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100 साल पहले देवी अन्नपूर्णा की जो अद्वितीय मूर्ति वाराणसी के मंदिर से चुराई गई थी, वो स्वदेश आने को तैयार

भारत से एक मूर्ति चोरी हुई थी। वो मूर्ति देवी अन्नपूर्णा की थी। यह प्राचीन मूर्ति चोरी होकर एक कैनेडियन विश्वविद्यालय पहुँच गई। लेकिन अब यह मूर्ति वापस भारत आएगी। कैनेडियन विश्वविद्यालय ने इस सांस्कृतिक चोरी को सुधारने का निर्णय किया है।

यह मूर्ति देवी अन्नपूर्णा की है, जो धान्य अर्थात अन्न की अधिष्ठात्री तथा वाराणसी की रानी हैं। इस मूर्ति के एक हाथ में चम्मच और दूसरे में खीर की कटोरी दिखाई गई है। रिपोर्टों के अनुसार, इस मूर्ति को करीब एक सदी पूर्व वाराणसी के एक मंदिर से चुराया गया था और तब से उसे ‘यूनिवर्सिटी ऑफ़ रिजायना’ के ‘मैकेंज़ी आर्ट गैलरी’ में रखा गया था।

एक बयान में यूनिवर्सिटी ने कहा कि इस मामले को उनकी नज़र में दिव्या मेहरा नाम की एक कलाकार ने लाया। दिव्या मेहरा को इसकी खबर पत्रकार और इतिहासकार रहे नॉर्मन मैकेंज़ी, जिनके नाम पर यह यूनिवर्सिटी है, के स्थाई संग्रह से मिली।

दरअसल दिव्या ने यह पाया कि मैकेंज़ी की नज़र इस मूर्ति पर उनके 1913 के भारत दौरे के वक़्त पड़ी। मैकेंज़ी की इस मूर्ति को पाने की इच्छा को जानकार एक व्यक्ति ने उसके इशारे पर, वाराणसी में गंगा किनारे बसे एक मंदिर से इसे चुरा लिया था। अब यूनिवर्सिटी ने इस सांस्कृतिक चोरी को सुधारने का निर्णय किया है।

यूनिवर्सिटी ने स्वेच्छा से मूर्ति वापस देने का किया निश्चय

19 नवम्बर को एक वर्चुअल समारोह के दौरान, यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर और इंटरिम प्रेसिडेंट डॉ थॉमस चेस कनाडा के भारतीय हाई कमिशनर अजय बिसारिया से मिले। यह इसलिए ताकि मूर्ति को आधिकारिक तौर पर स्वदेश भेजा जा सके। इस समारोह में कनाडा बॉर्डर सर्विसेज़ एजेंसी, मैकेंज़ी आर्ट गैलरी और ग्लोबल अफेयर्स कनाडा के कई प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

अजय बिसारिया ने कहा, “हम खुश हैं कि अन्नपूर्णा की यह अद्वितीय मूर्ति अब अपने घर जाने को है। भारत की इस सांस्कृतिक प्रतिमा को वापस करने की और यूनिवर्सिटी ऑफ़ रिजायना के इस सक्रिय जुड़ाव के लिए मैं इनका आभारी हूँ। स्वेच्छा से इस सांस्कृतिक निधि को लौटाने का कदम परिपक्वता तथा भारत-कनाडा के गहरे सम्बन्ध को दर्शाता है।”

यूनिवर्सिटी ऑफिशल्स का आधिकारिक बयान

वाइस चांसलर चेस ने कहा, “विश्वविद्यालय होने के नाते, ऐतिहासिक गलतियों को यथासंभव सुधारना हमारा कर्त्तव्य है। इस मूर्ति का एक सदी पहले यहाँ आने में जो गलती हुई, उसका प्रायश्चित तो नहीं हो सकता, परन्तु यह किया जाना आज सटीक एवं महत्वपूर्ण है। इसे संभव बनाने में मैकेंज़ी आर्ट गैलरी, भारतीय उच्चायोग तथा कनाडा के विरासत विभाग की भूमिका का मैं शुक्रगुज़ार हूँ।”

यूनिवर्सिटी ऑफ़ रिजायना के प्रेसिडेंट्स आर्ट कलेक्शन के संग्रहाध्यक्ष ऐलेक्स किंग ने कहा, “मूर्ति अन्नपूर्णा का प्रत्यावर्तन लम्बे समय से बातचीत का हिस्सा है। सांस्कृतिक विरासतों के प्रबंधक होने के नाते, सम्मानपूर्वक और नैतिक रूप से कार्य करना हमारा मौलिक कर्त्तव्य है और इसी प्रकार हमारे अपने संस्थागत इतिहास को गंभीर रूप से देखने की इच्छा भी।”

‘लव जिहाद’ की जगह ‘ग्रूमिंग जिहाद’ – आखिर क्यों ऑपइंडिया ने लिया इसे इस्तेमाल करने का फैसला

‘लव जिहाद’ के एक गंभीर मामले में सोनभद्र में एक लड़की के इस्लाम धर्म में परिवर्तित होने से इनकार करने पर उसका सिर काटकर दफना दिया गया। लड़की के विघटित शव के बारे में तब पता चला, जब एक महिला ने एक कुत्ते को लड़की के कटे हुए सिर को मुँह में दबाकर ले जाते देखा।

इसी तरह हरियाणा में, तौसीफ नाम के युवक ने निकिता तोमर की हत्या कर दी। आरोपित अपने दोस्तों के साथ कार में सवार होकर छात्रा के अपहरण के इरादे से आया था। आरोपित तौसीफ ने निकिता को गाड़ी में खींचने की कोशिश की लेकिन जब वो असफल रहा तो उसने गोली मार दी। यह पूरी घटना CCTV में भी कैद हो गई। मृतका निकिता बीकॉम फाइनल ईयर की छात्रा थी और अग्रवाल कॉलेज में एग्जाम देने आई थी।

पीड़िता के पिता ने दावा किया था कि आरोपित तौसीफ ही नहीं बल्कि उसकी माँ भी उनकी बेटी निकिता पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाती रहती थी। यह सिलसिला बीते दो साल से चल रहा था। छात्रा के पिता ने आरोपित तौसीफ की माँ पर आरोप लगाया कि वह बार-बार फोन कर के उनकी बेटी पर दबाव डालती थी कि तुम हमारा मजहब कबूल कर लो। कौशांबी रेप मामले में पीड़िता ने बलात्कारियों से अल्लाह के नाम पर रहम की भीख माँगी थी।

इनकी बर्बरता यहीं पर खत्म नहीं होती। ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जब मजहबी युवक हिंदू बनने का ढोंग करके अपनी पहचान छुपाकर हिंदू लड़की से शादी कर लेते हैं। और जब अचानक से या फिर उसके नाटक के अनुसार इसका खुलासा होता है तो वो लड़की पर इस्लाम में परिवर्तित होने के लिए दबाव डालते हैं, मना करने पर उनकी हत्या कर दी जाती है। सुभोलोग्ना चक्रवर्ती तो याद ही होगी आपको, जिसकी हत्या उसके होने वाले पति ने गोली मारकर कर दी थी। उसने भी हिंदू बनने का ढोंग रचा था।

हालाँकि वामपंथी इन घटनाओं को ‘दक्षिणपंथी कल्पना’ के रूप में खारिज करते हैं, लेकिन मामले वास्तविक हैं। शव भी असली हैं और खतरा व्याप्त है।

कैसे-कैसे मामले, देखें वर्गीकरण:

