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‘तिलक-चंदन नहीं लगा पाएँगे पुलिसकर्मी’: बिहार DGP के बयान पर मचा बवाल, जानिए- ‘तिलक’ से जुड़े पुराने विवाद और क्या कहते हैं नियम

बिहार में पुलिस विभाग को लेकर राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) विनय कुमार के एक बयान के बाद सियासी हलचल बढ़ गई है। दरअसल, DGP विनय कुमार ने पूरे पुलिस महकमे को सख्त हिदायत देते हुए कहा है कि ड्यूटी के दौरान वर्दी में माथे पर तिलक, चंदन का टीका या किसी भी तरह के धार्मिक चिह्न लगाने की अनुमति नहीं होगी। उन्होंने इसे पुलिस मैनुअल के खिलाफ बताया है और उल्लंघन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी है।

क्या है DGP का पूरा आदेश?

डीजीपी विनय कुमार ने स्पष्ट किया कि पुलिसकर्मियों को ड्यूटी के दौरान निर्धारित ड्रेस कोड का सख्ती से पालन करना होगा। उन्होंने कहा कि पुलिस की वर्दी में टोपी और बेल्ट पहनना अनिवार्य है बिना इनके ड्यूटी करने वाले पुलिसकर्मियों पर विभागीय कार्रवाई होगी।

इसके साथ ही आदेश में साफ कहा गया कि ड्यूटी के दौरान किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत या धार्मिक पहचान दिखाना अनुशासनहीनता की श्रेणी में आएगा। महिला पुलिसकर्मियों के लिए भी ड्यूटी के दौरान अत्यधिक श्रृंगार पर रोक लगाई गई है। इन निर्देशों का मकसद पुलिस बल में एकरूपता और पेशेवर छवि बनाए रखना बताया गया है।

DGP का एक वीडियो भी सामने आया है जिसमें वह तिलक ना लगाने की बात करते दिख रहे हैं। DGP ने कहा, “वर्दी पहनकर आप टीका चंदन नहीं लगा सकते हैं। यदि आप लगा रहे हैं तो एक सेकेंड के लिए लगाकर उसको हटा दीजिए। वर्दी अगर आपने पहनी है तो आप दसों उँगलियों में अंगूठी नहीं पहन सकते हैं।”

उन्होंने कहा, “वर्दी के साथ किसी भी प्रकार का अलंकरण वर्जित है।” वो बताते हैं कि महिलाओं के लिए जो आदेश निकाला गया था उसमें वर्दी के साथ महिलाओं के आभूषण पहनने पर भी रोक लगाई गई थी।

DGP के बयान पर भड़के हिंदू संगठन

डीजीपी विनय कुमार के इस बयान पर हिंदू संगठन और कई अन्य लोग भड़क गए हैं। विश्वामित्र सेना ने इस आदेश पर कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ बताया। संगठन के राष्ट्रीय संयोजक राजकुमार चौबे ने कहा कि चंदन-तिलक सनातन परंपरा और आस्था का प्रतीक है और इसे वर्दी के साथ जोड़कर प्रतिबंधित करना अनुचित और भेदभावपूर्ण कदम है।

उन्होंने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है जहां हर नागरिक को अपनी धार्मिक पहचान और आस्था व्यक्त करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। ऐसे में किसी विशेष धार्मिक प्रतीक पर रोक लगाने का प्रयास संविधान की भावना के विपरीत है। विश्वामित्र सेना ने बिहार सरकार से माँग की है कि इस मामले में तत्काल स्थिति स्पष्ट की जाए। संगठन ने चेतावनी दी कि यदि इन निर्देशों को वापस नहीं लिया गया तो व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन किया जाएगा।

इस मामले पर सत्तारूढ़ बीजेपी के नेता भी DGP के बयान पर नाराजगी जता रहे हैं। पूर्व विधायक और भाजपा नेता हरिभूषण ठाकुर ‘बचौल’ ने DGP के इस बयान पर कड़ा विरोध जताते हुए इसे तुष्टिकरण की पराकाष्ठा बताया है। उन्होंने कहा, “DGP ने कहा है कि कोई भी चंदन लगाकर पुलिस की ड्यूटी पर नहीं आएगा। तो फिर कोई भी बुर्का पहनकर, मूँछ छिलाकर या लंबी दाढ़ी रखकर भी पुलिस ड्यूटी में नहीं आना चाहिए। यही लोकतंत्र का असली तकाजा है।”

इसके अलावा सोशल मीडिया पर भी लोग इस बयान पर नाराजगी जता रहे हैं। एक यूजर ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, ‘क्या बिहार पुलिस की ईमानदारी तिलक से तय होती है? क्या भ्रष्टाचार चंदन लगाकर आता है? क्या अपराधी तिलक देखकर बच जाते हैं?” इसके अलावा भी अन्य यूजर्स ने तीखी सवाल उठाए हैं।

DGP-सरकारी कर्मियों के तिलक पर नया नहीं बिहार में विवाद

यह पहली बार नहीं है जब बिहार में सरकारी वर्दी या दफ्तर में तिलक को लेकर बवाल मचा हो। 2007 में बिहार के कृषि विभाग के उप-निदेशक लक्ष्मण मिश्रा को कार्यालय में माथे पर तिलक लगाने के कारण निलंबन की सिफारिश का सामना करना पड़ा था। उन्होंने कहा था कि वे 30 साल से तिलक लगाते आए हैं और यह उनका धार्मिक अधिकार है। उस समय पूरे कृषि विभाग के कर्मचारी अगले दिन तिलक लगाकर दफ्तर पहुँचे थे और तत्कालीन कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह ने भी कहा था कि किसी को तिलक लगाने के कारण निलंबित नहीं किया जाना चाहिए।

दिलचस्प बात यह है कि 2009 में यही विवाद उलटा भी हो चुका है यानी तिलक लगाने वाला खुद DGP था। तब बिहार के पुलिस महानिदेशक आनंद शंकर ड्यूटी के दौरान माथे पर चंदन का तिलक लगाकर दफ्तर आते थे और इसी को लेकर बिहार पुलिसमेन एसोसिएशन ने उन पर निशाना साधा था। एसोसिएशन अध्यक्ष जितेंद्र नारायण सिंह ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि DGP का यह आचरण पुलिस मैनुअल की धारा 1061 का उल्लंघन है जो किसी भी पुलिस अधिकारी को ड्यूटी के दौरान तिलक या टीका लगाने से मना करती है।

यानी बिहार में तिलक का यह विवाद न नया है, न एकतरफा। कभी एक कर्मचारी को तिलक लगाने पर निलंबन की धमकी मिली, कभी खुद DGP पर तिलक लगाने के लिए सवाल उठे और अब एक बार फिर DGP ने ही तिलक पर रोक का फरमान जारी किया है। पुलिस मैनुअल की धारा 1061 हर बार बीच में आती है लेकिन उसे लागू करना हमेशा राजनीतिक और सामाजिक संवेदनशीलता से टकराता रहा है।

2025 में मंगलसूत्र पर भी लगाई गई थी रोक

बिहार पुलिस मुख्यालय के ADG (विधि-व्यवस्था) पंकज दारद ने जुलाई 2025 में एक सर्कुलर जारी कर महिला पुलिसकर्मियों को ड्यूटी के दौरान झुमका, नथिया, चूड़ियां, कंगन, मंगलसूत्र और अन्य भारी गहने पहनने से पूरी तरह मना किया था। इसके साथ ही चटख रंग का लिप बाम और अत्यधिक मेकअप पर भी रोक लगाई गई थी। यह आदेश सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर स्तर तक की सभी महिला पुलिसकर्मियों पर लागू था।

यह आदेश DGP विनय कुमार की 23 जून 2025 को हुई समीक्षा बैठक के बाद आया था जिसमें उन्होंने पुलिस बल के अनुशासन पर चिंता जताई थी। इसके बाद 27 जून को कार्मिक एवं कल्याण प्रभाग ने आधिकारिक ज्ञापन जारी किया और सभी रेंज आईजी, एसएसपी तथा जिलों के एसपी को इसका सख्ती से पालन कराने की जिम्मेदारी दी गई। नियम तोड़ने पर विभागीय कार्रवाई का प्रावधान रखा गया।

क्या कहते हैं नियम?

बिहार में तैनात एक वरिष्ठ IPS अधिकारी ने ऑपइंडिया से बातचीत में बताया कि DGP का यह आदेश कोई नया फरमान नहीं है बल्कि यह बिहार पुलिस के 1978 के मैनुअल पर आधारित है। इस मैनुअल में ड्यूटी के दौरान पुलिसकर्मियों के आचरण, वर्दी और धार्मिक चिह्नों को लेकर विस्तृत नियम पहले से दर्ज हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि पुलिस की ट्रेनिंग के दौरान ही कर्मियों को इन नियमों की जानकारी दे दी जाती है और यह कोई अचानक थोपा गया नियम नहीं है।

मैनुअल के अनुसार ड्यूटी पर तैनात किसी भी पुलिसकर्मी को किसी भी धर्म के चिह्न, प्रतीक या पहनावे को प्रदर्शित करने की अनुमति नहीं है। इसमें हिंदू धर्म का तिलक या चंदन टीका, मुस्लिम धर्म की दाढ़ी सभी पर समान रूप से रोक लागू होती है। नियम का मूल उद्देश्य यही है कि वर्दी में खड़ा पुलिसकर्मी किसी एक धर्म या समुदाय का प्रतिनिधि नहीं बल्कि राज्य का प्रतिनिधि दिखे। हालाँकि, इस नियम में सिख धर्म को एक विशेष छूट दी गई है।

वो बताते हैं कि बाकी धर्मों में भी पूर्ण प्रतिबंध नहीं है लेकिन उसके लिए पहले अनुमति लेना अनिवार्य है। मसलन, नवरात्रि या किसी हिंदू पर्व पर तिलक लगाना हो या किसी मुस्लिम पुलिसकर्मी को रमजान या किसी खास मजहबी जरूरत के चलते दाढ़ी रखनी हो तो उसके लिए पहले वरिष्ठ अधिकारी से लिखित अनुमति लेनी होती है। बिना अनुमति के यह नियम का उल्लंघन माना जाता है।

दिग्गज फोटोग्राफर रघु राय का निधन, गधे की तस्वीर से शुरू हुए उनके सफर ने भारत की फोटो पत्रकारिता को दी वैश्विक पहचान: देखें उनके द्वारा ली गईं कुछ फेमस तस्वीरें

भारत में फोटो जर्नलिज्म को एक नई पहचान देने वाले महान फोटोग्राफर और फोटो पत्रकारिता के ‘जनक’ रघु राय का रविवार (26 अप्रैल 2026) को 83 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। लंबे समय से कैंसर से जूझ रहे राय ने नई दिल्ली के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली।

उनके बेटे नितिन राय के मुताबिक, पिछले करीब दो वर्षों से वे कैंसर से पीड़ित थे, जो बाद में दिमाग तक फैल गया था और उम्र से जुड़ी अन्य जटिलताओं ने उनकी हालत को और गंभीर बना दिया था। उनके निधन की खबर सामने आते ही कला, मीडिया और फोटोग्राफी जगत में शोक की लहर दौड़ गई।

