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2 परिवार से आगे निकली J&K की राजनीति: PDP, NC, कॉन्ग्रेस के पूर्व मंत्री, MLA ने बना ली ‘अपनी पार्टी’

जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी छोड़कर सैयद अल्ताफ बुखारी ने ‘अपनी पार्टी’ के गठन का एलान किया। रविवार (8 मार्च 2020) को बुखारी ने अपनी पार्टी की घोषणा करते समय कहा कि उनकी पार्टी का एकमात्र एजेंडा जम्मू कश्मीर का विकास है। इस पार्टी में न सिर्फ PDP बल्कि नेशनल कॉन्फ्रेंस और कॉन्ग्रेस के भी 30 से ज्यादा नेता शामिल हुए हैं। नई नवेली पार्टी में पूर्व मंत्री से लेकर कई पूर्व विधायक भी हैं। अल्ताफ बुखारी की इस नई पार्टी का एलान बुखारी के लाल चौक स्थित आवास पर किया गया।

इससे पहले शनिवार को पार्टी से जुड़ने वाले नेताओं की अहम बैठक हुई, जिसमें नए दल की तैयारियों को अंतिम रूप दिया गया। इस नई पार्टी के अस्तित्व में आने से पीडीपी को तगड़ा झटका लगा है। ‘अपनी पार्टी’ के गठन के बाद जम्मू कश्मीर की राजनीति को 2 परिवारों की जकड़ से निकाल आगे ले जाने का संकल्प लिया गया। साथ ही 370 पर सदा के लिए रोने के बजाय आगे बढ़ने पर भी बल दिया गया।

पार्टी बनाने की घोषणा करते के बाद मीडिया से बातचीत में बुखारी ने कहा कि यह एक बहुत ही खुशी की बात है कि हमने आखिरकार अपनी पार्टी बना ली है और इसे ‘अपनी पार्टी’ के रूप में जाना जाएगा। बुखारी ने कहा कि ये पार्टी आम लोगों की पार्टी है, जो आम लोगों ने बनाई है। ये किसी परिवार की बनाई पार्टी नहीं है और इसका अध्यक्ष कोई भी इंसान दो कार्यकाल से ज्यादा के लिए नहीं हो सकता। उनके अनुसार, “हम पर बहुत सारी जिम्मेदारी है, क्योंकि उम्मीदें और चुनौतियाँ बहुत हैं। मैं जम्मू और कश्मीर के लोगों को विश्वास दिलाता हूँ कि मेरी इच्छाशक्ति मजबूत है।”

प्रेस से बात करते वक्त आर्टिकल 370 और नेताओं की नजरबंदी आदि सवालों पर बुखारी ने खुल कर अपनी राय रखी। पीडीपी की सरकार में मंत्री रहे अल्ताफ बुखारी ने जम्मू कश्मीर के तीन पूर्व सीएम सहित अन्य नेताओं की गिरफ्तारी पर कहा कि लोकतंत्र में नेताओं को नजरबंद रखना सही नहीं है। याद रहे कि आर्टिकल 370 को निरस्त कर जम्मू-कश्मीर राज्य का विशेष दर्जा खत्म किए जाने और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट देने के बाद से राज्य में हिंसा की संभावना को देखते हुए कई नेता नजरबंद रखे गए हैं, जिनमें फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती भी शामिल हैं। वहीं 370 के सवाल पर बुखारी ने कहा कि यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में है, जिसके फैसले का हम सभी को इन्तजार है, लिहाजा इस पर अभी बात करने की कतई जरूरत नहीं समझता।

बुख़ारी ने अपनी पार्टी के एजेंडे पर कहा, “राज्य के लोगों के आत्मसम्मान और सम्मान की रक्षा करने, कश्मीरी पंडितों की गरिमापूर्ण वापसी, युवाओं और महिलाओं के सशक्तिकरण की माँग ‘अपनी पार्टी’ करेगी।” बुखारी ने कहा कि यह सूबे के आम लोगों की पार्टी है, इसलिए इसका नाम ‘अपनी पार्टी’ रखा गया है। और उनकी पार्टी लोगों की तर्कसंगत आकांक्षाओ का ध्यान रखेगी। बकौल बुखारी उनकी पार्टी ऐसा कोई वादा नहीं करेगी, जो सच पर आधारित नहीं हो।

जम्मू कश्मीर के “प्रधानमंत्री” रह चुके बख्शी गुलाम मोहम्मद से अपनी तुलना पर पीडीपी के पूर्व हैवी वेट नेता अल्ताफ बुखारी ने जवाब दिया- अगर बख्शी साहब (बख्शी गुलाम मोहम्मद) के साथ मेरी तुलना की जाती है तो ठीक है, मुझे याद आता है कि बख्शी साहब का पॉलिटिकल और इकोनॉमिक विजन था। उसी विजन को आज उभारने की जरूरत है।

जम्मू-कश्मीर के आर्थिक हालातों का जिक्र करते हुए बुखारी ने कहा कि चाहे छोटा व्यवसायी हो या बड़ा, सबकी हालत खराब है। उन्होंने कहा कि हम चुप बैठते लेकिन मेरे जमीर ने मुझे यह इजाजत नहीं दी। 5 अगस्त के बाद से जेलों में बंद राजनीतिक कैदियों के सवाल पर बुखारी ने ऐसे सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने की माँग की।

दिल्ली की राजनीति से जुड़े प्रश्न पर उन्होंने कहा कि हम इसे इस तरह नहीं देखते कि वहाँ कौन राज कर रहा है, हमारे लिए वहाँ जो भी है, वो भारत सरकार है, जिसके साथ हमें मिलकर चलना है। पार्टी में शामिल हुए और आगे शामिल होने वाले नेताओं से जुड़े सवाल पर बुखारी ने कहा कि हमारी पार्टी ओल्ड एंड यंग चेहरों का मिक्स्चर है। पार्टी में अनुभवी और युवाओं की जरूरत है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पीडीपी से निष्कासित अल्ताफ बुखारी के निवास पर कल शनिवार शाम को इस नव गठित ‘अपनी पार्टी’ के कोर ग्रुप की बैठक हुई थी, जिसमें पार्टी के संविधान और एजेंडे को सलाह मशविरे के बाद अंतिम रूप दिया गया था। अल्ताफ बुखारी को पार्टी का अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव पूर्व कृषि मंत्री गुलाम हसन मीर ने पेश किया। जिसका समर्थन नेकां से औपचारिक इस्तीफा देने वाले पूर्व एमएलसी विजय बकाया ने किया।

‘अपनी पार्टी’ में नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी, कांग्रेस व अन्य कई दलों के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधायक शामिल हुए हैं। अपनी नई पार्टी के गठन की घोषणा के पहले बुखारी ने सभी महिलाओं को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि आज के दिन ही नहीं, बल्कि महिलाओं को हर दिन इज्जत दी जानी चाहिए।

एंटी-CAA की आड़ में मुस्लिम युवाओं को बहला कर फिदायीन हमले का प्लान: कश्मीरी पति-पत्नी गिरफ्तार

दिल्ली के जामिया नगर से दिल्ली पुलिस ने एक दम्पति को गिरफ्तार किया। कश्मीर के रहने वाले इस दम्पति पर आईएस के खुरासान मॉड्यूल से संबंध रखने का आरोप है। रविवार (8 मार्च, 2020) की सुबह इनकी गिरफ्तारी के बाद इंटेलिजेंस आधारित ऑपरेशन से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यह दम्पति आईएस-खुरासान प्रोविंस (आईएसकेपी) के आला आतंकियों से सम्पर्क में था और वर्तमान में नए नागरिकता कानून के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों का फायदा उठा, मुस्लिम युवाओं को भड़का कर आतंकी कार्यवाही करने के लिए उकसा रहा था।

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने बताया, “कश्मीर का रहने वाला दम्पति जहाँजैब सामी और उसकी पत्नी हिंदा बसीर बेग को आज हिरासत में लिया गया है। हम औपचारिकता पूरी कर उन्हें जेल भेजेंगे।”

जहाँजैब सामी नामक यह व्यक्ति अफगानिस्तान के आईएसकेपी संगठन के वरिष्ठ सदस्यों के साथ सम्पर्क रखने के कारण भारतीय इंटेलिजेंस की नजरों में आया। यह संगठन अफगानिस्तान में आईएस का सहयोगी है। ऐसा मालूम पड़ता है कि यह व्यक्ति फिदायीन हमले की तैयारी में था और इसके लिए हथियारों को भी जमा करने की कोशिश में था।

इंटेलिजेंस के अधिकारियों के अनुसार जहाँजैब सामी आईएस खुरासान विंग के पाकिस्तानी कमांडर हुजैफा अल बाकिस्तानी के सम्पर्क में था, जिसने कश्मीरी युवाओं को रेडिकलाइज कर आतंकी संगठन ज्वाइन करवाने में बड़ी भूमिका निभाई थी।

