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लोकसभा में ट्रांसजेंडर व्यक्ति संशोधन विधेयक 2026 पेश, सेल्फ-आईडेंटिटी का प्रावधान खत्म: जानिए क्या-क्या बदलाव हुए

भारत में ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों और उनकी पहचान से जुड़े कानून में बड़ा बदलाव लाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक नया कदम उठाया है। शुक्रवार (13 मार्च 2026) को सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री डॉ वीरेंद्र कुमार ने लोकसभा में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 पेश किया।

यह विधेयक पहले से लागू ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 यानी ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) एक्ट, 2019 में कई अहम बदलाव प्रस्तावित करता है।

सरकार का कहना है कि 2019 के कानून को लागू करते समय यह महसूस किया गया कि ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति‘ की परिभाषा बहुत व्यापक और अस्पष्ट है, जिसके कारण यह तय करना मुश्किल हो रहा था कि वास्तव में किन लोगों को इस कानून के तहत मिलने वाले संरक्षण और सरकारी योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए।

इसी वजह से नया संशोधन विधेयक ट्रांसजेंडर व्यक्ति की अधिक स्पष्ट परिभाषा तय करने, पहचान प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया में बदलाव करने, गंभीर अपराधों के लिए सख्त सजा का प्रावधान करने और प्रशासनिक ढाँचे में सुधार करने का प्रयास करता है।

सरकार के अनुसार इस संशोधन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कानून का संरक्षण उन लोगों तक पहुँचे जो बायोलॉजिकल कारणों की वजह से समाज में गंभीर भेदभाव और बहिष्कार का सामना करते हैं।

क्या होगी ट्रांसजेंडर व्यक्ति की नई परिभाषा

नए संशोधन विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा में बदलाव है। प्रस्तावित प्रावधान के अनुसार ट्रांसजेंडर व्यक्ति उन लोगों को माना जाएँगे जिनकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान किन्नर, हिजड़ा, अरवानी, जोगता या नपुंसक जैसे पारंपरिक समुदायों से जुड़ी होती है। भारत में लंबे समय से इन समुदायों को सामाजिक रूप से ट्रांसजेंडर पहचान के रूप में देखा जाता रहा है।

इसके साथ ही ऐसे लोगों को भी ट्रांसजेंडर की श्रेणी में शामिल किया गया है जिनमें जन्म से बायोलॉजिकल डायवर्सिटी होती हैं, जिन्हें इंटरसेक्स डायवर्सिटी कहा जाता है। इसका मतलब उन व्यक्तियों से है जिनके शरीर में जन्म के समय पुरुष या महिला के सामान्य विकास से अलग बायोलॉजिकल लक्षण पाए जाते हैं।

इसमें कई प्रकार की स्थितियाँ शामिल हो सकती हैं जैसे प्राथमिक यौन लक्षणों में अंतर, बाहरी जननांगों की संरचना में भिन्नता, क्रोमोसोम के पैटर्न में बदलाव, रिप्रोडक्टिव ग्लैंड्स के विकास में अंतर या शरीर में हार्मोन के उत्पादन और प्रतिक्रिया में असामान्यता।

विधेयक में यह भी कहा गया है कि यदि किसी व्यक्ति या बच्चे को जबरन अंग-भंग, मजबूर कर के, लिम ऐम्प्यटैशन या किसी सर्जिकल, रासायनिक अथवा हार्मोनल प्रक्रिया के माध्यम से ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर किया गया हो तो ऐसे मामलों को भी ट्रांसजेंडर व्यक्ति की श्रेणी में शामिल माना जाएगा।

किन लोगों को इस परिभाषा में शामिल नहीं किया जाएगा

इस संशोधन विधेयक में एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी दिया गया है। इसमें कहा गया है कि केवल अलग-अलग सेक्सुअल ओरिएंटेशन रखने वाले लोग या अपनी सेल्फ रीलज़ैशन लैंगिक पहचान के आधार पर स्वयं को किसी अन्य जेंडर के रूप में बताने वाले व्यक्ति इस एक्ट के तहत ट्रांसजेंडर की परिभाषा में शामिल नहीं होंगे।

सरकार का कहना है कि 2019 के कानून में परिभाषा बहुत व्यापक होने के कारण यह तय करना मुस्किल हो गया था कि वास्तविक रूप से किन लोगों को इस कानून के तहत मिलने वाले लाभ और संरक्षण दिए जाएँ। इसलिए संशोधन विधेयक में यह स्पष्ट किया गया है कि ट्रांसजेंडर पहचान केवल व्यक्तिगत पसंद, विशेषता या स्वयं घोषित पहचान के आधार पर नहीं दी जा सकती।

ट्रांसजेंडर पहचान प्रमाण पत्र की प्रक्रिया में बदलाव

ट्रांसजेंडर पहचान से जुड़ा प्रमाण पत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं। अभी तक व्यवस्था यह थी कि कोई व्यक्ति अपनी सेल्फ रीलज़ैशन के आधार पर आवेदन करता था और जिला मजिस्ट्रेट दस्तावेजों की जाँच के बाद प्रमाण पत्र जारी करते थे।

लेकिन नए संशोधन के तहत पहचान की प्रक्रिया में मेडिकल बोर्ड को शामिल किया जाएगा। प्रस्ताव के अनुसार एक डेसिग्नेटेड मेडिकल बोर्ड बनाया जाएगा जिसकी अध्यक्षता मुख्य चिकित्सा अधिकारी या उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी करेंगे। यह बोर्ड संबंधित व्यक्ति के मामले की जाँच करेगा और अपनी सिफारिश देगा।

इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट उस सिफारिश की समीक्षा करेंगे और उसके आधार पर ट्रांसजेंडर पहचान प्रमाण पत्र जारी करेंगे। यदि आवश्यक समझा गया तो जिला मजिस्ट्रेट अन्य मेडिकल एक्सपर्ट से भी सलाह ले सकते हैं।

2019 के एक्ट की धारा 4(2) में यह प्रावधान था कि किसी व्यक्ति को अपनी सेल्फ रीलज़ैशन लैंगिक पहचान के आधार पर ट्रांसजेंडर के रूप में मान्यता मिल सकती है।

नए संशोधन विधेयक में इस प्रावधान को हटाने का प्रस्ताव किया गया है। सरकार का कहना है कि इस प्रावधान के कारण पहचान की प्रक्रिया में कई व्यावहारिक समस्याएँ सामने आ रही थीं और कानून के कई प्रावधानों को लागू करना मुश्किल हो रहा था। इसलिए पहचान के लिए अब चिकित्सा मूल्यांकन और प्रशासनिक जाँच को आवश्यक बनाने का प्रस्ताव किया गया है।

जेंडर परिवर्तन सर्जरी के बाद की नई प्रक्रिया

यदि कोई व्यक्ति जेंडर परिवर्तन सर्जरी कराता है तो उसके बाद की कानूनी प्रक्रिया में भी संशोधन प्रस्तावित किया गया है। विधेयक के अनुसार जिस चिकित्सा संस्थान में सर्जरी की जाएगी, उसे संबंधित व्यक्ति की जानकारी जिला प्रशासन को देनी होगी। इसके बाद व्यक्ति को चिकित्सा अधीक्षक या मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा जारी प्रमाण पत्र के साथ जिला मजिस्ट्रेट के पास आवेदन करना होगा।

जिला मजिस्ट्रेट उस आवेदन की जाँच करने के बाद जेंडर परिवर्तन को मान्यता देने वाला प्रमाण पत्र जारी कर सकते हैं। इसके बाद व्यक्ति अपने आधिकारिक दस्तावेजों में जेंडर से जुड़ी जानकारी में बदलाव करा सकता है।

संशोधन विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि जिस व्यक्ति को ट्रांसजेंडर पहचान प्रमाण पत्र मिल जाता है, उसे अपने जन्म प्रमाण पत्र और अन्य सरकारी दस्तावेजों में अपना पहला नाम बदलने का अधिकार होगा।

इसका उद्देश्य यह है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की सामाजिक पहचान को कानूनी मान्यता मिले और उन्हें सरकारी दस्तावेजों में अपनी पहचान से जुड़ी परेशानियों का सामना न करना पड़े।

जबरन ट्रांसजेंडर पहचान थोपने पर कड़ी सजा

नए संशोधन में अपराधों के लिए सजा को काफी सख्त बनाने का प्रस्ताव भी किया गया है। 2019 के एक्ट में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ अपराधों के लिए अधिकतम दो साल की सजा का प्रावधान था, जिसे सरकार ने अपर्याप्त माना है।

नए विधेयक में ऐसे मामलों के लिए अलग-अलग स्तर की सजाएँ तय की गई हैं। यदि किसी व्यक्ति का अपहरण करके उसे ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर किया जाता है और इस प्रक्रिया में अंग-भंग या अन्य किसी भी तरह से गंभीर शारीरिक नुकसान पहुँचाया जाता है तो दोषी को दस साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है और कम से कम दो लाख रुपए का जुर्माना लगाया जा सकता है।

यदि ऐसा अपराध किसी बच्चे के साथ किया जाता है तो सजा आजीवन कारावास तक हो सकती है और काम से काम पाँच लाख रुपए का जुर्माना लगाया जा सकता है।

भीख मंगवाने या जबरन श्रम कराने के मामलों में सजा

विधेयक में उन मामलों को भी गंभीर अपराध माना गया है जिनमें किसी व्यक्ति को जबरन ट्रांसजेंडर के बनाने के लिए मजबूर किया जाता है और फिर उसे भीख माँगने, बंधुआ मजदूरी या अन्य प्रकार के शोषण में लगाया जाता है।

ऐसे मामलों में वयस्क पीड़ित के लिए दस साल तक की कठोर सजा का प्रावधान किया गया है। यदि पीड़ित बच्चा है तो सजा चौदह साल तक हो सकती है। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए बनी राष्ट्रीय परिषद की संरचना में भी संशोधन का प्रस्ताव किया गया है। नए प्रावधान के अनुसार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों को क्षेत्रीय आधार पर नामित किया जाएगा।

उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम और उत्तर-पूर्व क्षेत्रों से बारी-बारी से प्रतिनिधियों को परिषद में शामिल किया जाएगा। साथ ही परिषद में शामिल होने वाले अधिकारी निदेशक स्तर से नीचे के नहीं होने चाहिए। इसका उद्देश्य परिषद को अधिक प्रभावी और प्रतिनिधि बनाना बताया गया है।

रक्तदान नीति पर सरकार का पक्ष

इस पूरे मुद्दे के साथ रक्तदान नीति को लेकर भी चर्चा सामने आई है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा है कि कुछ समूहों को रक्तदान से बाहर रखने का निर्णय वैज्ञानिक और चिकित्सकीय आधार पर लिया गया है।

इन समूहों में ट्रांसजेंडर व्यक्ति, पुरुषों के साथ यौन संबंध रखने वाले पुरुष और महिला यौन कर्मी शामिल हैं। सरकार का कहना है कि स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्टों के अनुसार इन समूहों में HIV और हेपेटाइटिस जैसे संक्रमणों की दर सामान्य आबादी की तुलना में छह से तेरह गुना अधिक पाई गई है।

सरकार का तर्क है कि रक्तदान करने की इच्छा से अधिक महत्वपूर्ण उस मरीज की सुरक्षा है जिसे रक्त चढ़ाया जाना है। इसलिए सुरक्षित रक्त उपलब्ध कराना सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से सर्वोच्च प्राथमिकता है।

LPG-पेट्रोल-डीजल के लिए पैनिक होना बंद करें, इंडक्शन की अचानक खरीदारी भी बढ़ाएगी दिक्कत: समझें- घबराहट में कैसे हम खुद को कर रहे हैं परेशान

मिडिल ईस्ट वॉर के बीच भारत में राजनीतिक फायदे के लिए कुछ अफवाहें जोरदार तरीके से फैलाई जा रही है, जिसमें एलपीजी-सीएनसी-पीएनजी, पेट्रोल-डीजल की कमीं की बात कही जा रही है इन अफवाहों की वजह से लोग पैनिक में आ रहे हैं और अव्यवस्था फैल रही है।

किस तरह की अव्यवस्था फैल रही है? ये अव्यवस्था है अचानक एलपीजी एजेंसियों पर लोगों की लंबी लाइनों की, पेट्रोल पंपों पर गाड़ियों की लाइनों की, सीएनजी पंपों पर भी कमोवेश यही स्थिति। जिन लोगों के घरों में सिलेंडर हैं, फिर भी वो भविष्य की चिंताओं में अभी से लाइन में लग गए हैं, तो ये अव्यवस्थाएँ सामने आ रही हैं। ऐसे में वो लोग भी परेशान हो रहे हैं, जिन्हें वाकई जरूरत है।

कैसे पैदा की जा रही है भीड़ वाली सिचुएशन?

