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हैदराबाद निगम चुनाव में हिंदू वोट कट रहे, वोटर कार्ड हैं, लेकिन मतदाता सूची से नाम गायब: मीडिया रिपोर्ट

हैदराबाद में मंगलवार (दिसंबर 1, 2020) को GHMC (ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन) चुनाव संपन्न हुआ। रिजल्ट 4 दिसंबर को घोषित होने वाला है। मगर इस बीच एक बेहद ही चौंकाने वाली बात सामने आ रही है। दरअसल, बताया जा रहा है कि यहाँ पर हिंदू वोटरों का नाम ही लिस्ट से ‘गायब’ कर दिया गया। हालाँकि, इनके पास वोटर कार्ड हैं, लेकिन वोटर लिस्ट में नाम नहीं।

‘जन की बात’ ने अपनी रिपोर्टिंग के जरिए इस बात का दावा किया। ‘जन की बात’ के मुताबिक यह घटना हैदराबाद के सबसे बड़े बूथ जाम बाग 77 डिवीजन का है। वीडियो में स्वाति नाम की एक हिंदू महिला दावा कर रही है कि वोटिंग लिस्ट में उनका नाम नहीं है, जबकि उनके पास वोटर कार्ड है और वो पिछले 20 सालों से वोट डालती आ रही है। इस बार जब वो वोट डालने गई तो लिस्ट से उनका नाम ही गायब था। ऐसा कई हिंदुओं के साथ हुआ। महिला ने बताया कि उनके पति का भी नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है।

वीडियो में एक और शख्स ने दावा किया कि हिंदू वोट कट रहे हैं। पिछले साल 60,000 हिंदू वोट कटे थे। रिपोर्टर प्रदीप भंडारी ने एक लिस्ट दिखाते हुए दावा किया कि इन पर जितने भी नाम हैं, सभी हिंदू हैं। इनमें से किसी का भी नाम वोटर लिस्ट में नहीं था। उन्होंने सवाल किया कि क्या ये चुनाव साजिश या रणनीति है या फिर सिर्फ एक गलती? क्या केसीआर की प्रशासन इस आरोप का जवाब देगी?

जीएचएमसी चुनाव में 1122 प्रत्याशी मैदान में हैं। यह चुनाव सभी दलों के लिए लिटमस टेस्ट की तरह है लेकिन बीजेपी ने पहली बार नगर निकाय चुनाव में सक्रियता दिखाते हुए जोरदार प्रचार किया। बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा से लेकर केंद्रीय मंत्री अमित शाह, स्मृति इरानी और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यहाँ चुनाव प्रचार किया।

एक समय तेलंगाना की राजनीति में शक्तिशाली रही तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) भी एक बार फिर खोई जमीन वापस लेने की कोशिश के तहत मैदान में उतरी है। पार्टी नेताओं ने अविभाजित आंध्रप्रदेश में एन चंद्रबाबू नायडू के मुख्यमंत्री रहते शहर के विकास के लिए किए गए कार्यों का हवाला दिया।

हैदराबाद नगर निगम चुनाव में कॉन्ग्रेस की ओर से तेलंगाना प्रदेश अध्यक्ष एन उत्तम कुमार रेड्डी और कार्यकारी अध्यक्ष ए रेवंत रेड्डी व अन्य वरिष्ठ नेताओं ने प्रचार किया। पिछले चुनाव में कॉन्ग्रेस को सिर्फ 2 वार्ड में जीत मिली थी।

निकाय चुनाव के लिए प्रचार करते हुए यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ ने एक नई बहस छेड़ी थी। योगी बोले, “कुछ लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि अगर हैदराबाद का नाम बदलकर भाग्यनगर किया जा सकता है? मैंने कहा कि क्यों नहीं। मैं उनसे कहा कि उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल करने के बाद जब हमने फैजाबाद का नाम अयोध्या और इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज किया तो फिर हैदराबाद का नाम बदलकर भाग्यनगर क्यों नहीं हो सकता है?”

किसान आंदोलन में ‘रावण’ और ‘बिलकिस बानो’, पर क्यों? अजीत भारती का वीडियो । Ajeet Bharti on Farmers Protest

किसान आंदोलन राजनैतिक चित्रहार की तरह हर दिन नए-नए गीत दिखाता जा रहा है। थोड़ी-थोड़ी देर पर नया चीज निकल कर सामने आता है। फिलहाल जो नयापन है, उसमें 4-5 कैरेक्टर की एंट्री है। जिसमें से एक भीम आर्मी का चंद्रशेखर ‘रावण’ है, दूसरी बिलकिस बानो है, जो तथाकथित शाहीन बाग की ‘दादी’ के रूप में चर्चा में आई थी। कनाडा के प्रधानमंत्री भी इसमें कूद गए हैं और ज्ञान की बात करने लगे हैं।

किसानों ने पीएम मोदी और अमित शाह के प्रपोजल को रिजेक्ट कर दिया है, जो 3 दिसंबर को होनी थी। पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ में कई किसानों का उदाहरण देकर समझाया कि कैसे किसान इस बिल से लाभान्वित हो रहे हैं, अपने उत्पादों को बेच पा रहे हैं। अगर उन्हें भुगतान नहीं मिलता है तो वो शिकायत भी दर्ज करा रहे हैं, जिस पर कार्रवाई भी हो रही है। प्रदर्शन में होने वाली हर बिंदु को जब आप गौर से देखेंगे तो आपको लगने लगेगा कि इसका किसानों से कोई लेना-देना नहीं है।

पूरा वीडियो यहाँ क्लिक करके देखें

कामरा के बाद वैसी ही ‘टुच्ची’ हरकत के लिए रचिता तनेजा के खिलाफ अवमानना मामले में कार्यवाही की अटॉर्नी जनरल ने दी सहमति

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने लॉ के एक छात्र को कॉमिक आर्टिस्ट रचिता तनेजा के खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू करने के लिए सहमति दे दी है। बता दें कि रचिता तनेजा पर अवमानना की कार्यवाही की सहमति उन ट्वीट्स के लिए दी है जो ‘दुस्साहसिक हमला और संस्था का अपमान’ था। 

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि sanitarypanels नामक सोशल मीडिया यूजर द्वारा किए ट्वीट का स्पष्ट अर्थ है कि सुप्रीम कोर्ट सत्तारूढ़ राजनीतिक दल भाजपा की तरफ पक्षपाती है।

दरअसल, पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी को जमानत दे दिया था। इसी को लेकर sanitarypanels ने एक कार्टून बनाया। जिसमें लिखा था, “तू जानता नहीं मेरा बाप कौन है।” इसमें बीच में अर्णब गोस्वामी को, एक तरफ सुप्रीम कोर्ट और दूसरी तरफ बीजेपी को दिखाया गया है। इसमें अर्णब गोस्वामी का हैशटैग लगाया हुआ है।