पिछले साल जुलाई में हुजैफा अल बाकिस्तानी की एक ड्रोन हमले में अफगानिस्तान में मौत हो गई थी, जिसकी मौत की पुष्टि आईएस की मीडिया विंग ने “भारतीय एजेंसीज की रातों की नींद उड़ा देने वाले” के रूप में की थी। हुफैजा पहले लश्कर ए तैयबा के साथ जुड़ा हुआ था, जिसने बाद में आईएस ज्वाइन कर ली थी।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर PM मोदी के ट्विटर अकाउंट को संभालने वाली 7 महिला अचीवर्स

आज रविवार को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर देश की 7 महिलाओं ने पीएम मोदी के ट्विटर अकाउंट के जरिए अपनी कहानियों को देश के लोगों तक पहुँचा उन्हें प्रेरित करने का काम किया। पिछले हफ्ते एक अस्पष्ट से ट्वीट में मोदी ने सोशल मीडिया एकाउंट्स को त्यागने की बात कही थी, जिसके बाद तरह तरह की अटकलों का बाजार गर्म था। लेकिन एक दिन बाद पीएम मोदी ने अपनी मंशा साफ़ करते हुए बताया था कि उनका इरादा 8 मार्च को एक दिन के लिए अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर अपने सोशल मीडिया अकाउंट को उन महिला अचीवर्स के सुपुर्द करने का है, जिनकी कहानियाँ हमें प्रेरित करती हैं।

आज सुबह देश की महिलाओं को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएँ देते हुए उन्होंने कहा कि जैसा मैंने कुछ दिन पहले कहा था, आज मेरा सोशल अकाउंट 7 महिलाओं के पास रहेगा, जो अपनी प्रेरणादायक कहानियाँ साझा करेंगीं और शायद आपसे मेरे सोशल मीडिया अकाउंट के जरिए संवाद भी स्थापित करेंगी।

जिन 7 महिलाओं को आज पीएम मोदी के सोशल मीडिया अकाउंट संचालित करने का मौका मिला, वो सभी अलग अलग क्षेत्रों से संबंध रखती हैं। इनमें जल संरक्षण से लेकर दिव्यांग जनों के लिए काम करने वाली स्त्रियाँ भी शामिल हैं। मोदी ने इन सातों महिलाओं का एक संक्षिप्त वीडियो अपने ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम अकाउंट से साझा किया।

ये रहीं वे 7 स्त्रियां जिन्होंने आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर पीएम मोदी के ट्विटर अकाउंट का संचालन किया:

स्नेहा मोहनदास

पीएम मोदी का ट्विटर अकाउंट संचालित करने वाली पहली महिला एचीवर आज चेन्नई की स्नेहा मोहनदास रहीं जिन्होंने ‘फूडबैंक’ नामक संगठन की स्थापना की है। जो बेघरबार लोगों तक भोजन पहुँचाने का काम करता है। स्नेहा मोहनदास ने अपनी इस यात्रा को साझा करते हुए लोगों से भूखों की मदद कर भूखविहीन ग्रह के निर्माण में सहयोग करने की अपील की। उन्होंने अपनी इस प्रेरक जीवन यात्रा के पीछे अपनी माँ के योगदान को याद किया जिन्होंने उनमें भूखों को खाना खिलाने की आदत विकसित की थी।

मालविका अय्यर

पीएम मोदी का ट्विटर अकाउंट उपयोग कर अपनी कहानी देश के साथ साझा करने वाली दूसरी महिला मालविका अय्यर थीं, जिन्होंने 13 साल की उम्र में भयानक बम ब्लास्ट में अपने हाथों को खो दिया था। बम ब्लास्ट में अपने हाथ गँवाने और पैरों का काफी नुक्सान देखने के बाद भी मालविका ने अपनी हिम्मत और मानसिक मजबूती के दम पर पीएचडी पूरी करने में सफलता प्राप्त की। मालविका ने पीएम मोदी के ट्विटर अकाउंट के जरिए देश के युवाओं से दिव्यांगों और दिव्यांगता के प्रति अपने दृष्टिकोण में सुधार लाने की अपील की।

आरिफा

तीसरी महिला आरिफा हैं, जिन्होंने कश्मीर में महिला कारीगरों की जिंदगी बदलने का काम किया है। आरिफा कश्मीर की पारम्परिक नमदा बुनकर हैं। नमदा बुनकर ऊन के कार्पेट बनाती हैं। कश्मीर की इस लुप्त होती कला को आरिफा ने नया जीवन दिया है।

कल्पना

कल्पना हैदराबाद की हैं जो आर्किटेक्ट हैं। ये रेन वाटर हार्वेस्टिंग के क्षेत्र में काम कर रहीं हैं। उन्होंने कहा कि हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए जल संरक्षण करने की जरूरत है। इसके लिए हमें जल के पुनर्चक्रण, झीलों को बचाना, वर्षा जल का संचयन आदि आदि के विषय में जागरूकता पैदा करनी होगी।

विजया पवार

महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाके से आने वालीं विजया पवार ने बंजारा समुदाय की गोरमाटी कला और हस्तशिल्प पर अपनी बात रखी।

विजया ने कहा, “गोरमाटी कला को बढ़ावा देने के लिए नरेंद्र मोदी जी ने न केवल हमें प्रोत्साहित किया बल्कि हमारी आर्थिक सहायता भी की। ये हमारे लिए गौरव की बात है। इस कला के संरक्षण के लिए मैं पूरी तरह से समर्पित हूँ और महिला दिवस के अवसर पर गौरवान्वित महसूस कर रही हूँ।”

कलावती

कानपुर की कलावती देश की बहन, बेटी और बहुओं को संदेश देतीं हैं कि समाज को आगे ले जाने के लिए ईमानदारी से किया गया प्रयास कभी निष्फल नहीं होता।

कलावती लिखती हैं, “मैं जिस जगह पर रहती थी, वहाँ हर तरफ गंदगी ही गंदगी थी। लेकिन दृढ़ विश्वास था कि स्वच्छता के जरिए हम इस स्थिति को बदल सकते हैं। लोगों को समझाने का फैसला किया। शौचालय बनाने के लिए घूम-घूमकर एक-एक पैसा इकट्ठा किया। आखिरकार सफलता हाथ लगी। स्वस्थ रहने के लिए स्वच्छता जरूरी है। इसके लिए लोगों को जागरूक करने में थोड़ा समय जरूर लगा। लेकिन मुझे पता था कि अगर लोग समझेंगे तो काम आगे बढ़ जाएगा। मेरा अरमान पूरा हुआ, स्वच्छता को लेकर मेरा प्रयास सफल हुआ। हजारों शौचालय बनवाने में हमें सफलता मिली है। अगर कोई कड़वी भाषा बोलता है तो उसे बोलने दीजिए।अगर अपने लक्ष्य को पाना है तो पीछे मुड़कर नहीं देखा करते हैं।”

वीणा देवी

“जहाँ चाह वहाँ राह… इच्छा शक्ति से सब कुछ हासिल किया जा सकता है। मेरी वास्तविक पहचान पलंग के नीचे एक किलो मशरूम की खेती से शुरू हुई थी। लेकिन इस खेती ने मुझे न केवल आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि मेरे आत्मविश्वास को बढ़ाकर एक नया जीवन दिया।”

मुंगेर की वीणा देवी आगे अपनी कहानी बताते हुए कहती हैं- “आज महिलाएँ किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। अगर देश की नारी शक्ति ठान ले तो घर के अपने कमरे से ही अपनी यात्रा शुरू कर सकती है। इसी खेती की वजह से मुझे सम्मान मिला। मैं सरपंच बनी। मेरे लिए खुशी की बात है कि अपने जैसी कई महिलाओं को ट्रेनिंग देने का अवसर भी मिल रहा है।”

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हिंदू के घर पर कब्जा, 90 मजहबी दंगाई और 6 घंटे पत्थरबाजी व हमला: नए विडियो से न्यूज़लॉन्ड्री का दावा दोबारा फुस्स

जब मीडिया का एक बड़ा वर्ग दंगाई मजहबी भीड़ के महिमामंडन में लगा है और हिन्दुओं को बदनाम कर रहा है, हम आपका ध्यान ‘स्वराज्य मैग’ की स्वाति गोयल शर्मा के एक ट्वीट थ्रेड पर दिलाना चाहेंगे, जो वामपंथी मीडिया के प्रोपेगेंडा को सबूतों के साथ काट रहा है। स्वाति द्वारा ट्वीट किए गए वीडियोज में पहला वीडियो तब का है, जब आईबी में कार्यरत अंकित शर्मा की हत्या नहीं हुई थी। उनके गायब होने से 1 दिन पहले के वीडियो में दिख रहा है कि शोभराम नामक एक दलित के घर को आग के हवाले कर दिया गया है। उसी इमारत में सबसे नीचे एक रिक्शावाला और एक फर्नीचर दुकान का गार्ड रहता था, जिसके घर को जला डाला गया।