  1. एक व्यक्ति हिंदू होने का ढोंग करता है और हिंदू महिला को फँसाता है। इसके बाद, उसकी असली पहचान या तो एक दुर्घटनावश सामने आ जाती है या फिर इसका खुलासा तब होता है, जब वो महिलाओं को इस्लाम में परिवर्तित होने के लिए मजबूर करते हैं। इसके बाद इनकार करने पर वह हिंदू महिला की हत्या कर देता है।
  2. हिंदू युवती और दूसरे मजहब का युवक, दोनों एक दूसरे के धर्म के बारे में जानते हुए भी शादी करते हैं और फिर बाद में युवती को इस्लाम में परिवर्तित होने के लिए टॉर्चर किया जाता है।
  3. इस्लाम के नाम पर हिंदू महिला के साथ बलात्कार किया जाता है – यह मामला कौशांबी सामूहिक बलात्कार मामले में सबसे स्पष्ट था, जहाँ एक नाबालिग हिंदू लड़की के साथ बलात्कार किया गया था और अल्लाह के नाम पर रहम की भीख माँगने के लिए कहा गया था। अपराधियों ने विशेष रूप से लड़की को भगवान के नाम पर दया की भीख माँगने के लिए नहीं कहा। वायरल वीडियो में साफ सुनाई पड़ रहा था कि पीड़िता दलित नाबालिग लड़की उन दरिंदों को “भैया आप मुझे जानते हो, अल्लाह के लिए छोड़ दो” कह-कहकर गिड़गिड़ा रही थी। मगर फिर भी दरिंदों को रहम नहीं आया। वह रोती, चीखती, चिल्लाती रही और आदिल, नजिक जैसे दरिंदे उसकी चीख को फिल्माते रहे। इन मामलों में उद्देश्य या तो हिंदू महिला का रूपांतरण हो सकता है या फिर इसे काफिर महिलाओं को दंडित किए जाने के रूप में देखा जा सकता है।
  4. कई बार दूसरे मजहब के लड़कों का हिंदू लड़कियों के प्रति एकतरफा जुनून भी उनके लिए बलात्कार, हत्या जैसी बर्बरता का कारण बनता है। जब हिंदू लड़की दूसरे मजहब के लड़के के प्रपोजल को इनकार कर देती है तो इस तरह के कृत्यों को अंजाम दिया जाता है। इनकार करने वाले मामलों में इस्लाम में धर्मांतरण से इनकार भी शामिल है, जैसे निकिता तोमर के मामले में। हालाँकि इस्लाम में धर्मांतरण के बिना भी इन मामलों को व्यापक रूप से जिहाद के एक अधिनियम के रूप में देखा गया है।
  5. ऐसे मामले जब हिंदू महिला या कम उम्र की लड़कियों का बलात्कार करने के बाद समुदाय विशेष के पुरुषों से शादी कर उन्हें इस्लाम में परिवर्तित कर दिया जाता है। ऐसे मामले इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान और अन्य जगहों पर सबसे ज्यादा देखे जाते हैं। इस तरह के मामले में अक्सर देखा गया है कि शादी और धर्मांतरण के बाद लड़की कहती है कि उसने अपनी मर्जी से धर्म परिवर्तन किया है। ऐसा ही एक मामला हाल ही में पाकिस्तान में देखा गया था, जहाँ एक 13 वर्षीय ईसाई लड़की को उसके 44 वर्षीय अपहरणकर्ता को सौंप दिया गया और माता-पिता के विरोध के बाद उसने दावा किया कि उसने स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन किया था। इस तरह के मामलों में, ब्रिटेन के ग्रूमिंग गैंग के समानांतर यह समझना आवश्यक हो जाता है कि लड़की के बयान मात्र से हमें ऐसा नहीं मान लेना चाहिए कि यहाँ जिहाद का कोई एंगल नहीं था।

यहाँ बता दें कि ग्रूमिंग गैंग पूरे ब्रिटेन में फैला हुआ है। पिछले 40 वर्षों में अकेले ब्रिटेन में जिन करीब 5 लाख लड़कियों का बलात्कार किया गया, उनमें से अधिकतर गोरे हैं और उन्हें शिकार बनाने वाले मुख्य रूप से मजहब विशेष के एशियाई हैं। ग्रूमिंग गैंग जातीय और धार्मिक आधार पर रेप की वारदात को अंजाम देते हैं। ग्रूमिंग ग्रुप मुख्य रूप से कम उम्र की लड़कियों को निशाना बनाता है, लेकिन युवा और वृद्ध महिलाओं को भी अपना शिकार बनाते हैं।

दूसरे धर्म की महिलाएँ ऐतिहासिक रूप से इस्लामी अधीनता के केंद्र में रही हैं। महिलाओं को बंदी बनाए जाने या यहाँ तक ​​कि उनके शवों को हिंदू भूमि पर इस्लामिक विजय और हिंदू शासकों की हार के बाद भी बंधक बनाए जाने की कई कहानियाँ हैं। समकालीन परिवेश में भोला हत्याकांड दिमाग में आता है।

अक्टूबर 2001 में, भोला जिलों, लालमोहन क्षेत्र में, कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं पर हमला किया गया था। हमलावर हिंदू घरों में घुस गए, उनके सामान लूट लिए, उनके पेड़ काट दिए, उनकी फसल नष्ट कर दी। भोला के चार फैसन में बीएनपी समर्थित कट्टरपंथियों ने 200 से अधिक हिंदू महिलाओं पर हमला किया और उनका बलात्कार किया। सबसे कम उम्र की पीड़िता 8 साल की थी और सबसे बड़ी 70 वर्षीय महिला थी।

इसके सालों बाद, बांग्लादेश में एक न्यायिक आयोग की जाँच ने निष्कर्ष निकाला था कि तत्कालीन सत्तारूढ़ बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के 25,000 से अधिक नेता और स्थानीय पार्टी कार्यकर्ता हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमले में शामिल थे, जिसके कारण सैकड़ों लोग मारे गए, घायल हुए और बांग्लादेश में हिंदुओं को भारत में भागने के लिए मजबूर किया था।

भोला एकमात्र उदाहरण नहीं है। भारत में ऐसे कई मामले हैं, जहाँ मजहब विशेष वाले दूसरे धर्म की महिलाओं को अपने जिहाद में एक आवश्यक मोहरे के रूप में इस्तेमाल करते हैं। 2018 में, एक व्यक्ति को अपनी पत्नी को इस्लाम में बदलने के लिए मजबूर करने और फिर उसे आईएसआईएस सेक्स स्लेव बनने के लिए बेचने के प्रयास के आरोप में हिरासत में लिया गया था। 2018 में केरल से कई ऐसे मामले सामने आए हैं। यहाँ तक कि ईसाई समुदाय ने भी आवाज उठाई है।

जर्मनी में समुदाय विशेष के पुरुषों के होर्ड्स ने छेड़छाड़ की और दूसरे धर्म की महिलाओं से बलात्कार करने का प्रयास किया। पुरुष पहले पीड़ित को घेरे में लेते हैं। कुछ लोग उसका यौन उत्पीड़न करते हैं।

यूनाइटेड किंगडम में ग्रूमिंग गैंग द्वारा किए जा रहे घटनाओं की काफी हद तक भारत में रिपोर्टिंग नहीं की जाती, जबकि भारत जिहाद का बड़ा शिकार बनता जा रहा है। ग्रूमिंग गैंग मुख्य रूप से ब्रिटेन में समुदाय विशेष के पुरुषों का गिरोह होता है, जो युवा लड़कियों और यहाँ तक कि महिलाओं का भी शिकार करते हैं। उनका धर्म जानने के बाद दूसरे धर्म का होने की सजा के रूप में बार-बार उनका बलात्कार करते हैं। ब्रिटेन में कई लोगों ने इसे ‘रेप जिहाद’ का नाम दिया लेकिन अधिकारियों ने नस्लभेदी होने के आरोपों के डर से इन गिरोहों के खिलाफ निर्णायक रूप से कार्य करने से इनकार कर दिया।

पीटर मैक्लॉघलिन ने अपनी पुस्तक ‘Easy Meat’ में बताया कि सिख समूह इस घटना से अवगत थे और वो सभी को चेतावनी देने की कोशिश कर रहे थे। सिख मध्यस्थता और पुनर्वास टीम के चैरिटी के एक अध्ययन के अनुसार, पाकिस्तानी पुरुष दशकों से ब्रिटेन में सिख लड़कियों को यौन शोषण और बलात्कार के लिए तैयार कर रहे हैं।

अध्ययन में यह भी दावा किया गया है कि पुलिस ने राजनीतिक शुद्धता के कारणों के बारे में ‘लापरवाही से शिकायतों’ की अनदेखी की है। इस रिपोर्ट को डेली मेल द्वारा एक्सेस किया गया था। इसमें कहा गया है, “शोध में पाया गया है कि 50 वर्षों से अधिक समय से युवा सिख महिलाओं को निशाना बनाने वाले पाकिस्तानी दूतावासों के इतिहास का प्रदर्शन किया जाता है।”

रिपोर्ट में कहा गया है कि खतरे को पहचानने में स्थानीय अधिकारियों की विफलता ने ऐसे नेटवर्क को पनपने दिया है। इसमें कहा गया है, “तीन दशकों के दौरान, वेस्ट मिडलैंड्स में सिख समुदाय के नेताओं ने बार-बार जोर देकर कहा कि जब परिवार या समुदाय के प्रतिनिधियों ने बच्चों के साथ दुर्व्यवहार के बारे में पुलिस से संपर्क किया, तो उनकी प्रतिक्रिया उदासीन ही रही।”

