उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के जलालाबाद कस्बे में गुरुवार (3 अप्रैल, 2025) रात कुरान के पन्ने फाड़ने की घटना सामने आई। पुलिस ने इस मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपित युवक को हिरासत में ले लिया है। घटना जलालाबाद थाना क्षेत्र में तहसील रोड पर हुई, जो थाना परिसर से मात्र 50 मीटर की दूरी पर है।
घटना का विवरण
गुरुवार रात करीब 9 बजे कुछ स्थानीय मुस्लिमों ने कुरान के कुछ पन्ने फटे हुए देखे, जिसके बाद क्षेत्र में हंगामा मच गया। देखते ही देखते घटनास्थल पर हजारों मुस्लिमों की भीड़ जुट गई। सूचना मिलते ही पुलिस अधीक्षक (एसपी) राजेश द्विवेदी भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुँचे। इसके बाद उन्होंने आक्रोशित मुस्लिम भीड़ को शांत करने का प्रयास किया। बार-बार चेताने के बाद भी शांत न होने पर पुलिस ने उन्हें लाठियाँ भाँजकर खदेड़ा और हालात को नियंत्रित किया।
सीसीटीवी फुटेज से आरोपित की पहचान
पुलिस ने घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की जाँच की, जिसमें एक युवक कुरान के पन्नों को हवा में उड़ाता हुआ नजर आया। फुटेज के आधार पर आरोपित की पहचान नजीम के रूप में हुई, जो जलालाबाद कस्बे का ही निवासी है। पुलिस ने आरोपित को रात में ही हिरासत में ले लिया।
पुलिस का बयान
एसपी राजेश द्विवेदी ने मीडिया को जानकारी देते हुए कहा, “घटना के तुरंत बाद पुलिस ने मौके पर पहुँचकर भीड़ को शांत कराया और स्थिति को नियंत्रण में लिया। सीसीटीवी फुटेज की जाँच में आरोपित की पहचान हुई, जिसे हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है।”
दि-03.04.25 को रात्रि में थाना जलालाबाद क्षेत्र में धार्मिक पुस्तक के फटे हुए पन्ने मिलने की सूचना पर तत्काल संज्ञान लेते हुए CCTV व अन्य जानकारी के माध्यम से एक नजीम नाम के व्यक्ति को हिरासत में लेने व अग्रिम कार्यवाही के सम्बन्ध में #श्री_राजेश_द्विवेदी SP_शाहजहाँपुर की बाईट। pic.twitter.com/a9cpLf1VKG
— SHAHJAHANPUR POLICE (@shahjahanpurpol) April 3, 2025
आरोपित की मानसिक स्थिति पर सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि आरोपित नजीम मानसिक रूप से अस्वस्थ है। हालाँकि, पुलिस इस दावे की सत्यता की जाँच कर रही है। एसपी द्विवेदी ने बताया कि इलाके में शांति बनी हुई है और पुलिस हर स्थिति पर कड़ी नजर रख रही है।
माहौल शांत, पुलिस सतर्क
घटना के बाद से इलाके में किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए पुलिस बल तैनात किया गया है। प्रशासन की अपील है कि लोग अफवाहों पर ध्यान न दें और शांति बनाए रखें। पुलिस इस मामले में आगे की जाँच कर रही है और आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाएगी। विदेश में भी कुरान के साथ छेड़छाड़ की घटनाएँ होती रही रही है। स्वीडन में कुरान जलाने वाले इराकी व्यक्ति सलवान मोमिका की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में एक मिशनरी नर्सिंग कॉलेज में ईसाई धर्मांतरण का खेल सामने आया है। यहाँ छात्राओं पर ईसाइयत अपनाने का दबाव डाला जाता है। अगर वह न मानें तो परीक्षा न देने के साथ अन्य तरह से परेशान किया जाता है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटना जशपुर के कुनकुरी थाना क्षेत्र के तहत होलीक्रॉस नर्सिंग कॉलेज है। यहाँ नर्सिंग की फाईनल ईयर की छात्रा ने प्रिंसिपल विंसी जोसेफ पर धर्मांतरण का दबाव बनाने का आरोप लगाया है। छात्रा का कहना है कि जीएनएम फर्स्ट ईयर में एडमिशन लेने के तीन महीने के बाद प्रिंसिपल ने अपने पास बुलाकर हिंदू से ईसाई बनने का ऑफर दिया।
छात्रा ने इस बात को नजरअंदाज किया तो ये प्रस्ताव, दबाव में बदल गया। प्रिंसिपल विंसी बार-बार धर्मांतरण कर नन बनने के लिए कहती। जब छात्रा ने इसके लिए साफ तौर पर मना कर दिया तो कॉलेज प्रबंधन ने उसे परेशान करना शुरू कर दिया। उसकी अटेंडेंस नहीं लगाई जाती थी।
छात्रा ने बताया कि उसे कक्षा से बाहर कर दिया जाता था। उसके कॉलेज परिसर में आने से रोक लगा दी गई। फिर 1 अप्रैल 2024 को उसे हॉस्टल से निकाल दिया गया। पढ़ाई और वार्षिक परीक्षा में भी न बैठने देने का प्रयास किया गया।
छात्रा ने इस बात की शिकायत उच्चाधिकारियों से की तो उसे परीक्षा में तो बैठने दिया गया लेकिन प्रैक्टिकल परीक्षा में फेल करने की धमकी दी। अब इस पूरे मामले पर छात्रा ने कलेक्टर और एसपी से लिखित शिकायत कर कार्रवाई की माँग की है।
पीड़ित छात्रा के पिता दिव्यांग हैं। उसकी माँ ने मीडिया को बताया,”बेटी ने कई बार इस प्रताड़ना के विषय में जानकारी दे चुकी है। उसे कॉलेज की सिस्टर (प्रिंसिपल) बार बार उसे नन बनने को कहती थी। मैंने उसे हमेशा यही का कि वो पढ़ाई पर ध्यान दे। अगर नन ही बनना है तो हमारे हिंदू धर्म में भी ब्रह्मकुमारी हैं। उसमें चली जाना। कॉलेज वाले लोग बच्ची की छोटी सी गलती पर भी हमको बुला कर बहुत डाँटते थे। हम कुछ नहीं कहते थे क्योंकि हम गरीब लोग हैं। बच्ची को किसी तरह पढ़ा रहे हैं।”
हिंदू संगठनों ने की कॉलेज बंद करने की माँग
छात्रा के साथ हुई इस मानसिक प्रताड़ना को लेकर छत्तीसगढ़ के भाजपा नेता और अखिल भारतीय घर वापसी संगठन के प्रमुख प्रबल प्रताप सिंह जूदेव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा,”शिक्षा के आड़ में धर्मांतरण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। होलीक्रॉस नर्सिंग कॉलेज (कुनकुरी) जिला जशपुर में बहन छात्रा को जबरन प्रताड़ित कर धर्मांतरण करने वालों को बिलकुल बख्शा न जाए, संबंधित प्राचार्या के खिलाफ कानूनी कारवाई हो और उस संस्था की मान्यता रद्द करके तत्काल बंद किया जाए।”
"शिक्षा के आड़ में धर्मांतरण बर्दाश्त नही किया जाएगा "
होलीक्रॉस नर्सिंग कॉलेज (कुनकुरी) जिला जशपुर में बहन छात्रा कु. अमिशा बाई को जबरन प्रताड़ित कर धर्मांतरण करने वालो को बिलकुल बक्शा न जाए, संबंधित प्राचार्या के खिलाफ कानूनी कारवाई हो और उस संस्था की मान्यता रद्द करके तत्काल…
— Prabal Pratap Singh Judev (@prabaljudevBJP) April 3, 2025
इस घटना के बाद हिंदू संगठनों में रोष व्याप्त है। विश्व हिंदू परिषद के जिला प्रमुख करनैल सिंह ने गरीब हिंदू लड़की के धर्मांतरण करने के खिलाफ आरोपितों पर तुरंत कार्रवाई करने और कॉलेज को बंद करने की माँग की है।
जून 2024 में जब लोकसभा चुनाव के परिणाम आए थे तब कॉन्ग्रेस ने ऐसे जश्न मनाया था जैसे वो चुनाव ही जीत गई हो। 99 सीटों पर अटकी कॉन्ग्रेस ने भाजपा को 240 सीटों पर रोकना ही अपने लिए सबसे बड़ी सफलता माना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी लोकप्रियता से एक ऐसा बेंचमार्क सेट किया कि कॉन्ग्रेस समझ ही नहीं पाई कि उसे कहाँ ले जाया जा रहा है। ‘400 पार’ के नारे में कॉन्ग्रेस समेत पूरा विपक्ष ऐसा उलझा कि NDA को 400 पर रोकने और फैज़ाबाद लोकसभा सीट जीतने की खुशियाँ मनाने में वो ये भी भूल गया कि PM पद की शपथ तो मोदी ही लेने वाले हैं।
कॉन्ग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत को तो प्रफुल्लित होकर पार्टी के वॉररूम में मुट्ठी भींच कर लहराते हुए भी देखा गया। ख़ैर, ये तो थी नेताओं की बात। अब आते हैं मीडिया पर। मीडिया में एक बहस छिड़ गई कि आख़िर मोदी सरकार के कोर एजेंडों का क्या होगा। जैसे – वक़्फ़ बोर्ड में सुधार, UCC (समान नागरिक संहिता), मुस्लिम आरक्षण ख़त्म करना और वर्शिप एक्ट में बदलाव। अब भाजपा ने लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सदनों में वक़्फ़ बिल को पारित करा के 2 चीजें एकदम साफ़ कर दी हैं।
संख्याबल को लेकर निश्चिंत है भाजपा, वक्फ पर हुई गहन चर्चा
पहली, भाजपा अपने कोर एजेंडे से भटकने वाली नहीं है। दूसरी, भाजपा के पास इस तरह के बदलावों के लिए संख्याबल मौजूद है। अपने दूसरे कार्यकाल में पार्टी ने राम मंदिर निर्माण से लेकर जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद-370 व 35A निरस्त करने और CAA जैसा क़ानून लाने जैसे बड़े फ़ैसले लिए। हाँ, किसान सुधार बिल ज़रूर वापस लेने पड़े लेकिन वो भाजपा के कोर हिंदुत्व या राष्ट्रवाद वाले एजेंडे का हिस्सा नहीं था। ‘दैनिक भास्कर’ ने जून 2024 में एक ‘एक्सप्लेनर’ के जरिए समझाया था कि कैसे नीतीश-नायडू कभी UCC लागू नहीं होने देंगे। साथ ही शंका जताई थी कि भाजपा के कोर मुद्दों का क्या होगा।