नीचे संलग्न किए गए वीडियो में आप देख सकते हैं कि कैसे ग़रीबों के घर धू-धू कर जल रहे हैं और ताहिर हुसैन के घर से निकले गुंडों का इसमें हाथ है। वो गुंडे गेट के पास दिख रहे हैं। दलित शोभराम रोते हुए पूछते हैं कि आखिर उनका कसूर क्या था कि न सिर्फ़ उनके सामान बल्कि सारे कागज़ात भी जला डाले गए। वो कहते हैं कि ‘उनलोगों’ ने काग़ज़-कागज़ की रट लगा रखी है लेकिन उनके तो सारे कागज़ ‘उन्हीं लोगों’ ने जला दिए। देखें वीडियो और ट्वीट:

शोभराम कहते हैं कि उनके घर में कुछ भी नहीं बचा, कपड़े तक भी जल गए। जब आग लगी, तब घर में 2 साल की एक बच्ची भी थी। लगभग सारे समान जल गए। टीवी, कूलर और संदूकों से लेकर गैस चूल्हे तक जल गए। आग काफ़ी दे तक लगी रही। बाद में उन्होंने बुझाया। दलित शोभराम बताते हैं कि ये वही घर था, जहाँ वो पिछले 30 वर्षों से रह रहे हैं। घर के दरवाजे तक जल गए। उस इमारत के बारे में लोगों ने कहा कि वो कभी भी गिर सकती है। वो कहते हैं कि अब एक ग़रीब आदमी इतना सब कुछ कैसे झेलेगा?

जब उनके घर में आग लगी हुई थी, तब आम आदमी पार्टी के निगम पार्षद (अब निलंबित) ताहिर हुसैन के गुंडे लगातार पत्थरबाजी कर रहे थे। आग लगाने के बाद भी उनका जी नहीं भरा था और उस तरफ़ से लगातार हमले होते रहे। नीचे संलग्न किए गए वीडियो में दंगाइयों की गुंडागर्दी का दृश्य देखें:

उसी मोहल्ले में रहने वाले शोभराम और बिजेंद्र के घरों के बीच में मंदिर है। बिजेंद्र ने बताया कि दंगाई भीड़ ने उनके घर की छत को ही हमले के लिए बेस बना लिया और वहाँ कब्ज़ा कर लिया। बिजेंद्र का घर मंदिर से सटा हुआ ही है। मंदिर पर बुरी तरह पथराव किया गया। पुजारी जी अपने परिवार को लेकर घर में बंद होने को मजबूर हो गए थे। बिजेंद्र ने बताया कि छत पर क़रीब 90 आदमी थे। पत्थर ढो-ढो कर लाए जा रहे थे। हालाँकि, न्यूज़लॉन्ड्री ने दंगाइयों को बचाने के लिए दावा कर दिया कि मंदिर पर हमले ही नहीं हुए।

चश्मदीद बिजेंद्र बताते हैं कि मंदिर पर पूरे 6 घंटे तक हमले किए गए लेकिन वामपंथी मीडिया (ख़ासकर न्यूज़लॉन्ड्री) वैसे ही उन दंगाइयों को बचाने में लगा हुआ है, जैसे हिन्दुओं का दमन करने वाले औरंगज़ेब और अल्लाउद्दीन खिलजी जैसे राजाओं का महिमामंडन किया जाता है। क्या मंदिर पर 6 घंटे तक लगातार पत्थरबाजी करना, उसकी छत पर चढ़ जाना और नुकसान पहुँचाना हमला नहीं कहलाता है? हमला तभी कहलाएगा या न्यूज़लॉन्ड्री के दिल को तसल्ली तभी मिलेगी, जब मंदिर को वहाँ से उखाड़ कर वहाँ बाबरी जैसा कोई ढाँचा खड़ा कर दिया जाए?

और शोभराम जैसे पीड़ितों को तो सरकारी सहायता या राहत तक नहीं मिलती। ऐसे कई पीड़ित हैं, जिन्हें सरकार तक नहीं पूछती। समाज के लोग ही आपस में मिलजुल कर उनकी मदद करते हैं। खाने-पीने के भी लाले पड़े हैं, राशन के लाले पड़े हैं। मोहल्ले से राशन और खाने-पीने की गाड़ियाँ गुजरती हैं लेकिन सारी व्यवस्था सिर्फ़ समुदाय विशेष के लिए है, ऐसा शोभराम व स्थानीय लोगों ने बताया। अब चूँकि न्यूज़लॉन्ड्री ये कहता है कि हमारी रिपोर्ट में स्थानीय लोगों के नाम लिए बिना उनके हवाले से कुछ भी लिख दिया जाता है, हम उसे सलाह देंगे कि नीचे संलग्न किए गए वीडियो को बार-बार प्ले कर के देखे:

यहाँ स्थानीय लोगों के नाम भी हैं, पीड़ितों के बयान भी हैं, वीडियो भी है, ऑडियो भी है, दंगाई मजहबी भीड़ की क्रूरता के दृश्य भी हैं, हिन्दुओं के पीड़ित होने के सबूत भी हैं, सरकारी पक्षपात के गवाह भी हैं, मंदिर पर हमले की बात भी है, पत्थरबाजी और आगजनी की घटनाओं के विज़ुअल्स भी हैं और साथ ही न्यूज़लॉन्ड्री को लताड़ती हुई हर वो चीज है, जो दंगाइयों से सहानुभूति रखने वाले उस नक्सली पोर्टल को सच का आइना दिखाती है।

हम शब्दों की संख्या पर ध्यान नहीं देते। अगर हमारे पास वो वीडियो है, जिसमें ताहिर हुसैन के गुंडे एक दलित के घर को जलाते दिख रहे हैं तो फिर उस वीडियो के साथ 100 शब्द ही क्यों न हों, वो मायने रखते हैं। अगर आपको सिर्फ़ गालियाँ बकनी हैं और संपादक द्वारा दिए गए टास्क को कुछ भी कर के धूर्ततापूर्वक पूरा करना है तो फिर आप 10000 शब्द लिख कर भी झूठ परोसने में लगे रहें क्योंकि आपके पास न सबूत हैं और न ही तथ्य हैं। अगर हैं तो आप उसे फ़िल्टर कर के उसमें से वही चीजें दिखाएँगे जो आपके मतलब की हो, वो भी तोड़-मरोड़ कर। पत्रकारिता की ‘कुछ ज्यादा ही पढ़ाई’ करने का दावा करने वाले अब ये तय करने में लगे हैं कि ग्राउंड रिपोर्ट में कितने शब्द होने चाहिए, कितनी मात्राएँ होनी चाहिए और कितनी बार अनुस्वार और चंद्रबिंदु का प्रयोग किया जाना चाहिए।

नीचे हम वो वीडियो भी संलग्न कर रहे हैं, जिसमें हिन्दू देवी-देवताओं को गालियाँ बकते हुए जम कर पत्थरबाजी की जा रही है। ‘शिव मंदिर’ पर हमले किए जा रहे हैं। ये सब न्यूज़लॉन्ड्री को नहीं दिखेगा। जब ऑपइंडिया ने दिल्ली के हिन्दू-विरोधी दंगों की ग्राउंड रिपोर्टिंग का बीड़ा उठाया तब उसने ये नहीं देखा कि कौन सा मंदिर किस देशांतर और अक्षांस रेखाओं के संयोग पर खड़ा है या फिर भूमध्य रेखा से कितनी दूरी पर कौन सा पीड़ित किस दिशा में खड़ा होकर बयान दे रहा है। हमारा जोर था पीड़ितों के ‘डर’ और ‘दर्द’ को आप तक पहुँचाना, दंगा के आरोपितों की पोल खोलना। हमने शब्दों की संख्या और मंदिर-मस्जिद का लोकेशन से ज्यादा प्रायॉरिटी पीड़ितों की दबी हुई आवाज़ को दी।

ये सब छोटी-छोटी चीजें हैं। खजुरी खास या फिर मौजपुर में किस घर की चौहद्दी क्या है और किस मंदिर के तरफ कितनी पुलिया, नदी, पहाड़ और पठार हैं- ये सब सेकेंडरी चीजें थीं हमारे लिए। लेकिन, जब न्यूज़लॉन्ड्री ने दंगाइयों को महान साबित करने के लिए हमें ये इन सब चीजों पर घेरने की कोशिश की है तो हमने इस रिपोर्ट में उन चीजों को मेंशन किया है। पत्थरबाजी करते हुए हमारे देवी-देवताओं को गाली देने वाले कौन? दलितों का घर जलाने वाले ताहिर हुसैन के गुंडे कौन? वो कहाँ खड़े थे ये मायने रखता है या फिर वो क्या कर और कह रहे थे ये सूचना आप तक पहुँचानी ज़्यादा आवश्यक है?

