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प्रवासी: तापसी पन्नू का वैचारिक प्रपंच

वर्तमान समय में छद्म छदम युद्ध लड़े जाते हैं। इसी का हिस्सा है, वैचारिक लड़ाई। इसमें राष्ट्र विरोधियों द्वारा समाज में वैचरिक विष से भ्रम का जाल बुना जाता है। इसके लिए मानस को प्रभावित करने वाले सिनेमा, नवीन संचार, समाचार, साहित्य आदि को उपकरण बनाया जाता है।

आपने अभिनेत्री तापसी पन्नू की ‘प्रवासी‘ नामक चलचित्र युक्त कविता अवश्य ही देखी होगी। सामान्य मनुष्य की भॉंति हमारे श्रमिक भाई बहनों की ऐसी परिस्थिति देख, आपका हृदय भी विचलित हुआ होगा। आपने तापसी के इस प्रयास की सराहना भी की होगी। सबसे महत्वपूर्ण, आपने भी प्रशासन को जी भरकर कोसा होगा और इसे प्रसारित करने में भी सहयोग किया होगा।

किन्तु, क्या आपने इसमें छिपे प्रपंच को समझने का प्रयास किया?

सर्वप्रथम प्रवासी का अर्थ समझिए। जो अपना स्थान बदल कर रहते है, यहाँ सन्दर्भ में प्रवासी श्रमिकों (मुख्यतः देहाड़ी श्रमिक) से है जो अपने राज्य से दूसरे राज्य जीविका के लिए आते हैं। यहाँ तापसी उनके देश का निवासी होने पर ही प्रश्न कर रही हैं। ये कहाँ का मूर्खतापूर्ण तर्क है, तापसी को छोड़कर, उनके भारतीय होने में किसको भी लेश मात्र संदेह नहीं है। महामारी में किसी भी परिस्थितिवश अगर भारतीयों को स्थान परिवर्तन करना पड़े तो क्या आप उनके भारतीय होने पर ही प्रश्न करेंगे। पहले जातीय, भाषाई, प्रांतीय होता था, अब जीविका को आधार बनाकर पर समाज में फूट डाल भेद उत्पन्न करना है। हमारे श्रमिक वर्ग के भाई-बहनों को देश से कटा हुआ प्रदर्शित करना है। हिन्दू नरसंहार के बाद 30 वर्षों से विस्थापित कश्मीरी हिन्दुओं के साथ जघन्य अपराध एवं घोर अन्याय हुआ है। तब यह प्रश्न तापसी को क्यों परेशान नहीं करता कि क्या कश्मीरी हिन्दू इस देश के वासी नहीं हैं?

अगर हम नहीं हैं इंसान, तो मार दो हमे, दे दो फरमान… ऐसे शब्दों का चयन सरकार को फ़ासिस्टवादी बताना। अपने बच्चे को ट्राली बैग पर खींचते हुए पैदल चल रही है माँ का दृश्य, अत्यंत मार्मिक एवं हृदय विदारक है। किन्तु प्रश्न यह है कि मात्र इस दृश्य विशेष को ही क्यों चुना गया? पूरा सन्दर्भ क्यों नहीं बताया गया?

जब आप इस दृश्य की पूरी चलचित्र को देखेंगे तो आपको ज्ञात होगा कि वह माँ और बच्चा एक छोटे (4-5) श्रमिक समूह या परिवार का हिस्सा थे। स्थानीय लोगों ने उन्हें रोक कर समझाया भी कि ‘पास के बस स्टेशन से प्रशासन ने यात्रा की व्यवस्था की है, उसका उपयोग करें’। किन्तु वे उपेक्षा करके चले जाते हैं।

फिर भी तापसी क्यों वास्तविक्ता एवं तथ्यों से ध्यान भटका कर, भावनात्मक रूप से झूठ को प्रसारित करना चाहती हैं। दूसरी ओर वह प्रोपेगेंडावादी पत्रकारों द्वारा, कोरोना की विषम परिस्थिति में भी, श्रमिकों से ‘photo pose‘ मॉंगने एवं ‘fake photo narrative create’ करने पर चुप्पी साध लेती हैं।

हम सभी ने देखा है कि कैसे पुलिस ने महामारी की इस विषम परिस्थिति में मानवीय मूल्यों के साथ अपने कर्तव्यों का पालन किया है। जब हम सभी अपने-अपने घरों में सुरक्षित बैठे थे, तब यही पुलिस अपने परिवार से दूर होकर कार्य कर रही थी। अपने ही घर के द्वार पर अपने बच्चे परिवार से दूर रहना सरल नहीं होता, महामारी के समय सड़क किनारे बैठ कर भोजन करना सरल नहीं होता, कोरोना की शंका को जानते हुए भी भीड़ का प्रबंधन करना सरल नहीं होता।

किन्तु कुछ नागरिक महामारी में देश बंदी के नियम तोड़ने में व्यस्त थे, ऐसे नागरिकों पर आप ही बताइए पुलिस को क्या कार्यवाही नहीं करनी चाहिए? एक विशेष समुदाय के नागरिकों ने महामारी में चिकित्सकों एवं प्रशासन पर थूका, पत्थर से प्रहार किया, ऐसे नागरिकों पर आप ही बताइए तापसी, पुलिस को क्या कार्यवाही नहीं करनी चाहिए?

राजस्थान की ग़ैर बीजेपी शासित राज्य की पुलिस ने भी श्रमिकों पर निर्ममता से लाठी बरसाई थी। तापसी ने अपनी कविता में उसके दृश्य क्यों सम्मिलित नहीं किए। महामारी जैसी विषम स्थिति में तापसी क्यों तथ्यों को तोड़-मोड़कर केंद्रीय प्रशासन एवं पुलिस संस्था को नकारात्मक रूप से प्रस्तुत कर रही हैं। ग़ैर बीजेपी शासित राज्यों द्वारा इस संकट की स्थिति में भी सहयोग ना करने पर तापसी मौन क्यों हैं?

कथित तौर पर 1200 किलोमीटर साइकिल चलने वाली ज्योति की कथा एवं घटनाक्रम समझते हैं। ज्योति और उसके पिता उनके मकान मालिक का किराया न दे पाने के कारण, गॉंव वापस जाने को विवश हुए। ज्योति के परिवार की सहमति नहीं थी, किन्तु ज्योति की हठ के आगे उन्हें झुकना पड़ा। महामारी से देश बंदी में, ज्योति के पिता को 1000 रुपया केंद्र सरकार एवं 1000 रुपया बिहार सरकार से भी मिला। जब ज्योति ने साइकिल भी सीखी थी, वो भी नितीश सरकार की किसी योजना के अंतर्गत मिली थी। उनकी यात्रा में अनेकों बार स्थानीय लोगो ने एवं ट्रक चालकों से ज्योति और उसके पिता को सहायता प्राप्त हुई थी। अतंतः ज्योति के इस विषम परिस्थिति में उभरी योग्यता के बल पर उसे Cycle Fedration of India की ओर से नेशनल cycling acedamy में प्रशिक्षु चुने जाने का एक अवसर प्राप्त हुआ, स्वयं इवांका ट्रम्प ने ज्योति को सराहना करते हुए, भारत के लोगो के धीरज और प्रेम को सुन्दर बताया। तापसी द्वारा इस पूरे घटनाक्रम में सरकार पर दोषारोपण करना कहॉं तक उचित है?

अनेकों उदहारण में एक यह सुनिए। एक श्रमिक भाई ने पूरे परिवार के साथ मध्य प्रदेश से राजस्थान तक निःशुल्क यात्रा की और मोदी सरकार को धन्यवाद दिया। तापसी घटनाक्रम को नकारात्मक ही क्यों दर्शाना चाहती हैं? सरकार के प्रयासों से लाभान्वित श्रमिक भाई बहनों के पक्ष को इन्होंने क्यों नहीं दिखाया?

