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‘अगर मंदिर बना तो याद रखना… हिंदुओं को चुन-चुन कर मारूँगा’ – बच्चे ने दी धमकी, Video Viral

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में जब से हिंदू मंदिर बनने का ऐलान हुआ है तभी से यह विषय चर्चा में है। कट्टरपंथी किसी कीमत पर नहीं चाहते कि इस्लामाबाद में कोई हिंदू मंदिर बने। इसे लेकर वह तरह-तरह के हथकंडे आजमा रहे हैं।

अभी हाल में वहाँ सरकार के इस फैसले के ख़िलाफ़ फतवा जारी किया गया था। बाद में खबर आई थी कि मंदिर निर्माण कार्य रुकवा दिया गया है।

इसी बीच सोशल मीडिया पर एक पाकिस्तानी युवक की वीडियो वायरल हुई है। वीडियो में हम देख सकते हैं कि युवक अपने दो बच्चों के साथ नजर आ रहा है और इस्लामाबाद में हिंदू मंदिर बनने पर संदेश के नाम पर खुली धमकी दिलवा रहा है।

वीडियो में सबसे पहले युवक कहता है, “अस्सलाम वालेकुम! कैसे हो? खैरियत से हो? ये मेरे बेटे कुछ पैगाम देना चाहते हैं।” इसके बाद वो अपने बेटे की ओर कैमरा घुमा देता है। बेटा देखने में सिर्फ़ 4-5 साल का लगता है।

लेकिन वीडियो में तुतलाती आवाज में हिंदुओं को धमकी देते हुए कहता है, “खान साहब! अगर इस्लामाबाद में मंदिर बना तो ये याद रखना मैं उन हिंदुओं को चुन-चुनकर मारूँगा। समझ गए? अल्लाह हाफिज।”

बेटे के इस संदेश पर बहुत गर्व के साथ ‘हाँ’ भरते हुए युवक अपनी ओर कैमरा घुमाता है। साथ ही बेशर्मी के साथ कहता है, “देख लो भई आगे तुम्हारी मर्जी है।”

इस वीडियो को सोशल मीडिया पर तारेक फतेह ने भी शेयर किया है। वीडियो को साझा करते हुए उन्होंने बच्चे की बात पर पिता की आँखों में दिखने वाले गर्व की ओर लोगों को गौर करवाया है। साथ ही बच्चों के मन में हिंदुओं के प्रति ऐसी घृणा भरे जाने पर हैरानी जताई है।

इस वीडियो के वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर बहुत अलग अलग प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। एक ओर इस वीडियो को शेयर कर-करके ये सवाल किया जा रहा है कि क्या पाकिस्तानी वाकई अपने बच्चों को यही सिखाते हैं। जैसे इस वीडियो में युवक अपने बच्चों को सिखा रहा है?

तो वहीं, सकलैन शाह जैसे लोगों का इस पर कहना है, “हम पश्चिम में मुस्लिमों के साथ उचित बर्ताव की अपेक्षा करते हैं। मगर इसाइयों को पड़ोस में घर खरीदने पर मारने लगते हैं। हम बर्लिन में मस्जिद चाहते हैं। लेकिन हम हिंदुओं को इस्लामाबाद में हिंदू मंदिर नहीं दे सकते। हम केवल अज्ञानी पाखंडी हैं।”

लेकिन, सकलैन के ट्वीट पर प्रतिक्रिया देने वाले अहमद जैसे लोगों का इसी वीडियो पर यह कहना है कि वो लोग दुनिया भर में इस्लामी झंडा बुलंद करने के लिए है। न कि अपने घरों में बुत स्थापित करने के लिए।

अहमद लिखता है, “हमारी जिम्मेदारी है कि हम अल्लाह का नाम पूरे विश्व में फैलाएँ। हम पैदा हुए हैं। ताकि लोगों को मुस्लिम बनाएँ। हम अल्लाह की राह पर चलने के लिए पैदा हुए हैं।”

ऐसे ही डॉ ताहिर का मानना है कि ऐसी चीजों के लिए हर मुस्लिम पर इल्जाम लगाना ठीक नहीं है। क्योंकि राज्य में बहुत गिने-चुने ऐसे वाकये होते हैं। डॉ ताहिर के अनुसार, गैर मुस्लिम अपना धर्म मानने के लिए पूरी तरह से आजाद हैं। लेकिन इस्लामाबाद में मंदिर बनाना मुस्लिमों के मजहब की तौहीद है।

चीन पीछे हट रहा है लेकिन कॉन्ग्रेस को चैन क्यों नहीं: अजीत भारती के सवाल | Ajeet Bharti on China and Galwan valley

गलवान घाटी से भारतीय और चीनी सेना में समझौता हो गया और दोनों उस क्षेत्र से लगभग 1-2 किलोमीटर दूर जा चुके हैं। उनके बीच बात हो गई है कि वहाँ पर पूर्व स्थिति को यथास्थिति बने रहने दिया जाना चाहिए। मगर राहुल गाँधी को चैन नहीं है। वो इसको लेकर काफी बयान देते रहते हैं और जनता, खासकर कॉन्ग्रेसियों को बरगलाने की खासा कोशिश करते हैं।

वो जताते रहते हैं कि उन्हें देश की ज्यादा चिंता है, जबकि उन्हें रत्ती भर भी चिंता नहीं है। ये अपने समर्थकों को अपना दोष दूसरे पर मढ़ने के लिए भी उकसाते हैं। कॉन्ग्रेस राज में ही चीन ने भारत की जमीन पर कब्जा किया और अब चिल्ला भी वही रहे हैं। मगर अब लोग समझने लगे हैं। हमें अपनी सेना पर विश्वास रखना चाहिए और कॉन्ग्रेसियों के प्रपंच से बचना चाहिए।

पूरा वीडियो यहाँ क्लिक कर के देखें।

नींद में ही पिता-पुत्र और 2 बेटियों को धारदार हथियारों से रेता, अब तक नहीं सुलझी हत्या की गुत्थी

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में एक ही परिवार के चार लोगों की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई, वहीं परिवार के एक सदस्य की हालत गंभीर है। वारदात गुरुवार (जुलाई 2, 2020) रात तब अंजाम दिया गया जब पूरा परिवार सो रहा था।

मामला पटेलनगर के शुकुल गाँव का है। बताया जा रहा है कि यहाँ रहने वाले विमलेश पांडेय (40) अपने परिवार के साथ घर में सोए हुए थे। सुबह गाँव के लोगों को हत्या का पता चला तो पुलिस को सूचना दी। पुलिस पहुँची तो देखा कि विमलेश के पूरे परिवार की हत्या कर दी गई है।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, घर के भीतर के जो हालात थे उससे यही लग रहा था कि पांडेय के बेटे व दोनों बेटियों को तो चारपाई से उठने का भी मौका नहीं मिला। हत्यारों ने सोते समय ही धारदार हथियार से वार कर उन्हें मौत की नींद सुला दिया। पांडेय के गले के अलावा शरीर के कई अन्य हिस्सों में भी जख्म के निशान मिलने से माना जा रहा है कि जान बचाने के लिए उन्होंने हत्यारों से जमकर संघर्ष किया। घर के भीतर काफी मात्रा में खून भी बिखरा था।

मारे गए लोगों में विमलेश पांडेय, उनकी बेटी श्रेया (22), शिबू (19) और बेटा प्रिंस (18) शामिल है। वहीं विमलेश की पत्नी गंभीर रूप से घायल हैं। उनका इलाज चल रहा है।

इस हत्याकांड ने हर किसी को हैरानी में डाल दिया है। परिवार के मुखिया विमलेश पांडेय पेशे से वैद्य थे। जड़ी-बूटी बेचते थे और उसी से परिवार का पालन-पोषण करते थे। लोगों का कहना है कि परिवार की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी। ऐसे में इन हत्याओं को क्यों अंजाम दिया गया?