मंदिर की छत देखिए। छत का एक-एक कोना देखिए। हमला कर के, पत्थरबाजी कर के इसे कैसा बना दिया गया है। न्यूज़लॉन्ड्री वालों को आँखें फाड़-फाड़ कर देखना चाहिए कि भगवान के मंदिर को लेकर कैसे उसने झूठ फैलाया है। चीजें अस्त-व्यस्त हैं, छत पर बड़ी-बड़ी ईंटों के टुकड़े पड़े हुए हैं लेकिन नहीं, न्यूज़लॉन्ड्री के अनुसार मंदिर को तो किसी ने छुआ भी नहीं! मंदिर ने अपने आप आसपास के सारे ईंट-पत्थर अपनी ओर खिंच लिए। मंदिर में दंगाई मजहबी भीड़ ने ईंट-पत्थर फेंक कर पूजा अर्चना की। कल को न्यूज़लॉन्ड्री ऐसी दलीलें दे सकता है, इसीलिए हैरान मत होइए। फ़िलहाल आप ख़ुद वीडियो देखें:

नीचे देखिए, एक स्थानीय व्यक्ति क्या कह रहा है। हमें इससे ज्यादा मतलब होना चाहिए कि वो स्थानीय है, या फिर इससे कि उसने कौन से रंग की शॉल ओढ़ी हुई है या फिर उसके सिर में कितनी संख्या में बाल हैं? अरे, कल को न्यूज़लॉन्ड्री ये लिख दे तो आश्चर्य नहीं कि स्थानीय लोगों के बयान तो लिए ऑपइंडिया ने लेकिन उन चश्मदीदों के सिर के बाल तो गिने ही नहीं। फिर प्रोपेगेंडा पोर्टल “मैं नहीं खेलूँगा, गोल हो गया” कह कर बिल में घुस सकता है। नीचे जो स्थानीय व्यक्ति हैं, वो स्पष्ट कह रहे हैं कि मंदिर पर बाहर से हमला हुआ, अटैक हुआ, बाकी मीडिया वाले जो भी लिखें।

मंदिर की छत पर ईंट-पत्थर मिले, ऐसा कहना है स्थानीय लोगों का। एक नहीं, कई लोग इस वीडियो में मौजूद हैं, जो ये कह रहे हैं। उन सबने बताया कि मंदिर के चारों तरफ़ से पथराव हुआ, चीजें जला दी गईं, तोड़फोड़ की गईं और छत पर ऊपर से पथराव हुआ। ऊपर चढ़ने के लिए मंदिर पर सीढ़ियाँ लगाई गईं। मंदिर की छत पर, परिसर में चीजों को तबाह करने और पत्थरबाजी व आगजनी करने को मंदिर पर हमला नहीं माना जाएगा क्या? देखें वीडियो, जो न्यूज़लॉन्ड्री के दावों की पोल खोलता है:

सारे वीडियो को देखिए और अंदाज़ा लगाइए कि किस कदर मीडिया के ये गैंग विशेष आपको न सिर्फ़ सबूतों से दूर कर रहा है बल्कि पूरे मुद्दे को मीडिया का झगड़ा बनाना चाह रहा है ताकि आपका ध्यान इन हिन्दू विरोधी दंगों में हुई मजहबी दंगाई भीड़ की क्रूरता से हट जाए। भारत की जनता है, थोड़ा इधर-उधर की बातें करने पर अपने ऊपर हुए सभी अत्याचार भूल जाएगी- इसी फिलॉसफी पर काम कर रहे हैं न्यूज़लॉन्ड्री व ऐसे ही अन्य नक्सल मीडिया संस्थान। हिन्दुओं को बेरहमी से मारा गया, उनके देवी-देवताओं को गालियाँ दी गईं लेकिन फिर भी अपराधी उन्हें ही ठहराया जा रहा है। और जो दोषी हैं, दंगाई हैं? उन्हें महान बताने के लिए झूठ और प्रोपेगेंडा का सहारा लिया जा रहा है।

यही कारण है कि न्यूज़लॉन्ड्री को मृत दिनेश कुमार खटीक के भाई सुरेश का वो बयान नहीं दिखता, जिसमें वो सभी मदरसों और मस्जिदों पर पुलिस की छापेमारी की वकालत करते हैं क्योंकि उनका मानना है कि वहीं सारे हथियार छिपा कर रखे जाते हैं। दिलबर नेगी के हाथ-पाँव काट कर उन्हें ज़िंदा आग में झोंक दिया गया। उसी दुकान की आग में, जिसमें वो काम करते थे। लेकिन नहीं, मीडिया का गिरोह विशेष तो कहता है कि वो ‘जलने से हुए घाव से मरे’। अभी तो कुछ ही दिन बीते हैं, कुछ साल बाद यही मीडिया वाले कहेंगे कि दिल्ली दंगों में एक भी हिन्दू नहीं मरा, जो मरे उन्होंने आत्महत्या की होगी!

काशी की राजकुमारी, अयोध्या के राजकुमार और युद्ध से बना रक्त का कुंड… जब स्वयं प्रकट हुईं माँ आदि शक्ति

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक जिन दिव्य स्थलों पर देवी माँ साक्षात प्रकट हुईं, वहाँ निर्मित मंदिरों में उनकी प्रतिमा स्थापित नहीं की गई है, ऐसे मंदिरों में चिह्न पूजा का ही विधान है। दुर्गा मंदिर में भी प्रतिमा के स्थान पर देवी माँ के मुखौटे और चरण पादुकाओं का पूजन होता है। कहा जाता है कि जब राजा-महाराजाओं ने सुदर्शन को युद्ध के लिए ललकारा तो माँ आदि शक्ति ने युद्धभूमि में प्रकट होकर सभी विरोधियों का वध कर डाला। इस युद्ध में इतना रक्तपात हुआ कि वहाँ रक्त का कुंड बन गया, जो वर्तमान में दुर्गाकुंड के नाम से प्रसिद्ध है।

दुर्गाकुंड, देवी माँ का मंदिर और सुदर्शन का युद्ध… कुछ कंफ्यूजन है ना! दरअसल इसके पीछे एक कहानी है। कहानी है एक विवाह की। काशी नरेश की पुत्री के विवाह की। इस विवाह के पीछे रोचक कथानक है कि काशी नरेश राजा सुबाहू ने अपनी पुत्री के विवाह योग्य होने पर उसके स्वयंवर की घोषणा की। स्वयंवर दिवस की पूर्व संध्या पर राजकुमारी को स्वप्न में राजकुमार सुदर्शन के संग उनका विवाह होता दिखा।

राजकुमारी ने अपने पिता काशी नरेश सुबाहू को अपने स्वप्न की बात बताई। काशी नरेश ने इस बारे में जब स्वयंवर में आए राजा-महाराजाओं को बताया तो सभी राजा सुदर्शन के खिलाफ हो गए व सभी ने उसे सामूहिक रूप से युद्ध की चुनौती दे डाली। राजकुमार सुदर्शन ने उनकी चुनौती को स्वीकार कर माँ भगवती से युद्ध में विजयी होने का आशीर्वाद माँगा। राजकुमार सुदर्शन ने जिस स्थल पर आदि शक्ति की आराधना की, वहाँ देवी माँ प्रकट हुई और सुदर्शन को विजय का वरदान देकर स्वयं उसकी प्राणरक्षा की।

मंदिर स्थल पर माता भगवती के प्रकट होने का संबंध अयोध्या के राजकुमार सुदर्शन की कथा से जुड़ा है। राजकुमार सुदर्शन की शिक्षा-दीक्षा प्रयागराज में भारद्वाज ऋषि के आश्रम में हुई थी। शिक्षा पूरी होने के उपरान्त राजकुमार सुदर्शन का विवाह काशी नरेश राजा सुबाहू की पुत्री से हुआ था। आज यह दुर्गा मंदिर काशी के पुरातन मंदिरों में से एक है। इसलिए आइए आज कुछ तस्वीरों के जरिए काशी के दुर्गा मंदिर, भैरो बाबा, गंगा मैया समेत त्रिकालदर्शी के दर्शन करें।