विचारणीय यह है कि किन कारणों से श्रमिकों को गृहनगर लौटने के लिए विवश होना पड़ा? किसने विवश किया श्रमिकों को पलायन करने के लिए? किसने फ़र्ज़ी अनाउंसमेंट करवाए? दिल्ली में किसने रात्रि में माइक पर कहा आनंद विहार बस अड्डे पर घरों तक जाने के लिए बसें खड़ी हैं? देश बंदी का राष्ट्रीय आदेश होने का बाद भी, बस अड्डे तक पहुँचाने के लिए क्यों DTC की बसें लगाई गईं? जनता को राज्य सीमा पर कोरोना के खतरे से मरने के लिए क्यों भेजा गया? मुंबई के बांद्रा में किस षड्यंत्र के अंतर्गत भीड़ को एकत्र किया गया? क्यों ग़ैर बीजेपी शासित राज्यों ने प्रारम्भ में ही कोरोना से लड़ने में केंद्र सरकार के प्रयासों से सहयोग नहीं किया?

तापसी श्रमिक पालयन के मूल कारण पर मौन क्यों हैं? महामारी नियंत्रण में केंद्र सरकार के प्रयासों को विफल क्यों करना चाहती हैं, देश में अराजकता क्यों बढ़ाना चाहती हैं? वास्तविकता को क्यों छुपाया जा रहा है, तथ्यों को तोड़ मोड़कर या आधा-अधूरा क्यों प्रस्तुत किया जा रहा है? जो भीड़ मीडिया में दिखाई जा रही थी, क्या किसी ने षड्यंत्र के अंतर्गत उन्हें भड़काया था , पलायन को विवश किया था? प्रथम दृष्टया प्रश्न अनेक हैं, जिनके उत्तर प्रपंच प्रसारित करने वाले गुटों को देने होंगे।

फरवरी में कोरोना के केंद्र चीन ने कोरोना से लड़ने के लिए चोंगकिंग में ‘Disinfectant tunnels’ लगवाए थे। ये टनल ‘Infra Red’ तकनीक से युक्त मानव पर वायरसनाशक का छिड़काव करने के लिए थे। जिसे सभी सामान्य सामूहिक स्थानों पर लगाया गया था।

दूसरे देशों ने भी इसका अनुगमन किया। भारत में भी सकारात्मक दृष्टि से प्रयोग किया गया, किन्तु बाद में मंत्रालय ने परामर्श के बाद इसे हटावा दिया। आपको समझना होगा की कोरोना महामारी अपने आप में कितनी विकट परिस्थिति है, पूरा विश्व इस प्रकार की स्थिति का प्रथम बार सामना कर रहा है। किसी को भी ठीक से नहीं पता की कैसे इससे निपटा जाए। समय की आवश्यकता के अनुरूप शनै-शनै हम सभी अपने आप को ढाल रहे हैं। ऐसे में अगर प्रसाशन ने जनता की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए, कुछ निर्णय ले लिए तो इसमें क्या आपत्ति है? क्या आप वायरस नाशक ‘Hand Sanitizer’ अपने हाथों पर प्रयोग नहीं करते। सबसे महत्वपूर्ण इस प्रकार छिड़काव से किसी को जीवन संकट का सामना नहीं करना पड़ा है। तो इसे क्यों ऐसे प्रदर्शित किया जा रहा है जैसे कितना बड़ा अपराध हो। अगर ये अपराध है तो इस तर्क से कोरोना वैक्सीन का मानव पर प्रयोग भी अपराध ही माना जाएगा।

क्यों तापसी ने मात्र, उत्तर प्रदेश में हुए छिड़काव वाली घटना को ही चित्रण के लिए ही चुना, किन्तु ग़ैर बीजेपी शासित केरल प्रशासन द्वारा लोगों पर की गई छिड़काव की घटना का जिक्र नहीं किया।

ग़ैर बीजेपी शासित मुंबई में जीवाणुनाशक के स्थान पर पानी का प्रयोग किया गया, ये मुम्बईकर के जीवन से खिलवाड़ क्यों नहीं लगता तापसी को। क्या तापसी बीजेपी एवं ग़ैर बीजेपी राज्यों में भेद करती हैं।

जीवाणुनाशक पर मूर्खता पूर्ण भ्रमित चित्रण दर्शाता है कि तापसी की वैज्ञानिक समझ का स्तर कितना निम्न है। साथ ही साथ यह तापसी की मंशा पर भी संदेह उत्पन्न करता है।

प्रश्न यह भी है कि क्यों तापसी श्रमिकों के विषय को स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से तुलना कर सरदार पटेल की प्रतिमा को अनुपयोगी सिद्ध करना चाहती हैं। क्या सरदार पटेल की प्रतिमा को मात्र इसीलिए प्रपंच में खींचा जा रहा है, क्योंकि सरदार पटेल को सम्मान देने का श्रेय बीजेपी को मिल जाएगा।

21 मार्च 2020 से 13 अप्रैल 2020 के बीच डीबीटी के जरिए 32 करोड़, PMGKAY योजना के तहत 5.29 करोड़ और PMUY योजना के तहत 1.39 करोड़ लोगों को लाभ पहुॅंचाया गया। राज्यों ने 22.08 लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न मुफ्त वितरण के लिए लिया। 1 करोड़ बीजेपी कार्यकर्ताओं ने प्रत्येक कार्यकर्ता द्वारा 5 निर्धन परिवारों के भोजन की व्यवस्था करने का अभियान भी चलाया। बावजूद इसके ‘भूख किसी की मिटा न पाए’ प्रपंच नहीं तो और क्या है। इतना ही नहीं सरकार को बदनाम करने के लिए फेक न्यूज तक फैलाए गए।

ऐसे में सवाल उठता है कि तापसी तथ्यों को एक विशेष वैचारिक रूप में ही क्यों प्रस्तुत कर रही हैं?

समाज को ऐसे प्रपंच प्रसारित करने वाले नामी लोगों का बहिष्कार करना चाहिए। हम सभी को अभिनेता (Actor) एवं नायक (Hero ) के अन्तर को समझना होगा। अभिनेता अभिनय करता है। वह एक छद्म स्वरुप धारण करता है। उसका व्यवहार वास्तविकता से परे होता है। नायक निजी जीवन एवं सार्वजानिक जीवन में एक उत्तम उदारहरण प्रस्तुत करते हुए समाज के लिए कार्य करता है। चुनाव आपका है, आपको छद्म वेश धारी अभिनेता अपनी प्रेरणा स्त्रोत के रूप में चाहिए या वास्तविक समाज के नायक जो धरातल पर कार्यरत हैं।

कार्यक्रम का नाम UPSC जिहाद क्योंकि ज़कात फ़ाउंडेशन लेता है आतंकी संगठनों से फंडिंग: सुदर्शन टीवी ने सुप्रीम कोर्ट में दिया जवाब

गुरूवार को सुदर्शन टीवी के एडिटर इन चीफ़ सुरेश चव्हाणके ने सर्वोच्च न्यायालय के सामने अपना पक्ष रखा। जिसमें उन्होंने कहा बिंदाल बोल कार्यक्रम के तहत प्रसारित किए जाने वाले यूपीएससी (UPSC) जिहाद इसलिए रखा गया क्योंकि इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि उन्हें मिली जानकारी के मुताबिक़ ज़कात फ़ाउंडेशन की फंडिंग तमाम आतंकवादी संगठनों के द्वारा की जाती है। 

राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से चर्चा होनी चाहिए कि ज़कात फ़ाउंडेशन की फंडिंग आतंकवादियों संगठनों द्वारा की जा रही है। उन्होंने इस बात पर भी अपना पक्ष रखा कि 4 कार्यक्रमों की शृंखला में कहीं ऐसा नहीं कहा गया है कि किसी समुदाय के व्यक्ति को यूपीएससी का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। 

सुदर्शन टीवी ने यह भी कहा ज़कात फ़ाउंडेशन को मदीना ट्रस्ट यूके से फंडिंग मिलती है। डॉक्टर ज़ाहिद अली परवेज़ इस ट्रस्ट के एक ट्रस्टी है। परवेज़ इसके अलावा इस्लामिक फ़ाउंडेशन का भी ट्रस्टी है। 

ज़कात फ़ाउंडेशन ने विदेश मंत्रालय को दी गई जानकारी में बताया कि उसे वित्तीय वर्ष 2018-2019 में यूनाइटेड किंगडम की मदीना ट्रस्ट से 13,64,694.00 रूपए मिले थे। मदीना ट्रस्ट हमेशा से भारत विरोधी गतिविधियों के लिए मशहूर रहा है। ऐसी तमाम साक्ष्य और घटनाएँ हैं जिनमें साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि यह ट्रस्ट ऐसी गतिविधियों में शामिल रहा है। 

सुदर्शन न्यूज़ का यह कार्यक्रम सुर्ख़ियों में तब आया जब उसने एक कार्यक्रम का प्रोमो जारी किया जिसका प्रसारण 28 अगस्त को किया जाना था। सुरेश चव्हाणके ने बताया कि उनके चैनल द्वारा इकट्ठा की गई जानकारी के अनुसार हाल फ़िलहाल में प्रशासनिक पदों पर और पुलिस विभाग में मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा मुस्लिम उम्मीदवारों को जितने अंक मिले हैं वह भी बाकी उम्मीदवारों की तुलना में कहीं ज़्यादा हैं। इसके बाद तमाम सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसके विरोध में मामला दर्ज कराया। जिससे इस कार्यक्रम का प्रसारण रुक जाए। 

इसके बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस कार्यक्रम के प्रसारण पर रोक लगा दी थी। जिसके बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने आदेश के पालन पर सहमति जताई थी। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने भी कार्यक्रम के प्रसारण पर रोक लगा दी थी। सर्वोच्च न्यायालय ने आज ही वकील फ़िरोज़ इकबाल द्वारा कार्यक्रम का प्रसारण किए जाने के मामले में दायर की गई याचिका पर सुनवाई थी।    

‘मुगल राजपूत माताओं की संतान थे, योगी सरकार हीन भावना की शिकार’ – छत्रपति शिवाजी म्यूजियम के बाद सागरिका घोष

देश के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की स्वघोषित ‘फैनगर्ल’ सागरिका घोष ने एक बार फिर अपनी वफ़ादारी साबित की है। इस बार नेहरू के लिए नहीं बल्कि अकबर सहित अन्य मुग़ल शासकों के लिए। हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ऐलान किया कि आगरा स्थित मुग़ल संग्रहालय का नाम छत्रपति शिवाजी के नाम पर रखा जाएगा। इस बात से आहत होकर सागरिका घोष ने ट्विटर पर विलाप शुरू कर दिया।

सागरिका घोष ने दावा किया कि मुग़ल शासक राजपूत माताओं की संतान थे। इतना ही नहीं, मुग़ल शासन काल भारतीय इतिहास का ऐसा दौर था जब समानता को अहमियत दी जाती थी। घोष के मुताबिक़ मुग़ल संग्रहालय का नाम बदलना हिंदूवादी नेताओं की इतिहास को लेकर निराशावादी समझ का नतीजा है। उनके मुताबिक़ सरकार ने हीन भावना का शिकार होकर यह निर्णय लिया है। 

इसके कुछ ही समय बाद सागरिका घोष ने अकबर की महानता को याद करते हुए लिखा कि वह एक सच्चा धर्म निरपेक्ष शासक था। वह हर दिन गंगा जल का सेवन भी करता था।

इस मामले में हैरानी की बात यह है कि अकबर के दो आवास (महल) दिल्ली और आगरा में स्थित थे, जो यमुना नदी के तट पर मौजूद हैं, न कि गंगा के। इसके बाद सागरिका ने कहा कि अकबर प्रशासनिक सुधारों को लेकर भी सफल शासक था। 

इसके बाद सागरिका घोष ने इस बात की इच्छा जताई कि नेटफ्लिक्स को मुग़ल शासकों की महानता पर एक वेब सीरीज़ बनानी चाहिए।

इसके बाद सागरिका घोष ने एक बीबीसी डॉक्यूमेंटरी का लिंक साझा किया। इसमें उन परिवार के शासकों का ज़िक्र है, जिन्होंने भारत पर लगभग 200 साल तक राज किया। 

सागरिका घोष ने इसके बाद भी अकबर का महिमामंडन जारी रखा और अगले ट्वीट में बताया कि अकबर कितना बेहतर शासक था। 

इसके पहले सागरिका घोष ने जवाहर लाल नेहरू के लिए अपनी भक्ति दिखाई थी। घोष के मन में ऐसे राजाओं-शासकों के लिए कुछ ज़्यादा ही लगाव है, जिन्होंने भारत पर शासन किया है। 

अक्सर ऐसे प्रयास होते रहते हैं, जिनमें मुग़ल शासकों की असल छवि को सकारात्मक बताया जाता है जबकि असलियत यही है कि मुग़ल शासकों से ज़्यादा धर्म परिवर्तन और अत्याचार किसी और ने नहीं किए। अकबर जिसे हिन्दू औरतों से विवाह करने के चलते कथित तौर पर धर्म निरपेक्ष करार दिया जाता है लेकिन सच यह है कि ऐसा उसने प्रेम भावना के चलते बिलकुल नहीं किया था।

अकबर ने भले हिन्दू औरतों से विवाह किया लेकिन उनके बच्चे जो हिन्दुओं की तरह पाले गए, उनके बारे में शायद ही कोई जानता हो। तमाम मुग़ल शासकों में सबसे ज़्यादा क्रूर और निर्दयी था औरंगज़ेब। जिनके बारे में यहाँ और यहाँ पढ़ा जा सकता है।       

वो सीट जिसने RSS प्रचारक नरेंद्र मोदी को बनाया नेता, किसकी थी यह सीट… कौन है वो और अभी कहाँ?

