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अलग-अलग लोगों से सेक्स करती दारूबाज लड़की… अनुराग कश्यप के पैसे से बनी ‘बैड गर्ल’, ब्राह्मणों को दिखाया नीचा: नेटीजन्स ने पूछा- क्या अपनी जाति/परिवार को इस तरह दिखा सकोगे?

तमिल फ़िल्म ‘बैड गर्ल’ के हाल ही में रिलीज की गए टीज़र ने विवाद खड़ा कर दिया है। लोगों ने आरोप लगाया है कि इस फ़िल्म में ब्राह्मण समुदाय को गलत तरीके से प्रदर्शित किया गया है। फ़िल्म की डायरेक्टर वर्षा भरत ने किया है और इसके प्रोड्यूसर वेत्री मारन और अनुराग कश्यप ने किया है।

फिल्म को 31 जनवरी, 2025 को रॉटरडैम में होने वाले अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में सबसे पहले दिखाया जाएगा। इसके टीजर से सामने आया है कि फिल्म के निर्माता एक ब्राह्मण लड़की को दिखाना चाहते हैं जो समाज और परिवार से विद्रोह करती है। वह अपने तरीके से जीवन जीना चाहती है, इसके लिए वह अपने माता-पिता की भी बात नहीं मानती।

उसको अलग-अलग लोगों से संबंध बनाते और शराब पीते हुए भी दिखाया गया है। इस फिल्म के टीजर को कई लोग अब निशाने पर ले रहे हैं। फिल्म डायरेक्टर मोहन ने भी इसकी आलोचना की। उन्होंने अनुराग कश्यप समेत बाकी लोगों को निशाने पर लिया।

उन्होंने लिखा, “ऐसे लोगों के लिए हमेशा से ही किसी ब्राम्हण लड़की के निजी जीवन को दिखाना बोल्ड रहा है…आखिर वेत्रिमारन, अनुराग कश्यप और कंपनी से और क्या उम्मीद की जा सकती है। ब्राह्मण माता-पिता को लगातार निशाना लिया जाना पुराना काम है… आप लोग अपनी जाति की लड़कियों के साथ ऐसा करके देखें और पहले अपने परिवार को दिखाएँ।”

मोहन जी के अलावा कई अन्य नेटिज़न्स ने ब्राह्मण समुदाय को नकारात्मक रूप में दिखाने पर फिल्म निर्माताओं की आलोचना की। एक यूजर ने लिखा, “पुरुषों के खिलाफ लगातार स्टीरियोटाइप को बढ़ावा देना मजाक है! वाह?”

एक और यूजर ने कहा कि फिल्म में ‘जहरीले फेमिनिज्म’ को दिखाया गया है। उसने कहा कि इस फिल्म में पारिवारिक मूल्यों के खिलाफ भी बात की गई है और स्कूल जाने वाली लड़कियों को पुरुषों के लिए ऑब्जेक्ट के रूप में दिखाया गया है। यूजर ने यह भी कहा कि फिल्म ने पुरुषों के खिलाफ हिंसा को उकसाया है।

इस बीच, दक्षिणी फिल्मों के एक्टर विजय सेतुपति, डायरेक्टर पा रंजीत और धनुष जैसे कई अन्य लोगों ने फिल्म का समर्थन किया। डायरेक्टर रंजीत ने बोल्ड गर्ल को एक ‘बोल्ड’ और ‘फ्रेश’ फिल्म बताया। उन्होंने कहा कि यह फिल्म महिलाओं के संघर्ष को दिखाती है। एक्टर धनुष ने भी इस टीज़र को शेयर किया।

इससे पहले डायरेक्टर वर्षा ने टीज़र लॉन्च के दौरान महिलाओं के बारे में ऐसी बातें कहीं, जिससे लोग आक्रोशित हुए। वर्षा ने दावा किया कि वह महिलाओं का ऐसा किरदार नहीं गढ़ना चाहतीं थी जिसमे उन्हें फूल जैसा कोमल दिखाया गया हो।

फिल्म को लगातार इस बात के लिए निशाने पर लिया जा रहा है क्योंकि इसमें ब्राह्मण समुदाय को पिछड़ा और रूढ़िवादी भी दिखाया गया है। इस फिल्म में दावा है कि ब्राह्मण परिवारों में महिलाओं को माता-पिता या बड़ों के कहने के महिलाओं को चलना पड़ता है और उनकी निजी इच्छा का सम्मान नहीं होता।

फेक न्यूज फैलाने वाले ‘रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ का नॉन प्रॉफिट दर्जा वापस, भारत में गरीबी पर फैलाया था झूठ: कार्रवाई होते ही रोने लगा जॉर्ज सोरोस के पैसों पर पलने वाले पत्रकारों का गैंग

मोदी सरकार ने भारत को लेकर लगातार झूठी खबरें फैलाने वाले कथित पत्रकारों के एक समूह ‘रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ को दी गई रियायतें छीन ली है। मोदी सरकार ने इसका नॉन प्रॉफिट दर्जा वापस ले लिया है। रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने भारत को लेकर लगातार कई झूठी खबरें फैलाई थी। इसको जॉर्ज सोरोस से पैसा आता था।

रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने मंगलवार (28 जनवरी, 2025) को यह जानकारी दी। उसने ट्विटर पर लिख कर बताया कि मोदी सरकार ने उससे नॉन प्रॉफिट ट्रस्ट का दर्जा वापस ले लिया है। कुछ दिन पहले उसने एक झूठी रिपोर्ट में दावा किया था कि केंद्र सरकार भारत में गरीबी की दर के डाटा में गड़बड़ी कर उसे कम करके बता रही है।

रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने बताया कि वह जुलाई 2021 से ‘नॉन प्रॉफिट ट्रस्ट’ के रूप में मौजूद था। रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने आरोप लगाया कि सरकार ने अब इसका यह छीन लिया जो सही नहीं है। इसने कहा कि पत्रकारिता से किसी को मुनाफा नहीं होता, ऐसे में इसका नॉन प्रॉफिट दर्जा हटाया जाना ठीक नहीं है।

रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने दावा किया कि उसका नॉन प्रॉफिट दर्जा रद्द किए जाने से अब वह अपना पत्रकारिता का काम करने में कठिनाई आएगी। सोरोस के दान के पैसे से चलने वाले रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने आरोप लगाया कि इससे उनकी क्षमता को गहरा धक्का लगेगा। उसने कहा कि मोदी सरकार के फैसले के खिलाफ कानूनी कदम उठाएगा।

झूठ फैलाता रहा है रिपोर्टर्स कलेक्टिव

रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने 18 दिसंबर, 2024 को एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि मोदी सरकार ने भारत में गरीबी में कमी दिखाने के लिए गरीबी सूचकांक में हेराफेरी की है। इसमें दावा किया गया कि 10 साल में 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने की सरकार की रिपोर्ट झूठी थी क्योंकि सरकार ने वैश्विक सूचकांक में दो महत्वपूर्ण पैरामीटर जोड़ दिए थे।

रिपोर्ट में कहा गया था कि अच्छे नतीजे दिखाने के लिए मोदी सरकार ने खुद का ही एक इंडेक्स बनाया क्योंकि वैश्विक एजेंसियाँ सच्चाई दिखा देती। आरोप था कि खुद के बनाए सूचकांक में अपने हिसाब से डाटा में गड़बड़ी की गई। हालाँकि, रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने अपनी इस रिपोर्ट में यह दावा किस आधार पर किया, इस संबंध में कोई सबूत नहीं दिए।

गौरतलब है कि दुनिया में गरीबी के विषय में बताने वाले ग्लोबल मल्टीडायमेंशनल पावर्टी इंडेक्स को OPHI और UNDP ने विकसित किया था। मोदी सरकार ने भारत में गरीबी का सही आँकड़ा मापने के लिए नीति आयोग के माध्यम से एक गरीबी सूचकांक बनाया था।

रिपोर्टर्स कलेक्टिव की रिपोर्ट में खुद उल्लेख किया गया है कि नीति आयोग ने सूचकांक विकसित करने के लिए OPHI और UNDP के साथ साझेदारी की थी। आश्चर्य की बात यह है कि भारत के डाटा पर वैश्विक एजेंसियाँ सहमत हैं लेकिन रिपोर्ट्स कलेक्टिव वाले यह बात नहीं मानते।

अमेरिका के डीप स्टेट से है कनेक्शन

रिपोर्टर्स कलेक्टिव को कहाँ से खाद-पानी मिल रहा है, यह भी देखने वाला है। एक बार नजर डालने पर पता चलता है कि इसे भी उन्हीं भारत विरोधी संस्थानो से पैसा मिलता है, जो बाकी संस्थाओं और NGO को फंडिंग देते रहे हैं। भारत में रिपोर्टर्स कलेक्टिव को नेशनल फ़ाउंडेशन फ़ॉर इंडिया नाम का एक FCRA लाइसेंस वाला NGO चलाता है।

नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया को फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन, जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फ़ाउंडेशन, ओमिडयार नेटवर्क और रॉकफ़ेलर फ़ाउंडेशन सहित अन्य संगठनों से फ़ंड मिलता है। ये सभी संगठन अमेरिकी डीप स्टेट नेटवर्क का हिस्सा हैं और उन्होंने कई भारत विरोधी अभियानों को पैसा दिया है।

रिपोर्टर्स कलेक्टिव अमेरिकी डीप स्टेट का हिस्सा है। दिसंबर, 2024 में इसके द्वारा प्रकाशित फर्जी खबरें जॉर्ज सोरोस और उसके ओपन सोसाइटी फाउंडेशन द्वारा द्वारा भारत में अपना राजनीतिक एजेंडा चलाने की पहल का भी एक हिस्सा है।

मौनी अमावस्या पर 10 करोड़ श्रद्धालु प्रयागराज में जुटे, स्नान के लिए संगम घाट जाने की होड़ से मची अफरातफरी: बोले CM योगी- नियंत्रण में हैं हालात, अफवाहों पर न दें ध्यान

प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ में बुधवार (29 जनवरी 2025) को अफरा-तफरी में कुछ लोगों के मौत की बात कही जा रही है। हालाँकि, आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं हुई है। वहीं, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस घटना पर दुख जताया है और घायल हुए लोगों को जल्द स्वस्थ होने की कामना की है। उन्होंने बताया इनमें से कुछ लोग गंभीर रूप से घायल हैं, जिनका इलाज कराया जा रहा है।

सीएम योगी ने कहा, “प्रयागराज महाकुंभ में श्रद्धालुजनों की भारी भीड़ है। लगभग 8-10 करोड़ श्रद्धालु इस समय प्रयागराज में मौजूद हैं। कल भी 5.5 करोड़ श्रद्धालुजनों ने महाकुंभ का स्नान किया था। ये भारी दबाव श्रद्धालुजनों और उनके संगम नोज पर जाने के कारण बना हुआ है, लेकिन पूरा प्रशासन वहाँ मौके पर पूरी मुस्तैदी के साथ मौजूद है।”

घटना को लेकर उन्होंने बताया, “रात्रि को 1 बजे से 2 बजे के बीच में अखाड़ा मार्ग पर अमृत स्नान के लिए बैरिकेड लगाए गए थे। वहाँ बैरिकेड्स को फाँदकर आने में कुछ श्रद्धालु गंभीर रूप से घायल हुए हैं। उन्हें तत्काल हॉस्पिटल में पहुँचाकर उनके उपचार आदि की व्यवस्था की गई है। प्रशासन मौनी अमावस्या के मुहूर्त प्रारंभ होने के बाद से ही श्रद्धालुओं को कुशल स्नान कराने में लगा हुआ है।”

