सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (सितम्बर 04, 2020) को 6 गैर-भाजपा शासित राज्यों की समीक्षा याचिका खारिज कर दी। इसमें जेईई मेन 2020 और NEET 2020 परीक्षाओं को स्थगित करने की माँग की गई थी। इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने हाल ही में एक वर्चुअल बैठक के बाद शीर्ष अदालत के 17 अगस्त के आदेश की समीक्षा के लिए याचिका दायर की थी।
शीर्ष अदालत ने पहले मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं के संचालन में हस्तक्षेप करने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि जिंदगी चलती रहनी चाहिए (Life must go on) और महामारी के कारण छात्र एक कीमती वर्ष नहीं खो सकते हैं।
समीक्षा याचिका में दलील दी गई थी कि अदालत द्वारा दिए गए केवल दो कारणों- जिंदगी चलती रहनी चाहिए और छात्रों को एक शैक्षणिक वर्ष नहीं खोना चाहिए, इस मुद्दे की एक आधिकारिक और व्यापक न्यायिक जाँच के लिए काफी नहीं हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह याचिका खारिज किए जाने से साफ हो गया है कि अब JEE और NEET परीक्षा नहीं टाली जाएगी।
जस्टिस अशोक भूषण, बीआर गवई और कृष्ण मुरारी की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने समीक्षा याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए कहा, “हमारे पहले के फैसले पर पुनर्विचार के लिए कोई मामला नहीं बनता है।”
गौरतलब है कि 6 गैर-भाजपा शासित राज्यों- पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पंजाब और राजस्थान ने शीर्ष अदालत से गत 28 अगस्त को कोरोना वायरस संकट के मद्देनजर परीक्षाओं को स्थगित करने की माँग की थी।
याचिकाकर्ताओं में पहले स्थान पर पश्चिम बंगाल के श्रम और कानून मंत्री मोलोय घटक थे। दूसरे नंबर पर झारखंड के वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव, तीसरे नंबर पर राजस्थान के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री रघु शर्मा थे। चौथे याचिकाकर्ता छत्तीसगढ़ के खाद्य और नागरिक मंत्री अमरजीत भगत थे। पाँचवें नंबर पर पंजाब के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री बलबीर सिंह सिद्धू और छठे महाराष्ट्र के उच्च और तकनीकी शिक्षा मंत्री उदय रवींद्र सामंत थे।
ज्ञात हो कि JEE, जो कि 1 से 6 सितंबर तक आयोजित होनी है, अभी जारी है, जबकि NEET परीक्षा 13 सितंबर को आयोजित की जाएगी।
सोशल मीडिया पर आज (4 सितंबर 2020) एक क्लिप वायरल हुई। क्लिप में एक रिपोर्टर रिपोर्टिंग के दौरान कई अपशब्द कहता है। इस क्लिप का प्रसारण रिपब्लिक टीवी पर होता है। जिसके बाद तमाम सोशल मीडिया यूज़र्स और नेटीजन्स ने यह वीडियो इंटरनेट पर साझा किया। साथ ही टेलीविज़न पर सीधी प्रसारण के दौरान ऐसी भाषा का उपयोग करने पर आलोचना भी की।
फ़िलहाल, यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका है। कथित तौर पर ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि रिपब्लिक टीवी में काम करने वाले एक रिपोर्टर ने नार्कोटिक्स ब्यूरो की कार का पीछा करते हुए अपशब्द ‘F**king M***rch*’ कहे। इस गाड़ी में नार्कोटिक्स ब्यूरो के अधिकारी मौजूद थे जिन्होंने रिया चक्रवर्ती और सैमुएल मिरांडा के घर में छापेमारी की थी।
We hope that now people won’t mind for light words like #Chutiya, when #Arnab News Channel is officially using #OhFuckMa******d. And now if anybody calls him M*******d on live debate then it’s all fine. pic.twitter.com/4OPsYsqzbz
इसके बाद सोशल मीडिया यूज़र्स ने रिपब्लिक टीवी वीडियो का लाइव फीड पोस्ट किया। फिर उन्होंने आरोप लगाया कि अपशब्द कहने वाला रिपोर्टर रिपब्लिक टीवी का कर्मचारी था।
सोशल मीडिया में इस मुद्दे पर चर्चा बढ़ने के बाद रिपब्लिक टीवी ने अपने तरफ से बयान जारी किया। अपने आधिकारिक बयान में रिपब्लिक टीवी ने स्पष्ट तौर पर कहा कि जो रिपोर्टर वीडियो में अमर्यादित और अनैतिक शब्दों का इस्तेमाल कर रहा है वह हमारे संस्थान का हिस्सा नहीं है। अपशब्द कहने वाला रिपोर्टर दूसरे संस्थान का कर्मचारी था और उसने रिपब्लिक टीवी की गाड़ी में लिफ्ट ली थी।
A reporter’s clip using unparliamentary language is doing rounds. The reporter ISN’T FROM REPUBLIC but from another channel & was taking a lift in our car. Questions may be directed at that reporter. Republic will take STRONG LEGAL ACTION against anyone ascribing it to Republic
असल में जिस रिपोर्टर ने ऐसा किया उससे यह सारे के सारे सवाल पूछे जा सकते हैं। रिपब्लिक टीवी ने ट्वीट करते हुए यह भी लिखा कि उनका सोशल मीडिया यूज़र्स से अनुरोध है कि वह घटना की गलत व्याख्या न करें। अगर कोई सोशल मीडिया यूज़र इस तरह का दुष्प्रचार करते हुए पाया जाता है तो रिपब्लिक टीवी उस पर क़ानूनी कार्रवाई करेगा। पूरी जानकारी के बिना इस मुद्दे पर ऐसी कोई टिप्पणी न करें।
महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने शुक्रवार (सितम्बर 04, 2020) को कहा कि कंगना रनौत को मुंबई और महाराष्ट्र में रहने का कोई अधिकार नहीं है। बॉलीवुड अभिनेत्री के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है।
इस पर कंगना ने एक ट्वीट के माध्यम से जवाब दिया है कि मुंबई एक ही दिन में PoK से तालिबान में तब्दील हो गया। बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत ने कुछ दिन पहले ही ट्वीट किया था कि वह माफिया गुंडों से ज्यादा मुंबई पुलिस से भयभीत हैं।
अनिल देशमुख ने बयान दिया, “मुंबई पुलिस की तुलना स्कॉटलैंड यार्ड से की जाती है। कुछ लोग मुंबई पुलिस को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं। एक आईपीएस अधिकारी इसके खिलाफ अदालत में गया है … मुंबई पुलिस से तुलना करने के बाद उसे महाराष्ट्र या मुंबई में रहने का कोई अधिकार नहीं है।”
महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कंगना रनौत ने कहा है कि उन्होंने (अनिल देशमुख) ने उनके लोकतान्त्रिक अधिकारों पर खुद ही एक ही दिन में इसे PoK से तालिबान में तब्दील कर दिया है।
He is taking his own calls on my democratic rights, from POK to Taliban in one day ? https://t.co/oUZ5M7VKAf
वहीं, शिवसेना के विधायक प्रताप सरनाईक ने भी शुक्रवार को महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख से अपने एक ट्वीट में बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने की अपील की है। इसके साथ ही शिवसेना विधायक ने मुंबई की तुलना पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) से करने पर कंगना रनौत का मुँह तोड़ने की भी धमकी दी है।
कंगनाला खासदार @rautsanjay61 नी सौम्य शब्दांत समज दिली.ती इथे आली तर आमच्या रणरागिणी तिचे थोबाड फोडल्याशिवाय राहणार नाहीत. उद्योजक व सेलेब्रिटी घडवणाऱ्या मुंबईची तुलना पाकव्याप्त काश्मीरशी करणाऱ्या कंगनावर देशद्रोही म्हणून गुन्हा दाखल करण्याची मी गृहमंत्र्यांना मागणी करणार आहे.