वक़्फ़ संशोधन विधेयक को पहले ‘संयुक्त संसदीय समिति’ (JPC) के पास भेजा गया, उसके बाद इसे लोकसभा में 288-232 और राज्यसभा में 128-95 के बहुमत के साथ पारित कराया गया। बड़ी बात ये है कि जदयू और TDP जैसे साथी दलों ने भी भाजपा का साथ दिया। जबकि ये दोनों पार्टियाँ और इसके नेता सेक्युलर छवि बनाए रखने के लिए जाने जाते हैं। चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार इफ्तारी नेताओं में से एक हैं। इतना ही नहीं, महादलित नेताओं चिराग पासवान की LJP और जीतन राम माँझी की HAM भी सरकार के साथ खड़ी रही। यहाँ तक कि नवीन पटनायक ने अपनी BJD के सांसदों को भी स्वेच्छा से वोट करने के लिए स्वतंत्र कर दिया।
ख़ास बात ये रही कि वक़्फ़ बिल को पास कराने से पहले लोकसभा और राज्यसभा में गहन चर्चा हुई। दोनों सदनों में वोटिंग की प्रक्रिया रात के क़रीब 1 बजे पूरी कराई गई। भाजपा के शीर्ष नेता मिशन मोड में कार्य करने के लिए जाने जाते हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह स्वयं ही रात भर डटे रहे, लोकसभा में भी और फिर राज्यसभा में भी। केंद्रीय संसदीय व अल्पसंख्यक कार्यमंत्री किरेन रिजिजू बार-बार बिल के प्रावधानों को समझाते रहे और हर शंका का जवाब देते रहे।
एक और ध्यान देने वाली बात ये है कि इधर संसद में वक़्फ़ बिल पर चर्चा चल रही थी, उधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थाईलैंड में BIMSTEC की बैठक में हिस्सा लेने पहुँचे। पीएम मोदी लोकसभा सांसद भी हैं, ऐसे में भाजपा को अगर संख्याबल को लेकर ज़रा सी भी शंका होती तो बिल पास कराने का समय तब रखा जाता जब प्रधानमंत्री दिल्ली में होते। लेकिन, पार्टी इसे लेकर पहले से ही आश्वस्त थी। उत्तर प्रदेश में अक्सर बात-बात पर सांप्रदायिक हिंसा भड़क जाया करती थी, वहाँ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहले ही चेता दिया कि दंगों की स्थिति में दंगाइयों की बाप-दादा की कमाई संपत्ति भी चली जाएगी, क्योंकि नुक़सान की भरपाई उसी संपत्ति से होगी।
बतौर PM पहली बार RSS मुख्यालय पहुँचे मोदी, गठबंधन साथी भी सदन में साथ
साफ़ है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसी तरह सरकार चला रहे हैं जैसे उन्होंने तब चलाया था जब अकेले BJP के पास 303 सीटें हुआ करती थीं। रही बात UCC की तो उत्तराखंड में इसे पहले ही लागू किया जा चुका है और एक मॉडल के रूप में उसका अध्ययन किया जा रहा है। हाँ, मुस्लिम आरक्षण ख़त्म करने पर ज़रूर भाजपा को परेशानी आ सकती है लेकिन बहुत कुछ इसपर भी निर्भर करता है कि अक्टूबर में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में NDA का प्रदर्शन कैसी रहता है और नीतीश कुमार का स्वास्थ्य तबतक कैसा रहता है। अगले साल असम में भी चुनाव होने हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा ने रामनवमी को प्रतिष्ठा का विषय बनाया हुआ है। पार्टी चुनावी अभियानों में भी मिशन मोड में है। थोड़ी रणनीति बदली ज़रूर है, जिसका परिणाम महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली में जीत के रूप में मिला। अब तो संसद में अमित शाह ने यहाँ तक कह दिया है कि उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों में योगी आदित्यनाथ CM के रूप में रिपीट होने वाले हैं।
ये भी ध्यान दीजिए कि नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री 11 वर्षों में पहली बार नागपुर स्थित RSS के मुख्यालय पहुँचे। सरसंघचालक मोहन भागवत के साथ उन्होंने संघ के संस्थापक KB हेडगेवार और दूसरे सरसंघचालक MS गोलवलकर की समाधि ‘स्मृति मंदिर’ में श्रद्धासुमन अर्पित किए। यानी, ख़ुद प्रधानमंत्री संघ के साथ अपनी नज़दीकी दिखाने में भी नहीं हिचके। उन्होंने परवाह नहीं की कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया क्या कहेगा। संघ ने दिल्ली में अपना भव्य मुख्यालय भी बनवाया, भले ही इसमें उसे 100 वर्ष लग गए। कुल मिलकर सबकुछ वैसा ही चल रहा है जैसा 2014 और 2024 के बीच में चला करता था।
मुख्यधारा की राजनीति में हिंदुत्व की ज़ोरदार वापसी
हाल ही में मथुरा में हुई भाजपा-संघ की एक बैठक में भी RSS ने स्पष्ट कहा कि हिन्दू हितों का ध्यान रखना होगा। इससे पहले काशी और मथुरा में स्वयंसेवकों को सक्रिय भूमिका निभाने की सलाह RSS महासचिव दत्तात्रेय होसबोले दे चुके हैं। उधर विपक्ष हिन्दुओं को बाँटने की सारी साजिश रचकर थक चुका है। राहुल गाँधी प्रधानमंत्री के सचिवों में OBC/SC/ST गिनते रहते हैं और जातीय जनगणना की बातें करते रहते हैं, अखिलेश यादव का PDA फॉर्मूला भी जातिवाद पर आधारित है, दिल्ली चुनाव से पहले डॉ अंबेडकर के अपमान का मुद्दा बनाकर अमित शाह और भाजपा को घेरा गया – इसके बावजूद भाजपा का जनाधार कमजोर नहीं हुआ है।
अबतक तो वो समर्थक भी निराश हो चुके हैं जो ‘मोदी बनाम Who’ का जवाब I.N.D.I. गठबंधन का नाम लेकर दिया करते थे। उनका हतोत्साह का कारण ये है कि पिछले कुछ चुनावों में ये दल आपस में ही लड़ बैठे। अभी की स्थिति भी देखें तो बिहार में राजद और कॉन्ग्रेस के बीच में रार चल रही है। कॉन्ग्रेस ने राजद पर सीट शेयरिंग में दबाव बनाने के लिए कन्हैया कुमार को बिहार में पदयात्रा के लिए उतार दिया है। भाजपा के लिए ये आदर्श स्थिति है। समर्थक उत्साहित हैं। महाकुंभ 2025 के बाद हिंदुत्व एक बार फिर मुख्यधारा की राजनीति में वापसी कर चुका है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार (4 अप्रैल, 2025) को बैंकॉक में बिम्सटेक शिखर सम्मेलन के दौरान बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस से मुलाकात की। । पिछले साल बांग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख हसीना के पद से हटने के बाद यह उनकी पहली मुलाकात थी।
भारत-बांग्लादेश के बीच अहम बैठक
भारत और बांग्लादेश के बीच संबंध इन दिनों काफी तनावपूर्ण हैं। दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के साथ शेख हसीना के कार्यकाल में काफी मजबूत संबंध थे। अगस्त में तख्तापलट के बाद शेख हसीना ने भारत में शरण ली। बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ. यूनुस सरकार पाकिस्तान परस्त मानी जाती है।
भारत की शरणार्थी बनीं हसीना
बांग्लादेश में कट्टरपंथी संगठन के छात्रों के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर उपद्रव और हिंसा हुई थी, जिसके कारण शेख हसीना को देश छोड़कर भागना पड़ा। बांग्लादेश की बागडोर कट्टरपंथियों के हाथों में चली गई और भारत के खिलाफ नारेबाजी की गई। बांग्लादेश के साथ तनाव उस वक्त और बढ़ गया जब भारत ने शेख हसीना को शरण देने का फैसला किया। नई दिल्ली ने ढाका के शेख हसीना को देने के अनुरोध पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। बांग्लादेश की कट्टरपंथी सरकार शेख हसीना को मुकदमे का सामना करने के लिए स्वदेश भेजने की माँग कर रही है।
बांग्लादेश सरकार के प्रेस कार्यालय ने बताया है कि नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित मुहम्मद यूनुस ने बैंकॉक में बिम्सटेक शिखर सम्मेलन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। बिम्सटेक बहु-क्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग के लिए बनाया गया संगठन है जिसके सदस्य भारत, बांग्लादेश, थाईलैंड, म्यांमार, नेपाल, श्रीलंका और भूटान हैं।
बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे हैं अत्याचार
भारत ने बांग्लादेश से बार-बार अपने अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कहा है। दरअसल मोहम्मद यूनुस के सत्ता में आने के बाद से कट्टरपंथियों के निशाने पर हिन्दू आ गए हैं। हालांकि बांग्लादेश का कहना है कि हिंसा को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है और यह सांप्रदायिक मुद्दा नहीं है।
संबंधों को स्थिर करना होगी प्राथमिकता
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के विदेश नीति के प्रमुख हर्ष पंत ने कहा, “उम्मीद है कि इस बैठक से कुछ जुड़ाव फिर से बनाने की प्रक्रिया शुरू होगी।” “मुझे लगता है कि इस समय, शायद संबंधों को स्थिर करना ही प्राथमिकता होनी चाहिए।”
