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नागालैंड भारत से बाहर का क्षेत्र, हम वहाँ सेवाएँ नहीं देते: विरोध होने के बाद Flipkart ने माँगी माफी

ई-कॉमर्स जायंट फ्लिपकार्ट की एक टिप्पणी को लेकर खासा हंगामा हो रहा है, जिसके बाद कम्पनी ने सफाई दी है। फ्लिपकार्ट ने नागालैंड को भारत से बाहर का क्षेत्र बता दिया था। इसके बाद सोशल मीडिया पर ई-कॉमर्स कम्पनी का जम कर विरोध हुआ था। अब फ्लिपकार्ट ने नागालैंड को भारत से बाहर का क्षेत्र बताने को लेकर माफ़ी माँगी है। उसने इसे ‘लापरवाही से हुई गलती’ बताया है।

दरअसल, फ्लिपकार्ट के किसी फेसबुक पोस्ट पर एक यूजर ने कमेंट के माध्यम से शिकायत करते हुए लिखा कि फ्लिपकार्ट नागालैंड में सामान क्यों नहीं डिलीवर करता है? उसने लिखा कि नागालैंड भी एक भारतीय राज्य ही है और फ्लिपकार्ट को सभी राज्यों के साथ बराबर का व्यवहार करना चाहिए। इसके जवाब में फ्लिपकार्ट ने लिखा कि वो उक्त यूजर द्वारा फ्लिपकार्ट से समान खरीदने में रूचि दिखाने की प्रशंसा करता है। साथ ही अगली पंक्ति में उसने लिखा, “हालाँकि, हमारे विक्रेतागण भारत से बाहर सेवाएँ नहीं देते हैं।”

बता दें कि उत्तर-पूर्वी राज्य नागालैंड दिसंबर 1963 में भारत का 16वाँ राज्य बना था। हरियाली के मामले में भारत के सबसे समृद्ध राज्यों में से एक नागालैंड एक पहाड़ी राज्य है, जहाँ दो दर्जन से भी अधिक प्रमुख जनजातियाँ निवास करती हैं। नागालैंड की 90% जनसंख्या ईसाई है। यहाँ अन्य भारतीय राज्यों की तरह नियमित चुनाव होते रहते हैं।

अपने कस्टमर केयर एग्जीक्यूटिव द्वारा नागालैंड को भारत से बाहर का क्षेत्र बताए जाने को लेकर माफ़ी माँगते हुए फ्लिपकार्ट ने लिखा है कि वह पूरे भारत में सेवाएँ देने की इच्छा रखता है और इसके लिए लगातार प्रयासरत है, जिसमें नागालैंड भी शामिल है। साथ ही उसने लिखा कि उसे नागालैंड से संपर्क करने में ख़ुशी है और वहाँ के लिए सारे विकल्पों को सामने रख रहा है। कम्पनी के स्पष्टीकरण से भी लोगों का आक्रोश थमा नहीं है।

इधर संगीतकार एलोबो नागा ने फ्लिपकार्ट के इस रवैये पर टिप्पणी करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना बताया और कहा कि इसी पता चलता है कि लोग भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों से कितने अनजान हैं। उन्होंने कहा कि कइयों को तो ये तक नहीं पता है कि नागालैंड कहाँ है और इसके लिए उन्हें पूरा दोष नहीं दिया जा सकता। उन्होंने कहा कि इस तरह की नज़रअंदाज़ी के लिए हमारी शिक्षा व्यवस्था ही जिम्मेदार है।

व्यूअरशिप में गड़बड़ी करने के लिए BARC ने लगाया था जुर्माना: ‘इंडिया टुडे’ ने ऑपइंडिया की खबर की पुष्टि की

फेक टीआरपी के मामले में ‘इंडिया टुडे’ ने बयान जारी कर सफाई दी है। इसमें उसने ऑपइंडिया की रिपोर्ट की पुष्टि कर दी है। उसने ये भी स्वीकार किया है कि उस पर ‘ब्रॉडकास्टर ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC)’ द्वारा जुर्माना लगाया गया था। हालाँकि ‘इंडिया टुडे’ ने आरोप लगाया है कि BARC ने बिना किसी पुष्ट सबूत और बिना न्यायिक कमिटी की जाँच के ही उस पर जुर्माना लगा दिया था।

साथ ही उसने BARC के खिलाफ क़ानूनी कार्रवाई की भी धमकी दी है और आरोप लगाया है कि उसने गोपनीय सुनवाई के विवरणों को सार्वजनिक कर दिया। उसने BARC द्वारा उस पर जुर्माना लगाए जाने को एक ‘अलग मामला’ बताते हुए लिखा कि वो उसके खिलाफ क़ानूनी कार्रवाई करेगा, लेकिन उसने इस बात पर चुप्पी साध रखी है कि आखिर उस पर जुर्माना लगने का कारण क्या था। इसी बारे में ऑपइंडिया ने बड़ा खुलासा किया था।

हमारे सूत्रों ने हमें जानकारी दी थी कि ‘इंडिया टुडे’ को 5 लाख रुपए का फाइन भरने को कहा गया था, क्योंकि उसने अपनी व्यूअरशिप बढ़ने के पीछे जो स्पष्टीकरण ‘BARC Disciplinary Council (BDC)’ को सौंपा, वह उन्हें संतोषजनक नहीं लगा। व्यूअरशिप में नजर आ रही गड़बड़ी (malpractice) के संबंध में टीवी टुडे नेटवर्क लिमिटेड और BARC को 27 अप्रैल 2020 को कारण बताओ नोटिस भी भेजा गया था। 

इसके बाद टीवी टुडे द्वारा दिया गया जवाब BARC डिसिप्लिनरी काउंसिल को संतोषजनक नहीं लगा। बीडीसी ने इंडिया टुडे की प्रतिक्रिया पर कहा, चुनिंदा भौगोलिक क्षेत्रों (मुंबई और बेंगलुरु) में इंडिया टुडे चैनल की व्यूअरशिप में इतने उछाल के संबंध में दिया गया जवाब संतोषजनक नहीं है। इसके अलावा, BARC डिसिप्लिनरी काउंसिल ने कहा, “BARC Measurement Science Team द्वारा उपलब्ध कराए गए स्टैस्टिकल डेटा (statistical data) से पता चलता है कि व्यूअरशिप में असामान्य और सोच से परे वृद्धि हुई है।”

