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चीन-जापान की राह पर भारत, रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे जन्म दर: पढ़ें- क्या होता है TFR, क्यों घट रही है जन्म दर और आने वाले दशकों में कितना बड़ा होगा संकट

लंबे समय तक दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती आबादी वाले देशों में गिना जाता रहा भारत अब एक बड़े जनसांख्यिकीय बदलाव (Demographic Shift) के दौर में जा रहा है। दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश होने के बावजूद भारत में अब जन्म दर उस स्तर से नीचे चली गई है जिसे किसी भी देश की जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए आवश्यक माना जाता है।

ताजा सरकारी आँकड़ों के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate-TFR) घटकर 1.9 पर पहुँच गई है। यह पहली बार है जब यह आँकड़ा ‘रिप्लेसमेंट लेवल’ यानी 2.1 से नीचे गया है। इस मुद्दे ने केवल भारत में ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी आबाद से जुड़ी चर्चाओं को जन्म दिया है।

अमेरिकी अरबपति उद्योगपति और टेस्ला तथा स्पेसएक्स के प्रमुख एलन मस्क ने भी भारत की घटती जन्म दर को लेकर चिंता जताई है। भारत की आबादी को लेकर अब तक होने वाली बहस अब तक आमतौर पर जनसंख्या विस्फोट को लेकर होती रही हैं लेकिन नए आँकड़े संकेत दे रहे हैं कि आने वाले दशकों में भारत के सामने चुनौती उल्टी भी हो सकती है यानी कम होती जन्म दर, वृद्ध होती आबादी और घटता कार्यबल।

मस्क ने क्या कहा?

एलन मस्क लंबे समय से दुनिया के कई देशों में गिरती जन्म दर को लेकर चिंता जताते रहे हैं। वे कई बार सार्वजनिक मंचों पर कह चुके हैं कि घटती जनसंख्या मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकती है। अब भारत को लेकर भी उन्होंने इसी चिंता को दोहराया।

AF Post द्वारा भारत की घटती प्रजनन दर से जुड़े आँकड़े साझा किए जाने के बाद मस्क ने X पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “भारत की जन्म दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे गिर चुकी है। सबसे अधिक शिक्षित वर्गों के बीच यह गिरावट कई वर्ष पहले ही शुरू हो गई थी।”

मस्क का तर्क है कि जब किसी देश में लंबे समय तक जन्म दर कम रहती है, तो धीरे-धीरे वहाँ युवाओं की संख्या कम होने लगती है। इसका असर उद्योगों, अर्थव्यवस्था, श्रम शक्ति और पेंशन व्यवस्था पर पड़ता है। जापान, दक्षिण कोरिया और कई यूरोपीय देशों को वे इसी संकट का उदाहरण बताते रहे हैं।

भारत के नए आँकड़े क्या बता रहे हैं?

भारत सरकार की सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) 2024 रिपोर्ट के अनुसार देश की कुल प्रजनन दर यानी TFR अब 2.1 से घटकर 1.9 बच्चों प्रति महिला रह गई है। सरल भाषा में समझें तो इसका मतलब है कि औसतन भारत में एक महिला अपने जीवनकाल में अब दो से भी कम बच्चों को जन्म दे रही है।

यह गिरावट अचानक नहीं हुई है बल्कि पिछले कई वर्षों से लगातार जारी है। लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया था कि भारत में वर्ष 1950 में कुल प्रजनन दर 6.18 थी। लेकिन भारत ने आजादी के बाद से ही जनसंख्या को नियंत्रित करने के उपाय शुरू कर दिए गए थे।

भारत 1950 के दशक में राज्य द्वारा प्रायोजित परिवार नियोजन कार्यक्रम अपनाने वाले पहले विकासशील देशों में से एक बन गया था। 1952 में जनसंख्या नीति समिति और 1956 में केंद्रीय परिवार नियोजन बोर्ड की स्थापना की गई थी। 1976 में भारत ने पहली राष्ट्रीय जनसंख्या नीति की घोषणा की थी। इसका असर भी दिखा और 1980 में जन्म दर 4.60 पहुँच गई।

जनसंख्या नियंत्रण के लिए किए गय उपायों से भारत की TFR में लगातार कमी होती रही। नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) 2015-16 के मुताबिक, भारत में TFR 2.2 हो गया था। अगले कुछ वर्षों में इसमें और भी कमी हुई और NFHS, 2019-21 के आँकड़ों के मुताबिक, भारत में TFR 2.0 पर पहुँच गया जो प्रतिस्थापन स्तर से भी कम था। अब यह पहली बार उस स्तर से नीचे पहुँच गई है जिसे किसी देश की आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए जरूरी माना जाता है।

अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक भारत की TFR 1.29 तक पहुँच जाएगा और 2100 तक इसके 1.04 तक पहुँचने का अनुमान है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव भारत में शिक्षा, शहरीकरण, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और परिवार नियोजन के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है।

2021 और 2100 में भारत की TFR का तुलनात्मक अध्ययन (फोटो साभार:लैंसेट)

क्या होता है ‘रिप्लेसमेंट लेवल’ और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

‘रिप्लेसमेंट लेवल’ या Replacement Fertility Rate का अर्थ समझना इस पूरी बहस को समझने के लिए बेहद जरूरी है। यह वह औसत संख्या होती है जितने बच्चे एक महिला को जन्म देने चाहिए ताकि एक पीढ़ी की जनसंख्या अगली पीढ़ी में बराबर बनी रहे।

आमतौर पर यह संख्या 2.1 मानी जाती है। यानी औसतन हर महिला को दो बच्चे पैदा करने होंगे ताकि माता-पिता की जगह अगली पीढ़ी ले सके। इसमें अतिरिक्त 0.1 इसलिए जोड़ा जाता है क्योंकि कुछ लोग बीमारी, दुर्घटना या अन्य कारणों से प्रजनन आयु तक नहीं पहुँच पाते।

यदि किसी देश की जन्म दर लंबे समय तक 2.1 से नीचे बनी रहती है तो धीरे-धीरे वहाँ जनसंख्या बढ़ने की रफ्तार धीमी पड़ जाती है। कुछ दशकों बाद कुल आबादी स्थिर होने लगती है और फिर घट भी सकती है। यही वजह है कि जनसंख्या विशेषज्ञ भारत के इस बदलाव को एक बड़े संकेत के रूप में देख रहे हैं।

दिल्ली की TFR फिनलैंड से भी कम लेकिन किन राज्यों में अब भी बच्चे पैदा हो रहे ज्यादा?

भारत का TFR (राष्ट्रीय औसत) अब 1.9 तक पहुँच गया है लेकिन पूरे देश की तस्वीर एक जैसी नहीं है। कुछ राज्यों में अब भी जन्म दर राष्ट्रीय औसत से अधिक बनी हुई है।

रिपोर्ट के अनुसार, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड ऐसे राज्य हैं जहाँ प्रजनन दर अभी भी रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से ऊपर है। इन राज्यों में अपेक्षाकृत अधिक जन्म दर के कारण देश का औसत कुछ हद तक संतुलित बना हुआ है।

इन राज्यों में ग्रामीण आबादी अधिक है, कम उम्र में विवाह अपेक्षाकृत ज्यादा होते हैं और कई सामाजिक-आर्थिक कारणों से परिवारों में बच्चों की संख्या अधिक बनी रहती है। दूसरी ओर दक्षिण भारत, पश्चिम भारत और बड़े महानगरों वाले राज्यों में जन्म दर तेजी से घटी है। इन इलाकों में छोटे परिवार अब सामान्य बात बन चुके हैं।

रिपोर्ट के सबसे चौंकाने वाले आँकड़ों में दिल्ली का नाम सामने आया है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में प्रजनन दर सिर्फ 1.2 दर्ज की गई है, जो देश में सबसे कम है। दिलचस्प बात यह है कि दिल्ली की यह दर यूरोपीय देशों के बराबर या कई मामलों में उनसे भी कम है। दिल्ली की जन्म दर फिनलैंड से भी नीचे पहुँच गई है।

विशेषज्ञ इसके पीछे कई कारण गिनाते हैं। बड़े शहरों में जीवनयापन की बढ़ती लागत, छोटे घर, करियर का दबाव, देर से शादी, महिलाओं का नौकरियों में बढ़ता योगदान और बच्चों की परवरिश का महँगा होना प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।

आज के शहरी परिवार पहले की तरह तीन या चार बच्चों की जगह एक या दो बच्चों को प्राथमिकता दे रहे हैं। कई दंपति तो केवल एक बच्चा रखने या बिल्कुल बच्चा न पैदा करने का निर्णय भी ले रहे हैं।

आखिर भारत में जन्म दर इतनी तेजी से क्यों घट रही है?

भारत में जन्म दर कम होने के पीछे केवल एक कारण जिम्मेदार नहीं है बल्कि कई सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बदलाव एक साथ काम कर रहे हैं।

सबसे बड़ा कारण शिक्षा को माना जा रहा है। खासकर महिलाओं की शिक्षा बढ़ने के बाद शादी और माँ बनने की औसत उम्र बढ़ी है। पहले जहाँ कम उम्र में शादी होना आम बात थीं, वहीं अब महिलाएँ उच्च शिक्षा और नौकरी को प्राथमिकता देने लगी हैं।

इसके अलावा शहरीकरण ने भी परिवारों की सोच बदल दी है। शहरों में महँगी शिक्षा, स्वास्थ्य खर्च और सीमित संसाधनों के कारण परिवार छोटे रखने की प्रवृत्ति बढ़ी है।

महिलाओं की नौकरी और आर्थिक स्वतंत्रता भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। आज बड़ी संख्या में महिलाएँ करियर और पेशेवर जीवन पर ध्यान दे रही हैं जिससे परिवार नियोजन के फैसले वो ले रही हैं। स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुँच और गर्भनिरोधक साधनों की उपलब्धता ने भी जन्म दर को नियंत्रित करने में मदद की है।

संयुक्त राष्ट्र ने भारत को लेकर क्या कहा है?

