फेसबुक के प्रस्तावित ओवरसाइट बोर्ड के 20 में से 18 सदस्य जॉर्ज सोरोस से जुड़े हुए हैं। RealClearInvestigations के शैरिल एकिन्स्टन की जॉंच से यह बात सामने आई है। यहूदी अमेरिकी अरबपति सोरोस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध के लिए जाने जाते हैं। इस साल की शुरुआत में उन्होंने राष्ट्रवादियों से मुकाबले के लिए 100 करोड़ डॉलर का फंड की घोषणा की थी। कॉन्ग्रेस से भी उनके घनिष्ठ संबंध रहे हैं।
हाल ही में फेसबुक ने स्वतंत्र रूप से काम करने वाले ओवरसाइट बोर्ड के गठन की घोषणा की थी। इस बोर्ड का मुख्य काम फेसबुक पर मौजूद कंटेंट को रेगुलेट (नियंत्रित) करना और अश्लीलता, हेट स्पीच और नफ़रत फैलाने वाली सामग्री की निगरानी करना होगा। जाँच में यह बात सामने आई है कि इस बोर्ड के 90 फ़ीसदी सदस्यों का जॉर्ज के साथ कनेक्शन है। इनको सोरोस की ओपन सोसायटी फ़ाउंडेशन से आर्थिक सहयोग भी मिलता है।
हेले थोर्निंग स्कमिड, डेनमार्क के पूर्व प्रधानमंत्री, कैटलीना बोटेरो मारीनो, अफिया असंतेवा असारे और सुधीर कृष्णस्वामी ओवरसाइट बोर्ड के ऐसे सदस्य हैं जिनका सोरोस से संबंध है। अरबपति लिबरल जॉर्ज सोरोस से जुड़े बोर्ड सदस्यों में रोनाल्डो लेमोस, माइकल मैक्कोनेल, एलन रसब्रिजर और एन्दस साजो भी शामिल हैं।
अमेरिकी समाचार समूह न्यूयॉर्क टाइम्स में इस मुद्दे पर विस्तार से जानकारी दी गई है। इसके मुताबिक़ फेसबुक ओवरसाइट बोर्ड के सदस्य अलग पेशे, संस्कृति और धार्मिक पृष्ठभूमि से आते हैं। उन सभी के अपने सामाजिक और राजनीतिक अभिमत हैं। इनमें से कुछ फेसबुक की सार्वजनिक रूप से आलोचना भी करते रहे हैं।
जानकारी के अनुसार फेसबुक एक स्वतंत्र ओवरसाइट तंत्र बनाने की तैयारी लगभग पूरी कर चुका है। पिछले 18 महीनों में लगभग 2200 जानकारों और 88 देशों ने इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। इससे फेसबुक के ओवरसाइट बोर्ड को अंतिम सूरत देने में मदद मिली। फ़िलहाल इस बोर्ड में 20 सदस्य हैं जिन्हें संभावित तौर पर 40 भी किया जा सकता है। इस साल के अंत तक बोर्ड के सक्रिय होने की पूरी उम्मीद जताई जा रही है।
यह काफी हद तक साफ़ हो चुका है कि सोशल मीडिया मंच रुढ़िवादी राजनीतिक विचारों की तरफ झुकाव रखते हैं। इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण ट्विटर है जिसने हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर कार्रवाई की थी। इस घटना से एक बात स्पष्ट थी कि सोशल मीडिया मंचों का रवैया कितना पक्षपाती है।
जब से जॉर्ज सोरोस के भारतीय राजनीति में दखल देने की ख़बरें सामने आई हैं, भारत के लोग भी चिंतित हैं। भारत में ऐसे तमाम गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) हैं जो सोरोस के संपर्क में हैं और देश की क़ानून-व्यवस्था को प्रभावित करने की कोशिश करते रहते हैं। इसके अलावा हर्ष मंदर जैसे भी कई लोग हैं जो इनके साथ मिल कर भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती पैदा करते हैं।
सुशांत सिंह राजपूत की मौत का मामला बॉलीवुड और भारत से निकल कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन रहा है। शुक्रवार (सितम्बर 4, 2020) को इस मामले में रिया चक्रवर्ती के भाई शौविक और सैमुअल मिरांडा की गिरफ़्तारी के बाद ब्रिटेन में भी उनके फैंस ने ख़ुशी मनाई। ब्रिटेन के फैंस ने ‘जस्टिस फॉर सुशांत’ को दुनिया भर में ले जाने का फैसला किया है।
ब्रिटेन में मल्टीप्लेक्सों के सामने सितम्बर 14, 2020 को बड़े विरोध-प्रदर्शन की तैयारी की जा रही है। प्रदर्शन की तैयारी कर रहे लोगों का कहना है कि ब्रिटेन में ऐसा कर वे बॉलीवुड को सन्देश देना चाहते हैं कि वो जनता ही है, जिसने उनलोगों को यहाँ तक पहुँचाया है। उनका का कहना है कि बॉलीवुड के लोग भगवान नहीं हैं, ये उन्हें याद रखना चाहिए। ‘न्यूज़ 18’ पर इससे सम्बंधित विस्तृत रिपोर्ट में प्रर्दशनकारियों का नेतृत्व करने वालों से बात की गई है।
ऐसी ही एक महिला रूपा दीवान ने कहा कि अगर इस मामले में न्याय मिल भी जाता है तो लोग असली मुद्दे को भूल जाएँगे, जबकि हमारा असली उद्देश्य बॉलीवुड से नेपोटिज्म को ख़त्म करना है। पिछले सप्ताह एक ट्रक पर सुशांत सिंह राजपूत की तस्वीर लगा कर न्याय की माँग करते हुए इसे पूरे लंदन में घुमाया गया था। सुशांत की बहन श्वेता सिंह कीर्ति ने भी ऐसी तस्वीरें अपने सोशल मीडिया एकाउंट्स से पोस्ट की थी।
सुशांत सिंह राजपूत के वकील विकास सिंह ने भी कहा है कि NCB द्वारा शौविक और सैमुअल को गिरफ्तार किए जाने और ड्रग्स वाला एंगल सामने आने से इतना तो स्पष्ट हो गया है कि परिवार का ये डर सही निकला कि मुंबई पुलिस किसी बड़ी चीज को दबाना चाहती थी। उन्होंने कहा कि इस केस में कई एंगल थे। परिवार आशा करता है कि इस मामले में अभी और एंगल सामने आएँगे, जिनसे सच्चाई पता चलेगी।
Maharashtra: Officers of Central Bureau of Investigation (CBI) visit actor Sushant Singh Rajput’s residence in Bandra, Mumbai.
