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XXX सीरीज में फँसीं एकता कपूर: नग्नता, अश्लीलता और राष्ट्रीय प्रतीकों के अनुचित उपयोग के खिलाफ कोर्ट गए सिंगर

बालाजी टेलीफिल्म्स, एकता कपूर और ऑल्ट बालाजी एंटरटेनमेंट के खिलाफ चंडीगढ़ जिला न्यायालय में एक सिविल सूट दायर किया गया है। कोर्ट से ऑल्ट बालाजी एंटरटेनमेंट कंपनी और चैनल पर किसी भी टीवी धारावाहिक या वेब सीरीज को बनाने या उसके प्रसारण पर प्रतिबंध लगाने की माँग की गई है।

चंडीगढ़ स्थित पब्लिक जागृति मिशन ने यह सिविल सूट दायर किया है। इनके अनुसार ऑल्ट बालाजी एंटरटेनमेंट नग्नता के साथ-साथ अश्लीलता फैला रही है। इसके अलावा कंपनी राष्ट्रीय प्रतीक के चिन्हों का अनुचित उपयोग भी कर रही है। इस मामले की अगली सुनवाई 18 सितंबर को होगी।

पब्लिक जागृति मिशन के अध्यक्ष बलजीत सिंह (जो खुद एक गायक हैं) के हवाले से याचिकाकर्ता ने कहा है, “ऑल्ट बालाजी ने एक्सएक्सएक्स सीजन -2 (XXX Season-2) नाम से एक वेब सीरीज शुरू की है। इसमें सेना के जवानों को बहुत गलत तरीके से दिखाया गया है।”

इस मामले के वकील प्रकाश दीप कौर ने बताया कि उनके मुवक्किल बलजीत सिंह ने एकता कपूर, उनके पिता जितेन्द्र कपूर और माँ शोभा कपूर के खिलाफ शिकायत दी है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि एकता कपूर को बालाजी प्रोडक्शन का नाम बदल लेना चाहिए। इसके पीछे तर्क दिया गया कि बालाजी का मतलब हनुमान जी है और इस नाम के बैनर तले अश्लीलता फैलाना समाज के खिलाफ है।

इसके पहले हिंदुस्तानी भाऊ ने आरोप लगाया था कि एकता कपूर ने अपनी एक वेब सीरीज में देश के जवान और उसकी वर्दी का मजाक बनाया है। इसके खिलाफ उन्होंने शिकायत भी दर्ज करवाई थी। तब सोशल मीडिया पर हिंदुस्तानी भाऊ का वीडियो वायरल भी हुआ था।

PM मोदी ने महेंद्र सिंह धोनी को लिखा पत्र: न्यू इंडिया का मंत्र समेटे इस आभार में पढ़ें क्या है खास

भारतीय क्रिकेट के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने जब से अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहा है। तभी से उनके प्रशंसक सोशल मीडिया पर उन्हें अलग-अलग तरह से ट्रिब्यूट दे रहे हैं। अब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी महेंद्र सिंह धोनी की तारीफ की है। पीएम मोदी ने उन्हें पत्र लिखकर आभार भी व्यक्त किया है। इस पत्र में ‘कैप्टेन कूल’ के शांत स्वभाव की प्रशंसा से लेकर ये तक कहा गया है कि धोनी नए भारत के युवाओं के लिए हमेशा प्रेरणा स्रोत रहेंगे।

इस पूरे पत्र में किस तरह देश के प्रधानमंत्री ने देश के सबसे बेहतर क्रिकेट कप्तान के लिए क्या लिखा है। आइए पढ़ें:

प्रिय महेंद्र,
15 अगस्त के अवसर पर आपने अपने नम्र अंदाज में एक छोटी सी वीडियो साझा की, जो पूरे देश के लिए एक लंबी और भावुक चर्चा के लिए पर्याप्त थी। 130 करोड़ भारतीय इससे निराश थे लेकिन वे अंदर से आपके प्रति आभारी भी थे, उस सब के लिए जो आपने पिछले डेढ़ दशक में भारतीय क्रिकेट के लिए किया है। 

आपके क्रिकेट करियर पर नजर डालने का एक तरीका है कि उसे आँकड़ों के जरिए देखें। आप सबसे सफल कप्तानों में से एक रहे हैं, जिन्होंने भारत को दुनिया के चार्ट में सबसे ऊपर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आपका नाम इतिहास में सबसे महान क्रिकेट कप्तान के रूप में, दुनिया के बल्लेबाजों में से, और निश्चित रूप से एक सबसे अच्छे विकेटकीपर के तौर पर लिया जाएगा।

मुश्किल परिस्थितियों में आपकी निर्भरता, मैचों को फिनिश करने की आपकी क्षमता, खासतौर पर 2011 के विश्व कप के फाइनल की याद, पीढ़ियों तक लोगों के जेहन में ताजा रहेगी।

महेंद्र सिंह धोनी को सिर्फ उनके करियर के आँकड़ों और मैच जीतने की भूमिका की वजह से ही याद नहीं रखा जाएगा। आपका सिर्फ एक खिलाड़ी के रूप में मूल्यांकन आपके साथ अन्याय होगा। आपको सही तरह से मूल्यांकित करने के लिए आपको अद्भुत शख्सियत के रूप में देखा जाना चाहिए!

एक छोटे से शहर से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर उभरना और अपने साथ-साथ पूरे देश को गौरव दिलाना बहुत महत्तवपूर्ण बात हैं। इसके बाद आपने अपनी ही भाँति उन करोड़ों युवाओं को प्रेरित किया जो भले ही बड़े स्कूल और कॉलेज नहीं जाते थे और न ही उनका संबंध किसी शाही परिवार से था। लेकिन बावजूद इसके उनके पास प्रतिभा थी कि वह अपने आप को उच्च स्तर तक ले जाएँ।

आप नए भारत की संकल्पना के लिए एक महत्तवपूर्ण उदहारण हैं जहाँ युवाओं की किस्मत उनका परिवार नहीं तय करता बल्कि वह खुद अपना नाम और अपनी किस्मत बनाते हैं।

हम कहाँ से आते हैं इस बात का तभी तक कोई फर्क नहीं पड़ता जब तक कि हम जानते हैं कि हम कहाँ है- ये वह भाव है जिससे आपने कई युवाओं को प्रोत्साहित किया।

मैदान पर आपके बहुत से कारनामे पीढ़ियाँ याद रखेगी। यह पीढ़ी रिस्क लेने से नहीं घबराती और मुश्किल घड़ी में भी एक दूसरे की काबिलियत को सराहती है। इसने आपसे ही कठिन से कठिन परिस्थिति में रिस्क लेना सीखा है। बिलकुल उसी तरह जैसे आपने तनाव वाली स्थिति में कई बार नवयुवकों को मौका देकर रिस्क लिया। साल 2007 के टी-20 वर्ल्ड कप में अंतिम ओवर जोगेंद्र सिंह से फिंकवाना इसका शानदार उदाहरण है।