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) ने भी अपनी हालिया रिपोर्ट में माना है कि भारत की प्रजनन दर अब रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे पहुँच चुकी है। UNFPA की 2025 की रिपोर्ट में भारत का TFR 1.9 माना गया। हालाँकि एजेंसी ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि भारत की आबादी तुरंत कम होने लगेगी।

UNFPA के अनुमान के अनुसार, अगर मौजूदा रुझान जारी रहे तो साल 2100 तक भारत की कुल प्रजनन दर घटकर लगभग 1.78 तक पहुँच सकती है। साथ ही देश की औसत जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) करीब 79 वर्ष होने का अनुमान जताया गया है। यह तस्वीर भारत के सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय भविष्य को लेकर कई बड़े सवाल खड़े करती है।

कम जन्म दर के कारण युवा आबादी का हिस्सा सिकुड़ता दिखाई देता है जबकि बुजुर्ग आबादी का अनुपात बढ़ने की संभावना है। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत धीरे-धीरे ‘युवा देश’ से ‘एजिंग सोसाइटी’ की तरफ बढ़ सकता है।

2100 को लेकर UNFPA का अनुमान

हालाँकि, भारत की कुल आबादी अभी भी 140 करोड़ से अधिक है और बड़ी संख्या में लोग युवा आयु वर्ग में हैं। इसका मतलब यह है कि आने वाले कुछ दशकों तक जनसंख्या बढ़ सकती है लेकिन उसकी रफ्तार पहले जैसी नहीं रहेगी।

UNFPA का कहना है कि भारत में जनसंख्या का पैटर्न एक जैसा नहीं है। अलग-अलग राज्यों में सामाजिक परिस्थितियां, स्वास्थ्य सुविधाएं, महिलाओं की स्थिति और विवाह की औसत उम्र अलग-अलग होने के कारण जन्म दर में भी बड़ा अंतर दिखाई देता है।

दुनिया भर में आने वाला है कम होती आबादी का संकट

आबादी का कम होने का संकट सिर्फ भारत के लिए ही चुनौती नहीं बनने वाला है बल्कि दुनिया के बहुत बड़े हिस्से के लिए यह संकट जल्द ही दिखना शुरू हो जाएगा। ‘द लैंसेट’ ने 204 देशों का अध्ययन किया और बताया कि 204 देशों और क्षेत्रों में से 103 देश (50.5%) ऐसे थे जहाँ 2018 तक TFR पहले ही ‘रिप्लेसमेंट लेवल’ से नीचे पहुँच चुकी थी। यह अध्ययन 2024 में प्रकाशित हुआ था।

शोध के अनुसार, 2050 तक लगभग 100 देश (49%) ऐसे हो जाएँगे जहाँ प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि नकारात्मक हो जाएगी। इसका मतलब यह है कि उन देशों में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या, मरने वाले लोगों की संख्या से कम हो जाएगी। शोध में यह भी अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक 155 देश और क्षेत्र (76%) रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे की प्रजनन दर पर पहुँच जाएँगे। वहीं, 2100 तक यह संख्या बढ़कर 198 देश (97.1%) हो सकती है। इनमें से 178 देश (87.3%) ऐसे होंगे जहाँ प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि नकारात्मक होगी।

विभिन्न देशों में 2100 तक TFR का आँकड़ा (फोटो साभार:लैंसेट)

क्या भारत भी जापान और चीन जैसी स्थिति में पहुँच सकता है?

यह सवाल अब तेजी से पूछा जाने लगा है कि क्या भारत भी भविष्य में जापान, दक्षिण कोरिया या चीन जैसी स्थिति का सामना करेगा? जापान और दक्षिण कोरिया में जन्म दर कई वर्षों से बेहद कम बनी हुई है। वहाँ बड़ी समस्या यह हो गई कि काम करने वाली युवा आबादी घटती चली गई जबकि बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ी। इससे पेंशन व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया।

चीन को भी इसी समस्या के कारण अपनी ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ तक खत्म करनी पड़ी और अब वहाँ सरकार ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए लोगों को प्रोत्साहन दे रही है। दुनिया के कई देशों में जनसंख्या को बढ़ाने के लिए अलग-अलग उपाय किए जा रहे हैं।

भारत फिलहाल उस स्थिति से दूर है क्योंकि यहाँ अभी भी युवा आबादी बड़ी संख्या में मौजूद है। ‘पॉपुलेशन मोमेंटम’ (Population Momentum) के चलते अभी भारत को कोई दिक्कत नहीं होगी। पॉपुलेशन मोमेंटम का मतलब यह है कि किसी देश की जन्म दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे जाने के बाद भी उसकी आबादी कुछ समय तक बढ़ती रह सकती है।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अगर किसी देश में युवा आबादी (खासतौर पर 15 साल से कम उम्र के लोग) बड़ी संख्या में मौजूद है, तो वे आगे चलकर प्रजनन आयु में पहुँचते हैं और बच्चे पैदा करते हैं। इसलिए जन्म दर कम होने के बावजूद जनसंख्या तुरंत घटनी शुरू नहीं होती।

अध्ययन बताते हैं कि जब किसी देश की TFR (कुल प्रजनन दर) 2.1 से नीचे जाती है, तब भी आबादी की प्राकृतिक वृद्धि दर के नकारात्मक होने में लगभग 30 साल का अंतर आ सकता है। यानी जन्म दर कम होने के बावजूद जनसंख्या कुछ दशकों तक बढ़ सकती है।

हालाँकि, अगर अगले कई दशकों तक जन्म दर लगातार कम बनी रही, तो भारत को भी भविष्य में श्रमिकों की कमी, वृद्ध आबादी और आर्थिक दबाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। और विभिन्न रिपोर्ट्स में यह अनुमान साफ-साफ नजर आ रहा है।

अब भारत के लिए चिंता ‘जनसंख्या विस्फोट’ नहीं बल्कि ‘घटती जनसंख्या’ होगी

एक समय भारत में सबसे बड़ी चिंता तेजी से बढ़ती आबादी को लेकर थी। सरकारें परिवार नियोजन अभियान चलाती थीं और जनसंख्या नियंत्रण को बड़ा मुद्दा माना जाता था। लेकिन अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत होगी। बहुत ज्यादा आबादी भी चुनौती है और बहुत कम जन्म दर भी भविष्य में गंभीर समस्या बन सकती है।

भारत फिलहाल उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ जनसंख्या वृद्धि धीमी हो रही है लेकिन युवा आबादी अभी भी बड़ी ताकत बनी हुई है। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि भारत अपनी जनसांख्यिकीय ताकत को आर्थिक अवसर में बदल पाता है या नहीं।

स्पष्ट है कि भारत में जन्म दर का रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे जाना केवल एक आँकड़ा नहीं बल्कि देश के सामाजिक और आर्थिक भविष्य से जुड़ा बड़ा बदलाव है, जिसके असर आने वाले दशकों में साफ दिखाई दे सकते हैं।

जंतर-मंतर पर CJP के प्रदर्शन में पत्रकारों से बदसलूकी और धक्का-मुक्की, रिपोर्टरों को घेरकर लगाए ‘गोदी मीडिया’ के नारे: महिला पत्रकारों पर की अभद्र टिप्पणियाँ, पढ़ें 7 मामले

नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर शनिवार (6 जून 2026) को कॉकक्रोच जनता पार्टी (CJP) का बहुप्रचारित प्रदर्शन आयोजित किया गया। सोशल मीडिया पर इस प्रदर्शन को लेकर काफी चर्चा और प्रचार हुआ था।

ऐसे में उम्मीद की जा रही थी कि CJP के लाखों ऑनलाइन समर्थकों में से कम से कम हजारों लोग प्रदर्शन में शामिल होंगे। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही निकली।

प्रदर्शन में लोगों की संख्या काफी कम रही और यह आयोजन लगभग फ्लॉप साबित हुआ। हालात ऐसे थे कि प्रदर्शनकारियों से ज्यादा संख्या में मीडिया कर्मी और पुलिसकर्मी मौके पर मौजूद नजर आए।

दिलचस्प बात यह रही कि प्रदर्शन में शामिल कई समर्थकों को खुद यह स्पष्ट नहीं था कि प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य और एजेंडा क्या है। CJP की ओर से कहा गया था कि यह प्रदर्शन हाल के NEET और CBSE परीक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार, खासकर शिक्षा मंत्री के खिलाफ आयोजित किया जा रहा है। लेकिन प्रदर्शन के दौरान ‘आजादी-आजादी’ जैसे नारे भी लगाए गए।

जब कुछ पत्रकारों ने प्रदर्शनकारियों से उनकी माँगों और एजेंडे के बारे में बात करने की कोशिश की और इन नारों को लेकर सवाल पूछे, तो उन्हें विरोध और बदसलूकी का सामना करना पड़ा। कई प्रदर्शनकारियों ने पत्रकारों को घेर लिया, धक्का-मुक्की की और उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश की, जबकि वे केवल अपनी पेशेवर जिम्मेदारी निभा रहे थे।

ओपइंडिया के पत्रकार अनुराग मिश्रा के साथ भी ऐसा ही हुआ। जब उन्होंने प्रदर्शन में मौजूद CJP समर्थकों से उनकी माँगों के बारे में बात करने की कोशिश की, तो कई समर्थकों ने उन्हें घेर लिया और ‘गोदी मीडिया’ के नारे लगाने शुरू कर दिए।

अनुराग मिश्रा ने केवल इतना सवाल पूछा था कि सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स होने के बावजूद प्रदर्शन स्थल पर लोगों की संख्या इतनी कम क्यों है। लेकिन यह सवाल सुनते ही कई समर्थक नाराज हो गए और उन्होंने पत्रकार को घेरकर शोर-शराबा करना शुरू कर दिया तथा उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश की।

हालाँकि अनुराग मिश्रा अकेले पत्रकार नहीं थे जिन्हें प्रदर्शन स्थल पर CJP समर्थकों के आक्रामक व्यवहार का सामना करना पड़ा। जी न्यूज के एक पत्रकार के साथ भी ऐसी ही घटना हुई।

ज़ी न्यूज के पत्रकार प्रदर्शन की कवरेज कर रहे थे, तभी कई CJP समर्थक उनकी ओर बढ़े और ‘गोदी मीडिया’ के नारे लगाने लगे। देखते ही देखते माहौल तनावपूर्ण हो गया। स्थिति बिगड़ती देख मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने हस्तक्षेप किया और पत्रकार को वहां से सुरक्षित बाहर निकाला।

प्रदर्शन की कवरेज कर रहीं कुछ महिला पत्रकारों को भी CJP समर्थकों के उत्पीड़न और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में देखा जा सकता है कि कुछ CJP समर्थकों ने एक महिला पत्रकार को चारों तरफ से घेर लिया। इस दौरान वे जोर-जोर से नारेबाजी कर रहे थे और पत्रकार गंदे-गंदे इशारे भी कर रहे थे।

वीडियो सामने आने के बाद पत्रकारों की सुरक्षा और प्रदर्शन के दौरान उनके साथ हुए व्यवहार को लेकर सवाल उठने लगे हैं। आलोचकों का कहना है कि अपनी बात रखने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की माँग करने वाले लोगों को पत्रकारों के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं करना चाहिए।

एक अन्य महिला पत्रकार को भी प्रदर्शन के दौरान CJP समर्थकों के निशाने पर आना पड़ा। जब वह मौके से रिपोर्टिंग करने की कोशिश कर रही थीं, तब कुछ प्रदर्शनकारियों ने उन्हें घेरकर हूटिंग शुरू कर दी और उन पर सरकार का एजेंट होने का आरोप लगाने लगे।

इस दौरान एक प्रदर्शनकारी ने तंज कसते हुए कहा, “मोदी ने इसे 500 रुपए का नोट पकड़ा दिया होगा।” वहीं आसपास मौजूद अन्य समर्थक लगातार नारेबाजी करते रहे। महिला पत्रकार के सवाल पूछने और कवरेज करने के दौरान माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया और उन्हें भी विरोध तथा अभद्र टिप्पणियों का सामना करना पड़ा।

