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ये मेरी माँ की तरफ़ से भारत माता के लिए है: कोरोना से लड़ने के लिए ₹25 करोड़ दे बोले अक्षय कुमार

बॉलीवुड सुपरस्टार अक्षय कुमार ने कोरोना से लड़ने के लिए 25 करोड़ रुपए की सहायता की है। इस संकट की घड़ी में किसी भी सेलिब्रिटी द्वारा दी गई ये सबसे बड़ी रकम है। नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर ‘पीएम केयर्स फण्ड’ को लेकर जानकारी साझा की थी और लोगों से आह्वान किया था कि इस विकट परिस्थिति में वे क्षमतानुसार वित्तीय सहयोग करें। पीएम मोदी ने बताया कि इस फंड में माइक्रो-डोनेशंस, अर्थात छोटी राशि भी डाली जा सकती है। उन्होंने बताया कि इससे भारत की ‘आपदा प्रबंधन क्षमताओं’ को मज़बूती मिलेगी।

इससे नागरिकों को बचाने और इस क्षेत्र में रिसर्च को बढ़ावा देने में भी मदद मिलेगी। प्रधानमंत्री ने अपील करते हुए कहा कि हम सबको एक स्वस्थ भारत बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए, ताकि अगला जनरेशन ज्यादा समृद्ध और स्वस्थ हो। प्रधानमंत्री की इस अपील के बाद छात्रों से लेकर सेलिब्रिटीज तक ने रुपए डोनेट किए। इसी क्रम में अक्षय कुमार ने पीएम केयर्स फंड में 25 करोड़ रुपए देने की घोषणा की। बॉलीवुड के ‘खिलाड़ी’ ने कहा कि इस परिस्थिति में एक ही चीज महत्व रखती है और वो है लोगों की जान। उन्होंने लिखा कि वो अपने बचत में से पीएम केयर्स फंड में डोनेट कर रहे हैं।

अक्षय ने सभी से आगे आकर डोनेट करने की अपील की और समझाया कि जान है तो जहान है। जब अक्षय कुमार से पूछा गया कि इतने रुपए दान करने के पीछे उनकी कौन सी भावना है तो उन्होंने कहा कि इसे उनकी मज़बूरी कह लीजिए या फिर कमजोरी, वो ऐसे कार्यों के पीछे की सोच को जाहिर नहीं कर सकते। हिंदुस्तान टाइम्स’ से बात करते हुए एक के बाद एक हिट फ़िल्में दे रहे अक्षय कुमार ने कहा:

“मैं कौन होता हूँ चैरिटी या डोनेट करने वाला? दूसरी बात ये कि हम अपने देश को भारत माता कहते हैं। मेरा ये योगदान असल में मेरा नहीं है। ये मेरी माँ की तरफ से भारत माता के लिए है। पूरी दुनिया में कह रहा है कि वरिष्ठ नागरिकों को नज़रअंदाज़ किया जाएगा और कोरोना वायरस की आपदा के बीच अकेला छोड़ दिया जाएगा। हम ये सोच भी कैसे सकते हैं? माँ-बाप की जान महत्वपूर्ण है। मेरी माँ की जान महत्वपूर्ण है। जो कोई जहाँ भी हो, इस समय एक-एक व्यक्ति की जान बचाना बहुत महत्वपूर्ण है। मैंने तो बस इसकी तरफ अपना छोटा सा फर्ज अदा किया है।”

अक्षय कुमार की पत्नी ट्विंकल खन्ना ने भी कहा कि उन्हें अपने पति पर गर्व है। उन्होंने बताया कि जब इतनी बड़ी राशि डोनेट करने को लेकर उन्होंने अक्षय से पूछा तो उनके पति ने कहा कि जब उन्होंने अपना करियर शुरू किया था, तब उनके पास कुछ नहीं था। अब मैं उनलोगों के लिए कुछ करने के लिए कैसे पीछे हट सकता हूँ, जिनके पास कुछ भी नहीं है। इससे पहले तेलुगु स्टार प्रभास ने 4 करोड़ रुपए डोनेट किए थे।

केजरीवाल के MLA राघव चड्ढा ने फैलाई फर्जी खबर, कार्रवाई करेगी UP सरकार

कोरोना वायरस संक्रमण का प्रसार रोकने के लिए देश में 21 दिनों का लॉकडाउन है। बावजूद दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर गॉंव लौटने वाले लोगों की भीड़ अचानक जमा हो गई। पैदल ही लोगों के कूच करने की तस्वीरें सामने आने लगी। अब कहा जा रहा है कि दिल्ली में इन लोगों के बिजली-पानी के कनेक्शन काट दिए गए और केजरीवाल सरकार के अधिकारियों ने उनसे कहा कि बॉर्डर पर उनको घर ले जाने के लिए बसों की व्यवस्था की गई है। फिर भी आम आदमी पार्टी के नेता अफवाहों को हवा देने से बाज नहीं आ रहे हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार के एक बयान से पता चला है कि किस प्रकार से दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने ना सिर्फ उन्हें घर भेजने के नाम पर छल किया बल्कि उनके घरों की बिजली-पानी भी काट दी। उल्लेखनीय है कि अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान पूर्वांचल के लोगों को लक्ष्य बनाकर इन्हीं दो मुद्दों, बिजली-पानी पर ही विशाल बढ़त के साथ जीत हासिल की थी।