सीबीआई ने भी सुशांत सिंह राजपूत मामले की जाँच के क्रम में दिवंगत अभिनेता के बांद्रा स्थित फ्लैट का दौरा किया, जहाँ वो जून 14 को मृत पाए गए थे। ये भी पता चला है कि रिया चक्रवर्ती के क्रेडिट कार्ड से ड्रग्स का पेमेंट किया गया था। कहा जा रहा है कि इस सिंडिकेट में और भी लोग शामिल हैं, जिसका खुलासा जल्द होगा। रिया-शौविक से सम्बन्ध रखने वाले कुछ ड्रग सिंडिकेट के लोगों को हिरासत में भी लिया गया है।
इससे पहले खबर आई थी कि शौविक चक्रवर्ती ने NCB के सामने कथित तौर पर स्वीकार कर लिया है कि रिया के कहने पर उसने ड्रग्स खरीदे थे। इतना ही नहीं, शौविक का दावा है कि रिया ने उसके अलावा सुशांत के पूर्व मैनेजर सैमुएल मिरांडा से भी ड्रग मँगाए, क्योंकि वह कई ड्रग तस्करों के संपर्क में था। वहीं, सैमुएल ने स्वीकार किया कि वह सुशांत के घर के लिए ड्रग्स खरीदते थे।
भारत और चीन के बीच बढ़ते तनाव के बीच ‘लाइन ऑफ एक्चुअल कण्ट्रोल’ (LAC) पर जवानों की तैनाती बढ़ा दी गई है। भारतीय सेना के जवानों के अलावा इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस (ITBP) के जवानों को भी मोर्चे पर लगाया गया है। कई ऐसी रणनीतिक ऊँचाई वाली जगहों पर ITBP के जवानों ने डेरा जमा लिया है, जहाँ से चीन के सैनिकों की गतिविधियों पर सीधे नजर रखी जा सकती है। इससे LAC के पार भी नजर रखी जा सकती है।
सब-सेक्टर नॉर्थ से लेकर सब-सेक्टर साउथ तक 5000 ITBP के जवानों को लद्दाख और चीन सीमा से सटे उससे जुड़े इलाकों में तैनात किया गया है। बता दें कि हाल ही में जब चीन ने सीमा पर मौजूदा स्थिति को बिगाड़ने का प्रयास किया था तो उसे नाकाम करने में ITBP के जवान भी शामिल थे। पांगोंग त्सो के दक्षिण में ऊँचाई वाली जगहों पर भारतीय सेना मौजूद है, जिससे चीन के हर इरादे को नाकाम किया जा सकता है।
वहीं ITBP के 30 जवानों ने पूर्वी लद्दाख में ब्लैक टॉप एरिया में डेरा जमाया है, जहाँ से चीन की गतिविधि पर सीधे नज़र रखी जा सकती है। इस जगह का अपना ही रणनीतिक महत्व है। फुरचुक ला पास से गुजरते हुए ITBP के जवानों ने उन रणनीतिक स्थलों पर डेरा जमाया है, जहाँ पहले सशस्त्र बलों की कोई उपस्थिति नहीं थी। फिंगर 2 और फिंगर 3 के पास पांगोंग के उत्तर में धन सिंह पोस्ट सहित कई जगहों पर ITBP के लोग मौजूद हैं।
ये सभी स्थल इतनी ऊँचाई पर है, जहाँ से LAC पर चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा की जाने वाली गड़बड़ियों को तुरंत भाँपते हुए त्वरित कार्रवाई की जा सकती है। पूर्वी लद्दाख के पांगोंग त्सो क्षेत्र में ITBP के जवाब चीन को अपनी ताकत दिखा चुके हैं। सुरक्षा एजेंसी के मुखिया एसएस देसवाल 6 दिनों के लिए LAC के दौरे पर थे, जहाँ उन्होंने जवानों की तैयारी का जायजा लिया। उन्होंने दौलतबेग से लेकर दक्षिणी लद्दाख तक दौरा किया।
Indian Army troops moved to dominating heights near the south of Pangong Tso. 30 personnel of the Indo-Tibetan Border Police have occupied new positions near the key Black Top area that oversees China in the Line of Actual Control (LAC) in eastern Ladakh. https://t.co/aKpJ63Fdhn
फ़िलहाल LAC पर 39 ऐसी जगहें हैं, जहाँ ITBP के जवानों ने रणनीतिक रूप से अपने अधिकार में ले रखा है। बता दें कि विस्तारवादी चीन की चाल इस बार असफल रही है। भारतीय सेना के मुताबिक, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी पीएलए के करीब 500 सैनिकों ने 29-30 अगस्त की रात काला टॉप और हेमलेट टॉप इलाकों पर यथास्थिति बदलने की कोशिश की, लेकिन सतर्क भारतीय सैनिकों ने ऐसा नहीं होने दिया।
उभरती हुई कन्नड़ अभिनेत्री संयुक्ता हेगड़े को कॉन्ग्रेस नेता कविता रेड्डी और उनके समर्थकों ने गाली दी और फिर हमला कर दिया। हमला करते हुए कॉन्ग्रेस नेता और उनके साथ मौजूद लोगों ने कन्नड़ अभिनेत्री पर बुरा बर्ताव करने का आरोप लगाया। यह घटना बेंगलुरु शहर स्थित अगारा झील के नज़दीक हुई।
संयुक्ता हेगड़े ने मीडियाकर्मियों से बात करते हुए पूरी घटना की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि शाम के वक्त वह अपने दो दोस्तों के साथ ‘हूला हूप्स’ (जिमनास्टिक अभ्यास) कर रही थीं। इसी दौरान एक महिला उनके नज़दीक आई और गलत व्यवहार करने का आरोप लगा कर अपशब्द कहने लगी। फिर उन्हें पता चला कि मॉरल पुलिसिंग के नाम पर बदतमीजी कर रही महिला कॉन्ग्रेस की नेता कविता रेड्डी है।
संयुक्ता ने बताया कि कविता रेड्डी और उनके समर्थक थोड़ी ही देर में हाथापाई भी करने लगे। उन्होंने इस घटना का एक वीडियो अपने ट्विटर एकाउंट पर साझा किया है। इसमें बेहद साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि पहले कविता रेड्डी और उनके समर्थक बहस करते हैं। इसके थोड़ी ही देर बाद अभिनेत्री और उनकी दो दोस्तों के साथ हाथापाई और मारपीट पर उतर आते हैं।
संयुक्ता ने बताया कि जब वह हूला हूप्स का अभ्यास कर रही थी तभी एक उम्र दराज़ महिला उनके नज़दीक आई। वह जैसे ही कुछ समझ पाती इसके पहले महिला ने उनके पहनावे को लेकर अभद्र टिप्पणी शुरू कर दी। कॉन्ग्रेस नेता कविता रेड्डी ने कहा, “क्या तुम कैबरे डांसर हो? यह किस तरह के कपड़े पहने हुए हैं? A@&&&@s! अगर इस तरह के कपड़े पहनने पर तुम्हारे साथ कुछ होता है तो रोते हुए मेरे पास मत आना।”
कन्नड़ अभिनेत्री संयुक्ता ने इस घटना का पूरा वीडियो भी बनाया है जिसमें वह डरी और सहमी हुई नज़र आ रही हैं। वीडियो में यह भी देखा जा सकता है कि अभिनेत्री के साथ कई लोगों ने सार्वजनिक तौर पर अभद्रता की। संयुक्ता ने आरोप लगाया कि कविता रेड्डी के साथ मौजूद 10 आदमियों के उन्हें धमकी देने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि वह ड्रग स्कैंडल मामले में संयुक्ता का नाम भी शामिल करवा देंगे।