प्रताप सरनाईक ने ट्विटर पर लिखा, “अगर वह यहाँ आती है, तो हमारे योद्धा उसका मुँह तोड़ देंगे। मैं गृह मंत्री से अनुरोध करता हूँ कि वह कंगना रनौत के खिलाफ मुंबई को पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) बताने के लिए राजद्रोह का मुकदमा दर्ज करे।”
गौरतलब है कि इससे पहले शिवसेना नेता संजय राउत भी कंगना रनौत को मुंबई न लौटने की धमकी दे चुके हैं। दरअसल, कंगना रनौत ने हाल ही में कहा था कि उन्हें दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जाँच के मामले में मुंबई पुलिस की सुरक्षा नहीं चाहिए। इसके अलावा कंगना रनौत ने मुंबई की तुलना पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से की थी। इस पर शिवसेना नेता संजय राउत ने उन्हें धमकी दी थी कि कंगना रनौत को मुंबई वापस नहीं आना चाहिए।
‘9 तारीख को आ रही हूँ मुंबई, किसी के बाप में हिम्मत है तो रोक ले’
इस तमाम विवाद के बीच बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत ने एक ट्वीट किया है। इसमें कंगना ने लिखा है, “मैं देख रही हूँ कि बहुत से लोग मुझे धमकी दे रहे हैं कि मैं मुंबई वापस नहीं आऊँ। इसलिए मैंने ये फैसला किया है मैं अब 9 सितंबर मुंबई वापस जाऊँगी। मैं वो समय भी शेयर करुँगी, जब मैं मुंबई हवाई अड्डे पर उतरूँगी। किसी के बाप में हिम्मत है तो रोक ले।” इस ट्वीट के साथ ही कंगना ने एक स्माइली भी शेयर की है।
गोरखपुर में बच्चों की मौत के मामले में आरोपित डॉ. कफील खान इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिए गए जमानत के बाद मथुरा जेल से बाहर आ गए। वहीं अब उनके बाहर आते ही तथाकथित लिबरल वामपंथी मीडिया ने उनके आरोपों पर लीपापोती करने और उनके महिमामंडन की कवायद शुरू कर दी है।
हमेशा विवादों में घिरे रहने वाले पत्रकार राजदीप सरदेसाई अलग-अलग मामलों में आरोपित बनाए गए व्यक्तियों के साक्षात्कार के लिए तैयार हैं। गौरतलब है कि सुशांत सिंह राजपूत के मृत्यु मामलों में मुख्य आरोपित रिया चक्रवर्ती का एक इमेज बिल्डिंग इंटरव्यू करने के बाद, सरदेसाई ने अब डॉ. कफील का इंटरव्यू लेकर उन्हें ‘निर्दोष’ साबित करने की कोशिश की है। जिन्हें एएमयू में सीएए के विरोध प्रदर्शनों में भड़काऊ भाषण देने के आरोप में मुंबई में गिरफ्तार किया गया था।
इंटरव्यू के दौरान ने डॉ. कफील से सरदेसाई ने जोर देकर पूछा कि जेल से बाहर आने के बाद उन्हें कैसा लगा। वहीं सरदेसाई को इंटरव्यू देते हुए कफील ने मुस्कुराते हुए बताया कि जेल में उन्होंने बेहद भयानक पलों का अनुभव किया।
उन्होंने दावा किया कि जेल में उन्हें कई दिनों तक भोजन से वंचित रखा गया और उन्हें उस दौरान शारीरिक और मानसिक रूप से टॉर्चर किया गया। डॉ.कफील ने दावा करते हुए कहा, “राजदीप सर, इस बार जेल में उन्होंने मुझे हर तरह से परेशान किया।” उन्होंने आगे कहा, “एसटीएफ ने मुझसे तीन दिनों तक पूछताछ की और मुझसे अजीबोगरीब सवाल पूछे।”
खान ने सीएए पर अपने रुख को बनाए रखते हुए कहा कि उन्होंने सीएए को लेकर विरोध नहीं किया लेकिन उन्हें एनआरपी और एनआरसी के साथ उसे जोड़े जाने पर समस्या हुई। वहीं अपने कानूनी ज्ञान प्रदर्शन करते हुए, खान ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 ने उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की है और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसे मान्यता दी गई थी।
गौरतलब है कि कफील खान ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में एन्टी- सीएए विरोध प्रदर्शन के दौरान दिए गए अपने भाषण में कुछ भड़काऊ टिप्पणियाँ की थी। उन्होंने कथिततौर पर गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ टिप्पणी की थी कि वह एक कातिल है, जिसके कपड़े खून से सने हैं।
उन्होंने यह भी कहा था कि सीएए ने संप्रदाय विशेष के लोगों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाया। उन्होंने आरोप लगाया कि आरएसएस संचालित स्कूलों में छात्रों को सिखाया जाता है कि दाढ़ी वाले लोग आतंकवादी हैं। वहीं खान ने यह भी कहा था कि सीएए लागू कर सरकार ने हमें बताया है कि भारत हमारा देश नहीं था। खान ने लोगों से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने का आग्रह किया था।
बेंगलुरु दंगों की सच्चाई उजागर करने के लिए सिटिजन फॉर डेमोक्रेसी ने सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश श्रीकांत बबलादी की अध्यक्षता में पूर्व न्यायधीशों, पत्रकारों, और ब्यूरोक्रेट्स की एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट दे दी है।
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दंगे पूर्व नियोजित और संगठित थे। इन्हें विशेष रूप से कुछ खास हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए अंजाम दिया गया। इस साल की शुरुआत में हुए दिल्ली दंगों और हालिया स्वीडन दंगों जैसी समानता भी मिली है। कमेटी ने जाँच में पाया कि कई स्थानीयों का भी इन दंगों को करवाने में हाथ था और उन्हें इसके बारे में पहले से पता था।
रिपोर्ट में लिखा है, “इस योजना को राजनैतिक द्वंद की तरह पेश करने का प्रयास जरूर किया गया, बावजूद इसके, यह निस्संदेह साम्प्रदायिक रूप से प्रेरित था। जिस तरह से घरों पर हमला किया गया और जिन लोगों को निशाना बनाया गया, उसका मकसद डर फैलाना भी हो सकता है ताकि इलाके की जनसांख्यिकी प्रभावित हो और उसे बदल कर मुस्लिम बहुल किया जा सके। ”
