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प्रशांत भूषण आपको माफी माँगनी होगी, 2 दिन का समय है आपके पास: अवमानना मामले में सुप्रीम कोर्ट

विवादित वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक अर्जी दायर की है, जिसमें अवमानना मामले के संबंध में उनकी सजा पर सुनवाई टालने की माँग की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण को अपने विवादित बयान (ट्वीट) पर पुनर्विचार करने के लिए 2 दिन का समय दिया है।

प्रशांत भूषण ने कहा कि वह उनके दोषी ठहराए जाने के फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर करने का इरादा रखते हैं और सजा पर सुनवाई तब तक के लिए टाल दी जाए, जब तक सुप्रीम कोर्ट पुनर्विचार याचिका पर फैसला नहीं सुना देती है।

गौरतलब है कि पिछले सप्ताह 14 अगस्त को न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने अधिवक्ता प्रशांत भूषण को न्यायपालिका के खिलाफ उनके दो अपमानजनक ट्वीट को लेकर न्यायालय की अवमानना के लिए दोषी ठहराया था। उन्हें 6 महीने की कैद या 2000 रुपए जुर्माना, या फिर दोनों ही सजा सुनाई जा सकती है।

सामाजिक कार्यकर्ता-वकील प्रशांत भूषण को न्यायपालिका के खिलाफ उनके दो अपमानजनक ट्वीट के मामले में अवमानना का दोषी ठहराया था। न्यायमूर्ति अरुणा मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि वह इस मामले में भूषण को सुनाई जाने वाली सजा पर दलीलें आज, यानी 20 अगस्त को सुन रही है।

बृहस्पतिवार को अवमानना मामले में प्रशांत भूषण की सज़ा पर सुप्रीम कोर्ट में बहस शुरू करते हुए भूषण के वकील दुष्यंत दवे ने पुनर्विचार याचिका दाखिल करते हुए सज़ा पर बहस रोकने की माँग की। इस पर जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा- हम जो भी सज़ा तय करेंगे, उस पर अमल पुनर्विचार याचिका पर फैसले तक स्थगित रखा जा सकता है।

प्रशांत के वकील दवे ने सुनवाई रोकने की माँग दोहराते हुए कहा कि कोर्ट ऐसा जताना चाहती है कि उसे जस्टिस अरुण मिश्रा के रिटायर होने से पहले फैसला देना ज़रूरी है। इस पर जस्टिस मिश्रा ने कहा कि दोषी ठहराने वाली बेंच ही सज़ा तय करती है और यह स्थापित प्रक्रिया है। ज्ञात हो कि जस्टिस मिश्रा 3 सितंबर को रिटायर होने वाले हैं। दवे ने कहा कि कोई आसमान नहीं टूट जाएगा, अगर कोर्ट प्रशांत भूषण की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई का इंतजार कर लेगी।

दलील सुनने के बाद जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा, “सजा पर बहस होने दीजिए। सजा सुनाए जाने के बाद हम तत्काल सजा लागू नहीं करेंगे। हम पुनर्विचार याचिका पर फैसले का इंतजार कर लेंगे। हमें लगता है कि आप मेरी बेंच को अवॉइड करना चाहते हैं।” लेकिन दिलचस्प यह है कि दूसरी बेंच द्वारा सजा पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण की याचिका भी खारिज कर दी है।

प्रशांत भूषण ने अपनी बात रखते हुए कहा – “मैं इस बात से दुखी हूँ कि मेरी बात को नहीं समझा गया। मुझे मेरे बारे में हुई शिकायत की कॉपी भी उपलब्ध नहीं कराई गई। मैं सज़ा पाने को लेकर चिंतित नहीं। मैंने संवैधानिक ज़िम्मेदारियों के प्रति आगाह करने वाला ट्वीट कर के अपना कर्तव्य निभाया है।”

वकील प्रशांत भूषण की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए एडवोकेट जस्टिस दवे ने जब बेंच को बताया कि उनके पास समीक्षा याचिका दायर करने के लिए 30 दिन का समय है और क्यूरेटिव पिटीशन जैसे विकल्प भी हैं, तो इस पर जस्टिस मिश्रा ने कहा कि अगर हम कोई सजा देते हैं, तो हम आपको आश्वासन देते हैं कि जब तक समीक्षा नहीं हो जाती, तब तक वह सजा लागू नहीं होगी। उन्होंने कहा कि आप हमारे प्रति ईमानदार रहें या नहीं, लेकिन हम आपके प्रति ईमानदार हैं।

जज अरूण मिश्रा की बेंच में शामिल दूसरे जज जस्टिस गवई ने भूषण से पूछा कि क्या वो अपने बयान पर पुनर्विचार करना चाहते हैं? इस पर भूषण ने कहा कि ऐसा कर के कोर्ट अपना समय बर्बाद करेगी क्योंकि वह अपने बयान पर अडिग हैं, चाहे कोई भी सजा सुनाई जाए। भूषण ने कहा कि उन्होंने अपना बयान सोच समझकर दिया था।

सुनवाई के दौरान भूषण के वकील धवन कुछ तकनीकी खराबी के कारण डिस्कनेक्ट हो गए तब पीठ ने कहा कि वो अटॉर्नी जनरल वेणुगोपाल को सुनेंगे। अटॉर्नी जनरल ने भूषण को सजा ना देने की बात सामने रखी, जिस पर बेंच ने कहा कि वो इस प्रस्ताव को तब तक नहीं स्वीकार कर सकते जब तक प्रशांत भूषण अपने बयान पर पुनर्विचार करने पर सहमत नहीं होते।

वकील धवन लगातार उन लोगों का जिक्र करते रहे जो प्रशांत भूषण का समर्थन कर रहे हैं। इस पर जस्टिस मिश्रा ने कहा, “हमें लोगों को सजा देने का शौक नहीं है। गलतियाँ किसी से भी हो सकती हैं। ऐसे मामले में, व्यक्ति को यह महसूस करना चाहिए और उसे स्वीकार करना चाहिए।”

जस्टिस मिश्रा ने कहा कि चूँकि आप बहुत से अच्छे काम करते हैं, सिर्फ इस वजह से किसी गलत काम को नकारा नहीं जा सकता। जस्टिस गवई ने कहा कि निर्णय इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि ट्वीट पूरे संस्थान को प्रभावित करते हैं न कि कुछ व्यक्तिगत न्यायाधीशों को। और जहाँ तक सजा की बात है, तो हम तभी उदार हो सकते हैं, जब व्यक्ति माफी माँगता है और वास्तविक अर्थों में गलती का एहसास करता है।

गौरतलब है कि अवमानना कार्यवाही का कारण अधिवक्ता प्रशांत भूषण द्वारा किए गए 2 ट्वीट हैं। ये ट्वीट 27 जून और 29 जून को किए गए थे। एक ट्वीट में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर निशाना साधा था। कहा था कि पिछले 4 मुख्य न्यायधीशों ने देश का लोकतंत्र ध्वस्त करने में अपनी भूमिका निभाई है। वहीं दूसरे ट्वीट में वर्तमान सीजेआई की बाइक के साथ तस्वीर पर सवाल उठाए थे।

ट्वीट में प्रशांत भूषण ने कहा था, “जब भविष्य में इतिहासकार वापस मुड़कर देखेंगे कि किस तरह से पिछले 6 वर्षों में औपचारिक आपातकाल के बिना ही भारत में लोकतंत्र को नष्ट किया गया है, तो वे विशेष रूप से इस विनाश में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका को चिह्नित करेंगे, और पिछले 4 CJI की भूमिका को और भी अधिक विशेष रूप से।”

29 जून को प्रशांत भूषण ने बाइक पर बैठे मुख्य न्यायाधीश एसएस बोबडे की एक तस्वीर ट्वीटर पर शेयर की थी। इसमें उन्होंने उनके बिना मास्क और हेलमेट होने को लेकर सवाल किए थे। हालॉंकि बाद में इसके लिए माफी माँगते हुए उन्होंने कहा था कि मैंने ध्यान नहीं दिया कि बाइक स्टैंड पर है और स्टैंड पर खड़ी बाइक पर हेलमेट लगाना जरूरी नहीं होता, ऐसे में वो इस बात के लिए माफी माँगते हैं कि उन्होंने हेलमेट को लेकर सीजेआई से सवाल किया।

पैसे देकर महेश भट्ट ने छपवाया ‘अच्छा’ लेख: सुशांत केस CBI के पास जाने के अगले ही दिन क्या पड़ी जरूरत?