ग्रेटर मैनचेस्टर के मेयर एंडी बर्नहैम द्वारा पुलिस और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ऐतिहासिक विफलताओं की जाँच करने के लिए अधिकृत रिपोर्ट के अनुसार, 2000 के दशक में दक्षिण मैनचेस्टर में 57 युवा लड़कियों का शोषण करने का आरोप है। रिपोर्ट में कहा गया है कि गैंग में मुख्य रूप से एशियाई पुरुष शामिल थे, जिन्होंने पीड़ितों को ड्रग्स दिया और फिर उनका यौन शोषण किया। एक 50 वर्षीय व्यक्ति द्वारा हेरोइन के इंजेक्शन लगाने के बाद 15 साल की एक लड़की की मौत हो गई। दो साल बाद इसकी रिपोर्ट आई।

ब्रिटेन में ग्रूमिंग गैंग में जो कुछ हुआ, वह सभी के लिए स्पष्ट था, लेकिन समुदाय विशेष के सदस्यों द्वारा किए गए अपराधों पर पानी फेरने की इच्छा रखने वाले – मुस्लिम पुरुष गैर-मुस्लिम लड़कियों और महिलाओं को ‘जिहाद’ के लिए उकसा रहे थे। कई लोगों ने इसे ‘रेप जिहाद’ कहा है।

इन लड़कियों, सिखों, हिंदुओं और सफेद लड़कियों का ब्रेनवॉश किया गया, बलात्कार किया गया, ड्रग्स का इंजेक्शन लगाया गया, कुछ को मार दिया गया या धर्मांतरित कर दिया गया। उन्हें अनिवार्य रूप से गैर-मुस्लिम होने के लिए दंडित किया गया। इसी तरह का एक मामला भारत में भी हुआ था – अजमेर दरगाह का, जहाँ 1992 में दूसरे धर्म की सैकड़ों लड़कियों का यौन शोषण किया गया था। इस मामले पर लोग अभी भी नि:शब्द हैं, इस तरह के मामलों की जड़ पर कोई वास्तविक चर्चा नहीं होती है। 

भारत में, अब हम जिस एकमात्र संगठित सिंडिकेट की बात करते हैं, वह ‘लव जिहाद’ की घटना है।

NIA ने 2017 में अपनी एक रिपोर्ट में कहा था, “केरल से रिपोर्ट किए गए मामलों से एक ही तरह के पैटर्न का इस्तेमाल किया गया है। कई मामलों में, जो व्यक्ति युवा लड़कियों के करीब आने में भूमिका निभाते हैं, वे उन्हें धर्मांतरण में मदद करते हैं, उन्हें आश्रय देते हैं और उनकी शादी समुदाय विशेष से करवाते हैं, वे एक ही शख्स होता है। वे ऐसे युवा लड़कियों से संपर्क करने लगते हैं, जो माता-पिता के साथ असहमति के कारण थोड़ी परेशान दिखाई देती हैं।

NIA ने ‘लव जिहाद’ को जिस तरह से परिभाषित किया, वह ब्रिटेन के ग्रूमिंग गैंग से काफी मेल खाती है। हालाँकि, अपराधों की कई अन्य श्रेणियाँ हैं, जो ‘लव जिहाद’ की संकीर्ण परिभाषा में फिट नहीं हैं।

अब, जब एक मजहब विशेष का पुरुष एक महिला को उसके साथ संबंध बनाने के लिए ‘लालच’ देता है, तो यह पूरी तरह से संभव है कि शादी के बाद वह लड़की कहती है कि वह स्वेच्छा से परिवर्तित हो गई। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि 14 साल की एक लड़की आर्थिक रूप से बेहद कमजोर परिवार से आती है तो एक बड़े आदमी का उसे फुसलाना कितना मुश्किल है? भले ही वह उसे अच्छी जिंदगी देने में सक्षम हो और उसे विश्वास दिलाए कि वह वास्तव में उसका परवाह करता है तो भी इसका मतलब यह नहीं हो सकता है कि बच्ची का ब्रेनवॉश करके उसे इस्लाम में परिवर्तित करे।

क्या तहर्रुश जैसा अपराध, या ऐसा जैसा हमने भोला में देखा, ‘लव जिहाद’ माना जाएगा? यहाँ तक कि निकिता तोमर की हत्या को ‘लव जिहाद’ कहा जाएगा क्योंकि निकिता और उसका कातिल कभी भी रिश्ते में नहीं थे और उसकी हत्या न केवल इसलिए कर दी गई क्योंकि उसने उसके प्रपोजल को ठुकरा दिया बल्कि इस्लाम में परिवर्तित होने से भी इनकार कर दिया।

यह ‘लव जिहाद’ जैसे शब्द की संकीर्ण परिभाषा के कारण है कि वामपंथी अब यह आरोप लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि लव जिहाद शब्द का उपयोग केवल इसलिए किया जाता है क्योंकि ‘चरमपंथी हिंदू’ अंतर-धार्मिक विवाह के खिलाफ हैं, जबकि, यह इससे कोसों दूर है।

यही कारण है कि ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट में ‘लव जिहाद’ शब्द के इस्तेमाल से दूरी बनाने का फैसला किया है। जिहाद में कोई ‘लव’ नहीं है और अगर इस शब्द को इसके जटिल वाक्य-विन्यास के साथ स्वीकार करते हैं, तो यह जिहाद की गंभीरता को दिखाने में विफल रहता है, जो कट्टरपंथी वर्गों द्वारा विशेष रूप से दूसरे मजहब की महिलाओं को निशाना बनाता है। हमारा मानना है कि इसके लिए ‘ग्रूमिंग जिहाद’ शब्द कहीं अधिक उपयुक्त है क्योंकि यह उन सभी अपराधों की श्रेणी में आता है, जो महिलाओं को इस जिहाद के केंद्र में रखते हैं।

गैर-मुस्लिम महिलाओं को मजहब विशेष के पुरुषों के हाथों अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए तैयार किया जा रहा है। उनका अपहरण कर लिया जाता है, उनका बलात्कार किया जाता है, लालच दिया जाता है, उन्हें इस्लाम में परिवर्तित कर दिया जाता है, दंडित किया जाता है और उनका ब्रेनवॉश किया जाता है। मानवता के खिलाफ इन अपराधों में कोई ‘प्यार’ नहीं है। इसमें कोई अस्पष्टता नहीं है कि यह जिहाद का ही एक रूप है। अब यह कहने का समय आ गया है कि यह ग्रूमिंग जिहाद है।

हिंदू संस्कृति का मजाक उड़ाती है Netflix की वेब सीरीज: समय है इसके बहिष्कार का… और वो समय अभी ही है

इस दौर में ओटीटी प्लेटफॉर्म की कंपनियों की नीति केवल इतनी ही रह गई है कि उनका बिजनेस ज्यादा से ज्यादा होना चाहिए। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन इसकी आलोचना करता है या कौन सराहना या फिर किसे इससे चोट पहुँचती है। 

विदेशी ओटीटी प्लेटफॉर्म Netflix का हाल भी कुछ ऐसा ही है, जिसमें आए दिन ऐसा कंटेंट दिखाया जाता है जो कि हिंदुओं की भावनाओं को आहत करता है, लेकिन फिर भी इस प्लेटफॉर्म के यूजर भारत में बढ़ रहे हैं। आलोचनाओं के सहारे ही सही, लेकिन इसकी पहुँच लोगों तक बढ़ रही है, जो कि लोगों के लिए भी एक रेड अलर्ट है कि अब इसे बहिष्कृत करने का सही समय आ चुका है।

Netflix के खिलाफ हिंदू भावनाओं को आहत करने की मुहिम छिड़ गई है। Netflix की वेब-सीरीज ‘A Suitable Boy’ को लेकर लोगों का गुस्सा भड़क पड़ा है। इसके एक दृश्य में लड़का और लड़की मंदिर में बेहद ही अश्लील हरकतें करते दिख रहे हैं। जबकि बैकग्राउंड में भगवान की पूजा अर्चना और भजन किए जा रहे हैं।

इस दृश्य से हिंदू समुदाय के लोगों की भावनाएँ आहत हुई हैं। लोग इसे तुरंत Netflix से हटाने के साथ ही कंपनी से इसके लिए माफी माँगने की बात करने लगे हैं। लोगों की इस मुहिम का असर ये हुआ है कि अब तक #BoyCottNetflix हैशटैग के तहत करीब 64 हजार ट्वीट किए जा चुके हैं।

