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‘स्टैचू ऑफ यूनिटी या ताजमहल?’ – स्टैचू ऑफ लिबर्टी से भी ज्यादा पर्यटकों के आँकड़े चिढ़ा रहे ध्रुव राठी को

इस मुल्क में एक बौद्धिक जमात ऐसी है, जिसके ज्ञान का कोई अंत नहीं है। ऐसे ही एजेंडापरस्त जमात के स्थायी सदस्य का नाम है ध्रुव राठी। धर्म से लेकर राजनीति और राजनीति से लेकर तकनीक तक हर सम-सामयिक मुद्दे के स्वघोषित विशेषज्ञ हैं – ध्रुव राठी।

खुद को वैचारिक स्तर पर ‘इंटेलेक्चुअल’ सिद्ध करने की होड़ में तथ्यों और तर्कों को ‘टाटा-गुड बाय’ बोलते हुए इन्होंने ‘स्टैचू ऑफ़ यूनिटी’ पर जम कर मिथ्या प्रचार किया था। तमाम दलीलों की मदद से साबित करने का भरपूर प्रयास किया था कि ‘स्टैचू ऑफ़ यूनिटी’ कितनी असफल परियोजना है। 

अब एक रिपोर्ट सामने आई है। यह राठी के दावों को सिरे से ख़ारिज करती है। रिपोर्ट का शीर्षक ही यही है कि ‘स्टैचू ऑफ़ लिबर्टी’ की तुलना में ‘स्टैचू ऑफ़ यूनिटी’ को देखने के लिए ज़्यादा पर्यटक आ रहे हैं।

कोरोना वायरस के पहले तक इसे देखने के लिए लगभग 13 हज़ार पर्यटक हर महीने आ रहे थे जबकि पिछले महीने स्टैचू ऑफ़ लिबर्टी को देखने के लिए 10 हज़ार पर्यटक ही आए। इतना ही नहीं, इसकी मदद से 3000 स्थानीय दलित लड़के/लड़कियों को रोज़गार मिला है और लगभग 10000 अन्य लोगों को भी रोज़गार मिला है।।         

अफ़सोस ध्रुव राठी की कपोल कल्पना सही साबित हुई भी नहीं और स्टैचू ऑफ़ यूनिटी की उपयोगिता और प्रासंगिकता दोनों सफल हुई। वामपंथी ब्रिगेड के अहम सदस्य ध्रुव राठी ने 1 नवंबर 2018 को अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो साझा किया था।

वीडियो की शुरुआत में इस स्टैचू पर तंज कसने का सतही प्रयास करते हुए उसने कहा, “दुनिया का सबसे लंबा स्टैचू हमारे देश में होगा। हमारे लिए कितने गर्व की बात होगी, दुनिया हमें सम्मान की निगाह से देखेगी।” इसके बाद कई पहलुओं का उल्लेख करते हुए कहा कि आइए देखते हैं स्टैचू ऑफ़ यूनिटी की सच्चाई क्या होगी। 

ध्रुव राठी ने सबसे पहले स्टैचू ऑफ़ यूनिटी की तुलना चीन के बुद्ध स्टैचू, स्प्रिंग टेम्पल से कर दी। फिर बताया कि उसके प्रोजेक्ट में 55 मिलियन डॉलर खर्च हुए और प्रतिमा की लागत 18 मिलियन डॉलर थी, यानी यह कितनी कम कीमत में बन गया। इसके बाद ध्रुव राठी ने बताया कि सरदार पटेल की प्रतिमा पर कितने ‘ज़्यादा रुपए’ (180 मिलियन डॉलर) खर्च हुए। सबसे पहली बात, तुलना के लिए मिला क्या? चीन की प्रतिमा! और दूसरी बात, चीन स्थित बुद्ध की प्रतिमा की ऊँचाई 128 मीटर है उसकी तुलना सरदार पटेल की प्रतिमा 182 मीटर से क्यों? 

इन सबसे बड़ी बात बुद्ध स्टैचू बन कर तैयार हुआ था साल 2008 में यानी स्टैचू ऑफ़ यूनिटी से लगभग एक दशक पहले। खैर लिबरल गैंग का यही तो हुनर है, आम जनता के सामने आधे-अधूरे तथ्यों की ढपली बजाना।

इसके बाद ध्रुव राठी ने ताजमहल का उल्लेख करते हुए बताया कि ताजमहल में जितने पर्यटक आते हैं, उससे हर साल लगभग 25 करोड़ रुपए का ‘रेवेन्यू’ पैदा होता है। इसके बाद ध्रुव राठी ने कहा, “स्टैचू ऑफ़ यूनिटी कोई ताजमहल तो है नहीं, जो 1 मिलियन लोग (10 लाख) हर साल इसे देखने के लिए आएँगे।” सही बात है, इसके शुरू होने के 2 हफ्ते में 128000 लोग आए, वह ‘पर्यटक’ नहीं थे बल्कि वहाँ से गुज़र रहे थे या ताजमहल देखने निकले होंगे, रास्ता भूल कर यहाँ पहुँच गए होंगे।