इस बात को एक उदाहरण से समझें कि एक एलपीजी गैस की एजेंसी पर आम तौर पर 200 सिलेंडर की सप्लाई होती है, इससे पूरे इलाके का काम चल जाता है। आम तौर पर लोगों के पास 2 सिलेंडर होते हैं। बड़े परिवारों के पास 4 या 6 भी, क्योंकि उनके पास 2 सिलेंडर वाले 2-3 कनेक्शन हो सकते हैं परिवार के अलग-अलग लोगों के नाम पर। लेकिन जब एलपीजी की कमीं की अफवाह फैलाई जाती है, तो ये सभी 3 लोग सिलेंडर की लाइन में लग जाते हैं, ये होते हुए भी कि उनके घरों में पहले से 3 सिलेंडर आम तौर पर भरे हैं और अगले 1-2 माह तक उन्हें नए सिलेंडर की जरूरत नहीं है, फिर भी पैनिक सिचुएशन की वजह से वो भी लाइनों में लग गए हैं।

ऐसे में जिस एलपीजी एजेंसी के पास हर दिन 200 सिलेंडर की सप्लाई होती है, वहाँ 2000 लोग सिलेंडर की डिमाँड लेकर अचानक आ गए। सिलेंडर की उपलब्धता आम दिनों जितनी ही यानी 200 की ही है, तो 1800 लोग बिना सिलेंडर के रह गए और वो हल्ला मचा रहे हैं कि सिलेंडर नहीं मिला। हकीकत ये है कि उनके घरों में पहले सिलेंडर हैं और भोजन सबके यहाँ बना है।

ऐसे में जो 200 आम लोग आम दिनों की सप्लाई वाले सर्कल में जिनका वाकई सिलेंडर खत्म हुआ है, उन्हें भी सिलेंडर नहीं मिल पा रहा है। तो पैनिक सिचुएशन क्रिएट हो रही है। हर दिन के हिसाब से इसी तरह के हल्ले में लोग जुड़ते चले जा रहे हैं और 4-5 दिनों में सिलेंडर की चाहत रखने वालों की संख्या 5-6000 को पार गई। हालाँकि घर में काम रुकने वालों की संख्या बेहद कम यानी 500-600 ही हैं, जो ऐसी पैनिक सिचुएशन की वजह से अब सिलेंडर नहीं पा रहे हैं।

इसी में सक्रिय होते हैं जमाखोर, ब्लैक में सिलेंडर बेचने वाले माफिया और दलाल… फिर जो सिलेंडर बुकिंग के माध्यम से 850 या 900 का मिल रहा है, वो पैनिक सिचुएशन का फायदा उठाकर वही सिलेंडर 2000-2500 रुपए में बेचने लग जाते हैं। साथ ही अपनी नाजायज ताकत का इस्तेमाल करते हुए उन 200 सिलेंडरों पर भी डाका डालते हैं, जो आम लोगों के लिए है। हालाँकि ये स्थानीय प्रशासन की विफलता भी होती है।

कुल मिलाकर इससे स्थिति दिन प्रतिदिन खराब होती ही जाती है। यही नहीं करना है। लोगों को शांत रहने की जरूरत है और गैस की सप्लाई डिमांड के हिसाब से एजेंसी भी बढ़ाएगी तो 4-6 दिनों में स्थिति सामान्य होती जाएगी।

क्या है एलपीजी को लेकर आधिकारिक आँकड़ा

सरकार की तरफ से पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की जॉइंट सेक्रेटरी (मार्केटिंग और ऑयल रिफाइनरी) सुजाता शर्मा ने बताया कि जंग से पहले, हर दिन औसतन 55.7 लाख सिलेंडर बुक किए जाते थे। अब यह आँकड़ा बढ़कर करीब 76 लाख बुकिंग प्रतिदिन तक पहुँच गया है।

सरकार का कहना है कि जंग के हालात के बीच LPG सिलेंडर की बुकिंग में यह अचानक आया उछाल लोगों में घबराहट की वजह से है। इस स्थिति से निपटने के लिए एलपीजी कंपनियों ने बुकिंग की समयसीमा को शहरी इलाकों के लिए 25 दिन और ग्रामीण इलाकों के लिए बढ़ाकर 45 दिन कर दी है, ताकि जमाखोरी न हो सके। हालाँकि सरकार ने भरोसा दिलाया है कि इस स्थिति से निपटने के लिए LPG डिस्ट्रिब्यूटर्स के पास गैस का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है।

ऐसी ही स्थिति पेट्रोल-सीएनजी-डीजल पंपों पर

एलपीजी को लेकर मचे भगदड़ जैसी ही स्थिति सीएनजी, पेट्रोल-डीजल की हो चली है। वाहन चालक अपने वाहनों में टंकी तो फुल करा ही रहे हैं, पैनिक फैलाकर बनाई गई इमरजेंसी वाली हालत के हिसाब से वो कनस्तरों में भी पेट्रोल-डीजल भर ले रहे हैं। चूँकि भारत के लोग भविष्य की बहुत ज्यादा चिंता करते हैं ऐसे में वो वर्तमान को भी अव्यवस्था की भेंट चढ़ा रहे हैं और पैनिक फैलाकर बढ़ाई गई सामान की माँग को भी सप्लाई की तुलना में 2-3 गुना बढ़ा दे रहे हैं। यहाँ भी वाकई जरूरतमंद लोग पिस रहे हैं।

इंडक्शन की तरफ शिफ्ट हो रहे लोग, अचानक बढ़ी माँग

अब बात करते हैं अचानक बाजार में बढ़ी इलेक्ट्रिक चूल्हे यानी इंडक्शन की माँग की। ये अचानक बढ़ी माँग और पैनिक सिचुएशन आपकी गर्मी के मौसम को भी खराब करने वाली है। पहली बात तो ये कि आम दिनों में जिस दुकान से 1 या 2 इंडक्शन की बिक्री होती थी, आप ने हो-हल्ले के बीच मुँहमाँगे दामों पर एक ही दिन में सारा स्टॉक खाली कर दिया। अब इंडक्शन की डिमांड बढ़ गई। यहाँ भी जिनका गैस वाकई खत्म हुआ है, वो इंडक्शन भी नहीं पा रहे हैं, तो हर तरफ पैनिक फैल सकता है।

इसका दूरगामी असर देखिए- लोग इंडक्शन भी खरीद रहे हैं, लाइनों में लगकर गैस सिलेंडर भी ले रहे हैं। और अब घरों में एलपीजी का इस्तेमाल कम करके खाना इंडक्शन पर बना रहे हैं। मार्केट में सिर्फ इंडक्शन की माँग ही नहीं बढ़ रही, साथ ही इंडक्शन पर चढ़ने वाले बर्तनों की भी माँग बढ़ गई। उनकी कीमतें काफी बढ़ गई। आम लोग अपनी जेबें ढीली कर रहे हैं, क्यों? क्योंकि एक फर्जी सा माहौल बनाया गया कि एलपीजी की कमी ‘हो’ सकती है।

इस दूरगामी असर में आपकी गर्मी कैसे खराब होगी?

दिल्ली जैसे शहर में बीते 2 साल से गर्मियों में पीक पर 8000 मेगावॉट से 8500 मेगावॉट बिजली की माँग होती है। सरकारें और वितरण कंपनियाँ इसी हिसाब से बिजली की खरीद करती हैं, ताकि गर्मी में आम लोगों तक बिजली की निर्बाध सप्लाई बनाई रखी जा सके। लेकिन पैनिक सिचुएशन की वजह से लोग इंडक्शन पर शिफ्ट हो रहे हैं, तो बिजली की माँग भी अचानक डेढ़ गुनी तक हो जाएगी।

ऐसे में जो सरकार और बिजली वितरण कंपनी अपनी सालाना जरूरत के हिसाब से 8000 से 8500 मेगावॉट की बिजली खरीद रही है, वो माँग के मुताबिक 9500 से 10,500 मेगावॉट की बिजली कहाँ से लाएगी?

बात सिर्फ आम लोगों तक ही नहीं है, इसी पैनिक सिचुएशन की वजह से छोटे मोटे व्यवसाय, होटल, रेस्टोरेंट भी इंडक्शन की तरफ शिफ्ट होंगे, और जब माँग आम स्थिति की तुलना में डेढ़ गुना बढ़ जाएगी तो ट्रांसमिशन लाइनों से लेकर बिजली की उपलब्धता पर भी असर पड़ेगा। अचानक बढ़ी माँग पूरी न कर पाने की वजह से सरकारों की स्थिति बिगड़ेगी, बिजली कंपनियाँ रेट भी बढ़ा सकती हैं, साथ ही बिजली की कटौती भी बढ़ेगी।

ऐसे में क्या करें और क्या न करें?

सबसे पहले काम ये करें कि सामान्य जीवन जिए। किसी पैनिक में न पड़ें। देश में आम माँग की तुलना में आम सप्लाई लाइन पर कोई असर नहीं पड़ा है। ऐसे में लाइनों में न लगें। मिडिल ईस्ट में तनाव कम हो या न हो, सरकार ने अपनी जरूरत के हिसाब से 42 देशों से आपके लिए पेट्रोल-डीजल की व्यवस्था कर रखी है। ऐसे में न तो पेट्रोल-डीजल की कमीं आम लोगों को होगी, न ही सीएनजी-पीएनजी-एलपीजी की। किसी युद्ध का भारत के लोगों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है।

ऐसे में एक-दूसरे की देखा-देखी इंडक्शन की तरफ न दौड़ें और सामान्य जिंदगी जिएँ। इंडक्शन की तरफ दौड़ने से आपकी गर्मी खराब होनी तय है। अगर यही स्थिति रही, तो गर्मियों में लंबी बिजली कटौती के लिए भी तैयार रहें और इसके लिए सरकार को न कोसें। क्योंकि सरकार और बिजली कंपनियाँ उसी माँग के आधार पर चल रही हैं, जितनी अब तक आम तौर पर रही है। डिमाँड आप बढ़ाएँगी, तो परेशान भी आप ही होंगे। सरकार तो खैर आगे-पीछे कुछ न कुछ इंतजाम कर ही लेगी। ये बात सारी दुनिया पर लागू है।

मिडिल ईस्ट वार पर आपको क्यों नहीं पड़ना चाहिए फर्क?

सबसे पहले तो ये समझें कि जो ब्रेंट ऑयल या कोई भी मिडिल ईस्ट से आने वाला तेल है, वो सीधे आप तक नहीं पहुँच रहा है। वो कच्चा तेल होता है। अभी आने वाला तेल आप तक पहुँचने में 4-5 महीने तक का समय लग जाता है। यानी अभी तो आपके पास 4-5 महीने तक पैनिक की कोई वजह नहीं है।

दूसरा कि मिडिल ईस्ट से आने वाला तेल आपके लिए होता ही नहीं है। आपके लिए सरकार अन्य देशों से जरूरत का सामान मँगा ही रही है। ये तेल होता है देश की बड़ी बड़ी रिफायनरियों के लिए। इन रिफायनरियों में जो कच्चा तेल आता है, वो रिफाइन होकर दूसरे देशों यानी यूरोप-अफ्रीकी देशों में बेचा जाता है। इसमें सरकारी कंपनियों के साथ ही नायरा एनर्जी, रिलायंस जैसे बड़े खिलाड़ी शामिल हैं।

ऐसे में उन रिफायनरियों को मिलने वाले तेल और उनके बिजनेस से आम लोगों को क्यों परेशान होना चाहिए ये सोचने वाली बात है।

फिर अभी भारत सरकार ने अपने रणनीतिक तेल भंडारों को छुआ तक नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक, पूरी दुनिया में 1 बूँद की सप्लाई रुकते तक भी भारत के पास इतना तेल है कि वो आम लोगों की जिंदगियों पर कुछ महीनों तक कोई फर्क नहीं पड़ने देगी।

इसे इस बात से समझें कि एशिया-प्रशांत इलाके के देशों यानी साउथ-ईस्ट देशों जैसे थाईलैंड, इंडोनेशिया, ताईवान, कंबोडिया, जापान जैसे देश कच्चा तेल और यूरोप के देश कच्चा तेल मँगाने की जगह भारत की रिफायनरियों से रिफाइन किया गया तेल मंगाते हैं। उन देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम करीब डेढ़ से 2 गुना हो चुका है। लेकिन भारत में मोदी सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दाम में 1 पैसे का इजाफा नहीं किया गया है। जबकि सीएनजी-पेट्रोल पंपों पर लाइन तो पड़ोसी बाँग्लादेश में भी लग चुकी है। लेकिन भारत के लोग क्यों परेशान हो रहे हैं?