लंबे समय से चले आ रहे सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंधों के साथ, दोनों देश 4000 किलोमीटर (2500 मील) की सीमा साझा करते हैं। भारत ने बांग्लादेश के निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान पाकिस्तान की मुख्य भूमि से अलग हो गया था।
वक्फ कानून की असीमित शक्तियों पर लगाम कसने के लिए केंद्र की मोदी सरकार ने वक्फ संशोधन बिल पेश किया, जिसे संसद के दोनों सदनों में पारित कर लिया गया है। अब इस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने के बाद यह कानून बन जाएगा। इस बीच मुस्लिमों के विरोध को लेकर सरकारें सतर्क हैं। खासकर पिछले कुछ समय से रामनवमी पर हिंदुओं के खिलाफ होने वाली हिंसा को देखकर यह सतर्कता लाजिमी है।
हालात का अनुमान लगाकर उत्तर प्रदेश सरकार ने तो पुलिस कर्मियों की छुट्टियाँ रद्द कर दी हैं। उन्हें सेवा में वापस लौटने के लिए कह दिया गया है। दरअसल, वक्फ बिल को लेकर मुस्लिमों के मजहबी नेता से लेकर मुस्लिम संगठनों के प्रमुख तक वक्फ को लेकर अफवाह फैला रहे हैं और मुस्लिमों को एक तरह से उकसाने का काम कर रहे हैं। कुछ लोगों ने यहाँ तक धमकी दे दी है कि कृषि कानूनों की तरह इसे भी वापस लेना होगा।
वक्फ संशोधन बिल पर चर्चा के दौरान हैदराबाद से सांसद और तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन औवेसी पहले ही सदन में उसकी कॉपी फाड़ चुके हैं। वो ये भी कह चुके हैं कि इस बिल के माध्यम से सरकार मुस्लिमों की संपत्तियों को ही नहीं, बल्कि उनके मजहबी स्थलों- मस्जिद, दरगाह, कब्रिस्तान आदि पर कब्जा कर लेगी। उन्होंने इसका पुरजोर विरोध करने की बात कही थी।
हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने आगे कहा, “ये बिल मुस्लिमों के साथ अन्याय है। यह एक जंग का ऐलान है। हमारे मदरसों और मस्जिदों को निशाना बनाया जा रहा है। इस बिल से मुस्लिमों के अधिकारों को छीना जा रहा है। इस बिल से मुस्लिमों के अधिकारों को छीना जा रहा है। इसके जरिए मुस्लिमों को दूसरे दर्जे का शहरी बनाने की कोशिश की जा रही है।”
इस्लामी नेता इसहाक गोरा ने कहा कि यह बिल मुस्लिमों के धार्मिक स्वतंत्रता और कानूनी हकों पर सीधा हमला है। इससे मुस्लिमों की वक्फ संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण हो जाएगा। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) के प्रवक्ता सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा, “विधेयक पास हो जाता है तो हम इसके खिलाफ देशव्यापी आंदोलन शुरू करेंगे। हम चुप नहीं बैठेंगे।”
वहीं, जमीयत उलेमा-ए-हिंद इस बिल को बहुसंख्यकवादी मानसिकता वाला बताया है। संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि सरकार जबरन इस बिल को संसद में लाई है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद मुंबई के अध्यक्ष मौलाना सिराज खान ने तो धमकी तक दे डाली। उन्होंने कहा, “सरकार ध्यान से सुन ले, हम जेल जाने से डरते नहीं हैं।”
सिराज ने कहा, “हमारे किसी भी मामले में अगर सरकार दखलअंदाजी करेगी तो हम जेलों को आबाद करेंगे। हम अपनी आजादी के लिए सब कुछ करने को तैयार हैं। हमारे नबी ने जीने का जो तरीका बताया है, हम उसी के हिसाब से जीने की कोशिश करते हैं। दिल्ली के शाहीन बाग की तरह देश भर में धरना प्रदर्शन किया जाएगा। महाराष्ट्र में भी शाहीन बाग की तरह आंदोलन किया जाएगा।”
शाहीन बाग की तर्ज पर हिंसा भड़काने की कोशिश
जिस तरह मुस्लिम नेता और मौलाना बयान दे रहे हैं, वह भड़काने वाला है। इसी तरह बात नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर फैलाई गई थी कि CAA और NRC कानून के जरिए मुस्लिमों की नागरिकता छीन ली जाएगी। ठीक उसी तर्ज पर वक्फ बिल को लेकर भी अफवाह फैलाने की कोशिश। की जा रही है कि सरकार मुस्लिमों की संपत्तियों और मस्जिद-दरगाहों पर कब्जा कर लेगी।
अगर मुस्लिम नेताओं से लेकर धर्मगुरुओं के बयानों को देखें तो वक्फ संशोधन बिल को लेकर भी ये अफवाह फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि मुस्लिमों को भ्रमित करके अधिक से अधिक उनका समर्थन हासिल किया जा सके। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) को लेकर भी ऐसी ही अफवाह फैलाई गई थी।
उस समय तमाम नेता ने ऐसा ही किया था। जेल में बंद शरजील इमाम ने जामिया से लेकर तमाम देश के दूसरे हिस्सों तक में इसको लेकर अफवाह फैलाई थी। शरजील इमाम ने पैंफलेट छपवाकर कई मस्जिदों और यूनिवर्सिटी में बँटवाया और खुद बाँटा था। पैंफलेट में लिखा था कि मुस्लिमों को नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (CAA-NRC) का विरोध करना चाहिए>
पैंफलेंट सभी मुस्लिमों को एक साथ मिलकर विरोध करने की अपील की गई थी। मुस्लिमों को भड़काने के लिए इसमें कश्मीर से लेकर बाबरी ढाँचे तक का जिक्र गया था। उसमें लिखा गया था कि पहले कश्मीर, फिर बाबरी मस्जिद और अब CAA हुआ है। इस पैंफलेट में दिल्ली को डिस्टर्ब करने के लिए कहा गया था, ताकि दुनिया भर की मीडिया का ध्यान इस ओर जाए।
इस पैंफलेट बाँटने के एक दिन बाद 15 दिसंबर 2020 को कई जगहों पर हिंसा फैल गई थी। इसमें दिल्ली के जामिया मिलिया यूनिर्विसटी की हिंसा भी शामिल थी। आगे चलकर CAA-NRC के नाम पर की किए जा रहे विरोध प्रदर्शन को हिंसक बना दिया गया और आखिरकार फरवरी 2020 में पूर्वी दिल्ली के कई हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा फैल गई। इस हिंसा में कई लोगों की जान चली गई थी।
रामनवमी और हनुमान जयंती को लेकर सावधानी
शाहीन बाग की तर्ज पर ही वक्फ संशोधन बिल के विरोध के नाम पर एक बार फिर दिल्ली एवं अन्य जगहों को दहलाने की कोशिश की जा सकती है। रामनवमी पर वैसे भी पिछले कई सालों से सुनियोजित तरीके से हमले किए जा रहे हैं। ये हमले सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, बल्कि यूपी-बिहार और झारखंड से लेकर कर्नाटक एवं महाराष्ट्र तक में दिया जाता रहा है।
कट्टरपंथियों द्वारा रामनवमी पर हिंसा की इस परिपाटी को वक्फ संशोधन विधेयक के विरोध के नाम पर दोहराने की कोशिश इस साल भी की जा सकती है। वैसे तो मूर्ति-पूजक हिंदुओं के खिलाफ मुस्लिम बहुल इलाकों में हमला करने की घटनाएँ अक्सर आती रहती हैं, लेकिन साल 2019 के बाद रामनवमी एवं हनुमान जयंती की शोभायात्रा पर हमले की घटनाएँ अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई हैं।
बता दें कि साल 2019 भारती राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा है। इसी साल 5 अगस्त को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हमेशा के लिए खत्म कर दिया था। इसको लेकर कुछ कट्टरपंथियों के मन में एक कसक पैदा हो गई। इसी बीच 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 140 से अटके अयोध्या विवाद पर हिंदुओं के पक्ष में फैसला दे दिया।
कट्टरपंथियों पर यह दोहरी मार थी। अभी एक महीना भी नहीं बीते होंगे कि 11 दिसंबर 2019 को भारत सरकार ने नागरिक संशोधन विधेयक (CAA) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) कानून पास कर दिया। यह वह ऐसा था, जिसमें पड़ोसी इस्लामी देशों में रहने वाले वहाँ के अल्पसंख्यकों को भारत में नागरिकता देने का प्रावधान किया गया था।
इसको लेकर भी कट्टरपंथी मुस्लिमों एवं भारत विरोधी शक्तियों ने मुस्लिमों को भड़काना शुरू कर दिया कि इससे मुस्लिमों की नागरिकता छीन ली जाएगी। इसके बाद बड़े पैमाने पर हिंसा शुरू हो गई थी। मन में बसी यह कसक रामनवमी जैसी धार्मिक यात्रा पर हमला करके कट्टरपंथी निकालते रहते हैं। इस बार भी वे कुछ ऐसा ही करने की सोच रहे हैं। इससे सतर्क रहने की जरूरत है।
भारतीय उपमहाद्वीप एक बार फिर अशांत हो गया है। बांग्लादेश के कुछ महीनों के बाद भारत के दूसरे मित्रवत देश नेपाल में जनता का एक बड़ा तबका सड़कों पर है। राजधानी काठमांडू तक में कर्फ्यू लगाना पड़ा है। बीते लगभग तीन दशक से लगातार अशांति झेल रहे नेपाल में लाखों की भीड़ हिन्दू राजशाही को वापस लाने की माँग कर रही है। उसकी माँग है कि नेपाल को वापस हिन्दू राष्ट्र घोषित किया जाए। लोकतंत्र के लगभग डेढ़ दशक के प्रयोग के बाद नेपाल फिर से उसी दोराहे पर खड़ा है, जहाँ से वह 1980 के दशक के अंत में चला था।
