Home Blog Page 4490

कुत्ते को झील में फेंकने वाला सलमान खान गिरफ्तार, पुलिस के डर से दोस्त के घर में छिपा था

भोपाल के श्यामला हिल्स पुलिस थाने में सलमान खान नाम के युवक पर पशुओं पर क्रूरता का मामला दर्ज किया गया था। युवक ने एक कुत्ते को अपर लेक (झील) में फेंक दिया था। उसे गिरफ्तार कर लिया गया है। उस पर आईपीसी की धारा-429 (किसी जीव-जन्तु का वध करने या उसे विकलांग आदि करने की कुचेष्टा) के तहत मांमला दर्ज किया गया था। ख़बरों के अनुसार पुलिस द्वारा किए गए सवाल-जवाब के दौरान उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया।  

उसने बताया कि वह मस्ती कर रहा था और इसी दौरान कुत्ते को हाथों से उठकर झील में फेंक दिया। पुलिस ने जब सलमान को गिरफ्तार किया तब वह भोपाल के हनुमानगंज इलाके में अपने एक दोस्त के घर छुपा हुआ था। पुलिस ने बताया कि सोशल मीडिया पर उसका वीडियो वायरल होने के बाद उसे जानकारी मिली कि पुलिस उसकी खोजबीन कर रही है। इसके बाद वह अपने घर से भाग कर एक दोस्त के घर पर छुप गया था

पुलिस का यह भी कहना है कि जिस धारा के तहत सलमान पर मुकदमा दर्ज किया गया उसके आधार पर उसे 5 साल तक की जेल हो सकती है। पुलिस आज ही उसे अदालत में भी पेश करने की तैयारी कर रही है। वहीं कुत्ते को भोपाल स्थित अपर लेक के वन विहार वाले इलाके में फेंका गया था, वहाँ पानी की मात्रा पूरे झील की तुलना में कम होती है। इसलिए यह उम्मीद जताई जा रही है कि कुत्ते की जान बच गई होगी।      

सलमान खान ने कुत्ते को अपर लेक में फेंक उसका वीडियो बनवाता रहा। कुत्ते को झील में फेंकने वाला वीडियो वायरल होते ही भोपाल में आरोपित की गिरफ़्तारी की माँग होने लगी। सोशल मीडिया पर अन्य जगह के लोगों ने भी इस मामले में अपना विरोध दर्ज कराया। ये वीडियो श्यामा हिल्स के पास अपर लेक में स्थित बोट क्लब के पास बनाए गए रेलिंग के पास शूट किया गया था। 

उक्त आरोपित कुत्ते को सबसे पहले अपने दोनों हाथों से उठाता है और फिर उसे झील में जोर से उछाल कर फेंक देता है। इसके बाद वो वीडियो में मुस्कुराता हुआ दिख रहा है। आरोपित सलमान खान भोपाल के टीला जमालपुरा का रहने वाला है। कहा जा रहा है कि सलमान खान के खिलाफ पहले से ही पशु क्रूरता का इतिहास रहा है और वो इससे पहले भी जानवरों के साथ इस तरह की हरकतें करता रहा है। रविवार की शाम आईपीसी की धारा-429 के तहत मांमला दर्ज किया गया।

साथ ही सलमान खान के खिलाफ ‘पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम’ के तहत भी कार्रवाई की जा रही है। श्यामा हिल्स की ही रहने वाले सुनीता जोशी ने उसके खिलाफ थाने में ममला दर्ज कराया। भोपाल के डीआईजी

शिवसैनिकों के हाथों पिटे पूर्व नौसेना अधिकारी पर उद्धव ठाकरे की पत्नी ने भी कसा तंज

महज एक कार्टून शेयर करने को लेकर शिवसेना कार्यकर्ताओं के हमले का शिकार बने पूर्व नौसेना अधिकारी मदन शर्मा ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से इस्तीफे की माँग की थी। इसी को लेकर शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में मदन शर्मा पर निशाना साधा गया है। बता दें कि सामना के संस्थापक संपादक बाल ठाकरे और संपादक रश्मि उद्धव ठाकरे हैं। रश्मि मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की पत्नी हैं।

सामना के संपादकीय में कहा गया है कि मुंबई में मदन शर्मा नामक सेवानिवृत्त नौसेना अधिकारी पर संतप्त शिवसैनिकों ने हमला किया। इसका समर्थन कोई नहीं करेगा। इसका निषेध ही होना चाहिए। लेकिन यह जो कोई सेवानिवृत्त अधिकारी महोदय हैं, उन्होंने राज्य की जनता द्वारा नियुक्त मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के संदर्भ में आपत्तिजनक व्यंग्य चित्र सोशल मीडिया पर साझा करके क्या हासिल किया?

संपादकीय में आगे कहा गया है, “संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का सम्मान करो, ऐसा इन महोदय को नौसेना में रहते कोई सिखाया नहीं था क्या? आप जिस राज्य में रहते हो, कमाते हो, सुख से जीते हो उस राज्य के नेताओं के बारे में कुछ भी व्यर्थ बोलना और उस पर संतप्त होकर कोई तुम्हारा मुँह फोड़ दे तो उसे अन्याय, अत्याचार, आजादी पर हमला आदि व्यर्थ विशेषण इस्तेमाल करके राजनीति करना।”

साभार: सामना संपादकीय

तंज कसते हुए लिखा गया है, “कटु सत्य कहा जाए तो आज आपने महाराष्ट्र का खाया और उसी थाली में छेद कर दिया है। मुख्यमंत्री का अपमान किया है। कल मन में आ ही गया तो राज्यपाल, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति, वर्तमान सेना प्रमुख, नौसेना प्रमुख का उपहास उड़ाओगे तो भी चिंता मत करना। आपको इस महान कार्य के लिए ‘पद्म’ पुरस्कार अथवा विशिष्ट सेवा पदक देकर सम्मानित किया जाएगा।”

संपादकीय में कहा गया है कि जब एलएसी पर चीन के साथ हिंसक झड़प में हमारे 20 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए, तब मदन शर्मा ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के इस्तीफ़े की माँग क्यों नहीं की? तब भी उनके अंदर के सैनिक को जागना चाहिए था। 20 सैनिकों की हत्या के जिम्मेदार राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री से इस्तीफे की माँग करनी चाहिए थी, परंतु फिलहाल देश में जो कुछ अनाप-शनाप हरकतें हो रही है, उसे देखते हुए ओलंपिक में बच्चों के खेल का कोई स्वर्ण पदक अवश्य ही मिल जाएगा।

