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सरकार नहीं, मुल्ला-मौलवियों की बातें मानते हैं मुस्लिम: जमातियों की हरकतों से याद आई बाबा साहब की कही बातें

तबलीगी जमात की हरकतों से पूरा देश परेशान है। उन्होंने कोरोना नामक आपदा को पूरे भारत में पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़ा। इनमें से कुछ तो अब तक छिपे हुए हैं। इनके प्रभाव वाले मोहल्लों में पुलिस व स्वास्थ्यकर्मियों पर भी हमले हुए। वैसे ये पहला मौका नहीं है जब इस्लामी कट्टरवादियों के ख़िलाफ़ लोगों ने आवाज़ उठाई हो, दशकों और सदियों पहले भी विद्वान लोग इसके ख़िलाफ़ आगाह करते रहे हैं। ऐसे में बाबासाहब भीमराव आंबेडकर की बातों को भी जानना चाहिए। उनके इस्लाम को लेकर जो विचार थे, वो आज भी प्रासंगिक हैं। उन्हें पढ़ा जाना चाहिए।

अपनी पुस्तक ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ इंडिया’ में बाबासाहब ने लिखा है कि इस्लाम की दूसरी सबसे बड़ी खामी ये है कि ये सेल्फ-गवर्नमेंट, यानी ख़ुद से सत्ता चलाने वाली विचारधारा पर काम करता है। साथ ही ये स्थानीय सरकार के साथ सामंजस्य बैठाने की चेष्टा नहीं करता। उन्होंने लिखा था कि एक मुस्लिम की आस्था उस देश में नहीं बस बसती जहाँ वो रह रहा है बल्कि वो उसके अपने मजहब में बसती है। जहाँ भी इस्लाम की सत्ता है, उसका अपना शासन है, वहाँ उसका अपना देश है।

बाबा साहब का मानना था कि इस्लाम कभी भी एक सच्चे मुस्लिम को इस बात की इजाजत नहीं देगा कि वो भारत को अपनी मातृभूमि मानें और हिन्दुओं को अपना स्वजन समझें। अगर जमातियों की हरकतों को देखें तो आज यही पता चलता है। उन्होंने इस्लाम के नाम पर मेडिकल सलाहों को धता बताया और इस्लामी रीति-रिवाजों का अनुसरण करने के चक्कर में देश से पहले मजहब को रखा, जो आम्बेडकर की बातों को आज भी सत्य सिद्ध करती है। आलम ये है कि निजामुद्दीन स्थित मरकज़ से निकल कर कोरोना वायरस पूरे देश में फ़ैल गया है।

जमातियों को पूरे देश में कई मस्जिदों में पनाह दी गई। मौलाना साद के ही शब्दों पर गौर करें तो इससे साफ़ हो जाता है कि उसके या उसके अनुयायियों के मन में देश और संविधान के प्रति कोई आस्था नहीं है। प्रधानमंत्री लोगों को घरों में रहने की सलाह देते हैं, मौलाना साद इसे इस्लाम के ख़िलाफ़ साज़िश करार देते हुए कोरोना को अल्लाह की परीक्षा कहता है। इसके अलावा आप उन टिक-टॉक वीडियोज को ही देख लीजिए, जिसमें सुन्नत और इस्लाम के नाम पर लोगों को डॉक्टरों और विज्ञान से दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। इसका इस्तेमाल मुस्लिमों को भड़काने के लिए किया जाता है।

यही तो आंबेडकर ने कहा था। यही आज हो रहा। कई मुस्लिम अपने मुल्ला-मौलवियों की बातें मान रहे हैं, सरकार की सलाहों पर अमल करने की बजाए। निकाह-हलाला जैसे घटिया रिवाजों से घिरे इन मजहबी मौलानाओं के पास देश के लिए समय नहीं है। सही तो कहा था आंबेडकर ने कि मुस्लिम कभी भी हिन्दुओं को स्वजन नहीं मानेंगे। आज कई ऐसे वीडियो आ रहे हैं, जिनमें उन्हें ये कहते हुए देखा जा सकता है कि कोरोना की आड़ में हिन्दू साज़िश रच रहे हैं। इस आपदा के समय भी ऐसी राजनीति खेलना कहाँ तक उचित है?

इस्लामी मौलानाओं के पास स्थानीय स्तर पर प्रशासन से ज्यादा शक्ति होती है मुस्लिमों के बीच। वो अपनी बात मनवा लेते हैं, जो सरकारें नहीं कर पातीं। जैसे, समुदाय विशेष के लोगों के लिए एक फतवे का ज्यादा महत्व है, कलक्टर द्वारा जारी किए गए दिशानिर्देशों की तुलना में। यहाँ तक तक कि सरकारें भी इन मौलानाओं और इस्लामी संगठनों की ही मदद लेती है। भले ही सरकार ऐसा करते रहे, आज तबलीगी जमात है तो कल कोई और होगा। इस्लाम में मौलाना-मौलवी और इस्लामी संगठन ही इनके विश्वास की चाभी हमेशा अपने पास रखेंगे।

तबलीगियों के अंदर की सिर्फ एक जमात, इसके कारनामों को छुपाने की आवश्यकता क्यों?

