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दिल्ली हिन्दू-विरोधी दंगा: पूर्व JNU छात्र नेता उमर खालिद UAPA के तहत गिरफ्तार, जल्द फाइल होगी चार्जशीट

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद को गिरफ्तार कर लिया है। उमर खालिद को दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के मामले में यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया गया है। शनिवार (सितम्बर 12, 2020) को ही दिल्ली पुलिस ने उमर खालिद को समन दिया था और उन्हें लोधी कॉलनी स्थित स्पेशल सेल के ऑफिस में हाजिरी देकर जाँच में सहयोग करने को कहा गया था। इससे पहले जुलाई 31 को भी उनसे पूछताछ हो चुकी है।

उसी दिन उमर खालिद का मोबाइल फोन भी सीज कर लिया गया था। रविवार को वो दोपहर 1 बजे पूछताछ के लिए पहुँचे, जिसके बाद शाम को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। अब उन्हें सोमवार को दिल्ली की एक अदालत के समक्ष पेश किया जाएगा। आने वाले कुछ ही दिनों में दिल्ली पुलिस उनके खिलाफ चार्जशीट भी दायर करेगी। क्राइम ब्रांच के नारकोटिक्स यूनिट में तैनात सब-इंस्पेक्टर अरविन्द कुमार को मुखबिर से मिली सूचना के बाद मार्च 6 को उमर खालिद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।

मुखबिर ने पुलिस के सामने खुलासा किया था कि दिल्ली में हुआ हिन्दू-विरोधी दंगा पूर्व नियोजित साजिश के तहत हुआ था और इसमें उसके साथ दानिश सहित 2 अन्य साथी शामिल थे। ये सभी अलग-अलग संगठनों का हिस्सा थे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दिल्ली दौरे के समय अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने भारत में कथित अल्पसंख्यकों के प्रताड़ित होने का नैरेटिव बनाने के लिए उमर खालिद ने दो अलग-अलग जगहों पर भड़काऊ भाषण भी दिया था।

हालाँकि, उमर खालिद के वकील त्रिदीप पाइस ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ से बातचीत करते हुए बताया कि उनके क्लाइंट के खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह गलत, मनगढ़ंत और दबाव के कारण दर्ज किए गए हैं। सितम्बर 4 को किए गए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उमर खालिद ने कहा था कि देश में दो किस्म का क़ानून चल रहा है- एक सत्ताधारी पार्टी के समर्थकों के लिए और दूसरा आम लोगों के लिए, जिनके खिलाफ झूठे सबूत बनाए जाते हैं।

ताहिर हुसैन ने पूछताछ के दौरान बताया था कि उसने 8 जनवरी को ही सीएए विरोधी प्रदर्शन स्थल शाहीनबाग में खालिद सैफी (India Against Hate Group) और उमर खालिद (JNU) के साथ मिलकर इस दंगे की योजना बना ली थी। उसने कबूला था कि वो और भी कई सीएए विरोधी प्रदर्शन के आयोजकों से संपर्क में था। इस कबूलनामे में उमर खालिद का नाम आने के साथ ही दिल्ली पुलिस ने उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी थी।

गलवान में 60 से ज्यादा चीनी सैनिक मारे गए थे, निर्भीक हुई है भारतीय सेना: अमेरिकी समाचार पत्र का दावा

अमेरिकी समाचार पत्र ‘न्यूज़वीक’ ने खुलासा किया है कि 15 जून को सीमा पर हुई भारत और चीनी सैनिकों की हिंसक झड़प में चीन के 60 से ज्यादा सैनिक मारे गए थे। साथ ही, यह बात भी सामने आई है कि भारतीय क्षेत्र में इन आक्रामक गतिविधियों के पीछे खुद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के आदेश थे, लेकिन उनकी सेना को मात कहानी पड़ी।

’60 से अधिक चीनी सैनिक मारे गए थे’

इस लेख के अनुसार, “विवादित इलाकों में घुसपैठ करना बीजिंग की पुरानी आदत है। वहीं, 1962 की हार से भारतीय नेता और जवान मानसिक रूप से लकवाग्रस्त हो चुके हैं और इसलिए वे सीमा पर सुरक्षात्मक रहते हैं। हालाँकि, गलवान घाटी में ऐसा नहीं हुआ। इस झड़प में चीन के 43 जवानों की मौत हुई। वहीं, पास्कल ने बताया कि यह आँकड़ा 60 से अधिक हो सकता है। भारतीय जवान बहादुरी से लड़े। दूसरी तरफ, चीन ने खुद को हुए नुकसान को नहीं बताया है।”

जिनपिंग के राष्ट्रपति बनने के बाद सीमावाद बढ़ा

‘न्यूजवीक’ के अनुसार, “चीन अपनी विफलता से और अधिक परेशान हो गया है, जिसका विपरीत प्रभाव हो सकता है। हार से परेशान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत के खिलाफ बड़ा कदम उठाने के लिए तैयार हैं। इससे निकट भविष्य में सीमा पर और अधिक तनाव पैदा हो सकता है।”