कहते हैं कि इस मंदिर का उल्लेख ” काशी खंड” में भी मिलता है। यहाँ माँ दुर्गा “यंत्र” रूप में विरजमान थी। इस मंदिर में बाबा भैरोनाथ, लक्ष्मीजी, सरस्वतीजी, एवं माता काली की मूर्ति रूप में भी मंदिर बने हुए थे।
हर हर महादेव (मंदिर के भीतर)
काशी के कोतवाल – बाबा भैरो (बाएँ), मालवीय जी ने जो बनाया था उस घर के प्रांगण में विराज रखे बाबा (दाएँ)
काशी घाट पर शिव स्तुति गाते -गाते कैमरा देखकर शर्माते बुजुर्ग बाबा।
ये घाट काशी के अमूल्य रत्न हैं, जिन्हें किसी जौहरी की आवश्यकता नहीं। गंगा केवल काशी में ही उत्तरवाहिनी हैं तथा शिव के त्रिशूल पर बसे काशी के लगभग सभी घाटों पर शिव स्वयं विराजमान हैं। विभिन्न शुभ अवसरों पर गंगापूजा के लिए इन घाटों को ही साक्षी बनाया जाता है।
अस्सी से आदिकेशव तक घाट श्रृंखला में हर घाट के अलग ठाठ हैं, कहीं शिव गंगा में समाए हुए हैं तो किसी घाट की सीढ़ियाँ शास्त्रीय विधान में निर्मित हैं, कोई मन्दिर विशिष्ट स्थापत्य शैली में है तो किसी घाट की पहचान वहाँ स्थित महलों से है तो कई घाट मौज-मस्ती का केन्द्र हैं।
गंगा किनारे आरती
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नोट: यह फोटो फीचर @shrimaan के ट्विटर हैंडल से ली गई तस्वीरों से बनाया गया है। जिसका पूरा थ्रेड आप इस लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं।

हरि सिंह के पोते और कॉन्ग्रेस नेता ने किया मोदी सरकार के फैसले का स्वागत, बताया 2011 के जनगणना को फर्जी

जम्मू कश्मीर में परिसीमन आयोग गठित होने के बाद कॉन्ग्रेस नेता एवं राजा हरि सिंह के पोते विक्रामादित्य सिंह ने मोदी सरकार के इस फैसलै को सराहा है। मगर, इसके साथ ही उन्होंने निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के लिए 2011 की जनगणना के आँकड़ों के उपयोग के बारे में आशंका व्यक्त की है और उसे एक गंभीर गलती भी बताया है।

विक्रमादित्य सिंह ने अपने ट्वीट में कहा, “जम्मू कश्मीर के लिए परिसीमन आयोग बनाना एक सराहनीय कदम है। लेकिन, अगर ये 2011 के सेंसस के आधार पर किया जाता है तो ये गंभीर गलती होगी। क्योंकि सभी सबूतों से पता चलता है कि जम्मू-कश्मीर की जनगणना फर्जी थी। इसलिए मैं 2021 की जनगणना के अनुसार, निर्णय की समीक्षा करने के लिए भारत सरकार से आग्रह करता हूँ।”

बता दें कि विक्रमादित्य सिंह के अलावा पैंथर्स पार्टी के प्रधान एवं पूर्व विधायक बलवंत सिंह मनकोटिया ने भी भाजपा को 2021 के सेंसस के बाद परिसीमन आयोग के गठन करने की सलाह दी है। पैंथर्स पार्टी के मुताबिक भाजपा खुद मानती है कि जम्मू कश्मीर की पिछली राज्य सरकारों ने जनगणना के तहत कश्मीर संभाग की आबादी और जमीन ज्यादा बताई है। जबकि जम्मू की आबादी और जमीन कश्मीर से ज्यादा है। इसलिए उनका कहना है कि अगर 2011 की मतगणना के तहत ही परिसीमन आयोग का गठन किया गया तो फिर जम्मू संभाग को कोई फायदा नहीं होगा और जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहेगा। इसके साथ ही विधानसभा क्षेत्र और संसदीय क्षेत्र भी कश्मीर के ज्यादा होंगे।

उन्होंने कहा कि अगर केंद्र सरकार जम्मू की जनता के साथ इंसाफ करना चाहती है तो परिसीमन आयोग का गठन 2021 की जनगणना के बाद किया जाना चाहिए, क्योंकि जम्मू की संख्या और जमीन कश्मीर से ज्यादा है। बैठक में पैंथर्स पार्टी के काफी संख्या में कार्यकर्ता मौजूद थे।

गौरतलब है कि जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 के तहत परिसीमन के बाद प्रदेश में विधानसभा सीटों की संख्या में सात सीटों का इजाफा होना है और कुल सीटों की संख्या 114 पर पहुँच जाएगी। इनमें 24 सीटों को पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर के लिए आरक्षित रखा जाएगा।

जानकारों के अनुसार परिसीमन के बाद बढ़ने वाली सात सीटों में अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए कई सीटों को आरक्षित किया जा सकता हैं। फिलहाल जम्मू कश्मीर में 7 विधानसभा सीटों को अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित रखा जाता रहा है लेकिन अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए एक सीट भी आरक्षित नहीं है। ऐसे में नए परिसीमन के बाद अनुसूचित जाति वर्ग के लिए भी सभी सीटों का आरक्षण होने का आसार है। इसके अतिरिक्त का भाजपा नेतृत्व भी चाहता है कि अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए सीटों का आरक्षण हो। इससे जम्मू संभाग में सीटों की संख्या बढ़ने के आसार बनेंगे।

बता दें कि केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के नियम, शर्तें तय करने के बाद आयोग की अध्यक्ष एवं सेवानिवृत्त जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में पैनल अपना काम करना शुरू करेगा। चुनाव विभाग के सूत्रों के अनुसार परिसीमन आयोग के गठन के बाद अब जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई जल्द बैठक बुला सकती हैं। जिसमें पैनल में शामिल सदस्य जिसमें चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा, जम्मू कश्मीर के मुख्य चुनाव आयुक्त शैलेंद्र कुमार मुख्य रूप से शामिल रहेंगे। इसी बैठक में परिसीमन आयोग के काम करने के क्षेत्र के नियम व शर्तें तय होगी और आयोग अपना काम करना प्रारंभ करेगा।

लंदन भाग रही थीं ‘यस बैंक’ के संस्थापक राणा कपूर की बेटी रौशनी, मुंबई एयरपोर्ट पर रोकी गईं

‘यस बैंक’ के संस्थापक राणा कपूर फ़िलहाल ईडी की कस्टडी में हैं लेकिन उनके परिवार पर जैसे ही जाँच की आँच पहुँची, उनकी बेटी रौशनी कपूर लंदन भागने लगीं। रौशनी को मुंबई एयरपोर्ट पर शिकंजे में लिया गया है, जहाँ से वो ब्रिटिश एयरवेज़ से लंदन जाने की फ़िराक़ में थीं। बता दें कि नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे भगोड़े भी अभी लंदन में ही हैं और उनके प्रत्यर्पण के लिए भारत सरकार लगी हुई है। राणा कपूर और उनके परिवार, जिसमें पत्नी बिंदु कपूर, बेटियाँ- राखी कपूर टंडन, राधा कपूर और रोशनी कपूर के खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी किया जा चुका है।

राणा कपूर की बेटी रौशनी को मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर लंदन जाने से रोका गया। ईडी ने खुलासा किया है कि कपूर, उनकी पत्नी और तीनों बेटियों ने मिल कर 20 फ़र्ज़ी कम्पनियाँ खोल रखी थीं और उन कंपनियों के द्वारा रुपयों की गड़बड़ी की जाती थी। ‘यस बैंक’ से लोन दिलाने के एवज में भारी रक़म वसूली जाती थी। ‘लुक आउट नोटिस’ को नज़रअंदाज़ कर लंदन भागने की कोशिश करने वाली रौशनी ने ईडी और सीबीआई का शक और गहरा कर दिया कि दाल में ज़रूर कुछ काला है।

ईडी ने राणा कपूर की पत्नी बिंदु और उनकी तीनों बेटियों के कई ठिकानों की तलाशी भी ली है। दिल्ली और मुंबई में चले इस तलाशी अभियान के दौरान राखी कपूर टंडन, राधा कपूर और रोशनी कपूर से पूछताछ भी की गई, जो कई घंटों तक चली। 

ईडी ने मुंबई कोर्ट को बताया है कि ‘यस बैंक’ ने डीएचएफएल के 3700 करोड़ मूल्य से भी अधिक के डिबेंचर ख़रीदे। डीबीएचएल ने डोलीट अर्बन वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड को 600 करोड़ का लोन दिया। इस कम्पनी में राणा कपूर की बेटियाँ बतौर डायरेक्टर कार्यरत हैं।

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जिनके पति हुए देश पर बलिदान… उसी राह पर चल वीरांगनाओं ने सेना का बढ़ाया मान: 10 कहानियाँ