इसमें साफ तौर से दर्शाया गया कि बीजेपी और सुप्रीम कोर्ट अर्णब गोस्वामी को बचाना चाहता है। इस तरह से ये भी दिखाने का प्रयास किया गया कि सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया सत्तारुढ़ पार्टी भारतीय जनता पार्टी की तरफ पक्षपाती है और उसी के पक्ष में फैसला सुनाता है।

इसी तरह का दूसरा ट्वीट सुप्रीम कोर्ट को लेकर किया गया है। जिसमें सुप्रीम कोर्ट को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जोड़ते हुए ‘संघी कोर्ट ऑफ इंडिया’ के रूप में उल्लेखित किया गया है। इसमें कैप्शन दिया गया, “अर्णब को जमानत मिलती है, असली पत्रकारों को जेल मिलती है, स्वतंत्र न्यायपालिका विफल होती है।” यह ट्वीट साफ तौर पर सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया का अपमान करती है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 11 नवंबर को रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी को 2018 के आत्महत्या मामले में जमानत दे दी। जमानत आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने इसे मानने के लिए मुंबई पुलिस को निर्देशित किया था। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था –  “हम मानते हैं कि जमानत नहीं देने में हाईकोर्ट गलत था।” इसके साथ ही अर्नब गोस्वामी और दो अन्य आरोपितों को 50,000 रुपए के बांड पर अंतरिम जमानत पर रिहा किया गया। अदालत ने पुलिस आयुक्त को यह निर्देश भी दिए कि उनके आदेश का तुरंत पालन किया जाना चाहिए।

इससे पहले गालीबाज ‘कॉमेडियन’ कुणाल कामरा द्वारा किए गए विवादित ट्वीट को लेकर अटॉर्नी जनरल ने अवमानना का मुकदमा चलाने की अनुमति दी थी। अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने यह अनमुति इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील अनुज सिंह की शिकायत के आधार पर दी थी। 

अनुमति देते हुए एजी वेणुगोपाल ने कहा कि कुणाल कामरा के ट्वीट में जान-बूझकर मुख्य न्यायाधीश (CJI) के अपमान का प्रयास किया गया। यह उस न्यायपालिका के अपमान के समान है, जिसका सीजेआई नेतृत्व करते हैं। कामरा के ट्वीट को अश्लील और बेहूदा बताते हुए अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट की अवमानना कानून 1975, की धारा 15 के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति दी।

वर्तमान नागालैंड की सुंदरता के पीछे छिपा है रक्त-रंजित इतिहास: नागालैंड डे पर जानिए वह गुमनाम गाथा

नागालैंड का इतिहास तथा इसकी संस्कृति विश्व भर में विख्यात है। नागालैंड का प्राकृतिक सौंदर्य, भोजन, पहनावा और इसकी संस्कृति विश्व को अपनी ओर आकर्षित करती है। नागालैंड राज्य दक्षिण में मणिपुर, उत्तर और पश्चिम में असम और पूर्वोत्तर में अरूणाचल प्रदेश की सीमाओं से घिरा हुआ बहुत ही रमणीय पर्वतीय तथा मैदानी क्षेत्र है। परन्तु इस सुन्दरता के पीछे बहुत ही कटु रक्त-रंजित इतिहास भी छिपा है जो ब्रिटिशों की विभाजनकारी और ईसाईकरण नीति के कारण आज भी अशांति का कारक है।

इतना ही नहीं उनकी इस कुत्सित मानसिकता ने भौगोलिक वर्तमान नागालैंड को स्वरूप में लाने वाले वास्तविक साहसी वीरों के त्याग, बलिदान तथा अखंड भारत के लिए किए गए उनके संघर्षों को इतिहास तथा जनमानस के मानस पटल से ओझल कर दिया है।  

सदियों से इस क्षेत्र में अंगामी, आओ, चाखेसांग, चांग, खिआमनीउंगन, कुकी, कोन्‍याक, लोथा, फौम, पोचुरी, रेंग्‍मा, संगताम, सुमी, यिमसचुंगरू और ज़ेलिआंग हैं आदि अनेक जन-समुदाय अपनी-अपनी भाषा, वेशभूषा, भोजन, पर्व, परंपरा आदि अनेक सांस्कृतिक एवं भौगोलिक विविधताओं के अद्भुत मिश्रण के साथ सौहार्दपूर्वक रहते आए हैं। इन सांस्कृतिक विरासत से समृद्ध समुदाय के लोगों को “नागा” तथा असभ्य, जंगली एवं बेहद क्रूर जनजाति तथा अनुसूचित क्षेत्र कहने वाले ब्रिटिशर्स ही थे क्योंकि अंग्रेज इन समुदायों के वीर योद्धाओं का सामना नहीं कर पा रहे थे।

1826 की ‘यांदाबू’ संधि के अनुसार असम पर अधिकार करने के बाद ब्रिटेन ने 1892 तक नागा पर्वत पर अपने अधिकार क्षेत्र का लगातार विस्तार किया। परन्तु इसके बाद लंबे समय तक यहाँ नागाओं और अंग्रेजों के बीच भीषण संघर्ष चलता रहा। अंग्रेजों को जल्दी ही विश्वास हो गया था कि उन दुर्गम पहाड़ियों में नागाओं पर अपना आधिपत्य बनाए रखना बहुत मुश्किल है।

1826 से 1865 तक के 40 वर्षों में अंग्रेज़ी सेनाओं ने नागाओं पर कई तरीकों से हमले किए, लेकिन हर बार उन्हें उन मुट्ठी भर योद्धाओं के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा। नागाओं के ऐसे पराक्रम को देख कर सबके मन में उनके प्रति घृणा और भय का भाव भरने के लिए अंग्रेजों ने उन्हें ‘सरकटिया’ (Head-Hunters) जनजाति कहा।

इसके बाद अंग्रेज़ प्रशासकों ने 1866 में एक नवीन कूटनीति के तहत पर्वतीय क्षेत्र को एक अलग ज़िला बनाकर वहाँ सामाजिक विकास और शिक्षा के प्रचार के बहाने से चर्च के मिशनरियों ने लोगों के बीच काम करते हुए उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया।

