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‘राहुल सोलंकी पर गोली मैंने ही चलाई थी’ – सबूत और CCTV फुटेज देख मुस्तकीम ने कबूल किया जुर्म, दिल्ली दंगे में है आरोपित

दिल्ली हिंदू विरोधी दंगे के दौरान शिव विहार में राहुल सोलंकी की हत्या मामले में मुस्तकीम उर्फ समीर सैफी ने कथित तौर पर दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के सामने अपना जुर्म को स्वीकर कर लिया है। इससे पहले क्राइम ब्रांच ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर उसे 6 सितंबर को गिरफ्तार किया था।

दिल्ली पुलिस के अतिरिक्त प्रवक्ता अनित मित्तल ने बताया, “हिंसा के समय की वीडियो फुटेज देखते हुए एक शख्स पर नजर गई, जो सोलंकी को गोली मार रहा था। 3 सितंबर को हमें सूचना मिली कि सैफी मिल गया है।” उन्होंने बताया कि खूफिया सूचना के आधार पर युवक भजनपुरा से पकड़ा गया है। सीसीटीवी में दिखे शख्स का पूरा विवरण हमलावर से मेल खाता था।

अनित मित्तल ने बताया कि शुरुआत में सैफी ने मर्डर में अपना हाथ होने से मना किया। लेकिन उसे जब सबूत दिखाए गए तो उसने इस बात को स्वीकार कर लिया कि उसने ही सोलंकी पर गोली चलाई थी।

दिल्ली पुलिस ने उसके पास से देशी पिस्टल भी बरामद की है। मौजूदा जानकारी के अनुसार, मुस्तकीम पेशे से कारपेंटर (बढ़ई) है। उसके ऊपर 1 लाख का इनाम भी था। उसके पास से पुलिस ने मोबाइल फोन, एक जोड़ी जींस, जूते और साथ में वो हेलमेट भी जब्त किया है, जिसे उसने सोलंकी को गोली मारने के समय पहना था।

दिल्ली पुलिस प्रवक्ता ने कहा कि सैफी फरुखिया मस्जिद के पास हो रहे सीएए विरोध प्रदर्शनों में भी सक्रिय था। इसके अलावा शिक्षा की बात करें तो वह 10वीं ड्रॉप आउट है।

इससे पहले इस केस में आईपीसी की धारा 34, 120बी, 147, 148, 149, 302, 436 और 427 के तहत मामला दयालपुर थाने में दर्ज हुआ था। इसके बाद ही यह केस  दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच को ट्रांसफर हुआ। मुस्तकीम से पहले एसआईटी ने आरिफ, अनस, सिराजुद्दीन, सलमान, इरशाद और सोनू सैफी को गिरफ्तार किया था।

बता दें कि राहुल सोलंकी की फरवरी में दिल्ली के शिव विहार में हिंदू विरोधी दंगों के दौरान संप्रदाय विशेष की भीड़ ने हत्या कर दी थी। जून में, दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने 27 वर्षीय राहुल सोलंकी की हत्या मामले में आरोप-पत्र दायर किया था।

आरोप-पत्र में कहा गया था कि 24 फरवरी को शाम 5 बजे के आसपास शिव विहार के पास हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान सोलंकी की दयालपुर इलाके में उनके घर के पास हत्या कर दी गई थी।

शिव विहार निवासी राहुल सोलंकी गाजियाबाद के एक निजी कॉलेज से एलएलबी कर रहे थे। वह दूध लेने के लिए अपने घर से निकले थे, तभी दंगाइयों ने उनके गले के पास दाहिने कंधे में गोली मार दी थी। जिस समय दंगाइयों ने सोलंकी की गोली मारकर हत्या कर दी, उस समय वह राजधानी स्कूल से सटे पाल डेयरी गली के पास खड़े थे।

इससे पहले, आरोपितों में से एक, सलमान ने पुलिस को बताया था कि वह राहुल को अच्छी तरह से जानता था क्योंकि राहुल का भाई रोहित उसके ग्रुप के साथ क्रिकेट खेलता था। सलमान ने पुलिस से कहा था कि वह हिंसक भीड़ में शामिल हो गया और दिल्ली की सड़कों पर ‘इस्लाम को बचाने के लिए’ आतंक फैलाया।

भारत की एक बेटी के आत्मसम्मान की लाज रखी है आपने: Y-कैटेगरी सुरक्षा मिलने पर अमित शाह से बोलीं कंगना

गृह मंत्रालय ने कंगना रनौत को Y-कैटेगरी सुरक्षा प्रदान की है। अभिनेत्री कंगना रनौत को शिवसेना के नेताओं से लगातार धमकियाँ मिल रही थीं। उन्हें संजय राउत के अलावा शिवसेना के एक विधायक और मुंबई के मेयर ने भी धमकाया था। मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा कंगना रनौत को Y-कैटेगरी सुरक्षा मिलने की बात कही गई, जिसकी अभिनेत्री ने पुष्टि करते हुए केंद्र सरकार और अमित शाह का आभार जताया है।

कंगना रनौत ने इस खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ये इस बात का प्रमाण है कि अब किसी देशभक्त आवाज़ को कोई फ़ासीवादी नहीं कुचल सकेगा। कंगना ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का आभार जताते हुए कहा कि वो चाहते तो हालातों के चलते मुझे कुछ दिन बाद मुंबई जाने की सलाह देते मगर उन्होंने भारत की एक बेटी के वचनों का मान रखा, हमारे स्वाभिमान और आत्मसम्मान की लाज रखी। अभिनेत्री ने सोशल मीडिया पर ‘जय हिन्द’ भी लिखा।

कंगना ने बॉलीवुड के डार्क साइड का खुलासा करते हुए कहा था कि  बॉलीवुड में कानून-व्यवस्था के लिए जिम्मेदार एजेंसियों का कोई दखल नहीं है। इसे माफिया या अंडरवर्ल्ड से जुड़े लोग चलाते हैं। यदि आपने कभी मदद के लिए पुलिस का दरवाजा खटखटाया तो वे आपको ‘पागल’ करार देंगे और आपका बहिष्कार या आपकी हत्या कर देंगे। कंगना ने दावा किया था कि कई सरकारों ने बॉलीवुड में ड्रग माफिया को मजबूत होने में मदद की है।

कंगना इससे पहले यह भी बता चुकी हैं कि किस तरह मूवी माफिया अपने इशारों पर नहीं नाचने वाले आउटसाइडर का करियर ख़त्म करते हैं। उन्होंने कहा था, “इन लोगों ने सुशांत सिंह को एक बलात्कारी में तब्दील कर दिया था। वह कैसे अपने घर बिहार वापस जाता? छोटे शहरों में पैसे नहीं देखे जाते, सम्मान देखा जाता है।”