दिवंगत बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जाँच पर मुहर लगा दी है। बुधवार (अगस्त 19, 2020) को सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि आगे कोई भी FIR इस मामले में दर्ज हुई तो सीबीआई उसे भी देखेगी। उच्चतम न्यायालय के इस फैसले के आते ही बॉलीवुड फिल्म निर्देशक महेश भट्ट फौरन मीडिया में अपने बारे में प्रायोजित (स्पॉन्सर्ड) आर्टिकल छपवाते देखे गए।

बृहस्पतिवार (अगस्त 20, 2020) सुबह ही समाचार पत्र हिन्दुस्तान टाइम्स में महेश भट्ट के सम्बन्ध में एक लेख प्रकाशित हुआ है, जिस पर स्पष्ट रूप से ‘प्रायोजित लेख’ लिखा गया है। यानी इस लेख को प्रकशित करने के लिए ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ को इसकी अलग से कीमत चुकाई गई है।

बॉलीवुड में नए लोगों को अवसर देने को लेकर महेश भट्ट का महिमामंडन कर रहे इस लेख का शीर्षक है – “महेश भट्ट ने बॉलीवुड में कई युवा सपनों को पंख दिए हैं।” (Mahesh Bhatt has given wings to many young dreams in Bollywood)

20 अगस्त की सुबह हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित प्रायोजित लेख का स्क्रीनशॉट

हिंदुस्तान टाइम्स द्वारा इस लेख को ‘ब्रांड स्टोरीज’ के अंतर्गत ‘प्रोमोशनल फीचर’ कॉलम में स्थान दिया गया है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जाँच सीबीआई के हवाले होते ही महेश भट्ट को मीडिया मैनेजमेंट की जरूरत क्यों पड़ गई?

यहाँ पर यह भी ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत के तुरंत बाद से ही बॉलीवुड में नेपोटिज्म यानी, भाई-भतीजावाद को लेकर भी बहस तेज हो गई और मुंबई के स्थापित निर्माता-निर्देशकों और अन्य कलाकारों द्वारा तथाकथित ‘बाहरी’ अभिनेता और अभिनेत्रियों के साथ किया जाने वाला बर्ताव बहस का विषय बन गया।

नेपोटिज्म की इस बहस के जोर पकड़ने के साथ ही सुशांत सिंह राजपूत की प्रेमिका और बॉलीवुड अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती भी शक के घेरे में आ गईं और दिवंगत अभिनेता के पिता ने रिया चक्रवर्ती के खिलाफ कई गंभीर आरोप लगाए, जिन्हें लेकर अब सीबीआई जाँच कर रही है।

सुशांत की मौत की जाँच के दौरान रिया की महेश भट्ट से नजदीकियों के तथ्य भी सामने आए और रिया की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) से इसका खुलासा हुआ है कि अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के नहीं रहने पर उनकी गर्लफ्रेंड एवं अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती फिल्म डायरेक्टर महेश भट्ट से बात करती थीं।

इन दोनों के बीच 20 से 25 जनवरी के बीच सबसे ज्यादा बात हुई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, रिया चक्रवर्ती ने 8 जून से 13 जून के बीच महेश भट्ट से कई बार बात की। इनमें से 9 कॉल ऑउटगोइंग थीं बाकी इनकमिंग। ईडी के सोर्सेज के अनुसार, 8 जून से 13 जून के बीच रिया और महेश की बातचीत अचानक काफी बढ़ गई थी।

वहीं, महेश भट्ट के ऑफिस में काम करने वालीं उनकी सहायक सुहरिता दास ने फेसबुक पर रिया से जुड़े कई खुलासे किए थे। इसमें उन्होंने बताया था कि रिया, सुशांत के बारे में महेश भट्ट से सलाह लेती थीं और उन्होंने रिया को सुशांत से दूर रहने को कहा था।

ऐसे में यह देखना दिलचस्प है कि इतने वर्षों तक इंडस्ट्री में कभी अपनी भूतपूर्व प्रेमिकाओं की आत्महत्या की कहानियाँ, तो कभी गैंगस्टर्स की कहानियाँ बेचकर एक मुकाम हासिल करने वाले महेश भट्ट को सीबीआई जाँच के दौरान इस तरह के प्रायोजित मीडिया मैनेजमेंट की जरूरत क्यों पड़ गई?

आगरा में बस हाइजैक करने वाले को मुठभेड़ में लगी गोली, UP पुलिस ने 24 घंटे के भीतर किया गिरफ्तार

मंगलवार (18 अगस्त 2020) को प्रदीप गुप्ता नाम के व्यक्ति ने आगरा दक्षिणी बाईपास से 34 यात्रियों को ले जा रही बस का अपहरण कर लिया था। गुरूवार की सुबह एसओजी, क्राइम ब्रांच और बदमाशों के बीच मुठभेड़ हुई। इस मुठभेड़ में आरोपित प्रदीप के पैर में गोली लगी और उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

इस अभियान में यूपी पुलिस का एक सिपाही सुदर्शन घायल भी हुआ था। आरोपित प्रदीप ने पूछताछ में बताया कि उसे बस मालिक से 65 लाख रुपए लेने थे लेकिन कुछ समय पहले उसकी मौत हो गई थी। यह रुपए वसूलने के लिए उसने बस कब्ज़े में लेने की कोशिश की थी।   

पूरे मामले में सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि पुलिस ने घटना के एक दिन के भीतर ही आरोपित को गिरफ्तार कर लिया। आरोपित को गिरफ्तार करने के दौरान उत्तर प्रदेश पुलिस के सामने एनकाउंटर जैसे हालात बन गए। लेकिन पुलिस तैयार थी और अंत में आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया।

मंगलवार को मुख्य आरोपित प्रदीप और उसके साथियों ने यात्रियों से भरी बस का अपहरण किया था। बुधवार (19 अगस्त 2020) की सुबह बस के चालाक और परिचालक ने मालपुरा थाने में इस घटना की जानकारी दी।   

परिचालक रामविलास की शिकायत के आधार पर पुलिस ने अज्ञात आरोपित पर डकैती और अपहरण की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया। इसके बाद आगरा और लखनऊ की पुलिस सक्रिय हुई। जाँच पड़ताल के दौरान खाली बस इटावा में मिली और वहाँ यह भी पता चला कि सवारियों को दूसरी बस में बैठा दिया गया है। वह बस छतरपुर (मध्य प्रदेश) पहुँच गई थी।

उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा की गई शुरूआती खोजबीन में जैतपुर के रहने वाले प्रदीप गुप्ता का नाम सामने आया। पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर फिरोजाबाद, आगरा और इटावा में उसकी तलाश की।   

प्रदीप गुप्ता की सीसीटीवी फुटेज (साभार – हिंदुस्तान टाइम्स)

उसी दिन शाम के वक्त प्रदीप गुप्ता की एक गाड़ी कचौरा घाट चित्राहट में मिली। यह बात भी सामने आई कि साल 2018 के दौरान प्रदीप पर समानांतर आरटीओ कार्यालय चलाने का आरोप था और वह इस मामले में जेल भी जा चुका था।

गुरूवार (20 अगस्त 2020) की सुबह लगभग 5 बजे आरोपित प्रदीप गुप्ता अपने साथी यतेन्द्र यादव फतेहाबाद के भलोखरा चौराहा के नज़दीक बाइक से जा रहा था। वह पुलिस से बच कर भाग रहा था, इसलिए वह आगरा से बाहर जाना चाहता था। 

तभी मौके पर उसे क्राइम ब्रांच, एसओजी और कई थानों की पुलिस ने घेर लिया। खुद को पुलिस से घिरा हुआ देख कर उसने पुलिस पर गोली चला दी। इसके बाद पुलिस ने भी जवाब में गोली चलाई, जिसके बाद प्रदीप गुप्ता के पैर में गोली लगी और वह बाइक से गिर पड़ा। इस दौरान उसका साथी घटनास्थल से फ़रार हो गया और पुलिस ने मौके से तमंचा और चोरी की बाइक बरामद की। घटना की जानकारी मिलते ही एसएसपी बबलू कुमार भी वहाँ पहुँचे।   

फ़िलहाल आरोपित को नज़दीक के एसएन मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया है। पूछताछ में प्रदीप ने पुलिस को कई बातें बताई। उसने कहा वह बस मालिक अशोक अरोड़ा को कई सालों से जानता था। वह अशोक अरोड़ा की लगभग साड़ी बसों का टैक्स जमा करता था। प्रदीप ने कई बार कहा था कि उसे उसके 65 लाख रुपए चाहिए। लेकिन हाल ही में बस मालिक की मृत्यु हो गई और उसके रुपए डूब गए।   

फिर उसने बस को कब्ज़े में लेने की योजना बनाई। उसने बस को पहले सैंया टोल पर पकड़ने के प्रयास किया था लेकिन बस गुरुग्राम चली गई थी। वह अपने साथियों के साथ वहाँ भी पहुँच गया लेकिन वहाँ उसे सफलता नहीं मिली। फिर उसने तय किया कि आगरा में बस का अपहरण करेगा। अंत में फाइनेंसकर्मी बन कर उसने बस का अपहरण किया। इसके बाद उसने यात्रियों को दूसरी बस में बैठा दिया और अपहरण की गई बस को इटावा में खड़ा कर दिया।   