आज ‘महिला दिवस’ के अवसर पर हम कुछ ऐसी महिलाओं की दास्ताँ लेकर आ रहे हैं, जिनके पति सेना में थे और जिन्होंने अपने पति की मृत्यु के बाद सेना को ही अपनाया। इन्हीं में एक कैप्टेन शालिनी सिंह हैं, जिनके पति मेजर अविनाश सिंह भदौरिया के वीरगति को प्राप्त होने के बाद उन्होंने सेना ज्वाइन की। शालिनी को 2017 में ‘मिसेज इंडिया क्लासिक क्वीन ऑफ सबस्टेंस’ का अवॉर्ड भी मिला। शालिनी के पति कारगिल युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे। शालिनी भी अब सेना से रिटायर हो चुकी हैं। 2001 में जब मेजर भदौरिया बलिदानी हुए, तब शालिनी मात्र 21 साल की थीं। उनके बेटा ध्रुव तब 2 साल का ही था।

स्कवाड्रन लीडर समीर मिराज-2000 के क्रैश होने के कारण वीरगति को प्राप्त हो गए थे। उसके बाद उनकी पत्नी ने फेसबुक पर लिखा था- ‘मुझे अभी भी यकीन नहीं होता कि तुम जा चुके हो किसी के पास मेरे सवालों का जवाब नहीं हैं तुम ही क्यों?’ पति के बलिदान के बाद गरिमा अबरोल ने भी वायुसेना में शामिल होने का फ़ैसला किया। उन्होंने एएफएसबी के साथ सर्विस सिलेक्शन बोर्ड का इंटरव्यू पास किया था

इसी तरह नीतू संब्याल भी अपने पति के वीरगति को प्राप्त होने बाद सेना में शामिल हुईं और लेफ्टिनेंट बनीं। जम्मू कश्मीर के साम्बा की नीरू के पति रवींद्र 2015 में एक इंजरी की वजह से दिवंगत हो गए थे। रवींद्र जम्मू कश्मीर राइफल्स में थे। उनकी एक छोटी बेटी भी है।

मेजर अमित देशवाल मणिपुर में उग्रवादियों के साथ मुठभेड़ में वीरगति को प्राप्त हो गए थे। वो अपने पीछे एक नन्हे बेटे को छोड़ गए थे। पत्नी नीता देशवाल ने हिम्मत नहीं हारी और उन्होंने चेन्नई में सेना के पासिंग आउट परेड में हिस्सा लेकर इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया। अमित झज्जर जिले के सुरमति गाँव में रहने वाले थे।

निधि मिश्रा की कहानी काफ़ी संघर्ष भरी है। उन्हें उनके ससुराल वालों ने ही बेदखल कर दिया था। जब उनके पति वीरगति को प्राप्त हुए, तब निधि के पेट में 4 महीने का बच्चा था। आज वो लेफ्टिनेंट निधि मिश्रा दुबे हैं। सुसराल वालों ने उनके पति की मृत्यु के बाद उन्हें सदमे से उबरने के लिए समय भी नहीं दिया और तुरंत निकल जाने को कहा। 7 सालों के संघर्ष के बाद निधि ने सेना में ट्रेनिंग ली।

गौरी महादिक के पति मेजर प्रसाद महादिक उग्रवादियों के हमले में वीरगति को प्राप्त हो गए थे। गौरी ने सेना ज्वाइन की और कहा कि वो वही कर रही हैं, जो उनके पति चाहते थे। वो चाहते थे कि गौरी हमेशा हँसती-मुस्कुराती रहे। दिसंबर 2017 में जब मेजर प्रसाद वीरगति को प्राप्त हुए, तब उन दोनों की शादी को महज दो साल ही हुए थे। गौरी ने चेन्नई में सेना की ट्रेनिंग ली। संयोग देखिए, उन्हें वही नंबर मिला जो उनके पति को मिला था।

वीरगति को प्राप्त मेजर विभूति ढौंडियाल की पत्नी निकिता कौल के परिवार को भी एक समय में कश्मीर को हमेशा के लिए अलविदा कहना पड़ गया था क्योंकि वो कश्मीरी पंडित थे। शादी के 10 माह बाद ही मेजर विभूति बलिदानी हो गए और निकिता अकेली रह गईं। लेकिन उन्होंने हौंसला नहीं हारा और सेना ज्वाइन किया।

सुष्मिता पांडेय न सिर्फ़ सेना में शामिल हुईं बल्कि अपने पति के समकक्ष पद पर पहुँचीं। उनकी शादी 2010 में मेजर नीरज से हुई थी। 16 मार्च 2016 को एक रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान नीरज वीरगति को प्राप्त हो गए थे। उस वक़्त उनका बेटा मात्र 4 साल का था। सुष्मिता एसएसबी की परीक्षा पास कर लेफ्टिनेंट बनीं

कर्नल संतोष महादिक की पत्नी स्वाति महादिक सितम्बर 2017 में 11 महीनों के कठिन प्रशिक्षण हासिल करने के बाद सेना में अधिकारी के तौर पर शामिल हुईं। उनके पति 2015 में उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा में आतंक विरोधी अभियान में वीरगति को प्राप्त हो गए थे। उन्हें वीरता के लिए सेना मेडल से सम्मानित किया गया था। चेन्नई स्थित ओटीए में ट्रेनिंग के बाद वो सेना में बतौर अधिकारी शामिल हुईं।

दून की कैप्टन प्रिया सेमवाल पश्चिम बंगाल के हल्दिया से पोरबंदर (गुजरात) के बीच आर्मी सेलिंग एक्सपीडिशन का हिस्सा बनीं और 45 दिनों में 3500 मील का सफर तय किया। प्रिया के पति नायक अमित शर्मा 20 जून 2012 को अरुणाचल प्रदेश में सेना के ऑपरेशन ऑर्किड के दौरान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। प्रिया को कई बार सम्मानित किया जा चुका है।

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‘कफ़न बाँध कर आए हैं, जो हमारे साथ नहीं… वो देश का गद्दार है’ – पिंजरा तोड़ वालों के खिलाफ अपील

ये सन्देश सीलमपुर व जाफराबाद के लोगों की तरफ़ से है। ट्रांस-यमुना क्षेत्र में रह रहे लोगों की तरफ से जनता के लिए ये अपील जारी की गई है:

कुछ प्रबुद्ध सामाजिक वर्ग के लोगों और ‘पिंजरा तोड़’ जैसे कथित सामाजिक संगठनों के कारण हम यमुना के आसपास रहने वाले लोग ख़ासी परेशानी में हैं। यहाँ के सभी स्थानीय लोग पीड़ित और दुःखी महसूस कर रहे हैं। चारों तरफ़ भगदड़ का माहौल है। ये संगठन और कथित प्रबुद्ध जन प्रतिदिन हिंसा भड़काने के काम में लगे रहते हैं और उन्होंने आज जाफराबाद मेन रोड को ही जाम कर दिया। इससे राहगीरों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

हम अभी भी उस आतंक से उबरे नहीं हैं, जिसका सामना हमें 1992 और 2006 में करना पड़ा था। हाल में भी हमारे ख़िलाफ़ जब हिंसा हुई, तो हमारे साथ कोई नहीं खड़ा हुआ। ये एक बहुत ही ग़ैर-जिम्मेदाराना हरकत है, जिसका सामना हमें करना पड़ रहा है। यहाँ की महिलाएँ रोड जाम करने के पक्ष में नहीं थीं और उन्होंने जब कड़ा विरोध दर्ज कराया तो ‘पिंजरा तोड़’ के नेताओं ने कहा:

“कफ़न बाँध कर आए हैं। जो हमारे साथ नहीं, वो देश का गद्दार है।”

दरियागंज दिल्ली गेट पर इसी ‘पिंजरा तोड़’ के कार्यकर्ताओं और नेताओं ने पुलिस के साथ झड़प की लेकिन इनमें से किसी एक को भी गिरफ़्तार नहीं किया गया। वो सभी हिंसक हरकतें कर के भाग खड़े हुए। फँसा कौन? स्थानीय लोग। स्थानीय लोगों में से कई आज भी पुलिस केस और अदालती कार्रवाइयों का सामना कर रहे हैं। करनी उनकी और भुगतना हमें पड़ रहा है।

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The fight against CAA-NPR-NRC is being sabotaged by the Hindutva forces out of which the recent pogrom targeted on Muslim community which managed to displace and kill largely Muslims was executed in North East Delhi along with other regions in India to curb, repress and instill fear among anti NPR-NRC-CAA protestors. We are seeing the collapse of all state machinery meant to check the authoritarian and fascist forces of the government. Arbitrary and false allegations as grave as attempt to murder, rioting with arms and sedition are being filed on organisers and participants of peaceful protests. Countless innocent people have lost their lives and livelihoods. So far there are at least 46 confirmed deaths while over 300 are undergoing treatment for serious injuries, including gunshot wounds. This is an organized attempt to communalise the two months of peaceful mass sit-ins against the divisive, anti-people CAA-NRC-NPR. Damage of properties, livelihoods and lifelong earnings are one of the primary material consequences which has led to displacements of the Muslim community, something that anti CAA –NPR protests were protesting against. People have in fact lost their identity documents and assets. Pinjratod supports the call by Young India committee and will join in strength and solidarity with the ANTI CAA-NPR-NRC movement on 3rd MARCH, 11 AM AT RAMLILA MAIDAN, DELHI We request all to come together. INQUILAAB ZINDABAD

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हम इलाक़े में शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे हैं। यहाँ हम किसी भी प्रकार की हिंसा को बर्दाश्त नहीं कर सकते। ट्रांस-यमुना क्षेत्र में कई प्रदर्शन स्थलों पर ‘पिंजरा तोड़’ ने पहले भी हिंसा फैलाने की कोशिशें की थीं लेकिन हमने उन्हें सफल नहीं होने दिया। हमारे लिए प्रार्थना कीजिए। इन असामाजिक तत्वों को यहाँ हिंसा करने और अराजकता फैलाने से रोकने में हमारी मदद कीजिए।

कुरान में बुर्का शब्द का कहीं भी वर्णन ही नहीं… ‘मर्दों की आँखों की दरिंदगी’ से बचाव वाला तर्क फिर कहाँ पैदा हुआ!

