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पैर पीछे, जुबान नरम: NSA अजीत डोभाल के वीडियो कॉल के बाद चीन के तेवर ढीले

गलवान घाटी में धोखे से वार करने वाला चीन पीछे हट गया है। भारत सरकार के लगातार सख्त तेवरों के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल (NSA) के वीडियो कॉल ने उसे ऐसा करने को मजबूर किया।

रविवार को डोभाल ने चीन के विदेश मंत्री और स्टेट काउंसलर वांग यी से बातचीत की। इसके बाद चीन ने स्वीकार किया कि यह कदम दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।  

अजीत डोभाल और वांग यी की वार्ता मुख्य रूप से एलएसी पर हालात सामान्य करने और सीमा पर शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए हुई। दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने यह भी सुनिश्चित किया कि आने वाले समय में सीमा पर इस तरह की कोई घटना न हो। 

वीडियो कॉल के दौरान दोनों ने सीमा पर बीते कुछ समय की घटनाओं पर भी अपने विचार रखे। बातचीत के दौरान जिस पर पहलू सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया गया, वह था ‘डी एस्क्लेशन’। इसके बाद चीन ने अस्थायी निर्माण ख़त्म करने और 1.5 से 2 किलोमीटर तक पीछे हटने पर सहमति जताई।   

बातचीत के दौरान दोनों देशों के प्रतिनिधियों बीच इस बात पर भी सहमति बनी कि एलएसी से सेनाएँ हटाई जाएँगी और सीमा पर हालात पूरी तरह सामान्य किए जाएँगे। 

इस बातचीत का नतीजा भी बहुत जल्द ही सामने भी आया, गलवान घाटी के जिस इलाके में भारत और चीन की सेना के बीच 15 जून को टकराव हुआ था, चीन की सेना उस जगह से कुछ किलोमीटर तक पीछे हट गई है।   

चीन के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी किए बयान के मुताबिक़, भारत और चीन के सैन्य अधिकारियों के बीच हुई बातचीत जिसके बाद तनाव सीमा पर तनाव घटाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं। चीन ने साफ़ तौर पर हालात सामान्य होने की पुष्टि की है।  

समझौते के बाद दोनों पक्षों द्वारा वहाँ अस्थायी तौर पर जो संरचनाएँ बनाई गई थीं और निर्माण कार्य किया गया था, उसे भी हटाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। साथ ही दोनों पक्षों द्वारा ‘फिजिकल वेरफिकेशन’ भी किया जा रहा है। ‘लाइन ऑफ कण्ट्रोल’ पर चीन के पीछे हटने के बाद स्थिति सुधरने की उम्मीद जताई जा रही है।

चीनी सैनिक अब उस स्थल से 2 किलोमीटर पीछे चले जाने को मजबूर हो गए हैं। भारत ने भी वहाँ बंकरों और अन्य संरचनाओं का निर्माण किया था, ताकि चीन पर नज़र रखी जा सके। 15 जून की रात दोनों देशों के जवानों के बीच खूनी संघर्ष में भारत के 20 जवान शहीद हो गए थे जबकि चीन के 40 जवान मारे गए थे।

एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने ‘द हिन्दू’ को बताया कि जून 30 को हुए कमांडर स्तर की वार्ता में ये समझौता हुआ, जिसके बाद चीन की सेना पीछे हटने को मजबूर हुई। ये भारत के लिए जीत की तरह है क्योंकि हमारे लिए जो LAC की परिभाषा है, वहाँ से चीन पीछे हट गया है।

कुवैत से निकाले जा सकते हैं 8 लाख भारतीय नागरिक, अप्रवासी कोटा बिल से बढ़ी मुश्किलें

तीन चौथाई मुस्लिम जनसंख्या वाले खाड़ी मुल्क कुवैत में अप्रवासियों के लिए एक नया बिल लाया गया है। इसके क़ानून बनने के बाद वहाँ रहने वाले 8 लाख भारतीय नागरिकों को लेकर समस्या खड़ी हो गई है।

कुवैत के नेशनल असेम्ब्ली की क़ानूनी और संसदीय समिति ने अप्रवासी कोटा बिल को मॅंजूरी दे दी है। इसके अनुसार भारतीय नागरिकों को वहाँ की कुल जनसंख्या का 15% से ज्यादा हिस्सा बनने से रोका जाएगा।

इसके लिए एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार की जानी है, इसीलिए इस बिल को अब सम्बद्ध कमिटी के पास भेजा जाएगा। क़ानूनी एवं संसदीय कमिटी ने पहले ही कह दिया है कि ये बिल संवैधानिक है।

‘गल्फ न्यूज़’ के अनुसार, कुवैत में भारतीय समुदाय की कुल जनसंख्या 14.5 लाख है। नए बिल की वजह से इनमें से क़रीब 8 लाख लोग कुवैत छोड़ने के लिए मजबूर हो सकते हैं।

अगर कुवैत में कुल अप्रवासियों की बात करें तो उनकी संख्या 43 लाख है। साथ ही इस बिल में इजिप्ट के लोगों को भी निकाल बाहर करने की बात की गई है।

