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बिहार के ‘वोट कटुआ’ अब बंगाल में भी लड़ेंगे चुनाव, ओवैसी ने कहा- हम NGO नहीं जो सिर्फ़ कागज दिखाएँगे

बिहार चुनावों में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन (AIMIM) द्वारा 5 सीटें जीतने के बाद पार्टी प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने समाचार चैनल ‘आज तक’ से बातचीत में ऐलान किया कि उनकी पार्टी अब पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव भी लड़ेगी। चैनल से बातचीत के दौरान ‘रजिया गुंडों में फँस गई’ जैसे वाक्य का इस्तेमाल करते हुए ओवैसी ने बिहार में अपनी स्थिति को बयान किया उन्होंने कहा कि जहाँ एक ओर उन्हें लग रहा है कि वह भाजपा के बीच में फँस गए हैं तो दूसरी ओर महागठबंधन उन्हें ‘वोट-कटुआ’ कह रहा है।

उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी AIMIM के राज्य अध्यक्ष अख्तरुल ईमान ने महागठबंधन के नेताओं से मिलकर हाथ मिलाने की बात की थी। उन्होंने इस गठबंधन में शामिल होने का प्रयास करते हुए कई बार गठबंधन के नेताओं से मुलाकात भी की लेकिन उन नेताओं ने उस समय भाव नहीं दिया। अपनी पार्टी के ऊपर लग रहे इल्जामों को भी ओवैसी ने खारिज किया। साथ ही यह कहा कि यह उनकी गलती नहीं है कि उन्हें दरकिनार किया गया।

ओवैसी ने अपनी इस बातचीत में सीमांचल का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी सीमांचल के लोगों के लिए लड़ना बंद नहीं करेगी। इस क्षेत्र में बता दें 4 जिले आते हैं- अररिया, कटिहार, किशनगंज और पूर्णिया। इस क्षेत्र में 24 विधानसभा सीटें हैं। बिहार के सबसे पिछड़े इलाकों में शुमार यह क्षेत्र मुस्लिम बहुल आबादी वाला है।

इस इलाके में राजद की पकड़ हमेशा से अच्छी थी, लेकिन जब AIMIM इस चुनावी मैदान में आई तो यहाँ की मुस्लिम आबादी के वोट बँट गए। महागठबंधन का मानना है कि AIMIM के कारण इन इलाकों में NDA को फायदा पहुँचा। वहीं, AIMIM के अख्तरुल ईमान, कोचाधाम में मोहम्मद इज़हार असफ़ी, जोकीहाट में शाहनवाज़ आलम, बहादुरगंज में अज़हर नईम, और बैसी में सैयद हुकुद्दीन ने सीटें जीती हैं।

ओवैसी से इस बीच कथित पत्रकार आशुतोष ने एनडीए के साथ हाथ मिलाने की संभावनाओं पर सवाल पूछे। इस पर ओवैसी ने कहा कि उन्होंने केंद्र सरकार के सीएए, यूएपीए संसोधन, अनुच्छेद 370 जैसे फैसलों का विरोध किया है ऐसे में आखिर खुद को राजनीतिक विश्लेषक कहने वाला कोई कैसे सोच सकता है कि उनकी पार्टी  एनडीए के साथ हाथ मिलाती?

बंगाल में चुनाव लड़ेगी AIMIM-ओवैसी

AIMIM प्रमुख ने ऐलान किया कि उनकी पार्टी बंगाल चुनावों को लड़ेगी। उन्होंने कहा, “बिहार में AIMIM की जीत उन सभी लोगों को जवाब है जिन्हें लगता है कि AIMIM को दूसरे राज्यों में चुनाव नहीं लड़ना चाहिए। क्या हम एनजीओ हैं कि हम केवल सेमिनार करेंगे और कागज दिखाएँगे? हम राजनीतिक पार्टी हैं और हम चुनाव भी लड़ेंगे।”

गौरतलब है कि AIMIM ने पिछले साल ही बंगाल चुनाव लड़ने का इशारों में ऐलान कर दिया था। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता असीम वकार ने अपनी ताकत का बखान करते हुए कहा था, “ये सच है कि तादाद में कम हैं, लेकिन हमें छूना मत। हम ATOM BOMB (एटम बम) हैं। दीदी! हमें आपकी दोस्ती भी कुबूल और आपकी दुश्मनी भी। आपको तय करना है कि आप हमें दोस्त समझते हो या फिर दुश्मन।”

इसके बाद कोलकाता के धर्मतला में AIMIM ने एक बैठक का आयोजन किया था। जिसके मद्देनजर ममता बनर्जी ने कूचबिहार में अपने कार्यकर्ताओं से बात करते हुए कहा था, “मैं देख रही हूँ कि यहाँ अल्पसंख्यकों में कुछ अतिवादी हैं, जिनकी जमीन हैदराबाद से जुड़ी है। ऐसे लोगों की बिलकुल भी मत सुनिए।”

‘एंटी इंडिया चूरन सबसे ज्यादा बिकता है, यही हमारी रोजी-रोटी’ – इमरान की स्पेशल असिस्टेंट रह चुकीं मंत्री

पाकिस्तानी मंत्री ने भारत के खिलाफ अपने मंसूबे को जगजाहिर करते हुए कहा है कि पाकिस्तान में जो नेता भारत के खिलाफ जितना ज्यादा जहर उगलता है या जितना देश के लोगों को उसके खिलाफ बरगलाता है, उसे उतना ही बड़ा पद दिया जाता है। वैसे ये बात तो सभी जानते हैं कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान के पास भारत के अलावा कोई अन्य मुद्दा नहीं है। वह हर बार भारत विरोधी कंटेंट से अपनी बात शुरू करते हैं और उसी पर बात खत्म कर देते हैं।

पाकिस्तान के एक न्यूज चैनल ARY से बात करते हुए इमरान खान की बेहद करीबी नेता फिरदौर आशिक अवान ने भारत के खिलाफ पाकिस्तानी एजेंडे का खुलासा किया है। मंत्री ने कबूल किया है कि पाकिस्तान में एंटी इंडिया सेंटीमेंट का चूरन सबसे ज्यादा बिकता है। इसलिए, सभी राजनेता इस मुद्दे को सबसे ज्यादा उछालते हैं।

पाकिस्तानी मंत्रियों और एंटी इंडिया चूरन के संदर्भ में फिरदौस आशिक अवान ने इमरान और विपक्षी पार्टियों के मंत्री की पोल खोलते हुए कहा कि उनके अवाम के जो एंटी इंडिया सेंटीमेंट्स हैं, वो चूरन सबसे ज्यादा बिकता है। जो सबसे ज्यादा बिकता हो, लोग उसी को सबसे ज्यादा बेचते भी हैं। इस पर ऐंकर ने पूछा कि आजकल गवर्नमेंट यही सब कर रही है? तब फिरदौस ने जवाब दिया कि यह केवल सरकार ही नहीं, बल्कि सभी लोग कर रहे हैं।

