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मुंबई ​पुलिस की पिटाई से मरा वेलु, बनाई मॉब लिंचिंग की कहानी; बॉम्बे HC के संज्ञान के बाद 4 कॉन्स्टेबल सस्पेंड

मार्च 25, 2020 से देशभर में कोरोना वायरस के चलते लॉकडाउन प्रभावी हो चुका था। इसके बाद एक घटना 29 मार्च को मुंबई स्थित जुहू में हुई थी। चार कॉन्स्टेबल- संतोष देसाई, दिगंबर चौहान, अंकुश पालवे और आनंद गायकवाड़ ने लॉकडाउन के नियम का उल्लंघन करने के आरोप में 22 वर्षीय राजू वेलु देवेन्द्र के साथ मारपीट की, जिसमें उसकी मौत हो गई।

हालाँकि, इस मामले के बॉम्बे हाईकोर्ट के पास जाने तक भी जुहू पुलिस के पास इस घटना की एक अलग ही कहानी थी। इसमें बताया गया कि राजू वेलु की मौत मॉब लिंचिंग के कारण हुई, ना कि पुलिस कस्टडी में पिटाई के कारण!

मार्च से शुरू हुए इस घटनाक्रम पर एक नजर –

मॉब लिंचिंग या पुलिस कस्टडी में पिटाई से मौत?

जुहू पुलिस द्वारा राजू वेलु की बर्बरता से पिटाई करने के बाद पुलिस ने कहा था कि राजू वेलु को स्थानीय लोगों ने पकड़ लिया था और उसकी कथित मॉब लिंचिंग की। इसी आरोप में आठ लोगों के खिलाफ हत्या, महामारी के दौरान जमा होने और दंगा करने का मामला दर्ज कर लिया। लेकिन, राजू वेलु के रिश्तेदारों ने दावा किया कि उसे पुलिस ने ही पीट-पीटकर मार डाला। इसके बाद मृतक राजू वेलु के भाई ने हाईकोर्ट में एक PIL दायर की।

हालाँकि, मुंबई पुलिस ने राजू वेलू देवेन्द्र के परिवार से कहा कि उसे डकैती के प्रयास में भीड़ द्वारा मारा गया था, उसके भाई ने इस घटना के सीसीटीवी फुटेज तक पहुँचने की कोशिश की। वेलु की माँ सायरा देवेंद्र का कहना है कि वेलु के शरीर पर जो चोट के निशान थे और जैसा स्थानीय लोगों ने भी उन्हें बताया था, उसके कारण उनका संदेह पहले से ही था कि जुहू पुलिस झूठी कहानी तैयार कर उन्हें सुना रही है।

पुलिस कॉन्स्टेबल संतोष देसाई, दिगंबर चौहान, अंकुश पालवे और आनंद गायकवाड़, पर वेलु के परिवार को गुमराह करने का आरोप है। 31 मार्च को दर्ज शिकायत में, पुलिस ने राजू वेलु की मौत के लिए आठ अज्ञात लोगों को दोषी ठहराया था, और बाद में दावा किया कि 2 ने अपराध कबूल कर लिया है। उन्हें आठ दिनों की हिरासत के बाद रिहा भी कर दिया गया।

सायरा देवेन्द्र ने अपने चार बेटों को एक फूड स्टॉल पर काम कर के पाला था। 30 मार्च की सुबह 09 बजे पुलिस वेलु के घर पहुँची और राजू के घरवालों से कहा कि वह कई बार क़ानून का उल्लंघन भी कर चुका है और वो छोटा-मोटा चोर भी था। उसकी 51 साल की माँ सायरा देवेन्द्र कहती हैं, “उन्होंने मुझे बताया कि वेलु पास में एक फुटपाथ पर नशे में पड़ा हुआ था।”

जुहू पुलिस की कहानी

पुलिस ने राजू की माँ से कहा कि जब वह मौके पर पहुँचे, तो मुश्किल से 200 मीटर की दूरी पर उन्होंने वेलु को बेहोश पाया। सायरा का कहना है कि वे उसे अस्पताल ले जाना चाहते थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें मना किया। जब पुलिस राजू को उसके घर ले गए, तो घरवालों ने उसके शरीर पर चोट के निशान खोजे। वे कहती हैं कि आखिरकार वेलु को पाँच घंटे बाद भी होश नहीं आने पर अस्पताल जाने का फैसला किया। कूपर अस्पताल पहुँचने पर राजू को मृत घोषित कर दिया गया।

पुलिस ने वेलु की माँ से कहा कि वेलु किसी के घर में चोरी करने के लिए घुसने की कोशिश कर रहा था, जहाँ लोगों ने उसकी मॉब लिंचिंग कर डाली और वो जल्द ही अपराधियों की तलाश कर लेंगे। पुलिस द्वारा कैद किए गए कथित आरोपितों में से एक ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया था कि 29-30 मार्च की रात को वेलु को चार पुलिसकर्मियों ने पकड़ा था। स्थानीय लोगों ने उसे घर में घुसने की कोशिश करते हुए देखा और पकड़कर उसकी पिटाई की।

29 और 30 मार्च की रात को, राजू वेलु देवेंद्र और उसके दोस्त बाहर निकले थे। पुलिस ने दावा किया था कि राजू की लोगों ने मॉब लिंचिंग की और उसका शव उन्हें नेहरू नगर चौक पर मिला।

मृतक राजू के भाई के मुताबिक, राजू को रात 2.30 बजे पुलिस स्टेशन ले जाया गया था और सुबह 6 बजे के आसपास, पुलिस ने परिवार को सूचित किया कि उसकी हत्या कर दी गई है। सार्वजनिक विरोध के बाद ही विभाग ने आंतरिक जाँच का आदेश दिया था।

वेलु की मॉं का बयान (साभार: Click News Media)