सहायक अध्यापक (ट्विटर अकाउंट द्वारा उपलब्ध जानकारी) महेंद्र सिंह ने दिल्ली से UP-बिहार की ओर पलायन कर रहे लोगों की स्थिति को लेकर एक ट्वीट करते हुए लिखा, “दिल्ली में रह रहे मजदूरों के घर का पानी, बिजली काट दिया गया। अफ़वाह फैलाई कि लॉकडाउन 3 महीने का होगा। अफ़रातफ़री मच गई। बसों में भर कर लोगों को यूपी बॉर्डर पर भेज दिया। रात भर गाजियाबाद, बुलंदशहर, हापुड़ में 1000 से ज्यादा बसें लगाकर इनको गंतव्य तक पहुँचाने की व्यवस्था की गई।” एक अन्य ट्वीट में उन्होंने लिखा है कि दिल्ली ने प्रवासी मजदूरों को निराश किया है।

महेंद्र सिंह के ट्वीट को रीट्वीट करते हुए आम आदमी पार्टी विधायक और दिल्ली जल बोर्ड के अध्यक्ष राघव चड्ढा ने लिखा, “सूत्रों के मुताबिक़ योगी जी दिल्ली से UP जाने वाले लोगों को दौड़ा-दौड़ा के पिटवा रहे हैं। योगी जी बोल रहे हैं कि तुम क्यों दिल्ली गए थे। अब तुम लोगों को कभी दिल्ली जाने नहीं दिया जाएगा। मेरी यूपी सरकार से अपील है ऐसा न करें, इस मुश्किल की घड़ी में लोगों की समस्याओं को बढ़ाइए मत।”

जाने अनजाने में ही आम आदमी पार्टी विधायक राघव चड्ढा ने इस ट्वीट के जारिए ना सिर्फ दिल्ली में रह रहे उत्तर प्रदेश के लोगों पर कटाक्ष किया है, बल्कि लॉकडाउन के दौरान अफवाह फैलाने का भी काम किया है। राघव चड्ढा के इस ट्वीट को शेयर करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मीडिया सलाहकार मृत्युंजय कुमार ने लिखा है, “यह सरासर झूठी ख़बर है, ऐसी महामारी के समय भी इनकी पार्टी गंदी राजनीति खेलने से बाज़ नहीं आ रही है, इतना नीचे कैसे गिर सकती है आम आदमी पार्टी? इस ट्वीट पर उत्तरप्रदेश सरकार और पुलिस निश्चित कार्यवाही करेगी।”

गौरतलब है कि दिल्ली से उत्तर प्रदेश लौटे लोगों ने घर पहुँचकर लॉकडाउन के दौरान दिल्ली सरकार के कारनामों से यूपी सरकार को अवगत कराते हुए बताया कि उनके घरों की बिजली और पानी काट दिया गया था और उन्हें डीटीसी बसों में यह कहकर बॉर्डर पर छोड़ दिया गया कि उन्हें उनके घर पहुँचाया जा रहा है। इस पर उत्तर प्रदेश सरकार ने बयान जारी कर इस बात को सार्वजानिक किया जिससे केजरीवाल सहित आम आदमी पार्टी के तमाम नेता अब सफाई दे रहे हैं। इसी कड़ी में केजरीवाल ने कहा है कि यूपी-बिहार के लोगों को कहीं जाने की जरूरत नहीं है। दिल्ली सरकार उनका पूरा इंतजाम कर रही है।

इस बार मुसीबत सबसे बड़ी: TATA ने ₹1500 करोड़ की मदद का ऐलान किया, स्वास्थ्य सुविधाओं पर जोर

रतन टाटा के नेतृत्व वाले ‘टाटा समूह’ ने भी कोरोना वायरस से लड़ने के लिए वित्तीय मदद सहित कई अन्य घोषणाएँ की हैं। किसी भी कॉर्पोरेट समूह की ओर से कोरोना के ख़िलाफ़ ये सबसे बड़ी मदद है। रतन टाटा ने 500 करोड़ रुपए की मदद का ऐलान किया। इसके कुछ ही देर बाद ‘टाटा संस’ ने भी 1000 करोड़ रुपए की अतिरिक्त मदद की घोषणा की। टाटा ट्रस्ट ने घोषणा की है कि उसके द्वारा दी गई रकम 5 चीजों पर ख़र्च किया जाएगा। पहला, मेडिकल स्टाफ की सुरक्षा के लिए। यानी, कोरोना से बचाव व इलाज हेतु कार्यरत मेडिकल कर्मचारियों के निजी सुरक्षा उपकरणों के लिए।

दूसरा, कोरोना पीड़ित मरीजों की लगातार बढ़ रही संख्या के कारण उन्हें रेस्पिरेटरी सिस्टम मुहैया कराने के लिए। तीसरा, ज्यादा से ज्यादा लोगों की स्क्रीनिंग के लिए टेस्टिंग किट उपलब्ध कराने हेतु। चौथा, उन मरीजों के लिए बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए, जो संक्रमण से जूझ रहे हैं। पाँचवाँ, स्वास्थ्य कर्मचारियों और आम नागरिकों को कोरोना वायरस के प्रति जागरूक बनाने के लिए। इन पाँचों के लिए 500 करोड़ रुपए ख़र्च किए जाएँगे। टाटा ने कहा है कि पहले भी जब देश में मुसीबतें आई हैं तो उसने आगे बढ़ कर काम किया है, लेकिन इस बार मुसीबत सबसे बड़ी है।