वहीं यह बात सुनते हुए जब एंकर ने विपक्षी पार्टियों पर चुटकी लेते हुए उनके विषय में जब पूछा कि एंटी इंडिया का चूरन तो गवर्नमेंट बेचती है, विपक्षी पार्टियाँ नहीं बेचती। इस पर फिरदौस ने कहा कि विपक्ष ने तो ऐसे-ऐसे मसाले बेचे हैं, जो मोदी के लिए मजेदार और लजीज हैं।

बता दें कि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की खास मंत्री फिरदौर आशिक अवान ने पीटीआई की सरकार से पहले इमरान खान के मूवमेंट फॉर चेंज अभियान में भी सक्रिय भागीदारी निभाई थी। यही नहीं, वह पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार में भी केंद्रीय मंत्री रह चुकी हैं। जिसके बाद इमरान खान ने उन्हें अप्रैल 2019 में अपनी सरकार में उन्हें सूचना और प्रसारण मंत्रालय में स्पेशल असिस्टेंट का पद दिया था।

गौरतलब है कि भारत के खिलाफ घृणास्पद अभियानों को वित्त पोषित करने और उसे बढ़ावा देने वाले पाकिस्तान ने हमेशा अपने देश के लोगों को भारत के खिलाफ बरगलाने का काम किया। हाल ही में हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा की 75वीं वर्षगाँठ के दौरान भी इमरान खान का मुद्दा बस भारत बना हुआ था।

370 हटने से बौखलाए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कश्मीर के मानवाधिकार और वहाँ के अन्य विषयों को लेकर जमकर राग अलापा। भारत की बुराई करने में ही उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के मंच का कीमती समय बर्बाद कर दिया था।

BREAKING: सुप्रीम कोर्ट ने अर्णब गोस्वामी को दी जमानत, कहा – ‘मुंबई पुलिस तुरंत माने आदेश’

सुप्रीम कोर्ट ने अर्णब गोस्वामी को बेल दे दिया है। जमानत आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने इसे मानने के लिए मुंबई पुलिस को निर्देशित किया है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा-  “हम मानते हैं कि जमानत नहीं देने में हाईकोर्ट गलत था।” इसके साथ ही अर्नब गोस्वामी और दो अन्य आरोपितों को 50,000 रुपए के बांड पर अंतरिम जमानत पर रिहा किया गया। पुलिस आयुक्त को यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देशित किया जाता है कि आदेश का तुरंत पालन किया जाए।

अर्णब गोस्वामी की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर हम आज इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करते हैं तो बर्बादी की राह पर बढ़ जाएँगे। उन्होंने कहा कि किसी की विचारधारा अलग हो सकती है और वो चैनल नहीं देखे, लेकिन संवैधानिक अदालतें अगर ऐसी आज़ादी की सुरक्षा नहीं करती हैं तो वो बर्बादी की राह पर बढ़ रही है।

उन्होंने याद दिलाया कि कैसे पश्चिम बंगाल में एक महिला को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया था, क्योंकि उसने लॉकडाउन को लेकर सरकार की आलोचना की थी। उन्होंने पूछा कि क्या ये सही था? महाराष्ट्र सरकार की तरफ से पेश हुए वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि उन्हें लगता है कि जस्टिस चंद्रचूड़ के पास इस मामले में ‘स्ट्रॉन्ग फीलिंग्स’ हैं, जिसके जवाब में उन्होंने अर्णब गोस्वामी को कुछ देर के लिए भूल जाने की बात करते हुए कहा कि हम एक संवैधानिक अदालत हैं।

उन्होंने कहा कि एक संवैधानिक अदालत अगर लिबर्टी की सुरक्षा नहीं करे तो फिर और कौन करेगा? उन्होंने कहा कि पीड़ित को पूरा अधिकार है कि उसे निष्पक्ष जाँच का अधिकार मिले लेकिन आपको अगर चैनल नहीं देखना है तो मत देखिए। मजिस्ट्रेट के सामने याचिका डाल कर वापस लेने से विरोधी तर्क पर उन्होंने कहा कि किसी की लिबर्टी के अधिकार को छीनने के लिए और जमानत न देने के लिए ये कोई तर्क नहीं हो सकता। जस्टिस चंद्रचूड़ ने ये प्रमुख बातें कहीं:

“हम बर्बादी के राह पर चल पड़ेंगे, अगर आज इस न्यायालय ने हस्तक्षेप नहीं किया। उसकी विचारधारा जो भी हो, मैं तो उसका चैनल भी नहीं देखता लेकिन ‘इस’ मुद्दे पर अगर संवैधानिक न्यायालयों ने आज हस्तक्षेप नहीं किया, हम बिलकुल ही बर्बादी की राह पर चल पड़ेंगे। आज हम सभी हाई कोर्ट को भी एक संदेश देना चाहते हैं: अपने न्यायाधिकार का प्रयोग वैयक्तिक स्वतंत्रता के बचाव में कीजिए। एक के बाद एक केस में हाई कोर्टों ने निजी स्वतंत्रता को नकारा है। क्या कोई आर्थिक चिंता से घिरा हुआ है और आत्महत्या कर लेता है तो हम उसे आत्महत्या के लिए उकसाना मान लें? आत्महत्या के लिए उकसाने और सीधे प्रेरित करने के साक्ष्य होने चाहिए।”

बता दें कि हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने सोमवार (नवंबर 9, 2020) को 2018 की आत्महत्या के मामले में अर्णब की अंतरिम जमानत याचिका खारिज करने के बाद उन्हें सेशन कोर्ट भेज दिया था। वहीं अर्णब के वकीलों ने आज सुप्रीम कोर्ट में भी जमानत याचिका दायर की। न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और इंदिरा बनर्जी की पीठ के समक्ष बुधवार को इसकी सुनवाई हुई। इससे पहले न्यायमूर्ति एसएस शिंदे और एमएस कार्णिक की पीठ ने अर्णब गोस्वामी की जमानत याचिका खारिज कर दी थी।

लड़का तेजस्वी को, लड़की मोदी को… कुछ ऐसे जीती भाजपा मुस्लिम बहुल इलाकों को, ये वीडियो देखिए

बिहार में एक बार फिर एनडीए की अगुवाई में सरकार बनाने का जनादेश मिला है। तमाम एग्जिट पोल को पछाड़ते हुए नीतीश कुमार की अगुवाई में एनडीए ने जीत दर्ज की और अपने दम पर बहुमत के आँकड़े को पार कर लिया। वहीं, लालू पुत्र युवा नेता तेजस्वी यादव की अगुवाई में महागठबंधन के हाथ निराशा लगी है।