परिवार ने उनके आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट के जरिए इस दुखद समाचार की पुष्टि की। उनका अंतिम संस्कार दिल्ली के लोधी रोड श्मशान घाट में शाम 4 बजे किया जाएगा। उनकी पत्नी गुरमीत राय एक जानी-मानी लेखिका, शिक्षाविद और हेरिटेज कंजर्वेशनिस्ट हैं।

रघु राय का जाना सिर्फ एक व्यक्ति का निधन नहीं बल्कि उस नजरिए का अंत है जिसने भारत को दुनिया के सामने देखने और समझने का एक अलग तरीका दिया।

जन्म, शुरुआती जीवन और एक ‘संयोग’ से शुरू हुई यात्रा

1942 में अविभाजित भारत के झंग (अब पाकिस्तान) में जन्मे रघु राय का असली नाम रघुनाथ राय चौधरी था। उनका शुरुआती जीवन किसी भी आम भारतीय की तरह बीता और उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। उस समय तक फोटोग्राफी उनके जीवन का हिस्सा नहीं थी।

1960 के दशक में जब वे दिल्ली अपने बड़े भाई और प्रसिद्ध फोटोग्राफर एस पॉल से मिलने आए, तभी उनकी जिंदगी ने अप्रत्याशित मोड़ लिया। रघु राय की फोटोग्राफी की शुरुआत भी एक बेहद दिलचस्प और लगभग खेल-खेल में हुई घटना से जुड़ी है। हरियाणा के एक गाँव में उन्होंने पहली बार कैमरा उठाया और एक गधे के बच्चे की तस्वीर लेने की कोशिश की।

इस दौरान एक मजेदार स्थिति बन गई, जैसे ही वे तस्वीर लेने आगे बढ़ते, गधा भागने लगता और रघु राय उसके पीछे दौड़ पड़ते। यह नजारा देखकर आसपास खड़े बच्चे जोर-जोर से हंसने लगे। बच्चों की खुशी और उत्साह को देखकर उन्होंने भी इस पीछा करने वाले खेल को जारी रखा।

आखिरकार जब गधा थककर रुक गया, तब रघु राय को मौका मिला और उन्होंने बिल्कुल करीब से उसकी तस्वीर कैद कर ली। बाद में जब उन्होंने यह फोटो अपने भाई को दिखाई, तो वह इतने प्रभावित हुए कि इसे The Times, London भेज दिया। खास बात यह रही कि यह तस्वीर अखबार में उनके नाम से प्रकाशित भी हुई।

रघु राय द्वारा ली गई पहली तस्वीर (फोटो साभार: NDTV)

इस एक तस्वीर ने उनके भीतर छिपे कलाकार को पहचान दिलाई और यहीं से उन्होंने तय कर लिया कि फोटोग्राफी ही उनका भविष्य होगी। 1962 में उन्होंने The Statesman अखबार के साथ पेशेवर फोटोजर्नलिस्ट के रूप में काम शुरू किया। बाद में वे India Today से जुड़े और 1982 के बाद करीब एक दशक तक वहाँ फोटो एडिटर रहे।

फोटोग्राफी का नजरिया: सिर्फ तस्वीर नहीं, इतिहास का दस्तावेज

रघु राय का मानना था कि तस्वीर उस पल का दस्तावेज है, जिसे दोबारा नहीं लिखा जा सकता। यही सोच उनके पूरे काम में झलकती है। उनकी फोटोग्राफी केवल सौंदर्य तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसमें समाज, राजनीति, संस्कृति और मानवीय भावनाओं की गहराई दिखती थी।

1988 में धर्मशाला में महाभारत धारावाहिक देखते हुए दलाई लामा (फोटो साभार: Raghu Rai, PHOTOINK)

उन्होंने भारत के गाँवों, शहरों, गलियों, घाटों, त्योहारों, संघर्षों और आम लोगों के जीवन को बेहद करीब से देखा और उसे अपने कैमरे में उतारा। उनके लिए कैमरा सिर्फ एक उपकरण नहीं, बल्कि समाज की आत्मा को समझने और दिखाने का माध्यम था।

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी बहू सोनिया गांँधी और पोते-पोतियों प्रियंका और राहुल के साथ, दिल्ली, 1972(फोटो साभार: Raghu Rai, PHOTOINK)

आपातकाल के दौर में जब सेंसरशिप का दबाव था, तब भी उन्होंने प्रतीकों और संकेतों के जरिए सच्चाई को दुनिया तक पहुँचाने के तरीके खोजे, यह उनकी रचनात्मकता और साहस का प्रमाण है।

ऐतिहासिक घटनाओं का जीवंत दस्तावेज: जब तस्वीरें बन गईं सच की आवाज

रघु राय ने अपने करियर में भारत और दुनिया की बड़ी ऐतिहासिक घटनाओं को कवर किया। उनकी सबसे चर्चित और प्रभावशाली तस्वीरों में ‘भोपाल गैस त्रासदी’ की तस्वीरें शामिल हैं। एक मासूम बच्चे की आधी दबी हुई लाश की तस्वीर ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था। यह सिर्फ एक फोटो नहीं थी बल्कि कॉरपोरेट लापरवाही के खिलाफ एक वैश्विक प्रतीक बन गई।

रघु राय द्वारा ली गई यह तस्वीर भोपाल गैस कांड के दो दिन बाद की है। (फोटो साभार: Mint)

इसके अलावा उन्होंने ‘बांग्लादेश लिबरेशन वॉर’ (Bangladesh Liberation War) के दौरान शरणार्थियों की पीड़ा, ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले अमृतसर के हालात और भारत के सामाजिक-राजनीतिक बदलावों को अपने कैमरे में दर्ज किया। उनकी तस्वीरों में हमेशा एक कहानी होती थी, ऐसी कहानी, जो शब्दों से कहीं ज्यादा असरदार होती थी।

महान हस्तियों के साथ अनूठा रिश्ता और दुर्लभ तस्वीरें

रघु राय का कैमरा सिर्फ घटनाओं तक सीमित नहीं था, उन्होंने भारत और दुनिया की कई महान हस्तियों को भी बेहद करीब से कैद किया। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के साथ लंबे समय तक काम किया और उनके जीवन के कई निजी और सार्वजनिक क्षणों को तस्वीरों में उतारा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भी तस्वीरें ली थी। वहीं मदर टेरेसा के साथ उनका जुड़ाव बेहद खास रहा।

रघु राय द्वारा ली गई मदर टेरेसा की तस्वीर (फोटो साभार: नेशनल हेराल्ड)

अंतरराष्ट्रीय पहचान, Magnum Photos और वैश्विक मंच पर भारत की छवि

रघु राय को वैश्विक स्तर पर भी अभूतपूर्व पहचान मिली। महान फ्रांसीसी फोटोग्राफर Henri Cartier-Bresson ने खुद उन्हें प्रतिष्ठित संस्था Magnum Photos के लिए नामांकित किया। यह सम्मान बहुत कम फोटोग्राफरों को मिलता है और किसी भारतीय के लिए यह ऐतिहासिक उपलब्धि थी।

उन्होंने Time, Life, GEO, The New York Times, Newsweek, The Independent और The New Yorker जैसी दुनिया की प्रमुख पत्रिकाओं के लिए काम किया। उनकी तस्वीरें दुनिया के बड़े शहरों में प्रदर्शित हुईं और भारत की छवि को वैश्विक मंच पर एक नई पहचान मिली।

वे तीन बार World Press Photo के ज्यूरी सदस्य रहे और दो बार यूनेस्को की अंतरराष्ट्रीय फोटोग्राफी प्रतियोगिता में निर्णायक की भूमिका निभाई। यह उनके अनुभव और विश्वसनीयता का प्रमाण है।

सम्मान, पुरस्कार और रचनात्मक योगदान

रघु राय को उनके योगदान के लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले। 1972 में उन्हें Padma Shri से सम्मानित किया गया, जो उन्हें बांग्लादेश युद्ध के कवरेज के लिए मिला था। इसके अलावा उन्हें भारत सरकार का लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड और कई वैश्विक पुरस्कार भी प्राप्त हुए।

उन्होंने अपने जीवन में 18 से अधिक किताबें लिखीं, जिनमें Raghu Rai’s India, Delhi, Picturing Time, Tibet in Exile और Raghu Rai: People जैसी प्रमुख कृतियाँ शामिल हैं। भोपाल गैस त्रासदी पर उनके काम को ‘Exposure: A Corporate Crime’ नाम की किताब और डॉक्यूमेंट्री के रूप में भी प्रस्तुत किया गया, जिसने इस त्रासदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूती से सामने रखा।

फोटोग्राफी से परे: सोच, दर्शन और विरासत

रघु राय का मानना था कि एक अच्छा फोटोग्राफर वही है, जो सिर्फ देखता नहीं बल्कि महसूस भी करता है। उनके अनुसार, कैमरे की कीमत या तकनीक से ज्यादा जरूरी है नजर और संवेदनशीलता। वे कहते थे कि जिंदगी खुद एक किताब है, जो कभी खत्म नहीं होती और हर पल कुछ नया सिखाती है।

यही कारण था कि उनकी तस्वीरों में हमेशा जीवन की सच्चाई, संघर्ष और सुंदरता एक साथ नजर आती थी। उनका पूरा जीवन इस बात का उदाहरण है कि कैसे एक साधारण शुरुआत से कोई व्यक्ति अपनी दृष्टि और संवेदनशीलता के बल पर दुनिया को देखने का नजरिया बदल सकता है।

रघु राय के निधन के साथ भले ही एक युग समाप्त हो गया हो लेकिन उनकी तस्वीरें हमेशा जिंदा रहेंगी। उनके कैमरे में कैद भारत, उसकी आत्मा, उसकी पीड़ा और उसकी सुंदरता आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य धरोहर बनी रहेंगी।

ईरान के सपोर्ट में शिया आबादी पाकिस्तान में कल्तेआम न मचा दे, इसलिए डरे असीम मुनीर ने NYT की रिपोर्ट ही उड़ा दी: पढ़ें उस आर्टिकल में क्या लिखा था

पाकिस्तान में एक बार फिर मीडिया सेंसरशिप की बड़ी घटना सामने आई है। अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) की एक रिपोर्ट को पाकिस्तान के प्रिंट एडिशन में छपने से रोक दिया गया। यह रिपोर्ट पाकिस्तान के शिया समुदाय के बढ़ते गुस्से पर आधारित थी।

रिपोर्ट का शीर्षक था- ‘Pakistan’s Leaders Try to Contain Rising Anger Over Iran War at Home’ यानी ‘पाकिस्तान के नेता ईरान युद्ध पर घरेलू गुस्से को काबू में करने की कर रहे कोशिश’। इस रिपोर्ट के लेखक हैं पाकिस्तानी फ्रीलांस पत्रकार जिया उर रहमान और ये रिपोर्ट 20 अप्रैल 2026 को न्यूयॉर्क टाइम्स की वेबसाइट और अंतरराष्ट्रीय संस्करण में छपी, लेकिन पाकिस्तान में बिकने वाले प्रिंट संस्करण से पूरी तरह हटा दी गई।

NYT के पाकिस्तान और अफगानिस्तान ब्यूरो चीफ एलियन पेल्टियर ने खुद एक्स पर पोस्ट करके इसकी जानकारी दी। उन्होंने लिखा कि रिपोर्ट अमेरिका और बाकी दुनिया में तो छपी, लेकिन पाकिस्तान के प्रिंट एडिशन से हटा दी गई। स्थानीय प्रकाशक (एक्सप्रेस ट्रिब्यून या ट्रिब्यून ग्रुप) ने इसे हटाया।

पन्ने पर खाली जगह छोड़ दी गई और नीचे छोटा डिस्क्लेमर छपा- “यह लेख हमारे पाकिस्तानी प्रकाशन साझेदार द्वारा प्रिंट के लिए हटा दिया गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स और इसके संपादकीय स्टाफ की इसमें कोई भूमिका नहीं है।” यह घटना पाकिस्तान में प्रेस की आजादी और धार्मिक संवेदनशीलता पर नई बहस छेड़ गई है।

NYT की रिपोर्ट में क्या लिखा था?

