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राणा कपूर की तीनों बेटियों की 20 फर्जी कम्पनियाँ, ₹13000 करोड़ का गबन: CBI ने दर्ज किया मामला

‘यस बैंक’ के संस्थापक राणा कपूर की गिरफ़्तारी के बाद ये मामला और भी फँसता जा रहा है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जाँच की आँच अब राणा कपूर की पत्नी और उनकी तीनों बेटियों तक पहुँच गई है। राणा कपूर ने कई महँगी पेंटिंग्स ख़रीदी थीं, जिनकी क़ीमत करोड़ों में लगाई गई थी। इसके अलावा उनके 2000 करोड़ रुपए के निवेश की भी जाँच की जा रही है। मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में गिरफ़्तार राणा कपूर एक दर्जन से भी अधिक मुखौटा कंपनियों के जरिए अपना कारोबार चला रहे हैं, जो जाँच की जद में आ गई है।

ईडी ने मुंबई कोर्ट को बताया है कि ‘यस बैंक’ ने डीएचएफएल के 3700 करोड़ मूल्य से भी अधिक के डिबेंचर ख़रीदे। डीबीएचएल ने डोलीट अर्बन वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड को 600 करोड़ का लोन दिया। इस कम्पनी में राणा कपूर की बेटियाँ बतौर डायरेक्टर कार्यरत हैं। बिना पर्याप्त कोलैटरल के उक्त लोन दे दिया गया और नियमों की अनदेखी की गई। दोनों कंपनियों के करार में 4300 करोड़ रुपए की गड़बड़ी की बात ईडी ने कही है। इसके बाद कोर्ट ने राणा कपूर को 11 मार्च तक ईडी की कस्टडी में भेज दिया।

ईडी ने राणा कपूर की पत्नी बिंदु और उनकी तीनों बेटियों के कई ठिकानों की तलाशी भी ली है। दिल्ली और मुंबई में चले इस तलाशी अभियान के दौरान राखी कपूर टंडन, राधा कपूर और रोशनी कपूर से पूछताछ भी की गई, जो कई घंटों तक चली। तीनों बेटियों पर आरोप है कि उनके नाम से कई कम्पनियाँ चलती हैं, जो दूसरी कंपनियों को ‘यस बैंक’ से लोन दिलाने के एवज में मोटी रकम वसूलती थीं। इस तलाशी अभियान के बाद मिले दस्तावेजों के आधार पर राणा कपूर के ख़िलाफ़ एक और अलग मामला दर्ज किया जा सकता है।

कपूर परिवार के पास 44 महँगे पेंटिंग्स मिले हैं। इनमें से कई राजनेतओं से ख़रीदी गई है। ईडी ने कपूर की पत्नी और तीनों बेटियों के बयान भी रिकॉर्ड किए हैं। आरबीआई ने ‘यस बैंक’ पर पाबन्दी लगाने के साथ ही उसके बोर्ड को भी भांग कर दिया है, ऐसे में कोई व्यक्ति अपनी जमापूँजी में से इस बैंक से 50,000 रुपए तक ही निकाल सकता है। सीबीआई ने ‘दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड’ और राणा कपूर की तीनों बेटियों के ख़िलाफ़ भी केस दर्ज किया है।

इस मामले के तार गैंगस्टर इक़बाल मिर्ची तक भी जुड़ते नज़र आ रहे हैं। ऐसे में ईडी फूँक-फूँक कर क़दम रख रही है। ‘यस बैंक’ के संस्थापक रहे राणा कपूर बाद में इसके एमडी और सीईओ बने। सितम्बर 2018 में उन्हें ये पद छोड़ना पड़ा था। आरोप है कि डीएफएचएल ने कुल 80 फ़र्ज़ी कंपनियों के जरिए 13,000 करोड़ रुपए का गबन किया है। एक ईडी अधिकारी ने आईएएनएस को बताया कि कपूर परिवार ने 20 फ़र्ज़ी कम्पनियाँ बना रखी हैं, जिनका इस्तेमाल इन गड़बड़ियों के लिए किया गया।

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‘हराम की बोटी’ को काट कर फेंक दो, खतने के बाद लड़कियाँ शादी तक पवित्र रहेंगी: FGM का भयावह सच

‘खतना’ एक शब्द में ही सब कुछ कह जाता है। यह शब्द बोलने में ही कितना गंदा सा लगता है और अगर इसका सच जानें तो और भी घिन सी आ जाएगी। जब लोग खतना बोलते हैं तो ऐसा लगता है कि किसी के साथ कुछ अत्याचार सा हो रहा है। बात करने में लगता है कि कहीं पर कुछ काटने-पीटने की बात हो रही है और जब काटना-पीटना मनुष्य के शरीर का हो तो मन में एक दया और उस प्रथा के प्रति एक घृणा स्वाभाविक तौर आ जाती है। घृणा होना उस प्रथा के प्रति एक पहलू है। दूसरा पहलू यह भी है कि इस बेवजह की प्रथा को यहूदियों और मुसलामानों ने क्यों अपनाया?

खतना किसी भी धर्म का अंग नहीं है। यह एक प्रथा है, जो मुस्लिम और यहूदियों में बहुत पुराने समय से चली आ रही है। ना तो बाइबल में ऐसा कुछ लिखा है और ना तो कुरान में खतने का कहीं भी जिक्र है फिर भी इस प्रथा को मुस्लिम और यहूदी धर्म के ठेकेदार उसको धर्म से जोड़कर लोगों को डराने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। उनके लिए महिला के शरीर के एक खाल को निकालकर बहार फेंक देना कहाँ तक उस धर्म के इस प्रथा को सही ठहराता है!

महिलाओं की खतना प्रथा के बारे में बहुत से लोगों को नहीं पता है। महिलाओं का जब खतना होता है तो महिला के क्लिटोरिस को काटकर निकाल दिया जाता है। आम भाषा में इस अंग का कोई नाम नहीं है पर संस्कृत में इसे भग्नशिष कहते हैं। यह महिला के जननांग के ऊपरी भाग में खाल का एक टुकड़ा सा होता है। मुस्लिमों में इस अंग को ‘हराम की बोटी’ कहा जाता है। मुस्लिमों के द्वारा मनुष्य के किसी अंग को ‘हराम” शब्द देना वैसे ही अपने आप में मुस्लिमों का महिलाओं के प्रति उनकी दृष्टि को दिखाता है।

महिलाओं का खतना कैसे? इसके प्रकार मुस्लिम समुदायों के अनुसार अलग-अलग हैं। सबसे ज्यादा जिस प्रकार का खतना किया जाता है, उसमें उनके क्लिटोरिस वाले अंग को काटकर निकाल दिया जाता है| आप इस भयावह स्थिति का विचार कर सकते हैं कि महिला के अंग को काटकर निकाला जा रहा हो तो उस समय बच्ची या महिला की शारीरिक वेदना क्या होगी? दूसरे तरह के प्रकार में क्लिटोरिस का थोड़ा सा हिस्सा काटा जाता है। इसके बाद के दो और प्रकार बहुत ही डरावने हैं। तीसरे तरह के प्रकार में महिला के जननांग को बींध दिया जाता है और उससे बहुत ही बुरा चौथा प्रकार यह है कि महिलाओं के जननांग को सिल दिया जाता है। ये चारों ही प्रकार महिलाओं के ऊपर मुस्लिम समाज के द्वारा किया गया चरम सीमा का अत्याचार ही है। कुछ लोंगो का यहाँ तक मानना है कि अगर उनके परिवार की किसी लड़की का उन्होंने खतना कर दिया है तो उस परिवार का समुदाय में मान भी बढ़ता है। मुस्लिम समुदाय अगर इस तरह से अपने मान को बढ़ाने के लिए लड़कियों के ऊपर अत्याचार करते रहेंगे तो यह कहाँ तक सही है?

