Home Blog Page 499

‘पूजा करो तो मातृभूमि की, सेवा करो तो देशवासियों की’: शिकागो से 4 साल बाद लौट स्वामी विवेकानंद ने भावुक होकर माँगी थी ‘धरती माँ’ से माफी, भारत को बताया था- तीर्थस्थान

इंग्लैंड से विदा लेने से पूर्व एक अंग्रेज मित्र ने उनसे पूछा, “स्वामी जी, चार वर्षों तक विलासिता, चकाचौंध तथा शक्ति से परिपूर्ण इस पश्चिमी जगत का अनुभव लेने के बाद अब आपको अपनी मातृभूमि कैसी लगेगी?” स्वामी जी ने उत्तर दिया, “यहाँ आने से पूर्व मैं भारत से प्रेम करता था परंतु अब तो भारत की धूलिकण तक मेरे लिए पवित्र हो गई है। अब मेरे लिए वह एक पुण्यभूमि है- एक तीर्थस्थान है!”

ऐसी थी हमारे परमपूज्य स्वामी विवेकानंद की भारत भक्ति। 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में जन्में, ठाकुर श्रीरामकृष्ण परमहंस देव के परमप्रिय शिष्य, गुरुदेव के आशीर्वाद से साधारण नरेन्द्र से असाधारण स्वामी विवेकानंद बन गए। परिव्राजक सन्यासी के रूप में स्वामी जी भारत भ्रमण करते हुए अंत में भारतवर्ष के अंतिम छोर, ध्येय भूमि कन्याकुमारी पहुँचते हैं। 1892, दिसंबर माह की 25, 26 और 27 तारीख को महासागर के मध्य स्थित शिला पर भारत के भूत, भविष्य, वर्तमान का ध्यान करते हुए उन्हें साक्षात जगतजननी भारत माता के दिव्य स्वरूप के दर्शन होते हैं और साथ ही अपना जीवनोद्देश्य भी प्राप्त होता है।

शिकागो (अमेरिका) में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में पहुँचने से पूर्व स्वामी जी को अनगिनत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। तत्पश्चात 11 सितंबर 1893 के पावन दिवस पर उनके मुख से गुरु रामकृष्ण प्रेरित ऐसी ओजस्वी वाणी गूँजी कि आज भी दुनिया याद करती है। यह केवल स्वामी जी की दिग्विजय ही नहीं अपितु भारतवर्ष के पुनरुत्थान का शंखनाद भी था। सम्पूर्ण विश्व भारत के प्रति, यहाँ की सभ्यता-संस्कृति के प्रति नतमस्तक हो गया।

स्वामी जी रातों – रात लोकप्रिय और प्रसिद्ध हो गए। उनके सम्मान में राजोचित सत्कार का आयोजन किया गया। स्वामीजी का कक्ष भौतिक सुख सुविधाओं से परिपूर्ण था, किन्तु उस विलासितापूर्ण बिछौने पर एक सन्यासी को नींद कहां आने वाली थी! उनका हृदय तो भारत के लिए क्रंदन करता रहा और वे फर्श पर लेट गए। द्रवित होकर सारी रात एक शिशु के समान फूट-फूट कर रोते रहे और ईश्वर के सम्मुख भारत के पुनरुत्थान की प्रार्थना करते रहे। भारत के प्रति उनका ऐसा ही ज्वलंत प्रेम था।

चार वर्षों के विदेश प्रवास के उपरान्त भारत लौटने के लिए अधीर होते स्वामी जी भारत की मिट्टी पर 15 जनवरी 1897 को अपना पहला कदम रखते हैं। अपने मन के आवेग को वे रोक नहीं पाते और स्वदेश की मिट्टी में लोट-पोट होने लगते हैं तथा भाव-विभोर होकर रोते हुए कहने लगते हैं कि, “विदेशों में प्रवास के कारण मुझमें यदि कोई दोष आ गए हों तो हे धरती माता! मुझे क्षमा कर देना।”

एक बार किसी ने स्वामी जी से कहा की सन्यासी को अपने देश के प्रति विशेष लगाव नहीं रखना चाहिए, बल्कि उसे तो प्रत्येक राष्ट्र को अपना ही मानना चाहिए। इस पर स्वामी जी ने उत्तर दिया – “जो व्यक्ति अपनी ही माँ को प्रेम तथा सेवा नहीं दे सकता, वह भला दूसरे की माँ को सहानुभूति कैसे दे सकेगा ?” अर्थात पहले देशभक्ति और उसके बाद विश्वप्रेम!

स्वामी जी की महान प्रशंसिका तथा उन्हें अपना मित्र माननेवाली अमेरिकी महिला जोसेफिन मैक्लाउड ने एक बार उनसे पूछा था, “मैं आपकी सर्वाधिक सहायता कैसे कर सकती हूँ?” तब स्वामी जी ने उत्तर दिया था, “भारत से प्रेम करो।” स्वयं के विषय में बोलते हुए उन्होंने एकबार कहा था कि वे ‘घनीभूत भारत’ हैं। वस्तुतः उनका भारत-प्रेम इतना गहन था कि आखिरकार वे भारत की साकार प्रतिमूर्ति ही बन गए थे। कविश्रेष्ठ रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उनके विषय में कहा था कि, “यदि आप भारत को समझना चाहते हैं, तो विवेकानंद का अध्ययन कीजिये।”

स्वामी जी और भारत एकाकार हो गए थे। भगिनी निवेदिता के शब्दों में यही विश्वास प्रतिध्वनित होता है – “भारत ही स्वामी जी का महानतम भाव था। भारत ही उनके हृदय में धड़कता था, भारत ही उनकी धमनियों में प्रवाहित होता था, भारत ही उनका दिवा-स्वप्न था और भारत ही उनकी सनक थी। इतना ही नहीं वे स्वयं ही भारत बन गए थे। वे भारत की सजीव प्रतिमूर्ति थे। वे स्वयं ही – साक्षात भारत, उसकी आध्यात्मिकता, उसकी पवित्रता, उसकी मेधा, उसकी शक्ति, उसकी अन्तर्दृष्टि तथा उसकी नियति के प्रतीक बन गए थे।”

स्वामी जी सभी दृष्टियों से अतुल्य थे। ऐसा कोई भी न था, जो भारत के प्रति उनसे अधिक लगाव रखता हो, जो भारत के प्रति उनसे अधिक गर्व करता रहा हो और जिसने उनसे अधिक उत्साहपूर्वक इस राष्ट्र के हित के लिए कार्य किया हो। उन्होंने कहा था, “अगले 50 वर्षों तक के लिए सभी देवी-देवताओं को ताक पर रख दो, पूजा करो तो केवल अपनी मातृभूमि की, सेवा करो अपने देशवासियों की, वही तुम्हारा जाग्रत देवता है।” उन्होंने देशभक्ति का ऐसा राग छेड़ा, कि वह आज भी गुंजायमान है।

युवाओं के प्रति आशा भरी दृष्टि

युवावस्था जीवन की वह अवधि है, जो शक्ति और क्षमता के साथ आगे बढ़ती है। किसी भी समस्या का समाधान युवा सकारात्मकता से हल करना जानता है। अतः किसी भी देश के युवा उस देश का भविष्य होते हैं और उस देश की प्रगति और विकास में उनकी प्रमुख भूमिका होती है। स्वामी विवेकानंद का भारत की युवा पीढ़ी पर अटल विश्वास रहा है। वे बड़ी आशा भरी दृष्टि से कहा करते थे कि, “मेरा विश्वास युवा पीढ़ी में, नई पीढ़ी में है; मेरे कार्यकर्ता उनमें से आयेंगे। सिंहों की भांति वे समस्त समस्या का हल निकालेंगे।”

वर्तमान में भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। जनसंख्या के आँकड़ों के मुताबिक भारत में पच्चीस वर्ष तक की आयु वाले लोग कुल जनसंख्या के पचास फीसद हैं, वहीं पैंतीस वर्ष तक वाले कुल जनसंख्या के पैंसठ फीसद हैं। यानी भारत अपने भविष्य के उस सुनहरे दौर के निकट है, जहाँ उसकी अर्थव्यवस्था नई ऊँचाईयों को छू सकती है। यही कारण है कि भारत को दुनिया भर में उम्मीद से देखा जा रहा है और इक्कीसवीं सदी की महाशक्ति होने की भविष्यवाणी की जा रही है। ये युवा न केवल कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा हैं, बल्कि आने वाले समय में सामाजिक-राजनीतिक, आर्थिक और जनसंख्या के विकास का संकेत भी देते हैं। चूँकि ये किसी भी देश के सबसे अधिक उत्पादक कामकाजी वर्ग होते हैं, तो यह उम्मीद की जा रही है कि युवाओं की बड़ी आबादी की मदद से भारत वर्ष 2025 तक दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। तब विश्व की कुल जीडीपी में भारत का योगदान लगभग छः फीसद होगा।

राष्ट्र निर्माण कैसे होगा ?

अब प्रश्न यह उठता है कि कौन सा युवा राष्ट्र निर्माण करेगा? कौन है वह जो देश बदलेगा? वह जिसकी प्रतिभा भ्रष्टाचार के भेंट चढ़ गई? अपितु वह जो रोजगार हेतु दर-दर की ठोकरें खा रहा है? या वह जो साक्षर तो है परन्तु शिक्षित नहीं… हाथों में डिग्रियाँ तो हैं परन्तु विषय संबंधित व्यावहारिक ज्ञान का अभाव है। या वह जो सोशल मीडिया की दुनिया में डूब गया है, जिसे सही गलत का भान न रह गया है.. आखिर कौन?

आज बहुत से ऐसे विकसित और विकासशील राष्ट्र हैं, जहाँ नौजवान ऊर्जा व्यर्थ हो रही है। कई देशों में शिक्षा के लिए आवश्यक आधारभूत संरचना की कमी है तो कहीं प्रच्छन्न बेरोजगारी जैसे हालात हैं। ऐसी परिस्थिति में भी युवाओं को एक उन्नत और आदर्श जीवन की ओर अग्रसर करना नितांत आवश्यक है।

यह सच है कि जितना योगदान देश की प्रगति में कल-कारखानों, कृषि, विज्ञान और तकनीक का है, उससे बड़ा और महत्त्वपूर्ण योगदान स्वस्थ और शक्तिशाली युवाओं का होता है। इतिहास साक्षी है कि आज तक दुनिया में जितने भी क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं, चाहे वे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक अथवा वैज्ञानिक रहे हों, उनके मुख्य आधार युवा ही रहे हैं। शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ युवा वर्ग ही राष्ट्र निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

स्वामी विवेकानंद के विचारों ने भारतवर्ष ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के युवाओं को प्रभावित व प्रेरित किया है। समय की माँग है कि भारत की युवा शक्ति स्वामी जी के “उत्तिष्ठत! जाग्रत! प्राप्य वरान्निबोधत!!” (उठो, जागो और अपने लक्ष्य तक पहुँचने तक मत रुको) रूपी आह्वान से जाग उठे। अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकले, यात्राएँ करे, दुनिया की समझ विकसित करे, ज्ञान की खोज में निकले, लक्ष्य प्राप्ति हेतु सदैव तत्पर और संघर्षरत रहे, चरित्रवान, आस्थावान और ऊर्जावान रहे। यदि सत्य में स्वामी विवेकानंद के विचार हमें प्रेरणा देते हैं तो हमारा प्रत्येक दिन ही ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ होना चाहिए। 19वीं शताब्दी में ही उस राष्ट्रसंत ने भारत माता के पुनः जगद्गुरु बनने का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। आज 21वीं शताब्दी में, स्वामी जी 162वीं जयंती पर आवश्यकता है तो केवल उनके बताए मार्ग पर संकल्पबद्ध होकर चलने की।

(लेखिका कलकत्ता विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं।)

ग्रीनलैंड पर होगा अमेरिका का कब्जा? : प्रधानमंत्री हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से बात करने को तैयार, प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था- हमें स्वतंत्रता चाहिए

ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री ने अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए डोनाल्ड ट्रम्प के साथ बातचीत को लेकर हामी भरी है। उनका यह बयान राष्ट्रपति चुने गए डोनाल्ड ट्रम्प के ग्रीनलैंड को नियंत्रण में लेने की बात के बाद आया है। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री म्यूट एगेदे ने कहा है कि उनके देश के लोग अमेरिकी नहीं बनना चाहते लेकिन वह बातचीत को तैयार हैं।

एगेदे ने कहा, ”हमें स्वतंत्र होने की इच्छा है, हम अपने घर का मालिक बनना चाहते हैं, यह ऐसी बात है जिसका सबको सम्मान करना चाहिए।” उन्होंने कहा कि अभी उनका ट्रम्प से कोई सम्पर्क नहीं हुआ है लेकिन वह बातचीत के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड अमेरिका के साथ अपने सहयोग को बढ़ाने को राजी है।

उन्होंने इसी के साथ यह स्पष्ट कर दिया कि उनके देश के लोग ना ही अमेरिकी और ना ही डेनिश बनना चाहते हैं। उन्होंने कहा, “हम डेनिश नहीं बनना चाहते। हम अमेरिकी नहीं बनना चाहते। हम ग्रीनलैंडिक बनना चाहते हैं… बेशक, यह ग्रीनलैंड के लोग ही हैं जो अपना भविष्य तय कर सकते हैं।”

ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री ने यह सारी बातें कोपनहेगन में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में तब कहीं जब डेनमार्क के प्रधानमंत्री भी उनके साथ बैठे थे। डेनमार्क का ग्रीनलैंड पर वर्तमान में नियंत्रण है। ग्रीनलैंड को 2009 में कई मामलों में स्वायत्ता दे दी गई थी लेकिन उसकी विदेश नीति और रक्षा नीति डेनमार्क ही तय करता है।

ग्रीनलैंड 57,000 की आबादी वाला एक द्वीप है जो कि डेनमार्क के साम्राज्य का हिस्सा है। ग्रीनलैंड में लगातार पूर्ण स्वतंत्रता की आवाजें उठती रही हैं। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री ने इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट किया है कि वह अमेरिका से बातचीत और स्वतंत्रता की माँग के बीच डेनमार्क से संबंध नहीं खत्म करेंगे।

उन्होंने कहा, “हम स्वतंत्रता चाहते हैं… लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम डेनमार्क के साथ सभी संबंध, सहयोग और सभी रिश्ते खत्म कर रहे हैं।”

ट्रम्प के बयान के बाद चालू हुआ बवाल

अमेरिका के ग्रीनलैंड का नियंत्रण लेने की बात का यह मामला ट्रम्प के हालिया बयानों के बाद चालू हुआ है। उन्होंने हाल ही में कहा था कि अमेरिका की आर्थिक और रणनीतिक सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड का नियंत्रण लेना जरूरी है। उन्होंने पनामा की नहर कब्जाने की बात भी कही थी। इसके अलावा वह कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य भी बनाना चाहते हैं।

ट्रम्प ने इस संबंध में सैन्य कार्रवाई तक से इनकार नहीं किया था। उन्होंने कहा था कि डेनमार्क का ग्रीनलैंड पर कानूनी अधिकार स्पष्ट नहीं है। ट्रम्प के इस बयान को लेकर अब डेनमार्क, ग्रीनलैंड और अमेरिका में बहस छिड़ी हुई है।

जहाँ डेनमार्क का कहना है कि ग्रीनलैंड के लोग अपनी इच्छा के अनुसार निर्णय करेंगे तो वहीं ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री ने साफ़ किया है कि वह अमेरिकी नहीं बनना चाहते। अमेरिका इससे पहले द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ग्रीनलैंड को खरीदने की कोशिश कर चुका है। वह वहाँ एक मिलिट्री बेस भी चलाता है।

सपने में आते थे बजरंगबली, इसलिए फिरोज बना राहुल: शुद्धिकरण के बाद सनातन में प्रवेश, MP के खंडवा से घर वापसी का 22वाँ मामला

मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में मुस्लिम युवक फिरोज ने सनातन धर्म अपनाकर अपना नाम राहुल सनातनी रख लिया है। महादेवगढ़ मंदिर में बुधवार (8 जनवरी 2025) को पंडित अश्विन खेड़े की उपस्थिति में मंत्रोच्चार, शुद्धिकरण और हवन के साथ यह प्रक्रिया पूरी की गई।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, खंडवा के दुबे कॉलोने के रहने वाले फिरोज S/o अकरम ने बताया कि वह 14 साल से हिंदू धर्म के प्रति गहरी आस्था रखते थे। बजरंगबली और खाटू श्याम जी उनके सपने में आते थे और यही उनकी घर वापसी का मुख्य कारण बना। उन्होंने इसे धर्म परिवर्तन नहीं बल्कि अपनी जड़ों की ओर लौटना बताया।

शुद्धिकरण की प्रक्रिया में मंदिर में गाय के गोबर, गोमूत्र और दस प्रकार के पवित्र द्रव्यों से स्नान कराया गया। मुंडन के बाद भगवा वस्त्र पहनाकर प्रायश्चित हवन करवाया गया। इसके बाद भगवान शिव का जलाभिषेक भी किया गया।

मंदिर संरक्षक अशोक पालीवाल ने बताया कि फिरोज काफी समय से हिंदू धर्म अपनाने की इच्छा जता रहे थे। उन्होंने बताया कि इस निर्णय के चलते फिरोज को अपने परिवार और समाज के विरोध का भी सामना करना पड़ा। विरोध के कारण उन्हें कुछ समय के लिए इंदौर जाना पड़ा था। लेकिन आठ दिन पहले वे महादेवगढ़ मंदिर के संपर्क में आए और अपनी इच्छा पूरी करने का निर्णय लिया।

यह पहली घटना नहीं है। खंडवा जिले में पिछले दो वर्षों में 22 ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जब मुस्लिमों ने सनातन धर्म परंपरा को अपनाया हो। इस घटना ने फिर से सनातन धर्म की उदारता और उसकी ओर लोगों के आकर्षण को उजागर किया है।

राहुल ने कहा कि सनातन धर्म में सभी के कल्याण की भावना है और यही वजह है कि उन्होंने इसे अपनाया। उन्होंने यह भी कहा कि सनातन धर्म में आने के बाद उन्हें आत्मिक शांति और संतोष का अनुभव हो रहा है।

महादेवगढ़ मंदिर के पुजारी पंडित अश्विन खेड़े ने कहा कि धर्म परिवर्तन के दौरान विधि-विधान से सभी प्रक्रियाएँ पूरी की गईं। मंदिर में शिव भक्तों ने स्वस्तिवाचन का पाठ किया और पुष्प-अक्षत के माध्यम से राहुल का स्वागत किया।

‘हमारी सरकार आने दो, तुम्हारा गला काट मस्जिद में रखेंगे’ : सुल्तानपुर में माजिद, अनस, कैफ ने 40-50 की भीड़ संग किया हिंदू युवकों पर हमला, दावा- हाथ में थी तलवार

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में मुस्लिम भीड़ पर हिन्दुओं पर हमला करने का आरोप लगा है। हिन्दुओं ने आरोप लगाया है कि मुस्लिम भीड़ उन पर तलवार और बाँका लेकर हमला करने आई थी। इस हमले में दो हिन्दू युवक गंभीर रूप से घायल हुए हैं। विवाद एक युवक के पैर पर बाइक चढ़ने से चालू हुआ था। ममाले में पुलिस ने शिकायत दर्ज कर ली है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटना सुल्तानपुर के कोइरीपुर नगर पंचायत में हुई। यह विवाद शुक्रवार (10 जनवरी, 2024) को चालू हुआ। यहाँ एक मुस्लिम लड़के पर गलती से हिन्दू युवक की बाइक टकरा गई थी। इसके बाद दोनों पक्ष में गालीगलौज हुई लेकिन मामला तुरंत शांत हो गया।

हिन्दू पक्ष का आरोप है कि मामला सुलझने के बावजूद शाम को मुस्लिम पक्ष के लोग बड़ी संख्या में उनके इलाके में आए और हमला किया। काफी देर तक यह लड़ाई झगड़ा चलता रहा और इस दौरान ईंट पत्थर भी चले। हिन्दुओं ने आरोप लगाया है कि हमलावरों ने औरतों और बच्चों को भी नहीं छोड़ा। बीचबचाव करने आए लोगों पर भी हमले की बात सामने आई है।

हिन्दुओं ने आरोप लगाया है कि इस हमले में जैद राईन, हामिद राईन सुफियान अंसारी, इसरार, माजिद, सद्दाब, मोहम्मद कैफ, साहिल, मोहम्मद अनस, मोहम्मद आकिब, समेत 40-50 लोग शामिल थे। इस हमले में जतिन और मोहित नाम के युवक घायल हो गए। उनके सर में चोट आई है। जतिन का आरोप है कि यह सभी लोग बाँका, लाठी और तलवार लेकर आए थे।

यह भी आरोप है कि इन लोगों ने गला काटने की धमकी भी दी। मामले में दर्ज FIR के मुताबिक, “हमलावरों ने धमकी दी कि एक बार उनकी सरकार (समाजवादी पार्टी/ INDI गठबंधन) सत्ता में आ गई, तो वे दूसरे पक्ष को मारेंगे, उनका गला काट देंगे और उनके बाल भी काट देंगे, जिन्हें मस्जिद में रखा जाएगा।”

उन्होंने आरोप लगाया कि यह सभी पहले भी हमला कर चुके हैं। पुलिस ने इस मामले में शिकायत दर्ज कर ली है। शांति व्यवस्था बनाने के लिए बड़ी संख्या में पुलिसबल तैनात किया गया है। पुलिस ने हमले में घायल हुए लोगों को मेडिकल के लिए भेज दिया है और आगे की कार्रवाई कर रही है।

‘उन्हें पढ़कर मेरा देश के प्रति प्रेम हजार गुना बढ़ गया’ : जानें कैसे स्वामी विवेकानंद के कार्यों से गाँधी हुए प्रभावित, मिलने की लालसा में निकले थे पैदल

स्वामी विवेकानंद और महात्मा गाँधी दो महान व्यक्तित्व हैं जिन्होंने अपने जीवनकाल और उसके बाद की पीढ़ियों पर गहरा प्रभाव डाला और प्रेरित किया। स्वामी विवेकानंद का जन्म 1863 में हुआ और महात्मा गाँधी का जन्म 1869 में हुआ, दोनों को समकालीन कहा जा सकता है। हालाँकि, स्वामी विवेकानंद की महा समाधि केवल 39 वर्ष और 5 महीने की आयु में 1902 में हुई, जबकि गाँधी जी का निधन 1948 में हुआ।

स्वामी विवेकानंद ने जहाँ इतने कम समय में ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई दिशा दी और वेदांत तथा भारतीय ज्ञान का संदेश वैश्विक स्तर पर प्रचारित किया, वहीं इसी अवधि में महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका में थे, जहाँ उन्होंने अपना करियर बनाने और अफ्रीका में भारतीय समुदाय के अधिकारों के लिए संघर्ष करने पर ध्यान केंद्रित किया। हालाँकि, वह बीच-बीच में भारत आते रहे।

स्वामी विवेकानंद और महात्मा गाँधी के बीच संबंध लेखन या चर्चा का विषय उस स्तर तक नहीं बन पाया, जितना वह बन सकता था। उनके बीच जो संबंध था, स्वामी विवेकानंद का महात्मा गाँधी पर जो प्रभाव पड़ा, और गाँधी जी ने स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं और उनके कार्यों को किस दृष्टिकोण से देखा, यह अधिकांशतः अनछुआ और अनविख्यात है। कुछ शोधकर्ताओं ने महात्मा गाँधी के जीवन पर स्वामी विवेकानंद के प्रभाव पर छोटे स्तर पर कार्य किया है, लेकिन इस संबंध को समग्र रूप से परखा नहीं गया है।

1893 में, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गाँधी का अलग-अलग उद्देश्यों के लिए विदेश यात्रा जाना हुआ था। स्वामी विवेकानंद शिकागो, अमेरिका गए थे ताकि वे विश्व धर्म महासभा में भाग ले सकें, जबकि महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका गए थे ताकि वह एक वकील के रूप में कार्य कर सकें। यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि स्वामी विवेकानंद को गाँधी जी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, क्योंकि गाँधी जी उस समय विदेश में थे और उन्होंने अभी तक व्यापक पहचान नहीं प्राप्त की थी।

वहीं दूसरी ओर, स्वामी विवेकानंद अपने 11 सितम्बर 1893 के ऐतिहासिक भाषण के बाद विश्व प्रसिद्ध हो गए थे और उनके पहले पश्चिमी प्रवास (1893-96) के दौरान ही वे किसी परिचय के मोहताज नहीं रहे थे। उनके अनुयायी और प्रशंसक प्रत्येक महाद्वीप में फैल चुके थे। इस दौरान, गाँधी जी, जो दक्षिण अफ्रीका में थे, स्वामी विवेकानंद और उनकी शिक्षाओं से अच्छी तरह परिचित थे। गाँधी जी ने स्वामी विवेकानंद के विचारों और उनके दृष्टिकोण को न केवल आध्यात्मिक बल्कि सामाजिक सुधारों के संदर्भ में भी बहुत महत्वपूर्ण माना था।

महात्मा गाँधी के संकलित कार्य, जो 98 खंडों में हैं और ऑनलाइन भी उपलब्ध हैं, कई ऐसे तथ्य और जानकारी प्रस्तुत करते हैं जो गाँधी जी और स्वामी विवेकानंद के बीच करीबी संबंध को दर्शाते हैं। हालाँकि, उनका व्यक्तिगत कभी मिलन नहीं हुआ, गाँधी जी का स्वामी विवेकानंद से मिलने की गहरी इच्छा थी। वह नियमित रूप से स्वामी विवेकानंद के साहित्यिक कार्यों को पढ़ते थे, उनकी शिक्षाओं का अध्ययन करते थे, और स्वामी जी द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन संस्थान में जाते थे। गाँधी जी ने स्वामी विवेकानंद पर भाषण भी दिए, और उन्होंने उनके विचारों को अपने व्याख्यानों और पत्रों में शामिल किया, जो विभिन्न विषयों पर आधारित थे। महात्मा गाँधी के इन प्रमुख दस्तावेजों के माध्यम से हमें इन दो महान व्यक्तित्वों की अनकही धरोहर का गहरा परिचय मिलता है।

दो घटनाक्रम जब स्वामी विवेकानंद और महात्मा गाँधी मिल सकते थे

स्वामी विवेकानंद और महात्मा गाँधी की मुलाकात के दो प्रमुख अवसर थे। पहला 1898 में हुआ, जब गाँधी जी ने स्वामी विवेकानंद से यह अनुरोध किया था कि वे दक्षिण अफ्रीका आएँ और वहाँ अपने आध्यात्मिक संदेश का प्रचार करें। यह बात गाँधी जी ने अपने मित्र श्री बी. एन. भजेकर को फरवरी 1898 में लिखे गए एक पत्र में व्यक्त की थी, जिसमें उन्होंने लिखा: “यहाँ एक धार्मिक उपदेशक की बहुत आवश्यकता है, लेकिन उसे यहाँ के सभी पुजारियों से ऊँचा होना चाहिए। वह पूरी तरह से निष्कलंक और निःस्वार्थ होना चाहिए और उसे अपना भरण-पोषण करने के लिए पैसे की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए………… क्या स्वामी को यात्रा के लिए प्रेरित किया जा सकता है? मैं उनके मिशन को सफल बनाने के लिए जो कुछ भी कर सकता हूँ, करूँगा। वह भारतीयों और यूरोपियों दोनों के बीच काम कर सकते हैं। ………………..आप यदि चाहें तो इस पत्र को स्वामी के सामने रख सकते हैं।”

हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि महात्मा गाँधी का पत्र स्वामी विवेकानंद तक पहुँचा था या नहीं, लेकिन यह निश्चित है कि स्वामी ने कभी दक्षिण अफ्रीका का दौरा नहीं किया। दूसरा वाकया कुछ साल बाद हुआ, जब गाँधीजी कुछ महीनों के लिए भारत में थे और 1901 में कलकत्ता गए। गाँधीजी स्वामी से मिलने के लिए उत्सुक थे, और इसके लिए वे बेलूर मठ गए। हालाँकि, स्वामी जी अस्वस्थ थे, इसलिए उनकी मुलाकात नहीं हो सकी।

The Story of My Experiments with Truth में गाँधी जी लिखते हैं: “ब्रह्मो समाज को पर्याप्त देख लेने के बाद, स्वामी विवेकानंद को देखे बिना संतुष्ट होना असंभव था। इसलिए मैंने बहुत उत्साह के साथ बेलूर मठ जाने का निर्णय लिया, अधिकांशतः, या शायद पूरी तरह से, पैदल ही। मुझे मठ की एकांत स्थिति बहुत पसंद आई। मुझे यह सुनकर निराशा और खेद हुआ कि स्वामी जी कलकत्ता स्थित अपने घर पर बीमार थे और उनसे मिलना संभव नहीं था।”

इन दोनों घटनाओं में, गाँधीजी की स्वामी विवेकानंद से मिलने की प्रबल इच्छा के बावजूद, वह ऐसा नहीं कर पाए। दूसरी घटना विशेष रूप से करीब थी, क्योंकि गाँधी जी कलकत्ता में थे और बेलूर मठ गए थे, लेकिन स्वामी जी की अस्वस्थता और उस समय उनकी वहां अनुपस्थिति ने उनकी मुलाकात को रोका।

स्वामी विवेकानंद के साहित्य का महात्मा गाँधी पर प्रभाव

किसी व्यक्तित्व को समझने के लिए उनका साहित्य एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। महात्मा गाँधी भी स्वामी विवेकानंद के करीब उनके साहित्य के माध्यम से ही आए। स्वामी के साहित्य के माध्यम से गाँधी जी भारत की सांस्कृतिक परंपराओं और ज्ञान के और निकट पहुँचे। राजयोग पुस्तक, जो स्वामी विवेकानंद ने अपनी पश्चिमी यात्रा के दौरान लिखी थी, वह एक ऐसा ग्रंथ था जिसे गाँधीजी ने अपने जीवनभर अपने पास रखा।

22 जुलाई 1941 को तिरुप्पुर सुब्रह्मण्य अविनाशीलिंगम चेट्टियार (1903-1991) को लिखे एक पत्र में गाँधीजी ने स्वामी के लेखन पर अपने विचार व्यक्त किए, जिसमें उन्होंने लिखा: “निःसंदेह स्वामी विवेकानंद के लेखन को किसी भी परिचय की आवश्यकता नहीं है। वे अपनी अपूर्व अपील स्वयं प्रस्तुत करते हैं।”

गाँधी जी जब दक्षिण अफ्रीका में थे, उसी समय उन्होंने राजयोग पुस्तक पढ़ना शुरू किया था। 1923 में, 28 सितंबर (शुक्रवार) को, उन्होंने अपनी जेल डायरी में लिखा कि उन्होंने स्वामी विवेकानंद का राजयोग पूरा पढ़ लिया था। बाद में, 1932 में, गाँधी जी ने स्वामी विवेकानंद की जीवनी ‘द लाइफ ऑफ विवेकानंद’ और उनके गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस की जीवनी “द लाइफ ऑफ रामकृष्ण “ पढ़ी, जो नोबेल पुरस्कार विजेता रोमां रोलां द्वारा लिखित थीं।

स्वामी विवेकानंद के कार्यों का महात्मा गाँधी पर प्रभाव और महत्व 1921 में बेलूर मठ, जो रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय है, पर गाँधी जी द्वारा दिए गए एक भाषण में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। गाँधी जी ने कहा: “मैंने उनके कार्यों को बड़े गहरे से अध्ययन किया है, और उन्हें पढ़ने के बाद, जो प्रेम मुझे अपने देश के लिए था, वह हजार गुना बढ़ गया।”

महात्मा गाँधी का रामकृष्ण मिशन से संबंध

स्वामी विवेकानंद और उनके गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए महात्मा गाँधी ने कई बार रामकृष्ण मिशन (जो स्वामी विवेकानंद द्वारा 1 मई 1897 को स्थापित एक आध्यात्मिक संगठन है) का दौरा किया। बेलूर मठ (कोलकाता) के अलावा, गाँधीजी ने मिशन के कई अन्य केंद्रों का भी दौरा किया, जिनमें वृंदावन और रंगून सहित अन्य स्थान शामिल थे।

रंगून में रामकृष्ण मिशन में 1929 में श्री रामकृष्ण परमहंस की जयंती के विशेष अवसर पर भाषण देते हुए, गाँधीजी ने कहा: “मैं आपको रामकृष्ण परमहंस और उनके मिशन के बारे में कुछ बताना चाहता हूँ। …… मुझे उनके मिशन पर पूरा विश्वास है और मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि आप भी उनका अनुसरण करें। जहाँ-जहाँ मैं जाता हूँ, वहाँ रामकृष्ण के अनुयायी मुझे आमंत्रित करते हैं और मुझे यह पता है कि उनका आशीर्वाद मेरे कार्य पर है। रामकृष्ण सेवा आश्रम (लोगों की सेवा केंद्र) और अस्पताल पूरे भारत में फैले हुए हैं। ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ उनका कार्य छोटे या बड़े स्तर पर नहीं हो रहा हो। अस्पताल खोले गए हैं और गरीबों को दवाइयाँ और उपचार प्रदान किया जा रहा है। …… जब मैं रामकृष्ण का नाम याद करता हूँ, तो मैं विवेकानंद को भूल नहीं सकता। सेवा आश्रमों का प्रसार मुख्य रूप से विवेकानंद की गतिविधियों के कारण हुआ और उन्हीं ने अपने गुरु को दुनिया भर में प्रसिद्ध किया।”

गाँधी जी के शब्द स्वामी विवेकानंद, उनके गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस और रामकृष्ण मिशन के प्रति उनकी गहरी श्रद्धा और सम्मान को व्यक्त करते हैं। महात्मा गाँधी के 98 संकलित कार्यों में और भी नई जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं, जैसे गाँधी जी का स्वामी विवेकानंद से संबंधित साहित्य को अपने विदेशी मित्रों को सुझाना, स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं का सार्वजनिक व्याख्यानों में प्रचार करना। इस सबका संकलन मेरी पुस्तक “रामकृष्ण-विवेकानंद आंदोलन का गांधी पर प्रभाव” में विस्तृत रूप से किया गया है।

नोट: यह लेख डॉ. निखिल यादव का है। वह विवेकानन्द केंद्र के उपप्रमुख हैं। उन्होंने जेएनयू से पीएचडी की है और ‘Influence of the Ramakrishna-Vivekananda Movement on Gandhi’ पुस्तक के लेखक हैं।

बांग्लादेश में मुस्लिम भीड़ की हिंसा को पुलिस ने दी क्लीन चिट, हिंदुओं पर हमलों को बताया ‘राजनीतिक हिंसा’ : रिपोर्ट में कहा- सिर्फ 1.59% घटनाएँ थी सांप्रदायिक

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हुए हमलों को लेकर बांग्लादेश की पुलिस ने रिपोर्ट जारी की है, जिसमें अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा को राजनीतिक हिंसा कहा गया है। खास बात ये है कि ये आँकड़े सिर्फ उन 16 दिनों के हैं, जब शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था।

दरअसल, इस रिपोर्ट में बताया गया कि 4 अगस्त 2024 से 20 अगस्त 2024 के बीच अल्पसंख्यकों के खिलाफ हुई 1,415 घटनाओं में से 98.4% मामले राजनीतिक प्रेरित थे और सिर्फ 1.59% घटनाएं सांप्रदायिक कारणों से हुईं। ऐसे में कट्टरपंथियों के दम पर सत्ता में बनी मोहम्मद यूनुस की कार्यवाहक सरकार हिंदुओं पर हमलों को राजनीतिक हिंसा का नाम देकर असली सांप्रदायिक मुद्दे को छिपाने की कोशिश कर रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 4 से 20 अगस्त 2024 के दौरान हिंदुओं, बौद्धों, ईसाइयों (अल्पसंख्यक समुदायों) पर 2,010 हमलों की रिपोर्ट बांग्लादेश हिंदू बुद्ध ईसाई एकता परिषद ने दर्ज की थी। इनमें उनकी संपत्तियों, पूजा स्थलों और जीवन पर हमले शामिल थे। हालाँकि, पुलिस के आँकड़ों के मुताबिक 1769 घटनाएँ दर्ज हुईं, जिनमें से 1415 मामलों की जाँच पूरी हो चुकी है। बाकी 354 मामलों की जाँच अभी चल रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस की इस जाँच में 1,254 मामलों को सही पाया गया, जबकि 161 मामलों में सबूत नहीं मिले। सत्यापित मामलों में 1,234 घटनाओं को राजनीतिक हिंसा बताया गया और सिर्फ 20 मामलों को सांप्रदायिक।

पुलिस ने कहा कि उन्होंने प्रभावित इलाकों का दौरा किया, पीड़ितों और गवाहों से बात की और औपचारिक शिकायत दर्ज कराने के लिए पीड़ितों को प्रोत्साहित किया। इसके अलावा, सुरक्षा के लिए कदम उठाए गए। इस पूरी प्रक्रिया के बाद 62 मामले दर्ज हुए और 951 सामान्य डायरियाँ (जीडी) बनाई गईं। अब तक 63 लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

हिंदुओं के खिलाफ हिंसा के मामलों को देखें, तो अकेले 5 अगस्त 2024 को ही 1452 घटनाएँ हुई थी, जो कुल मामलों का 82.8% है। ये वही दिन था, जब शेख हसीना को ढाका छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी थी। इसके बाद से पूरे देश की व्यवस्था बदल गई, फिर कितने मामले किस तरह दर्ज हुए होंगे, इसका महज अंदाजा ही लगाया जा सकता है।

सांप्रदायिक हिंसा के नए मामलों पर भी नजर डालें तो अगस्त 5, 2024 से जनवरी 8, 2025 के बीच 134 ऐसी घटनाएँ सामने आ चुकी हैं, जिनमें से 53 मामलों में एफआईआर दर्ज हुई और 53 सामान्य डायरियाँ बनाई गईं। अब तक 65 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया है। इस बीच, बांग्लादेश की सरकार ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की शिकायत दर्ज कराने के लिए एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया है, जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय के प्रतिनिधि शामिल हैं। साथ ही राष्ट्रीय हेल्पलाइन 999 पर आने वाली शिकायतों का तुरंत निपटारा किया जा रहा है।

बांग्लादेश हिंदू बुद्ध ईसाई एकता परिषद का कहना है कि सरकार इन हमलों को राजनीतिक रंग देकर असली समस्या को छिपा रही है। परिषद ने बताया कि अल्पसंख्यकों पर हुए हमले उनके जीवन और धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला हैं। अल्पसंख्यक समुदायों और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि राजनीतिक हिंसा का बहाना बनाकर कट्टरपंथी सरकार असली सांप्रदायिक हिंसा को नजरअंदाज कर रही है।

बांग्लादेश में हिंदुओं को लगातार निशाना बनाया गया है। ऐसे कई मामलों को ऑपइंडिया ने रिपोर्ट किया है। इन रिपोर्ट्स को आप यहाँ पढ़ सकते हैं- बांग्लादेश में हिंदू घृणा

गुजरात के बेट द्वारका में फिर गरजा बुलडोजर, सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे का समतलीकरण शुरू: सैकड़ों एकड़ से हटेगा कब्जा, हजार पुलिसकर्मी तैनात

गुजरात के देवभूमि द्वारका और बेट द्वारका में राज्य सरकार ने एक बार फिर से बुलडोजर की कार्रवाई की है। तटीय इलाकों में सैकड़ों एकड़ सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करके एक छोर से दूसरे छोर तक मकान और अन्य मजहबी एवं व्यावसायिक ढाँचे बना दिए गए हैं। अब इन ढाँचों को हटाया गया है। यह कार्रवाई कड़ी पुलिस सुरक्षा के बीच की जा रही है।

राज्य सरकार की ओर से आधिकारिक जानकारी का इंतजार है, लेकिन प्रारंभिक रिपोर्टों से पता चला है कि ध्वस्तीकरण अभियान में करीब 40 से 50 अवैध आवासीय एवं व्यावसायिक संरचनाओं को ध्वस्त किया गया है। गुजरात के गृह राज्यमंत्री हर्ष संघवी ने इसको लेकर सोशल मीडिया साइट X (पूर्व में ट्विटर) पर अभियान की जानकारी दी है।

हर्ष संघवी ने अपने पोस्ट में लिखा, “बेट द्वारिका देश भर के करोड़ों लोगों की आस्था की भूमि है। कृष्ण भूमि में किसी भी अवैध अतिक्रमण को नहीं होने देंगे। हमारी आस्था और संस्कृति की रक्षा करना हमारी जिम्मेदारी है। गुजरात में भूपेन्द्र भाई पटेल सरकार ने अवैध अतिक्रमण के प्रति जीरो टॉलरेंस दिखाया है।”

इस कार्रवाई के बाद बेट द्वारका में श्रद्धालुओं के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है। बैरिकेड्स लगा दिए गए हैं और कड़ी सुरक्षा के लिए बड़ी संख्या में पुलिस बल को भी तैनात कर दिया गया है। हालाँकि, इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि मंदिर में किसी तरह की अव्यवस्था न हो। वही, भगवान की पूजा-अर्चना नियमित रूप से जारी रहेगी।

ऑपरेशन के दौरान वरिष्ठ अधिकारियों और पुलिसकर्मियों समेत कुल एक हजार जवान शामिल हैं। प्रशासन और पुलिस विभाग के उच्च पदस्थ अधिकारियों ने इसकी सभी तैयारियाँ पहले ही कर ली थीं। ऑपरेशन के दौरान ड्रोन कैमरों से नजर रखी जा रही है। अभी यह ज्ञात नहीं है कि इस प्रक्रिया में कितना समय लगेगा, लेकिन निर्माण कार्यों की संख्या को देखते हुए इसमें कुछ समय लग सकता है।

उल्लेखनीय है कि बेट द्वारका भारत के सबसे पश्चिमी छोर है। देवभूमि द्वारका से 2 किलोमीटर दूर इस छोटे से द्वीप पर भगवान कृष्ण का मंदिर है, जो हिंदुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। हर साल यहाँ लाखों लोग भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए आते हैं। पहले यहाँ समुद्र के रास्ते ही जाया जा सकता था, लेकिन अब यहाँ पुल बन गया है।

द्वारका से ही शुरू हुआ था ध्वस्तीकरण का काम

गुजरात का समुद्र तट लगभग 1600 किलोमीटर लंबा है। इसके कई फायदे हैं, लेकिन साथ ही सुरक्षा के लिहाज से यह एक संवेदनशील इलाका भी है। गुजरात में भूपेंद्र पटेल की सरकार आने के बाद तटीय इलाकों में सुरक्षा को मजबूत करने पर ध्यान दिया गया और इसके साथ ही इन इलाकों में सालों से सरकारी जमीन पर हुए अतिक्रमण को भी चिन्हित किया जाने लगा।

साल 2022 में इन अतिक्रमण को हटाने की शुरुआत द्वारका से ही हुई और सैकड़ों एकड़ सरकारी जमीन पर बुलडोजर चलाया गया और ढाँचों को ध्वस्त किया गया था। यह कार्रवाई संभवतः गुजरात के इतिहास की सबसे बड़ी विध्वंस कार्रवाई थी। उसके बाद भी सरकार ने सोमनाथ, पोरबंदर आदि तटीय क्षेत्रों में यह कार्रवाई जारी रखी। हाल ही में सोमनाथ में भी बड़े पैमाने पर ऐसी कार्रवाई की गई।

अब बुलडोजर फिर से द्वारका पहुँच गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 2022 के ध्वस्तीकरण के बाद प्रशासन को बेट द्वारका इलाके में और अतिक्रमण की जानकारी मिली। उसके बाद अतिक्रमण करने वालों की पहचान की गई। सरकारी सूत्र कह रहे हैं कि जहाँ भी अतिक्रमण होगा, वहाँ इस तरह की बुलडोजर कार्रवाई की जाएगी।

‘तुम छोटी जाति वालों को इस्लाम में देंगे ऊँचा मुकाम’: हमीरपुर में दलित परिवार पर मौलाना खालिक और उसके साथी डाल रहे थे धर्मांतरण का दबाव, शिकायत के बाद 5 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में एक दलित परिवार को जबरन इस्लाम मजहब अपनाने के लिए धमकाने का मामला सामने आया है। पुलिस ने इस साजिश में शामिल पाँच लोगों-नूरुद्दीन, मेराजू हसन, खालिक, इरफ़ान और मोहम्मद हनीफ को गिरफ्तार किया है। पीड़ित परिवार को उनकी जाति का हवाला देकर इस्लाम अपनाने का लालच दिया गया। आरोप है कि उनके घर में मजार बनवाई गई और हर साल उर्स मनाने की बात कही गई।

ये मामला हमीरपुर के मौदहा थाना इलाके का है, जहाँ उर्मिला नाम की एक दलित महिला ने शुक्रवार (10 जनवरी 2025) को धर्म-परिवर्तन कराने जानी की कोशिश के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। उर्मिला ने बताया कि वह अक्सर बीमार रहती थीं। लगभग दो साल पहले उनकी मुलाकात नूरुद्दीन नाम के एक व्यक्ति से हुई। नूरुद्दीन ने उनकी बीमारी ठीक करने के नाम पर उन्हें मजार पर जाने के लिए उकसाया।

कुछ समय बाद नूरुद्दीन अपने भतीजे मेराजू हसन और खालिक के साथ उर्मिला के घर पहुँचा। इन सभी ने मिलकर उनके घर में एक मजार बनवाई और उर्मिला को मजार की पूजा करने और उर्स मनाने की सलाह दी। उर्मिला के पति अजीत और उनके रिश्तेदारों को भी इस्लाम कबूल करने पर उनकी सारी परेशानियों के खत्म हो जाने और आर्थिक मदद का झाँसा दिया गया।

इस साजिश को पूरा करने 10 जनवरी 2025 को नूरुद्दीन, खालिक, मेराजू हसन, इरफ़ान और मोहम्मद हनीफ फिर से उर्मिला के घर पहुँचे। इस बार उर्स का आयोजन किया गया, जिसमें उर्मिला ने अपने कुछ रिश्तेदारों को भी बुलाया। आरोप है कि वहाँ खालिक और उसके साथ आए लोगों ने उर्मिला और उनके परिवार पर इस्लाम मजहब अपनाने का दबाव बनाया। परिवार को मुस्लिम बन जाने पर बीमारियों से छुटकारा और ऊँची जाति का दर्जा मिलने का लालच दिया गया।

शुरुआत में परिवार ने उनकी बातों पर सहमति जताई, लेकिन बाद में आरोपितों के व्यवहार से असहज हो गए। जब परिवार ने इस्लाम कबूल करने से मना किया, तो आरोपितों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी। डर के बावजूद, उर्मिला और उनके परिजनों ने हिंदू धर्म में बने रहने का फैसला किया और तुरंत पुलिस को मामले की जानकारी दी।

पुलिस ने उर्मिला की शिकायत पर नूरुद्दीन, मेराजू हसन, खालिक, इरफ़ान और मोहम्मद हनीफ के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज की। इनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 351 (2) और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म सम्परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है। ऑपइंडिया के पास एफआईआर की कॉपी उपलब्ध है। फिलहाल पुलिस ने शनिवार (11 जनवरी 2025) को पुलिस ने पाँचों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। मामले की जाँच जारी है और अन्य कानूनी प्रक्रियाएँ पूरी की जा रही हैं।

दारू घोटाले से दिल्ली को हुआ ₹2026 करोड़ का नुकसान: CAG रिपोर्ट में खुलासा, AAP नेताओं की भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी का सच भी सामने आया

दिल्ली सरकार की शराब नीति को लेकर नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने बड़ा खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, अरविंद केजरीवाल सरकार की इस शराब नीति के कारण दिल्ली सरकार को 2026 करोड़ रुपये का भारी नुकसान हुआ। यह नीति नवंबर 2021 में लागू की गई थी और इसका उद्देश्य शराब की बिक्री के माध्यम से राजस्व बढ़ाना और व्यवस्था में सुधार लाना था। हालाँकि, रिपोर्ट में इसे भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और कमीशनखोरी से भरा बताया गया है। इस चक्कर में मनीष सिसोदिया, अरविंद केजरीवाल समेत कई बड़े नेताओं को जेल की हवा भी खानी पड़ी थी, क्योंकि शराब घोटाले से जमा किए पैसों की मनी लॉन्ड्रिंग का भी मामला सामने आ गया था।

कथित तौर पर लीक हुई CAG की रिपोर्ट में कहा गया है कि शराब की दुकानों के लाइसेंस जारी करने में नियमों का उल्लंघन किया गया। कई ऐसी कंपनियों को लाइसेंस दिए गए, जो घाटे में थीं या जिनके खिलाफ शिकायतें थीं। नियम तोड़ने वालों को सज़ा देने की बजाय उन्हें छूट दी गई। रिपोर्ट में कहा गया कि शराब नीति के कई अहम फैसले बिना कैबिनेट और उपराज्यपाल की मंजूरी के लिए गए।

यही नहीं, दिल्ली शराब नीति घोटाले के दौरान एक्सपर्ट पैनल की सिफारिशों को नजरअंदाज कर मनमाने तरीके से फैसले लिए गए। लाइसेंसधारकों और थोक विक्रेताओं के बीच अनुचित समझौते हुए। सरकार ने कोविड-19 के नाम पर 144 करोड़ रुपये की लाइसेंस फीस माफ कर दी, जबकि ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं थी।

CAG ने अपने विश्लेषण में बताया कि शराब नीति के तहत कई मोर्चों पर नुकसान हुआ। इसमें-

  • लाइसेंस वापस लिए गए, लेकिन उन्हें दोबारा टेंडर नहीं किया गया, जिससे ₹890 करोड़ का नुकसान हुआ।
  • ज़ोनल लाइसेंसधारकों को दी गई छूट से ₹941 करोड़ का घाटा हुआ।
  • कोविड-19 के नाम पर ₹144 करोड़ की माफी ने राजस्व को और कमजोर किया।
  • सुरक्षा जमा राशि सही से वसूलने में ₹27 करोड़ का नुकसान हुआ।

शराब की गुणवत्ता और जाँच पर ध्यान नहीं: नीति के तहत शराब की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए टेस्टिंग लैब और अन्य बुनियादी ढाँचे की योजना बनाई गई थी, लेकिन इसे लागू नहीं किया गया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि शराब की दुकानों का वितरण समान रूप से नहीं किया गया, जिससे जनता को परेशानी हुई।

रिपोर्ट में कहा गया कि इस नीति से आप नेताओं को सीधा फायदा हुआ। उस समय आबकारी विभाग के प्रमुख मनीष सिसोदिया और उनके साथी मंत्रियों ने जानबूझकर नियमों का उल्लंघन किया। लाइसेंस जारी करने और शुल्क माफी जैसे फैसलों में पारदर्शिता की कमी रही।

CAG की यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब दिल्ली चुनाव नजदीक हैं। भाजपा ने इसे बड़ा मुद्दा बना दिया है और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से जवाब माँगा है। हालाँकि आम आदमी पार्टी ने इस रिपोर्ट को सिरे से खारिज किया है। पार्टी के नेता संजय सिंह ने कहा, “यह रिपोर्ट अभी दिल्ली विधानसभा में पेश नहीं हुई है। भाजपा इसे चुनावी मुद्दा बनाने के लिए गलत दावे कर रही है।” उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा इस रिपोर्ट का इस्तेमाल आम आदमी पार्टी की छवि खराब करने के लिए कर रही है।

बता दें कि दिल्ली शराब नीति घोटाले में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत आम आदमी पार्टी और दिल्ली सरकार के शीर्ष लोगों को जेल जाना पड़ा था। इस मामले में जाँच अभी जारी है। मनीष सिसोदिया को काफी समय बाद जेल से बेल मिली थी, तो अरविंद केजरीवाल को भी महीनों जेल में बिताना पड़ा, इसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से भी हटना पड़ा। हालाँकि जेल से बाहर आने के बाद अरविंद केजरीवाल ने इस्तीफा दिया था।

बहरहाल, दिल्ली सरकार की शराब नीति को लेकर यह विवाद राजनीति के नए मोड़ ले सकता है। जनता यह जानना चाहती है कि 2026 करोड़ का नुकसान क्यों हुआ और इसके लिए जिम्मेदार कौन है। रिपोर्ट के बाद आम आदमी पार्टी पर जनता और विपक्ष का दबाव बढ़ गया है।

ऑपइंडिया ने दिल्ली शराब घोटाले पर लगातार खबरें प्रकाशित की थी। इस घोटाले की वजह से जेल और बेल समेत तमाम जरूरी खबरों को आप यहाँ पढ़ सकते हैं- (दिल्ली शराब नीति घोटाला)

‘झाड़-फूँक करके जेल से छुड़ा दूँगा तेरा शौहर’ : बागपत में नसीम मौलवी ने महिला को झाँसा देकर किया दुष्कर्म; महताब, गफ्फार सहित हुआ गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में एक शादीशुदा महिला से गैंगरेप का मामला सामने आया है। सामूहिक दुष्कर्म के आरोप में पुलिस ने बुधवार (8 जनवरी 2025) को नसीम, महताब और गफ्फार को गिरफ्तार किया गया है। इसमें से नसीम मौलवी है। नसीम ने झाड़-फूँक के जरिए पीड़िता के जेल में बंद शौहर को छुड़ाने का झाँसा दिया था। रेप के दौरान विरोध करने पर पीड़िता की पिटाई भी की गई थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना बागपत के सिंघावली की है। यहाँ के एक गाँव में रहने वाली महिला का शौहर किसी मामले में दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद है। इसी जेल में महिला के शौहर का मुँहबोला फूफा गफ्फार भी बंद था। थोड़े समय पहले गफ्फार जेल से छूट कर आया था। गफ्फार मूलतः मुज़फ्फरनगर का रहने वाला था। महिला ने उससे जेल से छूटने का तरीका पूछा। जवाब में गफ्फार ने मौलवी नसीम द्वारा की गई झाड़-फूँक से खुद के छूटने की बात कही।

गफ्फार की बातों में महिला आ गई। उसने मौलवी नसीम का पता लिया और अपने शौहर को छुड़वाने के लिए झाड़-फूँक की मिन्नत की। नसीम ने महिला को अपने पास बुलाया और झाड़-फूँक के बहाने पीड़िता से गैंगरेप किया। इस रेप में नसीम का सहयोगी महताब भी शामिल था। जब पीड़िता ने इसका विरोध किया तो महताब और नसीम ने मिल कर उसकी पिटाई की। रेप के बाद पीड़िता ने मौलवी की करतूत अपने शौहर के फूफा गफ्फार को बताई। गफ्फार ने पीड़िता के बजाय मौलवी का साथ दिया।

पीड़िता की तहरीर में आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की गई है। पुलिस ने इस तहरीर पर नसीम, महताब और गफ्फार के खिलाफ नामजद FIR दर्ज कर ली है। यह FIR भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 123, 70 (1), 61 (2) और 351 (2) के तहत दर्ज हुई है। बुधवार को पुलिस ने नसीम, महताब और गफ्फार को गिरफ्तार कर लिया है। मामले में जाँच व अन्य जरूरी कार्रवाई की जा रही है।