राजू के भाई का कहना है कि उच्च न्यायलय की सुनवाई के पहले तक भी पुलिस अपने इसी बयान पर अडिग थी कि पब्लिक द्वारा लिंचिंग किए जाने के कारण राजू की मौत हुई। पुलिस ने यहाँ तक भी कहानी गढ़ी कि राजू के 2 दोस्त भागने में कामयाब रहे और वह छत से गिर गया था। पुलिस ने कहानी बनाई कि उनके पास इस घटना का चश्मदीद गवाह भी मौजूद है।

लेकिन जब मामला बॉम्बे हाईकोर्ट में पहुँचा, तब पुलिस ने आंतरिक जाँच की रिपोर्ट तैयार की और स्वीकार किया कि देवेद्र की मौत मॉब लिंचिंग का मामला नहीं है, बल्कि पुलिस हिरासत में हुई मौत है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, सांता क्रूज़ के एक वकील ने वेलु के परिवार को प्रधानमंत्री कार्यालय, मुख्यमंत्री कार्यालय, राष्ट्रमंडल मानवाधिकार पहल (सीएचआरआई) और मुंबई पुलिस आयुक्त को पत्र भेजने में मदद की।

सायरा का कहना है कि लॉकडाउन शुरू होने के बाद से ही उनका परिवार एनजीओ द्वारा बाँटे गए भोजन और राशन पर निर्भर हो गए थे, ऐसे में गरीबी के चलते न्याय के लिए आवाज उठाने की उम्मीद ही उन्होंने छोड़ दी थी। उन्होंने कहा, “हमने सोचा था कि हम पैसे की तंगी के दूर होते ही इस मुद्दे को उठाएँगे। फिर, अगस्त के पहले सप्ताह में, हमें एक अधिवक्ता का फोन आया, जिसमें उन्होंने बॉम्बे उच्च न्यायालय में पुलिस की बर्बरता का यह मुद्दा उठाया था।”

इस पर अधिवक्ता, बहराइज़ ईरानी ने कहा, “शुरू में हमने बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि वह राज्य भर में हो रही पुलिस की क्रूरताओं का संज्ञान लें, लेकिन तब हमें सलाह दी गई थी कि आवश्यक पत्र दाखिल करें, क्योंकि एक पत्र पर्याप्त नहीं था। इसके चलते हमें जनहित याचिका दायर करनी पड़ी। हम सीएचआरआई की रिपोर्टों पर भरोसा करते हैं, जिसमें राजू वेलु के मामले को उजागर किया गया था।”

जबकि, ज़ोन के पहले पुलिस उपायुक्त ने उस समय कहा था कि राजू वेलु को लोगों की भीड़ द्वारा मार दिया गया था, सहायक पुलिस आयुक्त ने पिछले महीने बॉम्बे उच्च न्यायालय में स्वीकार किया कि पुलिस हिरासत में ही पिटाई के कारण राजू की मृत्यु हो गई थी।

मुंबई पुलिस के बांद्रा डिवीजन के सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) ने 22 जुलाई को बॉम्बे उच्च न्यायालय को सूचित किया कि उसने उन चार पुलिस कर्मियों की पहचान की है, जिन्होंने राजू वेलु देवेंद्र के साथ मारपीट की थी। लेकिन, हाईकोर्ट ने इस मामले की जाँच में देरी पर नाराजगी व्यक्त की, और एसीपी को जाँच में तेजी लाने और 5 अगस्त तक एक प्रोग्रेस रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।

पहले की सुनवाई के दौरान, मुंबई पुलिस ने आरोपों से इनकार किया और दो हलफनामे दायर किए। एक स्थिति रिपोर्ट भी दर्ज की गई थी जिसमें चार पुलिसकर्मियों की पहचान की गई थी, जिन्होंने कथित तौर पर मृतक के साथ मारपीट की थी, और पुलिस ने उनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही करने का प्रस्ताव दिया था।

बॉम्बे HC के हस्तक्षेप के बाद, मुंबई पुलिस ने संज्ञान लिया और 16 अगस्त को आरोपित पुलिसकर्मियों के खिलाफ एक निलंबन (सस्पेंड) आदेश जारी किया गया और कहा कि विभागीय जाँच अभी जारी है। हालाँकि, यह भी दिलचस्प बात है कि इन पुलिसकर्मियों को सिर्फ निलंबित किया गया, ना कि उनके खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया है।

भारत में नहीं पैदा हुआ राम जैसा कोई नायक, वह फिल्मों की तरह मात्र एक काल्पनिक पात्र: सपा नेता

समाजवादी पार्टी के नेता चौधरी लौटन राम निषाद ने मंगलवार (18 अगस्त, 2020) को राम मंदिर पर आपत्तिजनक टिप्पणी की है। निषाद ने भगवान राम के अस्तित्व पर भी सवाल उठाया है।

समाजवादी पार्टी पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष चौधरी लौटन राम निषाद ने कहा कि भगवान श्री राम फिल्मों की तरह ही एक काल्पनिक पात्र थे। निषाद पार्टी के स्थानीय पदाधिकारियों का चयन करने के लिए मंगलवार को अयोध्या पहुँचे थे।

अपने हिंदू विरोधी बयानबाजी को जारी रखते हुए, सपा नेता निषाद ने आगे दावा किया कि संविधान ने भी स्वीकार किया है कि भगवान राम जैसा कोई नायक कभी भारत में पैदा नहीं हुआ था।

मीडिया से बात करते हुए निषाद ने कहा, “अयोध्या में राम मंदिर बने या कृष्ण मंदिर, उससे मुझे कोई लेना देना नहीं है। भगवान राम में मेरी आस्था नहीं है। यह मेरा व्यक्तिगत विचार है। मेरा विश्वास डॉ.भीमराव अंबेडकर, कर्पूरी ठाकुर, छत्रपति साहूजी महाराज, ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले द्वारा बनाए गए संविधान पर है, जिनसे हमें सरकारी नौकरियों में पढ़ने, लिखने, बैठने का अधिकार मिला है।” इसके अलावा समाजवादी पार्टी के नेता ने कहा मेरी आस्था उनमें है जिनकी वजह से मुझे सीधा लाभ मिला।