सीएम योगी ने बताया, “श्रद्धालुओं के कुशलक्षेम के लिए माननीय प्रधानमंत्री श्री मोदी जी सुबह से चार बार फोन किया है। माननीय गृहमंत्री श्री अमित शाह जी, माननीय राष्ट्रीय अध्यक्ष भाजपा श्री जेपी नड्डा जी और प्रदेश की माननीय राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल जी ने भी फोन करके सबकी कुशलक्षेम और सबके सकुशल स्नान कराने के बारे में जानकारी ली। यहाँ प्रमुख सचिव और डीजीपी के साथ-साथ वरिष्ठ अधिकारियों की उच्चस्तरीय बैठक हो रही है।”

हालात को सामान्य बताते हुए CM ने कहा, “प्रयागराज में हालात नियंत्रण में हैं, लेकिन भीड़ का दबाव बहुत बना हुआ है। अखाड़ा परिषद से जुड़े हुए पदाधिकारियों के साथ मैंने स्वयं भी बातचीत की है। आचार्य महामंडलेश्वरों और संतों से भी मेरी बातचीत हुई है। संतों ने बहुत विनम्रता के साथ कहा है कि पहले श्रद्धालु जन स्नान करेंगे और उनका दबाव जब कम होगा और वे वहाँ से निकल जाएँगे, तब हम लोग संगम की तरफ स्नान करने के लिए जाएँगे।”

उन्होंने देश के कोने-कोने से आए लोगों और संतों से किसी अफवाह पर ध्यान नहीं देने की अपील है। सीएम योगी ने कहा, “संयम से काम लें। यह आयोजन लोगों का है। प्रशासन उनकी सेवा के लिए पूरी तत्परता के साथ लगा हुआ है। प्रदेश और केंद्र सरकार वहाँ पर हर तरह का सहयोग करने के लिए वहाँ पर तत्पर है। जो व्यक्ति अफवाह फैलाने की कोशिश करेगा, उससे नुकसान हो सकता है।”

उन्होंने कहा, “लगभग 15 से 20 किलोमीटर के दायरे में अस्थायी घाट बनाए गए हैं। जो जहाँ पर है, वो कहीं भी स्नान कर सकता है। आवश्यक नहीं है कि संगम नोज की तरफ ही आएँ। सब गंगाजी के ही घाट हैं। वहाँ भी उन्हें वही पुण्य प्राप्त होगा। स्नान का महत्व है। सभी लोगों को प्रशासन के निर्देश का पालन करना चाहिए। इससे सभी लोग सकुशल स्नान कर सकेंगे। मेरी सबसे अपील है कि शासन और प्रशासन को इसमें मदद करें।”

अब खोज-खोज कर ढेर किए जाएँगे आतंकी, जम्मू में सेना-पुलिस-सुरक्षाबल का ज्वाइंट ऑपरेशन शुरू: रडार पर 50 दहशतगर्द, कश्मीर में पहले ही टूट चुकी है आतंक की कमर

जम्मू कश्मीर में कश्मीर क्षेत्र से आतंकियों के लगभग सफाए के बाद सेना ने जम्मू इलाके में फोकस किया है। जम्मू में बीते कुछ समय में हुए बड़े हमलों के बाद अब आतंकियों को पूरी तरह से खत्म करने के लिए कई जगह पर बड़े ऑपरेशन एक साथ लॉन्च कर दिए हैं। इस क्षेत्र में पाकिस्तानी आतंकी पिछले कुछ समय से घुसपैठ कर रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सेना ने यह कार्रवाई जनवरी महीने में चालू कर दी है और इसके लिए 15 दिनों के अंदर 2 दर्जन से बड़े ऑपरेशन लॉन्च किए हैं। यह ऑपरेशन सेना, जम्मू कश्मीर पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षाबलों के साथ मिलकर कर रही है। सेना ने आतंकियों को खोज कर मार गिराने का प्लान बनाया है।

सबसे अधिक फोकस किश्तवाड़, डोडा और रामबन जैसे क्षेत्रों में है। इसके अलावा सीमा पर स्थित इलाके पूंछ, राजौरी और कठुआ में ऑपरेशन भी चालू हैं। यहाँ 10 से अधिक ऑपरेशन चल रहे हैं। आतंकी एक जगह से दूसरी जगह भाग ना सकें, इसके लिए घेरा भी लगाया गया है। उधमपुर, जम्मू और रियासी जैसे इलाकों में भी ऑपरेशन चल रहे हैं।

यह सारे इलाके पीर पंजाल पहाड़ी क्षेत्र में आते हैं। सेना का यह अभियान ‘खोजो और मारो’ रणनीति के तहत चल रहा है। सेना खोजी कुत्ते, ड्रोन और पैरा कमांडो के साथ ही स्थानीय इंटेलिजेंस की मदद भी ले रही है। बताया जा रहा है कि इस इलाके में 40-50 आतंकी मौजूद है।

इस इलाके में बीते दिनों में में कई बड़े हमले हुए हैं। पाकिस्तान से आए आतंकियों ने यहाँ सेना की यूनिट्स को निशाना बनाया है, जो काफिले में नहीं थी। उन्होंने वायुसेना की भी गाड़ियों पर भी हमला हुआ है। 2021 के बाद से आतंकी हमलों में 44 आम लोग और 18 सुरक्षाबलों के जवान मारे गए थे। इन हमलों में 13 आतंकी भी मार गिराए गए हैं।