भारत में धन के प्रवाह के मामले में भी कुवैत ऊपर की सूची में है, जहाँ से यहाँ काफी धन भेजा जाता है। भारत में कुवैत से हर साल 5 बिलियन डॉलर के क़रीब धनराशि आती है।

कुवैत के सरकार का कहना है कि वहाँ के अपने ही नागरिक अपने ही देश में अल्पसंख्यक बन कर रह गए हैं, जिन्हें सुरक्षित माहौल देने के लिए इस बिल का क़ानून में बदलना ज़रूरी है। कुवैत विदेशी कर्मचारियों पर निर्भरता कम करने के प्रयास में लगा हुआ है।

कुवैत अब आप्रवासियों को बहुसंख्यक नहीं बने रहने देना चाहता। हालिया कोरोना वायरस संक्रमण आपदा और तेल के दाम में गिरावट को भी इसके पीछे की वजह माना जा रहा है।

कुवैत में जैसे-जैसे कोरोना वायरस संक्रमण का प्रभाव बढ़ा, वहाँ की जनता में अप्रवासियों के ख़िलाफ़ माहौल बनने लगा। वहाँ के नेताओं ने इसी का फायदा उठा कर जनभावनाओं को और हवा दी। अर्द्धलोकतंत्र वाले कुवैत में इसे छोटे नेताओं द्वारा वोट तुष्टिकरण के रूप में भी देखा जा रहा है, जिन्होंने सरकार पर इस क़ानून के लिए दबाव बनाया।

भारत ने अब तक इस विषय पर कोई बयान नहीं दिया है लेकिन इस क़ानून से सम्बंधित हर एक गतिविधि पर कुवैत स्थित भारतीय दूतावास की नज़र है।

कुवैत के स्पीकर मरज़ूक़ अल घनेम ने कहा कि उनके देश की असली समस्या आप्रवासियों की जनसंख्या का 70% पार करना है। उन्होंने दावा किया कि कुवैत की 33.5 लाख आप्रवासियों में से 13 लाख अशिक्षित हैं या फिर उन्हें ठीक से पढ़ने-लिखने तक में भी समस्या आती है। उन्होंने कहा कि ये वीजा ट्रेडर्स की वजह से हुआ है और इस जनसंख्या की कुवैत को ज़रूरत नहीं है। कुवैत सरकार में फिलहाल 28,000 भारतीय नागरिक कार्यरत हैं।

इनमें से अधिकतर इंजिनियर, डॉक्टर, नर्स, वैज्ञानिक हैं या फिर वहाँ की तेल कंपनियों में काम करते हैं। वहाँ अब तक कोरोना वायरस संक्रमण के 50,000 के क़रीब मामले आ चुके हैं। कुवैत के प्रधानमंत्री शेख सबह अल खालिद का भी कहना है कि आप्रवासियों की जनसंख्या को कुल जनसंख्या का वर्तमान 70% से 30% करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। अब सभी को भारत सरकार के बयान का इन्तजार है।

साउथा चाइना सी में अमेरिकी नेवी देख बौखलाया चीन, कहा- हमारी जद में युद्धपोत, बर्बाद कर सकते हैं

पड़ोसियों को धौंस दिखाने की कोशिश कर रहा चीन दक्षिण चीन सागर (साउथ चाइना सी) में अमेरिकी नौसेना की मौजूदगी से बौखला गया है। चीन के आक्रामक तेवरों के जवाब में अमेरिका ने अपने दो एयरक्राफ्ट कैरियर इस इलाके में तैनात किए हैं।

2014 के बाद यह पहला मौका है जब दक्षिण चीन सागर में अमेरिकी नौसेना ने अपने दो बड़े एयरक्राफ्ट भेजे हैं। दोनों एयरक्राफ्ट के अलावा चार युद्धपोत भी इस इलाके में अभ्यास कर रहे हैं। इसका मकसद इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में निर्बाध आवाजाही सुनिश्‍चत करना है।

अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर यूएएस निमित्ज और यूएसएस रोनाल्ड रीगन के दक्षिण चीन सागर में तैनाती पर चीन के सरकारी अखबार ग्‍लोबल टाइम्‍स ने यूएस को ‘धमकी’ दी। ग्‍लोबल टाइम्‍स ने कहा कि चीन की सेना की किलर मिसाइलें डोंगफेंग-21 और डोंगफेंग-25 अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर को तबाह कर सकती हैं। ग्‍लोबल टाइम्‍स ने ट्विटर पर लिखा कि दक्षिण चीन सागर में तैनात अमेरिका के विमानवाहक पोत चीनी सेना की जद में हैं। चीनी सेना इन्‍हें बर्बाद कर सकती है। 

चीन की इस ‘धमकी‘ पर यूएस नेवी ने चुटकी ली है। अमेरिकी नौसेना के चीफ ऑफ इनफॉर्मेशन ने जवाब देते हुए ट्वीट कर कहा, “और इसके बावजूद वे (यूएस नेवी के जहाज) वहाँ हैं। एयरक्राफ्ट कैरियर्स, दक्षिणी चीन सागर के अंतरराष्ट्रीय सीमा में घूम रहे हैं। यूएसएस निमित्ज और यूएसएस रोनाल्ड रीगन किसी से डरने वाले नहीं हैं।”