एडीजी जोन प्रेमप्रकाश का भी कहना है कि अब तक की जाँच में किसी रंजिश की बात सामने नहीं आई है। अलग-अलग बिंदुओं को ध्यान में रखकर जाँच पड़ताल की जा रही है जिसके लिए कई टीमें लगाई गई हैं। 

पुलिस जाँच-पड़ताल और पूछताछ के साथ ही वारदात स्थल से साक्ष्य भी जुटा रही है। पुलिस के साथ ही फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट और डॉग स्क्वायड भी जाँच में लगा हुआ है। तहकीकात की जा रही है। पुलिस अधिकारी परिवार के सदस्यों के साथ ही आसपास के ग्रामीणों से भी पूछताछ कर रही है। 

पुलिस ने बताया कि विमलेश पांडेय उनकी बेटे और दोनों बेटियों की हत्या के बाद से उनका मोबाइल गायब था। जब उस मोबाइल को सर्विलांस पर रखा गया तो वो फोन पड़ोसी होमगार्ड के घर से मिला। फोन होमगार्ड के 13 वर्षीय बेटे ने रिसीव किया था।

हालाँकि पुलिस ने जब उसके घर पर छापेमारी को तो होमगार्ड फरार था और मोबाइल भी वहाँ से बरामद नहीं हुआ। होमगार्ड के बेटे ने मोबाइल को फेंक देने की बात कही। बहरहाल पुलिस सच्चाई का पता लगाने के लिए होमगार्ड, उसकी पत्नी, बेटी व बेटे को थाने में लाकर पूछताछ कर रही है

सामूहिक हत्या की वजह फिलहाल स्पष्ट नहीं हो सकी है। पहले ये आशंका जताई जा रही थी कि ये वारदात लूट या दुष्कर्म की वजह से अंजाम दी गई। मगर पोस्टपॉर्टम रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि नहीं हुई है और घर में रखी आलमारी और बक्सों के तमाम सामान भी सुरक्षित पाए गए हैं। ऐसे में लूट या फिर दुष्कर्म के बाद हत्या की बात सच नहीं है। पुलिस ने इस मामले में अब एसटीएफ की मदद लेने का फैसला किया है। जिसके बाद हत्या की गुत्थी सुलझने की उम्मीद है।

जामिया हिंसा: सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को गृह मंत्रालय के खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री हटाने का दिया आदेश

जामिया मिलिया इस्लामिया में और उसके आसपास 15 दिसंबर, 2019 को नागरिकता संशोधन विधेयक (CAA) के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा को लेकर सोमवार (जुलाई 6,2020) को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। न्यायाधीश डीएन पटेल और प्रतीक जालान की खंडपीठ ने इससे जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई की।

याचिकाकर्ताओं ने जामिया मिलिया इस्लामिया में हुई हिंसा की स्वतंत्र जाँच के लिए कहा। कोर्ट में सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता दिल्ली पुलिस की तरफ से पेश हुए तो वहीं वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंसाल्विस याचिकाकर्ताओं के लिए उपस्थित हुए।

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलों के कुछ हिस्सों में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि याचिकाओं में कहा गया है कि गृह मंत्री ने पुलिस को छात्रों को मारने और उनकी हड्डियों को निर्दयता से तोड़ने का आदेश दिया है। दलीलों में कहा गया है कि यह एक आम राय है कि छात्रों को पीटने के लिए पुलिस को ऊपर से निर्देश दिए गए थे।

एसजी मेहता ने कहा कि बिना किसी सबूत के याचिकाकर्ता संवैधानिक अधिकारियों के खिलाफ ऐसा दावा नहीं कर सकते। उन्होंने कहा, “संवैधानिक अदालत के समक्ष इस तरह के आरोप नहीं लगाए जा सकते।” बिना किसी सबूत के जो आरोप लगाए गए हैं, उन्हें दलीलों से दूर किया जाना चाहिए। एसजी ने कहा कि इस तरह के आरोप सार्वजनिक भाषणों में अच्छे लग सकते हैं, लेकिन संवैधानिक अदालत के समक्ष दायर एक हलफनामे में नहीं।

कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता गोंसाल्विस से याचिकाओं से आपत्तिजनक सामग्री हटाने पर विचार करने को कहा। इस दौरान जब न्यायमूर्ति जालान ने एसजी मेहता से पूछा कि क्या आपत्ति का शुरुआती चरण में फैसला किया जाना था, तो उन्होंने जवाब दिया कि यह सुनवाई के स्तर पर तय किया जा सकता है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने अदालत से पूछा कि क्या याचिकाओं और जवाबी हलफनामों की एक संगठित सूची हो सकती है, जिसका समर्थन अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने किया था। अदालत ने अपने अंतिम आदेश में मुद्दों की एक समेकित सूची प्रस्तुत करने के लिए कहा। साथ ही स्पष्ट रूप से कहा कि किसी सबूत के इस्तेमाल किए गए आपत्तिजनक सामग्री को याचिका से हटा दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने जामिया हिंसा मामले में सुनवाई की अगली तारीख 13 जुलाई 2020 तय की है।

गौरतलब है कि दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ 15 दिसंबर 2019 को हुआ प्रदर्शन हिंसा में बदल गया था। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने जमिया में लाठीचार्ज किया था। उस समय आरोप लगाए गए थे कि पुलिस ने पुस्तकालय में पढ़ने वाले निहत्थे छात्रों पर हमला किया और उनके साथ मारपीट की, फर्नीचर को भी तोड़ दिया। हालाँकि बाद में सामने आए वीडियो सबूतों से पता चला कि जो दंगाई पुलिस पर पथराव कर रहे थे, वो ही छात्र बनकर लाइब्रेरी में बैठे थे।

दिल्ली पुलिस की ओर से कोर्ट में कुछ वीडियोज और तस्वीरें भी सबूत के तौर पर पेश की गई। इनके जरिए बताया गया कि छात्रों के आंदोलन की आड़ में वास्विकता में कुछ लोगों ने स्थानीय लोगों की मदद से दंगा भड़काने की कोशिश की।

क्राइम ब्रांच ने कहा था, “जामिया हिंसा कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी। बल्कि सुनियोजित घटना थी, जहाँ दंगाइयों के पास पत्थर, लाठियाँ , पेट्रोल बम, ट्यूबलाइट आदि पहले से थीं। इससे साफ होता है कि भीड़ का इरादा केवल कानून-व्यवस्था को बाधित करना था।”

असम: मौलाना खैरुल इस्लाम के जनाजे में जुटे 10,000 लोग, सोशल डिस्टेंसिंग की उड़ी धज्जियाँ, 3 गाँव सील

देश भर में कोरोना वायरस के चलते इन दिनों सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन किया जा रहा है। ऐसे में किसी के भी अंतिम संस्कार में 20 से ज्यादा लोगों को जाने की इजाजत नहीं दी जाती है। लेकिन असम के नगांव ज़िले में लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियाँ उड़ा दी।

