चीन के साथ हालिया तनाव के बीच अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने बड़ी बात कही है। उन्होंने द हिंदू को दिए साक्षात्कार में कहा है कि अरुणाचल प्रदेश अपनी सीमा सिर्फ तिब्बत के साथ साझा करता है, चीन के साथ नहीं।
इस साक्षात्कार में उन्होंने फ्रंटियर हाइवे को लेकर मुख्य रूप से बात की है। उन्होंने कहा कि इस हाइवे के होने से युद्ध की स्थिति में सैनिकों को आवाजाही में दिक्कत नहीं आएगी। उन्होंने बताया है कि इस हाइवे का काम पहले धीमा था। लेकिन सशस्त्र बलों, बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन और अन्य स्टेकहोल्डर एजेंसियों के एक साथ आने के कारण 1,100 किमी LAC के साथ हाईवे बनाने के कार्य को गति मिली है।
गौरतलब है कि पेमा खांडू हमेशा से ही LAC को इंडो-तिब्बत बॉर्डर कहते आए हैं। यह पूछे जाने पर कि वह LAC को इंडो-तिब्बत बॉर्डर क्यों कहते हैं, उन्होंने कहा कि अरुणाचल प्रदेश ने अपनी सीमा सिर्फ तिब्बत के साथ साझा करता है। यह ऐतिहासिक तथ्य है और इसे कोई बदल नहीं सकता। पूरी दुनिया जानती है कि चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया है।
Q:You keep referring to the LAC as the India-Tibet border.. CM @PemaKhanduBJP :Arunachal has always shared its border with Tibet,not with China.This is an historical fact that none can erase.The world knows that China annexed Tibet. Intrvw by @rahconteurhttps://t.co/7IbCXAS4IJ
उन्होंने कहा कि यदि कोई 1962 के संघर्षों को देखता है और निराधार दावे करता है तो उनके लिए अपनी मातृभूमि को बचाना अनिवार्य है। उनकी मानें तो सीमा के कई खंड वास्तव में दुर्गम हैं। यही कारण है कि वह 1,100 किमी एलएसी के साथ फ्रंटियर हाईवे को बढ़ावा देने में जुटे हैं, जिससे सैनिकों की आवाजाही तेज हो।
उन्होंने बताया कि यह हाईवे पहले कई एजेंसियों के कारण सही दिशा में नहीं था। लेकिन अब इसमें बदलाव किया गया है ताकि सेना, इंडो-तिब्बत पुलिस, बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन और स्टेट एजेंसियों के पास इसकी क्वालिटी पर सोचने का समय हो। उन्होंने कहा कि पूर्वी हिमालय की नाजुक पारिस्थितियों के मद्देनजर कहना है कि इस बिंदु पर कॉर्डिनेशन बहुत ज्यादा जरूरी है।
मुख्यमंत्री के अनुसार भूस्खलन जैसे प्राकृतिक कारणों से यह प्रोजेक्ट काफी लागत वाला है। कई विदेशी फंडिंग एजेंसियाँ हैं जो कम ब्याज पर लोन देती हैं। इनसे भारत के कई राज्यों को फायदा हो रहा है। लेकिन चीन यह दावा करके कि अरुणाचल प्रदेश पर उसका अधिकार है लगातार फंड ब्लॉक करवा रहा है। मुख्यमंत्री के मुताबिक चीन के हस्तक्षेप के कारण एशियन डेवलपमेंट बैंक और अन्य बैंक उन्हें लोन देने से मना कर चुके हैं। हालाँकि केंद्र सरकार उन्हें मदद मुहैया करवा रही है।
इंटरव्यू में सीएम खांडू ने सुदूर क्षेत्रों में डिजिटल कनेक्टिविटी पर भी बात की और बताया कि टूरिज्म उनके प्रदेश की ताकत है। इसको बढ़ावा देने के लिए अच्छी सड़कें चाहिए। इंवेस्ट इंडिया के तहत एक स्पेशल डेस्क अरुणाचल प्रदेश के लिए बनाने का उन्हें भरोसा दिलाया गया है।
साक्षात्कार में उन्होंने अनुसूचित जातियों और पर्यावरण पर भी बात की। उन्होंने बताया कि सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी की ओर से प्रदेश को कहा गया था कि यहाँ 50,000 मेगावाट हाइड्रोपावर प्रोड्यूस करने की क्षमता है जो औद्योगिक सपने को पूरा करने की जरूरत है, लेकिन उन्हें प्रकृति की चिंता है। उन्होंने कई ऐसे प्रोजेक्ट्स को खत्म किया है जिन्हें सालों पहले साइन किया गया था, मगर वह सही नहीं थे या उनमें प्रोग्रेस नहीं हो रही थी। वह उन कार्यों पर अपना फोकस कर रहे हैं जो राज्य के लिए ठीक हैं।
जहाँ वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पहले से ही चीन की नाक में दम कर के रखे हुए हैं, वहीं अब वहाँ के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बायडेन से भी उसे डर लगने लगा है। कम्युनिस्ट सरकार के एक सलाहकार का कहना है कि चीन को इस ग़लतफ़हमी को दूर कर लेना चाहिए कि जो बायडेन प्रशासन के अंतर्गत उसके अमेरिका के साथ रिश्ते अपने-आप सुधरने लगेंगे। उसने चेताया कि उनके अंतर्गत अमेरिका अब चीन के खिलाफ और ज्यादा सख्त रवैया अपना सकता है।
‘साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट (SCMP)’ की खबर के अनुसार, शेनझेन स्थित थिंक टैंक ‘एडवांस इंस्टिट्यूट ऑफ ग्लोबल एंड कंटेम्पररी चाइना स्टडीज’ के डीन झेंग योंगनियाँ ने कहा कि चीन की सरकार को अमेरिका के साथ रिश्ते बेहतर करने के हर मौके का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने कहा कि चीन को इस सोच से बचना चाहिए कि अमेरिका के साथ उसके रिश्ते वैसे ही हो जाएँगे, जैसे डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने से पहले थे।
