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AC ब्लास्ट के बढ़ते मामलों के पीछे चीन का हाथ? जानिए कैसे घटिया गैस से बढ़ रहा घरों में विस्फोट का खतरा, भारत सरकार कर रही बैन लगाने पर विचार

गर्मी में AC (एसी) की खपत काफी बढ़ गई है। इस बीच कई जगहों पर एसी में धमाके की खबरे भी सामने आ रही हैं। इन धमाकों के पीछे कहीं न कही चीन का हाथ हो सकता है। ऐसा इसीलिए क्योंकि अब एसी में चायनीज गैसें भरी जा रही हैं। ये सस्ती होती हैं इसलिए मैकेनिक इसका इस्तेमाल धड़ल्ले से कर रहे हैं। घर के लोगों को पता भी नहीं होता कि उन्होंने एसी में जो गैस भरवाई है, वह उनके विनाश का कारण बन सकता है।

दरअसल आजकल एसी में R-32 गैस का इस्तेमाल किया जा रहा है। पहले R-22, R-410 जैसी गैंसें इस्तेमाल होती थी, जो कम ज्वलनशील (बहुत आसानी से आग पकड़ लेने वाली) थी। हालाँकि R- 32 पर्यावरण के ख्याल से बेहतर माना जाता है, लेकिन ये ज्वलनशील गैस है। ऐसी ही हालत R-152a को लेकर है। इस गैस का आयात बड़ी मात्रा में चीन से हो रहा है। अनुमान के मुताबिक, 2024 में अप्रैल के महीने तक करीब 5000 टन की भारी मात्रा इसका आयात हुआ था। ये सारे गैस मुख्य रूप से चीन से आते हैं। इससे एसी में ओवरहीटिंग की दिक्कत आती है।

सुरक्षित R-22 की बजाय सेकेंडरी रिफिलर R-152a को मिलाकर इस्तेमाल किया जा रहा है। ये काफी ज्वलनशील हैं। इसलिए एसी में इसके किसी भी तरह के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा हुआ है। यानी अकेले या मिश्रण के तौर पर R-152a का इस्तेमाल भारत में नहीं किया जा सकता। इसका इस्तेमाल हेयर स्प्रे और डिओडरेंट में किया जाता है। इतना ही नहीं ये पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी काफी खतरनाक है। क्योंकि इसके जलने से कार्बन मोनोऑक्साइड और हाईड्रोजन फ्लोराइड जैसे गैस निकलते हैं। इसलिए R-152a जैसे रेफ्रिजिरेंट के इस्तेमाल की वजह से एसी में विस्फोट की घटनाएँ बढ़ गई हैं।

दिल्ली, नोएडा समेत कई जगहों पर एसी में हुआ धमाका

मई 2026 में दिल्ली में घटी घटनाओं ने इस ओर लोगों का ध्यान खींचा। दिल्ली के हौज खास में रिटायर IAS अधिकारी धनेन्द्र कुमार के घर में एसी में आग लग गई, जिसमें झुलसकर उनकी मौत हो गई। उनका बेटा भी इसकी वजह से गंभीर रूप से जल गया। ऐसे ही एक मामले में राजधानी के विवेक विहार में हुए एसी ब्लास्ट में एक ही परिवार के 5 लोगों की जान चली गई।

इसी तरह दिल्ली के शाहदरा इलाके में 3 मई 2026 को AC फटने से आग लग गई, जिसमें 9 लोगों की जान चली गई। ग्रेटर नोएडा में भी AC फटने की घटना से घर का पूरा सामान जल गया। अप्रैल में ग्रेटर नोएडा में ही AC फटने की 6 घटनाएँ हो चुकी हैं। इस मामले में अग्निशमन विभाग का कहना है कि एसी के गैस रिसाव के कारण ये हादसा हुआ। हो सकता है कि एसी में नकली रेफ्रिजरेंट गैसों का इस्तेमाल हुआ हो।