बुर्का एक शब्द नहीं बल्कि एक प्रतिबन्ध है| अगर आपको चित्रात्मक तरीके से प्रतिबन्ध को दिखाना हो तो आप बुर्का पहने हुए एक महिला को दिखा सकते हैं। जब पूरे विश्व में महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, उसी समय विश्व का एक बहुत बड़ा तबका बुर्के के द्वारा महिलाओं की आजादी छीनने को सही ठहराने में लगा हुआ है।

किसी मुस्लिम से पूछिए बुर्का क्यों ज़रूरी है? जवाब में वो तपाक से यही बोलेगा कि कुरान में लिखा है। अगर थोड़े मौलाना टाइप के किसी आदमी से पूछेंगे कि बुर्क़ा महिलाएँ ही क्यों पहनती हैं? तो वो पूरा तरीका बताने लग जाएगा कि किस टाइप का बुर्क़ा पहनने को कुरान में बोला गया है। इन्हें ये तक नहीं पता है कि कुरान में वास्तव में क्या कहा गया है। ऐसे लोग भले ही अपने आपको इस्लाम का प्रचारक समझते हों लेकिन उनमें बहुत ज्यादा ज्ञान की कमी ही है। इन दोनों व्यक्तियों में इस चीज़ की समानता है कि दोनों ही मुस्लिम महिला को दबाकर रखना चाहते हैं।

इस मजहब में कुरान को इस्लाम की एक दैवीय पुस्तक मानते हैं। इस्लाम के समर्थकों के अनुसार उनके हर प्रश्न का जवाब कुरान में दिया हुआ है। अगर पहनावे की बात की जाए तो वो भी उनके अनुसार कुरान में दिया गया है कि महिलाओं को क्या पहनना चाहिए। उनके अनुसार ये बोला जाता है कि कुरान में बोला गया है कि महिलाएँ अपने पूरे शरीर को पूरा ढकें जबकि यह बात पूरी तरह से गलत है कि ऐसा कुछ कुरान में बोला गया है। सच्चाई यह है कि कुरान में बुर्का शब्द का कहीं भी वर्णन है ही नहीं। उसमें केवल यह बोला गया है कि महिलाओं का सर ढका होना चाहिए और कपड़े शालीन होने चाहिए।

बुर्का शब्द और पहनने का प्रचलन ईरान से आया है। जब इस्लाम मजहब ईरान में आया तब उन लोगों ने वहाँ के प्रचलित परिधान को अपना लिया और धीरे-धीरे ये उनके मजहब का अंग बन गया। अब इसको अगर यह कहा जाए कि कुरान में ऐसा कहा गया है तो उन आदमियों को लानत है, जो केवल महिलाओं को दबाने के लिए मानसिक प्रतिबन्ध के अलावा उनके वस्त्रों का भी सहारा ले रहे हैं।

जब आप किसी से बात करें और वो व्यक्ति सामने हो पर वो आपकी तरफ ना देख रहा हो तो आप यही समझेंगे कि वो आपकी बातों पर ध्यान नहीं दे रहा है और आप अपनी बात उस तक पहुँचाने में पूरी तरह से विफल रहेंगे। यही बात बुर्के में भी कहीं हद तक सत्य सिद्ध होती है। अगर कोई महिला सामने खड़ी है और उसका चेहरा पूरी तरह से ढका हुआ हो तो आप सामान्य सा महसूस नहीं करेंगे। इसकी जगह अगर उस महिला का चेहरा दिख रहा हो तो आप के शब्दों पर उसके चेहरे के हाव भाव से आप अपनी बात को पूरी तरह से उस तक पहुँचा सकते हैं।

समुदाय विशेष के लोग कहते हैं कि बुरका पहनने से महिलाओं का ‘मर्दों की आँखों की दरिंदगी’ से बचाव होता है। उनके अनुसार महिलाओं को केवल अपने खून के रिश्ते के अलावा किसी अन्य को चेहरा नहीं दिखाना चाहिए। इसके लिए वो बुर्के को पहनना जायज ठहराते हैं। जबकि इसका अगर दूसरा हिस्सा देखें तो, मर्दों की आँखों में यदि दरिंदगी है तो उसका उपाय ढूँढना चाहिए ना कि महिलाओं की वेशभूषा की स्वतन्त्रता में रोक लगाना चाहिए। क्या मुस्लिम मर्दों की आँखों में दरिंदगी है? ऐसा है तो उन्हें पहले नैतिक शिक्षा की जानकारी होनी चाहिए और महिलाओं के लिए उनके मन में अगर सम्मान है तो दरिंदगी का मतलब नहीं रह जाता है।

बुर्के से एक बहुत बड़ा नुकसान महिलाओं की त्वचा को भी होता है। बुर्का पहनने से महिलाओं की त्वचा को विटामिन डी नहीं मिल पाता है। इससे उनको त्वचा से सम्बंधित रोगों के होने की संभावना बढ़ जाती है। बुर्का पहनने से मुस्लिम महिलाओं को हड्डी के रोगों के भी होने की भी संभावना रहती है। मुस्लिम महिलाएँ अगर बाहर काम करती हैं तो वो दिन भर बुर्का पहने रहती हैं, जिससे उनकी त्वचा में जो विटामिन मिलने चाहिए उसकी कमी होने लगती है। कभी-कभी यह स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि स्किन कैंसर का रूप ले लेती है।

बुर्का महिलाओं की आत्मा और उनके स्वाभिमान को पूरी तरह से चोट पहुँचाता है। मुस्लिम महिला अगर सामान्य रूप से शालीन सी कोई पोशाक पहनना चाहती है, फिर भी उसको काले रंग का बुर्का उसके ऊपर डालना होता है। इससे उसके स्वाभिमान को कहीं न कहीं ठेस पहुँचती है। वो महिला जो बुर्का पहने हुए हैं, वो जब अन्य महिलाओं के स्वतंत्र शालीन लिबास को देखती है तो उसके मन में कहीं न कहीं बुर्के के प्रति हीन भावना आ ही जाती है, जिससे उसके आत्मविश्वास को बहुत ज्यादा चोट पहुँचती है।

बुर्के के अगर इतिहास को लोग सही में जान लें तो उन्हें पता चल जाएगा की यह पहनावा भौगोलिक क्षेत्र की आवश्यकता के लिए उस समय की महिलाओं ने अपनाया था, जिससे उस क्षेत्र में चलने वाली रेत भरी हवाओं से बचा जा सके। उसको अगर दूसरे क्षेत्र में रहने वाली महिलाओं पर जबरदस्ती लागू किया जाता है तो यह एक मानसिक प्रताड़ना कहलाती है। महिलाओं को अगर इस्लाम के समर्थक पुरुष उनको उनके मन से अगर कपड़े तक पहनने नहीं दे रहे हैं तो मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है|

बुर्का का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है| बुर्क़ा मुस्लिम संस्कृति का एक हिस्सा है, लेकिन इस्लाम का एक हिस्सा नहीं है। जहाँ पर इस्लाम का जन्म हुआ, उस हिस्से की औरतों ने कभी भी पर्दा नहीं पहना था। हजरत मुहम्मद ने कभी भी पर्दा करने के निर्देश नहीं दिए थे। धर्मग्रन्थों में दिए गए विचारों के साथ ही, विद्वानों का ये मत है कि इस्लाम में, सिर ढकने की अनिवार्यता नहीं होनी चाहिए क्योंकि इसका सीधा संबंध क़ुराम से है। सिर को ढकने की प्रथा का प्रारंभ अरब में इस्लाम के आगमन से पूर्व कुछ अन्य देशों के साथ संपर्क के चलते किया गया था, जहाँ पर हिजाब एक प्रकार की सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक था। आवरण में या बुर्के में रहना- इसे अरब में पैगम्बर मोहम्मद द्वारा प्रचलित नहीं किया गया था वरन्‌ ये वहाँ पर पहले से मौजूद था।