इसको लेकर बीजेपी के युवा मोर्चा के मंत्री गौरव शर्मा ने मध्य प्रदेश पुलिस से शिकायत की है और केस दर्ज कराया है। यही नहीं ट्विटर पर लोगों ने सरकार से Netflix समेत सभी ओटीटी प्लेटफॉर्म को सरकारी नियमों के अंतर्गत लाने की माँग की है। जिससे इनके गलत कार्यक्रमों पर नियमों के तहत सख्त कार्रवाई की जा सके, ताकि इन्हें सबक मिल सके, और ये सभी ओटीटी प्लेटफॉर्म अपने कार्यक्रमों में लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने से बचें।

इस मामले में मध्य प्रदेश के गृह मंत्री भी काफी सख्ती से पेश आए हैं। उन्होंने इसको लेकर वीडियो संदेश के माध्यम से कहा है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म Netflix में हिंदू मंदिर के अंदर इस प्रकार की अश्लील हरकतें आपत्तिजनक हैं और इसके खिलाफ अधिकारियों को कार्रवाई करने के आदेश दे दिए गए हैं। साथ ही उन्होंने कहा है कि Netflix को इस तरह से हिंदू भावनाओं को आहत करने से बचना चाहिए।

Netflix की वेब सीरीज का ये दृश्य विक्रम सेठ की किताब A Suitable Boy के दूसरे एपिसोड का है, जो कि मध्य प्रदेश के ही महेश्वर घाट स्थित शिव मंदिर का है। इसको लेकर बीजेपी नेता गौरव ने कहा है कि इसके खिलाफ जनता सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करेगी।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि Netflix ने कोई आपत्तिजनक कंटेंट प्रसारित किया हो। ये ओटीटी प्लेटफॉर्म आए दिन इसी तरह की वेब सीरीज प्रसारित करता रहता है जो कि हिंदू समुदाय और उसकी संस्कृति को नीचा दिखाती है।

Netflix पर सभी ने अनुराग कश्यप की सेक्रेड गेम्स देखी है, जो कि वामपंथी एजेंडा चलाती है। इस सीरीज में जिस तरह से अहम ब्रह्मास्मि का प्रयोग करके अपराध के दृश्य दिखाए गए, उससे हिन्दू समुदाय को धक्का लगा है। इसके अलावा एक सीरीज घोउल (Ghoul) भी है जो भारत के हिंदुओं को इस्लाम विरोधी प्रदर्शित करती है। Netflix ने ऐसी अनेक फिल्में प्रसारित की हैं, जिसमें किसी न किसी दृश्य में हिंदुओं या उनकी संस्कृति के प्रति नफरत भरी हो।

हिंदू विरोध के बावजूद लोग अभी भी इसे पसंद करते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं, जो केवल इसके कंटेंट की आलोचना करने के लिए ही इसे देखते हैं। ऐसे कंटेंट को देखने के बाद वे Netflix की ट्विटर से लेकर सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फजीहत करते हैं। वहीं ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें हिन्दू विरोधी कंटेंट देखने में मजा आता है। इसलिए अब सरकार को ऐसे प्लेटफॉर्म के खिलाफ कार्रवाई करने के साथ ही कुछ नियम भी तय करने चाहिए, जिससे हिंदुओं को इस तरह से अपमानित करने वाले कंटेंट पर लगाम लग सके।

इससे पहले नेटफ्लिक्स की वेब सीरिज सेक्रेड गेस्स-2 को लेकर खूब विवाद हुआ था। शिरोमणि अकाली दल के नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने सेक्रेड गेम्स के डायरेक्टर अनुराग कश्यप के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी। सेक्रेड गेम्स 2 में सिख पुलिस अधिकारी का किरदार निभाने वाले सैफ अली खान के एक सीन को लेकर अकाली दल के नेता ने अनुराग कश्यप पर सिख धर्म के अपमान करने का आरोप लगाया था।

बता दें कि पिछले कई सालों से इस्लामिक संगठनों द्वारा किए गए हमलों को सफेदजामा पहनाने की कोशिश की जा रही है और नेटफ्लिक्स इस प्रोपेगेंडा में सबसे आगे है। इन सभी हमलों को छिपाने के लिए इसने कई ऐसी सीरीज निकाली, जो हिन्दुओं की छवि को धूमिल करती है। लेकिन इनमें इतना साहस नहीं है कि वो इस्लामिक स्टेट, बोको हराम जैसे आतंकी संगठनों पर कोई वेब सीरीज बना कर दुनिया को दिखाए।

आतंकवाद पर पर्दा डालने के लिए इन निर्माता कंपनियों ने हिन्दुओं को निशाने पर लिया है तथा हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है। उनकी छवि को नकारात्मक तरीके से पेश किया जा रहा है ताकि लोगों में दिखावटी डर को बढ़ावा दे सके, जिसका वास्तविकता से कोई नाता ही नहीं है। 

नेटफ्लिक्स की प्रवृत्ति हमेशा से हिंदू विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देने की रही है। इसने ‘Ghoul’, ‘Sacred Games’ और ‘लैला’ के रूप में ऐसी कई वेब सीरिज बनाई है, जो हिंदू विरोधी भावनाओं को जन्म दे रही है और साथ ही इससे विश्व में हिंदू धर्म की नकारात्म छवि पेश की जा रही है। लैला वेब सीरीज में सनातन धर्म के अनुयायियों को सबसे हिंसक और दमनकारी मानसिकता वाले लोगों के तौर पर दिखाया गया है, जो सिर्फ लोगों को बाँटकर उन पर राज करना चाहते हैं। 

वेब सीरीज में आर्यावर्त समाज को भयंकर जातिवाद, कट्टरवाद और असहिष्णुता से ग्रसित दिखाया गया है। जहां मामूली अपराध करने पर भी कड़ी सजा दी जाती है। यहाँ आपके लिए यह जानना जरूरी है कि यह वेब सीरीज प्रयाग अकबर द्वारा इसी नाम से लिखित विवादित किताब पर आधारित है जिसमें लेखक ने सच्चाई और तथ्यों की जगह सिर्फ अपने एजेंडे का ही प्रचार किया है। अब समय आ गया है कि भारतीय जनता ऐसी वेब सीरीज बनाने वाली कंपनियों का बहिष्कार करे और ऐसे कंटेंट के खिलाफ आवाज उठाए जिससे विश्व में हिंदुओं की छवि धूमिल हो।

लव जिहाद पर ‘संविधान पढ़ो’… लेकिन 3-तलाक पर ‘कानून से सामाजिक बुराई खत्म नहीं’ – ओवैसी का डबल स्टैंडर्ड

भारत में इन दिनों ‘लव जिहाद’ के खिलाफ कानून बनाने की चर्चा काफी हो रही है। मध्य प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने अगले सत्र में कानून को लेकर बिल लाने की बात भी कही। वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार भी इसके खिलाफ सख्त कदम उठाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इस बीच AIMIM के राष्ट्रीय अध्यक्ष और लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवौसी ने इसे संविधान की भावना के खिलाफ बताया है।

ओवैसी ने कहा, “इस तरह का कानून संविधान की धारा 14 और 21 के खिलाफ है। स्पेशल मैरिज एक्ट को तब खत्म कर दें। कानून की बात करने से पहले उन्हें संविधान को पढ़ना चाहिए।” साथ ही उन्होंने कहा कि बीजेपी युवाओं का ध्यान बेरोजगारी से हटाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपना रही है।

‘लव जिहाद’ को संविधान की भावना के खिलाफ बताने वाले ओवैसी लेकिन खुद तीन तलाक पर संविधान संशोधन क्यों नहीं पढ़ते? कानूनों को लेकर समाज में बेचैनी का या तो इन्हें अंदाजा नहीं है या जानबूझकर अपनी आँखें बंद किए हुए हैं। अपने वादे के मुताबिक मोदी सरकार ने समाज में सैकड़ों साल से चली आ रही ट्रिपल तलाक जैसी गलत प्रथा को रोकने के लिए एक सख्त कानून का विधेयक संसद के दोनों सदनों में पारित करा दिया, लेकिन इसका विरोध करने वालों ने इसे मजहब विशेष को परेशान करने वाला कानून बताया।

ट्रिपल तलाक का दंश झेल चुकी महिलाएँ इस कानून को लेकर बेहद खुश हुईं। उनकी खुशी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता था कि राज्यसभा में विधेयक पारित होने के बाद बड़ी संख्या में मजहबी महिलाओं ने कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के घर जाकर उन्हें बधाई दी। समाज में महिलाओं का एक बड़ा तबका कानूनों में सुधार चाहता था, लेकिन मज़हबी रहनुमा और मजहबी नेता इसके हक़ में नहीं थे।