रिपोर्ट में साफ कहा गया कि पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता का मुख्य बिचौलिया बन गया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ फील्ड मार्शल आसिम मुनीर इस डिप्लोमेसी को लेकर काफी सक्रिय हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी पाकिस्तान की इस भूमिका की तारीफ की है। लेकिन घरेलू स्तर पर हालात बिगड़ रहे हैं।

पाकिस्तान में करीब 3.5 करोड़ (35 मिलियन) शिया मुसलमान रहते हैं। वे ईरान से गहरे आध्यात्मिक संबंध रखते हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई और अन्य टॉप क्लेरिक्स की अमेरिकी-इजरायली हमलों में मौत के बाद पाकिस्तान के शिया इलाकों में भारी आक्रोश फैल गया।

दरअसल, 18 मार्च 2026 को आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने खुद शिया मौलानाओं की एक अहम मीटिंग बुलाई। मीटिंग का मकसद शिया समुदाय का गुस्सा शांत करना था ताकि शिया-सुन्नी टकराव न भड़के। मिलिट्री मीडिया विंग के मुताबिक आसिम मुनीर ने शिया मौलानाओं को चेतावनी दी कि किसी दूसरे देश में हुई घटनाओं के आधार पर पाकिस्तान में हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

हालाँकि कुछ शिया मौलानाओं ने मीटिंग को तनावपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि उनकी पाकिस्तान के प्रति वफादारी पर सवाल उठाए गए। कुछ ने दावा किया कि आसिम मुनीर ने कहा कि जो ईरान के प्रति वफादार हैं, उन्हें पाकिस्तान छोड़ देना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया कि शिया समुदाय का गुस्सा बढ़ रहा है। ईरान युद्ध अब पाकिस्तान में ईंधन की महंगाई और बिजली कटौती के बाद दूसरा सबसे बड़ा घरेलू मुद्दा बन गया है। अधिकारी डर रहे हैं कि यह गुस्सा शिया-सुन्ना हिंसा को फिर भड़का सकता है। शिया अल्पसंख्यक पहले से ही आतंकवादी हमलों का शिकार होते रहे हैं।

रिपोर्ट में आगे लिखा गया कि पाकिस्तान बाहर शांति का दूत बनने की कोशिश कर रहा है, लेकिन घर में आग लगी हुई है। अगर घरेलू स्तर पर ही संप्रदायिक तनाव बढ़ा तो बाहर की डिप्लोमेसी कैसे काम करेगी? यह रिपोर्ट पाकिस्तान की आंतरिक कमजोरियों को उजागर करती है- जहाँ एक तरफ आर्मी चीफ ट्रंप के ‘फेवरेट फील्ड मार्शल’ बनने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ 3.5 करोड़ शियाओं का गुस्सा काबू में करने के लिए मीटिंगें बुलानी पड़ रही हैं।

पहले भी ऐसी हरकतें कर चुका है पाकिस्तान

यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान ने NYT की रिपोर्ट को सेंसर किया हो। 2017 में मई महीने में पाकिस्तानी पत्रकार मोहम्मद हनीफ ने NYT के पाकिस्तान एडिशन में एक आर्टिकल लिखा था। उसका शीर्षक था ‘Pakistan Triangle of Hate: Taliban, Army and India’। इसमें पाकिस्तानी सेना के भारत विरोधी एजेंडे, तालिबान के साथ गठजोड़ और एहसानुल्लाह एहसान (टीटीपी नेता, जो लाहौर हमले और मलाला यूसुफजई पर हमले का जिम्मेदार था) जैसे आतंकियों से संबंधों का जिक्र था। लोकल पब्लिशर ने इसे छापने के बाद पन्ने से पूरी तरह साफ कर दिया। जगह खाली छोड़ दी गई। नीचे नोट लिखा गया कि NYT का इसमें कोई हाथ नहीं है।

जनवरी में जेन-जी के लिए लेख को हटवाया गया

जनवरी 2026 में एक और बड़ा मामला सामने आया। पाकिस्तानी पीएचडी स्कॉलर जोरैन निजामानी (अमेरिका में पढ़ रहे, अभिनेता फाजिला काजी और कैसर खान निजामानी के बेटे) ने एक्सप्रेस ट्रिब्यून में ‘It Is Over’ नाम का लेख लिखा था। लेख में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की पुरानी पीढ़ी और सत्ता पर काबिज लोग युवाओं (Gen Z) पर अब कोई असर नहीं छोड़ रहे।

उन्होंने लिखा कि जबरन देशभक्ति, भाषण और सेमिनार अब काम नहीं कर रहे। युवा इंटरनेट और जानकारी की वजह से सब समझ रहे हैं। वे बराबरी, अधिकार और सही व्यवस्था चाहते हैं। जो बोलता है उसे चुप करा दिया जाता है, इसलिए कई युवा चुपचाप देश छोड़ रहे हैं।

इस लेख को भी कुछ ही घंटों में वेबसाइट से हटा दिया गया था। हालाँकि इसके बाद इस लेख के स्क्रीनशॉट वायरल हो गए। सोशल मीडिया पर जोरैन को नेशनल हीरो कहा जाने लगा। PTI, मानवाधिकार संगठनों और पत्रकारों ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया।

ये सभी घटनाएँ एक पैटर्न दिखाती हैं कि पाकिस्तान में आर्मी चीफ आसिम मुनीर के नेतृत्व में मीडिया पर सख्त नियंत्रण है। संवेदनशील मुद्दे चाहे सेना की आलोचना हो, युवाओं का असंतोष हो या शिया समुदाय का गुस्सा, इन सबको दबाया जा रहा है।

सरकार का तर्क है कि ऐसी रिपोर्ट्स से संप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है, लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह असल में सच्चाई छिपाने की कोशिश है। पाकिस्तान प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 180 देशों में 158वें स्थान पर है। स्वतंत्र पत्रकारों पर दबाव, बैंक खाते फ्रीज करने, सरकारी विज्ञापन रोकने और झूठी खबर फैलाने के कानून के तहत गिरफ्तारियाँ आम बात हैं।

पाकिस्तान की कथनी और करनी में अंतर, खोल रहा खुद के चैनल

अब सवाल यह है कि पाकिस्तान बाहर दुनिया के सामने ‘शांति का दूत’ और ‘मॉडर्न डिप्लोमेटिक पावर’ का चेहरा दिखाने की कोशिश क्यों कर रहा है, जबकि अंदर मीडिया को इतना कस रहा है?

इस सवाल का जवाब NYT का एक और आर्टिकल देता है जो मार्च 2026 में छपा था- ‘How Pakistan Is Trying to Reshape Its Image Abroad’। इस रिपोर्ट में एलियन पेल्टियर और जिया उर रहमान ने विस्तार से बताया कि पाकिस्तान सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ विदेशी छवि सुधारने के लिए बड़े पैमाने पर मीडिया अभियान चला रही हैं।

पाकिस्तान ने इंडिया और अफगानिस्तान के तालिबान सरकार के खिलाफ नई अंग्रेजी न्यूज चैनल शुरू किए हैं। PTV (पाकिस्तान टीवी) को फिर से लॉन्च किया गया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुद चैनल के हेडक्वार्टर जाकर कहा कि इसका डिजिटल डिपार्टमेंट विदेशी प्रोपगैंडा का मुकाबला करेगा और पाकिस्तान का मैसेज दुनिया तक पहुँचाएगा। सुरक्षा एजेंसियाँ पत्रकारों से संपर्क करके स्टेट-फ्रेंडली चैनल शुरू करने को कह रही हैं। टैक्स छूट और फंडिंग का लालच दिया जा रहा है।

इन चैनल्स का मुख्य टारगेट भारत और अफगानिस्तान में तालिबान है। वे पाकिस्तानी मिलिट्री की भाषा में खबरें चला रहे हैं, जैसे भारत पर हमले, तालिबान के खिलाफ कार्रवाई आदि। लेकिन स्वतंत्र मीडिया पर दबाव बढ़ रहा है। डॉन अखबार की सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए गए। कई पत्रकार गिरफ्तार कि गए। रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान ट्रकी और कतर जैसे देशों की तरह स्टेट-बैक्ड चैनल (TRT, अल जजीरा) की नकल करना चाहता है, लेकिन फंडिंग और विजन की कमी है।

पाकिस्तान में दूर नहीं ‘कयामत’ के दिन!

यह पूरा मामला दिखाता है कि पाकिस्तान दोहरी नीति चला रहा है। बाहर ट्रंप से दोस्ती और शांति की बातें, लेकिन वो अंदर से सेंसरशिप और दबाव की नीति लागू कर रहा है। वैसे, माना ये भी जा सकता है कि कहीं NYT की रिपोर्ट हटाने से शिया समुदाय का गुस्सा और बढ़ गया तो? इतिहास गवाह है कि दबाया हुआ सच एक न एक दिन बाहर आता ही है। पाकिस्तान की मीडिया स्ट्रैटजी कितनी कामयाब होगी, यह भविष्य बताएगा, लेकिन फिलहाल यह साफ है कि आसिम मुनीर की कठपुतली सरकार अभिव्यक्ति की आजादी को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का नाम देकर कुचल रही है।

गाजीपुर में नाबालिग की मौत पर राजनीतिक रोटियाँ सेंक रही सपा-कॉन्ग्रेस, पार्टियों के एंट्री से मामला गरमाया: जानें- पोस्टमार्टम रिपोर्ट और जाँच में क्या चीजें आई सामने

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के करंडा थाना क्षेत्र के कटरिया गाँव में एक नाबालिग लड़की की संदिग्ध मौत अब बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई है। शुरुआत में इसे गैंगरेप और हत्या का मामला बताया गया, लेकिन पुलिस जाँच, CCTV फुटेज और चैट रिकॉर्ड सामने आने के बाद तस्वीर कुछ अलग नजर आ रही है। फिलहाल पुलिस इसे आत्महत्या का मामला मान रही है, जबकि विपक्ष इस पर राजनीतिक रंग देने की कोशिश में लगी हुई हैं।

क्या है पूरा मामला?

