मध्य प्रदेश में उपचुनावों के मद्देनजर राजनीति तेज हो गई है। ऐसे में कई नेताओं के विवादित बयानों की वीडियो वायरल हो रही है। पिछले दिनों कॉन्ग्रेस प्रत्याशी फूल सिंह बरैया इस कारण चर्चा में थे और अब कॉन्ग्रेस नेता दिनेश गुर्जर का नाम मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के खिलाफ विवादित बयान देने के कारण सामने आया है। कॉन्ग्रेस नेता ने कमलनाथ को ‘बड़ा उद्योगपति’ और राज्य के CM शिवराज सिंह चौहान को ‘भूखा-नंगा’ बताया है।
दिनेश गुर्जर की एक वीडियो आज सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है। इस वीडियो में वह राजनीति करने के चक्कर में न केवल प्रदेश मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए अपशब्द कह रहे हैं बल्कि उस किसान समुदाय पर भी उंगली उठा रहे हैं, जिसका सीधा सम्बन्ध सीएम शिवराज सिंह चौहान की पृष्ठभूमि से जुड़े हैं।
इस वीडियो में कॉन्ग्रेस नेता दिनेश गुर्जर मुख्यमंत्री शिवराज को भूखे नंगे घर का बताते हैं और कमलनाथ की तारीफ करते हुए कहते हैं कि वह दूसरे बड़े उद्योगपति हैं। वह सीएम पर तंज कसते हुए कहते हैं कि पहले शिवराज सिंह चौहान के पास 5 एकड़ की जमीन थी लेकिन अब उनके पास हजारों एकड़ में जमीन है।
Kamal Nath is India’s no.2 industrialist. Unlike Shivraj, he is not from a starved household. Shivraj had 5 acres of land, now he has thousands of acres as he has been drinking farmers’ blood: Congress leader Dinesh Gurjar on Madhya Pradesh CM Shivraj Singh Chouhan (11.10.2020) pic.twitter.com/XudVnOAJuv
उन्हें वीडियो में कहते सुना जा सकता है, “कमलनाथ दूसरे बड़े उद्योगपति हैं, वो शिवराज सिंह चौहान की तरह भूखे नंगे नहीं है। शिवराज सिंह चौहान के पास पहले 5 एकड़ की जमीन हुआ करती थी लेकिन अब उनके पास हजारों एकड़ में जमीन है।” कॉन्ग्रेस नेता ने आगे कहा कि शिवराज सिंह चौहान ने किसानों के खून पीने का काम किया, इसलिए आज इतनी जमीन के मालिक हैं।
बता दें कि इस वीडियो के वायरल होने के बाद भाजपा खेमे में हड़कंप मच गया है। एक ओर जहाँ सोशल मीडिया यूजर्स इसे सुनकर चुटकी ले रहे हैं कि अब कमलनाथ को ईडी और इनकम टैक्स का डर सताएगा। वहीं भाजपा नेता इसे देखने के बाद नाराज हैं।
शिवराज सिंह चौहान पर की गई टिप्पणी को सुनने के बाद भाजपा नेता नरोत्तम मिश्रा ने कहा, “क्या गरीब परिवार में जन्म लेना कोई पाप है और गरीब का दर्द वही जान सकता है जो गरीबी का एहसास कर चुका हो। कमलनाथ जैसे लोग तो सोने की चम्मच लेकर मुँह में पैदा हुए। वे गरीबों का दर्ज क्या जानें? कमलनाथ जैसे उद्योगपति तो केवल गरीब से ज्यादा सलमान और जैकलीन की चिंता रहती है।”
यही कांग्रेस की मानसिकता है, यही इनकी पीड़ा और यही इनकी सोच।
एक ‘किसान पुत्र’ कैसे किसी ‘नामी उद्योगपति’ के सामने खड़ा हो सकता है?
वो ‘किसान पुत्र’ जो सिर्फ जनता के आगे झुकता हो, जिसका जीवन ही जनसेवा को समर्पित हो।
वहीं मध्य प्रदेश की भाजपा ईकाई ने इस वीडियो को शेयर करते हुए कॉन्ग्रेस की सोच पर सवाल खड़े किए हैं। भाजपा मध्यप्रदेश के ट्विटर पर लिखा गया, “यही कॉन्ग्रेस की मानसिकता है, यही इनकी पीड़ा और यही इनकी सोच। एक ‘किसान पुत्र’ कैसे किसी ‘नामी उद्योगपति’ के सामने खड़ा हो सकता है? वो ‘किसान पुत्र’ जो सिर्फ जनता के आगे झुकता हो, जिसका जीवन ही जनसेवा को समर्पित हो। ग़ुलाम मानसिकता के कॉन्ग्रेसियों का असली चेहरा सामने आ गया।”
इस पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पलटवार करते हुए अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा, “हाँ, मैं भूखे-नंगे परिवार से हूँ, इसलिए उनका दुख-दर्द समझता हूँ। हाँ मैं गरीब हूँ इसी लिए गरीब बेटे-बेटियों को मामा बन पढ़ाता हूँ। गरीब हूँ इसलिए गरीब माँ-बाप की बेटियों का कन्यादान करता हूँ। गरीब हूँ, इसलिए हर गरीब का दर्द समझता हूँ और प्रदेश को समझता हूँ।”
हाँ… मैं ‘नंगे-भूखे’ परिवार से हूँ, इसी लिए उनका दुःख-दर्द समझता हूँ।
हाँ…मैं गरीब हूँ इसी लिए गरीब बेटे-बेटियों को मामा बन पढ़ाता हूँ।
गरीब हूँ इसी लिए गरीब माँ-बाप की बेटियों का कन्यादान करता हूँ।
राजधानी दिल्ली में सक्रिय मानव तस्करी नेटवर्क का खुलासा हुआ है। इस नेटवर्क का खुलासा तब हुआ, जब उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक 17 वर्षीय लड़की परेशान अवस्था में मिली। कथित तौर पर लड़की दिल्ली के मानव तस्करों के चंगुल से भाग निकली थी और दिल्ली से हाथरस पहुँचने के लिए तीन दिन तक लगातार 200 किलोमीटर पैदल चलती रही। उसने हाथरस पहुँचने के लिए रास्ते में कुछ लोगों से लिफ्ट भी लिया।
हाथरस के राहगीर और वहाँ तैनात पुलिस अधिकारियों को गाँव में लड़की को देखने पर कुछ गलत होने का शक हुआ। पुलिस ने जब लड़की से पूछताछ की, तो उसने दिल्ली में मानव तस्करी के नेटवर्क के बारे में चौंकाने वाले खुलासे किए।
हाथरस के एसपी विनीत जायसवाल ने कहा कि लड़की के बारे में पुलिस को सूचित किए जाने के बाद शनिवार रात को लड़की को बचा लिया गया। लड़की ने उन्हें बताया कि वह मध्य प्रदेश में मंडला जिले के तोगल गाँव से है। एक हफ्ते पहले, उसके गाँव का एक व्यक्ति झूठे आश्वासन देकर कम से कम 12 लड़कियों को दिल्ली ले गया था। उन्हें दिल्ली में सिलाई-कढ़ाई का काम मिलेगा, यह झाँसा दिया गया था।