यह पीढ़ी कठिन से कठिन परिस्थितियों में संतुलन बनाए रखती है- जैसा हमने आपकी बहुत सी पारियों और मैचों में देखा हैं। हमारा युवा विपरीत परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं छोड़ता और बिना डरे स्थिति का सामना करता है-जैसे आप अपनी टीम का नेतृत्व करते थे।

इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके बाल लंबे हैं या छोटे। आप जिस तरह जीत के बाद शांत दिखते हैं उसी तरह हार के बाद भी शांत रहते हैं। यह युवाओं के लिए एक बड़ा सबक है।

भारतीय सैन्य बलों से आपके विशेष लगाव का भी मैं यहाँ जिक्र करना चाहूँगा। आप एक सैनिक के रूप में सबसे ज्यादा खुश दिखाई दिए थे। कल्याण के लिए आपकी प्रतिबद्धताएँ हमेशा याद रखी जाएँगी।

मुझे उम्मीद है कि साक्षी और जिवा अब आपके साथ अधिक समय बिता पाएँगी। मैं आप सबको शुभकामनाएँ देता हूँ, क्योंकि उनके त्याग और सहयोग के बिना कुछ भी संभव नहीं होता। युवा आपसे सीखेंगे कि पेशेवर और निजी जिंदगी के बीच कैसे तालमेल बिठाया जाता है। मैंने आपकी एक तस्वीर देखी है, जिसमें आप प्यारी जीवा के साथ खेल रहे हैं। एक टूर्नामेंट में जीत के बाद आप अपनी बेटी के साथ सेलिब्रेट कर रहे हैं। यही विशिष्ट धोनी हैं।

मैं आपको भविष्य के लिए शुभकामाएँ देता हूँ।

यहाँ बता दें कि इस पत्र को पढ़ने के बाद महेंद्र सिंह धोनी ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने पीएम मोदी को धन्यवाद लिखते हुए कहा, “एक कलाकार, सैनिक और खिलाड़ी जिस चीज के लिए तरसते हैं, वह है प्रशंसा, कि उनकी मेहनत और त्याग को हर कोई देख रहा है और उनकी सराहना की जा रही है। पीएम नरेंद्र मोदी आपकी प्रशंसा और शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद।”

बेंगलुरु दंगा: अब तक 61 पर UAPA के तहत कार्रवाई, 11 अगस्त की रात हुई थी हिंसा और आगजनी

बेंगलुरु दंगे के सिलसिले में अब तक 61 लोगों के खिलाफ गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम कानून (यूएपीए) के तहत मामला दर्ज किया गया है। सिटी पुलिस कमिश्नर के हवाले से मीडिया रिपोर्टों में यह जानकारी दी गई है।

पंत ने बताया कि मामले की जॉंच जारी है और साक्ष्यों के आधार पर यह आगे बढ़ रही है। इसी आधार पर आरोपितों की गिरफ्तारी की जा रही है। जो आरोपित पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं, उन्हें भी जल्द पकड़ लिया जाएगा।

कर्नाटक की राजधानी में 11 अगस्त की रात हिंसा और आगजनी हुई थी। राज्य के गृहमंत्री बसवराज बोम्मई ने पिछले दिनों दंगों के पीछे कट्टरपंथियों का हाथ होने की बात बताई थी। उन्होंने इसे बड़ी साजिश का हिस्सा बताते हुए जॉंच के आदेश दिए थे।

बोम्मई ने कहा था, “कॉन्ग्रेस विधायक और उनके फॉलोवर्स के बीच इंटरनल डिफरेंस हैं, उनके और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के बीच मतभेद हैं, ये सभी चीजें सामने आ रही हैं। इसके अलावा, यह एक बड़ी साजिश का हिस्सा था और बड़े पैमाने पर एसडीपीआई की भूमिका सामने आ रही है।”

गौरतलब है कि दंगों में 3 लोगों की मौत हो गई थी और कई जख्मी हो गए थे। दंगाइयों ने दर्जनों गाड़ियों को आग लगा दी थी और करोड़ों की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया था।

कॉन्ग्रेस विधायक श्रीनिवास मूर्ति के घर और थाने में तोड़फोड़ भी की गई थी। मूर्ति के भतीजे नवीन पर पैगम्बर मुहम्मद को लेकर विवादित पोस्ट करने का आरोप लगाते हुए हिंसा को अंजाम दिया गया था। हिंसा के सिलसिले में अब तक करीब 150 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। राज्य सरकार ने कहा था कि हिंसा के दौरान हुए नुकसान की भरपाई दंगाइयों से ही की जाएगी।

गणेशचतुर्थी के मौके पर तमिलनाडु सरकार ने मूर्तियों की स्थापना पर लगाया रोक: घरों में पूजा करने की दी सलाह

तमिलनाडु सरकार ने गुरुवार (20 अगस्त, 2020) विनायक चतुर्थी (गणेश चतुर्थी) के त्यौहार पर कड़ा रुख अपनाते हुए नागरिकों को सार्वजनिक स्थानों के बजाय अपने घरों में पूजा करने की सलाह दी है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु सरकार ने कोरोना महामारी और लॉकडाउन का हवाला देते हुए 22 अगस्त को विनायक चतुर्थी पर सार्वजनिक जगहों पर भगवान गणेश की प्रतिमाओं को स्थापित करने और जुलूस-रैलियाँ निकालने के साथ-साथ समुद्र और अन्य जलाशयों में प्रतिमाओं के विसर्जन पर भी रोक लगा दी है।

गणेश चतुर्थी के त्यौहार को लेकर वहाँ के लोगों ने मूर्तियों की स्थापना के लिए अनुमति माँगते हुए मद्रास उच्च न्यायालय में कई जनहित याचिका दायर की थी। जिसको लेकर कोर्ट ने जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया कि जनता को इस संबंध में सरकार के आदेशों का पालन करना चाहिए।

इसके अलावा तमिलनाडु सरकार ने केंद्र सरकार द्वारा जारी दिशानिर्देशों का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा वायरल संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए देश भर में धार्मिक त्योहारों और समारोहों पर रोक लगा दी गई है।

गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष एल मुरुगन और वरिष्ठ पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री पलानीस्वामी से उनके आवास पर मुलाकात कर उनसे इस वर्ष विनायक मूर्तियों की स्थापना की अनुमति देने का अनुरोध किया था। हालाँकि, सरकार ने अपने द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों पर दृढ़ रहते हुए उनके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट, अवमानना और प्रशांत भूषण: क्या, कब और कैसे हुआ, हर डिटेल

सुप्रीम कोर्ट ने जून में प्रशांत भूषण की ओर से मुख्य न्यायाधीश के बारे मे किए गए दो ट्वीट पर 21 जुलाई को स्वत: संज्ञान लिया था। जुलाई 22, 2020 को कोर्ट ने इस मामले में प्रशांत भूषण को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा था कि उनके खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला क्यों नहीं चलाया जाना चाहिए? अदालत ने कहा कि शुरुआती तौर पर प्रशांत भूषण के इन ट्वीट्स से न्याय व्यवस्था का अपमान होता है।