कमेटी का कहना है कि इन दंगों में SDPI और PFI भी शामिल थे। रिपोर्ट में लिखा है, “दंगाइयों के अन्य समूह ने नवीन के घर पर इस तरह हमला बोला, जैसे उन्होंने श्रीनिवासन मूर्ति के घर पर बोला था। पर, चूँकि वहाँ कोई सुरक्षाकर्मी नहीं था, इसलिए दंगाई उसके घर में घुस पाए और तोड़फोड़ की। नवीन के घरवालों ने फौरन पड़ोसियों के घर जाकर अपनी जान बचाई। इस बीच दंगाइयों ने पेट्रोल बम, पत्थर, लोहे की रॉड से घर में तबाही मचा दी। दंगाइयों ने केरोसिन, पेट्रोल और ज्वलनशील पदार्थों को फेंक कर घर में आग लगाई।”
नवीन कुमार के पिता पवन कुमार ने कमेटी को बताया, “व्यक्तिगत रूप से घर पर हुए हमले का साक्षी होते हुए मैं, मेरी पत्नी, हमारी बेटी और उसके बच्चे सब मौत से डर गए थे। इसलिए हम पहले फ्लोर पर गए और वहाँ के पीछे वाले दरवाजे से हमने पड़ोसियों के घर में छलांग लगाई और जान बचाने के लिए शरण ली।”
उन्होंने बताया, “अनियंत्रित भीड़ ने हमारे घर के सामने इकट्ठा होकर पेट्रोल बम फेंके और केरोसीन को घर में, सोफे पर, फर्नीचर पर डाल कर आग लगाई। हमले के समय उन्होंने फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक आइटम और जरूरी कागजातों को जला डाला। उन्होंने 5 लाख के करीब में कैश लूटा और पत्नी के गहने भी ले गए। हमारे पड़ोस की एक संप्रदाय विशेष की महिला ने घर में जाकर मेरे पत्नी को बचाया और उसे भागने में मदद की।”
कर्नाटक रक्षा वेदिके के एक सक्रिय सदस्य अरुण गौड़ा, जो उस दिन अपनी 8 महीने की गर्भवती पत्नी के साथ मौजूद थे, उन्होंने बताया कि उनके घर पर उसी इलाके के संप्रदाय विशेष के युवकों ने हमला किया था।
हिंदुओं के घर के अलावा दो थानों पर भी हमला बोला गया था। केजी हल्ली थाने थोड़ा नुकसान पहुँचा था, वहीं डीजे हल्ली थाने को बहुत नुकसान हुआ था। रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि भीड़ ‘अल्लाह हू अकबर’ और ‘नारा-ए-तकबीर’ के नारे लगा रही थी।
रिपोर्ट में कहा गया, “दंगों का पैटर्न दिल्ली और स्वीडन की तरह है। इसलिए, राज्य के लिए यह आवश्यक है कि वह घटना की समग्र रूप से जाँच करे और उन्हें (दंगाइयों को) अलग-थलग और स्थानीय न समझे।” इसमें कमेटी द्वारा यह भी सलाह दी गई कि ऐसे साम्प्रदायिक तनावों का सामना करने वाले संभावित क्षेत्रों को पुलिस चिह्नित कर लिया जाना चाहिए। साथ ही इस तरह के तनावों पर रोक लगाने के लिए दीर्घकालिक योजनाएँ बनानी चाहिए।
रिपोर्ट में कहा गया, “सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66ए के उन्मूलन के साथ, किसी भी धर्म, जाति, वर्ग, संगठन या संप्रदाय के लोगों को निशाना बनाने वाली अपमानजनक, और घृणास्पद सामग्री को रोकने और उन पर मुकदमा चलाने के लिए एक तंत्र विकसित किया जाना है।” इसमें आगे कहा गया कि इस मामले में जाँच इसलिए भी की जानी चाहिए कि आखिर भीड़ के पास इतने हथियार, पेट्रोल बम इतने कम समय में कैसे आए।
PFI और SDPI की गतिविधियों की निगरानी के अलावा, समिति ने यह भी कहा कि कर्नाटक सरकार को राज्य में धार्मिक अतिवाद के स्रोत का अध्ययन करने के लिए एक समिति का गठन करना चाहिए। यह भी राय दी कि राज्य के प्रमुख शहरों में जनसांख्यिकीय परिवर्तन का अध्ययन किया जाना चाहिए और दंगों में अवैध प्रवासियों की भूमिका की जाँच की जानी चाहिए।
गौरतलब है कि 11 अगस्त को बेंगलुरु में हुए दंगों में 3 लोगों की मौत हुई थी और कई जख्मी हो गए थे। दंगाइयों ने दर्जनों गाड़ियों को आग लगा दी थी और करोड़ों की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया था। कॉन्ग्रेस विधायक श्रीनिवास मूर्ति के घर और थाने में तोड़फोड़ भी की गई थी।
मूर्ति के भतीजे नवीन पर पैगम्बर मुहम्मद को लेकर विवादित पोस्ट करने का आरोप लगाते हुए हिंसा को अंजाम दिया गया था। हिंसा के सिलसिले में अब तक करीब 150 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। राज्य सरकार ने कहा था कि हिंसा के दौरान हुए नुकसान की भरपाई दंगाइयों से ही की जाएगी।
दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद से बुधवार (2 सितंबर, 2020) को दंगों के सिलसिले में करीब 4 घंटे पूछताछ की। पुलिस के अनुसार, उन्होंने “कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को सत्यापित करने” के लिए खालिद को तलब किया था।
उमर के साथ-साथ जामिया मीडिया कोऑर्डिनेटर सफूरा जरगर, राजद के युवा विंग के अध्यक्ष मीरान हैदर, पिंजरा तोड़ की कार्यकर्ता नताशा नरवाल और कई अन्य लोगों को कथित तौर पर दंगों को उकसाने के लिए गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामला दर्ज किया गया था। बता दें इस साल फरवरी की शुरुआत में पूर्वोत्तर दिल्ली के इलाकों में हिंदू विरोधी दंगों को अंजाम दिया गया था।
खालिद से बुधवार सुबह सनलाइट कॉलोनी स्थित कार्यालय में पूछताछ की गई। पिछले महीने भी उससे दिल्ली दंगों के मामले में दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल द्वारा पूछताछ की गई थी।
इससे पहले खालिद ने मंगलवार को दिल्ली पुलिस के आयुक्त एस एन श्रीवास्तव को एक पत्र लिखा। इस पत्र में उसने स्पेशल सेल के अधिकारियों पर मनगढंत आरोपों में फँसाने का आरोप लगाया। खालिद ने अपने पत्र में दावा किया कि उसके किसी परिचित ने यह खुलासा किया है कि स्पेशल सेल द्वारा उनपर दबाव बनाया जा रहा और उसके (खालिद) खिलाफ फर्जी बयान (प्री ड्राफ्टेड) दर्ज किया जा रहा है।
प्री ड्राफ्टेड बयान के अनुसार उमर खालिद को सीएए के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के बहाने पूर्वोत्तर दिल्ली में भड़के दंगों के सह-साजिशकर्ताओं में से एक के रूप में चित्रित किया गया था।