वहीं ‘टाटा संस’ ने अतिरिक्त 1000 करोड़ की सहायता का ऐलान करते हुए बताया कि कोरोना के मरीजों के इलाज के लिए वेंटिलेटर्स से लेकर सारे मेडिकल उपकरणों का निर्माण भारत में हो, ये सुनिश्चित किया जाएगा। टाटा ने लोगों से अपील करते हुए कहा कि संकट की इस घड़ी में सभी को साथ रह कर मुसीबत का सामना करना चाहिए। टाटा समूह के चेयरमैन रतन टाटा ने कहा कि जल्द से जल्द इमरजेंसी सेवाओं में तेज़ी आए और संसाधन जुटाए जाएँ, ये प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मानव सभ्यता सबसे बड़े संकटों में से एक झेल रही है।

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी वित्तीय सहयोग के लिए लोगों से निवेदन किया है। कई बड़े सेलिब्रिटी और कॉर्पोरेट जगत के लोगों ने मदद का ऐलान किया है। रिलायंस ने मुंबई में देश का पहला ‘कोरोना वायरस डेडिकेटेड अस्पताल’ कुछ ही दिनों में बना दिया, जहाँ लोगों का इलाज शुरू हो गया है। इसी तरह टाटा ने भी ज़रूरी सुविधाओं और उपकरणों की उपलब्धता पर ज़्यादा ज़ोर दिया है।

लेख कोरोना पर, गाली CAA को: ‘The Atlantic’ के लेख में तिरंगा का अपमान, लॉकडाउन को कोसा

कुछ ऐसे भारतीय पत्रकार हैं, जिनका पेशा बड़ा ही ‘निराला’ है। उनका एक ही काम है- विदेशी मीडिया संस्थानों में भारत और मोदी को इतनी गालियाँ दो कि हमारे देश की भी सीरिया जैसी इमेज बन जाए। विदेश में बैठे लोगों को लगे कि यहाँ कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा। ये ऐसा माहौल बनाने के लिए लिखते हैं, जिससे लगे कि मोदी सरकार लोकतान्त्रिक नहीं। तानाशाही सरकार है। इनमें बरखा दत्त, सदानंत धुमे और राणा अयूब शामिल हैं। इनमें एक विद्या कृष्णन भी हैं, जिनके लेख में भारत के राष्ट्रीय ध्वज का अपमान किया गया है।

उन्होंने ‘द अटलांटिक’ में एक लेख लिखा है, जिसमें बताया गया है कि सरकार कोरोना वायरस से निपटने के लिए बेरहम तरीके अपना रही है। इस लेख को लिखा तो गया है कोरोना के ऊपर लेकिन इसकी शुरुआत होती है सीएए को गाली देने से। साथ ही मोदी सरकार को ‘हिन्दू राष्ट्रवादी सरकार’ कह कर सम्बोधित किया गया है, जो इनलोगों का फेवरिट टर्म है। दिल्ली में हुए दंगों का भी जिक्र किया गया है। बताया गया है कि ये एक सुनियोजित दंगा था, जिसमें मरने वाले अधिकतर समुदाय विशेष से थे। हालाँकि, ये नहीं बताया गया है कि कट्टरपंथियों ने अपने छतों से किस तरह पत्थर और बम बरसाए।

शरजील इमाम की चर्चा नहीं की गई है, जिसे भड़काऊ बयान दिए। ताहिर हुसैन की चर्चा नहीं की गई है, जिसने हज़ारों की भीड़ के साथ दंगे किए और अंकित शर्मा सहित कइयों को मार डाला। शाहरुख़ की चर्चा नहीं की गई है, जो बन्दूक लहराते हुए सड़कों पर घूम रहा था। फैसल फ़ारूक़ के राजधानी स्कूल की चर्चा नहीं की गई है, जिसे भीड़ ने अटैक बेस बनाया। कॉन्स्टेबल रतन लाल के हत्यारों की चर्चा नहीं की गई है। मंदिरों पर हमले के बारे में चुप्पी साध ली गई है। इसका अर्थ है कि बिना सोचे-समझे, बिना किसी सबूत के, प्रोपेगंडा फैलाने की कोशिश की गई है।

कहा गया है कि जनवरी 30 को भारत में पहला मामला आया लेकिन सरकार जाएगी नहीं। लेकिन, इससे पहले ‘वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन’ भी तो कह रहा था कि इससे कोई खतरा नहीं है? सच्चाई ये है कि 7 जनवरी को चीन ने इसके बारे सूचना सार्वजनिक की और 8 जनवरी को भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय के टेक्निकल एक्सपर्ट्स कमिटी की बैठक हुई। सबसे बड़ी बात कि तुलनात्मक रूप से भारत सभी देशों से काफ़ी बेहतर कर रहा है, फिर भी इस लेख में जबरदस्ती कहा गया है कि मोदी ने कुछ नहीं किया।

साथ ही पहले कहा गया है कि मोदी सरकार ने कुछ नहीं किया, बाद में पूछा गया है कि मोदी सरकार ने क्यों किया? लॉकडाउन के निर्णय को गाली दी गई है और कहा गया है कि बिना किसी चेतावनी के लॉकडाउन की घोषणा कर दी गई। ऐसे में इस सवाल का उठना ज़रूरी है कि लॉकडाउन से पहले अगर चेतावनी दी जाती तो क्या और बड़े स्तर पर पलायन नहीं होता? लोग एक जगह से दूसरे जगह भागने लगते और जिसे नहीं भी ज़रूरत थी, वो भी घर जाना चाहता और चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल होता। लेकिन, विद्या का दावा है कि सब जल्दी-जल्दी में किया गया जबकि ‘जनता कर्फ्यू’ के दिन एक तरह से प्रैक्टिकल हो चुका था।