इस घिनौनी प्रथा का सच भी बड़ा अजीब सा है। मुस्लिम और यहूदी समुदाय में यह माना जाता है कि अगर लड़कियों का कम उम्र में क्लिटोरिस को काटकर निकाल दिया जाए तो उनके मन में सेक्स के प्रति इच्छा नहीं रहेगी। उस स्त्री का सेक्स करने का मन नहीं करेगा और शादी के पहले वह स्त्री पवित्र रहेगी। क्या लड़कियों का सेक्स करना इतना गलत है कि उनको इतनी अमानवीय प्रथा से गुजरना पड़े? क्या लड़कियों का कोई अधिकार नहीं है कि वो अपने शरीर के बारे में और अपनी इच्छा को अपने अनुसार सोच सकें? यह एक कुप्रथा ही नहीं बल्कि महिला का शारीरिक शोषण भी है।

खतना के बाद महिला को असहनीय पीड़ा सहन करनी पड़ती है। आप यह सोंचे कि जब आपके शरीर में हल्की सी कोई चुटकी काट ले तो आपको कितनी पीड़ा होती है, वहीं जब महिला के एक अंग को निकालकर बाहर फेंका जा रहा है तो उस महिला को कितनी पीड़ा का सामना करना पड़ता होगा! इस खतना क्रिया के बाद महिला या बच्ची में योनि संक्रमण होने की संभावना बहुत ज्यादा रहती है क्योंकि बहुत बार ऐसा होता है कि एक ही रेजर से कई महिलाओं का खतना कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया में जननांग के साथ इस तरह से कुकृत्य करने से कई बार महिला के बच्चे की जनन क्रिया में बाधा हो जाती है और कभी-कभी वह महिला बच्चे को जन्म भी नहीं दे पाती है। कितनी गन्दी और घिनौनी प्रथा है यह, जिसमें महिला के आतंरिक अंगों को इस प्रथा के द्वारा हानि पहुँचाई जाती है। जब यह होता है तो कई बार बहुत ज्यादा रक्तस्राव होने से बच्चियों की मृत्यु तक हो जाती है और कभी-कभी बच्चियाँ कोमा तक में पहुँच जाती हैं। मतलब आप यह सोच सकते हैं कि एक प्रथा के चक्कर में यह मुस्लिम समाज किस तरह से बच्चियों को मृत्यु तक पहुँचा रहा है।

इस प्रथा से महिलाओं को मानसिक वेदना का भी शिकार होना पड़ता है। इस प्रक्रिया से गुजरने के बाद शादी के बाद महिला के सेक्स जीवन में काफी असर पड़ता है। वो मानसिक द्वन्द्व से गुजरती रहती है। बच्ची को जब बहला फुसलाकर ले जाकर उसका खतना करवा दिया जाता है, तो उसका अपने लोंगो के प्रति किसी तरह का भरोसा नहीं रह जाता है और यह अविश्वास की भावना उसके जीवन में बहुत समय तक रहती है और मानसिक उत्पीड़न से अपने दिनों को काटती रहती है। वो महिला जिसको इस गंदे और वीभत्स प्रथा से होकर गुजरना पड़ता है उसके मानसिक अंतर्द्वंद्व को हम किसी भी तरह समझ नहीं सकते हैं कि किस पीड़ा से वो महिला या बच्ची गुजर रही होगी।

एक प्रथा जिसका कोई भी कारण नहीं है होने का, जिसमें केवल और केवल वेदना है, वेदना शारीरिक और मानसिक दोनों ही, उस कुप्रथा को कैसे मुस्लिम धर्म अपना सकता है। मुस्लिम धर्म में ऐसी बहुत सी कुप्रथाएँ चल रही हैं जो केवल महिलाओं के ऊपर ही लागू होती हैं। मुस्लिम धर्म महिला की हर तरीके से आजादी छीनने में विश्वास कैसे कर सकता है? मुस्लिम धर्म कैसे किसी महिला के अंग को निकालकर बाहर फेंक सकता है? यह पूरी तरह से मानवाधिकारों का उल्लंघन ही तो है। इसको खत्म करने के लिए हर देश को कानून बनाने ही होंगे, जिससे महिलाओं का शोषण रोका जा सके।

दाऊदी बोहरा समुदाय से आने वाली कई महिलाओं ने प्रधानमंत्री से लड़कियों के खतना को गैरकानूनी करार देने के लिए मदद की गुहार लगाई है। भारत में फिलहाल खतना को लेकर कोई कानून नहीं है और बोहरा समुदाय अब भी इस परंपरा का पालन करता है। जिसे यहाँ खतना या महिला सुन्नत कहते हैं। इसे अंग्रेजी में फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) कहा जाता है। इस प्रक्रिया में मुस्लिम महिला योनि के एक हिस्से क्लिटोरिस को रेजर ब्लेड से काट दिया जाता है। या कुछ जगहों पर क्लिटोरिस और योनि की अंदरूनी त्वचा को भी आंशिक रूप से हटा दिया जाता है। इस प्रक्रिया में महिला को असहनीय पीड़ा सहन करनी पड़ती है।

इस कुरीति को लेकर विश्वास है कि महिला यौनिकता पितृसत्ता के लिए खतरनाक है और महिलाओं को सेक्स का का कोई अधिकार नहीं है। इससे मुस्लिम महिला एक मानसिक वेदना से गुजरती है| मुस्लिम समाज में रूढ़िवादिता हावी है| माना जाता है कि जिस मुस्लिम महिला का खतना हो चुका है, वह अपने पति के प्रति ज्यादा वफादार होगी और घर से बाहर नहीं जाएगी।

यूनिसेफ के आँकड़ों के मुताबिक दुनिया भर में सालाना 20 करोड़ मुस्लिम महिलाओं का खतना होता है। इनमें आधे से ज्यादा सिर्फ मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया में होते हैं। आँकड़ों के मुताबिक जिन 20 करोड़ लड़कियों का खतना होता है, उनमें से करीब साढ़े चार करोड़ बच्चियाँ 14 साल से कम उम्र की होती हैं। इंडोनेशिया में आधी से ज्यादा बच्चियों का खतना हो चुका है। माना जाता है कि अफ्रीका में हर साल तीस लाख लड़कियों पर इसका खतरा मंडरा रहा है।

ऐसा समझा जाता है कि तीस अफ्रीकी देशों, यमन, इराकी कुर्दिस्तान और इंडोनेशिया में महिला खतना ज्यादा चलन में है। वैसे भारत समेत कुछ अन्य एशियाई देशों में भी इसके मामले मिले हैं। औद्योगिक देशों में बसी प्रवासी आबादी के बीच भी महिला खतना के मामले देखे गए हैं। यानी नए देश और समाज का हिस्सा बनने के बावजूद कुछ लोग अपनी पुरानी रीतियों को जारी रखे हुए हैं। जिन देशों में लगभग सभी महिलाओं को खतना कराना पड़ता है, उनमें सोमालिया, जिबूती और गिनी शामिल हैं। ये तीनों ही देश अफ्रीकी महाद्वीप में हैं।

आम तौर पर परिवार की महिलाएँ ही इस काम को अंजाम देती हैं। साधारण ब्लेड या किसी खास धारदार औजार के जरिए खतना किया जाता है। हालाँकि मिस्र और इंडोनेशिया जैसे देशों में अब मेडिकल स्टाफ के जरिए महिलाओं का खतना कराने का चलन बढ़ा है। महिला खतने का चलन मुस्लिम और ईसाई समुदायों के अलावा कुछ स्थानीय धार्मिक समुदायों में भी है। आम तौर पर लोग समझते हैं कि धर्म के मुताबिक यह खतना जरूरी है लेकिन कुरान या बाइबिल में ऐसा कोई जिक्र नहीं है।

माना जाता है कि महिला की यौन इच्छा को नियंत्रित करने के लिए उसका खतना किया जाता है। लेकिन इसके लिए धर्म का बेतुका हवाला दिया जाता है। बहुत से ईसाई और मुस्लिम समाज के लोग का मानना है कि खतने के जरिए महिलाएँ पवित्र होती हैं। इससे समुदाय में उनका मान बढ़ता है और ज्यादा कामेच्छा नहीं जगती। जो लड़कियाँ खतना नहीं करातीं, उन्हें समुदाय से बहिष्कृत कर दिया जाता है। खतने के कारण उस महिला को माँ बनने के समय बहुत सी जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। इसके कारण कई तरह की मानसिक समस्याएँ और अवसाद भी हो सकता है।

बहुत से अफ्रीकी देशों में महिला खतने पर प्रतिबंध है। लेकिन अकसर इस कानून को सख्ती से लागू नहीं किया जाता है। वहीं माली, सिएरा लियोन और सूडान जैसे देशों में यह कानूनी है। महिला खतने से कई अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन होता है। 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने महिला खतने को खत्म करने के लिए एक प्रस्ताव स्वीकार किया था। यूएन महिला खतने को ‘मानवाधिकारों का उल्लंघन’ मानता है। खतना से पहले एनीस्थीसिया भी नहीं दिया जाता। बच्चियाँ पूरे होशोहवास में रहती हैं और दर्द से चीखती हैं।

अगर बच्ची का खतना वाकई यौन इच्छा घटाने के लिए है तो सात साल की लड़की का खतना कराके वो क्या हासिल करना चाहते हैं? छोटी बच्ची को सेक्स और यौन इच्छा से क्या मतलब? खतना से औरतों को शारीरिक तकलीफ तो उठानी ही पड़ती है, इसके अलावा तरह-तरह की मानसिक परेशानियाँ भी होती हैं। उनकी सेक्स लाइफ पर भी असर पड़ता है। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, बेल्जियम, यूके, अमरीका, स्वीडन, डेनमार्क और स्पेन जैसे कई देश इसे पहले ही अपराध घोषित कर चुके हैं।

इस परंपरा पर 42 देशों ने रोक लगा दी है, जिनमें 27 अफ्रीकी देश हैं। बच्चियों का खतना बहुत छोटी उम्र में कराया जाता है। उस वक्त उन्हें कुछ पता ही नहीं होता, फिर वो पुलिस को कैसे बताएँगी? और फिर खतना कराते ही घरवाले हैं, तो बात बाहर कैसे आएगी? सरकार को बोहरा समुदाय के धार्मिक नेताओं से भी बात करनी चाहिए, उनके बिना इस अमानवीय परम्परा को खत्म करना बहुत मुश्किल है।