अंग्रेजो ने नागों को ईसाइयत के प्रति संतुष्ट रखने के लिए हर तरह के प्रयास किये। इसके लिए उनकी पितरों की मौखिक कथाओं, विश्वासों तथा परम्परों को ईसाई धर्म में स्वीकार किया तथा उनकी मातृक मौखिक भाषा के लिए नवीन लिपि भी बनाई। धीरे-धीरे ईसाई मिशनरी इसमें सफल हुई और उनके प्रति नागाओं में अत्यंत आदर एवं कृतज्ञता का भाव देखा गया।

परिणामस्वरूप नागा जन-समुदाय में भारत के प्रति अलगाववाद तथा उग्रता का बहुत ही गहन बीजारोपण हो गया इसलिए 1929 में जब साइमन कमीशन का नागालैंड में आगमन हुआ था तो नागा प्रतिनिधियों ने उन्हें एक प्रतिवेदन में कहा था कि अंग्रेजों के बाद नागा पहाड़ियों को भारत में शामिल न किया जाए।

यही नहीं, नागाओं के नेता ब्रिटिश नागरिक फिज़ो ने देश की स्वतंत्रता से एक दिन पहले, 14 अगस्त 1947 को स्वतंत्र ‘बृहत्तर नागालैंड’ अथवा “नागालिम” की घोषणा कर दी थी। फ़िजो के नेतृत्व में इस तथाकथित अलग नागालिम या ग्रेटर नागालैंड की माँग को लेकर एन.एन.सी. (Naga National Council) का 1946  में गठन हो चुका था।

फ़िजो की अध्यक्षता ने अन्यायपूर्ण हिंसा का रास्ता अपनाया और नागा तथा NNC के हजारों लोगों को भी अपनी जान गँवानी पड़ी। चीन और पूर्वी पाकिस्तान (अद्यतन बांग्लादेश) ने भारत में अशांति और अस्थिरता उत्पन्न करने के उद्देश्य से इन नागा विद्रोहियों को आर्थिक सहयोग दिया।

परन्तु एक जन समुदाय ऐसा भी था जो न तो हिंसा चाहता था और न ही भारत का एक और हिस्सा। उन्होंने Dr. Imkongliba की अध्यक्षता में प्रथम सम्मलेन (The Naga people’s Convention), 1957 में किया गया जिसमे नागा-हितों का चिंतन करते हुए उनके स्वर्णिम भविष्य की योजना बनाई। जिसमें शुरू में 21 लोग सम्मिलित थे।

इन सब ने पूरे क्षेत्र में सभी 16 जन समुदायों के प्रत्येक घरों तथा ग्राम प्रधानों से मिलकर उन्हें वास्तविकता तथा भारत के साथ रहने में उनके आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक विश्वासों के विकास से अवगत कराने का अभियान शुरू किया।

इस तरह प्रत्येक समुदाय के प्रतिनिधियों, विशेष रूप से नागा पहाड़ी और तत्कालीन उत्तर-पूर्व सीमांत एजेंसी के तेनसांग क्षेत्र के साथ-साथ मणिपुर, बर्मा जैसे अन्य नगा क्षेत्रों के लोगों के साथ विचार-विमर्श कर नागा समस्या का भारत सरकार के साथ सम्मानजनक और शांतिपूर्ण राजनीतिक समाधान करने के लिए तैयार किया और नागा लोगों से शांति और समृद्धि के लिए हिंसा का पंथ छोड़ने की अपील की।

प्रथम नागा पीपुल्स कन्वेंशन के प्रयासों के परिणामस्वरूप तत्कालीन भारत सरकार ने भारतीय संविधान की छठी अनुसूची में संशोधन और नागा हिल्स तुएनसांग क्षेत्र नाम से असम से अलग एक प्रशासनिक इकाई बनाई।

इस उपलब्धि से उत्साहित होकर नागा पीपुल्स कन्वेंशन ने नागा-समस्या का पूर्ण समाधान करने के लिए मई 1958 में दूसरा सम्मलेन किया। इस अधिवेशन में हिंसा तथा विभाजन को अनुमोदित करने वाले लोगों को अपनी मृत्यु की परवाह न करते हुए वास्तविकता से अवगत करने का निर्णय लिया गया और डॉ. इम्कोन्ग्लिबा एओ और 7 अन्य सदस्यों के नेतृत्व में एक संपर्क समिति का गठन किया। यह कार्य बहुत ही जोखिम भरा था जिसमें कुछ सफलता के साथ-साथ कई लोगों की शहादत भी हुई ।

इसके बाद अक्टूबर 1959 में तृतीय नागा पीपुल्स कन्वेंशन हुआ और राजनीतिक समाधान के लिए एक मसौदा समिति का गठन किया गया जिसने 16 सूत्री प्रस्ताव तैयार कर भारत सरकार को सौंपा। इस प्रस्ताव में नागा हिल्स तुएनसांग क्षेत्र (NHTA) के रूप में जाने वाले प्रदेश को भारतीय संघ में नगालैंड के नाम से जानने की परिकल्पना की गई तथा सरकार को आश्वासन दिया कि सभी नागा जनसमुदाय अपनी संस्कृति और परंपराओं के अनुसार देश के विकास में अपनी भूमिका पूरी तरह से निभाएँगे।

शान्ति प्रिय इन सम्मेलनों के कठिन और लम्बे संघर्षों के परिणामस्वरूप 1960 में पंडित नेहरू और नागा नेताओं के बीच बातचीत सही दिशा में आगे बढ़ी और नागालैंड को राज्य बनाने की कवायद शुरू की गई। शांतिपूर्ण और विकसित नागालैंड का सपना देखने वाले डॉ. इम्कोन्ग्लिबा एओ की विद्रोही विभाजनकारी नागाओं ने 22 अगस्त 1961 को मुकोचुंग में हत्या कर दी। अंततः 1962 में संसद में नागालैंड एक्ट पास हुआ और 1 दिसंबर 1963 को नागालैंड भारत का 16वाँ राज्य बन गया।

विद्रोहियों पर दबाव बढ़ने की स्थिति में फ़ीजो भारत से पलायन कर पूर्वी पकिस्तान भागा, और वहाँ से जून 1956 में लन्दन। उसके बाद वह कभी भारत नहीं लौटा। 1990 में लन्दन में ही उसकी मृत्यु हुई। विद्रोही नेतृत्वविहीन हो गए और नवम्बर 1975 को उन्होंने भारत सरकार द्वारा आम क्षमादान की पेशकश स्वीकार कर ली।

इस पर भी कुछ ऐसे चरमपंथी थे उसमें जिन्होंने समर्पण करने से इनकार कर दिया और उन्होंने नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैंड (NSCN) का गठन कर लिया। वर्तमान में NSCN (IM) आतंक की जड़ है, इन चरमपंथियों ने तब से लेकर उन लोगों को अपनी बंदूक का निशाना बनाना जारी रखा है कि जो शांतिपूर्ण ढंग से विवाद का समाधान करना चाहते हैं।