देश में पैनिक फैलाकर राजनीतिक फायदा उठाना चाहते हैं लोग, दुश्मन देश

भारत के लोग सिर्फ इसलिए परेशान हो रहे हैं क्योंकि उनके आसपास राजनीतिक आग्रहों से ग्रस्त लोगों ने पैनिक फैलाया हुआ है। वो तो चाहते हैं कि लोग सरकार से नफरत करें और सरकार के खिलाफ खड़े हो जाएँ और उन्हें सत्ता मिल जाए।

यही बात भारत के दुश्मन देशों और उन कथित पश्चिमी मित्र देशों पर भी लागू होती है। वो भारत की तरक्की बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। वो भी देश में सत्ता परिवर्तन और कठपुतली सरकार चाहते हैं। वो भारत का विकास रोकना चाहते हैं, अमेरिकी डीप स्टेट से जुड़े लोगों के बयान से लेकर अमेरिकी डिप्टी विदेश मंत्री तक भी ये बयान दे चुके हैं। वो नहीं चाहते कि भारत में स्थायित्व रहे और वो विकसित देश बने, क्योंकि ऐसा होने पर भारत कभी उनका पिछलग्गू नहीं रहेगा। बीते 12 सालों में मोदी सरकार की स्वतंत्र विदेश नीति इसी रास्ते पर चल रही है।

भारत के पड़ोस को देखिए, फिर करिए गहरा विचार

आप अपने आसपास के देशों को देखें फिर इस बात पर विचार करें। उदाहरण के लिए… पड़ोसी नेपाल में अमेरिकी कठपुतली सत्ता में आ चुका है। बांग्लादेश में भी छात्र आंदोलन के नाम पर भारत की मित्र सरकार को अपदस्थ कर दिया गया। आज बांग्लादेश की हालत खराब है। श्रीलंका में भी सत्ता परिवर्तन किया गया। पाकिस्तान पहले से अमेरिका की कठपुतली बना हुआ है। मौलाना मुनीर ट्रंप के यहाँ अक्सर हाजिरी मारने जाता है। म्यांमार की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। मालदीव में भी सत्ता परिवर्तन कुछ सालों में हुआ है और राजनीति को एंटी इंडिया की चाशनी में डुबो दिया गया है।

ईरान पर अमेरिकी आक्रमण जारी ही हैं, बाकी मिडिल ईस्ट अमेरिकी कठपुतली बने हुए हैं। अफगानिस्तान में किसी के घुसने की हालत नहीं है। चीन की इकोनमी पर अमेरिकी दबाव जगजाहिर है। साउथ कोरिया में राष्ट्रपति जेल (अमेरिका का कितना हाथ- ये अंदरुनी लोग बताएँगे) में हैं। जापान ने अपनी सैन्य नीति परिवर्तित कर ली है। रूस भी अमेरिका के साथ पींगे बढ़ा रहा है। हर तरफ यही खेल, कि किस तरह से भारत को पंगु बनाया जाए।

देश की ताकत बनिए, कमजोर नहीं

अब ये आप लोगों पर है कि आप क्या सोचते हैं इस बारे में और देश के साथ इस स्थिति में कैसे खड़े होते हैं। पैनिक होती भीड़ की शक्ल में… या समझदार आत्मनिर्भर भारत के मजबूत प्रहरी की शक्ल में। ऐसे में पैनिक फैलाना बंद करें और देश के साथ मजबूती से खड़े हों। कोई भी स्थिति स्थाई नहीं होती, ये वक्त भी गुजर जाएगा। फिर रही बात ट्रंप की, तो 2-3 साल में उसका भी बोरिया बिस्तर सिमट जाएगा। भारत शान से आगे बढ़ता जाएगा, जिसपर आने वाले दशक में आपको भी गर्व होगा। और ये बात पूरी दुनिया को दिखेगी भी।

LPG, LNG और दुनिया को चलाने वाले अन्य पेट्रोलियम ईंधन: जानिए क्या हैं इनके बीच अंतर और भारत इन्हें कहाँ से लाता है

मिडिल ईस्ट युद्ध के कारण पेट्रोलियम ईंधन की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ गई है। कई देशों में पेट्रोल, डीजल और LPG जैसी चीजों की कमी होने लगी है। भारत में ज्यादातर पेट्रोकेमिकल उत्पादों की कमी नहीं है लेकिन कुछ जगहों पर LPG की कमी देखी गई है। इसलिए सरकार ने तय किया है कि घरेलू उपभोक्ताओं को परेशानी न हो और इसके लिए LPG की बिक्री व्यावसायिक संस्थानों के लिए सीमित की जाएगी।

इस कमी की मुख्य वजह यह है कि भारत पेट्रोलियम उत्पादों खासकर LPG के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। जीवाश्म ईंधन के दो मुख्य स्रोत होते हैं- कच्चा तेल (क्रूड ऑयल) और प्राकृतिक गैस। ज्यादातर तेल के कुओं से तेल और गैस दोनों निकलते हैं जबकि कुछ कुओं से केवल गैस ही मिलती है। बाद में इन दोनों को रिफाइनरियों में अलग-अलग पेट्रोलियम उत्पादों में बदला जाता है।

LNG vs LPG

इन दिनों LNG और LPG की सप्लाई को लेकर काफी चर्चा हो रही है। LNG और LPG दोनों गैस ईंधन हैं, जिन्हें आसानी से ले जाने और स्टोर करने के लिए तरल (लिक्विड) रूप में रखा जाता है। लेकिन इन दोनों की बनावट और स्रोत अलग-अलग होते हैं।

प्राकृतिक गैस जीवाश्म ईंधन के दो मुख्य स्रोतों में से एक है जबकि दूसरा कच्चा तेल (क्रूड ऑयल) है। गैस और कच्चे तेल दोनों से कई तरह के पेट्रोकेमिकल उत्पाद बनाए जाते हैं।

प्राकृतिक गैस अपने सामान्य रूप में बड़ी मात्रा में टैंकरों के जरिए स्टोर या ट्रांसपोर्ट नहीं की जा सकती क्योंकि गैस होने के कारण एक बड़े टैंकर में भी इसकी मात्रा कम ही आ पाती है। इसलिए प्राकृतिक गैस को ठंडा करके लगभग -161°C तापमान तक लाया जाता है जिस पर यह लिक्विड बन जाती है।

इसी तरल रूप को LNG कहा जाता है। इसे टैंकों में आसानी से स्टोर किया जा सकता है और बड़े LNG टैंकरों के जरिए लंबी दूरी तक ले जाया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि LNG कोई अलग पेट्रोलियम उत्पाद नहीं है बल्कि यह ठंडा करके तरल बनाई गई प्राकृतिक गैस ही होती है। कच्चे तेल की तरह प्राकृतिक गैस को भी रिफाइन करके कई तरह के हाइड्रोकार्बन उत्पाद बनाए जाते हैं।

LPG (Liquefied Petroleum Gas) कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस दोनों से बनने वाला ईंधन है। यह मुख्य रूप से प्रोपेन और ब्यूटेन गैस का मिश्रण होता है, जो गैस प्रोसेसिंग और तेल रिफाइनिंग के दौरान निकलते हैं। स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट के लिए इसे दबाव देकर तरल बनाया जाता है और इसलिए इसे LPG कहा जाता है। हालाँकि, इसे तरल बनाने के लिए ज्यादा दबाव नहीं लगता।

LNG में ज्यादातर मीथेन गैस होती है जबकि प्रोपेन और ब्यूटेन की मात्रा कम होती है। इसलिए LNG से LPG कम बनती है। दुनिया में ज्यादा LPG कच्चे तेल से बनती है क्योंकि उसमें कई तरह के हाइड्रोकार्बन होते हैं। भारत में LPG का सबसे ज्यादा उपयोग रसोई गैस के रूप में होता है। इसके अलावा छोटे उद्योग, हीटिंग, कृषि ड्रायर और कुछ पेट्रोकेमिकल उद्योगों में भी इसका उपयोग होता है।

LNG के भी कई उपयोग हैं। इसे एक खास टर्मिनल पर फिर से गैस बनाया जाता है और पाइपलाइन से भेजा जाता है। भारत में इससे मिलने वाली प्राकृतिक गैस का उपयोग बिजली उत्पादन, उर्वरक उद्योग, सिटी गैस नेटवर्क और वाहनों के लिए CNG बनाने में होता है।

भारत में कहाँ से आते हैं तेल और गैस?

भारत में तेल और गैस की जरूरत घरेलू उत्पादन और आयात दोनों से पूरी होती है। देश में कुछ कच्चा तेल समुद्र के अंदर के क्षेत्रों जैसे मुंबई हाई और जमीन पर मौजूद क्षेत्रों जैसे असम और गुजरात से निकलता है लेकिन यह देश की कुल जरूरत का केवल छोटा हिस्सा ही पूरा कर पाता है। इसलिए भारत को ज्यादातर कच्चा तेल बाहर से मँगाना पड़ता है जैसे- इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और रूस।

LNG के मामले में भी भारत आयात पर काफी निर्भर है क्योंकि देश में प्राकृतिक गैस का उत्पादन जरूरत से कम है। भारत को सबसे ज्यादा LNG कतर से मिलती है, इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात और अन्य देशों से भी सप्लाई होती है। इन आयातों का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है, जो दुनिया का एक अहम समुद्री ऊर्जा मार्ग है और अभी ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध के कारण प्रभावित है।

LPG का कुछ उत्पादन भारत में रिफाइनरी और गैस प्लांट्स में होता है लेकिन यह माँग के लिए काफी नहीं है। भारत हर साल लगभग 31 मिलियन टन LPG इस्तेमाल करता है जबकि देश में सिर्फ करीब 13 मिलियन टन ही बन पाती है। इसलिए भारत को बड़ी मात्रा में LPG आयात करनी पड़ती है। इसके मुख्य सप्लायर सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत हैं। हालाँकि, भारत हाल के समय में US जैसे अन्य देशों से भी आयात बढ़ा रहा है। कुल मिलाकर भारत की LPG जरूरत का करीब 40% देश में बनता है जबकि बाकी 60% आयात के जरिए आता है।

सिर्फ LPG की ही कमी क्यों?

अब सवाल उठता है कि जब LPG कच्चे तेल और LNG से बनती है, तो देश में पेट्रोल-डीजल की कमी नहीं है लेकिन LPG की कमी क्यों हो रही है।

इसकी मुख्य वजह रिफाइनरी की सीमाएँ हैं। तेल रिफाइनरी एक तय तकनीक और कच्चे तेल के हिसाब से बनी होती हैं। एक बैरल कच्चे तेल से कितना पेट्रोल, डीजल या LPG निकलेगी यह पहले से लगभग तय होता है। इसलिए अचानक LPG का उत्पादन बढ़ाना आसान नहीं होता। इसके लिए रिफाइनरी में बड़े बदलाव करने पड़ते हैं, जिसमें बहुत पैसा और कई साल लगते हैं।

प्रोपेन और ब्यूटेन जैसी गैसें सीमित मात्रा में ही निकलती हैं। इन्हें ज्यादा बढ़ाने के लिए या तो अन्य पेट्रोकेमिकल उत्पादों को कम करना पड़ेगा या नई महँगी मशीनें लगानी पड़ेंगी।

दूसरी वजह स्टोरेज और सप्लाई सिस्टम है। LPG को दबाव वाले टैंक और खास सिलेंडरों में ही रखा और ले जाया जा सकता है, इसलिए इसे ज्यादा मात्रा में जमा करना मुश्किल होता है। जबकि पेट्रोल और डीजल जैसे तरल ईंधन सामान्य टैंकों में आसानी से स्टोर किए जा सकते हैं। LPG की पूरी सप्लाई व्यवस्था लगातार चलने वाले सिस्टम पर आधारित है। यानी इसे लंबे समय तक बड़े भंडार के रूप में जमा करके नहीं रखा जाता। वहीं, कच्चे तेल, पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधनों के रणनीतिक भंडार बनाए जाते हैं जो लगभग दो महीने की माँग पूरी कर सकते हैं।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

बिहार के सारण का केस क्यों बना ‘राजपूत बनाम पासवान’, जानिए नाबालिग को गैंगरेप के बाद कुएँ में फेंककर मार डालने के मामले में अब तक क्या हुआ?

बिहार के सारण जिले के पट्टीशीतल गाँव में 10वीं कक्षा की छात्रा के गैंगरेप और हत्या का मामला सामने आया है। इस मामले में पीड़िता की माँ ने गाँव के ही 5 युवकों पर आरोप लगाए हैं जिनमें से एक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। आरोप है पाँचों ने गैंगरेप के बाद छात्रा को कुएँ में फेंक दिया था जिसके चलते उसकी मौत हो गई। इस घटना में पीड़िता के सवर्ण समाज (राजपूत) से होने और आरोपितों के महादलित (पासवान) होने के चलते सोशल मीडिया पर नैरेटिव वॉर भी चल रहा है।

पुलिस पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि घटना में जिस तरह से त्वरित कार्रवाई की जानी चाहिए थी वो नहीं की गई है और घटना के तीन दिन बाद भी सभी आरोपितों को नहीं पकड़ा गया है। इस पूरे मामले में पीड़ित पक्ष और प्रत्यक्षदर्शी के दावों को पुलिस अभी स्वीकार करने से भी बच रही है। इस रिपोर्ट में जानें कि इस विषय पर किस पक्ष का दावा क्या है और पुलिस पर क्या उठ रहे हैं सवाल?

पीड़िता की माँ ने शिकायत में क्या कहा?

पीड़िता की माँ ने इस संबंध में डेरनी थाने में शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में मृतका की माँ ने कहा है, “मेरी बेटी अपने पुराने घर पर समान लेने जाया करती हैं और बुधवार (11 मार्च 2026) को वह दोपहर के 03:00 बजे गई थी इसी बीच में पहले से घात लगाए बैठे 5 लोगों ने सामूहिक बलात्कार कर बेटी को घसीटते हुए कुएँ में डाल दिया जिससे उसकी मौत हो गई।”

इस मामले में 5 लोगों को नामजद आरोपित बनाया गया है जिसमें सचिन कुमार माँझी, युवराज माँझी, चंदन माँझी, अजय माँझी और विकास माँझी शामिल हैं। शिकायत में कहा गया है कि विकास माँझी ने एक बार और घर में घुस कर बलात्कार करने का प्रयास किया था और गाली-गलौज करते हुए कह रहा था कि ‘मैं घर में घुस कर सभी को मारुँगा’।

शिकायत में कहा गया है, “इसका विरोध करने पर पहले भी विकास ने धमकी दी थी कि इसका अंजाम बहुत बुरा होगा और उसने जो कहा उसका समय देखते हुए फायदा उठा कर 11 मार्च 2026 को अंजाम दे दिया जिससे मेरी पुत्री का उसी समय मौत हो गई। घटना के अंजाम देने के बाद सभी ने गाली गलौज की और बोला कि थाना-प्रशासन-कोर्ट हम खरीद लेंगे, हम लोगों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा ।”

मृतका की माँ ने पुलिस पर कार्रवाई ना करने का आरोप लगाया है और उनका कहना है कि पुलिस आई और बस चली गई।

घटना के प्रत्यक्षदर्शी ने क्या बताया?

