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‘नपुंसक राजनीतिक नेतृत्व’: कॉन्ग्रेस के किस ‘सबसे बड़े नेता’ के लिए ओवैसी ने सबके सामने बोल दी इतनी ‘गंदी बात’

असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM को बिहार में हुए विधानसभा चुनावों में 5 सीटें प्राप्त हुईं। सीमांचल में उन्हें मिली सफलता के बाद मीडिया में ये आकलन होने लगा कि क्या इससे राजद को नुकसान हुआ है? ‘इंडिया टुडे’ पर इसे लेकर हो रही चर्चा में असदुद्दीन ओवैसी ने राजदीप सरदेसाई के सवालों का जवाब देते हुए न सिर्फ उन्हें आईना दिखाया, बल्कि कॉन्ग्रेस पार्टी को भी जम कर लताड़ लगाई।

दरअसल, राजदीप सरदेसाई ने कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा से पूछा कि क्या वो अपनी पार्टी की तरफ से AIMIM से अपील करना चाहते हैं कि वो महागठबंधन में आएँ? इसके जवाब में खेड़ा ने कहा कि वो ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि वो इसके लिए अधिकृत नहीं हैं और ये चीजें पार्टी में एक अलग स्तर पर की जाती है। उन्होंने कहा कि ओवैसी की पार्टी को कहीं से भी लड़ने का अधिकार है और इस पर कोई सवाल नहीं उठा सकता, लेकिन वो ‘कट्टर दक्षिणपंथ’ का हिस्सा बन गए हैं।

उन्होंने दावा किया कि कॉन्ग्रेस दोनों तरफ से चलती है। उन्होंने कहा कि भाजपा की ‘सांप्रदायिकता’ का ये जवाब नहीं है कि इसके जवाब में मुस्लिमों को भी कट्टर बनाया जाए। इसके बाद राजदीप सरदेसाई ने ओवैसी से कहा कि आपने सीमांचल में गरीब मुस्लिमों और मुस्लिम युवाओं तक पहुँच बनाई, क्या मुस्लिमों को कट्टर बनाना भाजपा का जवाब है? इसके जवाब में ओवैसी ने कहा कि ये कॉन्ग्रेस पार्टी की ‘इंटेलेक्टुअल बेईमानी’ का प्रमाण है।

उन्होंने कहा कि अगर वो कोई चुनाव लड़ रहे हैं तो वो इसीलिए क्योंकि युवाओं को कोई कट्टर न बनाए, क्योंकि दूसरे उनकी आवाज़ को नहीं उठाते। ओवैसी ने पूछा कि इन सबके बावजूद उन पर आरोप लगाए जा रहे हैं? उन्होंने खेड़ा से कहा कि आपकी पार्टी के नेताओं ने हमारी पार्टी के कार्यकर्ताओं के हाथ-पाँव तोड़ने की धमकी दी, एक जगह कार तोड़ डाली गई, क्या ये सब कट्टरता नहीं है? उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस हर सीट हारती है और उसके विधायक भाग जाते हैं, ये किस किस्म की राजनीति है?

उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी के साथ ये समस्या है कि वो सोचती है कि सभी उसके सामने झुकें लेकिन वो ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि अब कॉन्ग्रेस के दिन लद गए हैं। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे कॉन्ग्रेस 70 सीटों पर चुनाव लड़ी और उसे मात्र 19 सीटें मिलीं। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी चुनाव इसीलिए लड़ती है, ताकि कट्टरता हावी न हो। उन्होंने पूछा कि राजीव गाँधी ने राम मंदिर का शिलान्यास किया, क्या वो कट्टरता नहीं थी?

असदुद्दीन ओवैसी ने कॉन्ग्रेस पार्टी को जम कर धोया

उन्होंने पूछा कि किसके प्रधानमंत्रीत्व काल में बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किया गया? पवन खेड़ा ने आरोप लगाया कि आज नरेंद्र मोदी के चेहरे पर बिहार को लेकर मुस्कान है, इसका कारण ओवैसी हैं। इसके बाद ओवैसी ने कॉन्ग्रेस को धो दिया। उनसे पूछा गया कि क्या उनका ये प्लान है कि ज्यादा से ज्यादा मुस्लिम वोट्स पाकर कॉन्ग्रेस को नुकसान पहुँचाएँ? इस पर ओवैसी ने पूछा कि ‘शिवसेना के साथ हनीमून’ मनाने वाली कॉन्ग्रेस बता सकती है कि क्या शिवसेना एक सेक्युलर पार्टी है?

असउद्दीन ओवैसी ने कहा कि आज भाजपा सत्ता में है, तो इसका कारण कॉन्ग्रेस ही है। उन्होंने कॉन्ग्रेस के नेतृत्व को ‘नपुंसक’ करार दिया। उन्होंने पवन खेड़ा से कहा कि आपकी पार्टी का नेतृत्व नरेंद्र मोदी से लड़ने में अक्षम है, इसीलिए भाजपा आज सत्ता में है। उन्होंने कहा कि जब तक वो ज़िंदा हैं, चुनाव लड़ते रहेंगे और सेक्युलरिज्म को ज़िंदा रखेंगे। उन्होंने कॉन्ग्रेस को ‘Mind Your Language’ कह कर उसे अपनी औकात की याद दिलाई।

कॉन्ग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी को ‘वोट कटुआ’ कहा है। चौधरी ने कहा कि बिहार चुनाव में AIMIM भाजपा की ‘चालबाजी’ थी और उसे भाजपा ने कॉन्ग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल किया। उन्होंने सभी ‘धर्मनिरपेक्ष’ दलों से ओवैसी से सावधान रहने को भी कहा। वहीं, AIMIM का कहना है कि उन्हें वोट कटुआ कहने वालों को ‘बेफिटिंग जवाब’ मिल गया है।