अवमानना कार्यवाही का कारण अधिवक्ता प्रशांत भूषण द्वारा किए गए 2 ट्वीट हैं। ये ट्वीट 27 जून और 29 जून को किए गए थे। एक ट्वीट में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर निशाना साधा था। कहा था कि पिछले 4 मुख्य न्यायधीशों ने देश का लोकतंत्र ध्वस्त करने में अपनी भूमिका निभाई है। वहीं दूसरे ट्वीट में वर्तमान सीजेआई की बाइक के साथ तस्वीर पर सवाल उठाए थे।

ट्वीट में प्रशांत भूषण ने कहा था, “जब भविष्य में इतिहासकार वापस मुड़कर देखेंगे कि किस तरह से पिछले 6 वर्षों में औपचारिक आपातकाल के बिना ही भारत में लोकतंत्र को नष्ट किया गया है, तो वे विशेष रूप से इस विनाश में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका को चिह्नित करेंगे, और पिछले 4 CJI की भूमिका को और भी अधिक विशेष रूप से।”

29 जून को प्रशांत भूषण ने बाइक पर बैठे मुख्य न्यायाधीश एसएस बोबडे की एक तस्वीर ट्वीटर पर शेयर की थी। इसमें उन्होंने उनके बिना मास्क और हेलमेट होने को लेकर सवाल किए थे। हालॉंकि बाद में इसके लिए माफी माँगते हुए उन्होंने कहा था कि मैंने ध्यान नहीं दिया कि बाइक स्टैंड पर है और स्टैंड पर खड़ी बाइक पर हेलमेट लगाना जरूरी नहीं होता, ऐसे में वो इस बात के लिए माफी माँगते हैं कि उन्होंने हेलमेट को लेकर सीजेआई से सवाल किया।

5 अगस्त को इस मामले में सुनवाई पूरी हो गई थी। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की पीठ ने इस मामले में भूषण को दोषी माना। CJI बोबडे के मोटरसाइकिल पर बैठने को लेकर की गई टिप्पणी पर प्रशांत भूषण ने अपने एफिडेविट में कहा कि पिछले तीन महीने से भी ज़्यादा समय से सुप्रीम कोर्ट का कामकाज सुचारू रूप से न हो पाने के कारण वे व्यथित थे और उनकी टिप्पणी इसी बात को जाहिर कर रही थी।

14 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण को अवमानना मामले में दोषी करार दिया और सजा की सुनवाई की तारीख 20 अगस्त रखी।

20 अगस्त को उनकी सजा पर सुनवाई से ठीक पहले 19 अगस्त को कई नामी वकीलों ने इसका विरोध किया और प्रशांत भूषण को अवमानना केस में दोषी ठहराए जाने का विरोध किया।

19 अगस्त के ही दिन सेवानिवृत्त न्यायधीशों और ब्यूरोक्रेट्स समेत नागरिकों के एक समूह ने वकील प्रशांत भूषण को अदालत की अवमानना के मामले में दोषी करार देने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश की आलोचना करने वालों पर निशाना साधाते हुए कहा कि ये लोग संसद, चुनाव आयोग और शीर्ष अदालत जैसी लोकतांत्रिक संस्थाओं की जड़ों पर आघात करने का हर अवसर भुनाते हैं। सीजेआई बोबडे को लिखे गए इस पत्र में कहा गया कि ये काफी दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब किसी वकील का राजनीतिक मकसद कोर्ट के फैसलों से पूरा नहीं होता है तो वो इस पर अपमानजनक टिप्पणी करते हैं।

19 अगस्त को ही, यानी सजा की सुनवाई से ठीक एक दिन पहले ही वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक अर्जी दायर की जिसमें अवमानना मामले के संबंध में उनकी सजा पर सुनवाई टालने की माँग की गई है। इसमें कहा गया है कि जब तक इस संबंध में एक समीक्षा याचिका दायर नहीं की जाती है और अदालत द्वारा इस पर विचार नहीं किया जाता है, तब तक सजा पर सुनवाई को टाल दिया जाए।

20 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुनर्विचार याचिका के निपटारे तक उनके लिए सजा का ऐलान नहीं किया जाएगा। बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि प्रशांत भूषण के जवाब में आक्रमकता झलकती है, बचाव नहीं। हम इन्हें माफ नहीं कर सकते जब तक भूषण अपने स्टेटमेंट पर पुनर्विचार नहीं करते तब तक यह संभव नहीं है।

जस्टिस मिश्रा ने कहा कि चूँकि आप बहुत से अच्छे काम करते हैं, सिर्फ इस वजह से किसी गलत काम को नकारा नहीं जा सकता। जस्टिस गवई ने कहा कि निर्णय इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि ट्वीट पूरे संस्थान को प्रभावित करते हैं, न कि कुछ न्यायाधीशों को। जहाँ तक सजा की बात है, तो हम तभी उदार हो सकते हैं, जब व्यक्ति माफी माँगता है और वास्तविक अर्थों में गलती का एहसास करता है।

कंटेम्ट ऑफ़ कोर्ट्स ऐक्ट, 1971 के तहत प्रशांत भूषण को छह महीने तक की जेल की सज़ा जुर्माने के साथ या इसके बगैर भी हो सकती है। इसी क़ानून में ये भी प्रावधान है कि अभियुक्त के माफ़ी माँगने पर अदालत चाहे तो उसे माफ़ कर सकती है।

2009 का एक और मामला है लंबित

सुप्रीम कोर्ट में प्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ एक और अवमानना का मामला लंबित है, न्यायालय इस मामले में 24 अगस्त को सुनवाई करेगा। दरअसल, प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट को एक लिखित बयान में खेद जताने की बात कही थी, लेकिन अदालत ने इसे ठुकरा दिया।

प्रशांत भूषण ने वर्ष 2009 में तहलका पत्रिका को दिए इंटरव्यू में आरोप लगाया था कि भारत के पिछले 16 मुख्य न्यायाधीशों में आधे भ्रष्ट थे। सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि जजों को भ्रष्ट कहना अवमानना है या नहीं, इस पर सुनवाई की आवश्यकता है।

शुरू हो गया निर्माण कार्य: सैकड़ों साल तक खड़ा रहेगा राम मंदिर, नहीं होगा लोहे का प्रयोग

लंबे इंतजार के बाद अयोध्या में राम मंदिर निर्माण शुरू हो गया है। यह जानकारी गुरुवार (20 अगस्त, 2020) को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने ट्वीट के माध्यम सेे साझा की है।

5 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी ने प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन का कार्य संपन्न किया था। जिसके बाद सभी को इस बात की प्रतीक्षा थी कि मंदिर का निर्माण कार्य कब शुरू होगा। जिसका जवाब ट्रस्ट के आधिकारिक ट्वीटर हैंडल से दिया गया है। राम मन्दिर निर्माण के कार्य में लगभग 36-40 महीने का समय लगने का अनुमान है।