अब ‘इंडिया टुडे’ अपने 45 साल के काल की दुहाई देते हुए कह रहा है कि उसने पत्रकारिता का सर्वोच्च मानक स्थापित किया है और मीडिया संस्थान का हर कदम पत्रकारिता के स्वर्मिण मानक के मुताबिक व्यवहार करने की इच्छा से प्रेरित है। उसने मुंबई पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर के बारे में कहा कि उसे इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी और न ही इस मामले में गिरफ्तार अभियुक्त से उसका कोई वास्ता है।

उसने ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ पर निशाना साधते हुए कहा कि दूसरा चैनल अपनी ‘आपराधिक करतूतों’ को छिपाने के लिए किसी और पर आरोप मढ़ने का प्रयास कर रहा है। उसने कहा कि BARC ने ‘बिना ठोस सबूत और बिना यथोचित न्यायिक कमिटी की बैठक बुलाए गोपनीय सुनवाई को लीक कर दिया’, जिसके बाद चैनल ‘इंसाफ के लिए’ क़ानूनी रास्ता अपनाएगा। साथ ही उसने मुंबई पुलिस की जाँच पर भी भरोसा जताया है।

भीमा-कोरेगाँव केस: NIA ने 8 के खिलाफ दायर की चार्जशीट, प्रतिबंधित वामपंथी संगठन और ISI से लिंक

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने भीमा-कोरेगाँव मामले में शुक्रवार (9 अक्टूबर, 2020) को आनंद तेलतुंबडे, गौतम नवलखा, हनी बाबू और स्टेन स्वामी समेत आठ आरोपितों के खिलाफ 10,000 पन्नों की एक सप्लीमेंट्री चार्जशीट दायर की थी। एनआईए की चार्जशीट में उल्लेख किया गया है कि आरोपितों का प्रतिबंधित संगठन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के साथ “सक्रिय संबंध” है।

सागर गोरख, रमेश गिचोर और कबीर कला मंच (केकेएम) की ज्योति जगताप को भी मुंबई में विशेष एनआईए अदालत के समक्ष दायर आरोप-पत्र में नामित किया गया हैं। वहीं चार्जशीट में नामित आठवां आरोपित मिलिंद तेलतुम्बडे फरार है।

आरोपितों के खिलाफ आतंकवाद विरोधी कानून गैरकानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता के तहत देशद्रोह, भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने, आपराधिक साजिश आदि का मामला दर्ज है। इन लोगों पर आतंकवादी संगठन सीपीआई (माओवादी) की विचारधारा को बढ़ावा देने और धर्म, जाति तथा समुदाय के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने की साजिश रचने का भी आरोप है।

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी ने अपनी चार्जशीट में गौतम नवलखा पर सरकार के खिलाफ कथित बुद्धिजीवियों को एकजुट करने और प्रतिबंधित संगठन CPI(M) की गुरिल्ला गतिविधियों के लिए कैडर्स को सम्मिलित करने का षड्यंत्र रचने का आरोप लगाया है। इसके अलावा चार्जशीट में पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई से संबंध होने का भी उल्लेख किया गया है।

एनआईए के प्रवक्ता और एजेंसी में पुलिस उप महानिरीक्षक सोनिया नारंग ने गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के प्रोफेसर आनंद तेलतुम्बडे के बारे में कहा है कि वह ‘भीमा-कोरेगाँव शौर्य दिवस प्रेरणा अभियान’ के आयोजकों में से एक था और एल्गार परिषद की एक मीटिंग में भी उपस्थित था। यह बैठक हिंसा से एक दिन पहले 31 दिसंबर, 2017 को पुणे के शनिवार वाडा में में हुई थी।

एनआईए अधिकारी ने यह भी कहा कि दस्तावेजों में तेलतुम्बडे के खिलाफ ठोस सबूत पाए गए हैं। तेलतुम्बडे अन्य माओवादी कैडरों के संपर्क में था और उनकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए धन इकट्ठा किया करता था।

हनी बाबू पर आरोप लगाया गया है कि उसने माओवादी इलाकों में विदेशी पत्रकारों के जाने का इंतजाम किया और उनको सुविधा मुहैया करवाई। इसके अलावा प्रोफेसर जीएन साई बाबा की रिहाई के लिए फंड इकट्ठा किया, जिस पर आतंकी संगठनों से जुड़े होने का आरोप है।

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी ने आरोप पत्र में 83 साल के स्टेन स्वामी पर माओवादी कैडर होने का भी आरोप लगाया है। केंद्रीय एजेंसी का दावा है कि वह Persecuted Prisoners Solidarity Committee(PPSC) का संयोजक था, जो कथिततौर पर सीपीआई (एम) का ही एक संगठन है।

एल्गार परिषद भीमा-कोरेगाँव केस

एल्गार परिषद भीमा-कोरेगाँव केस 31 दिसंबर 2017 को शनिवार वाडा में आयोजित हुए एल्गार परिषद के कार्यक्रम से संबंधित है। इसी कार्यक्रम के बाद 1 जनवरी 2018 को भीमा-कोरेगाँव में हिंसा भड़की थी। वहाँ भीमा-कोरेगाँव युद्ध की 200वीं वर्षगाँठ मनाने लाखों दलित इकट्ठा हुए थे, जिसे 1818 में पेशवा के ख़िलाफ़ लड़ा गया था और इसमें ब्रिटिशों ने जीत हासिल की थी। इस युद्ध में ब्रिटिशों की तरफ से अधिकतर दलित थे।

