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मी लॉर्ड! शाहीन बाग पर आपके फैसले की बत्ती बना कर बीरबल जैसे देखते रहने के अलावा क्या विकल्प है?

शाहीन बाग दिसम्बर 2019 के उत्तरार्ध में जामिया नगर के दंगों के साथ शुरु हुआ एक कैंसरकारी ट्यूमर था, जिसकी जानकारी विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और अपने ही कर्मियों द्वारा टाँग उठा कर मूत्र विसर्जन किए जाने वाले चौथे खम्बे, मीडिया, को भी थी। फिर भी यह चलता रहा और इसकी परिणति 2020 की फरवरी 23, 24, 25 वाले हिन्दू विरोधी दंगों के रूप में हुई, जो किस व्यापकता को प्राप्त करती देवाधिदेव जानते हैं।

आज इस देश की सबसे उन्मुक्त, किसी भी तरह के प्रश्नों से स्वतंत्र और समय-समय पर कालजयी निर्णय देने वाली संस्था ने कहा है कि ‘शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन ही उचित है, जगह घेर कर बैठ जाना गलत है क्योंकि लोगों को इससे परेशानी होती है।’

पहली बात तो यह है कि यह बात तो आठवीं कक्षा में पढ़ते छात्र-छात्राएँ भी जानते हैं कि किसी भी मौलिक अधिकार के वृत्त की परिधि वहीं सीमित हो जाती है, जहाँ से दूसरों को उससे परेशानी होने लगती है। इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय को अपना वक्त लगाना पड़ा, बहस हुई, फिर निर्णय आया कि ‘नहीं भाई, शाहीन बाग में जो हुआ वो गलत था’।

यही अदालतें दिवाली पर क्या होना है, समय से पहले बता देते हैं; दहीं हाँडी का ऊँचाई तक इनको निर्धारित करनी होती है; कौन सी फिल्म बिना कटे-छँटे रिलीज होनी है, ये एक दिन की आपातकालीन सुनवाई में तय हो जाती है। इनके पास समयाभाव कभी नहीं रहा अगर आपके पास सही वकील हैं। कई बार स्वयं ही संज्ञान ले कर महामहिम न्यायमूर्तिगण ज्ञान की बातें समाज के हित में कर देते हैं।

लेकिन, शाहीन बाग जैसी प्रायोजित नौटंकी पर इनको अक्टूबर 2020 लग जाता है। बात यह नहीं है कि न्यायालय को तो निर्णय देना होता है, बात यह है कि इस निर्णय का अब करें क्या? क्या यह निर्णय सुनिश्चित कर देगा कि आगे शाहीन बाग पैदा नहीं होगा और ये वामी-कामी-इस्लामी कट्टरपंथियों का समूह दोबारा पूरे भारत को हिन्दूविरोधी दंगों की आग में नहीं झोंकेगा?

इस निर्णय की बत्ती बना कर जहाँ सूर्य की रोशनी नहीं पहुँचती वहाँ जला कर रखने के अलावा क्या विकल्प है? करें क्या इस निर्णय का? इसी न्यायालय से यह तक संभव न हो सका कि वो पुलिस से शाहीन बाग खाली करवा दे, न यह हुआ कि सरकारों को हाजिर करे कि ये हो क्या रहा है उसके निर्देशों का? 17 फरवरी को इसी सर्वोच्च न्यायालय ने कहा विरोध कीजिए लेकिन सड़क ब्लॉक मत कीजिए।

उसका क्या हुआ? क्या सुप्रीम कोर्ट की हालत गाँव के नुक्कड़ पर बैठे उस बुजुर्ग की हो गई है जो जानता है कि क्या गलत हो रहा है, बोलता भी है कि कोई उसको सही कर दे, लेकिन उसको पता ही नहीं कि कोई सुन भी रहा है! सुप्रीम कोर्ट ने भी बोल दिया, किसी ने सुना, पालन किया कि नहीं, ये जानने का भी समय नहीं।

दिल्ली पुलिस, केन्द्र सरकार सब दोषी हैं

53 लोगों की लाश कैसे गिरी, यह एक अलग बात है, लेकिन वहाँ तक पहुँचने की सारी सीढ़ियाँ शाहीन बाग से ही हो कर गई थी। जब पहले दिन शाहीन बाग में अराजकतावादी भीड़ पहुँची, दो दिन दंगे हो चुके थे, तब दिल्ली पुलिस ने बैरिकेडिंग की थी। उन्होंने उसे हटवाया था और रात को चले गए। फिर जामिया समेत अलीगढ़ और जेएनयू के इस्लामी कट्टरपंथी लड़कों ने वापस उसे हटवा कर फिर से रास्ता बंद कर दिया।

अब सवाल यह है कि उसी दिन दिल्ली पुलिस ने वापस क्यों नहीं हटाया? क्या उन्हें इसकी भनक नहीं थी कि यहाँ दो दिन पहले दंगा हुआ, आगजनी हुई और ये मुस्लिम बहुल इलाका है जहाँ मस्जिदों की लाउडस्पीकरों से भीड़ जुटाई जाती है, तो इस नासूर को बढ़ने न दिया जाए?

केन्द्र सरकार क्या कर रही थी? क्या वो ये देखना चाह रही थी कि दिल्ली चुनावों के समय इस पर आम आदमी पार्टी क्या करती है, उसके हिसाब से चलेंगे? मैं एक सामान्य नागरिक के तौर पर इन प्रश्नों के उत्तर पाना चाहता हूँ कि जब कानून हर तरह से पारित हो गया, तो इन अराजक तत्वों और इस्लामी कट्टरपंथियों को वामपंथी धूर्तों के साथ इकट्ठा होने क्यों दिया?

क्या तर्क यह था कि ये लोग स्वतः नग्न हो जाएँगे? बात यह है कि इनकी नग्नता किन्हें नहीं दिखती? ये कब-कब एक्सपोज नहीं हुए हैं? क्या हजार-दो हजार लोग जब चाहेंगे राष्ट्र की राजधानी को इच्छानुसार बंधक बना लेंगे? जिस दिन छात्र पत्थर उठाता है, उसकी छात्र होने की पात्रता खत्म हो जाती है। जिस दिन नागरिक मशाल उठा कर गैस सिलिंडर वाली बस में आग लगा कर पूरे इलाके को उड़ाने के स्वप्न को प्रतिफलित करना चाहता है, उसी समय वह अपराधी हो जाता है, और उसके सारे मौलिक अधिकार अनुपस्थित हो जाते हैं।

अपराधी चाहे एक व्यक्ति हो या भीड़, समाज की सामाजिकता, राष्ट्र की राष्ट्रीयता और संविधान की संवैधानिकता की समुचित रक्षा हेतु पुलिस तंत्र को निरपेक्ष हो कर हर वह निर्णय लेना चाहिए जो वृहद समाज, राष्ट्र और संविधान को सहेजने के लिए आवश्यक हो। यहाँ तथाकथित छात्र देश को तोड़ने की बातें “गलियों में निकलने का वक्त आ गया है, और पूछने का वक्त आ गया है कि ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या-ला इलाहा इल्लिल्लाह'” कहते हुए खुले में घूमते हैं और हम कहते कि ये छात्र हैं, सख्ती से पेश न आएँ!

ये छात्र हैं? ये छात्र हैं? ये वो परजीवी कीटडिंभ हैं जो किन्हीं कारणों से भारतभूमि के अपशिष्ट बन कर पश्चिमगमन नहीं कर पाए और अब ये फीताकृमि बन कर, बिना लक्षण दिखाए, बरसों तक भीतर से घालते रहे हैं। इन्हें सही माहौल मिले तो ये जान ले सकते हैं, और वही लक्ष्य भी है।

निर्णय से होगा क्या?