ये एक निर्विवाद तथ्य है कि भारत में कोरोना के जो मामले हैं, उनमें से तकरीबन एक तिहाई निजामुद्दीन के तबलीगी मरकज़ के इस्तिमा से जुड़े हैं। यही नहीं, दुनिया के कई अन्य देशों में भी तबलीगी जमात के लोगों ने कोरोना संक्रमण को आगे फ़ैलाने में बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन ये भी सही है कि तबलीग़ी जमात ऐसा करने वाला दुनिया का एकमात्र मजहबी संगठन नहीं है। दक्षिण कोरिया में शिन्चियोजी चर्च और इस्राइल में कट्टरवादी यहूदी पंथों ने भी ऐसा ही किया। कुछ और देशों में भी कई पुरातनपंथी मजहबी संगठन जाने अनजाने कोरोना फ़ैलाने में आगे रहे हैं। मगर हैरानी की बात है कई लोग भारत में इसके बहाने इस्लामोफोबिया का काल्पनिक भूत खड़ा कर रहे हैं।

कोरोना वायरस को लेकर दिल्ली स्थित निज़ामुद्दीन मरकज की हरकतों पर पूरे देश की निगाहें हैं। देश में कोरोना संक्रमण का आँकड़ा 10000 को पार कर चुका है। देखने की बात है कि पिछले कुछ दिनों में जो नए मामले आए हैं, उनमें ज़्यादातर तबलीगी जमात से जुड़े हुए मामले ही है। उदाहरण के लिए सोमवार 13 अप्रेल को दिल्ली में संक्रमण के 356 नए केस मिले। इनमें से 325 तबलीगी जमात से जुड़े पाए गए। इस दिन तक राजधानी में कुल मामलों की संख्या 1510 थी। इनमें से 1071 यानि कोई 71 प्रतिशत को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ये बीमारी तबलीगी जमावड़े के कारण लगी। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और हरियाणा आदि राज्यों में भी कोरोना के अधिसंख्य मरीज़ तबलीगी मरकज़ से जुड़े पाए गए है। ये तथ्य कोई कपोलकल्पना नहीं बल्कि सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध आँकड़ों से निकले हैं।

बार-बार यह कहा जा रहा है कि मरकज का मतलब सभी मुस्लिम नहीं है। यह बात सही भी है। पर अहम् सवाल है कि सारे मुस्लिमों को तबलीगी जमात से जोड़ कौन रहा है? इसी सोमवार को जमीयते उलेमाए हिन्द ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आग्रह किया कि मीडिया द्वारा इस तरह से तबलीगी मरकज़ की रिपोर्टिंग पर रोक लगाई जाए। न्यायाधीशों ने ये कहकर इस पर रोक लगाने से इंकार किया कि रोक लगाने का मतलब होगा मीडिया की आज़ादी को खत्म करना। इस मामले में सुनवाई अब आगे होगी।

दिलचस्प बात है कि तबलीगी जमात से फैले संक्रमण की पहचान के लिए पहले कोरोना के ऐसे मामलों के आगे ‘टीजे’ लिखा जाता था। इससे ऐसे मामले ‘ट्रेस करने’ यानr ढूँढने में आसानी होती थी। मगर राजनीतिक दबाव के कारण कई राज्यों ने कोरोना मरीज़ों की सूची से ये कॉलम ही हटा दिया। दिल्ली के अल्पसंख्यक आयोग के कहने पर दिल्ली की सरकार ने कोरोना वायरस के संक्रमित लोगों की सूची से मरकज का नाम हटाकर उसे स्पेशल ऑपरेशन कहना शुरू किया। तमिलनाडु तथा कई अन्य सरकारों ने तो ये कॉलम हटा ही दिया।

इसमें एक तार्किक विसंगति लगती है। यह तार्किक विसंगति क्या है? अगर तबलीग सारे समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करती और वो मजहब के अंदर की सिर्फ एक जमात ही है तो फिर उसके कारनामों को छुपाने की आवश्यकता क्या है? तबलीगी जमात लिखने से सभी मुस्लिमों की प्रतिध्वनि क्यों मानी जा रही है? ये सही है कि कोई भी संप्रदाय या पंथ पूरे मजहब के लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। अगर एक कोई संप्रदाय या पंथ कुछ गलती करता है तो उसी तक सीमित रखना चाहिए। इसके बहुत से उदाहरण मौजूद हैं।

2017 में जब हरियाणा में डेरा सच्चा सौदा के मुखिया की गिरफ्तारी को लेकर हिंसा हुई तो किसी ने उसे पूरे हिन्दू समाज से नहीं जोड़ा। इसी तरह पिछले हफ्ते पटियाला में कुछ सिरफिरे निहंगों ने पुलिस वालों पर हमला लिया तो किसी ने उसे पूरे सिख समाज से नहीं जोड़ा। तो फिर तबलीगी जमात का नाम लेने पर उसे सारे मजहब को निशाना बनाना कैसे और क्यों माना जा रहा है? ये तर्क कि मरकज के नाम पर समुदाय विशेष को टारगेट किया जा रहा है, सही कैसे हो सकता है?

होना तो ये चाहिए कि मुस्लिम समाज का नेतृत्व सामने आकर कहे की तबलीग़ियों ने जो किया, वह गलत था। अल्पसंख्यक समाज के हितों के लिए जरा सी बात पर आवाज़ उठाने वाले राजनीतिक नेताओं, बुद्धिजीवियों और सामाजिक नेताओं को सामने आकर कड़े शब्दों में इसकी निंदा करनी चाहिए थी। इससे ये सवाल ही खड़ा नहीं होता। असल बात तो ये है कि तबलीगी मरकज के जमावड़े ने सबसे ज़्यादा परेशानी अपने अनुयाइयों के लिए ही खड़ीं की हैं।

दिल्ली सरकार की रोक के बावजूद मार्च के महीने में हज़ारों लोगों को निजामुद्दीन स्थित अपने मुख्यालय में इकट्ठा करके आपने उनकी ज़िन्दगियों को सबसे ज़्यादा खतरे में डाला है। जो लोग समुदाय विशेष के हितैषी होने का दावा करते हैं, वही तार्किक रूप से तबलीग़ियों और आम मुस्लिमों में फर्क नहीं कर रहे। जबकि आवश्यक है कि इन लोगों और आम मुस्लिमों में फर्क किया जाए।