लड़की की गवाही के अनुसार, वह लगभग तीन दिन से पैदल चल रही थी और 200 किलोमीटर की दूरी तय कर हाथरस पहुँची। उसने बताया कि एक व्यक्ति ने रोजगार देने के बहाने लड़कियों को अपने साथ दिल्ली ले जाने का लालच दिया। उसने रास्ते में उन लोगों को किसी शहर में एक कमरे में कई दिनों तक भूखे-प्यासे बँधक बनाकर रखा। इस दौरान लड़कियों को उस शख्स पर शक हुआ तो मौका पाकर लड़कियाँ वहाँ से भाग निकलीं।
विनीत जायसवाल ने आगे कहा कि लड़की सही स्थान नहीं बता पा रही थी, जहाँ उसे और अन्य लड़कियों को बंदी बनाया गया था। उन्होंने कहा कि लड़की परेशान और भूखी थी। वो पिछले तीन दिनों से पैदल चल रही थी। जायसवाल ने यह भी कहा कि मामले में जाँच शुरू कर दी गई है।
एसपी ने कहा कि लड़की को चाइल्ड हेल्पलाइन को सौंप दिया गया है। लड़की ने कहा, “मेरा परिवार बहुत गरीब है और पैसे की जरूरत है। कुछ ग्रामीणों ने उन्हें सलाह दी कि कुछ पैसे के बदले में मुझे कुछ अन्य लड़कियों के साथ दिल्ली भेज दें।
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने राज्य के पूर्व सैनिकों को अहम पदों पर चयनित होने का बड़ा अवसर दिया है। योगी सरकार ने ऐलान किया है कि ग्रुप ‘B’ के पद पर पूर्व सैनिकों को 5% आरक्षण दिया जाएगा। सीएम योगी आदित्यनाथ की ओर से बताया गया कि थल सेना, नौसेना, वायु सेना- तीनों सेवाओं से सेवानिवृत्त और पूर्व सैन्यकर्मी 5% आरक्षण के पात्र होंगे।
मुख्यमंत्री श्री @myogiadityanath जी ने उत्तर प्रदेश के मूल निवासी भारतीय सेना के (तीनों अंगों-थल, नौ एवं वायु) के भूतपूर्व सैन्य कर्मियों को राज्य सरकार के अधीन समूह ‘ख’ के पदों में 05 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किए जाने का निर्णय लिया है।
यूपी सरकार का इस फैसले पर कहना है कि यह आरक्षण प्रत्येक श्रेणी में क्षैतिज रूप से प्रदान किया जाएगा। इस फैसले से भारतीय सेना के भूतपूर्व अधिकारियों तथा कर्मचारियों का मनोबल बढ़ेगा और उनके परिवार को प्रभावी संबल प्राप्त होगा।
यह आरक्षण प्रत्येक श्रेणी में क्षैतिज रूप से प्रदान किया जाएगा। इस फैसले से भारतीय सेना के भूतपूर्व अधिकारियों तथा कर्मचारियों का मनोबल बढ़ेगा और उनके परिवार को प्रभावी सम्बल प्राप्त होगा।
नौकरी के पात्र होने के लिए, उत्तर प्रदेश का मूल निवासी होना जरूरी है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार एक सरकारी प्रवक्ता ने इस पर बताया है कि, यह कदम पूर्व अधिकारियों और कर्मियों को प्रोत्साहित करेगा और उनके परिवारों की आर्थिक रूप से मदद करेगा। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश भी रक्षा सेवाओं में अधिकांश लोगों को भेजता है और वर्तमान में, राज्य में बड़ी संख्या में पूर्व सैन्यकर्मी रहते हैं।
राज्य सरकार द्वारा शहीद सैनिकों के आश्रितों को सेवायोजित किए जाने की व्यवस्था की गई है। इस सम्बन्ध में सशस्त्र सेना के तीनों सेनाओं (थल, नौ एवं वायु सेना) और अर्द्धसैनिक बलों में कार्यरत रहते हुए कर्तव्यपालन के दौरान दिनांक 01 अप्रैल, 2017 के पश्चात शहीद होने वाले….
इसके अलावा यह भी घोषणा हुई कि यूपी के मूल निवासी भारतीय सेना, केंद्रीय अर्द्ध सैन्य बलों/प्रदेशों के अर्द्ध सैन्य बलों के बलिदानियों के परिवार को दी जा रही ₹25 लाख की अनुग्रह आर्थिक सहायता बढ़ाकर ₹50 लाख की गई है।
प्रवक्ता ने बताया कि सरकार वीरगति प्राप्त हुए जवानों के परिवार के एक सदस्य को नौकरी भी प्रदान कर रही है। यह निर्णय लिया गया है कि किसी भी रक्षा सेवाओं और अर्धसैनिक बल से जुड़े 1 अप्रैल 2017 के बाद वीरगति प्राप्त हुए सैनिक के परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाएगी।
इस आशय से संबंधित एक आदेश 19 मार्च, 2018 को जारी किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि पिछली सरकारों के शासन में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था। वहीं योगी सरकार के ट्विटर पर भी जानकारी दी गई कि इससे पहले वीरगति प्राप्त सैनिकों एवं अर्द्धसैनिक बलों के आश्रितों को शासकीय सेवा में लिए जाने की कोई व्यवस्था नहीं थी।
उत्तर प्रदेश के मूल निवासी भारतीय सेना, केन्द्रीय अर्द्ध सैन्य बलों/प्रदेशों के अर्द्ध सैन्य बलों के शहीद के परिवार को दी जा रही ₹25 लाख की अनुग्रह आर्थिक सहायता बढ़ाकर ₹50 लाख की गई है।
भाजपा के वरिष्ठ नेता और असम सरकार में शिक्षा, स्वास्थ्य एवं वित्त मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा (Himanta Biswa Sarma) ने रविवार (अक्टूबर 11, 2020) को कहा कि अगर उनकी पार्टी 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता में आती है तो राज्य सरकार ‘लव जिहाद’ के खिलाफ ‘कठोर लड़ाई’ शुरू करेगी।
If ‘Ajmal’s army’ touches our women, punishment for them will be death sentence: Assam minister on love jihad.https://t.co/yXItYohfqC
असम में विधानसभा चुनाव अगले साल मार्च-अप्रैल में प्रस्तावित है। डिब्रूगढ़ में भाजपा महिला मोर्चा की एक बैठक में उन्होंने कहा, ‘‘हमें असम की जमीन पर लव जिहाद के खिलाफ एक नई और कड़ी लड़ाई शुरू करनी होगी। अगर भाजपा दोबारा सत्ता में आती है तो हम यह निर्णय लेंगे कि अगर कोई भी लड़का धार्मिक पहचान छुपाता है और असम की बेटियों और महिलाओं पर कुछ भी नकारात्मक टिप्पणी करता है तो उसे कड़ी सजा मिले।”
हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा, ‘‘लव जिहाद ने असम की बेटियों के लिए पहाड़ जैसी बड़ी समस्या खड़ी की है। कई लड़कियों की तो तलाक की नौबत आ गई क्योंकि उन्हें गलत नाम बताकर लड़कों ने धोखा दिया।”
बैठक के दौरान ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के प्रमुख बदरुद्दीन अजमल पर निशाना साधते हुए हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि ‘अजमल की सेना’ के पुरुष अपनी धार्मिक पहचान छिपाकर सोशल मीडिया पर लड़कियों से दोस्ती कर रहे हैं और फिर उनसे शादी कर रहे हैं।
यह दावा करते हुए कि फेसबुक पर अन्य धर्मों की लड़कियाँ ‘अजमल की संस्कृति-सभ्यता’ का शिकार हो रही हैं, उन्होंने कहा, “हमने शपथ ली है कि अगर अजमल की सेना हमारी महिलाओं को छूती है, तो उनके लिए एकमात्र सजा मौत की सजा होगी, इससे कम कुछ भी नहीं।” हम ऐसे संकल्प के साथ काम कर रहे हैं।”
उल्लेखनीय है कि पूरे देश भर में लव जिहाद के ऐसे तमाम मामले सामने आ चुके हैं जिनमें हिंदू लड़कियों को प्रेम के जाल में फँसा कर पहले उनका धर्म परिवर्तन करवाया गया, उनसे निकाह किया गया और फिर या तो उन्हें मार दिया गया या उन्हें साथ रख कर प्रताड़ित किया जाता रहा।
लव जिहाद कोई काल्पनिक संकल्पना नहीं है बल्कि वास्तव में कट्टरपंथियों की रची गई साजिश का हिस्सा है, जो आज हिंदू समाज के लिए नासूर बन गई है और न जाने कितनी हिंदू लड़कियों की जिंदगी तबाह कर रही है।
नब्बे के दशक की शुरुआत में ही ‘सारे लड़कों की करवा दो शादी’ गाने से चर्चा में आने वाली दक्षिण भारतीय अभिनेत्री खुशबू सुंदर ने कॉन्ग्रेस पार्टी के साथ अपने 6 साल के साथ को तोड़ दिया है। उन्होंने कॉन्ग्रेस पार्टी को अलविदा कह दिया है। कॉन्ग्रेस में आने से पहले वो 4 सालों तक डीएमके में थीं। जहाँ मई 2010 में करूणानिधि ने उन्हें डीएमके की सदस्यता दिलाई थी, वहीं नवंबर 2010 में सोनिया गाँधी ने उन्हें कॉन्ग्रेस जॉइन कराया था।
कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी को एक पत्र लिख कर खुशबू सुंदर ने अपने इस्तीफे के बारे में सूचित किया है और आरोप लगाया है कि पार्टी में ‘ऊपर बैठे कुछ लोग’ उन पर दबाव बना रहे थे और उन्हें धकेलने की कोशिश कर रहे थे। इसके साथ ही कॉन्ग्रेस पार्टी ने भी उन्हें राष्ट्रीय प्रवक्ता के पद से हटा दिया है। उन्होंने कहा कि वो पार्टी में तब आई थीं, जब इसके सबसे बुरे दिन चल रहे थे और इसे 2014 के आम चुनावों में करारी शिकस्त मिली थी।
अभिनेत्री खुशबू सुंदर ने कॉन्ग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया है। तमिलनाडु में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में एक चर्चित चेहरे का जाना पार्टी के लिए मुश्किल खड़ा कर सकता है। कई मीडिया रिपोर्ट्स में उनके भाजपा में जाने की अटकलें लगाई जा रही हैं और कहा जा रहा है कि इसकी घोषणा कभी भी हो सकती है। उन्होंने सोनिया गाँधी को पार्टी में काम करने के हेतु मौका देने के लिए धन्यवाद देते हुए लिखा,
“पार्टी के अंदर ही ऊपर कुछ ऐसे तत्व बैठे हुए हैं, जिनका जमीनी वास्तविकता से कोई संपर्क ही नहीं है और न ही उनकी कोई सार्वजनिक पहचान है। और ऐसे लोग पार्टी में काम करने के तौर-तरीके को लेकर फैसले लेते हैं और हम जैसे उन लोगों पर हुक्म चलाते हैं, जो पार्टी के लिए पूरी निष्ठा से काम करना चाहते हैं। हमारे जैसे लोगों को दबाया जा रहा है, पीछे धकेला जा रहा है। कई दिनों तक लम्बी चली सोच-विचार की बृहद प्रक्रिया के बाद मैंने कॉन्ग्रेस पार्टी के साथ अपना जुड़ाव ख़त्म करने का निर्णय लिया है।”
सोनिया गाँधी के नाम अभिनेत्री खुशबू सुंदर का पत्र (फोटो साभार: India Today)
बता दें कि खुशबू सुंदर एक समय तमिल सिनेमा की सबसे लोकप्रिय अभिनेत्री हुआ करती थीं और उनके नाम पर इडली, राइस केक, झुमकी, साड़ी, शरबत, कॉफी, कॉकटेल सहित कई चीजें बिका करती थीं। वो भारत की पहली अभिनेत्री हैं, जिनके नाम पर फैंस ने एक डेडिकेटेड मंदिर बनवाया था। वो रजनीकांत, कमल हासन, मोहनलाल, गोविंदा, चिरंजीवी और अम्बरीष जैसे बड़े सितारों के साथ काम कर चुकी हैं और तमिल, मलयालम, तेलुगु, कन्नड़ व हिंदी की 200 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया है।
भारतीय सेना के गोपनीय रेजिमेंट के लिए कार्य करने वाले एक तिब्बती सैनिक ने देश के लिए बलिदान दे दिया। चीन की ‘पीपल्स लिबरेशन आर्मी’ के खिलाफ भारत की तरफ से ये किसी तिब्बती सैनिक का पहला ऐसा बलिदान था, जिसकी सार्वजनिक रूप से चर्चा हुई।
जिस पहाड़ी चोटी को 1962 युद्ध में भारत ने खो दिया था, उसे वापस दिलाने में जिन सैनिकों का अहम योगदान था, स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (एसएफएफ) के कमांडो नीमा तेंजिन उनमें से एक थे। एसएफएफ की स्थापना 1962 में चीन से युद्ध के बाद हुई थी और इसमें अधिकतर तिब्बती शरणार्थी सैनिक के रूप में शामिल हैं।
51 वर्षीय नीमा तेंजिन की पैंगोंग झील क्षेत्र के पास 29-30 अगस्त की रात एक बारूदी सुरंग पर पैर पड़ जाने से मौत हो गई थी। भारत-चीन के बीच पिछले 5 महीनों से तनाव चल रहा है और सीमा पर कई स्तर की वार्ताओं के बाद भी कोई परिणाम निकले नहीं हैं। ‘The Epoch Times’ ने लेह के बाहरी इलाके के तिब्बती शरणार्थी कॉलोनी में स्थित बलिदानी सैनिक के घर जाकर परिजनों का हालचाल जाना।