गुआंगझोउ में ‘अंडरस्टैंडिंग चाइना कॉन्फ्रेंस’ के इतर एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा, “वो अच्छे और पुराने दिन अब चले गए हैं। अमेरिका में जो शीत युद्ध की स्थिति है, वो कई वर्षों में अभी सबसे ज्यादा सक्रिय स्थिति में है। ये सब कुछ एक रात में नहीं ख़त्म होगा।”
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने यूएस-चीन रिश्तों को लेकर लम्बी रणनीति बनाने के लिए झेंग योंगनियाँ को विचार-विमर्श हेतु बुलाया था। SCMP के अनुसार, 40 साल पहले एक-दूसरे के देश में दूतावास स्थापित होने के बाद दोनों के रिश्ते सबसे बुरी स्थिति में हैं।
व्यापार, मानवाधिकार और कोरोना वायरस सहित कई मुद्दों पर दोनों देशों में नहीं बन रही है। Pew के सर्वे में पाया गया था कि 70% अमेरिकी चीन को पसंद नहीं करते हैं। चीनी सरकार के सलाहकार का कहना है कि व्हाइट हाउस में घुसते ही जो बायडेन जनता की इन भावनाओं का फायदा उठा सकते हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका के समाज के टुकड़े हो गए हैं और जो बायडेन अब कुछ नहीं कर सकते हैं। उन्होंने कहा:
“वो सचमुच एक काफी कमजोर राष्ट्रपति होंगे। वो तो घरेलू मुद्दों तक को भी नहीं सुलझा सकते हैं। इसी कारण वो कुछ कूटनीतिक स्तर पर करना चाहेंगे और वो होगा चीन के खिलाफ कुछ कार्रवाई करना। अगर हम कहते हैं कि ट्रम्प लोकतंत्र और आज़ादी को बढ़ावा देने में रुचि नहीं रखते हैं, बायडेन हैं। ट्रम्प युद्ध की इच्छा नहीं रखते हैं। लेकिन, नया डेमोक्रेट अमेरिकी राष्ट्रपति युद्ध शुरू कर सकता है। अंतर सिर्फ इतना है कि ट्रम्प एक कारोबारी हैं, जो ऐसे निर्णय लेते हैं जिसकी उम्मीद किसी को न हो।बायडेन क्या करेंगे, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। वो इलीट कूटनीतिज्ञ हैं।”
“Chinese government should utilise every opportunity to mend ties with the US,” said one of China’s top political scientist Zheng Yongnianhttps://t.co/b25XBCQlmO
उन्होंने आगे कहा कि जहाँ ट्रम्प चीन के प्रति बिना सोच-विचार किए ही सख्त हैं, बायडेन तर्कपूर्ण ढंग से सख्त रहेंगे। उन्होंने अमेरिका-चीन के बिगड़ते रिश्तों के लिए वहाँ के घरेलू मुद्दों को जिम्मेदार ठहराया। झेंग ने कहा कि अमेरिका ने जिस ‘नियो-लिबरल’ आर्थिक विकास मॉडल को अपनाया और बढ़ावा दिया, उसके कारण वहाँ संपत्ति का अंतर बढ़ता चला जा रहा है और उसने समाज को विभाजित कर दिया है।
उन्होंने दावा किया कि अमेरिका के आंतरिक मामले चीन के साथ रिश्तों को खराब करने के लिए जिम्मेदार हैं। उन्होंने हुवाई का उदाहरण दिया, जो चिप्स के लिए पहले अमेरिका पर निर्भर था लेकिन अब उसे नुकसान हो रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि चीन की कई कम्पनियाँ अमेरिका से ही कंपोनेंट्स लेकर वैश्विक बाजार में उससे तैयार उपकरण बेचती हैं। उन्होंने कहा कि चीन कई क्षेत्रीय व्यापारिक समझौतों के जरिए आगे रहने की कोशिश कर रहा है।
बता दें कि जो बायडेन ने तुर्की को लेकर भी कहा था कि वो एक ‘असली समस्या’ है और इसे लेकर वो उसे सख्त हिदायत जारी करते। जो बायडेन ने कहा था कि वो तुर्की को सबक सिखाते, भले ही इसके लिए उन्हें ‘सिचुएशन रूम’ में हजारों घंटे ही क्यों न व्यतीत करना पड़े या फिर सीरिया या ईराक में स्थिति सुधारने के लिए क्यों न कुछ भी करना पड़े। चुनाव प्रचार के समय ही उन्होंने साफ़ कर दिया था कि वो तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआँ (Erdogan) से बात कर उन्हें चेता देते कि उन्होंने जो कुछ भी किया है, इसके लिए उन्हें बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।
TRP मामले की जाँच ईडी (ED) के पास पहुँचने के बाद इस केस में बड़ी डेवलपमेंट सामने आ रही है। ईडी के सूत्रों से पता चला है कि इंडिया टुडे पहला चैनल होगा, जिसे इस मामले पर वह समन भेजेगी और पूछताछ करेगी।
बता दें कि यह पूछताछ मुंबई पुलिस के पास दर्ज एफआईआर पर आधारित होगी, जिसमें इंडिया टुडे का नाम लिखा हुआ है। ईडी पहले शिकायतकर्ता (हंसा रिसर्च) का बयान दर्ज करेगी और फिर इंडिया टुडे के एग्जीक्यूटिव्स को पूछताछ के लिए बुलाएगी।
गौरतलब है कि शुक्रवार (नवंबर 20, 2020) को केंद्रीय जाँच एजेंसी ईडी ने टीआरपी केस में प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट यानी ECIR दर्ज की थी। रिपब्लिक टीवी ने बताया था कि अब ईडी मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों के साथ-साथ उन सभी चैनल की जाँच करेगी, जिनका उल्लेख ओरिजनल एफआईआर (FIR) में किया गया है।
ईडी के अलावा इस केस में सीबीआई की जाँच भी चल रही है यानी ईडी दूसरी केंद्रीय जाँच एजेंसी है, जिसने केस दर्ज किया।
TRP केस