30 जुलाई 2019 का दिन इतिहास में दर्ज हो गया। तीन तलाक विधेयक को राज्य सभा ने अपनी मंजूरी दे दी। लोक सभा से इस बिल को पहले ही मंजूरी मिल गई थी। लगभग 34 साल के अंतराल के बाद मोदी सरकार ने समुदाय की महिलाओं को उनका हक दिला दिया। सचमुच, यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में उठाया गया एक अभूतपूर्व कदम था। तुष्टीकरण के चलते जो न्याय पिछली सरकारें शाहबानो जैसी महिलाओं को नहीं दे पाईं थीं, वह चिर प्रतीक्षित न्याय वर्तमान सरकार ने शाहबानो के हवाले से समुदाय की महिलाओं को दिलाया।

विधेयक पेश किए जाने का तब विरोध करते हुए एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने आरोप लगाया था कि यह विधेयक संविधान की अवहेलना करता है और कानूनी रूपरेखा में उचित नहीं बैठता। उन्होंने कहा था कि समुदाय की महिलाओं के साथ अन्याय के मामलों से निपटने के लिए घरेलू हिंसा कानून और आईपीसी के तहत अन्य पर्याप्त प्रावधान हैं और इस तरह के नए कानून की जरूरत नहीं है। ओवैसी ने कहा कि यह विधेयक पारित होने और कानून बनने के बाद महिलाओं को छोड़ने की घटनाएँ और अधिक बढ़ जाएँगी।

ओवैसी साहब जो राजनीति कर रहे हैं, उससे अब तक मजहब विशेष के भारतीयों को कितना लाभ पहुँचा? इस प्रश्न का उत्तर जरा हैदराबाद के समुदाय विशेष से माँगिए। लगभग तीन दशकों से अधिक समय से एआईएमआईएम पार्टी हैदराबाद में म्युनिसिपल एवं राज्य स्तर पर सत्ता में है। शैक्षणिक और वित्तीय स्तर पर वहाँ के समुदाय के लोगों का कितना भला हुआ, आज तक ऐसा कोई डेटा आया नहीं।

हाँ, यह जरूर सुनते हैं कि ओवैसी खानदान के वक्फ फल-फूल रहे हैं। पुराना हैदराबाद एआईएमआईएम की म्युनिसिपल सत्ता के बावजूद वैसे ही गंदा रहता है, जैसे दूसरे शहरों की मजहबी बस्तियाँ गंदी रहती हैं। फिर, ओवैसी साहब जिस डंके की चोट पर ‘समुदाय के हित’ की बात करते हैं, हम ‘समुदाय के नेतृत्व’ पर पिछले तीन दशकों के अधिक समय से उसी ऊँचे स्वर में मजहबी मुद्दों की बात सुनते आए हैं।

असदुद्दीन ओवैसी साहब जिस ‘सीधे समुदाय के हित की बात’ की जज्बाती रणनीति पर चल रहे हैं, वह मजहबी नेतृत्व की दशकों पुरानी रणनीति है। हाँ, इस जज्बाती सीधी बात की रणनीति से कुछ मुल्ला-मौलवियों और कुछ मजहबी नेताओं के हित तो जरूर चमके लेकिन समुदाय विशेष भारत में दूसरे दर्जे की नागरिकता के कगार पर पहुँच गया।

समुदाय विशेष को जज्बाती ‘सीधी बात’ की राजनीति से सावधान रहने और सद्बुद्धि से अपनी क्षति नहीं बल्कि अपने हित की राजनीति का रास्ता ढूँढना चाहिए।

दीवाली और गणेश चतुर्थी पर बहुत भीड़, लॉकडाउन को लेकर उठाएँगे कदम: महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार

तीन राजनीतिक दलों के गठबंधन से बनी महाराष्ट्र की महाविकास अगाड़ी सरकार का हिन्दू विरोधी चेहरा छुपा नहीं रहा है। चाहे वह कॉन्ग्रेस और एनसीपी हो या शिवसेना, इस सरकार ने हिन्दू संबंधी तमाम मुद्दों को हाशिये पर रखा है। ताज़ा मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ, जो महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार के बयान से समझा जा सकता है। अजित पवार ने अपने बयान में कहा है कि दीवाली के दौरान बहुत भीड़ हुई थी और गणेश चतुर्थी के समय भी यही हालात थे।   

हिन्दू त्यौहारों को निशाना बनाते हुए महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री ने अपने बयान में कहा, “दीवाली के दौरान काफी ज़्यादा भीड़ देखी गई थी और यही स्थिति गणेश चतुर्थी के वक्त भी बनी हुई थी। हम इस मुद्दे पर संबंधित विभागों से चर्चा कर रहे हैं, आगामी 8-10 दिनों तक हालातों की समीक्षा करेंगे। उसके बाद ही लॉकडाउन को लेकर कोई उचित कदम उठाएँगे। फ़िलहाल महामारी का ख़तरा बना हुआ है, इसलिए किसी भी तरह की लापरवाही करना ख़तरे से खाली नहीं होगा।”

इसके बाद अजित पवार ने कहा, “दीवाली के दौरान बहुत ज्यादा भीड़ इकट्ठा हो गई थी जैसे कि कोरोना वायरस भीड़ की वजह से ख़त्म हो जाएगा। अब इस बात का अनुमान लगाया जा रहा है कि महामारी की दूसरी लहर आ सकती है। सरकार ने विद्यालय शुरू करने के लिए दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं, जिसमें उन्हें सैनेटाइज़ करने के तमाम तरीके भी शामिल किए गए हैं। जल्द ही महाराष्ट्र सरकार महामारी को मद्देनज़र रखते हुए बनाए गए दिशा-निर्देशों का क्रियान्वन शुरू कर देगी।”     

हैरानी की बात यह है कि महाराष्ट्र की तथाकथित धर्म निरपेक्ष और उदारवादी सरकार अन्य धार्मिक और सांस्कृतिक समारोहों पर टिप्पणी नहीं करती है। अन्य धर्मों के आयोजनों में भी काफी भीड़ इकट्ठा होती है लेकिन फिर भी प्रदेश की सरकार को एक ही धर्म के त्यौहार नज़र आए। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री द्वारा कही बात खुद में कितनी हास्यास्पद है कि दीवाली और गणेश चतुर्थी में भीड़ नज़र आई।

बाँका में मिले नदी-घाटी सभ्यता के अवशेष: ईंटें किश्चियन तारीख से पहले के, ग्रीक लेखकों ने भी किया था वर्णन

बिहार के बाँका जिले के भदरिया गाँव के समीप चांदन नदी के बीच कुछ अति-प्राचीन घरों की शृंखला मिली है। घरों की दीवारें 20 से 30 फीट तक चौड़ी हैं। इनमें प्रयुक्त ईंटें किश्चियन तारीख के शुरू होने से पहले के बताए जा रहे हैं। यह स्थल नदी के मूल बहाव क्षेत्र में है। इसे नदी घाटी सभ्यता का दर्जा दिया गया है। इस नदी की पहचान ग्रीक लेखकों ने भी पौराणिक काल की पवित्र नदी ‘ईरणभव’ के रूप में की है।

हाथ से बनाई गई ईंट

वामपंथी इतिहासकारों ने कुविचारों का घोला मारकर हमारे सामने इतिहास को प्रस्तुत किया। इसमें हमारी सनातन सभ्यता को हीन बताया गया और अन्य सभ्यताओं का महिमामंडन करते हुए प्रस्तुत किया। लेकिन भारत के प्रांतों के सभी क्षेत्रों के स्थानीय इतिहासकारों ने अपार श्रम से इतिहास की कसौटी पर रखते हुए जो नए खोज किए हैं, उसने वामपंथी इतिहास की बखिया उधेड़ दी है। ऐसी ही खोज में यह ‘नदी-घाटी सभ्यता’ है, जो भदरिया में मिली है। इस परिघटना से आर्य-अनार्य तथा नृविज्ञान के सिद्धांतों के तय मिथक टूटने की उम्मीद है।

खुदाई के दौरान प्राप्त ईंट की नजदीक से तस्वीर

चांदन नदी के बीचों-बीच जलबहाव क्षेत्र में इस भवन शृंखला की नींव मिलने से इसे नदी घाटी सभ्यता के तौर पर चिह्नित किया गया है। यह शृंखला लगभग 50 फीट दूर तक नजर आती है। इससे आगे भी इसके निकलने की संभावना है लेकिन वहाँ भी बालू भरा हुआ है और उसके ऊपर नदी का जल बहाव है।