एक मौलाना को आखिरी विदाई देने के लिए करीब 10 हजार लोग इकट्ठा हो गए। बाद में प्रशासन को मजबूरन 3 गाँवों को सील करने का फैसला करना पड़ा। इस मामले में केस भी दर्ज किया गया है।

87 वर्षीय इस्लामिक उपदेशक खैरुल इस्लाम का दो जुलाई को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था। खैरुल इस्लाम ने अखिल भारतीय जमीयत उलेमा के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य किया और इसे पूर्वोत्तर भारत में “आमिर-ए-शरीयत” माना जाता है। सोशल मीडिया पर इसकी तस्वीरें वायरल हो गई, जिसमें सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियाँ उड़ते हुए देखा जा सकता है। साथ ही किसी ने मास्क भी नहीं लगाया था।

सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीर

खैरुल इस्लाम का परिवार चाहता था कि अंतिम संस्कार तीन जुलाई को हो लेकिन बाद में उसे दो जुलाई कर दिया गया। खैरुल के बेटे अमीनुल इस्लाम नगांव जिले के धींग निर्वाचन क्षेत्र से ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के विधायक हैं और उन्होंने ही अपने पिता के अंतिम संस्कार की तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की थीं। इन तस्वीरों में भारी भीड़ दिखाई दे रही है। प्रशासन का मानना है कि अंतिम संस्कार में लगभग दस हजार लोग शामिल हुए थे।

इस बीच, Legal Rights Protection Forum नाम के एक NGO ने ट्विटर पर जानकारी दी है कि NGO ने असम के राज्यपाल को पत्र लिखकर धींग निर्वाचन क्षेत्र के विधायक अमीनुल इस्लाम के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की है।

NGO ने विधायक अमीनुल इस्लाम पर आरोप लगाया है कि उसने अपने पिता के अंतिम संस्कार के दौरान COVID-19 मानदंडों को तोड़ने के लिए मजबूर कर 10000 लोगों की जान खतरे में डाला है। बता दें कि असम में सोमवार को 735 और लोगों का कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आया। इसके बाद कुल संक्रमितों का आँकड़ा 11,736 पर पहुँच गया है।

गौरतलब है कि अमीनुल इस्लाम को 7 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया था। उन पर कोरोना वायरस महामारी से निपटने के लिए सरकार के प्रयासों को सांप्रदायिक रूप देने का आरोप लगाया गया था।

ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के विधायक ने एक वीडियो क्लिप के माध्यम से असम के लोगों को संबोधित करते हुए दावा किया था कि निजामुद्दीन मरकज से लौटने वालों में से किसी का भी कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव नहीं आया था। अमीनुल इस्लाम ने यह भी कहा था कि कोरोना वायरस के लिए आइसोलेशन वार्ड, डिटेंशन सेंटर की तरह हैं और यह सरकार की एक खास समुदाय के लोगों को मारने की साजिश है।

नहीं होगा CBDT और CBIC का विलय, PIB ने बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट को बताया निराधार

सोमवार (जुलाई 6, 2020) को प्रमुख अखबारों में से एक बिजनेस स्टैंडर्ड ने एक आर्टिकल प्रकाशित किया। इस आर्टिकल में दावा किया गया कि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) और केंद्रीय अप्रत्यक्ष एवं सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) का विलय होने जा रहा है।

इसमें लिखा गया है कि राजस्व में बढ़ती गिरावट के बीच कामकाज का खर्च सॅंभालने की चुनौती से जूझ रहे केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड एवं अप्रत्यक्ष कर बोर्ड के विलय पर चर्चा एक बार फिर शुरू हो गई है। साथ ही हरेक स्तर पर कर्मचारियों की संख्या में भारी कटौती का भी प्रस्ताव है।

बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित लेख

रिपोर्ट में दावा किया गया कि यह विचार केंद्र की खर्च कम करने की कवायद के तहत किया जा रहा है। इसमें नई भर्तियों पर रोक, सेवानिवृत्ति के नियमों में बदलाव, नौकरियों की श्रेणियों को आपस में मिलाना, राजस्व अधिकारियों को दूसरे विभागों में भेजना और कुछ कर्मचारी श्रेणियों के लिए भत्तों में कटौती करना शामिल है।

सच क्या है

हालाँकि प्रेस इनफॉर्मेशन ऑफ ब्यूरो (PIB) ने इस खबर को पूरी तरह से नकार दिया। पीआईबी ने कहा कि यह खबर तथ्यात्मक रूप से गलत है। सरकार के पास केंद्रीय राजस्व अधिनियम, 1963 के तहत बनाए गए दो बोर्डों को विलय करने का कोई प्रस्ताव नहीं है।

पीआईबी का कहना है कि यह रिपोर्ट वित्त मंत्रालय के उक्त अधिकारियों से तथ्यों के सत्यापन किए बिना प्रकाशित किया गया है। ऐसे समय में जब सरकार टैक्सपेयर्स के लिए सुविधाजनक नीति बना रही है, इस तरह की रिपोर्ट पॉलिसी डिस्ट्रैक्शन पैदा करती है।

इसके अलावा रिपोर्ट में बताया गया है, उक्त विलय कर प्रशासन सुधार आयोग (TARC) की सिफारिशों में से एक था। पीआईबी ने इस पर कहा कि TARC की रिपोर्ट की सरकार द्वारा विस्तार से जाँच की गई और इस सिफारिश को स्वीकार नहीं किया गया। TARC की सिफारिशों पर की गई कार्रवाई को राजस्व विभाग की वेबसाइट पर भी डाला गया है, जो स्पष्ट रूप से दिखाता है कि यह सिफारिश स्वीकार नहीं की गई थी।

पीआईबी की तरफ से जारी स्पष्टीकरण मेंं कहा गया है कि यह स्पष्ट है कि इस भ्रामक लेख को लिखने के लिए किसी तरह की कोई मेहनत नहीं की गई है। न तो इसके लिए सार्वजनिक डोमेन में रखे गए रिकॉर्ड की जाँच की गई और न ही इस संदर्भ में ताजा जानकारी प्राप्त करने के लिए वित्त मंत्रालय से संबंधित किसी अधिकारी से संपर्क करने की कोशिश की गई।

इसमें आगे कहा गया हा कि यह न केवल पत्रकारिता की गुणवत्ता पर खराब प्रभाव डालता है, बल्कि उचित परिश्रम की पूरी उपेक्षा को भी दर्शाता है। यदि इस तरह की असत्यापित कहानी को फ्रंट-पेज पर लीड स्टोरी के रूप में जगह दिया जाता है, तो यह सभी समाचार पढ़ने वाले लोगों के लिए एक चिंता का विषय होना चाहिए। यह समाचार आइटम पूरी तरह से निराधार और असत्यापित के रूप में खारिज कर दिया गया है।

जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी…: आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पहली जयंती

जम्मू-कश्मीर की राज्य सरकार के मुताबिक़ डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु 23 जून 1953 के दिन दिल का दौरा पड़ने की वजह से हुई थी। कोई नहीं जानता कि सच क्या है, लेकिन यही जानकारी आधिकारिक तौर पर उस दौरान दी गई जब जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे।