एक अद्वितीय नाम के साथ भारत के संविधान के भीतर 371(ए) का विशेष प्रावधान के तहत एक अलग पहचान प्राप्त करने की दिशा में श्रमसाध्य और खतरनाक यात्रा करने वाले देशभक्त नागा नेताओं के बलिदान और साहस के इतिहास को आधुनिक नागालैंड के इतिहास में जानबूझकर छोड़ दिया गया था।

भारत के 71 वें गणतंत्र दिवस पर नागालैंड के राज्यपाल आर.एन. रवि ने शांतिपूर्ण और विकसित नगालैंड के निर्माण के लिए अपना अप्रतीम योगदान देने वाले डॉ. इम्कोन्ग्लिबा एओ के सम्मान में, कोहिमा में राजभवन के दरबार हॉल को समर्पित किया। 3 अगस्त 2015 को जो भारत सरकार-नागा समझौता हेतु सम्मलेन हुआ है वह भारतीय मूल के आइसाक और मुइवा संचालित नागा संगठन के मध्य हुआ है, जिसे NSCN(IM) के नाम से अधिक जानते हैं।

अपने वक्तव्य में प्रधानमंत्री जी ने कहा था- नागाओं का साहस और प्रतिबद्धता प्रसिद्ध है, ऐसे में उनकी विशिष्ट संस्कृति और इतिहास को मान्यता देना, भारत की सांस्कृतिक समरसता और एकता को ही दर्शाएगा और 70 दशक लंबी इस लड़ाई का अंत होगा। मोदी सरकार के साथ हुए समझौते ने पिछले 40 वर्षों के भारत सरकार और इस अलगाववादी संगठन के बीच बार-बार होते संघर्षविराम को शांतिवार्ता के मंच तक पहुँचाएगा। अब नागालैंड की आम जनता इस समस्या से पूर्ण मुक्ति चाहती है और वह उसी संगठन का साथ देगी जो समाधान की दिशा में कदम बढ़ाएगा।

LAC पर काँपी चीनी सेना, भारतीय जवानों के आगे हालत खराब, पीएलए रोज कर रहा बदलाव: रिपोर्ट

वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर जारी विवाद को लेकर भारत और चीन की सेना कड़ाके की ठंड में अपने-अपने देश की रक्षा कर रहे हैं। मई माह में हुए दोनों देशों के बीच तनातनी के बाद चीन ने कड़ाके की ठंड में भी एलएसी सीमा पर भारी मात्रा में सैनिकों की तैनाती कर रखा है। लेकिन इस कड़ाके की ठंड के आगे चीनी सेना ने घुटने टेक दिए हैं। बढ़ती सर्दी को देखते हुए चीन अपने सैनिकों की तैनाती में बदलाव कर रहा है।

पूर्वी लद्दाख सेक्टर में पड़ने वाली कड़ाके की ठंड ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) को रोटेशन पॉलिसी अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है। चीनी सैनिक लद्दाख की ठंड के आदी नहीं हैं इसलिए फॉरवर्ड पोजिशन पर चीन अपने सैनिकों को रोज रोटेट कर रहा है। वहीं, भारतीय सैनिक उसी जगह पर लंबे ठहराव के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

न्यूज एजेंसी ने सरकारी सूत्रों के हवाले से बताया कि लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर फॉरवर्ड लोकेशन पर भारतीय सैनिक अपनी पोजिशन पर चीनी सेना के मुकाबले ज्यादा समय तैनात रहेगी।

सर्दियों का चीनी सेना पर ज्यादा असर

सूत्रों के मुताबिक, मौसम से जूझने के मामले में भारत ने चीन के मुकाबले ज्यादा तैयारियाँ कर रखी हैं। भारी संख्या में भारतीय सैनिक पहले से ही सियाचिन ग्लेशियर और ऊँचाई वाले इलाकों समेत लद्दाख सेक्टर में तैनात हैं। सर्दियों का असर ज्यादातर उन अहम ऊँचाई वाले इलाकों में होगा, जहाँ चीन ने भारतीय पोजिशन के पास अपने सैनिक तैनात किए हैं। उन्होंने बताया कि भारतीय सैनिक वहाँ मौजूद हैं, जबकि चीन अपने सैनिकों को रोज रोटेट कर रहा है

भारत-चीन के बीच अप्रैल-मई से विवाद शुरू हुआ

चीन ने अप्रैल-मई में सीमा पर आक्रामक रवैया अपनाया था। उसने पूर्वी लद्दाख सेक्टर में भारतीय सीमा के पास करीब 60 हजार सैनिकों की तैनाती भी कर दी थी। यहाँ चीन ने एयर डिफेंस सिस्टम, बख्तरबंद गाड़ियाँ, बड़े हथियार और लंबी दूरी तक मार करने वाली तोपें भी तैनात कर रखी थीं। चीन के घुसपैठ की हर हरकत को नाकाम करने के लिए भारत ने भी जवाबी तैनाती में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। हालाँकि, इसके बाद दोनों देशों के बीच 8 बार कॉर्प्स कमांडर्स लेवल की बातचीत हो चुकी है।

15 जून को हुई थी खूनी झड़प

भारत और चीन के बीच 15 जून को हुई खूनी झड़प में भारत के 20 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। चीन को भी काफी नुकसान हुआ था, लेकिन उसने कभी यह कबूल नहीं किया। उसके बाद से ही भारत यह माँग कर रहा है कि पैंगॉन्ग लेक के दक्षिणी छोर से डिसइंगजमेंट से पहले चीन फिंगर एरिया जैसी पोजिशन से भी अपनी सेना को पीछे हटाए।

चीन ने आक्रामक रुख दिखाते हुए पूर्वी लद्दाख सेक्टर में भारतीय सीमा की ओर करीब 60 हजार सैनिकों की तैनाती की थी। टैंक और भारी हथियारों से लैस इन सैनिकों के सहारे चीन भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ कर यहाँ कब्जा जमाना चाहता था। भारत ने भी इसके जवाब में सैन्य तैनाती बढ़ा दी थी।

फिलहाल, दोनों देशों के बीच सीमा विवाद हल करने के लिए वार्ताओं का दौर चल रहा है। अभी तक दोनों पक्षों के बीच कॉर्प्स कमांडर स्तर की वार्ताओं के आठ दौर पूरे हो चुके हैं। दोनों देशों के बीच वार्ताएँ सैन्य और राजनयिक माध्यमों से हो रही हैं। हालाँकि, अभी इन वार्ताओं का कुछ खास सकारात्मक परिणाम नहीं दिखा है।