भगवान राम के अस्तित्व पर संदेह जताते हुए निषाद ने आगे कहा, “राम पर ही नहीं मैं उनके अस्तित्व पर भी सवाल उठाता हूँ। राम एक काल्पनिक पात्र है, जो फिल्म की पटकथा के समान है। राम एक ऐसा चरित्र है, जिसका कोई अस्तित्व नहीं है। संविधान ने यह भी कहा है कि राम का जन्म किसी नायक से नहीं हुआ, राम नाम का कोई नायक भारत में पैदा नहीं हुआ।”

इस बीच, भाजपा ने सपा नेता लोटन राम निषाद के बयानों पर प्रतिक्रिया दी है और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से स्पष्टीकरण की माँग की है।

पाकिस्तान में फँसी जनता, भारत में हैं पति और 3 बच्चे: भारत लौटने को बेचैन हैं हिंदू, NORI की अवधि बढ़ाने की गुहार

पाकिस्तान में फँसी 33 साल की जनता माली हर हाल में भारत आना चाहती है। लॉकडाउन से पहले जनता अपनी बीमार माँ से मिलने मीरपुर गई थी, जिसके बाद वह वहाँ फँस गई। जून के आखिरी सप्ताह में जब भारत-पाकिस्तान की सीमाओं पर फँसे नागरिकों को अभियान चलाकर वापस लाया गया, तब उसके पति और बच्चे भारतीय नागरिक होने के कारण जोधपुर ले आए गए। लेकिन जनता माली वहीं फँसी रही। वह साल 2007 से भारत में लॉन्ग टर्म वीजा पर रह रही थी।

जनता की ही तरह कई पाकिस्तानी प्रवासी जो अपने रिश्तेदारों से मिलने पाकिस्तान गए थे और उन्हें अपना पासपोर्ट या अन्य पहचान पत्र नवीकरण करवाना था, वह सब वहाँ फँसे हुए हैं। ये प्रवासी पाकिस्तानी NORI (नो ऑब्जेक्शन रिटर्न ऑफ इंडिया) वीजा पर गए थे, जो अमूमन 60 दिन के लिए वैध होता है। अब यह समय पूरा हो गया है।

बता दें कि साल 2017 में, राजस्थान उच्च न्यायालय ने अल्पसंख्यक समुदायों के पाकिस्तानी नागरिकों के निर्वासन पर संज्ञान लिया था। बुधवार को इस पर सुनवाई के दौरान सज्जन सिंह राठौर ने पाकिस्तान में फँसे लोगों के मामले को न्यायाधीश संगीत लोढ़ा और रामेश्वर व्यास की खंडपीठ के समक्ष उठाया।

उन्होंने कहा, “NORI वीजा समाप्त होने के कारण और अंतरराष्ट्रीय मार्गों के बंद करने के कारण कई लोग पाकिस्तान में फँसे हुए हैं।” इसके बाद कोर्ट ने केंद्र और राज्य से इस मामले पर उनकी प्रतिक्रिया माँगी।

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, राठौर ने कोर्ट के सामने कहा कि जनता माली समेत कई लोगो का NORI वीजा विदेश मंत्रालय द्वारा बढ़ाया नहीं जा रहा। वहाँ के कई हिंदू अत्याचारों से तंग आकर भारत में लॉन्ग टर्म वीजा पर भारत में रहते हैं, वह इसका सहारा तब तक लेते हैं जब तक उन्हें नागरिकता नहीं मिलती।

पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों को भारत में नागरिकता दिलवाने का काम करने वाले सीमांत लोक संगठन के अध्यक्ष हिंदू सिंह सोढ़ा ने कहा, “NORI वीजा का समय 60 दिन है। अगर वह इतने समय में नहीं लौटते तो उनका वीजा रद्द हो जाता है। इसके बाद उन्हें नए वीजा के लिए अप्लाई करना पड़ता है। जब वह लोग ऐसा करते हैं तो पहले वाला समय जो उन्होंने भारत में बिताया उसे नहीं गिना जाता। इसलिए NORI वीजा को बढ़ाया जाना चाहिए और उन्हें भारत लौटने की अनुमति देनी चाहिए।”

बता दें कि सीमांत लोक संगठन ने भी 11 जुलाई को केंद्र सरकार को पत्र लिखकर मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया था। उन्होंने एक पत्र समन्वय सेल के प्रभारी राजस्थान अधिकारी सुबोध अग्रवाल को भी लिखा। फिर, राज्य सरकार ने पाकिस्तान में फँसे हुए लोगों के मामले में हस्तक्षेप करने के लिए गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय को पिछले महीने एक पत्र लिखा।

लेकिन इस सारी प्रशासनिक प्रक्रिया के बीच जनता माली के पति लीला राम को अपने तीन बच्चों की चिंता परेशान किए जा रही है। लीलाराम और जनता माली के 3 बच्चे हैं- कुलदीप (9), मोहित (8) और चंचल (6)। ये सारे बच्चे अपनी माँ से अब केवल व्हॉट्सएप पर बात कर पाते है और माँ अपने बच्चों को देखकर रोने के अलावा कुछ नहीं कर पाती। इन सबकी बस यही उम्मीद है कि उनकी सुनवाई हो और वह भारत लौट पाएँ।

घाटी में आतंक को बढ़ावा देने के लिए आतंकियों ने जारी की बारामूला में सुरक्षाबलों पर हमले की बॉडी कैमरा फुटेज: 72 घंटे में हुए ढेर