ध्रुव राठी ने इसके बाद कहा कि स्टैचू ऑफ़ यूनिटी बहुत प्रसिद्ध पर्यटन स्थल नहीं बन पाएगा क्योंकि यह किसी बड़े शहर के आस-पास स्थित नहीं है। साफ़ शब्द थे, “यहाँ लोग आएँगे ही नहीं।” सही बात है, देश की सारी धरोहरें, स्मारक, प्राचीन इमारतें, स्थल, मंदिर और मस्जिद बड़े शहरों में ही स्थित है और देश का सबसे बड़ा शहर आगरा है क्योंकि वहाँ ताजमहल है (ध्रुव राठी के उपरोक्त अनुमान अनुसार)। उनकी ज्ञान गंगा यहीं पर समाप्त नहीं हुई, सस्ते इंटरनेट के माध्यम से कपोल कल्पना का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने कहा, “इसमें यूनिकनेस नहीं है” और “यह सुंदर नहीं है।” 

सुंदर नहीं है! गजब का तर्क है। फिर भी इसे 2018 से 2019 के बीच 27 लाख लोग देखने आए। इसी बात के आगे वो पूछते हैं, “अब आप ही सोचिए, लोग मुग़ल आर्किटेक्चर देखना पसंद करेंगे या स्टैचू ऑफ़ यूनिटी?”

एकदम सही बात है ध्रुव राठी, ऐसे नहीं कहोगे तो पता कैसे चलेगा कि आप ‘सेक्यूलर समाज’ से हो। खुद को ‘सूडो सेक्यूलर’ दिखाने की ज़िम्मेदारी भी तो है। ऐसे ही तो तुलना की जाती है, 500 साल पहले बनाई गई चीज़ों (दूसरी चीज़ों को तोड़-फोड़ कर) की हाल ही में बनी चीज़ के समानांतर रख कर। 

वीडियो के अंत में ध्रुव राठी ने इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की राजनीति का नमूना बता दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी लपेट लिया (पता नहीं क्यों)। क्योंकि ध्रुव राठी ‘प्रलाप’ नामक वायरस की बीमारी से ग्रसित हैं, इसलिए इन्होंने 21 नवंबर 2019 को इसी मुद्दे पर एक और वीडियो बनाया। क्योंकि पिछली वीडियो में ध्रुव राठी के अनुमान अनुसार स्टैचू ऑफ़ यूनिटी को देखने के लिए 10 लाख लोग आ जाते तो बड़ी बात होती, इस बार ज़्यादा कुछ कहने के लिए बचा ही नहीं था। एक साल में लगभग 27 लाख लोग इसे देखने आए थे, जिससे लगभग 80 करोड़ रुपए का रेवेन्यू पैदा हुआ। 

ध्रुव राठी का अनुमान गलत सिद्ध हुआ तो ऐसे में वह इन्फ्लेशन, बैंक में इतना पैसा रख देते तो कितना ब्याज मिल जाता, रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट का गणित लगाने लगे। अंत में दोबारा ताजमहल से तुलना करते हुए कहा कि इसे देखने कोई नहीं आएगा और न ही इसकी लागत वसूल हो पाएगी।

लागत वाले प्रश्न का उत्तर तो वक्त ही देगा, ध्रुव राठी जैसे मौसमी जानकार सिर्फ अनुमान लगा सकते हैं (वह भी सलीके से नहीं)। यूट्यूब की जनता को एंगेज रखना है, खुद को वामपंथी ब्रिगेड की यूथ विंग का मुखिया साबित करना है तो यह सब करना ही पड़ेगा। सरकार को गाली दिए बिना (भले उसका कोई काम अच्छा ही क्यों न हो) पता कैसे चलेगा कि ‘ब्रो’ नवागंतुक बुद्धिजीवी हैं।                                                     

सुपरस्टार रजनीकांत जनवरी 2021 में लॉन्च करेंगे अपनी पार्टी, कहा- चलें अब बदलाव करें, अभी नहीं तो कभी नहीं

सुपरस्टार रजनीकांत ने अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत को लेकर लंबे समय से जारी सस्पेंस को खत्म कर दिया है। रजनीकांत ने कहा कि वह 31 दिसंबर को अपनी बहुप्रतीक्षित राजनीतिक पार्टी की घोषणा करेंगे और वर्षों से चल रही अटकलों को समाप्त करते हुए इसे जनवरी में लॉन्च करेंगे

रजनीकांत ने यह घोषणा अपने मंच रजनी मक्कल मंद्रम के वरिष्ठ पदाधिकारियों से मुलाकात के एक दिन बात की। बाद में बुधवार को, उन्होंने कहा कि वह चुनावी राजनीति के लिए अपनी योजनाओं पर जल्द ही खुद के फैसले की सार्वजनिक घोषणा करेंगे। अपने एक ट्वीट में उन्होंने कहा, “चलें अब सब कुछ का बदलाव करें, अभी नहीं तो कभी नहीं।”

सुपरस्टार ने आगे कहा, “आगामी विधानसभा चुनावों में हमारी निश्चित रूप से जीत होगी। हम लोगों को एक पारदर्शी, भ्रष्टाचार मुक्त और बिना किसी धार्मिक-जातिगत भेदभाव वाली सरकार देंगे।” रजनीकांत बहुत पहले ही तमिलनाडु में लोगों को एक वैकल्पिक राजनीति देने का बात कई बार कह चुके हैं। अब उन्होंने इस दिशा में अपना सधा हुआ कदम बढ़ा दिया है।