बताया जा रहा है कि लड़की (निशा/नेहा विश्वकर्मा) 14 अप्रैल 2026 की देर रात घर से लापता हो गई थी। CCTV फुटेज में वह रात करीब 2 बजे अकेले गंगा पुल की ओर जाती दिखी। जाँच में यह भी सामने आया कि वह अपने दोस्त हरिओम से मिलकर लौटी थी और घरवालों को पता चलने के डर से घबराई हुई थी। हरिओम ने उसे चैट के जरिए वापस घर जाने के लिए कहा, लेकिन उसने जवाब नहीं दिया।

सुबह करीब 5:30 बजे लड़की ने अपने पिता को फोन कर आत्महत्या करने की बात कही। इसके लगभग 10 मिनट बाद उसने गंगा नदी में छलांग लगा दी। पिता ने तुरंत डायल 112 पर कॉल कर पुलिस को सूचना दी। पुलिस कुछ ही मिनटों में मौके पर पहुँच गई और पुल से मोबाइल, चप्पल और दुपट्टा बरामद किया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण डूबना बताया गया।

हालाँकि परिजनों ने इसे हत्या बताते हुए दो लोगों के खिलाफ केस दर्ज कराया। एक आरोपित को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया है। इसके बाद मामला धीरे-धीरे राजनीतिक रंग लेने लगा। समाजवादी पार्टी, भीम आर्मी, कॉन्ग्रेस और अन्य संगठनों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया।

गाजीपुर कटरिया कांड: 22 से 25 अप्रैल तक कैसे बढ़ा विवाद, पूरी टाइमलाइन समझिए

गाजीपुर के कटरिया गाँव में नाबालिग की मौत के बाद शुरू हुआ विवाद अब पूरी तरह सियासी टकराव में बदल चुका है। जहाँ एक तरफ पुलिस इसे आत्महत्या का मामला बता रही है, वहीं विपक्ष लगातार गंभीर आरोप लगा रहा है। 22 अप्रैल से 25 अप्रैल के बीच घटनाक्रम तेजी से बदला और मामला स्थानीय से राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया।

22 अप्रैल 2026 (बुधवार): विवाद ने लिया हिंसक रूप

इस दिन समाजवादी पार्टी का प्रतिनिधिमंडल कटरिया गाँव पहुँचा। उनका उद्देश्य पीड़ित परिवार से मिलना था, लेकिन गाँव के कुछ लोगों ने उन्हें गाँव में घुसने से रोक दिया। दोनों पक्षों के बीच पहले तीखी बहस हुई, जो धीरे-धीरे झड़प में बदल गई। देखते ही देखते माहौल बिगड़ गया और पत्थरबाजी शुरू हो गई। इस हिंसा में कई लोग घायल हुए, जिनमें पुलिसकर्मी और सपा के नेता रामआसरे विश्वकर्मा भी शामिल थे। घटना के बाद इलाके में भारी तनाव फैल गया।

23 अप्रैल 2026 (गुरुवार): पुलिस की सख्त कार्रवाई

हिंसा के अगले दिन पुलिस ने कड़ा रुख अपनाया। मामले में 47 लोगों को नामजद करते हुए 200 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए अब तक करीब 10 लोगों को गिरफ्तार कर लिया, जिनमें कुछ समाजवादी पार्टी से जुड़े लोग भी बताए जा रहे हैं। प्रशासन ने साफ संकेत दिया कि कानून-व्यवस्था से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।

24 अप्रैल 2026 (शुक्रवार): सियासत तेज, प्रशासन सक्रिय

घटना ने इस दिन और ज्यादा तूल पकड़ लिया। विपक्षी दलों ने सरकार पर निशाना साधा और कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए। वहीं सरकार ने बताया की विपक्ष जानबूझकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहा है। वही प्रशासन नेइस मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में कराने का भरोसा भी दिया।

25 अप्रैल 2026 (शनिवार): राष्ट्रीय स्तर पर गूंजा मामला, आरोप-प्रत्यारोप तेज

इस दिन मामला राष्ट्रीय स्तर पर पहुँच गया जब कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने इस घटना को लेकर केंद्र और राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि विश्वकर्मा समाज की बेटी के साथ रेप के बाद हत्या की गई और परिवार को FIR दर्ज कराने से रोका गया।

राहुल गाँधी ने यह भी कहा कि अक्सर कमजोर वर्ग के लोगों को ही निशाना बनाया जाता है और अपराधियों को संरक्षण मिलता है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से जवाब माँगते हुए सरकार की नैतिक जिम्मेदारी पर सवाल उठाए।

हालाँकि गाजीपुर पुलिस ने राहुल गाँधी के इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया। पुलिस का कहना है कि जाँच में अब तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जो रेप या हत्या की पुष्टि करता हो। पुलिस ने इन दावों को भ्रामक और तथ्यहीन बताया और कहा कि मामले की जाँच तथ्यों के आधार पर ही की जा रही है।

अपने ‘घर’ पहुँच रहे नॉर्थ-ईस्ट भारत के ‘बनेई मेनाशे’, 250 लोगों का दस्ता पहुँचा इजरायल: यहूदियों के ‘खोए कबीले’ से जुड़ाव, जानें इनका इतिहास

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से एक छोटे लेकिन खास समुदाय के करीब 250 लोग हाल ही में इजरायल पहुँचे हैं। यह कोई सामान्य यात्रा नहीं, बल्कि पहचान, आस्था और इतिहास से जुड़ी एक लंबी कहानी का हिस्सा है। इन लोगों को ‘बनेई मेनाशे’ कहा जाता है, जो खुद को बाइबिल में वर्णित प्राचीन इस्राएली कबीले ‘मेनाशे’ का वंशज मानते हैं।

इजरायल सरकार ने इन्हें बसाने के लिए एक विशेष अभियान शुरू किया है, जिसके तहत आने वाले वर्षों में हजारों और लोगों को वहाँ लाया जाएगा। यह पूरी प्रक्रिया केवल प्रवासन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्स्थापन और ऐतिहासिक जुड़ाव की एक बड़ी कोशिश मानी जा रही है।

कौन हैं बनेई मेनाशे और क्या है उनका दावा?

बनेई मेनाशे समुदाय मुख्य रूप से भारत के मणिपुर और मिजोरम राज्यों में रहता है। इस समुदाय का दावा है कि वे प्राचीन इस्राएल के ‘लॉस्ट ट्राइब्स’ यानी खोई हुई दस जनजातियों में से एक, मेनाशे कबीले के वंशज हैं। धार्मिक कथाओं के अनुसार, करीब 2700 साल पहले असीरियन साम्राज्य ने इन जनजातियों को उनके मूल स्थान से निर्वासित कर दिया था।

इसके बाद ये लोग अलग-अलग दिशाओं में बिखर गए और समय के साथ उनकी पहचान धुंधली होती चली गई। बनेई मेनाशे की मौखिक परंपराएँ बताती हैं कि उनके पूर्वज फारस, अफगानिस्तान, तिब्बत और चीन से होते हुए अंततः भारत के पूर्वोत्तर इलाकों में पहुँचे।

इस लंबे सफर के दौरान उन्होंने कुछ यहूदी धार्मिक परंपराओं, जैसे खतना और कुछ धार्मिक रीति-रिवाजों को बनाए रखा, जिससे उनके दावे को एक आधार मिलता है।

भारत में जीवन और धार्मिक बदलाव

भारत में बसने के बाद यह समुदाय धीरे-धीरे स्थानीय समाज का हिस्सा बन गया। 19वीं सदी में आए ईसाई मिशनरियों के प्रभाव में इस समुदाय के अधिकांश लोगों ने ईसाई धर्म अपना लिया। इसके बावजूद उनके भीतर अपनी कथित यहूदी जड़ों को लेकर एक अलग पहचान बनी रही।

समय के साथ इस समुदाय के कुछ लोगों ने अपनी पुरानी परंपराओं और इतिहास को फिर से खोजने की कोशिश की। यही कारण है कि 20वीं सदी के अंत तक आते-आते उन्होंने यहूदी धर्म की ओर वापसी का प्रयास शुरू किया और इजरायल से संपर्क स्थापित किया।

इजरायल की मान्यता और लंबी बहस

बनेई मेनाशे को यहूदी मानने को लेकर लंबे समय तक विवाद चलता रहा। कई धार्मिक और सरकारी संस्थाओं ने उनके दावों पर सवाल उठाए। हालाँकि 2005 में एक अहम मोड़ आया, जब इजरायल के सेफारदी मुख्य रब्बी रब्बी श्लोमो अमर (Rabbi Shlomo Amar) ने उन्हें ‘इजरायल के वंशज’ के रूप में मान्यता दी।

इस मान्यता ने उनके इजरायल प्रवास का रास्ता खोल दिया, लेकिन एक शर्त के साथ, शर्त ये थी कि उन्हें औपचारिक रूप से यहूदी धर्म अपनाना होगा। यानी इजरायल पहुँचने के बाद उन्हें धार्मिक रूपांतरण की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, ताकि वे वहाँ की नागरिकता प्राप्त कर सकें।

क्या है ‘ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन’?

इजरायल सरकार ने इस समुदाय को व्यवस्थित तरीके से बसाने के लिए ‘ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन’ नामक एक विशेष अभियान शुरू किया है। इस योजना के तहत आने वाले वर्षों में भारत में रह रहे हजारों बनेई मेनाशे को इजरायल लाया जाएगा। हाल ही में पहुँचे 250 लोग इसी अभियान का पहला जत्था हैं।

सरकार की योजना है कि 2026 के दौरान करीब 1200 और लोगों को इजरायल लाया जाएगा, जबकि कुल मिलाकर लगभग 6000 लोगों को 2030 तक वहाँ बसाने का लक्ष्य है। इस पूरी योजना पर लगभग 90 मिलियन शेकेल (करीब 30 मिलियन डॉलर) खर्च होने का अनुमान है, जिसमें यात्रा, आवास, भाषा प्रशिक्षण और अन्य सुविधाएँ शामिल हैं।

इजरायल में बसने की प्रक्रिया और चुनौतियाँ

इजरायल पहुँचने के बाद इन लोगों को सीधे नागरिकता नहीं मिलती, बल्कि उन्हें एक चरणबद्ध प्रक्रिया से गुजरना होता है। सबसे पहले उन्हें ‘एब्जॉर्प्शन सेंटर’ में रखा जाता है, जहाँ उन्हें हिब्रू भाषा सिखाई जाती है, रोजगार के अवसरों से जोड़ा जाता है और समाज में घुलने-मिलने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है।

इसके अलावा धार्मिक रूपांतरण भी एक जरूरी प्रक्रिया है, क्योंकि इजरायल के कानून के तहत यहूदी पहचान को आधिकारिक मान्यता देना आवश्यक होता है। यह प्रक्रिया कई बार चुनौतीपूर्ण होती है, क्योंकि नए माहौल, भाषा और सांस्कृतिक अंतर के कारण लोगों को खुद को ढालने में समय लगता है।