हाल ही में जम्मू-कश्मीर के बारामूला स्थित क्रीरी में सुरक्षाबलों और आतंकवादियों के बीच मुठभेड़ हुई थी। इसमें कुल 5 सुरक्षाकर्मी बलिदान हुए थे और 3 आतंकवादी मारे गए थे। घटना के दो दिन बाद आतंकियों ने घटनास्थल पर हुई गोलीबारी का वीडियो इंटरनेट पर साझा किया है। पूरे वीडियो में आतंकवादी अपनी बहादुरी और गोरिल्ला कौशल दिखाते हुए नज़र आ रहे हैं। People’s Anti-Fascist Front (PAAF) ने यह वीडियो साझा किया था। जम्मू कश्मीर पुलिस के मुताबिक़ यह संगठन लश्कर-ए-तैय्यबा से संबंधित है।    

यह वीडियो 3 आतंकवादियों ने मिल कर बनाया है जो इस हमले में शामिल थे। वीडियो में यह साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि कैसे वह घात लगा कर छिप कर हमले की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने योजना कुछ इस तरह बनाई थी कि जैसे ही सुरक्षाबल मौके पर पहुँचते। आतंकी उन पर गोलीबारी शुरू कर देते। इनमें से 3 आतंकी जो सेब के पेड़ों के पीछे घात लगाए बैठे थे सुरक्षाबलों  के आते ही उन पर गोली चलाना शुरू कर देते हैं। वह तब तक गोली चलाना जारी रखते हैं जब तक पक्का सड़क के नज़दीक नहीं पहुँच जाते हैं।    

उसी जगह पर सुरक्षाबलों का वाहन भी मौजूद था। वीडियो में यह भी देखा जा सकता है कि दो आतंकी लगातार गोलियाँ चला रहे हैं जबकि तीसरा उन्हें कवर दे रहा है। घटना के दौरान एक मौक़ा ऐसा भी आता है जब उसे मैगज़ीन बदलते हुए भी देखा जा सकता है। यह वीडियो फिलहाल सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। इस वीडियो को एडिट भी किया गया है जिसके बाद इसमें म्यूज़िक भी जोड़ा गया है। तीन हमलावरों को प्रभावी रूप में दिखाने के लिए इफेक्ट्स भी जोड़े गए हैं।    

5 मिनट के इस वीडियो में दो सुरक्षाबलों को सिर गोली लगती है और मौके पर ही उनकी मृत्यु हो जाती है। लेकिन वीडियो में यह साफ़ नहीं हो पाता है कि जब सुरक्षाबलों के वाहन के नज़दीक गोलीबारी होती है तब क्या होता है। गोलीबारी तब रूकती है जब एक आतंकवादी अपने दूसरे साथी से कहता है “थावो” (रुको)। इस वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए पुलिस ने कहा कि इस हमले के 72 घंटे के भीतर सभी आतंकियों को मार गिराया गया है।            

पुलिस ने इस घटना पर ट्वीट करते हुए लिखा, “इस तरह का वीडियो साझा करके वह आतंकवाद को सम्मानित करना चाहते हैं। लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकते हैं। हमने आतंकियों को इसका मुँह तोड़ जवाब दिया है। हमारे अभियान में अभी तक उनके कई कमांडर मारे जा चुके हैं। सज्जाद हैदर, तैमूर खान, अबू उस्मान (वीडियो में भी नज़र आया था), नसीर, साद भाई, अली भाई, दानिश यह सब 72 घंटे के भीतर मारे गए हैं।” 

इसके पहले भी आतंकवादी बनने वाले नए युवा सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी साझा करते थे। यह सब पिछले 1 दशक के दौरान देखा गया था। पिछले एक दो बार की घटनाओं में ऐसा देखा गया है कि शूटआउट के वीडियो साझा किए जाते हैं। लेकिन इस घटना में देखा गया था कि वीडियो गो प्रो जैसे बॉडी कैमरा से शूट किया गया था। पहली बार किसी गोलीबारी की घटना रिकॉर्ड करने के लिए गो प्रो कैमरे का इस्तेमाल किया गया है।       

इसके पहले साल 2013 में सुरक्षाबलों पर आतंकियों द्वारा की गई गोलीबारी का वीडियो इंटरनेट और सोशल मीडिया वायरल हुआ था। एक स्थानीय आतंकी कमांडर इरशाद गनिया और उसके साथियों ने श्रीनगर स्थित हैदरपुरा बाईपास के नज़दीक इस हमले को अंजाम दिया था। इसमें हमले में कुल 8 जवान शहीद हुए थे और हमला करने वाले दो आतंकवादी लश्कर-ए-तैय्यबा से जुड़े हुए थे।    

कुछ महीने बाद कमांडर इरशाद गनिया भी पुलिस और सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया था। दो साल पहले श्रीनगर से 14 किलोमीटर दूर स्थित पम्पोर में सुरक्षाबलों की बस पर आतंकवादी हमला हुआ था। इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया और इंटरनेट पर खूब वायरल हुआ था। दो आतंकी बस पर सीधे गोली चलाते हुए नज़र आ रहे थे वहीं एक और आतंकी दूसरी तरफ से एके 47 से बस पर गोलियाँ चला रहा था।    

जावेद अख़्तर गैंग इंडस्ट्री के लोगों पर नजर रखता है कि कौन इस्लाम फ्रेंडली है, कौन नहीं: कंगना रनौत

बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रानौत ने इंडस्ट्री के फिल्म-माफियाओं को लताड़ लगाते हुए कहा है कि इस काम में ऐसे गिरोह हैं जिनका लक्ष्य राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाना है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुशांत सिंह राजपूत के मामले को सीबीआई को हस्तांतरित करने के बाद रिपब्लिक टीवी के प्रमुख अर्नब गोस्वामी से बात करते हुए, बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत ने कहा कि जावेद अख्तर, नसीरुद्दीन शाह जैसे लोगों को फिल्म उद्योग में भाई-भतीजावाद और पक्षपात की मानसिकता को स्थापित करने के लिए काम किया है।