संपादकीय में आरोप लगाते हुए कहा गया है कि पिछले 24 घंटों में कर्नाटक में तीन पुजारियों की पत्थर से कूँचकर हत्या कर दी गई। वहीं उत्तर प्रदेश के मंदिर में जा रहे पुजारी की चाकू घोंपकर हत्या कर दी गई। पालघर की दुर्भाग्यपूर्ण घटना में राजनीतिक निवेश करनेवाले और उनके मीडिया के ‘सहयोगी’ इन साधुओं की हत्या के मामले में चुप हैं। भाजपा के लोग सड़क पर उतरकर इन घटनाओं का निषेध करते हुए गलती से भी नहीं दिखे, क्योंकि यह सब व्यर्थ कारोबार उन्होंने सिर्फ महाराष्ट्र के लिए ही सुरक्षित रखा है।

‘कॉन्ग्रेसी’ सिकंदर खान ने 16 साल की लड़की का 2 वर्ष तक किया रेप: हिंदू नाम से दोस्ती, पोर्न साइट पर डालता था वीडियो

मध्य प्रदेश के सतना स्थित कोलगवाँ से एक बड़ा मामला सामने आया है, जहाँ कम्पनी बाग़ निवासी अतीक मंसूरी उर्फ़ समीर उर्फ़ सिकंदर खान ने हिन्दू नाम के साथ 16 साल की नाबालिग को 2 साल तक यौन शोषण का शिकार बनाया। उसका असली नाम मोहम्मद अली अंसारी बताया गया है। नाबालिग को उसने अपना नाम समीर सिंह बताया था। सतना पुलिस ने बलात्कार आरोपित के फार्महाउस और साइबर कैफे को सील कर लिया है।

बताया जा रहा है कि सिकंदर कॉन्ग्रेस का नेता था लेकिन पार्टी जिलाध्यक्ष ने इस बात से इनकार (हालाँकि मीडिया हाउस इस तथ्य को चला रहे हैं) किया है। फ़िलहाल सिकंदर खान को गिरफ्तार कर लिया गया है। आश्चर्य की बात यह कि वो जेल जाते वक्त विक्टरी साइन दिखाते हुए शान से जा रहा था।

उसके ठिकानों से कम्प्यूटर, डीवीआर और कई दस्तावेज जब्त किए गए हैं। 40 वर्षीय सिकंदर ने फेसबुक के जरिए नाबालिग से संपर्क किया था। पुलिस को शिकायत मिली है कि उसने कई अन्य महिलाओं को भी अपना शिकार बनाया है। एसपी रियाज इक़बाल ने जाँच के लिए एसआईटी गठित कर दी है।

एसपी ने लोगों से अपील की है कि अगर किसी के पास सिकंदर खान को लेकर कोई भी सूचना या शिकायत है तो वो बिना डरे सामने आएँ, पुलिस उन शिकायतों पर गंभीरता से कार्रवाई करेगी। सतना पुलिस ने सूचनाओं को गोपनीय रख कर कार्रवाई करने की बात कही है। पुलिस उसके अन्य ठिकानों पर भी दबिश दे रही है। उसे जल्द ही रिमांड पर भी लिया गया है। उसका साइबर कैफे प्रताप होटल के नीचे रीवा रोड में स्थित है, जहाँ पुलिस पहुँची।

वहीं नजीराबाद में सिकंदर का फार्महाउस भी है, जिसका इस्तेमाल वो अपने साथियों के साथ अय्याशी के लिए करता था। नगर कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष मक़सूद अहमद ने कहा है कि आरोपित कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता नहीं है, और उसने सदस्यता ही नहीं ली है। हालाँकि, उसके भाई कॉन्ग्रेस के पूर्व-पार्षद हैं और पार्टी के नेता हैं, ये बात उन्होंने स्वीकार की। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस ऐसे लोगों का समर्थन नहीं करती और पीड़िता को न्याय मिलना चाहिए।

‘नई दुनिया’ के सतना संस्करण में प्रकाशित खबर

पुलिस ने बताया है कि आरोपित को रिमांड पर लेकर उससे पूछताछ जारी है। नाबालिग पीड़िता ने अपनी शिकायत में बताया है कि सिकंदर खान ने अपने फार्महाउस पर बुला कर उसका बलात्कार किया था। साथ ही वीडियो बना कर ब्लैकमेल भी करता था।

आरोपित सिकंदर की कई कॉन्ग्रेस नेताओं के साथ भी तस्वीरें हैं। वह शहर के कई बड़े नेताओं के साथ होर्डिंग्स भी लगवाता था। उसके खिलाफ 4 एफआईआर दर्ज की गई है। सतना में बलात्कार आरोपित सिकंदर खान को लेकर चर्चा का बाजार गर्म है।

सिकंदर पर आरोप है कि वो महिलाओं के अश्लील वीडियो बना कर उन्हें पोर्न वेबसाइट्स पर अपलोड कर दिया करता था। एक होर्डिंग में उसे मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के साथ भी देखा जा सकता है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा ने कहा है कि सतना में हुई लव जिहाद की घटना मानवता पर कलंक है, ऐसी घटनाएँ मध्य प्रदेश में बर्दास्त नहीं होंगी। उन्होंने कहा कि दोषियों की जगह सिर्फ जेल है, चाहे फिर वो कोई भी हो।

‘उदित राज सिर्फ़ कॉन्ग्रेस अध्यक्ष नहीं, बल्कि विश्व के राष्ट्रपति बन सकते हैं, वे गैलेक्सी भी सँभाल सकते हैं’

आउटलुक को दिए साक्षात्कार में कॉन्ग्रेस नेता उदित राज ने बताया कि ‘भाजपा का आईटी सेल’ उनके और पार्टी के बीच में दरार पैदा करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्विटर पर हैशटैग चलाकर उनसे  माँग की जा रही है कि वह सोनिया गाँधी से उनकी जिम्मेदारियाँ ले लें।

यहाँ ये बात साफ कर दें कि उदित राज जिसे बीजेपी आईटी सेल का बता रहे हैं, वो एक डिजिटल एक्टिविस्ट है और ट्विटर पर @being_humor नाम से है। @being_humor ने ऑपइंडिया की निरवा मेहता से बात करते हुए अपने इस समर्थन की वजह बताई है और ये भी समझाया है कि वह उदित राज को इतना महान क्यों समझते हैं।

डिजिटल एक्टिविस्ट से बातचीत के अंश:

कॉन्ग्रेस से जुड़ने के बाद  #UditRajForCongressPresident सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है। आप इस पर क्या कहेंगे?