जब दिल्ली पुलिस तब इन दंगाइयों को रोक नहीं सकी, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा था कि ये जो कर रहे हैं, वो गलत है। फिर, इनके हाथ किसने बाँधे? क्या केन्द्र सरकार, जिसके अंतर्गत दिल्ली पुलिस आती है, उसका कुछ निर्देश था? क्या केन्द्र सरकार इस धोखे में रही कि ‘ये विद्यार्थी हैं, और वो महिलाएँ हैं, दिसम्बर की ठंढ में टिक नहीं पाएँगे’?

यहाँ रातोंरात ‘जस्टिस फॉर हाथरस’ के नाम से वेबसाइट बन जाती है, दंगों को लिए सौ करोड़ का इंतजाम हो जाता है, और हजारों की भीड़ मशाल, मास्क, तेल-फुलेल ले कर शहरों को फूँकने को तैयार रहती है, और आपको लगता है कि बच्चे हैं, औरतें हैं, ठंढ है, गर्मी है…

मी लॉर्ड लोग निर्णय भी देते हैं, और कालांतर में ज्ञान भी देते हैं कि ‘जस्टिस डिलेड इज़ जस्टिस डिनाय्ड’। ये दोनों ही बातें कैसे करते हैं आप लोग, भारतभूमि के महानतम न्यायिक मस्तिष्कधारक और न्यायवेत्तावृंद? करें क्या इस कालजयी निर्णय का! जब आप यह भी सुनिश्चित नहीं कर सकते कि आपकी कही बातें पुलिस माने, तो फिर अपने ही उपहास के लिए ऐसे निर्णय क्यों देते हैं?

यहाँ कट्टरपंथी और वामी-कामी गिरोह सत्तू-नमक बाँध कर बैठा है कि जब तक दो भी जिंदा रहेगा आपसे में ही लड़ मरेंगे, एक ही बचा तो हाथ में तलवार और पैर के अँगूठे और दूसरी उँगली के बीच में कटार फँसा कर लड़ता रहेगा। उसका जन्म ही अराजकता फैलाने के लिए हुआ है, हिंसा उसकी नियति है, हिन्दूघृणा उसका न बदल सकने वाला पाठ्यक्रम है, आग लगाना उसकी मनोवृत्ति है, दंगा उसके लिए मजहबी आयोजन है…

इसे दूसरी सड़क पर बैठने से कौन रोक लेगा मी लॉर्ड? ये पारदर्शी कपड़े पहन कर भी आएँ तो राजनीति उनकी नग्नता को देख नहीं पाएगी। उन कपड़ों के नीचे की कटारें, जाँघ पर बाँधे हुए पेट्रोल बम की बोतलें इन ज्ञानपुंजों को नहीं दिखती क्योंकि कटार से तो सब्जी भी काटी जाती है और पेट्रोल तो बाइक में भी डाला जाता है। यहाँ लोग कूल्हों पर एसिड की बोतलें ले कर घूम रहे हैं और हमें लगता है कि वो बैटरी चार्ज करने जा रहे होंगे।

राजनीति हमेशा विवश रहेगी न्यायाधीशो! आपकी शक्तिहीनता किस कारण है? इस लाचारी से जन्मी परिस्थितियों ने 53 लाशें गिरा दीं मी लॉर्ड। एक सीधे सवाल के उत्तर में आपको जनवरी से अक्टूबर क्यों लग जाता है महाशयों? आप इन अराजकतावादियों के समक्ष समझौता करने वालों को किस तार्किकता के आधार पर भेजते हैं? क्या इस भीड़ को छिन्न-भिन्न करने के लिए भारतीय वायुसेना की आवश्यकता थी?

या फिर राजनेताओं की तरह, न्यायपालिकाएँ भी इस ललबबुआ बने आततायी कट्टरपंथियों को हाथ में आइसक्रीम पकड़ा कर पूछेंगी कि मेरा राजा बेटा कौन है? किस तरह का संदेश देना चाह रहे हैं समाज में? यही कि कल को कोई भी भीड़ बना कर सड़क पर बैठ जाए, पुलिस जाए तो मत हटो, कोर्ट कहे, तब भी मत हटो क्योंकि दंगा करने के बाद न्यायालय बताएगी कि दस महीने पहले जो रोड ब्लॉक किया था, जिसके कारण करोड़ों रुपयों का नुकसान हुआ, और बाद में 53 लाशें गिरीं, वो गलत था, ऐसा नहीं करना चाहिए!

न्यायाधीशों को सोचना चाहिए कि क्या उनका कार्य सिर्फ श्वेत पन्नों पर काले अक्षरों से छपे हुए निर्णय देना है या उसका सन्निहितार्थ यह भी है कि कोर्ट का कहा माना जाएगा। अगर वह माना नहीं जा रहा है तो असीमित शक्तियों को अपने गर्भ में रखे इस न्यायपालिका को रोका किसने है?

सामान्य नागरिक ऐसे निर्णयों से क्या अर्थ निकाले? जो टैक्स देता है, नागरिकता के गिनाए कर्तव्यों का भी वहन करता है, बत्ती देख कर रुकता है, सामान खरीद कर बिल लेता है, किसी गलत घटना की त्वरित सूचना पुलिस को देता है… उसके लिए कौन सा न्याय किया है मी लॉर्ड? वो आपके इस निर्णय से क्या घर ले जाए? मी लॉर्ड, आप स्वयं इस निर्णय में उन अक्षरों के झुंड के अलावा क्या देख पा रहे हैं? आप इस निर्णय से क्या घर ले जाएँगे?

निकाह के लिए सुमित से सैफ खान बना..छुपकर पढ़ता था नमाज, युवती के घरवालों की शिकायत पर युवक के पिता अरेस्ट

कानपुर से एक लव जिहाद का मामला सामने आया है, लेकिन इस बार धर्म परिवर्तन का शिकार कोई युवती नहीं बल्कि सुमित नाम का एक युवक हुआ है। जिसको प्रेमजाल में फँसा कर लड़की ने पहले इस्लाम धर्म कबूल करवाया। आरोप है कि युवती ने पहले अपने प्रेमी युवक का नाम सुमित से सैफ खान में बदला। फिर निक़ाह कर लिया। सुमित की माँ का आरोप है कि लड़की ने उनके बेटे का इस कदर ब्रेनवाश कर दिया था कि वह चोरी छुपे नमाज पढ़ने और रोजा रखने लगा था।

मामला फीलखाना थाना क्षेत्र स्थित नवाब साहब हाता का है। इसी इलाके का निवासी सुमित कनौजिया का एक दोस्त ग्वालटोली के मकबरा में रहता है। सुमित अक्सर अपने दोस्त से मिलने उसके घर जाता था। जिस दौरान उसकी दोस्ती पड़ोस में रहने वाली एक मुस्लिम युवती से हो गई। जिसके बाद इस दोस्ती को प्रेम संबंधों में बदलते देर नहीं लगी। दो साल प्रेम संबंध में रहने के बाद दोनों ने एक दूसरे से शादी करने का मन बना लिया। लेकिन दूसरा धर्म होने की वजह से दोनों के परिजन इस बात से राजी नहीं हुए।

वहीं बीते रविवार दोनों प्रेमी और प्रेमिका बिना बताए घर छोड़कर भाग गए। युवक के परिजनों का आरोप है कि युवती के घर वाले मुस्लिम रीति रिवाज के साथ सुमित को अपनाना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने उसका धर्म परिवर्तन कराया लेकिन बाद में मुकर गए। मामले में युवती के परिजनों ने सुमित के घरवालो पर बेटी के अपहरण का आरोप लगाते हुए पुलिस थाने में तहरीर दी है। जिस पर पुलिस ने सुमित के पिता को हिरासत में ले लिया।