भावनाएँ, पहचान और नई शुरुआत

इस पूरी कहानी का सबसे भावुक पहलू उन लोगों के अनुभव हैं, जो वर्षों बाद अपने परिवार या समुदाय के सदस्यों से मिलते हैं। एयरपोर्ट पर पहुँचे लोगों का गानों, झंडों और तालियों के साथ जिस तरह स्वागत हुआ, वह इस बात का संकेत है कि यह केवल प्रवासन नहीं, बल्कि ‘घर वापसी’ जैसा अनुभव है।

(फोटो साभार: NDTV)

कई लोग ऐसे भी हैं, जो दशकों पहले इजरायल आ चुके थे और अब अपने पुराने साथियों या रिश्तेदारों से दोबारा मिल रहे हैं। कुछ के लिए यह खुशी का पल है, तो कुछ के लिए बीते समय की यादों से जुड़ा भावनात्मक क्षण।

(फोटो साभार: NDTV)

नई पीढ़ी के सामने एक अलग चुनौती है और वो है अपनी पारंपरिक पहचान को बनाए रखते हुए आधुनिक इजरायली समाज में खुद को स्थापित करना। भाषा, संस्कृति और जीवनशैली के फर्क के बावजूद इस समुदाय के लोग अपने जड़ों से जुड़ने के एहसास को सबसे बड़ा मानते हैं।

एक ऐतिहासिक और सामाजिक प्रयोग

बनेई मेनाशे का इजरायल जाना सिर्फ एक धार्मिक या सामाजिक घटना नहीं है, बल्कि यह एक अनोखा ऐतिहासिक प्रयोग भी है। इसमें हजारों साल पुराने दावों, आधुनिक राजनीति, धार्मिक मान्यताओं और मानवीय भावनाओं का मिश्रण देखने को मिलता है।

इजरायल की नीति हमेशा से दुनिया भर के यहूदियों को एक जगह लाने की रही है और यह अभियान उसी दिशा में एक और कदम है। वहीं बनेई मेनाशे के लिए यह अपने इतिहास को फिर से जीने और एक नई पहचान बनाने का मौका है।

इस तरह पूर्वोत्तर भारत के छोटे-छोटे गाँवों से निकलकर इजरायल तक पहुँचने की यह कहानी सिर्फ दूरी तय करने की नहीं, बल्कि समय, संस्कृति और विश्वास के लंबे सफर की कहानी है।

‘मुस्लिम पीड़ित’ का नैरेटिव फैलाने वाले APCR की साजिश, TCS नासिक कांड में जिहादियों को क्लीन चिट देने की कोशिश: बनाई प्रोपेगेंडा रिपोर्ट

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई के प्रेस क्लब में गुरुवार (23 अप्रैल 2026) को विवादास्पद संगठन ‘एसोसिएशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स’ यानी APCR ने एक कथित फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि नासिक के टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) के आफिस में उत्पीड़न मामले में धर्म परिवर्तन की किसी संगठित गतिविधि का कोई सबूत नहीं मिला है।

गौरतलब है कि नासिक TCS कांड के बाद पूरे देश में गुस्सा है। TCS दफ्तर में काम करने वालीं कई हिंदू महिलाओं ने BPO यानी बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग दफ्तर में कुछ मुस्लिम कर्मचारियों द्वारा यौन उत्पीड़न और धार्मिक रूप से दबाव बनाए जाने की कहानियाँ सामने रखीं।

APCR का कहना है कि उसकी 5 सदस्यीय टीम ने नासिक जाकर जमीनी हकीकत जानने के बाद यह रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट जारी करते समय APCR के साथ पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी (PUCL), सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP), बॉम्बे कैथोलिक सभा (BCS) और अन्य संगठनों के कार्यकर्ता भी मौजूद थे।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इस मामले में दर्ज 9 FIR में अलग-अलग शिकायतकर्ताओं के आरोप एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। साथ ही रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि जाँच एजेंसियों ने धर्म परिवर्तन की किसी संगठित साजिश की पुष्टि नहीं की है। APCR ने यह भी कहा कि इस मामले में धार्मिक दबाव के पहलू को बिना की खास वजह से केंद्र में रखा जा रहा है जबकि उनकी टीम को ऐसी किसी भी गतिविधि का कोई ठोस सबूत नहीं मिला।

APCR ने की ‘मुस्लिम पीड़ित’ का नैरेटिव गढ़ने की कोशिश

रिपोर्ट में किए गए दावों के मुताबिक, TCS नासिक मामले में जाँच एजेंसियों ने किसी भी तरह की संगठित धर्मांतरण साजिश की पुष्टि नहीं की है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस मामले में ‘धर्म के आधार पर जबरदस्ती’ के पहलू को जरूरत से ज्यादा अहम बना दिया गया है जबकि APCR की टीम के अनुसार ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला है जो किसी संगठित या व्यवस्थित धर्मांतरण गतिविधि को साबित करता हो।

APCR के राष्ट्रीय सचिव नदीम खान ने रिपोर्ट जारी करते समय कहा कि सिविल सोसायटी संगठनों को नासिक पुलिस की जाँच पर भरोसा नहीं है। नदीम ने माँग की कि इस मामले की जाँच किसी रिटायर्ड हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज से कराई जाए। नदीम पर नवंबर 2024 में दिल्ली पुलिस ने एक सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील प्रदर्शनी के दौरान आपराधिक साजिश रचने और समाज में वैमनस्य फैलाने के आरोप में मामला दर्ज किया था।

पीड़ितों के बयानों पर सवाल उठाते हुए खान ने इस मामले को मुसलमानों को कॉरपोरेट नौकरियों से दूर रखने की साजिश बताया। नदीम ने कहा, “इस मुद्दे का इस्तेमाल मुसलमानों को कॉरपोरेट क्षेत्र में नौकरी पाने से रोकने के लिए किया जाएगा। यह मानना मुश्किल है कि किसी को 24 घंटे रोजा रखने के लिए मजबूर किया जा सकता है। पुलिस द्वारा दर्ज FIR में कई सवाल खड़े होते हैं और उनकी भूमिका भी संदिग्ध लगती है।”

खान ने नासिक पुलिस द्वारा किए गए उस अंडरकवर ऑपरेशन पर भी सवाल उठाए जिसके जरिए पूरे मामले का खुलासा हुआ था। उन्होंने पूछा कि जब पुलिसकर्मी तीन हफ्तों तक बीपीओ में काम कर रहे थे, तो वे आरोपित निदा खान की नौकरी की भूमिका क्यों नहीं समझ पाए। गौरतलब है कि TCS ने हाल ही में एक आधिकारिक बयान जारी कर स्पष्ट किया है कि निदा खान बीपीओ में HR मैनेजर नहीं बल्कि प्रोसेस एसोसिएट के पद पर कार्यरत है।

‘एक्टिविस्ट’ तीस्ता सीतलवाड़ ने भी इस मामले को ‘मनगढ़ंत’ बताया है। उन्होंने कहा, “नासिक का यह मामला बनाया हुआ है और अदालत में टिक नहीं पाएगा। यहाँ प्रक्रिया ही सजा बन गई है। किसी भी अपराध को धर्म या जाति के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि निदा खान को उनके जेंडर के कारण निशाना बनाया जा रहा है।” इसी दौरान, तीस्ता सीतलवाड़ ने कहा कि महाराष्ट्र में दर्ज कुल 12,019 मामलों में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों की संख्या सबसे कम है।

रिपोर्ट जारी करने के दौरान मौजूद अन्य तथाकथित एक्टिविस्टों ने पूरे मामले को नासिक के ज्योतिषी अशोक खरात से जुड़े कथित यौन शोषण के मामले को दबाने की साजिश बताया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि TCS नासिक मामला, सिंहस्थ कुंभ मेले के लिए नासिक नगर निगम द्वारा कथित तौर पर पेड़ों की कटाई और एक अन्य कथित हाउसिंग घोटाले से जनता का ध्यान भटकाने के लिए रचा गया है।

FIR में दर्ज पीड़िताओं का दर्द

APCR की रिपोर्ट में किए गए दावे नासिक TCS ऑफिस उत्पीड़न मामले में दर्ज कई FIR में पीड़ितों द्वारा बताए गए यौन उत्पीड़न और धार्मिक दबाव के मामलों को देखने के बाद कमजोर नजर आते हैं। इस कथित ‘ग्रूमिंग जिहाद’ मामले में पहली FIR 23 मार्च को नासिक के देवळाली कैंप पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई थी।

FIR दर्ज होने के बाद मामले की जाँच के लिए कुछ महिला पुलिसकर्मियों को कंपनी में अंडरकवर भेजा गया। इस जाँच में ऐसे कई मामलों का खुलासा हुआ जिनमें पीड़ित महिलाओं ने बताया कि उन्हें वर्षों तक यौन उत्पीड़न, अश्लील टिप्पणियाँ, जबरन नजदीकी बढ़ाने की कोशिश, निजी जीवन से जुड़े आपत्तिजनक सवाल और हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ अपमानजनक बातें झेलनी पड़ीं। इसके बाद कई पीड़ित सामने आईं और आरोपितों के खिलाफ FIR दर्ज कराई।

पीड़ितों की शिकायतों के अनुसार, कंपनी में काम करने वाले छह मुस्लिम कर्मचारी हिंदू महिलाओं पर इस्लाम कबूल करने, नमाज पढ़ने और गोमांस खाने का दबाव बना रहे थे। यह उत्पीड़न करीब चार साल तक चलता रहा।

3 अप्रैल 2026 की एक एफआईआर में 23 साल की एक हिंदू पीड़िता ने बताया कि रजा मेमन और शाहरुख कुरैशी ने उसके साथ अश्लील टिप्पणियां कीं और हिंदू परंपराओं का मजाक उड़ाया। 2 अप्रैल 2026 को दर्ज एक अन्य एफआईआर में एक और 23 वर्षीय हिंदू महिला ने 5 आरोपितों के नाम लिए और बताया कि उसके साथ यौन उत्पीड़न किया गया और उसे धार्मिक अपमान सहना पड़ा।

एक अन्य FIR में बताया गया कि आरोपितों ने हिंदू देवी-देवताओं ब्रह्मा, राम और सीता का मजाक उड़ाया। आरोपितों ने ब्रह्मा को अपनी ही बेटी का अपराधी बताया और यह दावा किया कि राम और सीता ने वनवास के दौरान मांस खाया था। इसके अलावा भगवान शिव के अस्तित्व का भी मजाक उड़ाया गया और भगवान गणेश के पिता को लेकर भी आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की गईं।

पीड़िताओं ने अपनी शिकायतों में यह भी बताया कि आरोपितों के गलत व्यवहार, खासकर हिंदू धार्मिक मान्यताओं के लगातार मजाक उड़ाने की शिकायतें बार-बार करने के बावजूद उन पर ध्यान नहीं दिया गया। पीड़ितों के बयानों से यह भी सामने आता है कि आरोपितों ने कार्यस्थल पर अपने पद का फायदा उठाकर यौन उत्पीड़न, शोषण और कथित धार्मिक दबाव से जुड़ी शिकायतों को दबाने की कोशिश की जिससे उन्हें इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया जा सके।