यह पार्टी में फेरबदल के बाद नहीं हुआ है। हैशटैग दो हफ्तों से ट्रेंड कर रहा है। पार्टी से जुड़ने के कारण तो बस इसे तूल मिला है। उदित राज के समर्थकों की यह सच्ची माँग है। वह जनता के मुद्दों पर बोलते हैं और न्यायोचित बात करते हुए अपनी माँग करते हैं जो राहुल गाँधी के बयानों में नजर नहीं आता।

आउटलुक को दिए इंटरव्यू में उदित राज ने कहा कि वह जनता के नेता है इसलिए उन्हें निशाना बनाया जा रहा है? आपको लगता है वह जनता के नेता हैं?

#UditRajForCongressPresident और #justiceforuditraj हैशटैग पर 1 लाख से ज्यादा ट्वीट इस बात का सबूत है कि उनके बहुत समर्थक हैं। हालाँकि, फिर भी मैं आपका ध्यान उनकी विशाल छवि पर दिलवाना चाहता हूँ, उनके समर्थक जाति-पाति से हटकर हर वर्ग के हैं। वह खुद को सुनामी (आँधी) कहने की बजाय केवल जनता का नेता बताकर बड़प्पन दिखा रहे हैं। उनकी कुछ तस्वीरें देखें जिनसे उनकी मास अपील का पता लगता है।

क्या आपको लगता है कि आउटलुक के साथ उनका साक्षात्कार एक तरीका था कि कॉन्ग्रेस में उन्हें हाईकमान नोटिस करें?

बिलकुल। अपने एक से ज्यादा जवाबों में उन्होंने न केवल अपने उपर ध्यान आकर्षित करवाने की कोशिश की है, बल्कि कॉन्ग्रेस पर भी हमला बोला है। उन्होंने यह कहकर कि राहुल गाँधी ने अभी उनकी सुनवाई नहीं की, उनका जवाब आना बाकी है, उदित राज ने बड़े ही समझदारी से बताया है कि कॉन्ग्रेस दलितों की सुनवाई नहीं कर रही।यह पूछने पर कि अनुभवी दलित नेता मल्लिकार्जुन खड़गे भी AICC में मुख्य सचिव पद से हट गए। उदित राज ने कहा कि खड़गे अभी भी राज्यसभा सदस्य हैं। इसलिए उनकी बातों को समझिए और आपको पता चलेगा कि उनकी माँग क्या है।

क्या आपको लगता है कि उनकी मौजूदगी के कॉन्ग्रेस में कोई मायने हैं?

कोई फर्क नहीं पड़ता। कॉन्ग्रेस अवसरवादी पार्टी है। उन्होंने भगवान राम की मौजूदगी को नकार दिया था। लेकिन पीएम मोदी ने जब 5 अगस्त को राम जन्मभूमि पूजन किया तो उन्होंने राम मंदिर का क्रेडिट खुद ले लिया। जब कॉन्ग्रेस को उदित राज की ताकत का पता चलेगा, वह उन्हें भी पूजने लगेगी।

आप इसे क्यों ट्रेंड करवा रहे हैं?

मैंने अकेले कुछ नहीं किया। मैंने सिर्फ़ @amit_gujju जी के साथ मिल कर अपनी आवाज उठाई और उदित राज जी के सैकड़ों समर्थकों ने जुड़कर इसे जन आंदोलन बना दिया। ऐसा शायद इसलिए क्योंकि कई लोगों ने कॉन्ग्रेस को दलितों पर राय रखते देखा है और भाजपा पर ये आरोप भी लगाते देखा है कि बीजेपी दलितों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं देती, इसलिए अब वह चाहते हैं कि कॉन्ग्रेस अपनी बातों को चरितार्थ करे।

क्या भाजपा आईटी सेल ने आपसे ऐसा करने को कहा या किसी और ने कहा?

नहीं, मैं दूर से दूर तक भाजपा आईटी सेल से नहीं जुड़ा हुआ हूँ। हालाँकि, अगर कोई अच्छा पैसा देगा, तो मैं उससे जुड़ना चाहूँगा। मुझे उदित राज के कई समर्थकों के संदेश आते हैं। वह सभी लोग अपने महान नेता की सेवा में तैनात होने के लिए तैयार हैं।

आप कॉन्ग्रेस विरोधी लग रहे हैं? लोग आपके ऊपर क्यों विश्वास करेंगे कि आप वाकई उदित राज को समर्थन करते हैं?

मैं कॉन्ग्रेस और उसकी विचारधारा का विरोधी लग सकता हूँ। लेकिन मैं हमेंशा मजबूत राष्ट्रवाद और मजबूत विपक्ष के समर्थन में हूँ, जो कॉन्ग्रेस नहीं है। अब डॉ. उदित राज पर आऊँ तो उनके लिए देश हमेशा राजनीति से ऊपर रहा है और इसे इस तथ्य से साबित किया जा सकता है कि उन्होंने अपनी अपनी बड़ी पार्टी छोड़ कर भाजपा में जाना सही समझा और फिर साल 2019 में जब उन्हें लगा कि राहुल गाँधी अकेले मोदी का कुछ नहीं कर पाएँगे तो उन्होंने इसका भार अपने ऊपर ले लिया, ताकि कॉन्ग्रेस की डूबती नैया को बचा सकें। यानी, उन्होंने पहले भाजपा को सशक्त किया फिर कॉन्ग्रेस में आ गए। मुझे उनमें कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनने का ही नहीं, विश्व राष्ट्रपति बनने का और आकाशगंगा को सँभालने का जज्बा भी दिखता है।

आखिरी बार एक दलित, ‘सीताराम केसरी’ ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष का पद जब सँभाला तो उनके साथ बदसलूकी हुई। क्या आप कहीं भीतर से उदित राज से नफरत तो नहीं करते और उनके साथ बदसलूकी करवाना चाहते हों?

आप उदित राज जी को समझे नहीं। वह सीआईडी के दया की तरह हैं, वह जब जी चाहे दरवाजे तोड़ सकते हैं। ये उनकी ताकत है कि जैसे ही #UditRajForCongressPresident ट्रेंड करना शुरू हुआ, सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ने ध्यान इधर-उधर करने के लिए देश छोड़ना जरूरी समझा।

आप कब तक इस अभियान को चलाएँगे?