उमर खालिद के अनुसार, उसके परिचित ने प्री ड्राफ्टेड पत्र पर हस्ताक्षर करने का विरोध किया। लेकिन अधिकारियों ने उन्हें अपना बयान बदलने के लिए धमकाया। बाद में सवाल करने वाले व्यक्ति ने दावा किया कि यह उसका बयान नहीं था।
खालिद का दावा है कि अधिकारियों ने उस व्यक्ति को एक अरेस्ट मेमो दिखाकर धमकाया जिस पर यूएपीए लिखा था। पुलिस ने उन्हें धमकाते हुए कहा कि या तो वे इसे कबूल करें या या फिर वह दूसरे फॉर्म पर हस्ताक्षर करें। मजूबर होकर उन्हें पुलिस के बने-बनाए बयान को स्वीकार करना पड़ा।
वहीं उमर खालिद ने दिल्ली दंगों में शामिल ताहिर हुसैन के कबूलनामे को भी नकार दिया है। ताहिर ने पूछताछ के दौरान इस बात का खुलासा किया था कि खालिद सैफी और उमर खालिद से वह 8 जनवरी 2020 को शाहीन बाग में पीएफआई कार्यालय में मिला था। खालिद का दावा है कि वह न तो कभी ताहिर से मिला है और न ही कभी पीएफआई कार्यालय में गया है।
जहाँ एक तरफ खालिद खुद को निर्दोष बता रहा है, वहीं दिल्ली पुलिस अपराध शाखा ने 6 मार्च 2020 को अपने एफआईआर में कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की यात्रा के दौरान 24-26 फरवरी के बीच उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिंदू-विरोधी दंगों की साजिश पहले से ही रची गई थी। एफआईआर कॉपी में कहा गया है कि हिंदू विरोधी दंगों की साजिश पूर्व जेएनयू छात्र उमर खालिद और उसके साथियों द्वारा रची गई थी, जो दो संगठनों से जुड़े हैं।
उमर खालिद ने साजिश के तहत दो अलग-अलग स्थानों पर भड़काऊ भाषण दिए और लोगों से अपील की थी कि वे ट्रम्प की यात्रा के दौरान सड़कों पर उतरें ताकि प्रोपेगेंडा के तहत भारत में अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले कथित अत्याचारों का अंतर्राष्ट्रीयकरण किया जा सके।
आईबी के कॉन्स्टेबल अंकित शर्मा की हत्या में दायर आरोप-पत्र के अनुसार, दिल्ली के दंगों का आरोपित ताहिर हुसैन, उमर खालिद और उसके करीबी खालिद सैफी के संपर्क में था। चार्जशीट में इस बात का उल्लेख है कि शाहीनबाग में जेएनयू स्कॉलर उमर और खालिद सैफी से मिलने के बाद ताहिर ने जनवरी में दंगों की योजना तैयार की थी। वहीं पुलिस द्वारा जुलाई में दर्ज एक रिपोर्ट के अनुसार खालिद सैफी ने दंगों के लिए धन जुटाने के लिए जाकिर नाइक से मुलाकात की थी।
मुंबई नहीं आने की धमकियों के बीच कंगना रनौत ने ट्वीट कर ऐलान किया है कि वे मुंबई आ रही हैं और किसी के बाप को रोकना हो तो रोक ले। कंगना आजकल ट्विटर पर लगभग हर प्रोपेगेंडाबाज और वामपंथियों के निशाने पर हैं। इस लिस्ट में 2 नए नाम जुड़े हैं। पहली है प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘दी वायर’ की रिपोर्टर रोहिणी सिंह और दूसरी है राहुल गाँधी की कट्टर भक्त और कुख्यात कॉन्ग्रेस ट्रोल संजुक्ता बसु।
दरअसल, कंगना रनौत ने हाल ही में कहा था कि उन्हें मुंबई पुलिस की सुरक्षा नहीं चाहिए। इस पर शिवसेना नेता संजय राउत ने उन्हें धमकी दी थी कि कंगना रनौत को मुंबई वापस नहीं आना चाहिए। जवाब में कंगना ने कहा था कि आजकल मुंबई पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर जैसी क्यों लग रही है।
कंगना ने अपने ट्वीट में मुंबई की तुलना पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से करते हुए ट्वीट किया, “संजय राउत ने मुझे खुले में धमकी दी है और मुंबई नहीं आने को कहा है। मुंबई की गलियों में आज़ादी-ग्रैफिटी और अब खुली धमकी। मुंबई पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर जैसी फ़ीलिंग क्यों दे रही है?”
इसी विवाद पर वामपंथी प्रोपेगेंडा और कुख्यात फेक न्यूज़ वेबसाइट ‘दी वायर’ की रिपोर्टर रोहिणी सिंह ने कंगना रनौत को घेरने की कोशिश करते हुए कहा कि कल्पना करिए कि भाजपा नेता फडणवीस की सरकार के दौरान बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान और उनकी पत्नी किरण राव ने मुंबई की तुलना पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से की होती तो उनका कितना विरोध होता।
इस पर कंगना रनौत ने रोहिणी सिंह को जवाब में लिखा, “रोहिणी कृपया मुझे बताएँ कि फिल्म इंडस्ट्री में कब आमिर/किरण जी ने असहिष्णुता के बारे में बात की थी। क्या उन्होंने किसी ड्रग/ माफिया रैकेट का खुलासा किया? क्या भाजपा के किसी नेता ने उन्हें उस समय भारत छोड़ने के लिए कहा था? यह अतार्किक तुलना क्या है?”
कुख्यात कॉन्ग्रेस ट्रोल को कंगना ने किया ट्रोल
शुक्रवार (सितम्बर 04, 2020) को एक प्रसिद्ध कॉन्ग्रेस ट्रोल, संजुक्ता बसु ने शिवसेना नेता संजय राउत के बचाव में अभिनेत्री कंगना रनौत को ‘भाजपा का मोहरा’ बताया।
संजुक्ता बसु ने ट्वीट किया, “लोग पूछ रहे हैं कि कंगना रनौत द्वारा मुंबई की तुलना PoK से करने पर दक्षिणपंथी नाराज क्यों नहीं हैं? लेकिन उनमें आमिर खान के खिलाफ नाराजगी है। क्या यह आसान नहीं है? आमिर की टिप्पणी अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिन्दुओं की हिंसा की आलोचना थी। कंगना महाराष्ट्र सरकार पर हमला करने वाले भाजपा के चेहरे की भूमिका निभा रही हैं।”
इस अपमानजनक टिप्पणी पर कॉन्ग्रेस ट्रोल को कंगना रनौत ने बताया कि उन्होंने दो बार भाजपा से चुनाव टिकट को ठुकरा दिया था। अभिनेत्री कंगना रनौत ने लिखा, “बीजेपी का मोहरा..हाहा। मैंने दो बार बीजेपी के टिकट से इनकार किया है, मैं कंगना रनौत हूँ… मेरी लोकप्रियता और वार्षिक आय कई सफल मंत्रियों और राजनेताओं से कहीं अधिक है … कभी-कभी अपनी बुद्धि का इस्तेमाल क्यों नहीं करते?”
