तमिलनाडु में कॉन्ग्रेस प्रवक्ता खुशबू सुंदर (Khushbu Sundar) ने आज (अक्टूबर 12, 2020) अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपने इस फैसले के पीछे पार्टी के बर्ताव को मुख्य कारण बताया। सोनिया गाँधी को लिखे अपने पत्र में उन्होंने कहा कि वे पार्टी से उस समय जुड़ी जब कॉन्ग्रेस चुनाव हार गई थी। उनके अपने अनुभव कहते हैं कि पार्टी में कुछ ऐसे तत्व हैं जिनका ग्राउंड लेवल पर कोई जुड़ाव नहीं है।
बता दें कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति मामले पर अपनी पार्टी का विरोध कर केंद्र सरकार का समर्थन करने वाली खुशबू ने जुलाई में इस बात को स्पष्ट किया था कि उनके समर्थन को ये न समझा जाए कि वह भाजपा से जुड़ रही है। हालाँकि, आज जैसे ही उन्होंने अपना इस्तीफा कॉन्ग्रेस पार्टी से दिया, कुछ घंटों बाद खबर आई कि उन्होंने भाजपा से हाथ मिला लिया है।
खुशबू सुंदर ने आज भले ही भाजपा से जुड़ते वक्त कहा हो कि वह पार्टी के नेतृत्व से प्रभावित हुई हैं। मगर उनके कुछ शब्द ऐसे हैं जो शायद कोई भी भाजपा समर्थक भूल पाए। उनके कुछ पुराने ट्विट्स हम आपके सामने रख रहे हैं, जो साबित करते हैं कि पार्टी से जुड़ने के बाद उन्होंने खुद उन्हीं विशेषणों के साथ जोड़ लिया है जिनका उपयोग अतीत में वह भाजपा सदस्यों के लिए करती थीं। जैसे- गंदे, गँवार, अनपढ़, डेड ब्रेन, धार्मिक कट्टरपंथी, बंदर आदि।
14 अक्टूबर 2017- खुशबू सुंदर ने अपने ट्वीट में संघ समर्थकों को गवार, गंदा, घटिया दिमाग, अपमानजनक कहा था। सुंदर का आरोप था कि भाजपा के लोग सिर्फ़ ट्रोल करने के लिए जीते हैं।
उल्लेखनीय है कि आरएसएस एक राष्ट्र स्वयं सेवक संघ है और कई मामलों पर भाजपा की राय और आरएसएस की राय एक दूसरे से मिलती है। भाजपा के कई नेता भी आरएसएस समर्थक रहे हैं। इस संगठन का संबंध सामाजिक सांस्कृतिक संगठन है जिसे भाजपा भी मानती है।
25 सितंबर 2019- खुशबू ने संघ और भाजपा समर्थकों को मूर्ख व बेवकूफ और ‘फिजिकली रिटार्डेड’ भी कहा। 5 अक्टूबर को उन्होंने संघ से जुड़े लोगों को बंदर कहा और लिखा, “संघी बंदरों की तरह बर्ताव कर रहे हैं बिना 6th सेंस के।”
28 फरवरी को खुशबू सुंदर ने खुद के लिए ‘नखत खान’ नाम सुन कर भाजपा समर्थकों को धार्मिक कट्टरपंथी कहा था, जबकि हकीकत में उनका बचपन का नाम नखत खान ही था। वह एक मुस्लिम परिवार में जन्मी थीं और उन्होंने एक्टर, डायरेक्टर, प्रोड्यूसर सुंदर सी से साल 2000 में शादी की थी।
मात्र पाँच दिन पहले की यदि बात करें तो उन्होंने अपने ट्विटर पर लिखा कि जो लोग अपने आप को संघी घोषित कर चुके हैं उन्हें किसानों की परेशानियों की ओर देखना बंद कर देना चाहिए। यहाँ खुशबू किसान बिल को लेकर अपना ट्वीट कर रही थीं।
यहाँ ज्ञात रहे कि वामपंथियों द्वारा संघी शब्द का प्रयोग बेहद अपमानजनक तरीके से किया जाता है। कॉन्ग्रेसियों और वामपंथियों द्वारा विशेषत: इस शब्द का प्रयोग तब होता है जब कोई व्यक्ति पीएम मोदी का समर्थन करे। इसलिए यह सब केवल खुशबू जैसे लोगों के पाखंडी रवैये की ओर इशारा करता है।
आज खुशबु सुंदर ने भले ही पार्टी से जुड़ना चुना है और निश्चित ही अब वह पार्टी की विचारधारा के साथ होने का ढोंग भी करेंगी, लेकिन यह सच कभी नहीं बदलेगा कि उन्होंने अपनी राजनैतिक पैठ संघ से जुड़े लोगों को गालियाँ देकर बनाई है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कोरोना महामारी के बीच अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कई बड़े ऐलान किए। निर्मला सीतारमण ने कहा कि कोविड महामारी ने अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया लेकिन सरकार ने गरीबों और कमजोरों की मदद की है।
वित्त मंत्री ने कहा कि आत्मनिर्भर भारत पैकेज से माँग बढ़ी। आपूर्ति की बाधा को कम किया गया है। वित्त मंत्री ने कहा कि माँग को प्रोत्साहित करने के प्रस्ताव के दो भाग हैं, पहला ‘एलटीसी कैश वाउचर स्कीम’ और दूसरा ‘स्पेशल फेस्टिवल एडवांस स्कीम’ है।
केंद्र सरकार ने इस त्योहारी सीजन में सरकारी कर्मचारियों को बड़ा तोहफा दिया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार (अक्टूबर 12, 2020) को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकारी कर्मचारियों के लिए फेस्टिवल एडवांस की घोषणा की है। त्योहारी सीजन में केंद्र सरकार अपने कर्मचारियों को 10,000 रुपए एडवांस देगी।
स्कीम में सभी केंद्रीय कर्मचारी 10,000 रुपए का लोन ले सकते हैं। इस पर कोई ब्याज नहीं चुकाना होगा। इसकी शर्त बस यही होगी कि यह पैसा 31 मार्च 2021 से पहले खर्च करना होगा। इसका फायदा गजटेड और नॉन गजडेट दोनों कर्मचारारियों को मिलेगा।
कर्मचारियों को इसके लिए प्रीपेड रुपे (RuPay) कार्ड मिलेगा। प्रेस कॉन्फ्रेंस में वित्त मंत्री ने एलटीसी कैश वाउचर की घोषणा की है। वित्त मंत्री द्वारा आज की घोषणाएँ माँग को बढ़ाने के उद्देश्य से की गई हैं। स्पेशल फेस्टिवल एडवांस स्कीम के लिए 4,000 करोड़ रुपए खर्च होने की संभावना है। वहीं अगर राज्य भी आएँ तो 8000 करोड़ रुपए की अतिरिक्त उपभोक्ता माँग पैदा होगी।
2nd part of the Modi Govt’s plan to boost consumer demand is a one-time restoration of the festival advance for central govt employees through the Special Festival Advance Scheme.