गाँधी के चम्पारण में NDA को 17 सीटें, तिरहुत में अकेले BJP को 25 सीट: भाजपा का वो गढ़, जिसे उसने बचा लिया

अब जब बिहार में NDA ने पूर्ण बहुमत प्राप्त कर लिया है, आपको उस क्षेत्र के बारे में बताना जरूरी है, जिसने इसमें सबसे ज्यादा योगदान दिया है और वो है चम्पारण का क्षेत्र। नेपाल से सटे चम्पारण के मोतिहारी और बगहा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली भी हुई। पूर्वी चम्पारण और पश्चिम चम्पारण, इन दोनों जिलों को मिला दें तो NDA को 21 में 17 सीटें मिलीं। इनमें से 15 सीटें तो अकेले भाजपा की हैं, जबकि दो जदयू को मिली।

वहीं महात्मा गाँधी के आंदोलन की धरती चम्पारण में महागठबंधन को बुरी तरह मात मिली। ये पूरा क्षेत्र एक तरह से पिछले एक दशक से भी अधिक समय से भाजपा के गढ़ के रूप में तब्दील हो चुका है। बिहार में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल और पार्टी के राष्ट्रीय चुनाव अधिकारी राधा मोहन सिंह यहाँ से सांसद हैं, इसीलिए पार्टी के लिए अपने गढ़ को बचाना प्रतिष्ठा का भी विषय था, जो उसने बखूबी किया। राधा मोहन सिंह भी प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं।

इस तरह से अगर पूरे तिरहुत प्रमंडल को मिला दें तो यहाँ भी NDA, खासकर भाजपा को बहुत बड़ी बढ़त मिली है। तिरहुत में NDA को 31 सीटें मिलीं, जिनमें से 25 तो अकेले भाजपा को ही मिली। राजद को 13 और कॉन्ग्रेस को मात्र 2 सीटों से संतोष करना पड़ा। इनमें वाल्मीकि नगर से युवा विधायक रिंकू सिंह और रामनगर से भागीरथी देवी की जीत महत्वपूर्ण है, जो उत्तर बिहार में भाजपा का दलित चेहरा भी हैं और पहले सफाईकर्मी हुआ करती थीं।

चम्पारण के मोतिहारी से राज्य के पर्यटन मंत्री प्रमोद कुमार ने आसान जीत दर्ज की। वहीं मधुबन विधानसभा क्षेत्र से राज्य के कोऑपरेटिव मंत्री राणा रणधीर विजयी हुए। प्रमोद कुमार का ये लगातार चौथा कार्यकाल होगा और राणा रणधीर का लगातार दूसरा। केसरिया से जदयू की चर्चित उम्मीदवार शालिनी मिश्रा की जीत भी अहम है। इनमें से एक सीट पर मुस्लिम 30% से ज्यादा हैं, वो है शिवहर। वहाँ से राजद ने जीत दर्ज की

शिवहर से ‘बाहुबली’ नेता आनंद मोहन और लवली आनंद के बेटे चेतन आनंद विजयी हुए। उन्होंने जदयू के सिटिंग विधायक मोहम्मद सर्फुद्दीन को हराया। ये वही क्षेत्र है, जहाँ श्रीनारायण सिंह नामक प्रत्याशी की हत्या कर दी गई थी। वहीं तिरहुत प्रमंडल में 6 ऐसी सीटें हैं, जहाँ यादवों की जनसंख्या 30% से भी ज्यादा है, इनमें से 4 राजद को और 2 भाजपा को मिली। इससे पता चलता है कि भाजपा ने बिहारी पार्टियों के बनाए जातीय चक्रव्यूह को तोड़ दिया।

तिरहुत प्रमंडल में अगर 2015 के चुनाव की बाते करें तो यहाँ उस वक़्त भी भाजपा अकेले ही 18 सीटें लेकर आई थी। उस चुनाव में साथ लड़ रही जदयू-राजद 23 सीट जितने में कामयाब रही थी। उस चुनाव में भाजपा को मात्र 53 सीटें ही मिली थीं, और उसका एक तिहाई इसी क्षेत्र में था। और पीछे जाएँ तो 2010 में इस प्रमंडल में NDA को अभूतपूर्व रूप से 49 में से 45 सीटें मिली थीं। इस तरह से चम्पारण के कारण तिरहुत भाजपा का गढ़ रहा है।

पूरे बिहार में अब अगर हर चरण की बात करें तो पहले चरण में 71, दूसरे में 94 और तीसरे में 78 सीटों पर मतदान हुआ। NDA का सीट शेयर हर चरण के साथ बढ़ता ही चला गया। ये क्रमशः 29.6%, 52.1% और 66.7% रहा। हमारे अनुमानों के मुताबिक ही, महागठबंधन का सीट शेयर हर चरण के साथ घटता ही चला गया और ये क्रमशः 67.6%, 46.8% और 26.9% रहा। अक्टूबर 28, नवंबर 3 और 7 को तीनों चरण के लिए मतदान संपन्न हुआ था।

चम्पारण वो क्षेत्र है, जो 2015 में सबसे कठिन समय में भी भाजपा के साथ रहा। ये वो क्षेत्र है, जहाँ से 1989 में ही लोकसभा में कमल खिला। ये वो क्षेत्र है, जहाँ जनसंघ के दिनों में भी पार्टी नेताओं की सक्रियता रही। आपातकाल के समय अटल बिहारी वाजपेयी ने यहाँ आकर गिरफ़्तारी दी। ऐसे में भाजपा के दो वरिष्ठ नेताओं के मार्गदर्शन में यहाँ से कई युवा विधायक भी चुने गए हैं, महिलाएँ भी हैं। बिहार विधानसभा में क्षेत्र की अच्छी उपस्थिति रहेगी।