इसलिए जब कोई यह कहता है कि मरकज के रहनुमाओं की मूर्खतापूर्ण गतिविधियों के कारण देश के कई हिस्सों में कोरोना बड़ी बुरी तरह से फैल गया तो इसमें गलत क्या है? सरकारें जब कोरोना वायरस के मामलों में ‘टीजे’ का कॉलम लिखते हैं तो वो यह बताने के लिए है कि यह संक्रमण कहाँ से आया है। संक्रमण का स्रोत जानने से उसके निराकरण की तथा उससे जो लोग प्रभावित हुए हैं, उनकी खोजबीन करने में मदद मिलती है। ये लड़ाई अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक की लड़ाई नहीं है। ये पूरे भारत का कोरोना वायरस से युद्ध है, जो दुनिया में एक लाख से ज़्यादा लोगों की मौत का जिम्मेदार है।

आज दुनिया के अंदर 20 लाख से ज्यादा लोग इससे पीड़ित हैं। इसलिए उसके स्रोत को छुपाने से या उसके स्रोत को या उसके स्रोत के बारे में भ्रम पैदा करने से इस बीमारी के साथ लड़ाई कमजोर पड़ती है। यहाँ दक्षिण कोरिया का उदाहरण देना भी ठीक होगा। दक्षिण कोरिया में जो कोरोना के शुरू के मामले आए, उन्हें फैलाया एक ईसाई पंथ शिन्चियोजी ने। फ्रांस में भी कुछ ऐसा ही हुआ। लेकिन क्या वहाँ की सरकारों ने इसे छिपाया?

वहाँ की सरकारों ने यह छुपाने की कोशिश नहीं की कि बीमारी के फैलाव का स्रोत कहाँ है। बल्कि दक्षिण कोरिया ने शिन्चियोजी कल्ट के मुखिया ली मैन ही को इसका जिम्मेदार ठहराया। ली मैन ही ने सार्वजनिक रूप से अपने अपराध की क्षमा माँगी। जिस तरीके से शिन्चियोजी दक्षिण कोरिया में सारे ईसाइयों का प्रतिनिधित्व नहीं करता बल्कि एक कल्ट का प्रतिनिधित्व करता है, उसी तरीके से तबलीगी जमात पूरे समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करती। इसलिए ये बताना कि संक्रमण का स्रोत निजामुद्दीन में हुए तबलीगी मरकज से है, किसी भी तरीके से समुदाय को टारगेट करना नहीं माना जा सकता।

ऐसा करके जो लोग मुस्लिमों को और तबलीगी मरकज को मिला रहे हैं, वे भारत के आम मुस्लिमों के साथ अन्याय कर रहे हैं। असल में मुद्दा समुदाय विशेष वालों का है ही नहीं। तबलीगी जमात के मलेशिया, इंडोनेशिया और पाकिस्तान में हुए विभिन्न इस्तिमा से इन देशों में भी कोरोना तेज़ी से फैला। वहाँ पर किसी ने इसे पूरे इस्लाम का सवाल नहीं बताया।

सुन्नी मुस्लिमों में तबलीगियों को काफी दकियानूसी, पुरातनपंथी और मजहबी कट्टरपंथी माना जाता है। इस्लाम की जो व्याख्या तबलीगी करते हैं, उससे सभी सुन्नी मुस्लिम भी एकमत नहीं हैं। इनके कट्टरवाद को लेकर भी अक्सर सवाल उठते रहे हैं। असल में तो कई देशों में आतंकवादी हिंसा में भी तबलीग़ी पाए गए हैं। पर ये एक अलग लेख का विषय है।

दरअसल अपने यहाँ दिक्कत अल्पसंख्यक हितों के नाम पर अपनी रोटी सेंकने वालों की है। ये तत्व किसी भी तरीके से अल्पसंख्यकों को अलग करके दिखाना चाहते हैं। वे जानते हैं कि तबलीगी जमात का एक बड़े वर्ग में प्रभाव है। इसलिए तबलीग और मुस्लिमों का घालमेल उन्हें राजनीतिक रूप से फायदेमंद दिखाई देता है। ऐसा करके वे अपने वोट बैंक को पक्का करना चाहते हैं। इस समय जबकि पूरा देश एक आपदा की स्थिति में है, ऐसा करके वे जघन्य अपराध कर रहे हैं। ये अपराध पूरे देश के साथ-साथ देश के आम मुस्लिमों के साथ भी है।

उन लोगों के साथ ये घोर अन्याय है, जिनका तबलीगी जमात की पुरातनपंथी, दकियानूसी और अवैज्ञानिक सोच से कोई लेना-देना नहीं है। मुस्लिम समाज के नेतृत्व को स्पष्टता और दृढ़ता के साथ यह कहना चाहिए कि तबलीगी जमात एक संप्रदाय भर है। तबलीग ने गलती की है और उस गलती के लिए संप्रदाय के रहनुमाओं को सार्वजनिक रूप से क्षमा माँगनी चाहिए। साथ ही सरकारों को तबलीगी जमात के नेतृत्व के साथ कड़ाई से पेश आना चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की हरकतें करके कोई भी नासमझ लोगों को अंधविश्वास की बेड़ियों में डालकर मौत के मुँह में न डाल पाए।

लॉकडाउन से ट्रेन स्थगित होने के बाद रेलवे लौटाएगा पूरा रिफंड, ऑनलाइन टिकट बुक कराने वालों को कुछ नहीं करना होगा