इन सभी तथ्यों के बावजूद APCR की रिपोर्ट में पीड़ितों द्वारा बताई गई इन बातों को नजरअंदाज किया गया और रिपोर्ट को चुनिंदा व तोड़े-मरोड़े गए तथ्यों के आधार पर तैयार किया गया है।

APCR का ‘मुस्लिम पीड़ित’ नैरेटिव को बढ़ावा देने का इतिहास

APCR खुद को एक गैर-लाभकारी संगठन के रूप में पेश करता है जो ‘कानून और न्याय के बीच की दूरी को कम करने’ का काम करता है लेकिन इसका ट्रैक रिकॉर्ड कुछ और ही कहानी बताता है। साल 2006 में गठित और सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत यह संगठन दावा करता है कि वह मुफ्त कानूनी सहायता, आर्थिक मदद और वर्कशॉप व सेमिनार के जरिए कानूनी जागरूकता कार्यक्रम चलाता है।

हालाँकि, यह संगठन कई बार विवादित मामलों में नजर आया है, जहाँ इसने हिंसक घटनाओं में आरोपित लोगों को कानूनी सहायता दी है। संभल हिंसा और दिल्ली में हुए दंगों के मामलों में। इसके तथाकथित ‘फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट’ अक्सर निष्पक्ष दस्तावेज की बजाय एकतरफा नजरिए वाली रिपोर्ट लगती हैं, जिनका मकसद कुछ समूहों को बचाना और दूसरों को कठघरे में खड़ा करना बताया जाता है।

यह पहली बार नहीं है जब APCR पर ‘मुस्लिम पीड़ित’ का नैरेटिव गढ़ने का आरोप लगा हो। जुलाई 2024 में भी इस संगठन ने एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें दावा किया गया था कि लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद भारत में मुस्लिम विरोधी अपराध बढ़ गए हैं। इस रिपोर्ट का इस्तेमाल कई मीडिया संस्थानों जैसे फ्री प्रेस जर्नल, क्लैरियन, मुस्लिम मिरर आदि ने भी इसी तरह के दावे करने के लिए किया था।

APCR पर अक्सर आरोप लगते रहे हैं कि वह चुनिंदा तथ्यों को उठाकर और आंशिक जानकारी के आधार पर रिपोर्ट तैयार करता है। आलोचकों के मुताबिक, इससे देश में साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने की कोशिश की जाती है। APCR के इन दावों की हमने ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट में पोल खोली थी।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

फिरौती के लिए नाबालिग की हत्या, फिर खुद को मृत घोषित किया: जानिए- कैसे 25 साल तक दिल्ली पुलिस की नजरों से बचा रहा Ex-Muslim सलीम वास्तिक

दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक ऐसी गिरफ्तारी की है जिसने सबको हैरान कर दिया है। सोशल मीडिया पर इस्लाम की आलोचना करने के लिए मशहूर और खुद को ‘Ex-Muslim’ बताने वाला यूट्यूबर सलीम वास्तिक असल में एक पुराना कातिल निकला। पुलिस ने उसे 31 साल पुराने अपहरण और हत्या के मामले में गाजियाबाद के लोनी से दबोचा है।

13 साल के मासूम की हत्या और 30 हजार की फिरौती

यह मामला साल 1995 का है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के एक सीमेंट कारोबारी का 13 साल का बेटा संदीप बंसल स्कूल से घर नहीं लौटा। अगले दिन पिता के पास फोन आया और बच्चे की जान के बदले 30,000 रुपए की फिरौती माँगी गई।

जाँच के दौरान पुलिस का शक स्कूल के मार्शल आर्ट्स इंस्ट्रक्टर सलीम खान पर गया। जब उसे पकड़ा गया, तो उसने अपना जुर्म कबूल कर लिया। सलीम की निशानदेही पर पुलिस ने मुस्तफाबाद के एक गंदे नाले से बच्चे की लाश बरामद की थी।

सजा हुई, जमानत मिली और फिर हो गया फरार

साल 1997 में अदालत ने सलीम खान और उसके साथी अनिल को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। करीब तीन साल जेल में रहने के बाद, साल 2000 में सलीम को दिल्ली हाई कोर्ट से अंतरिम जमानत मिल गई।

बाहर आते ही सलीम ने कानून की आँखों में धूल झोंकना शुरू कर दिया। वह जमानत की मियाद खत्म होने के बाद वापस जेल नहीं गया और फरार हो गया। साल 2011 में हाई कोर्ट ने उसकी सजा को बरकरार रखा, लेकिन तब तक सलीम गायब हो चुका था।

खुद को मृत घोषित कर बदली पहचान

पुलिस की पकड़ से बचने के लिए सलीम ने एक खतरनाक पैंतरा आजमाया। उसने कागजों में खुद को मृत घोषित करवा दिया ताकि पुलिस उसकी तलाश बंद कर दे। इसके बाद उसने अपनी पहचान पूरी तरह बदल ली।

उसने अपना नाम ‘सलीम अहमद’ और फिर ‘सलीम वास्तिक’ रख लिया। वह हरियाणा के करनाल और अंबाला जैसे शहरों में छिपकर रहने लगा और अलमारी बनाने का काम किया। आखिरकार वह गाजियाबाद के लोनी में आकर बस गया।

यूट्यूब की शोहरत और बॉलीवुड फिल्म का ऑफर

लोनी में रहते हुए सलीम ने यूट्यूब पर ‘Ex-Muslim सलीम वास्तिक’ के नाम से अपनी नई पहचान बनाई। वह इस्लाम पर अपने विवादित बयानों और कट्टरवाद के खिलाफ बोलने के कारण नेशनल सुर्खियों में आ गया।

‘Ex-Muslim सलीम वास्तिक’ की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि हाल ही में एक मशहूर बॉलीवुड फिल्म प्रोड्यूसर ने उसकी बायोग्राफी (जीवन कहानी) पर फिल्म बनाने के लिए उसे 15 लाख रुपए का एडवांस चेक भी दिया था।

पुलिस का जाल और फिंगरप्रिंट से खुला राज

सलीम वास्तिक को लगा था कि वह अपनी पुरानी पहचान दफन कर चुका है, लेकिन दिल्ली पुलिस की एंटी रॉबरी एंड सीरियस क्राइम (ARSC) टीम उस पर नजर रख रही थी। पुलिस ने कोर्ट के पुराने रिकॉर्ड निकाले और सलीम वास्तिक के फिंगरप्रिंट और पुरानी तस्वीरों का मिलान किया। जब यह पुष्टि हो गई कि ‘सलीम वास्तिक’ ही 1995 का कातिल ‘सलीम खान’ है, तो पुलिस ने जाल बिछाकर उसे गिरफ्तार कर लिया।

क्या लगी हैं धाराएँ?

‘Ex-Muslim सलीम वास्तिक’ उर्फ सलीम खान पर दिल्ली के गोकुलपुरी थाने में एफआईआर नंबर 36/1995 दर्ज है। उस पर आईपीसी की धारा 302 (हत्या), 363 (अपहरण), 364A (फिरौती के लिए अपहरण) और 34 (साझा इरादा) के तहत मामले चल रहे हैं।

करीब 25 साल तक फरार रहने और पहचान छिपाने के बाद अब उसे दोबारा जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया है। फिलहाल वह तिहाड़ जेल में बंद है।

नाम- सतीश बौद्ध, काम- हिंदू देवी-देवताओं का अपमान: माता सीता से लेकर भगवान श्रीकृष्ण का मजाक उड़ाने वाले ‘अंबेडकरवादी’ पर कार्रवाई की माँग, हिंदू-विरोधी बयान वायरल

हिंदू धर्म और उनके देवी-देवताओं के खिलाफ अपमानजनक बातें करना, उसे ‘सामाजिक न्याय’ और ‘तर्कवाद’ का नाम देना, आजकल एक गलत चलन बनता जा रहा है। ऐसे ही एक ताजे मामले में खुद को अंबेडकरवादी बताने वाले सतीश बौद्ध ने हिंदू आस्था पर एक और हमला किया। सतीश ने 18 अप्रैल 2026 को दिल्ली के अशोक नगर में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान हिंदू देवी-देवताओं के बारे में बेहद आपत्तिजनक और अशोभनीय टिप्पणियाँ की। उनके इन बयानों के बाद लोगों में भारी नाराजगी है और कई लोग उनकी गिरफ्तारी की माँग कर रहे हैं।

यह कार्यक्रम डॉ भीमराव आंबेडकर की जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया था। अपने भाषण में सतीश बौद्ध ने पहले मनुवाद, जाति व्यवस्था और अंधविश्वास जैसे मुद्दों पर बात की। इसके जरिए सतीश ने दलित हिंदुओं को बौद्ध धर्म अपनाने के लिए प्रेरित करने की कोशिश की। लेकिन इसके बाद उसने हिंदू देवी-देवताओं, धर्मग्रंथों और धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक बातें कहीं, जिससे विवाद खड़ा हो गया।

सतीश बौद्ध ने किया माता सीता का अपमान

माता सीता के दिव्य जन्म की कथा का मजाक उड़ाते हुए सतीश बौद्ध ने कहा, “एक राजा और रानी थे। उन्हें संतान नहीं हो रही थी, तो किसी डॉक्टर के पास जाना चाहिए था, लेकिन एक ऋषि ने कहा कि अगर राजा और रानी मिलकर खेत जोतेंगे, तो उन्हें संतान होगी। फिर जब हल जमीन में अटक गया, तो वहाँ एक घड़ा मिला। उस घड़े में एक लड़की थी, उसी लड़की का नाम सीता राखा गया।”

सतीश बौद्ध ने आगे कहा, “मैं एक बात नहीं समझ पाया। क्या खुदाई करने पर बच्चे निकलते हैं, क्या वे बच्चे होते हैं या आलू-मूली। हमने इसे सच मान लिया, क्योंकि हमने बुद्ध का सहारा नहीं लिया, क्या सच में ऐसा हो सकता है कि जमीन खोदने पर एक लड़की बाहर निकल जाए।”

अंबेडकरवादी सतीश ने गंदे इशारे करते हुए भगवान कृष्ण की जन्मकथा का उड़ाया मजाक

अपने भाषण में सतीश बौद्ध ने भगवान श्रीकृष्ण और उनके जन्म की कथा का भी मजाक उड़ाया। सतीश ने हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित श्रीकृष्ण के जन्म और शिशु की अदला-बदली की कहानी पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की।

सतीश ने भगवान श्रीकृष्ण और उनके जन्म की कथा का मजाक उड़ाते हुए कहा, “वासुदेव, ओ बाबूजी… बड़ी मुश्किल से उनका रिश्ता हुआ था… कंस ने दोनों को एक साथ बंद कर दिया… जबकि पुरुषों को अलग और महिलाओं को अलग बंद किया जाता है, लेकिन कंस ने दोनों को साथ ही कैद कर दिया। फिर वहाँ खेती शुरू हो गई, आठवें बच्चे का जन्म होने वाला था… वासुदेव उस लड़के को लेकर निकल पड़े… वहाँ जाकर बच्चे बदल दिए… मैंने लड़के को वहाँ दे दिया और लड़की को यहाँ ले आया। जो लड़की यहाँ आई… वह उससे भी ज्यादा चालाक निकली, वह हवा में उड़ते हुए कह रही थी… ‘कंस बेटा तुम्हारे इंतजाम हो चुके हैं’… इस तरह हम अंधकार से और गहरे अंधकार की ओर बढ़ रहे हैं।”