ये जगह वहाँ से 125 मील की दूरी पर है, जहाँ नीमा तेंजिन वीरगति को प्राप्त हुए। नीमा तेंजिन के परिजन धुमुप ताशी ने बताया कि उन्होंने ‘ब्लैक टॉप’ को कब्जे में ले लिया था और अगले मोर्चे को फतह करने के लिए पेट्रोलिंग में लगे हुए थे, उसी में उनकी मृत्यु हुई। बलिदानी सैनिक के घर में 49 दिन का शोक मनाया जा रहा है। उनकी पत्नी नायमा ल्हामो और 14 वर्षीय बेटे तेंजिन दौड रोज की प्रार्थनाओं और अंतिम-संस्कार के बाद होने वाली प्रक्रियाओं में व्यस्त रहते हैं।
परिवार का कहना है कि 1962 में खोए ‘ब्लैक टॉप’ पर फिर से कब्जा जमाने के क्रम में वो बलिदान हुए। उसी सुबह उन्होंने अपनी माँ और पत्नी को फोन कर उन्हें खास ‘श्लोक’ पढ़कर प्रार्थना करने को कहा था। उन्होंने तभी बताया था कि कुछ खतरे हैं और उन्हें एक ‘विशेष कार्य’ हेतु प्रस्थान करना है। अगस्त 30, 2020 को भारतीय सैन्य अधिकारियों ने तिब्बती प्रतिनिधियों के साथ नीमा के घर जाकर परिजनों को उनके वीरगति को प्राप्त होने की सूचना दी।
इसके 3 दिन बाद भारतीय तिरंगे (बाद में साथ में तिब्बती झंडे) में लिपटा हुआ उनका शव आया। चीन में तिब्बत के झंडे पर पूर्णरूपेण प्रतिबंध लगा हुआ है। उनके दर्शन के लिए भाजपा के नेता व स्थानीय सांसद भी पहुँचे थे। नीमा तेंजिन ‘स्पेशल फ्रंटियर फोर्स’ के लिए काम करते थे, जिसे ‘विकास रेजिमेंट’ भी कहा जाता है। इस गुरिल्ला दस्ते को 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद गठित किया गया था और ये देहरादून में आधारित है।
भारत-पाकिस्तान में हुए 1971 के युद्ध के दौरान 3000 SFF के जवानों को लगाया गया था। इसी युद्ध के बाद पाकिस्तान से टूट कर बांग्लादेश नामक नए मुल्क का गठन हुआ। इनमें से 56 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे। SFF को शुरू में अमेरिकी CIA और फिर भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों द्वारा प्रशिक्षित किया गया। नीमा तेंजिन के घर में रोज सुबह-शाम उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना होती है, जिसमें आसपास के लोग भी जुटते हैं।
‘The Epoch Times’ में वीनस उपाध्याय की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, बलिदानी सैनिक 5 साल का बेटा इन चीजों से बेखबर गली में खेलता रहता है, इस बात से अनजान कि वो अब अपने पिता को कभी नहीं देख पाएगा। उनकी 17 साल की बेटी तेंजिन ज़म्पा ने बताया कि उनके पिता ने 36-37 वर्षों तक भारतीय सेना में सेवाएँ दी हैं वो हमेशा कहा करते थे कि वो भारत और तिब्बत से इतना प्यार करते हैं कि इसके लिए जान भी दे सकते हैं। उन्होंने बताया कि उनके पिता अगले साल ही रिटायर होने वाले थे।
उन्होंने बताया कि वो डॉक्टर बनना चाहती हैं और अगले साल रिटायरमेंट के बाद उनके पिता उनकी शिक्षा के लिए योजना बनाने वाले थे। हाल ही में परिवार ने एक कार खरीदा था और नीमा तेंजिन के वापस आने के बाद उस कार से हिमालय की सुंदरता को देखने की योजना भी बनाई गई थी। उनकी 76 साल की माँ कमरे में स्थित बैठी रहती हैं। उनकी पत्नी ने बताया कि जब वो लोग तिब्बत से हनले स्थित चैंथल आए थे, तब वो गर्भवती थीं और मात्र 22 साल की थीं।
वो उन 1 लाख शरणार्थियों में से एक हैं, जो माओ के आदेश से चीन की सेना द्वारा तिब्बत पर कब्ज़ा के लिए दमनकारी अभियान शुरू किए जाने के बाद भारत आ गए थे। धर्मगुरु दलाई लामा को भी ल्हासा में शरण लेनी पड़ी थी। वो लेह की 11 तिब्बती शरणार्थी कॉलनियों में से एक में रहती हैं। उनके बेटे ने बताया कि नीमा तेंजिन हमेशा कहा करते थे कि न कभी झूठ बोलो और न ही कोई बुरा काम करो।
साथ ही वो सलाह देते थे कि कभी भी ड्रग्स का सेवन नहीं करना चाहिए। उनके बेटे ने बताया कि तेंजिन जब भी घर आते थे, वो उसकी पसंदीदा चीजें खरीद दिया करते थे। पत्नी ने बताया कि घर-परिवार की जिम्मेदारियों का निर्वहन करने वाले उनके पति अब नहीं रहे, ऊपर से उनके छोटे बच्चे भी हैं। उन्होंने कहा कि वो हमेशा अपने बच्चों को कभी हार न मानने और अपने पिता के नक्शेकदम पर चलने की सलाह देती हैं।
बच्चों की शिक्षा के लिए PM मोदी से माँगी मदद
उनकी पत्नी ने कहा कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बस इतना ही निवेदन करती हैं कि वो उनके बच्चों की शिक्षा-दीक्षा पूरी करने में परिवार की सहायता करें। वो चीन को राक्षस बताते हैं और कहती हैं कि उसमे अब जरा भी मानवता नहीं बची है। बता दें कि तिब्बती आस्था के अनुसार, अगर अप्राकृतिक मृत्यु होने पर 49 दिनों के कर्मकांड का विधान है और इस दौरान लोग प्रार्थनाएँ करते हैं। आसपास के लोग भी जुटते हैं और उन्हें खिलाया-पिलाया जाता है।
ज्ञात हो कि नीमा तेंजिन की अंतिम विदाई में भारत और तिब्बत के झंडे साथ-साथ दिखे थे और इस मौके पर लेह में तिब्बत की आज़ादी का भी नारा गूँजा था। इस दौरान लेह में तिब्बती नागरिकों ने वहाँ के स्थानीय गीत गाए थे और ‘भारत माता की जय’ के नारे भी लगे थे। नीमा तेंजिन की अंतिम यात्रा में राम माधव जैसे बड़े भाजपा नेता का शामिल होना और उनका ससम्मान अंतिम संस्कार होने चीन के लिए एक कड़ा सन्देश था।
पिछले साढ़े छ: सालों में यानी भाजपा के सत्ता संभालने के बाद से ही मुख्यधारा मीडिया में ‘धर्म और जाति’ की खबरें प्रमुखता से दिखाई जाने लगी। केवल हमारे देश में ही नहीं, विदेशों तक में सबको ऐसे केसों के बारे में पता चलने लगा, जहाँ अल्पसंख्यकों पर हमला हुआ।
