फ़्रांस में एक शिक्षक की इस्लामी आतंकवादी ने हत्या कर दी। घटना श्वेत पश्चिमी विकसित राष्ट्र में हुई थी तो निंदा वैश्विक थी एवं क्षोभ सार्वजानिक। भारत में ऐसी घटनाओं का इतना सामान्यीकरण हो चुका है कि अब न जनता से प्रतिक्रिया होती है न सरकार से। यदि प्रतिक्रिया हो भी तो शाब्दिक निंदा पर ही इस्लामविरोधी इत्यादि आरोप लगा कर लोगों को चुप करा दिया जाता है। श्वेतवर्णी समाज के एक व्यक्ति के जीवन का मूल्य चार अश्वेतों के समान अमेरिकी संविधान में 1964 तक माना जाता था।
वैचारिक दासता के दौर में आज भी उसमें अधिक परिवर्तन नहीं है जब यूरोप के राष्ट्र किसी दूसरे राष्ट्र के प्रताड़ित को शरण दें तो उसे मानवता कहा जाता है परन्तु यही जब भारत नागरिकता संशोधन के द्वारा करना चाहे तो वही पश्चिमी देश झुण्ड बना कर भारत की सम्प्रभुता पर टूट पड़ता है। ऐसे में आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि भारत में सरकार भी एक रामलिंगम, ध्रुव त्यागी, कमलेश तिवारी या राहुल राजपूत की हत्या पर सार्वजानिक वक्तव्य देने से बचती है। ऐसी मानव जीवन की क्षति पर सरकार की ओर से हर्जाना भी भिन्न-भिन्न मिलता है। सत्ता की सौतेली संतान होने का कष्ट उभर आता है, और लोग सरकार से नाराज़ हो लेते हैं।
भारतीय जनता पार्टी दूसरी बार सरकार में है परन्तु ऐसे समय रोष भाजपा के समर्थकों में अधिक दिखता है। फ्रांस के राष्ट्रपति इस जघन्य घटना की निंदा बिना लाग लपेट के इस्लामिक कट्टरवाद को जिम्मेदार ठहराते हुए कर सकते हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसा क्यों नहीं कर सकते हैं? इस प्रश्न पर मेरा एक ही उत्तर है कि हमें वे तस्वीरें देखनी चाहिए जो फ्रांस की घटना के पश्चात विभिन्न शहरों में दिखती हैं। सैकड़ों की सँख्या में फ्रांसीसी नागरिक सड़कों पर उतरे यह कहते हुए – “हम भयभीत नहीं हैं।” दिल्ली में राहुल राजपूत की हत्या हुई, कैराली में पुजारी की हत्या हुई, उन्नाव में दो पुजारियों की हत्या हुई, पालघर में साधुओं की पुलिस के सामने हत्या हुई। हम पूछते हैं कि सरकार कुछ क्यों नहीं बोली, प्रधानमंत्री कुछ क्यों नहीं बोले?
सरकार बनने के बाद राजनीतिक दलों का काम समाप्त होता है परंतु समर्थकों का काम आरंभ होता है। नेता रोडवेज़ के ड्राइवर की तरह होते हैं, और सवारी भरने पर ही बस में बैठते हैं। हज़ार लोगों का जुलूस कई शहरों में निकाल दीजिए, नेता पहुँच जाएँगे और चौड़े मे समर्थन में भाषण भी देंगे। समर्थन में उतरी संख्या ही उनके राजनीतिक सरोकार तय करती है, उन्हें स्पष्ट बोलने का साहस देती है। झारखंड में एक हत्या हुई, केरल से लेकर दिल्ली तक लोग सड़क कर उतर गए। दिल्ली में पिछले दो महीने में दो हत्याएँ हुईं। तबरेज तो मार पीट के पाँच दिन बाद मरा, ये दोनों हत्याएँ तो तथ्यात्मक रूप से पिटाई से ही हुई। कितने लोग सड़क पर उतरे? पालघर में साधुओं की हत्या पर कितनी रैली निकली?
जब आप अपनी बात नहीं उठा सकते हैं तो सरकार क्यों उठाएगी? यदि लोग सड़क पर 2014 में नहीं उतरते तो आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार केंद्र में नहीं होती। बस का ड्राइवर बस यात्रियों को पहुँचाने के लिए चलाता है, लाँग ड्राइव के लिए नहीं। कोई भी बस का ड्राइवर बिना सवारी ख़ाली बस लेकर कोई नहीं जाएगा।
राजनीतिक बस पर चढ़िये, राजनीति भी बदलेगी, राजनैतिक संवाद भी। दस बड़े शहरों में दो-दो हज़ार की संख्या में लोग सड़क पर उतर कर पालघर पर न्याय माँगते तो मोदी क्या राष्ट्रपति भी राष्ट्र को संबोधित कर के निंदा करते। पालघर में कैमरे पर साधुओं की हुई हत्या पर तो सुशांत सिंह राजपूत के लिए न्याय माँगने वाले भी चुप है।
राजनीति एक बस स्टैंड है। हम एक नागरिक के नाते उस बस पर चढ़ना चाहते हैं जो भरी हुई है क्योंकि हमें लगता है वो बस पहले निकलेगी। सरकार भरी हुई बस को पहले स्टैंड से निकालती है। दोनों बातों में विरोधाभास है। हम टहल रहे हैं कि ड्राइवरआए तो बस में चढ़ेंगे, ड्राइवर चाय की प्याली पर प्याली पीते हुए दूर से दृष्टि रखे है की सवारियाँ भरें तो बस में जा के बैठे। क्या कारसेवा के बिना राम जन्मभूमि का निर्णय होता? क्यों न्यायपालिका उसे कश्मीरी पंडितों के केस की तरह प्राचीन मान कर न्यायपालिका से बाहर क्यों नहीं भेज देती। क्योंकि उस प्रश्न की बस तो अयोध्या गंतव्य के लिए निकली वह सवारियों से भरी हुई है।
सरकार आपके सोशल मीडिया के उत्कर्ष प्रलाप को पढ़कर काम नहीं करेगी। यह न तो सरकार के स्वभाव में है, न ही यह सरकार के लिए उचित ही है। सोशल मीडिया पर तो लोग मिनी स्कर्ट पर भी क्षोभ प्रकट करने लगते हैं, उस विलाप और प्रलाप पर सरकार कोई रूचि क्यों ले। उस पर कोई दल अपनी राजनीतिक पूँजी क्यों लगाएगा? भारत मे 13 मिलियन या 1.3 करोड़ लोग ट्विटर पर हैं। मान लीजिए भाजपा के वोट शेयर के बराबर, लगभग 40% भाजपा समर्थक हैं। ये बने कोई पचास लाख। 130 करोड़ के देश में क्या राजनीति पचास लाख लोगों के विचारों पर होगी? मैं तो यह मानता हूँ कि ऐसा भ्रम पैदा कर के सत्ता पक्ष विपक्षियों को व्यस्त रखा जाता है। कॉन्ग्रेस की सम्पूर्ण राजनीति सोशल मीडिया पर सिमट गई है और यह मान कर चल रही है की सरकारें वहीं से बनती हैं। राहुल गाँधी ट्विटर पर ज्ञान देते हैं, चुनाव हार जाते हैं।
घरों में बैठ कर समाज या सरकार दोनों नहीं बदली जाती। विपरीत विचारधारा सड़क पर उतरती है, अदालत में जाती है, माहौल बनाती है और सरकार को उस पर जुड़ना ही पड़ता है। महाराष्ट्र में यदि जनता धरने पर उतरती, अदालत में अर्ज़ी दाखिल होती तो पालघर के लिए जाँच के लिए केंद्रीय ब्यूरो क्यों न उतरता या किसी न्यायाधीश के निरीक्षण में जाँच क्यों नहीं होती। साधुओं के परिवारों को, राहुल राजपूत के परिवार को शासन से वही मदद क्यों नहीं मिलती जो जुनैद और तबरेज़ को मिली। मोदी जी भी सार्वजनिक मंचों से घटना की निंदा करते। 130 करोड़ के देश में एक हत्या अन्य हत्याओं के मुक़ाबले प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के ध्यान या समय के योग्य क्यों है, इसका निर्णय इस पर है कि मूक रहने पर और बोलने पर कितना समर्थन मिलता है।
अपेक्षाएँ होती हैं तो ऐसे प्रश्न उठते हैं। ऐसे ही प्रश्न योगी आदित्यनाथ से भी पूछे जाते हैं। उनसे यही कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री बनाए हो प्रभु, लठैत नहीं रखे हो। सड़क बन रही है, कोरोना नियंत्रण में है, दंगे दिल्ली से उत्तरप्रदेश नहीं फैले, माफिया के घर टूट रहे हैं, उद्योग आ रहे हैं। गोरखपुर में बालकों की जापान इनसेमफिलिटिस से मृत्यु लगभग बंद हो गई है। प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री का पद संवैधानिक पद है। अब कॉलोनी में ‘जागते रहो, जागते रहो’ कर के भी महाराज जी लाठी पीटते तो नहीं घूमेंगे।
एक ओर वह वर्ग या समाज है जो राजनीतिक एवं वैधकीय अतिसक्रियता का लाभ शासन से और न्यायपालिका से अपनी पसंद के निर्णय एवं वक्तव्य निकाल रहा है। आपको सत्ता का वही स्नेह चाहिए तो आपको भी सड़क पर आना होगा, एक संख्या बल सड़क पर दिखाना होगा जिसकी विदेशी मीडिया भी उपेक्षा न कर सके। यदि दिल्ली की या मुंबई की सड़कें भर जाएँ पालघर पर तो उन्हें रिपोर्ट करना होगा, उन्हें इसका कारण भी अपनी रिपोर्ट में लिखना हो गए।
आप न्यायपालिका का ध्यानाकर्षण इन विषयों पर करते रहे तो उन पर निर्णय भी होंगे और समाचार पत्रों को छापने भी होंगे। आप बीस करोड़ पोस्ट कार्ड लिख के प्रधानमंत्री कार्यालय भेजेंगे तो प्रधानमंत्री भी उस पर ध्यान देंगे, कानून भी संसद में लाएँगे। मंदिर भी सरकारी प्रतिबन्ध से बाहर निकालेंगे, संभवतः संविधान के आपातकाल में कए गए संशोधन भी हटेंगे यदि जैसा वामपंथी करते हैं दक्षिणपंथी कानून, मीडिया और सड़क पर प्रदर्शन को साथ में जोड़ कर मुहिम चलाते हैं।