नदी घाटी सभ्यता की दीवार

यह खोज छठ पर्व के दौरान सूर्य देवता को अर्घ्य देने के लिए घाटों की सफाई और निर्माण के दौरान ग्रामीणों द्वारा हुई। नदी के बीच किसी प्रकार के भवनों की शृंखला मिलने की यह पहली ऐतिहासिक घटना है। जबकि नदी के किनारे छोटी-मोटी ऐसे कुछ संरचनाएँ पहले भी मिली हैं, जिन्हें नगर अवशेष के तौर पर चिह्नित नहीं किया गया है। कहा गया है कि वे अस्थाई प्रबंध थे। किन्तु, यहाँ इन नगरीय अवशेषों के बीच मिट्टी का एक छोटा घड़ा भी मिला है। कुछ लोग बताते हैं कि एक मानव खोपड़ी भी मिली थी, जिसे अज्ञानतावश गुम कर दिया गया।

नदी घाटी सभ्यता की दीवार की तस्वीर

भदरिया नामक यह गाँव बिहार के बाँका जिला के अमरपुर ब्लॉक में है। इस ब्लॉक की सीमा भागलपुर जिले से लगती है। भागलपुर प्राचीन काल में अंग महाजनपद के नाम से जाना जाता था। महात्मा बुद्ध के जन्म से पहले यह भारत के 16 महाजनपदों में से एक था। इस महाजनपद की राजधानी चंपा थी। यहाँ बुद्ध आए थे। इस चंपा नगरी में 7वीं सदी में चीनी यात्री ह्वेन्त्सांग भी आया था।

यह प्राचीन चम्पा अब चंपानगर कहलाता है। भदरिया गाँव से चंपानगर की दूरी लगभग 25 किलोमीटर है। जातकों में कहा गया है कि बुद्ध की पहली चारिका का नाम विशाखा था, जो भद्दई की थी। इसी भदरिया की पहचान भद्दई गाँव के तौर पर की गई है। पिता धनंजय और माता सुमना की पुत्री विशाखा के दादा मेंडक एक श्रेष्ठि थे, जिनके गाँव बुद्ध अपने 1200 शिष्यों के साथ आए थे। 2 वर्षों पूर्व इस गाँव में बुद्ध के चरण चिह्न की स्थापना की गई, जिसके लिए ग्रामीण लखनलाल पाठक ने जमीन दान में दी।   

इस गाँव के पास चांदन नदी की चौड़ाई 900 मीटर है। गाँव की ओर से लगने वाली नदी तट से लगभग 400 मीटर की दूरी पर यह अवशेष पाया गया है। यहाँ से प्राप्त अवशेष में 15 इंच लंबी, 10 इंच चौड़ी और 2.5 इंच मोटी ईंटों का प्रयोग किया गया है। ये ईंटें हाथों से थापकर बनाई गई हैं और पुआल से पकाए गए हैं। यहाँ से 1.3 इंच व्यास के मिट्टी से बनाए गए छोटे घड़े भी मिले हैं।

खुदाई के दौरान प्राप्त घड़ा

यह नदी आगे जाकर गंगा में मिलने से पहले 3 भागों में बँट जाती है। मूल धारा आगे जाकर चंपा नदी बन जाती है, जो प्राचीन काल में मगध और अंग महाजनपदों की सीमा रेखा मानी गई है। इसी नदी के तट पर अंग की राजधानी चंपा बसी हुई है, जहाँ से प्रतापी राजा दानवीर कर्ण की चर्चा जुड़ी है। इसी चम्पा से विक्रमशिला महाविहार की दूरी लगभग 54 किलोमीटर है, जिसे पाल राजा धर्मपाल ने बनवाया था। विदित हो कि ये दोनों जगह भागलपुर जिले में हैं। 

भदरिया गाँव से मंदार पर्वत की दूरी 46 किलोमीटर है। इस मंदार पर्वत की पहचान समुद्र मंथन में प्रयुक्त केंद्र वाले पर्वत से की गई है। यह स्थल प्राचीन अवशेषों के लिए विख्यात है। इतिहासज्ञों के अध्ययन और स्थल पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह स्थल नदी-घाटी सभ्यता मानी गई है। सम्पूर्ण भारत में अब तक सिर्फ राखीगढ़ी (हरियाणा) और लोथल (गुजरात) में ही ऐसी सभ्यताओं के प्रमाण मिले हैं।

नदी घाटी सभ्यता के प्रमाण

इस स्थल के अधिक अध्ययन के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पटना सर्किल को जिला प्रशासन के जरिए अनुरोध किया गया है। फिलहाल, इस स्थल के संरक्षण के लिए जिला अधिकारी ने प्रबंध कराया है लेकिन कुछ प्रभावी लोगों द्वारा ईंटें या अन्य वस्तुएँ स्थल से उठाकर ले जाने की खबरें बराबर आ रही हैं, जो इस साइट के संरक्षण में बाधा उत्पन्न कर रही है।

लेखक: उदय शंकर झा ‘चंचल’

17 साल की लड़की को माँ-बेटे ने किया किडनैप, इस्लाम कबूल करा 2 महीने तक 5 लोगों ने बलात्कार किया

साल 2020 के मार्च महीने की 16 तारीख को पाकिस्तान के लाहौर में 17 साल की मूक बधिर लड़की का उसके घर से अपहरण किया गया और पड़ोस में रहने वाले मुस्लिम युवक के साथ जबरन निकाह कराया गया। ब्रिटिश पाकिस्तानी क्रिश्चियन एसोसिएशन में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक़ 17 मार्च को इस घटना के संबंध में संधा पुलिस ने एफ़आईआर दर्ज की थी।

पुलिस ने इस मामले पर कोई कार्रवाई नहीं की थी। इसके बाद स्थानीय विधायक तारिक गिल के दखल देने के बाद पुलिस ने पीड़िता के गायब होने के ठीक पहले उसकी माँ रुबीना के फोन पर आए कॉल को ट्रेस करना शुरू किया। 

जाँच के दौरान पता चला कि संदिग्धों का नाम अली मोबशीर और मोहम्मद अज़ीम है। पुलिस को यह भी पता चला कि जिस वक्त पीड़िता गायब हुई थी, उस वक्त यह दोनों उसके घर के पास ही मौजूद थे। इसके बाद पुलिस ने अज़ीम से संपर्क करने का प्रयास किया और उसने पूछताछ में सहयोग करने पर सहमति भी जताई लेकिन बाद में मोबशीर के साथ 2 महीने तक गायब रहा। 10 अप्रैल को रुबीना के पास एक और कॉल आया, जिसमें उसने कथित तौर पर अपनी बेटी की आवाज़ सुनी। 

इस बात की जानकारी पुलिस को दी जाने के बाद जब नंबर की ट्रेसिंग शुरू हुई तो उसकी लोकेशन पड़ोस में रहने वाले कासिफ़ गुलाम रसूल घर पर मिली। रसूल के अलावा मोहम्मद अज़ीम, मोबशीर अली और अली अब्बास पीड़िता को वैन में लेकर गए थे, जिसमें से एक आरोपित की पहचान नहीं हो पाई है। संधा पुलिस ने तीनों आरोपितों को ओकारा शहर के दीपालपुर से गिरफ्तार कर लिया है जबकि कासिफ गुलाम रसूल अभी फ़रार चल रहा है।

आरोपित के चाचा का दावा, लड़की कासिफ की जायदाद है  

घटना के कुछ समय बाद आरोपित कासिफ का चाचा 5 जून को पीड़िता के साथ पुलिस थाने आया, जो कि 2 महीने से लापता थी। इसके बाद उसने निकाह का फर्ज़ी इस्लामी प्रमाण पत्र और पीड़िता की उम्र 18 वर्ष बताने के लिए फर्ज़ी आयु प्रमाण पत्र दिखाया। इसके अलावा आरोपित के चाचा ने सहमति का दस्तावेज़ भी दिखाया, जिससे वह साबित करना चाहता था लड़की ने अपनी मर्ज़ी से इस्लाम स्वीकार किया है।

इसके बाद उसने पीड़िता को अपने घर वालों से मिलने के लिए जाने दिया और साथ में यह चेतावनी भी दी कि उसे अपने परिवार के पास वापस नहीं भेजा जाएगा। अंत में उसने दावा भी किया कि लड़की अपने पति की जायदाद है और अपने परिवार से मिलने के बाद उसे अपने पति के पास लौटना होगा। 