AltNews वाला मोहम्मद जुबैर: जिसने फैलाई 25 फेक खबरें, नाबालिग लड़की की ऑनलाइन प्रताड़ना का है आरोपित

प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘ऑल्ट न्यूज़’ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर पर एक नाबालिग लड़की की ऑनलाइन प्रताड़ना का आरोप लगा, जिसके बाद बाल आयोग ने उनके खिलाफ एक्शन लेते हुए एफआईआर दर्ज किया। अब प्रतीक सिन्हा भी उसके समर्थन में उतर आए हैं और कहा है कि जुबैर ‘फेक नैरेटिव से लड़ाई’ लड़ते हैं, इसीलिए वो उनके साथ खड़े हैं। एक तो झूठा दावा, ऊपर से इसके बहाने नाबालिग की प्रताड़ना को जायज ठहराने की कोशिश। अंकुर सिंह ने इस फेक दावे की पोल खोली।

‘पोलिटिकल कीड़ा’ के संस्थापक अंकुर सिंह ने ट्विटर पर ‘ऑल्ट न्यूज़’ के मोहम्मद जुबैर की पोल खोलते हुए उसका कच्चा चिट्ठा पेश किया। उन्होंने दर्जनों ऐसे उदाहरण गिनाए, जब जुबैर ने झूठ फैलाया। अधिकतर बार उसे अपनी ट्वीट्स डिलीट करनी पड़ी। साथ ही अंकुर ने उसे ‘रसोड़े का फैक्ट-चेकर’ करार दिया। यहाँ हम उस थ्रेड से उन घटनाक्रमों को आपके समक्ष रख रहे हैं, जब जुबैर ने झूठ फैलाया और उसकी बेइज्जती हुई।