हाई-प्रोफाइल बोहरा परिवार अपनी बच्चियों का खतना कराने के लिए डॉक्टरों के यहाँ ले जाते हैं| चूँकि खतना मेडिकल प्रैक्टिस है ही नहीं इसलिए डॉक्टरों को भी इस बारे में कुछ पता नहीं होता फिर भी पैसों के लिए वो भी इसमें शामिल हो जाते हैं। ये सब बिल्कुल गुपचुप तरीके से होता है और कोई इस बारे में बात नहीं करता। महिलाओं का खतना एक ऐसी कुप्रथा है, जिससे न सिर्फ महिलाएँ अपना मानसिक संतुलन खो देती हैं, बल्कि उनके शरीर को बेहद नुकसान भी पहुँचता है।

यूएन ने साल 2030 तक महिला खतना को खत्म करने का लक्ष्य रखा है। दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में महिलाओं का खतना करने की प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि महिलाओं का खतना सिर्फ इसलिए नहीं किया जा सकता है क्योंकि उन्हें शादी करनी है। इस मसले पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं का जीवन केवल शादी और पति के लिए नहीं होता है। शादी के अलावा भी महिलाओं के दायित्व होते हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी महिला पर ही ये दायित्व क्यों हो कि वह अपने पति को खुश करे।

सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के खतने वाली प्रथा को निजता के अधिकार का उल्लंघन माना है। साथ ही ये भी कहा है कि यह लैंगिक संवेदनशीलता का मामला है और ऐसा किया जाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। महिलाओं के खतना जैसे आपराधिक कृत्य को इस आधार पर इजाजत नहीं दी सकती कि वह प्रैक्टिस का हिस्सा है। प्राइवेट पार्ट को छूना पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत अपराध है। सुप्रीम कोर्ट ने भी महिलाओं की खतना प्रथा के खिलाफ कहा कि ये किसी भी व्यक्ति के पहचान का केंद्र बिंदु होता है और ये एक्ट (खतना) किसी की पहचान के खिलाफ है। कोर्ट ने माना कि इस तरह का एक्ट एक औरत को आदमी के लिए तैयार करने के मकसद से किया जाता है, जैसे वो जानवर हों।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धर्म के नाम पर कोई किसी महिला के यौन अंग को कैसे छू सकता है। यौन अंगों को काटना महिलाओं की गरिमा और सम्मान के खिलाफ है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि धर्म की आड़ में लड़कियों का खतना करना जुर्म है और वह इस पर रोक का समर्थन करती है। बोहरा मुस्लिम समुदाय से संबंधित एक महिला के अनुसार क्लिटरिस को बोहरा समाज में हराम की बोटी कहा जाता है।

दाउदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में महिलाओं के खतना को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं का खतना यानी महिला जननांग का छेदन करने की परंपरा संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है, जो कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा और धर्म, नस्ल, जाति, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करने की गारंटी देता है। खतना प्रथा के समर्थन में खड़े संगठन की ओर से पेश हुए वकील और कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि खतना करना इतना क्रूर भी नहीं है, जितना कि इसे बताया जा रहा है। तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा था, “यह संविधान के अनुच्छेद-21 का उल्लंघन है क्योंकि इसमें बच्ची का खतना कर उसको आघात पहुँचाया जाता है।” केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट को बताया गया था कि सरकार याचिकाकर्ता की दलील का समर्थन करती है कि यह भारतीय दंड संहिता (IPC) और बाल यौन अपराध सुरक्षा कानून (POCSO Act) के तहत दंडनीय अपराध है।

मिस्र में आमतौर पर 9 से 12 साल की उम्र में ही लड़कियों का खतना कर दिया जाता है। मिस्र सरकार के मुताबिक, यहाँ 92 फीसदी शादीशुदा महिलाएँ खतना की प्रक्रिया से गुजर चुकी है। यूएन के आँकड़ों के मुताबिक, इस प्रक्रिया से गुजरने वाली सबसे ज्यादा महिलाएँ मिस्र की हैं। दक्षिण अफ्रीकी देश गुयाना को आधिकारिक तौर फ्रेंच गुयाना के नाम से जाना जाता है। यहाँ खतना गैरकानूनी है। इसके बावजूद दुनिया में खतने के मामले में यह दूसरे नंबर पर है। एक सर्वे के मुताबिक, 15 से 49 साल की 96 फीसदी महिलाएँ खतना की प्रक्रिया से गुजरीं। इसके लिए यहाँ धर्म या क्षेत्र का कोई भेद नहीं है।

दक्षिण अफ्रीका में स्थित माली में भी खतना परंपरा आम है। WHO के आँकड़ों के मुताबिक, माली में 15-49 साल की उम्र की 85.2 फीसदी महिलाएँ इस प्रक्रिया से गुजरीं। यहाँ के सोनरई, तामाचेक और बोजो लोगों में ही इसका आँकड़ा कम है। माली में 64 फीसदी महिलाएँ एफएमजी को धार्मिक दृष्टि से जरूरी मानती हैं। यहाँ इसके खिलाफ अब तक कोई सख्त कानून भी नहीं है। दक्षिण अफ्रीकी देश एरिट्रिया में सरकार की ओर से जारी रिपोर्ट में FGM की दर 89 फीसदी बताई गई थी। यहाँ भी ग्रामीण इलाकों में धार्मिक दृष्टि से इसे जरूरी माना जाता है। ये मुस्लिम और ईसाई, दोनों ही धर्मों में प्रचलित है। मार्च 2007 में सरकार ने इसके खिलाफ कानून बनाया गया। इसके तहत जुर्माने से लेकर कैद तक की सजा का प्रावधान है।

सोमालिया में करीब 80 से 98 फीसदी महिलाओं का खतना होता है। WHO ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि सोमालिया में 97.7 फीसदी महिलाएँ और लड़कियाँ खतने की प्रक्रिया से गुजरीं। वहीं, यूनिसेफ ने भी अपनी रिपोर्ट में सोमालिया में खतने की दर को दुनिया में सबसे ज्यादा बताया था। अगस्त 2012 में संविधान के आर्टिकल 15 में खतना पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, लेकिन इस पर रोक नहीं लग पाई है। मुख्य रूप से मुस्लिम आबादी वाले जिबूती में 93 फीसदी से 98 फीसदी महिलाओं का खतना होता है। यूनिसेफ की रिपोर्ट में जिबूती को दुनिया का दूसरा ऐसा देश बताया गया था, जहाँ तीसरे स्तर के खतने की दर बहुत ज्यादा है।

हालाँकि, यहाँ के मौलवी भी इस प्रक्रिया को लेकर दो धड़ों में बँटे हुए हैं। देश में इसके खिलाफ सख्त कानून है। जिसके तहत दोषी पाए जाने पर पाँच साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान भी है। बुर्किना फासो को बुर्किना और आधिकारिक तौर पर रिपब्लिक ऑफ अपर वोल्टा के नाम से जाना जाता है। इस छोटे से देश की आबादी डेढ़ करोड़ से थोड़ी ज्यादा होगी। खतना यहाँ की संस्कृति में शामिल है। WHO ने 2006 की अपनी रिपोर्ट में यहाँ खतने की दर 72.5 फीसदी बताई थी। 1996 में देश में इसके खिलाफ कानून बनाया गया, जो फरवरी 1997 से लागू है।

हे शक्ति
तुम क्यों निराश हो
उदास हो
बदहवास हो।

हे शक्ति
तुम हनुमान नहीं
कि तुम्हें
तुम्हारी शक्ति का अहसास दिलाऊँ
तुम्हारी ऊर्जा का श्रोत बताऊँ।

हे शक्ति
तुम उठो
जागो
तुम अपने खड्ग से
महिसासुर ‘खतना’ का वध कर दो।

हे शक्ति
तुम क्यों निराश हो
उदास हो
बदहवास हो।

लेखक: गौरव मिश्रा

60 वर्षीय कॉन्ग्रेस नेता ने रवीना से रचाई शादी, पार्टी अध्यक्ष पद की रेस में भी रहे हैं शामिल

कॉन्ग्रेस पार्टी के 60 वर्षीय नेता मुकुल वासनिक ने शादी रचाई है। आनंदपुर साहिब से सांसद मनीष तिवारी ने वासनिक की शादी की सूचना दी और उन्हें बधाई भी दी। तिवारी अपनी पत्नी नाज़नीन के साथ नवविवाहित जोड़े को शुभकामनाएँ देने पहुँचे। उन्होंने ट्विटर पर इस पल को शेयर किया और लिखा कि वो वासनिक को 1984 से ही जानते हैं।