अगर आप इस लेख में लगी तस्वीर को देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि इसमें तिरंगे झंडे का अपमान किया गया है। बीच में सफ़ेद पट्टी पर अशोक चक्र की जगह कोरोना वायरस को दिखाया गया है। यानी अशोक चक्र की तुलना कोरोना वायरस से की गई है। लेखिका लोगों के घरों में रहने, ट्रांसपोर्ट बंद होने और दफ्तरों पर ताला लगने को भयावह बता रही हैं। जबकि अगर ये क़दम नहीं उठाए जाते और कोरोना के कारण लाशें गिर रही होतीं, तब भी ये पत्रकार ऐसे ही लेख लिख कर फलाँ-चिलाँ देशों से भारत को सीखने की सलाह दे रहे होते।

विद्या ने दावा किया है कि भारत में दवा की दुकानें बंद हैं, जबकि फ्रांस वगैरह में खुली हैं। सच्चाई ये है कि दवाओं और ज़रूरी वस्तुओं की दुकानें खुली हुई हैं। दवा की दुकानों को तो पूरे 24 घंटे खुले रहने की अनुमति है। बावजूद इसके झूठ फैलाया गया है। साथ ही ब्रिटेन और स्पेन सरकार के पैकेजों का जिक्र करते हुए दावा किया गया है कि भारत सरकार ने काफ़ी कम राहत पैकेज की घोषणा की। हालाँकि, ये नहीं बताया गया है कि ब्रिटेन और स्पेन की जनसंख्या और भारत को जनसंख्या व जीडीपी में क्या अंतर है। साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है अन्य देशों का पैकेज अर्थव्यवस्था को बूस्ट करने के लिए है, जबकि भारत सरकार ने गरीबों को राहत देने के लिए इसकी घोषणा की है। अर्थव्यवस्था सहित अन्य मोर्चे की परेशानी देने के लिए लगातार फैसले लिए जा रहे हैं। मुमकिन है कि आने वाले वक्त में सरकार किसी कंप्लीट पैकेज का ऐलान करेंगे।

लेख के एकाध पैराग्राफ में विद्या ने अपनी बड़ाई करते हुए बताया है कि कैसे वो ‘द हिन्दू’ के लिए हेल्थ कवर करती रही हैं और उनके पास 17 सालों का अनुभव है, इसीलिए उनकी बातें सही हैं। साथ ही पीएम मोदी द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस न करने पर सवाल उठाया गया है जबकि पीएम ने मीडिया, जनता और प्रबुद्ध जनों से लगातार संवाद किया है और सबसे सीधे जुड़ कर हालचाल जाना है। भारत ने किस तरह अपने नागरिकों को विदेश से निकाला, इस बारे में भी पूरी तरह चुप्पी साध ली गई है।

केजरीवाल की खुली पोल: बिजली-पानी काट बॉर्डर पर छोड़ा, UP सरकार की बसें बनी सहारा

मुफ्त बिजली और पानी का सपना दिखाकर दिल्ली विधानसभा चुनाव जीतने वाली अरविंद केजरीवाल सरकार की संवेदनहीनता और जनता के प्रति उसकी जवाबदेही की पोल कोरोना वायरस संक्रमण से पैदा हुए संकट ने खोल दी है। 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा के बाद दिल्ली और नजदीकी इलाकों से लोग उत्तर प्रदेश और अपने गृह राज्य की तरफ पैदल निकलने लगे हैं। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, यूपी सरकार ने बयान जारी कर कहा है कि इन लोगों के दिल्ली सरकार ने बिजली-पानी के कनेक्शन काट दिए। लॉकडाउन के दौरान उन्हें भोजन, दूध नहीं मिला जिस कारण भूखे लोग सड़कों पर उतरे। यहाँ तक कि दिल्ली सरकार के अधिकारी बक़ायदा एनाउंसमेंट कर अफ़वाह फैलाते रहे कि यूपी बॉर्डर पर बसें खड़ी हैं, जो उन्हें यूपी और बिहार ले जाएँगी।

इसके बाद बहुत सारे लोगों को मदद के नाम पर डीटीसी की बसों से बॉर्डर तक पहुँचाकर छोड़ दिया गया। वहीं, उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने रात भर जाग कर नोएडा, गाजियाबाद, बुलंदशहर, अलीगढ़, हापुड़ आदि इलाकों में 1000 से ज्यादा बसें लगाकर इन लोगों को गंतव्य तक पहुँचाने की व्यवस्था कराई। रात में ही मजदूरों और बच्चों के लिए भोजन का इंतज़ाम कराया गया। 

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी बयान में दिल्ली सरकार पर लोगों के साथ लॉकडाउन के दौरान किए गए व्यवहार पर आपत्ति जताई गई है। इसमें कहा गया है कि लोगों को ना ही दूध और न ही बिजली-पानी उपलब्ध करवाया गया। यही नहीं, उन्हें डीटीसी बसों पर बिठाकर बॉर्डर तक इस आश्वासन के साथ भेज दिया गया कि वहाँ उनके घर जाने का प्रबंध किया गया है। हालात देखते हुए यूपी सरकार ने कानपुर, बलिया, बनारस, गोरखपुर, आजमगढ़, फैजाबाद, बस्ती, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, अमेठी, रायबरेली, गोंडा, इटावा, बहराइच, श्रावस्ती सहित कई जिलों की बसें यात्रियों को बैठाकर भेजी। प्रशासन लोगों को खाने-पीने की व्यवस्था भी कर रहा है।

आज ही एक अन्य खबर में बताया गया है कि केजरीवाल अब गाँव की ओर लौट रहे यूपी-बिहार के लोगों से दिल्ली में ही रुकने की अपील कर रहे हैं। इसे डैमेज कंट्रोल की केजरीवाल की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