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि घटना के दौरान लड़की जोर-जोर से बचाओ-बचाओ चिल्ला रही थी। उसकी चीख-पुकार सुनकर आसपास के लोग और परिवार के सदस्य तुरंत मौके की ओर दौड़े। सबसे पहले उसकी माँ और बड़ी बहन वहाँ पहुँचने के लिए भागीं लेकिन उनके पहुँचने से पहले ही आरोपितों ने युवती का मुँह दबा दिया और इसके बाद वे उसे जबरन पैर से घसीटते हुए घर के बाहर ले गए।

प्रत्यक्षदर्शी का कहना है कि आरोपित युवती को करीब 10 मीटर दूर स्थित एक कुएँ तक ले गए और वहाँ उसे धक्का देकर कुएँ में गिरा दिया। घटना को अंजाम देने के बाद सभी आरोपित मौके से भागकर पास के खेतों की ओर फरार हो गए।

प्रत्यक्षदर्शी का कहना है कि आरोपित पहले भी लड़की को परेशान कर रहा था और उसे कई बार धमकी दे चुका था। प्रत्यक्षदर्शी के मुताबिक, छात्रा को कुएँ में धकेलने के बाद मुख्य आरोपित ने वॉट्सऐप पर भोजपुरी सॉन्ग का स्टेटस लगाया था। इसमें आरोपित ने ‘रानी हम बना लेहब तोहरा के दुल्हिनियाँ…अगर कोई बोला तो घर में घुसकर सबको मार डालेंगे’ पर लिप्सिंग की थी।

पुलिस ने अभी नहीं मानी गैंगरेप की बात, जानें क्या कहा?

सारण पुलिस ने इस संबंध में सोशल मीडिया पर जो बयान जारी किया है उसमें गैंगरेप या रेप की बात का जिक्र नहीं किया गया है। पुलिस ने बताया कि इस मामले में युवराज माँझी को गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस ने कहा, “एक नाबालिग लड़की की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु होने की सूचना प्राप्त मिली जिसके बाद पुलिस ने घटनास्थल पर जाकर कार्रवाई की। SP और SDPO ने घटनास्थल का दौरा किया और FSL की टीम ने भी सबूतों को परीक्षण किया। आरोपित युवराज कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया है और अन्य लोगों की गिरफ्तारी के लिए छाेपमारी की जा रही है।”

सारण के SSP विनीत कुमार का कहना है कि हमें बताया गया है कि कुएँ में कूदने से नाबालिग बच्ची की मृत्यु हो गई थी। विनीत कुमार ने कहा कि मामले में SIT का गठन किया गया है और पुलिस को पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का इंतजार है।

इस घटना को लेकर सारण (ग्रामीण) SP संजय कुमार ने ‘ऑपइंडिया’ से बातचीत में कहा कि पुलिस इस मामले पर त्वरित कार्रवाई कर रही है और जल्द ही अन्य आरोपितों को भी पकड़ लिया जाएगा।

सोशल मीडिया पर चल रहा ‘महादलित बनाम सवर्ण नैरेटिव’

इस घटना के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर राजपूत बनाम पासवान का नैरेटिव भी खूब चल रहा है। कई लोगों ने पुलिस के रवैये पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि पुलिस द्वारा त्वरित कार्रवाई ना करने के चलते यह माहौल बन रहा है।

सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर राणा दीपू सिंह ने ‘ऑपइंडिया’ को बताया कि वो अपने साथियों के साथ पट्टीशीतल गाँव गए थे और लोगों से बात की और पता चला कि वहाँ पर 5 आरोपित वो मौके पर देखे गए थे। दीपू सिंह का कहना है कि इस पूरे मामले में पुलिस का रवैया उदासीन रहा है और पुलिस ने त्वरित कार्रवाई नहीं है। उनका कहना है कि इस मामले में केवल एक शख्स गिरफ्तार है और मुख्य आरोपित फरार है और बाकियों का भी नहीं पता है।

परसा से RJD की विधायक करिश्मा राय भी मौके पर गई थीं लेकिन उन्होंने भी इस मामले पर कोई बयान जारी नहीं किया है। परसा से RJD की विधायक करिश्मा राय भी मौके पर गई थीं लेकिन उन्होंने भी इस मामले पर कोई बयान जारी नहीं किया है। जाति को लेकर जारी विवाद पर उन्होंने कहा कि हम इसे जाति के एंगल से नहीं देख रहे हैं लेकिन अपराधियों पर सख्त कार्रवाई होनी ही चाहिए। उनका कहना है कि अगर घटना में उल्टा होता यानि पीड़िता दलित या महादलित होती और आरोपित सवर्ण समाज से होते तो भी क्या इसी तरह का रवैया अपनाया जाता।

राणा दीपू सिंह ने अपने साथियों संग किया गाँव का दौरा

जाति से कुछ लेना-देना नहीं, कड़ी कार्रवाई हो: करिश्मा राय

‘ऑपइंडिया’ ने इस मामले पर विधायक करिश्मा राय से भी बातचीत की है। राय का कहना है कि उन्होंने खुद जाकर घटनास्थल का दौरा किया था। राय ने कहा कि यह घटना वीभत्स है और आरोपितों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि हैवान किसी भी जाति का हो वो हैवान ही होता है और ऐसी हैवानियत पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई किए जाने की जरूरत है।

इस पूरे मामले ने एक बार फिर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर पीड़िता के परिवार और प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि यह गैंगरेप के बाद की गई निर्मम हत्या है तो वहीं दूसरी ओर पुलिस फिलहाल इसे संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत बताते हुए पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और अन्य फॉरेंसिक साक्ष्यों का इंतजार कर रही है। ऐसे में सच क्या है, यह अंतिम रूप से जाँच और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर ही स्पष्ट हो पाएगा।

हालाँकि, इस तरह की संवेदनशील घटनाओं में पुलिस की कार्रवाई बेहद महत्वपूर्ण होती है। जब परिवार और स्थानीय लोग आरोप लगा रहे हों और सभी नामजद आरोपितों की गिरफ्तारी अभी तक न हुई हो तब स्वाभाविक रूप से प्रशासन पर सवाल उठते हैं। इससे समाज में अविश्वास का माहौल बनता है। यही कारण है कि इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर जातिगत नैरेटिव भी तेजी से उभरने लगे हैं।

ईरान जंग पर ट्रंप की अग्निपरीक्षा: युद्ध रोकने को लेकर व्हाइट हाउस के भीतर मची खींचतान, जानें- अमेरिका की अर्थव्यवस्था और ‘हार के डर’ को लेकर क्या हैं चिंताएँ

वॉशिंगटन के गलियारों से जो खबरें निकलकर आ रही हैं, वो बताती हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बड़ी उलझन में फँस गए हैं। स्थिति ऐसी है कि एक तरफ तो ईरान के साथ असली युद्ध चल रहा है, जहाँ मिसाइलें और ड्रोन चल रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ ट्रंप के अपने घर यानि ‘व्हाइट हाउस’ के अंदर ही उनके सलाहकारों के बीच बहस छिड़ी हुई है। ट्रंप समझ नहीं पा रहे हैं कि दुनिया के सामने कब और किस तरह यह कहें कि ‘हमने जंग जीत ली है।’ मुसीबत यह है कि जैसे-जैसे मिडिल ईस्ट में यह लड़ाई बढ़ रही है, इसका असर अमेरिका के आम लोगों की जेब पर दिखने लगा है, क्योंकि वहाँ पेट्रोल-डीजल की कीमतें तेजी से ऊपर जा रही हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या ट्रंप इस युद्ध को इसलिए रोकेंगे क्योंकि उनके पास कोई और रास्ता नहीं बचा है, या फिर यह उनका कोई सोचा-समझा मास्टरस्ट्रोक होगा? ट्रंप ने चुनाव के समय वादा किया था कि वे अमेरिका को फालतू की लड़ाइयों में नहीं झोकेंगे, लेकिन अब वे खुद एक बड़े युद्ध के बीच खड़े हैं। अगर वे अभी हमला रोक देते हैं और ईरान की सरकार पहले की तरह टिकी रहती है, तो दुनिया में यह संदेश जा सकता है कि अमेरिका अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाया। इसे एक तरह से अमेरिका की ‘दबी हुई हार’ के रूप में देखा जा सकता है, क्योंकि जिस दुश्मन को खत्म करने वे निकले थे, वह तो अपनी जगह पर कायम है।

अंत में सारा मामला इस बात पर टिका है कि ट्रंप अपनी छवि बचाते हैं या अपनी अर्थव्यवस्था। अगर पेट्रोल की कीमतें और बढ़ीं, तो अमेरिका के अंदर ही उनके खिलाफ माहौल बन सकता है। वहीं अगर वे बिना ईरान को पूरी तरह झुकाए पीछे हटते हैं, तो उनके विरोधी उन्हें कमजोर कहेंगे। ट्रंप फिलहाल एक ऐसे मोड़ पर हैं जहाँ से लिया गया हर फैसला बहुत जोखिम भरा है।

व्हाइट हाउस में दो फाड़: अर्थशास्त्री बनाम युद्ध समर्थक

जानकारी के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप की अपनी टीम में ही इस समय दो गुट बन गए हैं और दोनों के बीच जबरदस्त खींचतान चल रही है। एक गुट उन लोगों का है जो देश की अर्थव्यवस्था और राजनीति को संभालते हैं। इनका कहना है कि अगर यह युद्ध और लंबा खिंचा, तो पेट्रोल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। उन्हें डर है कि अगर आम जनता को महँगा पेट्रोल खरीदना पड़ा, तो वे ट्रंप के खिलाफ हो जाएँगे और उनका समर्थन करना बंद कर देंगे। इसलिए, ये सलाहकार ट्रंप को समझा रहे हैं कि हमें अब युद्ध रोक देना चाहिए और दुनिया से कह देना चाहिए कि हमने अपना काम पूरा कर लिया है।

वहीं दूसरी तरफ, ट्रंप की टीम में कुछ ऐसे नेता भी हैं जो युद्ध को जारी रखने के पक्ष में हैं। उनका मानना है कि अगर अभी हमला रोक दिया गया, तो ईरान इसे अपनी जीत समझेगा और बहुत जल्द परमाणु बम बना लेगा। उन्हें डर है कि अधूरा छोड़ा गया काम आगे चलकर अमेरिकी सैनिकों के लिए और भी बड़ा खतरा बन सकता है। उनका तर्क है कि ईरान को अभी पूरी तरह कमजोर करना जरूरी है।

अब राष्ट्रपति ट्रंप इन दोनों गुटों के बीच बुरी तरह फँसे हुए हैं। वे एक तरफ अपने उन समर्थकों को खुश रखना चाहते हैं जिन्होंने उन्हें इसलिए वोट दिया था क्योंकि उन्होंने दावा किया था कि वे अमेरिका को किसी नई जंग में नहीं फँसाएँगे। लेकिन दूसरी तरफ, वे दुनिया को यह भी दिखाना चाहते हैं कि वे एक मजबूत नेता है और दुश्मनों को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे। इसी दुविधा की वजह से वे कोई एक ठोस फैसला नहीं ले पा रहे हैं।

क्या युद्ध रोकने का मतलब ‘हार’ होगा?

अगर राष्ट्रपति ट्रंप आज अचानक युद्ध रोकने और अपनी सेना को वापस बुलाने का फैसला करते हैं, तो दुनिया इसे अलग-अलग नजरिए से देखेगी। सबसे बड़ी बात तो यह है कि अमेरिका का मकसद अधूरा रह जाएगा। जब यह लड़ाई शुरू हुई थी, तब अमेरिका ने कहा था कि वह ईरान की सरकार को बदल देगा या उसके परमाणु प्रोग्राम को पूरी तरह खत्म कर देगा। लेकिन अगर ईरान की सरकार अपनी जगह टिकी रहती है, तो दुनिया भर के लोग यही कहेंगे कि अमेरिका वह नहीं कर पाया जो उसने ठान रखा था। इसे एक अधूरी जीत ही माना जाएगा।

वहीं दूसरी ओर, ईरान इस स्थिति का पूरा फायदा उठाएगा। जानकारों का मानना है कि इतनी भारी बमबारी झेलने के बाद भी अगर ईरान का ढांचा और सरकार बच जाती है, तो वह इसे अपनी बहुत बड़ी जीत बताएगा। वह पूरी दुनिया में ढिंढोरा पीटेगा कि उसने सबसे ताकतवर देश अमेरिका को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। इससे ईरान का मनोबल और बढ़ जाएगा और वह अपने समर्थकों के बीच पहले से ज्यादा मजबूत होकर उभरेगा।

इसके अलावा, इसमें एक बड़ा खतरा यह भी है कि अगर युद्ध अभी रुक जाता है, तो ईरान के पास हथियार बनाने का सामान, जैसे- यूरेनियम, मिसाइलें और ड्रोन अभी भी बचे हुए हैं। इसका मतलब यह हुआ कि जंग रुकने के बाद ईरान चुप नहीं बैठेगा, बल्कि वह और भी ज्यादा खतरनाक बन सकता है। ईरान दोबारा अपनी ताकत जुटाएगा और भविष्य में अमेरिका या उसके साथियों के लिए पहले से कहीं बड़ी चुनौती पेश कर सकता है।