8 अक्टूबर को आयोजित एक प्रेस वार्ता में मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने टीआरपी घोटाले मामले में रिपब्लिक टीवी और उसके एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी पर कई गम्भीर आरोप लगाए थे। उन्होंने दावा किया था कि चैनल ने टीआरपी से जुड़ी जानकारी में बदलाव करने के लिए आम लोगों को पैसे दिए थे और उनसे कहा गया था कि वह उनका चैनल चलाकर अपना टीवी ऑन रखें।
हालाँकि, उसी दिन देर शाम तक रिपब्लिक टीवी ने सबूतों के साथ अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज करते हुए बताया कि असली रिपोर्ट में उनके चैनल का नाम कहीं भी नहीं है, बल्कि उन पर सवाल उठाने वाले इंडिया टुडे का नाम ओरिजनल एफआईआर में है। इसके बाद इंडिया टुडे और मुंबई पुलिस की मंशा पर सवाल खड़े हो गए थे। बाद में मुंबई पुलिस कमिशनर को मानना भी पड़ा था कि एफआईआर में इंडिया टुडे का नाम है।
दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार प्रदूषण की समस्या को लेकर कितनी ‘गंभीर’ है यह एक आरटीआई जवाब से फिर उजागर हुआ है। द संडे गार्जियन की खबर के अनुसार केजरीवाल सरकार ने बीते चार साल में पर्यावरण के नाम पर 883 करोड़ रुपए इकट्ठे किए हैं। लेकिन, प्रदूषण रोकने पर इस राशि का केवल 1.6 फीसदी ही खर्च किया गया है। यानी 883 करोड़ रुपए में से केवल 141,280,000 रुपए खर्च किए गए हैं।
यह चौंकाने वाला खुलासा दिल्ली सरकार के ट्रांसपोर्ट विभाग ने स्वयं संडे गार्जियन की आरटीआई के जवाब में किया है। विभाग द्वारा मुहैया करई गई जानकारी के मुताबिक दिल्ली सरकार ने साल 2017 में पर्यावरण कर के नाम पर 503 करोड़ रुपए, साल 2018 में 228 करोड़ रुपए और साल 2019 में 110 करोड़ रुपए इकट्ठा किए। इसके अलावा सरकार पर्यावरण उपकर के नाम पर साल 2020 में सितंबर तक 4 करोड़ रुपए जमा कर चुकी है।
रिपोर्ट बताती है कि पर्यावरण कर को दिल्ली सरकार क्षतिपूर्ति शुल्क के रूप में एकत्रित करती है। इसका एक बड़ा हिस्सा उन ट्रकों से लिया जाता है जो आए दिन दिल्ली में घुसते हैं और जिनके कारण प्रदूषण फैलता है। इस सूचना में आगे कहा गया है कि दिल्ली सरकार पर्यावरण उपकर का केवल बहुत छोटा हिस्सा सालों से प्रदूषण रोकने के लिए इस्तेमाल कर रही है।
आरटीआई यह भी बताती है कि दिल्ली सरकार ने पिछले चार सालों में सिर्फ 15 करोड़ 58 लाख रुपए पर्यावरण संरक्षण और साफ हवा के लिए खर्च किया है, जबकि साल 2017 में इकट्ठा हुए उपकर में से केजरीवाल सरकार ने एक रुपया भी खर्च नहीं किया है।
साल 2018 के कर में से 15 लाख रुपए एनएमवी (नॉन-मोटर व्हीकल) लेन के सुधार और रखरखाव के लिए खर्च किए गए थे और शहर में मार्शल के रूप में नागरिक सुरक्षा स्वयंसेवकों की तैनाती के लिए 43 करोड़ रुपए खर्च किया गया।
यहाँ याद दिला दें कि साल 2017 में आम आदमी पार्टी सरकार ने हाइड्रोजन पावर बस लाने का वादा किया था, लेकिन आरटीआई जवाब में बताया गया है कि साल 2019 तक इस पर सिर्फ 15 करोड़ खर्च हुआ है और 265 करोड़ रुपए दिल्ली-मेरठ रैपिड रेल ट्रांसपोर्ट प्रणाली के सुधार के लिए खर्च किया गया है।
साल 2017 में द न्यूज इंडियन एक्सप्रेस पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक फंड का सही उपयोग न कर पाने के कारण AAP सरकार को कॉन्ग्रेस तक घेर चुकी है। कॉन्ग्रेस नेता अजय माकन ने उस समय आरोप लगाया था कि दिल्ली सरकार फंड का सही प्रयोग नहीं कर पा रही है और न ही ट्रांसपोर्ट सुविधा सुधार रही है।
अब सोचने वाली बात है कि दिल्ली में आए दिन प्रदूषण के नाम पर पड़ोसी राज्यों को दोषी ठहराने वाली केजरीवाल सरकार का मकसद क्या है? आखिर क्यों हमें भ्रम में रख कर ऐसा दर्शाया जा रहा है कि सरकार प्रदूषण के लिए नित नए कदम उठा रही है, लेकिन उसे दूसरे लोग सहयोग नहीं कर रहे।
‘ऑड-ईवन’ से लेकर ‘रेड लाइट ऑन गाड़ी ऑफ’ तक का आह्वान करवाने के लिए दिल्ली सरकार जोर-शोर से जनता के सामने विज्ञापन करती है। लेकिन ऐसे प्रयोगों के नतीजे जब देने होते हैं तो दिल्ली की जनता का आभार व्यक्त करके उससे उनका ध्यान भटका दिया जाता है।
संडे गार्जियन की यह रिपोर्ट सवाल उठाती है कि आखिर क्यों प्रदूषण जैसी व्यापक समस्या से उभरने के लिए सरकार ने पर्याप्त कदम नहीं उठाए? आखिर क्यों आम आदमी पार्टी ने एक भी बार पर्यावरण के नाम पर इकट्ठा धनराशि का जवाब देना सही नहीं समझा? क्या केवल दिवाली पर पटाखे बैन से समस्या का समाधान हो जाएगा? क्या केवल ग्रीन दिल्ली एप लॉन्च करने से दिल्ली का AQI सुधर जाएगा?
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों का दिल्ली सरकार से पूछना है कि आखिर जब इस तरह जनता के पैसे खाने थे तो फिर ऑड-ईवन का नाटक क्यों किया गया था? एक यूजर तंज कसते हुए कहता है कि 1% प्रदूषण रोकने के लिए इस्तेमाल किया गया, क्योंकि बाकी का विज्ञापन पर यूज होना था।
The Aam Aadmi Party has collected over Rs 883 crore as environmental cess over the last four years, but has spent just 1.6% of the total environmental cess collected to tackle issues of pollution.