साल 1950, तारीख 17 सितंबर। नरेंद्र मोदी इसी दिन पैदा हुए, गुजरात में। स्कूली पढ़ाई के बाद इनका मन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के साथ जुड़ गया। जुड़ा ऐसा कि सब कुछ छोड़ देश सेवा का मन बना लिया।

धीरे-धीरे देश सेवा में रम गए। साथ ही RSS की जिम्मेदारियों को निभाते हुए एक-एक सीढ़ी आगे भी बढ़ते गए। सामाजिक कार्य करने वाले मोदी का फिर एक वक्त राजनीति से सामना हुआ। वो इसलिए क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने आपातकाल लगा दिया।

इंदिरा की काट के लिए ऐसे में RSS ने उन्हें गुजरात में आपातकाल के विरोध में समन्वय के लिए, ‘गुजरात लोक संघर्ष समिति’ का महासचिव नियुक्त किया। जब इंदिरा गाँधी ने RSS पर प्रतिबंध लगाया, तो मोदी को गिरफ्तारी से बचने के लिए छिपना पड़ा।

1970 के दशक के अंत में नरेंद्र मोदी गुजरात में संघ के प्रचारक बन गए और बाद में दिल्ली चले गए। 80 के दशक के मध्य में वह एक बार फिर गुजरात लौट आए। यहाँ वो भाजपा में शामिल हो गए और संगठन को मजबूत करने के लिए काम किया।

गुजरात में रहते-रहते नरेंद्र मोदी का पूर्व भाजपा नेता शंकरसिंह वाघेला के साथ विवाद होता है। इस प्रकरण के बाद, उन्हें हिमाचल प्रदेश और हरियाणा में भाजपा की गतिविधियों की देखरेख के लिए दिल्ली भेजा जाता है। इस बीच शंकरसिंह वाघेला कॉन्ग्रेस का दामन थाम लेते हैं।

इस दौरान नरेंद्र मोदी 2001 तक गुजरात से दूर रहते हैं। दिल्ली में पार्टी के लिए काम रहते हैं। उधर गुजरात में केशुभाई पटेल के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार हिल चुकी होती है। 2001 के भूकंप के बाद भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और खराब प्रशासन के आरोपों को केशुभाई की सरकार झेल रही होती है।

इसी समय केशुभाई पटेल ने अपने खराब स्वास्थ्य (शायद पार्टी के निर्देश पर) के कारण इस्तीफा दे दिया और नरेंद्र मोदी (जिन्होंने कभी किसी सार्वजनिक पद का अनुभव नहीं था) को मुख्यमंत्री बनाया गया। ऐसे में 6 महीने के भीतर मोदी को विधान सभा के सदस्य के रूप में निर्वाचित होने की आवश्यकता थी।

राजकोट (पश्चिम) की वो सीट, जिसने बदली भारतीय राजनीति की दिशा

राजकोट (पश्चिम) की सीट, जिसे पहले राजकोट II सीट कहा जाता था। यह सीट भाग्यशाली सीट मानी जाती थी। इसे लेकर भाजपा नेताओं का मानना था कि जीत पक्की है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस पर वजुभाई वला 1985 के विधानसभा चुनावों से जीतते आ रहे थे। वजुभाई वला ने नरेंद्र मोदी को उपचुनाव लड़ने के लिए अपनी यह सीट छोड़ दी। ये वही वजुभाई वला हैं, जो वर्तमान में कर्नाटक के राज्यपाल हैं।

फरवरी 2002 में, गुजरात में तीन सीटों पर उपचुनाव होना था – राजकोट (पश्चिम), महुआ और सजयजीगंज। तीनों सीटों पर BJP काबिज थी। 24 फरवरी 2002 को जब परिणाम घोषित किए गए तो कॉन्ग्रेस महुआ और सजयजीगंज की सीट पर विजयी हो चुकी थी, जबकि मोदी ने राजकोट (पश्चिम) को 14728 वोटों से जीता था।

14728 वोट से अपने जीवन का पहला चुनाव जीतने वाले मोदी इसके बाद मुख्यमंत्री के रूप में गुजरात में तीन चुनाव जीते और अंततः भारत के प्रधानमंत्री बने। इसके बाद का राजनीतिक इतिहास तो TikTok जेनरेशन तक को भी पता है।

भगवान राम-सीता के चित्र को चप्पलों से मारने-जलाने वाले पेरियार को जनेऊधारी राहुल गाँधी की पार्टी कर रही नमन

आज पेरियार के नाम से विख्यात, ईवी रामास्वामी का जन्मदिन है और इसे मनाने के लिए सबसे पहले कॉन्ग्रेस ही मैदान में कूदी है। 17 सितम्बर को पेरियार के जन्मदिन पर कॉन्ग्रेस ने अपने ट्विटर अकाउंट पर हिन्दू-विरोधी पेरियार की ‘खूबियों’ का महिमामंडन कर उन्हें स्मरण किया है।

कॉन्ग्रेस ने अपने ट्वीट में लिखा है, “आत्मसम्मान आंदोलन के संस्थापक और द्रविड़ आंदोलन के जनक, पेरियार जाति और लिंग असमानता और भेदभाव के खिलाफ सबसे मजबूत समर्थकों में से एक थे।”

कॉन्ग्रेस ने अपने ट्वीट में पेरियार को तर्क और स्वाभिमान का प्रतीक बताया है। यह बताने की जरूरत शायद ही होगी कि पेरियार को स्मरण करते समय उसके जिन ‘तर्कों’ के प्रति कॉन्ग्रेस ने अपना सम्मान जाहिर किया है, वह ब्राह्मण और हिन्दू विरोध, हिन्दुओं का अपमान और भारत के सांस्कृतिक ढाँचे का तिरस्कार है।

हाल ही में कॉन्ग्रेस का झुकाव पेरियार के प्रति बढ़ा है। इसके पीछे कॉन्ग्रेस का मकसद दक्षिण भारत के वोट बैंक को लक्ष्य बनाना है। उत्तर भारत में हिंदी भाषी वोटर्स को लुभाने के लिए कॉन्ग्रेस खुद को हिंदुत्व से जोड़ने की हर संभव अदाकारी कर के शायद अपना आँकलन कर चुकी है और यही वजह है कि उन्हें अगले कुछ दशकों तक भी उत्तर भारत में अपना कोई भविष्य नजर नहीं आता। ऐसे में, ‘तमिलनाडु तमिलों के लिए’ जैसा नारा देने वाले पेरियार, जिसकी पहचान ही हिन्दू और हिंदुत्व का विरोध है, कॉन्ग्रेस का आदरणीय हो जाता है, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

कॉन्ग्रेस आज यह तथ्य भी नकारना चाहती है कि जिन्ना की ही तरह पेरियार भी महात्मा गाँधी विरोधी बन चुके थे। द्रविड़ आंदोलनों के अगुआ रहे पेरियार ने ब्राह्मणों के प्रति विरोध जताया था।

यह वही कॉन्ग्रेस है, जो कभी जनेऊ पहनती है तो कभी सड़क पर गाय को काटने वाली कौम के साथ खड़ी नजर आती है। हिन्दू और हिन्दुओं की आस्था के प्रति पेरियार की विचारधारा भी कॉन्ग्रेस से भिन्न नहीं रही। अंतर सिर्फ इतना रहा कि पेरियार ने कॉन्ग्रेस की तरह कभी जनेऊ और धोती पहनकर ब्राह्मणों के वोट बैंक में सेंध लगाने का प्रयास नहीं किया। पेरियार ने हमेशा से ही हिन्दू देवी-देवताओं को अपमानित कर ब्राह्मणों के खिलाफ हमलावर रहने का संदेश देते हुए ही अपनी पहचान बनाई।

हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान करने वाला पेरियार

पेरियार ने ताउम्र हिन्दू धर्म को लज्जित और अपमानित किया। कभी भगवानों का अपमान किया तो कभी हिन्दुओं के धर्म ग्रंथों को जलाने का संदेश दिया। पेरियार के प्रति हिन्दुओं के प्रति विचार उनके इस एक बयान से भी समझे जा सकते हैं –

“मैंने सब कुछ किया, मैंने गणेश आदि सभी ब्राह्मण देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ डालीं। राम आदि की तस्वीरें भी जला दीं। मेरे इन कामों के बाद भी मेरी सभाओं में मेरे भाषण सुनने के लिए यदि हजारों की गिनती में लोग इकट्ठा होते हैं तो साफ है कि ‘स्वाभिमान तथा बुद्धि का अनुभव होना जनता में, जागृति का सन्देश है।”