इस पूरे केस में 8 जनवरी को मामला दर्ज हुआ था। इसके बाद पुणे पुलिस ने अपनी जाँच शुरू की। पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार हुए ‘कार्यकर्ताओं’ ने दावा किया कि इस आयोजन को माओवादियों द्वारा पोषित किया गया था और आरोपित भी माओवादी ही हैं।

पुणे पुलिस ने इस मामले में 2 साल तक अपनी जाँच जारी रखी, फिर जाँच को इस वर्ष जनवरी में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी को ट्रांसफर कर दिया गया। मामला संभालने के बाद एजेंसी ने दावा किया कि कुछ आरोपितों के डिवाइसों से ऐसे दस्तावेज और पत्र पाए गए, जिनसे पता चला कि उन लोगों के लिंक प्रतिबंधित सीपीआई (एम) समूह से थे।

मामला एजेंसी को ट्रांसफर होते ही इस केस में पुलिस ने 9 कथित बुद्धिजीवियों को गिरफ्तार किया। इसमें सुधा भारद्वाज, रोना विल्सन, सुरेंद्र गडलिंग, महेश राउत, शोमा सेन, अरुण फरेरा, वर्नोन गोंसाल्विस और वरवरा राव का नाम शामिल था। इन पर आरोप था कि इन्होंने वहाँ भड़काऊ भाषण दिए।

क्या बिहार चुनावों में ‘गॉडफादर’ के माइकल जैसा कमाल दिखा पाएँगे चिराग पासवान?

हाल के दौर के बहुचर्चित उपन्यासों की लिस्ट बनाने बैठें तो मारियो पूजो का लिखा ‘गॉडफादर’ उस सूची में काफी ऊपर आएगा। इस उपन्यास पर बनी अंग्रेजी फ़िल्में तो मील का पत्थर रही ही हैं, भारत में भी इनकी सस्ती नक़ल करते हुए ‘सरकार’ जैसी फ़िल्में बनाई गई।

संगठित अपराध की दुनिया और कैसे वहाँ साम, दाम, दंड, भेद इस्तेमाल करते हुए कोई सत्ता में आता है, कोई अपनी सत्ता बनाए रखता है और कैसे कोई स्थापित सत्ता को चुनौती देता है, इन सब विषयों पर लिखी गई ‘गॉडफादर’ अद्भुत कृति है। वर्षों से इसकी लोकप्रियता में कोई ख़ास अंतर नहीं आया है।

इस उपन्यास के मुख्य पात्रों में से एक डॉन कर्लिओने जब बूढ़ा हो जाता है तो उसका परिवार एक गंभीर संकट से जूझ रहा होता है। उसका सबसे बड़ा बेटा सोनी, एक गैंगवार में मारा जा चुका था। मंझला बिलकुल ही नकारा सिद्ध हुआ था और उसके छोटे बेटे को किसी पुलिस अफसर की हत्या के जुर्म में देश से भागना पड़ा था।

अंतिम समय में डॉन एक संधि करता है जिसके तहत उसके सबसे छोटे बेटे को वापस देश में आने की इजाजत मिल जाती है। इस वक्त तक डॉन काफी बूढ़ा हो चला था और वो सबसे छोटे बेटे माइकल को धंधे के गुर सिखाता एक दिन हृदयघात से मर जाता है।

सत्ता हथियाने के लिए पहले से ही लालायित उसके दुश्मन सबसे छोटे बेटे माइकल को मामूली समझकर सब हड़प लेने को लालायित होते हैं। यहीं उनसे एक बड़ी गलती हो जाती है। जिस माइकल को वो सीधा-सादा समझ रहे थे, वो अब उतना भोला नहीं रह गया था। उसे मालूम था कि दुश्मनों की ओर से जो मैत्री सन्देश लेकर आएगा, वही उनसे मिला हुआ है।

जैसे ही उसके पिता के साथ काम करने वाला टेस्सियो ऐसा करने की कोशिश करता है और अपने साथ माइकल को ले जाना चाहता है, उसे पहचान कर निपटा दिया जाता है। एक ही बार में माइकल अपने और अपने पिता के कई भूतपूर्व दुश्मनों की हत्या करवा डालता है। लोगों को जबतक समझ आता कि चल क्या रहा है, माइकल सत्ता हथिया चुका होता है।

बिहार, जिसे राजनीति की प्रयोगशाला भी कहते हैं, वहाँ कुछ ही दिनों पहले तक मामला दो गठबंधनों के बीच चुनाव लड़े जाने का था। लेकिन जिस देश में लोकतंत्र ही बहुपक्षीय, कई दलों का हो, वहाँ की राजनैतिक प्रयोगशाला में केवल दो दलों/गठबंधनों के बीच चुनाव हो ऐसा कैसे हो सकता है?

भाजपा और जदयू के साथ आए दलों का मुकाबला पहले तो राजद-कॉन्ग्रेस और कई वामपंथी कहलाने वाले दलों के गठबंधन से था। धीरे-धीरे इसमें एक तीसरे मोर्चे की जगह भी बन आई। विपक्ष यानी राजद-कॉन्ग्रेस-वाम से निराश कुछ छोटे दलों ने एक तीसरे मोर्चे की जगह बना ली थी।

हाल का दौर देखें तो तीसरे मोर्चे की ओर से भूतपूर्व संसद पप्पू यादव (जिनकी पत्नी कॉन्ग्रेस के टिकट पर जीती हैं), ने कई क्षेत्रों में लोकप्रियता हासिल कर ली थी। पिछले वर्ष हुए पटना में जलजमाव और चमकी बुखार इत्यादि के दौर में उनके दौरे और मदद का काम लगातार चलता रहा।

इसकी वजह से मीडिया में भी उन्हें अच्छी लोकप्रियता मिली। सोशल मीडिया के जरिए लोकप्रियता हासिल करने के प्रयास में एक पुष्पम प्रिया चौधरी और उनकी ‘प्लुरल्स’ नाम की पार्टी भी दिखी। इनके अलावा कई छोटे क्षेत्रीय दल भी उठकर हर चुनाव में सामने आ ही जाते हैं।