नेपाल में बीते तीन-चार दशकों से मची इस अशांति का फायदा चीन, अमेरिका, ईसाई मिशनरियों और इस्लामी कट्टरपंथियों को मजबूत करके पाकिस्तान ने उठाया है। नेपाल का उसके हिन्दू मूल से अलगाव करके लगातार तोड़ने के प्रयास किए जाते रहे हैं। भारत के भी कुछ नेता नेपाल को इस स्थिति में धकेलने के लिए जिम्मेदार हैं। नेपाल की हिन्दू जनता अब इस स्थिति में है कि उसे लोकतंत्र की बजाय वापस राजशाही और हिन्दू राष्ट्र बनाए जाने की माँग कर रहे हैं।
राजीव गाँधी ने किया नेपाल की राजशाही को खोखला
नेपाल में वर्ष 2008 में हिन्दू राजशाही का अंत हो गया था। राजा ज्ञानेन्द्र शाह को 2008 में अपनी गद्दी छोड़नी थी। इससे पहले वामपंथियों ने लगभग एक दशक नेपाल में खूब खून बहाया था। इसी के साथ 2008 में नेपाल की लगभग ढाई सदियों पुरानी राजशाही का अंत हो गया था।
हालाँकि, नेपाल की राजशाही की अंत की कथा लगभग इससे 20 वर्ष पहले ही लिखी जाने लगी थी। भले ही बाद में नेपाल में राजशाही वामपंथियों के आंदोलन ने खत्म की हो, इसके बीज भारत के प्रधानमंत्री रहने के दौरान राजीव गाँधी ने बो दिए थे। उनके एक कदम से ही नेपाल और भारत की दूरी बढ़ी, जिसे आज तक नहीं भरा जा सका है।
1980 के दशक के अंत तक नेपाल और भारत के रिश्ते मजबूत थे। सीमा को लेकर विवाद भी विशेष नहीं था। लाखों नेपाली भारत में काम करते थे। नेपाल अपनी किसी भी जरूरत के लिए भारत पर निर्भर था। भारत नेपाल को उत्पादों की सप्लाई करने में लगभग एकाधिकार की स्थिति रखता था।
80 के दशक का अंत होते-होते यह स्थितियाँ बदल गईं। राजीव गाँधी ने वर्ष 1989 में नेपाल को हर चीज की आपूर्ति रोक दी थी। भारत ने नेपाल को जाने वाले 21 में से 19 रास्तों को बंद किया था। तेल से लेकर राशन तक की नेपाल के लिए नाकाबंदी कर दी गई थी। नेपाल में इसके बाद तेल और खाने-पीने की भारी समस्या हो गई थी।
नेपाल में केरोसिन के लिए तक लंबी-लंबी लाइनें लग गई थीं। यह कदम राजीव गाँधी ने तब उठाया था जब नेपाल में कुछ ही दिन पहले रिक्टर स्केल पर 7 से अधिक तीव्रता वाला भूकंप आया था। तब राजीव गाँधी के इस कदम दो कारण बताए गए थे।
एक कारण तब नेपाल का चीन के हथियारों का एक सौदा करना बताया गया था। भारत का पक्ष रखने वालों ने कहा था कि यह उनकी सुरक्षा के लिए खतरा है और वह ऐसा नहीं होने दे सकते। वहीं दूसरा कारण नेपाल के साथ आवागमन के लिए किए गए समझौतों के खत्म होने का बताया गया था।
इन सबके चलते नेपाल में तब राज कर रहे राजा बीरेन्द्र बिक्रम शाह की भारत से ठन गई थी। यह नाकाबंदी एक वर्ष तक चली थी और इस दौरान नेपाल को भारी समस्याएँ झेलनी पड़ी थीं। नेपाल और राजा महेन्द्र के साथ इस सलूक के पीछे एक और कहानी बताई जाती है।
नेपाल के राजा बीरेन्द्र, उनकी पत्नी ऐश्वर्या, सोनिया और राजीव गाँधी के साथ (बाएँ से दाएँ)
कहा जाता है कि 1988 में तब प्रधानमंत्री राजीव गाँधी पत्नी सोनिया गाँधी के साथ नेपाल गए थे। यहाँ राजीव गाँधी काठमांडू स्थित पशुपतिनाथ मंदिर भी पहुँचे थे। लेकिन यहाँ के पुजारियों ने उनकी पत्नी सोनिया गाँधी को मदिर में प्रवेश की अनुमति देने से इनकार कर दिया था।
कहा जाता है कि यह सोनिया गाँधी के ईसाई होने के चलते कहा गया था। राजीव गाँधी ने इसके बाद राजा महेन्द्र से विषय में मदद माँगी थी। राजा महेन्द्र ने भी इस पर कोई मदद करने से इनकार कर दिया था और कहा था कि वह धार्मिक मामलों में कोई दखल नहीं दे सकते। बताते हैं कि रानी ऐश्वर्या भी सोनिया के मंदिर के भीतर जाने के विरुद्ध थीं।
When Rajiv Gandhi visited Nepal,Sonia Gandhi was not allowed into Pashupatinath Temple because she is Xtian. Even the King could not help. Rajiv imposed a blockade on Nepal to avenge this ‘slight’. This was the point when Nepal began to turn against India. @Swamy39 on @NewsX
यह बात भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी के हवाले से तथागत रॉय ने बताई थी। बताते हैं कि नेपाल में सोनिया को मंदिर में ना घुसने देने के चलते राजीव नाराज हो गए और भारत वापस आने के बाद उन्होंने नेपाल से राजशाही उखाड़ फेंकने के लिए कदम बढ़ाए। यह नाकाबंदी उसी का एक हिस्सा था।
राजीव गाँधी ने इसके साथ ही नेपाल के राजा के खिलाफ पार्टियों को इकट्ठा करने के लिए भी ‘रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’ को लगा दिया। R&AW के स्पेशल डायरेक्टर रहे अमर भूषण ने अपनी किताब ‘इनसाइड नेपाल’ में बताया है कि राजीव गाँधी के आदेश पर R&AW ने नेपाल में राजा के खिलाफ चल रहे आंदोलन को मजबूत कर दिया।
इसके लिए तमाम जासूस भी भर्ती किए गए थे। जिस समय राजीव गाँधी ने नेपाल के खिलाफ नाकाबंदी लगाई, उसी समय नेपाल में राजा की शक्तियाँ कम करने और राजनीतिक पार्टियाँ संचालित करने पर लगे प्रतिबंध हटाने के लिए आंदोलन चल रहा था। जब नाकाबंदी हुई तो जनता और भड़क गई।
नेपाल की जनता और छात्र भारत के खिलाफ तो गुस्सा थे ही, वह राजा बीरेन्द्र शाह के भी खिलाफ हो गए। इन्हें R&AW ने इसी दौरान संगठित कर लिया। R&AW ने इस दौरान नेपाली कॉन्ग्रेस पार्टी और कम्युनिस्टों को मजबूत किया। यह आंदोलन हिंसक भी हुआ और इसमें कई लोग मारे भी गए। अप्रैल, 1990 में राजा को आखिरकार झुकना पड़ा।
R&AW के इस ऑपरेशन के चलते 1990 में राजा को राजनीतिक पार्टियों को मंजूरी देनी पड़ी। इसके बाद नेपाल के पूर्णरूपेण राजशाही नहीं रह गया। इसका रूप सांवैधानिक राजशाही हो गया। राजीव गाँधी के इस रवैये के चलते नेपाल चीन की तरफ भी झुका।
इस तरह राजीव गाँधी ने निजी नाराजगी के चलते जहाँ नेपाल को चीन की तरफ धकेला तो वहीं उसकी राजशाही की जड़े भी खोखली कर दी। जहाँ राजीव गाँधी ने नेपाल में कम्युनिस्टों को खाद-पानी देकर राजशाही को कमजोर किया तो वहीं भारत के कम्युनिस्टों ने इस राजशाही को खत्म करने में बड़ा रोल निभाया।
सीताराम येचुरी वर्ष 2006 में कम्युनिस्ट नेताओं से मिलने भी पहुँचे थे। तब नेपाल में राजशाही और गुरिल्ला फौजें लड़ाई लड़ रहीं थी। बताया जाता है कि वह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कहने पर गए थे। माना जाता है कि सीताराम येचुरी के नेपाली वामपंथियों से गहरे संबंध थे।
2006 में उन्होंने वामपंथियों और नेपाल की बाकी पार्टियों के बीच एक समझौता भी करवाया था। इसे येचुरी फॉर्मूला कहा गया था। येचुरी ने अपनी इस यात्रा में कहा था कि 1990 में जो हासिल किया गया था, उसे अब आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
अस्थिरता का फायदा मिशनरियों को
नेपाल में तीन दशक से फैली इस अस्थिरता का फायदा विदेशी शक्तियों ने खूब उठाया है। ईसाई मिशानिरियाँ इसमें आगे रही हैं। हिन्दू राष्ट्र नेपाल लम्बे समय से कई ईसाई मिशनरियाँ एक्टिव हैं। बीबीसी की 2023 में आई एक रिपोर्ट ने बताया था एक दशक में नेपाल में ईसाइयों की आबादी 68% बढ़ी है।
नेपाल में 2011 में 3.76 लाख ईसाई रहते थे। यह संख्या 2001 में मात्र 1 लाख थी। वर्तमान में नेपाल में 5.5 लाख से अधिक ईसाई रहते हैं। यह स्थिति तब है, जब नेपाल में 1951 में एक भी ईसाई नहीं था। नेपाल की यह ईसाई जनसंख्या धर्मांतरण करने बनाई गई है। धर्मांतरण के निशाने पर नेपाल के सुदूर इलाकों के हिन्दू ही होते हैं।
साफ़ है कि जिस भी समय में नेपाल में अस्थिरता बनी रही है, वहाँ तेजी से धर्मांतरण हुआ है। यह सिलसिला अब भी जारी है। ईसाई धर्मांतरण का यह खेल 2008 में नेपाल के हिन्दू राष्ट्र का दर्जा खत्म हो कर सेक्युलर राष्ट्र बनने के बाद और तेजी से बढ़ा है।
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल में ईसाई धर्मांतरण में बड़ा रोल दक्षिण कोरिया की ईसाई मिशनरियों का है। दक्षिण कोरिया ने करीब दो दशक पहले नेपाल में ईसाई धर्म प्रचारकों को भेजना शुरू किया था। तब से लेकर अब तक करीब 20,000 कोरियाई मिशनरी हिंदुओं को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने के अभियान में शामिल हो चुके हैं।
नए आँकड़ों के अनुसार, नेपाल में लगभग 7758 चर्च हैं। यानी जहाँ 50 वर्ष पहले ईसाइयों की संख्या एक गाँव के बराबर नहीं थी, वहाँ आज 7700 से अधिक चर्च बन गए हैं। नेपाल में ईसाई धर्मांतरण में वामपंथी लड़ाकों का भी बड़ा रोल रहा है।