यही नहीं, पेरियार ने कहा था कि उन देवताओं को नष्ट कर दो जो तुम्हें शूद्र कहे, उन पुराणों और इतिहास को ध्वस्त कर दो, जो देवता को शक्ति प्रदान करते हैं।

भगवान राम-सीता की नग्न मूर्तियों पर पहनाई थी चप्पल की माला

जनवरी 2020 में एक तमिल पत्रिका तुगलक की पचासवीं सालगिरह के कार्यक्रम में मौजूद तमिल अभिनेता रजनीकांत ने कहा था, “सालेम में, 1971 में पेरियार ने एक रैली निकाली थी। रैली में भगवान श्री रामचंद्र और सीता की ऐसी मूर्तियाँ थी, जिसमें कपड़े नहीं पहनाए गए थे। मूर्तियों पर चप्पल की माला पहनाई गई थी। तब किसी समाचार संस्थान ने इसे प्रकाशित नहीं किया था।”

सालेम की इस रैली में पेरियार पर हिन्दू देवी-देवताओं के अपमान के सम्बन्ध में जब केस दर्ज हुआ तो उनका जवाब था कि वो ऐसा 1930 से करते आ रहे हैं।

‘ब्राह्मणों को खत्म करो’

पेरियार ने ब्रह्मणों के खिलाफ खुली हिंसा का संदेश देते हुए कहा था, “जाति तभी समाप्त होगी, जब ब्राह्मण ख़त्म होंगे। ब्राह्मण हमारे पैरों में उलझा हुआ साँप है। यदि आपको सड़क पर साँप और ब्राह्मण दिखाई देते हैं, तो पहले ब्राह्मण को मारो।

पेरियार के ‘भगवाकरण’ पर राहुल गाँधी ने किया था महिमामंडन

इसी वर्ष, जुलाई माह में तमिलनाडु में पेरियार की एक प्रतिमा पर भगवा रंग चढ़ाने की घटना के बाद कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने हिन्दुओं को लेकर घृणा फैलाने वाले ईवी रामासामी उर्फ ​​’पेरियार’ की प्रशंसा और महिमामंडन करते देखे गए। जुलाई 18, 2020 को एक ट्वीट में राहुल गाँधी ने लिखा, “घृणा की मात्रा किसी भी विशाल प्रतीक को कभी भी प्रभावित नहीं कर सकती है।”

कॉन्ग्रेस का पेरियार प्रेम

यह ध्यान रखने वाली बात है कि दक्षिण भारत में पेरियारवादियों के समर्थन की बदौलत ही 2019 के लोकसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस पार्टी 50 सीटों को पार करने में सफल रही। इस तरह से देखा जाए तो हिन्दुओं के प्रति नफरत फैलाने वाले पेरियार का महिमामंडन कर राहुल गाँधी सिर्फ पेरियार विचारधारा के समर्थकों का एहसान ही वापस कर रहे हैं।

सोनिया गाँधी के नेतृत्व तहत कॉन्ग्रेस पार्टी का लंबा इतिहास बताता है कि एक भी कोई ऐसा हिंदू-विरोधी कार्यकर्ता या ‘बुद्धिजीवी’ नहीं है, जिसे कॉन्ग्रेस पार्टी अपना समर्थन नहीं देती है। सत्ता में UPA के दौरान, सोनिया गाँधी ने अपनी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद को उन कार्यकर्ताओं के साथ जोड़ दिया, जिन्होंने विदेशों से फंड प्राप्त किया और विवादित हिंदू-विरोधी सांप्रदायिक हिंसा विधेयक का मसौदा तैयार किया।

यह भी याद रखने की जरूरत है कि राहुल गाँधी के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस पार्टी ने सिर्फ और सिर्फ हिंदू समुदाय के प्रति अनादर की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाया है, जिसे सोनिया गाँधी ने भलीभाँती सींचने का काम किया।

उदाहरण के लिए, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के रूप में राहुल गाँधी के कार्यकाल के दौरान, केरल में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने देश में कहीं भी गोमांस प्रतिबंध के प्रति अपने विरोध प्रदर्शन में एक बछड़े की निर्मम हत्या की थी। ऐसी परिस्थितियों में, यह बिल्कुल भी आश्चर्यजनक नहीं है कि राहुल गाँधी ने पेरियार का महिमामंडन किया।

हिन्दू विरोधी पेरियार

पेरियार ने रामायण के बारे में कई भ्रम फैलाए। श्री राम पर जातिवादी होने का आरोप लगाने से लेकर यह तक दावा किया गया कि उन्होंने महिलाओं को मार डाला। पेरियार के अनुसार, हिंदू महाकाव्य रामायण और महाभारत को द्रविड़ पहचान को मिटाने के लिए ‘चालाक आर्यों’ द्वारा लिखा गया था। अगर पेरियार की मानें तो, राम, भरत को सिंहासन ना मिलने की साजिश का हिस्सा थे, जो पेरियार के अनुसार दशरथ के योग्य उत्तराधिकारी थे।

राम के प्रति अपनी घृणा के अलावा, पेरियार ने भगवान गणेश की मूर्तियों को भी खंडित किया था। उसने श्री राम के चित्र भी जलाए थे। उसकी मृत्यु के बाद, पेरियारवादियों ने दशहरा के साथ ही ‘रावण लीला’ को वार्षिक आयोजन बनाने का प्रयास किया।

‘आपने बुलाया है तो आ जाऊँगा लेकिन मेरे पास गाड़ी नहीं है’ – वो मोदी, जो PM नहीं थे लेकिन वचन के पक्के थे

देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज 70 साल के हो गए। देश और दुनिया के सामने जितना कुछ नज़र आता है, वह है सिर्फ एक तस्वीर। तस्वीर में सब कुछ अति उत्तम है लेकिन तस्वीर में सब कुछ इतना बेहतर हुआ कैसे? इसके जवाब पर चर्चा का दायरा सीमित है।

स्टेशन पर अपने पिता के साथ चाय बेचने से लेकर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की कमान संभालने तक… 7 दशकों की यात्रा में ऐसे अनेक मौके आए, जब देश के प्रधानमंत्री के सामने हालात सामान्य नहीं थे। ऐसा ही एक किस्सा है, जब उन्हें एक समाचार समूह से चर्चा में शामिल होने का बुलावा आया और उन्होंने कहा उनके पास गाड़ी नहीं है।  

इससे पहले उनके जीवन के अन्य पहलुओं को जान लेते हैं। नरेन्द्र मोदी अपने बचपन में स्वभाव के बेहद शरारती थे, अक्सर साक्षात्कारों में उन्होंने इस बात का ज़िक्र भी किया है। एक बार मन की बात कार्यक्रम में उन्होंने इस बारे में एक किस्सा भी साझा किया था। उन्होंने बताया था कि बचपन में शहनाई वालों को इमली का लालच देकर उनका ध्यान हटाया करते थे।

नरेन्द्र मोदी पढ़ाई में औसत थे पर उन्हें रंगमंच का बहुत ज़्यादा शौक था, उन्होंने कई नाटकों में भी हिस्सा लिया था। बचपन में सभी का कोई न कोई नाम होता है, नरेन्द्र मोदी का भी था। नरेन्द्र मोदी के दोस्त उन्हें ‘नरिया’ कह कर पुकारते थे। उन्हें यह नाम बहुत पसंद नहीं था लेकिन वह इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते थे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चर्चाओं के लिहाज़ से कितने कुशल हैं, सोशल मीडिया पर मौजूद कई वीडियो क्लिप्स इस बात की तस्दीक करती हैं। साक्षात्कारों से हट कर और प्रधानमंत्री बनने से पहले भी नरेन्द्र मोदी के ऐसे तमाम वीडियो मौजूद हैं, जिनमें उन्होंने अपनी बात पूरी स्पष्टता से रखी है।