हमारे लिए यह जान पाना लगभग नामुमकिन है कि नेहरू जी इस मुद्दे पर सच कह रहे थे या नहीं? लेकिन हम एक बात बहुत अच्छे से जान सकते हैं कि डॉ. मुखर्जी का सपना उनके साथ ख़त्म नहीं हुआ। उनका सपना पूरे 60 साल तक हमारे दिलों में मौजूद था और पिछले साल 5 अगस्त के दिन उनका यह सपना पूरा हुआ। जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया गया और देश की अटूट इकाई के तौर पर स्थापित किया गया।  

आज उन्हीं डॉ. मुखर्जी की जयंती है और यह कई मामलों में ख़ास है। जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा हटने के बाद पहली जयंती। शायद इसी दिन के लिए डॉक्टर मुखर्जी ने कहा था 

एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे

उस दौर में हिन्दू महासभा और जनसंघ जैसे संगठन राजनीतिक दृष्टिकोण से उतने प्रभावी नहीं थे, लेकिन उनका एक सपना ज़रूर था। यह वह वक्त था जब न विरोध में प्रतिष्ठा थी न पैसा। न मीडिया के चीयरलीडर्स विरोध की आवाज को अपना कंधा देने को तत्पर थे। न कोई शाही स्वागत था न अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार। वह इस क्षेत्र में अपनी मर्ज़ी से आए थे और उनका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ त्याग था, अंतिम समय तक उन्होंने केवल यही किया।  

डॉ. मुखर्जी ने अपने सपने के लिए हर सरकार का डट कर सामना किया। इसके लिए उन्होंने श्रीनगर तक का सफ़र तय किया और वहीं बलिदान हो गए। वहीं से एक नारा भी निकल कर आया, ऐसा नारा जो दशकों तक लोगों की ज़ुबान पर रहा,

जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी, वह कश्मीर हमारा है 

पिछले साल रायपुर की एक जनसभा में गृह मंत्री अमित शाह ने लाखों लोगों की भीड़ के सामने यह नारा दोहराया था।  यहाँ तक की पूर्व विदेश मंत्री स्वर्गीय सुषमा स्वराज के अंतिम ट्वीट में इसी बात का ज़िक्र था।  

स्व. सुषमा स्वराज का अंतिम ट्वीट

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का कहना था कि मेरा लक्ष्य आपको भावुक करना नहीं है। हम सभी का अपनी देश की मिट्टी पर भरोसा होना चाहिए, एक दिन हम सभी ख़त्म हो जाएँगे।  हमारे पूर्वजों ने हमें यह ज़मीन दी है, हमें इसे आने वाली पीढ़ियों के हित में सुरक्षित रखना होगा। इस प्रजातंत्र के तले हमारा देश है, जो समय जितना ही पुराना है। भारत का प्रजातंत्र इसकी सबसे नई अभिव्यक्ति है।

यह तथ्य समझने के बाद एक बात साफ़ हो जाती है कि भारत को खोजने के लिए यहाँ से बाहर जाने वाले लोग, भारत को कभी समझ ही नहीं सकते हैं। सबसे अहम बात यही है कि हम अपने देश की ज़मीन किसी भी सूरत में किसी और के नाम नहीं कर सकते हैं।  

इस देश के लोगों का इस पर अटूट विश्वास है, यह किसी ज़िम्मेदारी से कम नहीं है कि उनके लिए जो सबसे बेहतर हो वही किया जाए। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 का हटना इस देश के हर नागरिक के लिए उठाया गया सराहनीय कदम है।    

दिल्ली हिंदू विरोधी दंगे: मीरान हैदर के घर से मिला रजिस्टर, हैंडराइटिंग जाँच के लिए भेजा फॉरेंसिक लैब

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में इस साल फरवरी में हुए हिन्दू विरोधी दंगों की जाँच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस मामले में कई चौंकाने वाले खुलासे हो रहे है। स्पेशल सेल के सूत्रों ने सोमवार (जुलाई 6, 2020) को बताया कि उन्हें जामिया कॉर्डिनेशन कमेटी के मेंबर मीरान हैदर के घर से एक रजिस्टर और ढाई लाख रुपए कैश बरामद किया गया है।

स्पेशल सेल ने मीरान हैदर के पास जो रजिस्टर बरामद किया है, उसमें साफ लिखा है कि कहाँ से कितने पैसे मिले, कहाँ कितना खर्च हुआ। बकायदा नाम के साथ सभी डिटेल हैं। रजिस्टर को हैंडराइटिंग की जाँच के लिए फॉरेंसिक साइंस लैबोरेट्री (Forensic Science Laboratory) भेजा गया है।

पुलिस के सूत्रों ने बताया कि दिल्ली हिंसा से पहले यानी जनवरी महीने में मीरान हैदर के अकाउंट में 5 लाख रुपए आए थे। ये पैसे ओमान और यूएई से आए थे।

बताया जा रहा है कि ये रजिस्टर दंगों से ठीक पहले ही बनाया गया था। इस रजिस्टर में दिल्ली दंगों के कई राज दफन हैं। इस रजिस्टर में दंगों का पूरा बही-खाता दर्ज है। पैसा कहाँ से आया और किसे-किसे दिया गया वो सब इस रजिस्टर में लिखा है।

दिल्ली दंगों की जाँच करने वाली स्पेशल सेल की टीम ने जामिया कॉर्डिनेशन समिति के सदस्य मीरान हैदर को गिरफ्तार किया था। उसे UAPA अधिनियम की धाराओं के तहत 2 मार्च को गिरफ्तार किया गया था। मीरान हैदर (35) कथित तौर पर पीएचडी छात्र है और दिल्ली में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की युवा इकाई का अध्यक्ष भी।

मीरान हैदर पर आरोप है कि मीरान हैदर ने शाहीन बाग, जामिया व अन्य जगहों पर चले विरोध-प्रदर्शन के दौरान बढ़-चढ़कर न सिर्फ हिस्सा लिया, बल्कि लोगों को उकसाया भी। मीरान के खिलाफ दंगे की साजिश रचने के अहम साक्ष्य मिले हैं। उस पर दंगों की साजिश रचने का आरोप है। 

गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस ने अदालत में पेश जाँच रिपोर्ट में कहा था कि पूर्वोत्तर दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों के लिए सऊदी अरब और देश के अलग-अलग हिस्सों से भी फंडिंग आई थी। पुलिस का कहना था कि दिल्ली में दंगे सुनियोजित साजिश और योजना के परिणामस्वरूप भड़के थे और यह अचानक नहीं था।

जामिया कॉर्डिनेशन कमेटी को जामिया के स्टूडेंट, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोशिएसन, स्टूडेंट इस्लामिक ऑर्गेनाइजेशन, मुस्लिम स्टूडेंट फोरम, जामिया स्टूडेंट फोरम जैसे कई संगठन के लोगों ने शामिल होकर बनाया था। जामिया कॉर्डिनेशन कमेटी को पीएफआई समेत कई जगहों से फंडिंग मिल रही थी। इस दंगे से भगोड़े इस्लामिक उपदेशक जाकिर नाइक के भी तार जुड़े हुए हैं। बता दें कि दंगों में 53 लोगों की मौत हुई और 200 से ज्यादा लोग घायल हुए थे।

AIIMS की चौथी फ्लोर से कूदे भास्कर पत्रकार की मौत, दोस्तों से ग्रुप में कह रहे थे – ‘मुझे बचा लो, आज कुछ कर लूँगा’

दैनिक भास्कर के पत्रकार तरुण सिसोदिया की मौत हो गई है। वे कैंसर और कोरोना से संक्रमित थे। उन्होंने दिल्ली AIIMS में चौथी मंजिल से कूद कर आत्महत्या की कोशिश की थी। बाद में इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया।