भारत पर गौरी या ख़िलजी की जीत का बड़ा कारण जनता का जातियों में कटा रहना था, जिसके कारण बड़ा वर्ग न युद्ध के लिए प्रशिक्षित था ना ही उसमें रुचि रखता था। जैसे आज लोग पालघर या दिल्ली लिंचिंग पर मोदी को कोसते हैं, तब पृथ्वीराज चौहान को कोसते होंगे। सोचिए। पसंद की सरकार को सत्ता पर बैठा कर जनता के कर्तव्यों की इतिश्री नहीं हो जाती है। सत्ता वर्षों से बने समीकरणों को, लोकतंत्र ही सामाजिक सिद्धांतों में परिवर्तन ला सकता। एक राष्ट्र की जनता जब अपने शासकों को सामाजिक परिवर्तनों का उत्तरदायित्व सौंप कर उदासीन एवं निष्क्रिय हो जाती है, उसका क्षेत्र जावा से, वियतनाम से, ईरान से, बर्मा से पाकिस्तान और बांग्लादेश से संकुचित होता होता वहाँ पहुँच जाता है जहाँ एक संस्कृति के लिए अपने पँजों पर खड़े होने की भूमि भी नहीं होती है।
संस्कृति की रक्षा निष्क्रिय प्रेम से नहीं होती है, सक्रिय कर्म से होती है। यदि भ्रष्ट्राचार के विरोध में जनता2014 में सड़क पर नहीं उतरी होती, तो आज प्रधानमंत्री मोदी भी सत्ताधीश नहीं हुए होते। संख्या बल वही सक्षम होता है जो साक्ष्य होता है, स्पष्ट होता है। सरकार को चुनकर हमने कोई ठेका नहीं दिया है, और दिया भी हो तो उपभोक्ता की उपेक्षा की स्थिति में तो ठेकेदार उतना ही और उसी गुणवत्ता का कार्य करता है जितना न्यूनतम आवश्यक हो। सरकार से उस न्यूनतम सीमा से अधिक कार्य कराना हो तो बोलना होगा, लिखना होगा, पहुँचना होगा, सबसे बढ़कर – एक हो कर दिखना होगा।
एक फ़िल्म कुछ वर्षों पहले आई थी- गुलाल! उसके एक वाक्य को शिष्टता का आवरण पहना कर यह लेख समाप्त करता हूँ- “अपने पृष्ठपटल पर बैठे रहने से स्वराज्य नहीं आएगा, धर्म और संस्कृति की रक्षा नहीं होगी।” राष्ट्रीय राजनीति उतनी ही नैतिक होगी जितना नागरिक जागृत होगा। एक बार फिर फ्रांस में सड़कों पर उमड़ी, श्रद्धांजलि देती जनता का चित्र देखें और विचार करें।
महाराष्ट्र में महिलाओं के साथ अपराध की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं और राज्य की तीनों सत्ताधारी पार्टियाँ दूसरे राज्यों में हो रही घटनाओं पर बयान देते नहीं तक रही। NCRB के आँकड़े कहते हैं कि महाराष्ट्र में रोज 105 महिलाएँ रोज गायब होती हैं और हर सप्ताह 17 महिलाओं की तस्करी की जाती है, उनका यौन शोषण होता है। अगर अन्य राज्यों के साथ तुलना करें तो महाराष्ट्र में महिलाओं के गायब होने और उनके तस्करी होने की घटनाएँ सबसे ज्यादा हैं।
इसके बाद मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल का नंबर आता है। महाराष्ट्र में तस्करी के जो 989 मामले दर्ज किए गए, उनमें से 88% महिलाएँ हैं और 6% बच्चे हैं। बंधुआ मजदूर बनाने के लिए, शरीर के अंगों को निकाल कर बेचने के लिए, ड्रग्स तस्करी के लिए, यौन शोषण के लिए और जबरदस्ती शादी के लिए महिलाओं की तस्करी की जाती है। अगर महाराष्ट्र की बात करें तो वहाँ गायब महिलाओं में से 95.6% महिलाओं को जबरन वेश्यावृत्ति में धकेल कर उनका यौन शोषण करने के लिए तस्करी की जाती है।
सबसे बड़ी बात तो ये है कि साल दर साल ये आँकड़े बढ़ते ही दिख रहे हैं क्योंकि 2019 में 2018 के मुकाबले ऐसे मामलों में 13% की वृद्धि देखी गई। 2018 में तो बच्चों की तस्करी के मामले में राज्य भारत के शीर्ष 10 राज्यों में था भी नहीं। लेकिन, अब ये चौथे नंबर पर आ गया है। एक साल में कुल 4562 बच्चे गायब कर दिए गए। इनमें से आधी से ज्यादा, 55% लड़कियाँ थीं। बावजूद इसके इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
मुंबई, पुणे और नागपुर में महाराष्ट्र के 3 बड़े शहर हैं और इन तीनों में कई बड़े रेड लाइट क्षेत्र हैं। आशंका जताई जा रही है कि ये क्षेत्र अब लड़कियों को गायब कर के उन्हें वेश्यावृत्ति की ओर धकेलने के लिए एक माध्यम बन गए हैं। राज्य में इन मेट्रो सिटीज के अलावा कई अन्य शहरों में भी छोटे और माध्यम रेड लाइट एरियाज की भरमार है। और राज्य में ऐसे क्षेत्रों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है।
‘मुंबई मिरर’ की खबर के अनुसार, अपहरण और उठाईगिरी के मामले में पूरे देश के मामलों में 0.7% की मामूली गिरावट देखी गई है, लेकिन महाराष्ट्र में ये मामले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। 2019 में अपहरण के मामलों में महाराष्ट्र काफी ऊपर रहा और पिछले साल के मुकाबले ये संख्या 1.3% बढ़ ही गई। जहाँ मूलभूत सुविधाएँ नहीं हैं या विकास के मौके नहीं हैं, उन क्षेत्रों में तस्कर सबसे ज्यादा निशाना बना रहे हैं।
105 women go missing everyday in Maharashtra, most land up in forced prostitution: NCRB data https://t.co/LKkpysMlR6
बता दें कि हाल ही में संजय राउत ने कंगना रनौत को ‘हरामखोर’ कह कर संबोधित किया था। एक महिला पर ऐसी अभद्र टिप्पणी के चलते संजय राउत की जम कर आलोचना हुई थी। लोगों का कहना था कि जब राज्य के सत्ताधीश ही महिलाओं को लेकर ये नजरिया रखते हैं तो फिर महिलाओं के साथ अपराध के मामलों में वो कैसे एक्शन लेंगे? वहीं हाथरस पर महाराष्ट्र की तीनों सत्ताधारी पार्टियाँ शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस – सभी भाजपा पर हमलावर थीं।
हैदराबाद में एक हिंदू लड़की को उसके प्रेमी सैयद मुस्तफा ने अपने भाई जमील के साथ मिलकर बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया। घटना रेन बाजार में शनिवार (अक्टूबर 17, 2020) की रात घटी। पुलिस के संज्ञान में मामला अगले दिन सुबह आया।
‘द हंस इंडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस को लड़की का शव रेन बाजार में एक होटल के नजदीक मिला। लड़की मूल रूप से संगारेड्डी जिले के नारायणखेड़ा इलाके में नागलगिंडा मंडल के करंगुट्टी इलाके से थी। वह कुछ समय पहले ही हैदराबाद आई थी और दत्तानगर में रह रही थी।
इसके अलावा, वह महात्मा गाँधी लॉ कॉलेज से एलएलबी की पढ़ाई कर रही थी और पीपल्स फॉर एनिमल सोसायटी की सक्रिय वॉलिंटियर थी। यहीं वह सैयद मुस्तफा से मिली। वह भी उसी सोसायटी से जुड़ा था और वॉलिंटियर का काम करता था। दोनों के बीच की दोस्ती धीरे धीरे प्रेम में बदल गई और दोनों ने शादी करने की सोची।
Hyderabad: Hindu woman confronts boyfriend Syed Mustafa over marriage promises, stabbed to death by him and his brother https://t.co/r5k8dv2jPS
हालाँकि, कुछ दिन बाद मुस्तफा लड़की को नजरअंदाज करने लगा। उसने उसकी कॉल उठानी बंद कर दी। समय बीतने पर युवती ने मुस्तफा के घर जाने की ठानी और पूछना चाहा कि आखिर वह उससे क्यों दूरी बना रहा है। मगर, जब वह वहाँ पहुँची तो मुस्तफा के भाई और उसमें झगड़ा हो गया।
मुस्तफा का भाई जमील भी उससे लड़ाई करने लगा। यह सब करीब सुबह 4 बजे तक चलता रहा। इसके बाद मुस्तफा ने युवती को दिलासा दिया और उसे घर छोड़कर आने की बाद कही। लेकिन यह सब सिर्फ़ एक नाटक था। बाद में सैयद ने अपने भाई जमील के साथ मिलकर लड़की को चाकू से घोंपकर मौत के घाट उतारा और फिर दोनों उसे रेन बाजार में छोड़कर फरार हो गया।
पुलिस ने हत्या के केस में दोनों के ख़िलाफ़ उपयुक्त धाराओं में व एसएसी एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है। शव को ओसमानिया अस्पताल पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है। अब आगे पुलिस हर संभव नजरिए से इस केस की जाँच कर रही है।
CBI ने सोमवार (अक्टूबर 20, 2020) को बैंक ऑफ इंडिया से धोखाधड़ी मामले में BSP MLA विनय शंकर तिवारी और उनकी पत्नी रीता तिवारी पर केस दर्ज किया है। पूरा मामला ₹754.24 करोड़ की फ्रॉड से जुड़ा है।
गोरखपुर के चिल्लूपुर से बसपा विधायक विनय शंकर तिवारी और उनकी पत्नी रीता तिवारी समेत गंगोत्री एंटरप्राइसेज व उसके निदेशक अजीत पांडे पर भी मामला दर्ज हुआ है।
CBI is conducting raids at 4 locations in NOIDA and Lucknow in connection with Rs 754 cr loan fraud.