हमले का इलाका पहले पुंछ और राजौरी तक सीमित था। लेकिन बाद में यह रियासी जैसे इलाके तक फ़ैल गए। ऐसे ही एक हमले में श्रद्धालुओं की बस को भी आतंकियों ने निशाना बनाया था। इसमें 10 हिन्दू मारे गए थे। अक्टूबर में आर्मी के एक काफिले पर हमला हुआ था। इसे 2 जवान मारे गए थे।

जम्मू इलाके में चल रहे इन ऑपरेशन को सेना आने वाले दिनों में और भी बढ़ाएगी। इससे पहले कश्मीर क्षेत्र में सेना को बड़ी सफलताएँ हासिल हो चुकी हैं। 2024 सुरक्षाबलों के लिए सबसे कम नुकसान वाला साल रहा है। 2024 में सुरक्षाबलों के 26 जवान ही कश्मीर में मारे गए। कुछ वर्षों पहले तक यह संख्या 100 पार रहती थी।

दूसरे मर्द से अवैध संबंध, पैदा हुआ बच्चा भी उसी का… लेकिन बाप होगा महिला का पति ही: सुप्रीम कोर्ट ने पितृत्व निर्धारण के लिए DNA टेस्ट का आदेश से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (28 जनवरी) को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि वैध विवाह के दौरान पैदा हुए बच्चे को उन माता-पिता की वैध संतान माना जाएगा, जो गर्भधारण के समय साथ थे। कोर्ट ने कहा कि जब एक महिला-पुरुष का विवाह होता है और वे एक-दूसरे के संपर्क में होते हैं तो पुरुष को महिला से पैदा हुए बच्चे का कानूनी पिता माना जाएगा, भले ही वह दावा करे कि बच्चा किसी अन्य पुरुष से पैदा हुआ है।

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 में ऐसी वैधता की परिकल्पना की गई है। जो व्यक्ति अवैधता का दावा करता है, उसे पति-पत्नी के बीच एक-दूसरे तक पहुँच नहीं (संबंध नहीं बनाने के संबंध में) होने की बात साबित करनी होगी। कोर्ट ने माना कि वैधता और पितृत्व एक दूसरे से जुड़े हैं, क्योंकि बच्चे की वैधता सीधे पितृत्व को स्थापित करती है।

कोर्ट का कहना है कि जब वैधता मानने के लिए साक्ष्य मौजूद हों तो न्यायालय पितृत्व निर्धारित करने के लिए डीएनए परीक्षण का आदेश नहीं दे सकता, क्योंकि इससे उस व्यक्ति (जो कथित रूप से प्रेमी है) की गोपनीयता का उल्लंघन होगा, जिसे पत्नी ने कथित रूप से अपने बेटे का पिता बताया है। अदालत ने कहा कि कथित प्रेमी को इस तरह के डीएनए परीक्षण के लिए मजबूर करना उसकी निजता और गरिमा का उल्लंघन होगा।

कोर्ट ने कहा, “जबरन डीएनए परीक्षण करवाने से व्यक्ति के निजी जीवन पर प्रभाव पड़ सकता है। जब मामला बेवफाई का हो तो इसका प्रभाव और प्रतिकूल होगा। यह व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ उसके सामाजिक और पेशेवर जीवन को प्रभावित कर सकता है। इस कारण से उसे अपनी गरिमा और गोपनीयता की रक्षा का कुछ अधिकार है, जिसमें डीएनए परीक्षण करवाने से इनकार भी शामिल है।”

दरअसल, यह मामला केरल के एक दंपत्ति से जुड़ा है। विभिन्न कोर्ट से होते हुए यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। सुप्रीम कोर्ट में अपील उस व्यक्ति द्वारा दायर की गई थी, जिस पर बच्चे के पिता होने का आरोप था। बच्चे की माँ ने दावा किया था कि अपीलकर्ता ने उस समय बच्चे को जन्म दिया था, जब वह किसी अन्य व्यक्ति से विवाहित थी।

साल 2001 में जब बच्चे का जन्म हुआ था, तब महिला की शादी किसी अन्य व्यक्ति से हो चुकी थी। बच्चे की माँ ने दावा किया था कि बच्चा अपीलकर्ता का है। बाद में उसने 2006 में अपने पति से तलाक ले लिया और कोचीन नगर निगम से संपर्क करके अपीलकर्ता का नाम बच्चे के पिता के रूप में दर्ज करने का अनुरोध किया। उसने तर्क दिया कि वह उस अपीलकर्ता के साथ अवैध संबंधों में थी। हालाँकि, अधिकारियों ने इससे इनकार कर दिया।

इसके बाद महिला ने साल 2007 में मुंसिफ कोर्ट में एक मुकदमा दायर किया और यह घोषित करने की माँग की गई कि अपीलकर्ता ही बच्चे का असली पिता है। इस याचिका को मुंसिफ कोर्ट ने खारिज कर दिया। इसके बाद महिला केरल हाई कोर्ट पहुँची। साल 2011 में केरल हाई कोर्ट ने भी इस याचिका को खारिज कर दिया। दोनों अदालतों ने कहा कि महिला और उसके पति के बीच प्रासंगिक समय पर एक वैध विवाह था।

दोनों अदालतों ने डीएनए परीक्षण का आदेश देने से भी इनकार कर दिया। इसके बाद साल 2015 में बेटे ने अपीलकर्ता से भरण-पोषण का दावा करते हुए पारिवारिक कोर्ट का रुख किया। इसमें दावा किया कि वह उसका जैविक पिता है। फैमिली कोर्ट ने फैसला सुनाया कि मुंसिफ कोर्ट के पास पहले के मुकदमे पर विचार करने का अधिकार नहीं है और उसका आदेश पारिवारिक न्यायालय को बाध्य नहीं करेगा।

