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जंतर-मंतर पर CJP के प्रदर्शन में पत्रकारों से बदसलूकी और धक्का-मुक्की, रिपोर्टरों को घेरकर लगाए ‘गोदी मीडिया’ के नारे: महिला पत्रकारों पर की अभद्र टिप्पणियाँ, पढ़ें 7 मामले

नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर शनिवार (6 जून 2026) को कॉकक्रोच जनता पार्टी (CJP) का बहुप्रचारित प्रदर्शन आयोजित किया गया। सोशल मीडिया पर इस प्रदर्शन को लेकर काफी चर्चा और प्रचार हुआ था।

ऐसे में उम्मीद की जा रही थी कि CJP के लाखों ऑनलाइन समर्थकों में से कम से कम हजारों लोग प्रदर्शन में शामिल होंगे। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही निकली।

प्रदर्शन में लोगों की संख्या काफी कम रही और यह आयोजन लगभग फ्लॉप साबित हुआ। हालात ऐसे थे कि प्रदर्शनकारियों से ज्यादा संख्या में मीडिया कर्मी और पुलिसकर्मी मौके पर मौजूद नजर आए।

दिलचस्प बात यह रही कि प्रदर्शन में शामिल कई समर्थकों को खुद यह स्पष्ट नहीं था कि प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य और एजेंडा क्या है। CJP की ओर से कहा गया था कि यह प्रदर्शन हाल के NEET और CBSE परीक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार, खासकर शिक्षा मंत्री के खिलाफ आयोजित किया जा रहा है। लेकिन प्रदर्शन के दौरान ‘आजादी-आजादी’ जैसे नारे भी लगाए गए।

जब कुछ पत्रकारों ने प्रदर्शनकारियों से उनकी माँगों और एजेंडे के बारे में बात करने की कोशिश की और इन नारों को लेकर सवाल पूछे, तो उन्हें विरोध और बदसलूकी का सामना करना पड़ा। कई प्रदर्शनकारियों ने पत्रकारों को घेर लिया, धक्का-मुक्की की और उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश की, जबकि वे केवल अपनी पेशेवर जिम्मेदारी निभा रहे थे।

ओपइंडिया के पत्रकार अनुराग मिश्रा के साथ भी ऐसा ही हुआ। जब उन्होंने प्रदर्शन में मौजूद CJP समर्थकों से उनकी माँगों के बारे में बात करने की कोशिश की, तो कई समर्थकों ने उन्हें घेर लिया और ‘गोदी मीडिया’ के नारे लगाने शुरू कर दिए।

अनुराग मिश्रा ने केवल इतना सवाल पूछा था कि सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स होने के बावजूद प्रदर्शन स्थल पर लोगों की संख्या इतनी कम क्यों है। लेकिन यह सवाल सुनते ही कई समर्थक नाराज हो गए और उन्होंने पत्रकार को घेरकर शोर-शराबा करना शुरू कर दिया तथा उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश की।

हालाँकि अनुराग मिश्रा अकेले पत्रकार नहीं थे जिन्हें प्रदर्शन स्थल पर CJP समर्थकों के आक्रामक व्यवहार का सामना करना पड़ा। जी न्यूज के एक पत्रकार के साथ भी ऐसी ही घटना हुई।

ज़ी न्यूज के पत्रकार प्रदर्शन की कवरेज कर रहे थे, तभी कई CJP समर्थक उनकी ओर बढ़े और ‘गोदी मीडिया’ के नारे लगाने लगे। देखते ही देखते माहौल तनावपूर्ण हो गया। स्थिति बिगड़ती देख मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने हस्तक्षेप किया और पत्रकार को वहां से सुरक्षित बाहर निकाला।

प्रदर्शन की कवरेज कर रहीं कुछ महिला पत्रकारों को भी CJP समर्थकों के उत्पीड़न और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में देखा जा सकता है कि कुछ CJP समर्थकों ने एक महिला पत्रकार को चारों तरफ से घेर लिया। इस दौरान वे जोर-जोर से नारेबाजी कर रहे थे और पत्रकार गंदे-गंदे इशारे भी कर रहे थे।

वीडियो सामने आने के बाद पत्रकारों की सुरक्षा और प्रदर्शन के दौरान उनके साथ हुए व्यवहार को लेकर सवाल उठने लगे हैं। आलोचकों का कहना है कि अपनी बात रखने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की माँग करने वाले लोगों को पत्रकारों के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं करना चाहिए।

एक अन्य महिला पत्रकार को भी प्रदर्शन के दौरान CJP समर्थकों के निशाने पर आना पड़ा। जब वह मौके से रिपोर्टिंग करने की कोशिश कर रही थीं, तब कुछ प्रदर्शनकारियों ने उन्हें घेरकर हूटिंग शुरू कर दी और उन पर सरकार का एजेंट होने का आरोप लगाने लगे।

इस दौरान एक प्रदर्शनकारी ने तंज कसते हुए कहा, “मोदी ने इसे 500 रुपए का नोट पकड़ा दिया होगा।” वहीं आसपास मौजूद अन्य समर्थक लगातार नारेबाजी करते रहे। महिला पत्रकार के सवाल पूछने और कवरेज करने के दौरान माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया और उन्हें भी विरोध तथा अभद्र टिप्पणियों का सामना करना पड़ा।

इसी तरह न्यूज24 के एक पत्रकार को भी प्रदर्शन के दौरान CJP समर्थकों के विरोध और धक्का-मुक्की का सामना करना पड़ा। पत्रकार प्रदर्शनकारियों से उनकी माँगों और प्रदर्शन के उद्देश्य को लेकर सवाल पूछने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन कुछ समर्थकों ने उन्हें घेर लिया और लगातार नारेबाजी शुरू कर दी।

पत्रकार ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत कर स्थिति समझाने और सवालों के जवाब लेने की कोशिश की, लेकिन प्रदर्शनकारी उनकी बात सुनने के बजाय शेम-शेम और गोदी मीडिया वापस जाओ जैसे नारे लगाते रहे। इस दौरान पत्रकार को लगातार घेरकर परेशान किया गया, जिससे मौके पर तनावपूर्ण माहौल बन गया।

एक अन्य घटना में ABP न्यूज के एक पत्रकार को भी CJP समर्थकों के आक्रामक व्यवहार का सामना करना पड़ा। जब पत्रकार प्रदर्शनकारियों से बात करने और उनकी माँगों को समझने की कोशिश कर रहे थे, तब कुछ समर्थकों ने उनके साथ धक्का-मुक्की की और उन्हें घेरकर परेशान करना शुरू कर दिया।

हालांकि इस दौरान पत्रकार ने काफी संयम बनाए रखा। प्रदर्शनकारी लगातार आक्रामक अंदाज में नारेबाजी कर रहे थे और माहौल को उग्र बनाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन पत्रकार ने शांत रहते हुए अपनी रिपोर्टिंग जारी रखने का प्रयास किया। इसके बावजूद उन्हें धक्का देने और रास्ता रोकने जैसी हरकतों का सामना करना पड़ा।

प्रदर्शन की कवरेज करने पहुंचे पत्रकारों के साथ हुई इन घटनाओं ने CJP नेताओं के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। CJP की ओर से इस पूरे अभियान और प्रदर्शन को अपनी आवाज उठाने तथा सरकार तक अपनी बात पहुँचाने की कोशिश बताया गया था। लेकिन प्रदर्शन स्थल पर पत्रकारों के साथ हुए व्यवहार को लेकर आलोचक इसे विरोधाभास बता रहे हैं।

एक तरफ CJP और उसके नेता सरकार से सवाल पूछने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उदार मूल्यों की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रदर्शन के दौरान कई पत्रकारों को सवाल पूछने पर विरोध, बदसलूकी, डराने-धमकाने और नारेबाजी का सामना करना पड़ा।

आलोचकों का कहना है कि यदि कोई आंदोलन संवाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करता है, तो उसे अपने बारे में पूछे जाने वाले सवालों का भी लोकतांत्रिक तरीके से जवाब देना चाहिए।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

कोई साड़ियों में छिपा, किसी के घर में मिला तिरपाल का ढेर: बंगाल में TMC के काली करतूतों पर भड़की जनता बना रही नेताओं को निशाना, सड़क से लेकर कोर्ट तक कर रही पिटाई; पढ़ें 6 मामले

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार बनने के बाद से तृणमूल कॉन्ग्रेस पार्टी (TMC) का ‘जंगलराज’ सामने आ रहा है। TMC के काले कारनामे सामने आने के बाद जनता का गुस्सा भी फूट रहा है। ऐसा गुस्सा कि कहीं TMC नेता पर अंडे फेंके जा रहे हैं, तो कहीं जनता के गुस्से से बचने के लिए नेता साड़ियों के ढेर में छिपे हुए हैं।

एक मामले में उत्तर 24 परगना जिले के कमरहाटी में TMC विधायक मदन मित्रा की कार को घेरकर लोगों ने अंडे और ईंटे फेंकी गई। ऐसे ही कोलकाता नगर निगम में पार्षद बप्पादित्य दासगुप्ता पर कोर्ट में पेशी के दौरान अंडे फेंके गए। दासगुप्ता को जबरन वसूली के आरोप में शनिवार (06 जून 2026) को गिरफ्तार किया गया था।

एक अन्य मामले में हावड़ा जिले के TMC नेता ब्रह्मानंद चक्रवर्ती का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वह साड़ियों के ढेर के भीतर छिपे हुए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, चक्रवर्ती पर सरकारी योजना के नाम पर लोगों से कटमनी लेने के आरोप हैं। पुलिस के डर से वह साड़ियों के ढेर में छिप गए। हालाँकि, इसके बावजूद पुलिस चक्रवर्ती को ढूँढकर अपने साथ गिरफ्तार करके ले गई।

उधर, TMC नेता के बंद घर का ताला तोड़कर स्थानीय लोगों ने जमा करके रखे गए लगभग 50 हजार तिरपाल बरामद किए। यह सरकारी राहत सामग्री जनता को पहुँचानी थी, लेकिन TMC नेताओं ने अपनी संपत्ति समझकर रखी हुई थी। इसका वीडियो भी सामने आया है, जिसमें एक घर में फर्श से छत तक केवल तिरपाल के ढेर नजर आ रहे हैं। बताया गया कि यह बंद घर TMC नेता राजू बाग और उनके भाई बीजू बाग का है। बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद से ही दोनों भाई फरार चल रहे हैं।

यह कोई गिनी-चुनी घटनाएँ नहीं हैं। इससे पहले भी कई मामले सामने आए हैं। जहाँ कटमनी का पैसा खाकर बैठे TMC नेता कहीं बिस्तर के नीचे छिपे पाए गए, तो कहीं लोगों ने गुस्से में आकर TMC नेता के करीबी को ही कूट दिया। इसके अलावा TMC नेता पर रिश्वत और जमाखोरी के मामलों में भी लगातार शिकंजा कसा जा रहा है।

K9 Vajra, जोरावर टैंक और न्यूक्लियर जेनरेटर… PM मोदी ने किया हजीरा के डिफेंस प्लांट का दौरा: जानें ये जगह भारत के लिए क्यों है महत्वपूर्ण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (5 जून 2026) को गुजरात के हजीरा स्थित लार्सन एंड टुब्रो (L&T) के  मैन्युफैक्चरिंग प्लांट का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने देश की रक्षा और रणनीतिक विनिर्माण क्षमता को मजबूत करने में भारतीय उद्योगों की बढ़ती भूमिका के बारे में बताया। यह दौरा उनके गुजरात दौरे का हिस्सा था और लगभग सात साल बाद उनका इस प्लांट का पहला दौरा था।

दौरे के दौरान प्रधानमंत्री ने हजीरा परिसर में विकसित की जा रही कई स्वदेशी तकनीकों और रक्षा प्लेटफॉर्मों का निरीक्षण किया। यह प्लांट आज भारत के सबसे महत्वपूर्ण भारी इंजीनियरिंग, रक्षा उत्पादन और रणनीतिक औद्योगिक निर्माण केंद्रों में शामिल हो चुका है।

प्रधानमंत्री ने कई घंटे प्लांट में बिताए और अधिकारियों से बातचीत करते हुए वहाँ तैयार हो रहे अत्याधुनिक उपकरणों और प्रणालियों को करीब से देखा।

PM मोदी ने शेयर की तस्वीरें

दौरे के कुछ ही समय बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर तस्वीरें और जानकारी साझा की। उन्होंने भारत को आत्मनिर्भर बनाने में L&T की भूमिका की सराहना की।

प्रधानमंत्री ने लिखा, “आज दोपहर मैं हजीरा स्थित L&T परिसर गया। वहाँ विभिन्न क्षेत्रों में विकसित की जा रही कई नई और महत्वपूर्ण तकनीकों को देखा। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को आगे बढ़ाने में L&T की भूमिका सराहनीय है।”

प्रधानमंत्री द्वारा साझा की गई तस्वीरों में एक तस्वीर ने सोशल मीडिया पर खास ध्यान खींचा। इस तस्वीर में वह हजीरा प्लांट में बने एक विशाल न्यूक्लियर स्टीम जनरेटर के पास खड़े दिखाई दे रहे थे।

यह तस्वीर इसलिए चर्चा में आई क्योंकि ऐसे स्टीम जनरेटर भारतीय उद्योग द्वारा बनाए जाने वाले सबसे जटिल और उन्नत उपकरणों में गिने जाते हैं और देश के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

क्या होता है 700 मेगावाट का न्यूक्लियर स्टीम जनरेटर?