संयुक्ता ने कहा, “कई लोगों ने हमें चारों तरफ से घेर लिया। फिर कविता रेड्डी ने मेरी दोस्त के साथ मारपीट की, मैंने अपने मोबाइल में इस पूरी घटना का वीडियो बना लिया। इसके बाद हम स्थानीय पुलिस थाने गए और वहाँ तक सभी हम पर चिल्ला रहे थे। हमारी किस्मत अच्छी थी कि एक पुलिसकर्मी ने कहा हमने कुछ गलत नहीं किया और हमें वापस भेज दिया।”
वहीं घटना के दौरान जो पुलिसकर्मी अगारा झील के पास मौजूद थे वह कविता रेड्डी को कुछ कहने की जगह उल्टा अभिनेत्री को चुप रहने और वीडियो न बनाने की नसीहत दे रहे थे। वीडियो में एक पुलिसकर्मी को यह कहते हुए भी सुना जा सकता है कि बिना वीडियो बनाए भी विवाद सुलझाया जा सकता है। अभिनेत्री संयुक्ता ने आरोप लगाया कि झील के पास मौजूद पुलिसकर्मियों ने कविता रेड्डी और उनके समर्थकों से कुछ नहीं कहा।
संयुक्ता ने बताया कि पुलिसकर्मी ने उन्हें और उनकी दोस्तों को चुपचाप वापस लौटने के लिए कह दिया, जबकि मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि हम रोज़ अभ्यास करने के लिए आते हैं और किसी भी तरह की अभद्रता नहीं करते हैं। ख़बरों के अनुसार संयुक्ता इस घटना की वजह से अवसाद में हैं, उनका कहना है हमने पता नहीं ऐसा क्या किया था जिसकी वजह से हमारे साथ ऐसा व्यवहार किया गया। इस तरह का बर्ताव किसी के साथ नहीं होना चाहिए और मॉरल पुलिसिंग की ऐसी घटनाओं पर लगाम लगनी चाहिए।
राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने कंगना रनौत को धमकी देने वाले शिवसेना विधायक प्रताप सरनाईक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात कही है। इस बीच मुंबई की मेयर ने कंगना को ‘कंस का वरदान’ बताया है।
धमकी देने के मामले में NCW ने महाराष्ट्र के डीजीपी को पत्र लिखा है। रेखा शर्मा ने कहा कि कंगना को शिवसेना विधायक की धमकी काफी आपत्तिजनक है। विधायक ने कहा था कि अगर अभिनेत्री मुंबई में घुसती हैं तो उनकी टाँगें तोड़ दी जाएँगी।
मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस मामले का संज्ञान लिया है। रेखा शर्मा ने पहले ही बताया था कि वो इस मामले में स्वतः संज्ञान ले रही हैं। रेखा शर्मा ने कहा कि कंगना रनौत की किसी भी ट्वीट से ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि वो देशद्रोही हैं या फिर उन्होंने किसी को भी धमकी दी हो। उनकी ट्वीट्स आपत्तिजनक नहीं थीं।
राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ने आगे कहा कि इस खबर से शिवसेना नेताओं की विचारधारा के बारे में भी पता चलता है, अगर कोई महिला स्वतंत्रता के बारे में बात कर रही है तो वो लोग इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते। उधर केंद्रीय मंदिर रामदास आठवले ने भी संजय राउत द्वारा कंगना रनौत को मुंबई न आने की धमकी भरे बयान की निंदा करते हुए कहा कि ये दुर्भाग्यपूर्ण है और कंगना सहित सभी लोग सुशांत मामले में न्याय के लिए आवाज़ उठा रहे हैं।
Shiv Sena MLA Pratap Sarnaik should be arrested for threat to Ranaut: NCW Chief
मुंबई की मेयर और शिवसेना नेता किशोर पडनेकर ने भी कंगना रनौत पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए उन्हें ‘कंस मामा का वरदान’ बताया है। मेयर ने ‘टीवी 9 मराठी’ के एक ट्वीट की रिप्लाई में मराठी भाषा में ये टिप्पणी की। उस खबर में बताया गया था कि कंगना ने मुंबई को अपनी कर्मभूमि बताते हुए कहा है कि वो इस शहर को माँ यशोदा के रूप में देखती हैं, जिसने उन्हें अपनाया और उन्हें अपनी कर्मभूमि के लिए प्यार को साबित करने की कोई ज़रूरत नहीं।
उधर कंगना रनौत ने अपने हालिया ट्वीट में मराठी लिबास में तस्वीर साझा की और संजय राउत की धमकियों का जवाब देते हुए लिखा, “किसी के बाप का नहीं है महाराष्ट्र, महाराष्ट्र उसी का है जिसने मराठी गौरव को प्रतिष्ठित किया है। मैं डंके की चोट पे कहती हूँ, हाँ मैं मराठा हूँ, उखाड़ो मेरा क्या उखाड़ोगे।”
अमेरिका में इस साल नवंबर के दौरान राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स दोनों ही इसकी तैयारियों में जुट गए हैं। इस कड़ी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना अच्छा मित्र बताते हुए भारतीय समुदाय के लोगों से चुनाव में साथ देने की अपील की है। ट्रंप ने ह्यूस्टन में हुए कार्यक्रम हाउडी मोदी और अपनी भारत यात्रा का भी ज़िक्र किया है।
प्रेस वार्ता में ट्रंप ने कहा, “प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं। वह इतने मुश्किल हालातों में भी बेहतर काम कर रहे हैं। यह वक्त सभी के लिए बुरा है ऐसे में बेहतर नतीजों के साथ काम करना आसान नहीं है।” उन्होंने कहा कि भारत के लोगों को एक महान व्यक्ति महान नेता के रूप में मिला है।
ट्रंप ने अपने भाषण के दौरान कई बार यह संकेत दिए भले समय कितना भी कठिन हो वह ऐसे हालातों में भारत के साथ हैं। साथ ही ये विश्वास जताया कि भारतीय-अमेरिकी समुदाय के लोग आगामी राष्ट्रपति चुनाव में उन्हें ही वोट देंगे।
इसके बाद ट्रंप ने अमेरिका के ह्यूस्टन में आयोजित ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम की यादें ताज़ा की। ट्रंप ने कहा वह एक शानदार अनुभव था और पूरा कार्यक्रम अविश्वसनीय था। प्रधानमंत्री मोदी इससे अधिक उदार नहीं हो सकते थे। हमें भारत के प्रधानमंत्री और वहाँ के लोगों का पूरा समर्थन मिल रहा है। 21 सितंबर 2019 को हुए इस कार्यक्रम में दोनों देशों के नेताओं की मुलाक़ात हुई थी। इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने लगभग 50 हज़ार से अधिक भारतीय-अमेरिकियों को संबोधित किया था।
इस कार्यक्रम के दौरान शामिल होने वाले लोगों ने नमो अगेन के नारे लगाए थे। इस कार्यक्रम का मूल उद्देश्य दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र और दुनिया के सबसे नए लोकतंत्र के बीच अच्छे रिश्ते दिखाना था। इसके बाद अपनी भारत दो दिवसीय भारत यात्रा का उल्लेख करते हुए ट्रंप ने कई बातें कही। उन्होंने कहा हमारे लिए पूरी यात्रा का अनुभव अकल्पनीय था। भारत एक अद्भुत देश है वहाँ से जितना कुछ मिला वह भुलाया नहीं जा सकता है।