अब चाहे बुद्धिजीवियों के कारण कहें या राजनेताओं की वजह से, दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों तक को मुस्लिमों के ख़िलाफ साजिश बता दिया गया। इसके अलावा जब-जब कोई अल्पसंख्यक या कोई दलित समुदाय के लोगों पर हमला हुआ, तो उसे फौरन आग की तरह फैलाया गया। वहीं किसी सवर्ण पर हमले की घटना पर हर जगह बस मौन पसरा दिखा। नतीजतन सवर्णों पर हुए हमलों की घटनाओं के बारे में विदेशों में तो छोड़िए, भारत तक में भी अधिकांश लोगों ने आवाज नहीं उठाई।
पुराने मामले छोड़ कर यदि सिर्फ़ साल 2020 की बात करें तो इस वर्ष कई साधुओं व संतों पर हमला हुआ। मगर, केवल पालघर जैसे मामलों को ही मीडिया ने प्रमुखता से दिखाया, वो भी बड़े सामंजस्य के साथ। कई हमलों को तो मीडिया ने हजारों अनरगल खबरों के बीच में ही दबा दिया या यदि उन्हें कवर भी किया तो किसी छोटे से कॉलम के लिए, वो भी बिना किसी फॉलो अप आदि के। आज हम आपको ऐसे ही कुछ हमलों की जानकारी देने जा रहे हैं जो केवल साल 2020 में ही घटे हैं।
16 जनवरी 2020 को चित्रकूट के बालाजी मंदिर के महंथ अर्जुन दास को कुछ उपद्रवियों ने मार डाला। पुलिस ने इस केस में अलोक पांडे, मंगलदास, राजू मिश्रा व दो अन्य लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया। रिपोर्ट्स में इस घटना को जमीनी विवाद का अंजाम बताया गया और साथ ही कहा गया कि आरोपितों ने हमले के तीन दिन पहले घटनास्थल की रेकी की थी। इसके बाद आकर महंथ को गोली मारी। गोली लगने से जहाँ महंथ की मृत्यु हो गई वहीं उनके साथी घायल हो गए।
16 अप्रैल 2020, जूना अखाड़ा के दो संतों को हिंसक भीड़ ने अपना निशाना बनाया और पालघर में उनकी लिंचिंग कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया। मृतकों की पहचान 70 साल के कल्पवृक्ष गिरि महाराज और 35 साल के सुशील गिरी महाराज के रूप में हुई। उनके साथ हिंसक भीड़ ने उनके ड्राइवर को भी मौत के घाट उतारा।
मामले के तूल पकड़ने पर उनके ऊपर तरह तरह के इल्जाम लगाए गए। हालाँकि बाद में जब वीडियो आई तब इस हकीकत का खुलासा कि आखिर कैसे पुलिस की मौजूदगी में हिंसक भीड़ ने बेरहमी ने संतों को मारा। इस पूरे मामले की जाँच में यह भी खुलासा हुआ था कि यह हत्या जानबूझकर की गई और इससे कई राजनैतिक कोण भी जुड़े हुए थे। यह भी अंदाजा लगाया गया कि एनसीपी की शह पर ईसाई मिशनरियों ने इस घटना को अंजाम दिलवाया।
28 अप्रैल को बुलंदशहर में दो पुजारियों पर हमला हुआ। उनका शव मंदिर के परिसर में क्षत-विक्षत मिला। पुजारियों की पहचान जगदीश उर्फ रंगी दास और शेर सिंह उर्फ सेवा दास के रूप में हुई। रिपोर्ट्स में बताया गया कि उन्होंने मुरारी नाम के व्यक्ति को चोरी करते पकड़ा था। इसी बाद मुरारी ने गुस्से में उन दोनों को धारधार हथियार से मारा और बाद में कई ग्रामीणों ने उसे तलवार के साथ गाँव के बाहर जाते देखा। पुलिस की छानबीन में आरोपित को गाँव से दो किलोमीटर दूर से पकड़ा गया था।
23 मई को महाराष्ट्र के नांदेड़ में दो साधुओं की हत्या हुई। पीड़ितों की पहचान बाल ब्रह्मचारी शिवाचार्य महाराज गुरु और भगवान शिंदे के रूप में हुई। साधुओं को शव घर के बाथरूम से बरामद हुआ। पुलिस रिपोर्ट ने बताया कि कम से कम दो आरोपित चोरी करने के लिए घर में घुसे और जब साधुओं से उनका आमना-सामना हुआ तो चार्जिंग केबल से उनका गला घोंट दिया। इसके बाद आरोपितों ने 69,000 रुपए लूटे, लैपटॉप चोरी किया और बाकी वस्तुएँ भी नहीं छोड़ीं। कुल मिलाकर साधु के कमरे से 1,50,000 रुपए गायब थे। पुलिस ने इस संबंध में साईनाथ सिंघाड़े को गिरफ्तार किया था।
13 जुलाई को मेरठ के अब्दुल्लापुर में एक शिव मंदिर के केयरटेकर कांति प्रसाद से मारपीट का मामला सामने आया। कांति प्रसाद की गलती बस यह थी कि वह भगवा धारण करते थे और इसी को देखकर एक ग्रामीण अनस कुरैशी उन पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करता था। 13 जुलाई को जब कांति प्रसाद बिजली का बिल जमा कराकर लौट रहे थे, तब भी अनस ने यही किया और उन्हें बीच सड़क पर मारना शुरू कर दिया।
इस बीच किसी तरह कांति प्रसाद उससे बच कर अनस के घर पहुँचे, लेकिन वहाँ भी अनस ने पीछे से आकर उन पर हमला कर दिया। जब कांति प्रसाद के घरवालों को इसकी सूचना मिली तो उन्होंने शिकायत दर्ज करवाई और पिता को अस्पताल में भर्ती करवाया। हालाँकि हालत गंभीर होने के कारण कांति प्रसाद बच न सके और अगले दिन उन्होंने दम तोड़ दिया।
23 जुलाई को यूपी के एक मंदिर में 22 वर्षीय साधु का शव पेड़ से लटका पाया। रिपोर्ट्स में उनकी पहचान बालयोगी सत्येंद्र आनंद सरस्वती बताई गई, जो हिमाचल प्रदेश से सुल्तानुपर आए थे। वह छतौना गाँव के वीर बाबा मंदिर में लंबे समय से रह रहे थे। जब पुलिस को उनकी अप्राकृतिक मृत्यु का मालूम चला तो शव को हिरासत में ले लिया गया। हालाँकि कुछ ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि यह आत्महत्या नहीं, हत्या है।
23 अगस्त को बिहार के लखीसराय में नक्सलियों ने नीरज झा को किडनैप किया और 1 करोड़ की फिरौती माँगी। जब परिवार वालों को पुजारी का शव मिला तो वो इतनी बुरी तरह से क्षत विक्षत था कि परिवार वाले उन्हें पहचान ही नहीं पाए। बाद में उनके भाई पंकज झा ने जनेऊ के कारण उन्हें पहचाना।