कैसे चायनीज गैस बनी संकट, सरकार ने उठाए कदम

इन हादसों ने हमें सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि आखिर किस तरह इससे बचा जाए। सरकार को इस चायनीज गैस R-152a के आयात पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की जरूरत है। वर्तमान में यह गैस सीधे तौर पर प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन भारत सरकार के विदेश व्यापार महानिदेशक ने इसके आयात को ‘प्रतिबंधित’ श्रेणी में रखा है। R-152a को आयात करने के लिए डीजीएफटी से वैध लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य है। सुरक्षा और दुरुपयोग को रोकने के लिए डीजीएफटी और सरकार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि आयात केवल ‘वास्तविक औद्योगिक उपयोग’ तक ही सीमित हो, ताकि यह गैस खुले बाजार में न बिके।

विशेषज्ञों और सुरक्षा एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि नकली या मिलावटी गैस बेची गई है, जो अत्यधिक ज्वलनशील कैमिकल (जैसे R40/मिथाइल क्लोराइड) पाए गए। ऐसी गैसें एसी के डिजाइन के अनुरूप नहीं होतीं। यदि सिस्टम में ऐसी गैस भर दी जाए जो मूल डिजाइन से अधिक ज्वलनशील हो, तो लीकेज की स्थिति में स्पार्क मिलने पर आग लग सकती है। इससे विस्फोट और कंप्रेसर फेल होने का खतरा भी बढ़ जाता है।

मिलावटी गैसों के खिलाफ भी कार्रवाई सरकार कर रही है। लोगों को भी इसको लेकर जागरुक करने की जरूरत है। भारत में बिकने वाले अधिकांश एसी और रेफ्रिजरेंट गैसों की सप्लाई चेन में चीन की अहम भूमिका है। चीन से नकली, मिलावटी और गलत लेबल लगी हुई या अवैध तरीके से आई खतरनाक गैस लोगों की जान पर बन आई है।

चीन ने मार दिए 10000+ लोग, भारत के वामपंथी करते रहे बचाव: पढ़ें- 37 साल पहले तियानमेन स्क्वायर के प्रदर्शन, सरकार की कार्रवाई और लेफ्ट के रुख की पूरी कहानी

4 जून 1989 का दिन था, चीन की राजधानी बीजिंग में तियानमेन स्क्वायर पर हजारों छात्र, मजदूर और आम नागरिक इकट्ठा हुए थे। ये लोग लोकतांत्रिक सुधार, भ्रष्टाचार पर लगाम और राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव की माँग कर रहे थे।

इन लोगों को उम्मीद थी कि कुछ बदलेगा लेकिन यह दिन इन हजारों लोगों का आखिरी दिन बन गया। कुछ ही घंटों बाद सड़कों पर टैंक उतर आए, गोलियाँ चलीं और आंदोलन का दमन कर दिया गया।

37 साल बाद भी यह सवाल दुनिया भर में पूछा जाता है कि आखिर तियानमेन स्क्वायर में हुआ क्या था? चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने इतना बड़ा कदम क्यों उठाया? उस समय चीन के वामपंथी नेताओं का क्या तर्क था? और सबसे महत्वपूर्ण, भारत के वामपंथी दलों ने इस घटना को किस नजर से देखा?

क्या था तियानमेन स्क्वायर प्रोटेस्ट आखिर क्यों हुआ था शुरू?

1980 के दशक में चीन आर्थिक सुधारों के दौर से गुजर रहा था। देंग शियाओपिंग के नेतृत्व में बाजार आधारित सुधार लागू किए जा रहे थे। इन सुधारों से अर्थव्यवस्था तो तेजी से बढ़ी लेकिन इसके साथ भ्रष्टाचार, महँगाई और असमानता भी बढ़ने लगी।

15 अप्रैल 1989 को चीन के पूर्व कम्युनिस्ट नेता हू याओबांग का निधन हो गया। हू याओबांग को सुधारवादी नेता माना जाता था और छात्रों के बीच उनकी अच्छी छवि थी। उनकी मौत के बाद हजारों छात्र उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए बीजिंग के तियानमेन स्क्वायर में जुटने लगे।

लोकतंत्र समर्थक मार्च तियानमेन स्क्वायर, बीजिंग, 4 मई, 1989 (फोटो साभार – AP)

धीरे-धीरे यह श्रद्धांजलि सभा एक बड़े राजनीतिक आंदोलन में बदल गई। छात्र सिर्फ शोक नहीं मना रहे थे, बल्कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई, प्रेस की अधिक स्वतंत्रता, राजनीतिक सुधार और सरकार में पारदर्शिता की माँग भी कर रहे थे।

कुछ ही हफ्तों में आंदोलन पूरे देश में फैल गया। बीजिंग के अलावा कई अन्य शहरों में भी प्रदर्शन होने लगे। लाखों लोग छात्रों के समर्थन में सड़कों पर उतर आए। यह कम्युनिस्ट चीन के इतिहास का सबसे बड़ा जन आंदोलन बन गया।

क्यों थे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर मतभेद?