हर चरण के साथ बढ़ता गया NDA: जहाँ हुए सारे Poll-पंडित फेल, उस बिहार चुनाव का सबसे सटीक अनुमान लगाया था OpIndia ने

बिहार में हुए विधानसभा चुनाव की मतगणना मंगलवार (नवंबर 10, 2020) की देर रात संपन्न हो गई और इसके साथ ही भाजपा प्रदेश में 74 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी। राजद को उससे एक ज्यादा, यानी 75 सीटें मिलीं। जहाँ कई राजनीतिक पंडितों और एग्जिट पोल्स ने महागठबंधन की जीत का अनुमान लगाया था, ऑपइंडिया ने अपनी ग्राउंड कवरेज के बाद चुनाव परिणामों का सटीक अंदाज़ा लगाया और NDA की जीत की बात कही। इतना ही नहीं, इस अनुमान में हर चरण का भी सटीक अनुमान लगाया गया था।

हम ये कहते रहे कि राज्य में NDA की सरकार ही बनने जा रही है, क्योंकि लालू के छोटे बेटे तेजस्वी यादव एक नेता के रूप में नीतीश कुमार का विकल्प बनने में असफल रहे। और हुआ भी यही। राजग 125 सीटें जीत कर बहुमत के लिए ज़रूरी 122 सीटों के आँकड़े से आगे निकल गया। इस तरह से नीतीश कुमार फिर से बिहार के मुख्यमंत्री होंगे और 2005 से बिहार में शुरू हुआ राजद का राजनीतिक वनवास जारी रहेगा।

7 नवंबर को लगाए गए अनुमान में 2 मिनट 40 सेकंड के बाद और 31 मिनट के बाद सुनिए लगभग शत-प्रतिशत सही भविष्यवाणी

ऑपइंडिया ने अपने विश्लेषणों में अनुमान लगाया था कि जहाँ पहले चरण के चुनावों में विपक्ष को बढ़त थी, वहीं जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ते गए, NDA बहुमत की ओर बढ़ता चला गया। चुनाव में किसी की हवा नहीं थी, लेकिन मोदी सरकार की जन-कल्याणकारी योजनाओं ने भाजपा को फायदा पहुँचाया। हम ये भी कहते रहे थे कि जदयू की सीटें घटनी तय हैं। राजद सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है, लेकिन सरकार NDA की ही बनेगी

अब अगर हर चरण की बात करें तो पहले चरण में 71, दूसरे में 94 और तीसरे में 78 सीटों पर मतदान हुआ। NDA का सीट शेयर हर चरण के साथ बढ़ता ही चला गया। ये क्रमशः 29.6%, 52.1% और 66.7% रहा। हमारे अनुमानों के मुताबिक ही, महागठबंधन का सीट शेयर हर चरण के साथ घटता ही चला गया और ये क्रमशः 67.6%, 46.8% और 26.9% रहा। अक्टूबर 28, नवंबर 3 और 7 को तीनों चरण के लिए मतदान संपन्न हुआ था।

इस तरह से हर चरण के साथ बिहार में भाजपा और जदयू की गठबंधन का वोट प्रतिशत और सीट शेयर बढ़ता ही चला गया, जबकि कई टीवी चैनलों ने पहले चरण के ही अनुमान के आधार पर मान लिया कि तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। राजग को 125 में से 105 सीटें दूसरे और तीसरे चरण में ही मिली, क्योंकि पहले चरण में उसके पास काफी कुछ दाँव पर था भी नहीं। इस तरह से ऑपइंडिया का हर अनुमान सटीक साबित हुआ।

बिहार चुनाव में मतगणना के दौरान आँकड़ों में हुई उलट फेर ने दोबारा से ईवीएम को ‘हैक’ करवा दिया है। NDA को दोपहर होते-होते सीटों में बढ़त क्या मिली, ट्विटर पर ईवीएम के ऊपर इल्जाम लगने शुरू हो गए। कॉन्ग्रेस नेता उदित राज ने तो इस ईवीएम हैक को सही बताने के लिए पूरे चुनाव को मंगल ग्रह और चाँद तक से जोड़ दिया। वहीं पुष्पम प्रिया ने सीधे तौर पर भाजपा पर इसका आरोप मढ़ा। अब परिणाम आने के बाद तो ये क्रंदन और तेज हो गया है।

ओवैसी के घर पर ‘वोट कटुओं’ ने जमकर फोड़े पटाखे, कॉन्ग्रेस ने AIMIM को बताया BJP का मोहरा

बिहार चुनाव के नतीजे आने पर जहाँ महागठबंधन हार की दहलीज पर खड़ा है तो वहीं ओवैसी की पार्टी AIMIM के समर्थक बिहार में एक सीट जीतने के जश्न में ओवैसी के निवास पर जमकर पटाखे फोड़ रही है। दूसरी तरफ, कॉन्ग्रेस अपनी सीटों पर हुए नुकसान के लिए ओवैसी की पार्टी को ‘वोट कटुआ’ भी बता रही है। यही नहीं, तमाम भाजपा विरोधी फेसबुक एकाउंट्स ओवैसी को फासिस्ट-एजेंट और वोट कटुवा कहकर गाली भी दे रहे हैं।