यूएसए के निमित्ज से एडमिरल जेम्स किर्क ने रॉयटर को दिए एक टेलीफोनिक इंटरव्यू में कहा, “उन्होंने हमें देखा है और हमने उन्हें देखा है।” वहीं चीन के विदेश मंत्रालय का कहना है कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने जान-बूझकर दक्षिण चीन सागर में अपने जहाजों को अपनी ताकत दिखाने के लिए भेजा है। बता दें कि साउथ चाइना सी में अमेरिकी नेवी के दो बड़े विमानवाहक युद्धपोत कैरियर 4 जुलाई से अभ्‍यास कर रहे हैं।

गौरतलब है कि ट्रंप प्रशासन ने 6 साल बाद साउथ चाइना सी में एयरक्राफ्ट कैरियर भेजे हैं। ये दुनियाभर में अमेरिकी नौसैनिक ताकत का प्रतीक माने जाते हैं। अमेरिका ने साउथ चाइना सी में यह युद्धाभ्यास ऐसे समय पर शुरू किया है जब इसी इलाके में चीन की नौसेना भी युद्धाभ्यास कर रही है। चीन की नेवी परासेल द्वीप समूह के पास पिछले कई दिनों से युद्धाभ्यास करके ताइवान और अन्‍य पड़ोसी देशों को धमकाने में जुटी हुई है। उधर चीन की लगातार नॉर्थ चाइना सी में जापान से भी झड़प जारी है।

सुप्रीम कोर्ट ने वकील पर 100 रुपए का लगाया हर्जाना, केस लिस्टेड करने में भेदभाव का लगाया था आरोप

वरीयता के आधार पर केस लिस्टेड करने के आरोप वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता वकील पर 100 रुपए का हर्जाना लगाया है। वकील रीपक कंसल की ओर से दायर की गई याचिका में आरोप लगाया गया था कि कि कुछ प्रभावशाली वकील और याचिकाकर्ता को रजिस्ट्री वरीयता देती है और उनका मामला प्राथमिकता के आधार पर लिस्टेड होता है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरुण मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने सोमवार (06 जुलाई, 2020) को मामले पर फैसला सुनाते हुए वकील रीपक कंसल वाली अर्जी को खारिज कर दिया। साथ ही वकील पर 100 रुपए का हर्जाना लगाया गया। इस पर अदालत ने कहा कि बार के किसी मेंबर को इस तरह से रजिस्ट्री पर आरोप नहीं लगाना चाहिए। हम आपके ऊपर निम्नतम हर्जाना लगा रहे हैं और 100 रुपए हर्जाना लगाते हैं।

दरअसल याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी कि रजिस्ट्री को निर्देश दिया जाए कि वह किसी भी वकील या याचिकाकर्ता को वरीयता न दें। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री द्वारा “पिक एंड चूज” नीति अपनाने और लिस्टिंग में प्रभावशाली वकीलों को वरीयता देने का आरोप लगाया गया था।

मामले पर 19 जून को सुप्रीम कोर्ट ने रीपक कंसल द्वारा लगाए गए आरोपों पर गंभीर आपत्ति जताई थी। जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस एम आर शाह की पीठ ने अर्णब गोस्वामी के मामले को ‘अधिमान्य प्राथमिकता’ का एक उदाहरण बताने पर याचिकाकर्ता पर नाराजगी व्यक्त की थी।

पीठ ने कहा था, कि “आप वन नेशन वन राशन कार्ड पर अपनी याचिका की तुलना अर्नब गोस्वामी से कैसे कर सकते हैं? क्या आग्रह था? आप क्यों बकवास बातें कह रहे हैं?”

पीठ ने कहा था, “रजिस्ट्री के सभी सदस्य दिन-रात आपके जीवन को आसान बनाने के लिए काम करते हैं। आप उन्हें हतोत्साहित कर रहे हैं। आप इस तरह की बातें कैसे कह सकते हैं?”

न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने जोर देकर कहा था कि “रजिस्ट्री हमारे अधीनस्थ नहीं है। वे बहुत हद तक सुप्रीम कोर्ट का हिस्सा और पार्सल हैं।” याचिकाकर्ता पर “गैरजिम्मेदाराना” आरोपों का बात कहने के बाद पीठ ने मामले में आदेश सुरक्षित रख लिया था।

गलवान में 2 KM पीछे हटा चीन, भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत: कमाण्डर स्तर वार्ता में ठंडा पड़ा ड्रैगन

भारत-चीन सीमा पर गलवान घाटी में चल रहे तनाव के बीच चीन पीछे हटने को मजबूर हो गया है। समझौते के बाद दोनों पक्षों द्वारा वहाँ अस्थायी तौर पर जो संरचनाएँ बनाई गई थीं और निर्माण कार्य किया गया था, उसे भी हटाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। साथ ही दोनों पक्षों द्वारा ‘फिजिकल वेरफिकेशन’ भी किया जा रहा है। ‘लाइन ऑफ एक्चुअल कण्ट्रोल (LAC)’ पर चीन के पीछे हटने के बाद स्थिति सुधरने की उम्मीद जताई जा रही है।