सतीश ने यह बात वहाँ मौजूद खुश और समान विचारधारा वाली भीड़ के बीच कही। सतीश ने आगे भगवान श्रीकृष्ण को ‘महिलाओं के पीछे भागने वाला’ बताया और लोगों को यह कहकर ताना मारा कि वे ऐसे व्यक्ति के सम्मान में उनका जन्मदिवस मनाते हैं और केक काटते हैं।

महाभारत में द्रौपदी के चीरहरण और उनके सम्मान से जुड़े प्रसंग का उड़ाया मजाक

माता सीता और भगवान श्रीकृष्ण का अपमान करने के बाद सतीश बौद्ध ने महाभारत की महारानी द्रौपदी का भी अपमान किया। सतीश ने द्रौपदी चीरहरण की घटना का जिक्र किया। इस दौरान सतीश ने गलत तरीके से दावा किया कि पांडव द्रौपदी का चीरहरण करना चाहते थे, जबकि वास्तव में यह कौरवों ने किया था। इतना ही नहीं, सतीश ने इस घटना में दलित-सवर्ण का मुद्दा जोड़कर सवर्ण हिंदुओं को बदनाम करने की कोशिश भी की।

सतीश ने कहा, “वहाँ एक महिला खड़ी थी, उसका नाम द्रौपदी था। जब पांडवों ने द्रौपदी का चीरहरण करने की योजना बनाई, तब उस सभा में कोई दलित था क्या… वे शूद्र नहीं थे बल्कि अतिशूद्र थे, जिन लोगों ने उस महिला का अपमान किया वे भी ऊँची जाति के थे, जिसने जुए में उस महिला को दाँव पर लगाया… वह भी सवर्ण था… इन लोगों की कहानियों ने हमें बर्बाद कर दिया है। दोस्त… हम अंधकार से और गहरे अंधकार की ओर बढ़ रहे हैं… इन लोगों की कहानियों ने हमें बर्बाद कर दिया है।”

हिंदू विरोधी ईसाई मिशनरियों या नफरत फैलाने वाले किसी इस्लामी कट्टरपंथी की तरह सतीश बौद्ध ने भी हिंदू देवी-देवताओं और धर्मग्रंथों का खुलकर मजाक उड़ाया। उनकी बातें अपमान, अश्लील इशारों और शास्त्रों की गलत व्याख्या पर आधारित थी, जिनका मकसद दलित हिंदुओं को सनातन धर्म से दूर करना था। सतीश बौद्ध ने जानबूझकर हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित घटनाओं को उनके सही नैतिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक संदर्भ से अलग करके पेश किया। इस तरह सतीश ने शास्त्रों की मूल शिक्षाओं को नजरअंदाज करते हुए लोगों को भ्रमित करने की कोशिश की।

यह भी गौर करने वाली बात है कि सतीश बौद्ध, ईसाई मिशनरी और TCS नासिक कांड में आरोपित इस्लामी कट्टरपंथी, सभी हिंदुओं के प्रति एक जैसी नफरत रखते हैं और हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाने में समान रूचि दिखाते हैं। पहले भी रिपोर्ट में सामने आया था कि TCS नासिक कांड के मुस्लिम आरोपित हिंदू आस्था का मजाक उड़ाते थे। वे ‘भगवान श्रीकृष्ण को महिलाओं के पीछे भागने वाला’ बताते थे, ‘शिवलिंग को लिंग’ बताते थे और ‘द्रौपदी को चरित्रहीन’ बताते थे।

सतीश बौद्ध के खिलाफ हिंदुओं की सख्त कार्रवाई की माँग

यह भारत जैसे हिंदू बहुल देष की एक दुखद सच्चाई है कि गौतम खट्टर जैसे हिंदुओं पर केवल एक 16वीं सदी के ईसाई मिशनरी की आलोचना करने पर मुकदमा दर्ज हो जाता, जबकि उस मिशनरी पर हजारों हिंदुओं को प्रताड़ित करने, उनकी हत्या करने और जबरन धर्मांतरण कराने के आरोप हैं। वहीं, भगवान राम और माता सीता का मजाक उड़ाने वाले इस्लामी कट्टरपंथी मशहूर हो जाते हैं और सतीश बौद्ध जैसे लोग हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करके खुद को ‘तर्कवादी’ और ‘सामाजिक न्याय का योद्धा’ कहलवाने लगते हैं।

सतीश बद्ध का भाषण सोशल मीडिया पर कोई खुद को ‘अंबेडकरवादी’ बताने वाले अकाउंट्स ने तेजी से शेयर किया। उनके हिंदू विरोधी बयानों वाले कई वीडियो वायरल होने के बाद हिंदुओं में भारी आक्रोश फैल गया। बड़ी संख्या में लोगों ने उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई और तुरंत गिरफ्तारी की माँग की है।

इसी क्रम में ‘एक्स’ पर एक यूजर ने लिखा,”नई दिल्ली के अशोकनगर में इस व्यक्ति ने हिंदू धर्म और हिंदू देवी-देवताओं का लगातार अपमान किया। इसने माता सीता, भगवान श्रीकृष्ण और महादेव का मजाक उड़ाया। इतना ही नहीं, वासुदेव के लिए भी बेहद आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। इसके बाद इस वीडियो को @BahujanDastakTV के सोशल मीडिया चैनलों पर शेयर किया गया। इन बयानों से हमारी धार्मिक भावनाओं को गहरी ठेस पहुँची है। मैं @DelhiPolice और @DCPSouthDelhi से आग्रह करता हूँ कि इस वक्ता, सोशल मीडिया हैंडल चलाने वालों और कार्यक्रम के आयोजकों के खिलाफ FIR दर्ज की जाए, क्योंकि ये लोग समाज में नफरत फैलाने और लोगों के बीच फूट डालने की कोशिश कर रहे हैं।”

साकेत ने लिखा, “अगर गोवा पुलिस मध्यकाल के एक पादरी के बारे में तथ्य साझा करने पर किसी व्यक्ति को उत्तराखंड से गिरफ्तार कर सकती है, तो फिर @DelhiPolice खुलेआम ईशनिंदा करने और समाज में वैमनस्य फैलाने की कोशिश करने वालों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई क्यों नहीं कर सकती?”

‘सवर्ण वॉइस’ नाम के एक यूजर ने लिखा, “दिल्ली के अशोकनगर में एक व्यक्ति ने @BahujanDastakTV के कार्यक्रम में माता सीता, भगवान श्रीकृष्ण, वासुदेव और महादेव का अपमान किया। इसके बाद इस पूरे वीडियो को गर्व के साथ अपने सोशल मीडिया चैनलों पर भी शेयर किया। यह कैसी समानता की बात है, जहाँ हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करके करोड़ों लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाई जाती है और फिर इसे सामाजिक न्याय का नाम दिया जाता है। मैं @DelhiPolice और @DCPSouthDelhi से माँग करता हूँ कि वक्ता, सोशळ मीडिया हैंडल चलाने वालों और कार्य़क्रम के आयोजकों के खिलाफ तुरंत FIR दर्ज की जाए। क्या धार्मिक भावनाएँ आहत होना केवल तब अपराध माना जाता है, जब मामला हिंदुओं से जुड़ा न हो? समाज में फूट डालने और नफरत फैलाने की इस कोशिश को तुरंत रोका जाना चाहिए।”

सतीश बौद्ध कौन है?

सतीश बौद्ध खुद को अंबेडकरवादी बौद्ध कार्यकर्ता और सार्वजनिक वक्ता बताता है। वह अंबेडकरवादी कार्यक्रमों में हिंदू विरोधी भाषण देने के लिए बदनाम है। उसके सोशल मीडिया अकाउंट्स पर हिंदू धर्म और उसकी आस्थाओं का मजाक उड़ाने वाले पोस्ट और वीडियो बड़ी संख्या में मौजूद हैं।

उनकी लिंक्डइन प्रोफाइल के मुताबिक, सतीश बौद्ध गाजियाबाद का रहने वाला है और खुद को एक ‘इंडिपेंडेंड कॉरपोरेट ट्रेनिंग कंसलटेंट’ बताता है। साल 2017 में सतीश ने एक मुस्लिम भीड़ को संबोधित करते हुए हिंदुओं, खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था। सतीश ने प्रधानमंत्री मोदी को ‘भगवा गुंडा’ कहा और भीड़ को भड़काने की कोशिश की। इतना ही नहीं, BJP पर हमला करते हुए सतीश ने EVM हैकिंग के आरोप भी लगाए और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल तक खड़े किए।

हाल ही में सतीश बौद्ध ने कई भ्रामक दावे किए। सतीश ने कहा कि मनुवादी पुरुष विधवाओं को जबरन अपने मृत पतियों की चिता पर बैठाकर ‘सती’ बनने के लिए मजबूर करते थे। इतना ही नहीं सतीश मध्यकाल में इस्लामी आक्रमणकारियों से अपनी इज्जत और धर्म की रक्षा के लिए हिंदू महिलाओं द्वारा किए गए ‘जौहर’ का भी मजाक उड़ाया।

हैरानी की बात नहीं है कि सतीश बौद्ध हिंदू विरोधी विचारों के लिए चर्चित ऐर पेरियार के नाम से प्रसिद्ध ईवी रामास्वामी नायकर का भी महिमामंडन करता है। ये वही पेरियार है, जो अपने अनुयायियों से कहते थे कि अगर रास्ते में कभी ब्राह्मण और साँप एक साथ मिल जाएँ, तो पहले ब्राह्मण को मारो।

सतीश बौद्ध की हालिया हिंदू विरोधी टिप्पणियों से भले ही व्यापक आक्रोश फैल गया हो, लेकिन यह पहली बार नहीं है। खुद को अंबेडकरवादी बताने वाला सतीश बौद्ध लंबे समय से अपने भाषणों और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए हिंदू देवी-देवताओं, धर्मग्रंथों और परंपराओं को निशाना बनाते रहे हैं। वह यह सब ‘तर्कवादी सोच’, सामाजिक न्याय और बौद्ध धर्म के प्रचार के नाम पर करता आया है।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

‘दूसरे बेटे को सड़क पर काटेंगे’: तरुण खटीक की जान लेने वाले जिहादी बना रहे केस वापस लेने का दबाव, पढ़ें पीड़ित परिवार की आपबीती

दिल्ली के उत्तम नगर में होली के दिन हुई तरुण खटीक की मॉब लिंचिंग अब एक नया रूप ले चुकी है। पीड़ित परिवार न्याय की लड़ाई लड़ रहा है तो वहीं आरोपित पक्ष ने घर में घुसकर जान से मारने की खुली धमकी दे दी है। इससे त्रस्त होकर तरुण का परिवार अब उत्तम नगर छोड़कर पलायन करने की तैयारी कर रहा है।