कॉन्ग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी को ‘वोट कटुआ’ कहा है। चौधरी ने कहा कि बिहार चुनाव में AIMIM भाजपा की ‘चालबाजी’ थी और उसे भाजपा ने कॉन्ग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल किया। उन्होंने सभी ‘धर्मनिरपेक्ष’ दलों से ओवैसी से सावधान रहने को भी कहा। वहीं, AIMIM का कहना है कि उन्हें वोट कटुआ कहने वालों को ‘बेफिटिंग जवाब’ मिल गया है।

गौरतलब है कि ओवैसी की पार्टी AIMIM ने विधानसभा चुनाव में एक सीट पर जीत हासिल की है और बिहार में चार सीटों पर आगे चल रही है। AIMIM ने अमौर विधानसभा क्षेत्र से अकरतारुल इमान, कोचाधाम विधानसभा क्षेत्र से मुहम्मद इज़हार असफी, जोकीहाट विधानसभा क्षेत्र से शाहनवाज़ आलम, बैसी विधानसभा क्षेत्र से सैयद रक्नुद्दीन और बहादुरगंज विधानसभा क्षेत्र से अज़हर नईमी को मैदान में उतारा था।

औवेसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने बिहार के सीमांचल में 14 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जहाँ मुस्लिमों की अच्छी खासी आबादी है। बिहार चुनाव में सामने आ रहे रुझान के अनुसार, जदयू की अगुवाई में चुनाव लड़ी रही एनडीए इस क्षेत्र की कई सीटों पर आगे चल रही है। यही वजह है कि इस इलाके में कॉन्ग्रेस के अपने लिए बढ़त बनाने की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी हैं।

सोशल मीडिया पर भी कई भाजपा-विरोधी ओवैसी को जमकर लताड़ लगाते हुए उन्हें फ़ासिस्ट और भाजपा का मोहरा बता रहे हैं। 

तेलंगाना में AIMIM ने जश्न में फोड़े पटाखे

तेलंगाना में असदुद्दीन ओवैसी के निवास के बाहर उनके पार्टी समर्थक जीत का जश्न भी मनाते नजर आ रहे हैं। यह आतिशबाजी ऐसे समय में की जा रही है, जब हिन्दुओं के आने वाले त्योहार दीपावली को लेकर तमाम राज्य पटाखों की बिक्री से लेकर पटाखे फोड़ने तक पर प्रतिबंध लगा रहे हैं।

अर्णब की जमानत को लेकर SC में कल होगी सुनवाई: सुरक्षा को लेकर भी बढ़ी चिंता, सेशन कोर्ट ने बृहस्पतिवार तक टाली हियरिंग

अर्णब गोस्वामी ने अपनी अंतरिम जमानत याचिका खारिज करने के बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। सुप्रीम कोर्ट कल (नवंबर 11, 2020) रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्णब गोस्वामी की अंतरिम जमानत याचिका पर सुनवाई करेगा।

बता दें कि हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने सोमवार को 2018 की आत्महत्या के मामले में उनकी अंतरिम जमानत याचिका खारिज करने के बाद अर्णब को सेशन कोर्ट भेज दिया था। वहीं अर्णब के वकीलों ने आज सुप्रीम कोर्ट में भी जमानत याचिका दायर की है। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और इंदिरा बनर्जी की पीठ के समक्ष कल यह सुनवाई की जाएगी।

गौरतलब है कि इससे पहले न्यायमूर्ति एसएस शिंदे और एमएस कार्णिक की पीठ ने अर्णब गोस्वामी की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि उनके पास सेशन कोर्ट में अपील करने का विकल्प देते हुए कहा था कि वह सेशन कोर्ट में भी जमानत याचिका दायर कर सकते हैं। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने सेशन कोर्ट को चार दिन के अंदर इस मामले पर फैसला सुनाने के लिए कहा था।

इस बीच, अलीबाग सत्र अदालत ने अर्णब गोस्वामी की नियमित जमानत याचिका को आज सुनवाई के बाद, बृहस्पतिवार को अगली सुनवाई के लिए टाल दिया है। पुलिस ने तर्क दिया है कि यदि सत्र अदालत पुलिस हिरासत देती है, तो जमानत याचिका अनैतिक हो जाएगी। सत्र अदालत में मुंबई पुलिस ने अर्णब गोस्वामी की न्यायिक हिरासत को चुनौती देते हुए जमानत अर्जी और पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई के लिए अर्जी दिया है जिसपर भी बृहस्पतिवार को सुनवाई होगी।

इसके अलावा आज मंगलवार को तलोजा जेल में रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ अर्णब की सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दो याचिकाएँ दायर की गई हैं। इन याचिकाओं में अर्णब के लिए अंतरिम राहत देने और महाराष्ट्र पुलिस को उनकी पूछताछ की प्रक्रिया के लिए निर्देश जारी करने का भी अनुरोध किया गया है।

रिपब्लिक मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के वकील सुभाष झा और आचार्य विक्रमादित्य द्वारा शीर्ष अदालत में दोनों याचिकाओं को अलग-अलग दायर किया गया है और दोनों में जेल में अर्णब गोस्वामी की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, आचार्य विक्रमादित्य ने अपनी दलील में शीर्ष अदालत से डीडी बसु मामले में दिए गए आदेश को याद दिलाते हुए मुंबई पुलिस को निर्देश जारी करने का अनुरोध किया है, जिसमें कानून के तहत, गिरफ्तार लोगों से पूछताछ करने वाले सभी लोगों के नाम को रिकॉर्ड पर रखने की जरूरत होती है। इसमें याचिका में यह भी कहा गया है, “गिरफ्तारी के ज्ञापन को परिवार के एक सदस्य द्वारा सत्यापित किया जाना चाहिए जिन्हें उनके ठिकाने के बारे में अवगत कराया जाना चाहिए जहाँ उन्हें ले जाया जा रहा है।”