इन सबके बीच गौर करने लायक रामविलास पासवान और उनकी पार्टी भी रही है। रामविलास पासवान अक्सर चुनावों का बैरोमीटर नाम से जाने जाते थे, और उनका समर्थन जिसे मिला हुआ हो, वही सत्ता में आएगा, ऐसा समझा जाता था। शायद यही वजह रही कि पुलिस (डीएसपी) की नौकरी को छोड़ राजनीति में उतरे रामविलास 1996 से लेकर 2019 तक, चाहे जिस भी गठबंधन की सरकार बने, ज्यादातर समय मंत्री जरूर बने रहे। हृदय के ऑपरेशन के बाद अभी जब उनकी मृत्यु की खबर आई तो राजनैतिक हलकों में थोड़ी सुगबुगाहट हुई।

उनके पुत्र चिराग पासवान पिछले कुछ दिनों से खुलकर भाजपा का समर्थन तो करते हैं, मगर जद-यू से उन्होंने बैर साध रखा है। अब तक के आँकलनों की मानें तो वो करीब-करीब 143 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने को तैयार हैं। काफी कुछ ‘गॉडफादर’ के माइकल की ही तरह पिता के गुजरते ही वो सभी प्रतिद्वंदियों को निपटा कर आगे आने की तैयारी में दिखते हैं।

नीतीश कुमार के फ्लैगशिप प्रोग्राम ‘सात निश्चय’ के विरोध में उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने प्रचार भी शुरू कर दिया है। कुछ-कुछ राजस्थान की ही तर्ज पर ‘भाजपा तुझसे बैर नहीं पर नीतीश तेरी खैर नहीं’ के नारे भी सुनाई देने लगे हैं।

चुनावी नतीजों के आधार पर देखा जाए तो उनकी पार्टी एलजेपी ने अब तक अधिकतम 29 सीटों पर विजय प्राप्त की है। अगर पिछले (2015) चुनावों के नतीजे देखें तो एलजेपी अब केवल दो पर सिमट आई है। ऐसे में रामविलास पासवान के ना रहने पर चिराग कोई ‘गॉडफादर’ के माइकल जैसा कमाल दिखा पाएँगे, इसपर शक रहता है।

इस पूरे वाकये में भाजपा की भूमिका परदे के पीछे वाली ही रही है। जेपी नड्डा और अमित शाह की चिराग से लगातार बातचीत जारी थी। इसलिए उन्हें पहले से अंदाजा ना हो कि चिराग क्या करने वाले हैं, ये तो नहीं हो सकता।

भाजपा और आरएसएस के कुछ करीबी भी हाल ही में एलजेपी में शामिल होकर उसके टिकट पर उतरने की मंशा जता चुके हैं। दिनारा से पिछले चुनाव में लड़कर हार चुके राजेन्द्र सिंह और नवादा के भाजपा के जिला प्रमुख अनिल कुमार पहले ही भाजपा छोड़कर एलजेपी का दामन थाम चुके हैं।

इसके अलावा भी भाजपा कार्यकर्ताओं के एलजेपी में आना जिस गति से जारी है, उससे लगता है कि ‘नीतीश ही नेता होंगे’ के सुशील मोदी के वादों के बावजूद, भाजपा के अन्दरखाने में नीतीश को किनारे करने की खिचड़ी पक चुकी है।

बाकी समीकरणों में भी पक्ष और विपक्ष तय ही है, अब बस जनता के मुहर लगाने की देर है। उसके बाद ही कहा जाएगा कि चुनावी ऊंट चिराग की करवट में बैठा भी या नहीं!

सबको नहीं हो वोट देने का अधिकार: ‘अर्जुन रेड्डी’ फेम विजय बोले, मैं तानशाह बनना चाहूँगा

ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘अर्जुन रेड्डी’ से प्रसिद्ध तेलुगु अभिनेता विजय देवरकोंडा ने एक मनोरंजन पोर्टल को दिए इंटरव्यू में राजनीति और चुनावों को लेकर कुछ विवादित टिप्पणी की है। उन्होंने वर्तमान सिस्टम के प्रति असंतोष जताते हुए तानाशाही की वकालत की है।

भविष्य में राजनीति में कदम रखने से जुड़े सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “मेरे पास इसके लिए धैर्य नहीं है। राजनीतिक प्रणाली समझ के बाहर है। जैसा कि हम चुनावों के बारे में जानते हैं, इससे इसका कोई मतलब नहीं है। मुझे नहीं लगता कि सभी को मतदान करने की अनुमति दी जानी चाहिए।”

उन्होंने आगे कहा, “जब आप एक विमान पर चढ़ते हैं और बॉम्बे के लिए उड़ान भरते हैं, तो क्या हम सभी यह तय करेंगे कि विमान कौन उड़ाएगा? नहीं, हमने एयरलाइंस जैसी कुशल एजेंसी को यह तय करने दिया कि सबसे सक्षम कौन है, जो विमान को उड़ाने के लिए सबसे अच्छे व्यक्ति का चुनाव करेगा।”

चुनावी प्रणाली पर अपनी असहमति को लेकर आगे बोलते हुए विजय देवरकोंडा ने कहा, “क्यों हम पैसे से वोट खरीद रहे हैं? क्यों हम सस्ती शराब देकर वोट खरीद रहे हैं? यह एक मूर्खता है। मैं यह भी नहीं कह रहा हूँ कि अमीर लोगों को वोट देना चाहिए। मुझे लगता है कि मध्यम वर्ग के पास सबसे ज्यादा हिस्सेदारी है, जो लोग पढ़े-लिखे हैं, वे लोग जो थोड़े से पैसे से नहीं बिकेंगे, मुझे लगता है कि वे… “

उन्होंने इस बात को कंफर्म किया कि उन्हें नहीं लगता है कि सभी को मतदान का अधिकार होना चाहिए। अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि वह उन चुनावों में नहीं खड़े होंगे जहाँ लोग पैसे या शराब के लिए वोट करते हैं। उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा, “मैं तानाशाह बनना चाहूँगा। मुझे यहीं एक रास्ता ठीक लगता है, जिसके जरिए आप बदलाव कर सकते हैं। जैसे, बस चुप रहो, मेरा इरादा अच्छा है, तुम्हें पता नहीं है कि तुम्हारे लिए क्या अच्छा है, लेकिन शायद इस पर टिके रहो और 5-10 साल लाइन में लगे रहो, तुम्हें इसका फल मिलेगा।”

