनाई। पीड़िता ने बताया कि शफी ने उसे दुबई के पार्लर में 40,000 की सैलरी दिलाने का वादा किया था। उसे लगा कि दिल की बीमारी से जूझ रही बड़ी बेटी के इलाज के लिए उसने जो 2 लाख उधार लिया था वो सब इससे चुक जाएगा। कोई भविष्य में फिर उससे तकादा करने नहीं आएगा। उसे कहीं ब्याज नहीं देना होगा। यही सब सोच कर नफीसा तुरंत मान गई।

उसने मोइनपुरा निवासी शफी को संपर्क किया और दुबई जाने की इच्छा जताई। शफी ने फौरन अवैध कागजों का इंतजाम किया और उसे दुबई भेज दिया। वहाँ जाने से पहले तक नफीसा उस शफी को इतनी मदद करने के लिए दुआएँ दे रही थीं, लेकिन उसे नहीं पता था कि वहाँ उसकी जिंदगी कितनी बदलने वाली है।

द न्यूज मिनट में प्रकाशित उसकी आपबीती के अनुसार वह 12 सितंबर दुबई पहुँची थी। लेकिन, वहाँ जाकर उसे जिस महिला ने काम दिया। उसने उसकी जिंदगी जहन्नुम से बदतर बना दी। नफीसा बताती है कि वह महिला उसे मारती थी और घर का सारा काम सुबह 5 बजे से 2 बजे तक करवाती थी। एक दिन तंग आकर जब उसने काम करने से मना किया और अपनी पगार माँगी तो उसे एक कमरे में बंद कर दिया गया और खाना-पीना देना बंद कर दिया।

4 महीने तक नफीसा ने यह दुख झेला। बिना पगार एक अंजान देश में काम किया। 30 लोगों के साथ वह एक अकेले कमरे में रही, जहाँ शौचालय केवल एक था। उनकी कॉन्ट्रैक्ट एजेंसी उन सबको हर रोज काम के लिए ले जाती थी।

वह बताती है कि इस एजेंसी के कार्यालय में रहते हुए उन्होंने 5 दिन बाथरूम के नल से पानी पी पीकर गुजारे। एक दिन खुशकिस्मती से वह भागकर अस्पताल पहुँच गई। वहाँ आपबीती सुनाई और घर जाने के लिए मिन्नते कीं। बाद में जाकर दुबई में मौजूद इंडियन इमिग्रेशन अथॉरिटी के प्रयासों से उसे बचाया गया। उसके साथ 25 और महिलाएँ बच पाईं।

दुबई से लौटी रेशमा की कहानी

नफीसा की भाँति 20 साल की रेशमा (बदला हुआ नाम) भी हालातों से परेशान होकर दुबई गई थी। उसकी मजबूरी थी कि उसके शौहर का स्वास्थ्य सही न होने के कारण वह दो साल से घर में ही रहते थे और उनके इलाज में 1 लाख का खर्चा आना था। उसे कुछ भी करके पैसे इकट्ठा करने था। इसीलिए शफी से मिल कर उसने दुबई जाने की इच्छा व्यक्त की। वह चाहती थी कि वह जाकर पैसे कमाए और सर्जरी के लिए पर्याप्त राशि जुटा सके। पहली बार में उसका वीजा रिजेक्ट हो गया, लेकिन बाद में किसी प्रकार वह वहाँ पहुँच गई।

वह बताती है,” सबसे पहली बार में हैदराबाद एयरपोर्ट अधिकारियों ने मेरा वीजा रिजेक्ट करके मुझे वापस भेज दिया था। उन्हें लगा था कि मैं छोटी हूँ और मेरे वहाँ जाने में कुछ गड़बड़ हो सकती है। वह कहती है कि शायद पहली बार में रिजेक्ट हुआ वीजा खुदा का इशारा था कि मैं अपना फैसला बदल लूँ, लेकिन शफी ने मुझपर दबाव बनाया और भविष्य व उधारी की बात कर करके वहाँ भेजने के लिए मना लिया। मैं चली गई।”

रेशमा का यह फैसला उस पर बहुत भारी पड़ा। अपनी मालिक द्वारा उसे असहनीय प्रताड़ना दी गई। वह कहती है कि उन्हें भूखा रखा गया और अमानवीय स्थिति में काम करवाया जाता रहा। जब शफी से उसने लौटने को कहा तो उसने उससे गाली-गलौच करके उसके शौहर से डेढ लाख रुपए माँगे।

ट्रैवल एजेंट हुआ गिरफ्तार

शफी का यह धोखाधड़ी का धंधा ज्यादा दिन नहीं चला। 11 दिसंबर 2020 को एक पीड़ित की बहन की शिकायत पर शलिबंद पुलिस ने उसे आईपीसी की धारा 420 के तहत गिरफ्तार कर लिया। महिला तस्करी का यह पूरा मामला उस समय जानकारी में आया जब शिकायतकर्ता ने मजलिस बचाओ तहरीक पार्टी के नेता अमजद खान को संपर्क किया। अमजद चूँकि पहले भी बाहरी देशों में फँसे लोगों की मदद कर चुके थे, तो उन्होंने यह मामला उठाया और कई पीड़िताएँ बचाई गईं।