BJP stooge ha ha , I have denied BJP ticket twice, I am Kangana Ranaut my popularity and yearly income is far more than many successful Ministers and politicians, why not sometimes use your intellect Madam intellectual ?…
मुंबई पुलिस पर अभिनेत्री कंगना रनौत के ट्वीट और शहर की तुलना पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से करने पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना, अमेय खोपकर ने शुक्रवार (सितंबर 04, 2020) को ट्विटर पर बिना किसी का नाम लिए मुंबई पुलिस के खिलाफ बोलने वालों को धमकी दी कि एक सच्चा मुंबईवासी मुंबई पुलिस की निंदा बर्दाश्त नहीं करेगा।
‘9 तारीख को आ रही हूँ मुंबई, किसी के बाप में हिम्मत है तो रोक ले’
इस तमाम विवाद के बीच बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत ने एक ट्वीट किया है। इसमें कंगना ने लिखा है, “मैं देख रही हूँ कि बहुत से लोग मुझे धमकी दे रहे हैं कि मैं मुंबई वापस नहीं आऊँ। इसलिए मैंने ये फैसला किया है मैं अब 9 सितंबर मुंबई वापस जाऊँगी। मैं वो समय भी शेयर करूँगी, जब मैं मुंबई हवाई अड्डे पर उतरूँगी। किसी के बाप में हिम्मत है तो रोक ले।” इस ट्वीट के साथ ही कंगना ने एक स्माइली भी शेयर की है।
I see many people are threatening me to not come back to Mumbai so I have now decided to travel to Mumbai this coming week on 9th September, I will post the time when I land at the Mumbai airport, kisi ke baap mein himmat hai toh rok le ? https://t.co/9706wS2qEd
ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कंपनी (बीबीसी) के नए डायरेक्टर जनरल टिम डैवी मशहूर वामपंथी नेटवर्क की ज़िम्मेदारी सँभालने के लिए तैयार हैं। इसके अलावा उन्होंने अपने विचारधारा प्रेरित कर्मचारियों से भी साफ़ कह दिया है कि या तो वह अपना नज़रिया बदल लें या नौकरी से इस्तीफ़ा दे सकते हैं। ख़बरों के मुताबिक़ बीबीसी के नए मुखिया टिम ने वादा किया है कि बीबीसी में बड़े पैमाने पर बदलाव होंगे।
साथ ही कर्मचारियों से कहा कि जितने भी लोग किसी भी तरह की विचारधारा से प्रेरित हैं वह अपना नज़रिया बदल लें या वह नौकरी छोड़ सकते हैं। कार्डिफ के बीबीसी दफ्तर में बोलते हुए टिम ने कहा, “अगर कोई कर्मचारी किसी विचारधारा प्रेरित स्तंभकार बनना चाहता है या सोशल मीडिया पर किसी विचारधारा के लिए कैम्पेनर की तरह काम करना चाहता है, तो यह उनकी निजी पसंद हो सकती है लेकिन ऐसे लोग अब बीबीसी में काम नहीं कर सकते हैं।”
टिम डैवी ने अपने उन कर्मचारियों पर कार्रवाई का ऐलान किया है जो सोशल मीडिया पर राजनीतिक टिप्पणी करेंगे। ऐसा बताया जा रहा है कि यह बदलाव इसलिए किए जा रहे हैं जिससे बीबीसी की निष्पक्ष छवि बने। टिम ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया के संबंध में बीबीसी के कर्मचारियों के लिए दिशा निर्देश जारी किया गया है। सभी कर्मचारियों को इसका पालन करना होगा।
इसके बाद टिम ने कहा अब बीबीसी के लिए निष्पक्ष बने रहना सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी। साथ ही बीबीसी पर तमाम विचारधाराओं के नेता आरोप लगाते हैं कि उसका रवैया पक्षपाती और भेद करने वाला है। टिम के मुताबिक़, “बीसीसी सिर्फ विचारधारा से प्रेरित रहने वाले पत्रकारों और स्तंभकारों का संस्थान नहीं है। संस्थान के भीतर लोकतांत्रिक मूल्यों की अनदेखी नहीं की जा सकती है खासकर निष्पक्ष चर्चाएँ और नस्लभेद जैसे मुद्दों का विरोध। हमारा उद्देश्य राजनीतिक झुकाव से हट कर आगे बढ़ना होगा। हम किसी के एजेंडा का प्रचार नहीं कर सकते सिर्फ सच सामने लाना होगा।”
उन्होंने कहा, “फेक न्यूज़, सोशल मीडिया कैम्पेन, विचारों का शोर और मीडिया संस्थानों के झुकाव जैसे वक्त में हमें अपना काम सही से करना होगा। हमें पूरे देश के लिए ख़बरें तैयार करनी हैं न कि एक ख़ास वर्ग या समूह के लिए। बीबीसी पर हमेशा से आरोप लगते रहे हैं कि वह वामपंथ से प्रेरित है या वामपंथ का पक्ष लेता है। इस तरह के आरोप सिर्फ इंग्लैंड में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में लगाए जाते हैं।” इन बातों को मद्देनज़र रखते हुए टिम ने यह आदेश जारी किया।
बीबीसी पर यह आरोप लगाए जाते हैं कि वह सिर्फ लंदन के संभ्रांत वर्ग के लिए ख़बरें तैयार करता है। इस पर टिम ने कहा, “मैं इस तरह के आरोप आने वाले समय में नहीं सुनना चाहता कि बीबीसी सिर्फ एक विशेष वर्ग के लिए खबरें प्रकाशित करता है।”
इसके बाद टिम ने इस बात का भी दवा किया कि बीबीसी निष्पक्षता के लिए समर्पित रहेगा। इस पर टिम ने अपनी बात ख़त्म करते हुए कहा, “मैं हमारे रवैये में बड़े पैमाने पर बदलाव चाहता हूँ वह चाहे आंतरिक हो या बाहरी। लोगों के बीच यह संदेश जाना चाहिए कि हम उनके लिए काम कर रहे हैं न कि किसी विचारधारा के लिए।”
ताइवान ने चीन का एक फाइटर जेट मार गिराया है। टीवी रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि चीनी सुखोई विमान-35 ताइवान के एयरस्पेस में घुस आया था। ताइवान ने अमेरिकी पैट्रियॉट मिसाइल डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल कर उसे मार गिराया। बाद में ताइवान ने आधिकारिक तौर पर इस दावे को गलत करार दिया।
इससे पहले खबरों में कहा गया था कि पहले ताइवान ने चीन को चेतावनी दी। मगर, चीनी विमान फिर भी उसके एयरस्पेस में घूमता रहा। इसके बाद उन्होंने विमान को मार गिराया। सुखोई विमान को उड़ाने वाला पायलट भी इस घटना में घायल हो गया। इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
कहा जा रहा है कि चीन पिछले कई दिनों से ताइवान के एयरस्पेस में अपने लड़ाकू विमान भेज रहा है। इसलिए ताइवान ने चीन के किसी भी नापाक हरकत का मुँहतोड़ जवाब देने की तैयारी शुरू कर दी है।
चीन का सामना करने के लिए ताइवान की सेना और नेवी दोनों अलर्ट हैं। वहाँ के राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन ने सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए कई घोषणाएँ भी की हैं। इसके तहत रिजर्व फोर्स को ताइवानी सेना के लिए मजबूत बैकअप के रूप में विकसित किया जाएगा। यह सशस्त्र बलों की तरह ही ताकतवर होगी। इनको भी वैसे ही हथियार व सैन्य उपकरण दिए जाएँगे जिनका प्रयोग ताइवानी सेना करती है।
Exclusive #ViralVideo of #Su35 pilot after being shot down over #Taiwan Strait. #Chinese jets undertake aggressive intrude on into #Taiwanese workspace on several occasion. But looks like #US#Taiwan had enough.
बता दें, ताइवानी राष्ट्रपति की यह घोषणा बेहद महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि चीन ने हाल ही में हॉन्गकॉन्ग में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून को पारित किया है। साथ ही ताइवान को भी एक देश दो तंत्र के तहत मिलाने की धमकी दी है।
हालाँकि, यह पहली बार नहीं है कि उसने सैन्य ताकत के जरिए ताइवान को अपने में मिलाने की धमकी दी हो। लेकिन, बीते कुछ समय से जो चीन अपने एयरक्राफ्ट भेज कर ताइवानी एयरस्पेस का उल्लंघन कर रहा है, वह निस्संदेह ही चिंता की बात है।
दूसरी ओर चीन को यह भी दिक्कत है कि अमेरिका ताइवान के साथ खड़ा नजर आ रहा है। हाल में ताइवान को अमेरिका ने पैट्रियॉट एडवांस कैपिबिलिटी-3 मिसाइलों की बिक्री की। इसे देख चीन बौखला गया और इसके कारण उसके सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने सीधे तौर पर ताइवान और यूएस को आग से न खेलने की चेतावनी दे डाली।
In response to rumors online that claim a Chinese Su-35 fighter jet had been shot down by Taiwan air defense systems, #ROCAirForce would like to categorically state this is fake news. We urge netizens to not spread it and strongly condemn this malicious act.