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ रविवार (नवंबर 22, 2020) को मिर्जापुर के दौरे पर थे और उन्होंने इस दौरान 11 गरीब परिवारों को गायें दान में दी। इन सभी गरीब परिवारों में कुपोषित बच्चे थे, जिनके भरण-पोषण और खान-पान के लिए सीएम योगी ने गायें दान में दी। गोपाष्टमी के मौके पर उन्होंने एक गोशाला में पूजा भी की। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में फ़िलहाल विभिन्न गोशाला में 5 लाख गायें हैं।
मुख्यमंत्री ने बताया कि इनमें से 65,000 से अधिक गाय पहले ही राज्य के कई गरीब परिवारों को दे दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि गोपाष्टमी को हमें गायों की सेवा के प्रति हमारी जिम्मेदारियों को याद करने के मौके के रूप में लेना चाहिए। एक अधिकारी ने बताया कि गरीबों को गाय देने से दो उद्देश्य पूरे होंगे – पहला, गायों के संरक्षण का काम होगा और दूसरा, कुपोषित बच्चों का खान-पान ठीक हो जाएगा। बच्चों का स्वास्थ्य ठीक होगा।
‘सहभागिता योजना’ के तहत उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार गाय की देखरेख करने वाले परिवारों को 900 रुपए प्रतिमाह की सहायता राशि देती है। अब तक इस योजना के तहत 66,257 गायें दान की जा चुकी हैं, जिनमें से 1071 गायें उन 1069 गरीब परिवारों को दी गईं, जिनमें कुपोषित बच्चे थे। मुख्यमंत्री ने मिर्जापुर में कहा कि ये अभियान समाज और राष्ट्र को के भविष्य को उज्जवल बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा है।
उन्होंने बताया कि इस अभियान के तहत सभी बेसहारा गायों को सरकारी गोशालों में लाया जा रहा है और अगर कोई भी किसान उनकी देखभाल के लिए उन्हें ले रहा है तो उसे 900 रुपए प्रतिमाह की सहायता राशि भी दी जा रही है। साथ ही हर महीने इस सिस्टम की समीक्षा भी की जाएगी। उन्होंने कई योजनाओं को जनता तक पहुँचाने के लिए महिलाओं और महिला स्वयंसेवी संस्थाओं की भी सराहना की। सीएम ने कहा कि समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए महिला सशक्तिकरण आवश्यक है।
मुख्यमंत्री ने मिर्जापुर के साथ-साथ सोनभद्र का भी दौरा किया। उन्होंने गोशाला में ही आयोजित कार्यक्रमों में स्वयंसेवी संस्थाओं की महिलाओं को चेक वितरण किया। उन्होंने कहा कि सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी न होने पर लोग इनका लाभ नहीं ले पाते। केंद्रीय जलशक्ति मंत्री राजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि हम अपनी पुरानी सभ्यता की ओर लौट रहे हैं और हमारे पूर्वज गाय को माता मान कर पूजते आए हैं और आज फिर इसी का आवश्यकता है।
इसी तरह मध्य प्रदेश में भी गौ कैबिनेट का गठन हुआ। भाजपा ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकल्प के रूप में गौ पालन के पीछे का कारण बताते हुए कहा कि ये एक ऐसा विकल्प है जो टिकाऊ है, क्योंकि पिछले 2000 वर्षों से भी अधिक समय से ऐसा होता आ रहा है। नई गाय आधारित अर्थव्यवस्था के जरिए मध्य प्रदेश की सरकार एक टिकाऊ इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करेगी, जिसके लिए गौ कैबिनेट का गठन किया गया है। साथ ही ग्रामीण सेटअप की आमदनी बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।
असदुद्दीन ओवैसी ने हैदराबाद के बाहर अपने पाँव पसारने क्या शुरू किए, जो वामपंथी पहले उनकी तारीफ करते नहीं थकते थे वो अब उनके खिलाफ हो गए। कोई उन्हें वोटकटवा कह रहा है तो कोई AIMIM की वजह से अन्य तथाकथित सेक्युलर पार्टियों को हो रहे नुकसान से चिंतित है। अब इस चर्चा में योगेंद्र यादव भी कूद गए हैं। BBC के एक वीडियो में उन्होंने भारत में मुस्लिम मतदाताओं की पसंद को लेकर भ्रामक दावे किए हैं।
महाराष्ट्र में AIMIM के विधायक रहे इम्तियाज जलील के हवाले से इस वीडियो में बताया गया है कि अगर देश में आज मुस्लिमों का कोई नेता है तो वो असाउद्दीन ओवैसी हैं। साथ ही वो पूछते हैं कि अगर उनके टक्कर में देश में कोई मुस्लिम नेता आया हो तो बताएँ। बिहार विधानसभा चुनाव में उनके हालिया प्रदर्शन का जिक्र करते हुए बताया कि अब वो एक महानगर की पार्टी न होकर देश भर में पाँव पसार रही है।
बता दें कि बिहार में AIMIM ने 5 सीटें जीती हैं, जो हैदराबाद के बाहर उसके लिए सबसे ज्यादा है। इसके बाद उन्होंने पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव में पूरी ताकत के साथ उतरने का फैसला लिया है, जिसके बाद कुछ लोग इसलिए परेशान हैं क्योंकि उन्हें आशंका है कि इससे ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस को नुकसान होगा। ममता ने अपने 10 साल के कार्यकाल में मुस्लिम तुष्टिकरण का एक भी मौका नहीं छोड़ा है।
अब ओवैसी ने तो TMC को गठबंधन के लिए न्यौता देकर अपना पास फेंक दिया है। ऐसे में BBC के इस वीडियो में बताया गया है कि कैसे CAA, NRC, बाबरी मस्जिद और इस्लाम से जुड़े अन्य मुद्दों पर वो संसद में सबसे ज्यादा ठीक तरीके से बात रखते हैं। वहीं कुछ मुस्लिम विश्लेषकों के हवाले से बताया गया है कि उनका आगे बढ़ना खतरनाक है और भारतीय मुस्लिमों को एक सेक्युलर सिस्टम ही चाहिए।
एक मुस्लिम विश्लेषक के हवाले से दावा किया गया है कि भाजपा चाहती है कि विपक्ष उसकी पसंद का ही होना चाहिए और असदुद्दीन ओवैसी के रूप में वो अपने लिए अपना पसंदीदा विपक्ष पैदा कर रही है। बताया गया कि ये एक ‘आज्ञाकारी विपक्ष’ है, और इसके लिए भाजपा ही जिम्मेदार है। अब आते हैं योगेंद्र यादव पर, जिन्होंने असदुद्दीन ओवैसी के प्रभाव के बढ़ने को ‘सेक्युलर राजनीति की हार’ और ‘सेक्युलर पार्टियों की विफलता’ करार दिया।
योगेंद्र यादव का कहना है कि बँटवारे के बाद मुस्लिमों ने कभी भी मुस्लिम पार्टियों को वोट नहीं दिया और न ही अपने प्रतिनिधित्व के लिए मुस्लिम नेताओं का सहारा लिया। बकौल योगेंद्र यादव, मुस्लिमों का मानना था कि जो पार्टी बहुसंख्यकों का ख्याल रख सकती है, वो मुस्लिमों के हितों के भी ख्याल रख सकती है। उन्होंने इसे ‘लोकतंत्र की खूबसूरती’ बताते हुए कहा कि इस देश की ‘सेक्युलर’ पार्टियों ने मुस्लिमों को ‘वोट का बंधक’ बनाने का प्रयास किया।
योगेंद्र यादव ने यहाँ बड़ी चालाकी से स्वतंत्रता के बाद की बात की है लेकिन आज़ादी से पहले की बात की भी चर्चा ज़रूरी है। 1945-46 में ब्रिटिश इंडिया में प्रांतीय चुनाव हुए थे। इस चुनाव में मुस्लिम लीग ने 87% मुस्लिम बहुल सीटें जीती थीं। अब इस बात पर सोचना चाहिए कि आखिर 1 साल में ही ऐसा क्या बदल गया, जो भारत के मुस्लिम अचानक से सेक्युलर हो गए और उन्होंने इस्लामी पार्टियों को वोट देना बंद कर दिया?