अंतरधार्मिक विवाह को प्रोत्साहन देने वाला अधिकारी हटाया गया, CM रावत ने कहा- कठोरता से करेंगे कार्रवाई

उत्तराखंड सरकार ने मंगलवार (दिसंबर 01, 2020) को टिहरी गढ़वाल में समाज कल्याण विभाग द्वारा अंतरधार्मिक विवाह को प्रोत्साहन देने का आदेश जारी करने वाले समाज कल्याण अधिकारी दीपांकर घिल्ड़ियाल को पद से हटाने का आदेश जारी कर दिया है। सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि राज्य सरकार मजहबी उद्देश्यों और धर्मांतरण को बढ़ावा देने वाली शक्तियों के खिलाफ कठोरता से कार्रवाई करने के लिए प्रतिबद्ध है।

आदेश की कॉपी

सीएम त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने अंतरजातीय/अंतरधार्मिक विवाह के बाद सहायता राशि देने वाली सूचना को लेकर जाँच करने के आदेश जारी करने के बाद यह फैसला लिया गया। दरअसल, जिले के सामाजिक कल्याण विभाग द्वारा अंतरधार्मिक विवाह करने वाले जोड़े को 50,000 रुपए की मदद देने की घोषणा की थी, जिसके बाद ‘लव जिहाद’ को बढ़ावा देने के आरोप लगे थे।

गत 18 नवम्बर को टिहरी गढ़वाल जिले के जिला समाज कल्याण अधिकारी दीपांकर घिल्ड़ियाल ने एक पत्र जारी किया, जिसमें अंतरजातीय विवाह करने पर समाज कल्याण विभाग की तरफ से प्रोत्साहन के रूप में 50,000 रूपए की धनराशि दिए जाने का उल्लेख किया गया था।

इस प्रकरण के चर्चा में आते ही राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने प्रशासन को इस मामले की जाँच के आदेश दिए थे। सीएम रावत ने कहा कि इसकी जाँच की जाएगी कि किन परिस्थितियों में इस प्रेस रिलीज को जारी किया गया।

इस प्रेस रिलीज के सामने आने के बाद उत्तराखंड सरकार के आर्थिक सलाहकार आलोक भट्ट ने बताया था कि ये 1976 का उत्तराखंड का क़ानून है। उन्होंने बताया कि इस योजना के तहत पहले 10,000 रुपए की सहायता राशि मिलती थी, जिसे कॉन्ग्रेस की सरकार ने 2014 में बढ़ाकर 50,000 रुपए कर दिया। उन्होंने कहा कि राज्य में भाजपा से किसी ने भी अंतरधार्मिक विवाह को बढ़ावा देने की बात नहीं की है।

सीएम के मीडिया संयोजक दर्शन सिंह रावत ने जानकारी दी थी कि मुख्यमंत्री ने इस घटना को काफी गंभीरता से लिया है और चीफ सेक्रेटरी को जाँच का आदेश दिया है। सीएम ने कहा कि जब सरकार पूरी तरह जबरन धर्मान्तरण के बाद शादी के खिलाफ है, तो किन परिस्थितियों में ये प्रेस रिलीज जारी हुआ? इसके साथ ही इस योजना को अंतरधार्मिक के बजाय अंतरजातीय विवाह तक सीमित करने के भी आदेश जारी किए गए।

उन्होंने बताया अंतरजातीय/अंतरधार्मिक विवाह पर सहायता राशि देने की ये योजना उत्तराखंड के गठन से काफी पहले से ही मौजूद थी और उत्तर प्रदेश के क़ानून का हिस्सा थी, जिसे राज्य ने हूबहू ग्रहण कर लिया और अब तक ये ऐसा ही चला आ रहा है। दर्शन रावत ने कहा कि सरकार जल्द ही इस योजना को बंद करने पर विचार कर रही है, क्योंकि वो नहीं चाहती कि जबरन धर्मान्तरण के बाद होने वाली शादी से राज्य की शांति और सद्भाव को ठेस पहुँचे।

ज्ञात हो कि इस योजना पर इस पर ‘सुदर्शन न्यूज़ टीवी’ के मुख्य संपादक सुरेश चव्हाणके ने पूछा था कि ‘लव जिहाद’ करने वाले को सजा की जगह 50,000 का सरकारी इनाम दिया जा रहा है? उन्होंने पूछा कि देवभूमि उत्तराखंड में ये उल्टी गंगा क्यों बह रही है? उन्होंने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से पूछा था कि जब सारे राज्य ‘लव जिहाद’ के विरुद्ध कानून बना रहे तो उत्तराखंड में इसे बढ़ावा क्यों? उन्होंने आशंका जताई थी कि कोई ‘UPSC जिहाद’ वाला अधिकारी ही ऐसा करा रहा है।

उत्तराखंड राज्य ने वर्ष 2018 में ही ‘फ्रीडम ऑफ रिलीजन बिल’ पारित किया था। इसके तहत रुपयों के दम पर या किसी का जबरन धर्म परिवर्तन कराए जाने का दोषी पाए जाने पर दो साल तक की जेल का प्रावधान है। इसके साथ ही उत्तराखंड, ओडिशा, एमपी, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में शामिल हो गया, जहां दूसरे रूप में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू है।

दिल्ली में आंदोलन के बीच महाराष्ट्र के किसानों ने नए कृषि कानूनों की मदद से ₹10 करोड़ कमाए: जानें कैसे

पंजाब और हरियाणा के ‘किसान’ दिल्ली और उसके आस-पास विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, मार्ग अवरुद्ध कर रहे हैं। इस बीच महाराष्ट्र के किसानों ने सितंबर 2020 में केंद्र सरकार द्वारा पारित किए गए कृषि बिल का लाभ लेना शुरू कर दिया है।

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि सोयाबीन किसान कृषि बिलों के पारित होने के बाद एपीएमसी सौदों से अधिक प्राप्त करने में सफल रहे हैं। महाराष्ट्र में किसान उत्पादक कंपनियों (FPCs) की अम्ब्रेला संस्था MahaFPC के अनुसार, चार जिलों में FPCs ने तीन महीने पहले पारित हुए कानूनों के बाद मंडियों के बाहर व्यापार से लगभग 10 करोड़ रुपए कमाए हैं।

फार्म बिल APMCs के भयानक शक्तियों को रोकता है

कृषि कानूनों को पारित किए जाने से पहले, APMCs के विनियमित क्षेत्रों में किए गए व्यापार पर सहकारी समितियों ने APMCs को विनियमित किया था और इस तरह के लेनदेन पर मार्केट कर और अन्य करों को लगाया गया था। हालाँकि, किसान उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020, ऐसे विनियमों को हटाने के लिए  APMCs की शक्ति को खत्म कर देता है।