न्यूज़वीक की इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नवंबर, 2012 में जब से शी जिनपिंग चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने हैं तभी से भारत से लगी सीमा पर चीनी सैनिकों की आक्रामकता बढ़ गई है। जिनपिंग CPC केंद्रीय सैन्य आयोग के अध्यक्ष और पार्टी के महासचिव भी हैं। अमेरिकी समाचार पत्र के अनुसार, भारत और चीन के बीच सीमा का सीमांकन नहीं किया गया है, इसलिए चीनी सैनिक घुसपैठ करने के लिए इसका फायदा उठाते हैं।

अमेरिकी अखबार की इस रिपोर्ट में दोनों पक्षों (भारत-चीन) पर एक-दूसरे पर दशकों पुराने नियम के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है। रिपोर्ट में लिखा है कि भारत के सैनिक निर्भिकता के नए मानकों का प्रदर्शन कर रहे हैं।

रूस ने चीनी गतिविधियों को लेकर भारत को किया था आगाह

‘न्यूज़वीक’ ने लिखा है कि रूस ने मई माह में ही चीन की हरकतों के बारे में भारत को आगाह किया था और चीन तिब्बत के इलाके में पहले से ही युद्धाभ्यास कर रहा था। इसमें कहा गया है कि ‘फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसी’ के क्लियो पास्कल के हवाले से, रूस ने भारत को मई में चीन की हरकतों के बारे में चेतावनी दी थी। इस अखबार ने आबादी के हिसाब से दुनिया के दो सबसे बड़े देशों में 45 साल में हुई यह पहली झड़प बताई है।

वर्तमान हालात यह हैं कि भारत के जवाबी हमलों से चीन के हौंसले पस्त हैं और अब पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे पर फिंगर-4 से फिंगर-8 तक के इलाकों में चीनी सैनिक मौजूद हैं। लेकिन 29-30 अगस्त के बाद कई ऊँची चोटियों पर भारतीय सेना के नियंत्रण के बाद चीन की चिंता बढ़ चुकी हैं।

न्यूज़वीक के मुताबिक, ‘फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसी’ के क्लियो पास्कल का मानना है कि खेल बदल गया है और भारत इन आक्रमणकारियों को अब बढ़त लेने का अवसर नहीं दे रहा है और ऐसा प्रतीत होता है कि भारत के सैनिक ‘नएपन’ का निर्भीक प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय अधिक आक्रामक या अधिक आक्रामक रूप से रक्षात्मक हो गए हैं, लेकिन वे वास्तव में निर्भीक और बेहतर हैं।

उल्लेखनीय है कि 15 जून की इस झड़प में चीन ने अपने सैनिकों की वास्तविक जानकारी देने से मना कर दिया था, जबकि यह बात सामने आई थी कि 45 से अधिक चीन सैनिक हताहत हुए थे।

मुरादाबाद: कॉन्ग्रेस महानगर अध्यक्ष हाजी रिजवान सहित 5 पर महिला के घर में घुस छेड़खानी और मारपीट को लेकर FIR

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में कॉन्ग्रेस नेता की दबंगई सामने आई है। पुलिस ने कॉन्ग्रेस महानगर अध्यक्ष रिजवान कुरैशी समेत 5 लोगों पर घर में घुसकर महिला के साथ छेड़खानी, मारपीट और जान से मारने की धमकी देने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया है।

पीड़ित महिला ने आरोप लगाया कि आरोपित हाजी रिजवान कुरैशी का कॉन्ग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों से अच्छे संबंध है। इसी बात का फायदा उठाकर वह बिना डरे गुंडागर्दी करता है। बता दें, कुरैशी समाजवादी पार्टी के देहात विधायक हाजी इकराम का भतीजा है।

पीड़िता का आरोप है कि उनके घर के नीचे बनी दुकान को फरहान क़ुरैशी नाम के व्यक्ति ने किराए पर ले रखा है। जहाँ वह कबाब बेचता है। 26 अगस्त को उसने घर में दुकान से आ रहे ज्यादा धुएँ पर आपत्ति जताई तो फरहान क़ुरैशी ने अपने भाई फैसल, रफीक व कॉन्ग्रेस नेता हाजी रिजवान कुरैशी व दो-तीन अन्य लोगो को बुला लिया। ये लोग उसके घर में घुस गए और उनके साथ गाली-गलौच करते हुए अश्लील हरकतें की। कपड़े भी फाड़ दिए और मारपीट की। साथ ही जान से मारने की धमकी देने लगे।

महिला ने बताया कि वह कॉन्ग्रेस नेता हाजी रिजवान को अच्छे से जानती है। उन्होंने भी कोई कसर नहीं छोड़ा और खुली धमकी भी दी कि पुलिस हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती जो करना है कर लो। पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया है कि सभी आरोपितों के पास हथियार भी थे। इन लोगों के हंगामे की वजह से लोग जमा होने लगे। इसके बाद जान से मारने की धमकी देते हुए आरोपित भाग गए।