  1. ज़ुबैर ने दावा किया कि जहाँ मेक्सिको में टीवी के माध्यम से पढ़ाई कराई जा रही है, भारत में दूरदर्शन पीएम मोदी के ‘मन की बात’ के प्रसारण में लगा हुआ है। बाद में जब लोगों ने बताया कि भारत में 3 दर्जन से भी अधिक चैनल पठन-पाठन के काम में लगे हुए हैं, उसने अपनी ट्वीट्स डिलीट कर दी।
  2. उसने सोलापुर में आग लगने की खबर शेयर की। उसने अप्रैल में ये वीडियो शेयर किया जबकि ये फ़रवरी का निकला। बाद में उसने भी माना कि उसने जिस वीडियो को रीट्वीट किया था, वो 2 महीने पुराना है।
  3. इसके बाद उसने दावा किया कि पीएम मोदी के ‘मन की बात’ के वीडियो पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन के डर से कमेंट्स ऑफ कर दिया गया है। हालाँकि, पीएमओ इंडिया के पेज पर सारे वीडियोज पर कमेंट्स वर्षों से ऑफ हैं। जबकि नरेंद्र मोदी और भाजपा के यूट्यूब चैनल पर इसी वीडियो पर कमेंट किया जा सकता है।
  4. जब महंत गोपालदास के कोरोना पॉजिटिव होने की खबर आई तो उसने एडिटेड फोटो शेयर कर के दावा किया कि सरसंघचालक मोहन भागवत उनके बगल में ही बैठे थे। जबकि ये तस्वीर फोटोशॉप्ड है।
  5. खबर आई थी कि अमेरिका के टाइम्स स्क्वायर पर राम मंदिर का बिलबोर्ड दिखाया जाएगा। जुबैर ने दावा किया कि इस कार्यक्रम को कैंसल कर दिया गया है। जबकि तय समय पर राम मंदिर के डिजिटल बिलबोर्ड का प्रदर्शन हुआ।
  6. उसने अपने पेज ‘अनऑफिसियल सुब्रमण्यन स्वामी’ से दावा किया कि भाजपा स्ट्रांग रूम से ईवीएम चुरा रही है। फैक्टहंट द्वारा फैक्ट चेक के बाद उसने पेज के एडमिन्स में से एक पर दोष डाल कर इतिश्री कर ली।
  7. उसने एक तस्वीर शेयर कर के दावा किया कि किसानों के साथ पुलिस आतंकियों की तरह व्यवहार कर रही है। बाद में खुलासा हुआ कि ये वीडियो 2013 है, जब केंद्र में यूपीए की सरकार थी। ये तस्वीर कविता कृष्णन ने ट्वीट की थी, जिसे जुबैर ने आगे बढ़ाया।
  8. श्रीलंका में हुए हमले के बाद वहाँ के एक मंत्री ने पत्र लिखा, जिसमें कहा गया था कि ख़ुफ़िया अधिकारियों को पहले से इसकी भनक थी। जब अभिजीत मजूमदार और आनंद रंगनाथन जैसे लोगों ने इस पत्र को आगे बढ़ाया तो जुबैर ने आतंकियों के बचाव के लिए उसे फेक करार दिया। जबकि मंत्री ने खुद अपने हैंडल से उसे डाल रखा था।
  9. उसने एक विरोध प्रदर्शन का वीडियो शेयर कर के लिखा कि दिल्ली में इतना बड़ा विरोध होने के बावजूद मीडिया इसे नहीं दिखा रहा। जबकि असलियत ये थी कि वो वीडियो मुंबई का था।
  10. जब देश भर में मॉब लिंचिंग को लेकर मुद्दा गरमाया हुआ था और इसे लेकर नैरेटिव बनाया जा रहा था, तब मोहम्मद जुबैर ने कॉन्ग्रेस शासनकाल का एक विरोध प्रदर्शन का वीडियो शेयर किया, ताकि लोग मोदी सरकार पर हमला बोल सकें।
  11. उसने दावा किया कि विश्व हिन्दू परिषद् के कार्यकर्ताओं ने ‘हिंदुस्तान मुर्दाबाद’ का नारा लगाया। गोंडा पुलिस ने इन ख़बरों का खंडन करते हुए कहा कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था।
  12. उसने अपने फेसबुक पेज से किया कि कश्मीरी छात्र रक्तदान कर रहे हैं। जबकि वो तस्वीर एक घायल व्यक्ति की थी, जो विरोध प्रदर्शन के दौरान जख्मी हो गया था। अस्पताल में उसका इलाज हो रहा था।
  13. मोहम्मद जुबैर ने अंजू घोष को बांग्लादेशी अभिनेत्री बताते हुए भाजपा की आलोचना की। लेकिन, दिलीप घोष ने उनका जन्म प्रमाण पत्र शेयर कर के उसके झूठ पर विराम लगाया।
  14. पीएम मोदी ने बताया था कि प्रधानमंत्री बनने से पहले वो अपने कपड़े खुद धोया करते थे। बाद में जुबैर ने एक खबर शेयर कर किया, जिसमें लिखा था कि वो पीएम मोदी का धोबी था। उसकी हार्ट अटैक से मृत्यु हुई। उसने ये साबित करने का प्रयास किया कि पीएम मोदी अपने कपड़े खुद नहीं धोते थे, वो झूठ बोल रहे। जबकि उसी खबर में लिखा था कि वो धोबी मोदी के कपड़े प्रेस करता था, धोता नहीं था।
  15. जम्मू कश्मीर के डिप्टी ग्रैंड मुफ़्ती ने दूसरे समुदाय के लिए अलग मुल्क की माँग की, जिस पर ऑपइंडिया ने खबर प्रकाशित की। जुबैर ने किसी अन्य क्लेम का फैक्ट-चेक शेयर कर के दावा कर दिया कि ये खबर गलत है।
  16. कठुआ मामले में विशाल जंगोत्रा निर्दोष है या नहीं, इस सम्बन्ध में ऑपइंडिया ने जब खबर प्रकाशित की तो जुबैर ने इसकी आलोचना की। जबकि बाद में वो कोर्ट से भी निर्दोष साबित हुआ, तब जुबैर की बोलती बंद हो गई।
  17. उसने उस ट्वीट को आगे बढ़ाया, जिसमें ग्रेटर नोएडा हत्याकांड के आरोपित सोनू पाठक का भाजपा से जुड़ाव बताया गया था। बाद में पता चला कि वो कोई और सोनू पाठक है, हत्या आरोपित नहीं।
  18. कन्हैया कुमार ने दावा किया कि बेगूसराय में एक फेरीवाले को पाकिस्तान जाने की बात कह के गोली मार दी गई। जबकि बाद में खुलासा हुआ कि ये घटना सांप्रदायिक थी ही नहीं, किसी चीज की खरीद-बेच को लेकर झगड़ा हुआ था, जिसके बाद ये घटना हुई।
  19. जब तबलीगी जमात वालों ने महामारी फैलाई और मौलाना साद के ऑडियो वायरल हुआ, जिसमें वो समुदाय के लोगों को कोरोना से न डरते हुए सारी इस्लामी गतिविधियाँ जारी रखने की सलाह दी, तो मोहम्मद जुबैर ने इस ऑडियो को फेक बताया। दिल्ली पुलिस ने इन दावों को ही फेक बता दिया और ऑडियो सही निकला।
  20. उसने दावा किया कि एक दलित लड़के को मंदिर में घुसने पर मार डाला गया। सच्चाई ये थी कि 5000 रुपए के लोन को लेकर ये वारदात हुई थी। उस मंदिर का इतिहास रहा है कि उसमे दशकों से दलित जाकर पूजा-पाठ करते आ रहे हैं।
  21. उसने दावा किया कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा कभी टीपू जयंती समारोह में हिस्सा लेते थे और अब इसका विरोध करते हैं। साथ ही उसने समारोह की तस्वीर भी शेयर की। जबकि वो फोटो ”कर्नाटक जनता पक्ष अल्पसंखज्यक समारोह’ का था, टीपू जयंती का नहीं।
  22. मोहम्मद जुबैर ने दावा किया कि नीतेश कुमार ने 263 करोड़ रुपए की लागत से जिस सत्तर घाट पुल का उद्घाटन किया था, वो बाढ़ से ढह गया है। जबकि सच्चाई ये है कि सत्तर घाट पुल से 2 किलोमीटर दूर स्थित एक छोटी पुलिया का पहुँच पथ टूटा था, पुल नहीं।
  23. अर्बन नक्सलियों के पास से आपत्तिजनक पुस्तक ‘वॉर एंड पीस’ जब्त हुआ, जिसकी चर्चा बॉम्बे हाईकोर्ट में हुई। बाद में पीएम मोदी का भी ‘वॉर एंड पीस’ पुस्तक पढ़ते हुए तस्वीर जुबैर ने वायरल की। उसे ये नहीं पता था कि किताब का नाम तो समान था लेकिन नक्सलियों वाली इसी नाम की पुस्तक विश्वजीत रॉय ने लिखी थी जबकि पीएम मोदी लिओ टॉलस्टॉय की किताब पढ़ रहे थे।
  24. उसने एक फेक न्यूज़ शेयर कर के दावा किया कि मेजर गोगोई को एक लड़की के साथ आपत्तिजनक अवस्था में गिरफ्तार किया गया है।
  25. उसने एक तस्वीर शेयर कर के दावा किया कि सीएम योगी आदित्यनाथ ने विवेक तिवारी के परिवार से बातचीत के समय उन्हें अपने से दूर रखा जबकि एक अन्य तस्वीर में सीएम योगी परिवार के बच्चों को पास बुला कर उनकी पीठ थपथपाते हुए बात करते दिख रहे हैं। उसने इस तस्वीर को छिपा लिया।

इन ट्वीट्स के दौरान अंकुर सिंह ने उन अंतरराष्ट्रीय फैक्ट-चेकिंग एजेंसियों को भी घेरा, जिन्होंने ‘ऑल्ट न्यूज़’ को फैक्ट-चेक करने के लिए सम्बद्धता दे रखी है। अंकुर सिंह ने तस्वीरों और स्क्रीनशॉट्स के जरिए मोहम्मद जुबैर की धज्जियाँ उड़ाई। बावजूद इसके स्वरा भास्कर सहित लिबरल समूह के कई बड़े नामों ने जुबैर का समर्थन करते हुए ट्रेंड चलाया। लेकिन, उस बच्ची की बात किसी ने नहीं की, जिसकी प्रताड़ना हुई।

ज्ञात हो राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने जानकारी दी है कि ‘ऑल्टन्यूज़’ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज की गई है। NCPCR के अध्यक्ष ने ट्विटर पर इसकी सूचना देते हुए बताया कि आयोग की ‘एक्शन टेकेन रिपोर्ट’ के अनुसार, नाबालिग लड़की की ऑनलाइन प्रताड़ना के आरोप में मोहम्मद जुबैर के खिलाफ पॉस्को एक्ट के तहत एफआईआर (FIR) दर्ज की गई है।

पैंगबर मुहम्मद का कार्टून शेयर करने की सजा: इंस्टाग्राम ने दो पत्रकारों का कर दिया अकॉउंट ब्लॉक