प्रधानमंत्री द्वारा साझा की गई तस्वीर में दिखा स्टीम जनरेटर भारत की परमाणु विनिर्माण यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है। L&T ने वर्ष 2022 में हजीरा प्लांट में पहला स्वदेशी 700 मेगावाट न्यूक्लियर स्टीम जनरेटर तैयार किया था।

न्यूक्लियर स्टीम जनरेटर एक विशाल हीट एक्सचेंजर होता है, जिसका इस्तेमाल परमाणु ऊर्जा प्लांट्स में किया जाता है। इसका मुख्य काम परमाणु रिएक्टर में पैदा होने वाली गर्मी को भाप में बदलना होता है, जिससे बिजली बनाई जाती है।

रिएक्टर के कोर में अत्यधिक गर्मी पैदा होती है। इस गर्मी को कूलेंट सिस्टम के जरिए स्टीम जनरेटर तक पहुँचाया जाता है। यहाँ यह गर्मी दूसरे सर्किट के पानी को दी जाती है, जिससे वह उच्च दबाव वाली भाप में बदल जाता है।

यही भाप बड़े टरबाइनों को चलाती है और टरबाइन जनरेटर के माध्यम से बिजली पैदा करती है। यदि स्टीम जनरेटर न हो तो परमाणु रिएक्टर में उत्पन्न गर्मी को प्रभावी तरीके से बिजली में नहीं बदला जा सकता।

हजीरा में तैयार किए जा रहे ये स्टीम जनरेटर भारत के स्वदेशी 700 मेगावाट प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWR) के लिए बनाए गए हैं। भविष्य में भारत के परमाणु ऊर्जा विस्तार की योजनाओं में इन रिएक्टरों की अहम भूमिका होगी।

भारत के लिए यह निर्माण क्षमता क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत में ही इतने बड़े और मुश्किल परमाणु उपकरण बनाने की क्षमता कई कारणों से रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है।

पहला, इससे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में सरकार की पहल को मजबूती मिलती है और महत्वपूर्ण परमाणु उपकरणों के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम होती है।

दूसरा, इससे भारत नए परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का निर्माण तेजी से कर सकता है और आयात या वैश्विक सप्लाई चेन में आने वाली बाधाओं से बच सकता है।

तीसरा, ऐसे उपकरणों का देश में निर्माण होने से उन्नत इंजीनियरिंग विशेषज्ञता विकसित होती है और हजारों कुशल रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।

भारत ने आने वाले दशकों में अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। बढ़ती बिजली माँग को पूरा करने और कार्बन उत्सर्जन कम करने की रणनीति में परमाणु ऊर्जा को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

फिलहाल न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) देश के कई हिस्सों में स्वदेशी डिजाइन वाले 700 मेगावाट रिएक्टरों का निर्माण कर रहा है। इन परियोजनाओं के लिए L&T और BHEL जैसी कंपनियों द्वारा बनाए जा रहे स्टीम जनरेटर बेहद महत्वपूर्ण हैं।

L&T की हेवी इंजीनियरिंग इकाई पहले ही NPCIL की कई परियोजनाओं के लिए निर्धारित समय से पहले कई 700 मेगावाट स्टीम जनरेटर भेज चुकी है। कंपनी इनका निर्माण हजीरा और वडोदरा स्थित अपने आधुनिक संयंत्रों में करती है।

भारत के परमाणु विस्तार को मिल रहा समर्थन

प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के दौरान चर्चा में आया यह स्टीम जनरेटर भारत की दीर्घकालिक परमाणु ऊर्जा योजनाओं का हिस्सा है। NPCIL के अनुसार, इन उपकरणों का सफल निर्माण और समय पर आपूर्ति भारत को वर्ष 2047 तक परमाणु ऊर्जा उत्पादन में बड़ा विस्तार करने के लक्ष्य को हासिल करने में मदद करेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे अत्याधुनिक परमाणु उपकरणों का स्वदेशी निर्माण भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में खड़ा करता है जिनके पास उन्नत परमाणु विनिर्माण क्षमता मौजूद है।

दौरे में रक्षा उपकरणों ने भी खींचा ध्यान

हालाँकि न्यूक्लियर स्टीम जनरेटर सबसे ज्यादा चर्चा में रहा लेकिन प्रधानमंत्री ने इसके अलावा भी कई महत्वपूर्ण रक्षा प्रणालियों का निरीक्षण किया। हजीरा प्लांट  भारत में निजी क्षेत्र द्वारा चलाया जा रहा ट्रैक्ड आर्मर्ड वाहनों का सबसे बड़ा निर्माण केंद्र माना जाता है।

भारतीय सेना के लिए K-9 वज्र स्वचालित तोप प्रणाली के निर्माण में इसकी बड़ी भूमिका रही है। L&T अब तक भारतीय सेना को 100 K-9 वज्र तोपें सौंप चुकी है। इनमें से कई तोपें पूर्वी लद्दाख में लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) के पास तैनात हैं। सरकार ने 100 अतिरिक्त K-9 वज्र तोपों की खरीद को भी मंजूरी दे दी है।

हजीरा प्लांट तब भी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था जब यहाँ स्वदेशी जोरावर लाइट टैंक को पहली बार पेश किया गया था। केवल 19 महीनों में विकसित इस टैंक को विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्रों में ऊँचाई वाले इलाकों में युद्ध के लिए डिजाइन किया गया है और वर्तमान में इसका परीक्षण चल रहा है।

इसके अलावा, भारतीय सेना की फ्यूचरिस्टिक इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल (FICV) परियोजना में भी L&T की महत्वपूर्ण भागीदारी है। इस परियोजना का उद्देश्य सेना के पुराने BMP-2 वाहनों की जगह नए आधुनिक वाहन लाना है।

प्रधानमंत्री मोदी का हजीरा दौरा इस बात का संकेत है कि भारत का औद्योगिक ढाँचा अब देश की रक्षा जरूरतों और महत्वपूर्ण ऊर्जा अवसंरचना को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभा रहा है।

उन्नत तोप प्रणालियों, स्वदेशी टैंकों और अत्याधुनिक न्यूक्लियर स्टीम जनरेटर जैसे उपकरणों का निर्माण करने वाला हजीरा प्लांट उन क्षेत्रों में भारत की आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन चुका है, जहाँ कभी देश को बड़े पैमाने पर विदेशी तकनीक और आयात पर निर्भर रहना पड़ता था।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

2 दिन मॉर्चरी में रहा मुस्लिम से निकाह करने वाली पारसी महिला का शव: मुस्लिम-पारसी दोनों ने जमीन देने से किया मना, हिंदुओं ने दी विदाई; जानें- बेदखली के नियम

मुस्लिम से निकाह करने वाली गुजरात की एक पारसी महिला का शव इसलिए दो दिनों तक अंतिम संस्कार की बाट जोहता रहा, क्योंकि उसे सुपुर्द ए खाक किए जाने की अनुमति नहीं मिली। शौहर ने कुछ मौलवियों से संपर्क किया। निकाह के बावजूद इस्लामिक रीति से उसे सुपुर्दे खाक करने की इजाजत नहीं दी गई। शौहर के जिंदा रहते भी नहीं। दूसरी तरफ पारसी समुदाय अडा रहा। समाज के मुताबिक अंतिम संस्कार करने की इजाजत नहीं दी गई। आखिर में सनातन रीति रिवाज से महिला का अंतिम संस्कार किया गया।

हिन्दू धर्म अपनी सहनशीलता और दूसरों को अपने में समाहित करने की प्रवृति के लिए जाना जाता है। सनातनियों की इसी खासियत ने सैकड़ों सालों तक आक्रांताओं की कोशिशों के बावजूद इसे जिंदा रखा है। यही सद्भावना और विशालतापूर्व सनातन धर्म ने महिला को गौरवपूर्ण अंतिम विदाई दी।

क्या है पूरा मामला

मुस्लिम से निकाह करने वाली पारसी समुदाय की एक 55 साल की महिला की मौत के बाद अंतिम संस्कार के लिए दो दिन तक उसके शव मॉर्चरी में ही रखा रहा। उसे न तो इस्लामिक तरीके से सुपुर्द ए खाक किया जा रहा था और न ही पारसी समुदाय अपने तरीके से अंतिम संस्कार कर रहा था। ये घटना गुजरात के नवसारी की है, जहाँ शुक्रवार (5 जून 2026) को पारसी महिला के शव को नवसारी के वेरावल इलाके में स्थित श्मशान घाट ले जाया गया। पारसी महिला के कुछ करीबी सदस्यों और उनके शौहर के कई करीबी रिश्तेदारों ने अंतिम संस्कार में भाग लिया।

द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, पैंतीस साल पहले नवसारी की पारसी छात्रा ने प्रोफेसर निसार अहमद से निकाह किया था। प्रोफेसर निसार अहमद की मुलाकात छात्रा से तब हुई जब वह गुजराती भाषा में बैचलर कर रही थी। प्रोफेसर वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय से संबद्ध एक स्थानीय कॉलेज में पढ़ाते थे।

दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं। छात्रा ने अपने परिवार से कहा कि वह उस आदमी से शादी करना चाहती है जो उससे 15 साल बड़ा था। महिला के पिता एक निजी फर्म में काम करते थे, जबकि उसकी माँ नवसारी में एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका थीं। परिवार की नाराजगी के बीच पारसी छात्रा ने प्रोफेसर अहमद से निकाह कर लिया।

पारसी समाज ने उस छात्रा को अपने समुदाय से बाहर कर दिया और परिवार ने भी उससे रिश्ता तोड़ लिया। महिला को पारसी समुदाय के किसी भी सामाजिक समारोह में भाग लेने की अनुमति नहीं थी। माता-पिता ने लगभग 10 वर्षों तक उससे दूरी बनाए रखी, लेकिन बाद में मान गए।

लेकिन परिवार के करीबी सदस्य के मुताबिक, कुछ साल पहले उन्हें अपने बड़े भाई और छोटी बहन की शादियों में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई थी।

कहा जाता है कि उसने इस्लाम नहीं कबूला था और जोरोस्ट्रियन धर्म को मानती थी। दंपति के कोई बच्चे नहीं हैं। हाल ही में वह बीमार पड़ गई और पारसी लोगों के हॉस्पिटल में कई दिनों तक इलाज के बाद 4 जून को उसकी मौत हो गई।

शौहर ने पारसी समुदाय से संपर्क किया, लेकिन अंतिम संस्कार की इजाजत नहीं मिला। उसने मौलवियों से पूछा, लेकिन मौलवी अड़ गए। इस्लाम जो धर्मांतरण के लिए बदनाम है। छल प्रपंच कर महिलाओं को प्रेम जाल में फँसाने और उसपर धर्मांतरण कर निकाह करने का दबाव डालने से जुड़ी खबरें रोज अखबारों की सुर्खियाँ बनती हैं, उससे जुड़े मौलवियों ने महिला की मौत का ‘सम्मान’ नहीं किया।