गौरतलब है कि अर्णब गोस्वामी को चार नवंबर को उनके घर से 2018 के अन्वय नाइक मामले में, एक बंद हुए केस में गिरफ्तार किया गया था। जिसके बाद महाराष्ट्र पुलिस ने उन्हें अलीबाग कोर्ट में पेश किया था। कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए अर्णब को 14 दिनों के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। जिसके बाद उन्हें अलीबाग क्वारंटाइन सेंटर में रखा गया था। हालाँकि, आठ नवंबर को अर्णब गोस्वामी को मोबाइल चलाने का आरोप लगाकर तलोजा जेल शिफ्ट कर दिया गया था।

कोर्ट ने रद्द की पुलिस पर फायरिंग करने वाले शाहरुख की जमानत याचिका, रवीश ने बताया था ‘अनुराग’

दिल्ली की एक अदालत ने पूर्वोत्तर दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के दौरान पुलिस पर फायरिंग करने वाले शाहरुख पठान की अंतरिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। शाहरुख पठान की तस्वीर सांप्रदायिक दंगों के दौरान एक निहत्थे दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल पर बंदूक तानते हुए सोशल मीडिया पर वायरल भी हुई थी ।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत ने कहा कि शाहरुख पठान के आचरण से, जिस तरह से वह घटना के बाद फरार हो गया था और बाद में गिरफ्तार कर लिया गया था, सुझाव दिया कि वह फिरसे फरार हो सकता है, जिस कारण आरोपित को राहत नहीं दी जा सकती।

अदालत ने कहा कि पुलिस कांस्टेबल पर पिस्तौल तानने का अर्थ है कि आरोपित कानून को खिलवाड़ समझता है। इस घटना के संबंध में रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि उसकी प्रवृति ऐसी नहीं है कि उसे राहत दी जा सके। शाहरुख पठान ने अपनी माँ के इलाज के लिए अंतरिम जमानत देने की माँग की थी। उसने याचिका में कहा कि उसकी माँ की पीठ और रीढ़ की हड्डी में चोट लगने की वजह से उनकी सर्जरी होनी है। इसलिए उसे अपनी माँ का ख्याल रखने के लिए अंतरिम जमानत चाहिए।

इसके अलावा, शाहरुख ने अपनी याचिका में अपने पिता के घुटने की सर्जरी का भी हवाला दिया था मगर अदालत ने कहा कि उसकी माँ और पिता का ध्यान उनके परिजन रख सकते हैं।

शाहरुख पठान पर आरोप है कि उसने साम्प्रदायिक दंगों में भाग लिया था और इसकी विधिवत पहचान भी की गई थी। अदालत ने नवंबर 09, 2020 को दिए गए अपने आदेश में पठान की याचिका पर संज्ञान लेने के साथ ही इस बात पर भी गौर किया कि उसके पिता पर भी मादक पदार्थ की तस्करी के मामले में सजा दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि आरोपित शाहरुख की ओर से दी गई दलीलें राहत देने के लिए नाकाफी हैं। सीएए के विरोध में हुए दंगे में हथियार के साथ शामिल होना साधारण अपराध नहीं है।

‘दंगे की जगह से गुजर रहा था शाहरुख, किसी ने थमा दी बन्दूक’

शाहरुख पठान के वकील सुनील मेहता ने जमानत के दौरान दलील दी कि साम्प्रदायिक दंगे के दौरान उनका मुवक्किल घटनास्थल से गुजर रहा था, उसी दौरान हुई पत्थरबाजी के दौरान वह एक शेल्टर के नीचे जाकर छिपने लगा, लेकिन वहाँ उसे जगह नहीं मिली। वकील ने शाहरुख के बचाव में कहा कि जब वो जगह तलाश रहा था तभी भीड़ में से ही किसी अनजान आदमी ने उसे पिस्तौल थमा दी, जिसका इस्तेमाल शाहरुख ने अपनी सुरक्षा के लिए किया था।

गौरतलब है कि ये वही शाहरुख पठान है जिसे NDTV के प्रोपेगेंडा पत्रकार रवीश कुमार ने ‘अनुराग’ साबित करने का प्रयास किया था और इस बहाने जमकर फेक न्यूज़ भी फैलाई थी।

फरवरी 24, 2020 को दिल्ली के मौजपुर-जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के पास पथराव और झड़पें हुईं थीं, और आरोपित शाहरुख पठान पुलिसकर्मियों के हेड कांस्टेबल दीपक दहिया पर फायरिंग करने के बाद फरार हो गया था।

Laxmii: तर्क-हॉरर तलाशना बहिष्कार का कारण तलाशने से कहीं अधिक मुश्किल, सीक्वल की संभावना है एकमात्र डरावनी बात

कोई फिल्म अपने आप ही इतनी ज्यादा वाहियात हो कि उसके बॉयकॉट की जरूरत ही ना पड़े। उसे दर्शकों को देखने के बाद फैसला लेने दिया जाय कि भविष्य में अमुक कलाकार के फिल्म चयन की सजा आपको अपनी जेब और अपने बहमूल्य (तकरीबन) ढाई घंटों के रूप में आखिर क्यों नहीं देनी चाहिए! अक्षय कुमार अभिनीत Laxmii (लक्ष्मी) फिल्म भी ऐसी ही किसी मनोदशा का सबसे बेहतरीन उदाहरण कही जा सकती है।

Laxmii फिल्म में तर्क और हॉरर तलाशना इसके बहिष्कार का कारण तलाशने से कहीं ज्यादा परेशान कर देने वाला काम था। मैं निजी तौर पर अब उन लोगों का विरोध करना चाहता हूँ जिन्होंने कहा कि इस फिल्म का बॉयकॉट इसकी पटकथा के कारण किया जाना चाहिए।