कोरोना के मद्देनजर 3 मई तक बढ़ाए गए लॉकडाउन के ऐलान के बाद रेलवे ने भी यात्रियों के आवगमन के लिए ट्रेनों को 3 मई तक स्थगित करने की घोषणा की। इस ऐलान के साथ ही कुछ लोगों के मन में टिकट रिफंड को लेकर सवाल उठ गए। जिसके जवाब में भारतीय रेलवे ने सबको आश्वस्त किया। रेलवे ने संबंधित सर्कुलर शेयर करते हुए बताया कि 3 मई तक रद्द की गई ट्रेनों की ऑनलाइन टिकट लेने वाले लोगों के पैसे खुद ब खुद वापस आ जाएँगे और काउंटर से टिकट लेने वाले लोग 31 जुलाई तक अपने पैसे वापस ले सकते हैं। रेलवे ने कहा कि जो ट्रेनें रद्द नहीं हुई हैं उसकी एडवांस बुकिंग रद्द करने वालों को भी पूरे पैसे वापस किए जाएँगे।

गौरतलब है कि पीएम मोदी के ऐलान के बाद भारतीय रेलवे ने भी मंगलवार को अपनी यात्री सेवाओं को 3 मई तक निलंबित कर दिया था और कहा था ई-टिकट सहित ट्रेन की एडवांस बुकिंग अगले आदेश तक नहीं होगी। लेकिन ऑनलाइन टिकट रद्द करने की सुविधा जारी रहेगी।

रेलवे ने कहा, जहाँ तक तीन मई तक रद्द की गई ट्रेनों की बात है तो ऑनलाइन टिकट बुक करने वाले लोगों के पैसे अपने आप वापस आ जाएँगे। वहीं काउंटर से टिकट लेने वाले 31 जुलाई तक पैसे वापस ले सकते हैं। इन ट्रेनों की टिकट लेने वालों को पूरे पैसे वापस किए जाएँगे। इसके अलावा रेलवे की तरफ से ये भी कहा गया कि उन ट्रेनों की एडवांस बुकिंग करने वालों को भी पूरे पैसे वापस किए जाएँगे, जो अभी रद्द नहीं हुई है।

बता दें, इस सूचना से पहले भारतीय रेलवे की ओर से रेलवे मंत्रालय के एक्सक्यूटिव डायरेक्टर राजेश दत्त बाजपेयी ने इस संबंध में अहम जानकारी भी दी थी। भारतीय रेलवे द्वारा जारी की गई प्रेस विज्ञप्ति के कहा गया था देश के विभिन्न हिस्सों में आवश्यक आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए माल और पार्सल गाड़ियों की आवाजाही बनी रहेगी। लेकिन यात्री टिकट बुकिंग 3 मई तक के लिए बंद कर दी गई है। रेलवे स्टेशनों और रेलवे स्टेशन परिसर में आरक्षित/अनारक्षित यात्रा के लिए रेल यात्रा टिकटों की बुकिंग के लिए सभी काउंटर 3 मई 2020 तक बंद रहेंगे। वहीं रेलवे मंत्रालय ने बताया था, “प्रीमियम ट्रेन, मेल, एक्सप्रेस ट्रेन, पैसेंजर ट्रेन, उपनगरीय ट्रेन, कोलकाता मेट्रो रेल, कोंकण रेलवे आदि सहित भारतीय रेलवे की सभी यात्री ट्रेन सेवाएँ 3 मई तक 24 घंटे निलंबित रहेंगी।”

दिल्ली: 356 कोरोना संक्रमितों में से 325 तबलीगी जमात से, पिछले 24 घंटों का आँकड़ा, कुल 1510 में 1071 मरकज से

दिल्ली में मरकज़ का भंडाफोड़ होने के बाद राष्ट्रीय राजधानी में कोरोना संक्रमितों की तादाद अचानक बढ़ी है। अब इसी कड़ी में हर दिन आँकड़ों में इजाफा हो रहा है। पिछले 24 घंटों की यदि बात करें तो दिल्ली में 356 नए मामले आए हैं। इन नए मामलों में 325 लोगों का संबंध निजामुद्दीन स्थिति मरकज़ से है। बता दें, इन नए मामलों के साथ दिल्ली में कोरोना संक्रमितों की संख्या 1510 तक पहुँच गई है। जिनमें से 1071 मामले तबलीगी जमात से संबंध रखते हैं।

हेल्थ बुलेटिन के मुताबिक बीते 24 घंटे में 4 लोगों की कोरोना से मौत हुई है। इसके साथ ही अबतक इस बीमारी से मरने वालों की संख्या बढ़कर 28 हो गई है। वहीं 30 लोग कोविड-19 से ठीक भी हुए हैं। हेल्थ बुलेटिन के अनुसार, 1510 में से 377 मामलों की या तो ट्रेवल हिस्ट्री रही है या वे किसी कोरोना पॉजिटिव मरीज के संपर्क में आकर संक्रमित हुए हैं। वहीं 62 लोग इस बीमारी की चपेट में कैसे आए हैं, इसकी अभी जाँच चल रही है।

दिल्ली सरकार के अनुसार, राजधानी में अभी तक 15032 लोगों की कोरोना टेस्टिंग हुई है। इसमें से 1510 लोग पॉजिटिव पाए गए हैं जबकि 12283 लोगों की रिपोर्ट नेगेटिव रही है। फिलहाल 1008 सैंपल के रिजल्ट आने बाकी हैं। इसके अलावा सरकार ने 2,456 लोगों को दिल्ली के 16 सेंटर्स में क्वारंटाइन किया है। जानकारी के अनुसार दिल्ली सरकार प्रति 10 लाख व्यक्ति 744 लोगों की कोरोना टेस्ट कर रही है।