पिछले 3 महीनों में, एफपीसी ने अपने किसानों से सीधे खरीद के लिए खाद्य तेल विलायक, अर्क और पशु चारा निर्माताओं से व्यापार में वृद्धि को पंजीकृत किया है। इस प्रत्यक्ष लेन-देन ने परिवहन पर कम खर्च करके बढ़ी हुई बचत के मामले में किसानों की मदद की है। दूसरी ओर, कंपनियों ने मंडी कर का भुगतान नहीं करने का दावा किया है।

इस लेख के अनुसार, मराठवाड़ा के सबसे अधिक 19 एफपीसी में से 2693.58 टन कंपनियों के साथ मंडी व्यापार दर्ज किया गया है। इन 19 एफपीसी में से, लातूर से 13 ने 2165.863 टन की आपूर्ति की है। इसी तरह उस्मानाबाद के चार एफपीसी ने 412.327 टन की आपूर्ति की है। हिंगोली और नांदेड़ में एफपीसी ने क्रमश: 96.618 टन और 18.78 टन तिलहन की आपूर्ति निजी कंपनियों को की है।

नए कानून से कई लाभ, परिवहन लागत में बचत, वजन की कोई समस्या नहीं

नए कृषि कानून से लाभान्वित होने वाले किसानों में से एक ने कहा कि नए बिलों ने न केवल परिवहन लागत बचाने में किसानों की मदद की, बल्कि वजन का भी मुद्दा नहीं था। हालाँकि, उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) घोषित किए जाने के बाद बाजार की दर गिर जाने से कंपनियों ने खरीद बंद कर दी है।

किसानों ने दावा किया कि नए बिलों में कुछ भी विवादास्पद नहीं था, लेकिन उन्होंने सरकार को यह सुनिश्चित करने की सलाह दी कि गैर-एमएसपी खरीद मंडी के बाहर न हो। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करना चाहिए।

महाएफपीसी के प्रबंध निदेशक, योगेश थोराट ने व्यवस्था को समाप्त करते हुए कहा कि वर्तमान संरचना किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए रास्ते खोलती है और उन्हें “बेचने के लिए विकल्प” प्रदान करती है। किसानों के विरोध प्रदर्शन से उत्पन्न होने वाली आशंकाओं को खारिज करते हुए, थोराट ने कहा कि उन्होंने किसानों और कॉर्पोरेटों को एक-दूसरे के लिए प्रतिबद्धताओं का सम्मान करते हुए देखा है।

पंजाब और हरियाणा के किसानों द्वारा विरोध प्रदर्शन

इसके विपरीत, पंजाब और हरियाणा के हजारों किसानों ने मोदी सरकार द्वारा कथित-किसान विरोधी ’कानूनों को पारित करने के विरोध में राष्ट्रीय राजधानी की ओर कूच किया। राष्ट्रीय राजधानी को जाने वाली मुख्य मार्ग को किसानों ने अवरुद्ध कर दिया है। उन्होंने सरकार को बातचीत के लिए मजबूर करने के लिए राजमार्गों के किनारे विशाल शिविर लगाए हैं। किसान एमएसपी के मोर्चे पर गारंटी की माँग कर रहे हैं। उनमें से कई अपनी माँगों को लेकर काफी अधिक कट्टरपंथी दिख रहे हैं, जिन्होंने सरकार से तीनों कृषि बिलों को पूरी तरह से रद्द करने के लिए कहा है। इसमें खालिस्तानन समर्थक और कॉन्ग्रेस के लिंक भी सामने आ रहे हैं।

बाइडन-हैरिस ने ओबामा के साथ काम करने वाले माजू को बनाया टीम का खास हिस्सा, कई अन्य भारतीयों को भी अहम जिम्मेदारी

अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन और उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस ने अपने शपथ समारोह का कार्यभार भारतीय मूल के माजू वर्गीज़ को सौंपा है। शपथ ग्रहण समारोह में होने वाले उत्सवों में माजू को कार्यकारी निदेशक नियुक्त किया गया है। पेशे से वकील माजू ने जो बाइडन और कमला हैरिस के लिए चुनावों के दौरान प्रचार भी किया था। उनका लंबे समय से डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़ाव है।

बता दें कि अमेरिका में माजू 5वें ऐसे भारतीय हैं जिन्हें बाइडन और कमला हैरिस ने इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। उनसे पहले बाइडन ने औपचारिक रूप से नीरा टंडन को कार्यालय के प्रबंधन और बजट के निदेशक के रूप में नियुक्त करने की घोषणा की थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वर्गीज ने इन चुनावों में बाइडन-हैरिस के कैंपेन में चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर की जिम्मेदारी संभाली थी और वह पूर्व उप राष्ट्रपति के वरिष्ठ सलाहकार भी रह चुके हैं। इन चुनावों में उन्होंने राष्ट्रव्यापी स्तर पर कई मिलियन डॉलर खर्च करके बाइडेन की जीत सुनिश्चित की और सैंकड़ों कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ा।

‘किसान आंदोलन’ के बीच एक्टिव हुआ Pak, पंजाब के रास्ते आतंकी हमले के लिए चीन ने ISI को दिए ड्रोन्स’: ख़ुफ़िया रिपोर्ट

अब जब भारत की मुस्तैदी के कारण चीन सीमा पर सीधे संघर्ष में लगातार मात खा रहा है तो उसने पाकिस्तान वाला रवैया अपनाते हुए आतंकियों की मदद करनी शुरू कर दी है। पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठन और इसके इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) की नई साजिश है कि अब जम्मू कश्मीर के साथ-साथ पंजाब के रास्ते चीन के ड्रोन्स के माध्यम से खतरनाक हथियार व अन्य दहशत का साजो-सामान भेजा जाएगा।

HT की खबर के अनुसार, काउंटर टेरर ऑपरेशंस से जुड़े अधिकारियों ने जानकारी दी है कि आतंकवादी संगठन और ISI की ओर से ड्रग्स और हथियारों की तस्करी के लिए कुछ वर्षों तक छोटे ड्रोन्स के इस्तेमाल के बाद इन्होंने अपग्रेडेड ड्रोन्स की खरीददारी की है, जो अधिक मात्रा में हथियार और विस्फोटक सीमा के पार भेजने में सक्षम हैं। फ़िलहाल LOC पर भारी बर्फ़बारी हुई है और जिहादी आतंकी सीमा पार नहीं कर पा रहे हैं।