जिस फिल्म में कोई कथा ही न हो उसकी पटकथा का बहिष्कार करना मानवीय क्षमताओं को चुनौती देने वाली बात है। त्वरित प्रतिक्रिया और संवाद के इस दौर में सिर्फ विवाद के दम पर कोई फिल्म बना देने का फैसला करना वास्तव में एक चुनौती भरा और साहसिक कदम ठहराया जा सकता है। किन्नरों को लेकर समाज के नजरिए को लेकर ये फिल्म एक अच्छा संदेश जरूर देती है।

Laxmii की ‘कहानी’

अक्षय कुमार द्वारा प्रोड्यूस्ड फिल्म ‘लक्ष्मी’ फॉक्सस्टार स्टूडियो, तुषार कपूर और केप ऑफ गुड फिल्म्स बैनर तले बनी है। फिल्म में अक्षय कुमार, कियारा आडवाणी के अलावा शरद केलकर, अश्विनी कल्सेकर, मनू ऋषि और आयशा रजा भी हैं।

अक्षय कुमार आसिफ़ नाम के एक व्यक्ति का किरदार निभा रहे हैं, जिसका विवाह रश्मि नाम की एक हिन्दू युवती से हुआ है। आसिफ़ इस फिल्म में कहता है कि उसका काम लोगों के मन से भूत-प्रेत का वहम निकालने का है। इस क्रम में, फिल्म की शुरूआती पन्द्रह मिनट में ही आसिफ़ एक हिन्दू ‘ढोंगी बाबा’ के ढोंग का भी पर्दाफाश कर अपनी बात को साबित करता है।

अक्षय की पत्नी यानी, रश्मि के किरदार में कियारा आडवाणी हैं। रश्मि के परिवार को ‘आसिफ़’ में बहुत रूचि नहीं है। आसिफ हर बात पर बोलता नजर आता है, ‘माँ कसम चूड़ियाँ पहन लूँगा’। और फिर जब उसके अंदर एक किन्नर की आत्मा प्रवेश करती है तो आसिफ को चूड़ियाँ पहननी ही पड़ती हैं।

कहानी के नाम पर जबरन ठूँसे गए ‘पोटेंशियल विवादित’ दृश्य

‘आत्मा’ और ‘हॉरर’ के नाम पर फिल्म में कई ऐसे घटनाक्रम बनाए गए हैं, जो फिल्म से ज्यादा एक सांस्कृतिक और सामाजिक विवाद पर चर्चा जैसे दृश्य प्रतीत होते हैं। यानी, फिल्म में दृश्य अपनी कहानी नहीं कहते बल्कि कहीं पर बैठकर उन विषयों पर ज्ञान देते लोग नजर आते हैं।

ऐसे ही एक दृश्य में अक्षय कुमार यानी, आसिफ अपनी पत्नी रश्मि से ‘प्रगतिशील चर्चा’ करते हुए नजर आ रहे हैं। आसिफ अपनी पत्नी रश्मि से कहता है, “ये अभी तक हिन्दू-मुस्लिम में अटके हुए हैं।”

यह दृश्य हाल ही में चर्चा में आए ‘लव-जिहाद’ जैसे विषय के नाम पर पब्लिसिटी उठाने के लिए बिना अधिक मेहनत के ही जबरन ठूँसा हुआ प्रतीत होता है। इसके अलावा, आसिफ एक हिन्दू बाबा को ढोंगी साबित कर देता है जबकि एक मुस्लिम झाड़-फूँक वाला इंसान आसिफ के भीतर बैठी आत्मा को चुटकियों में ठिकाने लगा देता है।

मंदिर के पुजारी गुंडों की सहायता करते हैं जबकि ‘पीर बाबा’ आसिफ और उसके परिवार की मदद करता है। एक हिन्दू परिवार में जन्मी ‘लक्ष्मी’, जो कि किन्नर है, अपमानित कर घर से निकाल दी जाती है। जबकि एक ‘अब्दुल’ लक्ष्मी को अपने घर में जगह देकर उसे ‘महान’ बनाने का सपना दिखाकर उसको पालता है।

इस पूरे कथानक के बीच ना ही आसिफ़ के मुस्लिम और रश्मि के हिन्दू होने की जरूरत को लेकर कोई तर्क है, ना ही एक किन्नर के हिन्दू परिवार में पैदा होकर एक अब्दुल के उसे अपनाने के बीच कोई सम्बन्ध बैठता नजर आता है। हाँ, फिल्म के आखिर में भगवान शिव को लेकर फिल्माए गए एक गाने से तमाम अजेंडे की क्षतिपूर्ति करने की कोशिश अवश्य की गई है।

जहाँ तक हॉरर मूवी के नाम पर ‘डर’ पैदा करने की बात है तो लक्ष्मी फिल्म में एकमात्र भयावह बात इसके सिक्वल की सम्भावना है। लक्ष्मी फिल्म के दक्षिण भारतीय फिल्म को उठाकर ‘कॉपी-पेस्ट’ कर एक विवादित रंग में ढालने का असफल प्रयास है। इस फिल्म को देखकर हास्य पैदा होता है, वह भी दृश्यों के कारण नहीं बल्कि अक्षय कुमार जैसे अभिनेता की ऐसी फिल्मों में अभिनय करने की सहमती के कारण ही!