वहीं इस मामले में कॉन्ग्रेस के जिला अध्यक्ष ने महानगर अध्यक्ष कुरैशी का बचाव करते हुए उन्हें बेकसूर बताया है। जिला अध्यक्ष विनोद गुम्बर ने पूरी घटना को फर्जी बताया है। पीड़ित महिला ने बताया इस मामले में मुरादाबाद की थाना गलशहीद पुलिस ने 3 सितम्बर को ही कॉन्ग्रेस महानगर अध्यक्ष हाजी रिजवान क़ुरैशी, रफीक, फरहान, फैसल सहित एक अज्ञात के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर लिया है। लेकिन पुलिस की और से अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। सभी आरोपित फिलहाल फरार है।

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने ट्विटर पर जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल किया, यूजर्स ने घेरा

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने रविवार को एक ट्वीट में जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल किया। इसकी वजह से उन्हें सोशल मीडिया में कड़ी प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ा और आखिर में उन्होंने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया।

Jaiveer Shergill’s tweet

शेरगिल ने एक तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा, “हमारे पंजाब में टॉप तीन ड्राइविंग नियम!!” इसमें उन्होंने क@** शब्द का इस्तेमाल किया जो अत्यधिक अपमानजनक है। यह शब्द अक्सर अनुसूचित जाति के लोगों के लिए गाली के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

इसके तुरंत बाद सोशल मीडिया यूज़र्स ने बवाल खड़ा कर दिया। इस तरह के मजाक को साझा करने की वजह पूछी। एक यूजर ने कहा कि कॉन्ग्रेस नेताओं से कुछ भी अच्छा करने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

वहीं एक अन्य यूजर ने उन्हें सर्वोच्च न्यायालय के वकील और राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ता के रूप में बिना विचार किए और बिना सोचे जातिवादी मजाक को साझा करने के लिए जमकर लताड़ा। शेरगिल ने आलोचनाओं के बाद ट्वीट तो डिलीट कर दिया, लेकिन उन्होंने जातिसूचक गाली का इस्तेमाल करने के लिए अभी तक कोई माफी नहीं माँगी है।

किसानों को ₹25 हजार करोड़, ₹1.63 लाख करोड़ MSME के लिए: PM मोदी के आत्मनिर्भर पैकेज का रिपोर्ट कार्ड

केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने रविवार (सितम्बर 13, 2020) को कोरोना काल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मई में घोषित किए गए 20 लाख करोड़ रुपए के आत्मनिर्भर भारत पैकेज के तहत कई योजनाओं की प्रगति पर रिपोर्ट पेश की। वित्‍त मंत्रालय ने आत्‍मनिर्भर भारत अभियान के तहत की गई घोषणाओं पर तुरंत अमल करते हुए इस अभियान के तहत किए जाने वाले कामों की निगरानी और नियमित समीक्षा भी शुरू कर दी है।

मंत्रालय ने कहा कि आत्मनिर्भर भारत पैकेज के तहत नाबार्ड के माध्यम से किसानों के लिए अतिरिक्त इमरजेंसी वर्किंग कैपिटल फंडिंग के आवंटित 30,000 करोड़ रुपए में से 25,000 करोड़ रुपए का वितरण किया गया है। शेष विशेष लिक्विडिटी सुविधा (एसएलएफ) के तहत 5,000 करोड़ रुपए की राशि को छोटे एनबीएफसी और एनबीएफसी-एमएफआई के लिए आरबीआई द्वारा नाबार्ड को आवंटित किया गया है। नाबार्ड इसे जल्द ही शुरू करने के लिए परिचालन दिशा-निर्देशों को अंतिम रूप दे रहा है।

वहीं, नाबार्ड ने ऋणदाताओं से क्रेडिट प्राप्त करने के लिए अनारक्षित गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों (NBFC) और माइक्रो फाइनेंस इंस्टीट्यूशंस (MFI) की सहायता के लिए दो एजेंसियों और बैंकों के सहयोग से संरचित वित्त और आंशिक गारंटी योजना भी शुरू की है। बैंक ने दो एजेंसियों और बैंकों के साथ भी सहयोग किया था, जिसमें ऐसे छोटे एमएफआई के लिए ऋण पात्रता को पाँच-छह गुना बढ़ाया जाएगा।

मंत्रालय ने कहा कि इस योजना के लिए 500 करोड़ रुपए के बाद उन छोटे एनबीएफसी-एफआईआई द्वारा 2500 से 3000 करोड़ रुपए की क्रेडिट परिकल्पना की गई है, जो ‘गेम-चेंजर’ साबित होंगे।

वित्त मंत्रालय ने कहा कि 28 अगस्त को बैंकों ने 25,055.5 करोड़ रुपए के पोर्टफोलियो की खरीद को मँजूरी दे दी है और वर्तमान में एनबीएफसी, एचएफसी और एमएफआई के लिए 45,000 करोड़ रुपए की आंशिक क्रेडिट गारंटी योजना 2.0 के तहत अतिरिक्त 4,367 करोड़ रुपए की मँजूरी की प्रक्रिया में है।