इसीलिए, अब चीन ने पाकिस्तान को अपने ड्रोन्स मुहैया कराने शुरू कर दिए हैं, ताकि उनका इस्तेमाल कर के पंजाब के रास्ते भारत में दहशत फैलाने की सामग्री भेजी जा सके। जम्मू कश्मीर में हाल के महीनों में जिस तरह से सुरक्षा बलों ने आतंकियों का सफाया शुरू किया है और विकास कार्यों के साथ-साथ DDC के चुनाव भी हुए हैं, उसने आतंकियों को परेशान कर दिया है और वो बड़े हमले की फिराक में लगे हुए हैं।

‘हिन्दुतान’ में प्रकाशित शिशिर गुप्ता की खबर के अनुसार, ख़ुफ़िया रिपोर्ट्स में सबसे बड़ा खुलासा ये हुआ है कि पाकिस्तान में मौजूद खालिस्तानी संगठनों को उनके आका पंजाब में हो रहे ‘किसान आंदोलन’ का फायदा उठाकर राज्य में दहशतगर्दी को दोबारा जिंदा करने के लिए तमाम तरह की साजिश रच रहे हैं। ‘किसान आंदोलन’ में जिस तरह से भारतीय प्रतीक चिह्नों का अपमान हुआ है और इस्लामी सक्रियता देखी गई है, उससे भी इस ख़ुफ़िया सूचना को बल मिलता है।

केवल पंजाब की ही बात करें तो अगस्त 12, 2019 से लेकर अब तक 4 चाइनीज ड्रोन्स जब्त किए जा चुके हैं। न सिर्फ इन चाइनीज कमर्शियल ड्रोन्स से सामान पहुँचाए जा सकते हैं, बल्कि अलर्ट में ये भी कहा गया है कि इनका इस्तेमाल कर सीमा पर तैनात भारतीय जवानों पर गोलीबारी भी हो सकती है। सीमा पर नजदीकी लक्ष्यों को निशाना बना कर हमले की भी आशंका है, जिसके बाद इस सम्बन्ध में सतर्कता बरती जा रही है।

लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के बड़े नेताओं के साथ अप्रैल 2020 में हुई बैठक में भी चाइनीज ड्रोन्स का इस्तेमाल कर के भारत पर हमला करने के विकल्प का खाका पेश किया गया था। POK के कोटली स्थित ब्रिगेड मुख्यालय में भी इस पर विचार-विमर्श हुआ था। अब जब धुंध का मौसम लगभग आ ही गया है, भारत भी एंटी-ड्रोन्स टेक्नोलॉजी को मजबूत करने में जुटा है। BSF ने जून में ऐसे ही एक बड़े ड्रोन को पकड़ा था।

अक्टूबर में भी खबर आई थी कि पाकिस्तान की फ़ौज अब आतंकियों को ड्रोन्स का इस्तेमाल कर के बम बरसाने की ट्रेनिंग दे रही है, ताकि जम्मू कश्मीर के हिस्सों को निशाना बनाया जा सके। ISIS सालों से इराक और सीरिया में क्वाडकॉप्टर ड्रोन्स की मदद से बमबारी कर के इस फॉर्मूले को आजमाता रहा है। ISIS ने इसी तरह से ‘Killer Bees’ के जरिए कई देशों में तबाही मचाई है और उसके ड्रोन्स को रोकने के लिए अमेरिका और कई ड्रोन बनाने वाली कंपनियों को नई तकनीकों पर काम करना पड़ा

BARC के रॉ डेटा के बिना ही ‘कुछ खास’ को बचाने के लिए जाँच करती रही मुंबई पुलिस: ED ने किए गंभीर खुलासे

10 दिन पहले प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने TRP मामले में प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट यानी ECIR दर्ज की। ECIR पुलिस एफआईआर के समतुल्य होती है। ईडी मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों और उन सभी चैनल की जाँच करेगी, जिनका उल्लेख ओरिजनल एफआईआर (FIR) में किया गया है।

10 दिनों के बाद, ऑपइंडिया को पता चला है कि ईडी ने पहले ही हंसा रिसर्च के अधिकारियों को तलब किया है, जिनके FIR के आधार पर मूल जाँच शुरू की गई थी। बता दें कि हंसा रिसर्च द्वारा की गई प्रारंभिक एफआईआर में इंडिया टुडे और कुछ स्थानीय चैनलों को कथित टीआरपी घोटाले में मुख्य आरोपित के रूप में दर्ज किया गया था। हालाँकि, मुंबई पुलिस कमिश्नर परम बीर सिंह ने इस एफआईआर के दर्ज होने के 48 घंटों के भीतर ही एक प्रेस कॉन्फ्रेंस किया और अर्णब गोस्वामी के मीडिया चैनल ‘रिपब्लिक टीवी’ पर टीआरपी घोटाले में शामिल होने का आरोप लगाया।

दिल्ली ईडी के सूत्रों के मुताबिक, ईडी द्वारा पूछताछ किए जाने के दौरान हंसा रिसर्च ने इंडिया टुडे का नाम लिया था न कि रिपब्लिक टीवी का। इसके अलावा, जब दो BARC अधिकारियों को तलब किया गया, एक उनके सतर्कता विभाग से और दूसरा IT विभाग से, दोनों ने यह बताया कि मुंबई पुलिस ने BARC से कोई भी रॉ डेटा नहीं लिया था।

यहाँ रॉ डेटा का मतलब लगाए गए बार-ओ-मीटर के डिटेल से है। हंसा रिसर्च समूह प्राइवेट लिमिटेड द्वारा की गई शिकायत में आरोप लगाया गया था कि BARC द्वारा लगाए गए बार-ओ मीटर के साथ बदलाव किए जाते हैं। यह समूह BARC द्वारा तैयार किए गए बार-ओ मीटर इंस्टॉल करता है। हंसा रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में इंडिया टुडे का नाम लिया। आरोप है कि वो जिन घरों में बार-ओ मीटर लगे हुए हैं उन्हें रुपए का लालच तक देते थे जिससे वह अपना टीवी चालू रखें। 

प्रवर्तन निदेशालय द्वारा BARC अधिकारियों की पूछताछ के दौरान यह प्रमुख चूक सामने आई, जो अब मनी लॉन्ड्रिंग एंगल से TRP के मामले में दिख रही है। BARC ने ED को बताया कि मुंबई पुलिस द्वारा बुलाए जाने के बावजूद, उन्होंने BARC के बुनियादी रॉ डेटा के लिए नहीं पूछा, जो कि इस जाँच का शुरुआती बिंदु होना चाहिए।