जब उसे जानकारी हुई कि इस मामले में पुलिस उसके पीछे पड़ चुकी है तब उसने भागना शुरू किया। लेकिन पुलिस ने समय रहते कार्रवाई की और एक दिन होते ही आरोपित को मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया।

10 साल में एक भी हिट नहीं, खुद और बच्चों के धंधे का सवाल… कंगना के खिलाफ नसीरुद्दीन कर रहे मूवी माफिया का समर्थन

बॉलीवुड अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने कंगना रनौत को कोसा है। उन्हें लेकर जब कई दिनों तक कोई विवाद न हो तो उन्हें ये चुभने लगता है और वो मीडिया के सामने आके कुछ भी उलूल-जलूल बक कर गायब हो जाते हैं, जिस पर विवाद होना तय होता है। इस बार भी जब पूरा देश सुशांत सिंह राजपूत मामले में न्याय की माँग कर रहा था, तब वो चुप रहे। लेकिन, जब प्रकट हुए तो उनका निशाना वो लोग थे, जो सुशांत के लिए अभियान चला रहे हैं, जैसे- कंगना रनौत।

नसीरुद्दीन शाह ने कंगना रनौत को भला-बुरा कहा। भले ही नसीरुद्दीन से किसी ने ये उम्मीद नहीं लगाई हो कि वो सुशांत सिंह राजपूत के पीड़ित परिवार के पक्ष में बोलें लेकिन उन्होंने दो क़दम और आगे बढ़ कर कंगना रनौत को लपेट किया क्योंकि वो बॉलीवुड के मूवी माफिया के खिलाफ अभियान चला रही हैं। नेपोटिज्म के विरुद्ध लड़ाई में कंगना रनौत एक सशक्त चेहरा बन कर उभरी हैं, जो नसीरुद्दीन को खल रहा है।

हम उनके इतिहास-भूगोल की बात करेंगे लेकिन ताज़ा विवाद के बारे में पहले जानते हैं और ये समझते हैं कि उन्होंने कहा क्या था। उन्होंने सुशांत मामले में न्याय के लिए चल रहे अभियान को ही कुत्सित करार दिया। साथ ही ये भी कहा कि वो इस प्रकरण पर नज़र ही नहीं रख रहे हैं। यहाँ सवाल उठता है कि जब वो घटनाक्रम का अनुसरण ही नहीं कर रहे थे तो फिर उन्हें कैसे पता कि जो भी हो रहा, वो घिनौना है?

इसका मतलब ये कि उन्होंने बिना कुछ जाने-समझे ही कुछ भी बक दिया। सुशांत के बारे में इतना जरूर कहा उन्होंने कि उनका करियर अच्छा था और एक युवा की मौत के बाद उन्हें भी दुःख हुआ। लेकिन, वो साथ ही ये कहना भी नहीं भूले कि काफी सारे लोग इस मामले में ”नॉनसेन्स’ बक रहे हैं और उन्हें उन सबसे कोई मतलब नहीं। साथ ही कहा कि जिनके मन मे इस कमर्शियल इंडस्ट्री को लेकर फ्रस्ट्रेशन था, वो लोग मीडिया के सामने निकाल रहे।

फ्रस्ट्रेशन कौन निकाल रहा, ये छिपा नहीं है। जब आप ये याद करने बैठेंगे कि नसीरुद्दीन शाह की पिछली अच्छी फिल्म कौन सी थी तो आपको शायद कुछ याद ही न आए। ये छोड़िए, अगर आप बॉक्स ऑफिस पर भी इनकी पिछली हिट फिल्म के बारे में पता करेंगे तो आपको सालों पीछे जाना पड़ेगा। ‘बॉक्स ऑफिस इंडिया’ के अनुसार, इस आदमी की पिछली हिट फिल्म 2011 में आई मल्टीस्टारर ‘द डर्टी पिक्चर’ थी, जिसमें इनका सहायक रोल था।

इसका अर्थ है कि इस आदमी ने पिछले 10 सालों में बतौर सहायक अभिनेता भी एक अदद हिट फिल्म नहीं दी है। इनकी पिछली 20 फिल्में हिट नहीं हो पाई हैं। ऐसे में फ्रस्ट्रेशन कौन निकाल रहा है, ये समझा जा सकता है। जिसके पास काम की कमी नहीं हो, फिर भी वो एक दशक में एक अदद हिट न दे पाए या अच्छी फिल्म न कर पाए – वो आदमी किसी और को फ्रस्ट्रेटेड बता रहा है, ये विचित्र स्थिति है।

वो कहते हैं कि इंडस्ट्री के बारे में लोग जो खुलासे कर रहे हैं, वो घृणास्पद कृत्य है। नसीरुद्दीन शाह कहते हैं कि अगर आपके पास शिकायतें हैं तो आप इसे अपने तक रखिए, मीडिया को क्यों बता रहे हो? यही बात वो खुद क्यों नहीं समझते? उनके पास अगर कंगना के लिए कुछ है तो वो क्यों मीडिया के सामने एक माहिला के लिए जहर उगल रहे? वो भी ये शिकायतें अपने पास रखें, अपनी ही सिद्धांतों पर चलते हुए!

और वामपंथी तो फ्री स्पीच और लोकतंत्र की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं न? सोशल मीडिया पर हर मुद्दे को लेकर ‘स्पीक अप’ बोल-बोल कर कौन सबका दिमाग खराब करता है? यही लिबरल लोग अब बोल रहे हैं कि चुप रहो? क्यों? क्योंकि सवाल अपने माई-बाप का है। सवाल इंडस्ट्री में दशकों से जमे गैंग का है, जिसे बचाना इनकी जिम्मेदारी है। ऐसे समय में ये आलोचकों को कहते हैं कि चुप रहो। और हाँ, चुप कराने के तरीके भी ये अपनाते हैं। महेश भट्ट पर लगे आरोपों को देख लीजिए।

कंगना रनौत को उन्होंने ‘स्टारलेट’ कह कर संबोधित किया, यानी उनकी नजर में वो स्टार तक नहीं हैं जबकि ये लोग सैफ अली खान से लेकर सलमान खान तक को सुपरस्टार कह कर गर्व से पुकारते हैं, क्योंकि नेपोटिज्म इनकी रग-रग में दौड़ता है। कंगना रनौत मुंबई से काफी दूर एक पहाड़ी राज्य से आई हैं। उनके माता-पिता किसी बड़े फिल्मी खानदान से नहीं आते, इसीलिए नसीरुद्दीन उन्हें कुछ भी कह सकते हैं। चुप रहने की हिदायत भी दे सकते है।

या फिर कहीं एक और कारण ये भी तो नहीं है कि कंगना रनौत हिन्दू हैं? नसीरुद्दीन शाह और जावेद अख्तर जैसों को हमने देखा है कि कैसे वो समय-समय पर हिंदुओं के प्रति अपनी दुर्भावना का प्रदर्शन करते रहते हैं। खुद नसीर को कभी डर लग जाता है और कभी उनके मन में अपने बच्चों के लिए भी यह डर बैठ जाता है। वो बच्चे जो कब के वयस्क हो चुके हैं। सभी फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय हैं।

उनका बड़ा बेटा इमाद पिछले डेढ़ दशक से इंडस्ट्री में सक्रिय है और उसने लगभग 9 फिल्मों में काम किया है। उनका छोटा बेटा विवान एक दशक में 6 फिल्मों में काम कर चुका है। उनकी बेटी तो 27 सालों से यहाँ सक्रिय है और 19 फिल्मों में काम कर चुकी हैं। ऐसे में बच्चों के करियर का सवाल जो ठहरा। जब अपने गैंग के खिलाफ कुछ बोलेंगे तो अपने बच्चों का करियर कैसे बनाएँगे, जिनकी एक्टिंग की मीडिया चर्चा तक नहीं करता।

खुद भी फिल्में करनी हैं, अपने बच्चों के करियर का भी सोचना है – ऐसे में जेएनयू जाने वाली दीपिका पादुकोण, सोशल मीडिया पर लड़ाई-झगड़े में व्यस्त रहने वाली तापसी पन्नु या फिर नेपोटिज्म का महिमामंडन करने वाली सोनम कपूर पर वो थोड़े न निशाना साधेंगे क्योंकि ये सब तो गैंग का ही हिस्सा हैं। इसीलिए कंगना रनौत निशाना बनती हैं क्योंकि उनका कोई गॉडफादर नहीं है और उनके लिए कोई आवाज भी नहीं उठाएगा इंडस्ट्री से।

नसीरुद्दीन शाह आज से नहीं बल्कि काफी पहले से दूसरों को लेकर इस तरह के बयान देते रहे हैं। ऐसे ही उन्होंने राजेश खन्ना के मरने के बाद उन्हें एक साधारण अभिनेता बता दिया था। जिस व्यक्ति को जनता ने इतना प्यार दिया कि उसे हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री का पहला सुपरस्टार कहा गया, उसे साधारण बता कर वो क्या साबित करना चाहते थे? असल में वो इन्फिरीऑरिटी कॉम्पलेस से ग्रसित हैं। हालाँकि, बाद में उन्हें माफी माँगनी पड़ी थी।

नसीरुद्दीन ने बाद में फिर कहा था कि उस दौर में राज कपूर और दिलीप कुमार की तिकड़ी ढलान पर थी, फिल्‍म इंडस्‍ट्री को एक नए आइकॉन की जरूरत थी और राजेश खन्‍ना ने वो कमी पूरी की। बकौल शाह, हकीकत यह है कि इंडस्‍ट्री ने राजेश खन्ना को पैदा किया, उनका इस्‍तेमाल किया और उन्‍हें फेंक दिया, जब वे पैसे बनाने की मशीन नहीं रहे। एक दिवंगत अभिनेता के बारे में इतना संवेदनहीन बयान?