नाबार्ड के जरिए किसानों को दिए 30,000 करोड़ रुपए

अब तक नाबार्ड (NABARD) के जरिए कृषि कार्यों के लिए किसानों को 30,000 करोड़ रुपए बाँटे जा चुके हैं। इसके तहत 28 अगस्‍त तक किसानों को 25,000 करोड़ रुपए दिए गए। मंत्रालय ने कहा कि ‘SBICAP’ (एसबीआई कैपिटल मार्केट्स) को एनबीएफसी, एचएफसी, एमएफआई को उधार देने के लिए 30,000 करोड़ रुपए की विशेष तरलता योजना लागू करने के लिए एक एसपीवी स्थापित करने का काम सौंपा गया था।

‘स्‍पेशल लिक्विडिटी स्‍कीम’ के तहत 37 प्रस्‍ताव मँजूर

सितंबर 11, 2020 तक 10590 करोड़ रुपए की राशि वाले 37 प्रस्तावों को मँजूरी दी गई है। 783.5 करोड़ रुपए के वित्तपोषण के लिए 06 आवेदन प्रक्रियाधीन हैं।

10 सितंबर तक 23 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और शीर्ष निजी बैंक 42,01,576 कर्जदारों को 1.63 लाख करोड़ रुपए का कर्ज दे चुके हैं। वित्त मंत्रालय द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि 10 सितंबर को 1.18 लाख करोड़ रुपए 25,01,999 कर्जदारों को दिए जा चुके हैं।

गौरतलब है कि केंद्र ने मई 2020 में 20 लाख करोड़ रुपए के प्रोत्‍साहन पैकेज की घोषणा करते हुए अर्थव्‍यवस्‍था, इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर, सिस्‍टम, वायब्रेंट डेमोग्राफी और उपभोक्‍ता माँग को ‘आत्‍मनिर्भर भारत’ के ‘5 स्‍तंभ’ बताया था। इसके बाद सरकार ने किसानों से लेकर गैर-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (NBFCs) और करदाताओं (Taxpayers) से लेकर छोटे कारोबार चलाने वाली महिलाओं तक की आर्थिक मदद की।

‘काफिर, काफिर, शिया काफिर’: पाकिस्तान में शिया दुकानदार को सरेआम मारी गोली, Video वायरल

सुन्नी बहुल पाकिस्तान में शिया-विरोधी हमलों में काफी वृद्धि हुई है। 6 सितंबर को पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रांत के कोहाट शहर में एक दुकानदार को अज्ञात बदमाश ने सरेआम गोली मार दी।

मृतक की पहचान क़ैसर अब्बास के रूप में की गई है। वह शिया समुदाय से था। सोशल मीडिया पर वायरल हुए सीसीटीवी फुटेज में एक हमलावर दुकान में घुसता है और अब्बास पर पॉइंट-ब्लैंक रेंज के बंदूक से फायर करता है। गोली लगने से वह अपनी कुर्सी से गिर जाता है। वहीं दुकान के बाहर मौजूद ग्राहक भागते हुए दिखाई दे रहे है।

बता दें, अभी तक किसी भी समूह ने इसकी जिम्मेदारी नहीं ली है। हत्या के पीछे स्थानीय देवबंदी प्रायोजित आतंकवादी संगठनों की भूमिका संदिग्ध है। मृतक की तस्वीर सामने आई है। जिसमें उसका शव स्ट्रेचर पर खून से लथपथ दिखाई दे रहा है। इंटरनेट पर यह तस्वीर काफी वायरल भी हो रही है।

मृतक क़ैसर अब्बास (फ़ोटो साभार: Twitter/ Hanif Abbas)

गौरतलब है कि शुक्रवार को हज़ारों की तादाद में सुन्नी कट्टरपंथी समूहों ने कराची की सड़कों पर शिया विरोधी आन्दोलन किया। इस्लाम के दो वर्गों के बीच इतने बड़े पैमाने पर तनाव पैदा होने पर हिंसा की घटनाओं का ख़तरा भी बढ़ गया था। हाल ही पाकिस्तानी शिया नेता ने कथित तौर पर मुहर्रम जुलूस के सीधे प्रसारण के दौरान ऐतिहासिक इस्लामिक चेहरों पर अनैतिक टिप्पणी की थी। इस टिप्पणी के चलते उस शिया नेता पर ईशनिंदा का आरोप लगा था जिसके विरोध में सुन्नी समुदाय के हज़ारों लोग सड़कों पर उतरे थे।

विरोध प्रदर्शन मोहम्मद अली जिन्नाह की मज़ार ‘मज़ार-ए -कायद’ के पास शुरू हुआ था। इस विरोध प्रदर्शन में शामिल होने वाले कट्टरपंथी सुन्नी तमाम शिया विरोधी समूहों से जुड़े हुए थे। इसमें सिपाह-ए-सहाबा और तहरीक लब्बाइक पाकिस्तान मुख्य थे। यह सभी समूह शिया समुदाय के लोगों को काफ़िर मानते हैं। ख़बरों की मानें तो सिपाह-ए-सहाबा ने पिछले कुछ समय में पाकिस्तान के भीतर सैकड़ों शिया समुदाय वालों की हत्या की थी।