ये सब मीडिया रिपोर्ट्स में अंदरूनी सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है। जहाँ जून 15, 2020 को चीन की धोखेबाजी के बाद भारत की सेना के साथ उसका संघर्ष हुआ था और 20 भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए थे। साथ ही 43 चीनी सैनिकों को भी मार गिराया गया था। चीनी सैनिक अब उस स्थल से 2 किलोमीटर पीछे चले जाने को मजबूर हो गए हैं। भारत ने भी वहाँ बंकरों और अन्य संरचनाओं का निर्माण किया था, ताकि चीन पर नज़र रखी जा सके।

एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने ‘द हिन्दू’ को बताया कि जून 30 को हुए कमांडर स्तर की वार्ता में ये समझौता हुआ, जिसके बाद चीन की सेना पीछे हटने को मजबूर हुई। ये भारत के लिए जीत की तरह है क्योंकि हमारे लिए जो LAC की परिभाषा है, वहाँ से चीन पीछे हट गया है। इसके बाद रविवार को एक फिजिकल सर्वे भी किया गया, जिसमें ये देखा गया कि चीन की सेना वादे के मुताबिक पीछे गई भी है या नहीं।

फिजिकल वेरिफिकेशन के बाद पाया गया कि गलवान संघर्ष स्थल से चीन की सेना 2 किलोमीटर पीछे चली गई है और सारी संरचनाएँ हटा दी गई हैं। ‘द हिन्दू’ की खबर के अनुसार, दोनों देशों के बीच हुई कमांडर स्तर की वार्ता में सहमति बनी थी कि सबसे पहले गलवान, पांगोंग और हॉट स्प्रिंग- इन तीनों स्थलों पर तनाव कम किया जाएगा। इसके बाद उत्तर में स्थित देस्पांग प्लेन्स पर तनाव कम किया जाएगा क्योंकि वो ज्यादा कॉम्प्लेक्स क्षेत्र है।

बैठक के बाद चीन का रुख नरम हुआ, जिसके कारण सीमा विवाद सुलझाने के लिए आगे होने वाली वार्ताओं के लिए भी रास्ता साफ़ हो गया है। इसे भारत की कूटनीतिक जीत के रूप में भी देखा जा सकता है क्योंकि चीन ने अब भूटान की जमीन पर दावा ठोक कर उस पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। चीन ने अब सीमा पर तनाव बढ़ाने की बजाए इधर-उधर से दबाव बनाए के तरीके आजमाने शुरू कर दिए हैं।

बता दें कि शुक्रवार को अचानक लेह पहुँचे पीएम मोदी ने भी चीन को चेतावनी देते हुए भारतीय सेना के जवानों से कहा था कि आप धरती के वीर हैं जिसने हजारों वर्षों से अनेकों आक्रांताओं के हमलों और अत्याचारों का मुँहतोड़ जवाब दिया है, हम वो लोग हैं जो बांसुरीधारी कृष्ण की पूजा करते हैं, वहीं सुदर्शन चक्रधारी कृष्ण को भी अपना आदर्श मानते हैं। उन्होंने कहा था कि आधुनिकीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास ने हमारी रक्षा क्षमताओं को कई गुना बढ़ा दिया है।

सब-कलेक्टर आसिफ के युसूफ को नहीं मिलेगा IAS अधिकारी का दर्जा, आरक्षण के लिए दिया था फर्जी दस्तावेज

भारत सरकार के कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय ने केरल के मुख्य सचिव को एक पत्र लिखा। मंत्रालय द्वारा भेजे गए पत्र के मुताबिक़ थालास्सेरी के सब-कलेक्टर आसिफ़ के युसूफ़ को आईएएस अधिकारी का दर्जा नहीं दिया जा सकता है।

अर्नाकुलम के कलेक्टर एस सुहास ने आसिफ़ के युसूफ़ के खिलाफ जाँच के आदेश दिए थे। ऐसा इसलिए क्योंकि आसिफ़ पर आरोप है कि उन्होंने आरक्षण के दायरे में आने के लिए अपने माता-पिता की आय से जुड़े गलत दस्तावेज़ दिए थे। कलेक्टर सुहास ने पिछले साल नवंबर महीने में जाँच रिपोर्ट केरल के मुख्य सचिव को सौंपी थी।  

कुछ ही समय पहले ही केंद्र सरकार ने इस मामले से संबंधित दिशा-निर्देश जारी किए थे। दिशा-निर्देशों के मुताबिक 3 साल तक लगातार 6 लाख से अधिक वार्षिक आय वाले लोग क्रीमी लेयर के दायरे में आएँगे। यानी वह नॉन क्रीमी लेयर श्रेणी के तहत आने वाले आरक्षण लाभ के योग्य नहीं माने जाएँगे।  