तियानमेन आंदोलन को लेकर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर एक जैसी सोच नहीं थी। पार्टी के कुछ नेता मानते थे कि छात्रों की माँगों को सुना जाना चाहिए और बातचीत के जरिए समाधान निकाला जा सकता है।

उस समय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव झाओ जियांग नरम रुख रखते थे। वे छात्रों के बीच गए और उनसे बातचीत की कोशिश भी की। उनका मानना था कि आंदोलन को बल प्रयोग से नहीं बल्कि राजनीतिक संवाद से समाप्त किया जाना चाहिए।

लेकिन पार्टी के दूसरे धड़े का मानना था कि यह आंदोलन सिर्फ सुधारों की माँग नहीं कर रहा बल्कि कम्युनिस्ट शासन को चुनौती देने की दिशा में बढ़ रहा है। उन्हें डर था कि अगर आंदोलन जारी रहा तो चीन में भी वही स्थिति पैदा हो सकती है जो उस समय सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के कई देशों में बन रही थी। आखिरकार कठोर रुख रखने वाले नेताओं का पक्ष भारी पड़ा और सरकार ने आंदोलन के खिलाफ सख्त कार्रवाई का फैसला कर लिया।

चीनी सरकार ने आंदोलन को कैसे किया खत्म?

20 मई 1989 को बीजिंग में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। सेना को राजधानी में भेजा गया लेकिन शुरुआत में प्रदर्शनकारियों और स्थानीय लोगों ने सैनिकों को आगे बढ़ने से रोक दिया। हालात लगातार तनावपूर्ण होते गए। आखिरकार 3 और 4 जून 1989 की रात चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को तियानमेन स्क्वायर और उसके आसपास के इलाकों को खाली कराने का आदेश दिया गया।

टैंक और बख्तरबंद वाहन सड़कों पर उतरे। सैनिकों ने भीड़ को हटाने के लिए बल का इस्तेमाल किया। कई जगह गोलीबारी भी हुई। इसके बाद आंदोलन पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।

इस कार्रवाई में कितने लोग मारे गए, इसे लेकर आज भी विवाद बना हुआ है। चीन की सरकार संख्या को कम कर के बताती है, जबकि मानवाधिकार संगठनों, पत्रकारों और कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों का दावा है कि मरने वालों की संख्या सैकड़ों से लेकर हजारों तक हो सकती है। हालाँकि एक बात पर लगभग सभी सहमत हैं कि यह कार्रवाई बेहद हिंसक थी और उसने चीन के इतिहास पर स्थायी प्रभाव छोड़ा।

चीन ने 200 लोगों और कई सुरक्षाकर्मियों के मारे जाने का दावा किया था। वहीं ब्रिटिश सरकार के एक डॉक्यूमेंट में सामने आया था कि चीनी सेना की कार्रवाई में कम से कम 10,000 लोग मारे गए थे।

चीन के वामपंथियों और कम्युनिस्ट सरकार का क्या तर्क था?

पश्चिमी देशों और मानवाधिकार संगठनों ने इस कार्रवाई को लोकतंत्र समर्थक आंदोलन का दमन बताया लेकिन चीन की कम्युनिस्ट सरकार का नजरिया बिल्कुल अलग रहा।

सरकार ने आंदोलन के एक हिस्से को ‘काउंटर रिवोल्यूशनरी’ यानी क्रांति-विरोधी गतिविधि बताया। चीनी नेतृत्व का दावा था कि कुछ ताकतें देश में अस्थिरता पैदा करना चाहती थीं और कम्युनिस्ट शासन को कमजोर करने की कोशिश कर रही थीं।