1988 में ‘इंडियन यूथ कॉन्ग्रेस’ के अध्यक्ष रहे मुकुल वासनिक ने रवीना खुराना के साथ शादी रचाई है। पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने बताया है कि वो रवीना को 1985 से ही जानते हैं और दोनों की जोड़ी खूब जम भी रही है। मनीष जब ‘वर्ल्ड फेस्टिवल ऑफ यूथ एंड स्टूडेंट्स’ में भाग लेने मॉस्को गए थे, तब उनकी मुलाक़ात रवीना खुराना से हुई थी। तिवारी ने लिखा कि वो इन दोनों के विवाह के बंधन में बंध जाने के बाद ख़ासे ख़ुश हैं।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सोमवार (मार्च 8, 2020) को दिल्ली के मौर्या शेरेटन पहुँचे और उन्होंने पार्टी महासचिव मुकुल वासनिक को शादी की बधाई दी। मौर्या शेरेटन में मुकुल वासनिक की तरफ से लंच पार्टी का आयोजन किया गया था, जिसमें अहमद पटेल, अम्बिका सोनी और आनंद शर्मा जैसे कई दिग्गज कॉन्ग्रेस नेता उपस्थित रहे।

बता दें कि हाल ही में जब राहुल गाँधी ने अचानक से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था, तब मीडिया में मुकुल वासनिक के नए अध्यक्ष बनने की अटकलें लगाई जा रही थीं। हालाँकि, सोनिया गाँधी को फिर से पार्टी की कमान दे दी गई थी।

IAF क्या-क्या करती है, ऊँची जगह से फोटो लो और Pak भेजो: हजाम, अरबाज और अब्बास जासूसी करते धराए

भारत में रहकर यहाँ के सैन्य ठिकानों से संबंधी अहम जानकारियाँ पाकिस्तान को भेजने के आरोप में पुलिस ने गुजरात के कच्छ से 4 पाकिस्तानी जासूसों को गिरफ्तार किया। जानकारी के मुताबिक गुजरात पुलिस और एटीएस की रडार पर ये चारों काफी लंबे समय थे। मगर, इनकी गिरफ्तारी आज सुबह जाकर संभव हुई। अब पुलिस, चारों आरोपितों से पूछताछ में जुटी है।

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गिरफ्तार हुए चारों आरोपितों की उम्र 17-23 वर्ष तक की है। इनमें से तीन की पहचान 23 वर्षीय हजाम मामाद्राफिक (Hajam Mamadrafik), 20 वर्षीय अरबाज इस्माइल, 18 साल के पढियार अब्बास (Padeiyar Abas) के रूप में हुई है। चौथे आरोपित के नाबालिग होने के कारण उसकी पहचान का खुलासा नहीं किया गया है।

शुरुआती जानकारी के मुताबिक, इन 4 युवकों पर कच्छ के नलिया वायुसेना की डिप्लॉयमेंट की जानकारी और वायुसेना की मूवमेंट सीमा पार पाकिस्तान भेजने का आरोप है। इसके अलावा बताया जा रहा है कि इनके जरिए सैन्य की गुप्त जानकारियाँ फोटोग्राफी की आड़ में पाकिस्तान भेजी जा रही थीं। जिसके लिए ये एयरबेस के आसपास ऊँची जगह पर जाकर फोटो लेते थे और पाकिस्तान भेजते थे। यह किस-किस के संपर्क में थे, फिलहाल भारतीय सुरक्षा एजेंसियाँ इसकी जानकारी जुटा रही हैं। इनके खिलाफ़ शासकीय गोपनीयता अधिनियम के तहत केस दर्ज किया गया है।

बता दें कि इससे पहले भारतीय नौसेना में जासूसी और हनी ट्रैप के खुलासे के बाद डिफेंस कर्मचारियों के लिए फेसबुक पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। अब कोई भी जवान फेसबुक का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। साथ ही नौसेना के ठिकानों, डॉकयार्ड और ऑन-बोर्ड युद्धपोतों पर स्मार्टफोन के इस्तेमाल पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। बीते दिनों नौसेना के 7 कर्मियों को सूचनाएँ लीक करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद नौसेना ने अपने कर्मियों से सोशल मीडिया से दूरी बनाने का फरमान जारी किया था।

कोई ढोती थीं मैला तो कोई थीं सफाई कर्मचारी: पद्म पुरस्कार विजेता महिलाओं की 7 कहानियाँ

इस बार के नारी दिवस की थीम है- समानता और बराबरी। बराबरी की दुनिया ही सक्षम दुनिया है। और हाँ, इस थीम पर पूरी तरह से फिट बैठती हैं भारत की वो महिलाएँ, जिन्होंने हर बंधन को तोड़कर, हर मुश्किल से लड़कर ना केवल अपने सपनों को साकार किया है बल्कि समाज और देश के विकास में भी अपना अहम योगदान दिया है। सरकार ने इस साल 141 पद्म पुरस्कार दिए हैं और उन्हें पाने वालों में 34 महिलाएँ हैं। चलिए आज नारी दिवस के अवसर इन पद्म पुरस्कार विजेताओं में से कुछ से मिलते हैं।

सफाई कर्मचारी से विधान सभा का सफर- भागीरथी देवी

“कौन कहता है आसमाँ में सूराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो”। ये कहावत फिट बैठती है इस साल पद्म पुरस्कार पाने वाली भागीरथी देवी पर। वो रामनगर, पश्चिम चम्पारण से बिहार विधान सभा की सदस्या हैं। भागीरथी देवी पश्चिम चम्पारण के नरकटियागंज के एक महादलित परिवार से आती हैं। कभी यह नरकटियागंज के ब्लॉक विकास कार्यालय में मात्र 800 रूपए माह की तन्ख्वाह पर काम करने वाली सफाई कर्मचारी हुआ करती थीं।

साइकिल पर घूम कर काम करने वाली भागीरथी देवी ने गाँव की लड़कियों की शिक्षा के क्षेत्र में काफी काम किया है। महिलाओं के संगठन बनाकर लोगों को घरेलू हिंसा और दलित हिंसा के बारे में जागरूक करने में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

पेड़-पौधों को जानने वाली तुलसी अम्मा

अब मिलिए कर्नाटक की तुलसी गौड़ा जी से। 72 साल की तुलसी अम्मा मूलत: हलक्की आदिवासी हैं। इनके पास चिकित्सकीय पौधों से जुड़े ज्ञान का भण्डार है। किसी भी तरह की औपचारिक शिक्षा नहीं होने के बावजूद तुलसी अम्मा ने पर्यावरण को संरक्षित करने में अतुलनीय योगदान दिया है।

यह अब तक 30,000 से ज़्यादा पौधे रोप चुकी हैं और फॉरेस्ट डिपार्टमेन्ट की नर्सरीज़ की देखभाल करती हैं।

महाराष्ट्र की ‘सीड मदर’

सफल होने के लिए बस दृढ़ इच्छा शक्ति चाहिए, इस सोच को और प्रगाढ़ करती हैं महाराष्ट्र की 56 वर्षीय आदिवासी महिला राहिबाई सोमा पोपोरे। इन्होंने खुद से एग्रो बायो-डाइवर्सिटी के संरक्षण के बारे में सीखा है और आज यह अपने इस काम के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं। इन्होंने लगभग पचास एकड़ की कृषि भूमि का संरक्षण किया है, जहाँ ये 17 अलग अलग तरह की फसलें उगाती हैं। इन्होंने खाली पड़ी ज़मीनों पर जल संरक्षण करने के अपने तरीके विकसित किए हैं।

पोपेरे, किसानों और छात्रों को सही बीज चुनने, मिट्टी को उपजाऊ रखने और कीड़ों से फसल को बचाने की ट्रेनिंग देती हैं। लोगों की सहायता करने के लिए यह स्वयं सहायता समूह भी चलाती हैं। इनकी इन्हीं खूबियों के चलते इन्हें ‘सीड मदर’ के नाम से जाना जाता है।

केरल की पारम्परिक कठपुतली कला की अन्तिम जीवित जानकार

81 साल की मूज़िक्कल पंकाजक्क्षी केरल की पारम्परिक कठपुतली कला नोक्कूविद्या पावाक्कली की अकेली जानकार हैं। यह बेहद मुश्किल कठपुतली कला है, जिसे सीखने के लिए कड़ा प्रशिक्षण और बेहद मेहनत लगती है। इस कला में कलाकार को कठपुतलियों को अपने अपर लिप पर बैलेंस करना होता है और उनकी चालों को नियंत्रित करने के लिए धागों के साथ आँख की पुतलियों को भी लगातार चलाना पड़ता है। यह अपने स्टायल और अलग तरीके से अंजाम दिए जाने के कारण एक दुर्लभ विद्या मानी जाती है।

पंकाजक्क्षी पाँच दशकों से इसे कर रही हैं। फिलहाल वो इस कठपुतली विधा की एकमात्र जानकार हैं, जो खत्म होने के कगार पर है। उन्हें इस विद्या को जीवित रखने के लिए पद्म पुरस्कार से नवाज़ा गया है।

हल्दी क्रांति की जनक ट्रिनिटी सय्यू

मेघालय की ट्रिनिटी सय्यू का नाम हल्दी की खेती के साथ जुड़ चुका है। सय्यू अपने गाँव की 800 से ज़्यादा महिलाओं को जैविक खेती के ज़रिए शुद्धतम और उच्चतम किस्म की हल्दी की खेती करने का प्रशिक्षण दे चुकी हैं। इनके स्वयं सहायता समूह की महिला किसान लाकाडोंग किस्म की हल्दी की खेती करती हैं, जो खाना बनाने में इस्तमाल होने के साथ ही एक एन्टी इन्फ्लेमेट्री, एन्टी डायबीटिक और एन्टी कैन्सरस चिकित्सकीय गुणों वाली उपज भी है।