— 國防部 Ministry of National Defense, R.O.C. (@MoNDefense) September 4, 2020
हालॉंकि ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने इस दावे को खारिज किया है। ताइवान के एयर फोर्स कमांड ने वायरल वीडियो को लेकर कहा है कि यह गलत जानकारी है। ऐसा कुछ नहीं हुआ है। कमांड ने इसकी निंदा करते हुए कहा है कि इंटरनेट पर झूठ फैलाकर लोगों को गुमराह करने की कोशिश की जा रही है।
बुधवार (2 सितंबर 2020) को कॉन्ग्रेस संसद शशि थरूर की अध्यक्षता में सूचना प्रौद्योगिकी के लिए स्थायी समिति ने फेसबुक द्वारा प्रदर्शित किए गए राजनीतिक पूर्वाग्रहों पर चर्चा की। इस समिति की बैठक से कुछ घंटे पहले, केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग को पत्र लिखा था और फेसबुक द्वारा भारत में सत्ता पक्ष के खिलाफ राजनीतिक पूर्वाग्रहों के बारे में गंभीर चिंता व्यक्त की थी।
केंद्रीय मंत्री ने इस पत्र में जिन चिंताओं पर प्रकाश डाला था उनमें से सबसे प्रमुख फेसबुक द्वारा फेक न्यूज़ रोकने के लिए रखे गए पूर्ण रूप से राजनीतिक पूर्वग्रह से युक्त थर्ड पार्टी फैक्ट चेकर्स का विषय था।
अपने पत्र में उन्होंने लिखा, “फेसबुक के साथ एक प्रमुख मुद्दा थर्ड-पार्टी फैक्ट-चेकर्स के लिए फैक्ट-चेकिंग की आउटसोर्सिंग है। फेसबुक यूजर्स को गलत सूचना से बचाने के लिए फ़ेसबुक अपनी ज़िम्मेदारी से बचने के साथ ही बाहरी फैक्ट चेकर्स पर निर्भर रहता है, जो कि पहले से ही राजनीतिक पूर्वग्रहों से ग्रसित हैं। रोजाना ही इन फैक्ट चेकर्स के फैक्ट चेक्स को लोगों द्वारा स्वयं ही फैक्ट चेक कर दिया जाता है।”
सीएनएन-न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार, समिति की सुनवाई में, “भाजपा सांसदों ने फेसबुक द्वारा अंतर्राष्ट्रीय फैक्ट-चेकिंग नेटवर्क समिति और नियुक्तियों के बारे में बात की। इसकी मुखिया कंचन कौर ने पीएम नरेंद्र मोदी के साथ-साथ ही सत्तारूढ़ दल के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया है।”
IFCN (इंटरनेशनल फैक्ट-चेकिंग नेटवर्क) के कार्यकर्ताओं में से एक कंचन कौर भी हैं, जो यह तय करती है कि भारत में किस वेबसाइट को IFCN सर्टिफिकेशन मिलता है और किस पोर्टल को नहीं! IFCN वेबसाइट पर कंचन कौर की प्रोफाइल बताती है कि उनमें ‘हितों का टकराव’ नहीं है।
IFCN पर कंचन कौर का प्रोफाइल विवरण
कंचन कौर ने IFCN सर्टिफिकेशन के अभ्यर्थी जिन कुछ पोर्टल्स का आकलन कर उन्हें सर्टिफिकेट दिया, वे बूमलाइव (BoomLive), दी क्विंट (TheQuint), ऑल्टन्यूज़ (AltNews ) आदि हैं। यह उनके IFCN प्रोफाइल पर भी दिखाई देता है। उसने Factchecker.in का भी आकलन किया और उसे भी सर्टिफिकेट जारी किया।
यहाँ पर ध्यान रखा जाना चाहिए कि न केवल ऑल्टन्यूज़, दी क्विंट जैसों को कई बार फर्जी खबरें फैलाने के लिए पकड़ा गया है, बल्कि उन्हें अत्यंत स्पष्ट राजनीतिक और वैचारिक पूर्वग्रह के लिए भी कुख्यात हैं। Factchecker.in भी अब इनके भयावह एजेंडा में शामिल हो गया है।
कंचन कौर इन पोर्टल्स के लिए IFCN सर्टिफिकेट का आकलन और निगरानी करती आई हैं, जो न केवल राजनीतिक दुर्भावना से भरे हैं, बल्कि स्पष्ट रूप से भाजपा के खिलाफ हैं। यही नहीं, ये वो पोर्टल्स हैं, जो बड़े पैमाने पर हिंदुओं के खिलाफ होने के साथ ही संप्रदाय विशेष के समर्थकों के साथ जुड़े हैं।
ऑपइंडिया ने खुद कंचन कौर की विचारधारा पर गौर करने की कोशिश की जिसमें एक ऐसा पेपर मिला जिसे उन्होंने नवंबर, 2019 में लिखा था। यानी, पीएम मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही महीने बाद।
कंचन कौर के लेख का हिस्सा
कंचन कौर ने जो पेपर लिखा, वह ‘भारत में फेक न्यूज़ इकोसिस्टम की समीक्षा और न्यूज़ साक्षरता प्रोजेक्ट की आवश्यकता’ था। दिलचस्प बात यह है कि जब वह खुद को फर्जी ख़बरों को रोकने के लिए जिम्मेदार संस्था मानती हैं और तय करती हैं कि कौन सा पोर्टल ‘तटस्थ’ ‘विश्वसनीय’ माना जाना चाहिए, किसे ‘फैक्ट-चेकर’ माना जाना चाहिए, कंचन कौर का अपना ही यह दस्तावेज फर्जी तथ्यों और वैचारिक पूर्वाग्रहों से भरा हुआ था।
जैसे, इस पन्ने के पहले ही पैराग्राफ में कंचन कौर बताती हैं कि सोशल मीडिया, खासकर व्हाट्सएप के माध्यम से फैली अपहरण की अफवाह के कारण 30 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। हालाँकि, जानकारी का यह हिस्सा अपने आप में असत्य नहीं है। बच्चों के अपहरण की अफवाहें वास्तव में हुई हैं और कई लोगों को न्याय पाने के लिए अपनी जान भी गँवानी पड़ी है। लेकिन, पहले वाक्य के बाद ही असली एजेंडा अपनी जगह बनता है।
वह आगे बढ़ती हैं और लिखती हैं कि टेलीकॉम कम्पनी जियो भारत में किस तरह से पेअर जमाती हैं, इससे इंटरनेट का उपयोग कैसे बढ़ा और फिर, इसे बीजेपी से जोड़ते हुए दावा करती है कि उसके व्हाट्सएप समूहों में 3 मिलियन से अधिक लोग हैं। इसके अलावा, वह यह दावा करने के लिए बीबीसी के एक अध्ययन का हवाला देती है कि दक्षिणपंथी ही ‘अधिकांश गलत सूचना’ फैलाते हैं।
इस पहले पैराग्राफ में ही कई चीजें गलत हैं। सबसे पहले, वह किसी भी तरह से यह आरोप लगाने के लिए बच्चों के अपहरण की अफवाहों के कारण होने वाली मौतों को लेकर प्रयास करती है कि भाजपा या दक्षिणपंथी इस तरह की अफवाहें फैलाने में शामिल हैं। जबकि, यह साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है क्योंकि ये लिंचिंग देश के अलग-अलग हिस्सों में हुई है, अलग-अलग राजनीतिक दलों के तहत और पुरुष और महिलाएँ, जो हिंदू और संप्रदाय विशेष के लोग थे, इसके शिकार हुए हैं। चूँकि इस दावे को साबित करने के लिए सीधे-सीधे फेक न्यूज़ का सहारा लेना होता है, इसलिए कंचन कौर चालाकी से गुमराह करने वाली जानकारी को इसमें जोड़ती हैं।
फिर वह बीबीसी की रिपोर्ट का हवाला देती है जिसमें कथित तौर पर दावा किया गया था कि भारत में दक्षिणपंथी ने सबसे ज्यादा फर्जी खबरें फैलाईं। चूँकि कंचन कौर, जो ‘फर्जी समाचार’ और ‘फैक्ट-चेकर्स’ की ‘ऑथरिटी’ होने का दावा करती हैं, इसलिए बीबीसी के इस शोध के बारे में बात करना ज़रूरी हो जाता है कि आखिर कैसे बीबीसी ने इस झूठ के बारे में जोर दिया कि फर्जी खबरों के पीछे का कारण राष्ट्रवाद है?