तरुण सिसोदिया के साथी पत्रकारों का कहना है कि तरुण सिसोदिया पिछले कुछ दिनों से मानसिक रूप से काफ़ी तनाव में रहते थे। तरुण दिल्ली के भजनपुरा में अपने परिवार के साथ रहते थे। साथी पत्रकारों का कहना है कि ‘दैनिक भास्कर’ ने 2 महीने पहले उनका इस्तीफा ले लिया था लेकिन बाद में उनकी नौकरी बच गई थी।

उनकी शादी लगभग 3 साल पहले ही हुई थी। उनकी दो बेटियाँ हैं, जिनमें से एक की उम्र 2 साल है और दूसरे की उम्र मात्र कुछ ही महीने है। वो भास्कर के आधिकारिक ग्रुप में भी डिप्रेशन के बारे में अपने साथियों को बताते रहते थे। उन्होंने अपनी परेशानियों से लोगों को अवगत कराते हुए उन्हें बचाने की बात कही थी।

तरुण सिसोदिया के बारे में पता चला है कि वो काफी दिनों से अपने घर पर ही थे। उनकी मानसिक हालत भी ठीक नहीं थी। कैंसर पीड़ित होने के साथ-साथ उन्हें मानसिक बीमारी भी थी। बाद में वे कोरोना वायरस से भी संक्रमित हो गए थे।

दिल्ली स्थित ‘ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज’ (AIIMS) में उनका इलाज चल रहा था। 35 साल के तरुण सिसोदिया 2017 से ही ‘दैनिक भास्कर’ में कार्यरत थे। उनके साथी पत्रकारों द्वारा उन्हें ब्रेन ट्यूमर होने की बात बताई गई है।

तरुण सिसोदिया के बारे में बता दें कि उन्होंने पिछले कुछ दिनों में कोरोना वायरस से होने वाली मौतों को लेकर ही रिपोर्टिंग की थी। उन्होंने ही बताया था कि दिल्ली सरकार कह रही है कि अब तक 982 मौत कोरोना से हुई है, जबकि 1500 से ज्यादा डेडबॉडी का अंतिम संस्कार श्मशान और कब्रिस्तानों में हो चुका है। उन्होंने प्राइवेट अस्पतालों के खिलाफ भी सोशल मीडिया में कुछ ट्वीट्स का समर्थन किया था।

‘दैनिक भास्कर’ के पत्रकार तरुण सिसोदिया के साथियों ने बताया कि वो काफी मिलनसार व्यक्ति हैं और सबसे हँस-बोल कर मिलते थे। इससे पहले वो ‘संडे टाइम्स’ में कार्यरत थे। ‘दैनिक भास्कर’ में उन्हें सामान्यतः MCD और एजुकेशन से जुड़ी बीट कवर करनी होती थी। वो अपने सोशल मीडिया हैंडल पर भी खबरें डालते रहते थे।

उनका एक स्क्रीनशॉट भी हमें मिला है, जिसमें वो अपनी जान खतरे में होने की बात करते हुए पुलिस से बात कराने को कह रहे थे और साथ ही उन्हें ‘बचाने’ की भी गुहार लगा रहे थे। साथ ही AIIMS की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करते हुए उन्होंने ग्रुप में बताया था कि डॉक्टर किसी को कोई भी इंजेक्शन दे रहे हैं। वहाँ जिस तरह से मरीजों को ट्रीट किया जा रहा था, उससे वो नाराज़ थे।

इस स्क्रीनशॉट से साफ पता चलता है कि वो मानसिक पीड़ा से गुजर रहे थे। जिस तरह से संस्थान ने उनका इस्तीफा ले लिया था या उनके साथ काम कर रहे लोगों को निकाला, उसका उनकी दिमागी हालत पर क्या असर पड़ा था- ये भी जाँच का विषय है। इससे ये भी प्रतीत होता है कि कोरोना संक्रमितों के मेन्टल काउंसलिंग की भी व्यवस्था होनी चाहिए।

उधर हैदराबाद से भी एक ऐसी ही दुःखद ख़बर आई, जहाँ 34 साल के एक व्यक्ति ने हुसैन सागर झील में कूद कर आत्महत्या कर ली क्योंकि उसे डर था कि वो कोरोना वायरस से संक्रमित हो गया है। उसका इलाज एक प्राइवेट क्लिनिक में चल रहा था। इससे पहले भी ऐसी घटनाएँ हुई हैं।

भारत के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में सावरकर-बोस सिद्धांत को अमल में लाने का वक्त आया

एक राष्ट्र की नियति में एक समय ऐसा आता है जब उसे परम सत्य को स्वीकार करना चाहिए, चाहे वह कितना भी कड़वा क्यों न हो। संभव है यह स्वीकारोक्ति हमारे भविष्य को सुरक्षित करने में कारगर हो। दूसरे शब्दों में, कोई भी राष्ट्र अपनी पिछली गलतियों का सामना किए बिना आगे नहीं बढ़ सकता। जो राष्ट्र अपनी भूलों से सबक लेने में विफल होते हैं, वे इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिए जाते हैं।

ऐसे समय जब चीन के बार-बार पीठ पर वार करने, जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान के लगातार आतंकी हमले और एक आंतरिक सुरक्षा स्थिति, जिसमें पैन-इस्लामिक और कम्युनिस्टों की संयुक्त कार्रवाई भारत-राष्ट्र को अस्थिर कर रही है, तब क्या भारत के लिए अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टि में गियर बदलने का समय आ चुका है? शायद हाँ!

भारत 1962 से भ्रामक ड्रैगन की प्रकृति से अवगत है। यह मानना पड़ेगा कि प्रधानमंत्री मोदी के आने के बाद भारत ने चीन को रोकने के काफी प्रयास किए, और एक हद तक भारत को चीन के समक्ष एक समान भागीदार के रूप में स्थापित भी किया। इसके साथ ही भारत ने गलवान घाटी में शालीनता के साथ अपना दृढ व्यवहार प्रस्तुत किया।

मोदी ने जापान और वियतनाम जैसी चीन विरोधी शक्तियों से दोस्ती करने, म्यांमार जैसी चीन समर्थक शक्तियों को भारत समर्थक बनाने और दक्षिण चीन सागर में चीनी आक्रमण का विरोध करने के साथ ही कोविड महामारी से संबंधित मुद्दों पर चीन विरोधी रुख अपनाने का बड़ा काम भी किया है। कोई भी इस बात से इंकार नहीं कर सकता है कि 3400 किलोमीटर लंबी भारत-चीन सीमा पर सैन्य और नागरिक बुनियादी ढाँचे के निर्माण की विशाल-योजना चीनी घुसपैठ के लिए उकसावे में से एक थी।

हमें यह भी स्वीकारना होगा, खासकर गलवान घाटी की घटना के बाद दलाईलामा को चीन के बारे में बोलने से रोकने की नीति हमारी रणनीतिक कमजोरी साबित हुई है। जब संयुक्त राष्ट्र द्वारा मौलाना मसूद अजहर को आतंकवादी निरुपित करने का चीन विरोध कर रहा था, तब हमें शिनजियांग में उइगरों और तिब्बत के साथ-साथ चीनी अत्याचारों को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं करके भारत ने बड़ी गलती की।