इसी तरह उन्होंने विराट कोहली को लेकर अजीबोगरीब बयान दिया था। उन्होंने भारतीय करी टीम के कप्तान को दुनिया का सबसे बदतमीज खिलाड़ी कह दिया था। नसीर ने कहा था कि कोहली भले प्रतिभावान हों लेकिन वो दुनिया के सबसे एरोगेंट और गलत व्यवहार करने वाले खिलाड़ी भी हैं। उनका यह स्वभाव उनकी प्रतिभा पर भारी पड़ता है। इसके बाद उन्होंने ये भी लिख दिया था कि उनका देश छोड़ कर जाने का कोई इरादा नहीं है।

आखिर वो जिन लोगों को गाली देते हैं, वो किस मामले में उनसे कम हैं? विराट कोहली उनसे ज्यादा लोकप्रिय हैं और हर मामले में टॉप पर हैं। राजेश खन्ना ने जो लोकप्रियता पाई, उसके लिए अमिताभ बच्चन जैसे तक ने उन्हें अपना आदर्श माना, नसीर तो दूर की बात हैं। नेशनल व फ़िल्मफेयर अवॉर्ड कंगना को भी मिल चुका है, फिर उन्हें ‘हाफ एडुकेटेड’ कहने वाले नसीर क्यों सेल्फ-मेड लोगों को इतनी हीन भावना से देखते हैं?

इसी तरह उन्होंने अनुपम खेर को जोकर कह दिया था, जिन्हें कई लोग उनसे कई गुना बेहतर अभिनेता मानते हैं। अनुपम खेर फ़िलहाल भारत से बाहर विदेशी फिल्मों में काम करने में व्यस्त हैं और पूरे 90 के दशक में उन्होंने लगभग सभी बड़े सितारों के साथ काम किया। वो आज भी इस उम्र में अपनी फिटनेस से युवाओं को भी चुनौती देते हैं। हर प्रकार के किरदारों में स्वीकार किए जाते हैं। क्या नसीरुद्दीन ने इसी का गुस्सा निकाला कि वो राष्ट्र के लिए बोलते हैं?

अनुपम खेर अक्सर वामपंथियों की धज्जियाँ उड़ाते रहते हैं। क्या किसी की विचारधारा अलग है तो वो अपने ज्यादा प्रतिभावान होने के बावजूद जोकर हो गया क्योंकि आप उसकी बातों को पसंद नहीं करते हैं। उसी समय अनुपम खेर ने कह दिया था कि नसीर फ़्रस्ट्रेटेड हैं और मादक पदार्थों के सेवन का शिकार हैं। दोनों एक-दूसरे को NSD के जमाने से जानते हैं। अब नसीर को किन मादक पदार्थों की लत है, वही बता पाएँगे क्योंकि अनुपम खेर ने आगे न बोल कर अपना बड़प्पन दिखाया।

राजेश खन्ना, अनुपम खेर, कंगना रनौत और विराट कोहली – नसीर ने इन सब पर टिप्पणी की जबकि इन सबकी मान-प्रतिष्ठा और प्रतिभा आसमान चूमती है। ये सभी काफी सफल रहे हैं। क्या नसीर अब गाँव के वो बेरोजगार हो गए हैं, जिसका काम हर आने-जाने वाले पर टिप्पणी करना है? वो भी तब, जब ये लोग उनकी बातों को गंभीरता से ही नहीं लेते। नसीरुद्दीन शाह का एक और दोमुँहा बयान देखिए।

वो सुशांत मामले में कहते हैं कि क़ानून अपना काम कर रहा है और इन सबसे हमें कोई मतलब नहीं होना चाहिए। वो क़ानूनी प्रक्रिया में विश्वास रखने की बातें करते हैं। लेकिन, जब इसी क़ानूनी प्रक्रिया से सीएए क़ानून बनाया जाता है तो वो जहाँ-जहाँ उपद्रवी बैठ कर इसका विरोध करते हैं, वहाँ-वहाँ जाकर वो सब करते हैं। क्या सीएए क़ानूनी प्रक्रिया से पास नहीं हुआ? सुशांत मामले में पुलिस पर विश्वास की सलाह देने वाले को संसद पर विश्वास नहीं है?

दिल्ली के शाहीन बाग़ की तरह बेंगलुरु के बिलाल बाग को भी प्रचारित किया गया। ये वही क्षेत्र है, जिस क्षेत्र में अगस्त 11, 2020 की रात दंगे भड़क गए थे और कॉन्ग्रेस के दलित विधायक के घर को क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। वहाँ हुए सीएए विरोधी प्रदर्शन में नसीरुद्दीन शाह भी पहुँचे थे। नसीरुद्दीन शाह ने उन प्रदर्शनकारी महिलाओं को बहादुर बताते हुए कहा था कि उन्हें सड़क पर उतरने के लिए किसी की अनुमति लेने की जरूरत नहीं है।

असल में समस्या ये है कि नसीरुद्दीन शाह खुद को सबसे बेहतर समझते हैं और दूसरों को हीन भावना से देखते हुए ऐसा मानते हैं कि ये सब कुछ उन्हें भी मिलना चाहिए था। वो शायद ये भूल गए कि उनके ही साथ NSD में पढ़े ओम पुरी ने न सिर्फ उनसे ज्यादा काम किया बल्कि देश-विदेश में सम्मान भी पाया। इसी तरह कई अभिनेताओं ने थिएटर को आगे ले जाने के लिए काम किया। नसीरुद्दीन ये सब पचा नहीं पाते हैं कि सब उनसे बेहतर काम कर रहे।

नसीरुद्दीन शाह का कहना है कि सुशांत के न्याय के लिए चल रहा अभियान नॉनसेंस है, बुलशिट है और मूवी माफिया नाम की कोई चीज है ही नहीं। उनका कहना है कि अगर अभिनेता के रूप में उनका करियर अच्छा रहा है तो वो अपने बच्चों को क्यों नहीं इसी प्रोफेशन में भेज सकते। लेकिन, कोई उनसे पूछे कि उन्हें दूसरों के बच्चों पर गलत टिप्पणी करने का अधिकार किसने दिया? वो भी ऐसे लोगों पर, जिन्होंने इतनी मेहनत से खुद को स्थापित किया है।

खुद नसीरुद्दीन शाह जितनी बेकार और घटिया फिल्मों में काम कर चुके हैं, उसकी कोई गिनती नहीं है लेकिन वो दूसरों को कोसते हैं। आईएमडीबी पर आपको उनकी कई फ़िल्में घटिया रेटिंग वाली मिल जाएगी। लेकिन वो यहाँ आकर कहते हैं कि मूवी माफिया दिमागी उपज है और कोई भी उसी को फिल्म देगा, जिसे वो प्राथमिकता देता हो, पसंद करता हो। लेकिन, क्या इससे किसी का करियर चला जाए या कोई बर्बाद हो जाए, तो भी ठीक है? ये ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब उन्हें देने चाहिए।

हार्ट सर्जरी करवा पाने में असमर्थ बीएड छात्रा की मदद में CM आदित्यनाथ ने रातों-रात जारी किए 9.90 लाख रुपए

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हार्ट सर्जरी करवा पाने में असमर्थ एक छात्रा के लिए सोशल मीडिया के जरिए आई मदद की एक अपील का संज्ञान लेते हुए कुछ ही घंटों में इलाज के लिए लाखों रुपए स्वीकृत कर दिए।

सीएम योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर की एक बीएड छात्रा मधुलिका मिश्रा (Madhulika Mishra) के दोनों वॉल्व बदलने के लिए 9.90 लाख रुपए (नौ लाख, नब्बे हजार रुपए) मंजूर किए। उन्होंने विवेकाधीन कोष से पूरी धनराशि स्वीकृत कर दी। सीएम ने पत्र लिखकर बेहतर स्वास्थ्य की कामना भी की है।