वहीं, पुलिस की इस कार्रवाई पर आपत्ति जताते हुए सुमित की माँ ने पुलिस को बताया कि युवती ने उनके बेटे का ब्रेनवाश कर दिया है। इतना ही नहीं उसने उसके बेटे को इस्लाम धर्म कबूल करवा कर उसका नाम बदल कर सैफ खान रख दिया है, जिसका घरवालों ने विरोध किया तो बेटा उनके ही खिलाफ हो गया। ‘सैफ खान’ की माँ का कहना है कि वह उनकी बात समझने को तैयार नहीं है।

उन्होंने बताया कि सुमित उर्फ़ सैफ खान अक्सर चोरी-छिपे नमाज पढ़ता था और रोजा रखता था। माँ का दावा है कि उन्होंने अपने बेटे सुमित को ऐसा करते हुए खुद अपनी आँखों से देखा।

वहीं, इस मामले में दूसरी तरफ से युवती के परिजनों ने आरोप लगाया कि सुमित जबरन उनकी बेटी को उठा ले गया है। वह बेटी के साथ कुछ गलत कर सकता है उसकी जान को खतरा है। साथ ही परिजनों ने घर से जेवरात और नगदी भी गायब होने का भी आरोप लगाया है।

पुलिस ने मामले को संज्ञान में ले लिया है। ग्वालटोली थाना प्रभारी के केके दीक्षित के मुताबिक युवक और युवती के परिजनों ने तहरीर दी है। इसमें अलग-अलग आरोप लगाए गए हैं। युवक और युवती को बरामद करने का प्रयास किया जा रहा है। दोनों की बरामदगी के बाद ही स्थिति साफ हो पाएगी।

हाथरस में दंगों के लिए मॉरिशस से PFI को ₹50 करोड़ फंडिंग पर CM योगी हुए सख्त, कहा- नहीं होने देंगे साजिश कामयाब

हाथरस कांड में प्रवर्तन निदेशालय के हालिया खुलासे के बाद उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस विषय पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने दंगे कराने के लिए PFI को मॉरिशस से मिले 50 करोड़ रुपए की फंडिंग पर कहा है वह किसी भी साजिश को सफल होने नहीं देंगे और न ही किसी को लोगों के भरोसे के साथ खिलवाड़ करने की इजाजत देंगे।

उन्होंने कहा, “हम ऐसे लोगों पर सख्त से सख्त कार्रवाई करेंगे, जो समाज में विद्वेष पैदा करके विकास को रोकना चाहते हैं।” सीएम बोले कि अब उत्तर प्रदेश तेजी से आगे बढ़ रहा है। आजादी के बाद सिर्फ दो एक्सप्रेसवे बन पाए थे, लेकिन तीन सालों में तीन नए एक्सप्रेसवे बन रहे हैं।

सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा, “जो समाज को जाति, धर्म और क्षेत्र में बाँटते हैं, वह आज भी यही काम कर रहे हैं। उन्हें विकास नहीं दिख रहा। इसलिए वो ये साजिशें रच रहे हैं। उन लोगों को अब पहचानना जरूरी है जो किसी व्यक्ति की मौत पर राजनीति कर रहे हैं।”

बता दें कि दिल्ली से हाथरस जाते हुए 4 पीएफआई सदस्यों के पकड़े जाने से इस पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है। हालाँकि, इनकी गिरफ्तारी से पहले भी फर्जी अक़ॉउंट और सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही सामग्री से अंदाजा लगाया गया था कि इन विरोध प्रदर्शनों में किसी साजिश की बू है। मगर, सोमवार रात को जब 4 PFI सदस्य गिरफ्तार हुए, तो अगले ही दिन कट्टरपंथी संगठन को हुई 50 करोड़ रुपए की फंडिंग की बात सामने आ गई। बताया जा रहा है कि कुल फंडिंग 100 करोड़ रुपए से अधिक की है। फिलहाल इस मामले की जाँच जारी है।

ईडी के एक अधिकारी के मुताबिक, हाथरस की पुलिस ने एक वेबसाइट को लेकर केस दर्ज किया है। इसके बाद एजेंसी इसमें जाँच का एंगल देखेगी। इस वेबसाइट के जरिए ‘जस्टिस फॉर हाथरस’ के लिए मुहिम चलाई गई और वेबसाइट में फर्जी आईडी के जरिए हजारों लोग जोड़े गए।

इसमें देश और प्रदेश में दंगे कराने और दंगों के बाद बचने का तरीका बताया गया। इसके अतिरिक्त यहाँ मदद के बहाने दंगों के लिए फंडिंग की जा रही थी। जाँच एजेंसी को फंडिंग के जरिए अफवाहें फैलाने के लिए सोशल मीडिया के दुरूपयोग के भी सुराग मिले हैं जिनसे मालूम चलता है कि सोशल मीडिया से अफवाहों को फैला कर प्रदेश और देश की शांति व्यवस्था को बिगाड़ने की साजिश रची जा रही थी।

बता दें कि अभी तक जो 4 पीएफआई सदस्य अरेस्ट हुए हैं, उनकी पहचान  उर रहमान ,सिद्दीकी, मसूद अहमद व आलम के रूप में हुई है। इनमें से मसूद जामिया का छात्र है।

हाथरस में बिना मास्क SDM पर चिल्लाने वाली ‘आज तक’ की पत्रकार हुईं कोरोना +ve, अधिकारी ने #Karma के साथ लिखा- Get well soon!

उत्तर प्रदेश के हाथरस मामले पर कवरेज करने वाली समाचार चैनल ‘आज तक’ की पत्रकार चित्रा त्रिपाठी कोरोना पॉजिटिव पाई गई हैं। उन्होंने ट्विटर पर अपने फॉलोवर्स को इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि कुछ कोरोना संक्रमित लोगों के संपर्क में आने के बाद वह कोविड पॉजिटिव पाई गई हैं।

चित्रा त्रिपाठी ने लिखा, “हाथरस में, मैं कुछ कोरोना पॉजिटिव लोगों के संपर्क में आई। इसलिए एहतियातन मैंने अपना टेस्ट करवाया जो पॉजिटिव आया। हालाँकि कोरोना वायरस के कोई लक्षण नहीं है। मगर डॉक्टर की सलाह पर मैंने खुद को आइसोलेट कर लिया है। मैं उन सभी लोगों से अपील करती हूँ जो भी मेरे संपर्क में आया है वो अपना ख्याल रखे।”

बिन मास्क पहने रिपोर्टिंग करते चित्रा त्रिपाठी की वीडियो हुई थी वायरल

उल्लेखनीय है कि चित्रा पिछले दिनों हाथरस मामले पर अपनी कवरेज के कारण काफी चर्चा में रह चुकी हैं। सोशल मीडिया पर वायरल होती उनकी वीडियो में उन्हें एसडीएम प्रेम प्रकाश मीणा से बेहद अजीब ढंग से बात करते देखा गया। अपने हाथ में माइक लेकर और कैमरे की ओर देखते हुए चित्रा ने अधिकारी पर बदसलूकी का इल्जाम लगाया और पूछा कि उनकी हिम्मत कैसे हुई पत्रकार को उनका काम सिखाने की।

वीडियो में चित्रा को बिना मास्क लगाए चिल्लाते देखा जा सकता है। वह आईएस अधिकारी पर इल्जाम लगाती हैं कि उन्होंने पत्रकार को धमकी दी, उनसे बदसलूकी। महिला पत्रकार ने यह इल्जाम भी लगाया कि मीणा अपना फर्ज निभाने में असमर्थ हैं जबकि उन्होंने अच्छी खासी पढ़ाई की है।

वहीं, युवा अधिकारी को वीडियो में कोरोना बचाव हेतु जारी की गई गाइडलाइन का पूर्ण रूप से पालन करते देखा जा सकता है। वह चित्रा के पूरे मेलोड्रामा पर एक शब्द भी नहीं बोलते और गाड़ी से सटकर खड़े रहते हैं। दिलचस्प बात यह है कि सुनने वाला सभी नियमों का पालन करता दिख रहा है और चिल्लाने वाला हर नियम का उल्लंघन कर रहा है।