रिपब्लिक टीवी के इंटरव्यू में कंगना रनौत ने बॉलीवुड गीतकार जावेद अख्तर के ‘नास्तिक’ होने के बारे में खुलासा करते हुए कहा कि जावेद अख्तर जैसे लोग, जो ‘नास्तिक’ होने का दिखावा करते हैं, वास्तव में, इंडस्ट्री के भीतर ऐसे लोगों पर नज़र रखते हैं कि वे इस्लाम के समर्थक हैं या नहीं? कंगना ने कहा कि कि ये लोग इंडस्ट्री में इस्लाम के समर्थकों या उनके हित में रहने वाले लोगों को ‘फ़िल्टर’ करते हैं और उन्हें बढ़ावा देते हैं।

बॉलीवुड के लोगों द्वारा मीडिया नैरेटिव किस तरह से कंट्रोल किया जाता है, इस पर कंगना रनौत ने अभिनेता आमिर खान के मौन पर भी सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि आमिर खान ने अभी तक भी सुशांत की मौत पर संवेदना व्यक्त नहीं की है।

कंगना रानौत ने कहा कि आमिर खान ने सुशांत सिंह के साथ PK फ़िल्म में काम किया था लेकिन उन्होंने अभी तक भी उनकी मौत की सीबीआई जाँच की माँग नहीं की है, ना ही इस पूरे प्रकरण पर अपने विचार रखे हैं।

सुशांत सिंह की मौत पर चुप्पी के कारण इस ‘गैंग’ पर निशाना साधते हुए कंगना रनौत ने कहा कि आमिर ही नहीं बल्कि अनुष्का शर्मा, राजू हिरानी, आदित्य चोपड़ा और रानी मुखर्जी तक ने भी इस बारे में अपनी राय नहीं रखी है।

इस इंटरव्यू में अर्नब ने कंगना से सवाल किया कि वो नसीरुद्दीन शाह और जावेद अख्तर जैसे लोगों के निशाने पर क्यों रहती हैं? इस पर अभिनेत्री कंगना रनौत ने कहा कि नसीरुद्दीन शाह, जावेद अख्तर, आमिर खान, शाहरुख खान जैसे लोगों के मुद्दे राजनीति से प्रेरित रहते हैं।

कंगना रनौत ने कहा – “ये सब लोग मोदी विरोधी हैं। इन्होंने अवार्ड लौटाए। याचिकाएँ दायर कीं, और पीएम मोदी को अमेरिका का वीजा ना दिए जाने के लिए मुहिम चलाईं। अगर आप इनका समर्थन नहीं करते हैं तो ये लोग आपको चैन से नहीं रहने देंगे।”

सुशांत के कुक से शुरू हुई पूछताछ: मुंबई पुलिस से लेकर पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर तक हर संदिग्ध से पूछताछ करेगी CBI

बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में केंद्रीय जाँच ब्यूरो ने जाँच शुरू कर दी है। सीबीआई का 16 सदस्यों वाला समूह गुरूवार (20 अगस्त 2020) की शाम मुंबई पहुँचा। सीबीआई की टीम ने दिवगंत अभिनेता की मौत की जाँच के लिए एक एसआईटी का गठन भी किया है। सीबीआई की एसआईटी टीम आज सुशांत सिंह के बांद्रा स्थित आवास से जाँच शुरू करेगी। वहाँ पहुँच कर सीबीआई की टीम पूरा क्राइम सीन रीक्रियेट करेगी।     

सीबीआई की टीम ने इस मामले पर योजना बनाने के लिए रात के लगभग 12 बजे तक बैठक की। सीबीआई द्वारा अब तक सामने आई जानकारी के मुताबिक़ गवाहों से पूछताछ शुरू हो चुकी है। इसके अलावा मुंबई पुलिस के पास इस मामले से संबंधित जितने भी दस्तावेज़ हैं वह इकट्ठा किए जाएँगे। ख़बरों के मुताबिक़ सीबीआई की टीम सुशांत सिंह राजपूत के कुक/बावर्ची नीरज को पूछताछ के लिए DRDO गेस्ट हाउस लेकर गई है। इस मामले में उससे पूछताछ शुरू भी हो चुकी है।    

सीबीआई के अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया था कि वह इस मामले में किसी भी संदिग्ध को गिरफ्तार नहीं करेंगे। उनके खिलाफ़ तब तक कोई कार्रवाई नहीं होगी जब तक ठोस सबूत और गवाह नहीं मिल जाते हैं। इसके अलावा सीबीआई मुंबई पुलिस की उस टीम से भी पूछताछ करेगी जो घटनास्थल पर सबसे पहले पहुँची थी। इसके बाद मुंबई पुलिस के कुछ अधिकारियों, अन्य सदस्यों और सुशांत सिंह के दोस्तों के भी पूछताछ की जाएगी। इतना ही नहीं सीबीआई ऐसे संदिग्ध लोगों से भी पूछताछ करेगी जिनसे पहले पूछताछ हो चुकी है।    

वहीं बीएमसी ने इस मुद्दे पर कहा है सुशांत सिंह मामले की जाँच के पहले सीबीआई की टीम को क़्वारन्टाइन नहीं किया जाएगा। बीएमसी के मुताबिक़ केंद्रीय जाँच ब्यूरो ने पहले ही इस मामले में छूट देने की माँग की थी नतीजतन वह अपनी कार्रवाई जारी रख सकते हैं। मुंबई स्थित सीबीआई की एंटी करप्शन विंग के डीआईजी सुवेज़ हक़ को नोडल अधिकारी बनाया गया है। वह सीबीआई की जाँच के दौरान मुंबई पुलिस और सीबीआई के बीच संवाद और समन्वय बनाने का काम करेंगे। मुंबई पुलिस के पास मौजूद सुशांत सिंह की जाँच से जुड़े दस्तावेज़ सीबीआई को दिलाने में भी उनकी भूमिका अहम होगी।    