चीनी जासूस चार्ली पेंग के मोबाइल फोन की फोरेंसिक रिपोर्ट सामने आई है। इसमें एक बहुत बड़े लेन-देन की बात सामने आई है। ख़बरों के मुताबिक़ यह लेन-देन कारण 500 मिलियन डॉलर का है। 9 नवंबर 2019 को यह राशि फाय यूं जॉइन नाम के व्यक्ति को भेजी गई थी। सीएनएन न्यूज़ 18 में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़ अभी तक इस लेन-देन से संबंधित कुल 5 दस्तावेज़ बरामद किए गए हैं।
बरामद किए गए इन दस्तावेज़ों में सबसे अहम बैंक गारंटी लेटर और बैंक ड्राफ्ट की कॉपी भी है। आयकर विभाग ने इस मामले में अंतर्राष्ट्रीय बैंक की स्थानीय शाखा से कई सवाल भी पूछे थे। विभाग ने संबंधित बैंक को इन दस्तावेज़ों की पुष्टि करने के लिए कहा था और ड्राफ्ट से जुड़ी जानकारी भी माँगी थी।
#EXCLUSIVE | CNN-News18 accesses 5 documents related to $500 million Hawala deal.
चार्ली पेंग ने पूछताछ के दौरान इस संबंध में संतोषजनक जवाब नहीं दिए हैं। उसके मुताबिक़ 500 मिलियन डॉलर की राशि सिंगल ट्रांजेक्शन में स्थानांतरित की गई थी। ख़बरों में बताया जा रहा है कि चार्ली पेंग ने इस लेन-देन से जुड़े सभी कागज़ात अपने मोबाइल फोन से हटा दिए थे। लेकिन जैसे ही आयकर विभाग ने फोन को फोरेंसिक जाँच के लिए भेजा पूरी बात सामने आई। इससे पता चला कि चार्ली पेंग ने 500 मिलियन डॉलर (लगभग 3500 करोड़ रूपए) एचएसबीसी बैंक के इंग्लैंड शाखा में भेजे थे।
इंग्लैंड स्थित एचएसबीसी बैंक ने इस मामले में आयकर विभाग को कोई भी जानकारी देने से साफ़ मना कर दिया है। बैंक की स्थानीय शाखा ने आयकर विभाग से यह कहा कि वह इस लेन-देन की जानकारी नहीं साझा कर सकते हैं। पूरे मामले पर दो ऐसे सबसे बड़े सवाल हैं जिनका अभी तक जवाब नहीं मिल पाया है। पहला इतने पैसे किसके थे? दूसरा इतनी बड़ी इतनी बड़ी रकम क्यों भेजी गई और यह कहाँ से आई थी? फाय यूं जॉइन नाम के जिस व्यक्ति को इतनी बड़ी राशि भेजी गई है, उसके बारे में भी अभी पता नहीं चल पाया है।
हाल ही में 1000 करोड़ रुपए के हवाला घोटाले के आरोपित चार्ली पेंग के बारे में बड़ा खुलासा हुआ था। चार्ली पेंग चीन का रहने वाला है और उसका असली नाम लुओ सैंग है। जाँच एजेंसियों को पता चला है कि चार्ली पेंग दिल्ली में कुछ लामाओं के संपर्क में था। पेंग के मामले की जाँच कर रही एजेंसियों को शक है कि वह बौद्ध धर्म के सर्वोच्च गुरु दलाई लामा और उनके सहयोगियों की जानकारी जुटा रहा था।
शुरुआती जाँच में पता चला है कि चार्ली पेंग ने दिल्ली में मजनू का टीला में कुछ लामाओं और अन्य व्यक्तियों को पैसे दिए थे। निगरानी से बचने के लिए, पेंग ने बातचीत करने के लिए चीनी एन्क्रिप्टेड एप्लिकेशन ‘वी चैट’ का इस्तेमाल करता था। भारत में रहकर हवाला रैकेट चला रहा चार्ली पेंग एक जासूसी नेटवर्क का भी हिस्सा था। उसने अन्य चीनी नागरिकों के साथ मिलकर चीनी शेल कंपनियों के नाम से बैंक खाते खोले और करीब 1000 करोड़ रुपए की मनी लॉन्ड्रिंग की।
भारत में घुसपैठ और यहाँ अवैध तरीके से रहने वाले रोहिंग्याओं को भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा माना जाता रहा है। भारत में उनकी उपस्थिति को लेकर जाहिर की जा रही चिंताओं के बीच रोहिंग्याओं ने अपनी फुटबॉल टीमें बना ली है। साथ ही वो लोकल टूर्नामेंट्स में भी हिस्सा ले रहे हैं। अब ऐसा प्रतीत होता हैकि फुटबॉल के जरिए घुसपैठ को नॉर्मलाइज करने की कोशिश की जा रही है।
इस फुटबॉल टीम का नाम रोहिंग्या FC है और इसने कई टूर्नामेंट्स में हिस्सा भी लिया है। यहाँ तक कि उन्होंने ये छिपाने की भी कोशिश नहीं की है कि वो फुटबॉल का इस्तेमाल घुसपैठ और अवैध प्रवास को सही साबित करने के लिए कर रहे हैं। दिल्ली के एक ‘युवा रोहिंग्या नेता’ अली जौहर का कहना है कि रोहिंग्याओं को एक ख़ास विचारधारा वाले चश्मे से देखा जाता है। उनका कहना है कि उनके समुदाय को लेकर काफी गलत सूचनाएँ और धारणाएँ हैं।
उन्होंने कहा कि फुटबॉल से सकारात्मक बदलाव आया है और वो लोग दुनिया को ये बताने में कामयाब रहे हैं कि वो उन्हीं में से एक हैं, एक सामान्य मनुष्य हैं। नेता ने आगे बताया कि इसके जरिए उनलोगों के भारत में भी कई दोस्त बने हैं। उन्होंने कहा कि फुटबॉल से सकारात्मक बदलाव तो आए हैं लेकिन इसे बनाए रखना एक चुनौती है। 2018 में रोहिंग्याओं ने ‘यूनाइटेड नेशंस हाई कमीशन फॉर रिफ्यूजीज’ द्वारा आयोजित एक टूर्नामेंट में भी हिस्सा लिया था।
ये टूर्नामेंट हैदराबाद के घांसी बाजार स्थित कुली क़ुतुब शाह स्टेडियम में हुआ था। इसमें 16 टीमों ने हिस्सा लिया था। इनमें जलापल्ली, किशनबाग और बालपुर रिफ्यूजी कैम्पों की 3 रोहिंग्याओं की फुटबॉल टीमें शामिल थीं। बालपुर के 24 वर्षीय खिलाडी अब्दुल्ला का कहना है कि वो फुटबॉल इसीलिए खेल रहे हैं, ताकि लोग रोहिंग्या को सकारात्मक दृष्टि से देखें। आयोजकों को भी रोहिंग्या टीमों के टूर्नामेंट में हिस्सा लेने से ख़ुशी है।
आयोजकों में से एक ‘सेव द चिल्ड्रन’ के जनरल मैनेजर ने कहा कि उनका उद्देश्य यहाँ रोहिंग्याओं की भागीदारी को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि यहाँ शरणार्थियों की बात करने का अर्थ है ‘रोहिंग्या शरणार्थी’, जिनकी संख्या सबसे ज्यादा है। उन्होंने कहा कि आधार कार्ड न होने के कारण उनके बच्चे शिक्षा तक नहीं पाते। तेलंगाना फुटबॉल एसोसिएशन के अध्यक्ष ने भी 2018 में कहा था कि वो खेल सुधारने में रोहिंग्याओं की मदद के लिए तैयार हैं।
Do you know that even amnesty acknowledges that Rohingya aka Bangladeshi slaughtered thousands of Hindus & Buddhists in Myanmar?