यहाँ बता दें कि दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार, कई निजी अस्पतालों के अलावा, 8451 सरकारी अस्पतालों में 1,451 कोविड-19 रोगियों का इलाज किया जा रहा है। इनमें से 49 रोगियों की गहन देखभाल की जा रही है, जबकि 5 वेंटिलेटर पर हैं। स्वास्थ्य विभाग द्वारा इन अस्पतालों की निगरानी की कुल क्षमता 2,406 है।

उल्लेखनीय है कि दिल्ली के 11 जिलों में से 9 जिले कोरोना वायरस के संक्रमण के नजरिए से बेहद संवेदनशील हैं। जिसके कारण इनके 47 इलाकों को कंटेनमेंट घोषित करने के साथ सील कर दिया गया है। बीते 24 घंटे में कंटेनमेंट की संख्या चार बढ़ी है। इनमें से तीन पश्चिमी जिले में और एक मध्य जिले में आता है।

कक्षा 6, 7, 8, 9 और 11 में पढ़ने वाले 70 लाख विद्यार्थी बिना परीक्षा दिए होंगे प्रोन्नत, यूपी बोर्ड ने लिया फैसला

कोरोना संक्रमण की रोकथाम के लिए मंगलवार को एक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा बढ़ाई गई लॉकडाउन की अवधि के बाद यूपी बोर्ड ने बड़ा फैसला लिया है। इस बीच यूपी बोर्ड ने कोरोना संकट के बीच आदेश जारी करते हुए कहा है कि यूपी बोर्ड के स्कूलों में कक्षा 6 से लेकर 9 और कक्षा 11 में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को प्रोन्नत किया जाएगा। इसे अमल में लाने के लिए विभाग ने आदेश भी जारी कर दिया।

इस संबंध में माध्यमिक शिक्षा परिषद की प्रमुख सचिव आराधना शुक्ला की ओर से एक आदेश जारी किया गया है। आदेश में कहा गया है कि कोरोना वायरस संक्रमण के चलते लॉकडाउन के कारण असाधारण परिस्थितियाँ पैदा हुई हैं। लिहाजा शैक्षिक सत्र को नियमित करने के लिए विद्यार्थियों को अनिवार्य रूप से अगली कक्षा में प्रोन्नत कर दिया जाए। इस निर्णय के तहत उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद (यूपी बोर्ड) के स्कूलों में कक्षा 6, 7, 8, 9 और कक्षा 11 में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को शिक्षा सत्र वर्ष 2019-20 से अगली कक्षा में प्रमोशन दिया जाएगा।

माध्यमिक शिक्षा परिषद द्वारा जारी किया गया आदेश

परिषद की ओर से ये आदेश सभी जिला विद्यालय निरीक्षकों को भेजे गए हैं। साथ ही सभी जिला विद्यालय निरीक्षकों को निर्देश दिए गए हैं कि वह उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद द्वारा संचालित सरकारी स्कूलों व प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे सभी विद्यार्थियों को उनकी अगली कक्षा में प्रोन्नत कराना सुनिश्चित करें। विभाग ने साफ कहा कि है कि विद्यार्थियों को अगली कक्षा में प्रोन्नत किए जाने के निर्देशों को स्कूलों में सख्ती से लागू कराएँ।

दरअसल इस आदेश का प्रदेश के करीब 70 लाख विद्यार्थियों को लाभ मिलेगा। वहीं प्रदेश में यूपी बोर्ड के लगभग 27000 स्कूल हैं, जिनमें से 2000 स्कूल सरकारी और 4500 स्कूल सहायताप्राप्त हैं, जबकि बाकी निजी स्कूल हैं। आपको बता दें कि कोरोना की रोकथाम के लिए 24 अप्रैल को घोषित किए गए लॉकडाउन के दौरान प्रदेश के इन सभी स्कूलों में वार्षिक परीक्षाएँ चल रही थीं, या फिर कुछ स्कूलों में हो चुकी थीं।

गौरतलब है कि 18 फरवरी से प्रदेश में शुरू हुई हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की बोर्ड परीक्षाएँ 6 मार्च को समाप्त हो गई थी, लेकिन इसके बाद कॉपियाँ चेक भी नहीं हो सकी। लिहाजा लॉकडाउन की समय सीमा समाप्त होते ही माध्यमिक शिक्षा परिषद की प्राथमिकता बोर्ड परीक्षाओं की कॉपी को चेक करा परीक्षा परिणाम घोषित करना होगा, जिससे कि समय से अगली कक्षाओं का संचालन हो सके। आपको बता दें कि देश में 3 मई तक लॉकडाउन घोषित कर दिया गया है।

मरकज के मजहबी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए तबलीगी जमातियों को दिया गया था पैसा: पुलिस जाँच में कई जमातियों ने कबूला

दिल्ली के निजामुद्दीन में स्थित तबलीगी जमात के मरकज पर क्राइम ब्रांच का शिकंजा कसता जा रहा है। मरकज का कोरोना कनेक्शन सामने आने के बाद जमात के अमीर मौलाना साद समेत सात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी। अब इस मामले की जाँच कर रही क्राइम ब्रांच ने आरोपित के बैंक अकाउंट को खँगालने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

इस बीच जाँच कर रही टीम को तबलीगी जमात के कई सदस्यों ने बताया कि उन्हें मार्च के मध्य में अलमी मरकज बंगलेवाली मस्जिद के मजहबी कार्यक्रम में भाग लेने से पहले उन्हें ठहरने, भोजन और अन्य खर्चों के लिए भुगतान किया गया था। यानी कि इस मजहबी सभा में हिस्सा लेने के लिए उन्हें पैसे देकर बुलाया गया था। अब पुलिस अधिकारियों का कहना है कि वो इस बात की जाँच कर रहे हैं कि कहीं यही पैसे तो वो वजह नहीं है, जिसके कारण लॉकडाउन होने के बाद भी अलमी मरकज के अधिकारियों ने उन्हें जाने के लिए नहीं कहा। 