महिला की रिश्तेदार के मुताबिक, प्रोफेसर ने एक मुस्लिम कब्रिस्तान के रखवालों से संपर्क किया, जिन्होंने उन्हें इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार शव को दफनाने की अनुमति देने से भी इनकार कर दिया। परिवारवाले काफी परेशान थे, क्योंकि शव दो दिनों तक अस्पताल के मुर्दाघर में पड़ा रहा। महिला के माता-पिता इस दुनिया में नहीं रहे। उसके भाई और छोटी बहन को उसकी मृत्यु की सूचना दी गई, तो वे भी आ गए।

मृतक महिला की बहन ने कहा, “कोई रास्ता न देखकर नवसारी के समाजसेवी और विश्व हिन्दू परिषद के नेता साजन भरवाड से मदद माँगी। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि यदि हम सभी सहमत हों, तो वे शव का अंतिम संस्कार कर देंगे… जिस पर हम सभी सहमत हो गए।”

दरअसल पारसी यानी जोरोएस्ट्रियन समुदाय भारत के सबसे छोटे और सबसे पुराने धार्मिक समुदायों में से एक है। उनके कई सामाजिकऔर धार्मिक नियम सदियों पुराने हैं, जिनका उद्देश्य अपनी अलग धार्मिक पहचान और परंपराओं को सुरक्षित रखना है। समय के साथ इसमें कोई बदलाव नहीं आया है।

आज भी महिला के बिरादरी से अलग शादी करते ही सारे अथिकार खत्म कर दिए जाते हैं। न तो वह अग्निमंदिर जैसे पूजा स्थल जा सकती है और न ही सामाजिक कार्यक्रम में हिस्सा ले सकती है।

भारत में कैसे आए पारसी

लोकप्रिय पारसी परंपरा के अनुसार, फारस यानी ईरान में इस्लामी विजय के बाद धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए पारसी शरणार्थी के रूप में 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच भारत के पश्चिमी तट खासकर गुजरात में आए थे। ‘किस्सा-ए-संजान’ नामक पारसी परंपरा के मुताबिक, स्थानीय राजा जादी राणा ने उन्हें बसने की अनुमति दी थी।

कथा के अनुसार, पारसियों ने वचन दिया था कि वे स्थानीय समाज में शांतिपूर्वक रहेंगे, स्थानीय भाषा अपनाएँगे और अपनी पहचान बनाए रखते हुए समाज में घुल-मिल जाएँगे। यह ऐतिहासिक परंपरा पारसी समुदाय की सामूहिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

क्यों कम होते जा रहे हैं पारसी

पारसियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि 1941 में देश में एक लाख 14 हजार से अधिक पारसी थे, जो 2011 की जनगणना में घटकर 57 हजार रह गए। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 के तहत अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी में गिरावट को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने कई पहल की है। उन्होंने कहा कि जियो पारसी योजना शुरू की गई है, जिसका उद्देश्य पारसी समुदाय में विवाह, परिवार और बच्चों के जन्म को प्रोत्साहित देना है।

पारसी समुदाय की प्रजनन दर भारत के लगभग सभी बड़े समुदायों से काफी कम है। बड़ी संख्या में युवा पारसी विवाह नहीं करते या काफी देर से करते हैं। बूढों की आबादी ज्यादा हो गई है। मृत्यु दर जन्म दर से ज्यादा है। दूसरे धर्म में विवाह को लेकर नियम काफी सख्त हैं। अगर कोई महिला दूसरे धर्म में विवाह करती है तो उसकी धार्मिक पहचान खत्म कर दी जाती है। यहाँ तक कि बच्चों के धार्मिक पहचान पर भी विवाद रहता है। भारत से बड़ी संख्या में पारसी विदेशों में जाकर बस गए हैं। ये भी उनकी संख्या कम होने की बड़ी वजह है।

मोदी सरकार के बड़े फैसलों से भारत में आएगी ₹6 लाख करोड़ की FDI, ग्लोबल एग्रीगेट बॉन्ड इंडेक्स में एंट्री की तैयारी: समझें किन कदमों से बदले हालात

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में शनिवार (6 जून 2026) को आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) की बैठक हुई। बैठक में चर्चा हुई कि केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा 5 जून को उठाए गए कदमों से भारत में करीब 70 अरब डॉलर (लगभग 6 लाख करोड़ रुपए) का विदेशी निवेश आ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन फैसलों से विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा और भारत में पूँजी प्रवाह तेज होगा। इससे देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, सरकार की उधारी लागत कम हो सकती है और वैश्विक वित्तीय बाजारों में भारत की स्थिति और बेहतर होगी।

बैठक में वैश्विक अस्थिरता के दौर में भारत की आर्थिक वृद्धि को गति देने, दीर्घकालिक विकास प्राथमिकताओं और सुधारों को आगे बढ़ाने पर विचार-विमर्श किया गया। बैठक में प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव पीके मिश्रा, प्रधान सचिव और पूर्व RBI गवर्नर शक्तिकांत दास, परिषद के अध्यक्ष एस महेंद्र देव सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।

बैठक के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि भारत के आर्थिक परिवर्तन, दीर्घकालिक विकास और सुधारों की गति को बढ़ाने पर व्यापक चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि ‘Ease of Living’ और ‘Ease of Doing Business’ को और मजबूत बनाने के उपायों पर भी विचार साझा किए गए।

सरकार और RBI ने क्या कदम उठाए?

विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए वित्त मंत्रालय ने बड़ा कर सुधार किया है। सरकार ने विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के सरकारी बॉन्ड में निवेश पर लगने वाले शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन टैक्स को समाप्त कर दिया है। इसके अलावा सरकारी बॉन्ड से मिलने वाली ब्याज आय पर लगने वाला विदहोल्डिंग टैक्स भी हटा दिया गया है।

वहीं RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक में गवर्नर संजय मल्होत्रा ने रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखने का फैसला किया। केंद्रीय बैंक ने भू-राजनीतिक तनाव, महंगाई और सप्लाई चेन संबंधी चिंताओं के बीच न्यूट्रल रुख बनाए रखा। इसके साथ ही RBI ने विदेशी पूँजी आकर्षित करने के लिए कई अतिरिक्त कदमों की घोषणा की।

इनमें सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के लिए एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग (ECB) जुटाने हेतु रियायती फॉरेक्स स्वैप सुविधा और FCNR(B) डिपॉजिट योजना को फिर से शुरू करना शामिल है। इस योजना के तहत विदेशी मुद्रा जमा पर हेजिंग लागत RBI वहन करेगा। वर्ष 2013 में इसी योजना के जरिए भारत ने लगभग 26 अरब डॉलर जुटाए थे।

क्यों है 70 अरब डॉलर निवेश की उम्मीद?

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि वित्त मंत्रालय और RBI द्वारा उठाए गए कदम विदेशी निवेशकों के लिए भारत को अधिक आकर्षक बनाएँगे। करों में राहत मिलने से विदेशी निवेशकों की लागत कम होगी, जबकि RBI की नई सुविधाएँ बाहरी वित्तपोषण को आसान बनाएँगी।

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी कहा है कि केंद्रीय बैंक किसी निश्चित निवेश लक्ष्य को लेकर काम नहीं कर रहा है, लेकिन उसे बाहरी उधारी, विदेशी जमा और इक्विटी निवेश के माध्यम से मजबूत पूँजी प्रवाह की उम्मीद है। इन कदमों से भारत के भुगतान संतुलन (Balance of Payments) को भी मजबूती मिल सकती है।

ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट बॉन्ड इंडेक्स क्यों है महत्वपूर्ण?

भारत में संभावित विदेशी निवेश का बड़ा हिस्सा भारतीय सरकारी बॉन्ड्स के ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट बॉन्ड इंडेक्स में शामिल होने पर निर्भर माना जा रहा है। दुनिया के कई बड़े निवेश फंड इन वैश्विक बॉन्ड इंडेक्स को ट्रैक करते हैं और उसी के आधार पर निवेश करते हैं।

यदि भारतीय सरकारी बॉन्ड इस प्रमुख इंडेक्स में शामिल होते हैं, तो बड़ी मात्रा में निष्क्रिय (Passive) निवेश अपने आप भारत की ओर आएगा। विशेषज्ञों के अनुसार, केवल इस इंडेक्स में शामिल होने से अगले 10 महीनों में 20 से 25 अरब डॉलर तक का निवेश आ सकता है।

भारत पहले ही कई प्रमुख वैश्विक बॉन्ड सूचकांकों में जगह बना चुका है। जून 2024 में JPMorgan ने भारतीय बॉन्ड को अपने उभरते बाजार सूचकांक में शामिल किया था। इसके बाद जनवरी 2025 में ब्लूमबर्ग इमर्जिंग मार्केट लोकल करेंसी इंडेक्स और सितंबर 2025 में FTSE Russell के संबंधित सूचकांक में भी भारतीय सरकारी बॉन्ड शामिल किए गए।

हालाँकि जनवरी 2026 में Bloomberg Index Services Ltd (BISL) ने भारतीय सरकारी बॉन्ड को अपने प्रमुख ग्लोबल इंडेक्स में शामिल करने का फैसला टाल दिया था। कंपनी ने कहा था कि बाजार ढाँचे और परिचालन संबंधी कुछ मुद्दों पर और मूल्यांकन की जरूरत है। BISL ने संकेत दिया था कि इस विषय पर अगला अपडेट 2026 के मध्य तक दिया जाएगा।

भारत के लिए कितना बड़ा अवसर?

सरकार की कर राहत, RBI की नई निवेश प्रोत्साहन योजनाएँ, मजबूत GDP वृद्धि और ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट बॉन्ड इंडेक्स में संभावित शामिल होने की संभावना मिलकर भारत के लिए बड़ा अवसर पैदा कर रही हैं। यदि ये सभी परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं, तो आने वाले महीनों में भारत में करीब 70 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आ सकता है।

इससे न केवल विदेशी मुद्रा भंडार और निवेश बढ़ेगा, बल्कि सरकार की उधारी लागत कम होगी, वित्तीय बाजारों को मजबूती मिलेगी और वैश्विक निवेशकों के बीच भारत की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी। ऐसे समय में जब दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ अनिश्चितता का सामना कर रही हैं, भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण आर्थिक अवसर माना जा रहा है।

भगवान राम का अपमान, आजादी के नारे और तिरंगे से बदसलूकी: कॉकरोचों को ये तक नहीं पता कि वे क्यों आए हैं, पढ़ें- CJP के प्रदर्शन में ऑपइंडिया को क्या दिखा

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने शनिवार (6 जून 2026) को दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपनी इस कथित पार्टी के सदस्यों यानी ‘कॉकरोचों’ को प्रदर्शन के लिए बुलाया था।CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने समर्थकों से बड़ी संख्या में पहुँचकर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की थी, लेकिन उनका साथ देने वाले कॉकरोचों की संख्या उनकी उम्मीदों को तोड़ने वाली रही।

अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर युवाओं और छात्रों से बड़ी से बड़ी संख्या में जुटने का आह्वान किया था लेकिन आह्वान का असर केवल कुछ कॉकरोचों पर ही पड़ा। सोशल मीडिया पर करोड़ों फॉलोअर्स वाली इस CJP के प्रदर्शन में बमुश्किल कुछ सौ लोग ही पहुँचे। बात सिर्फ इतनी ही नहीं है इसमें शामिल होने वाले कॉकरोचों को देखकर भी साफ समझा जा सकता था कि इनकी मंशा केवल हिंसा फैलाना, सुर्खियाँ बटोरना, सरकार और भारतीय संस्कृति को बदनाम करना था।

यह आरोप कोई हमारा मनगढ़ंत नहीं है बल्कि ऑपइंडिया को इसके प्रमाण भी मिले हैं। पहली बात तो ये सामने आई कि प्रोटेस्ट के नाम पर शोर मचाने वाले ये कॉकरोच असल में ना तो कोई छात्र हैं और ना ही पढ़ाई या किसी तरह की परीक्षा से इनका कोई लेना-देना है और इसका प्रमाण इन्होंने खुद ही दे दिया ‘आजादी-आजादी’ के नारे लगाकर।

वायरल वीडियो अब तक आपने भी देख लिए होंगे और अगर नहीं देखें तो ऑपइंडिया के इन वीडियोज को देंखे, जिसमें ये अबर्न नक्सली डफली बजाते हुए ‘आजादी-आजादी’ चिल्ला रहे।

वीडियो में दिख रहे ये लोग चिल्ला रहे, “हम क्या चाहते आजादी, BJP से आजादी, हमारा नारा आजादी, मोदी सुनले आजादी, BJP सुनले आजादी, तुम जेल में डालो आजादी, हम लेके रहेंगे आजादी, मैं भी बोलूँ आजादी, तू भी बोले आजादी, देश बोले आजादी, मोदी तुझसे आजादी, BJP तुझसे आजादी।” अब आप सोचिए कि इसका पेपर लीक से क्या लेना देना है भला?