बीबीसी ने ओवैसी के बिहार में प्रदर्शन का किया विश्लेषण
तब बंगाल और पंजाब में मुस्लिम लीग ने क्रमशः 113 और 73 सीटें जीती थीं। अब ये तर्क दिया जा सकता है कि इन प्रांतों के बड़े हिस्से पाकिस्तान में चले गए। लेकिन, लीग ने बिहार में 34, असम में 31, बॉम्बे में 30 और मद्रास में 28 सीटों पर विजय प्राप्त की थी। ये प्रान्त तो आज भी भारत का हिस्सा हैं? क्या एक साल में ही भारत के मुस्लिम अचानक से सेक्युलर होकर इस्लामी पार्टियों के खिलाफ हो गए, ये सवाल तो बनता है।
मद्रास, ओडिशा और बॉम्बे की तो सारी की सारी मुस्लिम बहुल सीटें मुस्लिम लीग ने ही जीती थीं। अब योगेंद्र यादव, जो खुद को सेफोलॉजिस्ट बताते हैं, उनके दूसरे तर्कों पर आते हैं। आज़ादी के बाद भी जहाँ भी मौका मिला, वहाँ मुस्लिम पार्टियों ने मुस्लिम बहुल इलाकों में वोट पाया। हाँ, कई सीटों पर इस्लामी पार्टियों को इसीलिए सफलता नहीं मिली क्योंकि बड़े दलों के मुस्लिम उम्मीदवार मजबूत थे और उनके चेहरे पर ही वोट हुआ।
अब बिहार के किशनगंज सीट को ही ले लीजिए, जहाँ मुस्लिमों का सबसे ज्यादा प्रभाव है। यहाँ मुख्यतः कॉन्ग्रेस और उसके बाद राजद का ही कब्ज़ा रहा। लेकिन, अब तक हुए 16 चुनावों में मात्र एक बार ही यहाँ से कोई हिन्दू विजयी हुआ, वो भी 1967 में। क्यों? क्या ये नहीं माना जाए कि यहाँ मुस्लिमों ने अपने प्रतिनिधित्व के लिए हमेशा किसी मुस्लिम को ही पसंद किया? फिर ये एक मुस्लिम बहुल सीट तो योगेंद्र यादव के दावे को फेल ही कर देती है।
बिहार को छोड़िए, अब असम चलते हैं। वहाँ जब मुस्लिमों को विकल्प मिला तो उन्होंने बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF पर खूब प्यार बरसाया। खुद बदरुद्दीन अजमल जिस डुबरी लोक सभा क्षेत्र से जीते हैं, उसका ही इतिहास देख लीजिए। यहाँ अब तक हुए 16 चुनावों में एक बार भी कोई नॉन-मुस्लिम जीतने में कामयाब नहीं हो सका है। बदरुद्दीन खुद यहाँ से हैट्रिक लगा कर नाबाद खेल रहे हैं। इसे क्या समझा जाए? जहाँ कॉन्ग्रेस के मुस्लिम चेहरे जीतते थे, वहाँ मौका मिलते ही इस्लामी पार्टी को मुस्लिमों ने जिताया या नहीं?
खुद असदुद्दीन ओवैसी को ही देख लीजिए। हैदराबाद लोकसभा क्षेत्र से 1980 से इस परिवार का कब्ज़ा है। हैदराबाद की 7 विधानसभा सीटें असदुद्दीन ओवैसी के खाते में जाती रही हैं। यहाँ भी मुस्लिमों को जैसे ही मौका मिला, उन्होंने मुस्लिम चेहरे की पार्टी पर विश्वास जताया। इसलिए, ये कहना कि बिहार में ओवैसी की पार्टी की मुस्लिम बहुल सीटों पर सफलता एक अचानक हुई घटना है, तो ऐसा नहीं है। हैदराबाद में वो इसी बल पर अपना प्रदर्शन दोहराते रहे हैं।
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 482 में से 7 मुस्लिम उम्मीदवार दिए, एक भी नहीं जीत पाया। क्या ये ध्रुवीकरण का सबूत नहीं? बाद में यही विश्लेषक पूछते हैं कि फलाने सरकार में एक भी मुस्लिम मंत्री क्यों नहीं है? क्या 2014 में भाजपा ने आकर ध्रुवीकरण कर दिया, अचानक से? ऐसा नहीं है। भाजपा के उम्मीदवार मुस्लिम भले ही हों, मुस्लिमों के एक बड़े वर्ग के मन में ये बैठा रहता है कि इसके जीतने से बढ़ेगी तो भाजपा के सीटों की संख्या ही।
हिंदी बेल्ट और उत्तर-पूर्व के बाद अब दक्षिण भारत से भी एक उदाहरण देख लेते हैं। यहाँ केरल में पिछले 70 वर्षों से भी अधिक समय से ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML)’ नामक पार्टी सक्रिय है। क्या आप यकीन करेंगे कि इस पार्टी के पास केरल में 18 विधानसभा सीटें और 3 लोकसभा सीटें हैं। वायनाड में इसके समर्थन से राहुल गाँधी जीते। क्या योगेंद्र यादव इसे भी ‘मुस्लिम बहुल इलाके में नॉन-मुस्लिम’ की जीत मानते हैं?