जहाँ तक फिल्मों में या कला में हिन्दू घृणा और हिन्दू विरोधी अजेंडे की बात है तो उसे हम यदि किनारे रख दें तब भी इस फिल्म में कुछ भी ऐसा नहीं जिसे लेकर बहुत ज्यादा चर्चा की जा सकती है। हालाँकि, यह इस फिल्म की एकमात्र उपलब्धी अवश्य कही जा सकती है कि बिना किसी ठोस कथा, डायलोग, संगीत और हॉरर के भी हम इस पर चर्चा कर रहे हैं।

मैं समझता हूँ कि लक्ष्मी (Laxmii) फिल्म इतनी घटिया है कि इसका बहिष्कार तक करना जरुरी नहीं है। यह हिन्दू विरोधी फिल्म के नाम पर महज एक ‘वान्ना बी हिन्दू-विरोधी फिल्म’ से अधिक कुछ नहीं। अक्षय कुमार की इस फिल्म को गुमनामी में अपनी मौत स्वयं मर जाना चाहिए।

पाक में मोहम्मद हसन की अगुवाई में भीड़ ने माँ-बेटे को मारा: अल्पसंख्यकों के खिलाफ क्रूर अत्याचार पर विश्व के मौन होने पर उठे सवाल

पाकिस्तान में इस्लामी बर्बरता का कोई अंत होता नहीं दिख रहा। चाहे हिंदू हो या ईसाई वहाँ हर अल्पसंख्यक को खून के आँसू रोने पर मजबूर किया जा रहा है। ताजा मामला पाकिस्तान के गुजरांवाला से आया है। वहाँ एक ईसाई समुदाय की महिला और उसके बेटे को दिन दहाड़े इस्लामी भीड़ ने मार डाला। उनका शव खून से लथपथ सड़क पर पड़ा तस्वीरों में देखा जा सकता है।

पत्रकार आदित्यराज कौल ने यह जानकारी अपने ट्विटर पर शेयर की। उन्होंने लिखा, “ईसाई माँ यासमीन और उसका बेटे उस्मान मसीह को मोहम्मद हसन के अगुवाई में इस्लामी भीड़ ने बेरहमी से मार डाला। ईश निंदा के नाम पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ क्रूर अत्याचार जारी है और पूरा विश्व पूर्ण रूप से मौन है।”

पाकिस्तान के वकील व कार्यकर्ता राहत ऑस्टिन ने इस घटना की सूचना देते हुए लिखा, “यहाँ सवालों के जवाब देने पर या फिर इस्लाम के लिए सख्त शब्दों का आदान-प्रदान करने पर भी उसे ईशनिंदा मानकर, मौत की सजा दी जाती है। एक ईसाई माँ और उसके बेटे उस्मान मसीह को मोहम्मद हसन और अन्यों ने पाकिस्तान पंजाब के गुजरांवाला के वजीराबाद के कठोर गाँव में हत्या कर दी।”

राहत ने जानकारी दी कि मृत महिला का केवल एक ही बेटा था और उसकी खुद की भी दो बेटियाँ थी। तस्वीरों में दोनों बेटियों को अपने पिता के शव के पास बैठकर रोते देखा जा सकता है।

साजेदा अख्तर इसी घटना पर लिखती हैं, “आधुनिक पाकिस्तान की बहुसंख्यक आबादी को ईशनिंदा के नाम पर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को चुन-चुन कर मारने का लाइसेंस मिल गया है और दुनिया बस चुपचाप देख रही है।”

याद दिला दें पाकिस्तान में ईशनिंदा के नाम पर किसी व्यक्ति को मौते के घाट उतारना कोई अपराध करना नहीं होता बल्कि वहाँ ऐसा करने वालों का फूलों से स्वागत होता है। लोग उस व्यक्ति के समर्थन में नारे लगाते हैं, उसे अपना हीरो बताते हैं।

हाल में पाकिस्तानी एक्टिविस्ट राहत ऑस्टिन ने ख़ुशब की क़ैदाबाद तहसील में नेशनल बैंक ऑफ़ पाकिस्तान शाखा के एक मैनेजर को ईशनिंदा के आरोप में गोली मारने वाले सिक्योरिटी गार्ड अहमद नवाज का वीडियो शेयर किया था।

वीडियो में अहमद एक भीड़ का नेतृत्व करते, नारे लगाते और हत्या का जश्न मनाते हुए सड़क पर दिखाई दे रहे थे। इस प्रदर्शन के बीच एक व्यक्ति को भीड़ से निकलते और उसे चूमते हुए भी देखा जा सकता है।

बिहारियों को बोला गरीब और लालची: मिलिए उस कॉन्ग्रेसी नेता से, जिसे राहुल गाँधी खुद करते हैं फॉलो

बिहार विधानसभा चुनाव की 243 सीटों पर मतगणना जारी है। अब तक सभी सीटों पर शुरुआती रुझान आ चुके हैं, जिनमें भाजपा-जदयू का एनडीए गठबंधन 132 सीटों पर आगे चल रहा है और उसे पूर्ण बहुमत मिलता नजर आ रहा है। वहीं राजद के नेतृत्व में महागठबंधन 98 सीटों पर आगे है।

इस बीच कॉन्ग्रेस शिकायत सेल की चेयरपर्सन अर्चना डालमिया ने बिहारियों को गरीब और लालची करार दिया है। चुनावी मतगणना में रुझान एनडीए की तरफ जाते देख अर्चना डालमिया ने ट्वीट करते हुए लिखा, “लगता है गरीब बिहारी मुफ्त वैक्सीन के लालच के चक्कर में आ गए है।”

इतना ही नहीं, इससे पहले भी उन्होंने बिहारियों को निशाने पर लिया। उन्होंने लिखा, “बिहारियों तुम फिर झूमलों के चक्कर में आ गए। अगर 15 लाख नहीं तो कोविड वैक्सीन मुफ्त तो माँगो और मिल जाए तो हम भी बिहार आकर लगवा लेंगे!!”