निर्मला सीतारमण ने कहा, “डिमांड को विवेकपूर्ण तरीके से बढ़ाने के लिए तैयार किए गए ये प्रस्ताव पेश किए जा रहे हैं। कुछ प्रस्ताव खर्च क्षमता को बढ़ाने के लिए हैं तो कुछ सीधे-सीधे GDP में बढ़ोतरी के लिए हैं।” उन्होंने बताया कि अर्थव्यवस्था में डिमांड को बढ़ाने के लिए आज जो प्रस्ताव पेश किए जा रहे हैं, वो दो वर्गों में बँटे हुए हैं- उपभोक्ता व्यय और पूँजीगत व्यय।
निर्मला ने कहा कि LTC कैश वाउचर स्कीम के तहत, सरकारी कर्मचारी छुट्टियों के लिए नकद राशि का विकल्प चुन सकते हैं। उन्होंने कहा कि माँग को प्रोत्साहन के लिए खर्च के लिए अग्रिम में राशि दी जाएगी और विशेष त्योहार अग्रिम योजना शुरू की जाएगी। बता दें कि प्रत्येक चार साल में सरकार अपने कर्मचारियों को उनकी पसंद के किसी गंतव्य की यात्रा के लिए एलटीसी देती है। इसके अलावा एक एलटीसी उन्हें उनके गृह राज्य की यात्रा के लिए दिया जाता है।
वित्त मंत्री ने साथ ही कहा कि सरकार कर्मचारियों को एलटीसी में टिकट किराए का भुगतान में नकद करेगी। निर्मला ने कहा कि एलटीसी के लिए नकद पर सरकार का खर्च 5,675 करोड़ रुपए होगा। इसके अलावा सार्वजनिक उपक्रमों और बैंकों को 1,900 करोड़ रुपए दिए जाएँगे।
LTC कैश वाउचर स्कीम के तहत, अगर सरकारी कर्मचारी कम से कम 12 फीसदी GST कलेक्ट करने वाला कोई भी सामान खरीदते हैं तो उन्हें उनकी छुट्टियों के एवज़ में मिलने वाली रकम और तीन बार के टिकट के किराये जितनी नकदी लेने का विकल्प मिलेगा।
केंद्र सरकार की ओर से पूँजीगत खर्च के लिए 25,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बजट दिया जाएगा। इसे रोड, डिफेंस इन्फ्रा, वाटर सप्लाई, शहरी विकास में खर्च किया जा सकता है। 7500 करोड़ रुपए बाकी राज्यों को मिलेंगे। इसका आधा हिस्सा पहली किस्त के रूप में मिलेंगे। पहली किस्त खर्च होने के बाद दूसरी किस्त मिलेगी। राज्य किसी नए प्रोजेक्ट या पुराने प्रोजेक्ट पर इसे खर्च कर सकते हैं।
We are issuing a special interest-free 50-year loan to states for ₹ 12,000 crore capital expenditure
✅₹ 200 crore each for 8 North East states ✅₹ 450 crore each Uttarakhand, Himachal ✅₹ 7,500 crore for remaining states, as per @15thFinCom devolution
राज्यों को पूँजीगत खर्च के लिए 50 साल के लिए 12,000 करोड़ रुपए का स्पेशल इंट्रेस्ट फ्री लोन दिया जाएगा, पूर्वोत्तर को और उत्तराखंड और हिमाचल को 2500 करोड़ रुपए मिलेंगे। LTC के बदले केंद्रीय कर्मचारियों को नकद भुगतान किया जाएगा। यह राशि टैक्स फ्री होगी। राज्य सरकारें और निजी क्षेत्र इसे लागू कर सकते हैं। इससे 28 हजार करोड़ रुपए की अतिरिक्त उपभोक्ता आय पैदा होगी। इससे गरीबों का भी भला होगा।
राजस्थान के करौली स्थित सपोटरा के बूकना गाँव में पुजारी बाबूलाल वैष्णव की हत्या के बाद पूरे देश में पीड़ित परिजनों को न्याय दिलाने के लिए आक्रोश का माहौल बन रहा है। वहीं दूसरी तरफ दिल्ली के पूर्व मंत्री और भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने मृत पुजारी के परिजनों से मिलकर उनके लिए वित्तीय सहायता सुनिश्चित की है। हालाँकि, राजस्थान की अशोक गहलोत की सरकार इस मामले में उदासीन बनी है और आलोचना का सामना कर रही है।
जिले के प्रभारी मंत्री अशोक चंदना और पूर्व मंत्री व क्षेत्रीय विधायक रमेश मीणा ने सोमवार (अक्टूबर 12, 2020) को गाँव का दौरा किया और ये राज्य सरकार की ओर से एक तरह से डैमेज कण्ट्रोल का प्रयास था। इन दोनों नेताओं ने राज्य सरकार की तरफ से पीड़ित परिजनों को सांत्वना दी और साथ ही सरकारी सहायता का चेक सौंपा। ये भी ध्यान देने वाली बात है कि इस घटना के बाद ये कॉन्ग्रेस नेताओं का गाँव में पहला दौरा है।
मृत पुजारी के पीड़ित परिवार को धनराशि, FD, घर और जमीन: कपिल मिश्रा का ऐलान
हमने इस पूरे मामले को समझने के लिए भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने बात की, जो राजस्थान में बूकना के इस पीड़ित परिवार से मिल कर आए हैं और उनकी सहायता के लिए धनराशि जुटाई है। उन्होंने बताया कि उन्हें खबरों और सोशल मीडिया के माध्यम से इस घटना के बारे में पता चला। इसके बाद उन्होंने इस घटना का वायरल वीडियो देखा, जिसे उन्होंने काफी दर्दनाक करार दिया है। उन्होंने कहा कि ये वीडियो काफी पीड़ादायक था।
कपिल मिश्रा ने बताया कि इस वीडियो को देख कर उनके मन में आया कि उन्हें पीड़ित परिवार ने लिए कुछ न कुछ जरूर करना चाहिए। इसके बाद उन्होंने दिवंगत पुजारी बाबूलाल वैष्णव के पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए एक कैम्पेन शुरू किया। कपिल मिश्रा के शब्दों में ही कहें तो इस पर उन्हें काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिली। पहले ही दिन 10 लाख रुपए का फण्ड लोगों ने जुटा दिया, जबकि ये कैम्पेन शाम को शुरू किया गया था।
उन्होंने बताया कि उन्होंने 21 दिन में 21 लाख रुपए की सहायता राशि जुटाने का लक्ष्य तय किया था लेकिन मात्र 24 घंटे के अंदर ही इतनी धनराशि लोगों ने जुटा दी। खबर लिखे जाने तक 30 लाख रुपए इकट्ठे किए जा चुके हैं। इसके बाद कपिल मिश्रा पीड़ित परिवार से मिलने पहुँचे। उन्होंने बताया कि परिवार काफी गरीब है, उनके पास रहने के लिए घर तक नहीं है और धन तो है ही नहीं। उन्होंने कहा कि परिवार की स्थिति काफी पीड़ादायक है।