विजय देवरकोंडा ने कहा,”मुझे लगता है कि कहीं न कहीं तानाशाही सही है लेकिन आपको एक अच्छे आदमी की जरूरत है।” इसके अलावा उन्होंने अपने दिमाग में कुछ “कट्टरपंथी” विचार होने की बात भी स्वीकार की है। विजय के अभिनय वाली ‘अर्जुन रेड्डी’ पर ही हिंदी फिल्म कबीर सिंह बनी है।

क्या शरद पवार के इशारे पर रिपब्लिक टीवी को बनाया गया निशाना? अर्नब के दावे से परम बीर सिंह की ‘निष्ठा’ घेरे में

रिपब्लिक टीवी के एडिटर अर्नब गोस्वामी ने शुक्रवार (अक्टूबर 9, 2020) को मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह की विश्वसनीयता और राजनैतिक निष्ठा को लेकर सवाल उठाए। गोस्वामी ने अपने संस्थान पर लगे बेबुनियादी इल्जामों के बाद एक चौंकाने वाला दावा किया है।

रिपब्लिक भारत पर लाइव सत्र के दौरान गोस्वामी ने कहा कि मुंबई पुलिस कमिश्नर ने एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार से शुक्रवार की सुबह मुलाकात की थी। उन्होंने गौर करवाया कि कैसे परमबीर सिंह महाराष्ट्र में अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर काम कर रहे हैं।

अर्नब गोस्वामी ने जानकारी दी कि परमबीर सिंह सुबह से पत्रकारों को समन भेज रहे है। उन्होंने कहा, “मुंबई पुलिस के पास कोई और काम नहीं है। इनका अजेंडा सिर्फ़ मुझे हटाने के लिए है। तुम (परमबीर सिंह) सुबह शरद पवार से मिले? मिले थे कि नहीं? मैं एक आसान सा सवाल पूछ रहा हूँ- क्या तुम शरद पवार से सुबह मिले या नहीं मिले? पूछता है भारत।” 

उन्होंने कहा, “क्या तुम्हारे पास कोई और काम नहीं है? तुम जनता के लिए काम करना कब शुरू करोगे। तुम्हारा सिर्फ़ एक अजेंडा है? क्या मिलेगा तुम्हें यह सब करके? हम जानते हैं तुमने झूठ बोला। लेकिन क्यों?”

इंडिया टुडे पर भी अर्नब ने साधा निशाना

अर्नब गोस्वामी ने इंडिया टुडे को आड़े हाथों लेते हुए कहा, “ये बहुत छोटा सा चैनल है। कोई देखता नहीं है।” उन्होंने पत्रकार रोहित सरदाना को चुनौती दी कि वह अपने शो दंगल में रिपब्लिक टीवी के ख़िलाफ़ प्रोग्राम करें। 

अर्नब गोस्वामी ने बताया कि एफआईआर में इंडिया टुडे का नाम 6 बार लिखा हुआ है। मगर, तब भी मुंबई पुलिस आयुक्त ने 12 घंटो में न्यूज चैनल को क्लीनचिट दे दी है और सारा इल्जाम रिपब्लिक टीवी पर लगा दिया। आगे गोस्वामी ने एफआईआर को छिपाने के इल्जाम भी परमबीर सिंह पर लगाए।

उन्होंने मुंबई पुलिस कमिश्नर के एकतरफा रवैया पर सवाल उठाया और पूछा, “तुमने इतनी जल्दी कैसे जाँच कर ली? क्यों अरुण पुरी और इंडिया टुडे के अन्य मालिकों को समन नहीं भेजा? तुम केस को घुमाना चाहते थे और सब मुझ पर लेकर आना चाहते थे? तुम्हारे पास रिपब्लिक और इंडिया टुडे के लिए अलग-अलग कानून कैसे हो सकते हैं।”

24 घंटे में FAKE TRP SCAM का हुआ खुलासा

गौरतलब है कि फेक टीआरपी स्कैम का मामला 24 घंटे पहले चर्चा में आया था, जब मुंबई पुलिस आयुक्त ने अपने बयान में रिपब्लिक मीडिया पर टीआरपी में गड़बड़ी का आरोप लगाया था। उनका दावा था कि रिपब्लिक टीवी ने कई घरों में पैसे देकर अवैध रूप से फर्जी टीआरपी के लिए खेल रचा।

हालाँकि गुरुवार शाम तक इस मामले में रिपब्लिक भारत ने खुलासा कर दिया कि उन्होंने एफआईआर को एक्सेस किया था और उसमें रिपब्लिक भारत का नहीं, इंडिया टुडे का नाम है। आज ज्वाइंट कमिश्नर ने भी इस बात को स्वीकारा कि इंडिया टुडे का नाम एफआईआर में है।

4 लोग मुंबई पुलिस की हिरासत में

बता दें कि इस पूरे मामले में 9 अक्टूबर तक इस केस में 4 लोगों को न्यायिक हिरासत में लिया गया है। इनके नाम विशाल भंडारी, बोमपेल्ली मिस्त्री, शिरिष पटनशेट्टी, नारायण शर्मा है। इनमें से दो हंसा रिसर्च ग्रुप के पूर्व कर्मचारी हैं जो बार-ओ-मीटर की मॉनिट्रिंग करते थे, जबकि दो अन्य मराठी चैनल के मालिक हैं। इसमें भंडारी पर बार-ओ-मीटर्स को मैनिपुलेट करने का इल्जाम लगा है।