इसी तरह न्यूज24 के एक पत्रकार को भी प्रदर्शन के दौरान CJP समर्थकों के विरोध और धक्का-मुक्की का सामना करना पड़ा। पत्रकार प्रदर्शनकारियों से उनकी माँगों और प्रदर्शन के उद्देश्य को लेकर सवाल पूछने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन कुछ समर्थकों ने उन्हें घेर लिया और लगातार नारेबाजी शुरू कर दी।

पत्रकार ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत कर स्थिति समझाने और सवालों के जवाब लेने की कोशिश की, लेकिन प्रदर्शनकारी उनकी बात सुनने के बजाय शेम-शेम और गोदी मीडिया वापस जाओ जैसे नारे लगाते रहे। इस दौरान पत्रकार को लगातार घेरकर परेशान किया गया, जिससे मौके पर तनावपूर्ण माहौल बन गया।

एक अन्य घटना में ABP न्यूज के एक पत्रकार को भी CJP समर्थकों के आक्रामक व्यवहार का सामना करना पड़ा। जब पत्रकार प्रदर्शनकारियों से बात करने और उनकी माँगों को समझने की कोशिश कर रहे थे, तब कुछ समर्थकों ने उनके साथ धक्का-मुक्की की और उन्हें घेरकर परेशान करना शुरू कर दिया।

हालांकि इस दौरान पत्रकार ने काफी संयम बनाए रखा। प्रदर्शनकारी लगातार आक्रामक अंदाज में नारेबाजी कर रहे थे और माहौल को उग्र बनाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन पत्रकार ने शांत रहते हुए अपनी रिपोर्टिंग जारी रखने का प्रयास किया। इसके बावजूद उन्हें धक्का देने और रास्ता रोकने जैसी हरकतों का सामना करना पड़ा।

प्रदर्शन की कवरेज करने पहुंचे पत्रकारों के साथ हुई इन घटनाओं ने CJP नेताओं के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। CJP की ओर से इस पूरे अभियान और प्रदर्शन को अपनी आवाज उठाने तथा सरकार तक अपनी बात पहुँचाने की कोशिश बताया गया था। लेकिन प्रदर्शन स्थल पर पत्रकारों के साथ हुए व्यवहार को लेकर आलोचक इसे विरोधाभास बता रहे हैं।

एक तरफ CJP और उसके नेता सरकार से सवाल पूछने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उदार मूल्यों की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रदर्शन के दौरान कई पत्रकारों को सवाल पूछने पर विरोध, बदसलूकी, डराने-धमकाने और नारेबाजी का सामना करना पड़ा।

आलोचकों का कहना है कि यदि कोई आंदोलन संवाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करता है, तो उसे अपने बारे में पूछे जाने वाले सवालों का भी लोकतांत्रिक तरीके से जवाब देना चाहिए।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

कोई साड़ियों में छिपा, किसी के घर में मिला तिरपाल का ढेर: बंगाल में TMC के काली करतूतों पर भड़की जनता बना रही नेताओं को निशाना, सड़क से लेकर कोर्ट तक कर रही पिटाई; पढ़ें 6 मामले

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार बनने के बाद से तृणमूल कॉन्ग्रेस पार्टी (TMC) का ‘जंगलराज’ सामने आ रहा है। TMC के काले कारनामे सामने आने के बाद जनता का गुस्सा भी फूट रहा है। ऐसा गुस्सा कि कहीं TMC नेता पर अंडे फेंके जा रहे हैं, तो कहीं जनता के गुस्से से बचने के लिए नेता साड़ियों के ढेर में छिपे हुए हैं।

एक मामले में उत्तर 24 परगना जिले के कमरहाटी में TMC विधायक मदन मित्रा की कार को घेरकर लोगों ने अंडे और ईंटे फेंकी गई। ऐसे ही कोलकाता नगर निगम में पार्षद बप्पादित्य दासगुप्ता पर कोर्ट में पेशी के दौरान अंडे फेंके गए। दासगुप्ता को जबरन वसूली के आरोप में शनिवार (06 जून 2026) को गिरफ्तार किया गया था।

एक अन्य मामले में हावड़ा जिले के TMC नेता ब्रह्मानंद चक्रवर्ती का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वह साड़ियों के ढेर के भीतर छिपे हुए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, चक्रवर्ती पर सरकारी योजना के नाम पर लोगों से कटमनी लेने के आरोप हैं। पुलिस के डर से वह साड़ियों के ढेर में छिप गए। हालाँकि, इसके बावजूद पुलिस चक्रवर्ती को ढूँढकर अपने साथ गिरफ्तार करके ले गई।

उधर, TMC नेता के बंद घर का ताला तोड़कर स्थानीय लोगों ने जमा करके रखे गए लगभग 50 हजार तिरपाल बरामद किए। यह सरकारी राहत सामग्री जनता को पहुँचानी थी, लेकिन TMC नेताओं ने अपनी संपत्ति समझकर रखी हुई थी। इसका वीडियो भी सामने आया है, जिसमें एक घर में फर्श से छत तक केवल तिरपाल के ढेर नजर आ रहे हैं। बताया गया कि यह बंद घर TMC नेता राजू बाग और उनके भाई बीजू बाग का है। बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद से ही दोनों भाई फरार चल रहे हैं।

यह कोई गिनी-चुनी घटनाएँ नहीं हैं। इससे पहले भी कई मामले सामने आए हैं। जहाँ कटमनी का पैसा खाकर बैठे TMC नेता कहीं बिस्तर के नीचे छिपे पाए गए, तो कहीं लोगों ने गुस्से में आकर TMC नेता के करीबी को ही कूट दिया। इसके अलावा TMC नेता पर रिश्वत और जमाखोरी के मामलों में भी लगातार शिकंजा कसा जा रहा है।

K9 Vajra, जोरावर टैंक और न्यूक्लियर जेनरेटर… PM मोदी ने किया हजीरा के डिफेंस प्लांट का दौरा: जानें ये जगह भारत के लिए क्यों है महत्वपूर्ण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (5 जून 2026) को गुजरात के हजीरा स्थित लार्सन एंड टुब्रो (L&T) के  मैन्युफैक्चरिंग प्लांट का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने देश की रक्षा और रणनीतिक विनिर्माण क्षमता को मजबूत करने में भारतीय उद्योगों की बढ़ती भूमिका के बारे में बताया। यह दौरा उनके गुजरात दौरे का हिस्सा था और लगभग सात साल बाद उनका इस प्लांट का पहला दौरा था।

दौरे के दौरान प्रधानमंत्री ने हजीरा परिसर में विकसित की जा रही कई स्वदेशी तकनीकों और रक्षा प्लेटफॉर्मों का निरीक्षण किया। यह प्लांट आज भारत के सबसे महत्वपूर्ण भारी इंजीनियरिंग, रक्षा उत्पादन और रणनीतिक औद्योगिक निर्माण केंद्रों में शामिल हो चुका है।

प्रधानमंत्री ने कई घंटे प्लांट में बिताए और अधिकारियों से बातचीत करते हुए वहाँ तैयार हो रहे अत्याधुनिक उपकरणों और प्रणालियों को करीब से देखा।

PM मोदी ने शेयर की तस्वीरें

दौरे के कुछ ही समय बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर तस्वीरें और जानकारी साझा की। उन्होंने भारत को आत्मनिर्भर बनाने में L&T की भूमिका की सराहना की।

प्रधानमंत्री ने लिखा, “आज दोपहर मैं हजीरा स्थित L&T परिसर गया। वहाँ विभिन्न क्षेत्रों में विकसित की जा रही कई नई और महत्वपूर्ण तकनीकों को देखा। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को आगे बढ़ाने में L&T की भूमिका सराहनीय है।”

प्रधानमंत्री द्वारा साझा की गई तस्वीरों में एक तस्वीर ने सोशल मीडिया पर खास ध्यान खींचा। इस तस्वीर में वह हजीरा प्लांट में बने एक विशाल न्यूक्लियर स्टीम जनरेटर के पास खड़े दिखाई दे रहे थे।

यह तस्वीर इसलिए चर्चा में आई क्योंकि ऐसे स्टीम जनरेटर भारतीय उद्योग द्वारा बनाए जाने वाले सबसे जटिल और उन्नत उपकरणों में गिने जाते हैं और देश के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

क्या होता है 700 मेगावाट का न्यूक्लियर स्टीम जनरेटर?

प्रधानमंत्री द्वारा साझा की गई तस्वीर में दिखा स्टीम जनरेटर भारत की परमाणु विनिर्माण यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है। L&T ने वर्ष 2022 में हजीरा प्लांट में पहला स्वदेशी 700 मेगावाट न्यूक्लियर स्टीम जनरेटर तैयार किया था।

न्यूक्लियर स्टीम जनरेटर एक विशाल हीट एक्सचेंजर होता है, जिसका इस्तेमाल परमाणु ऊर्जा प्लांट्स में किया जाता है। इसका मुख्य काम परमाणु रिएक्टर में पैदा होने वाली गर्मी को भाप में बदलना होता है, जिससे बिजली बनाई जाती है।

रिएक्टर के कोर में अत्यधिक गर्मी पैदा होती है। इस गर्मी को कूलेंट सिस्टम के जरिए स्टीम जनरेटर तक पहुँचाया जाता है। यहाँ यह गर्मी दूसरे सर्किट के पानी को दी जाती है, जिससे वह उच्च दबाव वाली भाप में बदल जाता है।

यही भाप बड़े टरबाइनों को चलाती है और टरबाइन जनरेटर के माध्यम से बिजली पैदा करती है। यदि स्टीम जनरेटर न हो तो परमाणु रिएक्टर में उत्पन्न गर्मी को प्रभावी तरीके से बिजली में नहीं बदला जा सकता।

हजीरा में तैयार किए जा रहे ये स्टीम जनरेटर भारत के स्वदेशी 700 मेगावाट प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWR) के लिए बनाए गए हैं। भविष्य में भारत के परमाणु ऊर्जा विस्तार की योजनाओं में इन रिएक्टरों की अहम भूमिका होगी।

भारत के लिए यह निर्माण क्षमता क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत में ही इतने बड़े और मुश्किल परमाणु उपकरण बनाने की क्षमता कई कारणों से रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है।

पहला, इससे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में सरकार की पहल को मजबूती मिलती है और महत्वपूर्ण परमाणु उपकरणों के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम होती है।

दूसरा, इससे भारत नए परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का निर्माण तेजी से कर सकता है और आयात या वैश्विक सप्लाई चेन में आने वाली बाधाओं से बच सकता है।

तीसरा, ऐसे उपकरणों का देश में निर्माण होने से उन्नत इंजीनियरिंग विशेषज्ञता विकसित होती है और हजारों कुशल रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।

भारत ने आने वाले दशकों में अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। बढ़ती बिजली माँग को पूरा करने और कार्बन उत्सर्जन कम करने की रणनीति में परमाणु ऊर्जा को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