भाजपा नेता ने बताया कि दिवंगत पुजारी बाबूलाल वैष्णव का गरीब और असहाय परिवार घास-फूस की झोंपड़ी में रहने के लिए मजबूर है। वो अपने पीछे पत्नी के अलावा 6 बेटियों को भी छोड़ गए हैं, जिनमें से 4 की शादी हो चुकी है। उनके पास एक सक्रिय बैंक खाता तक नहीं था। एक बैंक खाता था, जो निष्क्रिय था। कपिल मिश्रा ने जानकारी दी कि वो दो तरीके से परिवार की सहायता करने जा रहे हैं। एक तो 25 लाख रुपए सीधे उनके बैंक अकाउंट में डाले जाएँगे। उन्होंने बताया:
“हमने करौली स्टेट बैंक में दिवंगत पुजारी की पत्नी का बैंक खाता खुलवाया है। 15 लाख रुपए की सहायता राशि फिक्स्ड डिपॉजिट के माध्यम से उन्हें दी जाएगी। ये 10 वर्षों के लिए होगा। हर साल इसका इंटरेस्ट परिवार को मिलता रहेगा, जिससे उनका खर्च चलेगा। इससे रुपया भी बचा रहेगा और उनका खर्चा-पानी भी चलता रहेगा। इसके अलावा 10 लाख रुपए उन्हें तत्काल सहायता के रूप में दिए जाएँगे। इससे लगातार कुछ इनकम भी आ जाएगी, बैंक में सेविंग्स भी रहेंगी और अभी के खर्च के लिए भी धन होगा।”
25 लाख रुपए के अतिरिक्त जो भी धनराशि आई है या आगे आने वाली है, उसके लिए कपिल मिश्रा ने बताया कि अलग से योजना बनाई जा रही है और इस सम्बन्ध में उन्होंने ग्रामीणों से भी बातचीत की है। उन्होंने कहा कि पंचायत की मदद से गाँव में ही पीड़ित परिवार के लिए जमीन ली जाएगी और वहाँ उनके लिए एक पक्का घर बना कर दिया जाएगा। इसके लिए अभी भी विचार-विमर्श चल रहा है।
पुजारी जी की धर्मपत्नी का बैंक एकाउंट खुलवा दिया गया है
गांधी जी के जंतर में लिखें आखिरी व्यक्ति को अपनी आंखों से देखना हो तो एक बार राजस्थान के इस परिवार से मिलकर देखियेगा pic.twitter.com/IAE61Iz8tx
उन्होंने कहा कि 3-4 महीने में पीड़ित परिवार के लिए घर बनवा कर तैयार कर लिया जाएगा। कपिल मिश्रा ने बताया कि उनकी स्थानीय अधिकारियों से इस मामले में कोई बात नहीं हुई है लेकिन उन्हें पता लगा है कि रविवार तक बाबूलाल वैष्णव की मृत्यु के 3 दिन बीत जाने के बावजूद स्थानीय विधायक तक पीड़ित परिवार से मिलने नहीं पहुँचा, मुख्यमंत्री या मंत्री तो भला दूर की बात है। उन्होंने कहा कि जनता के काफी दबाव के बाद सरकार ने मदद की घोषणा की है।
बता दें कि राजस्थान सरकार ने पीड़ित परिवार के लिए बतौर मुआवजा 10 लाख रुपए देने की घोषणा की थी। उन्होंने सरकारी सहायता की हिसाब से इस मुआवजे को काफी कम बताते हुए कहा कि 30 लाख रुपए की सहायता तो जनता ने ही कर दिया है। उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि राज्य सरकार इस मामले में न्याय सुनिश्चित करते हुए नहीं दिख रही है और इसे रफा-दफा करने में लगी है, ताकि इसकी चर्चा ही न हो।
कपिल मिश्रा का कहना है कि इतनी बड़ी घटना होने के बाद सरकार के अधिकारियों और नेताओं को पीड़ित परिवार के साथ खड़ा हुआ दिखना चाहिए था लेकिन अब तक लग नहीं रहा कि ऐसा हुआ है। उन्होंने बताया कि परिवार को राजस्थान पुलिस-प्रशासन के काम करने के तरीके से संतुष्टि नहीं है और उन्होंने सीबीआई जाँच की माँग की है। बता दें कि इस हत्याकांड के कुछ आरोपित अभी भी फरार चल रहे हैं।
राजस्थान: करौली के बूकना में पुजारी बाबूलाल वैष्णव की हत्या: अपडेट्स
रविवार को अचानक से आरोपित परिवार की महिलाएँ उग्र हो गईं और उन्होंने पीड़ित पक्ष के घर जाकर जम कर हंगामा किया। आरोपितों की पत्नियों व बेटियों का कहना था कि पुजारी ने खुद को ही जला डाला और थानाधिकारी ने ‘सही बात कही’, इसीलिए उन्हें हटा दिया गया। एक महिला ने दावा किया कि पुजारी को बचाने में उसका हाथ भी झुलस गया था। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण चौधरी भी वहाँ पहुँचे और पीड़ितों से मुलाकात की।
इस दौरान वहाँ पहुँचे भाजपा नेता कपिल मिश्रा का भी स्थानीय लोगों और नेताओं ने स्वागत किया। वहीं पीड़ित पक्ष ने शिकायत की है कि उन्हें आरोपितों की तरफ से अभी भी धमकियाँ मिल रही हैं। मृतक की पत्नी ने अपनी जान को ख़तरा बताते हुए सुरक्षा की गुहार लगाई है। सांसद डकटर किरोड़ीलाल मीणा ने भी अपने धरना प्रदर्शन में यही माँग रखी थी। फिर भी आरोपित पक्ष की महिलाओं ने जो हंगामा किया, उससे पीड़ित परिवार सहमा हुआ है।
वहीं मृत पुजारी की पत्नी विमला देवी व दो बेटियों की तबियत खराब होने के बाद पूरे परिवार का स्वास्थ्य परीक्षण कराया गया। चिकित्सकों ने वहाँ पहुँच कर परिजनों का उपचार किया। न्याय और मुआवजे की माँग को लेकर परिवार ने भूखे-प्यासे धरना दिया था और प्रदर्शन किया था, जिसके बाद उनमें से कई की तबीयत बिगड़ गई थी और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वहीं हंगामा करने वाली महिलाओं को हिरासत में लिया गया।
मदद के लिए आगे आए कई हाथ (साभार: राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित खबर)
इस मामले में मदद के लिए हाथ बढ़ रहे हैं और ‘विप्र सेना’ की ओर से पीड़ित परिवार को 51 हज़ार रुपए की सहायता दी गई। साथ ही ‘परशुराम सेना वाहिनी’ के महिला मोर्चा की प्रदेश कार्यकारिणी ने भी 21 हजार रुपए की सहायता प्रदान की। इससे पहले सांसद किरोड़ीलाल मीणा और मनोज राजौरिया की तरफ से भी एक-एक लाख रुपए की सहायता राशि दी गई थी। साथ ही ‘विप्र फाउंडेशन’ ने 2 लालः रुपए की सहायता दी।
वहीं अब इस मामले की गूँज जयपुर में भी सुनाई दे रही है, जहाँ ‘फाइट फॉर राइट (FIR)’ नमक संगठन ने इस घटना को लेकर राजस्थान की राजधानी में विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। जब पुजारी ज़िंदा थे और उनके इलाज चल रहा था, तब भी इस संगठन के लोगों ने सवाई मानसिंह अस्पताल पहुँच कर सहायता की माँग उठाई थी। संगठन के प्रतिनिधिमंडल ने गाँव पहुँच कर पीड़ित परिवार का हालचाल जाना।
क्या है मामला?