वीडियो में नजर आ रहे SDM ने की जल्द स्वस्थ होने की कामना, त्रिपाठी ने बताया ‘तंज’

जब चित्रा ने अपने ट्विटर पर अपने संक्रमण की पोस्ट साझा की तो एसडीएम प्रकाश मीणा ने उनकी जल्द ठीक होने की कामना की और कमेंट किया, “सत्यमेव जयते- सत्य जरूर जीतेगा।” अपने ट्वीट के हैशटैग में उन्होंने #karma (#कर्मा) लिखा। इसके बाद इस ट्वीट को यूपी सीएम के सलाहकार शलभ मणि त्रिपाठी ने भी रीट्वीट किया जिसके कारण त्रिपाठी चिढ़ गईं और इसे शर्मनाक करार दिया। उन्होंने कहा:

“राज्य सरकार में कई मंत्रियों की मौत कोरोना से हो गई। केंद्र में एक मंत्री की जान चली गई। आपकी पार्टी के कई लोग कोरोना से संघर्ष कर रहे हैं। आप कोरोना पर किए गए इस व्यक्तिगत तंज को रीट्वीट कर रहे है। वो तो नया IAS है, जोश में है। आप ऐसी शर्मनाक हरकत क्यों कर रहे हैं।”

बता दें कि इससे पहले जब यूपी सरकार ने एसआईटी की जाँच के बाद मीडियाकर्मियों को गाँव में जाने की इजाजत दी थी, उस समय चित्रा त्रिपाठी गाँव की ओर रिपोर्टिंग के लिए भागती देखी गई थीं। उन्होंने दावा किया था कि मीडिया के दबाव में आकर सरकार ने उन लोगों को गाँव में प्रवेश की अनुमति दी है जबकि वास्तविकता में यह झूठ था। सरकार, मामले में एसआईटी की जाँच खत्म होने का इंतजार कर रही थी ताकि पड़ताल में कोई खलल न डले। इसलिए जैसे ही पूछताछ पूरी हुई मीडिया कर्मियों को वहाँ जाने की इजाजत दे दी गई।

नियम उल्लंघन करने पर AAP विधायक पर हो चुका है मुकदमा दर्ज

याद दिला दें कि इससे पहले यूपी पुलिस ने AAP विधायक कुलदीप कुमार पर क्वारंटाइन नियम उल्लंघन करने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया था। दरअसल वह 29 सितंबर को कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे और 4 अक्टूबर को उन्होंने सैंकड़ों लोगों के साथ पीड़िता के गाँव की ओर कूच किया था। बाद में उनकी इस हरकत की सोशल मीडिया पर बहुत आलोचना हुई थी।

धूमल सिंह: बिहार का वो मोस्ट वॉन्टेड बाहुबली MLA, जिसकी धमक मुंबई तक थी

बिहार विधानसभा चुनावों की तारीख का ऐलान हो चुका है। बिहार में मतदान तीन चरणों- 28 अक्टूबर, 3 नवंबर और 7 नवंबर को होंगे। नतीजों का ऐलान 10 नवंबर को किया जाएगा। नीतीश कुमार की वापसी होगी या फिर जनता इस बार जनता का मूड बदलेगा, ये तो चुनाव के बाद नतीजे आने पर ही साफ हो पाएगा। लेकिन राजनीति और दबंगई के कॉकटेल वाली बिहार की सियासत बड़ी दिलचस्प रही है। कई राजनेता दबंगई के दम से चुनाव जीतते आए हैं। बिहार में चुनाव हों और बाहुबलियों का जिक्र ना हो, ऐसा तो मुमकिन नहीं है।

पार्टी बदली, इलाका बदला, जेल भी गया लेकिन फिर भी इस बाहुबली का दबदबा कायम रहा। पुलिस की लिस्ट में 1987 से सालों तक मोस्ट वांटेड रहे मनोरंजन सिंह को लोग उनके इलाके में ‘धूमल सिंह’ के नाम से बुलाते हैं। स्थानीय लोग कहते हैं, ‘धूमल सिंह’ नाम ज्यादा वजनदार लगता है, इसलिए मनोरंजन सिंह के राजनीति में उतरने से पहले से लोग उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं।

आज हम बात कर रहे हैं ऐसे बाहुबली नेता की, जो 70 के दशक में मोस्ट वॉन्टेड की लिस्ट में शामिल थे। उनका नाम है मनोरंजन सिंह उर्फ धूमल सिंह, जो फिलहाल बिहार स्थित सारण के एकमा से जनता दल यूनाइटेड (JDU) से विधायक हैं। कहा जाता है कि सारण में धूमल सिंह के नाम की तूती बोलती है और उनकी इजाजत के बिना इलाके में परिंदा भी पर नहीं मार सकता।

रंगदारी वसूलने से लेकर हत्या और हत्या के प्रयास करने तक के आरोप धूमल सिंह पर लग चुके हैं। कहा जाता है कि एक वक्त था जब बिहार, यूपी, दिल्ली, मुंबई और झारखंड में धूमल सिंह पर सैकड़ों मामले दर्ज थे। हालाँकि यह बात अलग है कि साल 2015 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने नामांकन के वक्त एफिडेविट में बताया था उन पर 9 आपराधिक मामले चल रहे हैं। इसमें 4 मर्डर और हत्या के प्रयास के 2 मामले भी शामिल थे।

CM नीतीश के करीबी हैं धूमल सिंह

70 के दशक में वो मोस्ट वॉन्टेड की सूची में शामिल थे। लेकिन जब उन्होंने सियासी चोला पहन लिया तो ना सिर्फ उनकी शख्सियत बदल गई बल्कि उनकी पहचान भी एक ‘सफेदपोश’ की बन गई। अपराध की दुनिया से सियासत में आकर किस्मत आजमाने वाले मनोरंजन सिंह उर्फ धूमल सिंह आज बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबियों में शुमार हैं।

कहा जाता है कि अपराध की दुनिया में जितना धूमल सिंह का सिक्का चला, उतना ही उन्होंने सियासत की गलियों में भी धाक जमाई है। सारण में उनकी छवि बाहुबली की है। ऐसा नहीं है कि जब धूमल सिंह राजनीति में उतरे तब उन पर आपराधिक आरोप लगने बंद हो गए। सियासत में आने के बाद भी उनका नाम कई विवादों से जुड़ा लेकिन वो आज भी ‘माननीय’ विधायक हैं। साल 2000 में धूमल सिंह सारण के बनियापुर विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय विधायक बने और यह उनकी राजनीति में एंट्री थी।

कैसा रहा राजनीतिक करियर

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी माने जाने वाले बाहुबली मनोरंजन सिंह उर्फ धूमल सिंह अभी सारण के एकमा से जदयू के विधायक हैं। धूमल सिंह ने सारण की सियासत में साल 2000 में एंट्री मारी थी। तब वह सारण के बनियापुर विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय विधायक चुने गए थे। 2005 के फरवरी का चुनाव उन्होंने लोजपा और उसी साल नवंबर का चुनाव जदयू के टिकट पर लड़ा और जीते।

फिर उन्होंने अपना क्षेत्र बदल लिया और बतौर जदयू प्रत्याशी एकमा से किस्मत आजमाई। मनोरंजन सिंह ने 2010 के विधानसभा चुनाव में RJD के कामेश्वर कुमार सिंह को 29201 वोटों के अंतर से हराया था। बनियापुर सीट से विजेता बने धूमल सिंह का दिल जल्दी ही इस विधासनभा से भर गया और उन्होंने अपना विधानसभा क्षेत्र बदलने का फैसला किया।