राष्ट्रीय सुरक्षा भूलों की श्रृंखला

आइए राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में इतिहास पर नजर दौडाते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर जवाहरलाल नेहरू की गलतियाँ 1962 के भारत-चीन युद्ध में भारी पड़ीं। नेहरू के पंचशील सिद्धांत, जिसके कारण भारत को भारी कीमत चुकानी पड़ी। वह गाँधी की अहिंसा और नेहरू की कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति प्रेम का मिश्रण था। 1954 में जब नेहरू पंचशील सिद्धांत लेकर आए तब भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के महान दूरदर्शी वीर सावरकर ने चेतावनी दी थी।

सावरकर ने कहा था कि चीन द्वारा तिब्बत को हड़पने के बाद अगर नेहरू पंचशील जैसी लुभावनी बातें चीन के साथ करते हैं तो जमीन हड़पने की चीनी भूख को बढ़ावा मिलेगा और उनको थोड़ा भी अचम्भा नहीं होगा अगर चीन भविष्य में भारत की भूमि हड़पने का प्रयत्न करे। यह भविष्यवाणीभविष्वाणी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक गुरु गोलवरकर ने भी की थी। दोनों की भविष्यवाणी 8 साल बाद 1962 में सच सिद्ध हुई, जब चीन ने आक्रमण कर भारत की बहुत बड़ी भूमि पर कब्जा कर भारत को मध्य-एशिया से अलग-थलग कर दिया।

इसके अतिरिक्त भी भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर गाँधीवाद की काली छाया के कई उदाहरण हैं। 1978 के आसपास गाँधीवादी विचारधारा के प्रभाव में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई जैसे ईमानदार नेता ने तत्कालीन पाकिस्तान के तानाशाह जनरल जियाउल हक के समक्ष यह आत्मघाती खुलासा किया कि भारत का पाकिस्तान में जासूसी नेटवर्क था और भारत को पाकिस्तान के कहुटा परमाणु रिएक्टर की जानकारी थी।

इसके बाद जनरल जियाउल हक ने पाकिस्तान में भारत की गुप्चार व्यवस्थाओं को नष्ट कर दिया, जिसे भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने अपने कार्यकाल के दौरान स्थापित किया था। जियाउल हक ने भारत के जासूसों को मरवा दिया, जबकि कुछ अन्य भागने में सफल रहे। दिलचस्प बात यह है कि श्रीमती इंदिरा गाँधी के मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टिकोण और एक सशक्त प्रधानमंत्री के रूप में मोदी के आगमन के बावजूद, भारतीय सुरक्षा नीति गाँधीवादी छाया से मुक्त नहीं हो सकी है।

1971 के युद्ध में पाकिस्तान को दो टुकड़ों में तोड़ने के बाद भी हम पीओके के मुद्दे को सुलझाने में नाकाम रहे, जब भारत के पास पाकिस्तान के 93,000 जवान बंदी थे और तो और भारत ने 1971 के युद्ध में जीते हुए सिंध प्रांत को भी शिमला करार में वापस कर दिया। इससे पहले लाल बहादुर शास्त्री ने भी ताशकंद समझौते के तहत 1965 के युद्ध में जीते हुए पाक क्षेत्रों को वापस दे दिया था।

आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर भी भारत ने गाँधी-नीति के प्रभाव में कई गलतियाँ की हैं, विशेषकर इस्लामिक कट्टरपंथी अति वहाबी तत्वों से निपटने में। उदाहरण के तौर पर 2014 में मोदी सरकार आने के बाद भारत ने तबलीगी जमात के 10 हजार विदेशी प्रचारकों को भारत में आने और वहाबी प्रचार करने की अनुमति दी। यह सब इसके बावजूद हुआ, जबकि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र को इस बात की पूरी जानकारी थी कि तबलीगी जमात विश्व का सबसे बड़ा वहाबी आन्दोलन है, जो दुनिया के 150 से अधिक देशों में फैला हुआ है और इस्लामिक उम्मा (विश्व इस्लामिक भाईचारे) का प्रचार करता है, जो राष्ट्रवाद के विचार के विरुद्ध है। यह स्थिति एक राष्ट्रवादी सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टिकोण में कमी का प्रमाण है।

याद रहे कि मोदी और शाह ने इस्लामिक कट्टरपंथियों की योजनाओं पर एक के बाद एक अनेक प्रहार किए। पहले आसाम और उत्तर प्रदेश के चुनाव जीते, जहाँ इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा यह माना जाता था कि भाजपा ये दोनों प्रदेश कभी भी जीत नहीं पाएगी। फिर इन दोनों ने जम्मू-कश्मीर को धारा-370 से मुक्त किया। कट्टरपंथियों को तीसरा बड़ा झटका तब लगा जब मोदी सरकार ने राम-मंदिर मुद्दे को न्यायायिक समाधान देने में अहम् भूमिका निभाई। इसके बाद ही शाहीन बाग का षड्यंत्र, जो मोदी और शाह को घेरने की एक चाल थी, इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा रचा गया।

राम मंदिर की 500 साल पुरानी समस्या का समाधान और धारा 370 को हटाना राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर मोदी सरकार की प्रतिबद्धता का प्रमाण था। यह आज की राजनीतिक परिस्थितियों की दृष्टि से अकल्पनीय था। इन निर्णयों ने मोदी और शाह को भारतीय इतिहास के स्वर्णाक्षरों में दर्ज कर दिया है। सावरकर-बोस दृष्टि के अभाव के कारण भाजपा सरकार ने शाहीन बाग़ मुद्दे को बहुत हल्के तरीके से लिया।

जहाँ नरमपंथियों को साथ रखते हुए कट्टरपंथी और अतिवादी मजहबी लोगों को शाहीन बाग मुद्दे पर घेरा जा सकता था, वहाँ भाजपा ने दिल्ली चुनाव को दो मजहबों का मुद्दा बना कर जीतने का प्रयास किया। इसके कारण नरमपंथी और कट्टरपंथी दोनों एकजुट हो गए। यह सावरकर-बोस के राष्ट्रीय सुरक्षा-सिद्धांत के पूर्णत: विरुद्ध था।

हालाँकि, राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर भारत पिछले कई दशकों की तुलना में कहीं बेहतर स्थिति में है, लेकिन यह तथ्य पिछली सरकारों की तरह बना हुआ है कि मोदी सरकार भी पाकिस्तान या चीन पर भारत के खिलाफ अपराधों के लिए पर्याप्त नुकसान निर्धारित करने में विफल रही है। शत्रु देशों से हुई नुकसान की भरपाई कराने के मामले में इजरायल का उदाहरण सटीक है।

भले ही भारत ने पुलवामा हादसे का पाकिस्तान से बदला लिया हो, लेकिन सब प्रयासों के बावजूद पाकिस्तान आतंकी देश घोषित नहीं हो सका है। जम्मू-कश्मीर में पाक प्रायोजित आतंकी हमले जारी हैं। स्पष्ट रूप से, भारत की सुरक्षा दृष्टि में कुछ गड़बड़ है और आंतरिक और बाहरी दोनों तरह से इसे ठीक करने की तत्काल आवश्यकता है।