इंस्टाग्राम ने ‘शार्ली एब्दो’ मैग्जीन के दो पत्रकारों का अकॉउंट कई घंटों के लिए सस्पेंड कर दिया। इन दोनों पत्रकारों ने साल 2015 में शार्ली एब्दो पर हुए अटैक के मद्देनजर अपनी मैग्जीन के फ्रंट पेज की तस्वीर को शेयर किया था।

इसके जरिए उन्होंने उन लोगों को याद किया, जिन्होंने उस हमले में अपनी जान गवाई। बता दें कि साल 2015 में शार्ली एब्दो के ऑफिस पर पैगंबर मुहम्मद का कार्टून छापने के बाद हमला हुआ था।

लॉरे डौसी (Laure Daussy) नामक पत्रकार ने अपने अकॉउंट ब्लॉक होने की सूचना दी। उन्होंने कहा, “मेरा इंस्टाग्राम अकॉउंट डिएक्टिवेट हो चुका है। मैंने जो आखिरी फोटो उस पर डाली, वह शार्ली एब्दो मैगजीन के फ्रंट पेज की थी।” उन्होंने बताया कि शायद मास रिपोर्टिंग के कारण ये सब हुआ। जो अब सेंसरशिप का नया पर्याय बन चुकी है। उन्होंने लिखा ये ‘mind blowing’ है।

इसी प्रकार कॉरिन रे (Corrine Rey) ने अपने ट्विटर पर लिखा कि ऐसा ही उनके अकॉउंट के साथ भी हुआ। उन्होंने लिखा, “शार्ली एब्दो में मेरी सहकर्मी लॉरे डौसी की तरह मेरा अकॉउंट भी पैंगंबर मुहम्मद के कार्टून वाला कवर पेज शेयर करने के कारण डिएक्टिवेट हो गया है।” कॉरिनर ने इस हरकत को बेहद निंदनीय करार दिया है।

यहाँ बता दें कि सोशल मीडिया पर जिस तस्वीर के कारण पत्रकारों के अकॉउंट ब्लॉक किए जा रहे हैं, उसे लेकर शार्ली एब्दो (satirical newspaper) का कहना है कि उन्होंने इसकी 2,00,000 कॉपी प्रिंट करवाई थी। जो सामान्य संख्या से तीन गुना ज्यादा थी। बावजूद इसके सारी कॉपी बिक गई और उन्हें दोबारा वो एडिशन पब्लिश करवाना पड़ा।

अखबार का कहना है कि उन्होंने यह प्रयोग पिछले हफ्ते से शुरू किया और पेपर में उन लोगों को याद करने के लिए उस कार्टून को दोबारा से प्रकाशित किया, जो 2015 हमले में मारे गए थे। इसके लिए फ्रांस के राष्ट्रपति इम्मैनुअल मैक्रोन भी अखबार के समर्थन में आए और दोबारा कार्टून को छापने से रोकने से मना कर दिया।

जिस युवा नेता को कॉन्ग्रेस ने आज पैनल से निकाल डाला, कभी उनके पिता ने कॉन्ग्रेस में रह कर सोनिया को दी थी चुनौती

साल 2022 में होने वाले यूपी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए कॉन्ग्रेस ने रविवार (सितंबर 6, 2020) को 4 कोर कमिटियों की घोषणा की। इसमें पूर्व सांसद जितिन प्रसाद और यूपी कॉन्ग्रेस कमिटी के पूर्व अध्यक्ष राज बब्बर को शामिल नहीं किया गया है। ये दोनों नेता उन 23 कॉन्ग्रेसियों में से हैं, जिन्होंने पार्टी नेतृत्व के मुद्दे पर पिछले दिनों सोनिया गाँधी को पत्र लिखा था। इसके अलावा पूर्व सांसद आरपीएन सिंह को भी इस समिति में जगह नहीं दी गई।

बता दें कि पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल ने रविवार को यूपी के लिए घोषणा पत्र समिति, आउटरीच समिति, सदस्यता समिति और कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति के सदस्यों के नाम जारी किए। इन समितियों में कुल 27 वरिष्ठ कॉन्ग्रेस सदस्यों को शामिल किया गया है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, आरपीएन सिंह को लेकर एक नेता ने कहा है कि मुमकिन है चीन मामले पर पार्टी से हट कर अपने विचार बताने की वजह से उन्हें दरकिनार किया गया हो।

वहीं, राज बब्बर के साथ इलेक्शन पोल से जिन जितिन प्रसाद को कॉन्ग्रेस ने अलग कर दिया है, उन्हीं जितिन प्रसाद के लिए कॉन्ग्रेस साल 2019 में परेशान थी, क्योंकि पार्टी को डर था कि उनके युवा नेता भाजपा में शामिल हो सकते हैं। हालाँकि, उस समय सिंधिया की अगुवाई में कॉन्ग्रेस अपने इस नुकसान से बच गई। मगर पिछले दिनों कॉन्ग्रेस नेतृत्व को लिखी गई चिट्ठी के कारण जितिन दोबारा चर्चा में आए और फिर यूपी कॉन्ग्रेस की लखीमपुर खीरी इकाई द्वारा जितिन प्रसाद को पार्टी से निष्कासित करने का प्रस्ताव दिल्ली भेज दिया गया। इसके बाद अब यह खबर।

कॉन्ग्रेस नेता जितिन प्रसाद के साथ शायद ये सब इसीलिए हुआ क्योंकि सोनिया गाँधी को भेजी गई चिट्ठी पर हस्ताक्षर करने वालों में यूपी से एकमात्र नेता जितिन प्रसाद ही थे। या मुमकिन है उनके इस कदम के बाद लगातार ऐसे हमले होने की वजह ‘उनके पिता भी हों’। जी हाँ, जितिन प्रसाद के पिता कुंवर जीतेंद्र प्रसाद। जिन्होंने पार्टी में रहते हुए न केवल सोनिया गाँधी की अध्यक्षता को चुनौती दे डाली थी बल्कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए मैदान में भी आ गए थे।

ये बात साल 2000 की है। जितेंद्र प्रसाद 2000 में सोनिया गाँधी के ख़िलाफ़ संगठनात्मक चुनाव लड़ने मैदान में उतर गए थे। बताया जाता है कि जितेंद्र प्रसाद का वह कदम वंशवाद के ख़िलाफ़ था। उन्होंने राजीव गाँधी की हत्या के बाद 1998 में सोनिया गाँधी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने पर तो कोई विरोध नहीं किया था। मगर, जैसे ही 2000 में राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए चुनाव की घोषणा हुई, उन्होंने सोनिया गाँंधी के ख़िलाफ़ पार्टी में रहते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा। जहाँ अधिकांश वोट सोनिया गाँधी को गए और वह उन चुनाव हार गए।