ईडी के सूत्रों ने यह भी खुलासा किया है कि BARC अधिकारियों को जाँच के लिए 48 घंटों के भीतर आँकड़ों के साथ तलब किया गया है। ऑपइंडिया को बताया गया है कि इस जाँच के पूरी हो जाने के बाद इंडिया टुडे के अधिकारियों को पूछताछ के लिए बुलाया जाएगा। 

गौरतलब है कि 8 अक्टूबर को आयोजित एक प्रेस वार्ता में मुंबई पुलिस कमिश्नर ने रिपब्लिक टीवी और अर्णब गोस्वामी पर कई गम्भीर आरोप लगाए थे। उन्होंने दावा किया था कि चैनल ने टीआरपी से जुड़ी जानकारी में बदलाव करने के लिए आम लोगों को पैसे दिए थे और उनसे कहा गया था कि वह उनका चैनल चलाकर अपना टीवी ऑन रखें।

हालाँकि, उसी दिन देर शाम तक रिपब्लिक टीवी ने सबूतों के साथ अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज करते हुए बताया कि असली रिपोर्ट में उनके चैनल का नाम कहीं भी नहीं है, बल्कि उन पर सवाल उठाने वाले इंडिया टुडे का नाम ओरिजनल एफआईआर में है। इसके बाद इंडिया टुडे और मुंबई पुलिस की मंशा पर सवाल खड़े हो गए। बाद में मुंबई पुलिस कमिश्नर को मानना भी पड़ा था कि एफआईआर में इंडिया टुडे का नाम है।

इंडिया टुडे शुरुआती जश्न मनाने केे बाद एफआईआर में नाम आते ही डैमेज कंट्रोल मोड में चला गया। राजदीप सरदेसाई मुंबई पुलिस से बात करते हुए एक बयान लेने की कोशिश कर रहे थे कि एफआईआर में इंडिया टुडे का नाम नहीं है। उन्होंने कहा, “यह बताने का प्रयास किया गया है कि एफआईआर में इंडिया टुडे का उल्लेख किया था” और फिर खुद को बेहतर बनाने और रिपब्लिक टीवी को फँसाने के लिए स्पष्टता की माँग की। हालाँकि, ज्वाइंट कमिश्नर ने स्वीकार किया कि वास्तव में एफआईआर में इंडिया टुडे का नाम था।

इस मामले में एक ऑडियो सामने आया था जिसमें मुख्य चश्मदीद तेजल सोलानी ने रिपब्लिक टीवी के पत्रकार से बात करते हुए कई बातें स्वीकार की थी। उसका कहना था कि उसके बेटे को टीआरपी में बदलाव के लिए इंडिया टुडे समूह से रुपए मिलते थे। तेजल सोलानी उन 5 लोगों के समूह में शामिल थे जिनके आधार पर टीआरपी के मामले में गिरफ्तारी हुई थी। एक और खुलासे के अनुसार विशाल भंडारी ने पूछताछ में बताया था कि ऑडिट टीम ने पैनल के एक घर का दौरा किया था। जिसके बाद वहाँ रहने वालों ने बताया कि उन्हें इंडिया टुडे 2 घंटे ज्यादा देखने के लिए भुगतान किया जाता था। 

FIR में इंडिया टुडे समूह का नाम शामिल होने की बात सामने आते ही उसे खूब फ़जीहत का सामना करना पड़ा था। चश्मदीद ने ऑडियो में स्पष्ट तौर पर इंडिया टुडे का नाम लिया था। एक ऐसे लोगों का समूह जिसकी अगुवाई राजदीप सरदेसाई जैसा व्यक्ति कर रहा हो उससे नैतिकता की आशा करना अप्रत्याशित है। इस बात की कल्पना की जा सकती कि ऐसे में आखिर किस तरह इंडिया टुडे समूह के लोगों को समझ होगी कि वह निरर्थक ख़बरें देना बंद करें।  

वहीं बार और बेंच की रिपोर्ट के अनुसार बॉम्बे हाई कोर्ट में दायर याचिका में हंसा रिसर्च ने आरोप लगाया था कि पुलिस उनके कर्मचारियों को फर्जी बयान जारी करने के लिए दबाव बनाने की रणनीति अपना रही है। साथ ही रिपब्लिक टीवी द्वारा जारी एक डॉक्यूमेंट को फर्जी करार देने के लिए कह रही है।

हंसा रिसर्च की रिपोर्ट, जिसके आधार पर टीआरपी मामले में एफआईआर दर्ज की गई थी, उसमे सिर्फ इंडिया टुडे के नाम का उल्लेख करते हुए कहा गया था कि इंडिया टुडे चैनल को देखने के लिए बार-ओ-मीटर वाले ने घरों को रिश्वत दिया था। वहीं पुलिस द्वारा लगाए गए आरोप के विपरीत इसमें रिपब्लिक का नाम नहीं था। इसके अलावा एफआईआर में भी इसका जिक्र नहीं है।

याचिका में कहा गया, “याचिकाकर्ताओं को लगातार क्राइम ब्रांच में लंबे समय तक रखा जाता है और गिरफ्तारी की धमकी दी जाती है और बार-बार झूठे बयान देने के लिए दबाव बनाया जाता है।”

याचिका हंसा समूह के निदेशक नरसिम्हन के स्वामी, सीईओ प्रवीण ओमप्रकाश और नितिन काशीनाथ देवकर की तरफ से दायर किया गया है। याचिका में कहा गया कि पुलिस को पहले ही बताया जा चुका है कि तथ्यों के आधार पर निर्णय लिया जा रहा है कि रिपब्लिक द्वारा दिखाए गए डॉक्यूमेंट सही है या नहीं।

हंसा द्वारा दायर याचिका में यह भी कहा गया है कि उनके अधिकारियों से बिना लिखित सूचना के पूछताछ की जा रही है और उन्हें दस्तावेज तैयार करने का समय भी नहीं दिया गया है। याचिकर्ताओ पर इसके लिए दबाव भी बनाया गया।

कंपनी का कहना था कि उसके कर्मचारियों को मुंबई पुलिस द्वारा परेशान किया गया, क्योंकि उन्होंने रिपब्लिक टीवी के खिलाफ गलत बयान देने से इनकार कर दिया था। हंसा रिसर्च ने यह भी बताया है कि यह टीआरपी हेरफेर मामले में वे शिकायतकर्ता थे और अब उन्हें ही पुलिस द्वारा परेशान किया जा रहा है।

यह सब इस तथ्य से जुड़ा है कि मुंबई पुलिस ने कथित तौर पर BARC से रॉ डेटा की माँग नहीं की है, जो कि जाँच का शुरुआती बिंदु होना चाहिए था। यह इस तथ्य की ओर इशारा करता है कि जाँच को रोक दिया गया है। अब ईडी तह में जाकर इस मामले की जाँच कर रही है।