साभार: एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्मस

2014 के आम चुनाव में भी धूमल ने सांसद बनने की हसरत लेकर महाराजगंज लोकसभा सीट से JDU के टिकट पर किस्मत आजमाई, पर इन्हें हार का सामना करना पड़ा था। साल 2015 के विधानसभा चुनाव में मनोरंजन फिर एकमा सीट से उतरे और बीजेपी के कामेश्वर कुमार सिंह को शिकस्त दी।

वही कामेश्वर सिंह, जिन्होंने 2015 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया था। 2015 के विधानसभा चुनावों एक बार फिर धूमल सिंह ने उन्हें करीब 8 हजार वोटों के अंतर से मात दे दिया। लेकिन इस बार का चुनावी मौसम 2015 से बिलकुल अलग है। 2015 में एक दूसरे के खिलाफ लड़ने वाली जदयू और बीजेपी इस बार एक साथ हैं और इस सीट का टिकट धूमल सिंह के खाते में जाते दिख रही है। ऐसे में आरजेडी और अन्य दलों के लिए यह सीट थोड़ी मुश्किल हो सकती है।

हमेशा लकी रहा है पत्नी का नॉमिनेशन

मनाेरंजन सिंह की पत्नी सीता देवी ने 2010 में उनके खिलाफ निर्दलीय के तौर पर नॉमिनेशन दाखिल किया था, पर वो हार गई थीं। असल बात ये है कि सीता देवी को चुनाव जीतने से कोई मतलब नहीं था। चूँकि धूमल उन्हें अपने लिए लकी मानते हैं, लिहाजा उनके कहने पर ही सीता देवी ने पर्चा भरा था। हालाँकि वोट उन्होंने अपने पति के लिए माँगा था। इससे पहले 2005 के विधानसभा चुनाव में जब धूमल जेल में थे, उस वक्त भी सीता देवी ने उनके चुनाव में अहम भूमिका निभाई थी और पति के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ा था। उस बार भी धूमल चुनाव जीतने में सफल रहे थे।

घर से मिले थे हथियार और गाँजा

साल 2005 में जब विधायक धूमल सिंह बक्सर जेल में थे तो सारण जिले में उनके आवास पर पुलिस ने छापेमारी की थी। तब पुलिस को हथियार, 4 मोटरसाइकिल, एक क्वालिस कार, एक बोलेरो, 300 ग्राम अवैध गाँजा और 1.5 लाख रुपए कैश मिले थे। धूमल के भजौना और गोपेश्वर आवास से तीन साथियों को गिरफ्तार भी किया गया था।

पुलिस रिपोर्ट में रंगदारी का था जिक्र

साल 2018 में बोकारो में लोहा ऑक्सन और आयरन ओर के ढुलाई में धूमल सिंह के गिरोह समेत बिहार- झारखंड के तीन आपराधिक गिरोह की सक्रियता को लेकर खुफिया विभाग ने रिपोर्ट तैयार की थी। पुलिस की रिपोर्ट में कहा गया था कि बीएसएल में लोहा ऑक्शन होने पर ऑक्शन प्राप्त ठेकेदार से 400 रुपए प्रतिटन रंगदारी ली जाती थी।

विधायक धूमल सिंह को 200 रुपए प्रतिटन के हिसाब से रंगदारी पहुँचाई जाती थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि ट्रांसपोर्टिंग के जरिए वसूली का पहला गिरोह धूमल सिंह का है। वह रणवीर सिंह उर्फ राणा के जरिए रंगदारी की वसूली करवाता था। हालाँकि इन सभी आरोपों के बावजूद धूमल सिंह एक बार फिर सारण की अपनी विधानसभा सीट से ताल ठोकने के लिए तैयार है।

सरकारी जमीन पर कब्जे का आरोप

अक्टूबर 2014 में मनोरंजन सिंह पर 37 एकड़ सरकारी जमीन पर कब्जा करने का आरोप भी लग चुका है। राजीव नगर थाने में उनके खिलाफ बिहार हाउसिंग फेडरेशन की ओर से केस भी दर्ज कराया गया था। इस मामले में जदयू विधायक प्रदीप महतो और 40 अन्य लोगों को भी आरोपित बनाया गया था। मनोरंजन जब बनियापुर के विधायक थे तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उनके पैतृक आवास पर साथ में लंच किया था। तब नीतीश के इस कदम की काफी आलोचना हुई थी।

कितनी है संपत्ति

साल 2015 में चुनावी हलफनामे के मुताबिक उन्होंने अपनी संपत्ति 3,10,56,352 रुपए बताई थी। जबकि उनकी देनदारी 20,02,581 रुपए की थी।

बिहार में जंगलराज के दावे यूँ ही नहीं किए जा रहे

बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का उत्थान एक बड़ी घटना थी। उनके शासन के संदर्भ में ही बिहार में ‘जंगल राज’ की बात होती है। उनके शासन काल की ख़ासियत थी कि उन्होंने विकास की आधुनिक अवधारणा से बिहार को अलग कर, अपनी ख़ास सोच पर पूरी व्यवस्था को पुनर्स्थापित किया। पिछड़ी जातियों को सत्ता के तमाम महत्वपूर्ण स्थानों पर स्थापित करने में लालू यादव सफल रहे थे। लेकिन, ऐसा करने के लिये उन्होंने जो क़दम उठाए, वह व्यवस्था की मूल अवधारणाओं को ध्वस्त करने वाला था। 

पहले से ही भ्रष्ट व्यवस्था को ठीक करने के झमेलों से ख़ुद को बचाते हुए, उन्होंने भ्रष्टाचार को अपराध की ज़मीन से जुड़ने का पूरा मौक़ा दिया। उनकी अघोषित मान्यता थी कि व्यवस्था का आधुनिक स्वरूप और बनावट, पहले से स्थापित जातियों के हित वर्धन के अनुकूल था। इसीलिए, ऐसी व्यवस्था को पिछड़ी जातियों के अनुकूल बनाने के लिए उन्होंने, व्यवस्था को पीछे की तरफ़ ले जाकर, उसमें नए वर्गों को बेहतर तरीके से समायोजित करने की पूरी कोशिश की। इसी कोशिश में, पिछड़ी जातियों के अपराधियों को भी आगे बढ़ने में सरकार का पर्याप्त सहयोग मिला। 

लालू प्रसाद यादव के ज़माने में ही बिहार में अपराध का राजनीतिकरण का काम पूरा हुआ। इससे पहले, अपराध का राजनीति में इस्तेमाल होता था, मगर अब, अपराध ने ख़ुद को राजनीति में स्थापित कर लिया। 2005 में बिहार में लालू राज का अंत हो गया। किंतु ऐसा नहीं हुआ कि इसके साथ ही बिहार की राजनीति से आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों का खात्मा हो गया। इसके बाद भी हुए विधानसभा चुनावों में अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए सभी दलों ने इनका सहारा लिया।

2015 में 30% दागी प्रत्याशी

राज्य का शायद ही कोई विधानसभा क्षेत्र ऐसा होगा जहाँ एक न एक दबंग चुनाव को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं होगा। यही वजह है कि पार्टियाँ अपनी जीत सुनिश्चित करने के इन स्थानीय दबंगों या उनके रिश्तेदारों को अपना उम्मीदवार बनाने से परहेज नहीं करतीं हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्मस (एडीआर) की रिपोर्ट के अनुसार 2010 में हुए विधानसभा चुनाव में 3058 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे, जिनमें 986 दागी थे। वहीं 2015 के चुनाव में 3450 प्रत्याशियों में से आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों की संख्या 1038 यानी तीस प्रतिशत थी।

इनमें से 796 यानी 23 फीसदी के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने,अपहरण व महिला उत्पीड़न जैसे गंभीर मामले दर्ज थे। 2015 के चुनाव में जदयू ने 41, राजद ने 29,भाजपा ने 39 और कॉन्ग्रेस ने 41 प्रतिशत दागियों को टिकट दिया। यही वजह है कि 243 सदस्यीय विधानसभा के 138 अर्थात 57 प्रतिशत विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। इनमें 95 के खिलाफ तो गंभीर किस्म के मामले थे।