Premises of Gangotri Enterprises, Ajit Pandey, Vinay Shankar Tiwari, Ritu Tiwari and Royal Empire Marketing Pvt ltd being raided @ians_india@IANSKhabar
अधिकारियों के अनुसार, एजेंसी ने सोमवार को अपनी जाँच हेतु छापेमारी की थी। उन्होंने गंगोत्री एंटरप्राइसेज के लखनऊ वाले दफ्तर और तिवारी के आवास पर भी अपनी छानबीन की थी। इसके अलावा नोएडा में भी छापा मारा गया।
सीबीआई टीम को छानबीन में कई अहम दस्तावेज हाथ लगे। इनमें कुछ फर्जी भी बताए जा रहे हैं। सीबीआई के प्रवक्ता ने बताया कि बैंक आफ इंडिया की ओर से शिकायत दर्ज कराई गई थी कि गंगोत्री इंटरप्राइजेज लिमिटेड के अधिकारियों ने बैंक को 753.24 करोड़ का नुकसान पहुँचाया। इन लोगों ने फर्जी दस्तावेज के सहारे बैंक से क्रेडिट लिया और फिर उस पैसे का इस्तेमाल दूसरी जगह किया गया।
The Central Bureau of Investigation (#CBI) on Monday carried out searches at four locations in a Rs 754.25-crore loan fraud case, including at a company linked to Bahujan Samaj Party MLA Vinay Shankar Tiwari, officials said. pic.twitter.com/zkM0KHETm0
प्रवक्ता ने बताया था कि उक्त कंपनी के महानगर स्थित कार्पोरेट ऑफिस है। यह कंपनी सड़कों के निर्माण, पुल और ओवर ब्रिज बनाने का काम करती है। कंपनी ने इसी तरह के काम के नाम पर बैंक से क्रेडिट लिया था।
बता दें कि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों का हवाला देकर कहा जा रहा है कि इन पैसों को दूसरी कंपनी में डायवर्ट कर हेराफेरी की गई। इस धोखाधड़ी में गंगोत्री इंटरप्राइजेज के अलावा रायल एंपायर मार्केटिंग प्राइवेट लिमिटेड व कंदर्प होटर इंटरप्राइजेज भी शामिल हैं।
उल्लेखनीय है कि चिल्लूपुर से विधायक विनय कुमार तिवारी गोरखपुर के बाहुबली नेता हरिशंकर तिवारी के बेटे हैं। एक समय में हरिशंकर की पूरे प्रदेश में तूती बोलती थी। 6 बार चिल्लूपुर से विधायक बनने वाले हरिशंकर तिवारी का प्रदेश में इतना नाम था कि विधानसभा सीट का नाम ही तिवारी हो गया था। साल 2017 में हरिशंकर के बेटे विनयशंकर ने इस सीट को अपने नाम अर्जित किया था और इसके बाद अब उनकी सच्चाई उजागर हुई है।
इस मामले में सीबीआई की एंटी करप्शन ब्रांच, दिल्ली में एफआईआर दर्ज की गई है। इस एफआईआर में विनय शंकर तिवारी के अलावा उनकी पत्नी रीता तिवारी और अजीत पांडेय को भी नामजद किया गया है। रीता तिवारी रायल एम्पायर मार्केटिंग प्राइवेट लिमिटेड की निदेशक है।
जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में ‘कश्मीर टाइम्स’ (Kashmir Times) के 2 दफ्तरों को सील कर दिया गया है। करीब 2 महीने पहले इसकी एग्जीक्यूटिव एडिटर अनुराधा भसीन को भी उनका आधिकारिक निवास खाली करने को कहा गया था। ‘कश्मीर टाइम्स’ प्रदेश के सबसे पुराने अख़बारों में से एक है। अनुराधा भसीन ने सुप्रीम कोर्ट में जम्मू कश्मीर को मिले विशेष राज्य का दर्जा वापस पाने के लिए याचिका भी दायर कर रखी है।
अपनी याचिका में भसीन ने जम्मू कश्मीर में ‘कम्युनिकेशन ब्लैकआउट’ का आरोप लगाते हुए माँग की थी कि संचार व्यवस्था को पूरी तरह बहाल किया जाए। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक तस्वीर भी शेयर की, जिसमें जिसमें एस्टेट के अधिकारी मुस्ताक मेमोरियल प्रेस एंक्लेव में स्थित अखबार के दफ्तर में ताला जड़ रहे हैं, उसे सील कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना किसी प्रक्रिया के तहत उनके दफ्तर को सील कर दिया गया है।
उन्होंने इसे बदले कि भावना से की गई कार्रवाई करार दिया। वहीं प्रशासन ने बताया है कि ‘कश्मीर टाइम्स’ के संस्थापक वेद भसीन को ये प्लॉट दिया गया था, जिसका अधिकार अब वापस ले लिया गया है। एस्टेट विभाग के डिप्टी डायरेक्टर मोहम्मद असलम ने ‘द इंडियन एक्स्प्रेस’ को बताया कि इन्हें दो संपत्तियाँ दी गई थीं – एक दफ्तर के लिए और एक दिवंगत वेद भसीन के निवास के लिए। इन्हें खाली करने के लिए पहले ही नोटिस जारी किया जा चुका था।
प्रशासन का कहना है कि ‘कश्मीर टाइम्स’ वालों ने खुद से ही इन संपत्तियों को उनके हवाले कर दिया और वो लोग औपचारिकताएँ पूरी करने के लिए वहाँ जा रहे हैं। वहीं अनुराधा भसीन का कहना है कि उन्हें कोई नोटिस या आदेश मिला ही नहीं। उनका कहना है कि कुछ ‘निचले स्तर’ के अधिकारी आते थे और सूचना देते थे कि अलॉटमेंट कैंसल कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि दफ्तर जाने पर भी कोई नोटिस नहीं दिया गया, इसीलिए वो कोर्ट गए थे।
उन्होंने दावा किया कि जिस दफ्तर को सील किया गया है, वहाँ कंप्यूटर से लेकर सारी तकनीकी चीजें वहीं पर रखी हुई हैं। 90 के दशक में ही इस बिल्डिंग को ‘कश्मीर टाइम्स’ को दिया गया था। वहीं जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूब मुफ्ती भी अब इसके समर्थन में उतर आई हैं। उन्होंने कहा कि ये भाजपा कि साजिश है, जिसके तहत वो उनसे असहमत होने वालों के साथ ऐसा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत सरकार के ‘अवैध और हानिकारक’ कार्रवाइयों के खिलाफ बोलने पर ऐसा किया जा रहा है।
इससे पहले भसीन ने आरोप लगाया था कि ‘कुछ गुंडे’ उनके फ्लैट में घुस गए थे और वो गहनों सहित सभी महँगे समान चुरा कर ले गए। उन्होंने इसके लिए पूर्व विधान पार्षद शहनाज़ गनाई के भाई इमरान गनाई को जिम्मेदार ठहराया। वो वज़ारत रोड स्थित उस सरकारी फ्लैट में 2000 से ही रह रही थीं। उन्होंने आरोप लगाया था कि उन चोरों के साथ कुछ पुलिसवाले भी थे। साथ ही कहा कि तस्वीरें क्लिक करने पर वो अपने चेहरे छिपा रहे थे।
Today, Estates Deptt locked our office without any due process of cancellation & eviction, same way as I was evicted from a flat in Jammu, where my belongings including valuables were handed over to “new allottee”. Vendetta for speaking out! No due process followed. How peevish! pic.twitter.com/J5P0eKxvbx
वहीं पूर्व-मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने भी प्रशासन की कार्रवाई का विरोध किया है। उन्होंने दावा किया कि इस कार्रवाई से पता चलता है कि क्यों हमारे कुछ ‘प्रतिष्ठित’ मीडिया संस्थानों ने सरकार का प्रवक्ता बनना स्वीकार कर लिया है। उन्होंने कहा कि ये मीडिया संस्थान सिर्फ सरकारी प्रेस रिलीज ही छापते हैं। उन्होंने कहा, “स्वतंत्र रेपोर्टिंग की कीमत ये है कि आपको बिना प्रक्रिया संपत्ति खाली करनी पड़ेगी।“
हाल ही में हिरासत से रिहा होने के बाद महबूबा मुफ़्ती ने कहा था कि जम्मू कश्मीर का कोई भी शख्स उस दिन की ‘डाकाजनी और बेइज्जती’ को कतई नहीं भूल सकता। जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री ने लोगों को ये याद करने के लिए कहा था कि ‘दिल्ली दरबार’ ने अगस्त 5, 2019 को ‘असंवैधानिक, गैर-जम्हूरी और गैर-क़ानूनी’ तरीके से जो उनसे छीन लिया है, अब उसे वापस लेना होगा।
भारत और चीन ऐसे दो देश हैं, जिन्होंने आज से 58 वर्ष पहले युद्ध लड़ा था और आज भी सीमा पर माहौल तनावपूर्ण है। पाकिस्तान को तो हमेशा से भारत ने धूल चटाई है लेकिन चीन ने जब 1962 में भारत पर आक्रमण किया, तब जवाहरलाल नेहरू और उनके सारे ‘शांतिवादी दुनिया’ के मिथक धराशाई हो गए। अपने प्रधानमंत्रित्व काल के 16वें वर्ष में नेहरू को समझ आया कि देश की रक्षा नीति सटीक होनी चाहिए, सेना मजबूत व संसाधन संपन्न होनी चाहिए और हथियारों का निर्माण होना चाहिए।
लेकिन, तब तक देर हो चुकी थी। चीन की सेना ने अक्टूबर 20, 1962 को लद्दाख में और मैकमोहन रेखा के पार एक साथ हमले शुरू किए। चीन ने भारत को हरा दिया और हमारी सेना ने सीमित संसाधन और लचर राजनीतिक नेतृत्व के बावजूद इस युद्ध में अपना चरम पराक्रम दिखाया और ये सुनिश्चित किया कि देश को कम से कम नुकसान हो। देश का नेतृत्व उन्हीं नेहरू के हाथ में था, जिन्होंने ‘Scrap The Army’ जैसी शब्दावली का प्रयोग किया और ये वही सेना थी, जिसने तमाम उपेक्षाओं के बावजूद शक्तिशाली चीन का सामना किया।
भारत-चीन युद्ध की छोटी सी नींव: नेहरू ने सरदार पटेल की सलाह को नकारा
ऐसा नहीं है कि किसी को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि चीन भारत पर आक्रमण कर सकता है। एक व्यक्ति था, जिसने अपनी ज़िंदगी के अंतिम वर्ष में भी नेहरू को समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि तिब्बत पर सरकार की नीति क्या हो और चीन हमारे लिए कितना बड़ा खतरा है। 1950 में चीन ने तिब्बत पर आक्रमण कर के उस पर कब्ज़ा करने की शुरुआत कर दी। उनका नरसंहार तभी से चालू हो गया था।
नेहरू आँख बंद किए बैठे रहे। वरिष्ठ भारत-चीन विशेषज्ञ Claude Apriलिखते हैं कि न सिर्फ कॉन्ग्रेस के कई नेता बल्कि कई बड़े अधिकारी भी नेहरू की आत्मघाती ‘चीन तुष्टिकरण’ नीति से नाराज़ थे, लेकिन उन्होंने किसी की एक भी न सुनी। तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री सरदार पटेल ने नवम्बर 11, 1950 में अपने अंतिम भाषण में तिब्बत और नेपाल के घटनाक्रम का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि दुनिया में कोई भी देश तिब्बत जितना शांतिप्रिय नहीं है और चीन हथियार के बल पर ये निंदनीय हरकत कर रहा है।
उनका कहना था कि न तो चीन ने भारत की ये सलाह सुनी कि तिब्बत मुद्दे को शांतिप्रिय तरीके से हल किया जाए, और न ही भारत को लगता था कि चीन बल-प्रयोग करेगा। सरदार पटेल ने चेताया था कि जब कोई देश इस तरह अपनी सैन्य शक्ति के नशे में चूर रहता है तो वो किसी मुद्दे पर शांति से सोच-विचार नहीं करता। उन्होंने कहा था कि डरपोक नहीं बनना है, खतरों से नहीं भागना है। कलियुग में अहिंसा के बदले अहिंसा हो, लेकिन बल का जवाब बल से दिया जाए।
एक तरह से देखा जाए तो 1962 के भारत-चीन युद्ध की छोटी सी नींव तभी पड़ गई थी, जब भारत ने चुपचाप तिब्बत को उसके कब्जे में जाने दिया। अगर उस समय भारत आवाज़ उठाता तो हो सकता था कई देश उसके साथ आते। लेकिन, चीन ने भारत के बारे में समझ लिया कि वो कुछ भी करता रहेगा और वहाँ के राजनीतिक नेतृत्व के पास इसके खिलाफ जाने की हिम्मत तक नहीं है। खैर, नेहरू ने ‘स्वास्थ्य कारणों से’ दिसंबर 1950 में सरदार पटेल को एक तरह से कार्यमुक्त कर दिया।
नेहरू ने नहीं मानी थी सरदार पटेल की सलाह
सरदार पटेल जानते थे कि तिब्बत में जाकर चीनी सेना के बैठने का सीधा अर्थ है कि वहाँ से वो सीधा भारत के लिए खतरा पैदा करता रहेगा। तभी तो उन्होंने कहा था कि चीनी सेना का तिब्बत में घुसना भारतीय सैन्य कैलकुलेशंस को बर्बाद कर रहा है। उन्होंने चेताया था कि अब हमें अपनी सैन्य तैनातियों के खाके पर फिर से विचार करना पड़ेगा। तब विदेश मंत्रालय ने सेक्रेटरी जनरल गिरिजा शंकर बाजपेयी भी नेहरू से नाराज़ थे। नेहरू ने पटेल के पत्र को नजरअंदाज कर दिया। इसका दुष्परिणाम 12 साल बाद सिर उठा कर आया..