इन विरोध प्रदर्शनों के तमाम वीडियो भी सामने आए हैं। ऐसे ही एक वीडियो में सुन्नी कट्टरपंथी बसों को रोकते हुए, झंडे फहराते हुए और शिया विरोधी नारे लगाते हुए देखे जा सकते हैं। लगाए गए तमाम नारों में एक नारा था ‘काफ़िर काफ़िर शिया काफ़िर।’

7 साल पहले आज ही के दिन BJP ने लिया था वह फैसला, जिसने कॉन्ग्रेस के अस्तित्व को हिला कर रख दिया

2014 लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले (13 सितंबर, 2013) भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। उनके साथ गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी थे।

प्रेस वार्ता में यह घोषणा की गई कि नरेंद्र मोदी आगामी चुनावों में भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री का चेहरा होंगे। कयास लगाए जा रहे थे कि फिर से लालकृष्ण आडवाणी पीएम का चेहरा होंगे। बहुतों ने यह भी सोचा था कि सुषमा स्वराज या अरुण जेटली भी पीएम का चेहरा हो सकते है, क्योंकि मोदी को मीडिया ने 2002 के गुजरात दंगों की अगुवाई करने वाले व्यक्ति के तौर पर पेश किया था। जबकि इस तथ्य पर किसी ने ध्यान नहीं दिया कि उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल के 12 वर्षों में गुजरात काफी हद तक शांतिपूर्ण रहा था।

मैंने उस वक्त के ट्वीट्स को देखा जिसमें राणा अय्यूब और राजदीप सरदेसाई ने भाजपा की तरफ से नरेंद्र मोदी को पीएम चेहरे के लिए चुनने पर जमकर हमला किया था। उस दौरान वे नरेंद्र मोदी को काफी हल्के में ले रहे थे।

उन लोगों ने उनके US वीजा स्टेटस का मजाक भी उड़ाया।

आप देखें, किसी ने वास्तव में नहीं सोचा था कि साबरमती के किनारे से यह आदमी भाजपा का यह सपना पूरा करेगा। मीडिया की धारणा उनके खिलाफ थी। विपक्षी नेताओं द्वारा उन्हें ‘मौत का सौदागर’ कहा जाता था। उनके अपने सहयोगी इस बात से बहुत खुश नहीं थे और उन्होंने इसे बहुतायत स्पष्ट भी कर दिया था। जून 2013 में जब मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होने की चर्चाएँ तेज हो रही थीं, तब जदयू के नीतीश कुमार ने 17 साल पुराने एनडीए गठबंधन को तोड़ दिया था।

उन्होंने पीएम मोदी के लिए अपनी ‘नापसंदगी’ को काफी हद तक स्पष्ट कर दिया था। नीतीश कुमार ने 2010 में मोदी सहित कई भाजपा नेताओं के लिए एक पूर्व निर्धारित रात के भोजन के कार्यक्रम को भी रद्द कर दिया था। वहीं दो साल पहले 2008 में, उन्होंने नरेंद्र मोदी की अगुवाई में गुजरात सरकार द्वारा दिए गए 5 करोड़ रुपए को भी लौटा दिया था जो बिहार को बाढ़ राहत के लिए मिला था। उन्होंने इसे ब्याज के साथ वापस किया था।

गौरतलब है कि भाजपा पूरे पाँच साल के लिए सिर्फ एक बार ही सत्ता में आई थी। वहीं मोदी को पीएम उम्मीदवार के रूप में प्रचारित कर भाजपा एक बहुत ही बड़ा जोखिम मोल ले रही थी, जब उनकी खुद की पार्टी के सहयोगी इस बात से नाराज चल रहे थे। इसके अलावा वे कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए को भी चुनौती दे रहे थे जिसके पास तीसरी बार सत्ता में आने के लिए पूरा इकोसिस्टम साथ खड़ा था।

गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, नरेंद्र मोदी ने वाइब्रेंट गुजरात नामक द्विवार्षिक शिखर सम्मेलन शुरू किया था। एक वरिष्ठ पत्रकार ने एक बार मुझसे कहा था कि 2002 के दंगों के ठीक बाद मोदी ने गुजरात में परिवर्तन लाने का फैसला किया था। उन्होंने मन बना लिया था कि जब लोग गुजरात के बारे में सोचेंगे तो वे प्रगति के बारे में सोचेंगे। पहला वाइब्रेंट गुजरात शिखर सम्मेलन नवरात्रि के दौरान 2003 में आयोजित किया गया था, जो नौ-रात्रि लंबा नृत्य महोत्सव था।

उससे पहले मोदी ने विभिन्न मीडिया हाउस के संपादकों और पत्रकारों को बुलाया और उन्हें अपने विजन पर एक पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन दिया। एक पत्रकार ने मुझे बताया 2002 के दंगों के दौरान भड़काऊ खबरों को प्रसारित करने वाले गुजरात समाचार संपादक श्रेयांश शाह भी उसमें मौजूद थे। उन्होंने मुझे बताया कि शाह प्रस्तुति के बीच में ही बाहर चले गए थे। जाहिर तौर पर उन्हें वो सब पसंद नहीं आया होगा। इसके बाद गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उन्हें खुद रोका और वापस आने के लिए कहा। लेकिन शाह फिर भी नहीं माने।