गौरतलब है कि सोमवार को अपनी पार्टी के अधिकारियों से अहम बैठक के बाद उन्होंने कहा था कि बैठक में जिला सचिवों के साथ उन्होंने विचार-विमर्श किया। आगे बोलते हुए रजनीकांत ने कहा था कि पार्टी नेताओं ने उनका भरपूर साथ दिया है और कहा है कि वह कोई भी फैसला लेते हैं तो सभी पार्टी नेता उनका समर्थन करेंगे। 

ज्ञात हो कि हाल ही में गृह मंत्री अमित शाह ने तमिलनाडु का दौरा किया था। इसके बाद बहुत तेजी से वहाँ की राजनीति में चुनाव को लेकर सभी दलों में सरगर्मी बढ़ गई। ऐसे में अब सुपरस्टार रजनीकांत का पार्टी को लेकर एक बड़ा एलान इस बात की गवाही है कि वह चुनावी जंग के मैदान में उतरने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं।

बता दें कि अगले साल तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव होंगे। ऐसे में रजनीकांत की राजनीति में एंट्री को लेकर संशय अब लगभग खत्म हो गया है।

गौरतलब है कि सुपरस्टार रजनीकांत ने हाल ही में पेरियारवादियों द्वारा भगवान कार्तिकेय (मुरुगन) के रक्षा श्लोक को अपमानित करने वाले विवादास्पद वीडियो बनाने वाले लोगों पर त्वरित कार्रवाई करने के लिए तमिलनाडु सरकार की प्रशंसा की थी। मामला डीएमके-सहयोगी पेरियारवादी यूट्यूब चैनल के द्वारा भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) की एक श्लोक को बेहद घटिया विवरण के साथ पेश करने का था, जिसे लेकर लोगों में नाराजगी थी।

फ्रांस के राजदूत ने अपनी पत्नी के साथ उज्जैन में की महाकाल की पूजा, मंदिर विकास के लिए 80 करोड़ रुपए का सहयोग: रिपोर्ट

भारत की धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्वीकार्यता का दायरा काफी बड़ा है। यही कारण है कि दुनिया भर के लोग इससे जुड़ी चीज़ों में अपनी अटूट आस्था दिखाते हैं। इसी कड़ी में फ्रांस के राजदूत इमैनुएल लेनिन अपनी पत्नी के साथ उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर का दर्शन करने आए।

पिछले कुछ समय से फ्रांस डट कर कट्टरपंथी ताक़तों का सामना कर रहा है। ऐसे में फ्रांस के राजदूत का महाकाल की शरण में आना भारत के लिए राजनीतिक और धार्मिक दोनों दृष्टिकोण से सकारात्मक है। दर्शन के बाद उन्होंने ऐलान किया कि फ्रांस की सरकार ‘महाकाल मंदिर विकास योजना’ में 80 करोड़ रुपए दान करेगी। 

7 नवंबर 2020 को फ्रांस के राजदूत निजी दौरे पर मध्य प्रदेश आए थे। इंदौर में ठहरने के दौरान उन्होंने महाकाल दर्शन का निर्णय लिया था। जिसके बाद वह शनिवार को महाकाल के दर्शन के लिए निकले।

दर्शन के बाद मंदिर समिति ने इमैनुएल लेनिन और उनकी पत्नी को महाकाल के चित्र भी भेंट किए। इसके बाद लेनिन और उनकी पत्नी रामघाट गए और अंत में इंदौर रोड स्थित प्राचीन शनि मंदिर के दर्शन भी किए। इसके बाद वह इंदौर के लिए वापस निकल गए। 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ फ्रांस के राजदूत ने पूरे विधि विधान से पूजा पाठ किया। मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश बंद होने की वजह से इमैनुएल लेनिन को नंदी हॉल से ही दर्शन करना पड़ा। मंदिर के पुजारी रमण त्रिवेदी ने फ्रांस के राजदूत से पूजा पाठ संपन्न कराया।

सावधानी और सुरक्षा के दृष्टिकोण से फ्रांसीसी राजदूत के इस दौरे की जानकारी पुलिस और प्रशासन को ही थी। यात्रा के बाद राजदूत लेनिन और उनकी पत्नी ने शिप्रा नदी के तट पर पहुँच कर कुछ देर विश्राम भी किया। 

इसके बाद उज्जैन के कलेक्टर आशीष सिंह ने इस संबंध में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि मंदिर विकास योजना का दूसरा चरण बहुत जल्द शुरू होने वाला है। इस संबंध में सिंहस्थ मेला कार्यालय में अधिकारियों के साथ परियोजना की समीक्षा की गई है।

फ्रांस सरकार इस योजना में आर्थिक सहयोग के तौर पर 80 करोड़ रुपए देने जा रही है, जिसे मंदिर के विशेष निर्माण कार्य में लगाया जाएगा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इस राशि को मंदिर परिसर के 10-12 गुना अधिक विस्तृत करने में किया जाएगा, जिससे श्रद्धालुओं के आवागमन में कोई परेशानी नहीं हो।

इन विकास कार्यों में भूमि अधिग्रहण, मंदिर क्षेत्र के आस-पास 500 मीटर में चौड़ी और पक्की सड़क, ब्रिज निर्माण, नज़दीक रहने वालों की अन्य क्षेत्र में रहने की व्यवस्था और मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मूलभूत व्यवस्थाएँ शामिल हैं।

कॉन्ग्रेस ने 2007-11-13 में ऐसे ही कृषि बिल पर काम किया, राज्यों में लागू करवाया… चुनाव में भी जिक्र… अब कर रही नौटंकी