हम इसे जल्द तो नहीं रोकेंगे। बल्कि आप कोरोना खत्म होने के बाद जमीनी स्तर पर इसका असर देखेंगे। हम जंतर-मंतर पर अगले 4 साल तक के लिए एक जगह खरीदने की सोच रहे हैं। हम सुनिश्चित करेगें कि ये अभियान समय के साथ और तूल पकड़े ताकि डॉ. उदित राज सिर्फ़ कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ही नहीं, बल्कि साल 2024 में पीएम कैंडिडेट भी बनें।

चीन के खिलाफ बोलने से बचने के लिए तो नहीं भागे राहुल-सोनिया? मॉनसून सत्र के आधे हिस्से में नहीं रहेंगे दोनों

भारत-चीन तनाव के बीच सोनिया गाँधी अपने रूटीन मेडिकल चेकअप के लिए विदेश निकल गई हैं और उनके बेटे राहुल गाँधी भी साथ गए हैं। जहाँ सोनिया गाँधी रायबरेली से पाँचवीं बार सांसद बनी हैं, वहीं राहुल गाँधी 3 बार अमेठी का प्रतिनिधित्व करने के बाद अब केरल के वायनाड से सांसद हैं। सोनिया भी अमेठी का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। ऐसे में संसद का मॉनसून सत्र शुरू होने से ठीक पहले दोनों का विदेश जाना एक संयोग नहीं है, ऐसा कई लोगों को लग रहा।

भारत और चीन के बीच जब से तनाव शुरू हुआ है, तब से राहुल गाँधी की भाषा पर गौर किया जाए तो हमें पता चलता है कि उन्होंने आज तक चीन की आलोचना में एक शब्द भी नहीं कहे लेकिन प्रधानमंत्री को बदनाम करने के लिए उनके लिए ‘सरेंडर मोदी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। राहुल गाँधी लगातार कहते रहे कि चीन ने हमारी जमीन हड़प ली है और मोदी सरकार इस मामले में डर कर हाथ पर हाथ धरे बैठी है।

एक और बात गौर करने लायक ये भी है कि राहुल गाँधी ने कभी उन मीडिया रिपोर्ट्स तक पर भी प्रतिक्रिया नहीं दी, जिनमें भारतीय सेना के पराक्रम की बात की गई। गलवान संघर्ष में 40 चीनी फौजियों के मारे जाने की बात सामने आई लेकिन राहुल गाँधी ने सेना की पीठ नहीं थपथपाई। हाल ही में एक अमेरिकी रिपोर्ट में इससे भी ज्यादा का आँकड़ा दिया गया है लेकिन राहुल गाँधी ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और चुप रहे।

इसके अलावा सेना और सरकार द्वारा जारी किए गए किसी भी बयान का राहुल गाँधी ने समर्थन नहीं किया और ‘चीन ने हमारी जमीन हड़प ली’ वाला राग अलापते रहे। कॉन्ग्रेस पार्टी ने कभी भी इस बात की भी चर्चा नहीं की कि आज भारतीय सेना और आईटीबीपी के जवान उन चोटियों पर डेरा डाले हुए हैं, जहाँ 1962 के बाद से ही वो नहीं गए थे। आज चीन की गतिविधियों ऊपर भारतीय सशस्त्र बलों की सीधी नज़र है।

ऐसे में ये सवाल तो उठेगा ही कि क्या सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी चीन के डर से संसद सत्र के पहले हिस्से में भाग नहीं ले रहे हैं क्योंकि इससे उन्हें चीन की आलोचना या निंदा करनी पड़ेगी? क्या सोनिया-राहुल चीन के खिलाफ एक भी शब्द बोलने से डर रहे हैं? भारत-चीन तनाव के बीच ही राहुल ने अपने वीडियो सीरीज शुरू किया और इस तनाव के लिए पीएम मोदी को जिम्मेदार तो ठहराया लेकिन चीन की आलोचना नहीं की।

कभी सीमा पर भारतीय सेना के जवानों और अधिकारियों को अलग-अलग भोजन मिलने की बात करते हैं तो कभी चीन विवाद को मोदी की छवि से जोड़ कर देखते हैं। हाल ही में चीन के मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने भी एक वीडियो जारी कर दिखाया था कि जहाँ वहाँ के फौजी ठण्ड में ड्रोन से आया गर्मागर्म खाना खाएँगे, वहीं भारतीय सेना के जवाब भूखे रहेंगे। राहुल गाँधी और चीन, दोनों एक ही बातें कर रहे हैं। ऐसे में कैसे वो संसद में चीन की करतूतों की निंदा करने का साहस जुटा पाएँगे?

चीनी मुखपत्र ने तो ये भी लिखा कि कॉन्ग्रेस पार्टी मौके की ताक में है और कभी भी मोदी सरकार को हिला सकती है, जिसके लिए वो मुद्दा ढूँढ रही है। ऐसे में ये आरोप लगना स्वाभाविक है कि जब ये सारे सवाल संसद में उठेंगे, तब सत्ताधारी दल की बड़ी संख्या बल के सामने जवाब नहीं जुटे तो क्या होगा? क्या यही वो डर है, जिसने सोनिया-राहुल को विदेश जाने के लिए मजबूर कर दिया है? क्योंकि चीन की इतनी तरफदारी आजकल तो वामपंथी दल भी नहीं करते।

इसी तरह जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चौधरी भारत-चीन मुद्दे पर बोल रहे थे, तब राहुल गाँधी सोते हुए नज़र आए थे। हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने भी कहा था कि जिस तरह से इश्क और मुश्क छिपाने से भी नहीं छिपते, ठीक वैसे ही कॉन्ग्रेस और चीन के बीच चल रहे प्रेम के बारे में सभी को पता है। उन्होंने दावा किया था कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और भारत की कॉन्ग्रेस पार्टी के बीच समझौते हुए हैं, जिसकी जानकारी अब सार्वजनिक की जानी चाहिए। 

भाजपा का आरोप है कि 2008 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और कॉन्ग्रेस ने एक MOU पर हस्ताक्षर किए थे, इसीलिए दोनों के बीच का प्रेम किसी से छिपा हुआ नहीं है। आखिर उस MOU में क्या था, इसका विवरण अब तक सामने नहीं आया है? क्या कोई ऐसा करार है, जिसके तहत गाँधी परिवार ने चीन और शी जिनपिंग के खिलाफ न बोलने की शपथ ली हुई है और इसीलिए वो संसद सत्र में सवालों से बचने के लिए भाग गए?

ये भी अजीब विडम्बना है क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि जब ऐसे मौके आते हैं, तब सरकारें जवाब देने से बचती रही हैं लेकिन यहाँ तो विपक्ष के प्रथम परिवार के दो लोग ही देश से निकल लिए। कॉन्ग्रेस तो कहती है कि देश में अशांति है और माहौल खराब है, फिर उसे क्या ज़रूरत है भागने की क्योंकि अभी तो मोदी सरकार को घेरने के लिए उसके हिसाब से सबसे मुफीद समय होना चाहिए न? कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष और पूर्व अध्यक्ष देश से बाहर हैं और पार्टी संसद में लड़ेगी… वाह रे देश की सबसे परानी पार्टी!