यह पहली बार नहीं जब ये वामपंथी गुट किसी भी अन्य मुद्दे को ढाल बनाकर सामने आया हो और बाद में असली रंग दिखाया हो। किसान आंदोलन के समय भी किसानों के साथ उनकी लड़ाई में शामिल होने को ढोंग कर के इन वामपंथियों ने एक शांत से धरने को हिंसक बना दिया था।

इसके अलावा साल 2019-20 का समय याद करें तो दिल्ली समेत जगह-जगह CAA-NRC के विरोध में सड़क पर आकर बैठे प्रदर्शनकारियों ने अपने प्रोटेस्ट का रंग बदल दिया था। उन्हीं प्रदर्शनों का नतीजा था कि दिल्ली को हिंदू विरोधी दंगे झेलने पड़े। 40-50 लोगों की निर्ममता से मौत हुई।

मकसद भी नहीं बता पा रहे अभिजीत के कॉकरोच, तिरंगे के अपमान का वीडियो आया सामने

बता दें कि CJP के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने अपने समर्थकों से अपील की थी कि वो अपने साथ तिरंगा झंडा, किताबें और फूल लेकर आएँ। उनके कॉकरोचों यानी समर्थकों ने ये बात मानी भी लेकिन शायज आशुतोष उन्हें ये बताना भूल गए कि तिरंगे को हर भारतीय, हर देशभक्त सम्मान की दृष्टि से देखता है।

ऑपइंडिया ने इसकी पुष्टि कर रही ऐसी ही एक घटना को कैप्चर भी किया है, जिसमें प्रदर्शन करने पहुँचे कॉकरोच तिरंगे का अपमान कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि कोई ऐसा व्यक्ति, जिसको अपने देश से प्रेम हो वो ऐसी घटिया हरकत कर सकता है। साफ समझ आ रहा कि ये हरकते भारत को बदनाम करने की वामपंथियों की केवल एक साजिश है।

दूसरी तरफ ऑपइंडिया के रिपोर्टर्स को ग्राउंड पर ऐसा कोई कॉकरोच नहीं मिला, जो यह बता सके कि उनका जुटान यहाँ हुआ किसलिए है। किसी के पास कोई मुद्दा नहीं जो वो बता सकें कि इसलिए वो प्रदर्शन करने आए हैं। कोई पेपर लीक पेपर लीक चिल्ला रहे तो वो उनके साथ मिल जा रहे।

कोई आजादी-आजाजी चिल्ला रहा तो उधर भी उपस्थिति दर्ज कर रहे। इस बैनर से उस बैनर, यहाँ से वहाँ, वहीं जो असल में कॉकरोच करते हैं।

हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ उगला जहर उगलने पहुँच रहे कॉकरोचों के दादा-परदादा

जंतर-मंतर पर पहुँचे एक बुजुर्ग ने ऑपइंडिया के रिपोर्टर से कहा कि ‘पांडव-वांडव’ तो कभी थे ही नहीं, ये सब बेकार बाते हैं। उन्होंने आगे कहा, “राम-वाम सब छोड़ दे, तु वहाँ मत जा, राम मोदी को नहीं मारता, सारे देश को लूट कर खा गया, वो मोदी को नहीं मारता, राम मंदिर के नाम पर कितने रुपए डकार गया, अडानी-अंबानी को नहीं मारता है।”

जब ऑपइंडिया के रिपोर्टर ने पूछा कि इसमें भगवान राम बीच में कहाँ से आ गए तो वो कहते हैं, “तेरे मेरे को डराने के लिए हैं राम तो, उसको नहीं मानते।” जिनको ना तो भारत के इतिहास, संस्कृति और धर्मग्रंथो से कोई लेना-देना नहीं, ना तो इन्हें हिंदू देवी-देवताओं का सम्मान करना आता है, ये लोग पहुँचे हैं कॉकरोचों को समर्थन करने।

कोई डायरी को बता रहा संविधान तो किसी का जवाब- अब्बा-डब्बा-जब्बा

प्रशांत राणा नाम के एक कॉकरोच से ऑपइंडिया के रिपोर्टर ने बात की तो उसने हाथ में ली हुई डायरी को भारत का संविधान बताया। जब रिपोर्टर ने दिखाने को कहा तो प्रशांत ने थोड़ा भाव खाया, लेकिन फिर डायरी खोली और कहा, ‘ये मेरे कुछ आर्टिकल्स हैं।’ जी हाँ यानी कॉकरोचों का अपना एक संविधान भी लिखा जा रहा है। उसने कहा कि ये मेरे लिए संविधान है।

रिपोर्टर ने जब उससे कहा कि भाई दिखाओ तो इस संविधान में क्या है तो कॉकरोच ने कहा- “इतनी पर्सनल चीज नहीं दिखा सकते।” इसके बाद वो लगातार अपने मन का बेतुकी बातें करता रहा जो संभवतः उसके अपने पर्सनल संविधान में लिखी होंगी।

ऑपइंडियो को प्रशांत की तरह ही एक और कॉकरोच मिला। उसने कहा कि वो सिस्टम का विरोध करने वालों का समर्थन कर रहा है। उसने कहा कि एजुकेशन सिस्टम पूरी तरह करप्ट हो चुका है। जब रिपोर्टर ने पूछा कि तो इसका हल क्या है और CJP के पास इसका क्या समाधान है तो उसने ना में सिर हिला दिया कि उसके पास इसका कोई जवाब नहीं है।

मास्क पहने एक कॉकरोच ने ऑपइंडिया को बताया कि नीट पेपर लीक हुआ है, इसलिए वो यहाँ आया है, लेकिन और कौन से पेपर कब लीक हुए हैं, इसके बारे में उसे कोई जानकारी नहीं थी। वह लगातार कहता रहा, “नीट का पेपर लीक हुआ है, होते रहते हैं, अब जैसे नीट का पेपर लीक हुआ है, नीट का पेपर लीक हुआ था, नीट का पेपर लीक हो जाएगा फिर।”

अंत में कॉकरोच ने रिपोर्टर से ही पूछ लिया कि वो बताए कौन-कौन से पेपर लीक हुए हैं। रिपोर्टर के हर सवाल में फँसते हुए कॉकरोच में अंत में चेहरा दिखाकर और बेईज्जती कराना सही नहीं समझा और चुप हो गया। जिन्हें किसी विषय की कोई जानकारी नहीं है, यहाँ तक की अपने भविष्य का भी कुछ नहीं पता ये औरों के भविष्य की क्या चिंता करेंगे।

कोई कॉकरोच यहाँ हिंदू देवी-देवता का अपमान कर रहा तो कोई अपनी पर्सनल डायरी को संविधान बता रहा। किसी को तिरंगे के सम्मान से कोई लेना-देना नहीं तो कोई डफली बजाते हुए आजादी-आजादी चिल्ला रहा और इनका कहना था कि ये छात्रों के भविष्य के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेंगे, ये कॉकरोच जिनके पास ना तो ज्ञान है और ना ही तमीज।

तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति के ‘घृणा मॉडल’ को अन्नामलाई की चुनौती, पेरियार नहीं, कलाम हैं आदर्श: समझें- ‘We The Change’ से राष्ट्रवाद का शंखनाद कितना अहम

तमिलनाडु की राजनीति में दशकों पुराने द्रविड़ आंदोलनों के ‘घृणा मॉडल’ को सीधी चुनौती देते हुए, पूर्व आईपीएस अधिकारी के. अन्नामलाई ने एक अभूतपूर्व आंदोलन का शंखनाद किया है। पेरियार, अंबेडकर, उत्तर भारत विरोध और हिंदी विरोध जैसी विभाजनकारी विचारधाराओं पर आधारित राजनीति के विपरीत, अन्नामलाई ने भारत के मिसाइल मैन और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को अपना आदर्श बनाया है। उन्होंने ‘कलाम स्कूल ऑफ आइडियोलॉजी’ के तहत ‘वी द चेंज’ (We The Change) आंदोलन की शुरुआत की है, जिसका प्राथमिक लक्ष्य तमिलनाडु में राष्ट्रवाद और सकारात्मक विकास का बीज बोना है।

दरअसल, भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और अपनी बेदाग, साहसी और तेजतर्रार छवि के लिए मशहूर पूर्व आईपीएस अधिकारी के. अन्नामलाई ने बीजेपी से अपनी राहें आधिकारिक तौर पर अलग कर ली हैं। अन्नामलाई का यह फैसला किसी राजनीतिक द्वेष या आपसी कलह का नतीजा नहीं है, बल्कि यह तमिलनाडु की आत्मा को एक नई वैचारिक दिशा देने की एक विराट और दमदार कोशिश है। बिना अपनी पूर्व पार्टी पर कोई निशाना साधे, उन्होंने बेहद गरिमापूर्ण तरीके से इस्तीफा दिया और तुरंत बाद एक नए राजनीतिक आंदोलन की नींव रख दी।

यह आंदोलन केवल एक नए संगठन का जन्म नहीं है, बल्कि यह तमिलनाडु की उस पारंपरिक, संकीर्ण और घृणा-आधारित राजनीति के ताबूत में आखिरी कील ठोकने की शुरुआत है, जिसने दशकों से इस महान धरती को शेष भारत से अलग रखने की साजिश रची थी।

अन्नामलाई ने इस आंदोलन के जरिए तमिल गौरव और भारतीय राष्ट्रवाद के अद्भुत संगम की एक नई धारा प्रवाहित की है। इस नए सफर का आगाज होते ही तमिलनाडु की जनता ने जिस तरह इस पर अपना भरोसा जताया है, वह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि राज्य के युवा अब बदलाव के लिए पूरी तरह तड़प रहे हैं।

‘We The Change’ की अद्भुत शुरुआत, महज 10 घंटे में 10 लाख सदस्य

अन्नामलाई ने पारंपरिक राजनीति से बिल्कुल अलग हटकर देश के महानतम सपूत, मिसाइल मैन और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को अपना आदर्श और वैचारिक प्रतीक बनाया है। उन्होंने कलाम साहब के सिद्धांतों पर आधारित ‘कलाम स्कूल ऑफ आइडियोलॉजी’ के तहत अपने नए आंदोलन ‘We The Change’ (वी द चेंज) की आधिकारिक घोषणा की। यह आंदोलन उनके द्वारा कोयंबटूर में स्थापित किए जाने वाले ‘एपीजे अब्दुल कलाम सेंटर फॉर एथिक्स एंड पॉलिटिक्स’ के तहत संचालित होगा।

इस घोषणा का प्रभाव इतना व्यापक और तीव्र था कि महज 10 घंटों के भीतर ही 10 लाख से अधिक लोग, विशेषकर युवा और महिलाएँ इस आंदोलन से जुड़ गए। तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास में यह अपने आप में एक अटूट रिकॉर्ड है।

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

वैसे, जब दक्षिण की राजनीति में हाल ही में एक अभिनेता की पार्टी ‘टीवीके’ बनी थी, तो उन्होंने मंच से पेरियार और पारंपरिक द्रविड़ प्रतीकों का नाम लेकर वही पुरानी घिसी-पिटी राजनीति की थी। लेकिन अन्नामलाई ने उन सभी विभाजनकारी चेहरों से पूरी तरह दूरी बनाकर यह साबित कर दिया कि वे राज्य में सत्ता बदलने नहीं, बल्कि व्यवस्था और सोच को बदलने आए हैं।