पारिवारिक अदालत ने आगे कहा कि भरण-पोषण के लिए आवेदन वैधता के बारे में नहीं, बल्कि पितृत्व के बारे में है। इसलिए मुंसिफ अदालत और केरल हाई कोर्ट के पूर्व के आदेश पारिवारिक अदालत को डीएनए परीक्षण के माध्यम से पितृत्व का निर्धारण करने से नहीं रोकेंगे। केरल हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा।

केरल हाई कोर्ट कहा कि बच्चे के अपने जैविक पिता से भरण-पोषण प्राप्त करने का अधिकार है। इसके परिणामस्वरूप उस व्यक्ति ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की है, जिस पर कथित रूप से बच्चे का पिता होने का आरोप है। न्यायालय ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने इसने यह भी माना कि प्रतिवादी को अपनी मां के पूर्व पति का वैध पुत्र माना जाता है।

प्रयागराज महाकुंभ में हादसा, मौनी अमावस्या पर भगदड़ में कई घायल: प्रशासन की अपील – ‘जिस घाट पर हैं, वहीं करें गंगा स्नान, संगम की ओर ना बढ़ें’

प्रयागराज के महाकुंभ में मौनी अमावस्या पर भगदड़ जैसी स्थिति बन गई। बुधवार (29 जनवरी, 2025) को सुबह लगभग 1 बजे हुई भगदड़ में कई श्रद्धालु घायल हो गए। कुछ मौतों की भी आशंका है। घायलों को अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। मामले की मॉनिटरिंग खुद सीएम योगी कर रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भगदड़ ठीक संगम नोज पर हुई। यहाँ किसी अफवाह के चलते लोग इधर-उधर भागे, इसके चलते भगदड़ मची और कुछ महिलाएँ जमीन पर गिरीं। इनको कुचलते हुए लोग आगे बढ़ गए। इसी में कई लोग घायल हुए। भगदड़ के बाद तुरंत NSG समेत बाकी सुरक्षाबलों ने मोर्चा संभाला और लोगों को मौके पर से हटाया।

मौके पर 50 से अधिक एम्बुलेंस भेज कर घायल श्रद्धालुओं को अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। एक एम्बुलेंस में कथित तौर पर आग लगने की बात भी सामने आई है। दैनिक भास्कर के अनुसार, 14 लोगों की मौत हुई है। दैनिक जागरण ने मौतों का आँकड़ा 17 बताया है। इस विषय में अभी स्पष्ट आधिकारिक आँकड़ा सामने नहीं आया है।

प्रशासन ने कोई भी अपुष्ट जानकारी ना साझा करने की अपील की है। हादसे के बाद संगम में श्रद्धालुओं के आने पर रोक लगाई गई है। प्रयागराज में भी लोगों की एंट्री रोक दी गई है। लोगों से अपील की गई है कि वह जिस घाट पर हैं, वहीं गंगा स्नान कर लें और संगम की तरफ ना बढ़ें। घटना के बाद मौनी अमावस्या के स्नान को सभी अखाड़ों ने स्थगित कर दिया है।

अखाड़ों ने कहा है कि वह स्थिति सामान्य होने के बाद स्नान के विषय में विचार करेंगे। प्रशासन भीड़ कम करके अखाड़ों के स्नान को सम्पन्न करवाने की कोशिश में है। महाकुंभ में हुए इस हादसे को लेकर पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बात की है।

केंद्र सरकार ने यूपी सरकार को पूरे सहयोग का आश्वासन दिया है। प्रयागराज शहर में सुरक्षा में लगाए गए जवान मेला क्षेत्र में डायवर्ट किए गए हैं। प्रशासन को अनुमान है कि पूरे दिन में लगभग 8 करोड़ श्रद्धालु स्नान करेंगे। हालाँकि, वर्तमान में स्थिति सामान्य है और प्रशासन लोगों को स्नान के बाद निकाल रहा है।

हिंदुओं के श्मशान में दफन नहीं होगा ईसाई, मुर्दाघर में पड़ा पादरी का शव जाएगा कब्रिस्तान: राय थी जुदा फिर भी सुप्रीम कोर्ट के जजों ने बड़ी बेंच को नहीं भेजा केस, जानिए क्यों

छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक ईसाई का अंतिम संस्कार हिन्दुओं के श्मशान में करने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच बंट गई। जस्टिस नागरत्ना ने जहाँ मृतक के बेटे को इस बात की अनुमति ना दिए जाने को संविधान के खिलाफ बताया तो वहीं जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने सरकार के फैसले को सही करार दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (27 जनवरी, 2025) को इस संबंध में दायर याचिका पर फैसला सुनाया। दो जजों की बेंच ने इस मामले में बंटी हुई राय दी। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने ईसाई व्यक्ति को उसके गाँव से लगभग 20 किलोमीटर दूर एक ईसाई कब्रिस्तान में दफनाए जाने का आदेश दिया।

बेंच बंटने के बावजूद यह फैसला बड़ी बेंच के पास नहीं भेजा गया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि अलग-अलग कोर्ट में मामला लंबित होने के चलते पिछले 20 दिन से पादरी की मृत देह मोर्चरी में रखी हुई थी। कोर्ट ने कहा है कि राज्य को ईसाई पादरी के अंतिम संस्कार के लिए व्यवस्था भी करे।

जस्टिस नागरत्ना ने क्या कहा?