Yesterday you heard about Hyderabad Rohingya Football Club, today you get to see Hyderabad Rohingya Tv. Also, see how fascinating the comments are. pic.twitter.com/4zPe45UVAT
एसोसिएशन ने रोहिंग्याओं की टीम को प्रशिक्षण देने के लिए एक कोच की नियुक्ति से लेकर अपने खिलाड़ियों को उनके साथ प्रैक्टिस करने का भी ऑफर दिया। कई रोहिंग्या खिलाड़ियों के परिवार बांग्लादेश से आए हुए हैं। ‘रोहिंग्या ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव’ सहित कई मानवधिकार संगठन भी उनके समर्थन में उतर आए हैं। हालाँकि, भारत सरकार और इसके कई मंत्री रोहिंग्याओं के खिलाफ अपने रुख पर कायम हैं।
स्वतंत्र भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति (जो कि पेशे से शिक्षक भी थे) सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को भारत सरकार शिक्षक दिवस के रूप में मनाती है। कहते हैं राधाकृष्णन ने ख़ुद ही अपने विद्यार्थियों के समक्ष यह इच्छा ज़ाहिर की थी कि उनके जन्मदिन को शिक्षक-दिवस के रूप में मनाया जाए। सरकार की सहमति के बाद सरकारी शिक्षण संस्थानों में बड़े तौर पर इस दिन को इसी तरह सेलिब्रेट करने की परंपरा शुरू हो गई।
बचपन से इस दिन को स्कूलों और फिर कॉलेजों में हमने बहुत भावुक मन से इसे सेलिब्रेट किया है। लगभग हर स्कूल में इसदिन विद्यार्थी शिक्षक की भूमिका में आकर जूनियर क्लासेज में कक्षाएँ लेते हैं और अपने शिक्षकों को इसदिन कक्षा लेने के कार्यभार से मुक्त रखते हैं। कॉलेज में शिक्षक समुदाय के समक्ष तरह-तरह के कार्यक्रम कर विद्यार्थी अपनी प्रसन्नता और शिक्षकों के प्रति अपने सम्मान को प्रकट करते हैं।
आज के दिन हर विद्यार्थी अपने संस्थान के शिक्षक समुदाय के प्रति अपनी कृतज्ञता और सम्मान को तरह-तरह से प्रकट करता है। एक परंपरा यह भी है कि सारे विद्यार्थी आज के दिन अपने शिक्षकों को उपहार के रूप में बुद्धि के देवता गणपति की मूर्तियाँ भेंट करते हैं।
असल में मनुष्य एक उत्सवधर्मी प्राणी होता है। उसने अपने भीतर की खुशी और उर्जा को प्रकट करने के लिए ही विभिन्न पर्वों की सृष्टि की है। धरती पर जितनी भी जातियाँ हैं, जितने भी संप्रदाय हैं, जितने भी धर्म हैं, जितने भी लोग हैं सबकी अपनी-अपनी रीतियाँ हैं, तौर-तरीके हैं, पर्व हैं, त्योहार हैं। इन्हीं के माध्यम से लोग अपने होने को मानो प्रकट करते हों। आज भारत में परवर्ती पूँजीवाद का जन तो और ज़्यादा उत्सवधर्मी हो गया है। वह तो उत्सव मनाने और सेलिब्रेट करने के और-और बहाने खोजने लगा है। उसके पास पूँजीवाद ने इतना तनाव और अकेलापन सृजित कर दिया है कि वह छुट्टियों और सेलिब्रेशन के हर मौके पर एक तरह से टूट पड़ता है। यह जन इस दिन (शिक्षक-दिवस) को भी किसी ऐतिहासिक पर्व की तरह ही लहालोट होकर मनाता है।
साभार : सुदर्शन पटनायक
भारत के जन के लिए शिक्षक-दिवस भी एक आदर और सम्मान प्रकटीकरण का पर्व हो गया है और इसदिन को हर भारतीय विद्यार्थी अति भावुक मनःस्थिति से मनाता और प्रकट करता है। दुनिया के और देशों में शिक्षक-दिवस अलग-अलग दिन मनाए जाते हैं। सबके शिक्षक दिवस के अलग-अलग प्रतीक पुरुष और कारण हैं जैसे भारत के लिए सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन- कारण है।
यह लेकिन इतना सरल और सीधा मसला नहीं है जितना ऊपर-ऊपर दिख रहा है और विशेषकर भारत जैसे देश में तो यह और भी समस्यामूलक है क्योंकि भारत की समझ, उसकी संस्कृति किसी भी और देश से न सिर्फ भव्य और उन्नत है, बल्कि प्रतीक और मूर्ति पूजक होने के कारण भारतीय संस्कृति और ज़्यादा फोकस्ड और बोल्ड है।
यहाँ गुरु-पूर्णिमा का एक अनोखा पर्व मनाया जाता रहा है जो वेद-व्यास (पीठ) के जन्मदिन को सेलिब्रेट कम, उनके प्रति सम्मान प्रकट का पर्व ज़्यादा है। भारत की हिन्दूवादी विचारसरणी लेखकों और पुस्तकों को संस्कृति निर्माता के पद पर आसीन करती है। वह मानती है कि किसी भी संस्कृति और सत्य के निर्माता तथा अन्वेषक लेखक ही होते हैं। हिन्दूवादी विचारसरणी लेखकों को ऋषि और द्रष्टा कहकर पूजती रही है। इस विचारसरणी के लिए पुस्तकें केवल पुस्तकें नहीं, बल्कि धार्मिक महत्व की, पूजा की वस्तुएँ होती हैं।
पूरी दुनिया में हिन्दूवादी विचारसरणी के अतिरिक्त शायद ही कोई विचारसरणी या वैचारिकी होगी जो लेखकों, पुस्तकों और गुरुओं का ऐसा सम्मान करती हो। सिख, बौद्ध, जैन, नाथ आदि संप्रदाय तो गुरु को ही भगवान मानकर पूजते हैं। अब सवाल उठता है कि इस या ऐसे देश में अलग से एक शिक्षक दिवस की क्या आवश्यकता आन पड़ी होगी और यह दिन या पर्व कैसे और क्यों शुरू हुआ होगा?