1995 के बाद से नेपाल में वामपंथी लड़ाकों ने अपना प्रभाव जमाना चालू कर दिया था। वामपंथी ज्यादातर उत्तर के पहाड़ी क्षेत्रों में अपना बसेरा बनाए हुए थे। उन्होंने नेपाल की जनता को पढ़ाया कि धर्म अफीम है और हमें धर्म से कुछ नहीं मिलने वाला। वामपंथी नेपाल में हिन्दू धर्म के ही खिलाफ थे।
इसके बाद वामपंथियों और सरकार के बीच चली लड़ाई से यहाँ दरिद्रता आई। धर्म से दुराव और गरीबी ने ईसाई मिशनरियों के लिए एकदम उपजाऊ जमीन तैयार कर दी। पहले से परेशान लोगों को कहीं वित्तीय लालच देकर तो कहीं शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर बरगलाया गया और उन्हें ईसाइयत में धर्मांतरित किया गया।
ऐसा नहीं है कि नेपाल में किसी को भी इस धर्मांतरण की चिंता नहीं है। नेपाल के पूर्व उपप्रधानमंत्री कमल थापा ने बीबीसी से बात करते हुए ईसाई मिशनरियों पर कहा था कि यह जंगल में आग की तरह नेपाल के भीतर फ़ैल रही हैं। उन्होंने चिंता जताई थी कि इससे देश की संस्कृति का अस्तित्व खतरे में आ जाएगा।
इस्लामी कट्टरपंथ भी फैला रहा पाँव
नेपाल में ईसाई मिशनरियों के साथ ही इस्लामी कट्टरपंथ भी अपने पैर पसार रहा है। वर्ष 2001 में नेपाल में 9.54 लाख मुस्लिम आबादी थी। 2021 में यह बढ़कर 14 लाख से अधिक हो चुकी है। नेपाल में सिर्फ मुस्लिमों की जनसंख्या ही नहीं बढ़ी है बल्कि कट्टरपंथ भी बढ़ा है।
भारत की सीमा से लगे इलाकों में नेपाल में मस्जिद और मदरसे उग आए हैं। ऑपइंडिया ने इस मामले में 2022 में की गई एक ग्राउंड रिपोर्ट में पाया था कि सीमाई इलाकों में अर्थव्यवस्था भी बड़े स्तर पर मुस्लिमों का कब्जा है। 2008 तक हिन्दू राष्ट्र रहे नेपाल में मुस्लिमों ने एक गाँव का नाम बदल कर इस्लाम नगर करने तक की कोशिश की थी।
नेपाल के सीमाई इलाकों में तेजी से इस्लाम घुसपैठ कर रहा है
एक और घटना में सामने आया था कि पहले रोहिंग्या घुसपैठियों के लिए पहले कच्ची झुग्गियां बसाई गईं थी और बाद में इस जगह पर पक्के मकान बनाए जाने की माँग कर दी थी। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब कट्टरपंथियों ने सड़क पर उतर कर भी उत्पात मचाया है।
चीन और ISI ने उठाया नेपाल में गड़बड़ी का फायदा
नेपाल में अस्थिरता और उसके हिन्दू राष्ट्र के दर्जे के खत्म होने का फायदा चीन और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI ने उठाया है। ISI ने नेपाल को भारत में नकली नोट भेजने के लिए अड्डे की तरह इस्तेमाल किया था। भारत से भागे कई बड़े इस्लामी आतंकी भी नेपाल में ही पकड़े गए हैं।
पाकिस्तान नेपाल में इस्लामी कट्टरपंथियों को भड़का और अपने जासूस भेज कर इस इलाके को भी अपने लिए इस्तेमाल करता आया है। भारत के साथ खुली सीमा के चलते पाकिस्तानियों ने इसे भारत से भागने के एक रूट की तरह भी इस्तेमाल किया है। विकिलीक्स में भी सामने आया था कि पाकिस्तान ने काठमांडू में एक आतंकी संगठन तक खड़ा कर दिया था।
भारत के दबाव के बाद 2020 में नेपाल ने कई पाकिस्तानी नागरिक पकड़े थे। यह नागरिक भारत में नकली नोट लाने और आतंकी नेटवर्क बढ़ाने के लिए करते थे। 1990 के दशक के दौरान दाऊद इब्राहिम गैंग ने नेपाल को अपना बेस बनाया था। भारत में अपराध करने के बाद अपराधी नेपाल भाग जाते थे।
जहाँ पाकिस्तान अपने मंसूबे के लिए नेपाल को इस्तेमाल करता आया है, तो वहीं चीन भी अपनी विस्तारवादी नीति के चलते नेपाल को अपने घेरे में लेना चाहता है। राजीव गाँधी के नेपाल को लेकर लिए गए एक्शन ने उसे चीन की तरफ धकेल दिया था।
चीन हमेशा से ही नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था। वह नेपाल के सहारे भारत को घेरना चाहता था। 2008 में कम्युनिस्टों के सत्ता में आने के बाद चीन की नेपाल में घुसपैठ को नया सहारा मिला है। कम्युनिस्ट भारत पर दबाव बनाने के लिए चीन के साथ व्यापार और सहयोग बढाते हैं।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण नेपाल का बेल्ट एवं रोड परियोजना में शामिल होना है। नेपाल इसको लेकर ना-ना करता आया है लेकिन चीन उसे इसमें शामिल कर चुका है। चीन नेपाल को श्रीलंका की तरह ही कर्ज के जाल में फंसा कर उसका इस्तेमाल भारत को उसके ही घर के पिछवाड़े में घेरने के लिए करना चाहता है।
नेपाल ने चीन से कर्ज लेकर हाल ही में पोखरा में एक नया एयरपोर्ट भी बनाया है। यह एयरपोर्ट वैसे मरीज की तरह है, जो अस्पताल पहुँचने से पहले ही मर चुका है। इस एयरपोर्ट पर पहली उड़ान के लिए नेपाल ने भारत से गुहार लगाई थी लेकिन उसने मना कर दिया। इसके बाद चीन की एक फ्लाइट से यहाँ काम चालू हुआ।
यह एयरपोर्ट ग्वादर और हम्बनटोटा की तरह खाली पड़ा है। आशंका है कि इसके लिए दिए गए कर्जे की वसूली को चीन नेपाल पर दबाव बनाकर यह एयरपोर्ट कब्जा सकता है। नेपाल के आंतरिक मामलों में भी चीन का दखल है।
2020 में चीनी महिला राजदूत के नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली तक को हनीट्रैप करने की खबरें सामने आई थीं। यह जासूस भारत के खिलाफ नेपाल को भड़का रही थी। नेपाल से उसका इसके बाद तबादला कर दिया गया था।
मधेशी और पहाड़ी के झगड़े ने और बिगाड़ी स्थितियाँ
इन सब लड़ाइयों के इतर नेपाल में मधेशी और पहाड़ी के झगड़े ने और स्थितियाँ बिगाड़ी ही हैं। मधेशी नेपाल के तराई और भारत से सटे अधिकांश इलाकों में रहने वाले लोगों को कहते हैं जबकि पहाड़ी जनसंख्या देश के पर्वतीय इलाकों में बसती है।
नेपाल में राजशाही के खत्म होने के साथ ही मधेशी और पहाड़ी जनता के बीच खाई और बड़ी हो गई। मधेशी हितों की बात करने वालों का कहना है कि नेपाल की राजनीति में हमेशा से ही पहाड़ी जनता का प्रभुत्व रहा है और मधेशियों को वह प्रतिनिधित्व नहीं है जिसके वह हकदार हैं।
इसके अलावा मधेशी अपने इलाके को स्वायत्तता ना दिए जाने को लेकर भी आक्रोशित रहे हैं। इस लड़ाई का एक और सिरा नेपाल के माओवादी आंदोलन से भी जुड़ता है। दरअसल, नेपाल के माओवादी आंदोलन के अधिकांश नेता पहाड़ी जनसंख्या से आते थे।
2015 में मधेशियों ने नेपाल में बड़ा आंदोलन किया था (फोटो साभार: Hindustan Times)
इनका काडर भी यहीं से था। तमाम माओवादियों ने आंदोलन के दौरान तराई इलाकों में बड़ी लूटमार की और अपहरण तथा हत्याओं का एक दौर चलाया। इसके चलते भी अलगाव है। 2008 और 2015 में संविधान बनने के दौरान भी मधेशियों ने आंदोलन किया था।
2015 में यह आंदोलन हिंसक भी हो गया था। इसमें तमाम मधेशी मारे गए थे। काफी बवाल के बाद नेपाल की सरकार मधेशियों की कुछ मांगों को लेकर मानी थी। मधेशियों और पहाड़ियों की इस लड़ाई ने पहले से अशांत नेपाल को एक और समस्या दी है और यहाँ के लोगों की जिन्दगी कठिन कर दी है।
ऊब गए हैं नेपाल के लोग
नेपाल में बीते 30 वर्षों में जनता और विशेष कर हिन्दुओं ने इतनी अस्थिरता और लड़ाइयाँ देख ली हैं कि वह अब पुराने ढर्रे पर लौटना चाहते हैं। उन्होंने पिछले तीन दशक में राजतंत्र, संवैधानिक राजतंत्र और लोकतंत्र सब कुछ देख लिया है। इसमें सबसे बुरी स्थिति उनकी लोकतंत्र के चलते हुई है।
नेपाल में 2008 में राजशाही खत्म होने के समय लोकतांत्रिक पार्टियों ने नेपाली जनता से बड़े वादे किए थे। उन्होंने तत्कालीन राजा ज्ञानेन्द्र को पूरी प्रक्रिया से सिरे से बाहर कर दिया था। एक दशक तक हिंसा का दौर झेलने वाले नेपाली युवाओं को रोजगार और नेपाली जनता को खुशहाली का वादा किया गया था।
2025 आते-आते नेपाल में इसमें से अधिकांश वादे पूरे नहीं हुए हैं। नेपाल लोकतंत्र आने के बाद अस्थिरता का शिकार हो गया है। 2008 से 2025 के बीच 17 वर्षों में नेपाल में 13 बार सरकार बन-बिगड़ चुकी है। 13 बार प्रधानमंत्री बदल चुके हैं। इनमें से 11 बार तो सरकार पूरे 2 वर्ष भी नहीं चल पाई है।
राजशाही के खिलाफ हथियार उठाने वाले वामपंथी दल आज आपस में ही सिर फुटौव्वल का शिकार हैं। शेर बहादुर देउबा, केपी शर्मा ओली, पुष्प कमल दहल प्रचंड और बाबूराम भट्टाराई जैसे नेताओं के इर्द-गिर्द ही नेपाल की राजनीति बीते लगभग 2 दशक से घूम रही है।
लोकतंत्र के आने के बाद नेपाल के नेता आपस के ही झगड़े नहीं सुलटा पाए हैं। वर्तमान में नेपाल में बेरोजगारी दर 12% से भी अधिक है, जो कि भयावह है। युवाओं में तो यह दर 20% के भी पार है। बड़ी संख्या में युवा काम करने के लिए नेपाल से भारत या फिर अरब और यूरोपियन देशों में भाग रहे हैं।