नरेन्द्र मोदी के लिए क्या इन चर्चाओं तक हिस्सा बनने का सफ़र भी बहुत आसान रहा? नहीं। यह संघर्षों से भरा था। संघर्षों से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प किस्सा है, जब नरेन्द्र मोदी को एक समाचार चैनल की परिचर्चा में शामिल होने का मौक़ा मिला था। 

90 के दशक का अंत था। टीवी चैनल का दायरा काफी बढ़ चुका था। लोग समझ चुके थे कि यह संचार का एक बड़ा माध्यम बनने वाला है। खासकर राजनीतिक दृष्टिकोण से। समाचार चैनल्स में चर्चाएँ शुरू हो चुकी थीं, हर राजनीतिक दल अपने नेता-प्रवक्ता भेजा करता था। कुल मिला कर ज़िम्मेदारी बस एक होती थी, अपने दल का नज़रिया मज़बूती से रखना।

यह वाकया भी तभी का है। एक समाचार चैनल (आज तक) में एक चर्चा आयोजित कराई गई, जिसमें लगभग हर दल के नेता को बुलावा भेजा गया। भाजपा में विजय मल्होत्रा को निमंत्रण मिला, लेकिन किसी कारणवश कार्यक्रम से कुछ ही समय पहले उनका आना रद्द हो गया। 

चैनल वाले परेशान। अब किसे बुलाएँ BJP से? नामों की खोजबीन शुरू हुई और नरेन्द्र मोदी को बुलावा भेजा गया। अब तक वह ऐसी चर्चाओं की अहमियत बखूबी समझ चुके थे। उस वक्त तक वह एक अच्छे हिन्दी भाषी वक्ता के रूप में स्थापित भी हो चुके थे, लिहाज़ा आने के सवाल पर उन्होंने तुरंत हामी भर दी।

समस्या लेकिन टली नहीं। क्योंकि एक दुविधा थी। स्पष्टवादी मोदी ने तुरंत चैनल को अपनी दुविधा बताई। उन्होंने कहा, “मैं कार्यक्रम में आने के लिए तैयार हूँ लेकिन मेरे पास वाहन नहीं है।” यह तब की बात है, जब नरेन्द्र मोदी 9 अशोका मार्ग स्थित भाजपा कार्यालय के पास अन्य संघ प्रचारकों के साथ रहते थे। 

चैनल की ओर से उनसे कहा गया कि वह टैक्सी से आ सकते हैं, बाद में इसका भुगतान कर दिया जाएगा। लेकिन कार्यक्रम ऑन एयर होने में सिर्फ चंद मिनट का समय शेष था, और नरेन्द्र मोदी की कोई ख़बर नहीं थी। सब इंतज़ार कर ही रहे थे, तभी मोदी मौके पर नज़र आ गए।

नरेन्द्र मोदी जानते थे कि वह किसी दूसरे नेता के स्थान पर आए हैं लेकिन उन्होंने अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाई। यह इकलौती ऐसी घटना नहीं है, जब प्रधानमंत्री मोदी ने सिर्फ अपनी बात रखने के लिए परेशानियों का सामना किया हो लेकिन जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटे। 

दूसरा किस्सा जुलाई 2001 में हुई आगरा समिट का है। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ भारत आए थे। इस दौरान भी चैनल पर राजनीतिक दलों के नेताओं की ज़रूरत थी। मुश्किल के समय में एक बार फिर समाचार समूह ने नरेन्द्र मोदी से संपर्क किया और इस बार भी उन्होंने निराश नहीं किया।

चर्चा से कुछ देर पहले खूब बारिश होने लगी। सिग्नल न होने की वजह से नरेन्द्र मोदी को कई घंटे इंतज़ार करना पड़ा। क्योंकि वह मौजूद रहने का वादा कर चुके थे, इसलिए काफी देर इंतज़ार करने के बावजूद भी चर्चा में शामिल हुए।

इन दोनों ही घटनाओं में एक बात पूरी तरह समान थी कि नरेन्द्र मोदी हर बुलावे को सहर्ष स्वीकार करते थे। इसके बाद अपने राजनीतिक दल का पक्ष पूरी स्पष्टता से रखते थे। वह अपने नज़रिए और पार्टी के एजेंडे दोनों को लेकर कभी भ्रम में नहीं रहे।

साल 2001 में पहली बार गुजरात की कमान संभालने से लेकर 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों तक… काफी कुछ देखने और झेलने के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने यहाँ तक का सफ़र तय किया। फ़िलहाल देश की सत्ताधारी पार्टी के सामने कई चुनौतियाँ हैं लेकिन जनता ने अभी तक इस चेहरे पर पूरा भरोसा जताया है।    

पुस्तक साभार – The Election That Changed India

कॉन्ग्रेस के पूर्व MLA बदरुद्दीन के बेटे का लव जिहाद: 10वीं की हिंदू लड़की से रेप, फँसा कर निकाह, गर्भपात… फिर छोड़ दिया

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई से लव जिहाद का मामला सामने आया है। आरोपित ने लड़की को गुमराह करके उससे मित्रता की, फिर 10वीं क्लास में लड़की का बलात्कार किया। फिर फँसाया, निकाह किया। इतना करने के बाद आरोपित ने लड़की का गर्भपात भी कराया और अंततः छोड़ दिया।

लव जिहाद की इस घटना को अंजाम देने वाले व्यक्ति का नाम अजीजुद्दीन कुरैशी बताया जा रहा है। सबसे ज़्यादा हैरानी की बात यह है कि अजीजुद्दीन छत्तीसगढ़ स्थित दुर्ग से कॉन्ग्रेस के पूर्व विधायक बदरुद्दीन कुरैशी का बेटा है।

ख़बरों के मुताबिक़ आरोपित ने हिन्दू लड़की से तब मित्रता की, जब लड़की की मात्र उम्र 13 साल थी। इसके बाद आरोपित अजीजुद्दीन ने उसे प्रेम का झाँसा देकर फँसाया। इसके बाद वह पीड़िता के साथ लगातार कई सालों तक बलात्कार करता रहा। इस दौरान लड़की गर्भवती हुई, जिसके बाद अजीजुद्दीन ने उसका गर्भपात करा दिया। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान पीड़िता के साथ तमाम तरह के अत्याचार जारी थे। 

पीड़िता के मुताबिक़ उसे तमाम तरह की प्रताड़ना का सामना करना पड़ता था। वह जब कभी किसी ईश्वर की (खासकर गणेश भगवान की) पूजा करतीं तो अजीजुद्दीन उसे जम कर पीटता था। आरोपित उनसे कुरान की आयतें रटवाता था, धर्म परिवर्तन का दबाव बनाता था।

पीड़िता बीते चार वर्षों से मुंबई में अकेले रह रही थी। ख़बरों की मानें तो उसके माता-पिता और अन्य घर वालों ने उसका साथ छोड़ दिया है। फ़िलहाल पीड़िता अपनी पहचान, धर्म, परिवार और अब अपने बच्चे को भी खो चुकी है। अभी वह पूरी तरह अकेली है। पीड़िता ने साल 2016 में अजीजुद्दीन कुरैशी पर बलात्कार का मामला दर्ज कराया था। लेकिन इस मामले पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। 

अजीजुद्दीन के अलावा दो और मामले नीचे के वीडियो में

लव जिहाद का यह मामला इकलौता नहीं है। उत्तर प्रदेश के कानपुर में पिछले दिनों लव जिहाद के बढ़ते मामलों की जाँच के मद्देनजर एसआईटी का गठन हुआ था। बीते दिन इस मामले में ख़बर आई थी कि एसआईटी ने अपनी पड़ताल में एक दर्जन मामले ऐसे पकड़े हैं, जहाँ विवाह के लिए धर्म परिवर्तन करवाया गया था। एसआईटी इनका पता लगाने के बाद ये जानने की कोशिश कर रही है कि कहीं इनके पीछे किसी संगठन का तो हाथ नहीं है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस बारे में जानकारी देते हुए एक अधिकारी ने बताया था कि अपर पुलिस अधीक्षक दीपक भूकर की अगुवाई वाली एसआईटी ने हाल में ‘लव जिहाद’ के एक दर्जन से ज्यादा मामले पकड़े हैं। इनमें ज्यादातर मामले जूही इलाके से हैं। अब एसआईटी इस बात की जाँच करेगी कि कहीं लव जिहाद रैकेट में किसी कथित इस्लामी संगठन का तो हाथ नहीं है।

नरेंद्र मोदी: यह नाम लेते ही आपके जेहन में कैसी तस्वीर उभरती है?