फिलहाल न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) देश के कई हिस्सों में स्वदेशी डिजाइन वाले 700 मेगावाट रिएक्टरों का निर्माण कर रहा है। इन परियोजनाओं के लिए L&T और BHEL जैसी कंपनियों द्वारा बनाए जा रहे स्टीम जनरेटर बेहद महत्वपूर्ण हैं।

L&T की हेवी इंजीनियरिंग इकाई पहले ही NPCIL की कई परियोजनाओं के लिए निर्धारित समय से पहले कई 700 मेगावाट स्टीम जनरेटर भेज चुकी है। कंपनी इनका निर्माण हजीरा और वडोदरा स्थित अपने आधुनिक संयंत्रों में करती है।

भारत के परमाणु विस्तार को मिल रहा समर्थन

प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के दौरान चर्चा में आया यह स्टीम जनरेटर भारत की दीर्घकालिक परमाणु ऊर्जा योजनाओं का हिस्सा है। NPCIL के अनुसार, इन उपकरणों का सफल निर्माण और समय पर आपूर्ति भारत को वर्ष 2047 तक परमाणु ऊर्जा उत्पादन में बड़ा विस्तार करने के लक्ष्य को हासिल करने में मदद करेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे अत्याधुनिक परमाणु उपकरणों का स्वदेशी निर्माण भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में खड़ा करता है जिनके पास उन्नत परमाणु विनिर्माण क्षमता मौजूद है।

दौरे में रक्षा उपकरणों ने भी खींचा ध्यान

हालाँकि न्यूक्लियर स्टीम जनरेटर सबसे ज्यादा चर्चा में रहा लेकिन प्रधानमंत्री ने इसके अलावा भी कई महत्वपूर्ण रक्षा प्रणालियों का निरीक्षण किया। हजीरा प्लांट  भारत में निजी क्षेत्र द्वारा चलाया जा रहा ट्रैक्ड आर्मर्ड वाहनों का सबसे बड़ा निर्माण केंद्र माना जाता है।

भारतीय सेना के लिए K-9 वज्र स्वचालित तोप प्रणाली के निर्माण में इसकी बड़ी भूमिका रही है। L&T अब तक भारतीय सेना को 100 K-9 वज्र तोपें सौंप चुकी है। इनमें से कई तोपें पूर्वी लद्दाख में लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) के पास तैनात हैं। सरकार ने 100 अतिरिक्त K-9 वज्र तोपों की खरीद को भी मंजूरी दे दी है।

हजीरा प्लांट तब भी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था जब यहाँ स्वदेशी जोरावर लाइट टैंक को पहली बार पेश किया गया था। केवल 19 महीनों में विकसित इस टैंक को विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्रों में ऊँचाई वाले इलाकों में युद्ध के लिए डिजाइन किया गया है और वर्तमान में इसका परीक्षण चल रहा है।

इसके अलावा, भारतीय सेना की फ्यूचरिस्टिक इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल (FICV) परियोजना में भी L&T की महत्वपूर्ण भागीदारी है। इस परियोजना का उद्देश्य सेना के पुराने BMP-2 वाहनों की जगह नए आधुनिक वाहन लाना है।

प्रधानमंत्री मोदी का हजीरा दौरा इस बात का संकेत है कि भारत का औद्योगिक ढाँचा अब देश की रक्षा जरूरतों और महत्वपूर्ण ऊर्जा अवसंरचना को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभा रहा है।

उन्नत तोप प्रणालियों, स्वदेशी टैंकों और अत्याधुनिक न्यूक्लियर स्टीम जनरेटर जैसे उपकरणों का निर्माण करने वाला हजीरा प्लांट उन क्षेत्रों में भारत की आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन चुका है, जहाँ कभी देश को बड़े पैमाने पर विदेशी तकनीक और आयात पर निर्भर रहना पड़ता था।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

2 दिन मॉर्चरी में रहा मुस्लिम से निकाह करने वाली पारसी महिला का शव: मुस्लिम-पारसी दोनों ने जमीन देने से किया मना, हिंदुओं ने दी विदाई; जानें- बेदखली के नियम

मुस्लिम से निकाह करने वाली गुजरात की एक पारसी महिला का शव इसलिए दो दिनों तक अंतिम संस्कार की बाट जोहता रहा, क्योंकि उसे सुपुर्द ए खाक किए जाने की अनुमति नहीं मिली। शौहर ने कुछ मौलवियों से संपर्क किया। निकाह के बावजूद इस्लामिक रीति से उसे सुपुर्दे खाक करने की इजाजत नहीं दी गई। शौहर के जिंदा रहते भी नहीं। दूसरी तरफ पारसी समुदाय अडा रहा। समाज के मुताबिक अंतिम संस्कार करने की इजाजत नहीं दी गई। आखिर में सनातन रीति रिवाज से महिला का अंतिम संस्कार किया गया।

हिन्दू धर्म अपनी सहनशीलता और दूसरों को अपने में समाहित करने की प्रवृति के लिए जाना जाता है। सनातनियों की इसी खासियत ने सैकड़ों सालों तक आक्रांताओं की कोशिशों के बावजूद इसे जिंदा रखा है। यही सद्भावना और विशालतापूर्व सनातन धर्म ने महिला को गौरवपूर्ण अंतिम विदाई दी।

क्या है पूरा मामला

मुस्लिम से निकाह करने वाली पारसी समुदाय की एक 55 साल की महिला की मौत के बाद अंतिम संस्कार के लिए दो दिन तक उसके शव मॉर्चरी में ही रखा रहा। उसे न तो इस्लामिक तरीके से सुपुर्द ए खाक किया जा रहा था और न ही पारसी समुदाय अपने तरीके से अंतिम संस्कार कर रहा था। ये घटना गुजरात के नवसारी की है, जहाँ शुक्रवार (5 जून 2026) को पारसी महिला के शव को नवसारी के वेरावल इलाके में स्थित श्मशान घाट ले जाया गया। पारसी महिला के कुछ करीबी सदस्यों और उनके शौहर के कई करीबी रिश्तेदारों ने अंतिम संस्कार में भाग लिया।

द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, पैंतीस साल पहले नवसारी की पारसी छात्रा ने प्रोफेसर निसार अहमद से निकाह किया था। प्रोफेसर निसार अहमद की मुलाकात छात्रा से तब हुई जब वह गुजराती भाषा में बैचलर कर रही थी। प्रोफेसर वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय से संबद्ध एक स्थानीय कॉलेज में पढ़ाते थे।

दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं। छात्रा ने अपने परिवार से कहा कि वह उस आदमी से शादी करना चाहती है जो उससे 15 साल बड़ा था। महिला के पिता एक निजी फर्म में काम करते थे, जबकि उसकी माँ नवसारी में एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका थीं। परिवार की नाराजगी के बीच पारसी छात्रा ने प्रोफेसर अहमद से निकाह कर लिया।

पारसी समाज ने उस छात्रा को अपने समुदाय से बाहर कर दिया और परिवार ने भी उससे रिश्ता तोड़ लिया। महिला को पारसी समुदाय के किसी भी सामाजिक समारोह में भाग लेने की अनुमति नहीं थी। माता-पिता ने लगभग 10 वर्षों तक उससे दूरी बनाए रखी, लेकिन बाद में मान गए।

लेकिन परिवार के करीबी सदस्य के मुताबिक, कुछ साल पहले उन्हें अपने बड़े भाई और छोटी बहन की शादियों में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई थी।

कहा जाता है कि उसने इस्लाम नहीं कबूला था और जोरोस्ट्रियन धर्म को मानती थी। दंपति के कोई बच्चे नहीं हैं। हाल ही में वह बीमार पड़ गई और पारसी लोगों के हॉस्पिटल में कई दिनों तक इलाज के बाद 4 जून को उसकी मौत हो गई।

शौहर ने पारसी समुदाय से संपर्क किया, लेकिन अंतिम संस्कार की इजाजत नहीं मिला। उसने मौलवियों से पूछा, लेकिन मौलवी अड़ गए। इस्लाम जो धर्मांतरण के लिए बदनाम है। छल प्रपंच कर महिलाओं को प्रेम जाल में फँसाने और उसपर धर्मांतरण कर निकाह करने का दबाव डालने से जुड़ी खबरें रोज अखबारों की सुर्खियाँ बनती हैं, उससे जुड़े मौलवियों ने महिला की मौत का ‘सम्मान’ नहीं किया।

महिला की रिश्तेदार के मुताबिक, प्रोफेसर ने एक मुस्लिम कब्रिस्तान के रखवालों से संपर्क किया, जिन्होंने उन्हें इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार शव को दफनाने की अनुमति देने से भी इनकार कर दिया। परिवारवाले काफी परेशान थे, क्योंकि शव दो दिनों तक अस्पताल के मुर्दाघर में पड़ा रहा। महिला के माता-पिता इस दुनिया में नहीं रहे। उसके भाई और छोटी बहन को उसकी मृत्यु की सूचना दी गई, तो वे भी आ गए।

मृतक महिला की बहन ने कहा, “कोई रास्ता न देखकर नवसारी के समाजसेवी और विश्व हिन्दू परिषद के नेता साजन भरवाड से मदद माँगी। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि यदि हम सभी सहमत हों, तो वे शव का अंतिम संस्कार कर देंगे… जिस पर हम सभी सहमत हो गए।”

दरअसल पारसी यानी जोरोएस्ट्रियन समुदाय भारत के सबसे छोटे और सबसे पुराने धार्मिक समुदायों में से एक है। उनके कई सामाजिकऔर धार्मिक नियम सदियों पुराने हैं, जिनका उद्देश्य अपनी अलग धार्मिक पहचान और परंपराओं को सुरक्षित रखना है। समय के साथ इसमें कोई बदलाव नहीं आया है।

आज भी महिला के बिरादरी से अलग शादी करते ही सारे अथिकार खत्म कर दिए जाते हैं। न तो वह अग्निमंदिर जैसे पूजा स्थल जा सकती है और न ही सामाजिक कार्यक्रम में हिस्सा ले सकती है।

भारत में कैसे आए पारसी

लोकप्रिय पारसी परंपरा के अनुसार, फारस यानी ईरान में इस्लामी विजय के बाद धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए पारसी शरणार्थी के रूप में 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच भारत के पश्चिमी तट खासकर गुजरात में आए थे। ‘किस्सा-ए-संजान’ नामक पारसी परंपरा के मुताबिक, स्थानीय राजा जादी राणा ने उन्हें बसने की अनुमति दी थी।

कथा के अनुसार, पारसियों ने वचन दिया था कि वे स्थानीय समाज में शांतिपूर्वक रहेंगे, स्थानीय भाषा अपनाएँगे और अपनी पहचान बनाए रखते हुए समाज में घुल-मिल जाएँगे। यह ऐतिहासिक परंपरा पारसी समुदाय की सामूहिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