बूकना के पुजारी की गुजर-बसर के लिए गाँव के ही लोगों ने कुछ जमीन मंदिर के नाम कर रखी थी। इसी जमीन से सटती हुई कुछ जमीन और है, जो कुछ समय पहले तक एक पहाड़ी जैसी थी। मंदिर के पुजारी को वह जमीन उपयोगी लगी तो उन्होंने उसे समतल करवा लिया और गाँव की पंचायत बुला कर यह जमीन भी मंदिर के नाम कराने की सहमति ले ली। गाँव की पंचायत ने एकमत हो कर यह जमीन मंदिर के नाम करवा देने की सहमति दे दी।
पंचायत में कैलाश मीणा के परिवार ने इस फैसले का विरोध किया, लेकिन पंचों ने पुजारी के पक्ष में फैसला दिया। सात अक्टूबर को कैलाश मीणा और उसके परिवार के कुछ लोग जब इस समतल की हुई जमीन पर कब्जा करने पहुँचे तो पुजारी ने इसका विरोध किया और कहा कि पंचायत जमीन मंदिर को दे चुकी है तो अब तुम कब्जा क्यों कर रहे हो। इस बात को लेकर दोनो के बीच विवाद हुआ और गर्मागर्मी में ही कैलाश मीणा और इसके साथियों ने बाबूलाल वैष्णव पर पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी।
पुजारी के परिवार वालों और गाँव वालो ने उन्हें अस्पताल पहुँचाया, जहाँ से उन्हें जयपुर रेफर कर दिया गया और शुक्रवार यानी नौ अक्टूबर को उपचार के दौरान पुजारी की मौत हो गई। इस घटना के एक तथ्य में असमंजस है कि पुजारी ने स्वयं आत्मदाह किया अथवा कैलाश और उसके समर्थकों ने जलाया या कैलाश मीणा जो छप्पर बना रहे थे, बाबूलाल वैष्णव उसको आग लगाने गए और उसमें झुलस गए।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (अक्टूबर 12, 2020) को कॉन्ग्रेस नेता और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल द्वारा दायर की गई बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas corpus) याचिका को स्थगित कर दिया है। इस याचिका में केरल के कथित पत्रकार सिद्दीक कप्पन की रिहाई की माँग की गई थी। बता दें कि सिद्दीक कप्पन, उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए चार पीएफआई सदस्यों में से एक है। ये लोग यूपी में हाथरस मामले को लेकर जाति आधारित अशांति और सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की योजना बनाई थी।
याचिका को चार सप्ताह के लिए स्थगित करते हुए, भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल को इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के लिए कहा।
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल पत्रकार के रूप में काम कर रहे पीएफआई के सक्रिय सदस्य सिद्दीक कप्पन का प्रतिनिधित्व करते हुए सर्वोच्च न्यायालय से आग्रह किया कि वे उन्हें संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत उससे संपर्क करने दें। सिब्बल ने अदालत को बताया कि जब हिरासत में लिया गया तो यह बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई थी।
हालाँकि, बाद में, एक प्राथमिकी दर्ज की गई और तब गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) लागू किया गया था। उन्होंने न्यायालय को सूचित किया कि उत्तर प्रदेश राज्य का कोई भी न्यायालय याचिकाकर्ता को जमानत नहीं देगा। कपिल सिब्बल ने अनुरोध करते हुए कहा, “हमें आप अनुच्छेद 32 के तहत संपर्क करने दें।” सिब्बल कप्पन मामले में केरल पत्रकार संघ का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।
मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने सिब्बल से कहा कि वे इस मामले को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएँ। सिब्बल ने दलील दी कि इसका मतलब है कि याचिकाकर्ता फिलहाल जेल में ही रहेगा। अदालत ने कहा, “आप उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएँ हम यहीं पर हैं, अगर कुछ गलत होता है तो।”
उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुई घटना की आड़ में मथुरा से गिरफ्तार हुए दंगे की साजिश रचने वाले 4 आरोपितों के खिलाफ बुधवार (अक्टूबर 06, 2020) को मथुरा में गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और राजद्रोह के तहत केस दर्ज किया गया, जिनमें से एक केरल के कथित पत्रकार सिद्दीक कप्पन भी हैं।
दर्ज FIR में बताया गया कि अतीकुर्रहमान, आलम, केरल के सिद्दीक कप्पन (जो कि कथित तौर पर पत्रकार है) और मसूद अहमद के पास गिरफ्तारी के दौरान 6 स्मार्टफोन, एक लैपटॉप व ‘जस्टिस फॉर हाथरस’ नाम के पैम्फ़्लिट पाए गए थे और ये लोग शांति भंग करने के लिए हाथरस जा रहे थे।
पुलिस ने सोमवार को पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के चार कार्यकर्ताओं को मथुरा से गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार, वे सभी पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के स्टूडेंट विंग कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (सीएफआई) से जुड़े हुए हैं और दिल्ली से आकर कार में हाथरस की ओर बढ़ रहे थे जहाँ उन्हें रोका गया। पुलिस ने आरोप लगाया था कि वे सरकार की छवि खराब करने और इलाके में माहौल बिगाड़ने की साजिश कर रहे थे।
सोमवार (अक्टूबर 12, 2020) को मुंबई के सामने नई तरह की समस्या खड़ी हो गई। पावर ग्रिड के फेल हो जाने की वजह से मुंबई में बिजली आपूर्ति लगभग ठप्प हो गई। लोकल ट्रेन समेत मायानगरी की बिजली से जुड़ी तमाम सेवाएँ प्रभावित हुई। लेकिन सोशल मीडिया पर इस सम्बन्ध में अलग तरह की प्रतिक्रिया नज़र आई।
जैसा कि अक्सर देखा जाता है कि कोई भी घटना ‘मीमर्स’ के लिए अवसर की तरह होती है। कोई भी मुद्दा या कोई भी घटना उनके MEME से अछूती नहीं रहती। सोशल मीडिया यूजर्स ने इस घटना पर भी खूब MEME साझा किए।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से मीमर्स का लगाव कभी छिपा नहीं रहा, वह आम तौर पर क्रियेटर और मीमर्स की निगरानी में रहते हैं। ठीक ऐसा ही हुआ मुंबई पावर कट मामले में जब वह एक अच्छे मीम में नज़र आए।
इस मीम में केजरीवाल प्लास लेकर उलझे हुए तारों के सामने खड़े हैं और कैप्शन में लिखा है, “मुंबई वालों, अब अगली बार दिल्ली कैपिटल्स को हारने से पहले दो बार सोचना।”