द्रविड़ आंदोलनों का हिंदी, उत्तर भारत और सनातन से घृणा का इतिहास

तमिलनाडु की राजनीति आजादी के पहले से और उसके बाद भी कुछ खास नकारात्मक मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। द्रविड़ आंदोलन के नाम पर राज्य में हमेशा हिंदी विरोध, उत्तर भारत विरोध और ब्राह्मण विरोध को ही राजनीति का मूल आधार बनाया गया।

इस द्रविड़ विचारधारा की असलियत बेहद स्याह और समाज को तोड़ने वाली रही है। इसके जनक माने जाने वाले पेरियार का इतिहास देश, संस्कृति और बहुसंख्यक समाज की आस्थाओं के प्रति अत्यंत आक्रामक और घृणा से भरा रहा है। द्रविड़ आंदोलन के नाम पर तमिलनाडु में सनातन धर्म को निशाना बनाया गया, उत्तर भारतीय नागरिकों के खिलाफ नफरत फैलाई गई और भाषा के नाम पर देश को बाँटने की कोशिशें हुईं।

हद तो तब हो गई जब इस विचारधारा के तहत मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के पावन चरित्र तक पर उंगली उठाई गई और जनभावनाओं को आहत किया गया। द्रविड़ राजनीति ने हमेशा तमिल अस्मिता को भारतीयता के विरोधी के रूप में पेश किया, जिससे राज्य का युवा देश की मुख्यधारा से वैचारिक रूप से कटता चला गया। इस घृणा मॉडल के सहारे वहाँ के क्षेत्रीय दलों ने दशकों तक सत्ता सुख भोगा और भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े साम्राज्य खड़े किए।

विडंबना यह रही कि तमिलनाडु की इस जमीन पर राष्ट्रीय पार्टियाँ भी इन द्रविड़ मुद्दों का खुलकर पुरजोर विरोध नहीं कर पाती थीं, क्योंकि उन्हें राज्य में गठबंधन की बैसाखियों की जरूरत होती थी। लेकिन अन्नामलाई ने इस कायरतापूर्ण राजनीति को लात मारकर सीधे सच का रास्ता चुना है।

कलाम कार्ड क्यों है अन्नामलाई का सबसे दमदार मास्टरस्ट्रोक?

ऐसे नफरत भरे और कट्टर माहौल में अन्नामलाई द्वारा डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को अपना वैचारिक प्रतीक चुनना भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा और सकारात्मक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। डॉ. कलाम एक ऐसे अजातशत्रु नेता और वैज्ञानिक रहे हैं, जिनका सम्मान द्रविड़ समर्थक, राष्ट्रवादी, अल्पसंख्यक, अगड़े, पिछड़े और समाज के हर वर्ग के लोग समान रूप से करते हैं।

रामेश्वरम के एक साधारण तमिल परिवार में जन्मे कलाम साहब ने कभी भी खुद को किसी विक्टिम कार्ड या अल्पसंख्यक पहचान के सहारे आगे नहीं बढ़ाया। उन्होंने शिक्षा, कड़ी मेहनत, देशभक्ति और विज्ञान के बल पर देश के शीर्ष वैज्ञानिक और राष्ट्रपति बनने का गौरव प्राप्त किया।

अन्नामलाई ने कलाम साहब को आगे रखकर द्रविड़ राजनीति के उस नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है, जो कहता था कि एक सच्चा तमिल राष्ट्रवादी नहीं हो सकता। अन्नामलाई का यह कदम समाज को जोड़ने वाला है। यह आंदोलन किसी खास जाति, धर्म या संप्रदाय को बढ़ावा देने के बजाय देश और राज्य के सामूहिक और समग्र विकास पर केंद्रित है।

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

अन्नामलाई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तमिल संस्कृति और भाषा पर अगाध गर्व करना और भारत माता के प्रति पूरी तरह समर्पित रहना एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

संस्थान के बेस पर राजनीति का महाप्लान किया तैयार

अन्नामलाई एक बेहद पढ़े-लिखे, पूर्व नौकरशाह और दूरदर्शी राजनेता हैं, जो आक्रामक राजनीति करने के साथ-साथ गंभीर मुद्दों पर बात करने से कभी नहीं घबराते। उन्होंने अपनी इस राजनीतिक यात्रा की शुरुआत अचानक नहीं की, बल्कि इसके पीछे उनकी एक गहरी संस्थागत तैयारी है।

अन्नामलाई ने कोयंबटूर में जिस कलाम सेंटर की स्थापना की है, उसे बेस बनाकर वे पूरे तमिलनाडु में गवर्नेंस, शिक्षा, विज्ञान और तकनीक आधारित राजनीति को आगे बढ़ाएंगे। यह संस्थान राज्य के उन युवाओं को प्रशिक्षित करेगा जो राजनीति में आना चाहते हैं लेकिन जिनके पास कोई पारिवारिक गॉडफादर नहीं है।

अन्नामलाई की नजर बहुत दूरदर्शी है और उनका लक्ष्य साल 2031 का तमिलनाडु विधानसभा चुनाव है। अपने दीर्घकालिक विजन को समझाते हुए उन्होंने बेहद व्यावहारिक बात कही कि केवल एक मुख्यमंत्री, 234 विधायक या 39 सांसद मिलकर तमिलनाडु की इस सड़ चुकी मौजूदा व्यवस्था को नहीं बदल सकते। अगर हमें वाकई पूरी व्यवस्था को बदलना है, तो हमें पंचायत स्तर से लेकर पार्षद, मेयर और शीर्ष पदों तक करीब 30,000 ईमानदार, कर्मठ और राष्ट्रभक्त नए लोगों की एक पूरी फौज तैयार करनी होगी। उनका यह आंदोलन आने वाले वर्षों में धीरे-धीरे एक राजनीतिक दल का रूप लेगा और राज्य की भ्रष्ट पारिवारिक राजनीति को उखाड़ फेंकेगा।

कैप्टन विजयकांत के साथ वो अनुभव और राष्ट्रवाद का असली दर्द

अपने इस विजन के पीछे के अनुभव को साझा करते हुए अन्नामलाई ने अपने जीवन के एक बेहद महत्वपूर्ण अध्याय का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि साल 2009 में जब वे देश के प्रतिष्ठित संस्थान आईआईएम (IIM) लखनऊ से एमबीए कर रहे थे, तब उन्होंने विशेष अनुमति लेकर डीएमडीके (DMDK) के संस्थापक और दिवंगत अभिनेता-राजनेता कैप्टन विजयकांत के साथ तीन महीने की जमीनी इंटर्नशिप की थी।

लोकसभा चुनाव के दौरान ग्रामीण इलाकों में धूल फाँकते हुए और जमीनी स्तर पर काम करते हुए उन्होंने चुनावी राजनीति और सार्वजनिक सेवा की वास्तविक समझ हासिल की थी। यही जमीनी अनुभव आज उनके काम आ रहा है।

नितिन नवीन को भेजे अपने गरिमापूर्ण इस्तीफे में अन्नामलाई ने राष्ट्रीय पार्टियों के उस कड़वे सच और दर्द को भी बयाँ किया, जिससे वे लंबे समय से जूझ रहे थे। उन्होंने लिखा कि राष्ट्रीय दल कभी भी उस भाषा और भावना के साथ बात नहीं कर पाए जिसे तमिलनाडु के आम लोग अपनी आत्मा से समझ सकें।

अन्नामलाई ने भाजपा में रहते हुए इसी धारणा को बदलने की पुरजोर कोशिश की और कई अंदरूनी तथा बाहरी बाधाओं के बावजूद राज्य के कोने-कोने में राष्ट्रवाद की अलख जगाई। उन्होंने गर्व से यह साफ किया कि वे एक ऐसे पक्के राष्ट्रवादी हैं जो क्षेत्रीय आकांक्षाओं, तमिल भाषा और उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर सर्वोच्च गर्व करते हैं।

तमिलनाडु में राष्ट्रवाद के स्वर्णिम युग की शुरुआत

के. अन्नामलाई का यह कदम तमिलनाडु की राजनीति में एक नए सूर्योदय की तरह है। उन्होंने साबित कर दिया है कि सकारात्मकता, विकास और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर बिना किसी नफरत का सहारा लिए भी एक विशाल जन आंदोलन खड़ा किया जा सकता है। द्रविड़ दलों ने जहाँ हमेशा उत्तर भारत और सनातन से घृणा को अपना हथियार बनाया, वहीं अन्नामलाई ने डॉ. कलाम के ‘मनों के मिलन’ (Unity of Minds) के सिद्धांत को अपना कवच बनाया है।

‘We The Change’ आंदोलन के जरिए तमिलनाडु की धरती पर राष्ट्रवाद का जो बीज बोया गया है, वह आने वाले समय में एक विशाल वटवृक्ष बनेगा। देश की अखंडता को सर्वोपरि मानते हुए तमिल अस्मिता को नया आकाश देने का अन्नामलाई का यह प्रयास न केवल दमदार है, बल्कि भारत की एकता को मजबूत करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।

तमिलनाडु की जनता ने 10 लाख से अधिक की संख्या में जुड़कर यह दिखा दिया है कि वे अब घृणा की राजनीति से ऊब चुके हैं और अन्नामलाई के नेतृत्व में एक नए, समृद्ध और राष्ट्रवादी तमिलनाडु के निर्माण के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

‘कल आतंकियों को पद्म भूषण भी दे देंगे?’: जब अखिलेश सरकार को पड़ी थी हाई कोर्ट की फटकार, आतंक के केस वापस लेने चली थी सपा; जानिए 2013 का पूरा विवाद

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर 13 साल पुराना एक बड़ा विवाद चर्चा में आ गया है। यह वही मामला है, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार ने आतंकवाद के आरोपितों के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की थी। अब योगी सरकार में मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर ने इस पुराने मुद्दे को दोबारा उठाकर समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोला है।

ओमप्रकाश राजभर ने शनिवार (6 जून 2026) को सोशल मीडिया पर 6 जून 2013 की एक पुरानी खबर का स्क्रीनशॉट शेयर किया। यह खबर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच द्वारा आतंकवाद के आरोपितों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने के फैसले को लेकर अखिलेश सरकार से कड़े सवाल पूछे जाने से जुड़ी थी।

राजभर ने मामले का जिक्र करते हुए लिखा, “पढ़ लीजिएगा। कम से कम आपको अपने पाप याद आ जाएँगे। फिर जब आप 2027 में चुनाव हारेंगे तो EVM और SIR को दोष नहीं दे पाएँगे।”

क्या था पूरा मामला?

साल 2012 में समाजवादी पार्टी पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता में आई थी और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने थे। विधानसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी ने वादा किया था कि आतंकवाद के मामलों में फँसाए गए मुस्लिम युवकों के मामलों की समीक्षा कराई जाएगी। पार्टी का कहना था कि कई युवकों को गलत तरीके से फँसाया गया है और उनकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।

सरकार बनने के बाद इसी वादे को पूरा करने की दिशा में काम शुरू हुआ। वर्ष 2013 में अखिलेश सरकार ने वर्ष 2007 के लखनऊ, फैजाबाद और वाराणसी सीरियल ब्लास्ट मामलों से जुड़े आरोपितों के खिलाफ चल रहे मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की। इन धमाकों में कई लोगों की जान गई थी जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे। जैसे ही सरकार के इस फैसले की जानकारी सामने आई तो इसे लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद शुरू हो गया।

विपक्षी दलों ने सरकार पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया। वहीं इस फैसले को अदालत में भी चुनौती दी गई।

हाई कोर्ट ने क्यों उठाए सवाल?

मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच पहुँचा। 6 जून 2013 को सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने अखिलेश सरकार के फैसले पर गंभीर सवाल खड़े किए। अदालत ने पूछा कि आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों में मुकदमे वापस लेने का आधार क्या है? कोर्ट ने सरकार से उन आरोपितों की सूची भी माँगी, जिनके खिलाफ मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की गई थी।

इसके साथ ही हाई कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या इस तरह के मामलों में केंद्र सरकार से जरूरी अनुमति ली गई है। अदालत ने साफ कहा कि आतंकवाद से जुड़े मामलों को सामान्य आपराधिक मामलों की तरह नहीं देखा जा सकता क्योंकि इनका असर केवल किसी एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि पूरे समाज और राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है।

बाद में दिसंबर 2013 में हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और देश के खिलाफ युद्ध जैसे गंभीर मामलों में अभियोजन वापस लेने के लिए केंद्र सरकार की सहमति आवश्यक होती है। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में मुकदमे वापस लेने के लिए असाधारण और मजबूत कारण होने चाहिए।

‘कल आतंकियों को पद्म भूषण भी दे देंगे?’