कल को इस पार्टी के पास भी ओवैसी जैसा कोई बड़ा विवादित चेहरा मिल जाता है और ये किसी अन्य राज्य में चुनाव जीत जाती है तो इसे भी भाजपा की बी-टीम ही माना जाएगा? ऐसा हो सकता है, क्योंकि इस पार्टी के खिलाफ वामपंथी और लिबरल गिरोह तब तक चुप रहेंगे, जब तक ये कॉन्ग्रेस के साथ UDF गठबंधन में है। जैसे ही ये पाँव पसारेगी, कॉन्ग्रेस का वोट छिटकने के लिए इसे जिम्मेदार ठहराते हुए गालियाँ दी जाएँगी।
इसीलिए, इन तथाकथित विश्लेषकों की दिक्कत किसी मुस्लिम पार्टी के उभार से बिलकुल नहीं है। उन्हें असली दिक्कत भाजपा की जीत से है। उन्हें दिक्कत इस बात से है कि मुस्लिम कट्टरवादियों का प्रभाव बढ़ने के कारण हिन्दू भी एकजुट हुए हैं, जिसकी वो कभी उम्मीद नहीं करते थे। दिक्कत इस बात से है कि ये मुस्लिम समाज उन इस्लामी पार्टियों को समर्थन क्यों दे रहा है, जो कॉन्ग्रेस या किसी भाजपा-विरोधी बड़े दल के साथ गठबंधन में नहीं हैं।
असली परेशानी इससे है कि मुस्लिमों को जानबूझ कर हाशिए पर रख कर खुद को उनका रहनुमा बताने वाली पार्टियाँ हिन्दुओं के खिलाफ फैसले ले-ले कर मुस्लिम समाज को खुश करने की कोशिश करते रहे, और उनके दशकों के प्रयासों को भुला कर मुस्लिमों ने इस्लामी पार्टियों को वोट देना शुरू कर दिया है। मुस्लिम तुष्टिकरण की हदें पार चुकी ये पार्टियाँ और उनके चमचे इसे बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं।
मुस्लिम बहुल सीटों पर अगर कोई नॉन-मुस्लिम पार्टी जीती भी तो उसने वहाँ की मुस्लिम जनसंख्या के हिसाब से उम्मीदवार खड़े किए और अपने किसी बड़े मुस्लिम चेहरे को तरजीह देकर पार्टी कैडर को उसे जिताने में लगाया। आप गौर कीजिए, कॉन्ग्रेस, राजद, सपा, बसपा या तृणमूल जैसी पार्टियाँ मुस्लिम बहुल इलाकों में नॉन-मुस्लिम उम्मीदवार नहीं देती। क्यों? क्योंकि उन्हें पता है कि मुस्लिम समाज अपने बीच में ही प्रतिनिधित्व ढूँढता है। योगेंद्र यादव को भी पता होगा, लेकिन प्रपंच जो फैलाना है। योगेंद्र यादव तो सरदार पटेल के इस वीडियो को भी देखे होंगे लेकिन जनता को सब कुछ बताना क्यों?
मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने Netflix की उस सीरीज के खिलाफ जाँच का आदेश दिया है, जिसमें एक मुस्लिम युवक एक हिन्दू युवती को मंदिर में किस कर रहा है और बैकग्राउंड में भजन बज रहा है। गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने रविवार (नवंबर 22, 2020) को जानकारी दी कि मध्य प्रदेश पुलिस को इसकी जाँच करने को कहा है कि क्या Netflix का ‘द सूटेबल बॉय’ धार्मिक भावनाओं को आहत करता है।
मिश्रा ने इस ओर इशारा किया कि इस सीरीज के निर्माताओं के खिलाफ क़ानूनी कार्रवाई भी जा सकती है। भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) ने बताया है कि राज्य के महेश्वर शहर में स्थित एक मंदिर में इस दृश्य को फिल्माया गया था। संगठन ने रेवा पुलिस थाने में इसे खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई है। नरोत्तम मिश्रा ने स्पष्ट कहा कि ये आपत्तिजनक है और उनकी सोच है कि इससे धार्मिक भावनाएँ आहत होती हैं।
मिश्रा ने बताया कि उन्होंने पुलिस को निर्देश दिया है कि इस सीरीज के खिलाफ जाँच की जाए कि ये धार्मिक भावनाओं को आहत करता है या नहीं, ताकि निर्माता और निर्देशक के खिलाफ क़ानूनी कार्रवाई की जा सके। BJYM के महासचिव गौरव तिवारी ने बताया कि उन्होंने रेवा के एसपी राकेश कुमार सिंह को एक मेमोरेंडम देकर माँग की है कि निर्माता-निर्देशक को माफ़ी माँगने को कहा जाए और ये आपत्तिजनक दृश्य तुरंत हटाया जाए।
रेवा के एसपी ने बताया कि एक बार Netflix से इस सीरीज का वो फुटेज प्राप्त हो जाए, इसके बाद इस मामले में आगे की कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि जाँच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। साथ ही तिवारी का मेमोरेंडम मिलने की भी पुष्टि की। इस सीरीज का निर्देशन मीरा नायर ने किया है, जो ‘सलाम बॉम्बे’, ‘मानसून वेडिंग’ और ‘दी नेमसेक’ जैसी फिल्मों के लिए जानी जाती हैं। इन फिल्मों को समीक्षकों ने सराहा था।
ताज़ा वेब सीरीज की कहानी के केंद्र में है 1951 की एक लड़की, जिसके लिए उसकी माँ एक योग्य लड़के की तलाश में है। इस तलाश के दौरान ही सीरीज में भारत विभाजन से उपजी त्रासदी से लेकर धर्म का झगड़ा, मंदिर-मस्जिद, उस वक्त की राजनीति और बड़ी-बड़ी उलझनें लिए बहुत से शेड्स दिखते हैं। जहाँ ये दृश्य फिल्माया गया, उस महेश्वर घाट को रानी अहिल्याबाई होल्कर ने शिवभक्तों के लिए समर्पित किया था। पाषाण युग के हजारों शिवलिंग उसकी पहचान हैं।
नेटफ्लिक्स की प्रवृत्ति हमेशा से हिंदू विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देने की रही है। इसने ‘Ghoul’, ‘Sacred Games’ और ‘लैला’ के रूप में ऐसी कई वेब सीरिज बनाई है, जो हिंदू विरोधी भावनाओं को जन्म दे रही है और साथ ही इससे विश्व में हिंदू धर्म की नकारात्मक छवि पेश की जा रही है। लैला वेब सीरीज में सनातन धर्म के अनुयायियों को सबसे हिंसक और दमनकारी मानसिकता वाले लोगों के तौर पर दिखाया गया है, जो सिर्फ लोगों को बाँटकर उन पर राज करना चाहते हैं।
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में गत फरवरी में हुई हिंसा की साजिश के आरोप में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने JNU के पूर्व छात्र उमर खालिद और शरजील इमाम के ख़िलाफ UAPA के तहत 200 पन्नों की सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की है।