सीएम आदित्यनाथ ने खुद लड़की के पिता को सूचित करते हुए एक पत्र लिखा। मुख्यमंत्री ने लिखा, “उम्मीद है कि यह पैसा उनकी सर्जरी को सफल बनाएगा। वह जल्द ही स्वस्थ हो जाएँगी और अपनी आगे की पढ़ाई पूरी कर पाएँगी।”

बीएड की छात्रा मधुलिका मिश्रा के पिता राकेश चंद्र मिश्रा को लिखे पत्र में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने कहा कि उन्हें खबर मिली थी कि उनकी बेटी का धन के अभाव के कारण ऑपरेशन नहीं हो रहा है। मेदांता अस्पताल के संस्थान के अनुसार, मुख्यमंत्री के विवेकाधीन कोष से कुल 9.90 लाख रुपए मंजूर किए गए हैं।

गोरखपुर जिले के कैंपियरगंज के मछलीगाँव की मधुलिका मिश्रा हृदय की गंभीर बीमारी से ग्रस्त हैं। मधुलिका ने पीएम और सीएम से इलाज में मदद की गुहार लगाई थी। छात्रा ने बताया कि उसके पिता राकेश चंद्र मिश्र किसान हैं और माँ की बचपन में ही मौत हो गई थी। मधुलिका के दो भाई हैं, जो पढ़ाई करने के साथ-साथ कृषि में पिता का भी सहयोग करते हैं।

मधुलिका ने बताया कि पिछले दिनों उन्हें साँस लेने में तकलीफ हुई तो भाई ने गोरखपुर के एक निजी अस्पताल में दिखाया, जहाँ डॉक्टरों ने बताया कि उनके दिल के दोनों वॉल्व खराब हैं। इसके बाद मधुलिका का भाई उन्हें केजीएमयू और पीजीआई लेकर पहुँचा।

लेकिन, कोरोना वायरस महामारी की वजह से दोनों जगहों पर ही अस्पताल ने इलाज से मना कर दिया। उसके बाद मेदांता में भर्ती कराया गया। जहाँ डॉक्टरों ने कहा कि ऑपरेशन के माध्यम से दोनों वॉल्व बदले जा सकते हैं और इसमें 9 लाख 90 हजार रुपये का खर्च आएगा। अस्पताल प्रशासन ने 24 अगस्त को ऑपरेशन की तारीख भी दी। परिवार के लिए इतने पैसे का प्रबंधन करना मुश्किल था।

सोशल मीडिया पर सीएम योगी द्वारा मधुलिका के पिता को लिखा गया यह पत्र ट्विटर पर खूब वायरल हो रहा है। सलभ मणि त्रिपाठी ने एक ट्वीट में इस पत्र को पोस्ट करते हुए लिखा है – “गरीब किसान की बेटी मधुलिका मिश्रा की मदद में सीएम योगी ने पेश की मानवता की मिसाल। जानकारी मिलते ही दफ़्तर खुलवा कर कुछ ही घंटों में कराया इलाज के पूरे खर्चे का इंतज़ाम। पिता राकेश मिश्रा को व्यक्तिगत चिट्ठी लिख बढ़ाया परिवार का मनोबल भी, की बिटिया के बेहतर स्वास्थ्य की कामना।”

‘सुशांत का हाल दाभोलकर जैसा न हो’ – शरद पवार ने कसा तंज, शिवसेना ने तो अपमानजनक ही बता डाला

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (अगस्त 19, 2020) को दिवंगत बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत और केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) के मामले में अभिनेता रिया चक्रवर्ती और अन्य के खिलाफ पटना में दर्ज एफआईआर को स्थानांतरित करने की मंजूरी दे दी।

इसके बाद महाराष्ट्र सरकार में शामिल घटक दल राकांपा (NCP) अध्यक्ष शरद पवार ने कहा कि आशा है कि सुशांत का मामला नरेंद्र दाभोलकर (Narendra Dabholkar) हत्या मामले में चल रही जाँच के नतीजों जैसा नहीं होगा। पवार ने कहा है कि उन्हें यकीन है कि महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का सम्मान करेगी और जाँच में पूरी तरह से सहयोग करेगी।

अपने ट्वीट में शरद पवार ने लिखा, ”सुप्रीम कोर्ट ने सुशांत सिंह राजपूत जाँच प्रक्रिया सीबीआई को हस्तांतरित करने का आदेश दिया है। मुझे यकीन है कि महाराष्ट्र सरकार इस निर्णय का सम्मान करेगी और जाँच में पूरी तरह से सहयोग करेगी।”

शरद पवार ने साथ ही सुशांत सिंह राजपूत केस की जाँच सीबीआई से कराने पर डॉ नरेंद्र दाभोलकर की हत्या केस को याद करते हुए यह भी कटाक्ष किया है कि इस जाँच का अभी तक कोई हल नहीं निकल पाया है। एनसीपी के नेता शरद पवार ने अपने पिछले बयान में कहा था कि यदि इस केस की जाँच सीबीआई को सौंपी जाती है तो उन्हें किसी तरह का कोई ऐतराज नहीं है।

ज्ञात हो कि अंधविश्वास विरोधी कार्यकर्ता डॉ नरेंद्र दाभोलकर की हत्या हुए 7 साल हो चुके हैं। डॉ नरेंद्र दाभोलकर की हत्या अगस्त 20, 2013 को पुणे में गोली मार कर कर दी गई थी। जाँच एजेंसियाँ अब तक न ही उनके हत्यारों तक पहुँच सकी हैं और न ही हत्या के सूत्रधार तक।

शरद के पोते ने कहा ‘सत्यमेव जयते’

बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत मौत मामले में पटना में दर्ज FIR को CBI को ट्रांसफर करने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर एनसीपी प्रमुख शरद पवार के पोते पार्थ पवार ने बिना किसी सन्दर्भ के एक ट्वीट में लिखा – ‘सत्यमेव जयते’

पार्थ ने मामले की जाँच सीबीआई से कराने की माँग की थी, जिस पर NCP प्रमुख शरद पवार ने गत सप्ताह उन्हें सार्वजनिक रूप से फटकार भी लगाई थी। पवार ने पार्थ को ‘अपरिपक्व’ भी बताया था।

शिवसेना ने बताया अपमानजनक

वहीं, सुशांत मौत के मामले की जाँच सीबीआई को ट्रांसफर होने पर शिवसेना ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ में बिहार पुलिस की जाँच के अधिकार पर सवाल उठाए हैं। शिवसेना का कहना है कि इस केस में बिहार पुलिस की ओर से जाँच किया जाना ‘अपमानजनक’ है। मुंबई पुलिस इस केस की जाँच अच्छी तरह से कर रही है। ऐसे में इस मामले को सीबीआई के पास बिहार सरकार की तरफ से स्थानांतरित किया जाना ‘उचित’ नहीं था।

राजीव गाँधी जन्मदिन विशेष: घोटाले, नरसंहार, भ्रष्टाचार और सेना की चीज पर मौज-मस्ती… लंबी है लिस्ट

पिछले कुछ सालों में राहुल गाँधी और अब उनकी बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा भी केंद्र सरकार पर हर प्रकार के घोटालों के आरोप लगाते नजर आए हैं। इसके लिए उन्होंने कभी द हिन्दू अखबार की फर्जी कतरनों का सहारा लिया तो कभी चुनावी रैलियों में मनगढ़ंत आँकड़ों के जरिए एक ही झूठ को कई बार दोहरा कर यह साबित करने का प्रयास किया कि राहुल गाँधी के पिता राजीव के कार्यकाल और उसी तरह UPA के दागदार राजनीतिक सफर की तरह ही नरेंद्र मोदी सरकार में भी घोटाले हुए हैं।

इस कड़ी में राहुल गाँधी और उनकी बहन को कभी सुप्रीम कोर्ट से लताड़ लगी तो कभी उन्हें पीएम मोदी के खिलाफ इन खुले झूठों को बेचने की कीमत आम चुनावों में भारी हार के साथ चुकानी पड़ी।

अगस्त 20, 1944 को, आज ही के दिन पैदा हुए राजीव गाँधी देश के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री बने थे। राजीव गाँधी की उम्र तब महज 40 साल थी और भारत के प्रधानमंत्री पद पर अक्टूबर 31, 1984 से दिसंबर 01, 1989 तक आसीन रहे।

राजीव गाँधी के राजनीतिक जीवन कई प्रकार से दागदार रहा, इसमें सबसे बड़ी वजह एक बोफोर्स घोटाला और भोपाल गैस त्रासदी से लेकर कश्मीरी पंडितों का पलायन है। इसके साथ ही कोरोना काल में राजीव गाँधी फाउंडेशन के अंतर्गत किए गए घोटाले दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न राजीव गाँधी के करियर में एक और अध्याय जोड़ते हैं।