इस बात की पूरी उम्मीद है कि मुंबई में पावर कट की वजह से बने हालत बहुत जल्द सामान्य हो जाएँगे और मुंबईवासियों का जीवन वापस अपनी पटरी पर लौटेगा लेकिन तब तक ऐसे ही आगे बढ़ना होगा। इस दौरान मुंबई वालों के पास दो तरह के ही विकल्प बचते हैं, पहला शिकायत करना और दूसरा हालातों के बीच हँसते हुए आगे बढ़ना।
हालाँकि मायानगरी के लिए पावरकट जैसी बातें असामान्य हैं लेकिन इस दुनिया में बहुत कुछ एक ही बार होता है। साल 2020 अभी तक कुछ इस तरह का साल ही साबित हुआ है।
कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर ने सोमवार (12 अक्टूबर 2020) को हाथरस मामले में चिंता जताई। ऐसा घटनाक्रम जिसमें मृतका को न्याय दिलाना प्राथमिकता नहीं रह गई है। इसके उलट यह घटना नेताओं के लिए अपने नंबर बढ़ाने का ज़रिया बन गई है।
शशि थरूर ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश की सरकार इस मामले में असल तथ्यों को दबाना चाह रही है। यह दावा खुद में हास्यास्पद है क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफ़नामा दायर किया था, जिससे हाथरस मामले की सीबीआई जाँच सम्भव हो और यह सब अदालत की निगरानी में हो।
शनिवार (10 अक्टूबर 2020) को सीबीआई ने प्राथमिकी दर्ज करके मामले की जाँच शुरू भी कर दी है। आरोपों के अनुसार 14 सितंबर को 4 लोगों ने दलित लड़की के साथ मारपीट की और गला दबाया था, कई गम्भीर चोटों की वजह से 29 सितंबर को उसकी मृत्यु हो गई थी। उसने 4 लोगों पर आरोप लगाया था कि चारों ने उसके साथ बलात्कार भी किया था।
इसके घटना के सामने आते ही देश के लोगों में काफी आक्रोश था और तमाम राजनेता भी मदद दिलाने के लिए आगे आए। जिसमें से अधिकाँश के लिए इस घटना में न्याय से ज्यादा महत्वपूर्ण उनका खुद का प्रचार और खुद की छवि को बेहतर करना था। फ़िलहाल मामला सीबीआई के हाथों में है और वह इसकी जाँच शुरू कर चुकी है।
उल्लेखनीय बात यह है कि कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर का यह ट्वीट उनका सालों पुराना एक ट्वीट वायरल होने के बाद आया। जिसमें उन्होंने जॉर्ज सोरोस से मिलने की बात का ज़िक्र किया था, वही जॉर्ज सोरोस जिनका रवैया भारत के लिए हमेशा आलोचनात्मक रहा है।
Met old friend George Soros, upbeat abt India and curious abt our neighbourhood. He’s far more than an investor: a concerned world citizen
26 मई साल 2009 को शशि थरूर ने एक ट्वीट किया था, जिसमें उन्होंने बताया था कि कैसे वह अपने ‘पुराने दोस्त’ से मिले। साल 2009 में यूपीए के चुनाव जीतने के बाद शशि थरूर ने 28 मई को बतौर विदेश मंत्री शपथ ली थी।
ऑपइंडिया ने पहले ही कॉन्ग्रेस पार्टी और अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस के बीच सम्बंधों को लेकर कई ख़बरें प्रकाशित की हैं। इन सम्बंधों की जानकारी सामने आने के बाद पता चला था कि अपने एनजीओ नेटवर्क के ज़रिए उसका कॉन्ग्रेस पार्टी पर कैसा प्रभाव था।
यूपीए सरकार में तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिव शंकर मेनन जॉर्ज सोरोस के साथ एक एनजीओ बोर्ड का हिस्सा बने थे। इसी तरह हर्ष मंदर जो कि सोनिया गाँधी द्वारा बनाए गए नेशनल एडवाइजरी काउंसिल का हिस्सा थे, वह जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फ़ाउंडेशन के तहत आने वाली ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव एडवाइजरी बोर्ड के चेयरमैन थे।
जॉर्ज सोरोस कथित तौर पर अमेरिकी मूल के फिलान्थ्रोपिस्ट (जन हितैषी कार्य करने वाले) हैं। इन्होंने राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादियों के विरुद्ध जंग छेड़ने का ऐलान किया था।
भारतीय सेना पर किन बातों का बुरा प्रभाव पड़ रहा है? इसका जवाब बहुत विस्तृत है लेकिन उन तमाम चीज़ों में ही एक बड़ा नाम है आयुध निर्माण बोर्ड/ऑर्डनेन्स फैक्ट्री बोर्ड (Ordnance Factory Board)। एक ऐसी एजेंसी जो रक्षा मंत्रालय के उत्पादन विभाग (Production Department) के अंतर्गत आती है। इस एजेंसी के तहत पूरे देश भर में 41 फैक्ट्री मौजूद हैं, जिन्हें ‘इंडियन ऑर्डनेन्स फैक्ट्रीज़ कहा जाता है और इनमें लगभग 80 से 82 हज़ार कर्मचारी काम करते हैं।
OFB का मूल काम है भारतीय सेना के अलग-अलग धड़ों जैसे नौसेना, वायुसेना और थल सेना के लिए हथियार और उपकरण बनाना। यहीं से इस मुद्दे पर विमर्श शुरू होता है। OFB की कार्यशैली से लेकर यहाँ तैयार किए गए हथियारों तक सब कुछ उतना सही नहीं है। जिसके नकारात्मक परिणाम या आम शब्दों में कहें तो नुकसान भारत सरकार और मुख्य रूप से भारतीय सेना को झेलने पड़ते हैं। इसमें सिर्फ आर्थिक हानि शामिल नहीं है बल्कि सेना के जवानों-अफसरों का बहुमूल्य जीवन भी शामिल है।
इस सम्बंध में पूर्व मेजर गौरव आर्या का एक वीडियो है, जिसमें उन्होंने विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने आयुध निर्माण बोर्ड (OFB) के हर उस पहलू पर बात की है, जिसमें बदलाव की गुंजाइश और ज़रूरत है।
विश्व युद्ध के दौर में भारत दुनिया के उन देशों में शामिल था, जो हथियारों के उत्पादन और निर्यात के मामले में सबसे ऊपर थे। उस दौरान भी OFB ही सैन्य उपकरण और हथियार बनाती थी क्योंकि इसका गठन अंग्रेज़ों के ज़माने में ही हो गया था। ऐसे में सवाल उठता है कि अब किन वजहों से ऐसा नहीं हो पा रहा है? सबसे पहले समझ लेते हैं कि फ़िलहाल OFB की यथास्थिति क्या है और यह किस पैमाने पर और किस तरह काम कर रही है।
अभी देश के अलग-अलग राज्यों में कुल 41 ऑर्डनेन्स फैक्ट्री हैं, जो तरह-तरह के सैन्य उपकरणों और हथियारों का उत्पादन करती हैं।वर्गीकरण के आधार पर हम इसे ऐसे समझ सकते हैं:
असलहा और बारूद (Ammunition & Explosives) – 11 फैक्ट्री
गाड़ी और बंदूक (Vehicles & Arms) – 11 फैक्ट्री
सामग्री और कलपुर्जे (Materials & Components) – 8 फैक्ट्री
बख्तरबंद गाड़ियाँ (Armored Vehicles) – 6 फैक्ट्री
उपकरण (Equipments) – 5 फैक्ट्री
इसके अलावा 13 डेवलपमेंट सेंटर्स हैं और 9 इंस्टिट्यूट ऑफ़ लर्निंग। इनमें से लगभग 80 फ़ीसदी उत्पाद सेना खरीदती है। इसमें एक बड़ा पेंच यह है कि दुनिया के ऐसे तमाम देश जिनके भारत के साथ अच्छे सम्बंध हैं, वह भी ऑर्डनेन्स फैक्ट्री के बनाए हथियार और उपकरण नहीं खरीदते हैं और यह भी होने वाले नुकसान का एक बड़ा कारण है।