क्यों कम होते जा रहे हैं पारसी

पारसियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि 1941 में देश में एक लाख 14 हजार से अधिक पारसी थे, जो 2011 की जनगणना में घटकर 57 हजार रह गए। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 के तहत अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी में गिरावट को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने कई पहल की है। उन्होंने कहा कि जियो पारसी योजना शुरू की गई है, जिसका उद्देश्य पारसी समुदाय में विवाह, परिवार और बच्चों के जन्म को प्रोत्साहित देना है।

पारसी समुदाय की प्रजनन दर भारत के लगभग सभी बड़े समुदायों से काफी कम है। बड़ी संख्या में युवा पारसी विवाह नहीं करते या काफी देर से करते हैं। बूढों की आबादी ज्यादा हो गई है। मृत्यु दर जन्म दर से ज्यादा है। दूसरे धर्म में विवाह को लेकर नियम काफी सख्त हैं। अगर कोई महिला दूसरे धर्म में विवाह करती है तो उसकी धार्मिक पहचान खत्म कर दी जाती है। यहाँ तक कि बच्चों के धार्मिक पहचान पर भी विवाद रहता है। भारत से बड़ी संख्या में पारसी विदेशों में जाकर बस गए हैं। ये भी उनकी संख्या कम होने की बड़ी वजह है।

मोदी सरकार के बड़े फैसलों से भारत में आएगी ₹6 लाख करोड़ की FDI, ग्लोबल एग्रीगेट बॉन्ड इंडेक्स में एंट्री की तैयारी: समझें किन कदमों से बदले हालात

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में शनिवार (6 जून 2026) को आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) की बैठक हुई। बैठक में चर्चा हुई कि केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा 5 जून को उठाए गए कदमों से भारत में करीब 70 अरब डॉलर (लगभग 6 लाख करोड़ रुपए) का विदेशी निवेश आ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन फैसलों से विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा और भारत में पूँजी प्रवाह तेज होगा। इससे देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, सरकार की उधारी लागत कम हो सकती है और वैश्विक वित्तीय बाजारों में भारत की स्थिति और बेहतर होगी।

बैठक में वैश्विक अस्थिरता के दौर में भारत की आर्थिक वृद्धि को गति देने, दीर्घकालिक विकास प्राथमिकताओं और सुधारों को आगे बढ़ाने पर विचार-विमर्श किया गया। बैठक में प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव पीके मिश्रा, प्रधान सचिव और पूर्व RBI गवर्नर शक्तिकांत दास, परिषद के अध्यक्ष एस महेंद्र देव सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।

बैठक के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि भारत के आर्थिक परिवर्तन, दीर्घकालिक विकास और सुधारों की गति को बढ़ाने पर व्यापक चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि ‘Ease of Living’ और ‘Ease of Doing Business’ को और मजबूत बनाने के उपायों पर भी विचार साझा किए गए।

सरकार और RBI ने क्या कदम उठाए?

विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए वित्त मंत्रालय ने बड़ा कर सुधार किया है। सरकार ने विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के सरकारी बॉन्ड में निवेश पर लगने वाले शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन टैक्स को समाप्त कर दिया है। इसके अलावा सरकारी बॉन्ड से मिलने वाली ब्याज आय पर लगने वाला विदहोल्डिंग टैक्स भी हटा दिया गया है।

वहीं RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक में गवर्नर संजय मल्होत्रा ने रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखने का फैसला किया। केंद्रीय बैंक ने भू-राजनीतिक तनाव, महंगाई और सप्लाई चेन संबंधी चिंताओं के बीच न्यूट्रल रुख बनाए रखा। इसके साथ ही RBI ने विदेशी पूँजी आकर्षित करने के लिए कई अतिरिक्त कदमों की घोषणा की।

इनमें सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के लिए एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग (ECB) जुटाने हेतु रियायती फॉरेक्स स्वैप सुविधा और FCNR(B) डिपॉजिट योजना को फिर से शुरू करना शामिल है। इस योजना के तहत विदेशी मुद्रा जमा पर हेजिंग लागत RBI वहन करेगा। वर्ष 2013 में इसी योजना के जरिए भारत ने लगभग 26 अरब डॉलर जुटाए थे।

क्यों है 70 अरब डॉलर निवेश की उम्मीद?

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि वित्त मंत्रालय और RBI द्वारा उठाए गए कदम विदेशी निवेशकों के लिए भारत को अधिक आकर्षक बनाएँगे। करों में राहत मिलने से विदेशी निवेशकों की लागत कम होगी, जबकि RBI की नई सुविधाएँ बाहरी वित्तपोषण को आसान बनाएँगी।

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी कहा है कि केंद्रीय बैंक किसी निश्चित निवेश लक्ष्य को लेकर काम नहीं कर रहा है, लेकिन उसे बाहरी उधारी, विदेशी जमा और इक्विटी निवेश के माध्यम से मजबूत पूँजी प्रवाह की उम्मीद है। इन कदमों से भारत के भुगतान संतुलन (Balance of Payments) को भी मजबूती मिल सकती है।

ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट बॉन्ड इंडेक्स क्यों है महत्वपूर्ण?

भारत में संभावित विदेशी निवेश का बड़ा हिस्सा भारतीय सरकारी बॉन्ड्स के ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट बॉन्ड इंडेक्स में शामिल होने पर निर्भर माना जा रहा है। दुनिया के कई बड़े निवेश फंड इन वैश्विक बॉन्ड इंडेक्स को ट्रैक करते हैं और उसी के आधार पर निवेश करते हैं।

यदि भारतीय सरकारी बॉन्ड इस प्रमुख इंडेक्स में शामिल होते हैं, तो बड़ी मात्रा में निष्क्रिय (Passive) निवेश अपने आप भारत की ओर आएगा। विशेषज्ञों के अनुसार, केवल इस इंडेक्स में शामिल होने से अगले 10 महीनों में 20 से 25 अरब डॉलर तक का निवेश आ सकता है।

भारत पहले ही कई प्रमुख वैश्विक बॉन्ड सूचकांकों में जगह बना चुका है। जून 2024 में JPMorgan ने भारतीय बॉन्ड को अपने उभरते बाजार सूचकांक में शामिल किया था। इसके बाद जनवरी 2025 में ब्लूमबर्ग इमर्जिंग मार्केट लोकल करेंसी इंडेक्स और सितंबर 2025 में FTSE Russell के संबंधित सूचकांक में भी भारतीय सरकारी बॉन्ड शामिल किए गए।

हालाँकि जनवरी 2026 में Bloomberg Index Services Ltd (BISL) ने भारतीय सरकारी बॉन्ड को अपने प्रमुख ग्लोबल इंडेक्स में शामिल करने का फैसला टाल दिया था। कंपनी ने कहा था कि बाजार ढाँचे और परिचालन संबंधी कुछ मुद्दों पर और मूल्यांकन की जरूरत है। BISL ने संकेत दिया था कि इस विषय पर अगला अपडेट 2026 के मध्य तक दिया जाएगा।

भारत के लिए कितना बड़ा अवसर?

सरकार की कर राहत, RBI की नई निवेश प्रोत्साहन योजनाएँ, मजबूत GDP वृद्धि और ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट बॉन्ड इंडेक्स में संभावित शामिल होने की संभावना मिलकर भारत के लिए बड़ा अवसर पैदा कर रही हैं। यदि ये सभी परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं, तो आने वाले महीनों में भारत में करीब 70 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आ सकता है।

इससे न केवल विदेशी मुद्रा भंडार और निवेश बढ़ेगा, बल्कि सरकार की उधारी लागत कम होगी, वित्तीय बाजारों को मजबूती मिलेगी और वैश्विक निवेशकों के बीच भारत की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी। ऐसे समय में जब दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ अनिश्चितता का सामना कर रही हैं, भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण आर्थिक अवसर माना जा रहा है।

भगवान राम का अपमान, आजादी के नारे और तिरंगे से बदसलूकी: कॉकरोचों को ये तक नहीं पता कि वे क्यों आए हैं, पढ़ें- CJP के प्रदर्शन में ऑपइंडिया को क्या दिखा

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने शनिवार (6 जून 2026) को दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपनी इस कथित पार्टी के सदस्यों यानी ‘कॉकरोचों’ को प्रदर्शन के लिए बुलाया था।CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने समर्थकों से बड़ी संख्या में पहुँचकर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की थी, लेकिन उनका साथ देने वाले कॉकरोचों की संख्या उनकी उम्मीदों को तोड़ने वाली रही।

अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर युवाओं और छात्रों से बड़ी से बड़ी संख्या में जुटने का आह्वान किया था लेकिन आह्वान का असर केवल कुछ कॉकरोचों पर ही पड़ा। सोशल मीडिया पर करोड़ों फॉलोअर्स वाली इस CJP के प्रदर्शन में बमुश्किल कुछ सौ लोग ही पहुँचे। बात सिर्फ इतनी ही नहीं है इसमें शामिल होने वाले कॉकरोचों को देखकर भी साफ समझा जा सकता था कि इनकी मंशा केवल हिंसा फैलाना, सुर्खियाँ बटोरना, सरकार और भारतीय संस्कृति को बदनाम करना था।

यह आरोप कोई हमारा मनगढ़ंत नहीं है बल्कि ऑपइंडिया को इसके प्रमाण भी मिले हैं। पहली बात तो ये सामने आई कि प्रोटेस्ट के नाम पर शोर मचाने वाले ये कॉकरोच असल में ना तो कोई छात्र हैं और ना ही पढ़ाई या किसी तरह की परीक्षा से इनका कोई लेना-देना है और इसका प्रमाण इन्होंने खुद ही दे दिया ‘आजादी-आजादी’ के नारे लगाकर।

वायरल वीडियो अब तक आपने भी देख लिए होंगे और अगर नहीं देखें तो ऑपइंडिया के इन वीडियोज को देंखे, जिसमें ये अबर्न नक्सली डफली बजाते हुए ‘आजादी-आजादी’ चिल्ला रहे।

वीडियो में दिख रहे ये लोग चिल्ला रहे, “हम क्या चाहते आजादी, BJP से आजादी, हमारा नारा आजादी, मोदी सुनले आजादी, BJP सुनले आजादी, तुम जेल में डालो आजादी, हम लेके रहेंगे आजादी, मैं भी बोलूँ आजादी, तू भी बोले आजादी, देश बोले आजादी, मोदी तुझसे आजादी, BJP तुझसे आजादी।” अब आप सोचिए कि इसका पेपर लीक से क्या लेना देना है भला?