मुंबई पुलिस ने क्लीनचिट देने से किया मना

मुंबई पुलिस का इस पूरे मामले पर कहना है कि उन्होंने किसी भी चैनल को इस स्कैम के मामले में अभी क्लीनचिट नहीं दी है। इंडिया टुडे के राहुल कंवल से बात करते हुए मुंबई पुलिस के ज्वाइंट कमिश्नर मिलिंद भारम्बे ने कहा:

प्राथमिकी में इंडिया टुडे का नाम उन चैनलों में से एक है, जिन्होंने टीआरपी के लिए घरों में पैसा दिया, लेकिन जाँच के अनुसार, एकत्र किए गए सबूत रिपब्लिक टीवी, फक्त मराठी (Fakt Marathi)और बॉक्स सिनेमा (Box Cinema) की ओर इशारा करते हैं। हमारी जाँच चल रही है और हमने किसी अन्य चैनल को क्लीनचिट नहीं दी है। एकत्र किए गए सबूतों के अनुसार, हम कार्रवाई करेंगे। ”

केरल: पथराव के बाद बीजेपी नेता की कार को ट्रक ने मारी टक्कर, मोदी की प्रशंसा पर CPI ने पार्टी से निकाला था

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एपी अब्दुल्लाकुट्टी पर कल रात तिरुवनंतपुरम से कन्नूर जाते समय जानलेवा हमला किया गया। कथित तौर पर उनकी कार को रंधानाथि में एक ट्रक ने पीछे से टक्कर मार दी।

खबरों के मुताबिक जब अब्दुल्लाकुट्टी मलप्पुरम के पास जलपान के लिए रुके थे तब कुछ अज्ञात लोगों ने कथित तौर पर उनके साथ दुर्व्यवहार किया और उन्हें गालियाँ दी। अब्दुल्लाकुट्टी ने आरोप लगाया कि होटल छोड़ने के बाद उनकी कार का पीछा किया गया। इसके बाद एक ट्रक ने उनकी कार को दो बार टक्कर मारी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ अज्ञात लोगों ने उनकी कार पर पत्थर भी फेंके।

अब्दुल्लाकुट्टी ने कहा कि, “मेरी कार को दो बार टक्कर मारा गया था। बाद में ड्राइवर ने कहा कि उसे नींद आ गई थी। लेकिन यह सच नहीं है। होटल छोड़ने के बाद कुछ लोग हमारा पीछा कर रहे थे।” मलप्पुरम के एसपी अब्दुल करीम ने बताया कि घटना में दो अलग-अलग मामले दर्ज किए गए हैं और ट्रक चालक को पूछताछ के लिए बुलाया गया है। हम यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि ऐसा जानबूझकर किया गया था या एक दुर्घटना थी। वहीं केरल भाजपा अध्यक्ष के सुरेंद्रन ने कहा है कि इस घटना के खिलाफ पार्टी राज्यभर में प्रदर्शन करेगी।

गौरतलब है कि अब्दुल्लाकुट्टी पहले माकपा (CPI) के सदस्य थे। 1999 और 2009 में संसद के लिए चुने गए थे। 2009 में नरेंद्र मोदी की सराहना करने पर उन्हें सीपीआई ने पार्टी से निकाल दिया था। बाद में वे कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छ भारत मिशन की खुलकर प्रशंसा करने के बाद उन्हें कॉन्ग्रेस ने भी निष्कासित कर दिया था। इसके बाद वह भाजपा में शामिल हुए। उन्हें हाल ही में पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है।

ब्लैकमनी पर आई सूचनाओं की दूसरी खेप: स्विट्जरलैंड ने नाम, अकाउंट नंबर, पैसा… सब कुछ बताया

भारत को स्विट्जरलैंड से अपने नागरिकों और संस्थाओं के स्विस बैंक खाते के विवरण का दूसरा सेट प्राप्त हुआ है। यह जानकारी भारत को सूचना संधि के स्वत: आदान-प्रदान (automatic exchange of information pact) के तहत मिली है। 

इससे पहले पिछले साल मोदी सरकार के अथक प्रयासों के बाद भारत को स्विट्जरलैंड से अपने नागरिकों के अकाउंट संबंधी डेटा के बारे में पहली दफा जानकारी मिली थी। उस समय स्विट्जरलैंड ने 75 देशों के साथ विवरण साझा किया था। इस बार देशों की संख्या 86 हो गई है।

स्विट्जरलैंड ने एक बयान में कहा है कि 86 देशों के साथ 31 लाख वित्तीय खातों के बारे में जानकारी साझा की गई है। भारत उन 86 देशों में शामिल है, जिनके साथ स्विट्जरलैंड के फेडरल टैक्स एडमिनिस्ट्रेशन (एफटीए) ने इस साल वित्तीय खातों की जानकारी साझा की है।

एफटीए ने अपने बयान में कहा कि इस साल AEOI के तहत शामिल 86 देशों में 11 नए क्षेत्राधिकार शामिल हैं। इनके नाम- एंगुइला, अरूबा, बहामा, बहरीन, ग्रेनाडा, इज़राइल, कुवैत, मार्शल आइलैंड्स, नाउरू, पनामा और संयुक्त अरब अमीरात हैं। इसके अलावा 75 वह देश हैं, जिनके साथ पिछले साल जानकारी साझा की गई थी।

एफटीए ने शुक्रवार (अक्टूबर 9, 2020) को एक बयान में कहा कि भारत को AEOI के तहत सितंबर 2019 में स्विट्जरलैंड से विवरण का पहला सेट मिला था, जब इसमें 75 देश शामिल थे। इस साल सूचना के आदान-प्रदान में लगभग 3.1 मिलियन (31 लाख) वित्तीय खाते शामिल हैं। हालाँकि अपने बयान में उन्होंने स्पष्ट रूप से भारत का नाम नहीं लिया। लेकिन अधिकारियों ने पीटीआई को बताया कि भारत उन प्रमुख देशों में से है, जिनके साथ स्विट्जरलैंड ने स्विस बैंकों के ग्राहकों और विभिन्न अन्य वित्तीय संस्थानों के वित्तीय खातों के बारे में विवरण साझा किया है।