असल में इसकी जड़ें थोड़ी पुरानी और गहरी हैं। इसके तार सात समुद्र पार यूरोप से जाकर जुड़ते हैं। बर्बर मध्यकालीन यूरोप ज्ञान के प्रकाश से रेनेसां कर सका और इस नवजागरणकालीन यूरोप ने अपनी उन्नति के मद में दुनिया को लाँघने का फैसला किया। इसी के अनंतर पूरी दुनिया में पहले व्यापार और फिर उनपर शासन का कार्य किया।
कहने का आशय है कि पूँजीवाद के उदय के साथ रेनेसां की पीठ पर सवार होकर यूरोप ने दुनियाभर को अपने अधीन कर लिया और शासित देशों को अपनी संस्कृति, अपने नियम, अपने सिविल कोड्स से लादकर उनके रीति-नीति और संस्कारों और नियमों को शिफ्ट कर दिया।
उन्होंने पूरी दुनिया को अपनी सुविधावाली जगह बना दी जिसे उपनिवेशवाद अथवा उनका ड्राइंग रूम कहा जाने लगा। इसी क्रम में उन्होंने जो सबसे ज़रूरी काम किया वह यह कि शासित देशों को अपनी तरह ढालने के लिए वहाँ अपनी तरह सोचने वाले दिमाग़ विकसित कर दिए जिन्हें साधारणतया नेटिव्स कहा गया।
2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में लॉर्ड मैकॉले ने उपरोक्त उद्देश्य की पूर्ति के लिए भारत में लागू किए जाने वाली अपनी शिक्षा-नीति की पृष्ठभूमि को एकदम साफ-साफ प्रकट करते हुए कहा था-
“मैंने भारतवर्ष के ओर-छोर का भ्रमण किया परन्तु मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला जो भिखारी हो, चोर हो। ऐसी अपार संपदा, इतने उच्च नैतिक आदर्श व इतने प्रतिभाशाली व्यक्तियों वाले देश को हम कभी जीत नहीं पाएँगे। लोगों के मन में आध्यात्मिक, धार्मिकता एवं अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति अटूट आस्था है। वे बड़े मनोबली हैं। यदि भारत को गुलाम बनाना है तो इस देश के मेरुदंड अर्थात् भारतीय आध्यात्मिक व सांस्कृतिक परम्पराओं को तोड़ना होगा। अतः मैं प्रस्ताव करता हूँ कि इसकी शिक्षा-पद्धति और इनकी संस्कृति को नष्ट करना होगा क्योंकि जब प्रत्येक भारतीय के मन में यह बात अच्छी तरह से घर कर जाएगी कि जो भी ‘विलायती’ है, वह उनके ‘देशी’ से श्रेष्ठ है, महान है, तब ये हीन-भावना से ग्रस्त होकर अपनी गरिमा, अपने संस्कार, स्वदेश-प्रेम व स्वाभिमान को खो देंगे। इनका मनोबल टूट जाएगा, तब हम वास्तव में अपने इरादे में कामयाब हो जाएँगे। तब सही मायने में भारत देश हमारा गुलाम बन जाएगा। इसलिए नई शिक्षा-नीति बनाकर वहाँ की प्राचीन शिक्षा प्रणाली एवं संस्कृति पर हमला किया जाए ताकि लोगों का मनोबल टूटे, वे विदेशी खासकर अँग्रेज़ी और अँग्रेज़ियत को अपनी तुलना में महान समझने लगें। तब वही होगा जैसा कि हम चाहते हैं। अपनी संस्कृति और स्वाभिमान को खोया हुआ भारत पूर्णतः गुलाम और भ्रष्ट भारत होगा।”
अँग्रेज़ों ने इसीलिए भारत में स्कूल-कॉलेज खोले। वे भारतीयों को शिक्षित नहीं बल्कि उनके अवचेतन में भारतीय ज्ञान और सभ्यता के प्रति हिकारत भरकर ईसाइयत और पश्चिम को श्रेष्ठ स्थापित करना चाहते थे। कमोबेश पूरी दुनिया में उन्होंने यही किया।
और मैकॉले की बातों में यह साफ-साफ प्रकट है कि उन्होंने भारत को खुद के देश से ज़्यादा सभ्य और मज़बूत संस्कृति वाला पाया था। तो असल में उनलोगों ने एक उन्नत संस्कृति वाले देश को नष्ट कर, आत्महीन कर अपनी संस्कृति को थोपने के लिए बस ज़मीन तैयार करने का काम किया था और नजीता सबके सामने है।
ऐसे उन्होंने भारत में यूरोप की नज़र से देखने वाला दिमाग़ तैयार किया जो 1947 में उनके जाने के बाद भी उनके प्रभाव से मुक्त नहीं हुआ और भारत को उसकी मूल संस्कृति से काटकर एक ऐसा देश बना दिया जो सच में, ज़मीन पर कहीं था ही नहीं। उसने यूरोप के मानकों के आधार पर भारत का निर्माण किया और यह नया भारत उस समय की राजनीति और उसके शीर्ष द्वारा ‘डिस्कवर्ड’ किया गया जिसकी कोई सच्ची ज़मीन थी ही नहीं।
दुनिया का कोई भी देश किसी अन्य की संस्कृति के आधार पर कभी भी सही मायने में उन्नत नहीं हो सकता। कोई भी देश अपनी विशिष्ट विशेषताओं और प्रवृत्तियों और संभावनाओं के आलोक में ही सच्ची गति पा सकता है। किसी और का तरीका उसकी मूल भावना की हत्या कर उसे एक कृत्रिम, मृत और नकलची पुतला ही बना सकता है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं।
यहाँ अचानक नहीं था कि स्वतंत्र भारत में एक ऐसा बनावटी सिस्टम बना दिया गया जिसमें आमजन बाहर बैठकर उजबक की तरह टुकुर-टुकुर ताकने वाला बन गया। उन्हें इस नए बने सिस्टम में प्रवेश करने की इजाज़त ही नहीं थी। वे इस सिस्टम में असहज और अजनबी की तरह जीने को अभिशप्त हो गए।
कानून, संसद, सरकार, व्यवस्था, शिक्षा सब कुछ अंग्रेजी-यूरोपीय फ्रेम में ढाल दिया गया, जिसमें भारत का आमजन मिसफिट हो गया। इस नए बने कृत्रिम सिस्टम में भारत का आमजन खुद को ‘अन्य’ मानकर चलने लगा और उसे यह देश खुद से ज्यादा दूसरों का लगने लगा। यह सिस्टम बढ़ते-बढ़ते आज इतना बड़ा हो गया है कि अब अमीर और गरीब की खाई इतनी गहरी हो गई है कि पाटे नहीं पट रही है।
