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जब लगातार 9 घंटे चला हिन्दुओं का कत्लेआम… मस्जिद की छतों से आग के गोले फेंकती थी पाकिस्तानी फ़ौज, कतार में खड़ा करा के बरसाई गोलियाँ

ये घटना तब की है, जब बांग्लादेश ‘पूर्वी पाकिस्तान’ हुआ करता था, पाकिस्तान का एक हिस्सा। वहाँ आज़ादी का आंदोलन चल रहा था। उसे कुचलने के लिए पाकिस्तानी फ़ौज क्रूरता की हर सीमा पार कर रही थी। न केवल बंगाली बोलने वाले लोगों, बल्कि उनके साथ-साथ बड़े पैमाने पर हिन्दुओं को भी निशाना बनाया जा रहा था। उन्हीं वीभत्स घटनाओं में से एक है जिंजीरा का नरसंहार।

जिंजीरा नरसंहार 1971 में ‘बांग्लादेश मुक्ति आंदोलन’ के दौरान पाकिस्तानी सेना द्वारा योजनाबद्ध तरीके से की गई हिन्दुओं के नरसंहार की दास्ताँ है। यह हत्याकांड ढाका से बूढ़ीगंगा नदी के आसपास केरानीगंज उपजिला के जिंजीरा, कालिंदी और शुभद्या जैसे स्थानों पर हुआ, जिसमें एक ही रात में करीब 5000 हिन्दुओं की हत्या कर दी गई थी।

हिन्दुओं का कत्लेआम, हजारों महिलाएँ बलात्कार की शिकार

इसकी जानकारी बांग्लादेश में उस वक्त मौजूद अमेरिकी वकील आर्चर ब्लड के कई टेलीग्रामों से भी मिलती है, जिसमें उन्होंने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन से तत्काल हस्तक्षेप करने की माँग की थी। उन्होंने लिखा था, “पाकिस्तानी सेना के समर्थन से गैर-बंगाली मुस्लिम योजनाबद्ध तरीके से ग़रीब लोगों के घरों पर हमला कर रहे हैं और बंगालियों और हिंदुओं की हत्या कर रहे हैं।”

एक अनुमान के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना ने 1970 के दशक में कई नरसंहार किए जिसमें हिंदू पुरुषों, पेशेवरों और बुद्धिजीवियों को मारा गया। इस दौरान 20,000 से 40,000 महिलाएँ बलात्कार की शिकार हुईं।

पाकिस्तान का ‘खूनी खेल’

पाकिस्तानी सेना ने योजनाबद्ध तरीके से मुक्ति आंदोलन में शामिल लोगों के खिलाफ जमकर रक्तपात मचाया। इस दौरान धर्म को आधार बनाया गया और हिन्दुओं का कत्लेआम किया गया। 1971 के भारत-पाक युद्ध के बीज 25 मार्च, 1971 को ही पड़ गए थे, जब पाकिस्तानी सेना ने शेख मुजीबुर्रहमान की ‘अवामी लीग’ के नेतृत्व वाले मुक्ति आंदोलन को दबाने के लिए ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ शुरू किया।

पूर्वी पाकिस्तान को खोने के कगार पर पहुँचा पाकिस्तान बौखलाया हुआ था। ये हिस्सा पाकिस्तान की मुख्य भूमि से 1600 किलोमीटर (990 मील) दूर था, इसीलिए इसे नियंत्रित करने में दिक्कतें आ रही थी। इससे गुस्साए पाकिस्तान ने बांग्लादेश पर अपनी कम होती पकड़ को बनाए रखने के लिए आखिरी कोशिश के रूप में जमकर खूनी खेल खेला। परिणाम ये हुआ कि गंभीर मानवीय संकट पैदा हो गया और 1 करोड़ से ज़्यादा शरणार्थी भारत में शरण लेने को मजबूर हो गए। खास तौर पर पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा जैसे बांग्लादेश से सटे राज्यों में।

आत्मसमर्पण के लिए मजबूर हुआ पाकिस्तान

9 महीने के आंतरिक संघर्ष और बांग्लादेशी स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ पाकिस्तानी सेना के लगातार हमले के बाद भारत के साथ निर्णायक युद्ध शुरू हुआ। 13 दिनों के भीतर, भारतीय सेना ने एक महत्वपूर्ण जीत हासिल की, जिससे 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को शर्मनाक हार के बाद आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

इसके बाद पूर्वी पाकिस्तान का बांग्लादेश के रूप में एक नए राष्ट्र के तौर पर उदय हुआ। बांग्लादेश के बनने में वहाँ के हिन्दुओं के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। आजादी की लड़ाई को कमजोर करने के लिए पाकिस्तान ने मुक्ति वाहिनी के हिन्दू नेताओं और समर्थकों को चुन-चुनकर मौत के घाट उतार दिया। ऐसे ही नरसंहारों में एक था जिंजीरा नरसंहार।

जिंजीरा नरसंहार की वो काली रात

2 अप्रैल, 1971 की रात पाकिस्तान के सरकारी टीवी चैनल ने बूढ़ीगंगा की दूसरी तरफ केरानीगंज के जिंजीरा में शरण लिए हुए मुक्ति वाहिनी समर्थकों के खिलाफ सैन्य अभियान चलाने का ऐलान किया। 3 अप्रैल को मॉर्निंग न्यूज ने शीर्षक दिया, “जिंजीरा में उपद्रवियों के खिलाफ कार्रवाई।”

हुआ यूँ कि पाकिस्तानी सेना ने 2 अप्रैल की आधी रात से केरानीगंज के आसपास सैनिकों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। इन इलाकों के आसपास मुख्य रूप से हिन्दू परिवार रहते थे। उन्होंने नदी के किनारे स्थित मिटफोर्ड अस्पताल पर कब्जा कर लिया। सुबह करीब 5 बजे उन्होंने अस्पताल से सटी मस्जिद की छत से आग के गोले फेंकना शुरू किया और जिंजीरा में घुस गए। पूरे इलाके को कँटीली तारों से घेर दिया गया था, ताकि कोई भाग न सके।

पाकिस्तानी सेना लगातार लोगों पर गोलियाँ चला रही थी। यह नरसंहार करीब नौ घंटे तक चला। इस दौरान नांदेल डाक गली के एक तालाब के किनारे 60 लोगों को कतार में खड़ा करके गोली मार दी गई। सैनिकों ने बम बरसाए और घरों में घुसकर मौत का तांडव मचाया। इस नरसंहार में हज़ारों लोग मारे गए।

कब्र में छिप गए थे लोग

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना ने कम से कम 5000 नागरिकों को मार डाला। जिंजीरा, कालिंदी जैसे इलाके आवामी लीग के गढ़ थे। पाकिस्तानी सेना द्वारा शुरू किए गए ‘ऑपरेशन सर्च लाइट’ के बाद ढाका से बूढ़ीगंगा नदी पार कर बड़ी संख्या में हिन्दू यहाँ आए थे। ये लोग अवामी लीग के समर्थक थे।

बांग्लादेश में संयुक्त राष्ट्र मिशन के पूर्व प्रेस काउंसलर रहे अब्दुल हन्नान भी उन लोगों में शामिल थे जो घटना के दौरान वहाँ छिपे हुए थे। उन्होंने भी इस घटना का जिक्र डेली स्टार से किया है।

मुसलमानों को पाकिस्तानी सेना ने छोड़ा

हन्नान ने लिखा, “गोली दाहिनी तरफ से आ रही थी, इसलिए परिवार के साथ उत्तर की तरफ भागा। थोड़ी दूर चलने के बाद लगा उत्तर से गोली आने लगी तो पूर्व की ओर भागा, लेकिन फिर पता चला कि चारों ओर से गोली चल रही है। हम भागकर मस्जिद के पास पहुँचे। उसके पीछे एक कब्रिस्तान था। लोग कब्रों में छिपे हुए थे” हन्नान के मुताबिक, उनके पिता ने बताया कि पाकिस्तानी सैनिकों ने उनपर बंदूक तान दी थी लेकिन अल्लाह का नाम लेते ही उन्हें छोड़ दिया।

इसी तरह की एक और घटना ढाका के शंखरीबाजार में हुई। वह भी हिन्दू इलाका माना जाता था। यहाँ शंख की पारंपरिक चूड़ियाँ बनाई जाती थी। पाकिस्तानी सेना ने करीब 126 हिन्दुओं के घरों को घेर लिया और लोगों की एक एक कर गोली मार दी। घटना के बाद शंखरीबाजार वीरान हो गया।

चीनी नागरिकों से शारीरिक और प्रेम संबंध बनाने पर रोक, अमेरिका ने राजदूतों के लिए लागू किए सख्त नियम-क़ानून: नहीं माने तो छोड़नी होगी नौकरी