राजीव गाँधी का प्रधानमंत्री रहते घोटालों और विवादों से निरंतर ही करीबी सम्बन्ध रहा। इन पर एक नजर डालते हैं –

कश्मीरी पंडितों का पलायन

केंद्र में राजीव गाँधी की सरकार के दौरान ही जेकेएलएफ के आतंकियों ने कश्मीरी हिंदूओं पर हमले शुरू कर दिए थे। जगमोहन की तैनाती राज्यपाल के तौर पर जनवरी 19, 1990 को हुई। लेकिन इससे पहले और जगमोहन के शुरूआती दिनों में हालात काबू से बाहर आ चुके थे।

सितंबर 14, 1989 को पंडित टीकालाल टपलू की हत्या कर दी गई जो कि कश्मीर घाटी के प्रमुख राष्ट्रवादी नेता थे। आतंकियों ने सबसे पहले उन्हें निशाना बनाकर अपने इरादे साफ कर दिए थे। इस हत्या के मात्र सात सप्ताह बाद ही जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई थी।

घाटी में गवर्नर का शासन मार्च, 1986 में दूसरी बार तब लागू किया गया था, जब कॉन्ग्रेस ने गुलाम मोहम्मद शाह से समर्थन वापस ले लिया था। उस दौरान फारूक-राजीव समझौते पर काम चल रहा था और इस पर मुहर लगने और हस्ताक्षर होने के बाद फारूक मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो गए।

1987 का विधानसभा चुनाव, नेशनल कॉन्फ्रेंस और कॉन्ग्रेस द्वारा संयुक्त रूप से लड़ा गया। कश्मीर के इतिहास में खुले धाँधली के आरोपों के साथ सबसे बड़ी धोखाधड़ी के रूप में इसे याद रखा गया। यही वो समय था, जब उग्रवाद के साथ कश्मीर का रिश्ता गहरा होता चला गया। 1987 के इस ‘फारूक-राजीव एकॉर्ड’ के बाद कश्मीर हमेशा के लिए बारूद के ढेर पर बैठ गया और कश्मीरी पंडितों का नारकीय जीवन शुरू हो गया।

बोफोर्स घोटाला

एक चुनावी रैली के दौरान उत्तर प्रदेश के बस्ती में पीएम मोदी ने कहा था, ”आपके पिताजी को आपके राग दरबारियों ने मिस्टर क्लीन बना दिया था। गाजे-बाजे के साथ मिस्टर क्लीन… मिस्टर क्लीन चला था। लेकिन देखते ही देखते भ्रष्टाचारी नंबर वन के रूप में उनका जीवनकाल समाप्त हो गया।”

पीएम मोदी का इशारा राहुल गाँधी के पिता राजीव गाँधी और उनके बोफोर्स घोटालों में सम्बन्ध की ओर ही था। इस घोटाले ने 1980 और 1990 के दशक में गाँधी परिवार और ख़ासकर तब प्रधानमंत्री रहे राजीव गाँधी की छवि को गहरा धक्का पहुँचाया था।

बोफोर्स का जिन्न राजीव गाँधी की मौत के कई साल बाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ता। इस घोटाले में आरोप थे कि स्वीडन की तोप बनाने वाली कंपनी बोफ़ोर्स ने कमीशन के बतौर 64 करोड़ रुपए राजीव गाँधी समेत कई कॉन्ग्रेस नेताओं को दिए थे, ताकि वो भारतीय सेना को अपनी 155 एमएम हॉविट्ज़र तोपें बेच सकें।

बाद में राजीव गाँधी की पत्नी सोनिया गाँधी पर भी बोफ़ोर्स तोप सौदे के मामले में आरोप लगे थे, जब इस सौदे में बिचौलिया बने इटली के कारोबारी और गाँधी परिवार के क़रीबी ओतावियो क्वात्रोची का नाम सामने आया तो वह अर्जेंटिना भाग गया।

यूपीए सरकार के दौरान साल 2009 की शुरुआत तक भारत को आपराधिक मामलों में ओतावियो क्वात्रोची की तलाश थी, लेकिन अप्रैल 28, 2009 को सीबीआई ने क्वोत्रोची को क्लीनचिट देते हुए इंटरपोल से उस पर जारी रेडकॉर्नर नोटिस को हटा लेने की अपील की। सीबीआई की अपील पर इंटरपोल ने क्वात्रोची पर से रेडकॉर्नर हटा लिया गया। तब भाजपा ने क्वोत्रोची को क्लीनचिट देने के पीछे कॉन्ग्रेस का हाथ बताया था। 2013 में मिलान में उसकी मौत की खबरें सामने आईं थीं।

भोपाल गैस त्रासदी: 25 हजार लोगों के कातिल को बचाने वाले राजीव

भोपाल गैस त्रासदी कोई भारतीय शायद ही भूल सकता है। हजारों लोगों की मौत के जिम्मेदार एंडरसन को राजीव गाँधी ने 25 हजार रुपए के पर्सनल बॉन्ड पर भारत से बाहर भेज दिया था। भोपाल गैस त्रासदी हुई, उसके एक महीने पहले ही राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने थे।

2-3 दिसंबर, 1984 को भोपाल में यूनियन कार्बाइड की कंपनी से जानलेवा गैस लीक होने से हजारों लोगों की मौत हो गई थी। बताया जाता है कि 8000 लोगों की मौत इस त्रासदी के महज 2 हफ़्ते के भीतर ही हो गई थी।

अब तक अनुमान है कि तकरीबन 25,000 लोगों की इस गैस संबंधी बीमारी से मौत हो चुकी है। जबकि, हजारों लोग आज भी पीड़ित हैं। इस कंपनी के मालिक वॉरेन एंडरसन को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी और उनकी सरकार ने सरकारी प्लेन में बैठाकर सुरक्षित भोपाल से दिल्ली पहुँचाया, जहाँ से उसे अमेरिका जाने दिया गया।

इस त्रासदी पर मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह पर कन्हैयालाल नंदन ने ‘मोहे कहाँ विश्राम’ नामक पुस्तक लिखी थी, जिसमें कहा गया कि राजीव गाँधी के मौखिक आदेश के बाद अर्जुन सिंह ने वॉरेन को भोपाल से जाने दिया था। भगौड़े एंडरसन को भारत सरकार कभी दुबारा भारत वापस ला पाने में नाकामयाब रही और 92 साल की उम्र में सितंबर 29, 2014 को अमेरिका के फ्लोरिडा में एंडरसन की मौत हो गई।

राजीव ने ठहराया था सिखों के नरसंहार को जायज

भारत में सबसे बड़े दंगे (नरसंहार ही था वो) को सरकारी छूट देने का आरोप राजीव गाँधी पर ही है। अक्टूबर 31, 1984 को इंदिरा गाँधी की हत्या के अगले दिन से ही दिल्ली और देश के दूसरे कुछ हिस्सों में भयानक सिख विरोधी दंगे भड़क उठे।

नवंबर 19, 1984 को इंदिरा गाँधी के उत्तराधिकारी उनके पुत्र राजीव गाँधी ने बोट क्लब में इकट्ठा हुए लोगों की भीड़ के सामने सिखों के क़त्ल को जायज ठहराते हुए बयान दिया था, “जब इंदिरा जी की हत्या हुई थी़, तो हमारे देश में कुछ दंगे-फ़साद हुए थे। हमें मालूम है कि भारत की जनता को कितना क्रोध आया, कितना ग़ुस्सा आया और कुछ दिन के लिए लोगों को लगा कि भारत हिल रहा है। जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है।”

राजीव गाँधी ने इन दंगों का शिकार हुए हज़ारों सिखों पर कोई टिपण्णी ना करते हुए उनके घावों को कुरेदने वाला यह बयान दिया था जो आज तक भी गाँधी परिवार की प्राथमिकताओं को बेनकाब करने के लिए काफी है।

‘सरकार 1 रुपया भेजती है, लोगों तक 15 पैसे पहुँचते हैं’

भ्रष्टाचार और घोटालों पर राजीव गाँधी के विचार क्या थे, इस बात का अंदाजा उनके इसी बयान से लगाया जा सकता है कि उन्हें इस बात से भी कोई ख़ास समस्या नहीं थी कि यदि केंद्र द्वारा 1 रुपया भेजा जाता है तो आम आदमी तक 15 पैसे ही पहुँच पाते हैं।

यह वर्ष 1985 की बात है, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी सूखा प्रभावित ओडिशा के कालाहाँडी जिले में दौरे पर थे। यहाँ उन्होंने भ्रष्टाचार पर बात करते हुए कहा था कि सरकार जब भी 1 रुपया खर्च करती है तो लोगों तक 15 पैसे ही पहुँच पाते हैं। भ्रष्टाचार से निपटने में असमर्थता जताते हुए राजीव ने अपने उस भाषण में कहा था कि देश में बहुत भ्रष्टाचार है, जिसे दिल्ली से बैठकर दूर नहीं किया जा सकता।