आयकर के दस्तावेज़ों के अनुसार आसिफ़ के माता-पिता की पिछले कुछ वर्षों की सालाना आय कुछ इस प्रकार थी: साल 2012-13 में 21,80,963 रुपए; साल 2013-14 में 23,05,100 रुपए और साल 2014-15 में 28,71,375 रुपए।

केंद्र सरकार का यह भी कहना है कि सब-कलेक्टर आसिफ़ के युसूफ़ का जाति और आय प्रमाण पत्र दोनों ही निरस्त किए जाएँ। साथ ही साथ उस पर उचित कार्यवाही भी होनी चाहिए। फर्ज़ी प्रमाण पत्र जारी करने के लिए कन्यान्नूर के तहसीलदार पर भी मामला दर्ज करने की माँग उठ रही है।

आपको बता दें कि नॉन क्रीमी लेयर श्रेणी का प्रमाण पत्र का लाभ संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में नहीं मिलता है। लेकिन इस प्रमाण पत्र से प्रोन्नति में ज़रूर मदद मिलती है।  

शादी के बाद मायके आई वैष्णवी पर शेख अल्ताफ ने किए धारधार हथियार से 21 वार, 4-5 महीने से पड़ा था पीछे

महाराष्ट्र के जालना जिले के मंठा गाँव में हैवानियत की हद पार करने वाली एक घटना सामने आई है। खबर है कि यहाँ एक मुस्लिम युवक ने दिनदहाड़े हिंदू युवती पर धारधार हथियार से करीब 21 बार हमला करके उसे मौत के घाट उतार दिया।

वैष्णवी नाम की लड़की की गलती सिर्फ़ इतनी थी कि वह अपनी शादी के बाद खरीददारी के लिए सहेली और माँ के साथ बाजार गई थी। वहीं उसके पड़ोस में रहने वाले अल्ताफ की नजर उस पर पड़ी और उसने हमला बोल दिया। मीडिया रिपोर्ट्स में इसे एकतरफा प्रेम का मामला बताया जा रहा है।

हालाँकि, वैष्णवी के जीजा दीपक से जब इस संबंध में ऑपइंडिया ने संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि उन्हें इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। लेकिन सुनने में आया है कि अल्ताफ लूटपाट भी करता था और उस दिन भी वह वैष्णवी के पास इसी इरादे से आया था। इसी के बाद उसने उस पर कई वार किए।

FIR की कॉपी

अल्ताफ के एकतरफा प्रेम की बात पूछे जाने पर उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बारे में सूचना नहीं है। ऑपइंडिया ने इस मामले में स्पष्ट जानकारी जुटाने के लिए वैष्णवी के पिता को संपर्क किया।

वैष्णवी के पिता ने अपनी बेटी के साथ हुई बर्बरता सुनाते हुए कहा, “उस शैतान ने मेरी बेटी पर 21 वार किए। अगर कोई उसकी वो तस्वीर देख ले तो शायद रात में सो न पाए। अब हम इस मामले में फास्ट ट्रैक सुनवाई की माँग करते हैं और बस यही चाहते हैं कि उस शैतान को जल्द से जल्द फाँसी हो। आपके संस्थान से भी यही विनती है कि इस खबर को इतने लोगों तक पहुँचाइए कि आगे ऐसी घटनाएँ न हों।”

वैष्णवी के पिता नारायण एक ऑटो रिक्शा चालक हैं। अब वैष्णवी के बाद उनके घर में सिर्फ़ उनकी माता, उनकी पत्नी, वे और उनका बेटा बाकी बचे हैं। 30 जून की उस दर्दनाक कहानी को बयान करते हुए वैष्णवी के पिता नारायण कहते हैं कि अल्ताफ उनकी बेटी को 4-5 महीने से परेशान कर रहा था। ऐसे में, 26 जून को उसकी शादी हो गई।

शादी के बाद वैष्णवी एक कार्यक्रम के लिए अपने मायके आई। उसका मन खरीददारी का किया और वह अपनी माँ व सहेली के साथ बाजार तक गई। खरीददारी से लौटते समय उसकी माँ को कुछ लोगों को निमंत्रण देना था। तो वैष्णवी और उसकी सहेली आगे आ गए। जबकि माँ कुछ लोगों को कार्यक्रम का निमंत्रण देने के लिए पीछे ही रह गई।

इसी दौरान हथियार लेकर मौके की ताक में बैठे शेख अल्ताफ ने वैष्णवी पर हमला बोला। जब वैष्णवी गिर गई तो उसने उसकी सहेली को धमकाया कि वह वहाँ से भाग जाए वरना वह उसका भी वही हाल करेगा, जो वैष्णवी का किया। इसके बाद रेशमा वहाँ से भाग गई।

पुलिस इस पूरे वाकये पर कहती है कि उन्होंने इस मामले में आरोपित युवक को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस की मानें तो उनके पास इस संबंध में पहले कोई जानकारी नहीं थी। लेकिन उन्होंने मामले की सूचना पाते ही इस पर त्वरित कार्रवाई की और मात्र 3-4 घंटे में आरोपित युवक को ढूँढ निकाला।