आवरण में रहना सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था और ग्रीक, रोमन, ज्यू और असायरियन्स में ये प्रथा थोड़ी या ज्यादा मात्रा में उपस्थित थी। ये पता नहीं चल पाया है कि ये रिवाज़ आमजनों तक कैसे पहुँचा। मुस्लिम समाज में, अपनी प्रतिष्ठा व धन प्रदर्शन का मुद्‌दा बनाकर आवरण को ग्रहण करने की प्रथा धीरे-धीरे पैगम्बर मोहम्मद की पत्नियों को अपना आदर्श बनाकर आगे चल पड़ी। अरब के लोगों ने इस्लाम में हिजाब और नकाब को मिलाकर बुर्क़ा पहनने को अनिवार्य कर दिया। ब्रिटेन के एक कैबिनेट मंत्री ने सुझाव दिया था कि अगर वो बुर्के वाली महिला से बात करती हैं तो वो सहज महसूस नहीं करती हैं। उन्होंने कहा था कि अगर कोई महिला हिजाब पहनकर आती है तो उन्हें ज्यादा अच्छा लगता है क्योंकि उसमें महिला का चेहरा दिखता है।

कुरान में हिजाब का जिक्र है, जिसमें महिला का चेहरा दिखता रहता है। बुर्का केवल कट्टरपंथी इस्लाम की सोच है जिसमें वो महिला को जबरदस्ती चेहरा ढकने के लिए बाध्य करते हैं। श्रीलंका ने वहाँ पर हुए आत्मघाती हमले के बाद बुर्क़ा पहनने पर रोक लगा दिया है। बहुत से यूरोपियन और अफ़्रीकी देशों ने बुर्क़े पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। अरब देशों में बुर्का पहनने का चलन वहाँ पर चलने वाली आँधियों से बचने के लिए था। धीरे-धीरे उस क्षेत्र में इस्लाम धर्म के फ़ैलने के कारण बुर्का इस्लाम का अंग बन गया। कुरान में ‘जिलबाब या खिबर’ शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ होता है बदन को ढकने वाली एक चादर या दुपट्टा। इसमें चेहरे को ढकने को नहीं बोला गया है। बुर्क़ा की शुरुआत फारस यानी ईरान से हुई। फारस में जब इस्लाम का प्रवेश हुआ तो वहाँ पर एक संस्कृति पहले से ही मौजूद थी। इस्लामी संस्कृति में कई चीज़ें फारसी संस्कृति से आई हैं।

जैसे, अल्लाह की जगह खुदा और सलात की जगह नमाज जैसे शब्द। इसी तरह ईरानी संस्कृति के प्रभाव में मुसलामानों ने बुर्क़ा अपना लिया। बुर्क़ा का आत्मघाती कार्रवाइयों में इस्तेमाल तथा उसका अपराधियों द्वारा स्वयं को छुपाने के उपकरण के रूप में प्रयोग करने की घटनाओं के बाद उसके सार्वजनिक स्थलों में प्रयोग पर गंभीर विवाद खड़ा हो गया। इसके पश्चात अनेक इसाई बहुल पश्चिमी देशों ने सार्वजनिक स्थलों पर बुर्का पहनने को प्रतिबंधित कर दिया। फ्रांस में 2011 में सार्वजनिक स्थलों पर बुर्का पहनने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। वर्ष 2018 में डेनमार्क में सार्वजनिक स्थलों पर बुर्का पहनने का प्रतिबन्ध लगा दिया गया। नीदरलैंड की सीनेट ने जून 2018 में विद्यालयों, अस्पतालों और सार्वजनिक स्थलों पर चेहरा ढकने के प्रतिबन्ध का कानून पास किया।

जर्मनी की संसद ने गाड़ी ड्राइव करते समय किसी भी तरह से चेहरा नहीं ढकने का कानून पास किया। वर्ष 2017 में ऑस्ट्रिया में विद्यालयों, अस्पतालों और सार्वजनिक स्थलों पर चेहरा ढकने के प्रतिबन्ध का कानून पास किया। बेल्जियम में जुलाई 2011 में पूरे चेहरे को ढकने को प्रतिबंधित करने वाला कानून पास किया गया। नॉर्वे में 2018 में पारित एक कानून के तहत शिक्षण संस्थानों में चेहरा ढकने वाले कपड़े पहनने पर रोक है। बुल्गारिया की संसद ने 2016 में एक बिल पारित किया था। इसके अनुसार, सार्वजानिक जगहों में चेहरा ढकने वाली महिलाओं को मिलने वाली सरकारी मदद में कटौती की जा सकती है। लिसबर्ग में भी इसी तरह के आंशिक प्रतिबन्ध हैं। वहाँ अस्पतालों, अदालतों और सार्वजनिक इमारतों में चेहरा नहीं ढका जा सकता है।

इटली के कई शहरों में चेहरा ढके रहने पर प्रतिबन्ध है। स्पेन के बार्सिलोना शहर में साल 2010 में नगर पालिका कार्यालय, सार्वजनिक बाजारों और लाइब्रेरी जैसी जगहों पर चेहरा ढकने पर रोक लगी थी। स्विटज़रलैंड के भी कुछ इलाकों में इस तरह का प्रतिबन्ध लगा हुआ है। साल 2015 में बुर्काधारी महिलाओं ने अफ्रीका में कई आत्मघाती हमले किए थे। इसके बाद कार्ड, गबान, कैमरून के उत्तरी क्षेत्र, निजिरिया और रिपब्लिक ऑफ़ कॉम्बो में पूरा चेहरा ढकने पर रोक लगा दी गई। अल्जीरिया में साल 2018 में सरकारी कर्मचारियों पर सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा पूरा ढकने पर रोक लगा दी गई। चीन में कुछ जगहों पर चेहरा पूरा ढकने या बुर्का पहनने पर प्रतिबन्ध है। आतंकवाद को रोकने के लिए भारत को बुर्का प्रतिबंध की आवश्यकता है। फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सार्कोजी ने दो साल पहले बयान दिया था महिलाओं को ढकने वाला बुर्का गुलामी का प्रतीक है।

पिछले साल ऐसा किस्सा भी सामने आया था, जब फ्रांस की सरकार ने एक विदेशी व्यक्ति को नागरिकता देने से इसलिए इनकार कर दिया था क्योंकि उसने अपनी ‘पत्नी को बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया। वहीं सऊदी अरब के एक मजहबी चैनल ‘वतन टीवी’ ने नियम बनाया हुआ है कि महिला एंकर नकाब पहनें। जब महिलाएँ कार्यक्रम पेश कर रही होती हैं तो स्टूडियों में पुरुष तकनीकी कर्मचारियों को घुसने की इजाजत नहीं होती है। बुर्के को लेकर अलग-अलग दुविधाएँ सामने आती रही हैं। पिछले साल ऑस्ट्रेलिया के एक जज के सामने जब धोखाधड़ी का एक मामला आया तो उन्होंने आदेश दिया कि मुस्लिम महिला गवाही देने के लिए अपने चेहरे से नकाब हटाएँ। जज का कहना था कि ये उचित नहीं होगा कि गवाह का चेहरा ढका रहे।

ईरान में भी बुर्के को लेकर दिलचस्प किस्सा सामने आ चुका है। दरअसल, ईरानी लड़कियों की फुटबॉल टीम को युवा ओलिम्पिक खेलों में भाग लेना था, लेकिन उसका कहना था कि वे हिजाब पहनकर खेलेंगी, जिस पर फीफा राजी नहीं था। बाद में फीफा ने बालों को पूरी तरह से ढकने वाले हिजाब के स्थान पर सिर को ढकने वाले एक विशेष कैप की पेशकश की ताकि बीच का रास्ता निकल सके। 2009 के अपने भाषण के तत्कालीन फ़्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी ने कहा कि बुर्का महिला की अधीनता का प्रतीक है। राष्ट्रपति सरकोजी ने आगे बताया कि जो महिलाएँ पर्दा करती हैं, उन्हें फ्रांस में अनुमति नहीं दी जाएगी, क्योंकि देश महिलाओं की पहचान उनके कारावास और वंचितता में विश्वास नहीं करता।

मिस्र में भी ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं, जहाँ अधिकारियों ने विश्वविद्यालय में नकाब पर प्रतिबंध लगा दिया है। अधिकारियों का तर्क है कि उन्होंने सुरक्षा कारणों की वजह से ये पहल की। फ़्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी के लिए बुर्का एक निहत्थे जेल का प्रतीक है, जो महिलाओं को द्वितीय श्रेणी के नागरिकों के रूप में प्रस्तुत करता है। लेखक ऐनी अप्पलम्ब्याउम के अनुसार, बुर्का को शालीनता और स्थानीय रीति-रिवाजों के सम्मान के लिए प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।

(लेखक: गौरव मिश्रा)

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