OFB का मुख्यालय कोलकाता में स्थित है क्योंकि इसकी स्थापना ईस्ट इंडिया कंपनी ने की थी। जबकि इसके लगभग सारे ही ख़रीददार दिल्ली में मौजूद हैं। चाहे वह सेना हो, नौसेना हो, थल सेना हो या गृह मंत्रालय, इन सभी का मुख्यालय दिल्ली में है इसलिए संवाद की सम्भावनाएँ सीमित हो जाती हैं।
देश के अलग-अलग क्षेत्रों में स्थित OFB की फैक्ट्रीज़ में लगभग 80748 कर्मचारी काम करते हैं। इसके अलावा इससे सम्बंधित अन्य संस्थाओं में लगभग 1 से 1.5 हज़ार कर्मचारी काम करते हैं यानी मोटे तौर पर लगभग 82 हज़ार कर्मचारी OFB के अंतर्गत काम करते हैं। फिर भी OFB इतनी कमाई नहीं कर पाती कि अपने मुनाफ़े से फैक्ट्रीज़ चला सके यानी वह काफी बड़े पैमाने पर घाटे का सामना कर रही है।
OFB की कार्यशैली का एक छोटा सा उदाहरण है – ‘इंसास राइफल’। सेना इस हथियार को बहुत अच्छा नहीं मानती है फिर भी सेना को यह खरीदने पड़ते हैं, नहीं खरीदने का विकल्प ही नहीं है क्योंकि OFB इनका उत्पादन करती है। हालात ऐसे बने कि सरकार को यह खरीदने के बावजूद एके 203 और सिक्स आर्स जैसी अन्य राइफल खरीदनी पड़ी।
अब कुछ ऐसी चीज़ों के बारे में जान लेते हैं, जिनका बाज़ार में मूल्य क्या है और OFB के निर्माण और उत्पादन के बाद मूल्य क्या होता है:
कॉम्बैट ड्रेस – OFB से खरीदे जाने पर 3300 रुपए और बाज़ार से खरीदे जाने पर 1800 रुपए।
कॉम्बैट जैकेट – OFB से खरीदे जाने पर 5950 रुपए और बाज़ार से खरीदे जाने पर 3500 रुपए।
कोट (Extremely cold climate) – OFB से खरीदे जाने पर 6250 रुपए और बाज़ार से खरीदे जाने पर 4000 रुपए।
हाई एल्टीट्यूड पैराशूट – OFB से खरीदे जाने पर 1 लाख 62 हज़ार रुपए और बाज़ार से खरीदे जाने पर 1 लाख 12 हज़ार रुपए।
अशोक लेलैंड ‘आर्मी ट्रक’ – OFB से खरीदे जाने पर 28 लाख रुपए (पूरी तरह बना कर) और बाज़ार खरीदे जाने पर 17 लाख रुपए।
इसके अलावा पिछले कुछ सालों में OFB ने काफी बड़े पैमाने पर आर्थिक गिरावट (shortfall) देखी है। साल 2009 से 2014 के बीच OFB से कुल 82 उत्पादों की माँग की गई थी, जिसकी कुल कीमत 25914 करोड़ रुपए थी। लेकिन बनाए गए सिर्फ 19917 करोड़ रुपए के उत्पाद यानी लगभग 23 फ़ीसदी की गिरावट।
इसी तरह साल 2014 से लेकर 2019 के बीच दोबारा 82 उत्पादों की माँग रखी गई, जिसकी कुल कीमत 26378 करोड़ रुपए थी। लेकिन बनाए गए सिर्फ 18538 करोड़ रुपए के उत्पाद यानी इस बार लगभग 29 फ़ीसदी की गिरावट।
हाल ही में सेना ने इस सम्बंध में एक आधिकारिक बयान जारी किया था जिसके अनुसार सेना को OFB द्वारा बनाए गए हथियार और सैन्य उपकरण नष्ट करने पड़े थे। उनकी हालत इतनी बदतर थी कि उन्हें उपयोग में लाया ही नहीं जा सकता था, अगर ऐसा करने का प्रयास होता तो जान और माल की हानि होती। इतना ही नहीं, अगर यह हथियार और सैन्य उपकरण उचित गुणवत्ता के होते तो सेना उस मुनाफ़े से 100 तोपें खरीद सकती थी।
अब एक नज़र उन आँकड़ों पर डाल लेते हैं कि पिछले कुल सालों में खराब हथियारों और सैन्य उपकरणों की कीमत कितने भारतीय जवानों ने चुकाई:
2014 – 1 मृत्यु और 15 घायल
2015 – 0 मृत्यु और 14 घायल
2016 – 19 मृत्यु और 28 घायल
2017 – 1 मृत्यु और 18 घायल
2018 – 3 मृत्यु और 43 घायल
2019 – 3 मृत्यु और 28 घायल
2020 – 0 मृत्यु और 13 घायल (अभी तक)
यानी खराब सैन्य उपकरणों और हथियारों की वजह से पिछले 7 सालों में 27 जवान अकारण बलिदान हुए और 159 फौजी घायल हुए। भारतीय जवानों की जान को लेकर हुए नुकसान के संदर्भ में एक और बहुत मज़बूत उदाहरण है, ‘ऑपरेशन पराक्रम’।
साल 2001 में भारतीय संसद पर हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत पाकिस्तान सीमा पर लगभग 8 लाख जवान तैनात किए गए थे। युद्ध जैसे हालात बन गए थे, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तैयारी पूरी कर ली थी। युद्ध भले नहीं हुए लेकिन इतने सैनिकों की जान गई, जिसकी कल्पना करना मुश्किल है और कारण वही, खराब गुणवत्ता के हथियार और सैन्य उपकरण।
कारगिल की लड़ाई में आधिकारिक रूप से जारी की गई जानकारी के मुताबिक़ कुल 527 सैनिक बलिदानी हुए थे लेकिन ऑपरेशन पराक्रम के दौरान 798 सैनिकों ने अपनी जान गँवाई। इस ऑपरेशन के चलते भारत सरकार को हज़ारों करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था।
यह तो फिर भी बड़े उदाहरण हैं। इसके अलावा बहुत सी ऐसी वजहें हैं, जिन पर ध्यान ही नहीं जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में सेना के हथियार बनाने वाली बहुत सी निजी फैक्ट्री हैं और आश्चर्यजनक रूप से उनमें से कुछ NATO तक को हथियार निर्यात करती हैं। सेना उनसे चाह कर भी हथियार नहीं खरीद सकती है और न ही उन पर किसी का ध्यान जाता है।
हाल फ़िलहाल के कुछ सालों में OFB का औसत मानव संसाधन उपयोग (average man utilization) लगभग 127 फ़ीसदी रहा है। जबकि औसत मशीन उपयोग (average machine utilization) 75 फ़ीसदी है। इसके अलावा लगभग हर OFB फैक्ट्री में मजदूर संघ (लेबर यूनियन) है, जिनमें से कुछ की कार्यशैली अक्सर हैरान करती है। अक्सर सीमा पर चीन के साथ तनाव होने पर एक हिस्सा (वामपंथी विचारधारा से प्रभावित) विरोध जताने लगता है, कभी-कभी तो वह काम करना ही बंद कर देते हैं।
इन सारी बातों के अलावा OFB से जुड़े हुए जितने भी कर्मचारी हैं, वह बेहद कर्मठ और समर्पित हैं। उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी का आभास है लेकिन उन्हें उचित दिशा-निर्देश, प्रोत्साहन और बढ़ावा देने की ज़रूरत है। सरकार को भी इस सम्बंध में कठोर होकर विचार करना पड़ेगा, जिससे सेना का बुनियादी ढाँचा सुधरे।
‘मिथक-निर्माण’ किसी भी गणतंत्र की स्थापना की एक आंतरिक विशेषता है। सत्ता पर पकड़ मजबूत करने और अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए हर देश के सत्तारूढ़ संस्थान ऐसे ही कुछ मिथकों को गढ़ते हैं, जो उन्हें उनकी विचारधारा को सही ठहराने में मदद करती है। भारत में नेहरूवादी धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना के साथ भी इसी तरह की घटना देखने को मिली। इस दौरान ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ की विचारधारा का मिथक गढ़ा गया।
‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ की विचारधारा के मूल सिद्धांतों में से एक यह है कि 1947 में भारतीय मुसलमानों ने पाकिस्तान के इस्लामिक गणतंत्र को चुनने की बजाय ‘धर्मनिरपेक्ष भारत’ को चुना था, इसलिए अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के सभी दस्तूर जायज हैं। इसने न सिर्फ इस्लामी कट्टरपंथ पर पर्दा डालने को प्रोत्साहित किया, बल्कि इसका महिमामंडन भी किया।
इस स्पष्ट झूठ ने असदुद्दीन ओवैसी जैसे कट्टरपंथी इस्लामी नेताओं को यह कहने की खुली छूट दे दी है कि उन्होंने पाकिस्तान की बजाय भारत को ‘चुना’ था। ओवैसी के भाई हमेशा हिंसा और हिंदुओं को धमकी देते हुए पाए जाते हैं।
हालाँकि अब नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता के मूल सिद्धांत पर सवाल उठाने के लिए लगभग अक्षम्य हो गया है, स्वतंत्रता युग के राजनीतिक समर्थकों को अच्छी तरह से पता था कि मुसलमानों ने भारत में रहने के लिए नहीं चुना था क्योंकि उन्होंने एक इस्लामिक राज्य के दर्शन को अस्वीकार कर दिया था।
सरदार पटेल ने जनवरी 1948 में कोलकाता में अपने भाषण में उन भावनाओं को आवाज़ दी जो हमारे ‘धर्मनिरपेक्ष’ नेताओं को गहरा मानसिक आघात दे सकते हैं।
सरदार पटेल ने कहा, “जो मुसलमान अभी भी भारत में हैं, उनमें से कई ने पाकिस्तान के निर्माण में मदद की … क्या उनका राष्ट्र रातोंरात बदल गया है? मुझे समझ नहीं आया कि यह इतना कैसे बदल गया। वे अब कहते हैं कि वे वफादार हैं और पूछते हैं कि उनकी वफादारी पर सवाल क्यों उठाया जा रहा है। तो मैं जवाब देता हूँ कि आप हमसे क्यों सवाल कर रहे हैं, खुद से पूछिए। यह आपको हमसे नहीं पूछना चाहिए।”
वो आगे कहते हैं, “मैंने एक बात कही, आपने पाकिस्तान बनाया, आपके लिए अच्छा है। उनका कहना है कि पाकिस्तान और भारत को एक साथ आना चाहिए। मैं कहता हूँ कि कृपया ऐसी बातें कहने से बचना चाहिए। पाकिस्तान को स्वर्ग बनने दो, हम इससे आने वाली ठंडी हवा का आनंद लेंगे।”
इतना कहते ही दर्शक ठहाके लगाने लगते हैं और वो अपनी बात जारी रखते हैं। यह पहली बार ने नहीं था जब सरदार पटेल भारतीय मुसलमानों के पाकिस्तान के प्रति वफादारी की बात की थी।
उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री जीबी पंत को लिखे अपने पत्र में, 9 जनवरी 1950 को, राम लला और माता सीता की मूर्तियों के बाबरी मस्जिद के भीतर अचानक से प्रकट होने के बाद पटेल ने लिखा था, “प्रधानमंत्री ने अयोध्या के घटनाक्रम पर चिंता व्यक्त करते हुए आपको पहले ही एक टेलीग्राम भेज दिया है। मैंने आपसे लखनऊ में इसके बारे में बात की थी। मुझे लगता है कि यह विवादित मुद्दा बहुत गलत समय पर उठाया गया है, देश के दृष्टिकोण से भी और अपने स्वयं के प्रांत के दृष्टिकोण से भी। हाल ही में व्यापक सांप्रदायिक मुद्दे केवल विभिन्न समुदायों की आपसी संतुष्टि के लिए हल किए गए हैं। जहाँ तक मुसलमानों का सवाल है, वे अपनी नई वफादारी के लिए सेटल हो रहे हैं।”
देश के प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के 6 साल पूरे होने के बाद नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता की आड़ में अलग-थलग पड़े मिथक भी अब दूर हो रहे हैं। लेफ्ट के प्रिय ’बुद्धिजीवी’ शरजील इमाम ने नागरिकता संशोधन अधिनियम के पारित होने के बाद राष्ट्रीय राजधानी में भड़की हिंसा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसने इस मामले पर विस्तार से लिखा और बोला है।
शरजील इमाम, पाकिस्तान के निर्माता मोहम्मद अली जिन्ना को एक भारतीय नेता मानता है। उसने जिन्ना का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे बहुत से सबक हैं जिनसे भारतीय मुसलमान सीख सकते हैं। उसके अनुसार, जिन्ना एक भारतीय मुस्लिम नेता थे, जो हिंदू पुनरुत्थानवाद की ताकतों के खिलाफ लड़ रहे थे। हालाँकि, उसने कहा कि मुसलमानों ने भारत को ‘धर्मनिरपेक्षता’ के आदर्शों के कारण नहीं चुना। उसका कहना था कि मुसलमान अपनी संपत्ति और अन्य कारणों के कारण भारत में ही रह गए।
इस प्रकार, सरदार पटेल के शब्द और लेफ्ट के प्रिय ’बुद्धिजीवी’ शरजील इमाम की बातों से स्पष्ट हो जाता है कि ‘मुसलमानों ने इस्लामिक पाकिस्तान की बजाय धर्मनिरपेक्ष भारत को चुना’ नेहरूवादी सेक्युलर राज्य के ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ की विचारधारा का एक स्थायी मिथक है। हालाँकि इस मिथक के साथ ही अन्य मिथकों को भी कूड़ेदान में डालाना समय की माँग है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ ‘कुछ बोलने’ की अपनी जिम्मेदारी के कारण राहुल गाँधी अक्सर कई ऐसी बातें कर जाते हैं जिसे सुनकर किसी के भी मन में सवाल उठने लाजिमी हैं। हाल में उन्होंने एक रैली को संबोधित करते हुए कहा था कि अगर उनकी सरकार होती तो 15 मिनट में चीन के सैनिकों को खदेड़ देते।
अब उनके इस बयान ने तूल पकड़ा हुआ है। जगह-जगह जहाँ उन्हें ट्रोल किया जा रहा है। वहीं एक 16 साल का बच्चा उन्हें सोशल मीडिया के जरिए समझाने के लिए सामने आया है। इस बच्चे का नाम अर्जुन भाटी है। करीब 49 हजार फॉलोवर्स के साथ ट्विटर पर सक्रिय इस बच्चे ने अपनी दादी के साथ मिल कर राहुल गाँधी को संदेश दिया है।
अपनी वीडियो शेयर करते हुए अर्जुन ने लिखा, “आदरणीय राहुल गाँधी जी कोशिश करता हूँ कि आपका दिल से सम्मान करूँ। लेकिन जब आपकी बात सुनता हूँ तो दुःख होता है, आप राजनीति करो सवाल करो सरकार की ग़लत बातों का विरोध करो ये सही है लेकिन आपको ख़ुद ही नहीं पता आप नरेन्द्र मोदी जी की ख़िलाफ में देश के लिए भी ग़लत बोलते हो। ऐसा ना करो।”
आदरणीय@RahulGandhi ?जी कोशिश करता हूँ कि आपका दिल से सम्मान करूँ लेकिन जब आपकी बात सुनता हूँ तो दुःख होता है,आप राजनीति करो सवाल करो सरकार की ग़लत बातों का विरोध करो ये सही है लेकिन आपको ख़ुद ही नही पता आप @narendramodi जी की ख़िलाफ़त में देश के लिए भी ग़लत बोलते हो ऐसा ना करो? pic.twitter.com/ge4W8BJN2W