पुलिस बताती है कि जब उन्होंने अल्ताफ को पकड़ा, उस समय उसकी हालात खराब थी। वह कह रहा था कि कि उसने जहर पी लिया है। इसके बाद पुलिस को जाँच में उसके पास से एक रस्सी भी मिली। जिससे पता चला कि वह आत्महत्या करने जा रहा था। अगर टाइम पर पुलिस नहीं पहुँचती तो सवेरे तक शायद उसका शव ही हाथ लगता।

पुलिस कहती है कि उन्होंने अल्ताफ की हालत को देखते हुए उसे अस्पताल में भर्ती करवाया। इसके बाद प्राथमिक उपचार करके उसे जालना भेजा गया। हालाँकि अब वह डिस्चार्ज हो चुका है और अदालत में पेश करके उसे लॉकअप में भी डाल दिया गया है।

यहाँ बता दें कि इस घटना के उजागर होने के बाद कहा जा रहा है कि हिंदू संगठनों में गुस्से की लहर है। कई संगठनों के सदस्य वैष्णवी के परिवार से जाकर मिल रहे हैं। जिसका एक वीडियो पत्रकार गौरव मिश्रा ने अपने ट्विटर पर साझा की है।

सबकी बस यही माँग है कि ये मामला फास्ट ट्रैक में सुना जाए और अल्ताफ को जल्द से जल्द फाँसी हो। सुदर्शन न्यूज के मुताबिक महाराष्ट्र राज्य के पूर्व मंत्री बबनराव लोणीकर ने भी कहा है कि यह केस फास्ट ट्रैक कोर्ट में ही चलना चाहिए और जल्द से जल्द अल्ताफ को सजा मिलनी चाहिए।

104 साल की उम्र में आनंदी झा ने कोरोना को हराया, आज भी किलो भर खाते हैं माछ; दूध-मिठाई की पूछिए ही मत

कोरोना वैश्विक महामारी का खतरा जितना वैश्विक है, इसे मात देने वाले लोगों की कहानियॉं भी उतनी ही जीवट है। आनंदी झा ने तो 104 साल की उम्र में इस संक्रमण को मात दी है।

कहते भी हैं- मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। महाराष्ट्र के ठाणे में रहने वाले आनंदी झा ने 11 दिनों में कोरोना संक्रमण को परास्त कर इसे एक बार फिर चरितार्थ किया है। वे पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं। वे देश में कोरोना से सर्वाधिक प्रभावित राज्य महाराष्ट्र में इस संक्रमण के बाद स्वस्थ होने वाले सबसे बुजुर्ग इंसान हैं।

भारत में कोरोना वायरस के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में डॉक्टरों का साफ तौर पर कहना है कि अगर आपकी इम्युनिटी पावर अच्छी हो, तो कोई भी बीमारी आपको नुकसान नहीं पहुँचा सकती है। इसी का उदाहरण पेश किया है आनंदी झा ने। कोरोना वायरस हर उम्र के लोगों को अपनी जद में ले रहा है, लेकिन पहले से बीमार लोगों और बुजुर्गों को सबसे ज्यादा अपनी चपेट में ले रहा है। मगर जिंदादिल आनंदी झा ने इस महामारी को मात देकर लोगों के सामने एक सकारात्मक संदेश प्रस्तुत किया है।

आनंदी झा मूल रूप से बिहार के मुंगेर जिला को बटसार गाँव के रहने वाले हैं। फिलहाल वो अपने बच्चों के साथ महाराष्ट्र के ठाणे के कल्याण में रह रहे हैं। 26 जुलाई को उनका कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आया। इसके बाद उन्हें ठाणे के मेदान्ता कोविड 19 हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया।

आनंदी झा के नाती ललित झा ने बताया कि भर्ती होने के पहले दिन से ही उनमें महामारी से लड़ने की इच्छाशक्ति नजर आ रही थी। दवा और जीने की इच्छाशक्ति की वजह से शुरुआती दिनों में ही उनके सेहत में सुधार दिखने लगा था और आखिरकार 11 दिनों के अंदर उन्होंने कोरोना को मात दे दी।

इसके बाद 4 जुलाई को अपने बेटे मुकेश के साथ स्वस्थ होकर घर लौट आए। घर आने पर परिवार और मुहल्ले के लोगों ने फूल-माला आदि पहनाकर उनका स्वागत किया।

यह पूछने पर कि उन्हें कोरोना संक्रमण कैसे हुआ, ललित झा ने ऑपइंडिया को बताया कि आनंदी झा अपने छोटे बेटे मुकेश, जिनकी उम्र 48 साल है, से संक्रमित हुए थे। फिलहाल दोनों स्वस्थ हैं।

हैरानी की बात यह भी है कि इस उम्र में भी आनंदी झा को शारीरिक तौर पर कोई परेशानी नहीं है। उन्हें डायबिटीज और ब्लड प्रेशर जैसी कोई बीमारी भी नहीं है। ललित झा के मुताबिक इस बात को लेकर आनंदी झा का इलाज करने वाले डॉक्टरों ने भी आश्चर्य जताया। आनंदी झा आज भी अपना सारा काम खुद ही करते हैं।  