कैसे शुरू हुआ था भारत और चीन का युद्ध
अक्टूबर 20, 1962 – ये वो तारीख है, जब भारत और चीन का युद्ध शुरू हुआ। लेकिन, इसकी पटकथा काफी पहले से लिखी जा रही थी। अभी हमने इससे 12 साल पहले से समय की बात की। अब सीधा युद्ध शुरू होने के कारणों पर लौटते हैं। पर्वतराज हिमालय प्राचीन काल से ही भारत और इसके उत्तरी क्षेत्रों की सीमा रहा है। लेकिन, 40 के दशक में कम्युनिस्ट फ़ौज की सक्रियता और ब्रिटिश द्वारा भारत का नक्शा खींचने के बाद सब कुछ जैसे बदल सा गया।
सरदार पटेल का डर सही साबित हुआ और तिब्बत पर कब्जे के साथ ही चीन ने पूरे हिमालय पर ही अपना दावा ठोक दिया। वो हिमालय, जहाँ आदिकाल से हमारे ऋषि-मुनियों ने तपस्या की, वहाँ आध्यात्मिक एकांत की खोज की। पूर्व में भारत-चीन को अलग करने वाली मैकमोहन रेखा तक को चीन ने मानने से इनकार कर दिया। हालाँकि, दोनों देशों ने पंचशील पर हस्ताक्षर कर के जम्मू कश्मीर पर चीन के दावे को काफी हद तक रोकने की कोशिश की।
भारत निश्चिंत था लेकिन चीन के मन में खुराफात लगातार चल रही थी। अप्रैल 29, 1954 को पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर हुए। चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा करता रहा और नेहरू ‘हिंदी, चीनी भाई-भाई’ की ग़लतफ़हमी में अटके रहे। अक्साई चीन पर भी चीन ने अपना दवा ठोक डाला। 1956 में चीन के पहले प्रीमियर झोउ एनलाई ने कहा कि चीन किसी भी भारतीय क्षेत्र पर दावा नहीं करता। बाद में वो पलट गए।
भारत ने 1958 में अक्साई चीन को अपना हिस्सा बताया। उधर तिब्बत में हर प्रकार की विरोधी आवाज़ को कुचलने में चीनी फ़ौज लगी हुई थी। धर्मगुरु दलाई लामा को भाग कर भारत आना पड़ा। उन्होंने यहाँ आकर ही तिब्बत की सरकार का गठन किया। उसी साल अगस्त में ईस्टर्न सेक्टर में स्थित लोंगजू और अक्टूबर 1959 में वेस्टर्न सेक्टर में स्थित कोंग्का पास में भारत और चीन की सेनाएँ भिड़ीं। उनमें संघर्ष हुआ। नेहरू आँख मूँदे रहे।
चीन कह रहा था कि भारत तिब्बत में कोई बड़ी योजना बना रहा है। असल में वो बस थाह लेना चाहता था कि कहीं उसकी साम्राज्यवादी क्रियाकलापों में भारत कोई बाधा बन कर तो नहीं आएगा। नेहरू ने अक्साई चीन को भारत का हिस्सा आधिकारिक रूप से माना तो, लेकिन तिब्बत को लेकर उनके लचर रवैये ने चीन को ये एहसास दिलाया कि भारत अब कमजोर हो चुका है। 1961 में जब तक भारत की फॉरवर्ड पॉलिसी शुरू हुई, तब तक काफी देर हो चुकी थी।
1962: भारतीय सेना के जवानों ने दिखाया था अद्भुत पराक्रम
भारतीय सेना ने अपना अभियान शुरू किया और उनका उद्देश्य था कि आगे बढ़ रहे चीनियों को रोकने के लिए चेकपोस्ट बनाई जाए और उनकी सप्लाइज काटी जाए। 1962 आ गया। पहले 6 महीने में ही चीन के रवैये से लगता था कि वो युद्ध में उतर चुका है लेकिन भारत का केंद्रीय नेतृत्व सोया रहा। नेहरू को लगता था कि चीन कुछ भी कर ले लेकिन भारत के साथ युद्ध की जहमत नहीं उठाएगा।
नेहरू सरकार का मानना था कि छिटपुट संघर्ष ही होते रहेंगे क्योंकि चीन पूरी तरह युद्ध करने की स्थिति में है ही नहीं। आखिरकार चीन ने अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख में हमला बोला। उसने वेस्टर्न सेक्टर में चिपचप वैली और ईस्टर्न सेक्टर में नामका चु नदी के पास के क्षेत्रों पर कब्ज़ा करने के लिए एक के बाद एक भारतीय चेकपॉट्स पर हमला बोला। रक्षा विशेषज्ञ आर सुकुमारन लिखते हैं कि इस युद्ध ने भारत की प्रतिष्ठा को कम कर दिया।
तब आईबी के निदेशक रहे बीएन मलिक ने कहा था कि ख़ुफ़िया एजेंसी की तरफ से मुख्यालय में सूचना भेज दी गई थी कि चीन के इरादे ठीक नहीं हैं। साथ ही ये भी बताया गया था कि पाकिस्तान भी मौका देख कर पश्चिम में धावा बोल सकता है। तत्कालीन रक्षा मंत्री ने वायुसेना और थलसेना प्रमुखों को तैयारियाँ करने का निर्देश दिया लेकिन पीएम नेहरू ने वायुसेना को आदेश दिया कि फाइटर एयरक्राफ्ट्स अंतरराष्ट्रीय सीमा के 24 किलोमीटर के दायरे में न उड़ाए जाएँ।
नेहरू का कहना था कि तनाव रोकने के लिए उन्होंने ये आदेश जारी किया है। भारत ने जिस तरह से उस वक़्त अमेरिका से मदद की अपील की थी, उससे उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँची क्योंकि देश में जो भी हो, विदेश में नेहरू ने अपनी अलग छवि बना रखी थी और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कारण आज़ाद भारत की छवि भी ठीक थी। वायुसेना के फाइटर जेट्स का सहारा नहीं लिया गया। अन्यथा परिणाम शायद कुछ और हो सकते थे।
ये वो समय था, जब चीन को ताइवान के आक्रमण का भय भी सता रहा था। बावजूद इसके उसने भारत पर आक्रमण का निर्णय लिया। जनरल जीडी बक्शी लिखते हैं कि उस वक़्त युद्ध के बाद चीनी सेना के डिप्टी चीफ ने कहा था कि उनके देश की वायुसेना पश्चिमी देशों से 15 वर्ष पीछे है। यहाँ तक कि बाद में वियतनाम ने भी चीन को सबक सिखा दिया था। सही निर्णय न लेने के कारण भारत ये मौका चूक गया।
और ख़त्म हो गया युद्ध..