वीडियो में अर्जुन सीधे राहुल गाँधी से सवाल पूछते हैं। वह कहते हैं, “कल मैंने एक वीडियो देखी जिसमें आपने देश, देश की सेना और आदरणीय प्रधानमंत्री जी के बारे में गलत शब्दों का प्रयोग किया।”
अर्जुन ने कहा, “मुझे भी दुख होता है कि पूरा देश आपकी बातों और भाषणों पर आपका मजाक उड़ाता है, आपके जोक्स बनाता है और आपको ट्रोल करता है। और इसका कारण भी है, क्योंकि देश देश की सेना की तौहीन करते हैं, उसका मनोबल तोड़ते हैं और आप ये भी कहते हैं कि अगर आपकी सरकार को 15 मिनट मिल जाते तो आप चाइना को उखाड़ कर फेंक देते। आप उनको पीछे हटा देते।”
अर्जुन भाटी वीडियो में राहुल से सवाल करते हैं, “आपकी सरकार को तो 60 साल मिले थे फिर आखिर 15 मिनट की ही क्या कमी रह गई? आप हमारी देश की सेना को सबसे कमजोर समझते हैं। सबसे कायर समझते हैं और आप चाइना की तारीफ करते हैं। आप कैसे देशभक्त हैं? आप अपने आपको भारत माँ का सच्चा बेटा कैसे कह सकते हैं? अगर आप रिसर्च करेंगे, तो आपको पता चलेगा कि हमारे देश की सेना सबसे बहादुर है। भारत बहादुर है, था और रहेगा। बेशक मैं अभी 16 साल का हूँ, बेशक मैं छोटा हूँ। लेकिन अगर कोई मेरे देश की तौहीन करेगा, कोई मेरे परिवार के बारे में कुछ बोलेगा तो मैं चुप नहीं बैठूँगा। ऐसा कभी नहीं होता कि कोई कभी किसी के बारे में गलत बोले और वो उसे बड़े होने का इंतजार करे।”
“जब हमारी सरकार थी मैं आपको गारंटी देता हूं, चाइना में इतना दम नहीं था कि वो हमारे देश में एक कदम भी डाल दे। आज पूरी दुनिया में एक ही देश है जिसके अंदर दूसरे देश की सेना आई और कायर प्रधानमंत्री कहता है कि इस देश की ज़मीन किसी ने नहीं ली”: राहुल गांधी, कुरुक्षेत्र #हरियाणाhttps://t.co/gqwlVjZad3
अर्जुन बताते हैं कि उनके दादाजी फौज में थे और उन्होंने जब अपनी दादी को वीडियो दिखाई तो उन्हें भी बहुत गुस्सा आया और उन्हें भी बहुत दुख हुआ। अर्जुन की दादी इस वीडियो में कहती हैं, “राहुल गाँधी देश के लिए बहुत उल्टी सीधी बातें करते हैं। फौजियों को भी कहते हैं। उन्हें यह सब नहीं करना चाहिए। फौजी अपनी जान की बाजी लगाते हैं। अपने बच्चों को छोड़कर सीमा पर रहते हैं। देशभक्ति ऐसे नहीं होती है। आप उल्टी सीधी बात करते हो।”
बता दें कि अर्जुन की वीडियो को सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया जा रहा है। देखने वाले उनकी तारीफ और राहुल गाँधी की आलोचना करते नहीं थक रहे औ। एक यूज़र का कहना है, “राहुल गाँधी सुन रहे हो इन्हें, एक बच्चे को भी पता है देशभक्ति व देशप्रेम क्या होता है, सीख लेनी चाहिए आपको इस नौजवान से और शर्म आनी चाहिए आपको खुद पर, आपको इस देश से प्रेम नहीं है ये बात कई बार आप अपने बयान से साबित कर चुके हो.. खूबसूरत बात कही है अर्जुन आपने व दादीजी ने।”
राहुल गाँधी सुन रहे हो इन्हें, एक बच्चे को भी पता है देशभक्ति व देशप्रेम क्या होता है, सीख लेनी चाहिए आपको इस नौजवान से और शर्म आनी चाहिए आपको खुद पर, आपको इस देश से प्रेम नहीं है ये बात कई बार आप अपने बयान से साबित कर चुके हो.. खूबसूरत बात कही है अर्जुन आपने व दादीजी ने ??
कोरोना महामारी के कारण कई क्षेत्रों पर बहुत बुरा असर पड़ा है। हालत ये आ पहुँची है कि ब्रिटिश एयरवेज ने पहले 13,000 नौकरियों को समाप्त करने का ऐलान किया और अब घोषणा कर दी कि वह एक और व्यक्ति की जॉब छीन रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि जॉब किसी सामान्य कर्मचारी की नहीं है बल्कि ब्रिटिश एयरवेज (British Airways) के सीईओ एलेक्स क्रूज (Alex Cruz) की है। इसकी जानकारी एयरलाइन्स की पेरेंट कंपनी आईएजी ने सोमवार (अक्टूबर 12, 2020) को दी।
एयरलाइन्स की पेरंट कंपनी आईएजी ने कहा कि ब्रिटिश एयरवेज के अध्यक्ष व सीईओ एलेक्स क्रूज को उनकी भूमिका से तुरंत हटाया जा रहा है। वह इस पद पर साढ़े 4 साल तक कार्यरत थे। उनकी जगह सीन डोएल (Sean Doyle) लेंगे, जो एर लिंगस (Aer Lingus) का संचालन करते हैं और अब यहाँ चेयरमैन पद को भी संभालेंगे।
सीन ने आइरिश एयरलाइन से जुड़ने से पहले ब्रिटिश एयरवेज में करीब दो दशक तक काम किया था। बता दें कि सीन के पद संभालने के बाद एलेक्स बीए के नॉन एग्जीक्यूटिव पद पर तैनात रहेंगे।
BREAKING: British Airways chief executive Alex Cruz is stepping down from the role.
The International Airlines Group boss said the shake-up came as the company navigated “the worst crisis faced in our industry”.
कहा जा रहा है कि साल के दूसरे क्वार्टर में एयरलाइन को पैसंजर ट्रैफिक में एक साल पहले के मुकाबले 95% की गिरावट हुई जिससे उन्हें 4.04 बिलियन यूरो का घाटा हुआ। सितंबर में आईएजी के चीफ एग्जिक्यूटिव की भूमिका संभालने वाले लुइस गैलगो ने इस संबंध में कहा –
“हम अपने उद्योग में सबसे बड़े संकट का सामना कर रहे हैं और मुझे विश्वास है कि आंतरिक पदोन्नति यह सुनिश्तित करेगी कि आईएजी को एक मजबूत स्थिति में पहुँचाने के लिए सही तरह से रखा गया है।”
गौरतलब है कि इससे पहले अप्रैल माह में ब्रिटिश एयरवेज ने यह घोषणा की थी कि ब्रिटिश एयरवेज एक पुनर्गठन कार्यक्रम के बारे में श्रम संघों को सूचित कर रहा है जो अधिकांश कर्मचारियों को प्रभावित करेगा और जिससे करीब 12,000 लोगों की नौकरियाँ जा सकती है। इस खबर के बाद ब्रिटिश एयरवेज की बहुत आलोचना हुई थी।
IAG, जिसमें स्पैनिश एयरलाइन Iberia भी शामिल है, उसने कहा कि इसकी पहली तिमाही के राजस्व में 4.6 अरब यूरो ( करीब 5 अरब डॉलर) से 13 प्रतिशत की गिरावट आई है, जिससे उन्हें 535 करोड़ यूरो (579 करो़ड़ यूरो) का घाटा हुआ। एयरलाइन समूह ने चेतावनी दी थी कि दूसरी तिमाही में नुकसान काफी खराब होगा और यह उम्मीद की जाती है कि 2019 में यात्रियों की माँग को भरने में कई साल (2023 तक) लगेंगे।
उस दौरान ब्रिटिश एयरवेज के सीईओ एलेक्स क्रूज़ने CNN बिजनेस को जारी किए गए एक पत्र में कहा था कि जो हम एक एयरलाइन के रूप में सामना कर रहे हैं, वह अब कोई सामान्य बात नहीं है। उन्होंने कहा कि कल, ब्रिटिश एयरवेज ने हीथ्रो एयरपोर्ट से केवल एक मुट्ठी भर विमान उड़ाया। एक सामान्य दिन में हम 300 से अधिक उड़ान भरते थे।