एनडीए की जीत की नायक इस बार भारतीय जनता पार्टी रही है, जिसने जदयू से कहीं ज्यादा सीट अपने दम पर हासिल की। इसके पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का बड़ा योगदान रहा है। बिहार में एनडीए की इस अप्रत्याशित जीत के लिए ‘तीन एम’ (3 M) फैक्टर सामने आया है, जिनके दम पर एनडीए फिर सरकार बनाती दिख रही है।

आइए देखते हैं क्या है बिहार चुनाव का ‘3M फैक्टर’ –

पहला फैक्टर: ‘एम’ से मोदी

तमाम सर्वे में इस बार दिख रहा था कि महागठबंधन एकतरफा जीत हासिल कर लेगा। वहीं, नीतीश कुमार के प्रति जनता में गुस्सा भी था। लेकिन जब बिहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीए की ओर से मोर्चा सँभाला तो हवा का रुख बदलना शुरू हुआ। पीएम मोदी ने करीब एक दर्जन सभाएँ की, कई रैलियों में वो नीतीश कुमार के साथ भी नजर आए। पीएम ने लगातार नीतीश की तारीफ की, लोगों से अपील करते हुए कहा कि उन्हें नीतीश सरकार की जरूरत है। 

इसके अलावा, केंद्र की योजनाओं का गुणगान हो, राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर विपक्ष पर वार करना हो या फिर राजद के जंगलराज का जिक्र कर तेजस्वी पर निशाना साधना हो, पीएम मोदी ने एनडीए के प्रचार को बखूबी आगे बढ़ाया, जिसने हार और जीत का अंतर तय कर दिया। नतीजों ने भी दिखाया कि जहाँ जदयू को सीटों में घाटा हुआ वहाँ पर बीजेपी की बढ़त ने एनडीए को बहुमत तक पहुँचा दिया।

दूसरा फैक्टर: ‘एम’ से महिलाएँ

एनडीए की जीत का एक अहम फैक्टर बिहार की महिला वोटर रहीं। बिहार में महिला वोटरों को नीतीश कुमार का पक्का मतदाता माना जाता रहा है, जो हर बार साइलेंट तरीके से नीतीश के पक्ष में वोट करता है। यही नतीजा इस बार के चुनाव में भी दिख रहा है। इसके अलावा महिलाओं का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी कई योजनाओं पर विश्वास 2019 के लोकसभा चुनाव में भी दिखा और अब फिर इसका असर पहुँचा है।

केंद्र सरकार की उज्ज्वला योजना, शौचालयों का निर्माण, पक्का घर, मुफ्त राशन, तीन तलाक, महिलाओं को आर्थिक मदद जैसी कई ऐसी योजनाएँ हैं जिनका सीधा लाभ महिलाओं को होता है। इसके अलावा राज्य सरकार द्वारा की गई शराबबंदी के पक्ष में भी बिहार की महिलाएँ बड़ी संख्या में नजर आती हैं। ऐसे में फिर एक बार एनडीए की जीत में 50 फीसदी आबादी निर्णायक भूमिका निभाते नजर आए हैं।

खुद पीएम मोदी ने बिहार चुनाव के नतीजों के बाद महिला वोटरों को खास तौर पर धन्यवाद किया। पीएम मोदी ने लिखा, “बिहार की बहनों-बेटियों ने इस बार रिकॉर्ड संख्या में वोटिंग कर दिखा दिया है कि आत्मनिर्भर बिहार में उनकी भूमिका कितनी बड़ी है। हमें संतोष है कि बीते वर्षों में बिहार की मातृशक्ति को नया आत्मविश्वास देने का NDA को अवसर मिला, यह आत्मविश्वास बिहार को आगे बढ़ाने में हमें शक्ति देगा।”

तीसरा फैक्टर: ‘एम’ से मुस्लिम 

बिहार में मुस्लिम मतदाता मुख्य रूप से राजद के साथ जुड़ता रहा है और यही कारण है कि राजद का ‘M+Y समीकरण’ निर्णायक माना जाता रहा है। राज्य में करीब 17 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं, जो हार जीत का अंतर पैदा कर सकते थे, लेकिन इस बार यही वोटर अलग-अलग हिस्सों में बँटते हुए नजर आए, जिसका फायदा एनडीए को हो गया।

इस बार के चुनाव में मुस्लिम वोटरों के परिवार में भी वोट बँटते नजर आए। टीवी 9 भारतवर्ष की ग्राउंड रिपोर्टिंग का वीडियो सर्कुलेट हो रहा है। यह वीडियो पटना के मुराद शाह की मजार के पास की है। जहाँ रिपोर्टर मुस्लिम वोटर मोहम्मद तौफीक सवाल करते हैं कि वो किसको वोट देने वाले हैं। इस पर मोहम्मद तौफीक तेजस्वी का नाम लेते हैं, तो वहीं पास में खड़ी महिला जो शायद उनकी बेगम थी, ने बेहिचक पीएम मोदी को वोट देने की बात कही। 

महिला ने आगे यह भी कहा कि वो झूठ नहीं बोल रही, मोदी जी ही जीतेंगे। कारण पूछने पर वह कहती हैं कि पीएम मोदी ने लोगों के लिए कई सारे काम किए। यहाँ पर स्पष्ट है कि मुस्लिम महिलाओं का वोट बीजेपी के खाते में गया है।

वहीं ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे युवाओं ने तेजस्वी यादव को वोट देने की बात कही थी। इसके अलावा, ऑपइंडिया ने अपनी ग्राउंड रिपोर्ट में पाया कि मुस्लिम बहुल केवटी में मोदी के नाम ने राजद के मुस्लिम-यादव समीकरण को नकार दिया। लोगों ने बताया कि लालू यादव ने 15 साल के शासन में सिर्फ लोगों को जातिवाद के नाम पर लड़ाया और अँगूठा दिखाया।

इस बार मुस्लिम मतदाताओं के सामने कई तरह के विकल्प थे, राजद की अगुवाई में महागठबंधन चुनाव लड़ रहा था तो वहीं बिहार में AIMIM ने भी बड़ी जीत हासिल की. इसके अलावा बसपा जैसी पार्टियाँ भी अपने क्षेत्र में मुस्लिम वोटरों को नहीं लुभा पाईं। असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM इस बार चुनाव में पाँच सीटों पर जीत हासिल कर पाई, जिसे राजद का बड़ा वोट माना जा रहा था और इन्हीं सीटों ने महागठबंधन की जीत में रोड़ा अटका दिया।

पीएम मोदी ने बिहार में अपने गठबंधन की जीत की इबारत लिख दी

बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर मतगणना से पहले एक हवा बनाई गई थी कि एनडीए गठबंधन इस बार हारने वाला है, क्योंकि तेजस्वी यादव ने बड़ी ही आसानी के साथ अपना जनाधार मजबूत कर लिया, लेकिन सामने आए नतीजों ने एक बार फिर सारे गुब्बारे फोड़ दिए हैं, जिसकी बड़ी वजह प्रधानमंत्री की रैलियाँ हैं क्योंकि एनडीए के विपरीत चल रही चुनावी हवाओं का रुख पलटकर पीएम मोदी ने बिहार में अपने गठबंधन की जीत की इबारत लिख दी है।   