23 नेताओं ने पत्र लिख कर गाँधी परिवार को घेरा है और पार्टी में लोकतंत्र की माँग की है। संगठन में हुए महत्वपूर्ण बदलावों में उन नेताओं को नज़रअंदाज़ किया गया है और वफादारों की चाँदी हो गई है। पार्टी के लिए भी आंतरिक कलह के कारण ये ठीक समय नहीं है क्योंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया के जाने के बाद अभी-अभी सचिन पायलट की बगावत रही है। ऐसे समय में दोनों के विदेश जाने पर अटकलों का बाजार गर्म होना आम है। 

टीका लाल टपलू की हत्या और कश्मीरी पंडितों को भगाने के लिए नारा – ‘जलजला आया है कुफ्र के मैदान में, लो मुजाहिद आ गए मैदान में’

14 सितंबर 1989 यानी आज से ठीक 31 साल पहले कश्मीर में टीका लाल टपलू नामक कश्मीरी पंडित की हत्या को अंजाम दिया गया था। पंडित टीका लाल टपलू कश्मीरी पंडितों के बीच सबसे जाना-माना चेहरा थे। उनकी हत्या के बाद ही कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार का सिलसिला शुरू हुआ था। 

पंडित टपलू को मारने के लिए बड़ी ही बारीकी से आतंकियों ने साजिश रची थी। मगर, फिर भी टपलू को इसका आभास हो चुका था, शायद इसीलिए उन्होंने सबसे पहले अपने परिवार को दिल्ली पहुँचाया और फिर दोबारा 8 सितंबर को कश्मीर लौट आए। उनकी निर्मम हत्या कश्मीरी पंडितों को घाटी से भगाने की दिशा में पहला कदम माना जाता है।

8 सितंबर को दिल्ली से कश्मीर लौटने के बाद उनके घर पर 12 सितंबर को एक हमला हुआ था। यह हमला उन्हें डराने के लिए था। लेकिन कश्मीरी पंडितों का नेतृत्व करने की ठान चुके पंडित टीका लाल इससे घबराए नहीं और चिंक्राल मोहल्ले में स्थित अपने आवास पर टिके रहे। नतीजतन मात्र 2 दिन के अंदर उनकी हत्या की वारदात को अंजाम दे दिया गया।

14 सितंबर की सुबह पंडित टीका लाल के लिए सामान्य सुबह थी। उन्होंने अपने आवास के बाहर एक बच्ची को रोते हुए देखा,और वह बिन कुछ सोचे-समझे घर से बाहर निकल आए। बच्ची की माँ से उसके रोने की वजह पूछने पर पता चला कि उसके स्कूल में कोई फंक्शन है और उसके पास पैसे नहीं है, इसलिए वह रो रही है।

यह बात सुन कर पंडित टपलू ने उसे गोद में उठाया और पाँच रुपए देकर चुप करा दिया। मगर, तभी सामने से आतंकवादी आ गए और उन्होंने उनकी छाती गोलियों से छलनी कर दीं। इस वारदात के साथ ही कश्मीरी पंडितों को यह अहसास करवा दिया गया था कि वहाँ पर अब निजाम ए मुस्तफा का राज ही चलेगा।

कश्मीरी लेखक राहुल पंडिता के अनुसार, जिस दिन पंडित टीका लाल को मारा गया, उस दिन उनके पिता उन्हें घर ले आए थे और उन्हें दो दिन तक स्कूल जाने नहीं दिया गया था। यानी साफ है कि आतंकी कश्मीरी पंडितों को जो संदेश देना चाहते थे, वो उन तक पहुँच गया था।

लेखक अपने एक लेख में कश्मीरी पंडितों की आपबीती लिखते हुए जिक्र करते हैं कि पंडित टीका लाल की हत्या के मात्र एक महीने बाद यानी 14 अक्टूबर को उनके पिता ने एक कार्यक्रम में शिरकत की थी, जहाँ से लौटने के बाद उन्होंने बताया कि कार्यक्रम में भीड़ नारे लगा रही थी:

यहाँ क्या चलेगा, निजाम ए मुस्तफा
ला शरकिया ला गरबिया, इस्लामिया इस्लामिया;

जलजला आया है कुफ्र के मैदान में 
लो मुजाहिद आ गए हैं मैदान में

मौजूदा जानकारी के अनुसार, पंडित टीका लाल पेशे से वकील थे, लेकिन शुरुआती समय से ही उनका जुड़ाव आरएसएस से था। इसके अलावा घटना के समय वह जम्मू कश्मीर में भाजपा उपाध्यक्ष भी थे। लोग उन्हें लालाजी यानी बड़ा भाई कहकर संबोधित करते थे। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से वकालत पढ़ने के बावजूद पंडित टपलू ने कभी अपनी पढ़ाई का इस्तेमाल पैसा कमाने के लिए नहीं किया था।

उन्होंने जो भी कमाया, सब विधवा औरतों और उनके बच्चों की पढ़ाई में ही खर्च किया। उन्होंने घाटी में रहते हुए कई मुस्लिम लड़कियों की भी शादी करवाई थी। उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि लोग जात-पात धर्म-मजहब से ऊपर उठ कर उनका सम्मान करते थे।

उनकी यही छवि अलगाववादियों के लिए गले में फँसी हड्डी जैसी थी, जिन्हें अपना अस्तित्व बचाने के लिए कश्मीरी पंडितों को हटाना था। लेकिन पंडित टीका लाल के जीवित रहते उन्हें यह काम असंभव लग रहा था।

कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, पंडित टीका लाल टपलू की मृत्यु के बाद काशीनाथ पंडिता ने कश्मीर टाइम्स में लेख लिख कर अलगाववादियों से पूछा था कि आखिर वह चाहते क्या हैं। जिसके जवाब में उन्होंने बताया था कि कश्मीरी पंडित भारत का समर्थन देना या तो बंद कर दें और अलगाववादी आंदोलन का साथ दें या कश्मीर छोड़ दें।

बता दें, जिस समय पंडित टीका लाल की हत्या को अंजाम दिया गया, उस दौरान जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट अपनी राजनैतिक पैठ बनाने की कोशिशों में जुटा हुआ था। उनकी अंतिम यात्रा के समय में जब केदार नाथ साहनी और लाल कृष्ण आडवाणी जैसे लोग हजारों कश्मीरी पंडितों के साथ श्रीनगर पहुँचे और घटना के विरोध में कश्मीरी हिंदू संगठनों ने बंद का आयोजन किया तो जेकेएलएफ ने आयोजन पर पत्थरबाजी भी करने की कोशिश की। हालाँकि वह अपने इरादों में सफल नहीं हो पाए। मगर, इन सबसे अलगाववादी इरादों की भनक कश्मीरी पंडितों को जरूर लग गई थी।