यह पहली बार नहीं जब ये वामपंथी गुट किसी भी अन्य मुद्दे को ढाल बनाकर सामने आया हो और बाद में असली रंग दिखाया हो। किसान आंदोलन के समय भी किसानों के साथ उनकी लड़ाई में शामिल होने को ढोंग कर के इन वामपंथियों ने एक शांत से धरने को हिंसक बना दिया था।

इसके अलावा साल 2019-20 का समय याद करें तो दिल्ली समेत जगह-जगह CAA-NRC के विरोध में सड़क पर आकर बैठे प्रदर्शनकारियों ने अपने प्रोटेस्ट का रंग बदल दिया था। उन्हीं प्रदर्शनों का नतीजा था कि दिल्ली को हिंदू विरोधी दंगे झेलने पड़े। 40-50 लोगों की निर्ममता से मौत हुई।

मकसद भी नहीं बता पा रहे अभिजीत के कॉकरोच, तिरंगे के अपमान का वीडियो आया सामने

बता दें कि CJP के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने अपने समर्थकों से अपील की थी कि वो अपने साथ तिरंगा झंडा, किताबें और फूल लेकर आएँ। उनके कॉकरोचों यानी समर्थकों ने ये बात मानी भी लेकिन शायज आशुतोष उन्हें ये बताना भूल गए कि तिरंगे को हर भारतीय, हर देशभक्त सम्मान की दृष्टि से देखता है।

ऑपइंडिया ने इसकी पुष्टि कर रही ऐसी ही एक घटना को कैप्चर भी किया है, जिसमें प्रदर्शन करने पहुँचे कॉकरोच तिरंगे का अपमान कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि कोई ऐसा व्यक्ति, जिसको अपने देश से प्रेम हो वो ऐसी घटिया हरकत कर सकता है। साफ समझ आ रहा कि ये हरकते भारत को बदनाम करने की वामपंथियों की केवल एक साजिश है।

दूसरी तरफ ऑपइंडिया के रिपोर्टर्स को ग्राउंड पर ऐसा कोई कॉकरोच नहीं मिला, जो यह बता सके कि उनका जुटान यहाँ हुआ किसलिए है। किसी के पास कोई मुद्दा नहीं जो वो बता सकें कि इसलिए वो प्रदर्शन करने आए हैं। कोई पेपर लीक पेपर लीक चिल्ला रहे तो वो उनके साथ मिल जा रहे।

कोई आजादी-आजाजी चिल्ला रहा तो उधर भी उपस्थिति दर्ज कर रहे। इस बैनर से उस बैनर, यहाँ से वहाँ, वहीं जो असल में कॉकरोच करते हैं।

हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ उगला जहर उगलने पहुँच रहे कॉकरोचों के दादा-परदादा

जंतर-मंतर पर पहुँचे एक बुजुर्ग ने ऑपइंडिया के रिपोर्टर से कहा कि ‘पांडव-वांडव’ तो कभी थे ही नहीं, ये सब बेकार बाते हैं। उन्होंने आगे कहा, “राम-वाम सब छोड़ दे, तु वहाँ मत जा, राम मोदी को नहीं मारता, सारे देश को लूट कर खा गया, वो मोदी को नहीं मारता, राम मंदिर के नाम पर कितने रुपए डकार गया, अडानी-अंबानी को नहीं मारता है।”

जब ऑपइंडिया के रिपोर्टर ने पूछा कि इसमें भगवान राम बीच में कहाँ से आ गए तो वो कहते हैं, “तेरे मेरे को डराने के लिए हैं राम तो, उसको नहीं मानते।” जिनको ना तो भारत के इतिहास, संस्कृति और धर्मग्रंथो से कोई लेना-देना नहीं, ना तो इन्हें हिंदू देवी-देवताओं का सम्मान करना आता है, ये लोग पहुँचे हैं कॉकरोचों को समर्थन करने।

कोई डायरी को बता रहा संविधान तो किसी का जवाब- अब्बा-डब्बा-जब्बा

प्रशांत राणा नाम के एक कॉकरोच से ऑपइंडिया के रिपोर्टर ने बात की तो उसने हाथ में ली हुई डायरी को भारत का संविधान बताया। जब रिपोर्टर ने दिखाने को कहा तो प्रशांत ने थोड़ा भाव खाया, लेकिन फिर डायरी खोली और कहा, ‘ये मेरे कुछ आर्टिकल्स हैं।’ जी हाँ यानी कॉकरोचों का अपना एक संविधान भी लिखा जा रहा है। उसने कहा कि ये मेरे लिए संविधान है।

रिपोर्टर ने जब उससे कहा कि भाई दिखाओ तो इस संविधान में क्या है तो कॉकरोच ने कहा- “इतनी पर्सनल चीज नहीं दिखा सकते।” इसके बाद वो लगातार अपने मन का बेतुकी बातें करता रहा जो संभवतः उसके अपने पर्सनल संविधान में लिखी होंगी।

ऑपइंडियो को प्रशांत की तरह ही एक और कॉकरोच मिला। उसने कहा कि वो सिस्टम का विरोध करने वालों का समर्थन कर रहा है। उसने कहा कि एजुकेशन सिस्टम पूरी तरह करप्ट हो चुका है। जब रिपोर्टर ने पूछा कि तो इसका हल क्या है और CJP के पास इसका क्या समाधान है तो उसने ना में सिर हिला दिया कि उसके पास इसका कोई जवाब नहीं है।

मास्क पहने एक कॉकरोच ने ऑपइंडिया को बताया कि नीट पेपर लीक हुआ है, इसलिए वो यहाँ आया है, लेकिन और कौन से पेपर कब लीक हुए हैं, इसके बारे में उसे कोई जानकारी नहीं थी। वह लगातार कहता रहा, “नीट का पेपर लीक हुआ है, होते रहते हैं, अब जैसे नीट का पेपर लीक हुआ है, नीट का पेपर लीक हुआ था, नीट का पेपर लीक हो जाएगा फिर।”

अंत में कॉकरोच ने रिपोर्टर से ही पूछ लिया कि वो बताए कौन-कौन से पेपर लीक हुए हैं। रिपोर्टर के हर सवाल में फँसते हुए कॉकरोच में अंत में चेहरा दिखाकर और बेईज्जती कराना सही नहीं समझा और चुप हो गया। जिन्हें किसी विषय की कोई जानकारी नहीं है, यहाँ तक की अपने भविष्य का भी कुछ नहीं पता ये औरों के भविष्य की क्या चिंता करेंगे।

कोई कॉकरोच यहाँ हिंदू देवी-देवता का अपमान कर रहा तो कोई अपनी पर्सनल डायरी को संविधान बता रहा। किसी को तिरंगे के सम्मान से कोई लेना-देना नहीं तो कोई डफली बजाते हुए आजादी-आजादी चिल्ला रहा और इनका कहना था कि ये छात्रों के भविष्य के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेंगे, ये कॉकरोच जिनके पास ना तो ज्ञान है और ना ही तमीज।

तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति के ‘घृणा मॉडल’ को अन्नामलाई की चुनौती, पेरियार नहीं, कलाम हैं आदर्श: समझें- ‘We The Change’ से राष्ट्रवाद का शंखनाद कितना अहम

तमिलनाडु की राजनीति में दशकों पुराने द्रविड़ आंदोलनों के ‘घृणा मॉडल’ को सीधी चुनौती देते हुए, पूर्व आईपीएस अधिकारी के. अन्नामलाई ने एक अभूतपूर्व आंदोलन का शंखनाद किया है। पेरियार, अंबेडकर, उत्तर भारत विरोध और हिंदी विरोध जैसी विभाजनकारी विचारधाराओं पर आधारित राजनीति के विपरीत, अन्नामलाई ने भारत के मिसाइल मैन और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को अपना आदर्श बनाया है। उन्होंने ‘कलाम स्कूल ऑफ आइडियोलॉजी’ के तहत ‘वी द चेंज’ (We The Change) आंदोलन की शुरुआत की है, जिसका प्राथमिक लक्ष्य तमिलनाडु में राष्ट्रवाद और सकारात्मक विकास का बीज बोना है।

दरअसल, भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और अपनी बेदाग, साहसी और तेजतर्रार छवि के लिए मशहूर पूर्व आईपीएस अधिकारी के. अन्नामलाई ने बीजेपी से अपनी राहें आधिकारिक तौर पर अलग कर ली हैं। अन्नामलाई का यह फैसला किसी राजनीतिक द्वेष या आपसी कलह का नतीजा नहीं है, बल्कि यह तमिलनाडु की आत्मा को एक नई वैचारिक दिशा देने की एक विराट और दमदार कोशिश है। बिना अपनी पूर्व पार्टी पर कोई निशाना साधे, उन्होंने बेहद गरिमापूर्ण तरीके से इस्तीफा दिया और तुरंत बाद एक नए राजनीतिक आंदोलन की नींव रख दी।

यह आंदोलन केवल एक नए संगठन का जन्म नहीं है, बल्कि यह तमिलनाडु की उस पारंपरिक, संकीर्ण और घृणा-आधारित राजनीति के ताबूत में आखिरी कील ठोकने की शुरुआत है, जिसने दशकों से इस महान धरती को शेष भारत से अलग रखने की साजिश रची थी।

अन्नामलाई ने इस आंदोलन के जरिए तमिल गौरव और भारतीय राष्ट्रवाद के अद्भुत संगम की एक नई धारा प्रवाहित की है। इस नए सफर का आगाज होते ही तमिलनाडु की जनता ने जिस तरह इस पर अपना भरोसा जताया है, वह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि राज्य के युवा अब बदलाव के लिए पूरी तरह तड़प रहे हैं।

‘We The Change’ की अद्भुत शुरुआत, महज 10 घंटे में 10 लाख सदस्य

अन्नामलाई ने पारंपरिक राजनीति से बिल्कुल अलग हटकर देश के महानतम सपूत, मिसाइल मैन और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को अपना आदर्श और वैचारिक प्रतीक बनाया है। उन्होंने कलाम साहब के सिद्धांतों पर आधारित ‘कलाम स्कूल ऑफ आइडियोलॉजी’ के तहत अपने नए आंदोलन ‘We The Change’ (वी द चेंज) की आधिकारिक घोषणा की। यह आंदोलन उनके द्वारा कोयंबटूर में स्थापित किए जाने वाले ‘एपीजे अब्दुल कलाम सेंटर फॉर एथिक्स एंड पॉलिटिक्स’ के तहत संचालित होगा।

इस घोषणा का प्रभाव इतना व्यापक और तीव्र था कि महज 10 घंटों के भीतर ही 10 लाख से अधिक लोग, विशेषकर युवा और महिलाएँ इस आंदोलन से जुड़ गए। तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास में यह अपने आप में एक अटूट रिकॉर्ड है।

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

वैसे, जब दक्षिण की राजनीति में हाल ही में एक अभिनेता की पार्टी ‘टीवीके’ बनी थी, तो उन्होंने मंच से पेरियार और पारंपरिक द्रविड़ प्रतीकों का नाम लेकर वही पुरानी घिसी-पिटी राजनीति की थी। लेकिन अन्नामलाई ने उन सभी विभाजनकारी चेहरों से पूरी तरह दूरी बनाकर यह साबित कर दिया कि वे राज्य में सत्ता बदलने नहीं, बल्कि व्यवस्था और सोच को बदलने आए हैं।

द्रविड़ आंदोलनों का हिंदी, उत्तर भारत और सनातन से घृणा का इतिहास

तमिलनाडु की राजनीति आजादी के पहले से और उसके बाद भी कुछ खास नकारात्मक मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। द्रविड़ आंदोलन के नाम पर राज्य में हमेशा हिंदी विरोध, उत्तर भारत विरोध और ब्राह्मण विरोध को ही राजनीति का मूल आधार बनाया गया।