पार्टी में वंशवाद के ख़िलाफ़ आवाज उठाने वाले वरिष्ठ नेता जीतेंद्र प्रसाद को यह हार और पार्टी नेताओं की मानसिकता बिलकुल बर्दाश्त नहीं हुई। नतीजतन कुछ ही महीनों में उनकी मृत्यु ब्रेन हैमरेज के कारण हो गई।

कॉन्ग्रेस में चले आ रहे वंशवाद के ख़िलाफ़ ताल ठोकने की बात जब भी उठती है, तब-तब जितेंद्र प्रसाद को याद किया जाता है। हो सकता है हालिया मामले के बाद इसी वाकये को ध्यान में रखते हुए अब कॉन्ग्रेस जितिन प्रसाद को नजरअंदाज कर रही हो।

यह गौर करने वाली बात है कि रविवार को जिन कोर कमिटी के सदस्यों के नाम का ऐलान हुआ, उनमें अधिकांश प्रिंयका गाँधी के करीबी हैं। इन कमिटियों के नाम घोषणा पत्र समिति, विस्तार समिति, सदस्यता समिति, कार्यक्रम क्रियान्यवयन समिति, प्रशिक्षण और काडर डिवलपमेंट समिति, पंचायत इलेक्शन कमिटी, मीडिया और संचार सलाहकार समिति हैं।

किस कमिटी में कौन-कौन

  • घोषणापत्र समिति – सलमान खुर्शीद, पीएल पुनिया, आराधना मिश्रा, विवेक बंसल, सुप्रिया श्रीनेत, अमिताभ दुबे।
  • विस्तार समिति – प्रमोद तिवारी, प्रदीप जैन आदित्य, गजराज सिंह, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, इमरान मसूद, बाल कुमार पटेल। सभी प्रदेश उपाध्यक्ष भी इसके सदस्य होंगे।
  • सदस्यता समिति – अनुग्रह नारायण सिंह, अजय कपूर, बृजलाल खाबरी, मोहम्मद मुकीम, कमल किशोर कमांडो, अजय राय।
  • कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति – नूर बानो, हरेंदर मलिक, प्रवीन ऐरॅन, जितेंद्र सिंह, बालकृष्ण चौहान, नसीब पठान, बंसी पहाड़िया, राम जियावन, प्रीता हरित।
  • प्रशिक्षण और काडर डिवेलपमेंट समिति – डॉ. निर्मल खत्री, हरेंद्र अग्रवाल, हनुमान त्रिपाठी, सतीश राय, डॉली शर्मा, केशव चंद्र यादव।
  • पंचायत इलेक्शन कमिटी – राजेश मिश्र, जफर अली नकवी, राजाराम पाल, प्रदीप माथुर, विनोद चतुर्वेदी, मसूद अख्तर, अजय पाल सिंह। राजीव गांधी पंचायत राज संगठन के प्रदेश अध्यक्ष भी सदस्य होंगे।
  • मीडिया और संचार सलाहकार समिति – राशिद अल्वी, ललितेशपति त्रिपाठी, अखिलेश प्रताप सिंह, सुरेंद्र राजपूत, ओंकार सिंह, विरेंद्र मदान। कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट के चेयरमैन इसके पदेन सदस्य होंगे।

‘पेशावर हमारी राजधानी थी’ – Pak को बॉर्डर पर घेर रहा अफगानिस्तान, भारत को बताया दरियादिल

भात और चीन में चल रहे तनाव के बीच पाकिस्तान भी भारत के विरोध में माहौल बनाने का प्रयास कर रहा है लेकिन अब उसकी चाल सफल नहीं हो पा रही। इसी बीच अफगानिस्तान ने भारत के साथ अपने संबंधों की सराहना की है और पाकिस्तान को भी लताड़ लगाई है। अफगानिस्तान रणनीतिक रूप से भारत और पाकिस्तान, दोनों के लिए ही ज़रूरी है। भारत इस बात को बखूबी समझता है और इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है।

लेकिन, बदलते कूटनीतिक घटनाक्रमों के बीच अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच दूरियाँ लगातार बढ़ती ही जा रही है। अफगानिस्तान के उप-राष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह ने कहा है कि उनके मुल्क का कोई भी नेता डुरंड लाइन को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता है। उन्होंने कहा कि अगर कोई ऐसा करता है तो जीवन भर उसकी निंदा होगी ही, मृत्यु के बाद भी लोग उसकी आलोचना करेंगे। उन्होंने कहा कि ये एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर चर्चा होनी चाहिए, जिसका समाधान निकलना चाहिए।

बकौल अमरुल्लाह सालेह, हम अगर ये उम्मीद करते हैं कि ये मुफ्त में ही मिल जाएगा तो ये वास्तविकता से परे है। उन्होंने याद दिलाया कि कभी पेशावर अफगानिस्तान की राजधानी हुआ करता था। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान लगातार नकारने के बाद अब ये स्वीकार कर रहा है कि वो तालिबान का पोषण करता है। उन्होंने कहा कि ये स्पष्टता रिश्तों में कड़वाहट होने के बावजूद शांति प्रक्रिया का रास्ता बना सकती है। उन्होंने पाकिस्तान की फौज के अध्यक्ष जनरल बाजवा से बातचीत भी की।

अमेरिका के सैनिक धीरे-धीरे अफगानिस्तान से निकल रहे हैं और ऐसे में वहाँ शांति-व्यवस्था बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के ईरान दौरे में भी ये मुद्दा छाया रहा, जहाँ अफगानिस्तान की स्थिरता के लिए ‘रीजनल एप्रोच मॉडल’ अपनाने का प्रस्ताव बना। 2019 में ही भारत-अफगानिस्तान-ईरान ट्रेड कॉरिडोर का उद्घाटन किया गया था, जिसमें चाहबार पोर्ट की अहम भूमिका थी। इससे अन्य एशियाई देशों को भी फायदा हुआ।

वहीं हाल ही में अफगानिस्तान से एम्बेसडर बना कर नई दिल्ली भेजे गए फरीद मामुन्ज़डे ने भारत को दरियादिल पड़ोसी बताते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच मजबूत ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रिश्ते हैं, जिन्हें आगे बढ़ाने के लिए वो काम करेंगे ताकि दोनों देशों में शांति और स्थिरता बनी रहे। उन्होंने हिंदी में लिखा, “मैं हमारी दोस्ती को हमेशा निभाने की कामना करता हूँ।” दोनों देशों में एयर इंडिया और एरियाना के बीच ‘एयर बबल करार’ हुआ है।