किसानों के हितों को विषय बनाकर एक बार फिर विपक्षी दल अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए केंद्र सरकार को घेरने का प्रयास कर रहे हैं। इसी विरोधी राजनीतिक दखलंदाजी का नतीजा है कि पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में कृषि सुधार विधेयक (Farm Bill 2020) को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।

पिछली गैर-भाजपा सरकारों के न केवल राजनीतिक घोषणापत्र, बल्कि कृषि और समाजिक कार्यकर्ताओं, किसानों और उद्योग के समर्थकों के कई अध्ययनों ने दशकों से कृषि क्षेत्र में सुधार और उदारीकरण की माँग की है। खरीद, भंडारण से लेकर रसद और बिक्री तक, ऐसे बहुत से पहलू हैं, जो किसान और अंतिम उपभोक्ता दोनों के लिए अधिक मूल्य के लिए बदला जाना चाहिए। और यह पहली बार नहीं है, जब किसान इस बदलाव की प्रक्रिया में सड़क पर उतरे हों। मगर कॉन्ग्रेस जैसे राजनीतिक दलों का इन्हीं विषयों पर बदलता मत दिलचस्प है।

किसान कथित तौर पर नए नियमों का विरोध कर रहे हैं और इसके साथ ही विपक्ष सरकार पर निशाना साध रही है। हालाँकि, किसानों को लेकर एनडीए सरकार से पहले भी पूर्ववर्ती सरकार ऐसे विधेयक समय-समय पर पेश करती आई हैं, जिनमें सबसे अधिक आज ‘किसान-हितैषी’ होने का दावा करने वाले कॉन्ग्रेस (यूपीए) जैसे राजनीतिक दल सबसे आगे हैं। जबकि अपने सत्ताकाल में वह खुद इस प्रकार के बिल लाने की कोशिश कर रही थी।

केंद्र सरकार के नए कानूनों का विरोध कर रहे राजनीतिक दल और अन्य संगठनों का आरोप है कि नए क़ानून से कृषि क्षेत्र पूँजीपतियों या कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा और इसका नुक़सान किसानों को होगा।

एक नजर किसानों से जुड़े उन तमाम विधेयकों पर, जिन्हें पूर्ववर्ती सरकारों ने तब किसानों के लिए लाभकारी बताया था –

कॉन्ग्रेस का 2019 का घोषणापत्र

2019 के लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस ने अपने घोषणापत्र में कहा था कि सत्ता में आने पर किसानों को अपनी उपज सरकारी मंडियों में ही बेचने की अनिवार्यता को खत्म करेगी और किसान कहीं भी अपनी उपज बेच पाएँगे।

लोकसभा चुनाव के वक्त अपने घोषणापत्र में ही ऐलान किया था कि वह सरकार में आए तो सरकारी मंडी में फसल बेचने की अनिवार्यता को खत्म कर देंगे। ख़ास बात यह है कि तब भारतीय किसान यूनियन (BKU) ने भी कॉन्ग्रेस के इस कदम का स्वागत किया था जबकि आज यही BKU इन कृषि सुधारों का विरोध कर रही है।

कॉन्ग्रेस का 2014 का घोषणापत्र

2019 चुनावों से पहले 2014 के आम चुनाव में भी कॉन्ग्रेस ने यही घोषणा की थी। जिसके बाद कर्नाटक, असम, हिमाचल प्रदेश, मेघालय और हरियाणा की कॉन्ग्रेस की ही सरकारों ने किसानों को APMC एक्ट से अलग कर कहीं भी उपज बेचने का अधिकार दे दिया था।

2013

वर्ष 2013 में खुद राहुल गाँधी ने ही कॉन्ग्रेस शासित राज्यों से कहा था कि 12 राज्य अपने यहाँ फल और सब्जियों को APMC एक्ट से बाहर करेंगे और एक्ट में बदलाव की बात कही थी। अब यही कॉन्ग्रेस और इसके नेता राहुल गाँधी इस एक्ट में बदलाव का विरोध कर खुद को किसानों के मसीहा होने का दावा करते नजर आ रहे हैं।

2011

यूपीए सरकार के दौरान ही योजना आयोग ने भी वर्ष 2011 में अपनी एक रिपोर्ट में “Inter-State Agriculture Produce Trade and Commerce Regulation एक्ट को निष्क्रिय कर केंद्र की लिस्ट से हटाने का सुझाव दिया था।

9 साल पहले कॉन्ग्रेस ने इन विधेयकों को बताया था ‘किसान हितैषी’

योजना आयोग के सुझाव के बाद बाद उसी वर्ष 2011 में कैबिनेट सचिव ने सिफारिश की थी कि देश में अंतरराज्यीय कृषि व्यापार को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इसके अगले साल यूपीए सरकार ने ‘Agricultural Produce Inter State Trade and Commerce (Development and Regulation) Bill 2012’ तैयार किया। हालाँकि, यूपीए सरकार इस विधेयक पर आगे नहीं बढ़ पाई।

2008

तब भारतीय किसान संगठन ने ही शिकायत की थी कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूँ की कीमत 1,600 रुपए प्रति क्विंटल थी, जबकि तत्कालीन यूपीए सरकार उन्हें अपनी उपज को 100 रुपए प्रति क्विंटल के मूल्य पर बेचने को मजबूर कर रही थी।