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि गाँव के श्मशान में पादरी को दफनाने की अनुमति से मना करने से ग्राम पंचायत ने अपनी ड्यूटी सही तरीके से नहीं निभाई। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर उसने अपना काम ढंग से किया होता तो मामला 24 घंटे के भीतर सुलझ जाता। जस्टिस नागरत्ना ने गाँव के श्मशान में ईसाई के अंतिम संस्कार की अनुमति ना देने को संविधान का उल्लंघन बताया।

उन्होंने ASP बस्तर के हलफनामे को धार्मिक स्वतंत्रता की बात करने वाले अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन बताया है। ASP बस्तर ने कहा था कि ईसाइयत में धर्मांतरित हुए व्यक्ति को गाँव के श्मशान में नहीं दफनाया जा सकता। जस्टिस नागरत्ना ने पूछा कि आखिर ASP किस आधार पर यह बात कह दी।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “स्थानीय अधिकारियों की ओर से, चाहे वे गाँव स्तर पर हों या ऊँचे स्तर पर, इस तरह का रवैया सेक्युलरिज्म के सिद्धांतों और हमारे देश की गौरवशाली परंपराओं के साथ विश्वासघात का संकेत है, जो ‘सर्व धर्म समन्वय/सर्व धर्म समभाव’ में विश्वास करता है, जो सेक्युलरिज्म का सार है।

जस्टिस नागरत्ना ने अपने फैसले में कहा कि मृतक को उसकी कृषि भूमि पर दफनाने की अनुमति दी जाए। इससे पहले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया था कि यदि मृतक को उसकी जमीन में दफनाया जाता है तो वह पवित्र श्रेणी में आ जाएगी और इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।

उन्होंने यह भी आदेश दिया कि छत्तीसगढ़ 2 महीने के भीतर ईसाइयों के लिए कब्रिस्तानों की व्यवस्था राज्य भर में करे। जस्टिस नागरत्ना का फैसला हालाँकि, प्रभावी नहीं हुआ क्योंकि दोनों ने बाद में मृतक ईसाई को पास के ईसाई कब्रिस्तान में दफनाने का आदेश दिया।

जस्टिस शर्मा क्या बोले?

जस्टिस सतीश चन्द्र शर्मा ने इस मामले में जस्टिस नागरत्ना के फैसले से असहमति जताई। उन्होंने कहा, “इस मामले में छत्तीसगढ़ राज्य ने हमें बताया है कि 20-25 किलोमीटर दूर ही ईसाइयों के लिए कब्रिस्तान है जो कि 20-25 किलोमीटर दूर करकापाल गाँव में स्थित है। ऐसे में मुझे नहीं लगता कि आखिर याचिकाकर्ता को किसी एक ही स्थान पर उसके पिता को दफनाने की अनुमति क्यों मिलनी चाहिए।”

जस्टिस शर्मा ने कहा कि किसी का धार्मिक अधिकार इतना नहीं हो सकता कि वह मनपसंद जगह अंतिम संस्कार के लिए चुने। उन्होंने कहा कि ऐसे में मामलों में कानून व्यवस्था का भी ख्याल रखा जाना चाहिए और प्रशासन ने यही किया है। उन्होंने कहा कि प्रशासन द्वारा उठाए गए कदम सही हैं। उन्होंने निर्देश दिया कि मृतक का अंतिम संस्कार 20 किलोमीटर दूर ईसाइयों के कब्रिस्तान में किया जाए, जिसके लिए प्रशासन व्यवस्थाएँ उपलब्ध करवाए।

क्या था मामला?

छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के रहने वाले रमेश बघेल के पिता सुभाष बघेल की मौत 7 जनवरी, 2025 को हो गई थी। रमेश बघेल एक ईसाई है और उसके दादा हिन्दुओं की महरा जाति से ईसाई बन गए थे। मृतक सुभाष बघेल एक ईसाई पादरी भी रहा था।

सुभाष बघेल की मौत के बाद बेटे रमेश बघेल ने गाँव के श्मशान में उसका ईसाई रीति रिवाज से अंतिम संस्कार करना चाहा था। यहाँ रहने वाले हिन्दुओं और बाकी समुदाय ने इसका कड़ा विरोध किया। हिन्दुओं ने रमेश बघेल से कहा कि वह अपने पिता का अंतिम संस्कार 20 किलोमीटर दूर एक ईसाई श्मशान में करें।

मामले में घटनास्थल पर पहुँची पुलिस ने भी रमेश बघेल से कहा कि वह बिना विवाद के ईसाइयों के श्मशान में अपने पिता का अंतिम संस्कार कर दें। हालाँकि, रमेश बघेल इस बात पर अड़ गया कि उसे इस जनजातीय श्मशान में ही अपने पिता का अंतिम संस्कार करना है।

वह इस मामले में याचिका लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट पहुँच गया। उसने माँग की कि हाई कोर्ट पुलिस और प्रशासन को आदेश दे कि वह इसी जनजातीय श्मशान में अंतिम संस्कार करवाएँ। हाई कोर्ट ने उसको यह राहत नहीं दी थी जिसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया था।

PM मोदी ने पकड़ी ‘कोल्डप्ले’ की धुन, इन्फ्रा डेवलपमेंट से ‘कन्सर्ट इकोनॉमी’ होगी रॉक ऑन: कहा- भारत की तरफ आकर्षित हो रहे हैं दुनिया के बड़े आर्टिस्ट

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राज्यों और निजी सेक्टर से अपील की है कि वह बड़े कॉन्सर्ट आयोजित करने के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करें। उन्होंने हाल ही में मुंबई और अहमदाबाद में आयोजित बड़े कॉन्सर्ट की तारीफ़ की है। पीएम मोदी ने यह बातें ओडिशा में आयोजित एक कार्यक्रम में कही है।

पीएम मोदी ने उत्कर्ष ओडिशा कॉन्क्लेव में कहा, “जिस देश में म्यूजिक, डांस और स्टोरीटेलिंग की इतनी समृद्ध विरासत और युवाओं का इतना बड़ा पूल है, यह कॉन्सर्ट का बहुत बड़ा ग्राहक है। यहाँ कॉन्सर्ट इकॉनमी की बहुत संभावनाएँ हैं। पिछले 10 वर्षों लाइव इवेंट और चलन और माँग तेजी से बढ़ी है।