जनरल विपिन रावत भी पाकिस्तान को चेतावनी दे चुके हैं। उन्होंने कहा कि अगर पाकिस्तान ने फिर दुस्साहस किया तो उसे भारी पड़ेगा। उन्होंने आशंका जताई कि उत्तरी सीमा पर जारी तनाव का फायदा पाकिस्तान उठाने की कोशिश कर सकता है लेकिन जवाबी कार्रवाई के लिए भारत पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि POK और तिब्बत में चीन का निर्माण कार्य चल रहा है, जिसका भारत अध्ययन कर रहा है।

हाल ही में पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल के विदेश मंत्रियों के साथ वर्चुअल बैठक भी की थी। चीन ने पाकिस्तान का उदाहरण देते हुए कहा कि सीखते हुए अफगानिस्तान और नेपाल को भी कोरोना, आर्थिक गतिविधियों और आपसी संवाद को लेकर चीन के साथ ऐसी ही पहल करनी चाहिए। चीन के विदेश मंत्री ने पाकिस्तान व चीन की साझा पहल की मिसाल दी थी। वो लगातार छोटे देशों को लुभाने में लगा हुआ है। 

महिला नक्सली के हाथ में बंदूक, धमकी भरे पोस्टर और राजनीतिक प्रश्रय: बंगाल में माओवादियों की वापसी और 4 घटनाएँ

माओवादी पिछले कई सालों से पश्चिम बंगाल में दहशत की वजह बने हुए हैं खासकर जंगलमहल क्षेत्र में। इस पूरे इलाके में पश्चिम मिदनापुर, पुरुलिया, झारग्राम और बाँकुड़ा जैसे जिले कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (माओवादी) का गढ़ बने हुए हैं। साल 2009 से 2011 के बीच माओवादी जंगलमहल में एक अलग क्षेत्र बनाने में काफी हद तक कामयाब रहे थे।

वामपंथ के चरमपंथी समूह और सुरक्षाबलों के बीच तब गोलीबारी का लंबा दौर चला था। इस घटना में कुल 350 आम नागरिकों ने अपनी जान गँवाई थी और 80 माओवादी नेताओं पर कार्रवाई हुई थी। इसे पश्चिम बंगाल के जंगली कॉरिडोर का सबसे भयानक और कठिन अभियान माना जाता है। इसमें लगभग 50 सुरक्षाबल शहीद भी हुए थे। मल्लौला कोटेश्वर राव उर्फ़ किशन जी की हत्या के बाद इस घरेलू आतंकवादी समूह का प्रभाव लगभग ख़त्म हो गया था। इसके बाद पूरे इलाके में माओवादी गतिविधियाँ काफी कम हो गई थी। 

ख़बरों की मानें तो ऐसा माना जाता है कि माओवादी झारखंड के सिंहभूम जिले में अपना कैम्प लगाते हैं। पीछे कुछ महीनों से माओवादी झारग्राम में काफी सक्रिय रहे हैं। पिछले कुछ समय में झारग्राम में ऐसी 4 घटनाएँ हुई हैं, जिनके आधार पर माओवादियों की मौजूदगी और सक्रियता का डर फिर से बढ़ रहा है। ऐसी जानकारियों के आधार पर राज्य प्रशासन और खुफ़िया एजेंसियों ने हालात नियंत्रण में करने के लिए अभियान शुरू कर दिया है। 

हाल ही में माओवादियों ने पश्चिम बंगाल के बेलपहाड़ी स्थित सिमुलपल इलाके में टंगी कुसुमग्राम में पर्यटकों के एक समूह के साथ डकैती की। खड़गपुर से आए पर्यटकों को मोबाइल समेत अपने पास लगभग हर चीज़ देनी पड़ी। क्योंकि वह पूरा क्षेत्र पर्यटन के लिए मशहूर था, इसलिए वहाँ आने वाले लोगों के बीच भय का माहौल बन गया है। माओवादियों की संख्या 6 थी, जिसमें 3 महिलाएँ थीं और उन सभी के पास बंदूकें थीं। उन्होंने दिन में ही पर्यटकों को रोका और उनके मोबाइल फोन छीने। इसके बाद वह पड़ोसी राज्य झारखंड की तरफ आगे बढ़ गए। 

साभार – संगबाद प्रतिदिन

झारग्राम के पुलिस अधीक्षक अमित कुमार भारत राठौड़ ने इस घटना के बारे में अन्य जानकारी दी। उन्होंने बताया कि हाल ही में पश्चिम बंगाल, झारग्राम जिले में बेलापहाड़ी के पास भूलाबेधा क्षेत्र में माओवादियों के 3 पोस्टर पाए गए थे। साल 2009 के दौरान जंगलमहल के आस-पास ऐसे पोस्टर का मिलना आम बात थी। इनके वापस नज़र आने का यही मतलब है कि माओवादी समूह दोबारा संगठित हो रहे हैं और किसी नई योजना पर काम कर रहे हैं। 

साभार – टाइम्स ऑफ़ इंडिया

एक पोस्टर में लिखा था ‘ठेकेदार सौरव सड़क का काम बंद करो।’ पोस्टर में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया का ज़िक्र था और उसमें ठेकेदार सौरव रॉय को धमकी दी गई थी। धमकी में ऐसा कहा गया था कि वह धरसा से पराड़ी के बीच 40 किलोमीटर की सड़क का काम बंद करे। हालाँकि सौरव रॉय को इस बात की जानकारी नहीं थी और वह अपने काम में लगातार जुटे हुए थे।

इसके कुछ समय बाद माओवादियों ने गैस डीलर बिद्युत दास पर जानलेवा हमला किया था। माओवादियों ने उनसे 2 लाख रुपए की माँग की थी, जिसे देने से उन्होंने इनकार कर दिया था। इसके बाद 28 अगस्त को माओवादियों ने उन पर और उनकी पत्नी पर रात के 9:30 बजे अंधाधुंध गोलियाँ चलाई थीं।

घटना झारग्राम जिले के बेलापहाड़ी स्थित पोछा पानी गाँव में हुई थी। जब माओवादियों ने पति-पत्नी पर गोली चलाई, तब वह छत पर मौजूद थे। जैसे ही उन्होंने गोलीबारी की आवाज़ सुनी, वह जान बचाने के लिए छत से कूद कर भागे। अँधेरे का फायदा उठाते हुए माओवादी मौके से भाग निकले। घटना पर एक पुलिस अधिकारी ने कहा था, “लगता है माओवादी फिर से इकट्ठा हो रहे हैं और दास जी की जान लेना चाहते हैं।”