उन्होंने अपने ट्विटर पर एक पोस्ट को पिन किया हुआ है। इसमें लिखा गया है, “थोड़ा और इंतज़ार कीजिए। शाम ढलते ही लालटेन जलेगा।”

उन्होंने आज सुबह-सुबह एक ट्वीट करते हुए लिखा था, “नया सवेरा, नया बिहार, महागठबंधन की सरकार।”

अर्चना डालमिया को राहुल गाँधी फॉलो करते हैं

अर्चना कॉन्ग्रेस शिकायत सेल की चेयरपर्सन हैं, जिन्हें पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी भी फॉलो करते हैं। बता दें कि इससे पहले कॉन्ग्रेस पार्टी के बीच नेतृत्व को लेकर हो रही कश्मकश के बीच अर्चना डालमिया ने पार्टी के बुजुर्ग नेताओं को झटका देते हुए कहा था कि गाँधी परिवार के अलावा कोई कॉन्ग्रेस अध्यक्ष देश स्वीकार नहीं करेगा।

डालमिया ने ट्वीट करते हुए लिखा था, “गाँधी परिवार के अलावा और ‘कोई विकल्प है ही नहीं’… मैं फिर दोहराती हूँ कि जो गाँधी परिवार देश भर में स्वीकार किया जाता है, उसका कोई अल्टरनेटिव नहीं है!” 

वहीं कॉन्ग्रेस के उदित राज ने मंगलवार को ईवीएम पर सवाल उठाते हुए ट्वीट किया, “जब मंगल ग्रह और चाँद की ओर जाते उपग्रह की दिशा को धरती से नियंत्रित किया जा सकता है तो ईवीएम हैक क्यों नहीं की जा सकती? अमेरिका में अगर ईवीएम से चुनाव होता तो क्या ट्रंप हार सकते थे?”

फिलहाल ऐसा है रुझान

गौरतलब है कि बिहार में अब तक सभी 243 सीटों पर रुझान आ चुका है। इसमें एनडीए 132 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है, जबकि महागठबंधन 98 सीटों पर आगे है। वहीं, चिराग पासवान की लोजपा 1 और अन्य दल 9 सीटों पर बढ़त बनाए हुए हैं। अगर राजनीतिक दलों की बात करें तो भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। वह 73 सीटों पर आगे चल रही है। दूसरे नंबर पर राजद है, जिसने 60 सीटों पर बढ़त बना रखी है। जदयू 49 सीटों पर आगे चल रही है तो कॉन्ग्रेस की झोली में 21 सीटें जाती नजर आ रही हैं। 

‘बिहार में ई बा’ के बाद मैथिली ठाकुर ने पूछा- किसकी सरकार?

बिहार चुनावों की शरुआत से ही राजनेताओं और बाहुबलियों की चर्चा के साथ एक नाम मैथिली ठाकुर (Maithili Thakur) का भी सामने आया था। दरअसल, मैथिली ठाकुर ने एक गाने ‘बिहार मा का बा’ (Bihar me ka ba) के जवाब में बताया था कि ‘बिहार में ई बा’ (Bihar mein ee baa) और ये गाना सबकी जुबान पर चढ़ गया था।

बिहार में आज मंगलवार (नवम्बर 10, 2020) को बिहार चुनावों के नतीजे आ गए हैं और मैथिली ठाकुर ने अपनी एक तस्वीर ट्वीट करते हुए इस बार खुद सवाल किया है। मैथिली ने ट्वीट में लिखा है – “किसकी सरकार?”

इस तस्वीर में मैथिली ठाकुर के पीछे जो पोस्टर नजर आ रहा है उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, और नीतीश कुमार नजर आ रहे हैं। हालाँकि, उनके अलावा पोस्टर में दो और शख्सियत राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव भी मौजूद हैं लेकिन मैथिली ठाकुर का इशारा साफ़ नजर आ रहा है।

आखिरकार बिहार के चुनाव परिणामों से लगभग स्पष्ट हो चुका है कि बिहार की जनता ने राजद और महागठबंधन को नकार कर NDA को अपना समर्थन देकर सत्ता सौंप दी है। जिसका अर्थ है कि NDA ही बिहार में सरकार बनाने जा रही है।

रुझानों में एनडीए के पास 120 से ज्यादा सीटें दिख रही हैं, वहीं राजद को करीब 110 सीटें मिलती दिख रही हैं। अन्य को भी 10 के करीब सीटें मिलती दिख रही हैं। हालाँकि, फिलहाल दोनों ही मुख्य दल अपनी जीत के प्रति आश्वस्त हैं।

कुछ लोगों को रास नहीं आया था मैथिली ठाकुर का जवाब

मैथिली ठाकुर का ‘बिहार में ई बा’ गा देना तो सीधे सीधे बिहार के कुछ स्थापित नामों के धंधे पर चोट था! ये वो लोग थे जिन्होंने बिहार की पृष्ठभूमि को अपहरण, रंगदारी, गुंडागर्दी और तमाम तरह के सामाजिक अपराधों तक समेटकर रख दिया था।

पेट पर कोई लात मार दे और वो बिलबिलाएँ भी नहीं, ऐसा कैसे हो सकता था? मैथिली का गाना उनके ‘विकास’ की राह में रोड़ा बन गया। उन्हें राज्य के विकास से कोई लेना देना नहीं, उनके निजी स्वार्थों से इस गीत के बोल टकराते हैं। ये विवाद गीत पर नहीं हुआ, ये निजी स्वार्थ के सामाजिक हितों से टकराव का शोर था।