सय्यू जैयन्तिया हिल आदिवासी महिला हैं जहाँ मातृसत्तात्मक सत्ता चलती है। परिवार की सम्पत्ति महिलाओं को मिलती है। अपनी माँ से मिली पारिवारिक सम्पत्ति और कृषि के गुणों का सय्यू बेहद कौशल के साथ संरक्षण कर रही हैं।

सिर पर मैला ढोने वाली ऊषा चोमर बनी महिला शक्ति की पहचान

जिजीविषा, इच्छाशक्ति, कड़ी मेहनत और हौसले का जीता-जागता उदाहरण हैं, राजस्थान के अलवर जिले में रहने वाली ऊषा चोमर। मात्र 10 साल की उम्र में शादी होने के बाद जब वो अपने ससुराल पहुँचीं तो उन्हें सिर पर मैला ढोने के काम में लगा दिया गया। समाज में हर कोई उन्हें तिरस्कृत नज़रों से देखता था और उस काम से बचने का कोई रास्ता भी नहीं था। तब ऊषा की मुलाकात सुलभ इंटरनेशनल के डॉ बिन्देश्वर पाठक से हुई, जिनसे प्रेरणा लेकर उन्होंने अपने जैसी मैला ढोने वाली महिलाओं को एकत्र किया और जूट और पापड़ बनाने जैसे कामों की शुरुआत की।

धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता बढ़ी और ऊषा मैला ढोने के उस काम से बाहर निकल आईं। यह उनकी कोशिशों का ही परिणाम है कि आज अलवर में कोई मैला ढोने वाली महिला नहीं रह गई है। आज उनके बच्चे स्कूल और कॉलेज में पढ़ रहे हैं, समाज में उनका मान सम्मान है। उषा अब ‘सुलभ इन्टरनेशनल’ की प्रेसिडेन्ट भी बन गई हैं।

माइक्रोक्रेडिट बैंकिंग सिस्टम की जनक- चिन्ना अम्मा

चिन्ना पिल्लई मदुरै के पास के एक छोटे से गाँव से हैं। लेकिन छोटी जगह इनकी बड़ी सोच और बड़ी सफलता में बाधा नहीं बन पाई। चिन्ना ने अपने गाँव की गरीबी से जूझने के लिए और ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए आसपास के गाँवों की महिलाओं के साथ मिलकर खुद का एक माइक्रोक्रेडिट बैंकिंग सिस्टम शुरू किया, जिसके ज़रिए ज़रूरतमन्दों को बेहद कम दर पर कर्ज़ दिया जाता है।

चिन्ना अम्मा: मदुरै के एक छोटे से गाँव से रचा इतिहास

उनकी इस छोटी से कोशिश ने बहुत सी महिलाओं को गरीबी से बाहर निकालकर आत्मनिर्भर बनने में भी मदद की। इन्हें 1999 में स्त्री शक्ति पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। उस समय के प्रधानमन्त्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने चिन्ना अम्मा को पुरस्कार देते समय उनके पैर भी छुए थे। इन्हें इनके काम के लिए 1999 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।

यह भारत की वो गौरवशाली नारियाँ हैं जिन्होंने हर बंधन, हर रोक, हर परम्परा को तोड़कर अपने लिए रास्ता साफ किया है। जो फेमिनिज़्म की सही पहचान हैं, जिन्हें ना तो पितृसत्तात्मक सोच रोक पाई और ना ही इन पर थोपी गई वर्ण व्यवस्था। विश्व के लिए भले ही महिला दिवस का समापन आज रात 12 बजे हो जाएगा, लेकिन मुस्कुराइए कि आप भारतवर्ष में हैं, जहाँ पर महिलाशक्ति का अभिनन्दन और सफलताएँ अनवरत चलने वाली सतत् प्रक्रिया है। हैप्पी वीमेन्स डे…

(लेखिका: चित्रलेखा अग्रवाल)

रबींद्र नाथ टैगोर के गीत पर अश्लील पैरोडी: पुरुष लिंग, संभोग जैसे शब्दों वाला विडियो वायरल

कोलकाता के रबींद्र भारती विश्वविद्यालय की तरह मालदा की चार छात्राओं ने रबींद्र नाथ ठाकुर के गीत को विकृत करके अश्लील विडियो बनाया। यह मामला मालदा के बारलो ग‌र्ल्स हाई स्कूल की है। विडियो स्कूल परिसर में बनाया गया है, जिसमें स्कूल ड्रेस में छात्राओं को अश्लील गीत गाते देखा जा सकता है। देखते ही देखते यह विडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। आरोपित छात्राएँ 11वीं क्लास की हैं।

इस संबंध में आरोपित चारों छात्राओं के अभिभावकों को स्कूल बुलाकर उनके सामने ही छात्राओं से माफीनामा लिखाया गया। माफीनामा देने के बाद ही इन छात्राओं को 11वीं की परीक्षा में बैठने की अनुमति दी गई। हालाँकि स्कूल की प्रधानाध्यापिका की तरफ से कहा गया है कि इन छात्राओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने पर स्कूल प्रबंधन समिति विचार करेगी।

रबींद्र नाथ टैगोर की मूल रचना का हिंदी अनुवाद कुछ इस प्रकार है: “जब मैं अपने ज्ञात मार्ग पर टहल रहा था, रात के आकाश में चंद्रमा निकल रहा था… तभी हम उस पल की दिव्यता के बारे में जाने बिना मिले थे।” इसका अंग्रेजी अनुवाद यह है – “While I was strolling on my known path, the Moon had risen to the night sky… That was when we met without knowing about the divinity of the moment.”

हालाँकि, टैगोर के गीत की अश्लील पैरोडी, जो छात्राओं ने विडियो में गाया है, उसका हिंदी अनुवाद कुछ इस प्रकार है: “रात में आकाश के नीचे जहाँ हम चल रहे थे, किसी एक जगह पर पुरुष लिंग के द्वारा हमारे साथ संभोग किया गया। जब यह सब हो रहा था, पड़ोस के एक चाचा ने हमारे संभोग क्रिया को देखा। बहन#द! हमने एक जगह पर पुरुष लिंग के साथ संभोग किया।” जबकि अंग्रेजी अनुवाद कुछ यूँ है : “On our way under the night sky, we were fuced by a dik at one place. All this while, an uncle from the neighbourhood watched us fuk. Sister fucer! We fuced a di*k at one place. (3) ”

प्रधानाध्यापिका दीपश्री मजूमदार ने बताया कि छात्राओं ने अपनी की गई गलती को लेकर माफी माँगी है। उन्होंने कहा, “हमसे भूल हो गई। हम नहीं सोचे थे कि बात इतनी बढ़ जाएगी। हमें माफ कर दीजिए।” बाद में छात्राओं से लिखित माफीनामा लेकर प्रधानाधयापिका ने परीक्षा में बैठने की अनुमति दी।

दीपश्री मजूमदार ने कहा कि चारों छात्राओं व उनके अभिभावकों के साथ बंद कमरे में बैठक की गई। बैठक में कई शिक्षक भी मौजूद थे। छात्राओं ने वचन दिया कि भविष्य में इस तरह का अपराध दोबारा नहीं करेंगी। प्रधानाध्यापिका ने कहा कि छात्राओं ने जिस भाषा का इस्तेमाल किया है, उसे कोई सभ्य व्यक्ति मुँह से भी नहीं निकाल सकता है। शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने भी इस घटना की निंदा की है।

गौरतलब है कि इससे पहले होली उत्सव के दौरान रबींद्र भारती विश्वविद्यालय की छात्राओं ने अपनी पीठ पर रबींद्र नाथ ठाकुर के गीत को विकृत कर लिखा था। इसमें बेहद अश्लील शब्द लिखे गए थे। रबींद्र नाथ से जुड़े इस ऐतिहासिक विश्वविद्यालय में अश्लीलता करने को लेकर सवाल खड़े हुए थे और प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की माँग की गई थी। लोगों का कहना था कि रबींद्र नाथ टैगोर द्वारा लिखे गए गीत आज पूरी दुनिया में मशहूर हैं। उनसे जुड़े संस्थान में इस तरह के अश्लील गीत बजाने और अश्लील नृत्य ने बंगाल को अपमानित किया है।

महीनों से हिंदुओं पर हमले की योजना बना रही मुस्लिम भीड़ आख़िर पीड़ित कैसे? – 10 कहानियों से साफ होती तस्वीर