नीतीश कुमार ने कसा बाहुबलियों पर शिकंजा

80 के दशक में बिहार की राजनीति में वीरेंद्र सिंह महोबिया व काली पांडेय जैसे बाहुबलियों का प्रवेश हुआ जो 90 के दशक के अंत तक चरम पर पहुँच गया। इनमें प्रभुनाथ सिंह, सूरजभान सिंह, पप्पू यादव, मोहम्मद शहाबुद्दीन, रामा सिंह व आनंद मोहन तो लोकसभा पहुँचने में कामयाब रहे, जबकि अनंत सिंह, सुरेंद्र यादव, राजन तिवारी, अमरेंद्र पांडेय, सुनील पांडेय, धूमल सिंह, रणवीर यादव, मुन्ना शुक्ला आदि विधायक व विधान पार्षद बन गए। यह वह दौर था जब बिहार में चुनाव रक्तरंजित हुआ करता था। 

इस दौर में यह कहना मुश्किल था कि पता नहीं कौन अपराधी कब ‘माननीय’ बन जाए। 2005 में नीतीश कुमार की सरकार बनने के बाद स्थिति तेजी से बदली। बिहार में बीते 15 वर्षों के दौरान कानून के लंबे हाथों ने धीरे-धीरे दबंगों को खामोश करने में सफलता पाई है। राजनीतिक संरक्षण का ही नतीजा था कि शहाबुद्दीन, आनंद मोहन, सूरजभान सिंह, सुनील पांडे, पप्पू यादव, मुन्ना शुक्ला, सतीश पांडे, मनोरंजन सिंह उर्फ धूमल, रामा सिंह, राजन तिवारी, अनंत सिंह, रणवीर यादव, बूटन यादव, अवधेश मंडल और रीतलाल यादव जैसे बाहुबली अपने-अपने इलाकों में दबदबा कायम करने में कामयाब हुए।

2006 में नीतीश सरकार ने पुराने आपराधिक मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया। इसके बेहतर परिणाम सामने आए। कई दबंग अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए और चुनाव लड़ने के योग्य नहीं रहे। जैसे-जैसे कानून का राज मजबूत होता गया, इन बाहुबलियों की हनक कमजोर पड़ती गई। फिलहाल कुछ जेल में सजा काट रहे हैं तो कुछ से पार्टियों ने ही दूरी बना ली है।

बिहार की सामाजिक राजनीतिक जीवन में जातिगत पहचान आज भी एक सच्चाई

आज के बिहार में, ऐसे कितने ही राजनीतिक परिवार हैं, जो विशुद्ध आपराधिक पृष्ठभूमि के वाहक रहे हैं। साथ ही, अपराधियों का जातिगत विभाजन भी बिहार की राजनीति की ख़ासियत है। हर राजनीतिक दल के लिये उसका अपना एक निरापद आपराधिक समुदाय है, जिसका इस्तेमाल चुनावों एवं उसके बाद भी होता है। लालू प्रसाद यादव के शासन में उनकी जाति से जुड़े अपराधी निरंकुश हो जाते हैं, तो उनके शासन से हटते ही किसी और जाति के अपराधी के अच्छे दिन आ जाते हैं। अपराधियों की जातिगत पहचान का महत्व बिहार की सामाजिक राजनीतिक जीवन में आज भी एक सच्चाई है।

ब्रिटिश काल की हरकतें अनुचित, सार्वजनिक स्थानों पर कब्जा लोगों के अधिकारों का हनन: शाहीनबाग पर SC का फैसला

नई दिल्ली स्थित शाहीन बाग में CAA विरोधी आंदोलन के दौरान सड़क रोक कर बैठे प्रदर्शनकारियों के मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (अक्टूबर 07, 2020) को कठोर टिप्पणी करते हुए कहा कि कोई भी समूह या शख्स द्वारा सिर्फ विरोध प्रदर्शनों के नाम पर शाहीनबाग जैसी सार्वजनिक जगहों को अनिश्चित काल तक ब्लॉक या कब्जा नहीं किया जा सकता है।

शीर्ष अदालत ने आज अपने फैसले में कहा कि कोई भी व्यक्ति या समूह सार्वजिनक स्थानों को ब्लॉक नहीं कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पब्लिक प्लेस पर अनिश्चितकाल के लिए कब्जा किया जा सकता। अदालत ने कहा कि धरना-प्रदर्शन का अधिकार अपनी जगह है लेकिन अंग्रेजों के राज वाली हरकत अभी करना सही नहीं है।

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है और इसका सम्मान किया जाना चाहिए। हालाँकि, अधिकार का मतलब यह नहीं है कि आंदोलन करने वाले लोगों को स्वतंत्रता के लिए संघर्ष के दौरान औपनिवेशिक शासन के खिलाफ इस्तेमाल किए जाने वाले विरोध के साधनों और तरीकों को अपनाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एसके कौल, अनिरुद्ध बोस और कृष्ण मुरारी की बेंच द्वारा यह फैसला दिया गया है। कोर्ट ने कहा कि विरोध प्रदर्शनों के लिए सार्वजनिक स्थान पर इस तरह का कब्जा स्वीकार्य नहीं है और निर्धारित स्थानों पर ही विरोध प्रदर्शन होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “शाहीन बाग इलाके से लोगों को हटाने के लिए दिल्ली पुलिस को कार्रवाई करनी चाहिए थी। विरोध प्रदर्शनों के लिए शाहीन बाग जैसे सार्वजनिक स्थलों पर कब्जा करना स्वीकार्य नहीं है। प्रशासन को खुद कार्रवाई करनी होगी और वे अदालतों के पीछे छिप नहीं सकते। लोकतंत्र और असहमति साथ-साथ चलते हैं। लेकिन विरोध प्रदर्शन के लिए निर्धारित जगह होनी चाहिए”

बता दें कि शीर्ष अदालत ने गत 21 सितंबर को ‘लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन के अधिकार और लोगों के मुक्त आवागमन के अधिकार को संतुलित करने की आवश्यकता’ के पहलू पर अपना आदेश सुरक्षित रखा था।

वकील अमित साहनी ने जनवरी में शाहीन बाग में हुए सीएए-एनआरसी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन को हटाने के लिए याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने शिकायत की थी कि प्रदर्शनकारियों द्वारा ब्लॉक किए गए सड़क की वजह से जनता के मुक्त आवागमन के अधिकार पर असर पड़ रहा।

सुप्रीम कोर्ट ने सड़क से भीड़ नहीं हटाने और इस मामले में अदालत के आदेश की प्रतीक्षा करने के लिए सरकार को भी लताड़ा। अदालत ने कहा कि प्राधिकारियों को खुद कार्रवाई करनी होगी और वे अदालतों के पीछे छिप नहीं सकते।

सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन बाग में तथाकथित सीएए-विरोध पर कहा, “दिल्ली पुलिस को शाहीन बाग क्षेत्र को खाली करने के लिए कार्रवाई करनी चाहिए थी।”

अदालत ने आगे कहा कि प्रदर्शनों से बड़ी संख्या में लोगों को असुविधा होती है और उनके अधिकारों का उल्लंघन कानून के तहत स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक सड़क का उपयोग करने के लिए लोगों के अधिकार को देखते हुए विरोध का अधिकार संतुलित होना चाहिए। लंबे समय तक ब्लॉक सड़क को लेकर कोर्ट ने पूछा, ” लोगों द्वारा सड़क का उपयोग करने के अधिकार के बारे में क्या?”