यह तब था जब मोदी ने यह परवाह करना छोड़ दिया था कि मीडिया उनके बारे में क्या कहती है। उन्होंने इस बात का फैसला किया था कि उनके द्वारा किए गए काम को बोलने दो।

अगला शिखर सम्मेलन जनवरी 2015 के लिए निर्धारित किया गया था। नरेंद्र मोदी ने इस अवसर का भरपूर फायदा उठाया। उन्होंने हरित ऊर्जा, स्वच्छ तकनीक, शिक्षा, कृषि, सूचना प्रौद्योगिकी जैसे विभिन्न विषयों पर ‘वाइब्रेंट गुजरात प्री-इवेंट समिट्स’ की एक श्रृंखला की।

जिन लोगों ने 2003 में शिखर सम्मेलन को खारिज कर दिया था। वहीं लोग उसके शुरुआत से पहले ही उसको फ्रंट पेज पर प्रकाशित कर रहे थे। उन्होंने न केवल देश को यह बताया कि एक सीएम होते हुए उन्होंने सबसे उद्यमी राज्य में क्या-क्या किया। बल्कि यह भी कि जो वादा उन्होंने किया उसे पूरा भी किया। वह जानते थे कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था नीतिगत पक्षाघात के कारण फँस गई है। उन्होंने सुनिश्चित किया कि हर कोई इसके बारे में जाने।

लेकिन इस बात की उम्मीद कम थी कि बीजेपी के पास वास्तव में एक मौका हो सकता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चरम पर था। लोग कॉन्ग्रेस से नाराज थे। लेकिन क्या उनकी नाराजगी भाजपा को बहुमत देने देने के लिए पर्याप्त थे? क्या लोग 2002 के दंगों के बाद मोदी को वोट देने के लिए घटनाओं और मनगढ़ंत कहानियों को नजरअंदाज करने के इच्छुक थे? क्या भाजपा के लिए तर्कसंगत नेता को पीएम चेहरे के रूप में चुनना बुद्धिमानी होगी? क्या ‘त्रिशंकु संसद’ होगी और भाजपा को 5 साल की स्थिर सरकार के लिए सहयोगियों पर निर्भर रहना होगा? सच कहूँ, तो मुझे यकीन नहीं था।

14 मई, 2014 में मोदी के साथ राजनाथ सिंह, अरुण जेटली और नितिन गडकरी

यह तस्वीर मतगणना से 2 दिन पहले की है। भारत ने तय किया था। मोदी की बॉडी लैंग्वेज से यह लगता कि उन्हें यकीन था कि वह दिल्ली आ रहे हैं।

भाजपा ने रिस्क लिया। मोदी जीते और कैसे। सिर्फ एक बार नहीं। उन्होंने न केवल इतिहास दोहराया, बल्कि 2019 में मजबूत जनादेश के साथ वापसी करते हुए सत्ता में अपनी पकड़ को स्थापित किया।

राजनाथ सिंह की उस घोषणा ने पार्टी के इतिहास को बदल दिया। पार्टी को मजबूती के साथ हर वर्ष एक नई उम्मीद और पहचान बनाने का मौका दिया।

शिवसेना के ‘अन्यायपूर्ण व्यवहार’ के बारे में राज्यपाल को बताकर कंगना ने कहा- लड़कियों को न्याय मिलेगा तो व्यवस्था में यकीन होगा

बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत ने रविवार (सितम्बर 13, 2020) को महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुलाकात कर उन्हें राज्य की सत्ताधारी शिवसेना द्वारा अपने साथ किए ‘अन्यायपूर्ण व्यवहार’ के बारे में बताया। कंगना रनौत ने अपनी बहन रंगोली चंदेल के साथ महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से राजभवन में मुलाकात की।

कंगना रनौत ने इस मुलाकात के बाद कहा, “मैंने उनसे अपने साथ हुए अन्यायपूर्ण व्यवहार के बारे में बताया। मुझे उम्मीद है कि मुझे न्याय मिलेगा, ताकि युवा लड़कियों सहित सभी नागरिकों का विश्वास व्यवस्था में बहाल हो। मैं सौभाग्यशाली हूँ कि राज्यपाल ने अपनी बेटी की तरह मेरी बात सुनी।”

इससे पहले, राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने भी बीएमसी की कार्रवाई पर नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने इसे लेकर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के प्रमुख एडवाइजर अजॉय मेहता को तलब कर सीएम के इस ‘बेतुके सलूक’ पर अपनी नाराजगी जाहिर की थी।

33 वर्षीय अभिनेत्री ने आरोप लगाया है कि दिवंगत बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जाँच के संबंध में उनके एक ट्वीट में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के साथ मुंबई की तुलना करने के बाद शिवसेना नेताओं से धमकी मिली, जिसके बाद उन्हें वाई प्लस सुरक्षा प्रदान की गई।

कंगना रनौत और शिवसेना के बीच चली इस बहस के बाद मुंबई के पाली हिल में स्थित कंगना रनौत के ऑफिस को अवैध तरीके से बना हुआ बताकर बीएमसी ने बीते बुधवार को तोड़फोड़ की थी।