सीबीआई की एसआईटी टीम की कमान वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी मनोज शशिधर संभालेंगे। इसके अलावा डीआईजी गगनदीप गंभीर, एसपी नुपुर प्रसाद और डीएसपी अनिल कुमार यादव भी शामिल हैं। वहीं एसआईटी की टीम को दो हिस्सों में बाँटा गया है। पहली टीम मामले से जुड़े अहम लोगों से पूछताछ करेगी। दूसरी टीम फोरेंसिक सबूत इकट्ठा करेगी और पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर्स से भी मुलाक़ात करेगी। सबसे महत्वपूर्ण सीबीआई की टीम मुंबई पुलिस द्वारा की गई जाँच का गहन विश्लेषण भी करेगी।             

कोरोना काल में बेरोज़गार हुए 40 लाख कर्मचारियों के लिए खुशख़बरी: तीन महीने तक आधा वेतन देगी ESIC

गुरूवार (20 अगस्त 2020) को कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) ने कर्मचारियों के संबंध में एक अहम ऐलान किया है। कहा गया है कि इस साल 24 मार्च से 31 दिसंबर के दौरान नौकरी गँवाने वाले कर्मचारियों को ESIC आगामी 3 महीने तक 50 फ़ीसदी औसत वेतन देने के लिए, इससे संबंधित नियमों में बदलाव किया जाएगा। इस निर्णय की ख़बर सबसे ज़्यादा राहत ऐसे कर्मचारियों को देती है जिनकी नौकरी कोरोना महामारी के दौरान छूटी है।    

ख़बरों की मानें तो ESIC बोर्ड के इस अहम फैसले से औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले लगभग 40 लाख कर्मचारियों को फ़ायदा होगा। ESIC ने इस संबंध में जानकारी देते हुए कहा कि समूह ने अटल बीमित व्यक्ति कल्याण योजना के अंतर्गत अहर्ता शर्तों और बेरोज़गारी से संबंधित लाभ में बढ़ोत्तरी के दिशा निर्देशों में छूट देने का फैसला लिया है। ESIC द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के मुताबिक़ समूह ने इस योजना को एक और साल यानी 30 जून 2021 तक बढ़ाने का फैसला लिया है।    

संगठन ESIC Scheme के तहत कवर कर्मचारियों को बेरोज़गारी से जुड़े लाभ देने के लिए अटल बीमित व्यक्ति कल्याण योजना को लागू करती है। इस मुद्दे पर संगठन का यह भी कहना है कि कोविड 19 महामारी की वजह से नौकरी गँवाने वाले कर्मचारियों के लिए पहले से तयशुदा नियमों में ढील दी गई है।

इसके अलावा राहत से संबंधित राशि में भी बढ़ोत्तरी की गई है। नई शर्तों के मुताबिक़ बढ़ी हुई राशि का भुगतान 24 मार्च 2020 से 31 दिसंबर 2020 के बीच किया जाएगा। वहीं 31 दिसंबर 2020 के बाद 1 जनवरी से लेकर 2021 से लेकर 30 जून 2021 तक वास्तविक पात्रता शर्तों के साथ इस योजना का क्रियान्वन किया जाएगा।    

ESIC के अनुसार नियमों में छूट की समीक्षा 31 दिसंबर के बाद आवश्यकता और उत्पादन के आधार पर की जाएगी। समूह का यह भी कहना है कि राहत राशि प्राप्त करने के लिए अहर्ता शर्तों में ढील दी गई है। इसके अलावा राहत राशि को बढ़ा कर मूल वेतन का 50 फ़ीसदी करने का निर्णय लिया गया है।

इसके पहले तक राहत राशि 25 फ़ीसदी ही थी। यह राशि आगामी 3 महीनों के भीतर दी जाएगी। अब तक तक नौकरी छूटने के 90 दिन बाद राहत राशि का भुगतान किया जा सकता था। अब इस अवधि को घटा कर 30 दिन कर दिया गया है। इसके भुगतान को लेकर ESIC ने यह भी कहा है कि इन्शोर्ड कर्मचारी संगठन के शाखा दफ़्तर में भुगतान आकर सकते हैं।      

प्रशांत भूषण के 10 कांड जब सुप्रीम कोर्ट ने लगाई लताड़ | Ajeet Bharti on Prashant Bhushan getting humiliated by SC

प्रशांत भूषण ने पिछले 11 सालों में कई बार सुप्रीम कोर्ट के जजों को भ्रष्टाचारी कहा, उन्हें केस से हटने को कहा, यहाँ तक कहा कि उन्हें जनहित याचिका समझना नहीं आता। प्रशांत भूषण को न्यायपालिका और CJI के खिलाफ अपने दो ट्वीट्स के लिए अदालत की अवमानना का दोषी पाया गया। यही नहीं, उन पर वर्ष 2009 का भी एक अवमानना का केस लंबित है।

28 जून को चीफ जस्टिस एसए बोबडे की एक तस्वीर सामने आई थी। इसमें वे एक बाइक पर बैठे नज़र आ रहे थे। बाइक के बेहद शौकीन जस्टिस बोबडे अपने गृह नगर नागपुर में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान, वहाँ पर खड़ी एक महँगी बाइक पर कुछ देर के लिए बैठे थे।

इस पर प्रशांत भूषण ने टिप्पणी की थी कि चीफ जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट को आम लोगों के लिए बंद कर दिया है और खुद बीजेपी नेता की 50 लाख रुपए की बाइक चला रहे हैं। इससे भी सबसे खतरनाक उनका दूसरा ट्वीट था, जिसमें उन्होंने कहा कि भारत में पिछले 6 सालों में जितने भी चीफ जस्टिस आए, खासकर पिछले 4 चीफ जस्टिस ने लोकतंत्र की बर्बादी में अहम् भूमिका निभाई है।