पीएम मोदी ने इसके बाद मुंबई और अहमदाबाद में हाल ही में आयोजित कोल्डप्ले बैंड के कॉन्सर्ट का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, “पिछले कुछ दिनों में आपने मुंबई और अहमदाबाद में हुए कोल्डप्ले कॉन्सर्ट की शानदार तस्वीरें देखी होंगी। ये इस बात का प्रमाण है कि लाइव कॉन्सर्ट के लिए भारत में कितना स्कोप है।”

उन्होंने आगे कहा, “दुनिया के बड़े-बड़े आर्टिस्ट भारत की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। कॉन्सर्ट इकॉनमी से रोजगार भी पैदा होता है और टूरिज्म भी बढ़ता है। मेरा राज्यों और निजी क्षेत्र से आग्रह है कि वह कॉन्सर्ट इकॉनमी के लिए जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर फोकस करें।”

पीएम मोदी ने कहा कि इवेंट मैनेजमेंट, सिक्युरिटी और आर्टिस्ट की ग्रूमिंग आदि में कई संभावनाएँ बन रही हैं। पीएम मोदी ने बोलते हुए WAVES समिट की चर्चा भी की। इसका आयोजन गोवा में फरवरी, 2025 में होगी।

गौरतलब है कि कोल्डप्ले एक ब्रिटिश रॉकबैंड है जिसके रविवार (27 जनवरी, 2025) को अहमदाबाद में हुए कॉन्सर्ट में 1.34 लाख लोग शामिल हुए थे। यह 21वीं शताब्दी में किसी भी कॉन्सर्ट की भीड़ का रिकॉर्ड है। अहमदाबाद की व्यवस्थाओं को सोशल मीडिया पर काफी तारीफ़ भी मिली थी। मुंबई कॉन्सर्ट में भी बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए थे।

6 गाँव में 0, 1 गाँव में केवल 1 हिंदू परिवार… पाकिस्तान की सीमा से लगे इलाके हो रहे हिंदू विहीन, PM मोदी को सामाजिक संगठनों ने लिखा पत्र: रिपोर्ट में बताया- कई जमीनों पर मुस्लिमों का कब्जा

पाकिस्तान सीमा से लगे गुजरात के गाँवों में जनसांख्यिकी तेजी से बदल रही है। कच्छ के रण में बसे गाँव हिन्दुओं से खाली हो रहे हैं। इन गाँवों में मुस्लिम परिवार लगातार रह रहे हैं। कई गाँव ऐसे हैं, जहाँ एक भी हिन्दू अब नहीं रहता। तमाम गाँवों से हिन्दू तेजी से पलायन कर रहे हैं। इससे सुरक्षा चिंताएँ भी पैदा हो गई हैं।

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात के कच्छ जिले में पाकिस्तान सीमा से मात्र कुछ ही किलोमीटर दूर स्थित 6 गाँव हिन्दूविहीन हो चुके हैं। यह बात इन गाँवों की वोटर लिस्ट से भी सामने आई है। 17 गाँव ऐसे हैं, जहाँ हिन्दू आबादी बहुत कम हो चुकी हैं। भास्कर ने यह रिपोर्ट 23 गाँव में की है।

रिपोर्ट के अनुसार, कच्छ में मोटा दिनारा गाँव में मात्र 1 ही हिन्दू परिवार अब रहता है। यहाँ पहले 30 हिन्दू परिवार रहा करते थे लेकिन धीमे-धीमे सारे ही पलायन कर चुके हैं। यह सारे परिवार एक 500 साल पुराने मंदिर के पास रहा करते थे। यह परिवार यहाँ से पलायन करके आसपास के उन गाँवों में गए हैं जहाँ पर मूलभूत सुविधाएँ अच्छी हैं।

यह परिवार तब वापस आते हैं मंदिर में कोई बड़ा कार्यक्रम होता है। इनमें से तमाम हिन्दू 2001 में आए भूकम्प के बाद विस्थापित हुए थे। उन्हें इस गाँव से दूर घर बनाकर दिया गया था। वह वहीं अब अपने जीवन की गुजर बसर करते हैं। जो घर इस भूकम्प में टूटे थे, उनकी भी कई लोगों ने कोई मरम्मत नहीं करवाई।

यहीं के शेह गाँव में मात्र 8 हिन्दू वोटर हैं। जबकि यहाँ मुस्लिम वोटर 152 हैं। यहाँ से अच्छी अस्पताल और स्कूल सुविधाएँ दूर हैं, इसके चलते परिवार बाहर गए हैं। अच्छा अस्पताल भी भुज में हैं। भुज यहाँ से 150 किलोमीटर दूर है। ऐसे में लोग पलायन को मजबूर हैं।

रिपोर्ट बताती है कि सुठारी गाँव में हिन्दुओं की आबादी कुछ वर्ष पहले तक 2500 हुआ करती थी, यह घट कर अब 1000 के आसपास आ चुकी है। गाँव से जहाँ हिन्दू बाहर गए हैं तो वहीं कुछ मुस्लिम बाहर से आकर बसने लगे हैं। लखपत और कनेर जैसे गाँवों से लोग सूरत और मुंबई काम करने जाने लगे हैं।

यहाँ के हिन्दू संगठन लगातार पलायन का मुद्दा उठा रहे हैं। हिन्दू संगठन इन इलाकों में ड्रग तस्करी और देशविरोधी गतिविधियाँ होते रहने का आरोप लगाते रहे हैं। कुछ लोगों का आरोप है कि मुस्लिमों ने गाँवों में सरकारी समेत तमाम जमीन भी कब्जाई है। इस संबंध में पीएम मोदी को पत्र भी लिखा जा चुका है।

हिन्दू संगठनों की माँग है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और यहाँ की जनसांख्यिकी को देखते हुए पलायन रोका जाना चाहिए।