पुलिस ने अधिकारियों से उनके द्वारा प्राप्त राशि की जाँच के लिए उनसे पासबुक माँगा है। दरअसल, क्राइम ब्रांच की ओर से यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इनको कौन-कौन लोग फंडिंग कर रहे थे। इसके अलावा किन-किन संस्थाओं से जमात को चंदा मिल रहा था? पीएफआई संस्था से फंडिंग हुई या नहीं? इसकी भी जाँच की जा रही है।

जाँच एजेंसी ने मरकज से बीते एक जनवरी से लेकर एक अप्रैल तक हुए सारे कार्यक्रमों की लिस्ट माँगी है। आयोजनों में शामिल लोगों की संख्या, नक्शा या साइट प्लान और परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों की संख्या की डिटेल भी माँगी गई है। यह भी बताना होगा कि अगर यहाँ कोई बीमार पड़ा था उसे बाहर ले जाने के लिए क्या-क्या किए गए थे। अगर किसी को हॉस्पिटल ले जाया गया , या फिर किसी की मौत हुई है तो उसकी भी डिटेल माँगी गई है। 

इसके साथ ही पुलिस ने फंडिंग के स्रोत और विदेशियों की डिटेल भी माँगी है। जानकारी के मुताबिक जमात ने पिछले तीन सालों में कितना टैक्स भरा है, उसके बैंक खातों में कहाँ-कहाँ से कितने पैसे आए हैं, इन सब डिटेल्स के साथ पैन नंबर का विवरण भी माँगा है। इसके अलावा मरकज प्रमुख मौलाना साद और 6 अन्य सदस्यों से उन विदेशियों और भारतीय जमातियों की लिस्ट भी माँगी गई है, जिन्होंने 12 मार्च के बाद मरकज में शिरकत की थी। बता दें कि इस तीन दिवसीय मजहबी कार्यक्रम में लगभग 9,000 लोग शामिल हुए थे, जिनमें से अब तक केवल एक-तिहाई लोगों को ही खोजा जा सका है।

VIDEO: जब आइसोलेशन वार्ड में भर्ती कोरोना संदिग्ध महिला जबरदस्ती सबको छूने और गले लगाने लगी, मची अफरातफरी

कोरोना वायरस का कहर पूरे देश में थमने का नाम नहीं ले रहा है। देश में पिछले 24 घंटों के दौरान कोरोना वायरस संक्रमण के 1211 नए मामले दर्ज किए जाने के साथ ही संक्रमित मरीजों की संख्या 10 हजार के पार हो गई एवं इस दौरान संक्रमण के कारण और 31 लोगों की मौत होने के बाद मृतकों का आँकड़ा 339 पर पहुँच गया है। वहीं राजस्थान के कोटा के एक अस्पताल में हैरान कर देने वाली घटना देखने को मिली। जब एक महिला जबरदस्ती कर्मचारियों को छूने लगी और उनके गले पड़ने लगी।

यह घटना सोमवार (अप्रैल 13, 2020) शाम की है। यह महिला एक कोरोना पॉजिटिव शख्स के संपर्क में आई थी, जिसके बाद उसे अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में रखा गया था। लेकिन अचानक यह महिला वार्ड में अस्पताल कर्मचारियों को छूने लगी, उनके गले पड़ने लगी। महिला की इस हरकत से वहाँ अफरा-तफरी की स्थिति हो गई। इस पूरी घटना का एक वीडियो भी वायरल हो रहा है। जिसमें दिख रहा है कि इस महिला ने अस्पताल की एक महिला कर्मचारी को पकड़ रखा है और जबरदस्ती उसके गले लगने की कोशिश कर रही है। अस्पताल कर्मी किसी तरह उससे बच रही है और उससे हाथ छुड़ाने की कोशिश कर रही है लेकिन यह महिला उसे छोड़ना नहीं चाहती है।

वीडियो को देखने से यह पता चल रहा है कि इस वीडियो को अस्पताल की ही एक महिला कर्मचारी बना रही हैं। वो कह रही है, ‘पुलिस को बुलाइए यह महिला जबरदस्ती सबको छू रही है।’ वीडियो में कोई यह कह रहा है कि इसे एक कमरे में बंद कर दो…ये सबको छू रही है..पकड़ कर इसे कमरे में डालो।’ इस बीच यह महिला इधर-उधर जा रही है। अचानक वो वहाँ मौजूद एक महिला का हाथ पकड़ लेती है। मीडिया रिपोर्ट में बताया गया कि ऐसा करते समय महिला कुछ नारे भी लगा रही थी।

जिस वक्त अस्पताल में महिला की इस करतूत से हंगामा मचा हुआ था उस वक्त वहाँ कई अन्य अस्पताल कर्मी भी मौजूद थे जो यह सब देख कर दंग थे। बताया जा रहा है कि इस महिला को न्यू मेडिकल कॉलेज के आइसोलेशन वार्ड में रखा गया था। लेकिन उसने अस्पताल कर्मियों और नर्सों को काफी परेशान किया।

बता दें कि कुछ दिनों पहले ही राजस्थान से ही एक और तस्वीर सामने आई थी। यहाँ कुछ महिलाएँ पॉलिथीन में थूक भरकर लोगों के घरों में फेंक रही थीं। लोगों के घरों में थूक फेंक रही इन महिलाओं की तस्वीर सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई थी। जिसके बाद स्थानीय लोगों को इसकी शिकायत पुलिस से भी की थी। बाद में वहाँ नगर निगम के कर्मचारियों को बुला कर सेनिटाइजेशन भी कराया गया था।