जिसने बड़ी मात्रा में ईंट-पत्थर घरों, मस्जिदों और ऊँचे मकानों की छतों पर सजा कर रख दिए हों, जिसने पेट्रोल खरीदकर, काँच की बोतलें इकट्ठा कर पेट्रोल बम बनाकर तैयार कर लिए हों, जिसने तेजाब खरीदकर बोतलों में जमा कर लिया हो, जिसने अपनी रक्षा के लिए हथियारों को सहेजकर रख लिया हो, जिसने अपने कीमती सामानों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दिया हो, जिसने हिंदुओं की संपत्ती को अपने निशाने पर ले लिया हो, जिसने हमले को अंजाम देने के लिए ऊँची इमारतों का चयन कर लिया हो, जिसने हिंदुओं के घरों को निशाना बनाने के लिए बड़ी गुलेल तैयार कर ली हो, जिसने स्कूलों से अपने बच्चों को पहले ही सुरक्षित निकाल लिया हो और जिसने कानों-कान अपने लोगों को हमला करने का संदेश दे दिया हो… आख़िर वही समुदाय दिल्ली दंगों का पीड़ित कैसे हो सकता है? इतने सारे ‘जिसने’ वाले सवाल उठना लाज़मी है, क्योंकि जिस समुदाय ने हिदुओं के खिलाफ़ महीनों तक साजिश रची और तैयारी की हो वही समुदाय आज अपने को पीड़त साबित करने पर तुला हुआ है।

खुद को पीड़ित दिखाने की कला भी देखिए साहब! संतरों को सड़क पर फैला दिया जाता है, रेहड़ी में खुद ही आग लगा दी जाती है। किराए की दुकान से अपने कीमती सामान को निकालकर उसे आग के हवाले कर दिया जाता है। बीमा कंपनी का लाभ लेने के लिए शोरूम से बाईकों को पहले ही निकालकर उसमें खुद ही तोड़फोड़ की जाती है, और पीड़ित दिखाने के लिए शोरूम से एक काउंटर बाहर निकालकर उसमें आग लगा दी जाती है। हद तो तब हो गई कि जब अपनी ही भीड़ की चपेट में आने से जिस भाईजान की जान चली गई, उसकी लाश को 24 घंटे घर के अंदर रखा जाता है और फ़िर जैसै ही केजरीवालल सरकार मृतकों के लिए मुआवजे का ऐलान करती है, वैसे ही उस लाश को निकाकर पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया जाता है।

आश्चर्य इस बात का कि जो दिल्ली दंगों में दंगाइयों का चेहरा बना, वही मुस्लिम समुदाय सबसे पहले मीडिया के सामने आकर झूठ के आँसू दिखाते हुए अपने को पीड़ित प्रदर्शित करता है। इसमें ग़ौर करने वाली बात ये है कि सीएए विरोध के नाम पर की गई हिंदू विरोधी हिंसा में छोटे से लेकर बड़े तक, जवान से लेकर बूढ़े तक और महिलाओं से लेकर बच्चों तक हर कोई शामिल था। इसे देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह लड़ाई एक दिन या सीएए विरोध की नहीं बल्कि गजवा-ए-हिंद के सपने को साकार करने की है।

खैर, अब आपको याद दिलाते हैं, दिल्ली हिंसा में असली पीड़ितों का दर्द और सच्ची कहानी, जो किसी न किसी रूप में मुस्लिमों की साजिश का तो शिकार हुए ही, साथ ही हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई के मीडिया रचित शोर में अपने माल के साथ अपनी जान से भी हाथ धो बैठे।

1. बलिदानी रतनलाल अपने घर से अपने परिवार की नहीं बल्कि उस समाज की रक्षा करने के लिए निकलते हैं, जो इस देश के वासी हैं, लेकिन दुखद उसी समुदाय का वह शिकार हो गए और गाँव में होली से पहले तिरंगे में लिपटकर पहुँचते हैं।

2. आईबी कॉन्स्टेबल अंकित शर्मा जिन्हें दंगाई घर लौटते समय ताहिर हुसैन के घर में खींच लेते हैं और 400 बार चाकुओं से प्रहार कर उन्हें मौत की नींद सुला दिया जाता है। इसके बाद उनकी लाश को मस्जिद से नाले में फेंक दिया जाता है।

3. राहुल ठाकुर जो अपने घर से बाहर निकल कर बस यह देखने के लिए जाते हैं कि आख़िर ये हंगामा किस बात का हो रहा है और इसी बीच दंगाई उन्हें पेट में गोली मार देते हैं। यह सब तीन मिनट के अंदर होता है। इसके बाद घर की चौखट पर बैठी बेटे का इंतजार कर रही माँ को राहुल नहीं बल्कि उनकी लाश मिलती है।

4. आलोक तिवारी जो घर से खाना खाकर टहलने के लिए बाहर की ओर निकलते हैं और दंगाई भीड़ का शिकार हो जाते हैं। दो छोटे-छोटे बच्चों के साथ इंतजार कर रही पत्नी को पति आलोक तिवारी नहीं बल्कि उनकी लाश मिलती है और इसी के साथ उसके जीवन में अँधेरा सा छा जाता है।

5. इंजीनियर राहुल सोलंकी जो घर से आ रही आवाजों को सुनकर निकलते हैं, लेकिन दोबारा अपने घर वापस नहीं लौट पाते… क्योंकि दंगाई उनकी गर्दन में गोली मारकर हत्या कर देते हैं।

6. दिलबर नेगी जो उत्तराखंड से जीवन यापन करने के लिए दिल्ली आकर एक दुकान में नौकरी करते हैं, लेकिन अफसोस दंगाइयों की भीड़ उनके हाथ-पैर काटकर उन्हें आग के हवाले कर देती है। परिवार को शव उस हालत में मिलता है, जिसका अंतिम संस्कार भी न किया जा सके। दिलबर सेना में जाकर देश की सेवा करना चाहते थे, उनका यह सपना अधूरा रह गया।

7- विवेक उर्फ विक्की दुकान के अंदर बैठे विवेक के सिर में दंगाई ड्रिल घुसा देते हैं। इस घटना के बाद से पाँच बहनों के बीच इकलौते भाई विवेक आज भी अस्पताल में जिंदगी और मौत से जंग लड़ रहे हैं।

8. श्याम चाय वाले दुकान पर बैठे ग्राहकों का इंतजार कर रहे थे, तभी दंगाइयों की भीड़ आती है, दुकान में लूटपाट करती है और उसे आग के हवाले कर देती है। आज भी श्याम अपने परिवार का पेट पालने के लिए दर-दर भीख माँगते फिर रहे हैं।

9- अनूप सिंह बाहर हो रहे शोर-शराबे को सुन घर से बाहर निकलते हैं। इसी बीच ताहिर हुसैन के छत से चली गोली सीधे अनूप सिंह की गर्दन में जाकर लगती है। आज भी इलाज जारी है।

10- अंकित पॉल हर दिन की तरह उस दिन भी दुकान पर बैठे थे। तभी दंगाइयों की भीड़ आती है और उन्हीं की आँखों के सामने पहले दुकान फिर गोदाम और ऑफिस में लूटपाट करती है। फिर सब कुछ आग के हवाले कर देती है। चंद घटों के अंदर अंकित की जीवन भर की कमाई ख़ाक हो जाती है।

यह उन पीड़ितों की कहानी है, जो दिल्ली दंगों की योजना और अपने ऊपर होने वाले हमलों से बिल्कुल अनजान थे। इसके बाद भी, जिन लोगों ने हिंदुओं पर हमला करने की महीनों पहले योजना बनाई और उसे अंजाम भी दिया, वही आज नकली आँसू बहाकर मीडिया के सामने खुद को दंगा पीड़ित बताते हुए घूम रहे हैं। आश्चर्य इस बात का है कि मुस्लिम दंगाइयों को मीडिया का एक बड़ा तबका पीड़ित बता भी रहे हैं और दिखा भी रहे हैं।

मोदी सरकार में खेलती-कूदती-पढ़ती बेटियाँ: वो 8 योजनाएँ, जो उनके सपनों को कर रहे साकार

भारत में महिलाओं की समस्याओं पर बड़ी-बड़ी बातें होती हैं। हर क्षेत्र में महिलाएँ परचम लहराए, यह बात भी लोग खूब करते हैं। खुद को महिला हितैषी बता लंबी-चौड़ी बातें करने वाली कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन महिलाओं से जुड़े छोटे-छोटे मुद्दों पर किसी ने विशेष ध्यान नहीं दिया। सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन की बात हो, स्वच्छ भारत के जरिए शौचालय मुहैया कराना हो या उज्ज्वला योजना के जरिए करोड़ों परिवार को गैस कनेक्शन देकर स्वास्थ्य की चिंता करना, मोदी सरकार ने महिला हितैषी ऐसे कई कदम उठाए हैं, जिनके दूरगामी परिणाम होंगे। बात अगर शिक्षा की करें तो देश की बेटियाँ पढ़ें, आगे बढ़ें, हर क्षेत्र में अपना परचम लहराए, इसके लिए केंद्र सरकार ने कई अहम् कदम उठाए हैं। सरकार के उठाए इन कदमों से बेटियों को पढ़ने के अधिक अवसर मिल रहे हैं।

बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ

देश की बेटियों को पढ़ने का भरपूर अवसर मिले और समाज उन्हें पढ़ने, आगे बढ़ने का मौका देने में सहयोगी बने, इसके लिए 22 जनवरी, 2015 को केंद्र सरकार ने बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ कार्यक्रम की शुरुआत की। महिला एवं बाल विकास, स्वास्थ्य एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय के इस साझा प्रयास से जहाँ देश भर में गर्ल चाइल्ड रेशियो में सुधार आया, वही बेटियों को पढ़ाने के लिए समाज के हर क्षेत्र में लोग सक्रिय व जागरूक हुए। इस योजना के तहत विशेष रुप से उन 100 जिलों को चुना गया है, जहाँ चाइल्ड सेक्स रेशियो में बच्चियों की संख्या कम थी। इस अभियान की सफलता इसी बात से आँका जा सकता है कि देश में पहली बार ऐसा हुआ है जब लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या बढ़ी है। लिंगानुपात में भी देश में काफी सुधार आया है। विशेषकर हरियाणा, जहाँ इस कार्यक्रम की शुरुआत हुई थी।

हर स्कूल में बालिका शौचालय

देश के नीति नियंताओं ने बेटियों के लिए बड़ी-बड़ी बातें कीं, लेकिन शौचालय जैसी बुनियादी व्यवस्था मुहैया कराने पर ध्यान नहीं दिया। सुप्रीम कोर्ट की फटकार और यूनिसेफ जैसी वैश्विक संस्थाओं की रिपोर्ट के बावजूद के लिए देश के स्कूलों में बेटियाँ बगैर शौचालय के पढ़ने जाती रहीं। बड़ी संख्या में होने वाली अनुपस्थिति और ड्रॉपआउट की वजह शौचालय थी, इसके बावजूद कोई ठोस पहल नहीं किए गए। प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2014 को लाल किले के अपने भाषण से न केवल इस समस्या पर बातें की बल्कि युद्धस्तर पर देश में शौचालय बनवाने के अभियान की शुरुआत भी की। नतीजा, महज एक वर्ष में 2,61,400 स्कूलों में 4,17,796 शौचालय का निर्माण किया गया। वर्ष 2017-18 तक के प्राप्त आँकड़ों के मुताबिक देश में 98.38 प्रतिशत स्कूलों में बालिका शौचालय हो गए हैं।

कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय का विस्तार

“बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” के सपने को साकार करने के लिए मोदी सरकार ने कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय (केजीबीवी) को कक्षा 6-8 की बजाए कक्षा 6-12 तक चलाने का निर्णय लिया है। विद्यालय को विस्तारित करने की इस पहल से गरीब, अनाथ, दिव्यांग बेटियों के लिए उच्च शिक्षा का द्वार खुला है। देश के सभी पिछड़े ब्लॉक में चलने वाली कस्तूरबा गाँधी विद्यालयों में वे बेटियाँ पढ़ती हैं, जो आर्थिक, भौगौलिक व सामाजिक वजहों से प्राथमिक कक्षाओं में ही ड्रॉप आउट हो जाती हैं। इन विद्यालयों में बच्चियों के पढ़ने, रहने की व्यवस्था सरकार करती है। अब तक यही होता रहा है कि स्कूल से दूर होने के बाद बेटियाँ स्कूल से ड्रॉप आउट होकर घर-परिवार के कामकाज में ही हाथ बँटाने का काम करती थीं। किसी तरह नामांकन हो गया, तब भी 8वीं के बाद उनके पास उच्च शिक्षा के अवसर बेहद सीमित होते थे। सरकार के इस कदम से वे फिर से ड्रॉप आउट होने की बजाए 12वीं तक की शिक्षा प्राप्त कर आगे की पढ़ाई का स्वप्न देख सकेंगी।

आकांक्षी जिला परिवर्तन कार्यक्रम

मोदी सरकार ने देश के उन 115 पिछड़े जिलों की पहचान की, जहाँ अन्य बातों के साथ शिक्षा की स्थिति संतोषजनक नहीं थी। केंद्र सरकार ने इन जिलों में आकांक्षी जिला परिवर्तन कार्यक्रम की शुरुआत जनवरी, 2018 में की। इन जिलों में 8 चिन्हित मानकों के आधार पर शिक्षा की स्थिति बेहतर करने का कार्य युद्धस्तर पर हो रहा है। शिक्षा के लिए चिन्हित मानकों में कक्षा- 3,5,8 के बच्चों में गणित और भाषा में सीखने का स्तर सुधारने, कक्षा 5वीं से 6ठी व कक्षा 8वीं से 9वीं में होने वाले नामांकन दर की स्थिति बेहतर करना, अकादमिक सत्र के शुरुआती एक महीने में ही समय पर पाठ्य-पुस्तकों की पहुँच सुनिश्चित करना, शिक्षक-विद्यार्थी का अनुपात सही करना, माध्यमिक विद्यालयों में बिजली कनेक्शन उपलब्ध करवाने के साथ-साथ विशेष रूप से महिला साक्षरता दर बढ़ाने और हर विद्यालय में बालिका शौचालय बनाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इस कार्यक्रम की निगरानी स्वयं प्रधानमंत्री कलेक्टरों के साथ होने वाले प्रगति बैठक में नियमित करते हैं। आकांक्षी जिला कार्यक्रम की वजह से देश के 115 जिलों में सरकारी शिक्षा तो बेहतर हो ही रही है, इससे सबसे अधिक लाभ बेटियों को हो रहा है।

सैनिक स्कूलों में अब ले सकेंगी बेटियाँ भी एडमिशन

देश की बेटियाँ सेना में अधिकारी बनने का सपना अब पूरा कर पाएँगी। केंद्र सरकार ने अब सैनिक स्कूल में लड़कों के साथ-साथ लड़कियों के भी पढ़ने की सुविधा दे दी है। रक्षा मंत्रालय ने इसके लिए देश के पाँच सैनिक स्कूलों को चुना है। इनमें चंद्रपुर (महाराष्ट्र), बीजापुर (कर्नाटक), कोडागु (कर्नाटक), कलिकिरी (आंध्र प्रदेश) और घोड़ाखाल (उत्तराखंड) स्थित सैनिक स्कूल शामिल हैं। इन स्कूलों में लड़कियाँ भी कक्षा 6 में नामांकन ले सकेंगी। 2020-21 सत्र से इन स्कूलों में नामांकन की प्रक्रिया शुरु हो गई है।

पढ़ने के साथ-साथ खेलने के अवसर

मोदी सरकार ने “पढ़ेगा भारत बढ़ेगा भारत” को सुनिश्चित करने के लिए लगभग 10 लाख से अधिक स्कूलों में पुस्कालयों को बेहतर बनाने का अभियान चलाया है। पुस्तकालय की स्थिति में सुधार लाने के लिए केंद्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2018-19 में सरकारी स्कूलों को 5,000 रुपए से लेकर 20,000 रुपए तक का पुस्तकालय-अनुदान दिया है। पुस्तकालय के साथ साथ खेल-कूद में बच्चे आगे बढ़ें, इसके लिए “खेलेगा भारत, खिलेगा भारत” पर मोदी सरकार कार्य कर रही है। स्कूली बच्चों के बीच खेल को प्रोत्साहित करने हेतु प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय को 5000 रुपए, उच्च प्राथमिक को 10,000 रुपए एवं माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक स्कूलों के लिए 25,000 रुपए खेलकूद के उपकरण खरीदने के लिए मुहैया कराए गए हैं।

खेलकूद को बढ़ावा देने के लिए खेलो इंडिया कार्यक्रम के तहत “खेलो इंडिया स्कूल गेम्स” के आयोजन की शुरुआत 2018 से हुई। स्कूल गेम्स की वजह से बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली बच्चों को अवसर मिल रहे हैं। अभी 22 फरवरी, 2020 को अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने बताया कि खेलो इंडिया स्कूल गेम्स में 80 रिकॉर्ड टूटे हैं, जिनमें 56 रिकॉर्ड बेटियों ने तोड़े। खेलो इंडिया स्कूल गेम्स ने गाँव, गरीब और अभावग्रस्त इलाकों के बेटियों को खेलकूद में देश का मान बढ़ाने और खुद के लिए बड़े सपने देखने का अवसर दिया है। स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया ने खेलकूद को बढ़ावा देने के लिए खेलो इंडिया गर्ल्स लीग की भी शुरुआत की है, जिसके तहत अंडर-13 व अंडर-15 आयु समूह के बेटियों को और अधिक अवसर दिए जाएँगे। बात चाहे पुस्तकालय की हो या फिर खेल-कूद की, सबमें बेटियों को खूब मौके मिल रहे हैं पढ़ने और खेल-कूद में आगे बढ़ने के लिए।