बिहार चुनावों नतीजों के दिन वो लोग चुपचाप बैठे थे, जो लगातार एनडीए की हार के दावे कर रहे थे। इस बड़ी जीत की भूमिका प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लिखी है। प्रधानमंत्री को लेकर ये कहा जाने लगा था कि वो इस बार कोरोना की वजह से चुनाव प्रचार में शायद रैलियाँ नहीं करेंगे।

चुनाव नतीजों के दिन शुरूआती रुझानों को देखकर विपक्ष बेहद खुश था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं पीएम मोदी ने इस बार पहले की तरह ज्यादा रैलियाँ तो नहीं की, लेकिन जितनी भी रैलियाँ की वो एनडीए के लिए फायदेमंद रही और विपक्ष के तोते उड़ गए।

ऐसा पहली बार नहीं है कि विरोध में चल रही हवा को पीएम मोदी ने अपनी रैलियों से बेअसर कर दिया। गुजरात चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जहाँ कॉन्ग्रेस के सारे बीजेपी विरोधी एजेंडे की पीएम मोदी ने हवा निकाल दी थी और चुनाव नतीजों में प्रधानमंत्री एक बड़े चुनावी गेम चेंजर बनकर उभरे थे।

कुछ ऐसा ही इस बार बिहार विधानसभा चुनाव नतीजों में भी सामने आया है जिसमें बीजेपी राज्य की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनकर उभरी है, और उसे जिताने में सबसे बड़ी भूमिका है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की।

बात जो बाइडेन से और फोटो 12 साल पहले के US प्रेसिडेंट की… Pak के पूर्व गृहमंत्री की सोशल मीडिया बेइज्जती

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे अभी पूरी तरह आए भी नहीं हैं और जो बाइडेन की जीत का पाकिस्तान तक में जश्न मनाया जा रहा है। हास्यास्पद बात यह है कि पाकिस्तान के जो पूर्व मंत्री यूएस डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रत्याशी जो बाइडेन को ट्विटर पर शुभकामनाएँ देते पाए गए, उन्हें यह तक नहीं पता कि आखिर जो बाइडेन हैं कौन?

इन पूर्व मंत्री का नाम अब्दुल रहमान मलिक है। यह पाकिस्तान के पूर्व गृह मंत्री रह चुके हैं। इन्होंने आज सोशल मीडिया पर एक तस्वीर पोस्ट करते हुए जो बाइडेन को मुबारकबाद दी। ट्वीट में इन्होंने अफगान मुद्दे, सीरिया मुद्दे, चीन मुद्दे को सुलझाने के साथ ही कश्मीर मुद्दे पर भी समर्थन की अपेक्षा की। लेकिन सेनेटर रहमान मलिक नाम से ट्विटर पर मौजूद पूर्व गृहमंत्री की फजीहत तब होनी शुरू हुई, जब कुछ लोगों की नजर ट्वीट के साथ शेयर की गई तस्वीर पर पड़ी।

दरअसल, रहमान मलिक ने जिसे जो बाइडेन की तस्वीर समझकर अपने ट्वीट पर शेयर किया, वो पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की तस्वीर थी और जिस आत्मविश्वास के साथ उन्होंने इस तस्वीर पर अपनी राय रखी थी, उससे साफ पता चल रहा था कि उन्हें यह तक नहीं पता कि जो बाइडेन हकीकत में हैं कौन?

उन्होंने बस तस्वीर लगाकर दावा कर दिया कि जो बाइडेन ने तीन डेमोक्रेट्स पार्टीं के राष्ट्रपतियों के साथ काम किया है और उन्हें उम्मीद है कि वह स्वनिर्मित संकट से अमेरिका को उभारेंगे। साथ ही अफगान मुद्दे को सुलझाएँगे और सीरिया संकट का भी समाधान करेंगे।

दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान के पूर्व गृह मंत्री उन्हीं बाइडेन की जीत का जश्न मना रहे हैं, जो ओबामा के कार्यकाल में उप-राष्ट्रपति हुआ करते थे और तब पाकिस्तान में ड्रोन के जरिए बमबारी थोड़े-थोड़े समय में आम बात हो गई थी।

इसके अलावा बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब सेनेटर रहमान मलिक ने अपनी धूर्तता के कारण अपना ही मजाक बनवाया हो। इससे पहले भी वह अपने बयानों के जरिए और सोशल मीडिया पर ट्वीट करके प्रासंगिक मामलों पर अपनी अनभिज्ञता जताकर चर्चा में आते रहे हैं।

कुछ समय पहले ट्विटर के पॉपुलर यूजर @being_humor ने ट्विटर पर अपने और रहमान मलिक के बीच हुई बातचीत के स्क्रीनशॉट पोस्ट किए थे। इन स्क्रीनशॉट में उन्होंने रहमान को मैसेज में लिखा था कि पीएम मोदी के ख़िलाफ़ आवाज उठाने और अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध करने पर सीबीआई और ईडी ने चिदंबरम को गिरफ्तार कर लिया है। इतना ही नहीं उन्हें बुरी तरह मारा भी गया है। इस बातचीत में उन्होंने सिंघम फिल्म के एक सीन का इस्तेमाल करके रहमान को अपनी बात का यकीन दिलाया था।

बस फिर क्या? रहमान ने पाकिस्तान के एक जागरूक नागरिक की तरह इस मुद्दे को जानने में अपनी इच्छा व्यक्त की। उनसे उनका व्हाट्सअप नंबर माँगा, सबूत माँगे और अंत मे बिना मामले की प्रमाणिकता जाने यूजर से यह भी कहा कि वो इन तस्वीरों को संयुक्त राष्ट्र के साथ साझा करेंगे।

ऐसे ही इसी वर्ष जून में रहमान मलिक पर एक अमेरिकी फिल्म निर्माता ने बलात्कार का भी आरोप लगाया था। सिंथिया डॉन नाम की महिला ने पाकिस्तान के पूर्व गृहमंत्री को लेकर कहा था कि उन्होंने उसका 2011 में अपने आवास पर रेप किया था।

आया ऊँट पहाड़ के नीचे: I&B मंत्रालय के अंतर्गत आए OTT प्लेटफॉर्म्स, गालियों और सेक्स को बना लिया था कमाई का जरिया

मान लीजिए कि आप टीवी पर बैठ कर कुछ देख रहे हैं और आपका पूरा परिवार आपके साथ बैठा हुआ है, अचानक से माँ-बहन की गालियाँ दी जानी लगे और पोर्न चालू हो जाए? डिजिटल कंटेंट प्लेटफॉर्म्स ने कुछ ऐसा ही माहौल बना दिया था। OTT प्लेटफॉर्म्स के साथ यही समस्या थी। हर वो चीज जो टीवी पर नहीं आ सकती या सिनेमा हॉल्स में नहीं दिखाई जा सकती, उन्हें वहाँ दिखाया जा रहा था। अब वो ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल्स के साथ-साथ I&B मंत्रालय के अंतर्गत आ गए हैं

एकता कपूर के प्लेटफॉर्म ‘ऑल्ट बालाजी’ पर भी एक बी-ग्रेड शो ‘गन्दी बात’ आई थी, जिसमें अश्लीलता के अलावा कुछ था ही नहीं और इसके सहारे एक तरह से पोर्नोग्राफी को मुख्यधारा में लाया जा रहा था। इसमें महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक के नाम का आपत्तिजनक रूप से इस्तेमाल किया गया था। ये बस एक उदाहरण है, ‘पाताल लोक’ और ‘मिर्जापुर’ से लेकर ‘आश्रम’ तक, ऐसी चीजें लगातार होती रही हैं।

क्यों ज़रूरी था OTT प्लेटफॉर्म्स का नियंत्रण?