11 सिंतबर को मंड्या शहर के बाहरी इलाके में आरकेश्वर मंदिर में 3 पुजारियों की हत्या की गई। पुलिस ने इनकी पहचान गणेश, प्रकाश, आनंद के रूप में की। तीनों का शव पुलिस को खून से लथपथ बरामद हुआ। रिपोर्ट्स से पता चला कि पुजारियों का सिर पत्थर से कुचला गया था। हमलावरों ने वारदात को अंजाम देने के बाद मंदिर में लूटपाट भी की और दानपेटी में बस कुछ सिक्के छोड़े। 15 सितंबर को पाँचों हमलावरों को पकड़ा गया। इनकी पहचान अभिजीत, रघु, विजि, मंजा और गाँधी के रूप में हुई।
8 अक्टूबर को राजस्थान के करौली जिले के बोकना गाँव में 6 लोगों ने एक मंदिर की जमीन पर अतिक्रमण की कोशिश करते हुए 50 वर्षीय पुजारी बाबूलाल वैष्णव को पेट्रोल डालकर जलाके मार डाला । उन्हें जयपुर के एसएमएस अस्पताल में गंभीर हालात में भर्ती करवाया गया और 9 अक्टूबर को उनकी मौत हो गई।
10 अक्टूबर को राम जानकी मंदिर के तिर्रे मनोरमा गाँव में इटियाथोक थाने में पुजारी को गोली मारी गई। यह वारदात भी जमीन विवाद पर हुई। अभी उनका इलाज लखनऊ के ट्रॉमा सेंटर में चल रहा है। रिपोर्ट में बताया जा रहा है कि पुजारी सम्राट दास जिस राम जानकी मंदिर के पुजारी थे, उसकी जमीन पर भू माफियों की नजर थी। उन पर इस बाबत पिछले साल भी हमला हुआ ता। पुलिस ने अब इस संबंध में एफआईआर रजिस्टर कर ली है और अपनी पड़ताल भी शुरू कर दी है।
आजकल फैक्ट-चेक का चलन है और अगर कुछ ना मिले तो पहले एक झूठ बनाया जाता है और फिर उसके फैक्ट-चेक कर के दिखाया जाता है कि ये झूठ है। और ‘इंडिया टुडे’ ने तो पूरा का पूरा ‘एंटी फेक न्यूज़ वॉर रूम (AWFA)’ बना रखा है, जिसके माध्यम से वो खुद को सबसे बड़ा फैक्ट-चेकर प्रदर्शित करते हैं। अब उन्होंने राशिद खान और अनुष्का शर्मा को लेकर एक अजीबोगरीब फैक्ट-चेक किया है।
दरअसल, ‘इंडिया टुडे’ ने दावा किया कि गूगल पर राशिद खान की पत्नी का नाम सर्च करने पर अभिनेत्री अनुष्का शर्मा का नाम दिखाया जाता है। बता दें कि जहाँ राशिद खान अफगानिस्तान के लेग स्पिनर हैं, वहीं अनुष्का शर्मा हिंदी फिल्मों की अभिनेत्री और भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली की पत्नी हैं। हाल ही में दोनों ने सोशल मीडिया पर तस्वीर डाल कर अनुष्का की प्रेग्नेंसी की सूचना भी फैंस को दी थी।
‘इंडिया टुडे’ का नया फैक्ट-चेक
साथ ही ‘इंडिया टुडे’ ने अपने फैक्ट-चेक में बताया कि चूँकि राशिद खान ने 2018 के एक चैट सेशन में बताया था कि अनुष्का शर्मा और प्रीति जिंटा उनकी पसंदीदा अभिनेत्री हैं, इसीलिए गूगल सर्च में ऐसा दिखाया जा रहा है। फिर बताया गया है कि ‘राशिद खान की फेवरिट अभिनेत्री हैं अनुष्का शर्मा’ जैसी बातें लिख कर कई खबरें प्रकाशित हुईं, जिसके बाद गूगल अनुष्का को राशिद की पत्नी के रूप में वेब रिजल्ट्स दिखाने लगा।
कीवर्ड्स डाल कर ‘इंडिया टुडे’ कर गया खेल
हालाँकि, जब हमने गूगल पर ‘Rahid Khan Wife’ टाइप कर के सर्च किया तो हमें ऐसा कुछ भी नहीं मिला। परिणाम में सबसे ऊपर ‘Google search shows Afghan cricketer Rashid Khan’s wife is Anushka Sharma’ लिखा मिला और साथ ही ‘इंडिया टुडे’ का वो लेख भी, जिसमें से ये पंक्ति उठाई गई थी। इससे पता चलता है कि ट्रैफिक, पब्लिसिटी और कुछ भी फैक्ट-चेक करने की ललक के कारण ऐसा किया गया। जानबूझ कर इसमें अनुष्का शर्मा का नाम डाला गया।
Type ‘dalaal’ and you will find names of rajdeep sardesai, rahul kanwal and arun puri
इसके बाद मीडिया संस्थान पर कई लोगों ने निशाना साधते हुए ये भी दावा किया कि ‘दलाल’ लिखने पर गूगल राहुल कँवल और राजदीप सरदेसाई का नाम दिखाता है। हालाँकि, ऑपइंडिया इस तरह की चीजों की पुष्टि नहीं करता है। इस तरह से ‘इंडिया टुडे’ ने फैक्ट चेक के नाम पर क्रिकेट और बॉलीवुड की दो चर्चित हस्तियों का नाम लेकर ट्रैफिक बटोरने की कोशिश की है, और इसे फैक्ट-चेक का रूप दे दिया है।
भारत में अंग्रेजों के काल को अंधकार युग के रूप में देखा जाता है क्योंकि यही वो समय था जब यहाँ के किसानों और लघु व्यवसायियों की कमर तोड़ डाली गई। अंग्रेजों ने आदिवासियों और जनजातियों को ही अपराधी घोषित कर दिया। इसके लिए अंग्रेजों द्वारा ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act, 1871)’ लाया गया। भारत में जितने भी संसाधन थे, जिनके इस्तेमाल से यहाँ के ग्रामीण फलते-फूलते थे, उन सब पर अंग्रेजों का कब्ज़ा हो गया।
कपड़ा उद्योग के मामले में भारत का कोई सानी न था। कहा जाता है कि इसे बर्बाद करने के लिए कई शिल्पकारों के अंगूठे तक काट डाले गए थे। किसानों से जबरदस्ती नील की खेती कराई जाती, जिससे अंग्रेजों को तो फायदा था, लेकिन कृषकों की जमीनें किसी लायक नहीं बचती थीं। देश के प्राकृतिक संसाधनों का जम कर दोहन किया गया। बीमारियाँ फैलती रहीं, महामारियों से लाखों लोग मरते रहें, अंग्रेज उनका शोषण करते रहे।
इसी क्रम में आज हम बात करेंगे अंग्रेजों के इसी ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act, 1871)’ की, जिसे कई क़ानूनों को मिला कर बनाया गया था। इसके तहत भारत की कई जनजातियों को ‘आदतन अपराधी’ घोषित कर दिया गया। इनमें से 160 संजातीय भारतीय समुदायों के लोगों के खिलाफ एक प्रकार का गैर-जमानती वॉरंट जारी कर दिया गया। उन्हें हर सप्ताह थाने में बुलाया जाने लगा। वो अपनी मर्जी से हिल-डुल भी नहीं सकते थे, उनकी गतिविधियों पर कुछ इस तरह से अतिक्रमण हुआ।
कैसे बना ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act, 1871)’?