इस द्रविड़ विचारधारा की असलियत बेहद स्याह और समाज को तोड़ने वाली रही है। इसके जनक माने जाने वाले पेरियार का इतिहास देश, संस्कृति और बहुसंख्यक समाज की आस्थाओं के प्रति अत्यंत आक्रामक और घृणा से भरा रहा है। द्रविड़ आंदोलन के नाम पर तमिलनाडु में सनातन धर्म को निशाना बनाया गया, उत्तर भारतीय नागरिकों के खिलाफ नफरत फैलाई गई और भाषा के नाम पर देश को बाँटने की कोशिशें हुईं।

हद तो तब हो गई जब इस विचारधारा के तहत मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के पावन चरित्र तक पर उंगली उठाई गई और जनभावनाओं को आहत किया गया। द्रविड़ राजनीति ने हमेशा तमिल अस्मिता को भारतीयता के विरोधी के रूप में पेश किया, जिससे राज्य का युवा देश की मुख्यधारा से वैचारिक रूप से कटता चला गया। इस घृणा मॉडल के सहारे वहाँ के क्षेत्रीय दलों ने दशकों तक सत्ता सुख भोगा और भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े साम्राज्य खड़े किए।

विडंबना यह रही कि तमिलनाडु की इस जमीन पर राष्ट्रीय पार्टियाँ भी इन द्रविड़ मुद्दों का खुलकर पुरजोर विरोध नहीं कर पाती थीं, क्योंकि उन्हें राज्य में गठबंधन की बैसाखियों की जरूरत होती थी। लेकिन अन्नामलाई ने इस कायरतापूर्ण राजनीति को लात मारकर सीधे सच का रास्ता चुना है।

कलाम कार्ड क्यों है अन्नामलाई का सबसे दमदार मास्टरस्ट्रोक?

ऐसे नफरत भरे और कट्टर माहौल में अन्नामलाई द्वारा डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को अपना वैचारिक प्रतीक चुनना भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा और सकारात्मक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। डॉ. कलाम एक ऐसे अजातशत्रु नेता और वैज्ञानिक रहे हैं, जिनका सम्मान द्रविड़ समर्थक, राष्ट्रवादी, अल्पसंख्यक, अगड़े, पिछड़े और समाज के हर वर्ग के लोग समान रूप से करते हैं।

रामेश्वरम के एक साधारण तमिल परिवार में जन्मे कलाम साहब ने कभी भी खुद को किसी विक्टिम कार्ड या अल्पसंख्यक पहचान के सहारे आगे नहीं बढ़ाया। उन्होंने शिक्षा, कड़ी मेहनत, देशभक्ति और विज्ञान के बल पर देश के शीर्ष वैज्ञानिक और राष्ट्रपति बनने का गौरव प्राप्त किया।

अन्नामलाई ने कलाम साहब को आगे रखकर द्रविड़ राजनीति के उस नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है, जो कहता था कि एक सच्चा तमिल राष्ट्रवादी नहीं हो सकता। अन्नामलाई का यह कदम समाज को जोड़ने वाला है। यह आंदोलन किसी खास जाति, धर्म या संप्रदाय को बढ़ावा देने के बजाय देश और राज्य के सामूहिक और समग्र विकास पर केंद्रित है।

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

अन्नामलाई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तमिल संस्कृति और भाषा पर अगाध गर्व करना और भारत माता के प्रति पूरी तरह समर्पित रहना एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

संस्थान के बेस पर राजनीति का महाप्लान किया तैयार

अन्नामलाई एक बेहद पढ़े-लिखे, पूर्व नौकरशाह और दूरदर्शी राजनेता हैं, जो आक्रामक राजनीति करने के साथ-साथ गंभीर मुद्दों पर बात करने से कभी नहीं घबराते। उन्होंने अपनी इस राजनीतिक यात्रा की शुरुआत अचानक नहीं की, बल्कि इसके पीछे उनकी एक गहरी संस्थागत तैयारी है।

अन्नामलाई ने कोयंबटूर में जिस कलाम सेंटर की स्थापना की है, उसे बेस बनाकर वे पूरे तमिलनाडु में गवर्नेंस, शिक्षा, विज्ञान और तकनीक आधारित राजनीति को आगे बढ़ाएंगे। यह संस्थान राज्य के उन युवाओं को प्रशिक्षित करेगा जो राजनीति में आना चाहते हैं लेकिन जिनके पास कोई पारिवारिक गॉडफादर नहीं है।

अन्नामलाई की नजर बहुत दूरदर्शी है और उनका लक्ष्य साल 2031 का तमिलनाडु विधानसभा चुनाव है। अपने दीर्घकालिक विजन को समझाते हुए उन्होंने बेहद व्यावहारिक बात कही कि केवल एक मुख्यमंत्री, 234 विधायक या 39 सांसद मिलकर तमिलनाडु की इस सड़ चुकी मौजूदा व्यवस्था को नहीं बदल सकते। अगर हमें वाकई पूरी व्यवस्था को बदलना है, तो हमें पंचायत स्तर से लेकर पार्षद, मेयर और शीर्ष पदों तक करीब 30,000 ईमानदार, कर्मठ और राष्ट्रभक्त नए लोगों की एक पूरी फौज तैयार करनी होगी। उनका यह आंदोलन आने वाले वर्षों में धीरे-धीरे एक राजनीतिक दल का रूप लेगा और राज्य की भ्रष्ट पारिवारिक राजनीति को उखाड़ फेंकेगा।

कैप्टन विजयकांत के साथ वो अनुभव और राष्ट्रवाद का असली दर्द

अपने इस विजन के पीछे के अनुभव को साझा करते हुए अन्नामलाई ने अपने जीवन के एक बेहद महत्वपूर्ण अध्याय का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि साल 2009 में जब वे देश के प्रतिष्ठित संस्थान आईआईएम (IIM) लखनऊ से एमबीए कर रहे थे, तब उन्होंने विशेष अनुमति लेकर डीएमडीके (DMDK) के संस्थापक और दिवंगत अभिनेता-राजनेता कैप्टन विजयकांत के साथ तीन महीने की जमीनी इंटर्नशिप की थी।

लोकसभा चुनाव के दौरान ग्रामीण इलाकों में धूल फाँकते हुए और जमीनी स्तर पर काम करते हुए उन्होंने चुनावी राजनीति और सार्वजनिक सेवा की वास्तविक समझ हासिल की थी। यही जमीनी अनुभव आज उनके काम आ रहा है।

नितिन नवीन को भेजे अपने गरिमापूर्ण इस्तीफे में अन्नामलाई ने राष्ट्रीय पार्टियों के उस कड़वे सच और दर्द को भी बयाँ किया, जिससे वे लंबे समय से जूझ रहे थे। उन्होंने लिखा कि राष्ट्रीय दल कभी भी उस भाषा और भावना के साथ बात नहीं कर पाए जिसे तमिलनाडु के आम लोग अपनी आत्मा से समझ सकें।

अन्नामलाई ने भाजपा में रहते हुए इसी धारणा को बदलने की पुरजोर कोशिश की और कई अंदरूनी तथा बाहरी बाधाओं के बावजूद राज्य के कोने-कोने में राष्ट्रवाद की अलख जगाई। उन्होंने गर्व से यह साफ किया कि वे एक ऐसे पक्के राष्ट्रवादी हैं जो क्षेत्रीय आकांक्षाओं, तमिल भाषा और उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर सर्वोच्च गर्व करते हैं।

तमिलनाडु में राष्ट्रवाद के स्वर्णिम युग की शुरुआत

के. अन्नामलाई का यह कदम तमिलनाडु की राजनीति में एक नए सूर्योदय की तरह है। उन्होंने साबित कर दिया है कि सकारात्मकता, विकास और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर बिना किसी नफरत का सहारा लिए भी एक विशाल जन आंदोलन खड़ा किया जा सकता है। द्रविड़ दलों ने जहाँ हमेशा उत्तर भारत और सनातन से घृणा को अपना हथियार बनाया, वहीं अन्नामलाई ने डॉ. कलाम के ‘मनों के मिलन’ (Unity of Minds) के सिद्धांत को अपना कवच बनाया है।

‘We The Change’ आंदोलन के जरिए तमिलनाडु की धरती पर राष्ट्रवाद का जो बीज बोया गया है, वह आने वाले समय में एक विशाल वटवृक्ष बनेगा। देश की अखंडता को सर्वोपरि मानते हुए तमिल अस्मिता को नया आकाश देने का अन्नामलाई का यह प्रयास न केवल दमदार है, बल्कि भारत की एकता को मजबूत करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।

तमिलनाडु की जनता ने 10 लाख से अधिक की संख्या में जुड़कर यह दिखा दिया है कि वे अब घृणा की राजनीति से ऊब चुके हैं और अन्नामलाई के नेतृत्व में एक नए, समृद्ध और राष्ट्रवादी तमिलनाडु के निर्माण के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

‘कल आतंकियों को पद्म भूषण भी दे देंगे?’: जब अखिलेश सरकार को पड़ी थी हाई कोर्ट की फटकार, आतंक के केस वापस लेने चली थी सपा; जानिए 2013 का पूरा विवाद

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर 13 साल पुराना एक बड़ा विवाद चर्चा में आ गया है। यह वही मामला है, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार ने आतंकवाद के आरोपितों के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की थी। अब योगी सरकार में मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर ने इस पुराने मुद्दे को दोबारा उठाकर समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोला है।

ओमप्रकाश राजभर ने शनिवार (6 जून 2026) को सोशल मीडिया पर 6 जून 2013 की एक पुरानी खबर का स्क्रीनशॉट शेयर किया। यह खबर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच द्वारा आतंकवाद के आरोपितों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने के फैसले को लेकर अखिलेश सरकार से कड़े सवाल पूछे जाने से जुड़ी थी।

राजभर ने मामले का जिक्र करते हुए लिखा, “पढ़ लीजिएगा। कम से कम आपको अपने पाप याद आ जाएँगे। फिर जब आप 2027 में चुनाव हारेंगे तो EVM और SIR को दोष नहीं दे पाएँगे।”

क्या था पूरा मामला?

साल 2012 में समाजवादी पार्टी पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता में आई थी और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने थे। विधानसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी ने वादा किया था कि आतंकवाद के मामलों में फँसाए गए मुस्लिम युवकों के मामलों की समीक्षा कराई जाएगी। पार्टी का कहना था कि कई युवकों को गलत तरीके से फँसाया गया है और उनकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।

सरकार बनने के बाद इसी वादे को पूरा करने की दिशा में काम शुरू हुआ। वर्ष 2013 में अखिलेश सरकार ने वर्ष 2007 के लखनऊ, फैजाबाद और वाराणसी सीरियल ब्लास्ट मामलों से जुड़े आरोपितों के खिलाफ चल रहे मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की। इन धमाकों में कई लोगों की जान गई थी जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे। जैसे ही सरकार के इस फैसले की जानकारी सामने आई तो इसे लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद शुरू हो गया।

विपक्षी दलों ने सरकार पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया। वहीं इस फैसले को अदालत में भी चुनौती दी गई।

हाई कोर्ट ने क्यों उठाए सवाल?

मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच पहुँचा। 6 जून 2013 को सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने अखिलेश सरकार के फैसले पर गंभीर सवाल खड़े किए। अदालत ने पूछा कि आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों में मुकदमे वापस लेने का आधार क्या है? कोर्ट ने सरकार से उन आरोपितों की सूची भी माँगी, जिनके खिलाफ मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की गई थी।

इसके साथ ही हाई कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या इस तरह के मामलों में केंद्र सरकार से जरूरी अनुमति ली गई है। अदालत ने साफ कहा कि आतंकवाद से जुड़े मामलों को सामान्य आपराधिक मामलों की तरह नहीं देखा जा सकता क्योंकि इनका असर केवल किसी एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि पूरे समाज और राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है।

बाद में दिसंबर 2013 में हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और देश के खिलाफ युद्ध जैसे गंभीर मामलों में अभियोजन वापस लेने के लिए केंद्र सरकार की सहमति आवश्यक होती है। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में मुकदमे वापस लेने के लिए असाधारण और मजबूत कारण होने चाहिए।

‘कल आतंकियों को पद्म भूषण भी दे देंगे?’

इस मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट की कुछ टिप्पणियाँ काफी चर्चा में रही थीं। अदालत ने सरकार के रुख पर नाराजगी जताते हुए तीखी टिप्पणी की थी कि ‘आज आप आतंकवाद के आरोपितों के मुकदमे वापस ले रहे हैं, कल क्या इन्हें पद्म भूषण भी दे देंगे’?

कोर्ट ने कहा था कि यदि सरकार इस तरह आतंकवाद के आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने लगेगी, तो समाज में गलत संदेश जाएगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कौन दोषी है और कौन निर्दोष, इसका फैसला अदालत करेगी, सरकार नहीं।

संभल दंगों के आरोपितों का मुकदमा भी लिया गया था वापस

यह पहला मौका नहीं था जब समाजवादी पार्टी की सरकार ऐसे फैसलों को लेकर विवादों में आई हो। इससे पहले साल 1993 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की सरकार ने संभल में वर्ष 1978 में हुए दंगों से जुड़े आरोपितों के खिलाफ मुकदमे भी वापस लिए थे।

बताया जाता है कि उस दंगे में सैकड़ों लोगों की हत्या हुई थी और कई हिंदुओं के मकानों व पूजा स्थलों को आग लगा दी गई थी। उस फैसले को लेकर भी उस समय राजनीतिक बहस हुई थी।

अब फिर क्यों उठा यह मुद्दा?

दरअसल, पिछले कुछ महीनों से ओमप्रकाश राजभर लगातार समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर हमलावर नजर आ रहे हैं। खासकर सपा के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को लेकर राजभर लगातार सवाल उठा रहे हैं।

राजभर का आरोप है कि समाजवादी पार्टी केवल वोट बैंक की राजनीति करती है और गैर-यादव पिछड़ी जातियों को सिर्फ चुनावी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करती है। इसी राजनीतिक तनातनी के बीच उन्होंने 2013 के आतंकवाद मामलों का विवाद एक बार फिर सामने ला दिया है।

अपने सोशल मीडिया पोस्ट में राजभर ने कहा कि 6 जून की तारीख इसलिए याद रखनी चाहिए, क्योंकि इसी दिन हाई कोर्ट ने आतंकवाद के आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने के फैसले पर सपा सरकार को कठघरे में खड़ा किया था।

‘यह सरकार खून-खराबे के बिना सत्ता से नहीं हटेगी’: CJP के कॉकरोचों ने सोशल मीडिया पर मचाया उत्पात, कीं रक्तपात-हिंसा-अराजकता की बातें

विवादित कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने आज शनिवार (6 जून 2026) को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने समर्थकों से बड़ी संख्या में जंतर-मंतर पहुँचकर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की थी। लेकिन यह प्रदर्शन फीका ही रहा, ना भीड़ जुटी और ना ही कोई सार्थक परिणाम दिखा।

जमीन पर यह प्रदर्शन भले की पुलिस की मुस्तैदी की वजह से शांतिपूर्ण रहा हो लेकिन पार्टी के तिलचट्टों ने सोशल मीडिया पर इसमें हिंसा के लिए उकसाने की पूरी कोशिश की थी। ऑपइंडिया को सोशल मीडिया पर CJP समर्थकों की कई ऐसी टिप्पणियाँ मिलीं, जिनमें प्रदर्शन के दौरान प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हिंसा की बात कही गई थी।

रक्तपात और हिंसा का आह्वान

CJP के प्रदर्शन में शामिल होने की अपील करने वाली कुछ रेडिट पोस्टों के जवाब में एक समर्थक ने खुले तौर पर हिंसा का समर्थन किया। उसने लिखा, “यह अभिशप्त सरकार खून-खराबे और हिंसा के बिना सत्ता से नहीं हटेगी।”

स्क्रीनशॉट – रेडिट

इसी रेडिट अकाउंट से की गई एक अन्य टिप्पणी में भी प्रदर्शन के दौरान हिंसा को उचित ठहराने की कोशिश की गई। टिप्पणी में लिखा गया, “सत्ता में बैठे लोग गुंडे हैं और अपने पास मौजूद हर हथकंडे का इस्तेमाल करते हैं। अगर ये गुंडे इतने ही मूर्ख हैं, तो आंदोलन का हिंसक होना तय है।”

स्क्रीनशॉट – रेडिट

भारत में भी नेपाल जैसा Gen Z विरोध प्रदर्शन चाहिए

एक अन्य CJP समर्थक ने हाल ही में नेपाल में हुए युवा-नेतृत्व वाले उग्र प्रदर्शनों का हवाला देते हुए वैसी ही स्थिति की इच्छा जताई। उसने कहा कि नेपाल में युवाओं ने पुलिस कार्रवाई और लाठीचार्ज की परवाह किए बिना आंदोलन में हिस्सा लिया और भारतीय युवाओं को भी इसी तरह एकजुट होकर आगे आना चाहिए।

अपनी टिप्पणी में उसने लिखा, “नेपाल में युवाओं ने पुलिस या लाठीचार्ज की चिंता किए बिना विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। भारतीय युवाओं को भी एकता के लिए इससे अधिक मजबूत विश्वास दिखाना चाहिए।”

स्क्रीनशॉट – रेडिट

नेपाल को मजबूत लोकतांत्रिक परंपराओं या राजनीतिक स्थिरता के लिए नहीं जाना जाता। वहाँ बहुत कम प्रधानमंत्री ऐसे रहे हैं जो अपना पूरा कार्यकाल पूरा कर पाए हों। देश के राजनीतिक इतिहास में कई बार सरकारें जनआंदोलनों और राजनीतिक उथल-पुथल के चलते सत्ता से बेदखल हुई हैं।

इसके विपरीत, भारत दुनिया के सबसे सफल और जीवंत लोकतंत्रों में से एक माना जाता है, जहाँ सत्ता परिवर्तन हमेशा संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुनावों के माध्यम से होता रहा है। भारत में सरकारों को बदलने का अधिकार मतदाताओं के पास है और यह प्रक्रिया चुनावी व्यवस्था के जरिए संपन्न होती है।

प्रदर्शनों के दौरान की थी पागलपन भरी चीजें होने की उम्मीद

CJP के एक समर्थक ने प्रदर्शन के दौरान ‘कुछ बड़ा’ या ‘असामान्य’ होने की संभावना को लेकर उत्साह व्यक्त किया था। उसने लिखा, “मैं वहाँ जा रहा हूँ और इंस्टाग्राम को स्टोरीज से भर दूँगा, क्योंकि निश्चित रूप से कुछ पागलपन भरी चीजें होने वाली हैं।”

इस टिप्पणी से संकेत मिलता है कि समर्थक को प्रदर्शन के दौरान किसी अप्रत्याशित घटनाक्रम की उम्मीद थी। सोशल मीडिया पर सामने आए ऐसे संदेशों ने प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर और अधिक सवाल खड़े कर दिए हैं, खासकर तब जब पार्टी नेतृत्व लगातार आंदोलन को शांतिपूर्ण बता रहा है।

स्क्रीनशॉट – रेडिटॉ

भारतीय न्यायपालिका को उखाड़ फेंकने का आह्वान

सोशल मीडिया पर की गई एक अन्य टिप्पणी में CJP के एक समर्थक ने केवल लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार ही नहीं, बल्कि भारतीय न्यायपालिका के प्रति भी असंतोष व्यक्त किया। उसने लिखा, “हमें अपनी न्यायपालिका को भी बाहर का रास्ता दिखाना होगा, क्योंकि उसने अपनी स्वतंत्रता खो दी है।”

इस तरह की टिप्पणियाँ दर्शाती हैं कि कुछ समर्थक देश की प्रमुख लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति गहरा अविश्वास व्यक्त कर रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि ऐसे बयान संवैधानिक संस्थाओं की वैधता पर सवाल खड़े करते हैं और सार्वजनिक विमर्श को और अधिक ध्रुवीकृत बना सकते हैं।

स्क्रीनशॉट – रेडिटॉ

किसानों के विरोध-प्रदर्शन जैसी स्थिति के लिए योजना बनाना

CJP के कुछ समर्थक चाहते थे कि यह आंदोलन नवंबर 2020 में शुरू हुए किसान आंदोलन की तरह लंबा और प्रभावशाली साबित हो। सोशल मीडिया पर एक समर्थक ने दावा किया कि किसान आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और उपद्रव के लिए प्रदर्शनकारी नहीं, बल्कि केंद्र सरकार द्वारा भेजे गए तत्व जिम्मेदार थे।

उसने लिखा, “निराशावादी नहीं बनना चाहता, लेकिन अगर सैकड़ों लोग प्रदर्शन के लिए जुटते हैं तो वे भीड़ में कुछ लोगों को सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के लिए शामिल कर देंगे और फिर पूरे आंदोलनकारियों को उपद्रवी बता देंगे। किसान आंदोलन में भी ऐसा हुआ था और इस बार भी ऐसा ही होगा।”

इस टिप्पणी में समर्थक ने पहले से ही यह तर्क देने की कोशिश की कि यदि प्रदर्शन के दौरान कोई हिंसा या कानून-व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न होती है, तो उसके लिए CJP नेतृत्व और समर्थकों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।

स्क्रीनशॉट – रेडिटॉ

CJP समर्थकों की सोशल मीडिया टिप्पणियों को देखते हुए लगता है कि यह प्रदर्शन केवल सरकार के खिलाफ कथित शांतिपूर्ण विरोध तक सीमित नहीं था बल्कि इसके जरिए देश में अराजकता का माहौल पैदा करने की कोशिश की थी लेकिन सुरक्षाबलों की मुस्तैदी से यह संभव नहीं हो सका।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)