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने कहा, “श्री राम जन्मभूमि मन्दिर के निर्माण हेतु कार्य प्रारंभ हो गया है। CBRI रुड़की और IIT मद्रास के साथ मिलकर निर्माणकर्ता कम्पनी L&T के अभियंता भूमि की मृदा के परीक्षण के कार्य में लगे हुए है। मन्दिर निर्माण के कार्य में लगभग 36-40 महीने का समय लगने का अनुमान है।”

ट्रस्ट ने बताया, “श्री रामजन्मभूमि मन्दिर का निर्माण भारत की प्राचीन निर्माण पद्धति से किया जा रहा है ताकि वह सहस्त्रों वर्षों तक न केवल खड़ा रहे, अपितु भूकम्प, झंझावात अथवा अन्य किसी प्रकार की आपदा में भी उसे किसी प्रकार की क्षति न हो। मन्दिर के निर्माण में लोहे का प्रयोग नहीं किया जाएगा।”

गौरतलब है कि इससे पहले राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट के जनरल सेक्रेटरी चंपत राय ने भी राममंदिर को लेकर जानकारी साझा की थी। उन्होंने कहा था कि राम मंदिर का निर्माण कुछ इस तरह होगा कि इस पर किसी प्रकार के कोई प्राकृतिक आपदाओं का असर नहीं होगा। हजारों सालों तक इस पर भूकंप जैसे प्राकृतिक आपदाओं का कोई असर नहीं होगा।

उन्होंने आगे कहा था कि मंदिर के लिए जिस उच्च तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा, उससे ये मंदिर 1000 साल तक आँधी तूफान सहने के बाद भी पूरी तरह सुरक्षित होगा। जिस तरह नदियों का पुल बनता है, उसी तरह नींव के पिलर खड़े होंगे। बस अंतर इतना होगा कि नींव में लोहे का प्रयोग नहीं होगा, बीम पत्थर की बनाई जाएगी। उन्होंने यह भी बताया कि राम भक्तों को राम मंदिर के परिसर में खुदाई में मिले पुरातत्वों के भी दर्शन प्राप्त होंगे।

वहीं अयोध्या मंदिर के ट्रस्ट के सदस्य अनिल मिश्रा ने भी राम मंदिर के लेआउट प्लान को लेकर भी जानकारी साझा की थी। जिसके अनुसार सोमनाथ और अक्षरधाम मंदिरों से भी भव्य राम मंदिर बनने की बात कही गई थी।

99 की हत्या, सैकड़ों लापता, इस्लाम कबूलने की मजबूरी: म्यांमार का हिंदू नरसंहार जिसे याद नहीं करते रोहिंग्या के पैरोकार

“उन दिनों मेरी बेटी की तबीयत खराब थी इसलिए मैंने उसे ठीक होने के लिए अपने ससुराल छोड़ा था। बाद में पता चला कि ‘वे लोग’ मेरी सास और मेरी बेटी को अपने साथ ले गए हैं…. जब हम वहाँ गए तो इलाके में बहुत गंध थी। हम लोगों ने खुद घंटों हर जगह की खुदाई की। थोड़ी देर बाद मेरी नजर हाथ के कड़े और गले में पहनने वाले काले-लाल रेशम के धागे पर पड़ी जिसकी वजह से मैं अपनी बेटी के शव को पहचान पाया।”-आशीष

“मेरे पति मेरी बेटी को लेकर पास के गाँव में काम करने गए थे। शाम को मेरी बहन को एक फोन आया और कहा कि ‘उन लोगों’ ने उन दोनों की कुर्बानी दे दी है। अब हमारे साथ भी यही होगा। डरकर मैं घर में तीन दिन छिपी रही। फिर फौज हमें शिविर में लेकर आई।”-कुकु बाला

आप सोच रहे होंगे ये क्या है? दरअसल, ये एक माँ और एक पिता का बयान है जिनकी बच्चियों ने और घरवालों ने साल 2017 में म्यामांर के रखाइन प्रान्त में रोहिंग्या ‘आतंकियों’ की उस बर्बरता का चेहरा देखा जो किसी की भी रूह कँपा दे। शुद्ध काले नकाब में तलवार, चाकू, रॉड, भाले जैसे कई हथियारों से लैस होकर सैकड़ों हिंदुओं का नरसंहार! कल्पना करने पर लगता है जैसे कोई ISIS का हमला हो। यह घटना है 25-26 अगस्त 2017 की। हमलावर भले ही ISIS से नहीं थे, पर उनके मनसूबे उतने ही नापाक थे।  

आशीष कुमार ने अपनी 8 साल की बेटी को खोया था। गर्भवती कुकु बाला ने अपने पति और बेटी को। इनके जैसे सैंकड़ों परिवार थे जिनकी सिसकियाँ रुकने का नाम नहीं ले रहीं थी। उस दिन ‘काले नकाब’ में रोहिंग्या ‘आतंकियों’ ने म्यांमार के रखाइन प्रांत के खा मॉन्ग सेक में जो तबाही मचाई उसकी गंध आज भी सैंकड़ों पीड़ित हिंदू नहीं भूल पाते। भूलें भी कैसे? जमीन में दबाई गई एक साथ 45 लाशें जो क्षत-विक्षत देखी थीं। मात्र दो गाँव से 99 लोग मार दिए गए थे। 1000 हिंदू लापता हो गए। 620 परिवारों को शिविरों में रहने को मजबूर होना पड़ा था।

जी टीवी की कवरेज से लिया गया स्क्रीनशॉट

खा मॉन्ग सेक नरसंहार ( Kha Maung Seik massacre )

25 अगस्त 2017 को खा मॉन्ग सेक ( Kha Maung Seik ) यानी फाकिरा बाजार के नजदीक रहने वाले हिंदुओं के लिए भयावह रात थी। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस मामले में अपनी रिपोर्ट में रोहिंग्या ‘आतंकियों’ का हाथ बताया था। रिपोर्ट में एमनेस्टी ने कहा था कि इस नरसंहार को अंजाम देने वाले अराकान रोहिंग्या सैलवेशन आर्मी (आरसा) के गुर्गे हैं (म्यांमार में इन्हें रोहिंग्या आतंकी भी कहा जाता है)। उन्होंने ही पहले सुरक्षा बलों पर दर्जनों हमले किए। साथ ही हिंदू गाँव नॉक खा माउंग सेक ( Kha Maung Seik ) पर 25 अगस्त को हमला किया और कई हिंदू बंदी बना लिए गए। इनमें से अधिकांश को असहनीय यातनाएँ देकर मार डाला गया। 

रिपोर्ट्स बताती हैं कि दो दिन में 45 हिंदुओं के शव 3 गड्ढों में पाए गए थे। ये शव जब निकाले गए तो बुरी तरह क्षत-विक्षत थे। कुछ का गला काटा गया था, कुछ का सिर और कुछ के अन्य अंग। पहले शवों की गिनती 45-48 के बीच होती रही। फिर हमले में गायब कुल संख्या से मालूम हुआ कि लगभग 99 हिंदुओं को वहाँ मौत के घाट उतारा गया।