गौरतलब है कि कोरोना वायरस को मद्दे नजर रखते हुए लॉकडाउन लागू होने के बाद प्रदर्शकारियों को सड़क से हटा दिया गया था। लेकिन शीर्ष अदालत ने कहा था कि वह ‘राइट टू प्रोटेस्ट बनाम राइट टू मोबिलिटी’ के मुद्दे पर फैसला सुनाएगी। आज के आदेश से सरकारों को अदालती आदेश की प्रतीक्षा किए बिना सार्वजनिक स्थानों पर विरोध प्रदर्शनों को हटाने की कानूनी मंजूरी मिल गई है, इसका प्रभाव आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा।

उल्लेखनीय है कि दिल्ली के शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ करीब 100 दिनों तक लोग सड़क रोक कर बैठे थे। दिल्ली को नोएडा और फरीदाबाद से जोड़ने वाले एक अहम रास्ते को रोक दिए जाने से रोज़ाना लाखों लोगों को परेशानी हो रही थी। इतना ही नहीं दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों की साजिश भी शाहीनबाग में ही रची गई थी।

राजस्थान में एक और 15 वर्षीय लड़की हुई अपहरण और बलात्कार की शिकार: बनाई गई अश्लील वीडियो, आरोपित फरार

राजस्थान में बलात्कार की घटनाएँ थमने का नाम नहीं ले रहीं। हालिया मामला प्रदेश के बाड़मेर जिले के शिव थाना क्षेत्र का है। खबर है कि वहाँ एक 15 साल की नाबालिग का अपहरण करके उसका रेप किया गया और आरोपित वारदात को अंजाम देकर उसे सड़क पर अचेत अवस्था में छोड़ फरार हो गए।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, लड़की का अपहरण उस समय हुआ जब उसके परिवार के लोग मतदान करने गए थे। परिजनों का कहना है कि दो युवकों ने लड़की का अपहरण कर मोटरसाइकिल पर बैठाकर घर से दूर ले जाकर उसका गैंगरेप किया और उसकी अश्लील फोटो भी खींचीं।

जब परिवार ने उसकी तलाश शुरू की तो उसका कोई सुराग नहीं मिला। बाद में पुलिस ने इस मामले को पॉक्सो एक्ट व आईटी एक्ट के तहत दर्ज करके अपनी जाँच शुरू की और लड़की को स्कूल के पास अचेत अवस्था में पाया। अब पुलिस अलग-अलग टीम बना कर आरोपितों की तलाश कर रही है।

पुलिस अधीक्षक ने बताया कि 15 वर्षीय युवती के घर से लापता होने की रिपोर्ट भियाड़ चौकी को दी गई थी, जो तलाश करने पर स्कूल के पास अचेत अवस्था में मिली। पुलिस ने प्राथमिक उपचार करवाने के बाद उसे जिला हॉस्पिटल में भर्ती करवाया।

अस्पताल में होश आने के बाद लड़की का बयान दर्ज हुआ। पीड़िता ने बताया कि उसका दो लड़कों ने पहले अपहरण किया और फिर उनमें से एक ने उसके साथ बलात्कार किया और दूसरे ने घटना की वीडियो बनाई। पुलिस ने युवती के बयान के आधार पर इस मामले में मुकदमा दर्ज किया है। आरोपितों की तलाश चल रही है।

जिला कलेक्टर विश्राम मीणा ने कहा:

पंचायती राज चुनाव के तीसरे चरण का मतदान चल रहा था, परिजन सब मतदान देने के लिए गए हुए थे। उस दौरान दो लड़के उस नाबालिग लड़की को उठाकर ले गए और उसके साथ बलात्कार की घटना हुई। पुलिस ने मामला दर्ज कर अलग -अलग टीमें बनाकर आरोपितों की तलाश शुरू कर दी है। कुछ संदिग्धों से पूछताछ की जा रही है।

इससे पहले आज ही प्रदेश में गैंगरेप का एक और मामला चुरू जिले से सामने आया था। इसमें 19 साल की युवती से 8 दिन तक 9 लोगों ने बलात्कार किया था। एक आरोपित पीड़िता को एसएससी का फॉर्म भरवाने के बहाने गाड़ी में बिठा कर ले गया था जिसमें बाकी दो आरोपित पहले से ही मौजूद थे। सारे आरोपित मिलकर पीड़िता को राजगढ़ के एक मकान में लेकर गए।

वहाँ चारों ने न सिर्फ उसके साथ गैंगरेप किया, बल्कि पूरे वारदात की अश्लील वीडियो बना ली और आपत्तिजनक फोटोज भी क्लिक की। इसके अलावा आरोपितों पर पीड़िता को जान से मारने की धमकी देने और डराने का भी आरोप लगाया गया है।

यहाँ बता दें कि अभी पिछले दिनों हाथरस मामले के तूल पकड़ने के बाद राजस्थान में कॉन्ग्रेस नेताओं ने योगी सरकार पर खूब सवाल उठाए थे और रेप की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर प्रदेश में जंगलराज करार दिया था। हालाँकि, उसी बीच एनसीआरबी ने महिलाओं के विरुद्ध होने वाले आँकड़ों पर अपनी रिपोर्ट जारी कर राजस्थान के काले चेहरे का पर्दाफाश किया था।

सूची के मुताबिक सबसे ज्यादा बलात्कार की घटनाएँ राजस्थान में सामने आई थीं। वहाँ पिछले साल 5997 मामले दर्ज किए गए। यानी प्रतिदिन का औसत देखा जाए तो प्रदेश में हर दिन 16 रेप की घटना हुईं। सूची, रेप पीड़िताओं की संख्या भी प्रदेश में 6051 बताती है। इतना ही नहीं प्रदेश में प्रति लाख जनसंख्या पर अपराध की दर 15.9 है।

हाथरस में जातीय हिंसा की साजिश रचने वाला PFI चेयरमैन अब्दुल सलाम निकला केरल का सरकारी कर्मचारी

देशभर में विवाद का विषय बन चुके हाथरस केस की जाँच जारी है और इस मामले में रोज नए-नए खुलासे हो रहे हैं। हाथरस की वारदात के बाद यूपी में बड़े पैमाने पर हिंसा फैलाने की साजिश हो रही है और इस साजिश में PFI यानी, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया का हाथ सामने आया है। हाथरस में जातीय दंगा भड़काने की साजिश रचने वाला PFI का चेयरमैन OM अब्दुल सलाम केरल के बिजली विभाग का कर्मचारी है।

जानकारी के मुताबिक PFI का चेयरमैन केरल में सरकारी कर्मचारी है। जिसका नाम अब्दुल सलाम है और वह केरल में बिजली विभाग में कार्मचारी है। अब्दुल सलाम केरल विद्युत बोर्ड में वरिष्ठ सहायक कम कैशियर के पद पर तैनात है। एबीपी न्यूज का दावा है कि उसके पास पीएफआई के चेयरमैन की कई जानकारियाँ हैं और यही वो शख्स है जो सरकारी कर्मचारी रहते हुए देश में दंगे की साजिश रच रहा है।

केरल के मल्लापुरम जिले में रहने वाले अब्दुल सलाम की साल 2000 में सरकारी नौकरी पर नियुक्ति हुई थी। अब्दुल पर बिना इजाजत विदेश जाने के भी आरोप लगे हैं। केरल के बिजली विभाग में काम करने वाला अब्दुल सलाम उस पीएफआई संगठन का मुखिया है, जिस पर यूपी के हाथरस में दंगा भड़काने की साजिश का आरोप है। पीएफआई संगठन का नाम नागरिकता कानून को लेकर विरोध प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा में सुर्खियों में आया था। 

गौरतलब है कि मीडिया खबरों में ईडी की रिपोर्ट का हवाला देकर बताया जा रहा है कि इस कांड के बहाने जातीय दंगा फैलाने के लिए पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के पास मॉरिशस से 50 करोड़ रुपए आए थे।