न तो ये पहला मौका था, न ही आखिरी है जब स्वघोषित एक्टिविस्ट वकील प्रशांत भूषण ने जजों पर दवाब बनाने, उन्हें नीचा दिखाने, उन्हें किसी केस से हटने आदि की बातें की हों।

प्रशांत भूषण द्वारा किए गए कांडों पर ऑपइंडिया सम्पादक अजीत भारती का विश्लेष्ण आप इस यूट्यूब लिंक पर देख सकते हैं

मोहर्रम का चाँद दिखते ही मौलाना ने कहा- इजाजत ना मिली तब भी निकालेंगे ताजिया, अरेस्ट करने के लिए पुलिस स्वतंत्र

शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जवाद नकवी ने बृहस्पतिवार (अगस्त 20, 2020) को धार्मिक आयोजनों के लिए पहले से ही सख्त कोविड प्रोटोकॉल के बाद सभी मुहर्रम आयोजनों पर प्रतिबंध लगाने के लिए पुलिस कमिश्नर पर निशाना साधा है। लखनऊ में शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जवाद ने मोहर्रम के बीच ताजियों को घर से ले जाने देने की इजाजत ना देने पर पुलिस से नाराजगी जाहिर की है और इसके साथ ही, लखनऊ पुलिस कमिश्नर सुजीत पांडे को ज्ञापन सौंपकर ताजिया ले जाने की इजाजत माँगी है।

बताया जा रहा है कि मौलाना कि इस धमकी के बाद वहीं, देर रात प्रशासन ने इमामबड़ा गुफरानमाब में मजलिस के लिए सशर्त अनुमति दे दी है। कमिश्नर सुजीत पांडेय ने बताया कि इमामबड़ा गुफरानमाब में मजलिस की अनुमति दे दी गई है, लेकिन यहाँ ज्यादा लोग इकट्ठे नहीं होंगे और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि शर्त के मुताबिक, अकीदतमंदों को मास्क लगाना होगा व सैनिटाइजर या साबुन से हाथ भी साफ करने होंगे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, मौलवी कल्बे जवाद, जो पुराने शहर में इमामबाड़ा गुफरानमाब के प्रबंधक मुतवल्ली हैं, ने विशेष रूप से मुहर्रम के लिए जारी किए गए दिशानिर्देशों को असंवैधानिक और अवैध बताया था। जवाद ने प्रशासन को यह भी चेतावनी दी थी कि वह कोविड -19 प्रोटोकॉल के बावजूद भी इमामबाड़ा में मजलिस (मजहबी उपदेश) आयोजित करेगा और अगर वे इस ‘असंवैधानिक आदेश’ के उलंघन का अपराधी मानते हुए उसे गिरफ्तार करते हैं, तो वे ऐसा करने के लिए स्वतंत्र हैं। उन्होंने कहा कि अगर पुलिस उन्हें ऐसा करने की इजाजत नहीं देती है तो वो अपनी गिरफ्तारी देंगे।

मौलवी ने पुलिस आयुक्त के लिए एक लिखित बयान पेश किया था, जिसमें आरोप लगाया गया कि यह आदेश केवल भ्रामक ही नहीं है बल्कि ऐसा भी है, जो समुदाय में तनाव पैदा कर रहा है। कल्बे जवाद ने कहा कि पुलिस का यह आदेश डब्ल्यूएचओ, केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा कोविड -19 के लिए जारी किए गए दिशानिर्देशों के भी खिलाफ है।

कल्बे जवाद ने कहा, “यदि प्रशासन अपने असंवैधानिक आदेश का पालन करता है, तो मुझे गिरफ्तार करने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन मैं अपने समुदाय से अनुरोध करूँगा कि मेरी गिरफ्तारी का विरोध न करें और कोविड -19 प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन करें।”

गौरतलब है कि लखनऊ शिया और सुन्नी मरकजी चाँद कमेटी ने ऐलान किया है कि 20 अगस्त को मोहर्रम का चाँद दिख गया है, इसलिए बृहस्पतिवार यानी, 21 अगस्त को मोहर्रम की पहली तारीख होगी।

बेगूसराय: नाबालिग हिंदू लड़की को बंदी बना कर रखने वाला इज़मुल खान गिरफ़्तार, नींद की गोलियाँ देने की पुष्टि

26 जुलाई 2020 को बिहार के बेगूसराय जिले से एक नाबालिग लड़की का अपहरण किया गया था। फिलहाल लड़की को अपराधियों की गिरफ़्त से आज़ाद करा लिया गया है। इस मामले के मुख्य आरोपित इज़मुल खान उर्फ़ नज़मुल/आर्यन भी गिरफ़्तार किया जा चुका है। स्वराज्य की पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा ने इस घटना का वीडियो साझा किया है।    

स्वाति गोयल ने कुछ ऐसे फेसबुक पोस्ट के बारे में भी जानकारी दी है जो इज़मुल/नज़मुल ने अपने फेसबुक एकाउंट से साझा किए थे। फेसबुक पर उसने अपना नाम कैप्टन अमेरिका रखा हुआ है। कुछ स्थानीय लोग जो इस एकाउंट की गतिविधियों पर नज़र रख रहे थे। उन्होंने बताया कि अपहरण के बाद आरोपित इज़मुल ने नाबालिग लड़की का चित्र साझा किया था।    