लाशों के लिए खोदे गए गड्ढे

कई मीडिया रिपोर्ट्स में इस पूरे नरसंहार को बिलकुल अलग कोण के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया। तर्क-कुतर्क के नाम पर ARSA को बचाने की कोशिशें हुई। प्रश्न चिह्नों के साथ ये समझाया गया कि कैसे आखिर जो इल्जाम इस्लामिक आतंकियों पर लगाया जा रहा है वो सरासर गलत है। 

रोहिंग्या ‘आतंकियों’ की कार्रवाई पर मीडिया रिपोर्ट कैसी थी? इस पर हम अंत में थोड़ी चर्चा जरूर करेंगे। लेकिन उससे पहले इस नरसंहार की शुरुआत को समझिए। वैसे तो म्यांमार के रखाइन प्रांत में साल 2012 से ही बौद्धों और रोहिंग्या ‘आतंकियों’ के बीच सांप्रदायिक हिंसा शुरू थी। लेकिन साल 2017 में हालात तब भयानक हो गए, जब म्यांमार में मौंगडो बॉर्डर पर रोहिंग्या आतंकियों के हमले में 9 पुलिस अफसरों की मौत हो गई।

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: lepetitjournal)

रोहिंग्या कट्टरपंथियों ने 30 पुलिस थानों को अपना निशाना बनाकर 9 पुलिस कर्मियों को मौत के घाट उतारा था। जवाब में प्रशासन ने भी कार्रवाई की और करीब 90 हजार रोहिंग्या मुस्लिमों को गाँव छोड़कर बांग्लादेश जाना पड़ा। इन लोगों ने म्यांमार प्रशासन पर हत्याओं और बलात्कार का आरोप मढ़ा। इससे वैश्विक स्तर पर भी म्यांमार की तीखी आलोचना हुई। लेकिन म्यांमार ने इसे क्लीयरेंस ऑपरेशन बताते हुए रोहिंग्या चरमपंथियों के हमलों का वाजिब रिएक्शन करार दिया । 

आज इन्हीं रोहिंग्याओं के लिए इंसानियत के नाम पर जिस तरह छाती पीटी जाती है। बड़ी-बड़ी संस्थाएँ इन पर दया दिखाने की बात करती हैं। इन्हें शरण देने की पैरवी करती हैं। उसी ढंग से क्या आपने कभी भी रखाइन प्रांत के इन लाचार हिंदुओं के बारे में सुना है? जिनका न प्रशासन से कुछ मतलब था और न चरमपंथियों से। लेकिन तब भी वह इनकी बर्बरता का शिकार हुए।

महिला, बच्चे, पुरुष…सबको बनाया गया निशाना

पश्चिमी म्यांमार के हिंदू आबादी वाले गाँव में रीका धर ने अपने पति, 2 भाइयों और कई पड़ोसियों को नृशंसतापूर्वक मौत के घाट उतरते हुए अपनी आँखों से देखा। घटना के काफी दिनों बाद एक न्यूज चैनल से बातचीत में धर ने बताया  “कत्ल करने के बाद, उन्होंने बड़े-बड़े तीन गड्ढे खोदे और सबको उसमें फेंक दिया। उनके हाथ उस समय भी पीछे की ओर बँधे हुए थे और आँखों पर पट्टी बाँध दी गई थी।” 

इसी तरह 15 वर्षीया प्रोमिला शील ने बताया था, “पहाड़ियों में ले जाने के बाद उन्होंने हर किसी को मौत के घाट उतार दिया। मैंने अपनी आँखों के सामने यह सब देखा।” 

राजकुमारी ने कहा, “हमें उस तरफ देखने से मना किया गया था। उनके हाथ में चाकू, तलवारें और लोहे की रॉड थी। हमने खुद को झाड़ियों में छिपा लिया था। इसलिए हम वो सब देख पाए। मेरे पिता, मेरे चाचा और मेरे भाई…सबको उन्होंने काट डाला।”

सोचिए इस नरसंहार में बच्चे, महिला, पुरुष, बुजुर्ग किसी को नहीं छोड़ा गया। जब स्वजनों को खोजने के लिए अगले दो दिन खुदाई हुई तो हर जगह हड़कंप था। परिवारों की चीखें बंद होने का नाम नहीं ले रहीं थी। लोग एक दूसरे से लिपट-लिपट कर अपने परिजनों के लिए रो रहे थे। कुछ की आँखों से आँसू सूख चुके थे और कुछ इस इंतजार में थे कि क्या पता उनके स्वजन कहीं से लौट आएँ। 

पूरे नरसंहार ने हर जगह म्यांमार प्रशासन को  लेकर एक ओर जहाँ बहुत सारे सवाल खड़े कर दिए थे, वहीं हिंसा के बाद रोहिंग्या मुस्लिमों ने बांग्लादेश जाना शुरू कर दिया था। रखाइन प्रांत के दो गाँवों में हुए इस ‘आतंकी’ हमले के बाद सैकड़ों हिंदू भी बिखर गए। कइयों का पता नहीं चल पाया और कइयों को शिविरों में ठहराया गया। इस हमले से पहले वहाँ 14 हजार हिंदू रहते थे। बौद्ध और रोहिंग्या मुस्लिमों की तादाद के मुकाबले प्रांत में ये संख्या हमेशा से बहुत कम थी।

म्यांमार हिंदू नरसंहार पर क्या कहती है एमनेस्टी की रिपोर्ट?

एमनेस्टी की रिपोर्ट में स्थानीय लोगों की बयानों के हवाले से कहा गया कि उस रात नॉक खा मॉन्ग सेक ( Kha Maung Seik) नामक गाँव में काले नकाब पहनकर आए हमलावर ग्रामीणों की आँखों पर पट्टी बाँधकर शहर से बाहर ले गए। वहाँ उन्होंने सबसे पहले महिलाओं और बच्चों से पुरुषों को अलग किया। कुछ घंटों बाद 53 हिंदुओं का गला रेत दिया गया। ये शुरुआत पुरुषों से हुई। इस घटनाक्रम में नकाबपोशों ने 8 हिंदू महिलाओं समेत कुछ बच्चों को छोड़ने की बात मान ली। लेकिन वो भी तब, जब इन लोगों ने इस्लाम कबूलना स्वीकार कर लिया।

इस रिपोर्ट के अलावा जी न्यूज की ग्राउंड रिपोर्ट भी यह दावा करती है कि उन्हें म्यांमार के स्टेट काउंसलर से आधिकारिक जानकारी मिली थी। उसमें भी यही बात कही गई कि 300 रोहिंग्या आतंकियों ने 100 हिंदुओं का अपहरण किया और उनमें से 92 की हत्या कर दी गई, जबकि 8 महिलाएँ बच गईं क्योंकि उन्होंने इस्लाम स्वीकार करने को मजबूर किया गया और बाद में बांग्लादेश ले जाया गया।