आनंदी झा के आठ बच्चे हैं- चार पुत्र और चार पुत्री। सभी बच्चों का विवाह मधुबनी जिला में हुआ है। सभी संपन्न हैं। साधारण किसान के तौर पर जीवन व्यतीत करने वाले आनंदी झा ने काफी संघर्ष से बच्चों का पालन-पोषण किया। उन्हें काबिल बनाया। उनका जीवन गरीबी में गुजरा है, लेकिन अब उन्हें किसी प्रकार की कोई तकलीफ नहीं है। सभी बच्चे काफी अच्छे जगहों पर हैं। छोटा पुत्र बिल्डर है और बाकी तीनों पुत्र एक टेक्सटाइल केमिकल प्रोडक्ट का फैक्ट्री संचालित कर रहे हैं, जो कि अच्छा-खासा चल रहा है।

आनंदी झा ने अपना पूरा जीवन अपने गाँव बटसार की ही माटी-पानी में व्यतीत किया। मगर अब उम्र अधिक होने की वजह से बच्चे उन्हें ठाणे ले आए हैं।

ललित झा बताते हैं कि आनंदी झा गाँव में किसानी करने के साथ ही पहलवानी भी किया करते थे। गाँव में रहने के दौरान वो गाय भी पाला करते थे। उन्होंने 8 साल की उम्र से ही भाँग खाना शुरू कर दिया था। 88 साल की उम्र में इस लत से भी छुटकारा पा लिया।

ललित झा बताते हैं कि उनका खान पान तो ऐसा कि आज भी वो एक स्वस्थ नौजवान से अधिक अच्छी तरह से भोजन कर लेते हैं। मछली इतना पसंद है कि आज भी वे किलो भर खा लेते हैं। इसके अलावा उन्हें मिठाई और दूध भी खासा प्रिय है। इस उम्र में भी वो सब कुछ खाते हैं।

अपनी इस लड़ाई के जरिए आनंदी झा ने बताया है कि जीने की इच्छा हो, दिनचर्या स्वस्थ हो और खान-पान संतुलित हो तो उम्र के किसी भी पड़ाव पर किसी भी बीमारी को हराया जा सकता है।

दिल्ली हाईकोर्ट की NIA के खिलाफ टिप्पणी सही नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने गौतम नवलखा मामले में सिब्बल के तर्कों को नकारा

भीमा कोरेगाँव मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट को भीमा-कोरेगाँव हिंसा के आरोपित गौतम नवलखा की जमानत याचिका को स्वीकार ही नहीं करना चाहिए था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये मामला बॉम्बे हाईकोर्ट के अंतर्गत आता है, इसीलिए दिल्ली हाईकोर्ट को इसे स्वीकार करने से बचना चाहिए। बता दें कि नक्सली गौतम नवलखा फिलहाल जेल में बंद है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने NIA से कहा था कि वो गौतम नवलखा को दिल्ली से मुंबई ट्रांसफर किए जाने के सम्बन्ध में जारी किए गए प्रोडक्शन वारंट को लेकर सारे दस्तावेज करे। दिल्ली हाईकोर्ट के अनूप जयराम भम्भाणी ने उक्त आदेश जारी किया था। साथ ही हाईकोर्ट ने ये भी कहा था कि NIA ने गौतम नवलखा मामले को दिल्ली हाईकोर्ट के जुरिडिक्शन से बाहर ले जाने के लिए जल्दबाजी में काम लिया, जब उसकी जमानत याचिका पड़ी हुई थी।

जस्टिस अरुण मिश्रा, नवीन सिन्हा और इंदिरा बनर्जी की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि NIA के विरुद्ध दिल्ली हाईकोर्ट ने जो बयान दिया था, उसे रिकॉर्ड से हटाया जाए। जून 2, 2020 को ही सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर स्टे लगा दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने भीमा-कोरेगाँव हिंसा के आरोपित नक्सली गौतम नवलखा की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए ऐसा आदेश दिया। नवलखा मुंबई के तलोजा जेल में बंद है।

इस दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट का बयान आश्चर्यजनक है। उन्होंने कहा कि गौतम नवलखा के आत्मसमर्पण के समय पूरे भारत में लॉकडाउन लगा हुआ था। मेहता ने कहा कि कोर्ट से कुछ नहीं छिपाया गया है और NIA मुंबई को गौतम नवलखा को कस्टडी में लेने की ज़रूरत है क्योंकि इस मामले में उसके खिलाफ नए सबूत मिले हैं। हालाँकि, गौतम नवलखा के वकील कपिल सिब्बल दिल्ली हाईकोर्ट के बयान के समर्थन में थे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी, तब तक NIA ने इस मामले की जाँच भी नहीं शुरू की थी। यहाँ तक कि जुरिडिक्शन का मामला तो सॉलिसिटर जनरल ने भी नहीं उठाया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश कोई अच्छा परिणाम देने वाला नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने सिब्बल की अपील को नकार दिया और NIA के पक्ष में निर्देश जारी किया।