गाँधीजी की विचारधारा: राष्ट्रीय सुरक्षा में अवरोध

आखिर भारत को कमजोर सुरक्षा नीति से बाहर निकलने का रास्ता क्या है? यह स्पष्ट है कि गाँधीजी के योगदान ने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत को बहुत अधिक श्रेय दिलाया है। राष्ट्रीय मंच पर उनके समाज सेवा के मॉडल और स्वदेशी, ग्राम स्वराज की उनकी दृष्टि जो गाँवों को आत्मनिर्भर बनाने की बात करती है, दलितोद्धार और स्वच्छता का उनका प्रयास आज भी अनुकरणीय है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सम्पूर्ण अहिंसा और हिंदुओं की कीमत पर मजहबी एकता की उनकी विचारधारा ने जिन्नावादियों को विभाजन के लिए प्रेरित किया।

इतना ही नहीं, बल्कि गाँधीवाद के इर्द-गिर्द बुने गए विभिन्न नारों के नाम पर स्वतंत्र भारत में पैन-इस्लामिक तत्वों ने अपने स्वयं के एजेंडे को आगे बढ़ाया। यही कारण है कि शाहीन बाग सहित पूरे भारत में और यहाँ तक कि विदेशों में शाहीनबाग़ के नाम पर हुए हर प्रदर्शन में पहली तस्वीर महात्मा गाँधी की होती थी। इसलिए यह स्पष्ट है कि मजहबी एकता का गाँधी मॉडल बहुसंख्यक समुदाय को ब्लैकमेल करने का एक औजार ही है।

गाँधीजी की संपूर्ण अहिंसा की विचारधारा पर ईमानदार बहस की जरूरत

बहुत से लोग यह नहीं जानते कि गाँधीजी ने भी एक बार सुझाव दिया था कि स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भारत को सेना को खत्म कर देना चाहिए और केवल पुलिस पर भरोसा रखना चाहिए। 1925 में यह कह कर उन्होंने कई लोगों को चौंका दिया कि गुरु गोविंद सिंह, महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी दिग्भ्रमित देशभक्त थे।

जब द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी लन्दन के ऊपर बमबारी कर रहा था, तब गाँधी ने कहा था कि उन्हें खून-खराबा देखकर आत्महत्या करने का मन हो रहा है और बाद में उन्होंने इंग्लैंड को अपने बचाव के लिए नैतिक बल पर भरोसा करने की सलाह दी, बजाए सैन्य शक्ति के। उनके इन अकल्पनीय सुझावों से ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल बहुत बुरी तरह चिढ़ गए थे।

स्पष्टत: गाँधी का शांतिवाद हमें चीन जैसे दुश्मन देशों की दुष्टता को देखने से रोकता है। उरी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट जैसे दुर्लभ मामलों को छोड़कर, हमने शायद ही कभी जैसे को तैसा कार्रवाई की विचारधारा का पालन किया है। यह गाँधीवादी विरासत का प्रत्यक्ष परिणाम है।

यदि चीन हमारे क्षेत्र पर कब्जा कर सकता है तो उसके सीमावर्ती कुछ अन्य स्थानों पर हम क्यों नहीं कर सकते हैं! यह उल्लेखनीय है कि कूटनीति और सुरक्षा-व्यवस्था में नए प्रतिमान स्थापित करने वाले मोदी जैसे दूरदर्शी व्यक्ति की दृष्टि को भी गाँधीवाद भ्रमित करता है।

जब हमें चुनौती दी जाती है तो हम उपदेशों के साथ शुरू करते हैं, जैसे-भारत कभी भी आक्रमण नहीं करता, लेकिन जब कोई आक्रमण के लिए बाध्य करता है तब भारत इसे बर्दाश्त भी नहीं करता। यह स्थिति आत्म-संशय का प्रमाण है।

एक तरफ जहाँ अमेरिका ने कुख्यात आतंकी ओसामा बिन लादेन से 11,000 किलोमीटर दूर जाकर ट्विन टावर त्रासदी में मारे गए 3,000 लोगों का बदला लिया, वहीं इसके ठीक विपरीत हाफिज सईद और मौलाना मसूद अजहर, जिन्होंने 1995 के बाद से हजारों भारतीयों को मौत के घाट उतार दिया, भारतीय सीमा से मात्र 150 किलोमीटर दूर बैठे होने के बावजूद हम उन्हें ख़त्म करने में असमर्थ हैं। क्या यह ओसामा के खिलाफ अमेरिका की प्रतिक्रिया के ठीक विपरीत नहीं है?

अत: सबसे पहले गाँधीजी की विचारधारा पर एक ईमानदार बहस होनी चाहिए, जो राष्ट्र के लिए उनके योगदान की सराहना करते हुए यह प्रमाणित करे कि उनकी विचारधारा ने भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को कितनी क्षति पहुँचाई है। इसके बाद भारतीय स्वतंत्रता अभियान के महानायक और हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा-दृष्टि के पुरोधा वीर सावरकर और आजाद हिन्द फ़ौज के प्रणेता सुभाषचंद्र बोस को भारत के सुरक्षा प्रतीक के रूप में प्रस्थापित करना चाहिए।

कोई पूछ सकता है कि सावरकर और बोस राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रतीक पुरुष क्यों?

पहले सावरकर के विचारों और दृष्टि का विश्लेषण करें। सावरकर वह अद्वितीय व्यक्ति हैं, जिन्होंने पाकिस्तान के जन्म से कई साल पहले भारत के विभाजन की भविष्यवाणी कर दी थी कि कॉन्ग्रेस की तुष्टिकरण की नीतियाँ मुस्लिम लीग का चारा बन जाएँगी और जिसका आख़िरी मुकाम होगा भारत का विभाजन।

सन 1937 से सावरकर ने कई बार कॉन्ग्रेस को अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के खिलाफ चेतावनी दी थी, लेकिन उनके विचारों को एक सांप्रदायिकतावादी के रूप में करार दिया गया। हालाँकि उन्होंने कभी भी खास मजहब के अधिकारों की कीमत पर हिंदुओं के लिए विशेष व्यवहार की माँग नहीं की। दस साल बाद उनकी बात सच साबित हुई जब पाकिस्तान का जन्म हुआ और कॉन्ग्रेसी नेता जो कह रहे थे कि पाकिस्तान का निर्माण हमारी लाशों पर होगा, गलत साबित हुए।

सावरकर भारत की सुरक्षा के एक महान दूरदर्शी थे। उन्होंने 1940 में असम की समस्या (असम की मुस्लिम आबादी तब सिर्फ 10% थी, आज यह 35% है) की भविष्यवाणी और 1962 के भारत-चीन युद्ध की भविष्यवाणी आठ साल पहले कर दी थी। 1954 में उन्होंने नेहरू को चेतावनी दी थी कि पंचशील का उनका सिद्धांत चीन के कुत्सित मंसूबों को बढ़ावा देगा और अगर निकट भविष्य में वह हमला कर भारत की भूमि को हड़प लेता है तो उन्हें आश्चर्य नहीं होगा।

पाकिस्तान पर भी उनकी चेतावनी सटीक थी। उन्होंने कहा कि जब तक धार्मिक कट्टरता पर आधारित एक राष्ट्र भारत का पड़ोसी रहेगा, तब तक भारत शांति से नहीं रह पाएगा। यह आज तक सही प्रतीत होता रहा है। दिलचस्प बात यह है कि सावरकर ने पहली बार द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र रणनीति की वकालत की थी।

उन्होंने स्वतंत्रता से पहले और बाद में भारतीयों के सैन्यीकरण की बात की थी। उन्होंने भारत को महाशक्ति बनाने के लिए परमाणु बम की भी बात की थी, लेकिन किसी ने सावरकर के विचारों को पैन-इस्लामिक और कम्युनिस्ट विचारों के सामने प्राथमिकता नहीं दी।

भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टि में सावरकर का योगदान अंतहीन है और इस लेख के दायरे से परे भी। उदाहरण के तौर पर उन्होंने आजादी के तुरंत बाद जवाहरलाल नेहरू सरकार को सलाह दी थी कि अरब सागर को ‘सिंधु सागर’ कहना चाहिए, लेकिन नेहरू सहमत नहीं हुए। सावरकर जीवनी के लेखक धनंजय कीर के अनुसार, 1940 में सावरकर ने सुभाषचन्द्र बोस को यह सलाह दी थी कि विश्व मंच पर दुश्मन के दुश्मन देश को हमारे मित्र के रूप में देखा जाना चाहिए।

इसी से प्रेरित होकर सुभाषचंद्र बोस ने इटली, जापान और जर्मनी जैसे इंग्लैण्ड विरोधी शक्तियों के साथ एक समझौता करते हुए आज़ाद हिंद फौज का गठन किया। इस फ़ौज में उन भारतीय सैनिकों को शामिल किया गया था जो द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटिश शासन की ओर से लड़ते हुए इटली और कुछ अन्य मित्र देशों द्वारा पकड़ लिए गए थे।

आजाद हिन्द फ़ौज ने ब्रिटिश शासन से हिंदुस्तान को मुक्त कराने के उद्देश्य से अंग्रेजी हुकूमत पर हमला किया था। हालाँकि आजाद हिन्द फ़ौज नाकाम रही, लेकिन उसने भारत को स्वतंत्र करने के लिए ब्रिटेन पर भारी दबाव पैदा किया। एक अर्थ में बोस ने सावरकर की दृष्टि को लागू किया। 1947 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री के रूप में भारत को स्वतंत्रता देने वाले क्लेमेंट एटली ने 1956 में अपनी भारत यात्रा के दौरान (जब वह ब्रिटिश पीएम नहीं थे) कुछ चौंकाने वाले खुलासे किए।

पश्चिम बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल पीवी चक्रवर्ती के साथ उनकी बातचीत और उनकी टिप्पणियाँ भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को देखने के तरीके में पूरी तरह से बदलाव के लिए मजबूर करती हैं। एटली ने चक्रवर्ती से कहा, “आजाद हिन्द फ़ौज द्वारा बनाया गया दबाव, द्वितीय विश्वयुद्ध से लौटने वाले भारतीय सैनिकों की ओर से ब्रिटिश शासन को स्वीकार करने की अनिच्छा और अंततः 1946 में मुंबई डॉक पर नौसेना के सैनिक विद्रोह ने ब्रिटेन पर दबाव बनाने में एक बड़ी भूमिका निभाई।”

चक्रवर्ती द्वारा पूछे गए एक विशेष सवाल पर एटली ने कहा कि भारत की आजादी के लिए ब्रिटेन पर दबाव बनाने में कॉन्ग्रेस और महात्मा गाँधी की भूमिका ’न्यूनतम’ थी। इस पूरी बात का उल्लेख महान इतिहासकार आरसी मजूमदार ने अपनी पुस्तक ”बंगाल का इतिहास” में विस्तार से किया है।

इसलिए, भारत के लिए वह समय आ गया है कि वह सावरकर और बोस को अपना राष्ट्रीय सुरक्षा प्रतीक-पुरुष के रूप में घोषित करे। सामाजिक-आर्थिक विकास और आत्मनिर्भरता के गाँधी विचारों पर भले ही अमल किया जाए, लेकिन सुरक्षा-सिद्धांत के मामले में गाँधी-विचारों को भारत अस्वीकृत करता यह घोषणा भी होनी चाहिए। इस विषय पर सावरकर-बोस सिद्धांत ही उपयुक्त और मान्य हो।

गौरतलब है कि समुदाय विशेष के प्रति रवैए को लेकर सावरकर और बोस के बीच कुछ मतभेद थे, लेकिन ज्यादातर राष्ट्रीय सुरक्षा विषयों पर दोनों एकमत थे। पर हमें इस बात को भी स्वीकार करना होगा कि हिन्दू-मुस्लिम विषयों पर सावरकर ने जो भी भविष्यवाणियाँ आज से 80-90 वर्ष पहले की थी वे सभी सच साबित हुई हैं।

इन प्रयासों का क्या असर होगा?

इन प्रयासों से गाँधीजी के नाम का दुरुपयोग बंद हो जाएगा। पैन-इस्लामिक तत्वों द्वारा गाँधी का नाम राष्ट्र को ब्लैकमेल करने के लिए लिया जाता रहा है। यह प्रयास भारत के मुस्लिम समुदाय के उस हिस्से को ठीक से परिभाषित करने में सक्षम करेगा जो नरमपंथी है और पैन-इस्लामिक अभियान का हिस्सा नहीं है तथा भारत की मुख्यधारा में बने रहना चाहता है।

समुदाय विशेष के समावेशी लोगों की संख्या भारत में काफी है, लेकिन सावरकर-बोस आधारित राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के अभाव में भारत उन्हें अंगीकृत करने में असमर्थ है।

हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा के मैदान से गाँधी के अति मानवतावाद वाली विचारधारा को हटाकर भारत दुनिया के ताकतवर देशों को उपयुक्त सन्देश देने में समर्थ होगा, विशेषकर चीन और पाकिस्तान जैसे दुष्ट प्रतिद्वन्दी देशों को। पूरी दुनिया को पता चलेगा कि चुनौती देने पर भारत से क्या उम्मीद रखनी चाहिए।

भारत की भ्रमित राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टि को स्पष्ट करना और सही दिशा देना बहुत बड़ी राष्ट्रीय सेवा होगी। मेरे विचारों के विपरीत, आरएसएस और भाजपा के कुछ नेता मानते है कि गाँधी की विचारधारा को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वर्तमान शासक (मोदी सरकार) पहले से ही राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में सावरकर-बोस सिद्धांतों का अनुकरण कर रही है और उसके प्रमाण हैं- बालाकोट हमला, सर्जिकल स्ट्राइक और अनुच्छेद 370, लेकिन इस तर्क में दोष है।

वर्तमान परिस्थितियों और समय की माँग है कि सुरक्षा के मोर्चे पर सिर्फ सरकार का ही नहीं, बल्कि देशवासियों का नजरिया स्पष्ट हो। जाहिर है, राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर दृष्टि और सिद्धांत बदलने का समय आ गया है और आज के शासक भी अगर ये कहते हैं कि उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि गाँधी के विचारों से पूरी तरह मुक्त है तो वे गलत कह रहे हैं।

इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि हमारी सरकार ने बीते 6 वर्षों में 10 हजार तबलीगी जमात के विदेशी वहाबी प्रचारकों को भारत में आने और प्रचार करने की अनुमति दी। हालाँकि 30 मार्च, 2020 के बाद हुए तबलीगी जमात के कोरोना कांड के बाद सरकार ने इन विदेशी प्रचारकों को प्रतिबंधित कर दिया है।

यह स्पष्ट है कि आज के भारतीय जहाज के तल में एक बड़ा छेद है जिसे हमें दुरुस्त करने की आवश्यकता है। अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो यह जहाज सागर में डूब सकता है।

(लेखक उदय माहूरकर इंडिया टुडे ग्रुप में डिप्टी एडिटर हैं)