नेपाल में युवा बेरोजगारी की दर 20% से अधिक है (फोटो साभार: The Kathmandu Post)
एक रिपोर्ट बताती है कि नेपाल से रोज औसतन 1700 लोग देश छोड़ कर जा रहे हैं। देश छोड़ने वालों में अधिकांश युवा हैं। नेपाल की जनसंख्या का लगभग 10% हिस्सा दूसरे देशों में काम की तलाश में जा चुका है। वर्तमान में लगभग 23-24 लाख लोग नेपाल छोड़ कर विदेशों में काम कर रहे हैं।
बेरोजगारी के अलावा दूसरा बड़ा मुद्दा नेपाल में लोकतंत्र के बाद आया भ्रष्टाचार है। राजशाही के समय सत्ता केंद्रीकृत थी और भ्रष्टाचार का सामना आम जनता को रोजाना के काम में नहीं करना पड़ता था। लेकिन अब भ्रष्टाचार ने नेपाल में गहरी जड़ें जमा ली हैं।
द काठमांडू पोस्ट की एक रिपोर्ट बताती है कि नेपाल में 2023 में भ्रष्टाचार के 28 हजार से अधिक मामले दर्ज हुए थे। कई जगह तो सरकारी विभागों का काम इसलिए अटका पड़ा है क्योंकि वहाँ कई अधिकारी और कर्मचारी भ्रष्टाचार के आरोप में या तो निलंबित हैं या जेल काट रहे हैं।
इन सबके चलते आम जनता में असंतोष है। इसके अलावा मूलभूत सुविधाओं का भी टोटा है। एक रिपोर्ट बताती है कि नेपाल में 73% लोगों को स्वच्छ पीने का पानी नहीं मिलता है। एक और रिपोर्ट बताती है कि नेपाल की लगभग 35 लाख जनता अभी बिजली से वंचित है। पहाड़ी इलाकों में सड़कों की भी कमी है। इसके चलते नेपाल के लोग अब ऊब चुके हैं।
अब फिर राजशाही और हिन्दू राष्ट्र की माँग
नेपाल को बीते 3 दशक से हिंदुत्व और राजशाही से दूर किया जाता रहा है। वर्तमान में नेपाल सेक्युलर राष्ट्र है। यहाँ राजशाही भी नहीं है। लेकिन तब भी लोगों की समस्याएँ नहीं सुलझ पाई हैं। उन्हें अब लग रहा है कि माओवादी आंदोलन के चलते हटाई गई राजशाही वापस उनका देश ठीक कर सकती है।
नेपाल में राजशाही का इतिहास लगभग 250 वर्ष पुराना है। इसकी स्थापना राजा पृथ्वी नारायण शाह ने की थी। उसके बाद 2008 तक उनकी ही पीढ़ियों ने यहाँ शासन किया। हालाँकि, इस बीच राजशाही के सामने कई समस्याएँ भी आईं।
19वीं शताब्दी के मध्य से 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक इस परिवार को कब्जे में रख कर राणा परिवार नेपाल पर शासन करता रहा था। हालाँकि, 1950 के दशक में राजा त्रिभुवन शाह ने तख्तापलट करके सत्ता वापस अपने हाथ में ले ली थी। उनकी 1955 में मौत हो गई। इसके बाद महेन्द्र 1972 तक राजा रहे।
1972 के बाद बीरेन्द्र बिक्रम शाह राजा बने। उनका कार्यकाल घटनाओं से भरा हुआ था। चाहे 1989 में राजीव गाँधी से नाकाबंदी का सामना हो या फिर 1990 में लोकतंत्र का सामना। उनके ही राज के दौरान नेपाल में वामपंथी आंदोलन भी चालू हो गया था। हालाँकि, 2001 में राजा बीरेन्द्र और बाक़ी पूरे परिवार की उनके बेटे दीपेन्द्र ने हत्या कर दी थी।
राजा ज्ञानेन्द्र का अब भी जनता में बड़ा सम्मान है (फोटो साभार: The Kathmandu Post)
इसके बाद उनके भाई ज्ञानेन्द्र को राजा बनाया गया था। ज्ञानेन्द्र का कार्यकाल नेपाल में राजशाही का अंत था। ज्ञानेन्द्र के कार्यकाल के दौरान नेपाल में सत्ता परिवर्तन हुआ था। ज्ञानेन्द्र के कार्यकाल तक नेपाल हिन्दू राष्ट्र हुआ करता था।
17 वर्ष बाद वापस नेपाल उसी मोड़ पर है। इन 17 वर्षों में नेपाल में लोकतंत्र वह करने में सक्षम नहीं रहा है, जो वहाँ की जनता चाहती है। ऐसे में बीते कुछ समय से राजा ज्ञानेन्द्र को वापस लाने की माँग उठी है। नेपाल के हिन्दुओं को लगता है कि राजशाही और हिन्दू राष्ट्र के दर्जे की वापसी ही उनके लिए अब एक रास्ता बचा है।
यह कोशिश एकतरफ़ा नहीं है। नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र ने हाल ही में एक वीडियो जारी किया था। उन्होंने इस दौरान ‘जिम्मेदारी अपने हाथ में लेने’ की बात कही थी। यह एक बड़ा सन्देश था। नेपाल में राजशाही के जाने के बाद यह पहली बार था जब पूर्व राजा ने ऐसी बात कही हो।
राजा ज्ञानेन्द्र के लिए लोकतंत्र के दौरान भी समर्थन कुछ कम नहीं हुआ था। जनता का एक बड़ा हिस्सा अब भी राजा के प्रति श्रद्धा रखता है। 9 मार्च, 2025 को नेपाल के राजा ज्ञानेन्द्र शाह वापस राजधानी काठमांडू आए थे। वह इससे पहले पूरे देश के मंदिरों की यात्रा पर थे।
उनके काठमांडू आने के बाद एयरपोर्ट के बाहर लाखों की भीड़ ने स्वागत किया था। इसने उनके समर्थन बारे में सब स्पष्ट कर दिया। उनके समर्थकों ने वापस आने के बाद राजशाही समर्थक नारे भी लगाए थे। समर्थकों के हाथों में ‘राजशाही वापस लाओ’, ‘हमें हमारा राजा वापस दो’ और ‘ये नेपाल ज्ञानेंद्र का है’ की तख्तियां थी।
नेपाल में राजशाही की वापसी के लिए आवाज उठाने वालों में सबसे बड़ा नाम राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी का है। यह पार्टी नेपाल में राजशाही के साथ ही हिन्दू राष्ट्र की वापसी चाहती है। यह पार्टी बड़े प्रदर्शन भी आयोजित कर चुकी है। राजा ज्ञानेन्द्र की काठमांडू वापसी के बाद बड़ा समारोह भी इसी पार्टी के नेतृत्व में आयोजित किया गया था।
यह सिर्फ एक ट्रेलर भर था। 28 मार्च, 2025 को नेपाल में राजशाही के लिए हो रहा आंदोलन हिंसक हो गया। RPP ने 28 मार्च को एक बड़ा प्रदर्शन काठमांडू में किया। इस आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने राजशाही की वापसी की माँग की। इस आन्दोलन को दबाने के लिए पुलिस ने लाठियाँ चलाई और फायरिंग भी कर दी।
इसके चलते 1 प्रदर्शनकारी की मौत हो गई। इससे आंदोलन और उग्र हो गया। काठमांडू के तिन्कुने इलाके में हुए इस प्रदर्शन के दौरान पुलिसिया कार्रवाई के विरोध में उग्र हुए समर्थकों ने कई इमारतों में तोड़फोड़ की। एक इमारत में आग लगा दी। इसके चलते एक मीडियाकर्मी की मौत हो गई।
राजशाही को लेकर हुए प्रदर्शन में हाल ही में 2 लोग मारे गए थे (फोटो साभार: The Kathmandu Post)
काठमांडू में इस प्रदर्शन के चलते कर्फ्यू लगाना पड़ा। यहाँ सेना भी बुलानी पड़ गई। इस आंदोलन ने दिखाया कि नेपाल में राजशाही का कितना बड़ा तबका समर्थन करता है। RPP की केन्द्रीय समिति की सदस्य स्वाति मिश्रा ने कहा कि वह राज ज्ञानेन्द्र को एक राजा के रूप में नहीं बल्कि अभिभावक के रूप में वापस चाहते हैं।
RPP का कहना है कि वह हिन्दू धर्म को नेपाल में एक स्थिरता प्रदान करने वाली शक्ति के रूप में उपयोग करना चाहते हैं। RPP की इस बात में वजन भी दिखाई पड़ता है। नेपाल के एकीकरण और उसकी स्थिरता में धर्म का बड़ा रोल रहा है। लोगों को लगता है कि देश को सेक्युलर बनाए जाने के बाद ही अथिरता का माहौल आया है।
नेपाल में राजतंत्र के समय हिन्दू धर्म राजशाही पर भी नियंत्रण रखने वाली शक्ति के रूप में भी था। नेपाल की धार्मिक जनता और राजा का धर्म के प्रति जुड़ाव उसे अस्थिर होने से बचाता था। हालाँकि, नेपाल में संविधान संशोधन करके इसे सेक्युलर किया गया। यह वामपंथी पार्टियों का एक एजेंडा था।
इसके चलते नेपाल में धर्म एकीकरण करने वाली शक्ति के की हैसियत से तो हटा ही, बल्कि नेपाल, चीन की तरफ भी झुक गया। धर्म ही नेपाल को भारत से भी मजबूती से जोड़ कर रखता था। वामपंथी पार्टियाँ अब भारत की बजाय चीन की तरफ भागती हैं। इससे लेकिन जनता का जुड़ाव नहीं हो पाता। क्योंकि उसका सांस्कृतिक जुड़ाव भारत से है।
नेपाल की जनता को अब लगता है कि लोकतंत्र ने उन्हें केवल भ्रष्टाचार, अस्थिरता, आंतरिक लड़ाई और वादे ही दिए हैं जबकि राजशाही के दौर में वह ज्यादा समृद्ध थे। इसीलिए राजशाही का समर्थन करने वालों में आम जनता के साथ ही नेपाल के बड़े व्यापारी भी शामिल हैं।
नेपाल के बड़े कारोबारी दुर्गा परसाई भी इसी आंदोलन का हिस्सा हैं। नेपाल की जनता के साथ ही उसका अभिजात्य वर्ग भी राजशाही का समर्थक रहा है। बॉलीवुड अभिनेत्री मनीषा कोइराला ने एक इंटरव्यू में कहा था कि यहाँ के संविधान ने लोगों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं किया है। कोइराला नेपाल के शक्तिशाली राजनीतिक परिवार से आती हैं।
उन्होंने कहा था कि नेपाल में राजा को नए संविधान में एक स्थान दिया जाना चाहिए था। उन्होंने नेपाल की वर्तमान व्यवस्था को एक ‘लोकतंत्र का मुखौटा’ बताया था। उन्होंने कहा था कि राजशाही का आज भी 90% नेपाली जनता किसी ना किसी तरह से समर्थन करती है। मनीषा कोइराला ने बताया था कि नेपाल के लोगों के मन से राजशाही को हटाया नहीं जा सकता।