चीन ने 4 दिनों के भीतर ही भारत को अच्छा-खासा नुकसान पहुँचाया। वहाँ की सेना अक्टूबर 24, 1962 तक भारत में 15 किलोमीटर भीतर तक घुस चुकी थी। इसके बाद चीन ने दोनों सेनाओं के 20 किलोमीटर पीछे हटने और अक्साई चीन में यथास्थिति को बरक़रार रखने की पेशकश थी। उसका उद्देश्य पूरा हो चुका था। इसी बीच नवम्बर 14 को पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन भी आया। लेकिन, युद्ध फिर शुरू हो गया।
हालाँकि, इसके एक सप्ताह बाद चीन ने ही एकतरफा सीजफायर की घोषणा कर दी। लेकिन, इसके साथ ही भारत की 43,000 वर्ग किलोमीटर भूमि चीनियों के कब्जे में जा चुकी थी। भारत के 3250 जवान वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। अब नेहरू को समझ आ रहा था कि सेना को शक्तिशाली बनाना क्यों ज़रूरी है। हथियारों की फैक्ट्री और परमाणु कार्यक्रम के लिए फंड्स जारी किए गए। सेना को आधुनिक बनाने की कवायद शुरू हुई।
In 1950 India had 4 consulates in Tibet, China had none. Sardar Patel regarded Tibet as India’s key ally. Nehru’s was a historical error https://t.co/2JR6Slj6WP
पूर्व एयर मार्शल डेंजिल कीलोर दो टूक कहते हैं कि 1962 का युद्ध भारत केवल पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कारण हारा। उन्होंने उस समय एयरफोर्स का समर्थन नहीं किया। न ही सेना के जवानों को गर्म कपड़े उपलब्ध कराए। भारत यदि हारा तो उसकी वजह नेहरू थे। उन्होंने कहा था कि 1962 के युद्ध में सेना के हाथ में कुछ नहीं था। वो युद्ध बेहद राजनीतिक था, जिसे नेहरू ने हारा। शुरू भी उन्होंने किया और हारे भी वे।
इसके डेढ़ साल बाद जवाहरलाल नेहरू भी देश को मँझधार में छोड़ कर चल बसे। अपने आखिरी दिनों में वो उदास रहा करते थे। अब तक उन्होंने जो भी गलतियाँ की थीं, चीन ने उन सबका एहसास उन्हें एक बार में ही दिला दिया था। भारत की रक्षा नीति में अमूल-चूल बदलाव आने शुरू हुए। लाल बाहदुर शास्त्री के काल में पाकिस्तान ने हमला किया और मुँह की खाई। इंदिरा गाँधी के समय में पाकिस्तान के दो टुकड़े हुए। वाजपेयी काल में कारगिल में उसे धूल चटाया गया। लेकिन, 1962 का दाग अब तक रह गया! अंत में जाते-जाते लेखक रघुवीर सहाय का ये आकलन, जो इस स्थिति का विवरण देता है:
“1950-60 के बीच नेहरू का प्रभाव शिखर पर था। मध्यमवर्ग की आकांक्षाएँ बढ़ने लगीं और पूँजीपति वर्ग की मशीनें भी ज्यादा उत्पादन देने लगीं और इसके साथ ही शासक राजनीतिक दल का अहंकार और आत्मविश्वास भी बढ़ता चला गया। हालाँकि, सामान्य जन इस विकास का खामोश दर्शक बना रहा। नए लेखन में भी यथार्थ और भ्रम के बीच की अथाह खाई को तब तक नहीं पहचाना गया, जब तक राष्ट्र को 1962 में चीन युद्ध का भारी झटका नहीं लगा। बताते हैं कि आत्मस्वीकृति के अंदाज़ में नेहरू ने ये स्वीकार किया था कि अब तक राष्ट्र एक स्वप्न में जीवित था और अब आधुनिकता की ओर धकेला गया है।”
जैसे आज सिनेमा है, तब वैसे ही साहित्य की मदद से नेहरू ने अपनी छवि चमकाई थी। इधर भारत बेहाल था। उन्होंने ऐसा माहौल बना दिया था, जिसमें सब को नेहरू की ही चिंता थी और देश की नहीं। जबकि नेहरू की उम्र ढल रही थी और देश की हालत खस्ता होते जा रही थी। खैर, बाद में इन्हीं रघुवीर सहाय ने लिखा था कि आज नेहरू नहीं हैं लेकिन देश है और पहले से ज्यादा मजबूत है क्योंकि अब उसे सिर्फ अपनी फ़िक्र करनी है।
सोशल मीडिया पर एक वीडियो काफी चर्चा में है, इस वीडियो में एक डॉक्टर साल 2019 में आई फ़िल्म ‘वॉर’ (War) के गाने घुँघरू पर डांस कर रहे थे। फ़िल्म के दौरान इस गाने में ऋतिक रोशन और टाइगर श्रॉफ नज़र आए थे। डॉक्टर की पहचान अरुण सेनापति के रूप में हुई है। दरअसल, डॉक्टर ने असम स्थित सिलचर मेडिकल के कोरोना वार्ड में भर्ती मरीजों का मनोरंजन करने का फैसला लिया।
डॉक्टर अरुप सेनापति ईएनटी सर्जन विशेषज्ञ (स्पेशलिस्ट) हैं और फ़िलहाल उनके इस डांस की सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हो रही है। खासकर इस डांस के पीछे किए गए उनके प्रयास की जिसके तहत वह मरीजों को खुश करना चाहते थे। इस डांस का वीडियो उनके सहकर्मी डॉक्टर सैय्यद फैज़ान अहमद ने साझा किया था। रविवार (18 अक्टूबर 2020) को ट्विटर पर यह वीडियो साझा करते हुए उन्होंने लिखा-
“मिलिए मेरे ड्यूटी सहकर्मी डॉक्टर अरुप सेनापति से जो कि असम के सिलचर मेडिकल कॉलेज में ईएनटी सर्जन हैं। वह कोरोना वायरस से प्रभावित मरीजों को खुश करने के लिए उनके सामने डांस कर रहे हैं।” ख़बर लिखे जाने तक ट्वीट पर लगभग 49.9 हज़ार लाइक्स थे और 1.4 हज़ार रीट्वीट।
Meet my #COVID duty colleague Dr Arup Senapati an ENT surgeon at Silchar medical college Assam . Dancing infront of COVID patients to make them feel happy #COVID19#Assampic.twitter.com/rhviYPISwO
सोशल मीडिया पर चर्चा का कारण बनने के बाद यह बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता ऋतिक रोशन की निगाह में आया। डांस करने वाले डॉक्टर की तारीफ़ करते हुए ऋतिक रोशन ने अपने ट्वीट में लिखा, “डॉक्टर अरुप से कहिए मैं बहुत जल्द उनसे डांस स्टेप्स सीखने वाला हूँ। फिर किसी दिन असम में उनके उनके जैसा बेहतरीन डांस कर पाऊँ। अद्भुत ज़िंदादिली।”
Tell Dr Arup I’m gonna learn his steps and dance as good as him someday in Assam . Terrific spirit . ?? https://t.co/AdBCarfCYO
कोरोना वायरस अभी तक आम लोगों के लिए चुनौती से कम नहीं है, ऐसे में एक डॉक्टर का पूरी सुरक्षित पोशाक में डांस करना सकारात्मक माहौल तैयार करता है। बहुत से लोगों के लिए ऐसे कठिन समय में यह हौसला बढ़ाने वाला वीडियो साबित होगा। ऐसी छोटी कोशिशों से ही समाज में ख़ुशियों का दायरा बढ़ता है।
बातचीत का एक ऑडियो सुर्ख़ियों में आने के बाद कॉन्ग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी के सांसद वरुण गाँधी पर हमला करना शुरू कर दिया। सामने आए इस ऑडियो में भाजपा सांसद को साफ़ तौर पर ऐसा कहते हुए सुना जा सकता है कि रात के 9:30 बजे किसी को कॉल करने का सही समय नहीं होता है और वह उस व्यक्ति की बात सुबह सुनेंगे।
क्या @narendramodi जी आपको रात ९:३० बजे फोन करते तो आप उन्हें भी इसी प्रकार का उत्तर देते ?
माना आप किसी के बाप के नौकर नहीं है पर पिलभित के जनता के लोक प्रतिनिधि तो है, लोगों ने आपको वोट देकर चुना है और आपका १००% कर्तव्य है कि आप उनसे विनम्रता से पेश आए । pic.twitter.com/aLUFGhOmZV