देंग शियाओपिंग और उनके समर्थकों का मानना था कि अगर उस समय सख्त कदम नहीं उठाए जाते तो चीन भी सोवियत संघ की तरह राजनीतिक अराजकता और टुकड़ों में टूटने की ओर बढ़ सकता था। इसी वजह से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी आज भी आधिकारिक रूप से यह मानती है कि 1989 में उठाया गया कदम देश की स्थिरता और विकास के लिए जरूरी था।

सालों बाद भी चीन के कई सरकारी नेता इसी तर्क को दोहराते रहे हैं। उनका कहना है कि उस समय लिए गए फैसलों की वजह से चीन राजनीतिक रूप से स्थिर रहा और दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सका।

तियानमेन स्क्वायर नरसंहार का जिक्र होते ही भारत में वामपंथी दलों की भूमिका और उनके रुख पर भी सवाल उठने लगते हैं। दुनिया भर में जहाँ लोकतंत्र समर्थक छात्र-युवाओं पर चीनी सेना की कार्रवाई की आलोचना हुई तो वहीं भारत के कई वामपंथी नेता और संगठन चीन की कम्युनिस्ट सरकार के बचाव में खड़े नजर आए।

सवालों के घेरे में भारतीय वामपंथी दलों का रवैया

वामपंथ के एक बड़े वर्ग ने चीन के आधिकारिक दावों को स्वीकार करते हुए सैन्य कार्रवाई को सही ठहराने की कोशिश की। उनका तर्क था कि चीन में राजनीतिक अस्थिरता और क्रांति के विरोध को रोकने के लिए कठोर कदम जरूरी थे। कई वामपंथी नेताओं ने पश्चिमी मीडिया पर घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप भी लगाया।

आलोचकों का कहना है कि जो वामपंथी दल भारत में लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की बात करते हैं, वही चीन में छात्रों और नागरिकों के खिलाफ हुई सैन्य कार्रवाई पर अक्सर दोहरे मापदंड अपनाते दिखाई देते हैं। उनके अनुसार, वैचारिक नजदीकी के कारण कई वामपंथी नेता चीन की कम्युनिस्ट सरकार की आलोचना करने से बचते रहे हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया में 16 जून 1989 को प्रकाशित एक लेख के अनुसार, CPI(M) और CPI ने इस कार्रवाई की खुलकर निंदा नहीं की। इन दलों के नेताओं ने इसे चीन का आंतरिक मामला बताया। कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि छात्रों का आंदोलन राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर रहा था, इसलिए चीनी सरकार की कार्रवाई को गलत नहीं माना जाना चाहिए।

इसका उदाहरण CPI(M) के वरिष्ठ नेता और केरल के मंत्री एम वी गोविंदन का बयान है। उन्होंने कहा था कि उनकी पार्टी यह नहीं मानती कि तियानमेन स्क्वायर आंदोलन को खून में डुबो दिया गया था।

16 जनवरी 1990 को टाइम्स ऑफ इंडिया के एक संपादकीय में कहा गया कि CPI(M) ने सार्वजनिक रूप से तियानआनमेन स्क्वायर में हुई कार्रवाई का बचाव किया था। CPI(M) के आधिकारिक मलयालम अखबार ‘देशाभिमानी‘ ने छात्र प्रदर्शनकारियों को उपद्रवी बताया था। अखबार में चीनी सरकार द्वारा की गई सैन्य कार्रवाई के समर्थन में भी बातें कही गई थीं।

7 नवंबर 1990 को लोकसभा में विजय कुमार मल्होत्रा ने आरोप लगाया था कि तियानआनमेन स्क्वायर में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन को टैंकों से कुचले जाने के बाद भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों ने चीनी सरकार का समर्थन किया था।

राजनीतिक स्तर पर चीन के प्रति नरम रुख अपनाने वाले नेताओं की वजह से भारतीय वामपंथ की भूमिका लगातार विवादों और आलोचनाओं का विषय बनी रही। इसलिए तियानमेन स्क्वायर की चर्चा में भारतीय वामपंथी दलों को ले कर ये कहा जाता है कि उन्होंने लोकतांत्रिक अधिकारों की तुलना में वैचारिक प्रतिबद्धता को अधिक महत्व दिया।

टैंक मैन की तस्वीर कैसे बन गई प्रतिरोध का वैश्विक प्रतीक?