1934 में भूकंप आया और कोसी नदी पर बना रेल पुल क्षतिग्रस्त हो गया। इसके कुछ साल बाद देश आजाद हो गया और तब से अब तक न जाने कितनी सरकारें आईं। लेकिन, कोसी रेल पुल नहीं बना। 18 सितंबर 2020 को इस रेल पुल की सौगात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार को देने जा रहे हैं।

हालाँकि इसकी नींव 2003 में 6 जून को उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ही रख दी थी। लेकिन, बाद के सालों में यह प्रोजेक्ट ‘कॉन्ग्रेसशाही’ में लटक गई। जिस योजना की लागत 323.41 करोड़ रुपए थी, वह बढ़कर 516.02 करोड़ रुपए हो गई। सत्ता में मोदी के आगमन के बाद इस प्रोजेक्ट ने तेजी पकड़ी और अब इस पर ट्रेनें दौड़ने को तैयार हैं।

आज, यानी 17 सितंबर को 70 साल के हो गए मोदी असल में पीढ़ियों के ऐसे ही सपने को पूरा करने का नाम है। चाहे वह घर-घर बिजली पहुँचाने की योजना हो या फिर शौचालय। जन-धन के जरिए बैकिंग सिस्टम से अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को जोड़ना हो या फिर रसोई गैस सिलेंडर से धुएँ में रोज़ झुलसने से महिलाओं को मुक्ति दिलाना।

प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के तहत लाभान्वित लोगों को लेकर 1 जुलाई 2019 को लोकसभा में सरकार की ओर से दिया गया जवाब

इन्हीं वजहों से मोदी की वह छवि आपके मन में पैदा होती है, जिससे बीजेपी 2019 के आम चुनावों से पहले रूबरू हुई थी। वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार ने अपनी पुस्तक ‘भारत कैसे हुआ मोदीमय’ में लिखा है, “इस प्रजेंटेशन में सवाल हुआ- अगर आप (दो बड़े उद्योपतियों का नाम लिया गया, जिसमें एक भगोड़ा है तो दूसरा लंबे समय तक जेल में रहा, जिनके नाम का खुलासा करना उचित नहीं होगा) इनका नाम लेते हैं तो आपके जेहन में क्या छवि आती है? जवाब था- फ्रॉड की। लेकिन जब नरेंद्र मोदी का नाम लेते हैं तो क्या जवाब होता है? एक ऐसा नेता जो कोई भी बड़ा निर्णय ले सकता है, चाहे विकास के एजेंडे पर हो या फिर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा।”

आपके जेहन में उभरने वाली इसी छवि का चमत्कार था कि 2019 में अकेले दम पर बीजेपी 300 के पार चली गई। इस ऐतिहासिक जनादेश की कई तरहों से व्याख्या हो चुकी है, इसलिए हम इसके ग्राउंड जीरो पर हुए असर पर नजर डालते हैं।

‘मोदी मैंडेट 2019’ में प्रदीप भंडारी लिखते हैं कि उन्होंने कैराना में एक बुजुर्ग महिला से पूछा;

माताजी, आप क्या चाहती हैं प्रधानमंत्री कौन बनना चाहिए इस बार? वे जवाब देती हैं- भैया, हमको तो मोदी ठीक लगता है। भंडारी फिर पूछते हैं क्यों? ऐसा क्या किए हैं मोदी? महिला का जवाब होता है: क्या नहीं दिए। गैस चूल्हा दिए। घर दिए। पैखाना दिए। इतना कोई नहीं किया हम गरीब लोगों के लिए। उनको ऊपर वाला भेजा है हमलोगों के लिए!

इसी तरह प्रयागराज में एक नाविक भंडारी से कहता है, “पाकिस्तान को घर में घुसकर मारे हैं मोदी जी। ये होता है मर्द का जिगरा। ऐसी हवा टाइट की है इनकी कि अब भारत की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखेंगे।” जनता ऐसे जवाब तभी देती है, जब किसी का नाम उम्मीद जगाता हो और साथ ही उनके पूरे होने का भरोसा भी।

ऐसा भी नहीं है कि यह प्रभाव किसी खास राज्य या इलाके तक ही सीमित है। पश्चिम बंगाल के डायमंड हार्बर में एक पूर्व सैनिक ने भंडारी से कहा था, “जीते कोई भी, मेरा वोट मोदी को जाएगा। राष्ट्रीय सुरक्षा और ओआरओपी के लिए।” ओआरओपी यानी वन रैंक-वन पेंशन। अब आप याद करिए कि सैनिकों की यह माँग कितने समय से लंबित थी और मोदी के सत्ता में आते ही किस तेजी से इसे पूरा किया गया था।

याद करिए कि आम चुनाव के वक्त लिबरल गैंग बेगूसराय में कन्हैया कुमार नामक गुब्बारे में कितनी हवा भर रहे थे। वहीं एक युवा ने भंडारी को बताया था, “वोट मोदी को ही देंगे। वो देश को जोड़ने और आगे बढ़ाने का काम किए हैं। कन्हैया देश के टुकड़े-टुकड़े करने की बात करता है। अगर वो संसद में चला गया तो कश्मीर को भी अलग करने की माँग करने लगेगा।” यही भरोसा सीतामढ़ी में दिखा, जब कोई कहता है, “भैया अब बिजली आने लगी है तो लालटेन का क्या काम।”

भंडारी ने यह किताब आम चुनावों के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में किए गए भ्रमण के अपने अनुभवों पर लिखी है। जब आप इसे पढ़ेंगे तो पाएँगे कि मोदी की विकासवादी और मजबूत नेता की यह छवि देशव्यापी है।

सत्ता में लौटने के बाद उन्होंने जिस तरह जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने, सीएए और हाल में चीन के साथ सीमा पर तनाव को लेकर रूख दिखाया है, उससे उनकी मजबूत नेता की वह छवि और पुख्ता हुई है, जो सर्जिकल और एयर स्ट्राइक जैसे साहसिक निर्णयों से बनी थी।

दूसरी तरफ कोरोना संकट के दौरान जिस तरह आत्मनिर्भर भारत का अभियान और आर्थिक पैकेज लाया गया, उसने वंचित तबकों के बीच मोदी की विकासवादी छवि और प्रगाढ़ की है। चाहे वह 10 करोड़ गरीबों के खाते में सीधे रकम ट्रांसफर करना हो या उज्‍ज्‍वला स्‍कीम के तहत 8 करोड़ से ज्‍यादा बीपीएल महिलाओं को तीन महीने तक एलपीजी सिलेंडर मुफ्त देने का फैसला या फिर गरीबों को 5 किलो प्रति व्यक्ति मुफ्त गेहूँ या चावल तीन महीने तक देने का ऐलान वगैरह, वगैरह…।