एमनेस्टी की रिपोर्ट में पीड़िता का बयान

फॉर्मिला नाम की महिला ने एम्नेस्टी को बताया कि उसने हिंदू पुरुषों को मरते हुए भले ही नहीं देखा लेकिन जब नकाबपोश वापस लौटे तो उनके हथियार और हाथ पर खून था। उन्होंने महिलाओं को सूचित किया उनके आदमियों को मार दिया गया। बाद में फॉर्मिला समेत 7 अन्य महिलाओं को अलग ले जाया गया। उसने पीछे मुड़कर देखा तो ASRA के आतंकी महिलाओं और पुरुषों को भी मार रहे थे। फॉर्मिला ने एक घटना का जिक्र करते हुए कहा, “मैंने देखा कि एक आदमी ने महिला के बाल को पकड़ा हुआ था और दूसरे ने चाकू लेकर उसका गला काट दिया।”

घटना के उसी दिन उसी प्रात के एक अन्य गाँव Ye Bauk Kyar से 46 लोग लापता हो गए। इनके शव बहुत ढूँढने के बाद भी बरामद नहीं हो पाए। इसी तरह 26 अगस्त 2017 को ASRA आतंकियों मे मंगडौ शहर के पास Myo Thu Gyi गाँव में 6 हिंदुओं को गोली से मार दिया। 25 वर्षीय महिला ने बताया कि उसके पति और बेटी को उसके सामने नकाबपोशों ने मारा। हालाँकि वह उनका चेहरा नहीं देख पाई। लेकिन उनकी आँखे, बड़ी-बड़ी बंदूकें और तलवारे उसने जरूर देखीं। उसने कहा, “मेरे पति को जब मारा गया। मैं थोड़े होश में थी।”

मीडिया ने हिंदू नरसंहार और इस्लामी आतंक की खबर को कैसे परोसा?

इस नरसंहार ने विश्व के कोने-कोने मे रोहिंग्या मुस्लिमों की बर्बरता पर सवाल खड़े कर दिए थे। ऐसे में वामपंथियों की पहली जरूरत थी कि रोहिंग्याओं पर लगे दाग को साफ किया जाए। शायद इसीलिए मात्र कुछ महीनों के बाद ही द क्विंट, बीबीसी और द इंडिकटर जैसे वेबसाइट्स पर कई लेख छपे। 

इन आर्टिकल्स का मूल उद्देश्य लोगों के जेहन में ये बात डालना था कि आखिर जिस प्रकार से इस पूरे हमले के लिए संप्रदाय विशेष के चरमपंथियों पर मढ़ा जा रहा है, उसमें वास्विकता में म्यांमार सरकार का, वहाँ की सेना का और इलाके के बहुसंख्यकों का भी हाथ हो सकता है। अपने लेख को सही साबित करने के लिए इनमें यहाँ तक बता दिया गया कि आखिर ARSA के लोगों की क्या यूनिफॉर्म होती है, उनके नारे क्या होते हैं और क्यों ये काम उनका नहीं है। 

तमाम हिंदुओं के बयान सुनने के बाद भी रिपोर्ट्स में पूछा गया कि आखिर रोहिंग्या मुस्लिम रखाइन प्रांत के हिंदुओं को क्यों मारेंगे, उनकी हालत तो खुद रोंहिंग्या की तरह है। मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी आरोप लगाए गए कि म्यांमार प्रशासन ने हिंदुओं को रोहिंग्याओं से अलग करने के लिए काफी आगे तक निकल गए हैं। इसलिए बौद्धों ने जो हमला किया उसका इल्जाम रोहिंग्या पर थोपा जा रहा है। अपवादों के उदाहरण देकर यह एंगल रखने की कोशिश भी की गई कि नकाबपोशों ने संप्रदाय विशेष के लोगों को भी निशाना बनाया। 

जावेद अख्तर ने भी म्यांमार में हिंदू नरसंहार के लिए वहाँ की सैन्य कार्रवाई को दोषी ठहराया था। इसके बाद उनकी बहुत आलोचना हुई थी।

जावेद अख्तर ने ट्वीट करते हुए लिखा था, “अगर रखाइन में हिंदुओं की कब्र मिली है तो यह सब वहाँ की सेना की वजह से हुआ होगा। नहीं तो, सैकड़ों की संख्या में हिंदू लोग वहाँ से रोहिंग्याओं के साथ क्यों भाग गए।”

आप MP संजय सिंह ने लगाई उपराष्ट्रपति से मदद की गुहार, कहा- 9 FIR करके भय उत्पन्न करना चाहती है योगी सरकार

आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने उपराष्ट्रपति और राज्यसभा अध्यक्ष वेंकैया नायडू को एक पत्र लिखा है। पत्र उनके खिलाफ़ दर्ज किए गए मुक़द्दमों से संबंधित है। पत्र में उन्होंने लिखा कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने उनके खिलाफ़ कुल 9 मामले दर्ज कराए हैं। उन्होंने अपने पत्र में वेंकैया नायडू से निवेदन किया है कि वह इस मामले पर संज्ञान लें।   

आप सांसद संजय सिंह ने पत्र में सबसे पहले इस बात पर ज़ोर दिया है कि उनकी जान को ख़तरा है। इसके बाद उन्होंने कहा योगी सरकार उन्हें झूठे मामलों के तहत आरोपित साबित करना चाहती है। उनका यह भी कहना था कि योगी सरकार ने कुल 9 मामले इसलिए दर्ज कराए जिससे ऐसा लगे कि वह बड़े अपराधी हैं। संजय सिंह ने अपने पत्र में यह दावा भी किया कि योगी सरकार केवल एक जाति विशेष का हित कर रही है। 

उनका कहना था कि योगी सरकार में हो रहे अत्याचार पर मुखर होकर बोलने की वजह से उन पर मामला दर्ज कराया गया है। योगी आदित्यनाथ पर तंज कसते हुए आप सांसद ने कहा यह वही आदित्यनाथ हैं। जिन्होंने खुद पर दर्ज कराए गए 3 मामलों को लोकसभा में उठाया था। उन्होंने इस बात को लेकर चिंता भी जताई थी कि तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार उनका एनकाउन्टर भी कर सकती है। संजय सिंह ने पत्र में कहा कि उन्हें धमकी भरे मैसेज और कॉल भी आ रहे हैं। मुझे किसी भी तरह का नुकसान हुआ तो उसके लिए योगी सरकार ही ज़िम्मेदार होगी।   

इसके अलावा संजय सिंह ने ट्विटर पर भी इस मुद्दे को लेकर अपनी बात कही है। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “मैं उत्तर प्रदेश के लोगों से आज वादा करता हूँ कि जनहित के मुद्दों से जुड़ी राजनीति नहीं छोड़ने वाला हूँ। भले ही मुझ पर 900 मामले क्यों न दर्ज करा दी जाए। इस अघोषित आपातकाल के दौर में आप लोगों का सहयोग ज़रूरी है। आप लोगों के सहयोग के ज़रिए ही सरकार की तानाशाही ख़त्म होगी। दिल्ली में हुई प्रेस वार्ता के दौरान आप सांसद संजय सिंह ने योगी सरकार पर तमाम जातिगत आरोप लगाए थे।”   