क्या बला है चीन का DeepSeek, अमेरिकी बाजार में क्यों मची तबाही: अरुणाचल, लद्दाख और दलाई लामा पर नहीं देता जवाब, कहता है- करें किसी और मुद्दे पर बात

चीन के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्लेटफ़ॉर्म DeepSeek के चलते अमेरिकी बाजारों में तबाही आई है। AI के चलते हजारों करोड़ बनाने वाली कम्पनियों के शेयर DeepSeek के आने के चलते गोता लगा रहे हैं। बाकी AI मॉडल्स की तरह DeepSeek भी लोगों के सवालों के जवाब देता है। लेकिन इस पर भी चीन ने एक तगड़ा कंट्रोल लगाया है। DeepSeek उन सवालों के जवाब नहीं देता है, जिन को चीन लगातार दबाता आया है। तिआनमेन नरसंहार से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक यह खामोशी साध लेता है।

क्या है DeepSeek?

DeepSeek एक चीनी कम्पनी है। यह AI के क्षेत्र में काम करती है। DeepSeek ने भी OpenAI और Perplexity AI जैसी कम्पनियों की तरह ही अपना AI मॉडल तैयार किया है। यह कम्पनी लियांग वेंगफेंग ने बनाई है। DeepSeek ने अपना नया मॉडल R1 भी हाल ही में लॉन्च किया है।

इसका कहना है कि जो जवाब OpenAI बिना कुछ सोचे हुए देती है, वही जवाब DeepSeek AI पहले सोचती और उस पर अपनी तर्कक्षमता लगा कर देती है। DeepSeek ने हाल ही में अपना एप और चैटबॉट लॉन्च किया है। यह तेजी से पॉपुलर हो रहा है।

अमेरिकी बाजारों में DeepSeek से क्यों मचा कोहराम?

अमेरिका समेत दुनिया भर के टेक्नोलॉजी से सम्बन्धित शेयर बीते DeepSeek के चलते गोता लगा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा असर सेमीकंडक्टर बनाने वाली कम्पनी Nvidia पर पड़ा है। यह सेमीकंडक्टर AI मॉडल बनाने के लिए लगते हैं। इसके चलते Nvidia की मार्केट वैल्यू 593 बिलियन डॉलर (₹4.8 लाख करोड़) गिर चुकी है।

इसके अलावा माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी बड़ी कम्पनियों के शेयर भी गिरे। इसके पीछे निवेशकों का इन कम्पनियों में डिगा हुआ भरोसा है। निवेशकों को लगता है कि अब Nvidia की उतनी हैसियत नहीं रह जाएगी। दावा है कि DeepSeek में लगाई जाने वाली लागत भी OpenAI और बाकी कम्पनियों से कहीं कम है।

DeepSeek पर विवाद क्यों?

DeepSeek AI लॉन्च होने और जनता के बीच पॉपुलर होने के साथ ही विवादों में भी घिर गई है। जहाँ बाकी AI मॉडल उन सभी प्रश्नों का जवाब देते हैं, जिनके विषय में जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध है तो वहीं DeepSeek कुछ विषयों में जानकारी नहीं देता या फिर जवाब देकर गायब कर देता है। यह अधिकांश विषय ऐसे हैं जिन पर चीन भी नहीं बोलता या फिर कतराता है।

DeepSeek में चीन के दखल का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह अरुणाचल प्रदेश तक के विषय में नहीं बताता। जहाँ यह विश्व के बाकी हिस्सों की विशेषताएँ, वहाँ कैसे पहुँचे और बाकी जानकारी कुछ सेकंड के भीतर दे देता है, वहीं अरुणाचल प्रदेश के विषय में पूछने पर यह जवाब देता है, “सॉरी, यह मरे स्कोप से बाहर है। किसी और विषय पर बात करते हैं।”

यही जवाबा DeepSeek का लद्दाख पर है। गौरतलब है कि अरुणाचल को चीन अपना हिस्सा बताता है और अपने नक़्शे में शामिल कर इस पर दावा ठोंकता रहता है। इसी तरह DeepSeek चीन की भारत में घुसपैठ पर भी चुप्पी साध लेता है। वह यह तक नहीं बताता कि कितने बार भारत ने चीन पर घुसपैठ का आरोप लगाया है।

DeepSeek तिब्बती धर्मगुरु, दलाई लामा पर भी नहीं बोलता। यह उन्हें महान व्यक्तित्व मानने वाले प्रश्न पर भी रटा रटाया जवाब देता है। यहाँ तक कि वह उनकी शिक्षाओं को भी बताने से इनकार कर देता है। DeepSeek अगर कुछ चीजों का जवाब देता भी है तो कुछ ही सेकंड के भीतर उन्हें मिटा देता है।

सिर्फ अंतरराष्ट्रीय विवादों पर ही नहीं बल्कि DeepSeek चीनी नीतियों और बोलने की स्वतंत्रता पर भी जवाब नहीं देता। जब अमेरिकी AI ChatGPT से पूछा जाए कि क्या अमेरिकी एजेंसियाँ खबरों में दखल देती हैं और मीडिया को रोकती हैं, तो यह स्पष्ट जवाब देता है कि ऐसा हुआ है।

वहीं DeepSeek इसका जवाब भी देने से मना कर देता है।

कई मौकों पर यह जवाब देकर मिटा भी देता है। ऐसा ही इसे दलाई लामा पर पूछे गए प्रश्न के संबंध में किया।

DeepSeek के AI के इन जवाब के चलते अब इस पर प्रश्न उठ रहे हैं। लोगों का कयास है कि इस AI पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) का पूरा नियंत्रण है और यह उसी की नीतियों अपर चल रहा है। भविष्य में अमेरिका जैसे देश इसमें चीनी सरकार के दखल के चलते इस पर बैन भी लगा सकते हैं।