वेनेजुएला वाली ‘गलतफहमी’ और ईरान की हकीकत

खबरों की मानें तो राष्ट्रपति ट्रंप को लगा था कि ईरान को हराना उतना ही आसान होगा जितना वेनेजुएला के साथ हुआ था। अभी इसी साल जनवरी में जिस तरह एक छोटी सी कार्रवाई में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ लिया गया और वहाँ के तेल के कुओं पर कब्जा हो गया, ट्रंप को लगा कि ईरान में भी बस कुछ दिनों की ‘सैर’ (छोटी कार्रवाई) जैसी बात होगी। लेकिन ईरान उम्मीद से कहीं ज्यादा सख्त निकला। उसके पास ने सिर्फ अच्छे हथियार हैं, बल्कि वहाँ की सरकार और लोग भी अपनी विचारधारा पर अड़े हुए हैं। ट्रंप ने जैसा सोचा था वैसा कुछ नहीं हुआ, न तो वहाँ की सरकार गिरी और न ही वहाँ के लोग अपनी सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरे। इस वजह से ट्रंप की पूरी प्लानिंग फेल होती नजर आ रही है।

अब ट्रंप के सामने एक बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई है। अगर उन्हें तेल की सपलाई फिर से शुरू करानी है और दुनिया भर में बढ़ती पेट्रोल की कीमतों को रोकना है, तो उन्हें इस समुद्री रास्ते को सुरक्षित बनाना होगा। लेकिन इसे सुरक्षित करने का इकलौता तरीका यह है कि वे अपनी सेना को ईरान की जमीन पर उतारें और वहाँ कब्जा करें। ट्रंप हमेशा से कहते आए हैं कि वे अपनी सेना को ऐसी ‘बेवकूफाना’ जमीनी लड़ाइयों में नहीं झोकना चाहते जहाँ अमेरिकी सैनिकों की जान जाए। लेकिन दूसरी तरफ, तेल की कमी की वजह से जो महँगाई बढ़ रही है, उसे रोकने के लिए उनके पास अब ऑप्शन खत्म होते जा रहे हैं।

घरेलू राजनीति और मिड टर्म चुनाव

अमेरिका में इसी साल नवंबर के महीने में चुनाव होने वाले हैं। ट्रंप और उनकी पार्टी के लिए ये चुनाव बहुत जरूरी हैं क्योंकि वे संसद में अपनी ताकत और अपनी कुर्सी बचाए रखना चाहते हैं। ऐसे समय में कोई भी नेता नहीं चाहता कि जनता उससे नाराज हो। लेकिन ईरान के साथ चल रहा यह युद्ध ट्रंप के लिए गले की हड्डी बन गया है।

अमेरिका के आम चुनाव में एक पुरानी कहावत है कि वहाँ का वोटर ‘लोकतंत्र’ जैसी बड़ी-बड़ी बातों से ज्यादा अपनी जेब की परवाह करता है। अमेरिकी लोगों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि उनकी गाड़ी में डलने वाले पेट्रोल (गैस) की कीमत क्या है। अगर यह युद्ध ऐसे ही खिंचता रहा और पेट्रोल के दाम 5-6 डॉलर तक पहुँच गए, तो लोग महँगे पेट्रोल का गुस्सा ट्रंप पर निकालेंगे। इससे ट्रंप की लोकप्रियता तेजी से गिर सकती है और वे चुनाव हार भी सकते हैं।

इसके अलावा, ट्रंप के अपने कुछ बहुत खास दोस्त और सलाहकार, जैसे स्टीव बैनन और टकर कार्लसन, उन्हें लगातार एक ही बात याद दिला रहे हैं। उनका कहना है कि ‘ट्रंप साहब, जनता आपको दोबारा चुनकर इसलिए लाई थी ताकि आप दुनिया भर में चल रही लड़ाइयों को रुकवा सकें, न कि अमेरिका को किसी नए और बड़े युद्ध में फँसा दें।’ ये लोग ट्रंप पर दबाव बना रहे हैं कि वे अपने वादे पर कायम रहें और इस जंग को जल्दी खत्म करें, वरना उनके अपने समर्थक ही उनसे मुँह मोड़ सकते हैं।

ईरान का परमाणु कार्ड: सबसे बड़ी चिंता

खुफिया जानकारी देने वाली एजेंसियों का कहना है कि ईरान के पास परमाणु बम बनाने वाला सामान (यूरेनियम) बहुत बड़ी मात्रा में मौजूद है। भले ही अमेरिका ने ऊपर से खूब बम बरसाए हों, लेकिन ईरान ने अपना कीमती सामान और परमाणु मशीनें जमीन के बहुत नीचे गहरे बंकरों में छुपा रखी हैं। डर इस बात का है कि अगर अमेरिका अभी हमला रोक देता है और अपनी सेना हटा लेता है, तो ईरान उस सामान को बाहर निकालकर कुछ ही हफ्तों के भीतर परमाणु बम तैयार कर सकता है।

इसी वजह से ईरान के पड़ोसी देश, जैसे सऊदी अरब और UAE, काफी घबराए हुए हैं। उन्हें लग रहा है कि अमेरिका ने यह लड़ाई शुरू तो कर दी, लेकिन अब वह बिना काम पूरा किए ही उन्हें बीच रास्ते में छोड़कर भाग रहा है। इन देशों को डर है कि अमेरिका के जाने के बाद ईरान पहले से भी ज्यादा ताकतवर और खतरनाक हो जाएगा और फिर वह अपने इन पड़ोसी देशों को परेशान करेगा। उन्हें लगता है कि अगर इस बार ईरान का परमाणु प्रोग्राम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ, तो आने वाले समय में उनके लिए बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी हो जाएगी।

ट्रंप के लिए ‘नो-विन’ सिचुएशन?

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस समय एक ऐसे जाल में फँस गए हैं जहाँ से निकलना बहुत मुश्किल है। उनके सामने ऐसी स्थिति है कि वे न तो इस युद्ध को पूरी तरह जीत पा रहे हैं और न ही आसानी से इस लड़ाई को बंद कर पा रहे हैं।

ट्रंप का सबसे बड़ा वादा था ‘अमेरिका फर्स्ट’ यानी अमेरिका को दुनिया की लड़ाइयों से दूर रखकर अपने देश को मजबूत बनाना। लेकिन अब उनका यह वादा उनके ‘कमांडर’ वाले रूप से टकरा रहा है। मुसीबत यह है कि अगर वे अभी युद्ध रोक देते हैं, तो इजरायल और उनकी अपनी पार्टी के कुछ सख्त नेता उन्हें ‘डरपोक’ या ‘कमजोर’ कहेंगे। लेकिन अगर वे युद्ध जारी रखते हैं, तो अमेरिका की अर्थव्यवस्था (पैसे और बाजार की हालत) बिगड़ सकती है और पूरा मिडिल ईस्ट एक ऐसी भयानक आग में जल सकता है जिसे बुझाना नामुमकिन हो जाएगा।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि ट्रंप जिस मकसद से युद्ध में उतरे थे यानी ईरान की सरकार को उखाड़ फेंकना… वह अभी पूरा होता नहीं दिख रहा। जासूसी एजेंसियाँ साफ कह रही हैं कि ईरान की सरकार इतनी जल्दी गिरने वाली नहीं है। ऐसे में मुमकिन है कि ट्रंप कोई बीच का रास्ता चुनें। वे ईरान के कुछ और बड़े ठिकानों पर बमबारी करके दुनिया से कह सकते हैं कि ‘हमारा काम पूरा हुआ’ और फिर से पुराने तरीके से ईरान पर पाबंदियाँ लगाना शुरू कर दें। यह ट्रंप के लिए उनके पूरे कार्यकाल की सबसे बड़ी और कठिन परीक्षा है।

मिडिल ईस्ट युद्ध के बीच PM मोदी को क्यों माना जा रहा है बेस्ट मीडिएटर? विदेश यात्राओं पर तंज कसने वालों को दुनिया के एक्सपर्ट्स ने दिया जवाब: समझें इसके मायने

भारत में कई वर्षों से एक राजनीतिक बहस चलती रही है। जब भी पीएम मोदी किसी विदेशी दौरे पर जाते हैं, तो विपक्ष और कुछ आलोचक सवाल उठाते हैं कि क्या इन यात्राओं से वास्तव में कोई फायदा होता है? कई बार इन्हें ‘इवेंट डिप्लोमेसी’ कहकर भी निशाना बनाया गया। लेकिन मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध और तनाव के बीच जिस तरह अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ और कूटनीतिक हलकों में मोदी का नाम मध्यस्थ के रूप में सामने आ रहा है, उसने इस बहस को नया मोड़ दे दिया है।

अमेरिका और अरब देशों के विशेषज्ञ अब खुलकर कह रहे हैं कि यदि मिडिल ईस्ट में बढ़ते संघर्ष को रोकना है, तो उन नेताओं में से एक व्यक्ति जो सभी पक्षों से बात कर सकता है, वह भारत के प्रधानमंत्री हैं।

दरअसल, पिछले कुछ दिनों में मिडल ईस्ट में तनाव ने पूरे विश्व को चिंता में डाल दिया है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनी की मौत हो गई। इसके बाद ईरान ने जवाबी हमले किए और क्षेत्रीय सुरक्षा पूरी तरह से बिगड़ गई। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार (12 मार्च 2026) को ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से टेलीफोन पर बात की। उन्होंने क्षेत्र में बढ़ते तनाव, नागरिकों की मौत और बुनियादी ढाँचे को हुए नुकसान पर गहरी चिंता जताई।

पीएम मोदी ने स्पष्ट कहा कि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा, फारस की खाड़ी से सामान और ऊर्जा का निर्बाध प्रवाह भारत की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। उन्होंने शांति और स्थिरता के लिए बातचीत और कूटनीति की अपील की।

यह बातचीत कोई सामान्य कॉल नहीं थी। यह उस समय हुई जब ईरान-अमेरिका-इजराइल के बीच युद्ध की आशंका चरम पर है। सोशल मीडिया पर पीएम मोदी ने खुद लिखा, “क्षेत्र में तनाव बढ़ने और नागरिकों की मौत तथा बुनियादी ढाँचे को नुकसान पर गहरी चिंता व्यक्त की। भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और सामान व ऊर्जा के निर्बाध परिवहन को भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता बताया।”

इस एक कॉल ने दुनिया को दिखा दिया कि भारत की आवाज अब सिर्फ एशिया की नहीं, बल्कि वैश्विक शांति की भी है। जो लोग सालों से पीएम मोदी की विदेश यात्राओं पर तंज कसते रहे, उन्हें अब जवाब मिल गया है। वे कहते थे कि मोदी विदेश घूमने के शौकीन हैं, टैक्सपेयर का पैसा बर्बाद करते हैं, कुछ हासिल नहीं होता।

इस बीच, यूएई के पूर्व राजदूत हुसैन हसन मिर्जा ने कहा, “पीएम मोदी का एक फोन कॉल ही इस युद्ध को रोक सकता है।” उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी का क्षेत्र में काफी सम्मान है। उनका कहना था कि अगर मोदी किसी भी पक्ष से बात करते हैं तो उसकी गंभीरता होती है और कई बार सिर्फ एक फोन कॉल भी तनाव कम करने में मदद कर सकती है।

मिडिल ईस्ट संकट के बीच कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने भी भारत और प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका पर ध्यान दिलाया है। अमेरिकी सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी डगलस मैकग्रेगर ने भी कहा, “युद्ध रोकने के लिए मध्यस्थ की जरूरत है और नरेंद्र मोदी सबसे उपयुक्त हैं।”

उन्होंने साफ कहा कि इस युद्ध को रोकने के लिए किसी मजबूत और विश्वसनीय मध्यस्थ की जरूरत है। उनके अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन नेताओं में शामिल हैं जो यह भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी की खासियत यह है कि वह सभी पक्षों से संवाद कर सकते हैं और उनकी बात को गंभीरता से सुना जाता है।

पीएम मोदी ही क्यों सबसे बेहतर मध्यस्थ?

आज की दुनिया में बहुत कम नेता ऐसे हैं जो युद्ध के दोनों पक्षों से खुलकर बात कर सकें। ईरान-अमेरिका-इजराइल संघर्ष में ऐसा नेता और भी कम है। लेकिन पीएम मोदी उन दुर्लभ नेताओं में से एक हैं जो दोनों पक्षों और पूरे क्षेत्र के प्रमुख देशों से सीधा संवाद रखते हैं। उन्होंने ईरानी राष्ट्रपति से बात की, तो इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से भी बात की। इसके अलावा कतर, सऊदी अरब, कुवैत, जॉर्डन, ओमान और संयुक्त अरब अमीरात के नेताओं से भी संपर्क किया, जिन पर ईरान के जवाबी हमले हुए थे।

यह संतुलित संपर्क भारत की विदेश नीति का नतीजा है। भारत ने कभी क्षेत्र को ब्लॉक या गठबंधन के नजरिए से नहीं देखा। हमने इजराइल के साथ रक्षा साझेदारी मजबूत की, तो ईरान के साथ ऐतिहासिक और ऊर्जा संबंध बनाए रखे। सऊदी अरब, यूएई, कतर और कुवैत जैसे देशों के साथ आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी बढ़ाई। इसी वजह से क्षेत्र के सभी देश भारत को निष्पक्ष और विश्वसनीय समझते हैं। कोई भी पक्ष सोचता नहीं कि भारत किसी का पक्ष ले रहा है। यही वजह है कि अमेरिकी विशेषज्ञ डगलस मैकग्रेगर कह रहे हैं कि मोदी ही एकमात्र ऐसे नेता हैं जो दोनों पक्षों को मेज पर ला सकते हैं।

भारत की बढ़ती भूमिका और स्थिरता की आवाज

भारत की अर्थव्यवस्था और रणनीतिक ताकत तेजी से बढ़ रही है। पश्चिम एशिया में भारत अब सिर्फ तेल खरीदने वाला देश नहीं रहा। हम वहां निवेश कर रहे हैं, बंदरगाह बना रहे हैं, व्यापार बढ़ा रहे हैं। क्षेत्र के नेता भारत को स्थिरता देने वाली शक्ति मानते हैं। इसलिए जब पीएम मोदी क्षेत्र में तनाव कम करने की अपील करते हैं तो उनकी बात का वजन होता है। उन्होंने हर बातचीत में एक ही संदेश दिया कि बढ़ते तनाव से बचो, कूटनीति अपनाओ, मानवीय पहलुओं का ध्यान रखो और बड़े क्षेत्रीय युद्ध को रोको।