चार्जशीट के मुताबिक इन दंगों में खालिद का हाथ था। उसने दूर से इन दंगों को कंट्रोल किया था, जिसके कारण 53 लोगों की जान चली गई। उसने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे के दौरान इन दंगों को भड़काया, ताकि इस पूरे मामले को अंतरराष्ट्रीय कवरेज मिले और सीएए को लेकर सरकार पर दबाव बने।
विशेष न्यायाधीश अमिताभ रावत की अदालत में दायर की गई इस चार्जशीट में दंगों के दौरान खालिद और शरजील की भूमिका पर विस्तार से बताया गया है। इनके अलावा एक फैजान खान को भी आरोपित बनाया गया है। चार्जशीट में फैजान खान पर हिंसा में शामिल लोगों को फर्जी सिम कार्ड दिलवाने का आरोप है।
यह चार्जशीट आईपीसी की धारा 13/16/17/18 UAPA act, 120B, 109, 114,201, 124A, 147,148,149, 153A, 186, 420 समेत कई गंभीर धाराओं में दाखिल की गई है। अनुमान लगाया जा रहा है पुलिस जल्द से जल्द शेष आरोपितों के ख़िलाफ़ भी चार्जशीट दायर कर देगी।
दिल्ली पुलिस की ओर से करकड़डूमा कोर्ट में तकरीबन 930 पेज की चार्जशीट दाखिल की गई है। 930 पेज की चार्जशीट में 197 पेज चार्जशीट है, तो 733 पेज में दस्तावेज हैं। इसमें कहा गया कि खालिद ने सीएए के संसद में पास होते ही अपनी जैसी मानसिकता वाले लोगों को बढ़ावा दिया।
उसने जेएनयू के मुस्लिम स्टूडेंट ऑफ जेएनयू समूह को इमाम के जरिए मेंटॉर किया और फिर इसी समूह का इस्तेमाल दक्षिणी दिल्ली में हिंसा भडकाने के लिए किया। आगे उसी ने केंद्र सरकार से नफरत करने वाले विरोधियों को एक साथ जोड़ा, जिसकी वजह से दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप व्हॉट्सएप पर तैयार हुआ।
गौरतलब है कि इस पूरे मामले में अब तक 21 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। पहली और मुख्य चार्जशीट सितंबर में दाखिल हुई थी। इसमें 15 लोगों को अलग-अलग आरोपों के लिए आरोपित बनाया गया था। इसमें दंगे करवाने के लिए रची गई साजिश की विस्तार से जानकारी थी।
बीते 28 अक्टूबर को दिल्ली सरकार ने इसी मामले में खालिद और इमाम के ख़िलाफ़ यूएपीए के तहत मुकदमा चलाने की मंजूरी दी थी। अब खालिद को लेकर पुलिस का दावा है कि उसका उत्तर-पूर्वी दिल्ली में एक सीक्रेट ऑफिस था, जहाँ उसने साजिशकर्ताओं और दंगाइयों के साथ देर रात में बैठके की और बाद में इसी जगह बड़े पैमाने पर हिंसा हुई व कॉन्सटेबल रतन लाल को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
उसकी थ्योरी पर चर्चा करते हुए रिपोर्ट में बताया गया है, “उसका मानना था कि ट्रंप के साथ आ रहा अंतरराष्ट्रीय मीडिया दंगों को कवर करेगा, जिससे केंद्र सरकार की दुनिया भर में भारी फजीहत होगी। जाफराबाद और चांद बाद को दंगों का हॉटस्पॉट बनाने की साजिशकर्ताओं में उसकी शीर्ष भूमिका थी।”
यहाँ बता दें कि खालिद को क्राइम ब्रांच ने एक अन्य मामले में खजूरी खास से फरवरी में गिरफ्तार किया था। वह अपने भड़काऊ भाषण के बाद सबकी नजरों में आया था। उसके ख़िलाफ़ आर्म्स एक्ट के तहत फरवरी में भी मामला दर्ज हुआ था और 13 सितंबर से उसे तिहाड़ में रखा गया है।
9 नवंबर 2020 को केरल के एक चर्च में शादी होती है। शादी की फोटो पेपर में छपती है। फोटो वायरल हो जाती है। इस शादी पर बवाल होता है। बवाल इतना कि पादरी को माफी माँगनी होती है।
और यह सब होता है इसलिए क्योंकि चर्च में हुई यह शादी दो ईसाइयों के बीच नहीं थी। इस शादी में लड़की तो ईसाई थी लेकिन लड़का मुस्लिम था। चर्च की ऊपरी सत्ता को इस शादी से आपत्ति होती है और वो जवाब भी माँगता है।
केरल के सिरो मालाबार चर्च (Syro Malabar Church) को इस शादी से दिक्कत होती है। कोच्चि में स्थित कदवंथरा सेंट जोसेफ चर्च में जिस पादरी ने यह शादी करवाई, उससे और इस शादी में भाग लेने वाले एक अन्य पादरी से सवाल-जवाब पूछा गया।
मामला इतना बढ़ गया कि पादरी को माफी तक माँगनी पड़ी। इसका कारण यह रहा कि सिरो मालाबार चर्च के अनुसार कैनन कानूनों (Canon laws, ऐसा कानून जो चर्च के मिशन को पूरा करता है) का पालन इस शादी (लड़की ईसाई लेकिन लड़का मुस्लिम) में नहीं किया गया।
माफी माँगने वाले पादरी
इस शादी में सतना के पूर्व बिशप मार मैथ्यू वानीकिजक्केल (Mar Mathew Vaniakizhakkel) ने हिस्सा लिया था। बिशप के साथ लड़का-लड़की की फोटो ही बवाल का कारण बनी। इसके बाद इस शादी की जमकर आलोचना की गई। बिशप मार मैथ्यू ने अपनी गलती मानते हुए माफी माँग ली है।
कार्डिनल मार जॉर्ज एलेनचेरी (Cardinal Mar George Alencherry) ने इसके बाद जाँच का आदेश दिया। एर्नाकुलम-अंगमाली डायोसेक (Ernakulam-Angamaly diocese) के आर्कबिशप मार एंटोनी कारिल (Mar Antony Kariyil) से रिपोर्ट माँगी गई।
इतना ही नहीं, केरल कैथोलिक बिशप काउंसिल (KCBC) ने दोनों पादरियों (एक जिसने शादी करवाई, दूसरा जो शादी में उपस्थित रहा) पर कैनन कानूनों की धज्जियाँ उड़ाने का आरोप लगाया।
केरल में ‘लव जिहाद’ और कैथोलिक पादरी
केरल में कैथोलिक पादरियों के एक संगठन ने कहा कि ‘लव जिहाद’ एक वास्तविक समस्या है। केरल के चर्च ने इसके पीछे ISIS का हाथ बताते हुए कहा था कि ‘लव जिहाद’ के जरिए कई महिलाओं का जबरन धर्मान्तरण हो रहा है। इसके जवाब में PFI जैसे मुस्लिम संगठनों ने पादरियों को चुप रहने की सलाह दी थी, क्योंकि उन्हें लगता था कि इससे CAA के खिलाफ चल रहे उपद्रव को लेकर जोश में कमी आ जाएगी।