​घनघोर संकट के वक्त भी निचले पायदान के लोगों को लेकर यही चिंता जमीन पर मोदी मैजिक पैदा करती है और यह हर बीतते दिन के साथ पहले से ज्यादा प्रभावी दिखती है।

जैसा कि संतोष कुमार ने भारत कैसे हुआ मोदीमय में लिखा भी है, “जैसे कोई माँ अपने सुंदर बेटे को देखकर ईष्र्या नहीं कर सकती, वैसे ही मोदी भाजपा के लिए हैं और जब तक ऐसा चेहरा मौजूद हो, पार्टी उसे भुनाएगी ही। निश्चित तौर से भाजपा की वर्ष 2024 की पटकथा तैयार है और शायद 2026 की भी, जब मोदी 75 साल के हो जाएँगे।”

यह केवल भाजपा की ही पटकथा नहीं है। यह सपने देखने छोड़ देने वाली आँखों में उम्मीदें जगाने की पटकथा है। विकास के सपनों को पूरा करने की पटकथा है। और सबसे बढ़कर मजबूत एवं आत्मनिर्भर भारत की पटकथा है। इन पटकथाओं का ईंधन केवल एक है। उसका नाम है: मोदी।

केरल सहित कई दक्षिणी राज्यों में सक्रिय IS आतंकी, NIA ने दर्ज किए 17 मामले, 122 आरोपित गिरफ्तार: गृह मंत्रालय

दुनियाभर में आतंक का साया तेजी से बढ़ रहा है। इसे रोकने के लिए दुनियाभर के नेता एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं भारत के दक्षिणी राज्यों के कुछ लोगों के इस्लामिक स्टेट (IS) में शामिल होने की बात केंद्रीय और राज्य सुरक्षा एजेंसियों के सामने आई है। इसको लेकर नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी (एनआईए) ने 17 मामले दर्ज किए हैं।

गृह मंत्रालय ने कहा कि एनआईए ने तेलंगाना, केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में आईएस की उपस्थिति से संबंधित 17 मामले दर्ज किए हैं और 122 आरोपितों को गिरफ्तार किया है।

बता दें कि राज्य सभा में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने बताया कि एनआईए की जाँच में पता चला है कि इस्लामिक स्टेट (आईएस) केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, बिहार, यूपी, मध्य प्रदेश, और जम्मू-कश्मीर में सबसे अधिक सक्रिय है।

उन्होंने बताया कि IS, इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड लेवांत (ISIL), इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (ISIS), दाएश, इस्लामिक स्टेट इन खोरासान प्रॉविन्स (ISKP), आईएसआईएस विलायत खोरासान, इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक और शाम-खोरासान को केंद्र सरकार ने गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) कानून, 1967 के तहत प्रथम अनुसूची में शामिल कर उन्हें आतंकी संगठन घोषित किया है।

किशन रेड्डी ने बताया कि अपनी विचारधारा को फैलाने के लिए IS सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों का इस्तेमाल कर रहा है। इसे देखते हुए संबद्ध एजेंसियाँ सोशल मीडिया की लगातार निगरानी कर कानून के अनुसार कार्रवाई कर रही हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को इन लोगों को होने वाली फंडिंग के बारे में पूरी जानकारी है। उनकी इस फंडिंग को रोकने की कोशिश की जा रही है।

वहीं इस मामले को लेकर खुफिया एजेंसी के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “यह एक तथ्य है कि केरल में कट्टरता प्रचलित है और एनआईए और राज्य, केंद्रीय खुफिया एजेंसियों द्वारा इस मामले में विस्तृत जाँच की गई है। कुछ संगठनों द्वारा ब्रेनवॉश किए गए युवा अभी भी हमारे रडार पर हैं और उन पर निगाह रखी जा रही है। सभी एजेंसियां ​​ऐसे नेटवर्क को नष्ट करने के लिए पूर्ण समन्वय के साथ काम कर रही हैं।”

खालिस्तानी समूह ‘सिख फॉर जस्टिस’ ने भारत में शुरू किया नियुक्ति अभियान: आतंकवाद विरोधी एजेंसियों ने जारी किया हाई अलर्ट

प्रतिबंधित खालिस्तान समर्थक समूह ‘सिख फॉर जस्टिस’ (एसएफजे) ने अपने अलगाववादी एजेंडे का समर्थन करने वाले वोटरों के पंजीकरण के लिए डोर-टू-डोर अभियान चलाने घोषणा की है। उन्होंने इस अभियान का नाम ‘रेफरेंडम 2020’ रखा है। वहीं इस घोषणा के बाद भारतीय आतंकवाद विरोधी एजेंसियों ने राज्यों में कानून-प्रवर्तन एजेंसियों को अलर्ट कर दिया है।

अमेरिका स्थित खालिस्तानी समूह ने भारत में अपने समर्थकों को आकर्षित करने के लिए एक नई रणनीति तैयार किया है। बता दें इससे पहले अलगाववादी संगठन कनाडा और रूसी पोर्टलों पर ‘रेफरेंडम 2010’ के लिए अपने समर्थकों को रिझा नहीं पाया था। इस संगठन की योजना रेफरेंडम 2020 के लिए 1000 अम्बेसडर की भर्ती करने की है, जिन्हें 7,500 रुपए मासिक वजीफा प्रदान किया जाएगा।

एसएफजे का लक्ष्य 21 सितंबर से इस अभियान की शुरुआत करेगा। जिसमें 30 दिनों के भीतर पंजाब के 12,000 गाँवों को कवर किया जाएगा। चरमपंथी समूह ने पहले घोषणा की थी कि वे इस साल नवंबर में रेफरेंडम 2020 आयोजित करने की योजना बना रहे हैं। इसने 4 जुलाई को अपना ऑनलाइन मतदाता पंजीकरण शुरू करने के लिए पंजाब, दिल्ली और जम्मू और कश्मीर का चयन किया है। एसएफजे के जनरल काउंसलर और नामित आतंकवादी गुरपवंत सिंह पन्नून ने आज रेफरेंडम 2020 के बारे में घोषणा की और कहा कि भारत संगठन की वेबसाइटों और मोबाइल एप्लिकेशन को ब्लॉक करके पंजाब के लोगों को मताधिकार से वंचित कर रहा है।

गौरतलब है कि गृह मंत्रालय ने एसएफजे को गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत गैरकानूनी करार दिया था। इसके नेताओं सहित, पन्नून, नज्जर को भी अधिनियम के तहत आतंकवादी घोषित किया गया था।

इस आतंकवादी समूह ने पहले पंजाब के किसानों को रेफरेंडम 2020 से अनुदान के रूप में प्रत्येक किसान को 3,500 रुपए देने की कोशिश की थी। समूह ने घोषणा की थी कि यह उन किसानों को मासिक आधार पर धन मुहैया कराएगा जो अपना ऋण नहीं चुका सकते हैं।

एमएचए ने राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) की सिफारिश पर एसएफजे नेताओं की संपत्तियों को इस महीने के शुरू में जब्त करने का आदेश दिया था। एसएफजे कथित तौर पर सिख प्रवासियों को जुटाने की कोशिश कर रहा है और इस उद्देश्य के लिए वह अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिका में बैठके आयोजित कर रहा है। आतंकवादी समूह के पास पाकिस्तान का समर्थन भी है, जो इन्हें पैसों के साथ जरूरत के समान प्रदान करने में भी सहायता करता है।