बीबीसी ने इसमें कहा था कि राष्ट्रवादी ही फेक न्यूज़ चलाते हैं। उस रिपोर्ट के खिलाफ बड़े पैमाने पर हंगामा होने के बाद, बीबीसी ने ‘द बेटर इंडिया’ के ईमेल का जवाब दिया, जिसने उनके नाम का इस्तेमाल ‘बीजेपी समर्थक फेक न्यूज़’ की सूची में शामिल होने पर आपत्ति जताई थी। बीबीसी ने तब स्वीकार किया कि उन्होंने ‘द बेटर इंडिया’ का नाम गलती से शामिल कर दिया था। उन्होंने दावा किया था कि वेबसाइट का नाम इस ‘शोध’ से हटा दिया गया था और इसके लिए अपनी शोध प्रणाली की खामियों की जगह ‘मानवीय त्रुटि’ को जिम्मेदार ठहराया था।
बीबीसी ने अपनी संशोधित रिपोर्ट में स्वीकार किया था कि वे वास्तव में यह नहीं कह सकते हैं कि राष्ट्रवाद फ़ेक न्यूज़ के पीछे की ताकत है या नहीं? वे वास्तव में ऐसा कहते हैं और अभी तक इस संगठन ने अपने पिछले आरोपों के लिए कोई माफी जारी नहीं की है।
यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि यह संशोधन तब जोड़ा गया था जब 30 घंटे बाद अस्थायी रूप से इसे हटाने के बाद नई ‘शोध रिपोर्ट’ प्रकाशित की गई थी। यह पैराग्राफ उनके मूल ‘रिसर्च पेपर’ में नहीं था।
इस ‘रिसर्च पेपर’ में लिखा था कि ‘इस नतीजे पर नहीं पहुँचा जा सकता है कि वास्तव में फेक न्यूज़ फैलाने वाले समूह कौन होते हैं लेकिन फिर भी, यह कहा जा सकता है कि इनमें से कुछ कारक जरूर फेक न्यूज़ में भूमिका निभाते होंगे।’
बीबीसी के ‘शोधकर्ताओं’ ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे अपने द्वारा दी गए फेक न्यूज से जुड़े कारकों के प्रभाव की तुलना नहीं कर सकते हैं।
इस पूरे खुलासे के बाद और बीबीसी के अपने दावे से पीछे हटने के बाद, कंचन कौर, जिन्हें IFCN ने यह तय करने का जिम्मा सौंपा है कि कौन विश्वसनीय ‘फैक्ट-चेकर’ है और कौन नहीं, इस ‘शोध’ का इस्तेमाल करती है। इसलिए, पहले ही पैराग्राफ से ही, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कंचन कौर, जिसे IFCN द्वारा जिम्मेदारी सौंपी गई है, निष्पक्ष नहीं है और जब तक कोई सत्तारूढ़ पक्ष के खिलाफ लिखता या काम करता है, उन्हें उससे कोई आपत्ति नहीं है।
कंचन कौर के इसी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल में सिर्फ चुनिंदा मीडिया घरानों के साथ ही बातचीत की, जबकि यह तथ्य भी एकदम झूठ है। 2 नवंबर तक, कंचन कौर के इस लेख के प्रकाशित होने से पहले ही, पीएम मोदी ने निम्नलिखित चैनलों और प्रकाशनों को साक्षात्कार दिया था:
बैंकॉक पोस्ट
इकोनॉमिक टाइम्स
इज़राइल ह्यूम
नेटवर्क 18
इंडियन एक्सप्रेस
अमर उजाला
इंडिया टीवी
टाइम्स नाउ
वॉल स्ट्रीट जर्नल
रूसी मीडिया – TASS
अफ्रीकी पत्रकार
हिंदुस्तान समाचार
खलीज टाइम्स
UNI
द ट्रिब्यून
एएनआई
PTI
दैनिक जागरण
समय पत्रिका
हिंदुस्तान टाइम्स
आज सेशेल्स अखबार में
सीएनएन फरीद जकारिया
सीएनएन
स्वराज्य पत्रिका
इंडिया टुडे (आजतक)
और यह केवल सितंबर 21, 2014 से लेकर नवंबर 02, 2019 के बीच का विवरण है। यह जरूर ध्यान दिया जाना चाहिए कि कंचन कौर की ‘मीडिया’ की परिभाषा में NDTV के अलावा और कितने मीडिया स्रोत आते हैं।
कंचन कौर ने अपनी इस रिपोर्ट में मान लिया है कि भारत में लोगों के सोचने की क्षमता 2014 के चुनावों के बाद कम हो गई और यह देश अब तार्किक होकर सोच पाने में सक्षम नहीं है। कंचन कौर को यह याद नहीं रहा होगा कि कैसे बीबीसी ने कश्मीर में हज़रतबल ऑपरेशन के दौरान चेचन्या का फुटेज दिखाया था ताकि यह साबित किया जा सके कि भारतीय सेना मंदिर में गोलीबारी कर रही थी। कश्मीर में बीबीसी के कारनामे हाल ही में शुरू नहीं हुए थे, बल्कि 1990 के दशक में भारतीय मीडिया ने पूरे देश में चुप्पी बनाए रखी।
निरक्षरता और व्हाट्सएप
अपने लेख में कंचन कौर ने लिखा कि भारत डेटा खपत में कैसे सबसे ऊपर है, खासकर व्हाट्सएप और स्ट्रीमिंग ऐप पर। वह कहती हैं कि अशिक्षा और फर्जी खबरों के कारण इसका अधिक उपयोग किया जाता है, और आगे, वह उन सभी को भाजपा की चुनावी जीत से जोड़ती है।
लेकिन तथ्य यह हैं कि सबसे पहले, साक्षरता का एक बुनियादी स्तर भी फोन का उपयोग करने के लिए आवश्यक है। इसे इस्तेमाल करने के लिए उपयोगकर्ता को संख्या, अक्षर और निर्देशों की पहचानना जरूर होगी।
साथ ही, वर्तमान मोबाइल डेटा की खपत के साथ 2011 के साक्षरता डेटा का हवाला देकर इसे फेक न्यूज़ से जोड़ना इस फर्जी लेख को और भी हल्का साबित करता है। यही नहीं, 2011 के साक्षरता के आँकड़ों से व्हाट्सएप यूजर की तुलना कर कंचन कौर ने इसे 2019 के चुनावों के परिणाम से जोड़ने का भी खेल इस लेख में खेला है।
बीबीसी के ‘शोध’ का हवाला देते हुए, कंचन कौर का कहना है कि ज्यादातर फर्जी खबरें दक्षिणपंथ द्वारा फैलाई जाती हैं। जैसा कि इस लेख में पहले उल्लेख किया गया है, कि कंचन कौर को यह तक पता नहीं कि बीबीसी ने अपने इस घटिया शोध को अपडेट कर दिया था।
वह आगे कहती हैं कि मुख्यधारा की मीडिया वास्तव में फैक्ट चेक में शामिल नहीं है। कंचन कौर के बयान देखकर ही स्पष्ट होता है कि वह राजनीतिक पूर्वाग्रहों से भरी हुई हैं। वह केवल उन वेबसाइटों को प्रमाणित करती हैं, जिनकी राजनीतिक विचारधारा कॉन्ग्रेस और वामपंथियों के साथ है।