रूस-यूक्रेन युद्ध के समय भी पीएम मोदी ने यही रुख अपनाया था। उन्होंने व्लादिमीर पुतिन और वोलोदिमीर जेलेंस्की दोनों से बात की और शांति की अपील की। उस समय भी आलोचक कहते थे कि मोदी कुछ नहीं कर पाएंगे। लेकिन आज मिडल ईस्ट में वही नीति काम आ रही है। भारत की संतुलित नीति ने हमें वह विश्वास दिलाया है जो किसी और देश के पास नहीं है।

विशेषज्ञों ने दे दिया आलोचकों को सीधा जवाब

जो लोग कहते हैं कि पीएम मोदी की विदेश यात्राएं सिर्फ दिखावा हैं, उन्हें अब सोचना चाहिए। बहरहाल, जब यूएई के पूर्व राजदूत हुसैन हसन मिर्जा साफ कहते हैं कि पीएम मोदी का एक फोन कॉल इस मुद्दे को सुलझा सकता है। तो वे जानते हैं कि मोदी गल्फ क्षेत्र में कितने सम्मानित हैं। डगलस मैकग्रेगर ने भी कहा कि मोदी इजराइल से अच्छे संबंध रखते हैं, ईरान से भी और चीन से भी उचित संबंध हैं। यही वजह है कि वे मध्यस्थ बन सकते हैं।

भारत की कूटनीति का नया अध्याय

यह कॉल सिर्फ एक फोन नहीं था। यह भारत की वैश्विक भूमिका का प्रतीक है। जब दुनिया दो धड़ों में बंट रही है, तब भारत संतुलन बना रहा है। पीएम मोदी ने हमेशा कहा है कि युद्ध कोई समाधान नहीं। बातचीत ही रास्ता है। आज जब ईरान के साथ Strait of Hormuz बंद होने का खतरा है और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो रही है, तब भारत की आवाज महत्वपूर्ण हो जाती है।

क्या भारत भविष्य में मध्यस्थ बन सकता है?

यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि भारत आधिकारिक रूप से किसी युद्ध में मध्यस्थ की भूमिका निभाएगा या नहीं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि आज दुनिया के कई देश भारत को एक जिम्मेदार और संतुलित शक्ति के रूप में देख रहे हैं। यदि भविष्य में किसी तरह की शांति प्रक्रिया शुरू होती है, तो यह संभव है कि भारत की भूमिका उसमें महत्वपूर्ण हो।

मिडिल ईस्ट का मौजूदा संकट सिर्फ क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए भी चुनौती है। ऐसे समय में जिन देशों और नेताओं पर सभी पक्ष भरोसा कर सकें, उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की राय यह संकेत देती है कि भारत की कूटनीतिक स्थिति पिछले वर्षों में काफी मजबूत हुई है।

वर्षों से बनाए गए संबंध, संतुलित विदेश नीति और सभी पक्षों से संवाद की क्षमता ने भारत को एक ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है जहाँ उसकी आवाज को गंभीरता से सुना जा रहा है। इसलिए जब आज कुछ विशेषज्ञ यह कहते हैं कि मिडिल ईस्ट में शांति की कोशिशों में मोदी की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, तो यह सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं बल्कि भारत की बदलती वैश्विक स्थिति का संकेत भी है।

Exclusive: देशद्रोह केस में जेल जाने वाला JNU का स्कॉलर चिंगीज खान अब जामिया में दे रहा ‘शिक्षा’, जानिए कैसे ‘इस्लाम’ के नाम पर ‘पढ़ाई वाला गैंग’ करता है काम

जामिया मिल्लिया इस्लामिया एक बार फिर विवादों में आ गया है। इस बार विश्वविद्यालय में चिंगीज खान नाम के एक विवादित व्यक्ति की फैकल्टी के रूप में नियुक्ति को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

दरअसल, चिंगीज खान को जामिया मिल्लिया इस्लामिया के सेंटर फॉर कम्पेरेटिव रिलिजन्स एंड सिविलाइजेशंस (CCRC) में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त किया गया है। चिंगीज खान वही पूर्व जेएनयू ‘स्कॉलर’ हैं, जिस पर अप्रैल 2020 में देशद्रोह का मामला दर्ज हुआ था।

देशद्रोह के आरोप झेल चुके व्यक्ति को जामिया जैसे सार्वजनिक शोध विश्वविद्यालय में नियुक्त किए जाने को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं और यह मामला एक बार फिर विश्वविद्यालय को विवादों के घेरे में ले आया है।

चिंगिज खान की गूगल स्कॉलर प्रोफाइल

नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर सवाल अभी भी बने हुए हैं। इसी बीच एक दिलचस्प तथ्य यह भी सामने आया है कि चिंगीज खान ने जुलाई 2025 में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के वाइस चांसलर मजहर आसिफ के साथ मिलकर एक शोध-पत्र सह-लेखन यानि (co-author) किया था।

संयोग से उस शोध-पत्र का शीर्षक था ‘पूर्वोत्तर भारत में मुसलमानों के बसने और पलायन की ऐतिहासिक जड़ों का पता लगाना: असम और मणिपुर का एक केस स्टडी’

अब चिंगीज खान की जामिया मिल्लिया इस्लामिया में सेंटर फॉर कम्पेरेटिव रिलिजन्स एंड सिविलाइजेशंस (CCRC) में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति के बाद, उनके और वाइस चांसलर के बीच पहले से रहे इस अकादमिक सहयोग को लेकर भी चर्चाएँ तेज हो गई हैं।

रिसर्च पेपर का स्क्रीनशॉट

राजद्रोह के लिए गिरफ्तारी

अप्रैल 2020 में विवादित जेएनयू ‘स्कॉलर’ चिंगिज खान को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। बाद में उनके खिलाफ समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने, पब्लिक मिसचीफ और आपराधिक साजिश जैसे आरोपों में भी मामला दर्ज किया गया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, चिंगीज खान ने एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने मणिपुर में पांगल मुसलमानों के ‘सिस्टमेटिक पर्सिक्यूशन’ (संगठित उत्पीड़न) का दावा किया था, जिसे भ्रामक और दुर्भावनापूर्ण बताया गया। हालाँकि, इन आरोपों के बावजूद उन्हें 7 दिनों के भीतर जमानत मिल गई थी। उस न्यूजक्लिक, मकतूब मीडिया आउटलुक और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) ने भी उनके समर्थन में खुलकर मोर्चा संभाला था।

उनकी गिरफ्तारी के बाद समर्थकों ने इसे ‘सांप्रदायिक विच-हंट’ करार दिया था। इस दौरान जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (JNUSU) के पूर्व अध्यक्ष ने भी चिंगिज खान के समर्थन में ट्वीट किया था।

वही विवादित व्यक्ति चिंगिज खान अब जामिया मिलिया इस्लामिया के सेंटर फॉर कम्पेरेटिव रिलिजन्स एंड सिविलाइजेशंस (CCRC) में पढ़ा रहे हैं, जहाँ उन्हें असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर नियुक्त किया गया है।

बंगाल चुनाव से पहले CEC ज्ञानेश कुमार के ‘महाभियोग’ की माँग, TMC का दाँव: जानिए कैसे ममता बनर्जी ने राजनीतिक ड्रामा और सार्वजनिक प्रदर्शन को बनाया चुनावी हथियार

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव नजदीक आने के बीच तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) ने भारत के चुनाव आयोग (ECI) के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने का प्रस्ताव रखा है।

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली इस पार्टी को इस कदम के लिए कॉन्ग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य सहयोगी दलों का समर्थन भी मिला है। इन दलों ने मिलकर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव (Impeachment Motion) लाने की तैयारी की है।

इस दिशा में तृणमूल कॉन्ग्रेस ने लोकसभा में पेश किए जाने वाले नोटिस के लिए 120 सांसदों और राज्यसभा में दिए जाने वाले नोटिस के लिए 60 सांसदों के हस्ताक्षर भी जुटा लिए हैं।

ममता बनर्जी के शस्त्रागार में दो हथियार

पश्चिम बंगाल चुनाव से ठीक पहले यह कदम क्यों उठाया गया? और क्या विपक्षी दलों खासतौर पर तृणमूल कॉन्ग्रेस को यह नहीं पता कि यह ‘महाभियोग प्रस्ताव’ किसी ठोस नतीजे तक शायद ही पहुँचेगा? आखिर एक दिन पहले ही ओम बिरला को हटाने की विपक्ष की कोशिश नाकाम हो चुकी है। दरअसल, इसे ममता बनर्जी की चुनावी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, जो अक्सर राजनीतिक ड्रामा और सार्वजनिक प्रदर्शन के इर्द-गिर्द घूमती है।

कई विश्लेषकों का मानना है कि जब भी ममता बनर्जी अपने राजनीतिक करियर में घिरती हुई महसूस करती हैं या उनकी महत्वाकांक्षी राजनीति में ठहराव आता है, तब वह किसी बड़े सार्वजनिक मुद्दे या राजनीतिक नाटक के जरिए फिर से सुर्खियों में आने की कोशिश करती हैं।

उदाहरण के तौर पर 1993 में उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के खिलाफ एक विरोध मार्च और चुनावी साजिश के आरोपों को लेकर बड़ा आंदोलन खड़ा किया था। उस समय उनका मुद्दा मतदान प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने का बताया गया था।

दरअसल, सड़क पर संघर्ष, आक्रामक विरोध प्रदर्शन और जनभावनाओं से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक नाटक उनकी राजनीति की पहचान माने जाते हैं। इसी रणनीति के तहत उन्होंने नंदीग्राम और सिंगूर से जुड़े विवादों को भी अपने पक्ष में इस्तेमाल किया।

इन आंदोलनों के दौरान ममता बनर्जी स्थानीय बंगालियों को यह समझाने में सफल रहीं कि इन परियोजनाओं से होने वाला आर्थिक विकास उनके हित में नहीं है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे मुद्दों पर लगातार जनता को अपने पक्ष में मोड़ते हुए ही ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की सत्ता तक पहुँचने में सफलता हासिल की।

2026 की राजनीतिक सच्चाई

पहले के चुनावों के मुकाबले इस बार ममता को पश्चिम बंगाल में अभूतपूर्व जन-विरोध का सामना करना पड़ रहा है। जो मध्यमवर्गीय बंगाली कभी मासिक आर्थिक सहायता योजनाओं के लिए उनकी तारीफ करते थे, वही अब उनकी सरकार की कार्यक्षमता पर सवाल उठाने लगे हैं।

राज्य में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, तुष्टिकरण की राजनीति और बहुसंख्यक हिंदू समुदाय की सुरक्षा को लेकर उठ रहे सवालों ने सत्तारूढ़ अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस को बैकफुट पर ला दिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हालात कठिन होते देख ममता बनर्जी एक बार फिर अपनी पुरानी रणनीति राजनीतिक ड्रामा और सार्वजनिक प्रदर्शन पर निर्भर होती दिख रही हैं। इस बार आरोप है कि चुनावी प्रक्रिया को लेकर आम लोगों की आशंकाओं और अज्ञानता को मुद्दा बनाया जा रहा है।

बताया जा रहा है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस एक अभियान चला रही है, जिसके जरिए बंगालियों को यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि चुनाव आयोग एक ‘बाहरी ताकत’ है, जो उनके मतदान अधिकारों को प्रभावित कर सकती है।

इसके साथ ही एक समानांतर रणनीति के तहत ममता बनर्जी को ‘बांग्लार मेये’ (बंगाल की बेटी) के रूप में पेश किया जा रहा है, जो कथित बाहरी ताकतों के खिलाफ स्थानीय अधिकारों की लड़ाई लड़ रही हैं।

दरअसल, 2026 पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव से पहले का राजनीतिक माहौल काफी चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में ममता बनर्जी और उनकी पार्टी कोई जोखिम नहीं लेना चाहती।

इसी संदर्भ में चुनाव आयोग, इसके मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर लगातार राजनीतिक हमला और रणनीतिक अभियान चलाया जा रहा है।

SIR और ECI का व्यवस्थित और रणनीतिक लक्ष्यीकरण

जैसे ही मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की घोषणा हुई, ममता बनर्जी ने पिछले साल 4 नवंबर को अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के साथ एक ‘प्रोटेस्ट रैली’ का ऐलान कर दिया। उन्होंने पार्टी नेताओं को ‘वॉर रूम’ बनाने और BLO (बूथ लेवल अधिकारी) पर ‘मैन-टू-मैन मार्किंग’ करने का निर्देश भी दिया।

कुछ दिनों बाद ममता बनर्जी ने SIR को ‘सुपर इमरजेंसी’ बताते हुए ECI  से इसे पूरी तरह रोकने की माँग की। उनका आरोप था कि यह प्रक्रिया जानबूझकर शुरू की गई है ताकि सरकारी अधिकारी व्यस्त रहें और तीन महीने तक पश्चिम बंगाल सरकार का कामकाज प्रभावित हो।

उन्होंने SIR की तुलना ‘वोटबंदी’ से करते हुए यह भी दावा किया कि इस प्रक्रिया से कथित तौर पर कई लोगों की आत्महत्या हुई है। उन्होंने कहा, “इतने लोग मर गए, लेकिन चुनाव आयोग ने एक भी संवेदना संदेश नहीं दिया। आप मुझे जेल भेज दीजिए या मेरा गला काट दीजिए, लेकिन एक भी असली मतदाता का नाम मत काटिए।”