इस मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट की कुछ टिप्पणियाँ काफी चर्चा में रही थीं। अदालत ने सरकार के रुख पर नाराजगी जताते हुए तीखी टिप्पणी की थी कि ‘आज आप आतंकवाद के आरोपितों के मुकदमे वापस ले रहे हैं, कल क्या इन्हें पद्म भूषण भी दे देंगे’?

कोर्ट ने कहा था कि यदि सरकार इस तरह आतंकवाद के आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने लगेगी, तो समाज में गलत संदेश जाएगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कौन दोषी है और कौन निर्दोष, इसका फैसला अदालत करेगी, सरकार नहीं।

संभल दंगों के आरोपितों का मुकदमा भी लिया गया था वापस

यह पहला मौका नहीं था जब समाजवादी पार्टी की सरकार ऐसे फैसलों को लेकर विवादों में आई हो। इससे पहले साल 1993 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की सरकार ने संभल में वर्ष 1978 में हुए दंगों से जुड़े आरोपितों के खिलाफ मुकदमे भी वापस लिए थे।

बताया जाता है कि उस दंगे में सैकड़ों लोगों की हत्या हुई थी और कई हिंदुओं के मकानों व पूजा स्थलों को आग लगा दी गई थी। उस फैसले को लेकर भी उस समय राजनीतिक बहस हुई थी।

अब फिर क्यों उठा यह मुद्दा?

दरअसल, पिछले कुछ महीनों से ओमप्रकाश राजभर लगातार समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर हमलावर नजर आ रहे हैं। खासकर सपा के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को लेकर राजभर लगातार सवाल उठा रहे हैं।

राजभर का आरोप है कि समाजवादी पार्टी केवल वोट बैंक की राजनीति करती है और गैर-यादव पिछड़ी जातियों को सिर्फ चुनावी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करती है। इसी राजनीतिक तनातनी के बीच उन्होंने 2013 के आतंकवाद मामलों का विवाद एक बार फिर सामने ला दिया है।

अपने सोशल मीडिया पोस्ट में राजभर ने कहा कि 6 जून की तारीख इसलिए याद रखनी चाहिए, क्योंकि इसी दिन हाई कोर्ट ने आतंकवाद के आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने के फैसले पर सपा सरकार को कठघरे में खड़ा किया था।

‘यह सरकार खून-खराबे के बिना सत्ता से नहीं हटेगी’: CJP के कॉकरोचों ने सोशल मीडिया पर मचाया उत्पात, कीं रक्तपात-हिंसा-अराजकता की बातें

विवादित कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने आज शनिवार (6 जून 2026) को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने समर्थकों से बड़ी संख्या में जंतर-मंतर पहुँचकर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की थी। लेकिन यह प्रदर्शन फीका ही रहा, ना भीड़ जुटी और ना ही कोई सार्थक परिणाम दिखा।

जमीन पर यह प्रदर्शन भले की पुलिस की मुस्तैदी की वजह से शांतिपूर्ण रहा हो लेकिन पार्टी के तिलचट्टों ने सोशल मीडिया पर इसमें हिंसा के लिए उकसाने की पूरी कोशिश की थी। ऑपइंडिया को सोशल मीडिया पर CJP समर्थकों की कई ऐसी टिप्पणियाँ मिलीं, जिनमें प्रदर्शन के दौरान प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हिंसा की बात कही गई थी।

रक्तपात और हिंसा का आह्वान

CJP के प्रदर्शन में शामिल होने की अपील करने वाली कुछ रेडिट पोस्टों के जवाब में एक समर्थक ने खुले तौर पर हिंसा का समर्थन किया। उसने लिखा, “यह अभिशप्त सरकार खून-खराबे और हिंसा के बिना सत्ता से नहीं हटेगी।”

स्क्रीनशॉट – रेडिट

इसी रेडिट अकाउंट से की गई एक अन्य टिप्पणी में भी प्रदर्शन के दौरान हिंसा को उचित ठहराने की कोशिश की गई। टिप्पणी में लिखा गया, “सत्ता में बैठे लोग गुंडे हैं और अपने पास मौजूद हर हथकंडे का इस्तेमाल करते हैं। अगर ये गुंडे इतने ही मूर्ख हैं, तो आंदोलन का हिंसक होना तय है।”

स्क्रीनशॉट – रेडिट

भारत में भी नेपाल जैसा Gen Z विरोध प्रदर्शन चाहिए

एक अन्य CJP समर्थक ने हाल ही में नेपाल में हुए युवा-नेतृत्व वाले उग्र प्रदर्शनों का हवाला देते हुए वैसी ही स्थिति की इच्छा जताई। उसने कहा कि नेपाल में युवाओं ने पुलिस कार्रवाई और लाठीचार्ज की परवाह किए बिना आंदोलन में हिस्सा लिया और भारतीय युवाओं को भी इसी तरह एकजुट होकर आगे आना चाहिए।

अपनी टिप्पणी में उसने लिखा, “नेपाल में युवाओं ने पुलिस या लाठीचार्ज की चिंता किए बिना विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। भारतीय युवाओं को भी एकता के लिए इससे अधिक मजबूत विश्वास दिखाना चाहिए।”

स्क्रीनशॉट – रेडिट

नेपाल को मजबूत लोकतांत्रिक परंपराओं या राजनीतिक स्थिरता के लिए नहीं जाना जाता। वहाँ बहुत कम प्रधानमंत्री ऐसे रहे हैं जो अपना पूरा कार्यकाल पूरा कर पाए हों। देश के राजनीतिक इतिहास में कई बार सरकारें जनआंदोलनों और राजनीतिक उथल-पुथल के चलते सत्ता से बेदखल हुई हैं।

इसके विपरीत, भारत दुनिया के सबसे सफल और जीवंत लोकतंत्रों में से एक माना जाता है, जहाँ सत्ता परिवर्तन हमेशा संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुनावों के माध्यम से होता रहा है। भारत में सरकारों को बदलने का अधिकार मतदाताओं के पास है और यह प्रक्रिया चुनावी व्यवस्था के जरिए संपन्न होती है।

प्रदर्शनों के दौरान की थी पागलपन भरी चीजें होने की उम्मीद

CJP के एक समर्थक ने प्रदर्शन के दौरान ‘कुछ बड़ा’ या ‘असामान्य’ होने की संभावना को लेकर उत्साह व्यक्त किया था। उसने लिखा, “मैं वहाँ जा रहा हूँ और इंस्टाग्राम को स्टोरीज से भर दूँगा, क्योंकि निश्चित रूप से कुछ पागलपन भरी चीजें होने वाली हैं।”

इस टिप्पणी से संकेत मिलता है कि समर्थक को प्रदर्शन के दौरान किसी अप्रत्याशित घटनाक्रम की उम्मीद थी। सोशल मीडिया पर सामने आए ऐसे संदेशों ने प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर और अधिक सवाल खड़े कर दिए हैं, खासकर तब जब पार्टी नेतृत्व लगातार आंदोलन को शांतिपूर्ण बता रहा है।

स्क्रीनशॉट – रेडिटॉ

भारतीय न्यायपालिका को उखाड़ फेंकने का आह्वान

सोशल मीडिया पर की गई एक अन्य टिप्पणी में CJP के एक समर्थक ने केवल लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार ही नहीं, बल्कि भारतीय न्यायपालिका के प्रति भी असंतोष व्यक्त किया। उसने लिखा, “हमें अपनी न्यायपालिका को भी बाहर का रास्ता दिखाना होगा, क्योंकि उसने अपनी स्वतंत्रता खो दी है।”

इस तरह की टिप्पणियाँ दर्शाती हैं कि कुछ समर्थक देश की प्रमुख लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति गहरा अविश्वास व्यक्त कर रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि ऐसे बयान संवैधानिक संस्थाओं की वैधता पर सवाल खड़े करते हैं और सार्वजनिक विमर्श को और अधिक ध्रुवीकृत बना सकते हैं।

स्क्रीनशॉट – रेडिटॉ

किसानों के विरोध-प्रदर्शन जैसी स्थिति के लिए योजना बनाना

CJP के कुछ समर्थक चाहते थे कि यह आंदोलन नवंबर 2020 में शुरू हुए किसान आंदोलन की तरह लंबा और प्रभावशाली साबित हो। सोशल मीडिया पर एक समर्थक ने दावा किया कि किसान आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और उपद्रव के लिए प्रदर्शनकारी नहीं, बल्कि केंद्र सरकार द्वारा भेजे गए तत्व जिम्मेदार थे।

उसने लिखा, “निराशावादी नहीं बनना चाहता, लेकिन अगर सैकड़ों लोग प्रदर्शन के लिए जुटते हैं तो वे भीड़ में कुछ लोगों को सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के लिए शामिल कर देंगे और फिर पूरे आंदोलनकारियों को उपद्रवी बता देंगे। किसान आंदोलन में भी ऐसा हुआ था और इस बार भी ऐसा ही होगा।”

इस टिप्पणी में समर्थक ने पहले से ही यह तर्क देने की कोशिश की कि यदि प्रदर्शन के दौरान कोई हिंसा या कानून-व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न होती है, तो उसके लिए CJP नेतृत्व और समर्थकों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।

स्क्रीनशॉट – रेडिटॉ

CJP समर्थकों की सोशल मीडिया टिप्पणियों को देखते हुए लगता है कि यह प्रदर्शन केवल सरकार के खिलाफ कथित शांतिपूर्ण विरोध तक सीमित नहीं था बल्कि इसके जरिए देश में अराजकता का माहौल पैदा करने की कोशिश की थी लेकिन सुरक्षाबलों की मुस्तैदी से यह संभव नहीं हो सका।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

मिशन समुद्र मंथन से अंडमान में मिला गैस का महाभंडार, मोदी सरकार ने पूर्वी तट पर बनाया ₹1.5 लाख करोड़ का मेगा प्लान: समझें कैसे ऊर्जा में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा भारत

वैश्विक ऊर्जा संकट और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा संप्रभुता को मजबूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। केंद्र सरकार के ‘मिशन समुद्र मंथन’ (राष्ट्रीय गहरे जल अन्वेषण मिशन) के तहत ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL) ने अंडमान सागर में ‘श्री विजयपुरम-3’ खोजी कुएँ में प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार की खोज की है। यह कुआँ तट से 15 किलोमीटर दूर और 355 मीटर गहरे पानी में स्थित है, जहाँ 1,900 मीटर से अधिक की गहराई पर इओसीन फॉर्मेशन में लगातार गैस फ्लेयरिंग देखी गई है।

वैसे वर्तमान समय में पूरी दुनिया एक अभूतपूर्व ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक तनावों के दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में जारी अशांति, लाल सागर का संकट और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे संवेदनशील समुद्री व्यापारिक मार्गों पर मंडराते खतरों ने दुनिया भर के देशों को अपनी ऊर्जा सुरक्षा की समीक्षा करने पर मजबूर कर दिया है। भारत भी इस वैश्विक संकट से अछूता नहीं है, क्योंकि देश को अपनी तेल की जरूरतों का एक बहुत बड़ा यानी 85% हिस्सा विदेशों से आयात करना पड़ता है। हर साल अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ पेट्रोल, डीजल और एलपीजी खरीदने में खर्च हो जाता है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर अंतरराष्ट्रीय बाजार की हर छोटी-बड़ी हलचल का सीधा असर पड़ता है।

इसी वैश्विक संकट के बीच भारत के पूर्वी समुद्र तट और पश्चिमी रेगिस्तान से ऐसी सुखद और ऐतिहासिक खबरें आई हैं, जो आने वाले समय में देश की पूरी ऊर्जा कहानी को बदलकर रख देंगी। केंद्र सरकार द्वारा शुरू किए गए ‘मिशन समुद्र मंथन‘ यानी ‘राष्ट्रीय गहरे जल अन्वेषण मिशन’ के तहत भारत ने गहरे और अति-गहरे समुद्र में छिपे हाइड्रोकार्बन के विशाल भंडार को खंगालना शुरू कर दिया है।