पुलिस ने नकारी पीड़िता को परिवार के हवाले करने की बात

अपनी बेटी से मुलाक़ात पर रुबीना ने बताया कि सांकेतिक भाषा में बात करते हुए कोमल बहुत ज्यादा हैरान और परेशान नज़र आ रही थी। पीड़िता ने बताया कि 5 मुस्लिम युवकों ने उसे बंधक बना कर उसके साथ बलात्कार किया और अपहरणकर्ता को हिरासत में लेने की जगह उल्टा उसे बंधक बना कर रखा गया। रुबीना ने यह सारी बातें पुलिस को बताईं, फिर भी पुलिस ने उसकी अपनी बेटी को साथ लेकर जाने से मना कर दिया। 

इसके बाद स्थानीय विधायक तारिक गिल ने पुलिस थाने पहुँच कर पीड़िता को रिहा करने और मामले की जाँच करने की बात कही। 6 जून को डॉक्टर तौकीर आसिफ़ा द्वारा किए गए मेडिकल परीक्षण के दौरान यह बात सामने आई कि पीड़िता का शारीरिक शोषण और बलात्कार हुआ है। पंजाब सरकार के स्वास्थ्य विभाग में किए गए इस मेडिकल परीक्षण के दौरान पीड़िता के बाएँ पैर और दाहिनी कलाई पर कई घाव मिले। 

कोमल ने सुनाई पूरी घटना 

लाहौर में डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन ऑफिसर के सामने सांकेतिक भाषा के माध्यम से घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए कोमल ने कहा:

“मैं 1.30 बजे अपने घर का फर्श साफ़ कर रही थी तभी कासिफ गुलाम रसूल और उसकी माँ रकिया अचानक से आए और घसीट कर मुझे बाहर ले गए। क्योंकि मैं मूक-बधिर हूँ, इसलिए मैं शोर मचा कर अपने घर वालों को बता नहीं पाई कि मेरे साथ क्या हो रहा है। इसके बाद उन्होंने मुझे एक कार में बैठाया और रावी नदी के किनारे लेकर गए। 19 मार्च को वह मुझे लाहौर स्थित जामिया नामिया लेकर गए और वहाँ मुझे जबरन इस्लाम कबूल कराया, कासिफ ने यह सब कुछ अंजाम दिया। उसने ही मुझसे जबरन निकाह भी किया, इसके बाद पुलिस की गिरफ्तारी से बचने के लिए वह मुझे अलग-अलग जगहों पर लेकर गया और इस दौरान वह मुझे पीटता भी था।”

पीड़िता की हालत सुधरी नहीं और मुख्य आरोपित को मिल गई जमानत 

कासिफ और उसकी माँ ने गिरफ्तारी के पहले मिलने वाली एडिशनल सेशन जज ज़ुल्फ़िकर अली के सामने गिरफ्तारी के पहले ही जमानत के लिए याचिका दायर की थी। आखिरकार 30 हज़ार रुपए का बॉन्ड भरने के बाद उन्हें जमानत दे दी गई। इसके बाद दार-उल-अलूम जामिया नामिया के करी मोहम्मद सईद ने ने बयान दिया था कि कोमल ने बिना किसी डर के इस्लाम कबूल किया था और 19 मार्च को उसका निकाह कानूनी तरीके से किया गया था।

पीड़िता ने पिता पैटरस मसीह ने भी इस मामले में पुलिस की लापरवाही पर दुःख जताया था। लाहौर प्रेस क्लब के सामने हुए विरोध प्रदर्शन के बाद सीआईए डीसीपी जावेद सादिक ने पीड़िता के परिजनों को भरोसा दिलाया कि पुलिस इस मामले में सख्त कार्रवाई करेगी। फ़िलहाल पीड़िता को एक खुफ़िया स्थान पर रखा गया है, जहाँ उसकी हालत में सुधार के पूरे प्रयास किए जा रहे हैं। 

ब्रिटिश एशियन क्रिश्चियन एसोसिएशन के चेयरपर्सन जूलियट चौधरी ने बताया, “लड़की पर भयावह और दर्दनाक हमला हुआ था। मेरे उम्र की भी ऐसी शायद ही कोई महिला होगी, जो इस तरह के हमले से उबर पाए, उसने जितनी हिम्मत दिखाई है, वह सराहनीय है। उसने अंत तक ईश्वर से प्रार्थना की और भरोसा बनाए रखा। मेरी बेटी हैना भी ठीक उतनी ही उम्र की है और वह भी ब्रिटिश सांकेतिक भाषा समझती है, जैसे ही कोमल की हालत बेहतर होगी, मेरी बेटी उससे ज़रूर बात करेगी। जैसे ही यहाँ की क्रिश्चियन महिलाओं को इस घटना की पूरी जानकारी मिली कि उस बच्ची ने क्या-क्या झेला, सभी को बहुत कष्ट हुआ। यह घटना हमारे लिए आँख खोलने वाली है लेकिन सवाल यह है कि कितने लोग इस अत्याचार को रोकने के लिए आगे आना चाहते हैं।”                                  

केरल में सिर्फ 1 सोशल मीडिया पोस्ट पर हो सकती है 5 साल की जेल: FOE की रट लगाने वाले वामपंथियों का नया कानून

केरल के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद खान ने राज्य की वामपंथी सरकार के उस अध्यादेश को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत सोशल मीडिया पोस्ट के लिए भी किसी को 5 साल की जेल हो सकती है। ‘केरल पुलिस एक्ट’ में संशोधन कर के ऐसा नियम बनाया गया है। अगर पुलिस को लगता है कि कोई सोशल मीडिया पोस्ट आपत्तिजनक या धमकी भरा है, तो उस व्यक्ति को 5 साल की जेल की सजा हो सकती है।

केरल के राजभवन ने बताया कि ‘केरल पुलिस एक्ट’ में धारा 118 (A) जोड़ने वाले आदेश पर राज्यपाल ने हस्ताक्षर कर दिया है। इसके तहत केवल पोस्ट ही नहीं, बल्कि अगर किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य को भेजे गए कोई भी संदेश, चाहे वो कोई भी डिजिटल माध्यम हो, अगर आपत्तिजनक या धमकी भरे लगते हैं तो उसे या तो 5 साल कारावास होगा या फिर 10,000 रुपए जुर्माना, या दोनों ही सजा दी जा सकती है।

इस कानून से राज्य में फ्री स्पीच को बड़ा धक्का लगना तय है, क्योंकि पुलिस जिसे भी चाहेगी, उसे सिर्फ उसके सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर जेल भेज सकती है। पुलिस के पास इससे अब अतिरिक्त शक्तियाँ आ गई हैं। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन का कहना है कि सोशल मीडिया पर लोगों को निशाना बना कर उन्हें गालियाँ देने की घटनाएँ बढ़ रही हैं, इसीलिए उन पर लगाम लगाने के लिए ये कानून लाया गया है।

केरल के अधिवक्ता अनूप कुमारण ने कानून के खिलाफ हाईकोर्ट जाने की बात कही है। वो इसी एक्ट के एक अन्य सेक्शन 118 (D) के खिलाफ भी हाईकोर्ट गए थे। उन्होंने कहा कि सरकार का दावा है कि इस कानून से लोगों की, खासकर महिलाओं की सोशल मीडिया पर पड़ने वाली गालियों से रक्षा होगी, लेकिन असली बात ये है कि इसका इस्तेमाल पुलिस और सरकार द्वारा उन लोगों को निशाना बनाया जाएगा, जो उनकी आलोचना करते हैं।

इससे पहले केरल हाईकोर्ट ने 118 (D) को भी निरस्त करते हुए इसे अवैध करार दिया था और कहा था कि ये अभिव्यक्ति की आजादी के मूलभूत अधिकार का उल्लंघन है। केरल सरकार का कहना है कि अब हाईकोर्ट ने ही उसे सोशल मीडिया पर चलने वाले हेट कैंपेन्स और हमलों के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा था। सीपीएम सरकार सोशल मीडिया पर प्रोपेगेंडा फैलाने में बढ़ोतरी होने की बात भी कह रही है।

ये वही पिनराई विजयन हैं, जो फ्री स्पीच को बचाने को लेकर ट्वीट्स किया करते थे। वामपंथी खुद को अभिव्यक्ति की आज़ादी का संरक्षक बताते हुए उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे दंगा आरोपितों का भी बचाव करते हुए कहते हैं कि इन्हें बोलने के लिए ही गिरफ्तार किया गया है। जबकि उत्तर कोरिया और चीन से लेकर केरल तक, जहाँ-जहाँ वामपंथियों की सरकार है, वहाँ लोगों के अधिकारों को दबा दिया जाता है।