उस समय किसान यूनियन, तत्कालीन यूपीए सरकार के फैसले का विरोध कर रही थी कि उन्हें उपज को निजी खरीद पर रोक लगाने के नियम को हटाना चाहिए। यानी, किसान यूनियन उस समय कॉर्पोरेट फार्मिंग की वकालत कर रही थी। जबकि नए कृषि सुधारों के अनुसार, किसान अपनी उपज को बिना किसी बिचौलिए के किसी भी बाजार और मंडी में बेचने के लिए स्वतंत्र हैं और अब किसान यूनियन इस फैसले का विरोध करती देखी जा सकती है।

2007

वर्ष 2007 में यूपीए सरकार के दौरान ही ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत 2007-2012 के लिए कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, और ई-ट्रेडिंग का जिक्र किया गया था। तब हरियाणा, कर्नाटक, पंजाब, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश राज्यों ने अपने कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कानून पारित भी किए थे।

ऐसे में सवाल यह है कि कॉन्ग्रेस आखिर किस मुँह से अब इन सभी कृषि सुधारों को किसान-विरोधी साबित करने का प्रयास कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे ‘आज़ादी के बाद किसानों को किसानी में एक नई आज़ादी’ देने वाला विधेयक बताया है।

उन्होंने कहा कि किसानों को एमएसपी का फ़ायदा नहीं मिलने की बात ग़लत है और विरोधी दल सिर्फ विरोध के लिए इस कानून का दुष्प्रचार कर रहे हैं। सितम्बर माह में ही पीएम मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए बिहार की कई परियोजनाओं का शुभारंभ करते हुए कहा था कि जो लोग दशकों तक देश में शासन करते रहें हैं, सत्ता में रहे हैं, देश पर राज किया है, वो लोग किसानों को भ्रमित कर रहे हैं, किसानों से झूठ बोल रहे हैं।

पीएम मोदी ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि विधेयक में वही चीज़ें हैं, जो देश में दशकों तक राज करने वालों ने अपने घोषणापत्र में लिखी थी। इन तमाम बातों से यही स्पष्ट होता है कि कॉन्ग्रेस खुद 2007 से ही किसानों के लिए यही बिल लेकर आ रही थी, जिस पर बाद में उसकी कई प्रदेश कॉन्ग्रेस सरकारों ने भी काम किया। लेकिन अब जब मोदी सरकार किसानों के लिए उन्हीं किसान हितैषी बिलों को कानून का रूप देने की कोशिश कर रही है तो कॉन्ग्रेस ने अपना पाला बदल कर इसे ‘किसान-विरोधी’ ठहराना शुरू कर दिया है।

कुल मिलाकर यह पूरी लड़ाई इस एक विचार पर केंद्रित होती नजर आती है कि कॉन्ग्रेस का बिल प्रगतिशील और भाजपा का कानून किसी न किसी तरह से ‘किसान विरोधी’ और ‘फासीवादी’ है।

एक ही परिवार के 3 भाइयों का शव बरामद, आँखें निकली हुईं: हत्या का आरोप लगा परिजनों ने मिर्जापुर में किया चक्का जाम

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में 3 लड़कों की आँख निकाल कर कथित तौर पर निर्दयता से हत्या का मामला सामने आया है। तीनों लड़के एक ही परिवार के सदस्य हैं और लालगंज थाना क्षेत्र के बामी गाँव निवासी हैं। तीनों भाइयों (चचेरे) का शव बुधवार (2 दिसंबर 2020) विंध्याचल के लेहड़िया बंधी के पानी से बरामद किया गया। परिजनों ने आशंका जताई है कि उनकी हत्या करके आँख निकाली गई है। 

घटना की जानकारी मिलते ही एएसपी ऑपरेशन महेश अन्नी और एसडीएम लालगंज जंग बहादुर यादव घटनास्थल पर पहुँचे और वहाँ का मुआयना किया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ परिजनों ने इस घटना पर आक्रोश जताते हुए शव लेकर एनएच 7 जाम कर दिया। उनका कहना है कि इस मामले पर प्रशासन द्वारा जल्द से जल्द कार्रवाई हो।   

1 दिसंबर 2020 को लालगंज थाना क्षेत्र के अंतर्गत बामी गाँव के निवासी हरिओम तिवारी (14 साल), सुधांशु तिवारी (14 साल) और शिवम तिवारी (14 साल) अपने घर के नज़दीक स्थित कुशियरा जंगल में बेर खाने के लिए गए थे। काफी समय बीत जाने के बावजूद जब वह वापस नहीं लौटे, नतीजतन उनके परिजनों ने खोजबीन शुरू की।

खोजबीन के बाद जब उनका पता नहीं चला, तब परिजनों ने इस मामले की जानकारी पुलिस को दी। पुलिस द्वारा मामले का संज्ञान लिए जाने के कुछ ही समय बाद स्थानीय लोगों ने बताया कि किशोरों का शव लेहड़िया बंधी के पास देखा गया है। 

मृतक किशोरों के शव (साभार – falanadikhana)

सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची और तीनों का शव निकलवाया। शव निकालने के बाद देखा गया कि उनके शरीर पर चोटों के कई निशान हैं और आँखें भी निकाली गई हैं। यह देख कर किशोरों के परिजन आक्रोशित हुए और पुलिस को शव लेकर नहीं जाने दिया।