अब तक जितने भी वेब सीरीज आए हैं, उनमें कहानी जो भी हो लेकिन अश्लीलता ठूँसने पर पूरा जोर लगाया गया। उनके ऊपर किसी का नियंत्रण नहीं था। उन्हें किसी सेंसर बोर्ड से प्रमाण-पत्र नहीं लेना था। सेक्स और गालियों का मिश्रण कर के कुछ भी बना दिया, जिसे बच्चे भी देख रहे हैं। ऐसा कुछ तो है नहीं, जिससे बच्चों को ऐसे हानिकारण कंटेंट्स देखने से रोका जा सके। हर किसी का एक्सेस था ही, लॉगिन करो और देखो।

इंटरनेट पर एक से एक सामग्रियाँ उपलब्ध हैं। अगर किसी वेबसाइट को प्रतिबंधित कर दिया जाता है तो फिर VPN की मदद से या अन्य तरीकों से उसे देखने के कई माध्यम हैं। लेकिन, सामस्य ये थी कि अमेज़न, हॉटस्टार, एमएक्स प्लेयर, ऑल्ट बालाजी और नेटफ्लिक्स जैसे बड़े ब्रांड्स ऐसी-ऐसी सामग्रियों को मुख्यधारा में जोड़ कर उसका समान्यीकरण कर रहे थे, जो भद्दे और अश्लील होते हैं और महिलाओं के लिए भी अपमानजनक होते हैं।

हाल ही में रिलीज हुई कई वेब सीरीज में इसका उदाहरण भी देखा गया था, जिनमें न सिर्फ हिन्दूफोबिया को जम कर बढ़ावा दिया गया, बल्कि सेक्स दृश्यों और माँ-बहन की गालियों को ही फोकस में रखा गया। महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वालों ने भी महिलाओं के लिए लगातार आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग करने वाले इन वेब सीरीज पर चुप्पी साधे रखी। जो मन बना दो, परोस दो और रीच टीवी-सिनेमा से भी ज्यादा।

इससे पहले ‘इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ एक सेल्फ-रेगुलेशन कोड लेकर आया था, जिसे सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने नकार दिया था। इस पर 15 OTT प्लेटफॉर्म्स ने हस्ताक्षर कर के सेल्फ-रेगुलेशन की बात की थी। चूँकि सरकार ने भी सेल्फ-रेगुलेशन की बात कहते हुए सेंसरशिप की व्यवस्था को नकार दिया था, इन प्लेटफॉर्म्स ने उम्र की सीमाओं, कंटेंट के बारे में पूरी जानकारी और एक्सेस कंट्रोल सहित कई मुद्दों पर पारदर्शी बनने की बात कही थी।

केंद्रीय IB मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने की थी सेल्फ-रेगुलेशन की बात

हाल ही में ऑपइंडिया के सम्पादक अजीत भारती ने भी केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का इंटरव्यू लिया था, जिसमें उनसे इस विषय में सवाल पूछे गए थे। केंद्रीय मंत्री से जब पूछा गया कि डिजिटल मीडियम में फिलहाल किस तरह की चुनौतियाँ हैं? तो उन्होंने इसका जवाब देते हुए कहा था कि यह बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है और उनका मानना है कि डिजिटल मीडिया खुद ही इसे सेल्फ रेग्युलेट करे, लेकिन अगर उन्हें मदद चाहिए, तो वो मदद करने के लिए भी तैयार हैं। उन्होंने आगे कहा था:

“इसके अच्छे और बुरे दोनों तरह के नतीजे आ रहे हैं। इसलिए हमने OTT प्लेटफॉर्म को कहा है कि वो सेल्फ-रेग्युलेशन की अच्छी व्यवस्था करें। डिजिटल मीडिया से भी कह सकते हैं, क्योंकि कंटेंट ऑर्गेनाइज्ड होता है। लेकिन डिसऑर्गेनाइज्ड कंटेंट पर लगाम कसना थोड़ा मुश्किल है। एक मैकेनिज्म बनाइए, जिसकी विश्वसनीयता हो और किसी को भी इससे शिकायत न हो और उसके कारण सुधार होता रहे और अगर कोई नहीं करता है तो क्या करना है, इसका विकल्प हमेशा सरकार के पास खुले होते हैं।”

केंद्र सरकार ने तो इन प्लेटफॉर्म्स को कई बार मोहलत दी। मार्च 2020 की शुरुआत में ही उन्हें एक संस्था बना कर ‘कोड ऑफ कंडक्ट’ तैयार करने के लिए 100 दिनों का समय दिया गया था। नई दिल्ली में 45 मिनट तक चली बैठक में इन प्लेटफॉर्म्स ने ‘डिजिटल कंटेंट कंप्लेंट काउंसिल (DCCC)’ का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया था और अमेज़न प्राइम ने तो ऐसे किसी भी विचार पर आपत्ति भी जताई थी।

ऐसा नहीं है कि इससे पहले सरकार ने उन्हें नियम-कायदे बनाने को नहीं कहा था। अक्टूबर 2019 में भी प्रकाश जावड़ेकर ने उन्हें टोका था और कहा था कि वो खुद से अपने टर्म्स लेकर आएँ, जिस पर सब एकमत हो सकें। DCCC का गठन कर कर के फ़रवरी 2019 में रिटायर्ड जज एपी शाह को उसका अध्यक्ष बनाया गया था। मंत्री का सीधा कहना है था जो चीजें परिवार साथ में देखता है, उन्हें नियंत्रित किया जाना आवश्यक है।

इन प्लेटफॉर्म्स की खासियत ये है कि इसका इस्तेमाल कर के सरकारी योजनाओं और कानूनों को गलत रूप में पेश किया जा सकता है। चाइल्ड पोर्नोग्राफी को बढ़ावा मिलता है और महिलाओं का अपमान किया जाता है। एक खास नैरेटिव बनाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। धार्मिक भावनाओं को आहत करने और राष्ट्रीय प्रतीक चिह्नों का अपमान किया जाता है। और आजकल तो कॉमेडी शो भी खास एजेंडे के तहत इस पर डाले जाते हैं।