दरअसल, अंग्रेजों ने ये सब पंजाब और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों से शुरू किया, जहाँ सबसे पहले कुछ जनजातियों को अपराधी घोषित कर दिया गया। 19वीं शताब्दी के मध्य से ही घुमंतू या विमुक्त जनजातियों को प्रतिबंधित करने का सिलसिला चल निकला था। पुलिस ने इनकी गतिविधियों को सीमित कर रखा था और ब्रिटिश प्रशासन का कहना था कि इससे ‘काफी अच्छे परिणाम’ निकल कर सामने आ रहे हैं।
हालाँकि, अंग्रेजों के द्वारा ये तब शुरू हुईं जब 1860 के दशक में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस-प्रशासन की इन हरकतों को अवैध घोषित कर दिया। इसके बाद इन प्रांतों की सरकारें तत्कालीन भारत सरकार (ब्रिटिश सरकार) के पास पहुँचीं और उन्हें ऐसे क़ानून बनाने को कहा, जिससे न सिर्फ इन घुमंतू व विमुक्त जनजातियों की गतिविधियों पर लगाम लगे, बल्कि इसका उल्लंघन करना भी दंडनीय अपराध माना जाए।
फिर इस सम्बन्ध में क़ानून बनाने के लिए एक समिति का गठन किया गया लेकिन उस समिति ने कोर्ट द्वारा उठाई गई आपत्तियों को दरकिनार कर दिया। कोर्ट की आपत्ति थी कि इससे पुलिस बेवजह लोगों को परेशान करेगी लेकिन अंग्रेजों ने कहा कि ‘अपराधी पुलिस को परेशान करें, इससे अच्छा है कि पुलिस से अपराधी परेशान हों’। साथ ही इस बात को भी नज़रअंदाज़ कर दिया गया कि पहले से ही इसे लेकर कई क़ानून बने हुए थे।
इसके साथ ही इस क़ानून को बना कर इसे नॉर्थ-वेस्ट प्रोविंस के साथ-साथ अवध और पंजाब में लागू किया गया। जिन प्रक्रियाओं को कोर्ट ने अवैध घोषित कर दिया था, उन्हें ही क़ानूनन सही बनाने के लिए एक तरह से इसका बिल ड्राफ्ट किया गया, और उसे एक्ट में बदला गया। जनजातीय समूहों के लोगों को पुलिस थाने जाकर खुद को रजिस्टर कराने का आदेश दिया गया। उन्हें पुलिसिया लाइसेंस के बिना गाँव से बाहर कहीं भी जाने से प्रतिबंधित कर दिया गया।
ये लाइसेंस भी जिले के कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित हुआ करता था। जब वो एक गाँव से दूर गाँव जाते थे तो रास्ते पर पड़ने वाली हर पुलिस चौकी पर उन्हें ये लाइसेंस दिखाने होते थे। रहने का गाँव बदलने के लिए भी पुलिस की अनुमति लेनी पड़ती थी। एक बार चेतावनी के बाद दोबारा अगर इन ‘आपराधिक जनजातीय समुदायों’ का कोई भी व्यक्ति बिना लाइसेंस के पाया जाता था तो उसे 3 साल तक की कड़ी जेल की सज़ा दिए जाने का प्रावधान था।
‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’: क्या था इस अत्याचारी क़ानून में?
यहाँ तक कि इस क़ानून में ज़मींदारों तक को नहीं बख्शा गया था। उन पर जिम्मेदारी डाल दी गई कि वो ‘क्रिमिनल ट्राइब्स’ के लोगों को चिह्नित कर उनका रजिस्ट्रेशन करवाएँ और उन्हें ढूँढ कर भी निकालें। फिर बाद में इसे मद्रास प्रान्त में लागू करने की ओर सरकार बढ़ी, जहाँ घुमंतू जनजातियों के पक्ष में प्रान्त के अधिकारियों के होने के बावजूद उनकी एक न सुनी गई। 1876 में इसे बंगाल में लागू किया गया और उसके बाद इन जनजातियों को एक ‘आपराधिक गैंग’ ही घोषित कर दिया गया।
असल में ब्रिटिश सरकार की दमनकारी आर्थिक नीतियों ने इन जनजातियों के व्यापर को भी ठप्प कर दिया था। उनकी नमक वाली नीति से भी इन पर खासा दुष्प्रभाव पड़ा था। 1911 में इस क़ानून को पुलिस कमीशन की रिपोर्ट के बाद और सख्त कर दिया गया, जिसमें सिफारिश की गई थी कि पुलिस को इन जनजातियों के खिलाफ सख्ती के लिए और शक्तियाँ दी जाएँ। प्रांतीय सरकारों को भी ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’ के तहत किसी भी जनजाति को ‘अपराधी’ घोषित करने की शक्ति दे दी गई।
इस क़ानून को लागू करने से पहले जिस ब्रिटिश अधिकारी टीवी स्टीफेंस ने पैरवी की थी, उसका तर्क भी काफी अजीब था। उसका कहना था कि भारत में एक जाति के लोग सदियों से एक ही प्रकार के कारोबार करते आ रहे हैं, जैसे बुनाई, शिल्पकारी और लोहार वाले काम। उसका कहना था कि इसी तरह से कुछ जनजातियाँ ज़रूर ऐसी हैं, जिनके लोग अपराध को ही अपना प्रोफेशन मानते हैं क्योंकि उनके बाप-दादा भी यही करते आ रहे थे।
अंग्रेजों का मानना था कि ये जनजाति समूहों के लोग भी सदियों से अपराध ही करते आ रहे हैं और आगे भी इनके वंशज गैर-क़ानूनी कार्य ही करते रहेंगे। इससे हुआ ये कि इन समुदायों में बच्चे का जन्म होते ही वो ‘जन्मजात अपराधी’ हो जाता था, बिना कुछ किए ही। लेकिन, 20वीं शताब्दी आते-आते अंग्रेजों ने सारी हदें पार कर दी। बच्चों को उनके परिवार और माता-पिता से दूर कर के कहीं और बसाया जाने लगा।
इस बसावट को ‘सुधार’ का नाम दिया गया। आज जब चीन के शिनजियांग में उइगर परिवार के बच्चों को उनके परिवार और क्षेत्र से शुरू में ही दूर कर दिया जाता है, ऐसे में हम सोच सकते हैं कि उस वक़्त अंग्रेज कैसे यह करते रहे होंगे। आगे कभी कोई विद्रोह ही न हो, इसके लिए इन लोगों के फिंगरप्रिंट्स तक ले लिए गए। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इसे सिविल लिबर्टी का हनन करार दिया था। ये था अंग्रेजों का अत्याचारी ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act, 1871)’।
ट्रांसजेंडर समुदाय को भी बना दिया गया अपराधी
इस क़ानून का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव जिन लोगों पर पड़ा, उनमें ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग भी शामिल थे। आज जब आधुनिकता के नाम पर अंग्रेज इसकी पैरवी करते नहीं थकते तो उन्हें अपना ये काला इतिहास भी याद करना चाहिए। इन्हें ‘Enunch’ समुदाय बता कर इनकी धर-पकड़ तेज़ कर दी गई। हालाँकि, आज़ादी के बाद मद्रास प्रान्त में तत्कालीन कम्युनिस्ट नेताओं ने इसका विरोध किया, जिसके बाद वहाँ इस क़ानून को रद्द किया गया।
1950 में एक समिति बना कर इसकी जाँच करने को कहा गया कि इस क़ानून की देश को ज़रूरत है भी या नहीं। जाँच में पाया गया कि ये पूरा का पूरा क़ानून ही भारतीय संविधान का उल्लंघन करता है। कई अन्य क़ानूनों के जरिए आदतन अपराधियों पर लगाम लगाने की कोशिश की गई लेकिन अंग्रेजों के ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act, 1871)’ का दंश ऐसा था कि वो समाज से और भी ज्यादा कट गए, अलग रहने लगे।
गरीबी तो थी ही, ऊपर से इनमें से कई समूहों को सालों तक एससी-एसटी समुदाय में भी नहीं गिना गया, जिससे इन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल सके। आज जिस जाति-व्यवस्था या ‘ब्राह्मणों’ को अन्य जातियों से भेदभाव के लिए दोष दिया जाता है, उन्हें समझना चाहिए कि यही वो क़ानून था, जो अंग्रेजों का था, और जिसने जाति-समुदाय के आधार पर लोगों को जन्म से ही अपराधी घोषित करना शुरू कर दिया था। इससे बड़ा भेदभाव क्या होगा?