बिहार में पान मसाला, खैनी, तंबाकू पर पूर्ण प्रतिबन्ध: खाकर थूका तो होगी 6 महीने की जेल, भरना पड़ेगा जुर्माना

कोरोना के कारण देश भर में व्याप्त तमाम पाबंदियों के बीच बिहार सरकार ने अपने राज्य में तंबाकू आदि खाकर सार्वजनिक स्थान पर थूकने वालों को सजा देने का निर्देश दिया है। बिहार सरकार ने सोमवार (अप्रैल 13, 2020) को पास किए अपने आदेश में कहा है कि अगर कोई व्यक्ति तंबाकू या पान मसाला खाकर सार्वजनिक सड़कों पर उसे थूकता नजर आया तो उसके लिए 200 रुपए का जुर्माना या फिर 6 महीने की जेल की सजा देना तय किया गया है।

राज्य स्वास्थ्य विभाग से जारी हुए इस आदेश में कहा गया, “सार्वजनिक स्थानों पर तम्बाकू थूकने से कोरोना, इन्सेफेलाइटिस, टीबी, स्वाइन फ्लू या अन्य वायरल बीमारियों के होने को खतरा है। इसलिए अगर कोई भी व्यक्ति ऐसा करता पाया गया तो उसके खिलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 268 और 269 के तहत 6 महीने की सजा होगी या ₹200 रुपए का जुर्माना होगा।”

स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव संजय कुमार ने यह आदेश जारी करते हुए बताया कि सार्वजानिक जगहों पर पान मसाला, खैनी, जर्दा और गुटका के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। संजय ने बताया कि पान मसाला, खैनी, जर्दा और गुटका खाकर यहाँ-वहाँ थूकने से कोरोना वायरस फैलने का खतरा बढ़ता है। अतः सार्वजानिक जगहों पर तम्बाकू पदार्थों के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगाया गया है। उन्होंने कहा कि आईपीसी की धारा 268 एवं 269 के तहत कोई भी व्यक्ति यदि महामारी के दौरान उपेक्षापूर्ण अथवा विधि विरूद्ध कार्य करेगा जिससे जीवन के लिए संकटपूर्ण रोग का संक्रमण हो सकता है तो उसे छह माह का कारावास अथवा 200 रुपए जुर्माना किया जा सकता है।

जानकारी के अनुसार, राज्य में सभी सरकारी, गैर सरकारी कार्यालय एवं परिसर, सभी स्वास्थ्य संस्थान, सभी शैक्षणिक संस्थान, थाना परिसर आदि में किसी भी प्रकार का तंबाकू पदार्थ, सिगरेट, खैनी, गुटखा, पान मसाला, जर्दा आदि के उपयोग को पूर्णत: प्रतिबंधित करने का भी निर्देश दिया गया है। साथ ही कहा गया है कि यदि कोई भी अधिकारी, कर्मचारी अथवा आगंतुक इसका उल्लंघन करते हैं तो उनके खिलाफ कानून के अनुरूप कार्रवाई होगी।

बता दें, इससे पहले केंद्र सरकार ने बिहार सरकार से राज्य में तंबाकू के इस्तेमाल पर पूर्णत: प्रतिबंध लगाने की अपील की थी। इसके बाद सरकार ने ये निर्देश जारी किए और सभी जिलाधिकारियों व पुलिस अधिकारियों से इसके तत्काल कार्यान्वयन की बात की। लेकिन, कहा जा रहा है कि राज्य के लिए इस कार्य को करना बेहद मुश्किल होगा क्योंकि बिहार के 25.9 प्रतिशत जनता तंबाकू आदि का सेवन करती है।

गौरतलब है कि बिहार के वैशाली, समस्तीपुर व सीतमढ़ी जिले, राज्य में सबसे ज्यादा तंबाकू का उत्पादन करते हैं। लेकिन फिर भी सुरक्षा लिहाज़ से राज्य सरकार के लिए ये कदम उठाना बेहद जरूरी था। बिहार में अब तक कोरोना संक्रमिकों की संख्या 66 पहुँच गई है। वही नालंदा में भी एक 40 वर्षीय व्यक्ति कोरोना संक्रमित पाया गया है। इसलिए राज्य स्वास्थ्य विभाग ने सिवान, बेगुसराय, नवादा के अलावा नालंदा में भी अपनी जाँच शुरू कर दी है। अभी तक बिहार में इन चार जिलों को कोरोना का हॉट्सपॉट बताया जा रहा है।

मुंबई: कस्तूरबा हॉस्पिटल के स्टाफ ने PPE की कमी को किया उजागर, उद्धव सरकार ने की कार्रवाई

महाराष्ट्र के मुंबई में कस्तूरबा हॉस्पिटल स्टाफ के खिलाफ कार्रवाई की गई है। उनके खिलाफ यह कार्रवाई इसलिए की गई क्योंकि उन्होंने अस्पताल के अंदर PPE (Personal Protection Equipment) की कमी को उजागर किया।

बता दें कि देश में महाराष्ट्र कोरोना से सबसे अधिक प्रभावित राज्य है। और यहाँ पर भी कोरोना ने सबसे अधिक कहर बरपाया है मुंबई शहर में। यहाँ पर कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या धड़ल्ले से बढ़ती जा रही है। डॉक्टर इन मरीजों का इलाज करने के लिए दिन रात एक किए हुए हैं, लेकिन यहाँ पर इन कोरोना वॉरियर्स को सुरक्षा किट भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है।