अब चाहे कोइराला हों नेपाल की आम जनता, सब यह मानते हैं कि राजशाही वापस उनकी समस्याएँ हल कर सकती है। नेपाल की राजनीतिक पार्टियाँ राजशाही के लिए हो रहे आंदोलन के पीछे राजा ज्ञानेन्द्र का हाथ मानती हैं। उनका भारत के ऊपर भी राजशाही को हवा देने का आरोप है।
यह कोई नई बात नहीं है, काठमांडू के भीतर एक कटोरी के जमीन पर गिरने को भी भारत की साजिश बता दिया जाता है। पार्टियाँ राजा की किसी भी तरह से वापसी नहीं चाहती। भारत ने अभी इस आंदोलन और नए राजनीतिक समीकरणों को लेकर कोई प्रतिक्रया नहीं दी है।
देखने वाली बात होगी कि आगे नेपाल में वापस राजा का शासन आ पाता है या लोकतंत्र अपनी जगह वापस बनाए रखता है। नेपाल वापस हिन्दू राष्ट्र बनेगा या नहीं, यह समय के गर्भ में है। कोई बीच का रास्ता भी सामने आ सकता है जहाँ राजा और लोकतंत्र, दोनों को हिस्सेदारी दी जाए।
झारखंड की राजधानी राँची से सटे पिठौरिया के हेठबालू गाँव में सरना जनजातीय समुदाय के त्योहार सरहुल उत्सव के दौरान इस्लामी कट्टरपंथियों ने 1 अप्रैल को हमला कर दिया था। हमले में घायल लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इस घटना के विरोध में जनजातीय समुदाय के लोगों ने गुरुवार (3 अप्रैल 2025) को राँची-पतरातू रोड को जाम कर दिया। सामने आए वीडियो में महिला ने छेड़छाड़ करने और बंदूक से गोली मारने का भी आरोप लगाया है।
महिलाओं का कहना है कि सरना पूजा करने जाने के दौरान इस्लामी भीड़ द्वारा उन पर लाठी-डंडे से हमला किया गया और कुल्हाड़ी-बंदूक आदि दिखाकर धमकी दी गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि इस हमले की मास्टरमाइंड रजिया खातून है। वहीं, आसिफ और आरिफ पर महिलाओं का ब्लाउज और साड़ी खींचकर उसे फाड़ने की कोशिश की।
इस घटना से जुड़ा एक वीडियो सामने आया है। इसमें जनजातीय समुदाय की महिलाएँ बता रही हैं कि उनके साथ इस्लामी कट्टरपंथी हमलावरों ने किस तरह दुर्व्यवहार किया। वीडियो में एक लड़की ने अपने कंधे और गले पर लगे चोटों के निशान दिखाते हुए बताया कि रजिया खातून ने उसके साथ मारपीट की है। दिखने में नाबालिग लगने वाली उस लड़की ने बताया कि यात्रा के दौरान पीछे से आसिफ/आरिफ ने उनका ब्लाउज खींच लिया।
महिला ने बताया कि यात्रा में इस्लामी हमले के दौरान उसके पति पर हमला कर दिया, जिसकी वजह से उसके सिर में गहरी चोट आई है। महिला का कहना है कि उसके पति के सिर में खून जमा होने का खतरा है। महिला ने आशंका जाहिर की कि अगर उसके पति को कुछ होता है तो वह अपने बच्चे को लेकर कहाँ जाएगी। उसने चेतावनी देने के अंदाज में कहा कि अगर उसके पति को कुछ हुआ तो वह छोड़ेगी नहीं।
महिलाओं का कहना है कि हमला करने वालों में उनके गाँव के साथ-साथ आसपास के गाँवों के मुस्लिम भी शामिल थे। महिलाओं ने बताया कि हमलावरों में रजिया खातून के अलावा आसिफ अंसारी, आरिफ अंसारी, गुलशन अंसारी, गुलजार अंसारी, जुल्फान अंसारी आदि लोग भी शामिल थे। महिला ने कुल्हाड़ी दिखाते हुए कहा कि उसी से उसके भतीजे पर हमला किया गया था।
सरना पूजा के लिए निकली जनजातीय महिलाओं में बच्चियाँ से लेकर बुजुर्ग महिलाएँ तक शामिल थीं। इनमें से किसी को नहीं बख्शा गया। सरना महिलाओं का आरोप है कि सरना पूजा के लिए उन्होंने झंडा लगा रखा था। रजिया खातून ने उन झंडों को निकाल कर फेंक दिया। महिलाओं का कहना है कि रजिया ने उनसे कहा, “इस रास्ते से नहीं जाना है। तुम लोगों (जनजातीय) को अब यहाँ नहीं रहना है।”
इतना ही नहीं, महिलाओं ने यह भी कहा कि जब कट्टरपंथी मुस्लिम हमला कर रहे थे, तब रजिया सबको लाठी-हथियार दे रही थी। एक दूसरी महिला ने कहा कि रजिया खातून खुद भी सरना जनजातीय लोगों पर पत्थर फेंक रही थी। महिलाओं का आरोप है कि रजिया खातून ने बेटे ने झगड़े की शुरुआत की थी। वहीं, आसिफ अंसारी बंदूक तानकर सबको गोली मारने की धमकी दे रहा था।
महिलाओं का आरोप है कि इस बार के ईद में मुस्लिमों ने सड़कों के ऊपर झालर बाँध दिया था। जब वे सरना के लिए जा रहे थे, तो उनके झालर में इनका झंडा लग गया था। इसके बाद इस्लामी भीड़ भड़क उठी थी और उन लोगों पर हमला कर दिया था। एक अन्य महिला का कहा मुस्लिम उनके त्योहार में झमेला करते हैं।
जनजातीय समुदाय में आक्रोश
इस घटना के विरोध में सरना समुदाय के लोगों ने राँची-पतरातू रोड को सुबह नौ बजे से जाम कर दिया। इसके साथ ही पिठौरिया बाजार की सभी दुकानों को भी बंद करा दिया। आक्रोशित लोगों ने हमलावरों की तुरंत गिरफ्तारी की माँग की। हालाँकि, पुलिस ने दो आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन लोगों का कहना है कि जब तक बाकी आरोपितों को गिरफ्तार नहीं किया जाता, तब तक प्रदर्शन जारी रहेगा।
पीड़ितों का आरोप है कि न सिर्फ उनकी शोभायात्रा को रोका गया, बल्कि पाहन (पुजारी) और अन्य लोगों के साथ मारपीट भी की गई। इस घटना में रवि पाहन, नगदेव पाहन, पईनभोरा मुंडा, संदीप मुंडा, विजय मुंडा, अजय मुंडा, अरविंद मुंडा, करण मुंडा घायल हो गए हैं। पीड़ितों ने बुधवार (2 अप्रैल 2025) को जाकर थाने में शिकायत दी, जिसके आधार पर पुलिस ने FIR दर्ज की।
FIR में पुलिस ने आदम अंसारी, आरिफ अंसारी, मिंटु अंसारी और जुएफा अंसारी को नामजद किया है। वहीं, कई अज्ञात लोगों को आरोपित बनाया गया है। शिकायत में कहा गया है कि सरहुल की शोभायात्रा हेठबालू गाँव में हरगढ़ी स्थान पर पहुँची तो हमलावरों ने धारदार हथियारों से हमला कर दिया। हमलावर पहले से ही वहाँ घात लगाकर बैठे थे।
क्या है मामला?
दरअसल, मुस्लिम समाज के लोगों ने सड़क के दोनों तरफ झालर लगाया था। इसी दौरान जनजातीय समाज ने सरहुल के मौके पर पूजा वाले रास्ते में परंपरा के अनुसार सड़क के किनारे झंडा लगा दिया। एक दिन पूर्व भी दोनों पक्षों के बीच इसको लेकर तनातनी हो चुकी थी। 1 अप्रैल को जब सरहुल मनाने के लिए जनजातीय समाज के लोग जा रहे थे मुस्लिमों के लगाए झालर में ट्रैक्टर में फँसकर टूट गया।
इसके बाद मुस्लिम पक्ष ने उन पर लाठी-डंडे, ईंट-कुल्हाड़ी से हमले कर दिए। सरहुल शोभायात्रा का नेतृत्व कर रहे पाहन सहित 8 लोग इस हिंसा में घायल हुए हैं। वहीं मुस्लिम समाज का कहना है कि उनकी तरफ भी 4 लोगों को चोटें आई हैं। उसे पकड़ के पुलिस को सौंप दिया गया है। डीएसपी अमर कुमार पांडेय का कहना है कि साज-सज्जा को लेकर दोनों पक्षों में झड़प हुई थी।
पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के शासनकाल में समुदाय विशेष का दुस्साहस बढ़ गया है। हेमंत सोरेन न तो सरना स्थलों की रक्षा कर पा रहे हैं, न ही सरहुल उत्सव की सुरक्षा सुनिश्चित कर पा रहे हैं। उन्होंने सरहुल जुलूस में बाधा उत्पन्न करने वाले उपद्रवियों पर बिना विलंब सख्त कारवाई करने की अपील राँची पुलिस से की है।
बाबूलाल मरांडी ने कहा, “हेमंत सोरेन जी, फिर एक नौटंकी कीजिए – जैसे आपने पहले सरना स्थल आंदोलनकारियों पर मुक़दमा दर्ज कराया, फिर कार्रवाई रोक कर वाहवाही बटोरने का प्रयास किया। ठीक उसी तरह अब जनजातियों से प्राथमिकी दर्ज कराइए, फिर उसे निरस्त कर वाहवाही बटोरिए। ऐसे ही कुटिल राजनीति के माध्यम से जनजातीय समाज को बेवक़ूफ़ बनाकर भ्रमित करते रहिए।”
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक मुस्लिम परिवार के 10 सदस्यों ने हिंदू धर्म में घर-वापसी की। गुरुवार (3 अप्रैल, 2025) सुबह बघरा के योग साधना यशवीर आश्रम में स्वामी यशवीर महाराज ने हवन-यज्ञ करवाकर इनलोगों की शुद्धि कराई। परिवार ने 50 साल पहले इस्लाम मजहब अपनाया था। अब उन्होंने कहा हैं कि ये गलती थी, अब हम पूर्वजों के सनातन धर्म में वापस लौटना चाहते हैं।
आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी यशवीर महाराज और आचार्य मृगेन्द्र ब्रह्मचारी ने वैदिक मंत्रों के साथ शुद्धिकरण यज्ञ संपन्न कराया। परिवार के सभी सदस्यों ने घी और सामग्री की आहुतियाँ दी। इस दौरान परिवार के सभी 10 सदस्यों ने इस्लामिक नाम त्याग कर हिंदू नाम अपनाए। परिवार की मुखिया फेमिदा अब राजकुमारी बन गई है। उनका बेटा दिलजान बृजेश कश्यप और उसकी पत्नी महक कविता बन गई है। फेमिदा की पोती रेशमा पूजा, पलक सविता, आलिया पायल, सना कुमारी सोनिया, खुशनुमा कुमारी साधना, पोता अरमान अमित कश्यप और इस्लाम विक्रम सिंह बन गए हैं।