कोरोना एज में भी मेड इन चाइना फ्लॉप: स्पेन को 6 लाख किट बेच लगाया चूना, संक्रमित को भी बता रहा स्वस्थ

‘मेड इन चाइना’ उत्पाद अक्सर अपनी घटिया गुणवत्ता के कारण चर्चा का विषय होते हैं। लेकिन शायद किसी ने यह नहीं सोचा होगा कि पूरी दुनिया को कोरोना महामारी देने वाला चीन आपदा के दौरान भी अन्य देशों के साथ ऐसे छल करेगा। दुनिया में कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण के बीच सबसे बड़ा सवाल ‘मेड इन चाइना’ कोरोना टेस्ट किट की गुणवत्ता पर उठ रहे हैं।

दरअसल चीन ने कोरोना वायरस संक्रमण से जूझ रहे स्पेन को तेजी से जाँच के लिए ‘मेड इन चाइना’ कोरोना टेस्ट किट दिया था। लेकिन स्पेन की तरफ से आ रही शिकायत के मुताबिक वह किट कोरोना पॉजिटिव मरीजों को डिटेक्ट ही नहीं कर पा रही है। इससे स्पेन को बड़ा झटका लगा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, 10 से 15 मिनट में नतीजे देने का दावा करने वाली इस चीनी जाँच किट को स्पेन के माइक्रोबायलॉजी के विशेषज्ञों ने रिजेक्ट कर दिया है। उनके मुताबिक यह किट सही रिजल्ट देने में असमर्थ है। बता दें कि चीनी जाँच किटों ने ऐसे समय पर स्पेन को धोखा दिया है, जब स्पेन में तेजी से मामले बढ़ रहे हैं।

कोरोना वायरस संक्रमण से इटली के बाद सबसे ज्यादा मौतें स्पेन में ही हुई है। अभी तक स्पेन में करीब 5,138 लोगों की जान जा चुकी है। स्पेन ने दक्षिण कोरिया और चीन से छह लाख 40 हजार जाँच किट खरीदे हैं। चीनी जाँच किट चीन की कंपनी बायोइजी ने बनाए हैं। इससे पहले चेक रिपब्लिक भी चीनी किट्स की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठा चुका है।

पता चला है कि इन टेस्टिंग किट्स का एक्यूरेसी प्रतिशत सिर्फ 30% है। 70% बार ये टेस्टिंग किट्स किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य के बारे में सही जानकारी नहीं दे पाते हैं। स्पेन ने शिकायत की है कि ये टेस्टिंग किट्स कोरोना वायरस को डिटेक्ट करने में अक्षम है। कोरोना संक्रमितों की रिपोर्ट भी इनमें नेगेटिव आ रही है। इसके कारण कोरोना ज़्यादा से ज़्यादा लोगों में फैलता जा रहा है।

स्पेन के स्वास्थ्य विभाग ने अब चीनी जाँच किट के आँकड़ों को इस्तेमाल नहीं करने का फैसला किया है। स्पे‍न के एक स्वास्थ्य अधिकारी फेरनांडो सिमोन ने बताया कि स्पेन में इन चीनी किट से 9 हजार जाँच की गई है, लेकिन उनके परिणाम सही नहीं है। उन्होंने कहा कि हम इन जाँच किट को लौटाने जा रहे हैं। उधर, चीन ने जाँच किट बनाने वाली कंपनी से पल्ला झाड़ते हुए कहा है कि बायोइजी कंपनी के पास आधिकारिक लाइसेंस ही नहीं है। हालाँकि स्पेन के स्वास्थ्य मंत्री ने यह भी बताया कि उन्होंने यह जाँच किट चीन से प्रत्यक्ष रूप से नहीं खरीदे थे, बल्कि स्पेन की ही एक सप्लाई चेन द्वारा ऑर्डर करवाई थी।

स्पेन में कोरोना वायरस से 65,719 से अधिक नागरिक इससे संक्रमित हैं। स्वास्थ्य अधिकारी फेरनांडो सिमोन ने बताया है कि आने वाले समय में इसकी संख्या और बढ़ने की आशंका है। स्पेन में 14 मार्च से ही लॉकडाउन है। बावजूद इसके आँकड़ा लगातार बढ़ रहा है। वहीं चीन दुनियाभर में अपनी छवि सुधारने के लिए तमाम देशों को मेडिकल उपकरण दे रहा है, लेकिन अब इस पर से सभी देशों का भरोसा डगमगा रहा है।

कोरोना से निपटने में PM मोदी ने की दान की अपील, भारी ट्रैफिक से वेबसाइट क्रैश: यहाँ जाकर आप कर सकते हैं डोनेट

PM मोदी के वक्तव्य अब शायद वाकई में देश में कानून बन चुके हैं। क्योंकि शायद ही उनकी किसी बात को मानने से देशवासी पीछे हटते नजर आते हैं। 21 दिन के लॉकडाउन की अपील के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से एक और अपील की है और उसका नतीजा यह रहा कि लोग बड़ी मात्र में उनकी अपील में अपना सहयोग देने के लिए टूट पड़े।

दरअसल, कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए पीएम मोदी ने कहा कि आज प्रधानमंत्री नागरिक सहायता और आपातकालीन स्थिति में राहत का गठन किया गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों से कोरोना के खिलाफ जारी जंग में लोगों मदद की अपील की। इसके लिए पीएम केयर्स (PM-CARES) फंड बनाया गया है, जिसमें हर कोई स्वेच्छा से मदद कर सकता है।