इसके अलावा, ईडी ने दावा किया है कि पूरी फंडिंग 100 करोड़ रुपए से अधिक की थी। अब आगे पूरे मामले की पड़ताल की जा रही है। जानकारी के अनुसार, सोशल मीडिया से अफवाहों को फैला कर प्रदेश और देश की शांति व्यवस्था को बिगाड़ने की साजिश रची जा रही थी। हालाँकि, यूपी पुलिस की मुस्तैदी और खूफिया एजेंसियों के अलर्ट होने के कारण इस पूरी साजिश का पर्दाफाश हो गया।

मामले पर यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि विपक्ष राज्य में सांप्रदायिक दंगे भड़काने की कोशिश कर रहा है। सीएम ने कहा था, “जिसे विकास अच्छा नहीं लग रहा, वे लोग देश में और प्रदेश में भी जातीय दंगा, सांप्रदायिक दंगा भड़काना चाहते हैं। इस दंगे की आड़ में विकास रुकेगा। इस दंगे की आड़ में उनकी रोटियाँ सेंकने के लिए उनको अवसर मिलेगा, इसलिए नए-नए षड्यंत्र करते रहते हैं।”

उल्लेखनीय है कि दिल्ली से उत्तर प्रदेश के हाथरस जाते हुए 4 संदिग्ध लोगों को मथुरा पुलिस ने 5 अक्टूबर को गिरफ्तार किया था। पड़ताल में पता चला था कि इनके लिंक पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) और कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI) से हैं। टोल प्लाजा पर चेकिंग के दौरान इनकी गिरफ्तारी हुई थी। अब मथुरा पुलिस इनसे जुड़े हर पहलू पर जाँच कर रही है।

सुशांत के परिवार ने CBI को पत्र लिख मेडिकल रिपोर्ट की समीक्षा करने की माँग की: AIIMS पैनल को बताया- अनप्रोफेशनल

सुशांत सिंह राजपूत के परिवार ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की ओर से सीबीआई को सौंपी गई फॉरेंसिंक एग्जामिनेशन रिपोर्ट पर सवाल उठाए हैं। मृतक अभिनेता के परिवार की तरफ से सीबीआई डायरेक्टर को लेटर लिख कर मुंबई अस्पताल द्वारा शव परीक्षण और विसरा रिपोर्ट की समीक्षा के लिए एक नए मेडिकल बोर्ड के गठन की माँग की गई है।

सुशांत सिंह राजपूत मामले में वकील विकास सिंह ने केंद्रीय जाँच एजेंसी सीबीआई को एक पत्र लिखा है जिसमें एम्स पैनल के प्रमुख पर ‘अनैतिक’ और ‘अनप्रोफेशनल’ होने का आरोप लगाया गया है।

केंद्रीय जाँच एजेंसी को लिखे गए अपने पत्र में राजपूत के परिवार ने पैनल और एम्स फॉरेंसिक विभाग के प्रमुख डॉ. सुधीर गुप्ता पर निशाना साधते हुए मीडिया में रिपोर्ट लीक करने का आरोप लगाया।

विकास सिंह ने अपने पत्र में लिखा, “डॉ.सुधीर गुप्ता का आचरण सरकारी सेवा आचरण के नियमों और एमसीआई दिशानिर्देशों के उल्लंघन में अनैतिक और गैर-पेशेवर है। उनकी ओर से इस आपराधिक दुस्साहस ने एम्स जैसे प्रमुख संस्थान में सार्वजनिक विश्वास को कम किया है। उन्होंने लाखों लोगों के मन में जाँच की निष्पक्षता को लेकर संदेह पैदा किया है।”

सिंह ने आगे लिखा कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से महसूस हुआ है कि एम्स की फोरेंसिक टीम ने कूपर अस्पताल में किए गए पोस्टमार्टम की खामियों पर एक स्पष्ट राय नहीं दी है और इसके बजाय वह रिपोर्ट दी है जिसके लिए उनसे नहीं कहा गया था।

उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले को सीबीआई की ओर से गठित किसी और फॉरेंसिक टीम को रेफर किया जाए, ताकि कूपर अस्पताल की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट की सही और उचित जाँच हो सके।

बता दें सुशांत के परिवार वालों ने सुशांत के कथित आत्महत्या के मामले को मानने से मना कर दिया था और इसके पीछे गहरी साजिश बताई थी। जिसे देखते हुए मामले में सीबीआई जाँच के बाद एम्स फॉरेंसिक पैनल बोर्ड का गठन किया गया था।

इससे पहले, मीडिया रिपोर्टों में कहा गया था कि एम्स के डॉक्टर डॉ. सुधीर गुप्ता ने दावा किया था कि इस मामले की जाँच करने वाली मेडिकल टीम ने सुशांत सिंह मामले में ‘हत्या के एंगल’ को खारिज कर दिया है।

कोरोना पॉजिटिव AAP विधायक ने हाथरस पहुँच कई जिंदगियाँ डाली खतरे में: UP पुलिस ने किया केस दर्ज

दिल्ली के आम आदमी पार्टी (AAP) विधायक कुलदीप कुमार के ख़िलाफ़ महामारी अधिनियम के तहत मामला दर्ज हुआ है। उनपर क्वारंटाइन नियम तोड़ कर हाथरस जाकर पीड़ित परिवार से मिलने का आरोप है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, क्वारंटाइन नियम को तोड़ कर हजारों लोगों की जान को खतरे में डालने के आरोप में उत्तर प्रदेश पुलिस ने कुलदीप कुमार के ख़िलाफ़ मुकदमा दायर किया है। कुछ दिन पहले ही आप विधायक कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे।

हाथरस के पुलिस अधीक्षक ने बताया कि कुलदीप कुमार ने 29 सितंबर को कोरोनावायरस के संक्रमित होने की घोषणा की थी और 4 अक्टूबर को उन्होंने हाथरस पीड़िता के परिवार से मिलने के दौरान अपनी तस्वीर पोस्ट की थी।

गौरतलब है कि AAP विधायक ने 29 अक्टूबर की दोपहर 2 बजकर 29 मिनट पर एक ट्वीट किया। इस ट्वीट में उन्होंने लिखा कि उनको हल्का बुखार हुआ जिसके बाद उन्होंने कोरोना टेस्ट कराया। टेस्ट की रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। उन्होंने लिखा कि वो घर पर ही आइसोलेट रहेंगे। इसके बाद उन्होंने 4 अक्टूबर को दूसरा ट्वीट करते हुए बताया कि वो हाथरस गैंगरेप पीड़िता के परिजनों से मिलने जा रहे हैं।

उन्होंने क्वारंटाइन के सारे नियमों का उल्लंघन कर हाथरस की यात्रा की। इस दौरान वो अपनी पूरी यात्रा के बारे में ट्वीट करते रहे। हाथरस जाने के दौरान अपने पहले ट्वीट में उन्होंने लिखा, “हाथरस में हुए बर्बरतापूर्ण हत्याकांड से दुःखी होकर बहन मनीषा के परिवार से मिलने जा रहा हूँ।”

इसके बाद उन्होंने बताया कि लगभग 1 घंटे के संघर्ष के बाद उन्हें पीड़ित परिवार से मिलने की अनुमति मिल गई है। उन्होंने अगले ट्वीट में लिखा प्रशासन की अनुमति के बाद हाथरस में पीड़िता के परिवार से मिलने पहुँच गए हैं। फिर उन्होंने बताया कि वह हाथरस परिवार से मिल कर लौटे हैं। इस ट्वीट के साथ उन्होंने एक वीडियो भी शेयर की। इस वीडियो में वह पीड़ित परिवार के काफी नजदीक बैठे देखे गए।

सोशल मीडिया पर यह वीडियो आने के बाद लोगों ने इस पर सवाल उठाना शुरू कर दिया था। भाजपा दिल्ली यूनिट ने AAP विधायक के लापरवाह कदम की आलोचना की थी और दूसरों के जीवन को जान-बूझकर जोखिम में डालने के लिए महामारी अधिनियम के तहत उनके खिलाफ कार्रवाई की माँग की थी।