आज जब हम बिरसा मुंडा जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की पूजा करते हैं, एक समय था जब अंग्रेजों ने आदिवासियों को ही अपराधी घोषित कर डाला था। यहाँ तक कि सिखों के कुछ समूहों को भी आपराधिक जनजाति की श्रेणी में डाल दिया गया था। 1971 वाले क़ानून में प्रांतीय सरकारों को आज़ादी थी कि वो किसी भी जनजाति को गवर्नर जनरल से सिफारिश कर के उसे आपराधिक समूह घोषित करवा दे।
‘जन्मजात अपराधी’ के सिद्धांत वाला अंग्रेजों का काला कानून
प्रांतीय सरकारों से कहा गया कि वो इन जनजातीय समूहों के बारे में रिपोर्ट तैयार कर के भेजने के क्रम में ये भी बताएँ कि ये लोग अपना जीवन-यापन कैसे करते हैं। साथ ही न्यायिक व्यवस्था को इस पर सवाल उठाने नहीं दिए गए, जिससे जजों को इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार ख़त्म हो गया। बताया गया कि इन समुदायों के लोग वहीं रह सकते हैं, जहाँ स्थानीय प्रशासन कहे। एसपी के पास रजिस्टर में इन लोगों के नाम होते थे, जिसकी सूचना मजिस्ट्रेट को देनी होती थी।
अंग्रेजों के ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’ का एक अंश (साभार: कोलंबिया यूनिवर्सिटी)
अगर छोटी सी गलती भी हुई तो इसके लिए कम से कम 6 महीने की सजा के साथ-साथ जुर्माने का प्रावधान था। साथ ही गाँव के प्रधानों और जमींदारों को आदेश दिया गया कि वो घुमंतू जनजातियों के लोगों का सारा ब्यौरा सरकार को सौंपें और बताएँ कि वो लोग किसकी जमीन में कितने दिनों से रह रहे हैं। अगर वो ऐसा नहीं करते हैं तो उनके लिए भी सजा का प्रावधान किया गया। परिणाम ये हुआ कि अंग्रेजों के कारण जो सीधे-सादे लोग थे, उनमें भी आपराधिक प्रवृत्ति घर करने लगी।
आज भारत में 313 से भी अधिक घुमंतू जनजातियाँ हैं, जो आज भी अंग्रेजों के इस अत्याचार का दंश झेल रहे हैं। इन्हें समाज से इतना अलग-थलग कर दिया और इतना ज्यादा प्रताड़ित किया गया कि ये मुख्यधारा से ही अलग हो गए। लगभग 6 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो इन जनजातीय समूहों का हिस्सा हैं। अंग्रेजों ने अपने उस क़ानून में मुस्लिम समुदाय को भी जोड़ा था, तभी ‘Caste’ की जगह ‘Tribes’ शब्द का इस्तेमाल कर खेल किया गया।
शुक्रवार (अक्टूबर 9, 2020) को ‘तनिष्क ज्वेलरी’ का एक नया प्रचार वीडियो आया, जिसमें एक गर्भवती हिन्दू महिला की मुस्लिम परिवार में गोदभराई की रस्म दिखाई गई है। इस वीडियो में दिखाया गया है कि गहनों से लदी हुई एक महिला गोदभराई की रस्म के लिए तैयार हो रही है। जानने लायक बात ये है कि ‘तनिष्क ज्वेलरी’ की इस वीडियो में एक जिस जोड़े को दिखाया गया है, वो इंटरफेथ कपल होता है, अर्थात पति-पत्नी अलग-अलग धर्म के होते हैं।
‘लव जिहाद’ की कई खबरों के बीच आए इस वीडियो में महिला को पारम्परिक साड़ी, बिंदी और गहने पहने हुए दिखाया गया है। हालाँकि, उसके साथ परिवार में जो अन्य लोग हैं, वो मुस्लिम हैं। उसके साथ जो बुजुर्ग महिला दिख रही है, उसने बिंदी भी नहीं लगाई है। परिवार के लोग गहनों से लदी हिन्दू महिला को सरप्राइज के लिए बगीचे में लेकर जा रहे होते हैं। बैकग्राउंड में दीपमालाएँ हैं और नटराज की प्रतिमा भी है। मुस्लिम परिवार को एकदम ‘सहिष्णु’ दिखाने का प्रयास किया गया है।
साथ ही मुस्लिम परिवार का बुजुर्ग भी साज-सजावट में व्यस्त रहता है। बैकग्राउंड में एक महिला कहती है, “रिश्ते हैं कुछ नए-नए, धागे हैं कुछ कच्चे-पक्के। अपने बल से इन्हें सहलाएँगे, प्यार पिरोते जाएँगे।एक से दूजा सिरा जोड़ देंगे, एक बँधन बनते जाएँगे।” इस वीडियो में भरा-पूरा मुस्लिम परिवार दिखता है, जहाँ बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक गर्भवती महिला को सरप्राइज देने के लिए बगीचे में इन्तजार कर रहे हैं।
This sweet trap cost us our daughters. Until when this will contine in Secular India?
अंत में वो महिला अपनी सास से पूछती है, “ये रस्म तो आपके घर में होती भी नहीं है न?” इस पर उसकी सास उसे जवाब देती है, “पर बिटिया को खुश रखने की रस्म तो हर घर में होती है न?“इसके बाद ‘एक जो हुए हम, तो क्या ना कर जाएँगे।‘ के साथ इस वीडियो में ‘एकता’ की बात की गई है। हालाँकि, ध्यान देने वाली बात है कि इसमें दिखाया गया है कि एक हिन्दू महिला की मुस्लिम परिवार में शादी हुई है, जहाँ लोग उसे खासा प्यार कर रहे हैं।
विडम्बना देखिए कि ये वीडियो तब आया है, जब 19 साल के राहुल राजपूत को दिल्ली के आदर्श नगर में उसकी लड़की दोस्त के भाई मुहम्मद और अफरोज ने सिर्फ इसलिए मार डाला, क्योंकि दोनों आपस में प्यार करते थे। किशोरी ने बताया कि वो कहती रही कि राहुल की तबियत खराब है, उसे मत मारो – लेकिन वो उसे पीटते रहे। किशोरी ने बताया कि उसके भाइयों ने उसकी एक न सुनी। राहुल को धोखे से मिलने के लिए उसके भाइयों द्वारा बुलाया गया था।
हालाँकि, प्रचार वीडियोज में इस तरह की चीजें दिखाना कोई नई बात नहीं है। इसी तरह ‘सर्फ एक्सेल’ के ‘रंग लाए संग’ इस टैग लाइन से जारी किए गए विज्ञापन में हिन्दू-मुस्लिम सेंटीमेंट उछालने की कोशिश की गई थी। इसकी आड़ में बच्चों के कोमल मन में भी ज़हर बोने का सुनियोजित प्रयास किया गया था। इस वीडियो में हिन्दू बच्ची अपने साइकिल के पीछे बैठाकर मस्जिद छोड़ने जाती है। शबाना आजमी ने इस वीडियो में अपनी आवाज़ भी दी थी।