एक ट्वीट के माध्यम से पीएम ने कहा- “मैं अपने देशवासियों से अनुरोध करता हूँ कि वे पीएम केयर फंड में दान करें। इसकी मदद से हम इस लड़ाई को जीतेंगे। आने वाले दिनों में भी ऐसे डिजास्टर से लड़ने में सरकार की मदद होगी। जो लोग बढ़-चढ़ कर दान कर रहे हैं, मैं उनकी भावनाओं का सम्मान करता हूँ। आप लोगों की मदद से भारत ज्यादा हेल्दी होगा।”

पीएम ने दूसरे ट्वीट में कहा, “देशवासियों से मेरी अपील है कि वह कोरोना वायरस के खिलाफ युद्ध में PM-CARES फंड में अंशदान के लिए आगे आएँ। इस फंड का उपयोग आगे भी आपदा की स्थिति में किया जा सकता है।”

PM मोदी की इस अपील का नतीजा यह रहा कि इस घोषणा के तुरंत बाद लोग अपना योगदान करने के लिए लिंक क्लिक करने लगे, जिस कारण यह वेबसाईट ही क्रैश हो गई।

अगर आप भी इस फंड में कुछ डोनेट करना चाहते हैं तो नीचे अकाउंट नंबर समेत तमाम जानकारियाँ दी गई हैं। डोनेशन का काम घर बैठे डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग, यूपीआई और RTGS/NEFT की मदद से किया जा सकता है।

आज ही PM मोदी ने देश के तमाम रेडियो जॉकी से वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए बात की और उन्हें इस मुहिम में शामिल होने की अपील की। पीएम मोदी ने कहा कि रेडियो जॉकी की मदद से हम देश के हर नागरिक को कोरोना को लेकर जागरूक करना चाहते हैं।

अफगानिस्तान से एयरलिफ्ट किए जाएँ सिख: काबुल गुरुद्वारे हमले के बाद मोदी सरकार से कैप्टन

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अफगानिस्तान में फँसे सिख परिवारों को भारत लाने की गुहार मोदी सरकार से लगाई है। उन्होंने ट्वीट के जरिए विदेश मंत्री एस जयशंकर से कहा है, “प्रिय जयशंकर वहाँ बड़ी संख्या में सिख परिवार हैं जो अफगानिस्तान से निकलना चाहते हैं।”

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अमरिंदर सिंह ने कहा, “मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि शीघ्रता से उन्हें एयरलिफ्ट किया जाए। यह हमारा कर्तव्य है कि इस संकट के समय में हम उनकी सहायता करें।” उन्होंने काबुल के गुरुद्वारे पर हुए आतंकी हमले को दुर्भाग्यशाली बताया है। इस घटना के बाद अमरिंदर सिंह केंद्र सरकार से सिख परिवारों को अफगानिस्तान से जल्द से जल्द एयरलिफ्ट कर भारत लाने की अपील की है।

गौरतलब है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान तथा बांग्लादेश के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने वाले कानून का विरोध करने में कॉन्ग्रेस भी शामिल रही है। अमरिंदर सिंह के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने CAA के खिलाफ पंजाब विधानसभा में बिल पास किया था। इसे भारत के हितों के विरुद्ध तथा असंवैधानिक करार दिया था। ऐसा करने वाला केरल के बाद पंजाब दूसरा राज्य था।

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में 25 मार्च को गुरुद्वारे पर आातंकी हमला हुआ था। हमले के वक्त वहॉं 150 श्रद्धालु मौजूद थे। 27 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि आठ अन्य घायल हो गए थे। एक फिदायीन ने खुद को उड़ा लिया था और फिर उसके साथियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग की थी। हमले की जिम्मेदारी आईएस ने ली थी।

बताते चलें कि अफगानिस्तान में लंबे समय से सिखों को व्यापक भेदभाव का सामना करना पड़ा है और कई बार आतंकवादियों ने उन्हें निशाना बनाया है। हालिया दिल्ली दंगों के बाद भी काबुल में सिखों की दुकान पर हमला हुआ था। अकाली दल के नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने इस घटना का विडियो ट्विटर पर शेयर किया था। इसमें अधेड़ उम्र का सिख दुकानदार हाथ जोड़कर हताश खड़ा था और उसकी दुकान का सामान जमीन पर बिखरा था।

पहले भी अफगानिस्तान में सिखों पर हमले होते आए हैं और डरकर वे भारत आने को मजबूर हुए हैं। 2018 में भी जलालाबाद में आत्मघाती हमला हुआ था जिसमें 13 सिख मारे गए थे। इस हमले की जिम्मेदारी भी इस्लामिक स्टेट ने ली थी। हमले से सिख समुदाय इतना डर गया था कि उन्होंने देश छोड़ने का फैसला कर लिया था। मौजूद जानकारी के मुताबिक, अफगानिस्तान में अब 300 से भी कम सिख परिवार बचे हैं। इनके पास दो ही गुरुद्वारा है। एक जलालाबाद और दूसरा काबुल में।

97000 सिखों और हिंदुओं का सफाया… वो भी सिर्फ 29 साल में! आतंकी हमले आम, मानवाधिकार बेमानी है अफगानिस्तान में

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में एक गुरुद्वारे पर आतंकी हमला हुआ, जिसमें 27 अल्पसंख्यक सिखों को निशाना बनाकर मार दिया गया। यह घटना उस समय की है जब लगभग 150 सिख गुरुद्वारे में प्रार्थना के लिए इकट्ठा हुए थे। अचानक से एक फिदायीन ने अपने को पहले बम से उड़ा दिया और बाकि आतंकियों ने गुरुद्वारे पर ताबड़तोड़ गोलियाँ बरसानी शुरू कर दी। जैसा हमेशा होता है और इस बार भी, आतंकी हमले की जिम्मेदारी एक इस्लामिक संगठन ने ली है।