जुलाई 2019 में पुणे पुलिस ने कहा था कि गौतम नवलखा हिज्बुल मुजाहिद्दीन और कई कश्मीरी अलगाववादियों के संपर्क में था। भीमा कोरेगाँव की जाँच में यह निकल कर आया था कि पाकिस्तान के आतंकी संगठन के जरिए माओवादियों को हथियार सप्लाई करवाए गए थे। ज्ञात हो कि 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में एलगार परिषद सम्मेलन आयोजित किया था। इसमें भड़काऊ भाषण दिए गए थे जिसके अगले दिन पुणे के भीमा कोरेगाँव में हिंसा हुई थी।

देवी की प्रतिमा को पादरी ने बताया शत्रु की शक्ति, ईशु का नाम ले-लेकर लगा दी आग, FIR दर्ज

अरुणाचल प्रदेश में एक बार फिर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का मामला सामने आया है। यहाँ पूर्वी कामेंग जिले (East kameng district unit) की कुछ धार्मिक व सांस्कृतिक संस्थाओं ने मिलकर सेप्पा के पेंटेकोस्टल चर्च के पादरी ताये काडू (Taye Kadu), चतुंग सोपुंग और तली लंगड़ो समेत अन्य लोगों पर एफआईआर दर्ज करवाई है।

एफआईआर में संस्थाओं ने आरोप लगाया है कि उक्त लोगों ने उनके समुदाय के लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करते हुए सर्वोच्च देवी की प्रतीक ऐन डोनई (ane donyi) (सूर्य की माता) के चिह्न को जलाया।

इस एफआईआर में संस्थाओं ने पादरियों के इस एक्शन को पूर्ण रूप से अरुणाचल प्रदेश की धार्मिक स्वतंत्रता की धारा 3, 4 और 5 का उल्लंघन बताया। साथ ही ये भी उल्लेख किया कि यह कृत्य आईपीसी की धारा 295 A और 298 समेत सभी शांति भंग करने वाले प्रवधानों का उल्लंघन है। इसलिए वह चाहते हैं कि इस मामले में शिकायत दर्ज करके उचित कार्रवाई हो।

उल्लेखनीय है कि यह मामला संज्ञान में आने के बाद इस संबंध में ऑपइंडिया ने एफआईआर करने वाले IFCSAP EK ईकाई के अध्यक्ष ख्या सोनम से बात करने की कोशिश की। मगर उन्होंने बैठक में होने का हवाला देकर फोन रख दिया। फिर, हमने अन्य संस्था NIFCS EK यूनिक के चेयरमैन कारलिंग डोलो को संपर्क किया। लेकिन, उन्होंने भी सवालों का जवाब नहीं दिया।

इसके बाद हमने सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही वीडियोज से जानकारी जुटाई। इसमें यह स्पष्ट दिखा कि किस प्रकार ईशु के नाम पर अन्य धर्म की भावनाओं का मजाक बनाया गया।

गौरतलब है कि इस एफआईआर के अलावा सोशल मीडिया पर जो वीडियो सामने आई है। उसमें कुछ ईसाई जीसस के नाम पर ऐन डोनई के चिह्न व मूर्तियों को जलाते नजर आ रहे हैं। वीडियो में हम सुन सकते हैं कि पादरी ताये काडू कहता है कि ईशु के नाम पर हम सारे शत्रुओं की शक्तियों को कुचलते हैं। ईशु के नाम पर सारे मूर्तियों, दुष्ट प्रेत आत्माओं को जलाते हैं।

इसके बाद एक युवक सभी धार्मिक चिह्नों पर ज्वलनशील पदार्थ डालकर उन्हें आग के हवाले कर देता है। सभी लोग उसपर घास-फूस डालकर इस कृत्य में अपना सहयोग देते हैं। पादरी लगातार देवी की मूर्ति और चिह्नों को जलाते हुए कहता रहता है कि यह सभी कुछ ईश्वर के नाम पर भस्म किया जाता है।

वीडियो में ध्यान से सुनने पर पता चलता है कि जो चिह्म इस दौरान भस्म नहीं हो पाए, उन्हें भी आग में डाला गया ताकि वह भी आग की तपिश झेंलें। उनके ऊपर भी भूसा डालकर पूरी कोशिश हुई उन्हें जलाने की।

सोशल मीडिया पर इस कृत्य को सामने लाते हुए पाइ दवे नाम के यूजर ने लिखा है ऐसे ही वजहों से वे लोग अरुणाचल प्रदेश में फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट को सख्ती से लागू करने की वकालत करते हैं। लेकिन इस तरह की घटनाएँ राज्य सरकार के पक्षतापूर्ण रवैये का परिणाम हैं। सोशल मीडिया यूजर लिखते हैं कि राज्य सरकार के लिए समय आ गया है कि वे स्वदेशी संस्कृति और परंपरा के संरक्षक के रूप में दिखावटी होने के बजाय पत्र और भावना में अधिनियम के कार्यान्वयन और क्रियान्वयन पर गंभीरता से विचार करें।