इसी क्रम में ही एक सभ्य और उन्नत संस्कृति वाले देश को उसकी जड़ों से काटकर अनाथ बना दिया गया ताकि अपने कोड्स, अपने तरीके लागू किए जा सकें। एक आत्महीन देश ही किसी ‘उन्नत’ देश को धन्यभाव से देखता और पिछलग्गू बन जाता है। नेहरू ने भारत को उसकी मूल संस्कृति से काटकर असल में ऐसा ही देश बना दिया जो अपनी हर गति, हर उन्नति के लिए परमुखापेक्षी हो गया।
ऐसा ही देश निर्माण की जगह बनी बनाई वस्तुओं की प्रतीक्षा का आदी हो जाता है, उपभोक्ता हो जाता है। आज भारत वस्तुओं से लेकर विचार तक और मनोरंजन से लेकर पर्वों तक यूरोप-अमेरिका की तरफ टकटकी लगाए देखता एक उपभोक्तावादी देश ही तो हो गया है।
इसी क्रम में अंग्रेज़ों ने भारत को असभ्य देश बता कर उसे हिकारत से देखा, उसकी रीढ़ तोड़ी और मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि यह कैसा देश है जिसमें न सभ्यता है और न व्यवस्था। डॉ. कामेश्वर उपाध्याय अपने लेख में लिखते हैं कि अंग्रेजों ने कहा यह हिन्दू धर्म बड़ा अज़ीब है, 365 दिनों में 1660 पर्व मनाता है। इन पर्वों ने इन्हें कुंद कर दिया है। अतः सभ्य करने के क्रम में उन्होंने भारत के उन पर्वों को असभ्यता और पिछड़ेपन की तरह प्रचारित करना शुरू कर दिया। अंग्रेज़ों की फ्रेम्ड शिक्षा-पद्धति से पढ़ा भारतीय जनमानस इस धारा में बह भी गया।
उनके द्वारा निर्मित रेनेसां की अवधारणा और पैसे की ताकत ने उन्हें आधुनिकता और सभ्यता का प्रतीक पहले ही घोषित कर रखा था और लॉर्ड मैकॉले की शिक्षा-नीति ने रही सही कसर भी पूरी कर दी और भारत की सांस्कृतिक रीढ़ टूट गई तथा वह एक आत्महीन, गौरवहीन, उपभोक्तावादी देश बन गया। तो ऐसा भारत आसानी से उनकी तरफ शिफ्ट हो गया। रही सही कसर अँग्रेज़ों के बनाए दिमाग़ (नेहरू आदि) ने पूरी कर दी। जिसने स्वतंत्रता के पश्चात भी भारत को अँग्रेज़ों से मुक्त होने नहीं दिया और आज भी भारत सांस्कृतिक-गुलामी का दंश झेलने को बाध्य है।
आज उन्हीं अँग्रेज़ों (ईसाइयों/यूएन) ने दुनियाभर में 1000 से भी ज़्यादा ‘डे’ घोषित कर दिए हैं। लेकिन यह उनकी नज़र में सभ्यता और व्यवस्था का सूचक है। यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि जिस देश में गुरु-पूर्णिमा जैसा पवित्र पर्व मनाया जाता रहा हो, उस देश में अलग से शिक्षक दिवस की क्या आवश्यकता आन पड़ी थी, तो शायद ही जवाब मिले।
पूरी दुनिया में लेखकों और साहित्य का इससे बड़ा सम्मान और क्या होगा कि एक कवि (वेद व्यास) के जन्मदिन के दिन को पर्व की तरह, किसी धार्मिक महत्व के पर्व की तरह सेलिब्रेट किया जाता हो। पूरी दुनिया में साहित्य का ऐसा सम्मान विरले है। जिस देश में पुस्तकों को साहित्य न मानकर धर्म के प्रतीक की तरह पूजा जाता हो, वैसा समाज और देश इस दुनिया में नहीं ही होगा इस तथ्य को लॉर्ड मैकॉले समझ गए थे, लेकिन नेहरू नहीं समझ सके और उन्होंने भारत को उसकी मूल संस्कृति से काटकर यूरोप की संस्कृति और सिविल कोड्स से जोड़ना ज़्यादा उचित समझा।
नेहरू का ‘डिस्कवरी ऑफ इण्डिया’ असल में हिन्दू संस्कृति वाले भारत को शिफ्ट कर आधुनिक यूरोपीय नज़र से एक सांस्कृतिक उपनिवेशवादी भारत को गढ़ना ही था। वे ऐसे ही खुद को ‘एक्सिडेंटल हिन्दू’ नहीं कहते थे। उनके अंदर भी भारत के इतिहास और संस्कृति को लेकर कहीं-न-कहीं हीन भावना था तभी महात्मा गाँधी के भारतवादी मॉडल को रिजेक्ट कर यूरोपीय मॉडल को भारत के लिए उपयुक्त माना। महात्मा गाँधी ने अँग्रेज़ों के जाने के बाद नेहरू को दो ज़रूरी सुझाव दिए थे। पहला, कॉग्रेस को भंग कर दो और दूसरा, भारत को ग्राम आधारित समाज की तरह विकसित करो जिसे भारत की मूल विशेषताओं के आलोक में नया भारत बन सके। नेहरू ने दोनों ही सुझावों को मानने से इनकार कर दिया।
वे खुद अंग्रेजी माध्यम के पढ़े-लिखे व्यक्ति थे तथा उन्हें विलायत में रहने आदि का लंबा अवसर मिला था। उनकी जीवनशैली और रहन-सहन भी यूरोप से प्रभावित थी। इन्हीं सब के प्रभाव में उन्होंने महात्मा गाँधी के आदर्शों को हाशिए पर करके एक यूरोप की नज़र का भारत फ्रेम्ड कर दिया।
इस फ्रेम में आज आसानी से यूएन द्वारा घोषित और पोषित नीतियाँ लागू कर दी जाती हैं। पितरों को इतना महत्व देने वाला देश जो कि उनके मर जाने के बाद भी उनके लिए 16 दिन का महत्वपूर्ण पर्व मनाता है और उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर उनकी शांति की कामना करता है उस देश को ‘फादर्स डे’ जैसा एक अलग प्रतीक दिवस डे दिया गया। 30 दिनों तक अलग-अलग तरीके से स्त्रियों की शक्ति और महत्त्व के आगे नतमस्तक होकर उनके गुणों का गान करने वाली विचारसरणी को ‘मदर्स डे’ जैसा पर्व पकड़ा दिया गया और नेहरू के यूरोप माइंडेड फ्रेम में यह सब आसानी से अपनाया जाता रहा है।