हालाँकि, कंगना ने तोड़फोड़ रोकने के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट से स्टे ले लिया, लेकिन बीएमसी इससे पहले ही उनका काफी नुकसान कर चुकी थी। बॉम्बे हाईकोर्ट भी बीएमसी की इस कार्रवाई को गलत तरीके से की गई कार्रवाई बता चुकी है।

गौरतलब है कि कंगना रनौत गत 9 सितंबर को मुंबई पहुँची, जिस दिन बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) ने शहर में उनके कार्यालय के कथित अवैध रूप से बनाए गए हिस्सों को तोड़ दिया था। कंगना रनौत 14 सितंबर को अपने गृह नगर मनाली, हिमाचल प्रदेश के लिए रवाना होंगी।

‘तलवार बाबा’ बन लड़कियों पर अत्याचार करता था महबूब कुरैशी, वीडियो वायरल होने के बाद से फरार

जहाजपुर, भीलवाड़ा से सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें सर पर टोपी और माथे पर लाल रंग की पट्टी बाँधे दिख रहा एक व्यक्ति लोगों को भूत-प्रेत और पिशाचों से मुक्त करने का दावा कर रहा है। इस वीडियो में भूत-प्रेत उतारने के नाम पर ये व्यक्ति हाथ में तलवार लेकर लड़की को घसीटता हुआ नजर आ रहा है।

‘तलवार बाबा’ नाम का यह व्यक्ति लड़की के माता-पिता के ही सामने तलवार लिए कभी उसे पाँव से कुचलता है तो कभी बालों को खींचकर घसीटकर कमरे के अंदर-बाहर ले जाता है। जबकि, इस दौरान पूरे वीडियो में लड़की दर्द से चिल्ला रही है। यह सब उसे भूत-प्रेत से मुक्ति दिलाने के नाम पर किया जा रहा है।

इस वीडियो में सबसे बड़ा भ्रम यह फैलाया जा रहा है कि ‘तलवार बाबा’ नाम का यह व्यक्ति एक हिन्दू ओझा या तांत्रिक है। जबकि, तरह-तरह की यातनाएँ देने वाला ‘तलवार बाबा’ वास्तव में समुदाय विशेष का एक व्यक्ति है और इसका असली नाम महबूब कुरैशी है। ये पाँच मिनट का दिल दहलाने वाला वीडियो भ्रामक तथ्यों के साथ सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है।

जहाजपुर पुलिस थाना प्रभारी हरीश सांखला ने बताया कि क्षेत्र में सोशल मीडिया पर तेजी से एक वीडियो वायरल हुआ। इस वीडियो में एक बाबा भूत-प्रेत भागने के नाम पर किशोरी के साथ अमानवीय घटनाओं को अंजाम देता हुआ नजर आ रहा था।

यह घटना जहाजपुर कस्बे में चमन चौराहे की बताई जा रही है। इस वीडियो के वायरल होने के बाद प्रशासन हरकत में दिखाई दे रहा है और महबूब कुरैशी की तलाश में जुटा है। पुलिस जाँच में सामने आया कि वीडियो में जिस शख्स के दिखाई देने का दावा किया जा रहा है वो जहाजपुर छोड़ के भीलवाड़ा शहर की कावाखेड़ा कच्ची बस्ती में किराए के मकान में रह रहा है। बताया जा रहा है कि महबूब कुरैशी पिछले 3 दिनों से फरार है और उसका मोबाइल फोन भी बन्द आ रहा है। पुलिस द्वारा उसे गिरफ्तार करने के लिए टीम भेज दी गई हैं।

@BefittingFacts नाम के ट्विटर अकाउंट ने ट्विटर पर इसका वीडियो शेयर करते हुए लिखा है, “महबूब कुरैशी उर्फ़ तलवार बाबा, भूत भगाने के बहाने लड़कियों को पैर से कुचलता था और बाल पकड़ के घसीटता था।”

अन्ना हजारे RSS की साजिश, कश्मीर में हो जनमत-संग्रह (Pak भी यही चाहता है): भूषण बाप-बेटे संग राजदीप सरदेसाई का इंटरव्यू

शनिवार 12 सितंबर 2020 को प्रशांत भूषण और उनके पिता शांति भूषण ने इंडिया टुडे को एक साक्षात्कार दिया। साक्षात्कार में उन्होंने कश्मीर मुद्दे पर कई विचार रखे। इसके अलावा इंडिया अगेंस्ट करप्शन, इंदिरा गाँधी, नरेन्द्र मोदी और अरविन्द केजरीवाल के संबंध में कई बातें कही। 

बात करते हुए प्रशांत भूषण ने कहा,

“मुझे एक बात का सबसे ज्यादा अफ़सोस है कि मैं अरविन्द केजरीवाल का चरित्र नहीं समझ पाया। समय बीतने के बाद समझ आया कि हमने एक भयावह राजनीतिक दैत्य तैयार किया है, जबकि एक ज़माने में मैं अरविन्द का प्रशंसक हुआ करता था। अरविन्द केजरीवाल की हरकतों के लिए मेरा रवैया कभी आलोचनात्मक नहीं रहा। लोकसभा चुनावों के बाद पूरी तस्वीर साफ़ हो गई। वह केवल बेशर्म और तानाशाह ही नहीं है बल्कि अपने दल की नीतियों पर भी खरा नहीं उतरता है।” 