संजय सिंह ने पहले ही कहा था कि वह खुद पर दर्ज कराए गए मामलों के लिए वेंकैया नायडू को पत्र लिखेंगे। इसके बाद उनका कहना था कि मैं योगी सरकार को आइना दिखाना चाहता था और वह मुझे हिस्ट्री शीटर बनाना चाहते हैं। उत्तर प्रदेश के तमाम राजनीतिक दलों ने इस बात पर मेरा समर्थन भी किया है। मुझे यह बात कहने में कोई परेशानी नहीं है कि योगी सरकार ठाकुरों के लिए ही काम करती है। सरकार दलितों के साथ बुरा बर्ताव करती है।   

अंत में उन्होंने कहा सरकार ने उत्तर प्रदेश स्थित आम आदमी पार्टी का कार्यालय भी बंद करवा दिया है। 12 अगस्त 2020 को हुई प्रेस वार्ता में संजय सिंह ने योगी सरकार को ठाकुरों का हित करने वाली सरकार कहा था। उन्होंने कहा कि यह सरकार दलित विरोधी है। इन्होंने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को राम मंदिर भूमिपूजन में नहीं बुलाया। अंत में संजय सिंह ने कहा यह सरकार एक ही जाति का फ़ायदा सोचती है। इन बातों के आधार पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने सांसद संजय सिंह पर कुल 9 मामले दर्ज कराए थे।      

डिप्रेशन का धंधा चलानेवालों को पब्‍लिक ने उनकी औकात दिखा दी: दीपिका पर कंगना का तंज

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद से ही कंगना रनौत इस मामले पर मुखर रही हैं। इस मामले की जॉंच अब सीबीआई को सौंपी जा चुकी है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद कंगना ने दीपिका पादुकोण को निशाने पर लिया है।

कंगना ने सिलसिलेवार तरीके से कई ट्वीट किए हैं। हालाँकि दीपिका ने कंगना के इन ट्वीट्स का जवाब नहीं दिया है। था। 19 अगस्त को कंगना ने ट्वीट कर कहा, “मेरे साथ दोहराएँ, डिप्रेशन का धंधा चलानेवालों को पब्‍लिक ने उनकी औकात दिखा दी।” 

बता दें कि सुशांत की मौत के बाद दीपिका ने 19 और 20 जून को दो ट्वीट किए थे। इसमें उन्होंने कहा था, “मेरे साथ दोहराएँ, आप अवसाद से भाग नहीं सकते।” साथ ही उन्होंने अवसाद और उदासी के बीच का फर्क भी बताया था।

कंगना के ताजा ट्वीट को दीपिका के इसी ट्वीट के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है। कंगना ने इसके अलावा दो और ट्वीट किए हैं। एक में कहा है, “सच्चाई यही है कि मानसिक परेशानी का कोई मेडिकल साक्ष्य नहीं मिला है। यह एक नए तरह का शिकार है जिसमें हुनरमंद को मध्यस्थता के जरिये ख़त्म कर दिया जाता है। हर प्रतिभाशाली व्यक्ति के मामले में हम गलत फैसले सुनाते हैं और उसकी भावनात्मक लिंचिंग करते हैं। उम्मीद करती हूँ यह बंद हो।”    

एक अन्य ट्वीट में कहा है, “यदि दीपिका कहती हैं कि वह 10 साल पहले हुए ब्रेकअप के कारण अचानक अवसाद में चली गईं तो हमने इसे माना। फिर मुझे और सुशांत को भी तो वही सम्मान मिलना चाहिए। यदि मैं कह रही हूँ कि मैं डिप्रेस नहीं हूँ, सुशांत के पिता कह रहे हैं कि उनका बेटा डिप्रेस नहीं था, तो इसे स्वीकार किया जाना चाहिए। हम पर बीमारी क्यों थोपी जा रही है?”   

उल्लेखनीय है कि सुशांत की मौत के बाद कंगना बॉलीवुड में नेपोटिज्म को लेकर हमलावर रही हैं। इसके कारण इंडिया टुडे को दिए साक्षात्कार में नसीरुद्दीन शाह ने कंगना को आधी-अधूरी शिक्षित कलाकार बता डाला। इसके जवाब में कंगना ने कहा, “शुक्रिया नसीर जी! आपने मेरे सभी पुरस्कारों और अवार्ड्स को एक बार में तौल दिया। जो अभी तक नेपोटिज्म से उभरे मेरे प्रतिद्वंद्वी कलाकारों में किसी के पास नहीं है। लेकिन क्या आप मुझे यही बात कहेंगे अगर मैं दीपिका पादुकोण या अनिल कपूर की बेटी होती?” 

इससे पहले कंगना ने उस टैलेंट मैनेजमेंट एजेंसी को भी निशाना बनाया था जो दीपिका और ऋतिक समेत कई कलाकारों का काम देखती है। कंगना ने आरोप लगाया था कि यह एजेंसी उन्हें बदनाम करने के लिए अभियान चलाती है। कंगना ने अपने ट्वीट में कहा था, ‘यह एजेंसी दीपिका, ऋतिक, आमिर समेत इंडस्ट्री के तमाम लोगों का काम देखती है। यह साल 2014 से मुझे बदनाम करने के लिए अभियान चला रहे हैं, लेकिन अब इनका समय आ चुका है।’

पैसे लेकर दीपिका के जेएनयू जाने की बात सामने आने के बाद कंगना ने ट्वीट किया था, “बेचारी स्वरा भास्कर तो आज तक यह सब फ्री फंड में करती थी अब उसे यकीन नहीं हो पा रहा है कि दीपिका को जेएनयू जाने के पैसे मिलते हैं।”

प्रशांत भूषण आपको माफी माँगनी होगी, 2 दिन का समय है आपके पास: अवमानना मामले में सुप्रीम कोर्ट

विवादित वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक अर्जी दायर की है, जिसमें अवमानना मामले के संबंध में उनकी सजा पर सुनवाई टालने की माँग की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण को अपने विवादित बयान (ट्वीट) पर पुनर्विचार करने के लिए 2 दिन का समय दिया है।

प्रशांत भूषण ने कहा कि वह उनके दोषी ठहराए जाने के फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर करने का इरादा रखते हैं और सजा पर सुनवाई तब तक के लिए टाल दी जाए, जब तक सुप्रीम कोर्ट पुनर्विचार याचिका पर फैसला नहीं सुना देती है।

गौरतलब है कि पिछले सप्ताह 14 अगस्त को न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने अधिवक्ता प्रशांत भूषण को न्यायपालिका के खिलाफ उनके दो अपमानजनक ट्वीट को लेकर न्यायालय की अवमानना के लिए दोषी ठहराया था। उन्हें 6 महीने की कैद या 2000 रुपए जुर्माना, या फिर दोनों ही सजा सुनाई जा सकती है।