वह इसमें कह रही हैं कि जो वेबसाइट पीएम मोदी, भाजपा, दक्षिणपंथ या हिंदुओं को निशाना बनाने वाले लेख लिखते हैं, उन्हें इतने बड़े स्तर पर शेयर नहीं किया जाता है। शायद कंचन कौर का इशारा दी क्विंट, आउट ऑल्टन्यूज़ की ओर था।
जबकि प्रत्येक व्यक्ति अपने निजी राजनीतिक विचारों को रखने का हकदार है, यह भी एक वास्तविकता है कि एक विशिष्ट राजनीतिक विचारधारा वाले लोगों को IFCN द्वारा नजरअंदाज कर दिया जाता है।
मीडिया में कॉरपोरेट का स्वामित्व
निश्चित रूप से, कंचन कौर ने इस बात पर जोर दिया कि भाजपा के करीबी लोग और व्यक्ति मीडिया के मालिक हैं और इसलिए, वह सोचती हैं कि मीडिया प्रधानमंत्री से सवाल नहीं करता है। वह निश्चित रूप से, यह उल्लेख करना भूल जाती है कि NDTV के मुखिया कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य के रिश्तेदार कैसे हैं, या AAP के सदस्य न्यूज़लॉन्ड्री जैसे डिजिटल न्यूज़ पोर्टल के मालिक कैसे हैं। वह एनडीटीवी की सोनिया सिंह की तरह कई पत्रकारों के व्यक्तिगत राजनीतिक संबंधों को कॉन्ग्रेस पार्टी के साथ जोड़ना भी भूल जाती हैं। हालाँकि, वह यह आरोप सिर्फ इसलिए लगाती हैं कि मीडिया पीएम से सवाल नहीं करती है।
यहाँ तक कि राहुल गाँधी के सोनिया गाँधी और इंडिया टुडे के राजदीप सरदेसाई द्वारा आयोजित ‘सॉफ्ट-पेडलिंग इंटरव्यू’ को भी याद करते हैं। हालाँकि, ये तथ्य कंचन कौर के पेपर में शामिल नहीं हैं, जो कि फर्जी खबरों पर ‘रिसर्च’ को लेकर विवादित हैं।
कंचन कौर को देखकर लगता है कि वह फर्जी खबरों की बढ़ती संख्या से व्यथित हैं। जबकि खुद वह तमाम फेक न्यूज़ अपने इस पूरे पेपर में फैला रही हैं। उसके कागज के अंतिम हिस्से में ‘लम्बे समय तक चलने वाली जंग’ का जिक्र था।
वह लिखती हैं, “इसलिए, गलत सूचना के इस आंदोलन का विरोध करने की तत्काल आवश्यकता है। भारत में, कम से कम, हमारे पास एक पूरी पीढ़ी है जो संदिग्ध है, यहाँ तक कि इतिहास की पुस्तकों को बदल दिया गया है। वैश्विक मीडिया दिग्गजों – विशेष रूप से Google और फेसबुक द्वारा – फर्जी खबरों पर लोगों को शिक्षित करने और इसे कैसे ख़त्म करना है, इसके प्रयास किए गए हैं। Google ने देश में विभिन्न स्तरों पर कार्यशालाएँ आयोजित की और फर्जी समाचारों को प्रसारित करने में 8000 से अधिक पत्रकारों को प्रशिक्षित किया। फेसबुक ने भी अपने प्रयास किए हैं। फ़ेसबुक ने ‘फ़्लैग कंटेंट’ को इंटरनेशनल फैक्ट-चेकिंग नेटवर्क (IFCN) प्रमाणित फैक्ट चेकर्स की एक टीम भी नियुक्त की है।”
कंचन कौर ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि उसने इतिहास के पाठ्यक्रमों में बदलाव किया है। वास्तव में केंद्र सरकार ने इस बारे में अभी तक भी कोई रूचि नहीं दिखाई है। क्योंकि अगर ऐसा किया गया होता तो जिस झूठ को वामपंथी इतिहासकार अब तक लोगों को सच मानने के लिए मजबूर करते आए हैं, उस झूठे इतिहास से अब तक शिक्षा पद्धति मुक्त हो चुकी होती।
हालाँकि, यह एक स्थापित तथ्य है कि वामपंथियों ने भारत की शिक्षा को दूषित कर दिया है। इस स्थापित तथ्य को वामपंथी इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल ने भी स्वीकार किया है। उन्होंने स्वीकार किया था कि वामपंथी और मार्क्सवादी इतिहासकारों ने इतिहास की किताबों को अपने कल्पना के रंग से रंगा है।
इस लेख में कंचन कौर IFCN को भाजपा द्वारा फैलाई जाने वाली फेक न्यूज़ को रोकने वाली संस्था के तौर पर जिक्र करती हैं। यहाँ पर यह देखना दिलचस्प है कि वह इस नतीजे पर पहुँची कि सभी फेक न्यूज़ के पीछे भाजपा का रोल रहा होगा। वह भी तब, जबकि IFCN निष्पक्ष और पूर्वाग्रह रहित होने का दावा करता है।
वह स्वीकार करती हैं कि फैक्ट चेकर्स पर पक्षपातपूर्ण होने का आरोप लगाया गया है। इस कथित रिपोर्ट में, अगर वह यह स्वीकार कर रही है कि ऑल्टन्यूज़, क्विंट और बूमलाइव जैसे फैक्ट चेकर्स पर पक्षपातपूर्ण होने का आरोप लगाया गया है, तो यह सवाल उठता है कि उसने पहली ही बार में उन्हें IFCN का सर्टिफिकेट क्यों दिया? अगर उसने ऐसा किया, तो उसने एक भी ऐसे प्लेटफॉर्म को सर्टिफिकेट क्यों नहीं दिया है, जो कि वामपंथी विचारधारा का विरोध करता है।
अनिवार्य रूप से, यह पेपर जो कंचन कौर ने लिखा है, में वह सिर्फ अपने राजनीतिक पूर्वाग्रह का ही खुलासा कर रही हैं। वह फैक्ट-चेकर्स, जो कंचन कौर के राजनीतिक पूर्वाग्रह के अनुरूप हैं, उसके द्वारा IFCN सर्टिफिकेट भी प्राप्त करते हैं। फिर उन फैक्ट-चेकर्स को फेसबुक द्वारा काम पर रखा जाता है और वो फिर दक्षिणपंथ की छवि ख़राब करने का काम करते है।
तथ्य सिर्फ यही है कि जिस तरह के फैक्ट चेकर्स को IFCN फैक्ट चेकर होने का सर्टिफिकेट देता है, ना ही वह फैक्ट चेकर हैं, ना ही IFCN की विश्वसनीयता है और ना ही फैक्ट चेकर्स का मूल्यांकन करने वाले इन कार्यकर्ताओं की!
नोट : यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में नूपुर शर्मा द्वारा लिखा गया है, जिसे आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं।