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नग्न अवस्था में लड़की का शव बरामद, पत्थर से कुचला गया सिर: हैदराबाद में फिर से दरिंदगी

तेलंगाना में गैंगरेप (अनुमानित) के बाद हत्या जैसा एक और मामला सामने आया है। इस बार घटना हैदराबाद के छेवाला की है। सोमवार को यहाँ एक लड़की का शव बरामद हुआ। वो भी नग्न अवस्था में! लड़की के हाथ रस्सी से बँधे थे। उसका मुँह पत्थर से कुचला जा चुका था। सोने के गहने- जैसे अंगूठी और चेन उसके शरीर पर ही थे। और चूड़ियाँ शव के आसपास पड़ी थीं।

मीडिया खबरों के अनुसार आरोपितों का मालूम अभी नहीं चल पाया है। मगर, पुलिस का कहना है कि हत्या करने वालों ने लड़की की पहचान छिपाने के लिए हाथ बाँधकर उसका मुँह कुचला। शमसाबाद के डीसीपी एन प्रकाश रेड्डी के मुताबिक मृतिका की उम्र 25 से 30 साल थी।

पुलिस ने बताया कि सोमवार को करीब 7 बजे तंगेदुपल्ली (Tangedupally) गाँव के ग्रामीण जब शौच के लिए गए, तब उन्होंने शव को देखा और उन्हें सूचित किया। इसके बाद पुलिस मौक़े पर पहुँची और शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा। अब पुलिस सीसीटीवी फुटेज इकट्ठा करके मामले की जाँच कर रही है।

जाँच में जुटे इंस्पेक्टर का इस मामले पर कहना है,“हमें आशंका है कि हमलावरों ने पीड़िता की गला घोंटकर हत्या कर दी और शव को यहाँ फेंक दिया। शरीर को फेंकने के बाद उसके चेहरे को कुचला गया। हम अधिक सुराग खोजने के लिए आसपास के क्षेत्रों में पड़ताल कर रहे हैं। हमें यह देखने के लिए पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का इंतजार करना होगा कि क्या पीड़िता का यौन उत्पीड़न किया गया था।”

फिलहाल, बता दें कि पुलिस ने मृतिका से संबंधित सभी जानकारी शहर के सभी जिलों के पुलिस थाने में भेज दी है। अब पुलिस अधिकारी इस पर जाँच शुरू करके फॉरेंसिंक प्रमाण जुटा रहे हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले तेलंगाना में ही पशु चिकित्सक रेड्डी की गैंगरेप के बाद नृशंस हत्या का मामला सामने आया था। इस वाकये में चारों आरोपितों ने डॉ रेड्डी का मदद के बहाने दुष्कर्म किया था और बाद में उन पर पेट्रोल डालकर उन्हें जला दिया था। हालाँकि बाद में चारों आरोपित पकड़े गए थे और पुलिस की हिरासत से भागने की कोशिश करने के दौरान एनकाउंटर में मारे भी गए थे।

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टेलीग्राफ है? बकवास ही करेगा: हिन्दू-घृणा से बजबजाते अखबार ने दलितों को वायरस कहा

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए नामित किया गया है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए नामित किया है। चीफ जस्टिस के रूप में अपने करीब साढ़े 13 महीने के कार्यकाल में रंजन गोगोई ने कई एतिहासिक फैसले सुनाए। इसमें अयोध्या राम जन्मभूमि का भी फैसला भी शामिल था। उन्होंने असम एनआरसी, राफेल, सीजेआई ऑफिस को आरटीआई के दायरे में शामिल करने जैसे ऐतिहासिक फैसले भी सुनाए। गोगोई पिछले साल 17 नवंबर 2019 को सीजेआई के पद से रिटायर हुए थे। 

उनके राज्यसभा के लिए नामित होने पर लिबरल गैंग और कॉन्ग्रेस द्वारा विवादों में घसीटना तो तय ही था, क्योंकि अयोध्या पर उनके फैसलों ने लिबरल गैंग के कलेजे में आग लगाने का काम किया था। हिंदू विरोधी मानसिकता वाले लिबरल इनके खिलाफ मुँह फाड़ने का मौका ढूँढ रहे थे और अब उन्हें यह मौका मिल गया है। अब जब हिंदू विरोधी मानसिकता का प्रदर्शन करना है तो भला टेलीग्राफ कैसे पीछे रहता, जो हमेशा ही अपनी हिन्दुओं से धार्मिक घृणा वाली छवि को प्रदर्शित करता रहता है। ये चर्चा में ही तभी आते हैं, जब इनकी कोई घटिया हेडलाइन ट्विटर पर शेयर करता है। अब तो ऐसा है कि यही इनका यूएसपी बन चुका है कि टेलीग्राफ है, बकवास ही करेगा।

द टेलीग्राफ की हेडलाइन

रंजन गोगोई मामले में भी द टेलीग्राफ ने एक बार फिर से ऐसा ही बकवास करने का काम किया है। हालाँकि, इस बार तो इस अखबार ने सारी मर्यादा और गरिमा को ताक पर रख दिया है। इनकी दलितों के प्रति नफरत की पराकाष्ठा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन्होंने देश के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को ही वायरस कह दिया। अब आप समझ सकते हैं जो तथाकथित मीडिया संस्थान राष्ट्रपति की तुलना वायरस से कर सकता है, उनके मन में दलितों के लिए कितनी नफरत भरी होगी। राष्ट्रपति जैसी कुर्सी, जो राजनीति से हमेशा दूर रखी जाती है, उस पर इस तरह की घृणित और जातिवादी टिप्पणी बहुत ही निचले दर्जे की सोच और पत्रकारिता का परिचायक है।

वैसे ये इनका एक दिन का काम नहीं है। ये वर्षों से हिंदू-घृणा से बजबजाते रहे हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि यह अखबार बंगाल से छपता है, मगर बंगाल से छपने वाला अखबार होने के बावजूद ममता के शासन में यह पेपर भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या, हर जिले में हो रहे मजहबी दंगों और तमाम अपराधों से जलते बंगाल पर चुप्पी साध लेता है। ऐसे तमाम मौकों पर इनकी बुद्धि घास चरने चली जाती है और बेहूदे हेडलाइन सुझाने वाले एडिटरों की रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है। पश्चिम बंगाल सरकार के तलवे चाटने वाले इस अखबार की विशेषता ही ‘शब्दों से खेलने’ भर की रही है। इनका सारा ज्ञान हेडलाइन में अपनी जातिवादी घृणा, हिन्दुओं से धार्मिक घृणा आदि में ही बहता रहता है। 

मुँह फाड़ने वाले इन लिबरलों और तथाकथित मीडिया संस्थानों को यहाँ पर यह बताना जरूरी है कि रंजन गोगोई को भाजपा या फिर किसी अन्य पार्टी ने राज्यसभा के लिए नामित नहीं किया बल्कि राष्ट्रपति की तरफ से नामित किया गया है। राज्यसभा में 12 सदस्य राष्ट्रपति की ओर से मनोनीत किए जाते हैं। ये सदस्य अलग-अलग क्षेत्रों की जानी मानी हस्तियाँ होती हैं और कई अभूतपूर्व फैसला देने वाले रंजन गोगोई पूर्वोत्तर से सर्वोच्च न्यायिक पद पर पहुँचने वाले इकलौते शख्स हैं।

द टेलीग्राफ की रिपोर्ट में लिखा गया

वैसे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस रंजन गोगोई को राज्य सभा के लिए चुने जाने से जिन-जिन तथाकथित निष्पक्ष कॉन्ग्रेसी लोगों की जली है, वो अगर एक बार इतिहास में दर्ज कॉन्ग्रेस के अजीब और अद्वितीय कारनामों को देख लें तो शायद उन्हें भी पता चल जाएगा कि रंजन गोगोई से पहले भी भारत के एक और मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य न्यायाधीश राज्य सभा की शोभा बढा चुके हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि गोगोई जहाँ नामित सदस्य के तौर पर राज्यसभा के सदस्य बने हैं, वहीं पहले वाले दोनों जज कॉन्ग्रेस पार्टी के टिकट पर राज्यसभा पहुँचे थे।

हम यहाँ बात कर रहे हैं हाई कोर्ट के पूर्व मुख्‍य जज और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बहरुल इस्लाम एवं पूर्व सीजेआई रंगनाथ मिश्रा की। रंजन गोगोई को मनोनीत किए जाने पर विपक्ष ने हाय-तौबा मचाया और हिंदू विरोधी द टेलीग्राफ ने भी अपनी रिपोर्ट में लिखा कि भारतीय इतिहास में इससे पहले कभी भी रिटायर होने के कुछ महीने बाद पूर्व CJI को उच्च सदन में नामांकित नहीं किया गया था। अगर इन्होंने इतिहास को पलटने की जहमत उठाई होती तो इन्हें पाता होता कि ये पहली बार नहीं है। साल 1988 में कॉन्ग्रेस शासनकाल में एक अन्य पूर्व सीजेआई रंगनाथ मिश्रा को राज्यसभा सांसद बनाया जा चुका है।

मगर द टेलीग्राफ इसके बारे में नहीं बताएगा, क्योंकि ये कॉन्ग्रेस के शासनकाल में हुआ था न और अभी बीजेपी शासनकाल में हो रहा है और वो भी अयोध्या मामले पर फैसला सुनाने वाले पूर्व सीजेआई के साथ, तो मुँह तो फाड़ेंगे ही न। इंदिरा गाँधी ने बहरुल इस्लाम को हाई कोर्ट के मुख्य जज के रूप में रिटायर होने के 9 महीने बाद फिर से उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया। बहरुल इस्लाम को कॉन्ग्रेस ने तीन बार राज्यसभा भेजा। उन्हें कॉन्ग्रेसियों के खिलाफ मुकदमों में कानून और न्याय की ऐसी की तैसी करके बचाने में महारत हासिल थी। सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में उन्होंने बिहार के उस समय के कॉन्ग्रेस सीएम जगन्नाथ मिश्रा के खि‍लाफ जालसाजी और आपराधिक कदाचार के मामले में क्लीन चिट देते हुए उनके खिलाफ मुकदमा चलाने से मना कर दिया था।

वैसे देखा जाए तो कॉन्ग्रेस की सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को उनके हितों की रक्षा करने पर पुरष्कृत करने की परंपरा रही है और इसका अनुपालन राजीव गाँधी ने भी किया। पूर्व चीफ जस्टिस रंगनाथ मिश्रा को 1984 में हुए सिखों के नरसंहार की जाँच का काम सौंपा गया था, जिसमें उन्होंने दंगों के लिए किसी को भी जिम्मेदार नहीं ठहराया था। उन्हें अपनी जाँच में सिवाय पुलिस की लापरवाही के किसी भी कॉन्ग्रेसी का हाथ नहीं दिखा था। इसका परिणाम यह हुआ कि उन्हें बाद में पुरस्कृत कर 1988 में राज्यसभा का सदस्य बनाया। आज जो कॉन्ग्रेस आक्रोशित और हताश होकर हाय-तौबा मचा रही है, वो इसलिए कि आज के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश कॉन्ग्रेस के 10 जनपथ से सोनिया गाँधी के इशारों को समझना बंद कर दिया है। साथ ही इनके अंदर यह डर भी बैठ गया है कि उनके पुराने पापों पर सुप्रीम कोर्ट के आगामी निर्णय कहीं उनको भारत की राजनीति से विलुप्त न कर दें।  

द टेलीग्राफ के घटिया हेडलाइन ट्विटर पर शेयर होने के साथ ही लोगों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया। लोगों ने लिखा कि लिबरलों को दलित से इतनी घृणा है कि राष्ट्रपति की तुलना वायरस से कर सकते हैं तो फिर दलितों के लिए इनकी सोच क्या होगी। एक ने लिखा कि सिर्फ लिबरल ही राष्ट्रपति की तुलना घातक वायरस से कर सकते हैं। प्रभात यादव नाम के एक अन्य यूजर ने लिखा, “वैसे नाम की मारने में हमलोग भी सिद्धहस्त हैं, लेकिन वामी छुछुन्दरों को छुछुन्दर ही रहने देना प्रकृति के साथ न्याय होगा।”

BJP और RSS ने ही दिल्ली में मुस्लिमों को मारा: ताहिर को बचाने के लिए पगलाए ‘स्क्रॉल’ ने याद किया बाबरी और गुजरात

प्रोपेगंडा परस्त पोर्टल ‘स्क्रॉल’ ने एक बार फिर से मस्जिदों और कथित अल्पसंख्यकों का राग अलापते हुए भाजपा पर निशाना साधा है। उसने लेख की शुरुआत ही एक ऐसे तथ्य के साथ की है, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। ‘स्क्रॉल’ लिखता है कि दिल्ली में हुए दंगों में भाजपा के कार्यकर्ताओं और स्थानीय मुस्लिमों के बीच लड़ाई हुई। एक हिन्दू-विरोधी दंगे को इस तरह से एक पार्टी और समुदाय विशेष के बीच का संघर्ष इतनी आसानी से बता देने का काम ‘स्क्रॉल’ जैसे प्रोपगैंडिस्ट वेबसाइट ही कर सकते हैं। ‘स्क्रॉल’ लिखता है कि इन दंगों में समुदाय विशेष को निशाना बनाया गया, उन्हें मारा गया और उनके व्यापारिक प्रतिष्ठानों को जला डाला गया।

जबकि अगर आप ऑपइंडिया पर दंगों की कवरेज देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि सच्चाई कुछ और है। इन हिन्दू-विरोधी दंगों में हिन्दुओं की दुकानों को चुन-चुन कर जलाया गया। 19 साल के विवेक के सिर में ड्रिल कर दिया गया। जब ये क्रूरता हुई, तब वो अपनी दुकान में ही बैठे हुए थे। जिन दिलबर नेगी के हाथ-पाँव काट कर उन्हें जिन्दा जला दिया गया, वो भी किसी की दुकान में ही काम करते थे। ऐसी कई घटनाएँ हैं, जो बताती हैं कि हिन्दुओं की दुकानों को चुन-चुन कर निशाना बनाया गया।

फिर ‘स्क्रॉल’ घूम-फिर कर मस्जिदों पर आ जाता है। उसने लिखा है कि मस्जिदों को निशाना बनाया गया और ऐसा हिन्दुओं ने किया। जबकि उसने शिव विहार के प्राचीन हनुमान मंदिर का कोई जिक्र नहीं किया है, जिस पर हमला किया गया और उसे बचाने के लिए हिन्दुओं ने बम और पत्थर सहे। या फिर चाँदबाग़ का वो शिव मंदिर, जिसकी छत पर ईंट-पत्थरों का जमावड़ा लगा हुआ था। ये सभी तो मंदिर थे, फिर उनका जिक्र इस लेख में क्यों नहीं किया गया? ‘न्यूज़लॉन्ड्री’ जैसे अन्य प्रोपेगंडा पोर्टलों ने भी ये साबित करने का प्रयास किया कि मंदिर पर हमले नहीं किए गए। मजहबी दंगाइयों को बचाने के लिए उन्होंने ऐसा किया।

इसके बाद इस लेख में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर बेवजह निशाना साधते हुए कहा गया है कि ये संगठन शुरू से मस्जिदों और समुदाय विशेष को निशाना बनाते रहे हैं। बाबरी मस्जिद विध्वंस वाली घटना का भी जिक्र किया गया है। जबकि ये सभी को पता है कि बाबरी मस्जिद वाली घटना एकदम अलग थी और सुप्रीम कोर्ट का राम मंदिर मामले में फ़ैसला आने के बाद भी इस मुद्दे को पकड़ कर रखे रहना ये दिखाता है कि ये प्रोपेगंडा पोर्टल्स साम्प्रदायिकता के बिना एक दिन भी जिन्दा नहीं रह सकते।

इसके अलावा 2002 दंगों की भी बात की गई है, जो नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में हुए। वो तब का समय था, जब देश के विभिन्न राज्यों में दंगे होने आम बात थे और गुजरात कुछ ज्यादा ही अशांत था। उस मामले में भी नरेंद्र मोदी को कोर्ट की क्लीन चिट मिल चुकी है। लेकिन, 2002 के बाद से अब तक गुजरात में कोई बड़ा दंगा नहीं हुआ- इस बात का जिक्र ‘स्क्रॉल’ ने नहीं किया है। उस दौरान कॉन्ग्रेस शाषित राज्यों में अधिकतर दंगे हुए और गुजरात में कॉन्ग्रेस के कार्यकाल में रोज दंगे होते थे- इन सबके बावजूद ‘स्क्रॉल’ ने 2002 का जिक्र किया। लेकिन हाँ, कारसेवकों को जिन्दा जलाने वाली घटना पर प्रोपेगंडा पोर्टल ने चुप्पी साध ली है।

दंगाइयों को बचाने के लिए फिर से सक्रिय हुआ ‘स्क्रॉल’

इसके अलावा दावा किया गया है कि हिन्दुओं ने भड़काऊ नारे लगाए और मस्जिदों के बाहर आपत्तिजनक हरकतें की। अगर ऐसा है तो हमेशा जुमे के दिन ही पुलिस फ़ोर्स को पूरी ताकत लगाने की ज़रूरत क्यों पड़ी? आज भी पड़ती है। ऐसा इसीलिए, क्योंकि मस्जिद में जमा हुई भीड़ ने कई बार निकल कर बवाल किया। दिल्ली ही नहीं, बंगाल सहित अन्य राज्यों में हुए दंगों में भी ये ट्रेंड देखा गया। ‘फक हिंदुत्व’ के पोस्टर लगाने और काली माता को हिजाब पहनाने वाले हरकतें सार्वजनिक रूप से कौन कर रहा था? ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ के नारे को भड़काऊ रूप देकर कौन चिल्ला रहा था?

इस लेख में सुप्रीम कोर्ट तक को नहीं बख़्शा गया है। संविधान की रट लगाने वाले राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और संसद द्वारा बनाए गए क़ानूनों की अवहेलना करने से भी बाज नहीं आते। सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद विध्वंस की और राम मंदिर के निर्माण का मार्ग क्यों प्रशस्त किया, इस पर आपत्ति जताई गई है। यानी कोर्ट भी अब इन वामपंथियों से पूछ कर फ़ैसला लेगा? अगर कोई अन्य सुप्रीम कोर्ट तो छोड़िए, सेशन कोर्ट के फ़ैसले के बारे में भी कुछ टिप्पणी करे तो यही वामपंथी उस पर संविधान का सम्मान न करने का आरोप मढ़ते हैं।

यह भी दावा किया गया है कि देश भर के मुस्लिमों ने सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या जजमेंट को सिर-आँखों पर रखा और आगे बढ़ गए। ऐसा नहीं है। तीन तलाक, अनुच्छेद 370 और राम मंदिर- इन चारों का गुस्सा सीएए के बहाने हिन्दुओं पर निकाला गया। चूँकि राम मंदिर पर फ़ैसले के समय और अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के समय सुरक्षा व्यवस्था कड़ी थी, इसीलिए दंगाई कुछ नहीं कर पाए। ख़ासकर उत्तर प्रदेश में, जहाँ योगी आदित्यनाथ की सरकार है। इसीलिए उन दंगाइयों ने दिल्ली को चुना, जहाँ चुनाव होने वाले थे। अमानतुल्लाह और ताहिर हुसैन जैसे नेताओं पर लग रहे आरोपों से इसकी पुष्टि भी हो जाती है।

इस लेख में लिबरलों व सेक्युलर वामपंथियों की तरह ही कपिल मिश्रा का रोना रोया गया है। जबकि ये साबित हो चुका है कि कपिल मिश्रा के बयान से पहले ही दंगे शुरू हो गए थे। ताहिर हुसैन के घरों से ट्रक्स में भर कर पत्थर निकले। क्या उन सभी को कपिल मिश्रा के बयान के तुरंत बाद घर में जमा कर लिया गया था? मस्जिदों और मजहबी दंगाइयों के घरों में जैसी तैयारी थी, वो एक दिन में की ही नहीं जा सकती।

कुल मिला कर बात ये है कि इस पूरे लेख में एक बार फिर से दिल्ली के हिन्दू-विरोधी दंगों में कट्टरपंथियों को पीड़ित और हिन्दुओं को हत्यारा साबित करने के प्रयास को पुनर्जीवित किया गया है। ताहिर हुसैन जैसों को बचाने और अंकित शर्मा की हत्या से हिन्दुओं का ध्यान भटकाने के लिए ये प्रोपेगंडा पोर्टल ‘पोस्ट रायट टास्क’ पर काम कर रहे हैं, जिसमें लोगों के दिमाग में ये भरना है कि ये दंगे भाजपा ने कराए थे और संघ ने समुदाय विशेष के लोगों को मारा। पुलिस क्या कहती है, कौन-कौन गिरफ़्तार हुए, जाँच में क्या निकला, जनता क्या कह रही है और वीडियो में क्या दिख रहा है- इन सबसे ऐसे पोर्टलों को कोई मतलब नहीं।

जिसका भाई था Pak की बड़ी हस्ती, उसे न सिर्फ CJI बनाया बल्कि उपराष्ट्रपति भी: इंदिरा गाँधी के शासन की कहानी

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा के लिए नामित किए जाने पर बुद्धिजीवियों में हलचल है। सोशल मीडिया के हर कोने पर पूर्व सीजेआई द्वारा लिए फैसलों को उनके राज्यसभा के टिकेट से जोड़कर देखा जा रहा है। लेकिन इस बीच ध्यान रहे कि रंजन गोगोई पहले पूर्व सीजेआई नहीं हैं जिनका नाम राज्यसभा के लिए भेजा गया हो। इससे पहले भी कुछ मुख्य न्यायाधीशों का नाम इस सूची में रह चुका है, जिन्हें राज्यसभा तक पहुँचाने का काम कॉन्ग्रेस ने किया। मगर, एक नाम इस लिस्ट में भारत के 11वें सीजेआई मोहम्मद हिदायतुल्लाह का भी है, जो कॉन्ग्रेस के कारण सीधे उपराष्ट्रपति बना दिए गए।

हिदायतुल्लाह 25 फरवरी 1968 से 16 दिसंबर 1970 के बीच देश के 11 वें मुख्य न्यायाधीश रहे। उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति जाकिर हुसैन ने की थी। मगर, 4 मई 1969 को राष्ट्रपति पद पर रहते हुए ही डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन का निधन हो गया। इसके तुरंत बाद तत्कालीन उपराष्ट्रपति श्री वराहगिरि वेंकट गिरि को कार्यवाहक राष्ट्रपति बना दिया गया जैसा कि संविधान में पहले से उल्लेखित था। मगर, इसके बाद श्री गिरि ने राष्ट्रपति बनने की इच्छा जाहिर की और इस पद के लिए चुनाव भी लड़ने की बात कही। लेकिन वो कार्यवाहक राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का पद त्याग कर ही ऐसा कर सकते थे।

बस फिर क्या… यहीं से राजनैतिक परेशानियाँ शुरू हुईं। चूँकि संविधान में उस समय तक ऐसा कोई प्रावधान नहीं था कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति की गैर मौज़ूदगी में देश का संवैधानिक प्रधान कौन होगा। इसके लिए काफ़ी विचार विमर्श किया गया और संविधान विशेषज्ञों की राय ली गई। तब 28 मई 1969 को संविधान का एक विशेष सत्र बुलाया गया, जिसमें संविधान के अधिनियम 16 में ये प्रावधान बनाया गया कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का पद रिक्त होने पर सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश देश का सर्वोच्च कार्यवाहक संवैधानिक प्रमुख होगा। लेकिन अगर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश का पद भी रिक्त हो जाए तो सर्वोच्च न्यायालय के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को सर्वसम्मति से कार्यवाहक संवैधानिक प्रमुख बनाया जाएगा।

इसके बाद 20 जुलाई 1969 को वेंकट गिरि ने 12 बजे दोपहर से पहले ही कार्यवाहक राष्ट्रपति पद से इस्तीफ़ दे दिया क्योंकि उनका कार्यकाल उस दिन प्रातः 10 बजे पूर्ण हो रहा था। इसके बाद मोहम्मद हिदायतुल्लाह को कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया गया। इसके लिए पद और गोपनीयता की शपथ सर्वोच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश “श्री जेसी सह” ने दिलाई।

हिदायतुल्लाह 24 अगस्त 1969 तक यानी कुल 35 दिनों तक इस पद पर रहे, जब तक अगले राष्ट्रपति निर्वाचित नहीं हो गए। और इस तरह एक सीजेआई को भारत के पहले कार्यवाहक राष्ट्रपति बनने का गौरव प्राप्त हुआ।

लेकिन इसके बाद भी हिदायतुल्लाह के जीवन में उपाधियाँ दर्ज करने का दौर थमा नहीं। कार्यवाहक राष्ट्रपति का पद त्यागने के लगभग 10 सालों बाद उन्हें 31 अगस्त 1979 को सर्वसम्मति से उपराष्ट्रपति पद के लिए चुन लिया गया और उन्होंने उपराष्ट्रपति रहते हुए अपने 6 साल का कार्यकाल पूर्ण किया और उन्होंने राज्यसभा के सभापति की ज़िम्मेदारी भी निभाई।

बताया जाता है कि मोहम्मद हिदायतउल्लाह इंदिरा गाँधी के प्रिय थे। जिस समय उन्हें बतौर उपराष्ट्रपति चुना गया, उस समय भी इंदिरा गाँधी ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

वैसे तो हिदायतुल्लाह सभी प्रमुख दलों के एकमात्र सर्वसम्मत उम्मीदवार थे, और उनके नाम का समर्थन प्रधानमंत्री चरण सिंह, विपक्ष के नेता जगजीवन राम और अन्य नेताओं ने किया था, जिनमें वाईबी चव्हाण, एचएन बहुगुणा और कमलापति त्रिपाठी भी शामिल थे। लेकिन मुख्य रूप से वे इंदिरा गाँधी के नामांकित व्यक्ति थे और कॉन्ग्रेस (आई) के नेताओं ने यह स्पष्ट कर दिया था कि अगर वे हिदायतुल्ला के नामांकन का विरोध करते, तो वे जनता (एस) का समर्थन नहीं करेंगे। अब जाहिर है इसके बाद उनके उपराष्ट्रपति बनने का किसी ने विरोध नहीं किया और वे सीधे भारत के उपराष्ट्रपति चुने गए।

इस दौरान वे जामिया मिलिया, दिल्ली और पंजाब विश्वविद्यालय के कुलपति भी बने। 31 अगस्त 1984 को उन्होंने उपराष्ट्रपति का कार्यकाल पूरा किया। इसके बाद वो बम्बई रवाना हुए। उनकी रवानगी में स्टेशन पर विदाई देने के लिए स्वयं प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी समेत पीवी नरसिम्हा राव और आर वेंकटरमण मौजूद थे।

यहाँ बता दें कि हिदायतुल्लाह के पिता हाफ़िज विलायतुल्लाह 1928 में भाण्डरा से डिप्टी कमिश्नर एवं डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। सरकारी सेवा में रहते हुए ब्रिटिश सरकार ने श्री हिदायतुल्लाह के पिता को ख़ान बहादुर की उपाधि, केसरी हिन्द पदक, भारतीय सेवा सम्मान और सेंट जोंस एम्बुलेंस का बैज प्रदान किया था।

एक कहानी और भी! हिदायतुल्लाह के भाई थे मोहम्मद इकरामुल्लाह। बँटवारे के समय वो पाकिस्तान चले गए। वह एक प्रमुख पाकिस्तानी राजनयिक थे। इकरामुल्लाह की पत्नी थी शाइस्ता सुहरावर्दी। शाइस्ता हुसैन शहीद सुहरावर्दी की भतीजी थीं। और हुसैन शहीद सुहरावर्दी कौन थे? वो अविभाजित पाकिस्तान के कुछ समय के प्रधानमंत्री थे। वैसे शाइस्ता खुद पहली पाकिस्तानी संविधान सभा की सदस्य भी थीं।

गौरतलब है कि ये कहानी मोहम्मद हिदायतुल्लाह की थी। जिनके न्यायाधीश बनने के बाद कभी परिस्थितियों ने देश के उच्च पद पर आसित करवाया, तो कभी इंदिरा गाँधी के समर्थन ने। मगर, इससे पहले और भी सीजेआई रहे जिन्हें कॉन्ग्रेस के समर्थन से राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया। वर्ष 1998 से 2004 तक कॉन्ग्रेस ने रंगनाथ मिश्रा को राज्यसभा के लिए नामित कराया था। वे देश के 21वें मुख्य न्यायाधीश थे। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बहरूल इस्लाम भी 1962 और 1968 में कॉन्ग्रेस के टिकट पर राज्यसभा सांसद चुने गए थे। लेकिन आज जब पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई राज्यसभा के लिए मनोनीत किए गए तो कॉन्ग्रेस उन पर तंज कस रही है, कटाक्ष कर रही है और ये दावा कर रही है कि राज्यसभा के लिए पूर्व सीजेआई गोगोई को मनोनीत किए जाने पर न्यायपालिका से जनता का विश्वास कम होता जा रहा है।

वकील➨राज्यसभा➨HC जज➨रिटायर➨SC जज➨राज्यसभा: बहरुल इस्लाम और कॉन्ग्रेसी काल की कहानी

कोरोना वायरस चैलेंज के नाम पर ‘Tik-Tok स्टार’ ने चाटी टॉयलेट सीट: ऐसे स्टंट से बढ़ रहा है संक्रमण का डर, देखें वीडियो

कोरोना वायरस इस समय पूरे विश्व के लिए चुनौती है। हर देश की सरकार इससे लड़ने का प्रयास कर रही है। हर जगह लोगों को इस भयानक संक्रमण से बचाने के लिए जागरूक किया जा रहा है। संक्रमित लोगों से भी निवेदन किया जा रहा है कि वे अस्पताल में रहकर अपना इलाज करवाएँ और सार्वजनिक स्थलों पर जानें से बचे। लेकिन बावजूद इतने प्रयासों के कुछ गैर जिम्मेदार लोगों की संख्या हमें लगातार बढ़ती दिख रही है।

अभी कल की बात है जब मुंबई महानगर के अस्पताल से 11 कोरोना से संदिग्ध संक्रमित लोग सुरक्षाकर्मियों को चकमा देकर फरार हो गए थे। ऐसा सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उन्हें जाँच पूरी होने तक आइसोलेशन वार्ड में रख दिया गया था। बाद में इनमें से 1 की रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। इसी तरह, इससे पहले नागपुर में भी 5 लोग अस्पताल से फरार हो गए थे और कर्नाटक में तो कुछ मुस्लिम लोगों ने संदिग्ध होने के बावजूद इस्लाम का हवाला देकर चेक अप करवाने से मना कर दिया था।

अब, इस समय ये सभी लोग कहाँ गए कितने लोगों के संपर्क में आए कुछ नहीं पता। बस लगातार खबरें आ रही हैं कि भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की तादाद बढ़ रही है और आज इससे तीसरी मौत हो गई। अब हालाँकि, हो सकता है अन्य देशों के मुकाबले भारत में इसके कम केस होने के कारण कई लोगों में इसके फैलने का डर कम हो। लेकिन, इसके प्रति बेफिक्र हो जाने से पहले साउथ कोरिया की स्थिति जानने की जरूरत है।

साउथ कोरिया- एक ऐसा देश जहाँ केवल एक गैर-जिम्मेदार शख्स के कारण पूरे देश में कोरोना वायरस फैल गया और कोई कुछ नहीं कर पाया। संक्रमित शख्स के कारण पूरे 1160 लोग संक्रमित हुए और देखते ही देखते ये तादाद बढ़ गई। नतीजतन आज ये देश इस संक्रमण के कारण बदहाल हो चुका है और संक्रमित लोगों की संख्या 6000 के पार तक पहुँच गई है।

ऐसी स्थिति में जब हर माध्यम और हर संसाधम का प्रयोग करके इसकी रोकथाम और इससे बचाव के लिए उपयुक्त कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। वहाँ टिकटॉक पर एक वीडियो वायरल हो गई है। विडियो कोरोना चैलेंज के नाम पर बनाई गई है। इसे बनाने वाली का नाम एवा लुईस है। लुईस अमेरिका के फ्लोरिडा की निवासी है और टिकटॉक पर बहुत सक्रिय है।

एवा ने 15 मार्च को एक वीडियो बनाकर टिकटॉक पर अपलोड की और कैपशेन में लिखा, प्लीज इसे रीट्विट करें, ताकि लोग जान सकें कि विमान में सफाई कैसे की जा सकती है। यहाँ हालाँकि कैप्शन में ऐसा कुछ नहीं है, लेकिन वीडियो यदि देखें तो एवा इसमें कोरोना वायरस के नाम पर टॉयलेट की सीट को जीभ से चाटते देखी जा सकती हैं और ऐसी घटिया हरकत करने के बाद वो अपने हाथ विक्टरी का साइन भी बनाती दिखती हैं। 

सोचिए, एक ओर जहाँ विश्व भर में टिकटॉक का खुमार युवाओं में व्यापक स्तर पर बढ़ चुका है कि वो टिकटॉक पर आने वाले हर चैलेंज को अपनी कलाकारी से पूरा करने की कोशिश करते हैं, वहाँ पर ऐसी विडियो चैलेंज बनाकर डालना कहाँ की समझदारी है? हम मानें या न मानें लेकिन टिकटॉक ने जहाँ लोगों की प्रतिभा को लोगों तक पहुँचने का मंच दिया है, वहीं धूर्त लोगों को भी सामने लाकर रख दिया है। जिनका काम मनोरंजन के नाम पर सिर्फ़ अश्लीलता और अराजकता फैलाना रह गया है।

एवा की वीडियो को देखने के बाद अभी तक किसी यूजर ने उसपर पॉजिटिव रिएक्ट नहीं किया है, जो कि एक संतोषजनक बात है। लेकिन उन लोगों का क्या भरोसा जो हर डिजिटल चुनौती को पूरा करने के लिए आमादा हो जाते हैं और इसी जुगत में लग जाते हैं कि किसी तरह वह भी ऐसे स्टंट करके टिकटॉक स्टॉर बनें और उनकी विडियो भी वायरल हो जाए।

ऐसे संवेदनशील समय में ध्यान रखने की आवश्यकता है कि एवा जैसे लोग उन लोगों से कम नहीं है जो संक्रमित होने के बावजूद अस्पतालों में ईलाज कराने की जगह वहाँ से फरार हो रहे हैं और हजारों की संख्या में लोगों के संपर्क में आकर उन्हें भी बीमार कर रहे हैं। फर्क दोनों में बस ये है कि वे अपने डर के कारण अन्य लोगों को जाने-अंजाने में संक्रमित कर रहे हैं, मगर एवा जैसे लोग जान बूझकर लोगों को संक्रमित होने के लिए प्रोतसाहित कर रहे हैं।


रेप की कोशिश में कॉन्ग्रेसी MLA का साला गिरफ्तार, पंचायत में सिर्फ 2 थप्पड़ मारकर निपटा दिया गया था मामला

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में कॉन्ग्रेस विधायक विनय भगत के साले नीतेश भगत को गिरफ्तार कर लिया गया है। विधायक के साले पर आरोप है कि उसने छात्रा को लिफ्ट देने के बहाने सुनसान जगह पर ले जाकर दुष्कर्म का प्रयास किया था। इससे पहले मामले में पंचायत बिठाकर आरोपित को दो थप्पड़ लगाकर माफी मँगवाकर मामले को दबाने का प्रयास किया गया था। 

परीक्षा देकर घर लौट रही नाबालिग छात्रा से छेड़छाड़ का मामला पंचायत ने दो थप्पड़ की सजा सुनाकर रफा-दफा कर दिया। ऐसा इसलिए क्योंकि आरोपित कॉन्ग्रेस विधायक विनय भगत का साला है। महत्वपूर्ण बात ये है कि इसमें थप्पड़ मारने की रस्म आरोपित की बहन यानी विधायक की बहन ने निभाई। इसके साथ ही पीड़िता ने आरोप लगाया कि मामले को पंचायत में ही दबा देने के लिए सरपंच को आरोपित की तरफ से 50 हजार रुपए दिए गए थे। पीड़िता ने बताया कि 50 हजार में से पीड़िता के घर वालों को 10 हजार रुपए दिए गए और बाकी का पैसा पंचायत में रख लिया गया।

जानकारी के मुताबिक 12 मार्च को जशपुर में परीक्षा देकर घर लौट रही छात्रा को नीतेश भगत ने लिफ्ट देने के बहाने उसे अपनी गाड़ी में बैठाया और सुनसान रास्ते का फायदा उठाकर उसके साथ रेप की कोशिश करने लगा। तभी छात्रा ने साहस का परिचय देते हुए युवक का मोबाइल छीनकर वहाँ से भाग खड़ी हुई। घर पहुँचते ही छात्रा ने परिजनों को घटना की जानकारी दी।

जिसके बाद परिजन पीड़िता को लेकर गाँव के सरपंच के घर पहुँचे और पूरे मामले की जानकारी दी। तब सरपंच और उसके पति ने इस मामले में पंचायत में बैठक करने की बात कही। दूसरे दिन पंचायत की बैठक रखी गई। जिसमें सैकड़ों लोग मौजूद थे। बैठक में आरोपित की बहन और विधायक विनय भगत की पत्नी भी पहुँची। बैठक में आरोपित को दो थप्पड़ लगाकर माफी मँगवाकर मामले को रफा-दफा करने का फैसला किया गया। 

पीड़िता पंचायत के फैसले से नाराज होकर 14 मार्च को अपने आधा दर्जन दोस्तों के साथ पुलिस स्टेशन पहुँची और आरोपित नीतेश भगत के खिलाफ कार्रवाई की माँग को लेकर शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद नीतेश भगत के खिलाफ छेड़छाड़ का मामला दर्ज किया गया और फिर कार्रवाई करते हुए आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया। पीड़िता के मुताबिक चूँकि मामला हाईप्रोफाइल नेता के रिश्तेदार से जुड़ा था, इसलिए उस पर लगातार मामले में शिकायत ना करने का दबाव बनाया जा रहा था। जब पीड़िता अपने दोस्तों के साथ शिकायत करने पुलिस स्टेशन पहुँची तो पीड़िता के परिजन और ग्रामीण वहाँ पहुँचकर भी पीड़िता को मामला वापिस लेने का दबाव बनाया गया था।

CM योगी को वकील अब्दुल ने कहा आतंकवादी, पुलिस ने दबोचा: अब खुद पड़ेगी वकील की जरूरत

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ ट्विटर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में पुलिस ने एक वकील के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया है। रविवार (मार्च 15, 2020) की दोपहर पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहाँ से उसे जेल भेज दिया गया। आरोपित वकील अब्दुल हन्नान के खिलाफ आईटीएक्ट और देशद्रोह की धारा में FIR दर्ज की गई है।

अब्दुल हन्नान के ट्विटर अकाउंट से सीएम के बारे में अभद्र ट्वीट किए गए थे। साथ ही सरकार की नीतियों के बारे में भी गलत बातें लिखीं गई थीं। कुछ ऐसी भड़काऊ बातें भी लिखी थीं, जिससे सामाजिक सौहार्द्र बिगड़ने की आशंका थी। इस बारे में अधिकारियों ने डीआईजी अनंत देव को ट्विटर के माध्यम से जानकारी दी। इसके बाद कल्याणपुर पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज की। 

जाँच के लिए साइबर सेल प्रभारी इंस्पेक्टर लान सिंह की टीम को लगाया गया। पुलिस ने देशद्रोह की धारा 124 (ए) और आइटी एक्ट की धारा 67 के तहत मुकदमा दर्ज कर आरोपित को गिरफ्तार कर लिया। कल्याणपुर थाना प्रभारी अजय सेठ ने बताया कि ट्विटर से आपत्तिजनक पोस्ट को डिलीट करवा दिया गया है। इसके साथ ही आरोपित के फॉलोवर्स और उससे जुड़े अन्य संदिग्धों की भी जाँच की जा रही है। कुछ आपत्तिजनक मिला तो सभी के खिलाफ कार्रवाई होगी।

दरअसल उत्तर प्रदेश रिकवरी ऑफ डैमेज टू पब्लिक एंड प्राइवेट प्रॉपर्टी अध्यादेश के ड्राफ्ट को मंजूरी मिलने के बाद सोशल मीडिया पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। 13 मार्च को भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता शलभमणि त्रिपाठी की ओर से ट्विटर पर मुख्यमंत्री के भाषण का एक वीडियो डालने के बाद कल्याणपुर केशवपुरम निवासी अधिवक्ता अब्दुल हन्नान ने इसे रीट्वीट कर मुख्यमंत्री पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी। 

शलभमणि त्रिपाठी ने वीडियो के कैप्शन में लिखा, “तुम कागज नहीं दिखाओगे, और दंगा भी फैलाओगे, तो हम लाठी भी चलवाएँगे, घरबार भी बिकवाएँगे….और हाँ पोस्टर भी लगवाएँगे।” इसी ट्वीट को रिट्वीट करते हुए अब्दुल हन्नान ने रविवार को सीएम योगी आदित्यनाथ को ‘आतंकवादी’ बता दिया था।

एक अन्य ट्वीट में हन्नान ने ये भी ऐलान किया कि वह प्रदर्शनकारियों को मुफ्त में कानूनी मदद मुहैया कराएगा और साथ ही सभी ‘संविधान के चाहने वालों’ से अपील भी की कि वह इस ट्वीट को शेयर करें।

वीर सावरकर मार्ग पर कालिख पोती, लिख डाला, मो. अली जिन्ना… JNU की घटना, पाकिस्तान की नहीं

दिल्ली विश्वविद्यालय में वीर सावरकर की मूर्ति पर कालिख पोतने वाले वाकये के बाद अब JNU में भी ऐसा मामला सामने आया है। लेकिन यहाँ पर वामपंथियों का गढ़ होने के कारण ये मसला सिर्फ़ कालिख पोतने तक सीमित नहीं है बल्कि देश को 2 टुकड़ों में विभाजित करने वाले जिन्ना के नाम से भी जुड़ गया है।

दरअसल, कल खबर आई थी कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सुबनसर हॉस्टल के नजदीक एक सड़क का नाम बदलकर वीर सावरकर मार्ग कर दिया गया, जिसे देखने के बाद वामपंथी काफी आग बबूला हुए और यहाँ तक कहा कि सावरकर के लिए और उनके लोगों के लिए न कभी जेएनयू में जगह थी और न कभी होगी।

अब हालाँकि, कल तक इस मार्ग का सिर्फ़ मौख़िक रूप से विरोध होता दिख रहा था। लेकिन रात भर में ये मामला ओछी हरकतों पर पहुँच गया। पहले मालूम चला है कि इस मार्ग के बैनर पर जहाँ वीर सावरकर मार्ग लिखा था, वहाँ उनका नाम छिपाकर उसके ऊपर बड़ा-बड़ा बीआर अंबेडकर लिख दिया गया और बाद में उस पर भी कालिख पोत दी गई और वहाँ सीधे जिन्ना की तस्वीर चस्पा दी गई। जिस पर मोहम्मद अली जिन्ना मार्ग लिखा था।

जेएनयूसू की अध्यक्ष आइशी घोष ने इन तस्वीरों को अपने फेसबुक पर शेयर किया और लिखा, “हम अपने धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को तोड़-मरोड़ कर रखने वाले अंग्रेजों से माफी माँगने और उन्हें स्वीकार करने वाले कभी नहीं हो सकते। आइए उन लोगों का सम्मान करें जिन्होंने हमें अपना संविधान दिया।”

हालाँकि बता दें कि आइशी द्वारा शेयर की गई तस्वीर में जिन्ना की चस्पा हुई तस्वीरें नहीं हैं। लेकिन सोशल मीडिया पर बोर्ड पर चिपकी जिन्ना वाली तस्वीरें तेजी से शेयर की जा रही हैं। यूजर्स का कहना है कि JNUSU में बैठे जिन्ना के वंशजों ने वीर दामोदर सावरकर मार्ग बोर्ड को छतिग्रस्त कर जिन्ना अली मार्ग का पोस्टर लगा दिया है। अभिव्यक्ति की आड़ में पाकिस्तान परस्ति अब खुल कर सामने आने लगी है।

यूजर्स इसे वामपंथियों की राजनीति बता रहे हैं और सवाल पूछ रहे हैं कि क्या हम पाकिस्तान में हैं? और अगर नहीं तो क्या जेएनयू में पाकिस्तानी भर चुके हैं।

लोगों का आरोप है कि इस कुकृत्य को aisa और sfi के गुंडों ने अंजाम दिया है। लेकिन वह चाहकर भी सावरकर के उज्ज्वल नाम को कालीख से नहीं मिटा सकते।

जेएनयू में हुई शर्मनाक हरकत पर लोगों की माँग है कि देश में अब विभाजनकारी मानसिकता को खत्म किया जाना चाहिए। क्योंकि अभिव्यक्ति की आड़ में पाकिस्तान परस्ति अब खुल कर सामने आने लगी है।

‘IS आतंकी तो नमाज भी नहीं पढ़ते, मेरे साथ धोखा हुआ… मैं तो खलीफा के हिसाब से जीने के लिए ज्वाइन की थी’

इस्लामिक स्टेट से जुड़ने के लिए केरल से भागकर अफगानिस्तान जाने वाली लड़कियों में एक नाम सोनिया सेबेस्टियन उर्फ आयशा का है। आयशा ने कुछ समय पहले ISIS मॉड्यूल के कासरगोड रिंग लीडर अब्दुल राशिद से निकाह किया था और उसके बाद कई युवकों को कट्टरपंथी बनाने का काम किया था। मगर, आज अपने शौहर की मौत के बाद आयशा वापस भारत लौटना चाहती है। अब उसका कहना है कि आईएस के गढ़ में स्थितियाँ उसकी उम्मीदों के विपरीत थीं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आयशा का पति अब्दुल राशिद अब्दुल्ला भी आईएस को लेकर काफी निराश था। इसलिए उसने वहाँ आत्महत्या कर ली। जबकि अफगानिस्तान के सुरक्षाबल द्वारा आतंकियों को पकड़ने के लिए शुरू किए गए अभियान में आयशा ने आत्मसमर्पण कर दिया। अब फिलहाल वह काबुल की एक जेल में बंद है और कहती है कि वह इस्लामिक स्टेट से नहीं जुड़े रहना चाहती।

आयशा का कहना है, “मुझे लगता है कि बहुत से लोग जो (आईएस में शामिल होने) आना चाहते हैं, उनकी भी यही उम्मीदें हैं। मैं उन्हें निर्णय लेने से पहले दो बार सोचने का सुझाव दूँगी।”

खबर के अनुसार, आयशा ने वहाँ की पोल-पट्टी खोलते हुए कहा कि हम अफगानिस्तान यह सोचकर गए थे कि ‘खलीफा’ के हिसाब से इस्लामी जीवन जी सकेंगे। लेकिन जब हम यहाँ पहुँचे, तो हमने महसूस किया कि लोग नमाज पढ़ने तक के लिए भी नहीं जा रहे थे।