खबर सिर्फ यही नहीं है कि किसी इस्लामिक आतंकी संगठन ने हमले के पीछे अपना हाथ बताया है। असल में मुद्दा यह है कि अफगानिस्तान के 27 अल्पसंख्यक सिखों का नरसंहार हुआ है। फिलहाल 8 सिख गंभीर घायल हैं और संभव है कि इनमें से कुछ लोगों की मौत भी हो जाए। दुर्भाग्य यह भी है कि इनके परिवारों को कोई आर्थिक सहायता नहीं मिलने वाली है। संयुक्त राष्ट्र संघ और दूसरे मानवाधिकारों के हितैषी संगठन भी इनके लिए कोई पहल नहीं करेंगे।

दरअसल, यह कोई मेरा स्वयं का मूल्यांकन नहीं है। अफगानिस्तान में हिन्दू और सिखों पर पहले भी आतंकी हमले हो चुके हैं। कभी किसी को आर्थिक सहायता तो दूर, दिलासा और भरोसा तक नहीं दिया गया। अभी 2018 में ही जलालाबाद में 10 सिखों का नरसंहार कर दिया गया। तब भी किसी ने उन सिखों के परिजनों को सांत्वना तक नहीं दी।

एक साधारण सा सवाल है – इन सिखों का क्या दोष है? क्या इन्हें जीवन जीने का अधिकार नहीं है? इनकी किस्मत में बम और बंदूकें ही लिखी हैं! आतंकी हमले के अलावा उनका हर दिन सामाजिक बहिष्कार और दमन भी होता है। साल 2016 में रॉयटर्स ने काबुल के जगतार सिंह की कहानी को प्रकाशित किया। सिंह ने तब समाचार एजेंसी को बताया था, “अफगानिस्तान में अगर आप मुस्लिम नहीं तो आप इन्सान नहीं हैं। हम अपने दिन की शुरुआत डर और अलगाव से करते है। मेरे आठ साल के बेटे जसमीत सिंह ने स्कूल जाना बंद कर दिया क्योंकि वहाँ उसे ‘हिन्दू काफिर’ कहकर बुलाया जाता था।”

वास्तव में यह मानवाधिकारों के हनन ही नहीं, बल्कि मानवता को शर्मसार करना है। सोचिए, इन सिखों की स्थिति कितनी मार्मिक रहती होगी। साल 2010 में तालिबान आतंकियों ने दो सिखों के सिर काट दिए और उनके कटे हुए शीशों को गुरूद्वारे में रखवा दिया। यह घटना किसी विश्व युद्ध के दौरान नहीं हुई थी, जिसे सामान्य मानकर छोड़ दिया जाए। उन सिखों के सिर तब काटे गए थे, जब विश्वभर में मानवाधिकारों के संगठन स्थापित हो चुके थे। संयुक्त राष्ट्र संघ का काबुल में भी एक दफ्तर कार्यरत था।

वैसे तो, अफगानिस्तान के पिछले 1400 सालों का इतिहास इस तरह के नरसंहारों से भरा हुआ है। मगर आज जब हम एक सभ्य और आधुनिक समाज की कल्पना करते हैं, तो ऐसे अमानवीय कृत्य कहाँ तक जायज हैं? अब जब इन अल्पसंख्यकों की सुध लेने वाला कोई है, तो ऐसे हमलों से बचने का क्या रास्ता हो सकता है? एक संभव और आसान तरीका है कि यह लोग अपनी पहचान ही छिपा लें। मगर, अफगानिस्तान के कट्टर धर्मांध संगठनों और आतंकियों ने इसका पहले ही तोड़ निकाल लिया है। वहाँ के हिन्दू और सिखों के घरों को विशेष निशान से चिन्हित किया गया है। यही नहीं, उनकी पहचान को समुदाय विशेष से अलग करने के लिए उन्हें लेबल्स लगाने का फरमान भी सुनाया जा चुका है।

अफगानिस्तान का कोई आधिकारिक सेन्सस नहीं है। अमेरिका के स्टेट्स डिपार्टमेंट और मीडिया के अनुसार 1990 में वहाँ 1 लाख हिन्दू और सिख आबादी थी, जोकि अब 3000 के आसपास है। अब यह समझना कोई कठिन काम नहीं है कि उन 97,000 हिन्दुओं और सिखों के साथ क्या हश्र हुआ होगा। संभव है कि उन्हें मार दिया गया होगा अथवा उनका जबरन धर्म परिवर्तन हुआ होगा और कुछ भागकर दूसरे देशों में शरण ले चुके होंगे।

सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक तौर पर भारत उनके लिए एकमात्र उम्मीद की किरण है। भारत में भी पिछले कई दशकों से यह सवाल उठता रहा है कि अफगानिस्तान के अल्पसंखक समुदाय के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक कदम उठाए जाने चाहिए। पिछली सरकारों ने कुछ राहत दी लेकिन वह कोई स्थाई समाधान नहीं था। आखिरकार, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की केंद्र सरकार ने साल 2019 में भारतीय नागरिकता कानून में एक संशोधन संसद से पारित करवाया। जिसका एकमात्र मकसद पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता प्रदान करना है। यह नागरिकता कानून में दसवाँ संशोधन था, इससे पहले सात संशोधन कॉन्ग्रेस की सरकारों ने किए। बाकि एक संशोधन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय हुआ और दूसरा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 2015 में किया गया।