तियानमेन स्क्वायर की चर्चा बिना ‘टैंक मैन‘ के अधूरी मानी जाती है। 5 जून 1989 को एक तस्वीर दुनिया भर में प्रकाशित हुई। तस्वीर में एक अकेला व्यक्ति हाथ में बैग लिए टैंकों के सामने खड़ा दिखाई देता है। वह टैंकों के रास्ते में खड़ा होकर उन्हें आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश करता है।

फोटो साभार – गेटी इमेजेज

उस व्यक्ति की पहचान आज तक आधिकारिक रूप से नहीं हो सकी है। लेकिन उसकी तस्वीर दुनिया भर में साहस, प्रतिरोध और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में देखी जाती है। कई लोगों के लिए तियानमेन स्क्वायर की पूरी कहानी इसी तस्वीर में समा जाती है, एक तरफ राज्य की ताकत और दूसरी तरफ अकेला नागरिक।

37 साल बाद भी तियानमेन स्क्वायर दुनिया में चर्चा का विषय क्यों है?

तियानमेन स्क्वायर सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना नहीं है। यह आज भी राजनीतिक बहस का हिस्सा है। चीन में इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा बेहद सीमित है। इंटरनेट पर सेंसरशिप लागू रहती है और इस घटना की वर्षगाँठ पर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी जाती है। कई बार स्मरण कार्यक्रमों और श्रद्धांजलि सभाओं पर भी प्रतिबंध लगाए गए हैं।

दूसरी तरफ मानवाधिकार संगठन लगातार इस घटना की निष्पक्ष जाँच, मृतकों की सही संख्या और जवाबदेही की माँग करते रहे हैं। इसी कारण हर साल 4 जून आते ही दुनिया भर में तियानमेन स्क्वायर की चर्चा फिर शुरू हो जाती है।

कभी था भू-माफियाओं का कब्जा, अब हिंदू शरणार्थियों को जमीन का अधिकार: पढ़ें- डिजिटलीकरण से भ्रष्टाचार पर रोक तक, योगी सरकार ने कैसे बदली UP की भूमि व्यवस्था

देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश ने दशकों तक भूमि प्रशासन की भयावह विफलताएँ देखी हैं। एक ओर ध्वस्त और रिश्वतखोरी से भरी भूमि राजस्व प्रणाली थी, तो दूसरी ओर भूमि माफियाओं का वर्चस्व और दशकों से भूमि के अभाव में जीवन जी रहे हिंदू शरणार्थियों की पीड़ा।

2017 में जब सरकार बदली तो यह व्यवस्था भी बदलने लगी, योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने सत्ता में आने के बाद इन तीनों मोर्चों पर एक साथ और निर्णायक रूप से काम किया है। इस रिपोर्ट में नीतियों और सुधारों को विस्तार से समझेंगे।

भूमि रिकॉर्ड और लेखपाल व्यवस्था की दुर्दशा

उत्तर प्रदेश की भूमि राजस्व व्यवस्था उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 पर आधारित है, जो पुराने UP Tenancy Act 1939 और UP Land Revenue Act 1901 और अन्य कानूनों की जगह बनाई गई है। इसमें नामांतरण (Property Mutation), विभाजन, सीमांकन (Demarcation) और राजस्व वसूली के प्रावधान हैं। लेकिन उस दौर में कानून की मंशा और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क था।

जमीन के सबसे बुनियादी दस्तावेज खसरा और खतौनी मैनुअल रजिस्टरों में लेखपाल के हाथ में थे, जिनकी कोई डिजिटल कॉपी तक उपलब्ध नहीं होती थी। हर काम के लिए तहसील कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते थे और हर चक्कर के साथ रिश्वत देना आम बात थी और आप लोगों में ये कइयों ने अनुभव भी किया होगा। फर्जी नामांतरण की भरमार थी और ‘बेनामी’ लेनदेन इतने सामान्य थे कि असली मालिक और कागजी मालिक अलग होना एक चलन बन चुका था।

भूमि माफिया और राजनीतिक संरक्षण

भूमि माफियाओं ने सरकारी जमीनों पर कब्जा कर रखा था और उन्हें खुले राजनीतिक संरक्षण का वरदान प्राप्त था। कोई कार्रवाई नहीं होती थी क्योंकि ऊपर से नीचे तक एक सुरक्षित तंत्र बना हुआ था। भूमि पंजीकरण में रिश्वत और स्टांप पेपर की कालाबाजारी आम बात थी। राजस्व न्यायालयों में लाखों मामले कई-कई वर्षों से लांबित थे क्योंकि सारी कार्रवाई मैनुअल रजिस्टरों पर निर्भर थी और वादियों को बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते थे।