सामाजिक कार्यकर्ता-वकील प्रशांत भूषण को न्यायपालिका के खिलाफ उनके दो अपमानजनक ट्वीट के मामले में अवमानना का दोषी ठहराया था। न्यायमूर्ति अरुणा मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि वह इस मामले में भूषण को सुनाई जाने वाली सजा पर दलीलें आज, यानी 20 अगस्त को सुन रही है।

बृहस्पतिवार को अवमानना मामले में प्रशांत भूषण की सज़ा पर सुप्रीम कोर्ट में बहस शुरू करते हुए भूषण के वकील दुष्यंत दवे ने पुनर्विचार याचिका दाखिल करते हुए सज़ा पर बहस रोकने की माँग की। इस पर जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा- हम जो भी सज़ा तय करेंगे, उस पर अमल पुनर्विचार याचिका पर फैसले तक स्थगित रखा जा सकता है।

प्रशांत के वकील दवे ने सुनवाई रोकने की माँग दोहराते हुए कहा कि कोर्ट ऐसा जताना चाहती है कि उसे जस्टिस अरुण मिश्रा के रिटायर होने से पहले फैसला देना ज़रूरी है। इस पर जस्टिस मिश्रा ने कहा कि दोषी ठहराने वाली बेंच ही सज़ा तय करती है और यह स्थापित प्रक्रिया है। ज्ञात हो कि जस्टिस मिश्रा 3 सितंबर को रिटायर होने वाले हैं। दवे ने कहा कि कोई आसमान नहीं टूट जाएगा, अगर कोर्ट प्रशांत भूषण की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई का इंतजार कर लेगी।

दलील सुनने के बाद जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा, “सजा पर बहस होने दीजिए। सजा सुनाए जाने के बाद हम तत्काल सजा लागू नहीं करेंगे। हम पुनर्विचार याचिका पर फैसले का इंतजार कर लेंगे। हमें लगता है कि आप मेरी बेंच को अवॉइड करना चाहते हैं।” लेकिन दिलचस्प यह है कि दूसरी बेंच द्वारा सजा पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण की याचिका भी खारिज कर दी है।

प्रशांत भूषण ने अपनी बात रखते हुए कहा – “मैं इस बात से दुखी हूँ कि मेरी बात को नहीं समझा गया। मुझे मेरे बारे में हुई शिकायत की कॉपी भी उपलब्ध नहीं कराई गई। मैं सज़ा पाने को लेकर चिंतित नहीं। मैंने संवैधानिक ज़िम्मेदारियों के प्रति आगाह करने वाला ट्वीट कर के अपना कर्तव्य निभाया है।”

वकील प्रशांत भूषण की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए एडवोकेट जस्टिस दवे ने जब बेंच को बताया कि उनके पास समीक्षा याचिका दायर करने के लिए 30 दिन का समय है और क्यूरेटिव पिटीशन जैसे विकल्प भी हैं, तो इस पर जस्टिस मिश्रा ने कहा कि अगर हम कोई सजा देते हैं, तो हम आपको आश्वासन देते हैं कि जब तक समीक्षा नहीं हो जाती, तब तक वह सजा लागू नहीं होगी। उन्होंने कहा कि आप हमारे प्रति ईमानदार रहें या नहीं, लेकिन हम आपके प्रति ईमानदार हैं।

जज अरूण मिश्रा की बेंच में शामिल दूसरे जज जस्टिस गवई ने भूषण से पूछा कि क्या वो अपने बयान पर पुनर्विचार करना चाहते हैं? इस पर भूषण ने कहा कि ऐसा कर के कोर्ट अपना समय बर्बाद करेगी क्योंकि वह अपने बयान पर अडिग हैं, चाहे कोई भी सजा सुनाई जाए। भूषण ने कहा कि उन्होंने अपना बयान सोच समझकर दिया था।

सुनवाई के दौरान भूषण के वकील धवन कुछ तकनीकी खराबी के कारण डिस्कनेक्ट हो गए तब पीठ ने कहा कि वो अटॉर्नी जनरल वेणुगोपाल को सुनेंगे। अटॉर्नी जनरल ने भूषण को सजा ना देने की बात सामने रखी, जिस पर बेंच ने कहा कि वो इस प्रस्ताव को तब तक नहीं स्वीकार कर सकते जब तक प्रशांत भूषण अपने बयान पर पुनर्विचार करने पर सहमत नहीं होते।

वकील धवन लगातार उन लोगों का जिक्र करते रहे जो प्रशांत भूषण का समर्थन कर रहे हैं। इस पर जस्टिस मिश्रा ने कहा, “हमें लोगों को सजा देने का शौक नहीं है। गलतियाँ किसी से भी हो सकती हैं। ऐसे मामले में, व्यक्ति को यह महसूस करना चाहिए और उसे स्वीकार करना चाहिए।”

जस्टिस मिश्रा ने कहा कि चूँकि आप बहुत से अच्छे काम करते हैं, सिर्फ इस वजह से किसी गलत काम को नकारा नहीं जा सकता। जस्टिस गवई ने कहा कि निर्णय इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि ट्वीट पूरे संस्थान को प्रभावित करते हैं न कि कुछ व्यक्तिगत न्यायाधीशों को। और जहाँ तक सजा की बात है, तो हम तभी उदार हो सकते हैं, जब व्यक्ति माफी माँगता है और वास्तविक अर्थों में गलती का एहसास करता है।

गौरतलब है कि अवमानना कार्यवाही का कारण अधिवक्ता प्रशांत भूषण द्वारा किए गए 2 ट्वीट हैं। ये ट्वीट 27 जून और 29 जून को किए गए थे। एक ट्वीट में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर निशाना साधा था। कहा था कि पिछले 4 मुख्य न्यायधीशों ने देश का लोकतंत्र ध्वस्त करने में अपनी भूमिका निभाई है। वहीं दूसरे ट्वीट में वर्तमान सीजेआई की बाइक के साथ तस्वीर पर सवाल उठाए थे।

ट्वीट में प्रशांत भूषण ने कहा था, “जब भविष्य में इतिहासकार वापस मुड़कर देखेंगे कि किस तरह से पिछले 6 वर्षों में औपचारिक आपातकाल के बिना ही भारत में लोकतंत्र को नष्ट किया गया है, तो वे विशेष रूप से इस विनाश में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका को चिह्नित करेंगे, और पिछले 4 CJI की भूमिका को और भी अधिक विशेष रूप से।”

29 जून को प्रशांत भूषण ने बाइक पर बैठे मुख्य न्यायाधीश एसएस बोबडे की एक तस्वीर ट्वीटर पर शेयर की थी। इसमें उन्होंने उनके बिना मास्क और हेलमेट होने को लेकर सवाल किए थे। हालॉंकि बाद में इसके लिए माफी माँगते हुए उन्होंने कहा था कि मैंने ध्यान नहीं दिया कि बाइक स्टैंड पर है और स्टैंड पर खड़ी बाइक पर हेलमेट लगाना जरूरी नहीं होता, ऐसे में वो इस बात के लिए माफी माँगते हैं कि उन्होंने हेलमेट को लेकर सीजेआई से सवाल किया।