अधिकारियों ने बताया कि इस वर्ष 86 देशों के साथ स्विट्जरलैंड ने जो 31 लाख वित्तीय खातों के बारे में जानकारी आदान-प्रदान की है उनमें एक बड़ी संख्या भारतीय नागरिकों और भारतीय संस्थाओं से संबंधित है। अधिकारियों ने कहा कि स्विस अधिकारियों ने पिछले एक साल में 100 से अधिक भारतीय नागरिकों और संस्थाओं के बारे में जानकारी साझा की गई है। 

उन्होंने बताया कि यह मामले अधिकांश पुराने खातों से संबंधित हैं जो 2018 से पहले बंद हो सकते थे, इसीलिए स्विट्जरलैंड ने भारत के साथ आपसी प्रशासनिक सहायता के एक पुराने ढाँचे के तहत इनके विवरण को साझा किया। अधिकारियों ने बताया कि उक्त खाताधारकों द्वारा कर-संबंधी गलत कामों के प्रथम दृष्टया सबूत भारतीय अधिकारियों द्वारा प्रदान किए गए थे। 

जानकारी के लिए बता दें कि AEOI केवल उन खातों पर लागू होता है जो 2018 के दौरान सक्रिय या बंद थे। इनमें से कुछ मामले भारतीयों द्वारा विभिन्न विदेशी न्यायालयों जैसे पनामा, ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स और केमैन आइलैंड्स में स्थापित संस्थाओं से संबंधित हैं, जबकि व्यक्तियों में ज्यादातर व्यापारी और कुछ राजनेता और राज परिवारों से जुड़े हैं। 

यहाँ ज्ञात हो अधिकारियों ने भले ही भारतीयों के मौजूद खातों की सही संख्या या संपत्ति के बारे में विवरण साझा करने से इनकार कर दिया है। मगर जो जानकारी उन्होंने साझा की है उसमें खाताधारक की पहचान, खाते में जमा रकम और अन्य जानकारियाँ शामिल हैं। इसमें खाताधारक का नाम, पता, राष्ट्रीयता, टैक्स आइडेंटिफिकेशन नंबर और वित्तीय संस्थानों से जुड़ी अन्य सूचनाएँ भी शामिल हैं।

इन जानकारियों से टैक्स अधिकारियों को यह सत्यापित करने की अनुमति मिलेगी, कि क्या करदाताओं ने अपने कर रिटर्न में अपने वित्तीय खातों को सही ढंग से घोषित किया है। अब अगला एक्सचेंज सितंबर 2021 में होगा।

एफटीए ने अपने बयान में यह भी कहा है कि इस वर्ष जानकारी का आदान-प्रदान 66 देशों के साथ पारस्परिक रूप से हुआ है। वहीं 20 देशों के मामले में स्विट्जरलैंड ने जानकारी प्राप्त की, लेकिन उन्हें कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई। ऐसा इसलिए क्योंकि वे देश अभी तक गोपनीयता और डेटा सुरक्षा पर अंतरराष्ट्रीय आवश्यकताओं को पूरा नहीं करते।

उल्लेखनीय है कि कालेधन के ख़िलाफ़ लड़ाई में मोदी सरकार को पिछले साल सबसे पहली बड़ी सफलता मिली थी। स्विस बैंक में भारतीय खातों का विवरण प्राप्त करने के लिए भारत काफ़ी दिनों से प्रयास कर रहा था। इसके बाद सितंबर 2019 में पहले दौर का विवरण स्विट्जरलैंड ने भारत को सौंपा था। इसमें बैंक में भारतीयों के सक्रिय खातों से सम्बंधित जानकारियाँ शामिल थीं। स्विट्जरलैंड के संघीय कर प्रशासन ने तब 75 देशों को वैश्विक मानदंडों के तहत ऐसे वित्तीय खातों का विवरण दिया था। 

देवरिया में जमीनी विवाद में दबंगों ने बंदूक की नोंक पर युवक को पीटा, चेहरे पर पेशाब कर जनेऊ तोड़ा

उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से शर्मनाक घटना सामने आई है। चार लोगों ने मिलकर एक युवक को बेरहमी से पीटा। आरोपितों ने युवक का जनेऊ भी तोड़ दिया और उसके चेहरे पर पेशाब कर दिया। सदर कोतवाली पुलिस ने सोमवार को सकारपार इलाके से चारों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जमीनी विवाद में चारों ने शख्स के साथ बदसलूकी की। आरोपितों ने युवक का जनेऊ तोड़ दिया और उसके चेहरे पर पेशाब कर दिया। यह मामला उस समय सुर्खियों में आया, जब पीड़ित ने एक वीडियो ट्विटर पर डाल दिया। सदर कोतवाली के रहने वाले अनीशचंद्र द्विवेदी ने सभी आरोपितों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। अपनी शिकायत में पीड़ित ने बताया कि हमलावरों ने उन्हें बेरहमी से पीटा, चेहरे पर पेशाब कर दिया और यहाँ तक कि उनके जनेऊ को भी तोड़ दिया।

वीडियो में पीड़ित अनीशचंद्र द्विवेदी ने दावा किया कि सकारपुर क्षेत्र के कुछ लोगों ने उन्हें बंदूक की नोंक पर घेर कर जम कर पीटा। पीड़ित ने बताया कि पिटाई करने वालों ने उसके ऊपर पेशाब किया और उसका जनेऊ तोड़ दिया। देवरिया के एएसपी शिष्या पाल के अनुसार सदर कोतवाली के पंसरही निवासी अनीशचंद्र द्विवेदी का पड़ोसी सतीश यादव के घर से भूमि का विवाद चल रहा है। अनीशचंद्र ने ट्विटर पर एक वीडियो डाला, जिसमें उन्होंने दावा किया कि रविवार रात कुछ लोगों ने बंदूक की नोंक पर उसकी पिटाई की। युवक उस वक्त मोटरसाइकिल से कहीं जा रहा था।

‘बंगाल पुलिस का गुंडाराज’: सेना में रहे सिख की पगड़ी खींची, बेरहमी से पीटा; देखें Video

पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पुलिस का गुंडाराज बढ़ता ही जा रहा है। भाजपा के नवान्न अभियान के दौरान बंगाल पुलिस की गुंडागर्दी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इसमें बंगाल के एक पुलिस अधिकारी को एक ऑन-ड्यूटी सिख सुरक्षाकर्मी की पगड़ी खींचते हुए और उसकी बेरहमी से पिटाई करते हुए देखा जा सकता है। यह वीडियो ममता सरकार की मुश्किलें बढ़ा सकती है।

भाजपा नेता प्रियांगु पांडेय के सुरक्षा गार्ड बलविंदर सिंह पर उस समय हमला हुआ जब पश्चिम बंगाल पुलिस ने गुरुवार को कोलकाता की सड़कों पर भाजपा कार्यकर्ताओं को बेरहमी से पीटा और बड़े पैमाने पर लाठीचार्ज किया। यह घटना तब हुई जब भाजपा युवा मोर्चा और बीजेपी कार्यकर्ता ममता बनर्जी की अगुवाई वाले पश्चिम बंगाल में हो रहे राजनीतिक हत्याओं के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे।

पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा सिख के दस्तार के अपमान पर आपत्ति जताते हुए अकाली दल के नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने इसकी निंदा की है। मनजिंदर सिंह सिरसा ने वीडियो शेयर करते हुए ट्वीट किया और कहा, “बंगाल पुलिस का गुंडाराज, जो सामने दिखा उसी पर डंडे बरसा दिए। सिक्योरिटी अफसर बलविंदर सिंह की पगड़ी उतारकर उन्हे सड़क पर घसीटा गया। दस्तार का अपमान सिख धर्म का अपमान। पुलिस की ऐसी गुंडागर्दी भारतीय लोकतंत्र पर कलंक।” साथ ही उन्होंने पुलिस अधिकारी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग भी की।

खबरों के मुताबिक, बलविंदर सिंह को हावड़ा मैदान से पश्चिम बंगाल पुलिस ने गिरफ्तार किया था, क्योंकि ऑन-ड्यूटी सिख सुरक्षा अधिकारी के पास भरी हुई बंदूक थी। मीडिया से पुलिस वाहन के अंदर से बात करते हुए बीजेपी नेता प्रियांगु पांडेय ने कहा कि बलविंदर सिंह एक पूर्व-सेना अधिकारी हैं और उनके पास बंदूक रखने के लिए उचित लाइसेंस भी था।

वहीं इस मामले में पश्चिम बंगाल पुलिस ने तर्क दिया कि सिंह का लाइसेंस केवल राजौरी, जम्मू और कश्मीर में वैध है, क्योंकि यह वहाँ जारी किया गया था। हालाँकि, भाजपा नेता ने इस बात पर जोर दिया कि बलविंदर सिंह के शस्त्र लाइसेंस पर अखिल भारतीय परमिट की मोहर है और इसका उपयोग देश भर में कहीं भी किया जा सकता है।

भाजपा नेता ने कहा कि असम और गुवाहाटी में काम करने के बाद बलविंदर सिंह ने कोलकाता में उन्हें ज्वाइन किया था। पांडेय ने कहा कि पूरे भारत का शस्त्र लाइसेंस होने के बावजूद पुलिस ने सिंह के हाथ से बंदूक छीन ली। एक पूर्व सेना अधिकारी के साथ इस तरह की मारपीट बेहद ही अपमानजनक था।

भाजपा नेता ने कड़े शब्दों में कहा कि पुलिस ने पगड़ी खींचकर पूरे सिख समुदाय का अपमान किया है। पगड़ी का अपमान सिख का सबसे बड़ा अपमान है।

गौरतलब है कि बलविंदर सिंह ने मीडिया से बात करते हुए यह पुष्टि की कि हथियार का लाइसेंस राजौरी से जारी किया गया था, लेकिन उनके पास पूरे भारत का परमिट था। उन्होंने कहा कि वह सिर्फ एक कोने में खड़े थे जब पुलिस अधिकारी ने अचानक उन पर हमला किया। उन्हें घसीटा गया और सबके सामने उनकी पगड़ी को खींचकर उतार दिया गया।

भाजपा नेता ने माँग की है कि शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने वाले कार्यकत्ताओं को बेरहमी से पीटने वाली पश्चिम बंगाल पुलिस के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए, जिन्होंने अपनी गुंडागर्दी का प्रदर्शन किया।

गौरतलब है कि कल भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष व कर्नाटक से भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा की गई बर्बरता की जानकारी दी थी। तेजस्वी सूर्या ने ट्वीट करते हुए लिखा था कि, “फासीवाद ऐसा ही दिखता है। टीएमसी के गुंडों ने छतों से हमारे ऊपर देशी बम फेंके। शांतिपूर्ण मार्च के ख़िलाफ़ आँसू गैस के गोले और वाटर कैनन छोड़े गए। आतताइयों का समय खत्म हो रहा है।” बता दें, इस प्रदर्शन में लगभग 450 भाजपा कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है। वहीं 1000 से भी ज्यादा लोग घायल हुए है।

उल्लेखनीय है कि भाजपा नेता मनीष शुक्ला की हत्या के विरोध में भाजपा द्वारा ‘नवान्न चलो’ प्रदर्शन का ऐलान किया गया था। इस आह्वान के बाद ही राज्य सरकार ने प्रदेश सचिवालय का दरवाजा दो दिन के लिए बंद कर दिया। राज्य सरकार ने इसकी सफाई में कहा कि बिल्डिंग को सैनिटाइज करने के लिए सचिवालय को बंद रखा गया है, जबकि भाजपा का मानना है कि ममता सरकार ने मार्च रोकने के लिए सचिवालय को बंद करने का फैसला किया। इसके अलावा प्रदर्शन को रोकने के लिए ममता सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट के बयान का भी हवाला दिया गया जिसमें अदालत ने कहा था, “शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन ही उचित है, जगह घेर कर बैठ जाना गलत है, क्योंकि लोगों को इससे परेशानी होती है।”