भूमंडलीकरण असल में है क्या, यूरोप अमेरिका की जीवनशैली को अपनाकर उन्हीं की तरह जीना ही न। आज बहुलतावादी भारत ईसाई यूरोप की तरह एकत्ववादी हो गया है। विभिन्न भाषाओं और बोलियों वाला देश एक भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने की माँग करता है, एक झंडा, एक संस्कृति, एक दृष्टि का हिमायती हो गया है, जबकि अँग्रेजों के आधार पर फ्रेमिंग के पहले इस देश में ऐसी कोई माँग या हिमायत नहीं थी। तमाम विविधताओं के बीच इस देश का मज़े में काम चलता था।
उस समय अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मैथिली आदि तमाम भाषाएँ थीं और सभी प्रसन्नतापूर्वक आत्मगौरव से रह रही थीं लेकिन आज अधिकतर भाषाएँ बोलियाँ होकर उपेक्षित, आत्महीन होने को अभिशप्त हो गई हैं। अँग्रेज़ों की तरह भारत को फ्रेम्ड करने से भारत की मूल आत्मा ही खो गई है। भारती की हिन्दूवादी विचारसरणी प्रकृत्या बहुलतावादी और अन्य को स्पेस देनेवाली विचारसरणी है, लेकिन इस नए फ्रेम ने उसे दबाकर एकत्ववाद को थोप दिया है।
यूरोप और उसकी दृष्टि ने असल में भारत को कुंद और संकुचित ही किया है। नेहरू ने यूरोप की तरफ मुँह करने की जगह अगर उसकी तरफ पीठ कर लिया होता और भारत को भारत की विशेषताओं के आलोक में गढ़ने का प्रयत्न किया होता तो संभवतः भारत बहुत पहले ही विश्व शक्ति बन गया होता।
भारत के पर्ववादी मानस और यूएन के ‘डे वादी’ मानस में ज़मीन आसमान का फर्क है। यूएन के यहाँ जहाँ भोगवादी मनःस्थिति प्रमुख है तो भारत के पास पवित्रता और कल्याण की भावना प्रमुख है। इस लेख का उद्देश्य शिक्षक-दिवस का विरोध नहीं है, बल्कि अपने स्वर्णिम अतीत और परम्परा का ज्ञान कराना है, क्योंकि कहते हैं कि जो देश अपनी परम्परा को नहीं जानता वह आज नहीं कल मृत हो जाता है और भारत न कभी मरा है और न आगे मरेगा।
अतः भारत के लोगों को अपनी परम्पराओं को यूएन की प्रतीकवादी राजनीति के बरअक्स स्थापित कर दुनिया को एक भव्य विकल्प देना चाहिए। जैसे कोरोना काल में ‘नमस्ते’ के महत्व को दुनिया ने मान दिया, वैसे ही जब वे भारत की और परम्पराओं से अवगत होंगे तो निश्चय ही यूरोप-अमेरिका की भोगवादी संस्कृति को छोड़ भारत से जुड़ना चाहेंगे। आत्मनिर्भर भारत, विश्व गुरु भारत और क्या है।
चेन्नई के विरुगंबक्कम (Virugambakkam) इलाके में अरुलमिगु सुंदरा वरदराज पेरुमल मंदिर (Arulmigu Sundara Varadharaja Perumal temple) की 10 एकड़ जमीन कलेक्टर ने मस्जिद कमेटी से वापस ले ली है।
स्वराज्य की खबर के मुताबिक, दो दशक पहले स्थानीय मस्जिद कमेटी ने इस पर अपना कब्जा किया था। कब्जे के बाद से ही श्रद्धालु व मंदिर से जुड़े कार्यकर्ता जमीन वापस पाने की कोशिशों में जुटे थे।
रिपोर्ट की मानें तो कलेक्टर ने अभी भी उस याचिका पर प्रतिक्रिया नहीं दी है जिसमें मंदिर के तालाब को वापस पाने की माँग की गई है। यह तालाब उसी मंदिर का है और करीब 2.5 एकड़ जमीन पर है। रिपोर्ट बताती हैं कि 1997 में तालाब को खाली किया गया था। मगर, कुछ स्वार्थी लोगों ने तालाब व उसके आसपास की 14 एकड़ जमीन को हथियाने का प्रयास किया, जबकि यह जमीन सुनगुवार ब्राह्मण समुदाय के लोगों ने दान में दी थी।
बावजूद इसके, स्थानीय मस्जिद समिति ने सरकारी कर्मचारियों की मदद से अपने नाम पर कब्जे वाली 3 एकड़ जमीन को पंजीकृत करने में कामयाबी कर ली। जिसे जानने के बाद जल्द ही, हिंदू मुन्नानी और मंदिर कार्यकर्ता मामले में शामिल हो गए।
मंदिर उपासक सोसायटी के अध्यक्ष टी आर रमेश ने मामले में जनहित याचिका दायर की और मद्रास उच्च न्यायालय ने उनकी दलीलों को स्वीकार करते हुए पंजीकरण रद्द कर दिया। फिर हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा।
हालाँकि, बाद में मामले की जाँच का काम जिलाधिकारी को सौंपा गया। जिसके मद्देनदर उन्होंने मस्जिद कमेटी के प्रतिनिधियों को बुलवाया। लेकिन इस पूछताछ के लिए वे उपस्थित नहीं हुए। नतीजतन 2 साल बाद भी इस पर कोई निष्कर्ष नहीं निकला।
इसके बाद घटनाक्रमों से अनजान, मंदिर कार्यकर्ता जेबमणि मोहनराज ने मंदिर के तालाब को पुनः प्राप्त करने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। दूसरी बार भी केस उसी जज के पास गया जिन्होंने पिछली बार फैसला सुनाया था। न्यायाधीश ने मामले की सुनवाई करते हुए कलेक्टर को तुरंत अपनी जाँच पूरी करके यह निर्धारित करने के लिए निर्देशित किया कि क्या वहाँ एक तालाब मौजूद है?
बता दें, कलेक्टर ने इस मामले में जो फैसला सुनाया है उसमें जमीन को तालुक बोर्ड को देने की बात है। क्योंकि साल 1910 के रिकॉर्ड में जमीन उन्हीं के नाम है। जिसका मतलब है कि फैसले में वह जमीन मंदिर को वापस नहीं मिली। इससे उसके स्वामित्व पर अब भी सवाल है। वहीं तालाब को लेकर कोई फैसला नहीं आया है। स्वराज्य की माने तो मोहनराज ने मद्रास हाई कोर्ट ने इस मामले पर दोबारा याचिका डाली है।