आज भाजपा नेता पंडित टीका लाल टपलू को उनके राष्ट्रवादी भावना और अदम्य साहस के लिए याद किया जाता है। कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार की बात जब-जब होती है, उसकी पृष्ठभूमि समझने के लिए पंडित टीका लाल की हत्या सबसे पहली घटना बन कर सामने आती है।

आज 14 सितंबर के मौके पर और उनकी निर्मम हत्या के 31 साल बीत जाने पर, अनुपम खेर लिखते हैं, “आज से 31 साल पहले 59 वर्षीय सोशल वर्कर श्री टीका लाल टपलू जी की आतंकवादियों द्वारा 14 सितंबर को श्रीनगर में हत्या कर दी गई थी। और यहाँ से शुरू हुआ था कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार का एक लंबा सिलसिला। ये घाव भले ही भर गए हो। लेकिन भूले नहीं हैं। और भूलने चाहिए भी नहीं।”

इसी तरह हरीश चंद्र लिखते हैं, “आज से 31 साल पहले 14 सितम्बर को सामाजिक कार्यकर्ता श्री टीका लाल टपलू की इस्लामी आतंकवादियों द्वारा श्रीनगर में हत्या करके कश्मीर को हिन्दूविहीन बनाने का जिहादी षड्यंत्र प्रारम्भ हुआ। कश्मीर के हिन्दुओं पर जिहादियों द्वारा किया गया अत्याचार भारत भूल नहीं सकता।”

हिन्दी केवल उत्तर भारत की नहीं: हिन्दी दिवस को हिन्दी बोलने वालों तक नहीं करें सीमित, न ही किया जाना चाहिए

14 सितंबर 1949 – जब संविधान सभा ने हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया। 14 सितंबर 1953 – जब से हिन्दी दिवस मनाने की शुरुआत हुई। हिन्दी के लिए असल मायनों में दो सबसे अहम मौके। ऐसी भाषा जो दुनिया की 5 सबसे ज्यादा बोली जाने वाली (देशी भाषा या बोलने-समझने लायक – दोनों स्तरों पर) भाषा में से एक है।

हिन्दी भाषा ने कालांतर में एक लंबी यात्रा तय की है और इस यात्रा में तमाम उतार-चढ़ाव थे। अनुमानित तौर पर हिन्दी भाषा में लगभग 7 लाख शब्द हैं और एक औसत व्यक्ति 50 हज़ार शब्दों तक सिमट कर रह जाता है। 

प्रेमचंद इकलौते ऐसे व्यक्ति थे, जिनकी शब्द संख्या 1.50 लाख तक पहुँची थी। इस आँकड़े का मतलब? मतलब हम भाषा को कितना कम समझते हैं या क़ायदे से आधा भी नहीं! भारतीय दर्शन में तो शब्दों का दर्जा बहुत बड़ा है, शब्दों को ब्रह्म तुल्य माना जाता है। यानी जितना सत्य है, शब्दों से हट कर कुछ नहीं! और शब्द कहाँ से आए? भाषा से! 

भाषा का अपना इतिहास है, विज्ञान है, अपनी एंथ्रोपोलॉजी (मानवशास्त्र) है। भाषा में सम्बोधन, भाव भंगिमाएँ, ध्वनि और संकेत हैं। बल्कि इसे कुछ यूँ कहा जाना चाहिए कि भाषा है तभी छंद है, अलंकार है, गद्य और पद्य है, अभिव्यक्ति और विचार है। हम भाषा अपने जन्म से ही समझना शुरू कर देते हैं, फिर पढ़ते हैं और वह जन्मांतर तक हमारे साथ रहती है। 

अंग्रेज़ी भाषा में एक कहावत है जो हिन्दी भाषा की चौखट पर सटीक बैठती है Language is an emotion of collectiveness (भाषा में एकीकरण की भावना है)। भाषा है, तभी विचार हैं और विचार हैं तभी अभिव्यक्ति है। सीधी सी बात है – ‘भाषा नहीं तो अभिव्यक्ति नहीं।’ कोई विचार प्रसारित होता है, तो वह भाषा की ही देन है। इस बात के आधार पर भाषा की प्रासंगिकता और उपयोगिता पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है। 

हम पूरी दुनिया में शायद इकलौते ऐसे देश हैं, जिसने हिन्दी भाषा को माता का दर्जा दिया है और यह कारण पर्याप्त है भाषा के लिए कट्टर बनने के लिए। माता के साथ स्नेह और सम्मान की भावनाएँ जुड़ी होती हैं और इन बातों से आज तक किसी भी तरह का समझौता नहीं हुआ है। एक यथार्थ यह भी है कि हम भले अपनी भाषा के लिए कितने कट्टर क्यों न बन जाएँ पर हिन्दी भाषा से ज़्यादा सहिष्णु भाषा भी कोई दूसरी नहीं है। 

अपनी यात्रा में हिन्दी भाषा ने सबसे ज़्यादा उतार-चढ़ाव देखे हैं लेकिन इसी भाषा ने सभ्यता को जन्म दिया। हिन्दी भाषा की वजह से ही सामाजिक और सामुदायिक सुधार हुए। भाषा के स्वरूप में बदलाव लाने का मतलब भाषा की आत्मा कुचलने जैसा है और जब आत्मा ही नहीं होगी तो एक लाश को कितना और कैसै सजाया जा सकता है।

किसी जानकार ने लिखा है कि ‘भाषा या तो कठिन है या फिर नहीं है’ और सच्चाई यही है कि भाषा की सुंदरता उसके असल स्वरूप में है। यही कारण है कि आज की तिथि में हिन्दी दुनिया की चौथी सबसे ज़्यादा उपयोग की जाने वाली भाषा है।  

शब्द शास्त्र में इसके लिए एक उक्ति है ‘उकतार्थानाम अप्रयोगः’ मायने, जिस अर्थ के लिए कोई शब्द या शब्दांश उपयोग होता है उसके लिए दोबारा कोई शब्द उपयोग नहीं किया जाएगा अन्यथा पुनरावृत्ति दोष होता है। हम कभी गौर नहीं करते लेकिन हिन्दी भाषा में विकल्प की कमी नहीं है। कालांतर में हमने ख़ुद से विकल्प सीमित किए हैं। हम कभी खोजने का प्रयास नहीं करते हैं कि सॉफ्टवेयर की हिन्दी क्रमानुदेश होती है और हार्डवेयर की धातु सामग्री। 