कॉल करने वाले व्यक्ति ने बातचीत की शुरुआत में कहा कि वह पीलीभीत का रहने वाला है। इसके जवाब में पीलीभीत सांसद वरुण गाँधी ने कहा कि अगर उसे कोई ज़रूरी काम है तो वह सुबह कॉल कर सकता है। बातचीत के बीच में एक मौके पर उन्होंने कहा, “मैं आपके बाप का नौकर नहीं हूँ कि रात के 10 बजे आप से बात करूँ। अगर आपको आधी रात गए या रात के 10 बजे कोई काम है तो माफ़ करिए। मैं आप से इस वक्त बात नहीं कर सकता हूँ। यह कोई समय नहीं होता है किसी को कॉल करने का, आप शरीफ इंसानों की तरह सुबह कॉल कर सकते हैं।”
घटना के बाद वरुण गाँधी की संसदीय सचिव इशिता यादव ने इस पूरे मामले की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कॉल करने वाला व्यक्ति कम उम्र के लड़कों को नकली शराब बेचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद उन्होंने बताया, “वरुण गाँधी इस तरह के घटिया लोगों की मदद नहीं करने वाले हैं। इसके बदले उन्होंने पीलीभीत के लोगों की सुरक्षा करने का विकल्प चुना।” इशिता यादव की तरफ से यह प्रतिक्रिया तब आई जब वामपंथी प्रोपेगेंडा वेबसाइट द वायर की पत्रकार रोहिणी सिंह ने इस मामले में दखल देने का प्रयास किया।
Rohini, you should truly be ashamed of yourself. This man called the MP to prevent himself from being arrested for selling spurious alcohol to underage children. Varun Gandhi is not going to help shady people like this. He chose to protect the people of Pilibhit instead. https://t.co/AB68kYmsl8pic.twitter.com/Eb62Lyjzcc
इशिता यादव ने यह भी बताया कि बातचीत की यह ऑडियो क्लिप एडिट की गई है। द वीक द्वारा प्रकाशित ख़बर में इस बात का खुलासा किया गया था कि कॉल करने वाला व्यक्ति सर्वेश पीलीभीत स्थित सनघड़ी इलाके के शिवाजी कॉलोनी का रहने वाला है। पुलिस ने उसके पास से देसी शराब की 20 बोतलें बरामद की थीं और 20 हज़ार के 2 बेल बांड भरने के बाद उसे रिहा किया गया।
वरुण गाँधी द्वारा कॉल करने वाले इस व्यक्ति को समय नहीं देने का निर्णय सैद्धांतिक रूप से भी गलत नहीं था। स्वाभाविक सी बात है कि सर्वेश नाम के व्यक्ति ने वरुण गाँधी को पुलिस से बचाने में मदद के लिए कॉल किया था। मीडिया ने भले इस मुद्दे पर विवाद खड़ा करने का प्रयास किया लेकिन यह बात पूरी तरह मान्य है कि एक संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधि ऐसे विचित्र समय किसी से भी बात नहीं कर सकता है। ऑडियो में साफ़ सुना जा सकता है कि वरुण गाँधी उस व्यक्ति से कहते हैं कि वह सुबह परेशानी सुनने के लिए तैयार हैं।
ऐसे में एक सांसद से इस तरह की आशा करना कि वह पूरे दिन आपकी बात सुनने के लिए उपलब्ध रहे, यह तार्किक नहीं है। राजनेता, सांसद या मंत्री, सभी आखिरकार इंसान होते हैं। उनके लिए किसी व्यक्ति से किसी भी समय बात कर पाना सहज नहीं होता होगा। यह बात सभी को समझनी चाहिए।
पेरिस में एक शिक्षक के सर काटने की घटना दुनिया भर के कट्टरपंथियों के लिए ‘ये तो साला होना ही था’ मोमेंट था। एक ऐसी घटना जो आजकल किसी को भी सुनाई पड़ती है तो, भले ही उसके होने के कारण हमें अजीब और विचलित करने वाले लगते हैं, लेकिन वहाँ हाथ में छुरा लिए हुए, ‘अल्लाहु अकबर’ का नारा लगाते हुए लोगों की उपस्थिति हमें सामान्य ही नहीं लगती, बल्कि हम प्रतीक्षा करते हैं कि ‘अब तो उसकी जान जानी तय है’।
ऐसी ही एक सामान्य घटना होती है ट्विटर पर वामपंथियों की चुप्पी या फिर ये कहना कि ‘ऐसे लोग मुस्लिम हैं ही नहीं‘। मतलब, आप यह समझिए कि जो व्यक्ति अपने पैगंबर के बारे में गलत सुनने पर हत्या कर देता है, वही मुस्लिम नहीं है, और जो दिन रात इस्लाम के बताए हर नियम को तोड़ते हैं, वो ये सर्टिफिकेट जारी करते हैं। जानकार कहते हैं कि असली इस्लाम तो वही है जो ऐसे कट्टरपंथी जीते हैं, क्योंकि वो काफिरों को कत्ल के योग्य मानते हैं, पैगम्बर या कुरान के खिलाफ एक शब्द बर्दाश्त नहीं करते, और मूर्तिपूजकों को घृणा की निगाह से देखते हैं।
ये सारी बातें ही तो इस्लाम को उसका सही मतलब देती है। यही तो असली इस्लाम है जो पूरी तरह से अपने पथप्रदर्शक की किताब को नुक्ते तक अपनाए हुए चलती है। वस्तुतः, वैसे लोग जो ‘मॉडरेट इस्लाम’ या ‘इस्लाम तो शांति का मजहब है’ बताते हैं, वो सच्चे मुस्लिम होते ही नहीं। आपने अगर ‘सेकुलरिज्म’ के कॉन्सेप्ट को स्वीकार लिया तो आप पूरी तरह से इस्लाम के खिलाफ खड़े हो जाते हैं।
इसलिए, इस्लाम को सही तरीके से न मानने वाले, जब इस्लाम को बिलकुल सही तरीके से मानने वाले को मुस्लिम मानने से इनकार कर देते हैं, तब बड़ी ही विचित्र स्थिति पैदा हो जाती है कि एक गैरमुस्लिम झूठे मुस्लिम के ट्विटर दर्शन को माने, या फिर एक सच्चे मुस्लिम द्वारा गर्दन काटने की घटना को इस्लाम द्वारा निर्देशित पथ मान कर इस मजहब को समझने की कोशिश करे।
इस्लाम को सही तरह से मानने वाले सेकुलर हो ही नहीं सकते
सोशल मीडिया पर मेरी एक पूर्व छात्रा ने एक लिंक शेयर किया तो उसके किसी मजहबी जानकार ने जो टिप्पणी (गलत अंग्रेजी में ही सही) की, वह बताती है कि मजहब में एक बड़े, या शायद अधिकांश, या शायद हर सच्चे मुस्लिम की सोच ऐसे हर मामले के बाद कैसी होती है।
ममून अहमद लिखता है, “ईमानदारी से कहूँ तो, कोई भी मुस्लिम अपने पैगम्बर मुहम्मद के खिलाफ किसी भी तरह की अमर्यादित टिप्पणी, अपमानजनक बात, या कार्टून आदि बर्दाश्त नहीं करेगा। इसके लिए तुम हमें आतंकवादी कहो, या कुछ और, हमें फर्क नहीं पड़ता। और हाँ, बात यह है कि वो भी (अपमान करने वाले) जानते हैं कि हमें ये सब स्वीकार्य नहीं है, फिर भी वो बारम्बार वही काम करते हैं। तब जब हम प्रतिक्रिया देते हैं (जान ले लेते हैं) तब वो हमें अपनी मर्जी से कुछ भी कह सकते हैं।”
छात्रा लिखती है, “ममून अहमद, तो इस्लाम के अनुसार मजहबी मान्यताओं के आधार पर किसी की हत्या जायज है? और हाँ, ये भी याद रहे कि (इस मामले में) परिजनों और शिक्षकों के अनुसार, (मृत शिक्षक) पैटी ने मुस्लिम विद्यार्थी को, कार्टून दिखाने से पहले, बाहर जाने का विकल्प देते हुए कहा था कि वो किसी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचाना चाहता।”
ममून ने इस पर जवाब लिखा, “किसी की हत्या मजहबी कार्य नहीं है, लेकिन ये कुछ ऐसा ही है जैसे किसी ने तुम्हारे परिजनों का अपमान किया, तो तुम उस पर किस तरह की प्रतिक्रिया दोगी। और पैगम्बर के लिए, जैसा कि मैंने कहा, हम मुस्लिम तो युद्ध के लिए तैयार रहते हैं। दुनिया के सारे लोग इस बात को जानते हैं कि हम ये बर्दाश्त नहीं करेंगे। इसके बाद भी वो हमें छेड़ते रहते हैं। क्यों?”