राजीव गाँधी फाउंडेशन घोटाला

राजीव गाँधी का घोटालों के साथ रिश्ता उनकी मौत के इतने वर्ष बाद भी जीवित नजर आता है। ऐसे समय में जब देश कोरोना वायरस की महामारी से जूझ रहा था और भारतीय सेना लद्दाख क्षेत्र में चीन की सेना के साथ संघर्षरत थी, राजीव गाँधी फाउंडेशन द्वारा किए गए घोटाले चर्चा का विषय बन गए। ख़ास बात यह रही कि यह घोटाला तब उजागर हुआ, जब गाँधी परिवार के माँ-बेटा और बेटी की नजर PM CARES फंड पर टिकी हुई थी।

राजीव गाँधी फाउंडेशन पर चीन की कम्युनिस्ट सरकार से फंड लेकर चीन के पक्ष में लॉबिग करने का मामला भी सामने आया है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री राहत कोष फंड (PMNRF) को राजीव गाँधी फाउंडेशन में ट्रांसफर करने भी खुलासा भी हुआ। साथ ही पता चला कि UPA के दौरान कई मंत्रालयों और सार्वजनिक उपक्रमों की ओर से भी राजीव गाँधी फाउंडेशन में पैसे ट्रांसफर किए गए। इन सभी खुलासों के बाद गृह मंत्रालय ने एक कमिटी का गठन किया है।

राजीव गाँधी के करियर में तमाम घोटालों के अलावा दंगे और सबसे अहम शाहबानो प्रकरण शामिल हैं। जब सात सालों की कठिन कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट से जीतने के बाद संप्रदाय विशेष का विरोध इस कदर बढ़ा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने एक कानून मुस्लिम महिला अधिनियम 1986 पास करवा दिया था।

इस कानून के चलते शाहबानो के पक्ष में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी पलट दिया गया। यहाँ से खुले तौर पर मुस्लिम तुष्टिकरण की शुरूआत हुई थी और आज ये हाल हैं कि राहुल गाँधी और उनकी कॉन्ग्रेस आज खुद को कट्टर हिन्दू साबित करने का हर सम्भव प्रयास कर रही है।

इन सबसे हटकर उस किस्से को तो शायद ही कभी यह देश भूल सकेगा, जब राजीव गाँधी ने भारत की सुरक्षा में तैनात आईएनएस विराट को अपने परिवार और इटली के ससुरालवालों की मौज मस्ती में लगा दिया था। समुद्र के बीचों-बीच 10 दिन तक मौज काटी थी। यह इस बात का बहुत छोटा सा सबूत था कि गाँधी परिवार इस देश की हर सम्पदा पर अपना पहला हक़ समझता आया था। यह सब तब घटित हो रहा था, जब दरबारी मीडिया, दरबारी विचारक और दरबारी इतिहासकार इन्हीं राजीव गाँधी को इक्कीसवीं सदी का वास्तुकार साबित करने के हर प्रयास कर रहे थे।

MX Player पर Bobby Deol की हिन्दूघृणा से सने वेब सीरीज ‘आश्रम’ के ट्रेलर पर भड़के लोग: सरकार से बैन करने की माँग

एम एक्स प्लेयर पर प्रकाश झा द्वारा निर्मित और निर्देशित वेब सीरीज आश्रम का ट्रेलर रिलीज कर दिया गया है। बॉबी देओल की यह पहली वेब सीरीज है। इस सीरीज का ट्रेलर 17 अगस्त को रिलीज हुआ था। जिसमे बॉबी बाबा के रोल में नजर आ आ रहे है।

ट्रेलर एक बाबा (बॉबी देओल द्वारा अभिनीत) के जीवन के इर्द-गिर्द घूमता है, जिसने जल्दी लोकप्रियता हासिल की है। वह हर किसी से “मोक्ष” का वादा करता है और अपने अनुयायियों से उन सभी सांसारिक चीजों से छुटकारा पाने के लिए कहता है, जो उन्हें दुनिया के लिए बाध्य कर सकता है जैसे कि- संपत्ति, रुपए-पैसे आदि। ट्रेलर में देखा जा सकता है कि उनके अनुयाई अपना सारा सामान दान करने के बाद उनके आश्रम में शामिल होते हैं।

इस ट्रेलर में दिखाया गया है कि बाबा के आश्रम में एक छिपा हुआ बंकर है, जहाँ वह युवतियों को जेल में रखता है। वहीं पुलिस को एक इलाके में कई युवतियों के शव मिलते है। इस कहानी में एक गॉडमैन (धर्मगुरु) को एक कॉनमैन (चालक, ठग) के रूप में दिखाया गया है। ट्रेलर के सीन में यह दिखाया गया है कि आश्रम का क्षेत्र की युवतियों के अचानक और रहस्यमय ढंग से गायब होने से कुछ लेना-देना है।

सोशल मीडिया पर हो रही ट्रेलर की जमकर आलोचना

कई सोशल मीडिया यूजर ने ट्रेलर को लेकर शिकायत की है। उन्होंने कहा है कि ट्रेलर में हिंदू आस्था के खिलाफ एक नकारात्मक तस्वीर को चित्रित किया गया है। ट्रेलर रिलीज होने के साथ ही ट्विटर पर इसे बैन करने की माँग उठ रही है। इस वक्त #BanAashramWebSeries ट्रेंड कर रहा है।

कुछ ट्विटर यूज़र्स ने यज्ञ अनुष्ठान करने वाले देवता के चित्रण और अन्य विवरणों पर भी आपत्ति जताई है। लोगों ने कहा कि यह सीरीज हिंदूधर्म के प्रति नकारात्मकता फैलाने और बदनाम करने का एक जानबूझकर प्रयास है।

कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने कहा कि जहाँ सरकार पैगंबर के खिलाफ फिल्मों पर प्रतिबंध लगाती है, वहीं पीके और आश्रम जैसी फिल्में को पर्दे पर उतारती हैं। उन्होंने आगे सवाल किया कि कोई भी हिंदू भावनाओं की परवाह क्यों नहीं करता है?

एक यूजर ने कहा कि जहाँ अन्य धर्मों के संस्थानों के साथ जुड़े अपराधों के कई जाने-माने मामले हैं, वहीं फिल्म निर्माता केवल हिंदुओं को निशाना बनाते हैं क्योंकि अन्य धर्मों के तथाकथित धार्मिक लोगों द्वारा किए गए अपराधों को दिखाना ‘धर्मनिरपेक्षता’ के खिलाफ होगा।

एक अन्य यूजर ने कहा कि वेब सीरीज ‘आश्रम’ के लिए एमएक्स प्लेयर द्वारा दिया जा रहा डिस्क्लेमर मूर्खतापूर्ण है। उन्होंने कहा कि इसका कोई मतलब नहीं है कि ओटीटी मंच ऐसी सामग्री को अनुमति दे, जो संस्कृति और धर्म को बदनाम करती है।

ईश्वरी_राज्य नाम के एक यूजर ने कहा कि एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री केवल हिंदू धर्म और साधुओं को बदनाम करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि बॉलीवुड में हिंदूफोबिया बंद नहीं होगा।

गौरतलब है कि हिंदुओं की आस्था और विश्वास पर नकारात्मक चित्रण करने के लिए सड़क -2 के हाल ही में लॉन्च किए गए ट्रेलर को सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा था।

ट्रेलर के खिलाफ गुस्सा और अतीत में अपने हिंदू विरोधी बयानों के लिए महेश भट्ट और उनकी बेटियों को आलोचना का सामना करना पड़ा था। इसके परिणामस्वरूप सड़ाक -2 का ट्रेलर यूट्यूब पर 18 मिलियन से अधिक डिसलाइक मिला था। जिसकी वजह से सड़क-2 का ट्रेलर दूसरा सबसे अधिक नापसंद किया गया वीडियो बन गया।

बता दें यह पहली बार नहीं है, नेटफ्लिक्स पर हिन्दूघृणा और हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुँचने वाली कई सीरीज को पहले रिलीज किया जा चुका हैं। जिनमें घुल(ghoul) सेक्रेड गेम्स, लीला जैसे सीरीज शामिल हैं।

139 मामलों में 76 अपराधी गौहत्या के दोषी: योगी सरकार ने दिया NSA के तहत सख्त कदम उठाने के निर्देश

उत्तर प्रदेश पुलिस ने इस साल अब तक कड़े राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का उल्लंघन करने वाले 76 लोगों को गौहत्या के मामले में केस दर्ज किया है। यह जानकारी बुधवार (19 अगस्त, 2020) को एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी द्वारा दी गई है।

उन्होंने कहा इस साल विभिन्न अपराधों के लिए एनएसए के तहत कुल 139 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। इनमें सबसे ज्यादा गौहत्या का मामला है।

अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) अवनीश अवस्थी ने एक बयान जारी करते हुए कहा, “राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत 139 लोगों पर केस दर्ज किया गया था। जिनमें 76 लोगों पर गौहत्या का आरोप है। 6 लड़कियों के खिलाफ अपराधों में शामिल हैं। वहीं 37 गंभीर अपराधों और 20 अन्य अपराधों में शामिल हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने निर्देश दिया है कि अपराधों के मामले में एनएसए को सख्त कदम उठाना चाहिए, जो सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है ताकि अपराधियों में भय की भावना और जनता के बीच सुरक्षा की भावना पैदा हो सके।”

गौरतलब है कि अगर कोई व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा या कानून और व्यवस्था के लिए खतरा है, तो अधिकारी द्वारा एनएसए के तहत उसे 12 महीने तक बिना किसी आरोप के हिरासत में रखा जा सकता है।

यूपी में गौहत्या पर नया अध्यादेश जारी

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने गौहत्या पर पूर्ण लगाम लगाने के लिए ‘Cow-Slaughter Prevention (Amendment) Ordinance, 2020’ को पास किया था। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में ‘उत्तर प्रदेश गो वध निवारण (संशोधन) अध्यादेश, 2020’ को मंजूरी दे दी गई।

जहाँ गौहत्या के आरोपित 7 साल के कारावास की सज़ा के प्रावधान को बढ़ा कर 10 साल कर दिया गया था। साथ ही गौहत्या पर लगने वाले जुर्माने को भी 3 लाख रुपए से बढ़ा कर 5 लाख रुपए कर दिया गया। उत्तर प्रदेश में अब जो भी गौहत्या या गौ-तस्करी में संलिप्त होगा, उसके फोटो भी सार्वजनिक रूप से चस्पे किए जाएँगे। मंगलवार (जून 9, 2020) को यूपी कैबिनेट ने ये फ़ैसला लिया।

इसके अलावा अवैध परिवहन से गौ-तस्करी में लिप्त लोगों को पकड़े जाने के बाद वाहन चालक और तस्करी में शामिल लोग, बल्कि वाहन के मालिक के खिलाफ भी मुकदमा चलाया जाएगा। उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा कि गौकशी की घटनाओं को पूर्णतः रोकना उसका लक्ष्य है और गोवंशीय जानवरों के संरक्षण के लिए ये फ़ैसला लिया गया है। इससे पहले इस अधिनियम की नियमावली में 1964 और 1979 में संशोधन किया जा चुका था।

एक और ख़ास प्रावधान यह कि अगर कोई आरोपित इन अपराधों में दोबारा लिप्त पाया जाता है तो सज़ा भी दोगुनी मिलेगी। अर्थात, 20 वर्ष की क़ैद भुगतनी पड़ेगी और 10 लाख बतौर जुर्माना वसूला जाएगा। इस अधिनियम में 1958, 61, 79 और 2002 में इससे पहले संशोधन किया जा चुका है। इन सबके बावजूद प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से गोवंशीय पशुओं की तस्करी और हत्या की वारदातें सामने आती रहती थीं। इसीलिए इसे सख्त बनाया गया।

रिटायर्ड जज, ब्यूरोक्रेट्स उतरे प्रशांत भूषण के विरोध में: CJI को लिखा पत्र, कहा- ये लोकतांत्रिक संस्थाओं पर करते हैं आघात, सख्ती से आएँ पेश

सेवानिवृत्त न्यायधीशों और ब्यूरोक्रेट्स समेत नागरिकों के एक समूह ने वकील प्रशांत भूषण को अदालत की अवमानना के मामले में दोषी करार देने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश की आलोचना करने वालों पर निशाना साधा है। उन्होंने नायायलय के फैसले की निंदा करने वालों को घेरते हुए आरोप लगाया कि ये लोग संसद, चुनाव आयोग और शीर्ष अदालत जैसी लोकतांत्रिक संस्थाओं की जड़ों पर आघात करने का हर अवसर भुनाते हैं।

सीजेआई बोबड़े को लिखे गए इस पत्र में कहा गया है कि ये काफी दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब किसी वकील का राजनीतिक मकसद कोर्ट के फैसलों से पूरा नहीं होता है तो वो इस पर अपमानजनक टिप्पणी करते हैं। 

पत्र में आगे कहा गया है, “हम सभी लोग इस नए ट्रेंड पर चिंता जताते हैं, जिसमें न्यायपालिका को निशाना बनाया जा रहा है। भारत में पिछले कई सालों में देखा गया कि कुछ लोगों ने लगातार उन जजों पर हमला बोला है, जो उनसे सहमत नहीं थे।”

पत्र में ऐसे वकीलों का जिक्र किया गया है जो कोर्ट के फैसले के खिलाफ बोलते हैं। इसमें कहा गया है कि ऐसे वकील अपमानजक टिप्पणी कर कोर्ट का अपमान करते हैं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया और जजों को भी टारगेट किया जाता है। हमेशा उनके जजमेंट की आलोचना की जाती है।

खत में आगे कहा गया है कि अगर न्यायपालिका अपना काम और संचालन सही तरीके से कर रही है तो ऐसे में ये जरूरी हो जाता है कि कोर्ट की गरिमा और अथॉरिटी की सुरक्षा की जाए। न्यायपालिका का आधार यही है कि लोग इस पर न्याय के लिए भरोसा रखते हैं। कोर्ट के खिलाफ ये कहना कि ‘सुप्रीम कोर्ट ने लोकतंत्र को बर्बाद कर दिया’ और ‘सुप्रीम कोर्ट संविधान की हत्या कर रहा है’, जनता में न्यायपालिका के भरोसे को तोड़ने की एक शुरुआत जैसा है।

सेवानिवृत्त न्यायधीशों और ब्यूरोक्रेट्स समेत नागरिकों के एक समूह की तरफ से लिखा गया है, “हम कुछ लोगों के बयानों से बहुच चिंतित हैं, जो खुद के सिविल सोसायटी का एकमात्र प्रतिनिधि होने का गलत दावा करते हैं और संसद, चुनाव आयोग तथा अब उच्चतम न्यायालय जैसे भारत के लोकतांत्रिक संस्थानों की जड़ों पर हमला करने के हर अवसर का इस्तेमाल करते हैं।”

इन सभी वकीलों, पूर्व जजों और ब्यूरोक्रेट्स ने आखिर में अपील करते हुए कहा है, “हम सीजेआई से अपील करते हैं कि न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता बनी रहे और ऐसे लोगों से, जो इस संस्था को खत्म करना चाहते हैं, लोकतंत्र के तीसरे पिलर को बचाएँ। साथ ही सुप्रीम कोर्ट से अपील करते हैं कि ऐसे लोगों के साथ सख्ती से पेश आया जाए।”

पत्र पर 100 से अधिक लोगों ने हस्ताक्षर किए हैं, जिनमें मुंबई उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के आर व्यास, सिक्किम उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश प्रमोद कोहली, पूर्व पेट्रोलियम सचिव सौरभ चंद्रा और पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक पीसी डोगरा आदि शामिल हैं। उन्होंने कहा है कि प्रशांत भूषण उच्चतम न्यायालय के एक वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और ‘अदालत की अवमानना’ को कोई ‘दबाव समूह’ न्यायोचित नहीं ठहरा सकता है।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण के खिलाफ उनके दो ट्वीट्स को लेकर 14 अगस्त को फैसला दिया था। 14 अगस्त को शीर्ष अदालत ने वकील प्रशांत भूषण को कोर्ट की अवमानना वाले मामले में दोषी करार दिया। न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा, न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की पीठ ने भूषण को अवमानना का दोषी ठहराते हुए कहा कि इसकी सजा की मात्रा के मुद्दे पर 20 अगस्त को बहस सुनी जाएगी। शीर्ष अदालत ने पाँच अगस्त को इस मामले में सुनवाई पूरी फैसला सुरक्षित कर लिया था। 

ये पहली बार है जब कुछ लोगों ने प्रशांत भूषण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में आवाज उठाई है। इससे पहले कई बुद्धिजीवी, पत्रकार, वकील और अन्य लोगों ने प्रशांत भूषण का समर्थन किया और कोर्ट के फैसले पर ‘चिंता’ जाहिर की थी। प्रशांत भूषण को अवमानना का दोषी करार दिए जाने के फैसले के बाद सैकड़ों वकीलों और अन्य लोगों ने इसका विरोध किया। बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया से लेकर वकीलों की अन्य एसोसिएशंस ने भी इस पर चिंता जताई थी।

बता दें कि वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक अर्जी दायर की जिसमें अवमानना मामले के संबंध में उनकी सजा पर सुनवाई टालने की माँग की गई है। इसमें कहा गया है कि जब तक इस संबंध में एक समीक्षा याचिका दायर नहीं की जाती है और अदालत द्वारा इस पर विचार नहीं किया जाता है, तब तक सजा पर सुनवाई को टाल दिया जाए।