इसी तरह शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस शासित महाराष्ट्र में पत्रकारों को सरकार व पुलिस द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा है। एडिटर्स गिल्ड सीएम योगी को यूपी में ‘पत्रकारों की प्रताड़ना’ पर पत्र लिखता है लेकिन कि जब सवाल उठता है कि क्या एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने ऐसा ही पत्र महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार को लिखा है, जहाँ पर एक मीडिया चैनल और उनके पत्रकारों को बुरी तरह से परेशान किया जा रहा है – तो वो चुप हो जाता है।

तलाक के बाद अब राज्य भी बदलने का मूड, टीना डाबी के शौहर अतहर खान ने लगाई तबादले की अर्जी

हाल ही में साल 2015 की संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की टॉपर आईएएस अधिकारी टीना डाबी और उनके शौहर अतहर खान ने तलाक लेने के लिए जयपुर की फैमिली कोर्ट में अर्जी दायर की थी। अब ख़बरें आ रही हैं कि अतहर खान ने डेप्यूटेशन के लिए जम्मू कश्मीर जाने के लिए आवेदन किया है। ख़बरों की मानें तो उनका यह आवेदन फ़िलहाल गृह मंत्रालय में लंबित है, उस पर सुनवाई बाकी है। 

टीना और अतहर दोनों ही राजस्थान कैडर के अधिकारी हैं और दोनों को फ़िलहाल जयपुर में नियुक्ति मिली हुई है। आईएएस पति-पत्नी के अलग होने की बात सामने आने के बाद से ही चर्चाओं का बाज़ार गर्म है। नौकरशाही से लेकर सोशल मीडिया तक इस मुद्दे पर भिन्न-भिन्न तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ अतहर खान ने गृह राज्य जम्मू कश्मीर जाने के लिए आवेदन किया था, जिसके बाद ही दोनों के बीच सबसे पहली बार दरार पैदा हुई थी। फ़िलहाल टीना डाबी और अतहर खान जयपुर फैमिली कोर्ड में तलाक की अर्जी देने के बाद से चर्चा में बने हुए हैं। 

इतना ही नहीं, दोनों को मुस्लिम देशों में भी गूगल पर काफी सर्च किया जा रहा है। इसके अलावा शुक्रवार (20 नवंबर 2020) को पूरे दिन दोनों ट्विटर पर ट्रेंड करते रहे। इसके पहले आईएएस पति-पत्नी के बारे में एक और बात सामने आई थी कि आईएएस अधिकारियों के लिए हाउसिंग बोर्ड की तरफ से एक अलग सोसाइटी बनाई गई है। जिसमें प्लॉट के लिए टीना डाबी और अतहर खान ने अलग-अलग आवेदन किया था। इस बात के सामने आते ही दोनों के बीच सब कुछ सामान्य नहीं होने की अटकलें तेज हो गई थीं। 

लगभग दो दिन पहले ही टीना डाबी को श्रीगंगानगर से सचिवालय के वित्त विभाग में स्थानांतरित किया था, इस पर राज्य निर्वाचन आयोग ने रोक लगा दी थी। दरअसल सेन्ट्रल डेप्यूटेशन पर जाने के लिए 9 साल, किसी अन्य केंद्र शासित राज्य में डेप्यूटेशन पर जाने के लिए 7 साल और जम्मू कश्मीर में डेप्यूटेशन पर जाने के लिए सिर्फ 5 साल के अनुभव की आवश्यकता होती है। अतहर खान का 5 वर्ष का अनुभव आगामी दिसंबर महीने में पूरा हो जाएगा, इसके बाद जम्मू कश्मीर में डेप्यूटेशन पर तैनाती के लिए उनकी योग्यता पूरी हो जाएगी।

अतहर खान ने टीना डाबी के साथ ही UPSC परीक्षा में दूसरा स्थान हासिल किया था। दोनों की शादी साल 2018 में हुई थी। IAS टॉपर टीना डाबी और उनके पति अतहर खान की मर्जी से दायर इस अर्जी में कहा गया था, “हम आगे साथ नहीं रह सकते। ऐसे में कोर्ट हमारी शादी को शून्य घोषित करें।” उल्लेखनीय है कि टीना डाबी और अतहर आमिर-उल-शफी खान के बीच ट्रेनिंग के दौरान नजदीकियाँ बढ़ी थीं। इसके बाद इन्होंने साल 2018 में शादी कर ली। 

इसके बाद टीना ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर खान लिखने के साथ-साथ ‘कश्मीरी बहू’ का टैग भी लगा लिया था। हालाँकि, अभी कुछ दिन पहले टीना के फैंस ने नोटिस किया कि उन्होंने अपने अकाउंट से न केवल ‘कश्मीरी बहू’ का टैग हटाया है, बल्कि उसके साथ-साथ अपने पति को भी ट्विटर पर अनफॉलो कर दिया है। इंस्टास्टोरी पर भी जय श्रीराम लिखते हुए हनुमान चालीसा की चौपाई- “सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहु को डरना। जय श्रीराम” लिखी थी।

दोनों की शादी को 2018 में कई नेताओं और पत्रकारों सहित लिबरल गिरोह के लोगों ने सेलिब्रेट किया था। सोशल मीडिया पर उन्होंने इसे एक उदाहरण बताते हुए ख़ुशी जताई थी। किसी की शादी का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए, लेकिन इन लोगों ने इसे ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ की मिसाल के रूप में प्रस्तुत कर अपने एजेंडे के लिए इस मौके का इस्तेमाल किया। इसमें कॉन्ग्रेस अध्यक्ष रहे राहुल गाँधी सबसे आगे थे।

मलेरिया, डेंगू के बाद कोविड-19 और उसके बाद सांप ने काटा: राजस्थान में फँसे ब्रिटिश नागरिक की कहानी

कोरोना काल से पहले राजस्थान आए ब्रिटिश मूल के एक नागरिक पहले डेंगू और मलेरिया की चपेट में आ गए, फिर कोरोना वायरस ने भी उन्हें अपनी जद में ले लिया। तीनों बीमारियों से जीतने के बाद उन्हें एक जहरीले साँप ने काट लिया। हैरानी की बात यह है कि वह इस जहर को भी मात देने में कामयाब रहे। इयान जोनस को जोधपुर जिले में एक कोबरा साँप ने काट लिया था, जिसके बाद उन्हें जोधपुर के ही एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। फिलहाल वो खतरे से बाहर हैं।

अस्पताल के डॉक्टर अभिषेक तातर ने कहा, “इयान जोनस को साँप द्वारा काटे जाने के बाद अस्पताल लाया गया था। शुरुआती जाँच में उनके कोरोना पॉजिटिव (दूसरी बार) होने का भी शक हुआ लेकिन जाँच में वो नेगेटिव पाए गए। उनके अंदर साँप के काटने के सभी लक्षण दिख रहे थे। उनकी दृष्टि कमजोर हो गई थी, वो मुश्किल से चल पा रहे थे। उनका इलाज किया गया। हमें लगता है कि कोई दीर्घकालिक प्रभाव नहीं होगा। इलाज के बाद जोनस ठीक हो गए और एक हफ्ते के अंदर अस्पताल से उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया।”

इस बीच जोनस के बेटे सेब जोनस ने पिता की प्रशंसा करते हुए GoFundMe पर लिखा, “डैड योद्धा हैं, भारत में प्रवास के दौरान पिता कोविड-19 से पहले मलेरिया, डेंगू बुखार से पीड़ित हो चुके हैं।” सेब जोनस ने यह पेज पैसे जुटाने के लिए बनाए हैं, ताकि भारत में उनके मेडिकल बिल को भरा जा सके और उनके वापस इंग्लैंड जाने का भी प्रबंध किया जाए।

बेटे ने बताया कि उनके पिता कोरोना महामारी की वजह से यात्रा कर पाने में सक्षम नहीं थे और परिवार ने लोगों की मदद करने की उनकी इच्छा का सम्मान किया। जोनस राजस्थान के स्थानीय कारीगरों की बनाई पारंपरिक शिल्प को अपनी चैरिटी संस्था के जरिए ब्रिटेन में बिकवाने में मदद करते हैं। उनका मकसद उनके सामान की बिक्री से उनकी गरीबी दूर करने में मदद करना है। वह जल्द अपने देश लौटेंगे।