केरल के चर्च का कहना था कि कुछ महीनों पहले केरल के जिन 21 लोगों को ISIS में शामिल कराया गया था, उनमें से आधे ईसाई थे। पादरियों का कहना था कि ‘लव जिहाद’ से सांप्रदायिक सद्भाव की भावना को ठेस पहुँच रही है। उनका ये भी आरोप था कि केरल का पुलिस-प्रशासन इस खतरे से निपटने को गंभीर नहीं है।
CBI ने कर्नाटक के पूर्व मंत्री रौशन बेग को 4000 करोड़ रुपए के IMA स्कैम से जुड़े मामले में रविवार (नवंबर 22, 2020) को गिरफ्तार कर लिया। वो राज्य में कॉन्ग्रेस का सबसे बड़ा मुस्लिम चेहरा हुआ करते थे। सीबीआई ने पहले उन्हें समन किया और फिर सबूतों के आधार पर गिरफ्तार कर लिया। अब सोशल मीडिया में एक दुष्प्रचार फैलाया जा रहा है कि वो अब भाजपा के नेता हैं और कॉन्ग्रेस छोड़ कर वो भाजपा में आ गए थे।
उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने उनका कोरोना मेडिकल टेस्ट किया गया। उन्हें कोर्ट ने जुडिशल कस्टडी में भेज दिया, जिसके बाद उन्हें पराप्पना अग्रहारा स्थित बेंगलुरु सेन्ट्रल जेल में शिफ्ट कर दिया गया। उन्हें शाम के 7:45 बजे जेल के क्वारंटाइन सेंटर में भर्ती कराया गया। 14 दिनों बाद उन्हें रेगुलर बैरक में डाल दिया जाएगा। जुलाई 2019 में राज्य सरकार द्वारा गठित SIT ने उनसे पहली बार पूछताछ की थी, जिसके बाद ये मामला CBI के पास चला गया।
IMA के संस्थापक और एमडी मंसूर खान के बयानों के बाद इस मामले में रौशन बेग के शामिल होने के पक्के सबूत मिले थे और ये बह पता चला था कि उन्हें IMA से किकबैक भी मिले थे। तब फरार चल रहे मंसूर खान ने एक ऑडियो क्लिप जारी कर रौशन बेग को ही IMA प्रोजेक्ट के फेल होने के लिए जिम्मेदार ठहराया था। बाद में उसने SIT के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। जबकि रौशन बेग ने इसे मंसूर खान की साजिश बता दिया था।
रौशन बेग राजधानी बेंगलुरु के शिवजी नगर विधानसभा क्षेत्र से चुन कर आते रहे हैं। वो पहली बार 1985 में और दूसरी बार 1994 में जनता पार्टी के टिकट पर विधायक बने थे। इसके बाद उन्होंने कॉन्ग्रेस पार्टी के टिकट पर 2008, 13 और 18 का विधानसभा चुनाव जीत कर हैट्रिक लगाई। जुलाई 2019 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। तब राज्य में कॉन्ग्रेस-जेडीएस की सरकार चल रही थी। उससे पहले उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में कॉन्ग्रेस ने निलंबित कर दिया था।
रौशन बेग के भाजपा में होने को लेकर खूब फैलाया गया झूठ
पत्रकार अरविन्द गुनसेकर ने ट्वीट किया है कि रौशन बेग ने 2019 में कॉन्ग्रेस छोड़ कर भाजपा जॉइन कर ली थी। इसी तरह से पत्रकार डीपी सतीश ने भी यही झूठ फैलाया। एक ट्विटर यूजर ने तो यहाँ तक लिख दिया कि वो IMA स्कैम मामले में गिरफ़्तारी से बचने के लिए ही भाजपा में शामिल हुए थे। कुछ लोगों ने तो यहाँ तक आवाज़ उठाई कि उन्हें खबरों में ‘भाजपा नेता’ कहने की बजाए ‘पूर्व कॉन्ग्रेस विधायक’ क्यों कहा जा रहा है?
Mr. Roshan Baig resigned as MLA and from Congress Party in 2019 and openly supported BJP in Shivaji Nagar Assembly bypoll.
NDTV instead of referring him as BJP leader is calling him Ex Congress MLA.
सच्चाई जानने से पहले ये समझना ज़रूरी है कि कॉन्ग्रेस ने रौशन बेग को इसीलिए निलंबित नहीं किया था, क्योंकि उनका नाम IMA स्कैम में आया था। उन्हें राजनीतिक कारणों से निलंबित किया गया था। उन्होंने 2019 लोकसभा चुनाव में करारी हार के लिए पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया को जिम्मेदार ठहराया था और लगातार बड़े कॉन्ग्रेस नेताओं की आलोचना की थी। हाँ, उन्होंने भाजपा में शामिल होने की कोशिश ज़रूर की थी।
नवंबर 2019 में खबर आई थी कि रौशन बेग ने भाजपा में शामिल होने के लिए खूब हाथ-पाँव मारे लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर पार्टी ने उन्हें नहीं लिया। तब कर्नाटक के कुल 16 बर्खास्त विधायकों ने भाजपा का दामन थामा था और रौशन बेग उनमें अकेले थे, जिन्हें पार्टी ने एंट्री नहीं दी थी। भाजपा ने स्पष्ट कहा था कि वो रौशन बेग को पार्टी में नहीं चाहती। आलाकमान ने भी उनकी एंट्री बैन कर दी थी।
बावजूद इसके तीन बार कॉन्ग्रेस से विधायक बनने वाले और पार्टी की सरकार में मंत्री बनने वाले और हज समिति के अध्यक्ष के नाते पूरे राज्य में पार्टी का मुस्लिम चेहरा बनाए जाने वाले रौशन बेग को भाजपा से जोड़ा जा रहा है। उन्होंने सिनेमा के एक बड़े संगठन में भी स्थायी सदस्यता प्राप्त की और कई बड़े मंत्रालय संभाले। ये सब कॉन्ग्रेस राज में हुआ। भाजपा से उनका कभी कोई नाता रहा ही नहीं। इसीलिए उनके भाजपा में जाने वाली बातें झूठ हैं।
IMA ‘हलाल’ पोंजी घोटाले में आरोपित व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी विजय शंकर ने बेंगलुरु के अपने आवास पर जून 23, 2020 को आत्महत्या कर ली थी। SIT ने विजय शंकर को पिछले साल ₹1.5 करोड की रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया था। इसके बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया था। इस स्कैम कारण 40,000 से ज्यादा लोगों का नुकसान हुआ। लोगों को ज्यादा रिटर्न का लालच देकर फँसाया गया।