प्रशांत भूषण ने यह जानकारी दी कि कुल 36 जानकारों की समिति ने पार्टी के लिए नीतियाँ तैयार की थीं। अरविन्द केजरीवाल की तैयारी थी कि उन सारी नीतियों को एक बार में ख़त्म कर दिया जाए। अरविन्द केजरीवाल ने हमेशा जितने भी निर्णय लिए, सिद्धांतों के आधार पर नहीं लिए बल्कि अपनी सुविधा के अनुसार लिए। इतना ही नहीं, अरविन्द केजरीवाल ने इंडिया अगेंस्ट करप्शन अभियान को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा का साथ भी दिया था। 

इसके बाद राजदीप सरदेसाई ने कश्मीर मुद्दे पर सवाल किया। इस सवाल का जवाब देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण (प्रशांत भूषण के पिता) ने कहा कि उनके विचार प्रशांत जैसे ही हैं। उनका मानना है कि यह तय करना एक क्षेत्र के लोगों का अधिकार है कि वह किस तरह के प्रशासन या सरकार की अपेक्षा रखते हैं। इस तर्क के आधार पर यही अधिकार कश्मीर के लोगों का भी है। 

ब्रेक्सिट के लिए किए गए यूके के जनमत संग्रह का हवाला देते हुए शांति भूषण ने एक हैरान कर देने वाला दावा किया। अपने दावे में उन्होंने कहा:

“उन लोगों ने अलग होने के बावजूद जनमत संग्रह किया। जैसा कि पाकिस्तानी सरकार ने भी हमेशा अलग होने की बात पर ज़ोर दिया है। यह अधिकार कश्मीर के लोगों को भी दिया जाना चाहिए, अगर वह भारत की सीमा से अलग होने की इच्छा रखते हैं।” 

इसके बाद पिता पुत्र ने भारत की न्यायपालिका पर भी आरोप लगाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ा। राजदीप ने कोर्टरूम की प्रैक्टिस में रियायत बरतने पर सवाल किया। इसका जवाब देते हुए शांति भूषण ने कहा, “मेरे समय में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ईमानदार हुआ करते थे। इस बात पर भरोसा करना बहुत कठिन था कि शायद ही कोई भ्रष्टाचार में शामिल मिलता था। जब मैंने अपना वकालत का जीवन शुरू किया था, तब कुछ ऐसे हालात थे। आज ऐसे हालात हैं कि हमें पहले इस बात की पहचान करनी होती है कि न्यायाधीश भ्रष्ट है या ईमानदार।”

प्रशांत भूषण ने चर्चा में शामिल होते हुए कहा कि काफी न्यायाधीश ईमानदार तो हैं लेकिन वह सरकार के विरुद्ध आवाज़ उठाने में बहुत कमज़ोर हैं। यह बेहद साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि जो मुद्दे राजनीतिक दृष्टिकोण से संवेदनशील होते हैं, उसमें सर्वोच्च न्यायालय सरकार के विरुद्ध नहीं हो सकता।

इसके बाद शांति भूषण ने बेटे की बात पर जोर देते हुए कहा कि अगर कोई सरकार ताकतवर है तो वह आसानी से न्यायपालिका को कमज़ोर कर सकती है। शक्तिशाली सरकारें ऐसा करने के लिए तमाम हथकंडे अपनाती है। जैसे न्यायाधीशों के नज़दीकियों को धमकी देना, उन्हें लालच देना और उनकी बात न मानने पर नतीजों के लिए तैयार रहने की धमकी देना। 

भूषण पिता-पुत्र ने साक्षात्कार के दौरान यह दावा किया कि वह भाजपा या सरकार विरोधी नहीं हैं। लेकिन सच तभी सामने आ जाता है जब शांति भूषण ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और जवाहर लाल नेहरू पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि नेहरू लोकतंत्र में भरोसा करते थे जबकि नरेन्द्र मोदी तानाशाही में भरोसा करते हैं। शांति भूषण का यह तर्क पूर्वग्रहों पर आधारित है, मनगढ़ंत भी है। यही कारण है कि उन्होंने इंदिरा गाँधी को क्लीन चिट दे दी। 

शांति भूषण के अनुसार इंदिरा गाँधी की तुलना में नरेन्द्र मोदी से संवाद करना कहीं ज़्यादा कठिन है। इसके ठीक बाद प्रशांत भूषण ने भी कहा कि इंदिरा गाँधी फासीवादी नहीं थीं लेकिन नरेन्द्र मोदी हैं। पिता-पुत्र ने इस तरह के दावे तब किए, जब इंदिरा गाँधी ने अपने राज में विपक्ष के सभी नेताओं को जेल में बंद कर दिया था। इसके अलावा असहिष्णुता और फासीवाद जैसे मुद्दों पर बोलते हुए अपने पूर्वग्रहों के आधार पर पिता-पुत्र ने कई तरह के अनर्गल आरोप लगाए।