अंडमान सागर में एक के बाद एक मिली सफलताओं और देश के पूर्वी तट पर शुरू हुए डेढ़ लाख करोड़ रुपए के मेगा प्लान ने भारत के ऊर्जा स्वतंत्रता मिशन को एक नई और अचूक दिशा दे दी है। इस महा-मिशन का उद्देश्य देश के भीतर ही इतने ऊर्जा स्रोत विकसित करना है कि भविष्य में किसी भी वैश्विक संकट का असर देश के आम नागरिकों की जेब पर न पड़े।

अंडमान सागर से आई दूसरी बड़ी खुशखबरी

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का क्षेत्र सामरिक दृष्टि से जितना महत्वपूर्ण है, भूगर्भीय रूप से यह ऊर्जा का उतना ही बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि अंडमान सागर में एक और नए स्थान पर प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार का पता चला है।

यह ऐतिहासिक खोज सरकारी तेल कंपनी ऑयल इंडिया लिमिटेड द्वारा अंडमान द्वीप समूह के पूर्वी तट से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित श्री विजयपुरम-3 नामक एक एक्सप्लोरेटरी यानी खोजी कुएँ में की गई है। यह कुआँ लगभग 355 मीटर गहरे समुद्री क्षेत्र में खोदा गया था, जो अपनी भौगोलिक बनावट के कारण बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है।

इस खोज की तकनीकी गहराइयों को समझें तो समुद्र के तल से नीचे करीब 1900 से अधिक की गहराई तक जाकर इस कुएँ की टेस्टिंग की गई है। यह खोज इओसीन फॉर्मेशन नाम की भूगर्भीय परत में हुई है, जो अपनी विशेष चट्टानी संरचना के लिए जानी जाती है।

परीक्षणों के दौरान इस कुएँ से लगातार गैस फ्लेयरिंग देखी गई, जो बेहद उच्च दबाव और बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस की निरंतर उपस्थिति को प्रमाणित करती है। पेट्रोलियम मंत्री ने देश को बधाई देते हुए साफ किया कि यह भारत के समुद्री तेल और गैस अन्वेषण कार्यक्रम के लिए एक मील का पत्थर है और इससे आने वाले दिनों में देश की गैस उत्पादन क्षमता में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिलेंगे।

अंडमान बेसिन की असली भूगर्भीय क्षमता से अभी दुनिया अनजान

यह खोज इसलिए भी बेहद खास है क्योंकि ऑयल इंडिया लिमिटेड ने मौजूदा अन्वेषण अभियान के तहत अंडमान बेसिन में कुल तीन खोजी कुएं खोदे थे, जिनमें से दो में हाइड्रोकार्बन यानी तेल और गैस की सफल मौजूदगी दर्ज की जा चुकी है। इससे पहले, वर्ष 2025 में इसी क्षेत्र के पास श्री विजयपुरम-2 कुएँ में भी प्राकृतिक गैस मिलने की पुष्टि हुई थी।

उस समय निकाली गई गैस के नमूनों की जाँच में पाया गया था कि उसमें लगभग सतासी प्रतिशत शुद्ध मीथेन गैस मौजूद है, जो व्यावसायिक उपयोग के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। पहली सफलता के तत्काल बाद सरकार ने बिना समय गँवाए इस क्षेत्र में अन्वेषण गतिविधियों को और तेज कर दिया, जिसका परिणाम अब श्री विजयपुरम-3 के रूप में सबके सामने है।

भूवैज्ञानिकों और ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अंडमान बेसिन की अंडरवाटर संरचना म्यांमार और इंडोनेशिया के उन समुद्री क्षेत्रों से बिल्कुल मिलती-जुलती है, जहाँ पिछले कई दशकों से बड़े पैमाने पर प्राकृतिक गैस और तेल का व्यावसायिक उत्पादन किया जा रही है। अब तक तकनीक की कमी और अत्यधिक गहराई के कारण अंडमान का यह क्षेत्र पूरी तरह अनछुआ रहा था, लेकिन अब यह साबित हो चुका है कि भारत के इस समुद्री क्षेत्र के नीचे गैस का एक विशाल खजाना दबा हुआ है।

फिलहाल ऑयल इंडिया लिमिटेड इस गैस भंडार का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन कर रही है ताकि इसके नमूनों को एकत्र कर इसकी गुणवत्ता, संरचना और ऊर्जा क्षमता का सटीक परीक्षण किया जा सके। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर सब कुछ योजना के अनुसार रहा, तो साल 2030 तक इस क्षेत्र से व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया जा सकता है।

पूर्वी तट पर भारत का सबसे बड़ा ऊर्जा अभियान

अंडमान की इस बड़ी सफलता ने भारत सरकार के हौसलों को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया है और यही कारण है कि देश की सबसे बड़ी तेल और गैस उत्पादक कंपनी ओएनजीसी यानी ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन ने भारतीय समुद्रों में गहरे पानी से तेल निकालने के लिए अपने इतिहास के सबसे बड़े प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी है।

ओएनजीसी ने गहरे और अति-गहरे पानी में तेल और गैस की खोज और ड्रिलिंग के लिए अठारह से बीस अरब डॉलर यानी लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपए से अधिक के भारी-भरकम निवेश की योजना तैयार की है। इसके लिए वैश्विक स्तर पर टेंडर जारी कर दिए गए हैं और मार्च के महीने में मुंबई में हुई प्री-बिड मीटिंग में दुनिया भर की एक दर्जन दिग्गज ड्रिलिंग कंपनियों ने हिस्सा लिया है।

इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत दुनिया की सबसे अत्याधुनिक ड्रिलशिप और सेमी-सबमर्सिबल रिग्स को भारतीय समुद्रों में तैनात किया जा रहा है। भारत इस महा-मिशन में किसी भी तरह की तकनीकी कसर नहीं छोड़ना चाहता, इसलिए ओएनजीसी ने गहरे समुद्र की ड्रिलिंग में महारत रखने वाली दुनिया की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों जैसे ब्राजील की पेट्रोब्रास, फ्रांस की टोटल एनर्जी और अमेरिका की एक्सोनमोबिल के साथ रणनीतिक और तकनीकी सहयोग किया है।

यह प्रोजेक्ट केवल तेल खोजने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ी आर्थिक और रणनीतिक सोच काम कर रही है, जो भारत को वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में स्थापित करेगी।

एडवांस्ड सिस्मिक इमेजिंग तकनीक का इस्तेमाल

इस बार भारत सरकार और उसकी तेल कंपनियाँ केवल पुराने और पारंपरिक तरीकों पर निर्भर नहीं हैं। मिशन समुद्र मंथन के तहत पूर्वी तट पर भारत का अब तक का सबसे आधुनिक और हाई-टेक सिस्मिक सर्वे शुरू किया जा रहा है, जिसके लिए वैश्विक जियोफिजिकल कंपनियों से निविदाएँ माँगी गई हैं। यह मिशन करीब छतीस महीने तक चलेगा, जिसके तहत समुद्र के नीचे की चट्टानों और उनकी जटिल संरचनाओं का एक हाई-टेक डिजिटल नक्शा तैयार किया जाएगा। इस तकनीक के माध्यम से उन क्षेत्रों की भी पहचान की जा सके की जिन्हें पहले तकनीकी सीमाओं के कारण पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया था।

इस हाई-टेक सर्वे में ब्रॉडबैंड थ्री-डी सिस्मिक इमेजिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें विशेष सर्वेक्षण जहाज समुद्र के पानी में कई किलोमीटर लंबी केबल छोड़ते हैं। ये उपकरण समुद्र के नीचे शक्तिशाली ध्वनि तरंगें भेजते हैं, जो समुद्र की तलहटी और उसके नीचे स्थित विभिन्न चट्टानों से टकराकर वापस लौटती हैं।

जहाजों पर लगे अत्यधिक संवेदनशील सेंसर इन तरंगों की गूँज को रिकॉर्ड कर लेते हैं, जिसके बाद वैज्ञानिक इस विशाल डेटा को सुपरकंप्यूटरों के जरिए प्रोसेस करके समुद्र के नीचे कई किलोमीटर गहराई तक की एक स्पष्ट त्रिविमीय तस्वीर तैयार करते हैं। इससे यह साफ पता चल जाता है कि किस जगह की चट्टानी संरचना के बीच तेल या गैस फंसी हुई है और यही तकनीक दुनिया के सबसे बड़े ऑफशोर तेल क्षेत्रों की खोज में इस्तेमाल की जाती है।

नदी बेसिनों में छिपी ऊर्जा की असीम संभावनाएँ

इस आधुनिक तकनीक के निशाने पर मुख्य रूप से देश के चार सबसे बड़े नदी बेसिन हैं, जिनमें सबसे बड़ा दाँव कृष्णा-गोदावरी यानी केजी बेसिन पर माना जा रहा है। यह क्षेत्र पहले से ही भारत का प्रमुख गैस उत्पादन केंद्र है, लेकिन सरकार का मानना है कि नई तकनीक के जरिए इस बेसिन के और अधिक गहरे हिस्सों में छिपे जटिल पेट्रोलियम सिस्टम और गैस हाइड्रेट्स का पता लगाया जा सकता है।

इसी तरह ओडिशा के तट के पास स्थित महानदी बेसिन को भारत के सबसे संभावित और समृद्ध डीप-वॉटर क्षेत्रों में से एक माना जाता है, जहाँ वैज्ञानिकों को करीब आठ किलोमीटर से अधिक की गहराई तक तेल और गैस होने के प्रबल संकेत मिले हैं।

इसके अलावा बंगाल-पुर्णिया बेसिन को भूवैज्ञानिक एक बड़ा अवसर मान रहे हैं, क्योंकि यहाँ समुद्र के नीचे लगभग दस किलोमीटर तक मोटी अवसादी परतें मौजूद हैं। शुरुआती अध्ययनों से संकेत मिले हैं कि यहाँ मियोसीन युग के प्राचीन और विशाल हाइड्रोकार्बन भंडार छिपे हो सकते हैं, जो सफल होने पर पूरे पूर्वी भारत की ऊर्जा तस्वीर को बदल देंगे।

तमिलनाडु से लेकर बंगाल की खाड़ी तक फैला कावेरी बेसिन भी इस योजना का एक अहम हिस्सा है, जिसके ऑफशोर कार्बोनेट सिस्टम और जुरासिक सिं-रिफ्ट प्ले की जाँच की जाएगी। यहाँ आठ किलोमीटर की गहराई में और बड़े तेल भंडारों की उम्मीद जताई जा रही है, जिसके लिए भविष्य में बड़े स्तर पर ड्रिलिंग की जाएगी।

मल्टी-क्लाइंट मॉडल से बदलेगा पूरा खेल

इस विशाल और खर्चीले मिशन को तेजी से पूरा करने और सरकारी खजाने पर आर्थिक बोझ कम करने के लिए सरकार ने एक बेहद चालाकी भरी रणनीति अपनाई है, जिसे मल्टी-क्लाइंट मॉडल कहा जाता है। पारंपरिक तरीकों में सिस्मिक डेटा जुटाने का पूरा खर्च और उसका जोखिम सरकार या सरकारी तेल कंपनियों को उठाना पड़ता था, जिससे बजट की कमी के कारण काम काफी धीमा हो जाता था। लेकिन इस नए मॉडल के तहत अंतरराष्ट्रीय जियोफिजिकल कंपनियाँ अपने खर्च और अपने जोखिम पर समुद्र के नीचे का डेटा जुटाएंगी।

इसके बाद ये कंपनियाँ इस प्रामाणिक डेटा को दुनिया भर की विभिन्न ऊर्जा और तेल उत्पादक कंपनियों को बेच सकेंगी, जिससे उनका मुनाफा भी सुरक्षित रहेगा और सरकार पर शुरुआती वित्तीय बोझ भी नहीं पड़ेगा।