ममून अहमद की बातचीत का स्क्रीनशॉट
ममून या ममून जैसों की ये बातें उनके ज्ञान के स्तर से गलत नहीं हैं। उन्हें ही नहीं, चाहे वो पीएचडीधारी शरजील हो, या सड़क किनारे मेहनत कर के पंचर का काम करता जुबैर, वो भी यही मानता है, जो ऊपर ममून ने लिखा है। वो ऐसा इसलिए मानता है कि क्योंकि ऐसी शिक्षा उसे बचपन से अपने घर, मदरसे, मस्जिद और टेंट के नीचे हो रही मजहबी बैठकों में मिलती है।
उनके लिए ऐसा मानना बहुत ही सामान्य है कि पैगम्बर के बारे में गलत लिखने, बोलने वाले का ‘सर तन से जुदा’ करना ही उचित कार्य है। और तो और, उन्हें किसी भी राष्ट्र के कानून की बाध्यता नहीं रोक सकती क्योंकि वो इसके लिए पहले से ही तैयार रहते हैं। ट्विटर पर आज ही एक वीडियो सामने आया, जो भोपाल के किसी मस्जिद का बताया जाता है। वहाँ लाउडस्पीकर पर कहा जा रहा है कि एक ईसाई ने कुरान को ले कर गुस्ताखी की, तो एक भोपाली खड़ा हुआ, जिब्बह कर के सर काट कर अलग कर दिया। लोग आह्लादित होते हैं कि वो आम लोग नहीं है, वो ‘सैयद, शेख, पठान हैं’।
This is real life as opposed to the well-funded propaganda industry of Bollywood that shows all violence comes to stop at sound of azaan
Iqbal Maidan, Bhopal, 4 Dec 2015: Fatwa calling for beheading those who insult Rasool & Quran as reaction to Kamlesh Tiwari. #parisbeheadingpic.twitter.com/s3bsfAocqQ
क्या आपको ऐसा लगता है कि इस हजारों की भीड़ का उन्माद किसी भारतीय दंड विधान की राह देखता है? क्या आपको लगता है कि यूरोप के शहरों में शार्ली एब्दों के 12 कार्टूनिस्टों की एक बार में हत्या करने वाला, या फिर किसी की गर्दन काट कर अलग करने वाला, किसी भी देश के कानून को मानता है? वस्तुतः, वो किसी भी कानून को मान ही नहीं सकता, यही उसकी मजबूरी है। वो विवश है क्योंकि उसके अस्तित्व के लिए, उसके व्यक्तित्व के लिए यह स्वीकारना असंभव है कि अल्लाह के कानून के इतर कोई और कानून भी है।
आप याद कीजिए कि साल भर पहले ही कमलेश तिवारी की भी हत्या हुई थी। आपने, हमने, पूरे भारत ने उसकी गर्दन के घाव, छाती में छुरे के घुसने से बने निशान और लाश देखी। हत्या की योजना कितनी गहनता और विस्तार लिए बनी थी कि जान-पहचान बढ़ाते हैं, हिन्दू नाम रखते हैं, पार्टी का काम करते हैं, फिर गुजरात से चलते हैं, उत्तर प्रदेश पहुँचते हैं, और मिठाई के डब्बे में रखे छुरे से गर्दन रेत देते हैं। पकड़े जाने पर कहते हैं कि उनका इरादा तो काटते हुए ‘फेसबुक लाइव’ पर पूरी दुनिया को दिखाना था कि इस्लाम में पैगम्बर के बारे में गलत लिखने का परिणाम कैसा होता है।
हत्यारे के परिवार वाले उसकी मदद कर रहे हैं, पत्नी बोल रही है कि बस तुम आ जाओ, बाप कह रहा है कि वो देख लेगा, लोग मदद को तैयार हैं। आपको इसमें कुछ अजीब नहीं लगता? आप हिन्दू अपराधियों के मामले में जाइए, सबसे पहले उसके परिवार के लोग ही उसे त्याग देते हैं और कहते हैं कि उसका बेटा दोषी है तो गोली मार दो उसको। यहाँ, चाहे कश्मीर हो या उत्तर प्रदेश, हमें दसियों उदाहरण मिलते हैं कि एक और बेटा होता तो उसे भी कुर्बान कर देता।
जब कोई व्यक्ति या समाज इस हद तक, ऐसे मामलों में, मोटिवेटेड हो, अपनी अस्थि-मज्जा तक ऐसी मजहबी आस्था से जकड़ा हुआ हो, वो गैरइस्लामी समाज, राष्ट्र या व्यक्ति की किसी भी बात को कैसे मान लेगा? यह असंभव है। अगर वो काफिरों को कत्ल के लायक नहीं समझता, तो वो सच्चा मुस्लिम है ही नहीं। क्योंकि काफिरों को मारने के लिए घात लगा कर बैठने से ले कर, क्यों और कैसे मारें, सारी बातें उनकी किताब में लिखी हुई हैं।
एक और वाकया याद आता है जो हाल ही में बनारस के एक मित्र से बात करते हुए पता चली। वो बताते हैं कि बचपन में वो लोग क्रिकेट खेला करते थे। उनके साथ मुस्लिम बच्चे भी खेलते थे। खेलते वक्त, अगर इन बच्चों को कहीं भी गिरगिट दिख जाए, उसे वो लोग मार डालते थे। कभी ईंट से कुचलना, कभी बैट से, कभी उनके ऊपर बम (पटाखा वाला) फेंक देना आदि आम बात थी। अगर किसी दिन ये काम उनके गैरमुस्लिम मित्रों की अनुपस्थिति में होता था, तब वो उन्हें बताते थे कि कैसे मारा।
मित्र बताते हैं कि उस समय हमें समझ में नहीं आता था कि गिरगिट मारने पर ऐसी खुशी किसी को क्यों मिलती थी, बाद में पता चला कि ऐसा करना किसी हदीस के अनुसार सही है क्योंकि गिरगिट ने इब्राहिम नाम के पैगम्बर को नमरूद द्वारा आग में फेंक देने पर, उस आग को हवा दी थी। इस हदीस में कितनी सच्चाई है, ये मैं नहीं जानता, पर कुरान में ऐसा कोई जिक्र नहीं मिलता। साथ ही, कई दूसरे लोग यह भी बताते हैं कि चूँकि गिरगिट एक नुकसान पहुँचा सकने वाला जीव है, तो उसे मार देना ही उचित है।
यह कोई बहुत बड़ी घटना नहीं है। आपके भी कई ऐसे जानकार होंगे जो कोई कारण बताएँगे कि गिरगिट को देखते ही मार देने की बात कही गई है। किसने, किसको कही, कब क्या हुआ, ये सब अनावश्यक बातें हैं, आवश्यक यह है कि ऐसा वास्तव में होता है। जो जीव आपको ‘नुकसान पहुँचा सकता है’ उसको मारने की बात को बचपन से ही सामान्यीकृत किया जाता है।
तो, वैसा ही एक जीव काफिर होता है। काफिरों को इस्लाम में सबसे हेय दृष्टि से देखा जाता है। आज की दुनिया जब ‘सेक्स’ और ‘जेंडर’ के डिबेट में ‘ही, शी, दे’ आदि लिंगसंबंधी विशेषणों पर व्याख्यान प्रस्तुत कर रही है, ब्लैक लाइव्स मैटर के नाम पर लड़ रहे हैं, वहीं काफिर जैसे संबोधन आम हैं। जबकि, इस संबोधन पर वैश्विक प्रतिबंध लगना चाहिए, और किसी को भी इस नाम से पुकारने पर सजा निर्धारित होनी चाहिए क्योंकि यह विशेषण किसी भी जातिसूचक, रंगभेदी, नस्लभेदी विशेषण से ज्यादा खराब है।
तो, जब काफिर को कुरान ने ही वाजिब-उल-कत्ल माना है, तो धरती पर के आम मुस्लिम कैसे इस बात को झुठला देंगे? क्योंकि इस्लाम में सबसे ऊँची पदवी पैगम्बर मुहम्मद की है, उसके बाद कुरान आता है। इन दोनों के बारे में आप एक शब्द, सोच कर, या अनायास गलत बोल दें, और आपके लिए कोई फतवा किसी दूसरे मुल्क में निकल आए, तो आप अपने दिन गिनने शुरु कर दीजिए।
ऑस्ट्रेलियाई एक्टिविस्ट इमाम तौहिदी इसी विषय पर एक टॉक शो में डेव रूबिन से बात करते हुए कहते हैं, “आम तौर पर हर मुस्लिम दो देशों का नागरिक होता है- एक उस देश का जिसका वह राजनीतिक रूप से नागरिक होता है, और दूसरा मुस्लिम ‘उम्माह’। जब दुनिया के किसी भी कोने में बैठा कोई भी मुल्ला किसी का सर कलम कर देने का फ़तवा जारी करता है तो वह अँधेरे में तीर नहीं मार रहा होता है। उसे यह पता होता है कि उसके इस फ़तवे को पूरा करना किसी न किसी मुस्लिम का फ़र्ज़ होगा।”
तो बात यह है कि फ्रांसिसी शिक्षक पैटी की अकाल मृत्यु तो निश्चित थी, बस माध्यम कौन बनता, किस दिन बनता, यह तय नहीं था। कई बार, कमलेश तिवारी का उदाहरण लें, सालों लग जाते हैं, कई बार तत्क्षण किसी के भीतर का इस्लाम जगता है और ‘जिब्बह करके गर्दन अलग’ कर दी जाती है। एक और उदाहरण सलमान रश्दी का है जो बिना खिड़कियों वाले घरों में, एक जगह से दूसरे जगह, छिपता फिर रहा है क्योंकि उसकी जान लेने का फतवा सालों पहले जारी हो गया है। कोई सच्चा मुस्लिम कहीं ताक में बैठा होगा कि उस फतवे को अंजाम तक कैसे पहुँचाया जाए।
सेकुलर देश में शरीयत वाले लोग
ये सारी बातें मूलतः एक बिंदु पर ही टकराती दिखती हैं: आदमी के बनाए कानून बनाम अल्लाह का बनाया कानून। एक सच्चा मुस्लिम अल्लाह का ही कानून मानता है, और अगर उसे चुनना पड़े (भले ही इसके लिए कानूनन उसकी जान क्यों न ले ली जाए) वो हमेशा अल्लाह के कानून को ही मानेगा जो उसे बताता है कि पैगंबर के खिलाफ लिखे एक शब्द के लिए गर्दन अलग कर दो।
आपको टीवी डिबेट पर, कमलेश तिवारी की हत्या पर, खुल्लमखुल्ला जश्न मनाने वाले मुल्ले-मौलवी दिख जाएँगे। आपको ऐसा लिखने वाले पूरे सोशल मीडिया पर दिख जाएँगे कि भाई, उसने तो वो बात कर दी जो मना है हमारे में, इसमें तो यही होना ही था। आपने लोगों को ‘सर काट कर लाने पर लाख और करोड़ के ईनाम’ की बात भी सुनी होगी।
अब बात यह है कि ऐसा तो है नहीं कि लोगों के पास विकल्प नहीं हैं इस्लामी मुल्कों में जाने के, जहाँ इस तरह की व्यवस्था है कि आदमी का कानून नहीं चलेगा, अल्लाह वाला चलेगा। जो लोग ममून अहमद की तरह के हैं, वो ऐसे मुल्कों में अपनी व्यवस्था के बिना कैसे रह रहे हैं? क्योंकि यहाँ तो चोरी पर, बलात्कार पर, हत्या पर राष्ट्र का कानून चलता है, जबकि अल्लाह वाले कानून में तो बड़ी ही कष्टकारी सजाएँ निर्धारित हैं।
मतलब, शरीयत तभी तक मानो जब तक अपना फायदा दिखे, बाकी समय ‘पत्थरों से मार कर हत्या’, ‘चौराहे पर कोड़े मारने की सजा’, ‘हाथ काट देने की सजा’ आदि स्वीकार्य नहीं? ये तो एक तरह से इस्लाम के खिलाफ होना हुआ। कोई भी सच्चा मुस्लिम एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में कैसे रह सकता है? ये तो उसकी मजहबी अवधारणा के बिलकुल ही विरोध में है।
तरीका तो यह है कि आप एक इस्लामी मुल्क में रहें, और काफिर देशों पर हमेशा चढ़ाई करते रहें, और अंत में पूरी दुनिया पर इस्लाम का राज कायम कर लें। यही बताया गया है, यही सोचा जाता है, यही लक्ष्य है। लेकिन काफिरों के देश में रहना, हर तरफ मंदिर, चर्च या अन्य धार्मिक स्थलों को देखना, हर बड़े पेड़ के नीचे मूर्तियाँ देखना तो किसी भी सच्चे मुस्लिम को अत्यधिक पीड़ा पहुँचाती होगी, फिर वो ऐसे देशों में कर क्या रहा है!
हर मुस्लिम की यही इच्छा होती है कि वो जहाँ रह रहा है वो इस्लाम के कायदे-कानूनों के मुताबिक रहे। जहाँ यह संभव नहीं, और एक मौका मिले कि वो वैसी जगह पर जा सकता है जहाँ ऐसे कायदे-कानून लागू होंगे, तो सच्चे मुस्लिमों को तो वहीं जाना चाहिए था। जो बच गए हैं, और इस तरह के कत्लों को यह कह कर जायज ठहराते हैं कि भाई रसूल का अपमान किया तो उसको तो मारेंगे ही।
इनके तर्क आप देखिए कि ‘जब तुम्हें पता है कि हम यही करेंगे, तो तुम ऐसा करते क्यों हो?’ ये तो वहीं बात हो गई कि कोई आदमी, जो सीरियल किलर है, वो अपने बचाव में यह कहे कि ‘तुम्हें जब पता है कि मैं रातों को चाकू ले कर गलियों में घूमने वालों को बलात्कार के बाद मार देता हूँ, तो तुम गलियों में घूमते ही क्यों हो?’
ये तो कुतर्क है जो किसी भी विवेकशील मनुष्य या अन्य जीवों को (अगर उन्हें समझाया जा सके किसी तकनीक से) स्वीकार्य नहीं होगा। ये तो सीधे तौर पर यह कहना हुआ कि हम तुम्हारे कानून को नहीं मानते, हमें जो बचपन में घर में, मदरसों में, मस्जिदों में सिखाया गया है, वही अखंड सत्य है, और हम उसका पालन करने को बाध्य हैं।
फिर तो, वैसे देशों से ऐसे सारे मुस्लिमों को बाहर निकाला जाना चाहिए, या वो स्वयं ही निकल जाएँ, जहाँ कोई और रिलीजन या धर्म बहुसंख्यक है, या जो भी देश स्वयं को पंथनिरपेक्ष कहता है। सीधा कारण यह है कि इस्लाम न सिर्फ एक मजहब है, बल्कि आज के परिदृश्य में एक राजनैतिक पहचान है। अगर एक कदम और बढ़ कर कहा जाए तो इस्लाम अपने शुरुआत से ही साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का मजहब रहा है जहाँ जमीन जीतने से ले कर, काफिरों को मारने, उनके घरों, धार्मिक स्थानों पर कब्जा करने आदि के लिए जाना जाता है। उसका तो लिखित लक्ष्य है पूरी धरती को इस्लाम के नीचे लाना।
फिर ऐसे में, इस तरह के लोग एक सामान्य व्यवस्था में हमेशा फँसे हुए पाएँगे स्वयं को। मुझे तो उनकी स्थिति सोच कर ही अत्यंत कष्ट की अनुभूति होती है कि बलात्कारी, बच्चाबाज, हत्यारे, लुटेरे मुगलों के द्वारा इतनी तबाही के बाद भी कुछ मंदिर रह गए, और कुछ तो बनने वाले हैं, सच्चे मुस्लिम कितना कुछ सहते होंगे। जिन लोगों को पाकिस्तान में शिया, अहमदिया आदि भी काफिर ही नजर आते हैं, उन्हें इतने करोड़ हिन्दुओं के बीच रहना, उनकी पूजा को सुनना, आरती को देखना, उनकी गंगा को बहते देखना कितना पीड़ा पहुँचाता होगा!