अमेरिकी सरकार ने चीन में तैनात अपने सरकारी अधिकारियों, उनके परिवारों और सुरक्षा मंजूरी प्राप्त ठेकेदारों के लिए सख्त प्रतिबंध लागू किया है। अब वे किसी भी चीनी नागरिक के साथ प्रेम संबंध या शारीरिक संबंध नहीं बना सकेंगे। इस नीति को जनवरी में तत्कालीन अमेरिकी राजदूत निकोलस बर्न्स ने लागू किया था।

AP (एसोसिएट प्रेस) के अनुसार, पिछले साल एक सीमित नीति लागू की गई थी, जिसमें अमेरिकी अधिकारियों को चीन में अपने दूतावास में काम वाले चीनी नागरिकों, जैसे सुरक्षा गार्ड और अन्य सहायक कर्मचारियों के साथ रिश्ते रखने से रोका था। लेकिन अब यह प्रतिबंध अमेरिकी दूतावास और वाणिज्य दूतावासों में लागू होगा। इसमें बीजिंग स्थित अमेरिकी एम्बेसी और ग्वांगझू, शंघाई, शेनयांग और वुहान स्थित वाणिज्य दूतावास शामिल हैं। इसके अलावा, यह नियम हांगकांग स्थित वाणिज्य एम्बेसी में भी लागू होगा।

हालाँकि, जिन अधिकारियों के पहले से चीनी नागरिकों के साथ संबंध हैं, वे छूट के लिए आवेदन कर सकते हैं। अगर उनका आवेदन अस्वीकार किया जाता है तो उन्हें अपने संबंध खत्म करने होंगे या अपनी नौकरी ही छोड़नी होगी।

क्यों लगाया गया प्रतिबंध?

अमेरिकी सरकार ने पहले भी ऐसे प्रतिबंध लगाए हैं। 1987 में सोवियत संघ और चीन में तैनात अमेरिकी अधिकारियों को स्थानीय नागरिकों (महिलाओं/पुरुषों) से दोस्ती करने, डेट करने या संबंध बनाने से रोक दिया गया था। इसकी वजह एक मामला था, जिसमें मॉस्को में तैनात एक अमेरिकी मरीन को सोवियत की महिला जासूस ने प्रेम-संबंध बनाकर फँसाया था।

खुफिया एजेंसियाँ अक्सर आकर्षक पुरुषों और महिलाओं का इस्तेमाल कर गोपनीय जानकारी हासिल करने की कोशिश करती हैं। यह विशेष रूप से शीत युद्ध के दौरान काफी आम था। अमेरिका का मानना है कि चीन अभी भी इस तरह की रणनीतियों का इस्तेमाल कर रहा है।

चीन कर रहा ‘हनीपॉट’ का उपयोग

अमेरिकी राजनयिकों और खुफिया विशेषज्ञों के अनुसार, चीन अमेरिकी रहस्यों तक पहुँचने के लिए ‘हनीपॉट’ तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है। पोस्टिंग से पहले, अमेरिकी अधिकारियों को ये जानकारी दी जाती है कि चीनी खुफिया एजेंसियां सुंदर महिलाओं को उनके करीब भेज सकती हैं। इसके अलावा, किसी भी महत्वपूर्ण अमेरिकी राजनयिक पर दर्जनों चीनी सुरक्षा एजेंट नजर रख सकते हैं।

अमेरिकी अधिकारियों को इस नए प्रतिबंध की जानकारी जनवरी में मौखिक और इलेक्ट्रॉनिक रूप से दी गई थी। हालांकि, इस संबंध में अभी तक कोई सार्वजनिक घोषणा नहीं की गई है। इससे पहले, चीन में तैनात अमेरिकी अधिकारियों को अपने चीनी नागरिकों के साथ किसी भी करीबी संपर्क की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को देने की आवश्यकता होती थी लेकिन उस पर पूरा प्रतिबंध नहीं था।

खतरे में है हर हिंदू, सरकारी सुरक्षा के भरोसे हम जीवनभर नहीं बैठ सकते… पर कवर्धा का ‘सुरक्षा मॉडल’ आत्मसात तो कर ही सकते हैं

यदि आपको लगता है कि कासगंज के चंदन गुप्ता का ही परिवार खतरे में है तो आप गलत हैं। यदि आपको लगता है कि खतरा केवल नुपुर शर्मा तक ही सीमित है तो आप गलत हैं। यदि आपको लगता है कि कमलेश तिवारी, कन्हैया लाल तेली, उमेश कोल्हे की हत्या के बाद ‘सर तन से जुदा’ का खतरा आपके ऊपर से टल चुका है तो भी आप गलत हैं।

खतरा तो कथित गंगा-जमुनी तहजीब का राग अलापने वाले, जय भीम-जय मीम का नारा लगाने वाले, मुगलों में सेकुलरिज्म का अब्बा देखने वाला हिंदुओं को भी है। क्योंकि सारे हिंदू काफिर हैं। लिबरल, वामपंथी, दलित चिंतक, सेकुलर जैसे टैग्स की भूमिका उनकी सूची में आपका नाम थोड़ा नीचे दर्ज करवाने तक ही सीमित है।

यह खतरा केवल कुछ गलियों, गाँवों, शहरों, जिलों, प्रांतों तक भी सीमित नहीं है। वे गह-गह पसरे हुए हैं। आपसे यह खतरा उतना ही दूर है, जितना एक मुस्लिम को मुस्लिम भीड़ का हिस्सा बनने में लगना है। इस खतरे को भाँपकर, हमें सुरक्षित रखने के लिए सरकारें (यदि वह तुष्टिकरण वाली न हो तो) सख्त कानून बना सकती हैं। किसी व्यक्ति/परिवार पर खतरों का आकलन कर उन्हें सुरक्षा उपलब्ध करवा सकती है।

पर यह संभव नहीं है कि हर हिंदू को सरकार सुरक्षा दे। यह भी संभव नहीं है कि जो व्यक्ति/परिवार ऐसे खतरों में घिरा हो उसे जीवनभर सुरक्षा दी जाए। ऐसा करना उस व्यक्ति/परिवार के जीवन को भी कठिन बना देगा।

ऐसे में सवाल उठता है कि हम हिंदू क्या करें? वह व्यक्ति/परिवार क्या करे जिसका शिकार करने को इस्लामी कट्टरपंथी घात लगाए बैठे हैं? इसका मुकम्मल जवाब दे पाना तो कठिन है। पर कवर्धा के हिंदुओं ने जिस तरह दुर्गेश देवांगन के परिवार की सुरक्षा की है, उस मॉडल को आगे बढ़ाकर हम काफी हद तक इस खतरे को कम अवश्य कर सकते हैं।

कवर्धा में क्या हुआ था?

2021 में छत्तीसगढ़ के कवर्धा में करमा माता मंदिर पर लगे भगवा ध्वज को इस्लामी कट्टरपंथियों ने फाड़कर फेंक दिया था। इसका विरोध करने पर दुर्गेश देवांगन नाम के युवक को बेरहमी से पीटा गया। हिंदुओं पर पत्थरबाजी हुई। उस समय राज्य में भूपेश बघेल के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार चल रही थी। स्थानीय विधायक मोहम्मद अकबर उस सरकार का प्रभावशाली मंत्री था।

इसका असर पुलिसिया कार्रवाई में भी दिखा। कथित तौर पर थाने लाकर भी हिंदुओं को पीटा गया। दुर्गेश देवांगन का तो कई दिनों तक पता भी नहीं चला था। यह भी आरोप है कि पुलिस के साथ तलवार लेकर इस्लामी कट्टरपंथी सड़कों पर घूम रहे थे। कर्फ्यू और जबरन बल प्रयोग कर हिंदू संगठनों के नेताओं को कवर्धा पहुँचने से रोका गया। स्थानीय हिंदुओं की मानें तो हिंदुओं के इस दमन को मोहम्मद अकबर का पूर्ण समर्थन था। मोहम्मद अकबर को भूपेश बघेल का संरक्षण था। कवर्धा से लेकर रायपुर तक व्यवस्था में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था, जो हिंदुओं की व्यथा सुने। सुनी भी नहीं गई।

हिंदुओं के आत्मबल का प्रतीक है धर्म ध्वजा चौक

आज छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार है। कवर्धा के विधायक विजय शर्मा राज्य के उप मुख्यमंत्री हैं। मोहम्मद अकबर और उसको संरक्षण देने वाले भूपेश बघेल की हनक 2023 के विधानसभा चुनावों में जनता निकाल चुकी है। ऐसे में आपको शायद यह अनुभूति न हो कि 2021 की उस घटना के बाद से चुनाव के नतीजे आने तक, कवर्धा के हिंदू किस खतरे के बीच रह रहे थे। किन तरह के खतरों के बीच दुर्गेश देवांगन और उसका परिवार एक-एक दिन काट रहा था।

मैं 2021 की उस घटना के करीब एक साल बाद कवर्धा गया था। उस समय हिंदुओं ने अपने आत्मबल से करमा माता मंदिर के पास धर्म ध्वजा चौक बना ली थी। 108 फीट ऊँचा भगवा ध्वज लहरा रहा था। इससे कुछ ही कदमों की दूरी पर दुर्गेश देवांगन के पिता की आलू, प्याज और मसालों की दुकान थी। दुकान के शटर पर बजरंगबली विराजमान थे तो साइनबोर्ड पर राम का नाम अंकित था। दुकान पर पहुँचते ही मेरा अभिवादन ‘जय श्रीराम’ के साथ हुआ था। यकीन मानिए मुझे भी उस समय वहाँ के हिंदुओं पर मंडरा रहे खतरों की अनुभूति नहीं हो पाई थी। मुझे भी लगा कि 2021 की घटना शायद उतनी भयावह नहीं थी, जैसा वहाँ से आए वीडियो को देखकर और कवर्धा के लोगों से फोन पर बातचीत से प्रतीत होती थी।

हिंदू ही हिंदू का बना सुरक्षा कवच

लेकिन जब मैंने दुर्गेश देवांगन के परिवार और स्थानीय हिंदुओं से बातचीत करना प्रारंभ किया तो पता चला कि हमारी जानकारी से कहीं अधिक बुरे तरीके से 2021 में हिंदुओं का दमन किया गया था। उनकी आवाज कुचल दी गई थी। साल भर बाद भी हिंदुओं को डराने धमकाने का सिलसिला जारी था। पुलिस तमाशबीन बनी हुई थी।

दुर्गेश के पिता संतोष देवांगन ने ऑपइंडिया को बताया था, “विधायक का करनी है पूरा। जब मेरा लड़का मार खाया तो पीटने वालों के साथ अकबर (विधायक मोहम्मद अकबर) का लड़का भी था। अब हम पर राजीनामे का दबाव बनाया जा रहा है।” संतोष देवांगन ने बताया कि उस घटना के बाद एक तरफ उनके बेटे का पता नहीं चल रहा था, दूसरी तरफ उनके घर के बाहर पुलिस का पहरा बिठा दिया गया। परिवार की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि पीड़ित परिवार के लोग न किसी से मिल सके और न कोई उनसे मिल सके।

विश्व हिंदू परिषद के कबीरधाम जिले के कार्यकारी अध्यक्ष कैलाश शर्मा ने ऑपइंडिया को बताया था कि पहले सुनियोजित तरीके से हिंदुओं पर हमले की घटना को अंजाम दिया गया। फिर स्थानीय स्तर पर जो भी हिंदुओं के पक्ष में खड़ा हुआ मोहम्मद अकबर के इशारे पर उसका दमन किया गया। इसका असर यह था कि सालभर बाद भी हिंदू भयभीत थे।

जिन हिंदुओं की उस समय गिरफ्तारी हुई थी उनमें आज के डिप्टी सीएम विजय शर्मा भी थे। जब हम दुर्गेश के परिवार से बातचीत कर रहे थे, उस समय भी वे अचानक से उस परिवार का हाल जानने के लिए आए थे। संतोष देवांगन ने बताया कि जब से शर्मा जेल से बाहर आए है, कवर्धा में रहते हुए कोई भी ऐसा दिन नहीं बीतता, जब वे उनके परिवार का हाल जानने खुद नहीं आते। कवर्धा से बाहर रहने पर भी वे फोन के जरिए उनके परिवार के संपर्क में बने रहते हैं।

देवांगन के मुताबिक विहिप और अन्य हिंदू संगठनों के पदाधिकारी भी नियमित रूप से उनका और उन जैसे पीड़ितों की इसी तरह चिंता करते हैं। उन्होंने ऑपइंडिया को बताया था कि धमकियों और खतरों के बीच हिंदुओं का यह सहयोग उनके परिवार के लिए बड़ा बल है। इसके कारण ही उनका जीवन सामान्य हो पाया है। वे निश्चिंत होकर दुकान चला पा रहे हैं। ऑपइंडिया से बातचीत में कुछ और पीड़ित हिंदुओं ने भी इसी तरह का सहयोग मिलने की पुष्टि की थी।

कवर्धा का यह सुरक्षा मॉडल हमें क्या बताता है?

कवर्धा के इस सुरक्षा मॉडल में हम हिंदुओं के लिए सीधा संदेश यह है कि सरकार और तंत्र के भरोसे बैठे रहना ठीक नहीं है। बाहरी मदद की उम्मीद नहीं रखनी है। स्थानीय स्तर पर ही यदि हम नियमित रूप से केवल एक-दूसरे की सुरक्षा की चिंता करने लगे तो कैसी भी प्रतिकूल परिस्थिति में हम परिस्थिति बदल सकते हैं। खतरे से घिरे हिंदू परिवार का जीवन सामान्य कर सकते हैं। मार डाले जाने के भय से घर बैठने की जगह, उन्हें अपने परिवार की जीविका चलाने के लिए उसी बाजार में निश्चिंत होकर व्यवसाय करने को प्रेरित कर सकते हैं, जहाँ से वे कट्टरपंथियों के निशाने पर आए थे।

वैसे भी सत्य यही है कि इस्लामी कट्टरपंथ के खतरे को कम करना ही हमारे हाथ में है। एक-दूसरे का सुरक्षा कवच बनना ही हमारे हाथ में है। क्योंकि जब तक इस्लाम है, जब तक हिंदू काफिर हैं, इस खतरे को कम ही किया जा सकता है, उसका समूल नाश संभव नहीं है।

BIMSTEC में भाग लेने बैंकॉक पहुँचे PM मोदी: रामायण का मंचन देख हुए गदगद, थाईलैंड ने रामकथा के सम्मान में जारी किया स्पेशल स्टाम्प

देश में वक्फ संशोधन बिल को लेकर राज्यसभा में चर्चा जारी है। इस बीच गुरुवार (3 अप्रैल) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी BIMSTEC की बैठक में भाग लेने के लिए दो दिवासीय थाईलैंड की यात्रा पर राजधानी बैकॉक पहुँचे। वहाँ भारतीय समुदाय ने प्रधानमंत्री मोदी का भव्य स्वागत किया। पीएम मोदी ने वहाँ थाई रामायण ‘रामाकियेन’ का प्रदर्शन देखा। इस दौरान वे बेहद प्रसन्न नजर आए।

पीएम मोदी ने कहा, “ऐसा सांस्कृतिक जुड़ाव किसी और से नहीं मिलता। थाई रामायण रामकियेन का एक आकर्षक प्रदर्शन देखा। यह वास्तव में बेहद समृद्ध अनुभव था, जिसने भारत और थाईलैंड की साझा सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों को खूबसूरती से प्रदर्शित किया।” पीएम मोदी ने कहा कि रामायण एशिया के इतने सारे हिस्सों में दिलों और परंपराओं को जोड़ने का काम करता है।

कार्यक्रम के दौरान थाईलैंड के छात्रों के एक समूह ने भरतनाट्यम और थाईलैंड के प्रसिद्ध नृत्य ‘खोन’ को मिलाकर रामकियेन का प्रदर्शन किया। इस दौरान थाईलैंड ने रामायण पर एक विशेष स्टाम्प जारी किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने थाईलैंड की प्रधानमंत्री पैतोंगतार्न शिनावात्रा के साथ वार्ता की। इसके साथ ही उन्होंने वहाँ के अन्य नेताओं से भी चर्चा की।

प्रधानमंत्री मोदी के थाईलैंड के ऐतिहासिक ‘वात फो मंदिर’ भी जाने की उम्मीद है। यह देश के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। यह बौद्ध मंदिर बैंकॉक में स्थित है। इसमें भगवान बुद्ध की लेटी हुई मुद्रा में विशाल प्रतिमा है। इस विश्व प्रसिद्ध मंदिर में भगवान बुद्ध की 1,000 से अधिक प्रतिमाएँ हैं। इसके अलावा, यहाँ 90 से अधिक स्तूप भी हैं।

छठे बिम्सटेक सम्मेलन में भाग लेने आए पीएम मोदी का थाईलैंड के उप-प्रधानमंत्री और परिवहन मंत्री सूर्या जुंगरुंगरेंगकिट ने हवाई अड्डे पर स्वागत किया। वहाँ से वे होटल पहुँचे। वहाँ भारतीय प्रवासियों और भारतीय समुदाय के लोगों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। पीएम मोदी को देखकर लोगों ने ‘मोदी-मोदी’, ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदेमातरम’ के नारे लगाए।

शुक्रवार (4 अप्रैल) को वे बिम्सटेक के नेताओं के साथ वार्ता करेंगे। BIMSTEC (Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation) देशों में थाईलैंड, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार और भूटान के नेता शिरकत करेंगे। उन्होंने बिम्सटेक नेताओं के साथ चर्चा को लेकर उत्सुकता जारी की।

बता दें कि भारत और थाईलैंड का लगभग दो हजार साल पुराना संबंध है। भारत से ही थाईलैंड में बौद्ध धर्म और वैदिक धर्म एवं रामायण पहुँचा है। थाई संस्करण में भगवान राम को ‘फ्रा राम’ कहा जाता है। सम्राट अशोक के समय बौद्ध भिक्षुओं ने थाईलैंड में भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को फैलाया था। थाईलैंड को प्राचीन भारतीय ग्रंथों में ‘स्वर्णभूमि’ (सोने की भूमि) कहा गया है।

400 एकड़ की हरियाली तबाह कर रही कॉन्ग्रेस सरकार, हाईकोर्ट ने नीलामी पर लगाई रोक: पेड़-पौधे, झीलों और घाटियों को बचाने के लिए चल रहा विरोध प्रदर्शन

हैदराबाद विश्वविद्यालय (UoH) और तेलंगाना सरकार के बीच कांचा गाचीबोवली में 400 एकड़ जमीन को लेकर विवाद बढ़ गया है। यहाँ राज्य सरकार द्वारा जंगलों के पेड़ काटवाए और चट्टानों को हटावाए जा रहे हैं। इस पर तेलंगाना हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है। वहीं, विश्वविद्यालय के छात्रों ने राज्य सरकार के इस निर्णय के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।

दरअसल, तेलंगाना की कॉन्ग्रेस सरकार ने यहाँ आईटी पार्क के विकास के लिए 400 एकड़ जमीन की नीलामी करने का फैसला किया है। यहाँ पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक रूप से स्थित विशाल भूखंडों की माँग बढ़ गई है। यहाँ कई कंपनियों ने अपने मुख्यालय स्थापित कर लिए हैं। हालाँकि, तेलंगाना सरकार और हैदराबाद यूनिवर्सिटी के बीच का ये मामला अब हाईकोर्ट पहुँच गया है।

मंगलवार (01 अप्रैल 2025) को छात्रों ने तेलंगाना इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर कॉर्पोरेशन (TIIC) को ज़मीन सौंपने के खिलाफ जनहित याचिका (PIL) दायर की। बुधवार को HC में सुनवाई के दौरान अगले आदेश तक जमीन पर किसी भी गतिविधि पर रोक लगा दी। दरअसल, 30 मार्च से ही बुलडोजर आदि लगाकर वहाँ जमीनों की सफाई की जा रही थी।

उधर, इसके विरोध में 1 अप्रैल 2025 को हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्रों ने भारी पुलिस बंदोबस्त के बीच दो जगहों पर जमकर विरोध प्रदर्शन किया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के 500 छात्रों ने विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर धरना दिया, जबकि अन्य 150 छात्र प्रशासनिक भवन के सामने विरोध कर रहे थे। उन्होंने विश्वविद्यालय की भूमि पर अतिक्रमण रोकने की माँग की।

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि सरकार ज़मीन साफ करने में लग गई है। बुलडोजर और भारी मशीनरी से पेड़ों को काटा जा रहा है। यह क्षेत्र इकॉलॉजिक रूप से महत्व रखता है और इसे बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए। उधर, सरकार का कहना है कि यह वनभूमि नहीं है। इसे साल 2003 में निजी स्पोर्ट्स मैनेजमेंट कंपनी को ट्रांसफर किया गया था।

बावजूद इसके, प्रशासन ने भूमि समतलीकरण के लिए काम शुरु कर दिया है। इस बीच प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प भी हुई। पुलिस ने दो छात्र समेत 53 लोगों को हिरासत में लिया। पुलिस पर बल प्रयोग और छात्रों से बदतमीजी करने का आरोप है। वहीं, लाठीचार्ज करने के आरोपों को पुलिस ने मानने से इनकार किया।

ABVP के पीएचडी छात्र निशांत रेड्डी ने प्रशासन की चुप्पी पर नाराजगी जताते हुए कहा, “पिछले तीन दिनों से विश्वविद्यालय प्रशासन ने कोई जवाब नहीं दिया है। हम छात्र इस जमीन के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि असली हितधारक चुप हैं।” छात्रों ने सुरक्षा बढ़ाने पर भी असंतोष जताया, क्योंकि बिना आईडी कार्ड के परिसर में प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया है।

गाचीबोवली पुलिस ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और भारतीय जनता युवा मोर्चा के कुछ सदस्यों को भी गिरफ्तार किया है। विश्वविद्यालय छात्र संघ ने 2 अप्रैल से अनिश्चितकालीन विरोध और कक्षाओं के बहिष्कार की घोषणा की। उन्होंने प्रशासन पर राज्य सरकार को विश्वविद्यालय की जमीन सौंपने का आरोप लगाया और इस मामले में लिखित गारंटी की माँग की।

जमीन विवाद का राजनीतिक मोड़

  • जमीनी विवाद ने अब राजनीतिक मोड़ ले लिया है। विपक्षी दल तेलंगाना सरकार पर पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील आईटी हब का निर्णय रद्द करने के लिए दबाव बना रहे हैं। भारत राष्ट्र समिति (BRS) ने विवाद पर चुटकी लेते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस की ‘मोहब्बत की दुकान’ अब हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी तक पहुँच गई है।

BRS का कहना है कि राहुल गाँधी को उनकी पार्टी के उद्देश्यों के खिलाफ काम करना भारी पड़ गया है। BRS ने आंदोलनकारी छात्रों और पत्रकारों की गिरफ्तारी की भी आलोचना की। BRS के कार्यकारी अध्यक्ष केटी रामाराव ने कहा कि यह ‘नासमझी’ भरा कदम है, क्योंकि यह हैदराबाद को शुद्ध वायु से वंचित करेगा।

वहीं, विधानसभा में भाजपा विधायक दल के नेता अल्लेती महेश्वर रेड्डी की अध्यक्षता में पार्टी विधायकों का एक प्रतिनिधिमंडल घटनास्थल पर जाने वाला था। उन्होंने पूछा कि राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार कांचा गाचीबोवली में सैकड़ों बुलडोजर और मशीनों से पेड़ों को हटाकर 400 एकड़ जमीन पर कब्ज़ा करने की कोशिश क्यों कर रही है। विधायक के आवास के पास कई पुलिस अधिकारी तैनात किए गए।

महेश्वर रेड्डी का कहना है कि पुलिस ने उन्हें घर से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी। ना ही पुलिस ने बताया कि उन्हें क्यों रोका जा रहा है। रेड्डी ने आरोप लगाया कि पुलिस ने भाजपा के बाकी नेताओं और विधायकों को भी उनके घरों से बाहर निकलने से रोक दिया। BJP नेता पायल शंकर को 1 अप्रैल को आंदोलन में भाग लेने के लिए हैदराबाद विश्वविद्यालय जाते समय हिरासत में लिया गया था।

प्रदेश के BJP प्रवक्ता एनवी सुभाष ने सवाल किया, “सरकार कब से रियल एस्टेट डीलर बन गई है।” उन्होंने पुलिस की प्रतिक्रिया को लोकतांत्रिक अधिकारों पर अस्वीकार्य हमला बताया और विरोध प्रदर्शनों का समर्थन किया। उन्होंने बताया कि उस समय तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के नेता रहे वर्तमान सीएम ए. रेवंत रेड्डी ने 2007-08 में सवाल उठाया था।

उन्होंने कहा कि रेवंत रेड्डी ने TRS नेता रहते हुए कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा दिल्ली में एक डेवलपर को जमीन सौंपने के इसी तरह के कदम का विरोध किया था। उन्होंने पूछा, “अब क्या बदल गया है? क्या मुख्यमंत्री सिर्फ़ खाली खजाने को भरने, गाँधी परिवार को खुश करने और उनके मुफ़्त उपहारों के एजेंडे को निधि देने के लिए अपने पिछले रुख को छोड़ रहे हैं।”

कई साल पुराना है विवाद

हैदराबाद यूनिवर्सिटी और सराकार के बीच ये विवाद सालों पुराना है। रिपोर्ट के अनुसार, विश्वविद्यालय ने दावा किया है कि 1975 में उसे 2324 एकड़ ज़मीन आवंटित की गई थी। इनमें से 400 एकड़ का यह भूभाग भी शामिल है। साल 2022 में तेलंगाना हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि यूनिवर्सिटी के पास इस भूमि के हस्तांतरण के कोई अधिकारिक दस्तावेज नहीं है।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे सरकार की भूमि माना। हालाँकि, पर्यावरणविदों का कहना है कि यह क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर है। यहाँ 455 से अधिक प्रजातियों की वनस्पति और जीव मौजूद हैं। एनजीओ वटा फाउंडेशन ने ज़मीन को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने और ‘डीम्ड फोरेस्ट’ का दर्जा देने की माँग की।

नेहरू ने थोपा वक्फ बोर्ड, कॉन्ग्रेसी सरकारों ने पाला-पोसा: जानिए कैसे स्वतंत्र भारत में ‘मजहबी जमींदार’ बन गया देश के लिए नासूर

वक्फ संशोधन कानून को लेकर देश में चर्चा जारी है। मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा मस्जिदों संचालन के लिए दिए गए दो गाँवों से शुरू हुआ भारत में वक्फ संपत्ति का रिवाज आज 9.4 लाख एकड़ तक पहुँच गया है। आज भारत में वक्फ के पास 8.7 लाख से ज्यादा संपत्तियाँ हैं। दुनिया के किसी भी देश, यहाँ तक कि मुस्लिमों मुल्कों में भी वक्फ के पास इतनी संपत्तियाँ नहीं हैं।

भारत में वक्फ की औपचारिक शुरुआत का श्रेय इस्लामी आक्रांता मोहम्मद गोरी को दिया जाता है। गोरी अफगानिस्तान के घोर प्रांत से आया एक तुर्की शासक था, जिसने 12वीं सदी के अंत में भारत पर कई हमले किए। 1175 में उसने मुल्तान के इस्माइली शासक को हराया था। गोरी ने सन 1185 में मुल्तान की जामा मस्जिद के लिए दो गाँव दान में दिए। इन गाँवों का मैनेजमेंट शेख-अल-इस्लाम को सौंपा गया।

मुगल काल में भी मस्जिद-मकबरों-दरगाहों को इस्लामी शासक बड़ी-बड़ी संपत्तियाँ देते रहे। अंग्रेज जब आए तो उन्होंने इस पर नियंत्रण करने की कोशिश की, लेकिन मुस्लिमों के विरोध के बाद उन्होंने इसे कानूनी रूप से दे दिया। इस कानून का ड्राफ्ट पाकिस्तान के जन्मदाता मोहम्मद अली जिन्ना ने तैयार किया था। भारत जब आजाद हुआ तो भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेेहरू ने इसे जारी रखा।

मुस्लिम तुष्टिकरण हवा देते हुए पहली सन 1954 में देश के पंडित नेहरू ने वक्फ एक्ट बनाया। इससे वक्फ बोर्ड नाम की एक संस्था बनी। इस कानून के तहत कॉन्ग्रेस की सरकार ने बँटवारे के बाद भारत से पाकिस्तान गए मुस्लिमों की जमीनें एवं संपत्तियाँ वक्फ बोर्डों को दे दीं। इस कानून के लागू होने के एक साल बाद यानी सन 1955 में इसमें संशोधन करके हर राज्य में वक्फ बोर्ड बनाए जाने की बात कही गई।

इसका परिणाम ये हुआ है कि आज देश के करीब 32 राज्यों में वक्फ बोर्ड हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार समेत कई राज्यों में शिया और सुन्नी मुस्लिमों के लिए अलग-अलग वक्फ बोर्ड हैं। ये बनाए तो गए थे वक्फ की संपत्तियों का रजिस्ट्रेशन, देखरेख और उनका प्रबंधन करने के लिए, लेकिन ये बोर्ड आज सरकारी जमीनों-इमारतों के साथ-साथ हिंदुओं के पूरे-के-पूरे गाँवों तक पर दावा किए जाने लगे।

सन 1964 में एक संशोधन पारित किया गया था। इसके तहत केंद्रीय वक्फ परिषद (Central Waqf Council) की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के केंद्रीकरण को बढ़ावा देना शामिल था। यह भारत सरकार का एक वैधानिक निकाय है। यह केन्द्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन आता है। इसका काम केंद्र सरकार को सलाह देना है।

दरअसल, CWC का उद्देश्य वक्फ संबंधित मामलों में केंद्र सरकार को सलाह देने का काम था। यह सलाह वक्फ संपत्तियों के रख-रखाव से संबंधित होता था। CWV का अध्यक्ष केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री होता है। सन 1984 में वक्फ प्रशासन के पुनर्गठन के लिए वक्फ जाँच समिति गठित की गई। उसकी रिपोर्ट का मुस्लिमों ने भारी विरोध किया। इसके बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

शाहबानो और मंडल-कमंडल के बीच बाबरी ढाँचा गिरने के बाद तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने मुस्लिम तुष्टिकरण की नई परिभाषा लिखी। प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव की सरकार ने दो बड़े विवादित कानून बनाए। इनमें से एक पूजा स्थल अधिनियम और दूसरा वक्फ बोर्ड 1995 शामिल है। वक्फ बोर्ड 1995 में तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने वक्फ बोर्ड को बेहद ताकतवर बना दिया।

इस एक्ट की धारा 3(R) में कहा गया कि अगर किसी संपत्ति को मुस्लिम कानून के मुताबिक पवित्र, मजहबी या परोपकारी मान लिया जाए तो वह वक्फ की संपत्ति हो जाएगी। इसमें ये कहा गया है कि यदि वक्फ बोर्ड को लगता है कि कोई भी जमीन किसी मुस्लिम की है तो वह उसे वक्फ संपत्ति घोषित कर सकता है। इसके लिए वक्फ बोर्ड को कोई कागजात पेश करने की जरूरत नहीं होगी।

उस जमीन पर जिस व्यक्ति को आपत्ति होगी, उसे कागजात दिखाकर साबित करना होगा कि यह उसकी संपत्ति है। इतना ही नहीं, इस अधिनियम की धारा 40 में कहा गया है कि जमीन किसकी है, यह वक्फ का सर्वेयर और वक्फ बोर्ड तय करेगा। बोर्ड का यह निर्णय ही अंतिम होगा, जब तक कि उस निर्णय पर वक्फ ट्रिब्यूनल रोक ना लगा दे या उसे बदल ना दे।

इसके अलावा, बोर्ड उस किसी भी संपत्ति की जाँच कर सकता है, जिसके वक्फ संपत्ति होने का दावा किया जाता है। इस धारा में आगे कहा गया है कि अगर वक्फ बोर्ड को विश्वास हो जाता है कि यह वक्फ की संपत्ति है तो उसे वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत करने का आदेश दे सकता है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि वक्फ कानून की धारा 40 को ‘काला कानून’ बताया है।

बात यहीं रूक जाती तो समझ में आता। कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन-2 (UPA-2) के शासनकाल में वक्फ अधिनियम को और मजबूत किया गया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने साल 2013 में वक्फ कानून में संशोधन करके वक्फ बोर्डों को असीमित अधिकार दे दिए गए। इस संशोधन के जरिए वक्फ बोर्ड को स्वायत्ता दे दी गई।

इस संशोधन के जरिए इससे जुड़े विवाद में कलेक्टर को भी हस्तक्षेप करने से रोक दिया गया। इस कानून में कहा गया कि अगर वक्फ बोर्ड किसी व्यक्ति संपत्ति को वक्फ संपत्ति बता देता है तो उसके खिलाफ वह कोर्ट नहीं जा सकता। उसे वक्फ बोर्ड से ही गुहार लगाना होगा। अगर बोर्ड बात नहीं मानता है तो वह वक्फ ट्रिब्यूनल जा सकता है।

हालाँकि, कानून में यह भी प्रावधान कर दिया गया है कि विवादित मामले में वक्फ ट्रिब्यूनल का फैसला ही अंतिम अंतिम होगा। इस फैसले को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती, यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट में भी नहीं। इस तरह न्याय पाने के सारे दरवाजे को इस कानून के माध्यम से यूपीए सरकार ने हमेशा के लिए बंद कर दिया है।

अगर वर्तमान में हम वक्फ बोर्ड की संरचना की बात करें तो इसमें एक सर्वे कमिश्नर होता है। यह सर्वे कमिश्नर संपत्तियों का लेखा-जोखा रखता है। इसके अलावा, बोर्ड में मुस्लिम विधायक, मुस्लिम सांसद, मुस्लिम IAS अधिकारी, मुस्लिम टाउन प्लानर, मुस्लिम अधिवक्ता और मुस्लिम बुद्धिजीवी जैसे लोग शामिल होते हैं।

वक्फ ट्रिब्यूनल में प्रशासनिक अधिकारी होते हैं। ट्रिब्यूनल में कौन शामिल होगा, इसका फैसला संबंधित राज्य की सरकार करती है। मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति और वोटबैंक की राजनीति के कारण राज्य सरकारें आमतौर पर वक्त बोर्ड और ट्रिब्यूनल में मुस्लिमों को ही शामिल करती हैं, ताकि वो खुद को मुस्लिम हितैषी दिखा सके।

14 साल बाद RBI को मिली महिला डिप्टी गवर्नर, IMF से लेकर वर्ल्ड बैंक तक का अनुभव लेकर आई हैं पूनम गुप्ता: देश-विदेश की यूनिवर्सिटीज में रहीं प्रोफेसर

केंद्र सरकार ने बुधवार (2 अप्रैल, 2025) को तीन वर्षों के लिए पूनम गुप्ता को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का डिप्टी-गवर्नर बनाया है। पूनम वर्तमान में ‘नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च’ (NCAER) में इकोनॉमिक पॉलिसी थिंक टैंक की महानिदेशक हैं। इससे पहले जनवरी 2020 से 2025 तक माइकल देबव्रत पात्रा रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर थे।

पूनम की नियुक्ति 7 से 9 अप्रैल के बीच प्रस्तावित RBI की मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी की बैठक से केवल एक हफ्ते पहले ही हुई है। 1935 से अब तक, डिप्टी-गवर्नर के 65 वर्षों के कार्यकाल में सिर्फ चार महिलाएँ ही इस पद पर पहुँच पाईं हैं। RBI को जून 2003 में KJ उदेशी के रूप में पहली महिला डिप्टी-गवर्नर मिली थीं। उनके बाद श्यामला गोपीनाथ सितंबर 2004 में और उषा थोराट नवंबर 2005 में RBI की डिप्टी-गवर्नर नियुक्त होने वाली महिलाएँ थीं। 2010 तक उषा थोराट इस पद पर रहीं। अब 14 वर्षों बाद चौथी महिला डिप्टी-गवर्नर के रूप में पूनम गुप्ता का चयन हुआ है।

वर्ल्ड बैंक और IMF में काम कर चुकी हैं RBI की नई डिप्टी गवर्नर

डिप्टी-गवर्नर के साथ-साथ पूनम प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की भी सदस्य हैं और 16वें वित्त आयोग की एडवाइजरी काउंसिल की संयोजक हैं। इसके अलावा पूनम गुप्ता नीति आयोग की विकास सलाहकार समिति का महत्वपूर्ण अंग भी हैं। इससे पहले उन्होंने भारत की जी-20 अध्यक्षता के दौरान मैक्रोइकोनॉमिक्स और व्यापार पर टास्क फोर्स की अध्यक्षता की थी।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और वॉशिंगटन डीसी स्थित विश्व बैंक में दो दशकों तक वरिष्ठ पदों पर काम करने के बाद 2021 में वह NCAER में आईं। यहाँ पूनम को इकोनॉमिक ग्रोथ, इंटरनेशनल फाइनेंशियल आर्किटेक्चर, सेंट्रल बैंकिंग, मैक्रोइकोलॉमिक्स स्टेबिलिटी, पब्लिक डेब्ट और स्टेट फाइनेंस के मसलों पर काम करने का अनुभव है।

कई विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर रहीं पूनम गुप्ता

अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाया है। उन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और अमेरिका स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड में भी पढ़ाया। इसके साथ ही वह इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टिट्यूट, दिल्ली की विजिटिंग फैकल्टी भी रहीं। पूनम नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी (NIPFP) की आरबीआई चेयर प्रोफेसर और ‘इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशन्स रिसर्च’ (ICRIER) की प्रोफेसर भी रही हैं।

दिल्ली यूनिवर्सिटी के दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से अर्थशास्त्र में मास्टर्स की डिग्री लेने के साथ पूनम ने अमेरिका के मैरीलेंड यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में मास्टर्स और पीएचडी किया है। अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र में पीएचडी के लिए पूनम को 1998 में एक्जिम बैंक पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।

मुस्लिम मुल्कों सऊदी-UAE में क़ैद हैं सबसे अधिक भारतीय: जानिए कौन से हैं वो 12 देश जहाँ भारत के 10000+ नागरिक जेल में, दी जा रही निःशुल्क सहायता

दुनिया में सबसे ज्यादा सजायाफ्ता और विचाराधीन भारतीय कैदी सऊदी अरब और UAE में हैं। इन दोनों मुस्लिम देशों में 2000 से ज्यादा भारत के लोग कैद हैं। दूसरे खाड़ी देशों की बात करें तो बहरीन, कुवैत और कतर में बड़ी संख्या में भारतीय कैद हैं। इसके अलावा नेपाल में 1317, मलेशिया में 338 और चीन में 173 भारतीय अलग अलग जेलों में बंद हैं। कुल मिलाकर दुनियाभर में 10,152 भारतीय 86 देशों में कैद हैं। इनमें सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, कतर, नेपाल, चीन जैसे 12 देश अहम हैं जहाँ कुल भारतीय कैदियों में से क़रीब तीन-चौथाई कैद हैं।

2 साल में 10 कैदी आए स्वदेश

इसका खुलासा विदेश मंत्रालय ने संसद की एक समिति के सामने किया है। कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर की अगुवाई वाली संसदीय स्थाई समिति ने अपनी छठी रिपोर्ट में ये जानकारी दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, 12 देशों में से 9 देशों के साथ कैदियों के लिए प्रत्यर्पण संधि है, फिर भी पिछले 2 सालों में यानी 2023 से मार्च 2025 तक सिर्फ 10 कैदियों को ही स्वदेश लाया जा सका है। इनमें ईरान और यूके से 3-3, रूस और कंबोडिया से 2-2 कैदी शामिल हैं।

31 देशों से कैदियों के ट्रांसफर का समझौता

विदेश मंत्रालय ने समिति को बताया है कि 31 देशों के साथ भारत का कैदियों के प्रत्यर्पण को लेकर द्विपक्षीय समझौता है। इनमें सऊदी अरब, यूएई, क़तर, ईरान, इजरायल, ऑस्ट्रेलिया, बहरीन, बांग्लादेश, बोस्निया, ब्राजील, बुलगारिया, कंबोडिया, मालदीव्स, फ्रांस, दक्षिण कोरिया, सोमालिया, कज़ाकिस्तान, उज़बेकिस्तान, एजिप्ट, हॉगकॉग, यूके वियतनाम, श्रीलंका, थाईलैंड शामिल हैं। लेकिन, प्रक्रिया में वक्त लगता है क्योंकि TSP समझौते के तहत मेजबान देश और मूल देश के बीच सहमति जरूरी है।

रिपोर्ट के मुताबिक, विदेश मंत्रालय ने कहा है, “भारत ने सजायाफ्ता व्यक्तियों के स्थानांतरण पर दो बहुपक्षीय सम्मेलनों पर भी हस्ताक्षर किए हैं। इसका अर्थ है कि इंटर-अमेरिकन सम्मेलन और सजायाफ्ता व्यक्तियों के स्थानांतरण पर यूरोप परिषद सम्मेलन के आधार पर सदस्य राज्यों और अन्य देशों के सजायाफ्ता व्यक्ति अपनी सजा की शेष अवधि पूरी करने के लिए अपने मूल देशों में स्थानांतरण की माँग कर सकते हैं।”

कैदियों को दी जा रही निःशुल्क कानूनी सहायता

रिपोर्ट में कहा गया है, “भारतीय कैदियों को वापस लाने में मिल रहा ‘कम सक्सेस रेट’ के कारण हमें इन प्रयासों की समीक्षा करनी होगी।” हालाँकि, मंत्रालय ने जानकारी दी है कि कई विचाराधीन कैदियों की मदद भारतीय काउंसलर कर रहे हैं। कैदियों को जरूरत पड़ने पर कानूनी सहायता भी उपलब्ध कराई जाती है। इसके लिए कैदियों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता।

विदेशी जेलों में बंद कैदियों की बड़ी संख्या को ध्यान में रखते हुए, समिति ने कहा कि वह चाहती है कि सरकार समझौतों और सम्मेलनों को लागू करने में आ रहीं बाधाओं का अध्ययन करे और यदि जरूरी हो, तो कैदियों के सुगम प्रत्यर्पण की सुविधा के लिए मौजूदा समझौतों में संशोधन करे या नए समझौते बनाए। पैनल ने कैदियों को स्थानांतरित करने की प्रक्रिया को आसान बनाने और विदेशी जेलों में भारतीय नागरिकों के साथ अच्छा व्यवहार हो इसके लिए उन देशों के साथ ‘कूटनीतिक प्रयास’ करने पर जोर दिया।

रिपोर्ट में अवैध तरीके से रह रहे भारतीय नागरिकों को अमेरिका द्वारा निकाले जाने का भी उल्लेख किया गया है। समिति का कहना है कि अमेरिका से लौटे इन भारतीयों को फिर से बसाने की जिम्मेदारी उन राज्य सरकारों की है जहाँ से ये लोग आते हैं।

डोनाल्ड ट्रम्प ने किया टैरिफ का ऐलान, भारत के सामानों पर लगेगा 26%: जानिए क्या होगा निर्यात पर असर, क्यों भारत को मिला ‘डिस्काउंट’

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दुनिया के कई देशों पर आयात शुल्क (टैरिफ) की घोषणा कर दी है। इस दायरे में यूरोप, अमेरिका के पड़ोसी देश और चीन समेत तमाम एशियाई राष्ट्र भी आए हैं। भारतीय सामानों पर अमेरिका ने 26% का टैरिफ लगाया है। यह एशियाई देशों पर लगाए गए टैरिफ में सबसे कम में से एक है। ट्रम्प ने टैरिफ लगाते समय पीएम मोदी का भी जिक्र किया है। भारत पिछले कुछ समय से अमेरिका के साथ इन टैरिफ को लेकर बातचीत कर रहा था। उसने इनसे होने वाले नुकसान को कम करने के लिए तैयारी भी कर ली थी।

क्या हैं ट्रम्प के टैरिफ, इसका क्या मतलब?

बुधवार (2 अप्रैल, 2025) की रात को ‘मेक अमेरिका वेल्थी अगेन’ नाम के एक अभियान के तहत दुनिया के अलग-अलग देशों पर नए टैरिफ का ऐलान किया। ट्रम्प ने विश्व के लगभग 100 देशों के विरुद्ध यह टैरिफ लगाए हैं। ‘टैरिफ’ शब्द का मतलब किसी सामान पर लगने वाले आयात शुल्क से है।

भारत में इसे आमतौर पर कस्टम ड्यूटी के नाम से जाना जाता है। इसका मतलब है कि अमेरिका में किसी सामान के पहुँचने के बाद ग्राहक के पास उसके जाने तक कितना टैक्स लगाया जाएगा। सभी देश अपनी नीतियों के हिसाब से यह टैरिफ लगाते हैं।

ट्रम्प की इस बार की टैरिफ नीति का आधार कुछ दूसरा है। ट्रम्प का कहना है कि दुनिया के बाकी देशों ने अमेरिका की खुली अर्थव्यवस्था का गलत फायदा उठाया है। उनका कहना है कि अमेरिकी सामान को बाकी देश ऊँचे आयात शुल्क लगाकर आने बाजार में नहीं घुसने देते, जबकि वह देश अपना सामान अमेरिका में धड़ल्ले से बेचते हैं।

इसीलिए ट्रम्प ने सत्ता में आने से पहले ही ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ का ऐलान कर दिया था। ट्रम्प ने कहा था कि जो देश अमेरिकी सामान पर जितना टैरिफ लगाएगा, वापस उतना ही टैरिफ अमेरिका में उस देश के सामान पर लगा दिया जाएगा। ट्रम्प की इन शिकायतों के दायरे में सबसे बड़ा नाम चीन रहा है।

भारत भी ट्रम्प के निशाने पर था। इसी कड़ी में अब ट्रम्प ने नए टैरिफ का ऐलान कर दिया है। इनका सबसे बड़ा नुकसान उन देशों को होगा, जो अमेरिका में सामान निर्यात करते हैं। इसमें भारत भी शामिल है। हालाँकि, अपनी इस कवायद में ट्रम्प ने किसी भी देश को नहीं बख्शा है।

भारत पर कितना लगा?

राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने ऐलान में बताया है कि अमेरिका भारतीय सामान पर 26% का टैरिफ लगाएगा। राष्ट्रपति ट्रम्प ने इन टैरिफ का ऐलान करते हुए कहा, “प्रधानमंत्री मोदी वापस गए हैं। वे मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं, लेकिन मैंने कहा कि आप मेरे मित्र हैं, लेकिन आप हमारे साथ ठीक बर्ताव नहीं कर रहे हैं।”

राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा कि भारत उनके सामानों पर 52% टैरिफ लगाता है लेकिन अमेरिका भारतीय सामान पर लगभग ना के बराबर ही टैरिफ लगाता है। इससे पहले भी राष्ट्रपति ट्रम्प आरोप लगा चुके हैं कि भारत अपना बाजार अमेरिकी सामानों के लिए मुश्किल बनाता है जबकि अमेरिका के भीतर बड़ा व्यापार करता है।

इसका भारत पर क्या असर?

इन टैरिफ का सीधा असर भारत के अमेरिका को होने वाले निर्यात पर पड़ेगा। अब अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान 26% महँगे दामों पर बिकेंगे। इससे उनकी अमेरिकी स्थानीय उत्पादों या फिर दूसरे देश से आए उत्पादों के मुकाबले किफायत कम हो जाएगी। भारतीय सामानों पर अभी तक अमेरिका में औसतन 3% का टैरिफ लगता आया है।

अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात सहयोगी है। रिपोर्ट बताती हैं कि भारत ने 2024 में अमेरिका को 87 बिलियन डॉलर (लगभग ₹7.5 लाख करोड़) का निर्यात किया। भारत के कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी 18% है। अमेरिका के साथ भारत व्यापार अधिशेष में रहता है। यानी अमेरिका को भारत जितना निर्यात करता है, उससे कम अमेरिकी सामान का आयात करता है।

भारत अमेरिका टैरिफ ट्रम्प

विदेशों के साथ व्यापार का लेखाजोखा रखने वाले वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2024-25 की तीन तिमाहियों (अप्रैल-जून) में ही भारत की तरफ व्यापार का पलड़ा लगभग 30 बिलियन डॉलर (लगभग ₹2.5 लाख करोड़) से अधिक झुका है।

अब यह स्थिति कुछ बदल सकती है। राष्ट्रपति ट्रम्प के इस कदम का नुकसान भारतीय फार्मा कम्पनियों और टेलीकॉम क्षेत्र को होगा। वाणिज्य मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, 2024-25 के अप्रैल से जून के बीच भारत ने अमेरिका को ₹63 हजार करोड़ से ज्यादा की दवाइयाँ बेचीं हैं।

भारत अमेरिका टैरिफ ट्रम्प

वहीं भारत ने इसी दौरान ₹55 हजार करोड़ से अधिक के टेलीकॉम उत्पाद भी अमेरिका को बेचे हैं। इसके बाद रत्न और हीरे भी भारत का बड़ा निर्यात हैं। अब इन सब पर असर पड़ेगा। संभव है कि उनके निर्यात में कुछ कमी देखने को मिले। हालाँकि, भारत पहले ही इन टैरिफ की तैयारी कर चुका है।

फरवरी, 2025 में आई सिटीबैंक की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत को अमेरिका के टैरिफ से लगभग ₹50 हजार करोड़ का नुकसान सालाना हो सकता है। रिपोर्ट बताती है कि सबसे अधिक नुकसान स्टील और एल्युमीनियम जैसे सेक्टर उठाएँगे। दवाइयों को लेकर थोड़ा असर जरूर पड़ेगा लेकिन इससे कोई ख़ास अंतर नहीं आने वाला।

सिटीबैंक की रिपोर्ट के इतर, हाल ही में आई भारतीय स्टेट बैंक की एक रिपोर्ट ने कहा है कि भारत को चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। स्टेट बैंक की रिपोर्ट कहती है कि अमेरिका के इस कदम के बाद भारत के अमेरिका को निर्यातों में लगभग 3%-3.5% की कमी आ सकती है। भारत इसे आसानी से झेल सकता है।

जल्द ही बन सकती है भारत-अमेरिका में बात

अमेरिका के भारत पर लगाए गए टैरिफ का प्रभाव जल्द खत्म भी हो सकता है। भारत और अमेरिका के बीच वर्तमान में मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर बातचीत चल रही है। भारत ने यह टैरिफ आने से एक दिन पहले ही FTA के लिए बातचीत की शर्तों को मंजूरी दी थी।

1 अप्रैल को ही FTA के लिए बात करने आए अमेरिकी अधिकारी वापस गए थे। भारतीय और अमेरिकी अधिकारियों के बीच यह बातचीत 4 दिनों तक चली है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह समझौता इस वर्ष की गर्मियों तक अंतिम रूप ले सकता है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि इसके लिए प्रधानमंत्री कार्यालय तक जोर लगा रहा है और इसे जल्द ही पूरा करना चाहता है।

भारत ने यह टैरिफ के ऐलान से कुछ समय पहले ही अमेरिकी सामानों पर कई तरह के टैक्स हटा लिए थे। इससे अमेरिकी प्रशासन में सकारात्मक सन्देश गया है। भारत पर लगाए गए 26% टैरिफ को इसीलिए ‘छूट वाली दरें’ कहा जा रहा है।

दुनिया के लिए चिंता का सबब

भारत पर एशिया के भीतर जापान और कोरिया के बाद सबसे कम टैरिफ ट्रम्प प्रशासन ने लगाए हैं। हालाँकि, सबसे तगड़ा झटका चीन, बांग्लादेश और विएतनाम जैसे देशों को लगा है। चीन पर सर्वाधिक 54% टैरिफ थोपे गए हैं। इसमें से 34% टैरिफ जबकि 20% लेवी टैक्स है।

अब चीन का अमेरिका में निर्यात और भी महँगा हो जाएगा। अमेरिका, चीन का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी है। वह इस जवाब में अमेरिका पर भी टैरिफ लगा सकता है। ट्रम्प के पहले कायर्काल में भी ऐसी ही जंग हुई थी। वहीं बांग्लादेश और विएतनाम बहुत बड़े पैमाने पर इसके भुक्तभोगी बनेंगे।

बांग्लादेश के कपड़ों पर अब अमेरिका के भीतर 37% का टैरिफ लगेगा। बाकी सामान पर यही दर लागू होगी। बांग्लादेश के कुल निर्यात में अमेरिका का हिस्सा लगभग 20% है। अब अमेरिकी बाजार बांग्लादेश के लिए और भी मुश्किल हो जाएगा।

इसके अलावा पहले ही मंदी की मार झेल रहा यूरोपियन यूनियन भी इस टैरिफ के दंश से नहीं बचा है। उस पर 20% का टैरिफ लगाया गया है। इसका असर भी आगे आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा। ट्रम्प के इस ऐलान के बाद वैश्विक व्यापार में कमी आ सकती है।

इसके अलावा सभी देश अब अपने घरेलू बाजार की तरफ ध्यान देने को भी मजबूर होंगे। विश्व भर में मैन्युफैक्चरिंग पर भी असर पड़ने वाला है। पहले पश्चिमी देशों और अमेरिका से चीन या दक्षिणपूर्वी एशिया की तरफ भागने वाली कम्पनियाँ वापस अमेरिका में उत्पादन चालू करने का सोच सकती हैं।

तेलंगाना में कॉन्ग्रेस सरकार के ‘नंगा नाच’ पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, कहा- हम शक्तिहीन नहीं: जानिए क्या है विधायकों की अयोग्यता याचिका से जुड़ा मामला

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (2 अप्रैल 2025) को BRS (भारत राष्ट्र समिति) के विधायकों की अयोग्यता की याचिकाओं पर नोटिस जारी करने में लगभग 10 महीने लगाने पर तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष से सवाल पूछा है। ये विधायक BRS छोड़कर कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए थे। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के बयान की आलोचना की और उसे 10वीं अनुसूची का मजाक बताया।

कॉन्ग्रेस नेता एवं तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने विधानसभा में कहा था कि विधायकों के पाला बदलने पर भी उपचुनाव नहीं होंगे। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने सीएम के बयान पर आपत्ति जताई। दरअसल, संविधान की 10वीं अनुसूची दल बदलने से संबंधित अयोग्यता के प्रावधानों से संबंधित है।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष द्वारा अयोग्यता से संबंधित आवेदिन पर निर्णय लेने में देरी से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। एक याचिका में तीन विधायकों की अयोग्यता से संबंधित तेलंगाना हाई कोर्ट के नवंबर 2024 के आदेश को चुनौती दी गई थी। वहीं, दूसरी याचिका में दल बदलने वाले सात अन्य विधायकों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की गई थी।

दल बदलने वाले विधायकों को लेकर BRS ने हाई कोर्ट में याचिका दी थी। इस याचिका पर सुनवाई करने के बाद तेलंगाना हाई कोर्ट की एकल पीठ ने 9 सितंबर 2024 को विधानसभा सचिव को निर्देश किया था। इस निर्देश में कहा गया था कि वे विधायकों की अयोग्यता याचिकाओं को विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष रखें तथा चार सप्ताह के भीतर सुनवाई निर्धारित करें।

इसको लेकर कॉन्ग्रेस ने अपील की। इसके बाद पिछले साल नवंबर में हाई कोर्ट की दो जजों की पीठ ने सुनवाई की। इस सुनवाई में दो जजों की खंडपीठ ने कहा था कि विधानसभा अध्यक्ष को तीनों विधायकों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाओं पर ‘उचित समय’ के भीतर फैसला करना चाहिए। उचित समय को लेकर स्पष्ट नहीं था। इसको लेकर BRS ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

विधानसभा अध्यक्ष के कार्यालय की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि पहली अयोग्यता याचिका 18 मार्च 2024 को दायर की गई थी। उसके बाद 2 अप्रैल और 8 अप्रैल को दो और याचिकाएँ दायर की गईं। हाई कोर्ट में याचिका 10 अप्रैल 2024 को दायर की गई थी। रोहतगी ने कहा, “क्या यह उचित समय तक इंतजार करना है?”

अयोग्यता याचिकाओं पर नोटिस देने में इतना समय लगने के सवाल पर मुकुल रोहतगी ने कहा कि यह मामला हाई कोर्ट में लंबित था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने विधानसभा अध्यक्ष की ओर से पेश मुकुल रोहतगी से पूछा, “तो फिर जब मामला हमारे संज्ञान में था, तब आपने नोटिस क्यों जारी किया? क्या हमें अब अवमानना ​​का नोटिस जारी करना चाहिए?”

इस पर रोहतगी ने कहा कि हाई कोर्ट की खंडपीठ के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका 15 जनवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी और स्पीकर ने अगले दिन नोटिस जारी किया था। पीठ ने इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि जब मामला हाई कोर्ट में था तो स्पीकर ने कार्रवाई करने से परहेज किया, लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा तो उन्होंने कार्रवाई की।

जस्टिस गवई ने कहा कि हाई कोर्ट की एकल पीठ ने सिर्फ 4 सप्ताह के भीतर शेड्यूल तय करने का निर्देश दिया था, ना कि उस समय सीमा में पूरे मामले का निपटारा करने के लिए कहा था। सर्वोच्च अदालत ने पूछा, “यदि अध्यक्ष कोई कार्रवाई नहीं करते हैं तो इस देश की अदालतें, जिनके पास न केवल शक्ति है, बल्कि संविधान के संरक्षक के रूप में उनका कर्तव्य भी है, शक्तिहीन हो जाएँगी?”

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि न्यायिक समीक्षा केवल निर्णय की सत्यता की जाँच करने के लिए लागू होती है। उन्होंने कहा, “चूँकि इस मामले में कोई निर्णय नहीं हुआ है तो क्या न्यायालय को सिर्फ खड़े होकर लोकतंत्र के नंगा नाच को देखते रहना चाहिए?” कोर्ट ने कहा कि उसके निर्देशों की अवहेलना की जाती है तो वह शक्तिहीन है।

अदालत ने सवाल किया, “हम शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का सम्मान करते हैं, लेकिन जब कोई संवैधानिक प्रावधान किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए बनाया जाता है तो क्या अदालतों को उसे निरस्त करने की अनुमति देनी चाहिए?” सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एकल पीठ के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं था।

इससे पहले 25 मार्च को बीआरएस नेता पाडी कौशिक रेड्डी का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता सीए सुंदरम ने तर्क दिया था कि मुख्य मुद्दा यह है कि क्या संवैधानिक न्यायालय के पास संवैधानिक प्राधिकरण को अपने आदेश के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य करने का अधिकार है। उन्होंने तर्क दिया कि न्यायालयों को ऐसी शक्ति से वंचित करना ‘न्याय की पूर्ण विफलता’ होगी।

इस मामले में 4 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना सरकार और अन्य से जवाब माँगा था, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया था कि समय पर निर्णय लेना महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने ऐसी स्थिति के खिलाफ चेतावनी दी थी कि ‘ऑपरेशन सफल हो जाए, लेकिन मरीज मर जाए’ का कोई फायदा नहीं है। कोर्ट ने विधायक दानम नागेंदर, वेंकटराव तेलम और कडियम श्रीहरि से भी जवाब माँगा था।