यहाँ बता दें कि राशिद ने 90 से ज्यादा ऑडियो क्लिप भेजकर आईएस के विभिन्न पहलुओं को केरल के लोगों तक पहुँचाया था। लेकिन आयशा के मुताबिक उसका पति अफगानिस्तान जाकर इन चीजों को देखकर बहुत निराश हुआ और इसके बाद उसने ऑडियो मैसेज भेजना बंद कर दिया। आयशा ने कहा कि वह केरल वापस लौटना चाहती है और राशिद के माता-पिता के साथ रहना चाहती है।

आयशा के साथ एक अन्य लड़की और है। नाम है फातिमा उर्फ निमिषा। जानकारी के अनुसार, निमिषा ने भी कुछ साल पहले एक ईसाई से शादी की थी। मगर बाद में दोनों ने इस्लाम कबूल कर लिया था और दोनों अफगानिस्तान चले गए। आज आयशा की तरह निमिषा का भी कहना है कि वह भारत लौटना चाहती है बशर्ते उसे कैद में न रखा जाए और टार्चर न किया जाए। उसका कहना है, “मैं यह नहीं कह सकती कि मैं अफगानिस्तान में रहना चाहती हूँ क्योंकि यह मेरी जगह नहीं है। भारत मेरी जगह है।”

डॉक्टर बनना चाहती थी केरल की निमिषा, लव जिहादियों ने पहले फातिमा बनाया फिर फिदायीन बम

वकील➨राज्यसभा➨HC जज➨रिटायर➨SC जज➨राज्यसभा: बहरुल इस्लाम और कॉन्ग्रेसी काल की कहानी

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को नामित सदस्य के तौर पर राज्यसभा का सदस्य बनाने का ऐलान हुआ है। फैसले का ऐलान होते ही कॉन्ग्रेस पार्टी के अलावा असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं की ओर से मोदी सरकार पर न्यायपालिका की स्वतंत्रता के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाया गया। आज कॉन्ग्रेसियों द्वारा संविधान व सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लेकर जो छटपटाहट दिख रही है, उसका सिर्फ एक कारण है और वह यह है कि पिछले 5 दशकों में यह पहली बार है, जब सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश कॉन्ग्रेस के प्रभाव से बाहर है। 

बता दें कि रंजन गोगोई से पहले भी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश राज्यसभा की शोभा बढ़ा चुके हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि गोगोई जहाँ नामित सदस्य के तौर पर राज्यसभा के सदस्य बने हैं, वहीं पहले वाले जज कॉन्ग्रेस पार्टी के टिकट पर राज्यसभा पहुँचे थे।

हम यहाँ बात कर रहे हैं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बहरुल इस्लाम की। बहरुल इस्लाम सुप्रीम कोर्ट के जज थे, जिन्होंने राज्यसभा की शोभा बढ़ाई थी। बहरुल इस्लाम की कहानी बड़ी रोचक है। वे जब सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते थे, तब उन्हें 1962 में पहली बार असम से कॉन्ग्रेस पार्टी ने राज्यसभा भेजा। उसके बाद दूसरी बार 1968 में उन्हें राज्यसभा भेजा गया लेकिन इसके पहले कि वो 6 साल का अपना कार्यकाल पूरा कर पाते, उन्हें तब के असम और नागालैंड हाईकोर्ट (आज के गुवाहाटी हाईकोर्ट) का जज बनाया गया। जज बनते ही उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया। 1983 में सुप्रीम कोर्ट के जज से रिटायर होने के तुरंत बाद उन्हें तीसरी बार कॉन्ग्रेस पार्टी ने राज्यसभा भेज दिया।

उन्होंने 1951 में असम हाई कोर्ट के वकील के रूप में और 1958 में सुप्रीम कोर्ट के वकील के रूप में काम किया। इसी बीच उन्होंने 1956 में कॉन्ग्रेस का दामन थाम लिया। इसके बाद अप्रैल 1962 में वह राज्‍यसभा के सदस्‍य के रूप में चुने गए। इसके बाद 1967 में वो कॉन्ग्रेस के टिकट पर लड़े, मगर पराजित हो गए। फिर 1968 में दोबारा राज्‍यसभा सदस्‍य के रूप में निर्वाचित हुए। कॉन्ग्रेस के विभाजन के दौरान वह इंदिरा गाँधी के गुट से जुड़ गए। 1972 में उन्‍होंने राज्‍यसभा से इस्‍तीफा दे दिया और गुवाहाटी हाईकोर्ट के जज बने।

हाई कोर्ट के मुख्‍य जज से रिटाटर होने के बाद एक मार्च 1980 को फिर सक्रिय राजनीति में चले आए। नौ महीने के रिटायटरमेंट के बाद वह सुप्रीम कोर्ट के जज बने। वह 1 मार्च 1980 को रिटायर हो गए थे। उस समय इंदिरा गाँधी वापस सत्ता में आ गई थीं। वो प्रधानमंत्री थीं। इंदिरा गाँधी ये सहन नहीं कर सकीं कि एक कॉन्ग्रेसी नेता रिटायर हो गए, जो कि एक जज के रूप में उनके लिए काफी मददगार थे। तो इंदिरा गाँधी ने हाई कोर्ट के जज के रूप में रिटायर होने के 9 महीने बाद फिर से उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया।

उन्हें 4 दिसंबर 1980 को सुप्रीम कोर्ट में जज के तौर पर नियुक्त किया गया था। हालाँकि एक रिटायर जज का इस तरह फिर से जज बनाने का फैसला काफी अजीब और अद्वितीय भी था, क्योंकि आम तौर पर एक रिटायर जज को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त नहीं किया गया था और आगे वे केवल पंद्रह महीनों के बाद रिटायर हो सकते थे। सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के एक महीने पहले उन्‍होंने 12 जनवरी 1983 को इस्‍तीफा दे दिया और कॉन्ग्रेस के बारपेटा लोकसभा सीट से चुनाव लड़े।

बहरुल इस्लाम पूरी तरह से कॉन्ग्रेसी थे और उन्हें कॉन्ग्रेसियों के खिलाफ मुकदमों में कानून और न्याय की ऐसी की तैसी करके बचाने में महारत हासिल थी। सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में उन्होंने बिहार के उस समय के कॉन्ग्रेस सीएम जगन्नाथ मिश्रा के खि‍लाफ जालसाजी और आपराधिक कदाचार के मामले में क्लीन चिट देते हुए उनके खिलाफ मुकदमा चलाने से मना कर दिया था। 

अपनी रिटायरमेंट के 6 हफ्ते पहले और बिहार के तत्कालीन कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा को जालसाजी मामले में क्लीन चिट देने के एक महीने बाद, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट जज के पद से इस्तीफा दे दिया और 1983 में बारपेटा लोकसभा सीट के लिए कॉन्ग्रेस उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल किया। हालाँकि असम की अशांति की वजह से वहाँ का चुनाव टल गया तो कॉन्ग्रेस ने उन्हें तीसरी बार राज्यसभा का सदस्य बनाया।