अब तक 10 महिलाएँ हैदराबाद लौट चुकी हैं। वह कहते हैं कि सरकार ऐसे धोखेबाजों के ख़िलाफ़ बहुत नरम रवैया अपनाती है और इनके ख़िलाफ़ जमानती धाराओं में मामले दर्ज होते हैं। कई महिलाओं की इसी तरह तस्करी हुई और हर बार पुलिस ने उन्हीं धाराओं में केस दर्ज करके आरोपितों को छोड़ दिया गया।

हैदराबाद के 5 परिवारों ने लगाई थी भारत सरकार से गुहार

बता दें कि इससे पहले ट्रैवल एजेंट शफी के जाल में फँसी 5 महिलाओं के परिवार ने भारत सरकार से मदद की गुहार लगाई थी। एएनआई से बात करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता अमजद उल्लाह खान ने इनके बारे में विस्तार से जानकारी दी थी। उन्होंने बताया था, “तेलंगाना हैदराबाद स्थित मिसरीगंज के लोकल एजेंट सैफी ने हैदराबाद की ही 5 महिलाओं को दुबई के एक शॉपिंग मॉल में नौकरी दिलाने की बात कही थी। अक्टूबर 2020 में उसने पाँचों महिलाओं को तीन महीने के वीज़ा पर दुबई भेजा और फिर उन्हें दुबई की लेबर रिक्रूटमेंट कंपनी में काम करने वाले अल सफीर को सौंप दिया। इसके बाद प्रत्येक महिला को 2 लाख रुपए में बतौर घरों में काम करने वाली नौकरानी, अरब परिवारों को बेच दिया गया।” 

महिलाओं के हालात का ज़िक्र करते हुए अमजद उल्लाह ने बताया, “इन महिलाओं को पर्याप्त खाना और रहने की जगह दिए बिना ही इनसे 15 घंटे तक काम करवाया जाता है। इन महिलाओं को बातें नहीं सुनने पर यातनाएँ दी जाती हैं और अक्सर यौन शोषण तक किया जाता है। ये जब से दुबई गई हैं तब से ही इन्हें वेतन भी नहीं मिला है।” 

उन्होंने भारत सरकार से निवेदन किया था कि वह जल्द से जल्द इस मामले में दखल देकर मदद करें। अबू धाबी, यूएई में मौजूद भारतीय दूतावास और दुबई में मौजूद भारतीय वाणिज्य दूतावास मदद के लिए आगे आए ताकि इन महिलाओं को इस मुश्किल से बचाया जा सके और इनकी देश वापसी संभव हो सके। 

5 लाख गाँव में जाएँगे स्वयंसेवक, 10 करोड़ परिवार से करेंगे संपर्क: RSS ने बताया राम मंदिर के लिए कैसे जुटाएगा चंदा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अयोध्या के राम मंदिर निर्माण को लेकर बड़ा ऐलान किया है। ऐलान के मुताबिक़ वह अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए चंदा इकट्ठा करने के लिए 5 लाख गाँवों में स्वयंसेवकों को भेजेगा। यह निर्णय गुजरात में 5 से 7 जनवरी तक चली संघ की राष्ट्रीय समन्वय समिति की बैठक में लिया गया। बैठक में संघ के तमाम अनुषांगिक संगठन के प्रतिनिधि शामिल हुए। बैठक के पहले दिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा भी मौजूद थे। 

संघ के वरिष्ठ अधिकारी कृष्ण गोपाल ने कहा, “5 अगस्त को अयोध्या में भूमि पूजन होने के बाद देश भर के लोग यही चाहते हैं कि भव्य राम मंदिर का निर्माण हो। हमारे स्वयंसेवक देश भर के 5 लाख गाँवों में जाकर इसके लिए आर्थिक सहयोग इकट्ठा करेंगे। इस बीच हम 10 करोड़ परिवारों से सीधे संपर्क करेंगे। हमारा प्रयास होगा कि हमें हर एक परिवार से पूरा सहयोग प्राप्त हो। राम मंदिर निर्माण के लिए कम से कम सहयोग राशि 10 रुपए होगी। जो लोग इससे अधिक आर्थिक सहयोग करने की इच्छा रखते हैं वह 100 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक का आर्थिक सहयोग कर सकते हैं। समृद्ध वर्ग से आने वाले लोग अपनी इच्छानुसार इससे अधिक आर्थिक सहयोग भी कर सकते हैं।”        

संघ की बैठक में विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता और राम मंदिर ट्रस्ट के जनरल सेक्रेट्री चम्पत राय भी शामिल हुए। इसके पहले विश्व हिन्दू परिषद ने राम मंदिर निर्माण के लिए आर्थिक सहयोग इकट्ठा करने के लिए बड़ा अभियान चलाने का ऐलान किया था। संघ और विश्व हिन्दू परिषद का यह अभियान संभावित तौर पर 15 जनवरी से शुरू होगा। इस पर राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के जनरल सेक्रेट्री चम्पत राय ने कहा था, “जो राम भक्त अपनी इच्छा से आर्थिक सहयोग करना चाहते हैं उनके लिए 10,100 और 1000 रुपए के कूपन उपलब्ध कराए जाएँगे।” 

संघ की इस तीन दिवसीय राष्ट्रीय समन्वय समिति की बैठक में राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ पश्चिम बंगाल चुनाव और कृषि सुधार क़ानूनों के विरोध में जारी किसान आंदोलन के मुद्दे पर भी चर्चा हुई।