हालाँकि इस बीच दिल्ली हाईकोर्ट ने पीड़ित परिवार को सुरक्षा देने के लिए दिल्ली पुलिस को आदेशित किया है। साथ ही सोशल मीडिया से भड़काऊ वीडियो हटाने की बात कही है। इसे लेकर ऑपइंडिया ने पीड़ित परिवार से बातचीत कर उनका हाल जाना। मृतक तरुण खटीक के चाचा टेकचंद ने ऑपइंडिया को बताया कि बीते 13 अप्रैल को आरोपित परिवार की कुछ महिलाएँ उनके घर पहुँची थीं।

उस समय घर पर कोई मर्द मौजूद नहीं था। तरुण की माँ और अन्य महिलाएँ घर पर थी। जिन्हें आरोपी परिवार की महिलाओं ने जाति सूचक शब्द बोलते हुए तरह-तरह की गालियाँ दीं और फिर केस वापस न लेने पर दूसरे बेटे को भी बीच चौराहे पर ले जाकर जान से मारने की धमकी देकर चली गईं।

पलायन करने को मजबूर तरुण का परिवार

टेकचंद ने बताया कि इस धमकी के बाद से हमारा पूरा परिवार भयभीत है। अब हम इस मकान को बेचना चाहते हैं और यहाँ से पलायन करना चाहते हैं। इसके लिए हम एक बेहतर जगह की तलाश कर रहे हैं। जहा हम सुरक्षित रह सकें। हम नहीं चाहते कि परिवार के सामने फिर से कोई मुसीबत आए।

घर के सामने दिल्ली पुलिस की तैनाती पर टेकचन्द्र कहते हैं कि दिल्ली पुलिस भले ही हमारे यहाँ तैनात हो। हाल ही में एसीपी भी हमसे मिलने और बातचीत के लिए आए थे उन्होंने भी हमें सुरक्षा का भरोसा दिया था, लेकिन पुलिस हमारे पास या हमारी सुरक्षा में कब तक रहेगी? एक न एक दिन पुलिस यहाँ से जाएगी तो फिर हमारी रक्षा कौन करेगा? इसलिए हमारा यहाँ से जाना ही बेहतर है। हम यहाँ से पलायन करेंगे। टेकचन्द्र ने बताया कि आरोपित परिवार द्वारा दी गई धमकी को लेकर हमने दिल्ली पुलिस में शिकायत भी की है।

दिल्ली हाईकोर्ट का परिवार को सुरक्षा देने का आदेश

इस बीच दिल्ली हाई कोर्ट ने पीड़ित परिवार द्वारा लगाई गई याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली पुलिस को सुरक्षा मुहैया कराने का आदेश दिया है। साथ ही सोशल मीडिया से भड़काऊ वीडियो हटाने का भी आदेश दिया है। हाई कोर्ट ने पुलिस आयुक्त से कहा है कि वह संबंधित एसएचओ से कहें कि पीड़ित परिवार को वह अपना पर्सनल नंबर दें ताकि किसी भी स्थिति में पीड़ित परिवार मदद के लिए उनसे संपर्क कर सके।

आपको बता दें कि 5 मार्च होली के दिन दिल्ली के उत्तम नगर में रहने वाले तरुण खटीक की देर शाम घर लौटते समय मुस्लिमों की भीड़ ने मॉब लिंचिंग कर दी थी। विवाद सिर्फ इतना था कि तरुण के परिवार की एक बच्ची जो कि छत पर होली खेल रही थी जिससे एक पानी भरा गुब्बारा नीचे गिर गया था उसकी कुछ छींटे पड़ोस में रहने वाली मुस्लिम महिला के पैरों तक चले गए थे। इसी बात को लेकर दोनों पक्षों में कहासुनी हुई और फिर पहले से तैयार बैठी जिहादियों की भीड़ ने घर लौट रहे 22 वर्षीय तरुण पर हमला बोल दिया और उसे पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया।

इस घटना के इलाके में तनाव पैदा हो गया और गुस्साए लोगों ने आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया। यहाँ तक कि उत्तम नगर में आयोजित विराट आक्रोश सभा में पहुँचे हजारों हिंदुओं ने मुसलमानों को ईद नहीं मनाने देने की चेतावनी दी थी। इसके बाद और भी माहौल बिगड़ गया। हालाँकि पुलिस प्रशासन ने सभी आरोपितों की गिरफ्तारी करके और आरोपितों के घर बुलडोजर एक्शन लेकर हिंदुओं को गुस्से को शांत करने की कोशिश की थी।

BJP उम्मीदवारों पर हमला, सुरक्षाबलों पर निशाना और वोटरों को रोकने की कोशिश: बंगाल विधानसभा चुनाव में TMC की ‘लुंगी वाहिनी’ का आतंक, पढ़ें- हिंसा के 9 मामले

पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव में हार की आशंका से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) बौखलाई हुई नजर आ रही है। इसी के चलते पहले चरण के मतदान के दौरान राज्य में हिंसा, डर और अराजकता फैलाने की कोशिशें सामने आईं।

आरोप है कि मतदाताओं को वोट डालने से रोकने और सरकार के खिलाफ माहौल बनने से बचाने के लिए TMC के गुंडों ने कई जगहों पर हिंसा और दबाव का सहारा लिया। गुरुवार (23 अप्रैल 2026) को हिंसा के कई ऐसे मामले सामने आए थे।

पूर्व मेदिनीपुर जिले के मोयना विधानसभा क्षेत्र में TMC उम्मीदवार चंदन मंडल आम लोगों को प्रभावित करने की कोशिश करते नजर आए। इस पर स्थानीय लोग विरोध में सामने आए, नारेबाजी की और उन्हें वहाँ से खदेड़ दिया।

रानीनगर में TMC के गुंडों ने लोगों को वोट डालने से रोका

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, TMC के गुंडों ने रानीनगर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले बूथ नंबर 54 पर मतदाताओं को वोट डालने से रोक दिया। लोगों की शिकायत के बाद, पुलिस और सुरक्षा बलों ने नाराज मतदाताओं से मुलाकात की और उन्हें मतदान केंद्र तक पहुँचाया।

कुमारगंज में भाजपा उम्मीदवार को मारा घूँसा, पोलिंग एजेंट को बूथ में प्रवेश करने से रोका

पहले चरण के मतदान के दौरान कुमारगंज विधानसभा क्षेत्र में TMC के गुंडों ने आम लोगों के रूप में सामने आकर बीजेपी उम्मीदवार के साथ मारपीट की। एक वायरल वीडियो में देखा गया कि पुलिस की मौजूदगी में ही उन्हें घूँसे मारे गए। पीड़ित बचने की कोशिश करता रहा लेकिन पुलिस ने हमलावरों को रोकने के लिए कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।

इसी क्षेत्र में TMC के लोगों ने बीजेपी के पोलिंग एजेंट को बूथ में प्रवेश करने से भी रोका जिसके बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं ने उन्हें खदेड़ दिया।

उसी निर्वाचन क्षेत्र में TMC के गुंडों ने भाजपा के मतदान प्रतिनिधि को बूथ में प्रवेश करने से रोक दिया। बाद में भाजपा कार्यकर्ताओं ने उन्हें खदेड़ दिया।

मुर्शिदाबाद में TMC के गुंडों ने जाम की सड़क

अपनी ताकत का प्रदर्शन करने और मतदाताओं को डराने के मकसद से TMC के गुंडे मुर्शिदाबाद की सड़कों पर उतर आए और यातायात बाधित कर दिया। हालाँकि, इलाके में तैनात पुलिस बलों ने उन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन वे TMC का झंडा लहराते हुए अराजकता फैलाते रहे।

TMC और AJUP के बीच झड़प

मुर्शिदाबाद जिले के नाओदा विधानसभा क्षेत्र में सत्ताधारी TMC के सदस्यों और पूर्व TMC विधायक हुमायूं कबीर के समर्थकों के बीच भीषण झड़प हुई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के प्रमुख कबीर को TMC के कार्यकर्ताओं ने रोका।

इसके चलते TMC सदस्यों और AJUP कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़प हुई। लाठी-पत्थरों से लैस होकर दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर जमकर हमला किया। एक वीडियो में हुमायूं कबीर को TMC कार्यकर्ताओं को ‘वेश्या का बेटा’ कहकर गाली देते और उनकी माँओं के साथ दुष्कर्म करने की धमकी देते हुए सुना गया।

‘लुंगी वाहिनी’ का पुलिस और केंद्रीय बलों पर हमला

गुरुवार (23 अप्रैल 2026) को ममता बनर्जी की ‘लुंगी वाहिनी’ ने पश्चिम बंगाल पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) के जवानों पर हमला किया। यह घटना बीरभूम जिले के दुबराजपुर विधानसभा क्षेत्र में घटी।

सामने आए वीडियो में भीड़ को ईंट-पत्थर फेंकते हुए देखा जा सकता है, जबकि सुरक्षा बल जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे हैं। उन्होंने एक पुलिस वाहन की विंडशील्ड को भी तोड़ दिया।

लाभपुर में बीजेपी उम्मीदवार और पोलिंग एजेंट पर हमला

पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के लाबपुर विधानसभा क्षेत्र में भी हिंसा की खबर सामने आईं। सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो में TMC के ‘गुंडे’ भाजपा के उम्मीदवार की गाड़ी पर हमला करते नजर आए। उन्होंने मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों को पकड़ा और गाड़ी पर लात-घूँसे बरसाए। बेकाबू भीड़ ने गाड़ी का पिछला शीशा तोड़ दिया जबकि पुलिस उन्हें काबू करने में नाकाम रही।

बाद में यह बात सामने आई कि TMC के गुंडों ने भाजपा के मतदान एजेंट पर बेरहमी से हमला किया और उसे खून से लथपथ हालत में छोड़ दिया।

कूचबिहार में बूथ कैप्चरिंग की कोशिश

कूच बिहार के तुफानगंज निर्वाचन क्षेत्र में बूथ जैमिंग की खबरें सामने आईं। केंद्रीय बलों ने तुरंत कार्रवाई करते हुए उनकी योजना को विफल कर उन्हें खदेड़ दिया। इस घटना का वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

आसनसोल में बीजेपी नेता की गाड़ी पर हमला

गुरुवार (23 अप्रैल 2026) को पश्चिम बंगाल के आसनसोल शहर में सत्तारूढ़ TMC के गुंडों ने भाजपा उम्मीदवार अग्निमित्रा पॉल की कार पर हमला किया। उन्होंने उनकी गाड़ी पर पत्थर और ईंटें फेंकीं, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गईं। हालाँकि, भाजपा नेता बाल-बाल बच गईं। बाद में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई और मामले की जाँच शुरू कर दी गई।

ममता सरकार और उनकी ‘लुंगी वाहिनी’ द्वारा मतदाताओं को डराने-धमकाने, उन पर दबाव डालने और हिंसा और धमकियों के माध्यम से उन्हें प्रभावित करने के तमाम प्रयासों के बावजूद, पश्चिम बंगाल के लोग भारी संख्या में अपने लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग करने के लिए निकले।