सुकन्या समृद्धि योजना

शादी पर होने वाले खर्च की चिंता करने के बजाए माँ-बाप बेटियों की शिक्षा पर ध्यान दें, इस दिशा में केंद्र सरकार ने दो अभिनव पहल की है। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के तहत केंद्र सरकार ने 2015 में बेटियों के हित में छोटी बचत को बढ़ावा देने के लिए सुकन्या समृद्धि योजना की शुरुआत की। इस योजना के तहत सरकार 8.5 प्रतिशत ब्याज (वर्तमान समय में) इनकम टैक्स की छूट की सुविधा के साथ देती है। इस योजना में जन्म लेने के 10 साल से पहले की उम्र में कम से कम 250 रुपए के जमा के साथ पोस्ट ऑफिस में खाता खोला जा सकता है, जिसे बाद में एक हजार के गुणक में डेढ़ लाख की राशि जमा करवाई जा सकती है। बेटी की आयु 18 साल होने पर जमा की गई राशि में से उच्च शिक्षा के लिए 50 फीसदी तक की निकासी की जा सकती है। ये योजना न केवल बेटी को पढ़ाने के लिए प्रेरित करने का काम कर रही है बल्कि बेटियों को पढ़ने के लिए समाज में एक बेहतर माहौल भी बना रही है।

सेल्फ अटेस्टेड करने का अधिकार

देश के युवाओं को विभिन्न तरह की नौकरियों के आवेदन करने के लिए अपने अंक-पत्र सहित अन्य दस्तावेज पर अधिकारियों से हस्ताक्षर करवाने के लिए भाग-दौड़ करना पड़ता था। मोदी सरकार ने इस समस्या को समझा और इस समस्या से निजात दिलाने के लिए खुद से ही प्रमाणित अर्थात सेल्फ अटेस्टेड करने का हक दिया। इसका सबसे अधिक लाभ ग्रामीण और वनवासी क्षेत्रों में रहने वाली बेटियों को हुआ, जिन्हें अब सरकारी फॉर्म भरने में दिक्कतों का सामना नही करना पड़ता। यह छोटा सा लेकिन महत्वपूर्ण प्रयास न केवल युवाओं में सरकार के भरोसे की अभिव्यक्ति थी बल्कि इस वजह से होने वाली परेशानियों से निजात दिलाने वाला भी था।

यूपी के 257 मस्जिद-मदरसे रडार पर: टेरर फंडिंग का शक, नए अमीरों की निगरानी का भी आदेश

नेपाल की सीमा से सटे उत्तर प्रदेश के जिलों में बड़े स्तर पर टेरर फंडिंग की सूचना के बाद योगी सरकार ने जाँच के आदेश दिए हैं। दरअसल सीमा से सटे 257 मस्जिद-मदरसों में टेरर फंडिंग का शक जताया गया है। इसके बाद इन मस्जिद-मदरसों पर खुफिया विभाग की नजर है। मामले में उत्तर प्रदेश शासन की रिपोर्ट के बाद गोरखपुर के एडीजी जोन दावा शेरपा ने निगरानी के आदेश दिए हैं। अब संदिग्ध स्थानों की सूची बनाकर पुलिस नजर रख रही है।

पुलिस को एक-एक मस्जिद, मदरसे की निगरानी करने को कहा गया है। कुछ भी संदिग्ध मिलने पर एडीजी को तत्काल सूचना भेजने का आदेश दिया गया है। बता दें कि उत्तर प्रदेश के कुशीनगर, महराजगंज, बहराइच, बलरामपुर और श्रावस्ती जिलों की सीमा नेपाल से सटी है। यहाँ पर अचानक से बड़ी संख्या में मस्जिद, मदरसे सामने आए हैं, जिसके बाद हड़कंप मचा हुआ है।

दरअसल दिसंबर के महीने में यूपी के अलग-अलग जिलों में सीएए और एनआरसी के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन में पीएफआई का नाम सामने आने के बाद यूपी पुलिस इस कट्टरपंथी संगठन से जुड़े लोगों की लिस्ट तैयार कर रही थी। उस दौरान भी नेपाल सीमा से सटे बहराइच का नाम प्रमुखता से सामने आया था। यह बात भी सामने आई थी कि अपने नेटवर्क के प्रचार-प्रसार के लिए पीएफआई धार्मिक स्थलों का इस्तेमाल कर रहा है।

हाल ही में नई दिल्ली में हुई हिंसा के बाद खुफिया एजेंसी ने भी उत्तर प्रदेश सरकार को एक खुफिया इनपुट दिया है। इसके मुताबिक नेपाल सीमा से सटे हुए यूपी के जिलों के 257 मस्जिद, मदरसों पर नजर रखने को कहा गया है। यहाँ टेरर फंडिंग की आशंका जताई गई है। इस इनपुट के बाद गोरखपुर जोन के कई जिलों में पुलिस और खुफिया विभाग ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है।

बताया जा रहा है कि कुशीनगर, बहराइच, महाराजगंज ,सिद्धार्थनगर, बलरामपुर और श्रावस्ती में मस्जिद और मदरसों की इंतजामिया कमेटी से जुड़े हुए लोग और इन धार्मिक स्थलों की फंडिंग से जुड़ी हुई डिटेल खुफिया तौर पर जुटाई जा रही है। इन इलाकों में संदिग्ध और नए अमीरों पर भी नजर रखने को कहा गया है। यह पता करने के लिए कहा गया है कि आखिर इनके पास पैसा कहाँ से आ रहा है? इसके बाद खुफिया एजेंसियाँ अपने हिसाब से पड़ताल में जुटी हैं। पुलिस मस्जिद, मदरसों में आने वाले फंड व लोगों की कुंडली तैयार कर रही है।

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#SheInspiresUs: 7 महिलाओं के हवाले पीएम मोदी ने किया अपना सोशल मीडिया अकाउंट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार सुबह देश को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की बधाई देने के बाद अपने सोशल मीडिया अकाउंट को दिनभर के लिए सात महिलाओं को सुपुर्द कर दिया। उन्होंने ट्वीट किया, “अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की बधाई। नारी शक्ति की भावना और उपलब्धियों को सलाम करते हैं। जैसा कि मैंने कुछ दिन पहले कहा था, मैं आज के लिए विदा लेता हूँ। आज दिनभर सात महिलाएँ अपनी जीवन यात्रा साझा करेंगी और संभवत: मेरे सोशल मीडिया अकाउंट के माध्यम से बातचीत करेंगी।”

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर दिनभर के लिए पीएम मोदी के सोशल मीडिया अकाउंट से विदा लेने के बाद उनके अकाउंट से सबसे पहला ट्वीट स्नेहा मोहनदास का आया। उन्होंने लिखा- मैं स्नेहा मोहनदास हूँ। अपनी माँ से प्रेरित होकर, जिन्होंने बेघरों को खाना खिलाने की आदत डाली, मैंने फूडबैंक इंडिया नाम से पहल शुरू की है।

प्रधानमंत्री के आकउंट के जरिए दूसरा ट्वीट करते हुए उन्होंने लिखा- मैं सशक्त महसूस करती हूँ। मैं अपने साथी नागरिकों, खासकर महिलाओं को आगे आने और मेरे साथ हाथ मिलाने के लिए प्रेरित करना चाहती हूँ। मैं सभी से आग्रह करती हूँ कि कम से कम एक जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराएँ।

इसके पहले आज सरकार के ट्विटर हैंडल MyGovIndia से ऐसी कई स्त्रियों की प्रेरणादायक कहानी शेयर की गई। आइए एक नजर डालते हैं ऐसी ही प्रेरणास्पद कहानियों पर जिनके बारे में जानकारी शेयर की गई है।

इन कहानियों में 90 वर्ष की भक्ति यादव की कहानी भी है जो डॉक्टर दीदी के नाम से मशहूर हैं। ये इंदौर की पहली महिला एमबीबीएस डिग्री होल्डर हैं जो पिछले 68 वर्षों से लोगों का निशुल्क इलाज कर रहीं हैं। उन्होंने अब तक हजारों सुरक्षित प्रसव करवाने में सहायता की है।

ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी आतंकवाद से जूझते कश्मीर की शकीना अख्तर की है जो घाटी की पहली क्वालिफाइड महिला कोच हैं। वे आजकल राज्य की अन्डर 19 महिला क्रिकेट टीम को कोचिंग दे रही हैं।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी ने 3 मार्च को ट्विटर, फेसबुक समेत सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म छोड़ने पर विचार करने की बात कही थी। इससे हर कोई अचंभित हो गया था। इस फैसले को लेकर कई तरह के कयास लगाए जाने लगे थे। हालॉंकि बाद में पीएम ने स्पष्ट करते हुए कहा था कि वह महिला दिवस पर अपने सोशल मीडिया अकाउंट उन महिलाओं को सौंपेंगे, जिनका जीवन एवं कार्य प्रेरणा देने वाला हो।

सोशल मीडिया पर पीएम मोदी की लोकप्रियता का अंदाजा उनके फेसबुक पेज और ट्विटर अकाउंट को फॉलो करने वालों की संख्या से लगाया जा सकता है। फेसबुक पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पेज पर जहाँ 44,723,734 लाइक्स हैं, वहीं उन्हें फॉलो करने वालों की संख्या 44, 598,804 है। ट्विटर पर पीएम मोदी दुनिया के तीसरे सबसे ज्यादा फॉलो किये जाने वाले शख्स हैं जिन्हें 53.3 मिलियन लोग फॉलो करते हैं। उनसे ज्यादा फॉलोवर केवल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और बराक ओबामा के पास हैं।