इस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि इसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी और निवेश रातों-रात बढ़ जाएगा, जिससे भारत के समुद्रों में तेल की खोज का काम कई गुना तेजी से आगे बढ़ सकेगा। जब दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियाँ इस डेटा को खरीदेंगी, तो वे भारत में निवेश करने के लिए खुद-ब-खुद आकर्षित होंगी, जिससे देश में विदेशी निवेश भी बढ़ेगा।

पश्चिमी सीमा पर भी मिली बड़ी कामयाबी

एक तरफ जहाँ देश के पूर्वी समुद्री हिस्से में मिशन समुद्र मंथन इतिहास रच रहा है, वहीं दूसरी तरफ देश के पश्चिमी छोर से भी भारत के लिए एक और बड़ी खुशखबरी आई है। राजस्थान के जैसलमेर बेसिन में सरकारी तेल कंपनी ऑयल इंडिया लिमिटेड को एक और बड़ी कामयाबी हाथ लगी है, जिसने मरुभूमि में ऊर्जा की एक नई किरण जगाई है।

कंपनी ने जैसलमेर के प्रसिद्ध डांडेवाला फील्ड में एक नया गैस कुआँ खोजा है, जिसकी सबसे खास बात यह है कि यहाँ पहली बार बेहद कम गहराई पर स्थित सानू फॉर्मेशन से प्राकृतिक गैस निकलनी शुरू हुई है।

यह कुआँ केवल 950 मीटर की गहराई तक ही ड्रिल किया गया था और शुरुआती परीक्षणों में ही यहाँ से लगभग 25000 स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रतिदिन गैस का प्रवाह दर्ज किया गया है। तकनीकी विश्लेषण और भूगर्भीय जाँच के आधार पर वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस विशिष्ट क्षेत्र में करीब 75 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस का कुल संसाधन मौजूद हो सकता है।

डांडेवाला फील्ड हालाँकि पहले से ही पारंपरिक गैस उत्पादन के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन सानू फॉर्मेशन में गैस का मिलना एक बड़ी रणनीतिक जीत है, जिसने इस पूरे रेगिस्तानी इलाके में भविष्य के लिए ड्रिलिंग की नई संभावनाएँ खोल दी हैं।

भारत की ऊर्जा जरूरतें और आयात का भारी बोझ

भारत की वर्तमान ऊर्जा स्थिति और उसकी जरूरतों को समझे बिना इस पूरे मिशन के महत्व को नहीं जाना जा सकता। भारत आज की तारीख में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश बन चुका है, जहां तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और शहरीकरण के कारण ईंधन की माँग आसमान छू रही है।

आँकड़ों के अनुसार, भारत में इस समय प्राकृतिक गैस की दैनिक खपत लगभग एक सौ सतासी मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रति दिन तक पहुँच चुकी है। उद्योगों के संचालन, बड़े कारखानों, सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों के लिए सीएनजी और घरों की रसोई के लिए पीएनजी की माँग हर गुजरते दिन के साथ बढ़ रही है।

इस भारी माँग को पूरा करने के लिए भारत को अपनी कुल जरूरत का लगभग 50% हिस्सा विदेशों से लिक्विफाइड नेचुरल गैस यानी एलएनजी के रूप में आयात करना पड़ता है। कच्चे तेल के मामले में आत्मनिर्भरता की स्थिति और भी ज्यादा चिंताजनक है, क्योंकि भारत को अपनी दैनिक जरूरतों का लगभग पचासी प्रतिशत हिस्सा विदेशों से ही खरीदना पड़ता है।

देश में कच्चे तेल का आयात बिल हर साल लाखों करोड़ रुपए तक पहुँच जाता है, जिससे देश का एक बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ ईंधन खरीदने में ही स्वाहा हो जाता है। ऐसे माहौल में देश के भीतर ही नए गैस और तेल के भंडार मिलना सरकार के लिए बहुत बड़ी राहत की खबर है, जो देश को आर्थिक रूप से और मजबूत बनाएगी।

कच्चे तेल का दैनिक गणित और भारत का उत्पादन

भारत की तेल की दैनिक खपत और उसके घरेलू उत्पादन के बीच का गणित बेहद दिलचस्प है और यह दिखाता है कि देश को आत्मनिर्भर बनने के लिए कितने बड़े स्तर पर काम करने की जरूरत है।

भारत में रोजाना लगभग 55 लाख बैरल कच्चे तेल की खपत होती है, जो देश की विशाल आबादी और उसके परिवहन तंत्र की रीढ़ है। इस 55 लाख बैरल में से भारत अपने तमाम घरेलू स्रोतों जैसे मुंबई हाई, असम के तेल क्षेत्रों और कृष्णा-गोदावरी बेसिन को मिलाकर रोजाना लगभग 9 से 10 लाख बैरल कच्चे तेल का खुद उत्पादन कर पाता है।

यह घरेलू उत्पादन देश की कुल जरूरत के मुकाबले काफी कम है, जिसके कारण भारत को रोजाना लगभग 45 लाख बैरल कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार से खरीदना पड़ता है। यही वजह है कि जब भी खाड़ी देशों में या वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक डॉलर का भी उछाल आता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर उसका अरबों रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

सरकार का पूरा ध्यान अब इसी अंतर को पाटने पर है ताकि घरेलू उत्पादन को 9 लाख बैरल से बढ़ाकर उस स्तर पर ले जाया जा सके जहाँ विदेशों पर निर्भरता न्यूनतम हो जाए।

भारत Vs पाकिस्तान: तेल और गैस उत्पादन का सच

जब भी भारत की सीमाओं के पास कोई भूगर्भीय खोज होती है, तो दोनों देशों की तुलना और उनके दावों की हकीकत जानना बेहद जरूरी हो जाता है। हाल ही में पाकिस्तान की सरकारी तेल कंपनी ओजीडीसीएल यानी ऑयल एंड गैस डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड ने भारत की सीमा से सटे अपने सिंध प्रांत के सांघड़ जिले में बॉबी डीप-1 नामक कुएँ में तेल और गैस मिलने की बड़ी घोषणा की है।

इस खबर के आते ही पाकिस्तान में जश्न का माहौल बन गया और वहाँ के लोगों को लगा कि उनकी किस्मत बदलने वाली है, लेकिन जब हम आँकड़ों की कसौटी पर दोनों देशों की तुलना करते हैं, तो पाकिस्तान की यह खोज भारत के सामने बहुत छोटी और नीचे दिखाई देती है।

भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो पाकिस्तान का सिंध प्रांत और भारत का राजस्थान राज्य आपस में जुड़े हुए हैं और दोनों तरफ थार का एक ही रेगिस्तान फैला हुआ है, जिसके कारण रेत के नीचे की चट्टानें पुरानी और तेल-गैस को जमा करने वाली हैं।

पाकिस्तान ने दावा किया है कि उसके सांघड़ जिले के इस नए कुएँ से शुरुआती टेस्टिंग के दौरान रोजाना 2000 बैरल कच्चा तेल और 11 लाख क्यूबिक फीट गैस निकल रही है। पाकिस्तान जैसी खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के लिए यह एक राहत की खबर जरूर हो सकती है, लेकिन जब हम भारत के राजस्थान में पहले से चल रहे काम को देखते हैं, तो पाकिस्तान का यह दावा पूरी तरह फीका पड़ जाता है।

थार के रेगिस्तान में भारत की बादशाहत

भारत को राजस्थान के रेगिस्तान में बहुत पहले ही तेल का विशाल भंडार मिल चुका है और हमारी कंपनियाँ पिछले कई सालों से वहाँ से सफलतापूर्वक रिकॉर्ड उत्पादन कर रही हैं। राजस्थान के बाड़मेर में स्थित प्रसिद्ध मंगला ऑयलफील्ड से भारत अकेले रोजाना लगभग 80000 बैरल कच्चे तेल का उत्पादन कर रहा है। इसके अलावा बाड़मेर और जैसलमेर के अन्य छोटे-बड़े तेल कुओं को मिला दिया जाए तो भारत केवल राजस्थान के इस अकेले इलाके से ही रोजाना करीब 2 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन सफलतापूर्वक कर रहा है।

इसका सीधा सा मतलब यह हुआ कि पाकिस्तान को अपने जिस सिंध प्रांत के सांघड़ जिले में तेल मिलने पर इतना नाज है, भारत उससे 100 गुना ज्यादा तेल राजस्थान के रेगिस्तान से पहले ही रोजाना निकाल रहा है। पाकिस्तान को सांघड़ से सिर्फ दो हजार बैरल तेल मिलने की उम्मीद है, जबकि भारत वहाँ 2 लाख बैरल रोज निकाल रहा है।

आगे चलकर पाकिस्तान वहाँ और कुएँ खोदे तो बात अलग है, लेकिन फिलहाल जो घोषणा की गई है, उसकी असलियत भारत के मुकाबले कुछ भी नहीं है। भारत की कंपनियाँ पहले से ही इस पूरे बॉर्डर इलाके में अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं और लगातार नए कुओं की ड्रिलिंग कर रही हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर दोनों देशों की क्षमता का विशाल अंतर

अगर हम राष्ट्रीय स्तर पर दोनों देशों की कुल तेल खपत और उनके घरेलू उत्पादन की तुलना करें, तो यह अंतर और भी ज्यादा हैरान करने वाला है। पाकिस्तान को अपनी पूरी राष्ट्रीय व्यवस्था चलाने और अपनी जनता की जरूरतों को पूरा करने के लिए रोजाना लगभग 5 लाख बैरल कच्चे तेल की आवश्यकता होती है। इसके मुकाबले जैसा कि हम जानते हैं, भारत अपने घरेलू कुओं से रोजाना लगभग 9 से 10 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन खुद कर लेता है।

इसका अर्थ यह हुआ कि भारत रोजाना जितना कच्चा तेल अपने देश की जमीन और समुद्र से निकालता है, वह मात्रा पाकिस्तान की कुल राष्ट्रीय जरूरत से लगभग दोगुनी है। पाकिस्तान को कुल पाँच लाख बैरल चाहिए और भारत 10 लाख बैरल रोज खुद पैदा करता है, भले ही भारत की अपनी जरूरत 55 लाख बैरल की है।

इस लिहाज से देखा जाए तो पाकिस्तान की सांघड़ की यह खोज भारत के राजस्थान और अंडमान के हाइड्रोकार्बन साम्राज्य के सामने कहीं नहीं ठहरती और बेहद नीचे नजर आती है। असली कहानी और ऊर्जा सुरक्षा की वास्तविक बाजी पूरी तरह से भारत के हाथ में है, जो समुद्र और जमीन दोनों मोर्चों पर पाकिस्तान से कई गुना आगे चल रहा है।

ऊर्जा स्वतंत्रता और आर्थिक संप्रभुता का भविष्य

मिशन समुद्र मंथन के तहत देश के भीतर मिल रहे तेल और गैस के ये नए भंडार आने वाले समय में भारत की पूरी आर्थिक और रणनीतिक स्थिति को बदलने की ताकत रखते हैं। जब देश के भीतर ही कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का उत्पादन बड़े पैमाने पर शुरू हो जाएगा, तो आयात बिल में होने वाली भारी कटौती से देश का अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा कोष सुरक्षित रहेगा।

इस बचे हुए पैसे का उपयोग देश के आंतरिक विकास, आधुनिक बुनियादी ढाँचे के निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और तकनीकी अनुसंधान पर किया जा सकेगा, जो अंततः देश के नागरिकों के जीवन स्तर को सुधारेगा।

इसके साथ ही भारत वैश्विक तेल बाजार के उतार-चढ़ाव और मिडिल ईस्ट के तनावों से भी काफी हद तक सुरक्षित हो जाएगा, जिससे देश में ईंधन की कीमतों में स्थिरता आएगी।

प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किया गया यह मिशन अब धरातल और समंदर की गहराइयों में पूरी तरह से रंग लाने लगा है, जो भारत को आने वाले दशकों के लिए न केवल आत्मनिर्भर बनाएगा बल्कि उसकी आर्थिक संप्रभुता को भी अक्षुण्ण रखेगा। वैश्विक मंच पर भारत का यह ऊर्जा सुरक्षा मॉडल और आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ते कदम आज दुनिया के तमाम विकासशील देशों के लिए एक महान प्रेरणा बन चुके हैं।