हिन्दी भाषा में आज भी ऐसे अनेक शब्द हैं, जो आम जनमानस से अपरिचित हैं। कभी एक आम वार्ता में कोई कहे अनुशीलन, उद्विग्न, आरूढ़, अलभ्य, आभ्यातारिक, परिस्फुट, नैराश्य। वार्ता में ऐसे किसी भी शब्द का उल्लेख करने से वहाँ स्थिति असामान्य हो जाती है लेकिन क्या वाकई ऐसा होना चाहिए? इस श्रेणी के शब्दों का उपयोग करने वालों को ‘टैबू’ की तरह देखा जाता है। ऐसी कोई अनिवार्यता भी नहीं है कि इनका इस्तेमाल होना ही चाहिए पर कम से कम इन्हें जानना और समझना तो आवश्यक है। 

इसलिए हरिशंकर परसाई ने लिखा है कि हिन्दी दिवस के दिन हिन्दी बोलने वाले हिन्दी बोलने वालों को कहते हैं कि हिन्दी में बोलना चाहिए। ऐसी हालात हमारे सामने कभी नहीं आनी चाहिए। हिन्दी का दायरा और महत्व केवल एक दिन तक सीमित नहीं किया जा सकता है और न ही किया जाना चाहिए। और हिन्दी के सम्बंध में दिया जाने वाला सबसे गलत तर्क है कि हिन्दी केवल उत्तर भारत की भाषा है। 

सच्चाई यह है कि तमिलनाडु के मन्दिरों में हिन्दी भाषी भजन बजते हैं। कोयम्बटूर में अच्छी भली हिन्दी बोलने-समझने वाली आबादी है। केरल के कई संस्थानों में हिन्दी अनिवार्य है। इतना ही नहीं, पूर्वोत्तर के ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहाँ पर्याप्त हिन्दी बोली जाती है। गुवाहाटी, शिलॉन्ग, चेरापूंजी, दार्जिलिंग, गैंगटोक और न जाने कितने क्षेत्र… जिनके बारे में हम जानते ही नहीं। 

हिन्दी भाषा में अच्छा लिखने वालों की सूची और भी लंबी है, हिन्दी भाषा ने बहुतों को बहुत कुछ दिया शायद इतना, जितना लौटाया नहीं जा सकता। इस भाषा ने सभ्यताओं को गढ़ा है और अब यह भावनाएँ गढ़ती हैं। छोटी कक्षाओं से लेकर भाषण के मंचों तक और नुक्कड़ पर होने वाली बहसों से लेकर पुस्तकों में उकेरे गए हर अहम शब्द तक। भाषा ने पीढ़ियों का बुनियादी ढाँचा सुधारा है और आने वाले समय में भी सुधारेगी, ज़रूरत है तो इसका सम्मान करने की और इसे समझने की।

‘कंगना रनौत को थप्पड़ नहीं मारा… शिवसैनिक महिलाओं की इज्जत करते हैं’ – अभिनेता नास्सर अब्दुल्ला

बॉलीवुड अभिनेता नास्सर अब्दुल्ला ने शिवसेना का समर्थन करते हुए कहा है कि महाराष्ट्र में तोड़फोड़ की घटनाएँ बालसाहब ठाकरे के समय से ही होती आ रही हैं। उन्होंने दावा किया कि जितने भी शिवसैनिक हैं, वो सभी महिलाओं की इज्जत करते हैं। उन्होंने कहा कि कंगना रनौत शिवसेना के साथ आततायी हो गईं और इसलिए उनका दफ्तर तोड़ा गया। बकौल नास्सर अब्दुल्ला, ये बात तो माननी पड़ेगी कि शिवसैनिकों ने कंगना रनौत के साथ हाथापाई नहीं की।

उन्होंने ये बातें ‘आजतक’ पर अंजना ओम कश्यप के साथ एक चर्चा में कही। अंजना ओम कश्यप ने उनसे पूछा कि क्या वो ये कहना चाहते हैं कि चूँकि कंगना रनौत महिला हैं, इसीलिए शिवसैनिकों ने उनकी पिटाई नहीं की और पूर्व-नौसेना अधिकारी मदन शर्मा पुरुष हैं, इसीलिए उन्हें पीट कर घायल कर दिया गया? नास्सर अब्दुल्ला ने कहा कि कंगना रनौत महिला हैं, इसीलिए उनके दफ्तर पर बुलडोजर चला दिया, उन्हें थप्पड़ नहीं मारा।

देखें वीडियो 32:00 के बाद (साभार: आजतक)

जहाँ तक नास्सर अब्दुल्ला की बात है, वो बॉलीवुड की कई फिल्मों में काम कर चुके हैं। उन्हें ‘आई एम ऑलवेज हियर (2004)’, ‘ओम शांति ओम (2007) और ‘गाँधी (1982)’ में काम करने के लिए जाना जाता है। उन्होंने 1992 में फिल्म ‘दिल आशना है’ से बॉलीवुड में डेब्यू किया था। इसके बाद उन्होंने 1995 में टीवी सीरियल ‘स्वाभिमान’ में काम किया। हालाँकि, पिछले 8 वर्षों से उन्हें फ़िल्में नहीं मिल रही हैं।

वो टीवी डिबेट्स में अजीब तरीके से हाथ हिला कर अंग्रेजी बोलने के लिए भी जाने जाते हैं। ज्ञात हो कि हाल ही में कंगना रनौत के दफ्तर में बीएमसी ने तोड़फोड़ मचाई थी। बीएमसी ने कंगना रनौत के पाली स्थित ऑफिस के एक हिस्से को अवैध निर्माण का हवाला देते हुए ध्वस्त कर दिया था। जब ये सब किया जा रहा था, तब उस वक्त बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत मनाली से मुंबई के लिए निकल चुकी थीं और रास्ते में थी। 

वहीं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का कार्टून शुक्रवार को सोशल मीडिया में फॉरवर्ड करने पर मुंबई में शिवसेना कार्यकर्ताओं ने सेवानिवृत्त नेवी ऑफिसर मदन शर्मा पर हमला बोल दिया था। इस हमले में पूर्व नेवी अधिकारी की आँख बुरी तरह जख्मी हो गई थी। बाद में पुलिस उल्टा उन्हें ही गिरफ्तार करने आई थी। लेकिन, वह अपने घर से बाहर ही नहीं निकले। इस मामले में आरोपितों को गिरफ्तार कर थाने से ही जमानत भी दे दी गई। 

सलमान खान ने कुत्ते को उठाया, झील में फेंका… और हँसते हुए वीडियो बनवाता रहा: FIR दर्ज, आरोपित फरार