ईद मनाने के बाद 10 मुस्लिमों ने इस्लाम मजहब छोडा आज योग साधना यशवीर आश्रम बघरा मुजफ्फरनगर में सहारनपुर जनपद के देवबंद के मुस्लिमों ने शुद्धिकरण यज्ञ में आहुतियां देकर इस्लाम मजहब को छोड़कर सनातन धर्म में घर वापसी की ये कश्यप जाति से है इस परिवार का घर वापसी करने पर स्वागत करिये pic.twitter.com/bvhmBOhCFM
— स्वामी यशवीर महाराज (@sanatan_prachar) April 3, 2025
बता दें कि देवबंद के कश्यप राजपूत परिवार की महिला ने 50 साल पहले मुस्लिम शख्स से शादी की थी, जिसके बाद वो फेमिदा बन गई। फेमिदा ने बताया, “मैं ज्यादा समय अपने मायके में बिताती थी। इससे ससुराल वालों को ऐतराज रहता था। कुछ वर्ष पहले पति की मौत हो गई। इसके बाद से ही ससुराल वालों ने मायका छोड़कर ससुराल में रहने का दबाव बनाने लगे। मेरे बच्चों को भी वो परेशान करते हैं। बच्चे महाराष्ट्र गए हुए हैं। वो साल छह महीने में आते हैं। उन्हें मेरे हिंदू धर्म में रहने से भी परेशानी थी। अब मैंने हिंदू धर्म में वापसी कर ली है, मेरे साथ-साथ परिवार ने भी ये कदम उठाया है।”
फेमिदा ने बताया, “अब मेरा नाम राजकुमारी है। 50 साल पहले ग़लती हुई थी। मेरा कोई भाई नहीं था। हम पाँच बहनें थीं, इसीलिए मजबूरी थी। अब अपने धर्म में वापस आ गई हूँ। काफी खुश हूँ। ईद के बाद धर्म में वापस आने का संकल्प लिया था। अब पूरा हो गया है।”
आश्रम के पीठीधीश्वर स्वामी यशवीर महाराज ने बताया, “देवबंद के निवासी मुस्लिम परिवार से थे। ये लोग यहाँ आश्रम में आए और कहने लगे कि हमने इस्लाम मजहब छोड़ दिया है, सनातन धर्म को स्वीकार कर लिया है। शुद्धि यज्ञ के माध्यम से बड़ी श्रद्धा से सनातन धर्म में घर वापसी कर ली है। यह कश्यप जाति से हैं। 5000 मुस्लिम हिंदू धर्म में वापसी करना चाहते हैं जिन्होंने किसी भी वजह से वर्षों पूर्व इस्लाम मजहब को अपना लिया था।”
‘सभी मुस्लिम पहले हिंदू थे’
स्वामी यशवीर महाराज ने कहा, “भारत में रहने वाले सभी मुस्लिम पहले हिंदू थे। इस्लामी हुकूमत में उनके पूर्वजों पर अत्याचार हुए। कई ने लालच में आकर सनातन धर्म छोड़ दिया। किसी ने भी खुशी या इस्लाम की शिक्षा से प्रभावित होकर इसे नहीं अपनाया। हमारी सभी कन्वर्टेड मुस्लिमों से अपील है कि वे अपने पूर्वजों की गलती सुधारें। सभी सनातन धर्म में लौट । अब देश में भय का माहौल नहीं है। भाजपा सरकार अच्छा काम कर रही है। लाखों-करोड़ों मुस्लिम इस्लाम छोड़ चुके हैं। जो मुस्लिम हिंदू धर्म में आना चाहते हैं, हम उनका स्वागत करते हैं।”
बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता और निर्देशक मनोज कुमार का शुक्रवार (4 अप्रैल 2025) तड़के मुंबई के कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी अस्पताल में निधन हो गया। राष्ट्रपति मुर्मू और पीएम मोदी समेत कई नेताओं ने उनके निधन पर शोक जताया है।
पीएम मोदी ने एक्स पर लिखा है, “महान अभिनेता और फिल्मकार मनोज कुमार जी के निधन से बहुत दुख हुआ। वे भारतीय सिनेमा के प्रतीक थे, जिन्हें खास तौर पर उनकी देशभक्ति के जोश के लिए याद किया जाता था।”
बॉलीवुड गमगीन
बॉलीवुड में भी शोक की लहर है। प्रसिद्ध फिल्म निर्माता अशोक पंडित के मुताबिक, “दादा साहब फ़ाल्के पुरस्कार विजेता और भारतीय फ़िल्म जगत के दिग्गज कलाकार मनोज कुमार का निधन फिल्म जगत के लिए बड़ी क्षति है। पूरी इंडस्ट्री उनको याद करेगी।”
बॉलीवुड में देशभक्ति की आवाज बने
मनोज कुमार अपने राष्ट्रवादी फिल्मों के लिए जाने जाते थे और भारत कुमार के रूप में प्रख्यात हुए। उपकार, क्रांति, शहीद, पूरब और पश्चिम, रोटी कपड़ा और मकान जैसी राष्ट्रवादी और सामाजिक सरोकार से जुड़ी उनकी प्रमुख फिल्में रहीं। मनोज कुमार का नाम हरिकृष्ण गोस्वामी था। उनका जन्म वर्तमान पाकिस्तान के ऐबटाबाद में 1937 में हुआ।
सत्ता के खिलाफ कोर्ट पहुँचे और जीता
मनोज कुमार उन नेताओं में शुमार थे जिन्होने सत्ता के खिलाफ बोलने की हिम्मत दिखाई। उन्होने इमरजेंसी का विरोध किया जिसकी वजह से उनकी फिल्मों ‘दस नंबरी’ और ‘शोर’ पर तत्कालीन इंदिरा गाँधी सरकार ने रोक लगा दी। हालाँकि कोर्ट में सरकार के खिलाफ उन्होने केस जीतकर अपने अभियान को आगे बढ़ाया। फिल्म शोर को सिनेमाघरों में रिलीज होने से पहले दूरदर्शन पर दिखाया गया, जिसकी वजह से फिल्म ज्यादा कमाई नहीं कर पाई। इससे मनोज कुमार को काफी धक्का लगा क्योंकि फिल्म के एक्टर, निर्देशक और निर्माता वही थे।
सरकार के ऑफर को ठुकराया भारत कुमार ने
यहाँ तक कि जब सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने उन्हें एक फिल्म की पेशकश की तो सरकार के इस ऑफर को मनोज कुमार ने ठुकरा दिया था। आर्थिक तंगी के बीच भारत कुमार का ये फैसला उनके दृढ़निश्चयी होने का प्रमाण है।
लोकसभा के बाद वक्फ संशोधन बिल गुरुवार (4 अप्रैल 2025) की रात राज्यसभा में भी पास हो गया। इस विधेयक के पक्ष में 128 सांसदों ने वोट दिया, जबकि विरोध में 95 वोट पड़े। संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद इस बिल को राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हस्ताक्षर के बाद नोटिफिकेशन जारी होते ही यह बिल कानून बन जाएगा।
राज्यसभा में इस पर लगभग 12 घंटे इस पर बहस हुई थी। विधेयक पर विपक्ष की ओर से कई संशोधन पेश किए गए, जिसे सदन ने खारिज कर दिया। बता दें कि बुधवार (3 अप्रैल 2025) की रात को लोकसभा में भी लगभग 12 घंटे तक बहस के बाद इसे पारित किया गया था। लोकसभा में इस विधेयक के पक्ष में 288 वोट पड़े थे, जबकि विरोध में 232 वोट पड़े थे।
अंतिम समय में ओडिशा की बीजू जनता दल (BJD) ने सरकार का समर्थन किया। इससे पहले BJD ने बिल का कड़ा विरोध किया था और इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताया था। हालाँकि, बाद में पार्टी ने अपने सांसदों को इच्छा के अनुसार पक्ष में या विपक्ष में वोट करने की अनुमति दी। पार्टी ने कोई व्हिप जारी नहीं किया था और अपनी अंतरात्मा की आवाज पर निर्णय लेने को कहा था।
दरअसल, वर्तमान में राज्यसभा सदस्यों की संख्या 236 हैं। बहुमत का आँकड़ा 119 है। वहीं, राज्यसभा में के सासंदों की कुल संख्या 98 सांसद हैं, जबकि NDA के सदस्यों की संख्या 118 है। वहीं, 6 मनोनीत सदस्य भी हैं। इस तरह NDA के पक्ष में कुल 124 संख्या है। राज्यसभा में कॉन्ग्रेस के 27 सांसद हैं। अगर इंडी गठबंधन की बात करें तो यह संख्या 88 पहुँच जाती है।
राज्यसभा में वक्फ (संशोधन) विधेयक-2025 पर चर्चा का जवाब देते हुए अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि वक्फ बोर्ड एक वैधानिक निकाय है। इस कारण से इसे धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए। रिजिजू ने कहा कि मुस्लिमों की भावनाओं को देखते हुए फिर भी हमने गैर-मुस्लिमों की संख्या सीमित कर दी गई है। उन्होंने कहा कि विपक्षी पार्टियाँ वक्फ विधेयक से मुस्लिमों को डरा रही हैं।
विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्ष के अधिकांश सदस्य सदन से नदारद रहे। वहीं, सत्ता पक्ष सदस्य मौजूद रहे। बिल को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मोर्चा संभाल रखा था। चर्चा के दौरान कई बार खड़े होकर उन्होंने हस्तक्षेप किया। कॉन्ग्रेस सांसद नासिर हुसैन को टोकते हुए उन्होंने कहा कि अब तक ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती नहीं दी जा सकती थी, लेकिन विधेयक में ऐसा नहीं है।
मुस्लिम संगठनों के पास क्या है आगे का रास्ता
मुस्लिम संगठनों एवं सांसदों के विरोध के बीच वक्फ संशोधन विधेयक लोकसभा और राज्यसभा में पास हो गया। लोकसभा में AIMIM के मुखिया ने इस बिल को फाड़ दिया था। अब ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) इसके खिलाफ कोर्ट जा सकता है। लखनऊ ऐशबाग ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने भी इसका संकेत दिया है।
फिरंगी महली ने कहा, “हमारे लिए कोर्ट का दरवाजा खुला है। इनमें से कई प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 29 के खिलाफ हैं। हमें पूरी उम्मीद है कि कोर्ट से हमें इंसाफ मिलेगा।” उन्होंने कहा कि AIMPLB के साथ ही अन्य संस्थाओं ने जो सुझाव JPC के सामने रखे थे, उन्हें इस बिल में शामिल नहीं किया गया है।