नजमुल का डिलीटेड फेसबुक पोस्ट

जिसमें लड़की के सिर पर सिंदूर लगा हुआ था और गले में माँ दुर्गा का लॉकेट था। अपहरण के बाद यह इज़मुल का पहला फेसबुक पोस्ट था। इतनी जानकारी मिलने के बाद स्थानीय लोगों ने वह फेसबुक पोस्ट दिनेश कुमार पंडित (लड़की के पिता) को दिखाई। जिस पर उन्होंने चिंता जाहिर की वह बस अपनी बेटी को ज़िंदा देखना चाहते हैं।  

इसके बाद 20 अगस्त को जब स्वराज्य के पत्रकार ने दोबारा इज़मुल की फेसबुक प्रोफाइल खंगाली तब तक पोस्ट हटा दी गई थी। इसकी जगह पर एक और पोस्ट नज़र आया जिसमें कुछ ऐसी बातें लिखी हुई थीं, “आपके पास मुझसे लड़ने का अधिकार है लेकिन मुझे छोड़ कर जाने का अधिकार नहीं है।” इस फेसबुक पोस्ट पर कुल 3 टिप्पणी की गई थी। धरमबीर नाम के व्यक्ति ने लिखा था “घर आ जाओ तुम्हारी वजह से तुम्हारी माँ और भाई जेल में हैं। लड़की एक बार सुरक्षित घर चली जाए उसके बाद विवाद सुलझा लेंगे।” इसके अलावा आसिफ़ इक़बाल नाम के व्यक्ति ने लिखा “तुम्हारा परिवार तुम्हारी वजह से बहुत ज़्यादा परेशान है और जेल भी जा चुका है। घर आ जाओ और आत्मसमर्पण कर दो।” 

इज़मुल उर्फ़ नज़मुल की फेसबुक टाइमलाइन पर और खंगालने पर अप्रैल महीने की दो पोस्ट नज़र आई। “सुन छोरी… पैसों का नहीं, **** होने का घमंड है।” दूसरी पोस्ट में लिखा था “न तो मेरी सरकार है और न ही सरकार में मेरा कोई संपर्क। मेरे पास कोई बड़ा नाम तक नहीं है। मुझे सिर्फ एक बात का गर्व है – मैं मु###न हूँ और मेरा धर्म इस्लाम है।” इसके बाद दिनेश ने कहा, उनके लिए यह पोस्ट राहत देने वाली थी क्योंकि उन्हें यह पता चला कि उनकी बेटी कम से कम ज़िंदा तो है।    

बिहार पुलिस द्वारा लड़की की खोज होने के 2 दिन बाद (20 अगस्त 2020)। कैसे 19 अगस्त की शाम 7:30 बजे के आस-पास दिनेश कुमार पंडित के पास बेगूसराय के बछवारा पुलिस थाने से फोन आया। उन्हें जानकारी दी गई कि उनकी बेटी को पटना से बरामद किया गया है। उनके मुताबिक़ जिस युवक ने उनकी बेटी को बंधक बना कर रखा था (इज़मुल) उसकी उम्र 20 साल थी। इसके बाद दिनेश कुमार ने पुलिस के प्रति भी गुस्सा जताया कि फेसबुक पोस्ट सामने आने के बावजूद पुलिस को कोई लीड नहीं मिल रही थी।    

ऑपइंडिया भी इस मामले पर बहुत करीब से निगरानी रख रहा था। कैसे डीएसपी ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि यह मामला अफ़ेयर का है और नाबालिक लड़की के पिता दिनेश से सबूत लेकर आने के लिए कहा था। दिनेश ने बेहद निराश होकर इस मुद्दे पर कहा था कि अपहरण करने वाला फेसबुक पर पोस्ट कर रहा था। इसके बावजूद पुलिस के हाथ कोई अहम सुराग नहीं लग रहा था। इसका मतलब साफ़ था कि पुलिस इस मामले पर कुछ नहीं कर रही थी।    

इसके अलावा दिनेश ने कहा कि अपहरण के बाद वह अपनी बेटी से 19 अगस्त को पहली बार मिले। जहाँ उन्होंने अपनी बेटी से फेसबुक पर साझा की गई उसकी तस्वीर के बारे में पूछा। जिस पर लड़की ने बताया कि इज़मुल ने उस तरह तस्वीर खिंचवाने के लिए दबाव बनाया। दिनेश ने इस पर अनुमान लगाया कि तस्वीर के ज़रिए वह ऐसा दिखाना चाहता था कि उसका लक्ष्य धर्म परिवर्तन कराना नहीं था। वह सिर्फ लड़की की इज्ज़त खराब करना चाहता था जिससे उसका भविष्य बिगड़ जाए।        

सारी कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद जब दिनेश अपनी बेटी के साथ लौट रहे थे। तब वह अपनी माँ से लिपट कर लगातार रो रही थी। उसने बताया कि कई बार भागने की कोशिश की, वह मौके से भागने के लिए चीखती भी थी लेकिन कभी मौक़ा ही नहीं मिला। लड़की ने यह भी बताया कि उसे स्लीपिंग पिल भी दी जाती थी। फिलहाल लड़की की मेडिकल रिपोर्ट आना बाकी है जिससे इस बात की पुष्टि होगी कि उसके साथ शारीरिक उत्पीडन हुआ था या नहीं। आरोपित इज़मुल पर पॉस्को एक्ट समेत कई धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है।    

26 जुलाई को बेगूसराय, बछवारा पुलिस थाने के तहत आने वाले भीकन चक गाँव में रहने वाली नाबालिक हिंदू लड़की का बंदूक के बल पर अपहरण किया गया। अपहरण उस वक्त किया गया जब वह अपने पिता के साथ बाज़ार से लौट रही थी। लड़की के पिता दिनेश ने इस मामले में कुल 7 लोगों पर आरोप लगाया जिसमें इज़मुल और एक महिला भी शामिल थी। जैसे ही वह बेगूसराय स्थित मंसूरचक ब्लॉक के बहरमपुर, पंचायत भवन पहुँचे तभी आरोपित बोलेरो से आए और लड़की का अपहरण करके चले गए।