उन्होंने शवों के साथ एनएच जाम करते हुए जिलाधिकारी को बुलाने की माँग उठाई। जिसके बाद डीएम के आश्वासन पर शवों को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया। फ़िलहाल किशोरों की कथित तौर पर हत्या का कारण सामने नहीं आया है।

इस घटना पर पुलिस अधीक्षक अजय कुमार सिंह का कहना है कि लेहड़िया बंधी के पानी में तीन किशोरों का शव बरामद हुआ है। मामले में हत्या की आशंका जताई गई है, शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया गया है। तहरीर और पोस्टमॉर्टम के आधार पर घटना की जाँच और कार्रवाई की जाएगी।

तीनों किशोर एक ही परिवार के सदस्य हैं। इनमें सुधांशु तिवारी पुत्र राजेश तिवारी, शिवम तिवारी पुत्र राकेश तिवारी और हरिओम तिवारी पुत्र मुन्ना लाल तिवारी हैं। राकेश तिवारी और मुन्ना लाल तिवारी सगे भाई हैं और राजेश तिवारी चचेरे भाई हैं।

30 नवंबर को राजेश तिवारी की बहन की शादी थी। 1 दिसंबर को विदाई हो चुकी थी, इसलिए सब आराम से सो रहे थे। तभी तीनों किशोर परिजनों से नज़र छुपा कर जंगल में बेर खाने के लिए निकले थे। सुधांशु और शिवम विंध्यवासनी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में कक्षा आठवीं के छात्र थे और हरिओम प्रयागराज स्थित नैनी में अंग्रेज़ी माध्यम का कक्षा आठवीं का छात्र था।         

गौभक्त और आर्य समाजी धर्मपाल गुलाटी का निधन: विभाजन के बाद तांगा चलाने को मजबूर, मेहनत से खड़ा किया MDH

मसालों की कंपनी महाशय दी हट्टी (MDH) के मालिक धर्मपाल गुलाटी का निधन हो गया है। धर्मपाल गुलाटी 98 वर्ष के थे।

धर्मपाल गुलाटी कोरोना संक्रमित हो गए थे लेकिन वो उससे उबर चुके थे। इसके बाद हार्ट अटैक से उनका निधन 3 दिसंबर 2020 को सुबह 5:38 पर हुआ।

महाशय दी हट्टी (MDH) के मालिक धर्मपाल गुलाटी को व्यापार और उद्योग खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में बेहतर योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

धर्मपाल गुलाटी का जन्म 27 मार्च 1923 को पाकिस्तान के सियालकोट में हुआ था। सियालकोट में इनके पिताजी की मसालों की एक छोटी सी दुकान थी, जिसका नाम महाशय दी हट्टी था। इसी महाशय दी हट्टी से नाम आया M – महाशय D – डी H – हट्टी यानि MDH

मसालों के इतने बड़े व्यापार को स्थापित करने वाले धर्मपाल गुलाटी सिर्फ चौथी तक पढ़े थे। पाँचवीं में फेल होने के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी।

देश के विभाजन के बाद 27 सितम्बर 1947 को इनका परिवार भारत आकर दिल्ली में रहने लगा। दिल्‍ली आकर इन्‍होंने न्यू दिल्ली रेलवे स्टेशन से कुतुब रोड और करोल बाग से बड़ा हिन्दू राव तक तांगा चलाने का काम किया।

तांगा चलाने वाले धर्मपाल गुलाटी ने कुछ पैसे बचा कर मसालों का काम करोल बाग से शुरू किया। 1953 में इन्होंने एक दूसरी दुकान चांदनी चौक में ली। और 1959 में इन्‍होंने दिल्‍ली के कीर्ति नगर में मसालों की एक फैक्‍ट्री लगा दी। इसके बाद MDH ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

कैसा दिखता है वैज्ञानिक कृषि वाला खेत: अजीत भारती का वीडियो | Raj Narayan’s farm and training centre, Keshabe

वैज्ञानिक कृषि के बारे में जानने के लिए हम बेगूसराय के केशाबी गाँव पहुँचे। यहाँ पर हमने कृषक एवं प्रशिक्षक राज नारायण से मुलाकात की और इसके बारे में जानने की कोशिश की। राज नारायण माइक्रो ट्रेनिंग सेंटर चलाते हैं। इस दौरान हमने जानने की कोशिश की कि ये किस तरह से कृषि, गौपालन आदि करते हैं और इसे समाज में भी ले जाने की कोशिश करते हैं।

इनका एक ट्रेनिंग सेंटर चलता है। राज नारायण यहाँ पर आए लोगों को न सिर्फ कृषि से संबंधित किताबी ज्ञान देते हैं, बल्कि उन्हें खेतों में भी ले जाते हैं। राज नारायण ने बताया कि अभी उनके पास ज्यादातर क्रॉस ब्रीड की गायें हैं, लेकिन वो देशी नस्ल की गायों का अनुपात बढ़ा रहे हैं, क्योंकि इनका रख-रखाव वातावरण के हिसाब से आसान है। यह गाय दूध कम देती है, लेकिन उसकी गुणवत्ता काफी अच्छी होती है।

वैज्ञानिक कृषि फार्म के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें

चिंतित मत होइए, यहाँ से कुछ ले नहीं जा रहे, नया फिल्म सिटी बना रहे हैं: CM योगी का संजय राउत को करारा जवाब

महाराष्ट्र यात्रा को लेकर शिवसेना नेता संजय राउत की बातों का जवाब देते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि हम महाराष्ट्र से कुछ लेने नहीं बल्कि एक उत्तरप्रदेश में नई फिल्म सिटी का निर्माण करने जा रहे हैं।

शिवसेना नेता संजय राउत की यूपी फिल्म सिटी की टिप्पणियों के बारे में पूछे जाने पर सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि हम यहाँ कुछ लेने नहीं बल्कि एक नई फिल्म सिटी बना रहे हैं। क्यों कोई इसके बारे में चिंतित हो रहा है। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को बड़ा बनना पड़ेगा, बड़ी सोच पैदा करनी होगी और बेहतर सुविधाएँ देनी होंगी। जो सुविधाएँ दे पाएगा, लोग वहाँ जाएँगे और उत्तर प्रदेश इसके लिए तैयार है।

सीएम योगी ने कहा कि मुंबई फिल्म उद्योग वहीं बना रहेगा और एक नई फिल्म सिटी को उत्तर प्रदेश में नए परिवेश में नई आवश्यकताओं के अनुसार विकसित किया जाएगा।

गौरतलब है कि सीएम योगी के मुंबई दौरे को लेकर शिवसेना सांसद संजय राउत की बौखलाहट भी देखने को मिली थी। राउत ने चेतावनी दी थी कि मुंबई की फिल्म सिटी को दूसरी जगह शिफ्ट करना आसान नहीं है। उन्होंने कहा दक्षिण भारत में फिल्म उद्योग भी बड़ा है, पश्चिम बंगाल और पंजाब में भी फिल्म सिटी है। जहाँ सीएम योगी को जाना चाहिए और वहाँ के निर्देशकों और कलाकारों से बात करनी चाहिए। या क्या वह केवल मुंबई में ही ऐसा करने जा रहे हैं?

महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे ने भी सीएम योगी को राज्य में दौरे से पहले चेतावनी दी थी कि वह किसी को भी राज्य से कोई उद्योग नहीं ले जाने देंगे।

उल्लेखनीय है कि सीएम योगी कल मुंबई पहुँचे थे। इस दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश के नोएडा में आगामी फिल्म सिटी को लेकर कई उद्योगपतियों, बैंकरों और फिल्मी हस्तियों से मुलाकात की थी। मुंबई पहुँचने के बाद उन्होंने सबसे पहले अभिनेता अक्षय कुमार से मुलाकात की और उत्तर प्रदेश में फिल्म निर्माण की संभावनाओं पर चर्चा की। इसके बाद उन्होंने गायक कैलाश खेर से भी मुलाकात की थी।

बता दें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने इस साल सितंबर में राज्य में फिल्म सिटी की स्थापना की घोषणा की थी। सीएम योगी ने आगामी फिल्म सिटी के लिए उद्योग से जुड़े लोगों से सुझाव भी माँगे थे। साथ ही कई फिल्मी हस्तियों के साथ बैठक की थी।

NGT ने क्रिसमस और न्यू ईयर पर दी पटाखे चलाने की छूट, दिवाली में लागू था पूर्ण प्रतिबंध

देश मे कोरोना की स्थिति को देखते हुए एनजीटी ने पटाखों पर लगे बैन को अनिश्चितकाल तक के लिए बढ़ा दिया है। एनजीटी ने साफ तौर पर कह दिया है कि दिल्ली-एनसीआर समेत देश के उन सभी हिस्सों में पटाखों पर बैन बरकरार रहेगा जहाँ पर एयर क्वालिटी ख़राब या खतरनाक स्तर पर है। साथ ही एनजीटी ने कहा है कि क्रिसमस और न्यू ईयर के मद्देनजर देश के उन इलाकों में जहाँ एयर क्वालिटी मॉडरेट स्तर पर है, वहाँ पटाखे रात को 11:55 बजे से 12.30 तक यानी 35 मिनट के लिए चलाने की अनुमित होगी।

बता दें कि एनजीटी द्वारा पटाखों पर लगे बैन को आगे बढ़ाने के बाद अब सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी समारोह या शादी में पटाखों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसके अलावा इसकी खरीद-फरोख्त पर लगी रोक भी बरकरार रहेगी।

पिछले महीने दीवाली से पहले एनजीटी ने 9 नवंबर को पटाखों के खरीद-फरोख्त और स्टोरेज पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था। एनजीटी की तरफ से यह प्रतिबंध 30 नवंबर तक के लिए लगाया गया था, लेकिन अब एनजीटी ने पाया कि दिल्ली एनसीआर में कोरोना की तीसरी लहर तेज है, इसलिए यह प्रतिबंध आगे भी जारी रहेगा।

दिल्ली में दिवाली से ठीक पहले दिल्ली सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया था। दिल्ली में पटाखों को 9 नवंबर से 30 नवंबर तक पूरी तरह से बैन कर दिया गया। ग्रीन क्रैकर्स की बिक्री पर भी रोक लगा दी गई। कहा गया कि दिल्ली को प्रदूषण से बचाने के लिए इस तरह की पाबंदी लगाई गई। 

केजरीवाल सरकार ने पटाखों को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए। दिल्ली सरकार में पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने इसकी जानकारी देते हुए बताया था कि पटाखे जलाने और पटाखे बेचने वालों पर ₹1 लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