भोपाल के श्यामा हिल्स पुलिस स्टेशन में सलमान खान नामक एक व्यक्ति के खिलाफ पशु क्रूरता का मामला दर्ज किया गया है। सलमान खान पर आरोप है कि उसने एक कुत्ते को अपर लेक में फेंक दिया और फिर उसका वीडियो बनवाता रहा। कुत्ते को झील में फेंकने वाला वीडियो वायरल होते ही भोपाल में आरोपित की गिरफ़्तारी की माँग होने लगी। सोशल मीडिया पर अन्य जगह के लोगों ने भी इस मामले में अपना विरोध दर्ज कराया।

ये वीडियो श्यामला हिल्स के पास अपर लेक में स्थित बोट क्लब के पास बनाए गए रेलिंग के पास शूट किया गया है। उक्त आरोपित कुत्ते को सबसे पहले अपने दोनों हाथों से उठाता है और फिर उसे झील में जोर से उछाल कर फेंक देता है। इसके बाद वो वीडियो में मुस्कुराता हुआ दिख रहा है। अभी तक पुलिस को ये नहीं पता चल सका है कि कुत्ते की मौत हो गई या फिर वो ज़िंदा है। वीडियो किसे शूट किया, इसका भी पता नहीं चला है।

आरोपित सलमान खान भोपाल के टीला जमालपुरा का रहने वाला है। वो फ़िलहाल फरार है। कहा जा रहा है कि सलमान खान के खिलाफ पहले से ही पशु क्रूरता का इतिहास रहा है और वो इससे पहले भी जानवरों के साथ इस तरह की हरकतें करता रहा है। रविवार की शाम आईपीसी की धारा-429 (किसी जीव-जन्तु का वध करने या उसे विकलांग करने आदि द्वारा कुचेष्टा) के तहत मांमला दर्ज किया गया है और उसकी तलाश जारी है।

साथ ही सलमान खान के खिलाफ ‘पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम’ के तहत भी कार्रवाई की जा रही है। श्यामा हिल्स की ही रहने वाले सुनीता जोशी ने उसके खिलाफ थाने में ममला दर्ज कराया। भोपाल के डीआईजी इरशाद वली ने बताया कि सलमान खान एक फोटो स्टूडियो में काम करता है और पुलिस ने उसकी पहचान कर ली है। पुलिस ने बताया कि घटना की तारीख और समय के बारे में पता नहीं चल सका है।

हालाँकि, भोपाल पुलिस ने सलमान द्वारा कुत्ते को झील में फेंकने वाले वीडियो को लेकर आरोपित के दोस्तों से पूछताछ की, जिन्होंने बताया कि ये घटना काफी पुरानी है। सोशल मीडिया पर भी लोग इस घटना को लेकर गुस्से का इजहार करते माँग कर रहे हैं कि आरोपित के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। अस्मा खान नामक एक छात्रा ने भोपाल के डीएम को इस मामले में ज्ञापन दिया। उन्होंने वीडियो शूट करने वाले के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की माँग की।

‘लद्दाख में क्रैश हुआ भारत का Mi-17’ – चीन की गोदी में खेल रहे पाकिस्तानी पत्रकार, फैला रहे फर्जी खबर

दुनिया के सामने भारत को कमजोर दिखाने के लिए पाकिस्तान अब सोशल मीडिया पर नए झूठ फैला रहा है। हाल ही में एक पाकिस्तानी पत्रकार ने एक तस्वीर को शेयर करके ये बताने की कोशिश की है कि भारत का ‘M-17’ लद्दाख में क्रैश हो गया है और इस संबंध में वह भारतीयों को जानकारियाँ देते रहेंगे।

ट्विटर पर पाकिस्तानी पत्रकार मुबाशेर लुकमान ने एक क्रैश विमान की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, “भारतीयों चेक करो, क्या यह तुम्हारा M 17 लद्दाख में क्रैश हो गया है। हम तुम्हें इससे जुड़ी जानकारियाँ देते रहेंगे।”

इसके बाद कई पाकिस्तानियों ने इस तस्वीर को धड़ल्ले से शेयर किया। इमरान खान की पीटीआई से जुड़ी डॉ फातिमा ने इस तस्वीर को शेयर करते हुए लिखा, “बस एक दरख्वास्त है!!! हमारे लिए भी कुछ राफेल्स रखे रखना।”

अब दिलचस्प बात यह है कि जिस तस्वीर को पाकिस्तानी पत्रकार, वहाँ की अवाम और पीटीआई से जुड़े लोग तक सोशल मीडिया पर खुशी-खुशी शेयर कर रहे हैं, वो तस्वीर वास्तविकता में साल 2018 की है।

जी हाँ, पाकिस्तानियों द्वारा शेयर की जा रही तस्वीर 3 अप्रैल 2018 को उत्तराखंड के केदारनाथ में हुई एक दुर्घटना की है। 3 अप्रैल 2018 की सुबह प्राकृतिक आपदा से हुए नुकसान की मरम्मत के लिए Mi-17 निर्माण कार्यों से जुड़ा सामान लेकर केदारनाथ मंदिर के पीछे बने वीआईपी हैलीपैड पर लैंडिंग करने जा रहा था। मगर, बीच में ही यह घटना हो गई और सुबह के 8 बजकर 10 मिनट पर वहाँ से वायुसेना का एमआई 17 क्रैश होने की खबर आई। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इस दुर्घटना के समय विमान में पायलट समेत 6 वायुसैनिक सवार थे। लेकिन राहत की बात यह थी कि इसमें कोई हताहत नहीं हुआ था।

अब यह तो साफ है कि शेयर की जा रही तस्वीर क्रैश हुए M-17 की ही है लेकिन पाकिस्तानी इसे जिस मकसद से लद्दाख में क्रैश हुआ बता रहे हैं, वह चीन की चाटुकारिता ही है। घटना न तो हाल फिलहाल की है और न ही लद्दाख की। इसलिए तस्वीर के साथ शेयर किए जा रहे कैप्शन से यही मालूम चलता है कि एक बार फिर झूठे दावों का इस्तेमाल करके पाकिस्तान अपना और चायनीज प्रोपेगेंडा फैलाना चाहता है।

हालाँकि, सोशल मीडिया पर भारतीय यूजर्स ऐसे प्रोपेगेंडा का मुँहतोड़ जवाब दे रहे हैं। शिव अरूर पाकिस्तानी पत्रकार के ट्वीट के रिप्लाई में लिखते हैं, “मुबाशेर, यह 2018 की तस्वीर है उत्तराखंड से। 55 लाख फॉलोवर्स के होते हुए भी तुम अपना पायजामा चायनीज को दे आए!”

इसी तरह अमन कश्यप घटना से संबंधित खबर का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखते हैं, “डियर पोर्की, कुछ सुधार। ladakh होता है न कि laddakh। mi 17 है न कि m17। तस्वीर उत्तराखंड की है न कि लद्दाख की। घटना साल 2018 की है न कि 2020 की।”