असल में इससे पहले जो सेल्फ-रेगुलेटरी मैकेनिज्म बनाया गया था, उसमें प्रतिबंधित कंटेंट्स को लेकर कोई क्लासिफिकेशन नहीं था, ऐसा सरकार का मानना था। इनके संगठनों में मात्र एक स्वतंत्र सदस्य थे, जो जाहिर है कि माइनॉरिटी में होता। फिर तो सब कुछ वैसे ही चलता, जैसे चलता आ रहा था। इसीलिए, अब उनका सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आने से प्रतिबंधित कंटेंट्स के प्रसारण को रोकने में मदद मिलेगी।

सोमवार (नवंबर 9, 2020) को ही केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हस्ताक्षर वाला गैजेट नोटिफिकेशन जारी किया, जिसमें बताया गया है कि सभी OTT प्लेटफॉर्म्स अब I&B मंत्रालय के अंतर्गत आ गए हैं। अभी तक इन कंटेंट्स के नियंत्रण के लिए न कोई ऑटोनोमस बॉडी है और न ही कोई क़ानून है। मीडिया के लिए PCI है और सिनेमा के लिए सेंसर बोर्ड, लेकिन ये अब तक खुले ही बेलगाम घूम रहे थे।

अब सवाल है कि आगे क्या? अब सरकार इन कंटेंट्स को नियंत्रित करने के लिए दिशा-निर्देश जारी करेगी और उन्हें इसका पालन करना पड़ेगा। अब कंटेंट्स बच्चों के देखने लायक नहीं हैं तो उन्हें अलग से क्लसिफाई करना पड़ेगा और स्पष्ट रूप से बताना होगा कि कौन से कंटेंट किस कैटेगरी में आते हैं। प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरह इनके लिए भी नियम-कायदे होंगे। हालाँकि, ये किस तरह का होगा – ये कुछ दिनों में स्पष्ट होगा। फ़िलहाल तो ये OTT प्लेटफॉर्म्स I&B मंत्रालय के अंतर्गत लाए गए हैं।

विनोद दुआ की सुनवाई रविवार को हो तो OK… अर्णब का केस भी लिस्ट हो तो गड़बड़: SC बार एसोसिएशन अध्यक्ष का दोहरा रवैया

‘सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन’ के अध्यक्ष दुष्यंत दवे ने सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल को पत्र लिख कर अर्णब गोस्वामी की याचिका पर तुरंत सुनवाई किए जाने के फैसले का विरोध किया है। अब जब अर्णब गोस्वामी एक सप्ताह से जेल में हैं, दुष्यंत दवे ने उनके मामले को सुनवाई के लिए लिस्ट किए जाने को ‘असाधारण त्वरित सुनवाई’ करार दिया। उन्होंने इस केस को लिस्ट किए जाने की जम कर निंदा की है।

उन्होंने इसे ‘सेलेक्टिव लिस्टिंग’ करार दिया है। उनका कहना है कि महामारी के इस समय में प्रभावशाली लोगों के मामले एक दिन में ही लिस्ट हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि वो ये पत्र इसीलिए नहीं लिख रहे हैं क्योंकि अर्णब गोस्वामी से उन्हें कोई व्यक्तिगत दुश्मनी है, वो किसी के भी सुप्रीम कोर्ट जाने के अधिकार के विरोधी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि जब कई लोग जेल में हैं और महीनों चली महामारी के समय सुप्रीम कोर्ट के सामने कई मामले पड़े हुए हैं, अर्णब गोस्वामी जब भी सुप्रीम कोर्ट जाते हैं तो उनका केस लिस्ट हो जाता है।

उन्होंने कहा कि जब लोग जेल में पड़े हुए हैं, अर्णब गोस्वामी को ‘स्पेशल ट्रीटमेंट’ दिया जाना अवैध और अनैतिक है। उन्होंने उदाहरण गिनाते हुए कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ता पी चिदंबरम तक के मामलों की भी त्वरित सुनवाई नहीं हुई थी, जिन्हें कई हफ्ते जेल में गुजारने पड़े। बाद में सुनवाई हुई और उन्हें जमानत दी गई। उन्होंने इसे प्रशासनिक अधिकारों का हनन बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि अर्णब गोस्वामी को खास ट्रीटमेंट दिया गया है।

हालाँकि, अब जब पूरा का पूरा लिबरल जमात अर्णब गोस्वामी को लेकर चुप है और मीडिया लॉबी भी उनकी गिरफ़्तारी का विरोध नहीं कर रही, दुष्यंत दवे के इस पत्र का एक ही उद्देश्य है कि ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ के संस्थापक और प्रधान संपादक के खिलाफ जो महाराष्ट्र के उद्धव ठाकरे सरकार द्वारा एकतरफा कार्रवाई की जा रही है, वो जारी रहे। वो पत्र लिख कर अपना दोहरा रवैया प्रकट कर रहे हैं। अर्णब गोस्वामी की पत्नी ने भी CJI को पत्र लिख कर इसकी निंदा की है।

उन्होंने जिस तरह से कहा कि बड़े वकीलों के प्रतिनिधित्व वाले प्रभावशाली लोगों के मामले तुरंत लिस्ट हो जाते हैं, उससे लगता है कि वो हरीश साल्वे पर भी निशाना साध रहे हैं। एक तरह से उन्होंने CJI बोबडे पर भी निशाना साधा है। लेकिन, वो अपने पत्र में कुछ बातें भूल गए हैं। जिस तरह से अर्णब गोस्वामी को 2018 का मामला खोल कर फँसाया गया, दवे को लगता है कि ये एकलौता ऐसा मामला है, जहाँ अर्जेन्ट लिस्टिंग हुई।

क्या दुष्यंत दवे को याद नहीं है कि किस तरह से पत्रकार विनोद दुआ की जमानत याचिका पर सुनवाई के लिए कोर्ट रविवार को भी खुला था। वो तो जेल में भी नहीं थे। यौन शोषण के आरोपों के मामले में ऐसा हुआ था। अगर विनोद दुआ का मामला रविवार को सुना जा सकता है तो फिर तब दुष्यंत दवे ने ऐसा कोई पत्र क्यों नहीं लिखा था? SCBA ने तब भी दुष्यंत का विरोध किया था, जब उन्होंने जस्टिस मिश्रा की सिर्फ इसीलिए निंदा की थी, क्योंकि उन्होंने पीएम मोदी की तारीफ की थी।

यूँ ही नहीं बन जाता कोई योगी आदित्यनाथ… जिन 18 सीटों पर किया प्रचार, 12 में विपक्षी को चटाई धूल