हिन्दुओं की एक और समस्या है कि वो गाय, गोबर, गंगा, पेड़, जानवर, फूल, पत्थर किसी को भी देवी-देवता मान लेते हैं। अगर न मानते तब तक किसी सच्चे मुस्लिम को समस्या नहीं होती क्योंकि उनके लिए तो ये सब अल्लाह की बनाई चीजें हैं। जबकि हिन्दुओं ने चीजों को तब और जटिल बना दिया जब वो इन्हें पूजने लगे। जैसे ही आप किसी वस्तु की पूजा करने लगते हैं, वो मूर्ति पूजा हो जाती है, और फिर किसी भी सच्चे मुस्लिम के लिए वो इस्लाम के खिलाफ नजर आने लगती है।
ऐसे में, दो ही रास्ते हैं। पहला तो यह है कि अल्लाह का कोई अज़ाब आए जिससे सारी धरती के सारे काफिर रातों-रात मर जाएँ। दूसरा यह कि सच्चे मुस्लिम हर दिन की पीड़ा से बचने के लिए किसी दूसरे इस्लामी मुल्क में चले जाएँ जहाँ गाय खाने की वस्तु है, और मूर्तियाँ तोड़ने के लिए, जहाँ आईना देखना, सजना-सँवरना हराम है। पहले विकल्प के भी होने की पूरी संभावना है क्योंकि पुस्तक में कई जगह ऐसा जिक्र है कि जब भी ईमान वालों ने युद्ध किया है, और पिछड़ने लगे हैं, तब अल्लाह ने अज़ाब भेज कर काफिरों का सफाया करने में मुस्लिमों की मदद की है क्योंकि वो अत्यंत दयावान है, परम विवेकशील है और पूर्ण प्रभुत्व वाला है।
हाँ, ये तय नहीं है कि ऐसा कब होगा। तो इंतजार करने से बेहतर है कि स्वयं ही वैसी जगह चले जाएँ, जहाँ से काफिरों के खिलाफ जंग की तैयारी में राष्ट्र पूरी तरह आपकी सहायता करे। अभी समस्या ये है कि, कश्मीर का ही उदाहरण लें तो, सुबह में कोई एरिया कमांडर बनता है, शाम तक मारा जाता है, वैकेंसी वैसी ही खाली रह जाती है। ये तो सीधे अनुपातहीन स्थिति है क्योंकि काफिर पाँच गुणा ज्यादा भी हैं, और यहाँ इस्लाम वाले कानून को भी राष्ट्र मान्यता नहीं देता।
जैसा कि किताब भी कई जगह कहती है कि काफिरों के लिए कैसे घात लगाना है, तो उस स्थिति के प्रतिफलित होने के लिए आपको अपने इलाके में होना आवश्यक है। क्योंकि घात तो आप तभी लगा पाएँगे जब इलाका आपका हो। जब तक ऐसी स्थिति न आए, तब तक ऐसे जगह चले जाओ जहाँ संख्या बढ़ा सको, इकट्ठा हो सको और तलवारों की जगह मिसाइल, परमाणु हथियारों से काफिरों पर हमला कर सको।
यूरोप का भविष्य
पिछले दो दशक में यूरोप में जिस तरह के हमले हुए हैं, और ये हमले हर जगह हुए हैं, उसके बाद भी ‘पोलिटिकली करेक्ट’ वामपंथी विचारों की सत्ताओं ने शरणार्थियों के तौर पर आए लोगों के लिए जैसी व्यवस्थाएँ की, और गले लगाया, वो अब अपने विकृत परिणाम सामने ला रहा है। लंदन लंदनिस्तान बन चुका है, बर्मिंघम के पार्क में अब नमाजें होती हैं, रोम की सड़कों पर लोग चटाई डाल कर नमाज पढ़ते दिख रहे हैं, और मजहबी आतंक की छाप हर शहर तक पहुँच चुकी है।
कुछ एक राष्ट्रों ने इस्लामी आतंक की गंभीरता को समझते हुए ऐसे शरणागतों के लिए बॉर्डर बंद कर दिए हैं, वहीं कई देश ऐसे हैं जो दयालु दिखने के चक्कर में ऐसे लोगों को अपने यहाँ जगह दी और अचानक से वहाँ अपराधों में वृद्धि होने लगी। चाहे स्वीडन हो, जर्मनी हो, फ्रांस, इटली या इंग्लैंड हो, इन जगहों पर कट्टरपंथी हमलों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है।
मानवता की बात एक तरफ है, लेकिन आँखें मूँद कर मानवता की दुहाई देना और अपना सर कटवा लेना मूर्खता है। सत्ता तो अभी भी ऐसे ही अपने बयानों में ‘टेरर हैज नो रिलीजन’ के गीत गाती रहेगी, लेकिन यूरोप के मूल नागरिक जल्द ही सड़कों पर उतरेंगे। चाहे वो फ्रांसिसी शिक्षक पैटी की हत्या हो या शॉर्ली एब्दो के कार्टूनिस्टों की, लोगों ने इसके खिलाफ बोलना शुरु कर दिया है। सरकार भले चुप रहे, लोग सड़कों पर आ रहे हैं।
जब सरकार हाथ खड़े कर देती है, क्योंकि उसे वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता चाहिए कि वो बड़े संवेदनशील और सुलझी हुई बातें करते हैं कि आतंक का कोई मजहब नहीं होता, तब आम जनता ऐसे आतंक से तंग आ कर कानून हाथ में ले लेती है, क्योंकि सामने वाले ने तो वहाँ का कानून तभी तक माना जब तक वो उसके मतलब को साधने में सहायक था।
अगले पाँच सालों में इस्लामी आतंक के खिलाफ यूरोपीय शहरों में आम लोग विद्रोह पर उतरेंगे और फिर स्थिति किसी भी सरकार के नियंत्रण से बाहर हो जाएगी। सरकारों को अपने शहर की गलियों में ‘तुम्हारे कपड़े हमारे मजहब की उम्मीदों के विरोध में हैं’ जैसी बातें नहीं सुननी पड़ती। क्योंकि एक मजहब की प्रकृति ही यही है कि उन्हें अपने तरीकों से तो चलना ही है, साथ ही जो उनके तरीकों से नहीं चलते, उनको भी उँगली करते रहना है।
जिनके लिए शिया भी काफिर हो चुका हो, अहमदिया भी, उनके लिए ईसाई तो सबसे पहला दुश्मन सदियों से रहा है। ये तो वो युद्ध है जो ये बीच में हार गए थे, लेकिन कहा तो यही जाता है कि वो तब तक लड़ते रहेंगे जब तक जीतेंगे नहीं, चाहे सौ साल लगे या हजार। जिसकी लड़ाई का काल भविष्य में इतना लम्बा और अनिश्चित है, वो तुम्हारी सभ्यता को मान ही नहीं सकता।
ऐसे में, गृहयुद्ध की संभावना बढ़ जाती है क्योंकि सरकार पाँच साल में अपनी प्रकृति नहीं बदल पाएगी, लेकिन आम जनता पाँच साल में ऊब जाएगी और जवाब देने के लिए योजनाएँ बनाने लगेगी। जो नहीं होगा, वो यह है कि भारत जैसे देश में, जहाँ बहुसंख्यक समाज सहिष्णु है, वो लड़ने का तो छोड़िए, कमलेश तिवारी की हत्या पर एक आक्रोश जुलूस तक नहीं निकाल पाया।
ऐसा समाज सिर्फ संख्या बल के कारण ही जीवित बचा रहता है, और हर दिन लव जिहाद, रेप जिहाद, मजहबी हमले आदि के छोटे-छोटे घाव सहता रहता है। फिर यह समाज ट्विटर पर दूसरे समाज के लोगों से पूछता है कि ‘फलाँ आज क्यों चुप है?’ अरे भाई, फलाँ, तुम्हारे लिए क्यों बोलेगा? वो जब अपने चोर की आकस्मिक हत्या पर, सीट के झगड़े वाली हत्या पर, गौरक्षकों द्वारा पकड़े जाने की बात को मजहबी बना कर पूरी दुनिया में तुम्हें असहिष्णु बताता है, तो फिर वो तुम्हारे लिए ट्वीट करेगा!
वो तो इस बात से ही संतुष्ट है कि ‘इस्लाम शांति का मजहब है’, ‘जिसने किसी की गर्दन काट दी वो मुस्लिम नहीं है’। इस गूढ़ बात को समझो, तभी कहीं पहुँच पाओगे कि कैसे हर आतंकी हमला एक मजहब से जुड़ा आतंकवादी करता है, फिर भी वो मजहब आतंक का मजहब नहीं, फिर भी वो मजहब शांतिप्रिय मजहब है।
फिर, गौर करने पर लगता है कि बिलकुल सही बात है कि इस्लाम शांति का मजहब है। लेकिन ये शांति, कयामत की तरह ही, वर्तमान की शांति की बात नहीं करती, ये उस शांति की बात करती है जब हर काफिर मर चुका होगा, धरती पर एक भी गैरमजहबी व्यक्ति नहीं बचा होगा, तब जो मुर्दा शांति आएगी, वही शांति इन ट्वीटों में वर्णित है।
राजनीति के अपराधीकरण को रोकने की चर्चा खूब होती है, लेकिन जब टिकट बाँटने की बारी आती है तो राजनीतिक दल अपराधियों को टिकट देने से पीछे नहीं हटते। इसका उदाहरण एक बार फिर से बिहार चुनाव में देखने को मिल रहा है। बिहार में होने वाले मतदान के लिए पार्टियों ने जिन उम्मीदवारों को खड़ा किया है, उनमें अपराधी नेताओं की संख्या काफी ज्यादा है। कॉन्ग्रेस ने जिन्ना समर्थक को टिकट देने के बाद अब रेप आरोपित उम्मीदवार प्रवीण सिंह कुशवाहा को टिकट दिया है।
प्रवीण सिंह कुशवाहा 1988 के पापरी बोस रेप कांड में आरोपित हैं। प्रवीण सिंह पर आरोप लगा कि उन्होंने एक डॉक्टर की बेटी पापरी बोस को अगवा कर लिया। अगले दिन जबरन शादी कर ली। पापरी बोस को गोड्डा के जिस ओंकारनाथ राम इंजीनियर के घर में छिपाकर रखा गया था, वह तत्कालीन सीएम भगवत झा आजाद के करीबी थे।
रेप कांड में आजाद के एक करीबी रिश्तेदार के साथ ही उनके बेटे कीर्ति झा आजाद का भी नाम जुड़ा था। बहुत विवाद हुआ। प्रवीण उस समय भागलपुर जिला एनएसयूआई के अध्यक्ष थे। संगठन के प्रदेश अध्यक्ष प्रेमचंद्र मिश्रा ने उन्हें पद से हटा दिया। महीनेभर तक उस कांड की चर्चा रही।
पापरी से न सिर्फ बंदूक की नोंक पर शादी की गई, बल्कि विश्वसनीयता के लिए घटना की एक तस्वीर भी ली गई थी। इतना ही नहीं, लड़की को अपने माता-पिता को यह कहते हुए एक नोट लिखने के लिए मजबूर किया गया था कि उसने अपनी मर्जी के लड़के से शादी की। पुलिस ने लड़की के ठीक होने तक इंतजार किया, और राम को अंडरग्राउंड होने की अनुमति दे दी।
अपहरण, जिला एनएसयूआई प्रमुख और आजाद के करीबी लोगों की संलिप्तता और पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई के कारण लोगों ने सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया। तीन दिनों तक मुख्यमंत्री के गृह नगर भागलपुर में सड़क बंद रखा गया। भागलपुर की घटना के ठीक चार दिन बाद, NSUI ने पटना में एक रैली का आयोजन किया। इसमें नेताओं की भरमार थी, लेकिन पार्टी की छवि को सुधारने के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए। इसे राज्य में कॉन्ग्रेस शासन के पतनकाल का कांड भी कहा जाता है। कॉन्ग्रेस ने 2005 में भी कुशवाहा को टिकट दिया था, तब भी कॉन्ग्रेस को पीड़ित परिवार और जनता की नाराजगी का सामना करना पड़ा था।
यही कॉन्ग्रेस हाथरस केस में कथित रूप से गैंगरेप पीड़िता को न्याय दिलाने की झूठी लड़ाई लड़ रही थी लेकिन यहाँ रेप आरोपित को टिकट देकर उसने एक बार फिर साबित किया कि उसे पापरी बोस रेप कांड से कोई मतलब नहीं है बल्कि उसके आरोपित को टिकट देकर वह ऐसे घृणित अपराध का इनाम दे रही है।
इसके अलावा पार्टी की तरफ से जेल में बंद बाहुबलियों आनंद मोहन और पप्पू यादव की पत्नियों लवली आनंद और रंजीता रंजन को भी टिकट दिए जाने की संभावना है।
इससे पहले जिन्ना के समर्थक मश्कूर उस्मानी को कॉन्ग्रेस प्रत्याशी बनाने पर विवाद हुआ था। गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस ने जाले विधानसभा सीट पर मशकूर अहमद उस्मानी को टिकट दिया है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छात्रसंघ का अध्यक्ष रहते हुए साल 2018 में मशकूर अहमद उस्मानी ने विश्वविद्यालय में लगी मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर हटाने का विरोध किया था। इसपर अब बिहार की सियासत गरमा गई है।
बताया जा रहा है कि उस्मानी ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र संघ में रहते हुए जिन्ना की तस्वीर लगाई थी। इस यूनिवर्सिटी से जिन्ना की तस्वीर हटाए जाने पर उन्होंने काफी बवाल मचाया था। मुकदमे के बाद जब पुलिस ने छापेमारी की थी तो कार्यालय से जिन्ना की तस्वीर बरामद हुई थी।
लोगों का कहना है कि जिन्ना को आदर्श मानने वाले व्यक्ति को अपना प्रत्याशी बनाकर कॉन्ग्रेस ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि उनके मन में गाँधी नहीं बल्कि जिन्ना वास करता है। इस तरह के व्यक्ति को टिकट देना न सिर्फ कार्यकर्ताओं बल्कि जनता का भी अपमान है।