साभार – इंडियन एक्सप्रेस

15 अगस्त के दौरान भी माओवादियों ने झारग्राम के भूलाभेदा इलाके के 2-3 गाँवों में पोस्टर्स लगाए थे। पोस्टर्स में लिखा था कि स्थानीय लोग 15 अगस्त को ‘काले दिवस’ के तौर पर मनाएँ। इस पोस्टर पर कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का ज़िक्र था। इस तरह के लगभग 10-12 हाथ से लिखे गए पोस्टर झारग्राम पुलिस ने बरामद किए थे।

इस पर पुलिस अधिकारी ने कहा था, “माओवादियों के पास फिलहाल किसी भी तरह की सेना नहीं बची है। साल 2011 में मल्लौला कोटेश्वर राव उर्फ़ किशन जी की मौत के बाद बहुत से माओवादियों ने आत्मसमर्पण कर दिया था। ऐसे पोस्टर पश्चिमी मिदनापुर में पिछले साल पाए गए थे।”

साभार – हिंदुस्तान टाइम्स

फिलहाल इस मामले में जाँच शुरू कर दी गई है लेकिन अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। इस तरह की कई घटनाएँ सामने आने के बाद पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर इस मुद्दे पर अपनी बात रखी थी। उन्होंने कहा था कि एक बार फिर राज्य में माओवादियों की सक्रियता स्पष्ट रूप से नज़र आ रही है।

हैरानी की बात यह है कि माओवादियों को प्रदेश सरकार से पूरा सहयोग भी मिल रहा है। ममता बनर्जी ने छात्रधर महतो को टीएमसी की प्रदेश कार्यकारिणी समिति में शामिल किया था। महतो 10 साल तक जेल में रह चुका है और माओवादी संगठनों के लिए काम भी करता था।     

बिहार: 19 साल की लड़की को जैनुल और हकीमा खातून ने जिंदा जलाया, गाँव छोड़कर भागे

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में संपत्ति को लेकर हुए विवाद में 19 वर्षीय एक युवती को जिंदा जला दिया गया है। युवती के चाचा-चाची पर ही उसे जिंदा जलाने के आरोप लगे हैं। ये दिल दहला देने वाला मामला सकरा पुलिस थाने के रामपुर बखरी गाँव का है। 

घटना शुक्रवार (सितंबर 4, 2020) की बताई जा रही है। जानकारी के मुताबिक, जमीन विवाद में 19 वर्षीय सुफियाना परवीन को जिंदा जला दिया गया। युवती को जिंदा जलाने के मामले में सकरा थाने में FIR दर्ज की गई। इसमें मृत युवती के चाचा मोहम्मद जैनुल आवेद्दीन, चाची मोनी परवीन उर्फ हकीमा खातून, मोहम्मद अंजार और मोहम्मद इश्तेखार को आरोपित किया गया है। घटना के बाद से सभी फरार हैं।

मृतका सुफियाना के छोटे भाई कुदरत अली ने टाइम्स ऑफ इंडिया से फोन पर बात करते हुए बताया कि उसकी बहन पड़ोस में समसूद जोहा के घर हैंडपंप पर नहाने के लिए गई थी। इसी दौरान उसकी चाची हकीमा और अन्य लोगों ने सुफियाना पर केरोसिन डालकर आग लगा दी। वारदात को अंजाम देने के बाद वो मौके से फरार हो गए। सुफियाना के चिल्लाने की आवाज आई लगी तो स्थानीय लोग मदद के लिए पहुँचे, लेकिन तब तक काफी देर हो गई और उसकी मौत हो गई।

इसके अलावा, कुदरत ने बताया कि मरने से पहले उसके पिता ने ज़ैनुल के नाम पर 10 धुर ज़मीन लिखी थी। कुदरत का कहना है कि ज़ैनुल अब उस ज़मीन के मालिकाना हक के अलावा 10 धुर अतिरिक्त भूमि का दावा करता है। इसी को लेकर उसने वारदात को अंजाम दिया।

मृतका की माँ हुस्न बानो उर्फ बोरिया खातून ने बताया कि उसके पति की मौत हो चुकी है। उसके पिता मुजीबुलहक किसी तरह परिवार का भरण-पोषण करते हैं। मृतका के नाना व माँ ने पुलिस को बताया कि पट्टीदार मोहम्मद जैनुल आबेदीन से काफी दिनों से उनका विवाद चल रहा है। कई बार जमीन हड़पने की नीयत से मारपीट कर हत्या करने की कोशिश की गई।

इस घटना के बारे में जानकारी देते हुए दारोगा एसके झा ने बताया कि निरीक्षण के दौरान केरोसिन के दो खाली डब्बे मिले। दारोगा ने बताया कि जमीन विवाद में युवती को जिंदा जलाकर मारने का आरोप लगाते हुए मृतका की माँ ने आवेदन दिया है जिसके आधार पर एफआईआर दर्ज कर पुलिस आरोपितों की धर-पकड़ के लिए छापेमारी करने में जुटी है।

योगी राज में गाँव लौटा फौजी का परिवार, अखिलेश के CM रहते परिवार के 5 लोगों की कर दी गई थी हत्या

परिवार के 5 लोगों की हत्या के बाद एक फौजी का परिवार उत्तर प्रदेश के बागपत स्थित अपना गॉंव छोड़कर चला गया था। लेकिन योगी आदित्यनाथ की सरकार में कानून-व्यवस्था में सुधार के बाद यह परिवार 7 साल बाद फिर अपने गॉंव लौट आया है। गॉंव पहुॅंचकर पुलिस की मदद से उन्होंने अपना घर, जमीन और संपत्ति भी वापस पा ली है।

प्रवेश राठी सेना में जवान और अभी जयपुर में तैनाती है। मीडिया वालों से बात करते हुए उन्होंने कहा जब से योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश की कमान सँभाली है तब से प्रदेश का माहौल बहुत बेहतर हुआ है। जिस तरह सरकार ख़ूँख़ार अपराधियों पर कार्रवाई कर रही है और उन्हें सज़ा सुनाई जा रही है, वह सराहनीय है। 

प्रदेश के तमाम जिलों में लोगों के बीच अपराध को लेकर भय कम हुआ है। इस देखकर मुझे लगा कि हालात पहले से बेहतर हैं और मेरी वापसी संभव है। इस दौरान बागपत के पुलिस अधीक्षक, आईजी मेरठ समेत कई अधिकारियों ने प्रदेश की क़ानून-व्यवस्था को लेकर आश्वासन भी दिया था।