इसी बात को जब हॉस्पिटल के कर्मचारी ने वीडियो बनाकर उजागर करने की कोशिश की तो उनके खिलाफ कार्रवाई की गई, उन्हें सजा मिली। दरअसल, स्टाफ यह दिखाने की कोशिश कर रहा था कि PPE किट की कमी है, इसके बावजूद भी वो लोग अपनी जान को जोखिम में डालकर मरीजों का इलाज कर रहे हैं। उन्हें भी इस संक्रमण का खतरा है। आखिर वो भी तो इंसान ही हैं।

मगर स्टाफ को PPE किट की बात को उजागर करना भारी पड़ गया। पहले तो महाराष्ट्र सरकार ने इन्हें समुचित सुरक्षा नहीं मुहैया करवाई और जब उन्होंने इस कमी को दिखाने की कोशिश की तो उनके खिलाफ कार्रवाई की गई। बता दें कि देश के सबसे बड़े और काफी घनी आबादी वाले शहरों में से एक, मुंबई में कोरोना पॉजिटिव मामलों की संख्या धड़ल्ले से बढ़ रही है। मुंबई के विभिन्न उपनगरों जैसे वर्ली, धारावी, अंधेरी, जोगेश्वरी, बायकुला, पवई, डोंगरी, ग्रांट रोड, सांताक्रूज, चेंबूर, गोवंडी, मलाड, दादर और कांदिवली से बड़ी संख्या में संक्रमित लोगों का पता चला है। जिसकी वजह से यहाँ पर कम्युनिटी ट्रांसमिशन की आशंकाएँ बढ़ गई है।

इसके बावजूद उद्धव सरकार का ये लापरवाही वाला रवैया कई सवाल खड़े करता है। गौरतलब है कि इससे पहले भी महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई में केंद्र सरकार के सशस्त्र बलों को तैनात करने के कदम से इनकार कर दिया था। राज्य सरकार द्वारा लॉकडाउन को प्रभावी रूप से लागू करने और लोगों को प्रतिबंधों का उल्लंघन करने से रोकने में असफल होने के बाद केंद्र ने शहर को नियंत्रित करने और वायरस के बढ़ते प्रसार पर लगाम लगाने के लिए सेना भेजने की योजना बनाई थी। मगर उद्धव सरकार ने सेना के हस्तक्षेप से मना कर दिया था।

सबरीमाला सहित कई मंदिरों के सोने-चाँदी डिपॉजिट किए जाएँगे: CPI व CPM के कब्जे वाले बोर्ड का फ़ैसला

त्रावणकोर देवस्थानम बोर्ड कई मंदिरों का सञ्चालन एवं प्रबंधन करता है। इसमें सबरीमाला मंदिर भी शामिल है। अब उसने निर्णय लिया है कि इन सभी मंदिरों के पास उलब्ध सोने और चाँदी की खेप को ‘रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया’ में डिपॉजिट कर दिया जाएगा। इसके अंतर्गत पहले फेज में 24 किलो सोना-चाँदी डिपॉजिट किया जाएगा। इसके तहत बोर्ड को कुल जमा की गई चीजों पर 2% के ब्याज दर से फायदा मिलेगा। बोर्ड ने कहा है कि उतनी मात्रा में सोने-चाँदी मंदिर में ही रहेंगे, जितने की आवश्यकता प्रतिदिन के पूजा-पाठ और रीती-रिवाजों में होती है।

बोर्ड अब इस बात का पता लगाने में जुटा है कि उसके पास सोने-चाँदी की कुल कितनी मात्रा है और आज की तारीख में उसका मूल्य कितना होगा। इन सभी सोने-चाँदी की चीजों को तीन भाग में विभाजित किया जाएगा, पहला वो जो स्ट्रांग रूम में रखे गए हैं, दूसरे वो जो देवी-देवताओं को पहनाए जाते हैं व जिनकी ख़ास रीती-रिवाजों में ज़रुरत नहीं पड़ती और तीसरे वो जिनका ऐतिहासिक महत्व है। हालाँकि, ये फ़रवरी की ही ख़बर है लेकिन इसके लिए प्रक्रिया अब शुरू की गई है।

कहा जा रहा है कि इनमें अधिकतर गहने ऐसे हैं, जो मंदिरों को दानस्वरूप मिले हैं। इनका दैनिक क्रियाओं में उपयोग नहीं किया जाता। इन सारे गहनों को सोने में बदल दिया जाएगा और इसे सोने के बार में बदल कर रिजर्व बैंक में डिपॉजिट किया जाएगा। ये सब बोर्ड के अधिकारियों की मौजूदगी में किया जाएगा। दिक्कत ये है कि इससे भक्तों की भावनाएँ आहत होंगी क्योंकि उनके द्वारा दान की गई चीजों के बदले में सोना लेकर उसे रिजर्व बैंक में डाल दिया जाएगा और श्रद्धालुओं को पता ही नहीं चलेगा कि उन्होंने जो चीजें दान दी हैं, वो कहाँ हैं और किस हालत में हैं। वो मंदिर की संपत्ति तो रह ही नहीं जाएगी।

ठीक इसी तरह गुरुवायुर बोर्ड ने भी निर्णय लिया था। हालाँकि, बोर्ड बार-बार भक्तों को विश्वास दिलाने का प्रयास कर रहा है कि दैनिक पूजा-पाठ और रीती-रिवाजों में उपयोग में आने वाले सोने को डिपॉजिट नहीं किया जाएगा। बोर्ड के अध्यक्ष एन वासु ने कहा है कि ये सारी चीजें रिजर्व बैंक में सुरक्षित रहेंगी। इस पर मिलने वाले ब्याज का क्या किया जाएगा, इस पर भी अभी कोई जानकारी नहीं दी गई है। बता दें कि वासु सीपीआई के नॉमिनी हैं और बोर्ड सदस्य को सीपीएम ने नामित किया था।