बिहार में हुई एनडीए की जीत ने एक बार फिर साबित कर दिया कि आखिर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को क्यों प्रभावशाली शख्सियतों में गिना जाता है। उन्होंने इन चुनावों में जिस तरह बिहार की जनता को अभिभूत किया, वह उल्लेखनीय है।

योगी आदित्यनाथ के हर एक भाषण ने जनता पर इस तरह जादू के जैसा काम किया, इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि मतदान के तीन चरणों मे उन्होंने जिन 18 सीटों के लिए कैंपेनिंग की, उसमें से 12 कैंडिडेट या तो जीते या फिर लीड करते रहे। यानी सीएम योगी का स्ट्राइक रेट इस बिहार चुनाव में कुल मिलाकर 67% रहा।

उन्होंने बख्तियारपुर, बिस्फी, कटिहार, केवटी, सीतामढ़ी, रक्सौल, वाल्मिकी नगर, झंझारपुर, लालगंज, दरौंदा, जमुई, कराकट, गरिया कोठी, सिवान, अरवल, पालिगंज, तरारी और रामगढ़ में अपनी रैलियाँ की थीं। 

इनमें से कराकाट, अरवल, पालिगंज, तरारी और रामगढ़ जैसे क्षेत्रों को यदि छोड़ दिया जाए तो एनडीए के प्रत्याशियों ने सभी सीटों पर अपनी जीत दर्ज की। जबकि बाकी बची 4 सीट सीपीआई (एमएल) के खाते में गई और रामगढ़ में भी अंत तक भाजपा ने राजद प्रत्याशी को काँटे की टक्कर दी।

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार भाजपा सूत्रों ने योगी आदित्यनाथ के प्रचार पर कहा कि स्टार प्रचारक के तौर पर योगी आदित्यनाथ के प्रचार में वोटों को अपनी ओर करने की क्षमता थी। भाजपा नेता स्वतंत्र देव सिंह ने सीएम योगी के लिए कहा कि वह न केवल एक सक्षम प्रशासक हैं, बल्कि उन प्रभावशाली नेताओं में से एक हैं, जो जातिगत रेखाओं के बावजूद मतदाताओं को अपने साथ लाने की क्षमता रखते हैं। 

जानकारों का ऐसा मानना है कि सीएम योगी आदित्यनाथ ने अपने भाषणों में ‘सीता का मायका’ जैसे प्रभावशाली शब्दों का इस्तेमाल करके जनता का दिल जीता। इसके बाद उन्होंने मोदी सरकार के जिन कार्यों का उल्लेख किया, उसने भी जनता पर प्रभाव छोड़ा।

अयोध्या में राम मंदिर मुद्दे पर केंद्र सरकार की प्रतिबद्धता हो या फिर राम जानकी पुल के निर्माण का ऐलान, योगी आदित्यनाथ ने अपनी हर बात को प्रभावशाली ढंग से रख कर मतदाताओं को एनडीए की ओर आकर्षित किया।

समय-समय पर राजद और कॉन्ग्रेस पर निशाना साधने के कारण भी जनता का ध्यान एनडीए की ओर अधिक गया। मतदाताओं ने इन इलाकों में एनडीए प्रत्याशियों को वोट देकर यह साबित भी किया कि उन्हें राजद के वादे खोखले लग रहे थे।

अपने प्रचार के दौरान योगी आदित्यनाथ ने मतदाताओं को राजद के 15 साल का कार्यकाल भी याद दिलाया था। उन्होंने सवाल खड़ा किया था कि आखिर यदि राजद की मंशा युवाओं को जॉब देने की थी तो 15 साल के कार्यकाल में ऐसा क्यों नहीं हुआ?

48 सीटों पर जीत-हार का फासला सिर्फ 3000 वोट: मतगणना में गड़बड़ी के आरोपों के बीच RJD-कॉन्ग्रेस में सिर फुटौवल

बिहार विधानसभा चुनाव की अंतिम तस्वीर साफ हो गई है। कल सुबह तक रुझान देख कर जिस एनडीए को लोगों ने हारा हुआ मान लिया था, उसी एनडीए ने शाम को बाजी मार कर सबको हैरान कर दिया। वहीं महागठबंधन ने कुछ सीटों से पीछे रह कर कइयों की उम्मीद पर पानी भी फेरा।

केवल पार्टी के लिहाज से देखें तो राजद और भाजपा के बीच कड़ा मुकाबला हुआ। जेडीयू का प्रदर्शन भी औसत था। मगर कॉन्ग्रेस इन चुनावों में भी अपने खराब प्रदर्शन के कारण पिछड़ी रही।

चुनाव आयोग की वेबसाइट पर रिजल्ट

भारतीय चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, 243 विधानसभा सीटों पर हुए चुनावों पर राजद को 75 सीटें मिली हैं तो वहीं भाजपा के खाते में 74 सीटें आई हैं। 43 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर जेडीयू है। कॉन्ग्रेस को इन चुनावों में केवल 19 सीट हाथ लगी है।

वोट प्रतिशत की बात करें तो सबसे ज्यादा वोट शेयर 23.1 प्रतिशत आरजेडी के खाते में गया है। वहीं कॉन्ग्रेस के हिस्से 9.48% और लेफ्ट के हिस्से 1.48% वोट गया है। एनडीए की बात करें तो बीजेपी ने 19.46%, जेडीयू ने 15.38% वोट पर अपना कब्जा जमाया है।

उक्त आँकड़े देख कर यह साफ है कि 125 सीटों के साथ राज्य में एनडीए की सरकार एक बार फिर बनने जा रही है। महागठबंधन को कुल 110 सीटें मिली हैं, जिसमें से सीपीआईएलएल ने 19 सीटों में से 12 पर अपना कब्जा जमाया।

चुनाव आयोग ने इस दौरान बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों पर बड़ा खुलासा भी किया। आयोग ने बताया कि 4 सीटों पर जीत-हार का अंतर महज 200 वोट हैं जबकि 24 सीटों पर जीत-हार का अंतर 1000 वोट हैं। 32 सीट पर 2000 वोटों का अंतर है। 48 सीटों पर जीत-हार का फासला सिर्फ 3000 वाेट है। 

चुनावों में देर रात पूर्ण बहुमत मिलने के बाद भाजपा के दिग्गज नेताओं ने इस जीत पर अपनी खुशी जाहिर की। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बिहार चुनाव परिणाम पर खुशी जताई। उन्होंने ट्वीट में लिखा “बिहार में विकास, प्रगति और सुशासन को पुनः चुनने के लिए प्रदेश के सभी भाइयों-बहनों का हृदय की गहराइयों से आभार व्यक्त करता हूँ मैं विशेषकर बिहार के युवाओं और महिलाओं को साधुवाद देता हूँ, जिन्होंने बिहार में सुरक्षा और उज्ज्वल भविष्य को चुनकर NDA की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।”