गोपाल राय ने कहा कि पटाखे बेचने या फोड़ने वाले लोगों पर वायु प्रदूषण (नियंत्रण) अधिनियम (1981) के तहत 1 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। गोपाल राय ने बताया कि आरोपित के खिलाफ एयर एक्ट के तहत केस बनाया जाएगा, जिसमें 1 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाने का प्रावधान है। अब एनजीटी ने क्रिसमस और न्यू ईयर के अवसर पर रात के 11:55 बजे से 12.30 तक पटाखे चलाने की अनुमति दे दी है।

बीजेपी नेता मेजर सुरेंद्र पुनिया ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा है, “शाबाश NGT NGT क्रिसमस/नई साल पर 11:50PM से 12:30 AM के बीच में पटाखे चला सकते हैं” क्योंकि उससे प्रदूषण नहीं होगा! दीवाली पर इसी NGT के आदेश पर पटाखे चलाने के जुर्म में 850 लोगों को गिरफ़्तार किया गया था। मी लॉर्ड,आपको इस वैज्ञानिक आविष्कार के लिए नोबेल पुरस्कार क्यों ना मिले?

वहीं एक अन्य सोशल मीडिया यूजर ने लिखा, अब पटाखे जलाने से प्रदूषण नही फैलता? केवल दीपावली पर ही प्रदूषण फैलता है? अब कोविड-19 वायरस का संक्रमण खत्म हो गया है? या कानून का दुरुपयोग हो रहा है सिर्फ हिन्दू के त्यौहार को प्रतिबंधित करने के लिए?

बब्बू और छब्बू मियाँ: दर्जी और पेंटर भाई कैसे बन गए भूमाफिया?

उत्तर प्रदेश सरकार के तर्ज पर मध्यप्रदेश सरकार भी गुंडों माफियाओं पर लगातार नकेल कस रही है। इसी कड़ी में नगर निगम की रिमूवल गैंग ने बुधवार (2 दिसंबर, 2020) सुबह भूमाफिया बब्बू उर्फ सुल्तान शेख और छब्बू उर्फ शाबिर के आलीशान मकान को ध्वस्त कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि बब्बू और छब्बू मियाँ भूमाफिया बनने से पहले टेलर और पेंटर का काम करते थे।

खजराना थाना क्षेत्र में बब्बू और छब्बू ने अवैध रूप से तीन आलीशान मकान बना लिया था। जिसको नगर निगम और पुलिस ने पहले नोटिस जारी करके खाली करवाया। फिर जेसीबी और पोकलेन की मदद से करीब तीन घंटे में अवैध मकानों को जमीदोंज कर दिया।

बता दें दोनों ही माफियाओं पर मारपीट, चोरी, हत्या, हत्या की कोशिश के एक दर्जन से ज्यादा अपराध दर्ज है। 2015 में इनका नाम गुंडे शहजाद लाला हत्याकांड में सामने आया था। उससे पहले इन्हें मामूली चोरी चाकरी जैसे मामलों में गिना जाता था। धीरे-धीरे दोनों ने अपनी पहुँच नामी गुंडों और हिस्ट्रीशीटर से बनानी शुरू की। जिसके बाद उन्होंने इलाके में क्राइम को अंजाम देने के लिए गैंग बना कर गुंडों से काम करवाना शुरू कर दिया, ताकि पकड़े जाने पर इनका नाम सामने न आए।

कहा जाता है बब्बू-छब्बू सिंडीकेट में रसूखदार लोगों के साथ मिलकर विभिन्न पार्टियों के नेता और कुछ पुलिस अफसरों की मदद से क्राइम को अंजाम देते थे। और इसके काले कारनामों से दोनों मियाँ भाई ने अवैध कारोबार का साम्राज्य खड़ा कर लिया।

रिपोर्ट के अनुसार, बब्बू व छब्बू ने खजराना इलाके में कई सरकारी जमीनों पर कब्जा कर लिया था। और जमीन से संबंधित लोगों से साँठगाँठ कर इन्होंने इलाके में अवैध कॉलोनियों का निर्माण शुरू करवा दिया था। नोटरी के तहत प्लाट की नीलामी भी की गई।

इसी अवैध धंधे को देखते हुए इन दोनों ने टेलरिंग और पेंटर का काम बंद कर दिया। जमीन का यह अवैध धंधा इतना फला-फूला कि जिन बदमाशों के पास खाना खाने तक के पैसे नहीं रहते थे अब उनके पास गाड़ी और बंगला आ गया। साथ ही अलग अलग जगहों पर इन्होंने आगे के लिए पैसा लगाना शुरू कर दिया।

वहीं जब इसकी खबर प्रशासन को लगी तो पुलिस ने दोनों पर दबिश देनी शुरू कर दी। जिसके तहत बब्बू की गिरफ्तारी हो गई लेकिन छब्बू भोपाल में प्यारे मियाँ की शरण में चला गया। वही प्यारे मियाँ जोकि लड़कियों के अवैध धंधे के सिलसिले में सलाखों के पीछे है। नगर निगम ने 1 साल पहले बब्बू के पटेल नगर स्थित फार्म हाउस पर दबिश देकर अवैध बिल्डिंग को ध्वस्त करवाया था। उस दौरान पुलिस ने ग्राउंड में खड़ी 50 नई इलेक्ट्रिक बाइक भी बरामद की थी। ध्वस्तीकरण के दौरान दौरान बब्बू की पत्नी ने काफी हो-हल्ला भी मचाया था।