नवंबर 2025 में ममता बनर्जी ने यह कहते हुए विवाद खड़ा कर दिया कि उन्हें बांग्लादेश से प्यार है। उन्होंने इस दावे को भी नकार दिया कि SIR का उद्देश्य पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से बांग्लादेशी नागरिकों के नाम हटाना है। उन्होंने यहाँ तक कहा, “अगर आपका नाम हटाया जाता है, तो केंद्र सरकार को भी हटा देना चाहिए।”

तृणमूल प्रमुख ने SIR को लेकर देश में अराजकता की चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि बिहार के चुनाव में विपक्ष भाजपा की रणनीति नहीं समझ पाया, लेकिन बंगाल में ऐसा नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “अगर बंगाल को छूने की कोशिश हुई तो हम पूरे देश को हिला देंगे।”

एक महीने बाद ममता बनर्जी ने कहा कि किसी को भी बांग्लादेश नहीं भेजा जाएगा। इसी दौरान उन्होंने पश्चिम बंगाल की महिलाओं से चुनाव आयोग के अधिकारियों का सामना ‘रसोई के औजारों’ से करने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि अगर महिलाओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए तो वे आगे आकर विरोध करें और पुरुष पीछे से उनका समर्थन करें।

दिसंबर 2025 में ममता बनर्जी ने SIR को ‘बहुत बड़ा घोटाला’ बताया और आरोप लगाया कि इसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से चलाया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया के जरिए पश्चिम बंगाल के लोगों को प्रताड़ित किया जा रहा है।

इसके कुछ समय बाद उन्होंने चुनाव आयोग पर तीखा हमला करते हुए कहा कि अगर रवीन्द्रनाथ टैगोर आज जीवित होते, तो उनका नाम भी मतदाता सूची से हटा दिया जाता।

उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि SIR के जरिए पश्चिम बंगाल में महिला मतदाताओं को विशेष रूप से निशाना बनाया जा रहा है और उनके नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं।

इसी दौरान तृणमूल सरकार के समर्थक माने जाने वाले कुछ मीडिया पोर्टलों ने राज्य में हुई कई मौतों को SIR प्रक्रिया से जोड़कर प्रचारित किया। इन अपुष्ट दावों की तुलना 2016 के डेमोनेटाइजेशन के दौरान फैली अफवाहों और भय के माहौल से की गई।

इसके अलावा कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने यह दावा भी किया कि पश्चिम बंगाल में SIR लागू होने से इतिहास का सबसे बड़ा मतदाता अधिकार हनन हो सकता है। इसी मुद्दे को लेकर इस प्रक्रिया को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में कई याचिकाएँ भी दायर की गईं।

कैसे TMC की आँखों की किरकिरी बने ज्ञानेश कुमार

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) ने सत्तारूढ़ अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस के पूरे तंत्र को हिला कर रख दिया है, पार्टी नेतृत्व से लेकर जमीनी स्तर तक। इसका कारण भी स्पष्ट है। ECI ने इस प्रक्रिया के दौरान राज्य की मतदाता सूची से 58,20,899 नाम हटा दिए, जिनमें मृत्यु, स्थान परिवर्तन, अनुपस्थिति और डुप्लिकेशन जैसे कारण शामिल बताए गए।

इसके साथ ही लगभग 60 लाख ‘संदिग्ध मतदाताओं’ की सूची भी तैयार की गई है, जिनकी स्थिति पर अब न्यायिक अधिकारियों द्वारा फैसला किया जा रहा है। इससे ममता बनर्जी की सरकार के लिए राजनीतिक मुश्किलें खड़ी होना स्वाभाविक माना जा रहा है।

आलोचकों का आरोप है कि पहले के वर्षों में बांग्लादेश के नागरिकों के लिए पश्चिम बंगाल में रहना और मतदान करना अपेक्षाकृत आसान था। यहाँ तक कि कुछ मामलों में अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशी नागरिकों को ‘इमाम भत्ता’ जैसी योजनाओं का लाभ मिलने और चुनाव में सरकार के पक्ष में वोट देने के आरोप भी लगाए जाते रहे हैं।

पुराने समय में कुछ तृणमूल नेताओं के बयान भी सामने आए थे, जिनमें बांग्लादेशियों को पश्चिम बंगाल में मतदान अधिकार दिलाने में मदद करने की बात कही गई थी। ऐसे आरोपों के बीच SIR प्रक्रिया को इन योजनाओं पर रोक लगाने वाला कदम माना जा रहा है। इसी वजह से ज्ञानेश कुमार अचानक तृणमूल कॉन्ग्रेस के निशाने पर आ गए हैं। मामला केवल SIR तक सीमित नहीं है।

हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ज्ञानेश कुमार ने घोषणा की कि पश्चिम बंगाल के सभी मतदान केंद्रों पर 100% वेबकास्टिंग की जाएगी। इससे चुनाव प्रक्रिया की निगरानी कड़ी हो जाएगी और बूथ कब्जाने या वोटबॉक्स में गड़बड़ी की संभावनाएँ कम हो सकती हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त ने साफ कहा कि राजनीतिक हिंसा किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा, “चुनाव प्रक्रिया के दौरान हर मतदान कर्मी से पूर्ण निष्पक्षता अपेक्षित होगी और किसी भी तरह की हिंसा को सहन नहीं किया जाएगा।”

इस पूरे विवाद के संदर्भ में एक प्रसिद्ध बंगाली कहावत अक्सर उद्धृत की जाती है, ‘যত দোষ নন্দ ঘোষ’, जिसका अर्थ है, “सारी गलती नंद घोष की है।”

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, वर्तमान स्थिति में ज्ञानेश कुमार उसी नंद घोष की तरह बन गए हैं, जिन पर तृणमूल कॉन्ग्रेस चुनावी प्रक्रिया में सख्ती और कथित गड़बड़ियों पर रोक लगाने के कारण निशाना साध रही है।

अंतिम चाल

संभावित चुनावी गड़बड़ियों पर अचानक लगाम लगने के बाद अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस ने ECI और इसके मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आक्रामक अभियान शुरू कर दिया।

ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश करते हुए 6 मार्च को एस्पलेनैड में धरना देने का ऐलान किया। यह धरना मतदाता सूची से अवैध नाम हटाने के विरोध में आयोजित किया गया था।

इस प्रदर्शन के दौरान तृणमूल नेताओं ने आम बंगाली मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए कई विवादित बयान भी दिए। तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा, “मैं सबको बता रही हूँ कि अगर आप TMC का समर्थन नहीं करते, तो आप खुद को बंगाली नहीं कह सकते। जो लोग TMC का समर्थन नहीं करते, उन्हें बंगाली कहलाने का अधिकार नहीं है।”

वहीं ममता बनर्जी ने भी मंच से एक विवादित चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी के कारण ही लोग सुरक्षित हैं और यदि उनकी सरकार नहीं होती, तो एक विशेष समुदाय लोगों को घेरकर नुकसान पहुँचा सकता है।

करीब 114 घंटे तक चले इस धरने के बाद ममता बनर्जी ने इसे समाप्त करते हुए इसे सफल करार दिया। हालाँकि जब यह स्पष्ट हो गया कि इस आंदोलन का SIR प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ा है, तो इसके बाद एक नया राजनीतिक मुद्दा खड़ा करने की कोशिश की गई मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग (impeachment) लाने की माँग। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह कदम भी उठाया गया, जबकि यह पहले से स्पष्ट था कि इसके सफल होने की संभावना बेहद कम है।

निष्कर्ष

एक बंगाली होने के नाते मै ममता बनर्जी की राजनीतिक शैली से भली-भांति परिचित हुँ और उनके लिए यह कोई नई बात नहीं है। ममता बनर्जी की राजनीति लंबे समय से इसी तरह के राजनीतिक नाटकों और सार्वजनिक प्रदर्शनों पर आधारित रही है।

हालाँकि ममता बनर्जी को कम आंकना बड़ी गलती हो सकती है। चुनाव से ठीक पहले अचानक सहानुभूति हासिल करने वाली घटनाएँ पहले भी देखी गई हैं, जैसे 2021 पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव और 2024 भारतीय आम चुनाव के दौरान।

चुनावी माहौल में व्हीलचेयर पर बैठी ममता बनर्जी जनता के सामने आ सकती हैं और ‘खेला होबे’ जैसे नारों के जरिए बंगालियों को ‘बाहरी लोगों’ के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश कर सकती हैं।

पश्चिम बंगाल की ‘मूक बहुसंख्या’ को राज्य की राजनीतिक दिशा बदलने का संकल्प लेना चाहिए और राज्य में लंबे समय से चल रहे राजनीतिक नाटक और सार्वजनिक प्रदर्शनों की राजनीति को समाप्त करने का प्रयास करना चाहिए।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

5 साल की बच्ची के साथ दरिंदगी करने वाले की मौत की सजा पर SC ने लगाई रोक, मनोवैज्ञानिक जाँच का दिया आदेश: चाकू से फाड़ दिया था प्राइवेट पार्ट

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के शाहजहानाबाद इलाके में 5 साल की बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए आरोपित की फाँसी की सजा पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है। जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एन वी अंजारिया की बेंच ने आरोपित की अपील पर सुनवाई करते हुए उसकी फाँसी की सजा पर तब तक के लिए रोक लगा दी है, जब तक कि मामले पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता।

अदालत ने इस दौरान मामले से जुड़े सभी रिकॉर्ड, प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट, जेल में आरोपित के व्यवहार और उसके मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन की रिपोर्ट भी मँगाने के निर्देश दिए हैं।

यह मामला उस आरोपित अतुल निहाले का है, जिसे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 22 जनवरी 2026 को दोषी ठहराते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई फाँसी की सजा को बरकरार रखा था।

इससे पहले भोपाल की विशेष POCSO एक्ट कोर्ट ने 10 मार्च 2025 को अपने फैसले में उसे 5 साल की बच्ची से दुष्कर्म और हत्या का दोषी मानते हुए मौत की सजा सुनाई थी।

अब आरोपित ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिस पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने फिलहाल उसकी फाँसी की सजा पर रोक लगा दी है।

हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान क्या पाया?

चाकू से चीरकर फैलाई पीड़िता की योनि: हाईकोर्ट

विशेष POCSO एक्ट कोर्ट के फैसले के खिलाफ आरोपित द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने ट्रायल के दौरान पेश किए गए सभी सबूतों और दस्तावेजों की विस्तार से जाँच की। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आरोपित ने एक मासूम बच्ची के साथ बेहद बर्बर और अमानवीय तरीके से अपराध किया था।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में बताया कि आरोपित ने पाँच साल की उस बच्ची को निशाना बनाया, जो खुद का बचाव करने में पूरी तरह असमर्थ थी। अदालत के मुताबिक, आरोपित ने पहले बच्ची का मुँह दबा दिया और फिर रसोई में इस्तेमाल होने वाले चाकू का इस्तेमाल करते हुए उसके साथ क्रूरता से दुष्कर्म किया, जिसके बाद उसकी हत्या कर दी।

इस कृत्य की बर्बरता हर सबूत से झलक रही है: हाईकोर्ट

अपने फैसले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा कि आरोपित द्वारा किए गए हमले के कारण बच्ची को मरने से पहले असहनीय पीड़ा झेलनी पड़ी होगी। अदालत ने बताया कि बच्ची के शरीर पर कुल 10 चोटों के निशान पाए गए थे, जिनमें पेल्विक हिस्से में गंभीर चोट भी शामिल थी, जो उसकी मौत का मुख्य कारण बनी।

अदालत के अनुसार, एक मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म करने के लिए उसके साथ इस तरह की क्रूरता करना बेहद बर्बर और अमानवीय कृत्य है। फैसले में कहा गया कि सबूतों का हर हिस्सा इस घटना की भयावहता और आरोपित की दरिंदगी को साफ दिखाता है।

हाई कोर्ट ने यह भी माना कि घटना के समय बच्ची पूरी तरह असहाय थी और उसे अत्यधिक दर्द और यातना सहनी पड़ी होगी। अदालत ने कहा कि जिस हालत में बच्ची को चोटें पहुँचाई गईं, उससे इस अपराध की क्रूरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

साथ ही अदालत ने आरोपित के आपराधिक रिकॉर्ड का भी जिक्र किया। कोर्ट ने बताया कि आरोपित पहले भी IPC के तहत एक मामले में दोषी ठहराया जा चुका है और उसके खिलाफ पहले से पाँच आपराधिक मामले लंबित हैं। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने उसकी अपील खारिज कर दी थी।

अपराध करते समय आरोपित किसी मानसिक बीमारी से पीड़ित नहीं था: हाईकोर्ट

सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने आरोपित के मेडिकल रिकॉर्ड की भी जाँच की। अदालत ने पाया कि आरोपित किसी भी तरह की मानसिक बीमारी या मानसिक विकार से पीड़ित नहीं था, जो उसके कृत्य को समझने की क्षमता को प्रभावित करता हो।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस संबंध में ट्रायल कोर्ट ने डॉक्टर राहुल शर्मा (CW-1) की गवाही दर्ज की थी। डॉक्टर ने स्पष्ट रूप से बताया कि जाँच के दौरान ऐसा कोई संकेत नहीं मिला कि आरोपित किसी बाइपोलर मूड डिसऑर्डर या अन्य मानसिक बीमारी से ग्रस्त था।

अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपित किसी मानसिक बीमारी से पीड़ित था और उसी कारण वह अपने कृत्य को समझने में असमर्थ था।

कोर्ट के मुताबिक, मौजूद सबूतों के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने सही माना कि घटना के समय आरोपित पूरी तरह मानसिक रूप से सक्षम था और अदालत में अपना बचाव करने की स्थिति में भी था।

क्या था मामला

यह मामला 24 सितंबर 2024 को शुरू हुआ, जब 5 साल की बच्ची की माँ ने शाहजहानाबाद पुलिस स्टेशन में अपनी बेटी के लापता होने की शिकायत दर्ज कराई। बच्ची के गायब होने के बाद पुलिस ने उसकी तलाश शुरू की।

दो दिन की लगातार खोज के बाद 26 सितंबर 2024 को पुलिस को बाजपेयी नगर के ईदगाह हिल्स इलाके में स्थित ब्लॉक A-1 के फ्लैट F-2 से तेज बदबू आती महसूस हुई। यह फ्लैट आरोपित के परिवार के कब्जे में था।

जब पुलिस बदबू के स्रोत का पता लगाने के लिए फ्लैट के अंदर जाने लगी, तो आरोपित की माँ और बहन ने उन्हें रोकने की कोशिश की। इसके बाद पुलिस जबरन घर के अंदर दाखिल हुई और तलाशी शुरू की।

तलाशी के दौरान बाथरूम में रखे एक सफेद प्लास्टिक टैंक के अंदर से बच्ची का शव बरामद हुआ। पुलिस को मौके से खून से सने कपड़े और एक चाकू समेत कई अहम सबूत भी मिले। इसके बाद पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता और प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट की संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया।

बाद में बच्ची के माता-पिता ने शव की पहचान की। शव का पोस्टमार्टम ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस भोपाल के फॉरेंसिक विभाग के तीन डॉक्टरों की टीम ने किया, जिसमें पुष्टि हुई कि बच्ची के साथ दुष्कर्म किया गया था और उसकी हत्या की गई थी।

जाँच के दौरान जब्त किए गए सामान की फॉरेंसिक जाँच से भी आरोपित के शामिल होने के सबूत मिले है, सबूतों और गवाहों के बयानों के आधार पर विशेष पॉक्सो अदालत ने आरोपित को BNS और प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट की अलग-अलग धाराओं के तहत दोषी ठहराया।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

आर्य आक्रमणकारी सिद्धांत को किया खारिज, खोजी सरस्वती नदी की धारा: जानें पद्म श्री मिशेल दानिनो को, जिन्हें ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ चैप्टर को लेकर SC ने किया बैन

सुप्रीम कोर्ट ने पद्मश्री से सम्मानित फ्रेंच मूल के भारतीय विद्वान मिशेल दानिनो को बैन कर दिया है। इसकी वजह है NCERT की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लिखा लेख, जो इनकी देखरेख में तैयार हुआ था।

मिशेल दानिनो भले ही फ्रांस में पैदा हुए, लेकिन वो दशकों से भारतीय संस्कृति और सभ्यता की पहचान सामने लाने की कोशिशों में जुटे रहे हैं। उन्होंने अब तक पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाए जा रहे कम्युनिष्टों के प्रोपेगेंडा -आर्य बाहरी थे और वो आक्रमणकारी के तौर पर भारत भूमि पर आए… इसे सबूतों के साथ खारिज किया था।

यही नहीं, मिशेल दानिनों ने वैदिक युगीन सरस्वती नदी की मूल धारा को खोजने में मदद की थी और हमेशा इस बात पर जोर दिया कि हड़प्पा सभ्यता नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में उपजी सभ्यता सरस्वती सभ्यता थी। उनके कामों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली है। आईए, इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं और बताते हैं मिशेल दानिनों के बारे में, जिनका उनके कामों की वजह से पूरे भारत में सम्मान होना चाहिए, लेकिन फिलहाल वो SC की तरफ से बैन झेल रहे हैं।

मिशेल दानिनों को सुप्रीम कोर्ट ने क्यों किया बैन?

भारत की सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (11 मार्च 2026) को तीन बड़े विद्वानों पर सरकारी फंड वाले प्रोजेक्ट्स में काम करने पर रोक लगा दी। इस फैसले के पीछे की वजह थी- क्लास 8 की एनसीईआरटी किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर लिखा एक चैप्टर। कोर्ट के पहले के आदेश पर एनसीईआरटी ने बताया कि ये विवादित चैप्टर विजिटिंग प्रोफेसर मिशेल दानिनो की देखरेख में तैयार हुआ था। इसमें दो और लोग शामिल थे- सुपर्णा दिवाकर और अलोक प्रसन्ना कुमार।

सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों के नाम सुनकर कहा कि इनको भारतीय न्यायपालिका के बारे में कोई ठीक जानकारी नहीं है या जानबूझकर गलत तरीके से फैक्ट्स पेश किए गए ताकि क्लास 8 के बच्चों के सामने न्यायपालिका की बुरी तस्वीर बनाई जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे लोगों को अगली पीढ़ी की किताबें या सिलेबस बनाने में किसी भी तरह शामिल नहीं होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार, सभी राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और यूनिवर्सिटीज को आदेश दिया कि इन तीनों को तुरंत अलग कर दें और कोई भी ऐसा काम न दें जिसमें पब्लिक फंड लगे। ये आदेश तब तक लागू रहेगा जब तक ये लोग कोर्ट में आकर एक्सप्लेनेशन नहीं देते और मॉडिफिकेशन नहीं माँगते।

एनसीईआरटी के एफिडेविट के मुताबिक, प्रोफेसर मिशेल दानिनो एक प्रसिद्ध फ्रेंच मूल के भारतीय लेखक और विद्वान हैं। क्लास 8 की सोशल साइंस किताब में ‘Corruption in the Judiciary’ नाम का सब-चैप्टर इन्हीं की देखरेख में बना था। कोर्ट ने इसे जानबूझकर गलत तरीके से पेश किया हुआ माना, जो छोटे बच्चों के सामने न्यायपालिका की इमेज खराब कर सकता है।

मिशेल दानिनो का भारत से जुड़ाव आध्यात्मिक

मिशेल दानिनो का जन्म 4 जून 1956 को फ्रांस के नॉर्मंडी के तटीय शहर ऑनफ्लेयर में हुआ। बचपन से ही उन्हें भारतीय अध्यात्म और दर्शन की ओर खिंचाव था। श्री अरविंद और उनकी सहयोगी मिर्रा अल्फासा (जिन्हें ‘द मदर’ कहा जाता है) से बहुत प्रभावित थे।

फ्रांस में चार साल की हायर साइंस पढ़ाई से असंतुष्ट होकर 1977 में 21 साल की उम्र में भारत आ गए। पहले तमिलनाडु के ऑरोविले में बसे, जो श्री अरविंद के आदर्शों पर बना प्रयोगात्मक शहर है। वहाँ कम्युनिटी लाइफ और आध्यात्मिक काम में डूब गए।

साल 1982 में नीलगिरि की पहाड़ियों में चले गए और दो दशक तक वहाँ रहे। वहाँ रहकर उन्होंने प्रकृति संरक्षण और इंडिपेंडेंट रिसर्च पर अपना ध्यान केंद्रित रखा। इसके बाद साल 2003 में वो कोयंबटूर के पास शिफ्ट हो गए और फ्रेंच सिटिजनशिप को छोड़कर भारत की नागरिकता ले ली।

दानिनो अक्सर कहते हैं कि ये बदलाव गहरे ‘मतलब’ की तलाश थी। इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि श्री अरविंद की सोच ने उन्हें वो कुंजी दी जो ढूँढ रहे थे।

मिशेल दानिनो का शैक्षिक और प्रोफेशनल करियर

दानिनो खुद को भारतीय सभ्यता का आजीवन छात्र बताते हैं। उनके पास इतिहास या पुरातत्व में कोई फॉर्मल हाई डिग्री नहीं है, लेकिन उन्होंने इस विषयों पर गहन अध्ययन किया है। उन्होंने भारत में आईआईटी कानपुर, आईआईएम रांची और कई कल्चरल फोरम पर लेक्चर दिए हैं।

मिशेल दानिनो साल 2011 से आईआईटी गाँधीनगर में गेस्ट प्रोफेसर हैं। यहाँ उन्होंने आर्कियोलॉजिकल साइंसेज सेंटर बनाने और इंडियन नॉलेज सिस्टम्स (आईकेएस) कोर्स चलाने में बड़ी भूमिका निभाई। इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च (आईसीएचआर) के मेंबर भी हैं, प्राचीन भारत पर रिसर्च में योगदान देते हैं।

मिशेल दानिनो बीते सालों में एनसीईआरटी के सोशल साइंस करिकुलम कमिटी के चेयरपर्सन रहे। उनकी देखरेख में स्कूल किताबों में बदलाव हुए, जिसमें ‘बैलेंस्ड कंटेंट’ पर जोर और भारतीय विरासत को शामिल किया गया।

लेकिन अब कोर्ट के आदेश से उन्हें सभी सरकारी फंड वाले संस्थानों से हटा दिया गया है, वजह किताब में न्यायपालिका पर भ्रष्टाचार वाला चैप्टर।

मुख्य किताबें और योगदान

दानिनो की लिखी किताबें प्राचीन भारतीय सभ्यता पर फोकस करती हैं। वे औपनिवेशिक दौर की कहानियों को चुनौती देते हैं और स्वदेशी नजरिए की वकालत करते हैं। शुरुआती काम में श्री अरविंद और मदर की किताबों का फ्रेंच से इंग्लिश में अनुवाद किया, जैसे 13 वॉल्यूम मदर्स एजेंडा।

साल 1996 में ‘The Invasion that Never Was’ नाम से उनकी किताब आई, जिसमें इंडो-आर्यन माइग्रेशन थ्योरी को खारिज किया और कहा कि आर्य भारत के मूल निवासी थे। वे जेनेटिक एविडेंस से आर्य और द्रविड़ के बीच एकता का दावा करते हैं।

उन्होंने साल 2010 की किताब ‘The Lost River: On the Trail of the Sarasvati’ में आर्कियोलॉजी, हाइड्रोलॉजी और प्राचीन ग्रंथों से वैदिक सरस्वती नदी को आज की घग्गर-हकरा नदी से जोड़ा। उन्होंने कहा कि ये इंडस वैली सिविलाइजेशन के पतन का कारण था।

दानिनो इंडस वैली सिविलाइजेशन को ‘इंडस-सरस्वती’ या ‘सिंधु-सरस्वती’ नाम से पढ़ाने की वकालत करते हैं। कुछ किताबों में ये वैकल्पिक नाम जोड़े गए। वे कहते हैं कि ये नाम पुरातत्व की स्थापित रिसर्च पर आधारित हैं, किसी राजनीतिक प्रभाव से नहीं।

उनकी अन्य किताबों में ‘Indian Culture and India’s Future’ (2011), सीबीएसई क्लास 11-12 के लिए ‘Knowledge Traditions and Practices of India’ शामिल हैं, जिनका उन्होंने सह संपादन किया। साल 2018 में उन्होंने ‘Sri Aurobindo and India’s Rebirth’ का संपादन किया।

उनकी रिसर्च वैदिक गणित, खगोलशास्त्र और पर्यावरण जैसे टॉपिक्स को मॉडर्न एजुकेशन में शामिल करने पर है। उन्होंने नीलगिरि की पहाड़ियों में पर्यावरण संरक्षण के लिए भी काफी काम किया है।

मिशेल दानिनो को मिल चुके हैं बहुत सारे सम्मान

साल 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया। पद्मश्री भारत का चौथा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है। ये सम्मान साहित्य और शिक्षा में योगदान के लिए मिला।

मिशेल दानिनो की रिसर्च विवादों से भी घिरी रही है। इंडियन सभ्यता के समर्थक होने के कारण उन्हें हिस्टोरिकल नेगेशनिज्म का आरोप लगा, खासकर इंडो-आर्यन माइग्रेशन थ्योरी खारिज करने पर। सरस्वती नदी और इंडस वैली के नए नाम पर लेफ्ट-लिबरल्स ने उन्हें निशाना बनाया।

एनसीईआरटी में उनकी भूमिका पर किताबों में बदलाव को आइडियोलॉजिकल बताया गया, जैसे मराठा साम्राज्य को अच्छा और मुगल साम्राज्य को नेगेटिव दिखाना, या ‘अनप्लेजेंट’ टॉपिक्स से बचना ताकि बच्चे ट्रॉमा न झेलें। हालाँकि दानिनो ने ऐसे आरोपों को हमेशा ही इनकार किया है। उनका कहना है कि वो हमेशा बैलेंस्ड, नॉन-ट्रॉमेटाइजिंग एजुकेशन की बात करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश उन्हें एनसीईआरटी और अन्य सरकारी काम से हटाने का है, जिसे कई लोग ज्यूडिशियल ओवररीच मानते हैं।

बहरहाल, मिशेल दानिनो हमेशा की तरह भारत की सांस्कृतिक और शैक्षणिक दुनिया में अपना प्रभाव बनाए रखे हैं। वो ऐसे व्यक्ति हैं, जो भारत में भले ही पैदा नहीं हुए, लेकिन अपनी शैक्षिक तपस्या के दम पर भारत के गौरवशाली इतिहास के पुनर्लेखन में अहम भूमिका निभा रहे हैं। धीरे-धीरे ही सही, आम लोगों तक उनके बारे में जानकारी पहुँचेगी, तो आम लोग भी उन्हें वही सम्मान देंगे, जिसके वो असल में हकदार हैं।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)