पीएम मोदी ने भी बिहार के गाँव-गरीब, किसान-श्रमिक, व्यापारी-दुकानदार, हर वर्ग को धन्यवाद दिया। उन्होंने लिखा, “बिहार के गाँव-गरीब, किसान-श्रमिक, व्यापारी-दुकानदार, हर वर्ग ने NDA के ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ के मूल मंत्र पर भरोसा जताया है। मैं बिहार के हर नागरिक को फिर आश्वस्त करता हूँ कि हर व्यक्ति, हर क्षेत्र के संतुलित विकास के लिए हम पूरे समर्पण से निरंतर काम करते रहेंगे।”

वहीं विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद राजद का प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग के दफ्तर पहुँचा। राजद के प्रवक्‍ता मनोज झा ने कहा कि राजद के कई प्रत्‍याशियों को जीत के बाद भी प्रमाण पत्र नहीं दिया गया है। ऐसे में किसी गड़बड़ी की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। मनोज झा ने वोट गिनती में गड़बड़ी का आरोप लगाया और कहा कि उन्हें आयोग ने शिकायतों की जाँच का भरोसा दिया है।

ऐसे ही कॉन्ग्रेस ने अपनी हार का विश्लेषण करने की जगह सारा ठीकरा राजद पर फोड़ा। रिपोर्ट्स के अनुसार कॉन्ग्रेस के एक पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि 70 सीटें भले मिलीं, लेकिन जो सीटें मिलनी चाहिए थीं, वो पार्टी ले नहीं पाई। उनका कहना है कि आरजेडी ने वही सीट दीं, जहाँ उसके लिए जीत हासिल करना मुमकिन नहीं था। कॉन्ग्रेस का कहना है कि उसे वही सीट मिली, जहाँ एनडीए बहुत मज़बूत था।

बता दें कि राजद और कॉन्ग्रेस में तालमेल की गड़बड़ी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चुनावी प्रचार के दौरान तेजस्वी और राहुल के बीच एक भी रैली नहीं हुई। प्रियंका गाँधी तक ने एक बार भी बिहार आना उचित नहीं समझा और बिना विश्लेषण के राजद, लेफ्ट और कॉन्ग्रेस की सीटों का बँटवारा कर दिया गया।

‘सरोवर बंद… 2 लोग ही पानी में उतरेंगे…’ – छठ पर्व पर पश्चिम बंगाल में लगाए गए कई प्रतिबंध

कलकत्ता हाईकोर्ट ने मंगलवार (नवंबर 10, 2020) को पश्चिम बंगाल में छठ पर्व मनाने सम्बन्धी जुलूस पर प्रतिबंध लगा दिया। कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल में आदेश जारी किया है कि छठ पर्व के दौरान पानी में परिवार के सिर्फ दो लोग ही उतर सकते हैं, उससे अधिक नहीं। कोलकाता की दो सबसे बड़ी झीलों रवींद्र सरोवर और सुभाष सरोवर में भी छठ महपर्व के आयोजन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है, जिससे हिन्दुओं में निराशा है।

इससे पहले ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT)’ ने रवींद्र सरोवर में छठ पर्व के आयोजन को प्रतिबंधित कर दिया था। हाईकोर्ट के वकील सब्यसाची चैटर्जी ने बताया कि कलकत्ता हाईकोर्ट ने छठ पर्व के जुलूस पर रोक लगा दी है। साथ ही कहा है कि एक परिवार से दो लोग से ज्यादा पानी में उतर कर पूजा नहीं कर सकते। साथ ही गाड़ी से आने वाले श्रद्धालुओं को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने को कहा गया है।

इतना ही नहीं, उनके गाड़ी से उतरने पर भी प्रतिबंध रहेगा। साथ ही जिसके घर में छठ पर्व हो रहा है, उस परिवार के अन्य सदस्यों को घर में रह कर ही इसे देखना पड़ेगा। साथ ही हर समय मास्क पहने रखने को अनिवार्य कर दिया गया है और कहा गया है कि घर के आसपास से ही छठ पर्व मनाएँ। नवंबर 2020 में ही कलकत्ता हाईकोर्ट ने काली पूजा और छठ पूजा सहित सभी त्यौहारों में पटाखे उड़ाने पर प्रतिबंध लगा दिया था।

नवंबर 30, 2020 तक कोलकाता में किसी भी प्रकार के पटाखे उड़ाने पर प्रतिबंध लगाते हुए पुलिस को निर्देश दिया गया है कि वो पटाखों के क्रय-विक्रय पर निगरानी रखे और इस पर रोक लगाए। हाईकोर्ट और NGT, दोनों ने ही ये आदेश जारी किया है। नवंबर 2019 में भी NGT ने रवींद्र सरोवर में छठ पर रोक लगाई थी लेकिन श्रद्धालुओं ने दरवाजा तोड़ कर अंदर घुस छठ पर्व मना कर अपना आक्रोश जताया था।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस की सरकार ने छठ पूजा को लेकर अलग तालाब की व्यवस्था करने की बात कही थी। पिछले वर्ष सरोवर के पास पटाखे भी खूब फोड़े गए थे और ड्रम बना कर श्रद्धालुओं ने पर्व को मनाया था। अब कलकत्ता हाईकोर्ट ने इसे पूरी तरह बंद रखने को कहा है, ताकि यहाँ छठ न मनाया जा सके। किसी भी क्षेत्र में लोगों की मौजूदगी को नियंत्रित करने के लिए धारा-144 लगाने का भी सरकार को निर्देश दिया गया है।

‘सन्मार्ग’ की खबर के अनुसार, जस्टिस संजीव बनर्जी ने अपने आदेश में कहा कि छठ पूजा करने वाले लोग तब तक रवींद्र सरोवर और सुभाष सरोवर से फासला बना कर रखें, जब तक सुप्रीम कोर्ट का आदेश नहीं आ जाता। डिविजन बेंच ने कोलकाता में KMC सहित उन क्षेत्रों में जहाँ छठ पूजा होती आई है, की नगरपालिकाओं को माइक से प्रचार कर के लोगों से अपील करने का आदेश जारी किया है। साथ ही डिविजन बेंच ने ये भी आदेश दिया कि छठ पूजा करने वालों को कोरोना वायरस को लेकर जारी दिशा-निर्देशों का पालन करना होगा।

महापर्व छठ को लेकर बिहार में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसकी चर्चा की थी। बिहार के साथ अपने लगाव की बात करते हुए छपरा में पीएम मोदी ने कहा था कि कोरोना के काल में किसी माँ को ये चिंता करने की जरूरत नहीं है कि छठ पूजा को कैसे मनाएँगे। पीएम मोदी ने बिहार के छपरा में कहा था, “अरे मेरी माँ! आपने अपने बेटे को दिल्ली मैं बिठाया है, तो क्या वो छठ की चिंता नहीं करेगा! माँ! तुम छठ की तैयारी करो, दिल्ली में तुम्हारा बेटा बैठा है।” बता दें कि छठ इस बार 20-21 नवंबर को है।