इन पिछले नौ संशोधनों का कोई विरोध नहीं हुआ, लेकिन इस दसवें संशोधन को लेकर देशभर में विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए। राजधानी दिल्ली सहित देशभर के शहरों में कट्टरपंथियों द्वारा पत्थरबाज़ी, हिंसा और आगजनी की गई। शाहीनबाग़ के नाम पर देश की राजधानी को असहाय बना दिया गया। जबकि इस संशोधन का भारतीय नागरिकों से कोई लेना-देना नहीं था। सरकार की तरफ से लगातार भरोसा दिया गया कि किसी भी भारतीय नागरिक विशेषकर मजहब विशेष की नागरिकता को कोई नुकसान नहीं है।

एक तरफ अफगानिस्तान है, जहाँ की बहुसंख्यक आबादी ने हिन्दू और सिख अल्पसंख्यकों का जीवन जीना दूभर कर दिया। दूसरी तरफ भारत के अल्पसंख्यकों ने उन्हीं हिन्दू और सिखों को भारतीय नागरिकता दिए जाने पर हंगामा मचा दिया। दुर्भाग्य देखिए, अफगानिस्तान के इस अल्पसंख्यक समुदाय ने पहले आतंकियों से सामना किया, तो यहाँ उन्हें राजनैतिक तुष्टिकरण देखने को मिला। अंत में बस एक यही सवाल पैदा होता है कि आखिर इन लोगों की किस्मत में और क्या देखने को बचा है।

भारत की तर्ज पर ब्रिटेन में भी बजी तालियाँ और थालियाँ, PM जॉनसन और राजपरिवार के लोग भी हुए शामिल

शुक्रवार (मार्च 27, 2020) को ब्रिटेन में भारत की तर्ज पर ही लोगों ने अपने घरों में रहते हुए डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को तालियाँ और थालियाँ बजाकर सलामी दी। कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में जुटे स्वास्थ्यकर्मियों के लिए लोगों ने ‘क्लैप फॉर केयरर्स’ कार्यक्रम के तहत तालियाँ बजाईं। हजारों की संख्या में लोग अपने घरों की छत और बॉलकनी में आकर आकर स्वास्थ्यकर्मियों के प्रति आभार जताने के लिए जुटे।

इसमें ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन और राजपरिवार के लोग भी शामिल हुए। कैंब्रिज के प्रिंस विलियम और प्रिंसेस कैथरिन के बच्चों प्रिंस जॉर्ज, प्रिंसेस शर्लेट और प्रिंस लुईस ने भी तालियाँ बजाईं। रॉयल परिवार के इंस्टाग्राम पर इन बच्चों का वीडियो शेयर किया गया। वीडियो शेयर करते हुए लिखा गया है, “सभी डॉक्टरों, नर्सों, ख्याल रखने वालों, GP, फार्मासिस्ट, वालंटियर्स और अन्य नेशनल हेल्थ स्टाफ जो कोरोना वायरस से लड़ाई में मदद कर रहे हैं: शुक्रिया।”

बता दें कि पीएम मोदी की अपील पर 22 मार्च को कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए एक दिन का जनता कर्फ्यू लगाया गया था। इसी दिन पीएम की अपील पर शाम 5 बजे 5 मिनट के लिए देश भर की जनता अपने घरों के बालकनी, खिड़कियों और छतों पर निकलकर डॉक्टर्स, मेडिकल स्टाफ, नर्स, जो लोग सेवा कर रहे हैं और इलाज कर रहे हैं, उनकी हौसलाफजाई के लिए तालियाँ, थालियाँ, घंटी और शंख आदि बजाकर उनका आभार व्यक्त किया था। हालाँकि देश के कुछ लिबरलों और तथाकथित बुद्धजीवियों ने इसका मजाक उड़ाया था।

मगर पीएम मोदी की इस पहल की पूरी दुनिया में चर्चा हुई। अब ब्रिटेन ने भी पीएम मोदी के इस तरीके को फॉलो करते हुए पूरे देश में कोरोना वॉरियर्स के समर्थन में ताली बजवाई है। ब्रिटेन भी आज कोरोना वायरस की आपदा से बुरी तरह जूझ रहा है। यहाँ के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन भी इसकी चपेट में आ चुके हैं। लिहाजा संकट की इस घड़ी में स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाओं से संबंधित लोगों के प्रति आभार प्रकट करने के लिए पूरे ब्रिटेन में लोगों ने ताली बजाकर उनका अभिनंदन किया गया।

फिल्म हैरी पॉटर की एक्ट्रेस एम्मा वाटसन ने एक वीडियो शेयर किया है। जिसमें उन्होंने लिखा है कि वह मेडिकल स्टाफ की बहुत आभारी है। वीडियो के अंदर आप सुन सकते हैं कि किस तरह से लोग अपने घरों की बालकनी पर आकर मेडिकल स्टाफ के लिए तालियाँ और थालियाँ और साथ ही सीटियाँ बजा रहे हैं।

वीडियो कैप्शन में एम्मा वाटसन ने लिखा, “मैं उस देश पर गर्व करती हूँ जो किसी को भी मेडिकल में देने के लिए तैयार है। साथ ही मेडिकल वर्कर्स पर भी गर्व करती हूँ, जो इतनी जोखिम भरे महामारी के बीच अपने काम की सेवा से लोगों को मदद पहुँचा रहे हैं। मैं ऐसे लोगों का आभार व्यक्त करती हूँ।”