दरअसल एक पुराने विवाद के चलते प्रवेश राठी के परिवार के 5 लोगों की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। मरने वालों में उनकी माता सरोज, पिता रामवीर, उनके भाई प्रवीण और संजीव शामिल थे। इसके अलावा भी उनके घर पर कई बार गोलीबारी की गई थी। हत्या का आरोप गाँव के ही प्रमोद गंगनोली और उसके परिवार वालों पर लगा था। प्रमोद गंगनौली पर एक लाख रुपए का इनाम भी रखा गया था। उसे हाल ही में गिरफ्तार किया गया है। 

इस घटना से भयभीत और आहत होकर फौजी के परिवार ने गाँव छोड़ दिया था। यह घटना साल 2013 में हुई थी जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे। यह हत्याएँ उस वक्त हुई जब पुलिस की तरफ से सुरक्षा मिली हुई थी। वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद प्रवेश राठी का मनोबल बढ़ा और उन्होंने गाँव वापस लौटने का फैसला लिया।  

रविवार (6 सितंबर 2020) को पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में प्रवेश राठी ने अपने खेत की जुताई की। इसके अलावा पुलिस ने उन्हें अपना पैतृक गाँव स्थित घर भी वापस दिलाया। राठी ने कहा कि अब वह अपना गाँव छोड़ कर कहीं नहीं जाएँगे, क्योंकि अब प्रदेश में क़ानून-व्यवस्था पहले की तुलना में काफी बेहतर है। हम अपने गाँव में शांति से रह सकते हैं अब हमें किसी का डर नहीं है।  

राम मंदिर के प्रस्तावित डिजाइन के अंतिम नक्शे को मँजूरी, 1 लाख भक्तों के ठहरने की व्यवस्था

अयोध्या विकास प्राधिकरण (ADA) से भव्य राम मंदिर का नक्शा पास होने के बाद से कार्य में तेजी देखी जा रही है। सबसे पहले मंदिर निर्माण के लिए नींव की खुदाई होनी है। नींव की खुदाई में प्रयोग होने वाली बड़ी मशीनें कानपुर से अयोध्या पहुँच चुकी है। 

राम मंदिर की आधारशिला के लिए धरातल से करीब 200 फीट नीचे 1200 खंभे स्थापित किए जाएँगे। इन पिलरों का निर्माण पत्थरों से होगा और इसमें लोहे का प्रयोग नहीं किया जाएगा। इन पिलरों पर अन्य स्तर की आधारशिला रखी जाएगी। प्रस्तावित राम मंदिर 360 फीट लंबा, 235 फीट चौड़ा और 161 फीट ऊँचा होगा। ट्रस्ट के अनुसार, मंदिर की आधारशिला आधुनिक तकनीक का प्रयोग कर बनाई जाएगी, ताकि इसे 1500 वर्षो तक और इसकी संरचना को 1000 वर्ष तक संरक्षित किया जा सके।

ट्रस्ट ने अयोध्या विकास प्राधिकरण को विकास शुल्क, रखरखाव शुल्क और श्रम उपकर के रूप में 2.11 करोड़ रुपए जमा किए हैं। अयोध्या विकास प्राधिकरण ने साइट पर धार्मिक/मेला मैदान, बाग, आध्यात्मिक मैदान, और पर्यटक निवास के रूप में मँजूरी दी है।

5 अगस्त को राम मंदिर भूमि पूजन के बाद ट्रस्ट ने स्वामित्व, साइट मानचित्र, डिजाइन, आदि से संबंधित कागजी कार्रवाई को पूरा करना शुरू कर दिया। 29 अगस्त को ट्रस्ट ने मंदिर का प्रस्तावित नक्शा प्रस्तुत किया। उन्होंने मंदिर से संबंधित 4,000 पृष्ठों के दस्तावेज भी अयोध्या विकास प्राधिकरण को सौंपे। इसमें 67 एकड़ में फैले परिसर की विस्तृत योजना थी। ट्रस्ट को पहले ही आग और बिजली विभागों के साथ ही मंदिर के लिए भूकंप प्रतिरोधी उपायों की मँजूरी मिल चुकी है।

अयोध्या में राम मंदिर हवाई पट्टी से 6.5 किलोमीटर दूर स्थित है, इसलिए यह भारतीय एयरपोर्ट प्राधिकरण द्वारा प्रतिबंधों के दायरे में नहीं आएगा। बता दें कि नियमों के अनुसार,  यदि किसी हवाई अड्डे के निकट परिसर में किसी इमारत का निर्माण करना होता है, तो इसके लिए एयरपोर्ट के अधिकारियों से अनुमति लेनी होती है। इसी तरह, चूँकि मंदिर मणि पर्वत, कुबेर पर्वत और सुग्रीव पर्वत के निकट नहीं है, इसलिए ट्रस्ट को पुरातत्व विभाग से NOC लेने की आवश्यकता नहीं है।

ट्रस्ट के सदस्य कामेश्वर चौपाल के अनुसार, मंदिर में 1 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए जगह होगी। मंदिर में अधिक भीड़ से बचने के लिए, तीन दिशाओं में चार द्वार होंगे। महंत सत्येंद्र दास ने रविवार एक्सप्रेस को दिए एक बयान में कहा कि मंदिर के प्रवेश द्वार पर आवश्यक मंदिरों के नाम वाले कई पत्थर लगाए जाएँगे। 

महंत ने कहा, “अतीत में, सभी मुख्य मंदिरों के प्रवेश द्वार और धार्मिक महत्व के स्थानों पर पत्थर लगाए गए थे। हमने अब तक करीब 85 ऐसे पत्थर पाए हैं। उनमें से तीन सुमित्रा भवन, सीता रसोई और राम जन्मभूमि के रूप में चिह्नित हैं। राम जन्मभूमि का पत्थर 100 मीटर से कम गर्भगृह के सबसे करीब है, और हमने इसे नहीं छुआ है। इसे हटाने से गर्भगृह का संपूर्ण रूप और अर्थ बदल जाएगा।”

5 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राम मंदिर आंदोलन के नेताओं और संतों के बीच राम मंदिर भूमि पूजन हुआ। नवंबर 2019 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या में विवादित भूमि पर दशकों से चली आ रही लड़ाई को समाप्त करते हुए राम मंदिर निर्माण की अनुमति दे दी। मंदिर निर्माण के प्रबंधन के लिए फरवरी 2020 में भारत सरकार द्वारा एक ट्रस्ट का गठन किया गया था।