हिंदू शरणार्थियों की दयनीय स्थिति

1947 के बँटवारे से लेकर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम तक और उसके बाद भी अलग-अलग समय में पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) से धार्मिक उत्पीड़न, दंगों और अस्थिरता के कारण भागे हजारों हिंदू परिवार उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में बस गए थे।

पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बिजनौर और रामपुर जैसे जिलों में 1960 से 1975 के बीच बसे लगभग 10,000 परिवार दशकों से बिना किसी कानूनी भूमि-अधिकार के अस्थायी बस्तियों में रह रहे थे। मेरठ जिले में बंगाली हिंदू परिवार झील के लिए आरक्षित भूमि पर अस्थायी बस्ती में दशकों से रह रहे थे। इन परिवारों के पास न तो अपना घर बनाने का अधिकार था, न जमीन खरीदने की कानूनी स्थिति।

भूलेख पोर्टल और भूमि रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण

पहले जमीन से जुड़े कामों के लिए लोगों को लेखपाल पर काफी निर्भर रहना पड़ता था। पीढ़ियों तक लेखपाल ही जमीन के कागजात और रजिस्टरों का मुख्य जिम्मेदार माना जाता था। लेकिन 2025-26 आते-आते यह व्यवस्था डिजिटल हो गई। अब राज्य सरकार के आधिकारिक पोर्टल upbhulekh.gov.in पर कोई भी व्यक्ति घर बैठे अपनी जमीन का खसरा, खतौनी और भू-नक्शा आसानी से देख सकता है। इस बदलाव से करोड़ों किसानों और जमीन मालिकों को बार-बार लेखपाल के चक्कर लगाने और मनमानी का सामना करने से काफी राहत मिली है।

डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम (DILRMP) के तहत 2024 तक देश के लगभग 98.5% ग्रामीण भूमि रिकॉर्ड डिजिटल किए जा चुके हैं। उत्तर प्रदेश के भूलेख पोर्टल पर अब ग्रामीण जमीन पर लिए गए बैंक लोन की जानकारी भी उपलब्ध है।

इसके साथ ही दो बड़े बदलाव और किए गए हैं- जमीन के रिकॉर्ड को सहमति के आधार पर आधार नंबर से जोड़ना और राजस्व न्यायालयों को कम्प्यूटरीकृत करके उन्हें भूमि रिकॉर्ड सिस्टम से जोड़ना। इन कदमों से फर्जी नामांतरण और एक ही जमीन पर दोहरे मालिकाना हक जैसे विवादों की संभावना लगभग खत्म हो गई है।

PM SVAMITVA: UP में 1 करोड़+ ‘घरौनी’

PM SVAMITVA योजना को ग्रामीण भारत में जमीन और संपत्ति से जुड़े सबसे बड़े बदलावों में से एक माना जाता है। इस योजना के तहत ड्रोन तकनीक की मदद से गाँवों के आबादी क्षेत्र का सर्वे किया जाता है और हर घर के लिए संपत्ति का आधिकारिक रिकॉर्ड यानी प्रॉपर्टी कार्ड या ‘घरौनी’ बनाई जाती है।

देशभर में अब तक 3.27 लाख से ज्यादा गाँवों का ड्रोन सर्वे पूरा हो चुका है। साथ ही 1.82 लाख से अधिक गाँवों के लिए 2.17 करोड़ संपत्ति कार्ड तैयार किए जा चुके हैं।

उत्तर प्रदेश में इस योजना को ‘घरौनी’ के नाम से जाना जाता है। पूरे देश में बनी करीब 2.23 करोड़ घरौनियों में से 1 करोड़ से ज्यादा सिर्फ उत्तर प्रदेश में हैं। इनमें से 78 लाख से अधिक कार्ड 56 हजार गाँवों में लोगों को बाँटे जा चुके हैं। 18 जनवरी 2025 को एक ही दिन में उत्तर प्रदेश के 29 हजार से ज्यादा गाँवों में 45.35 लाख घरौनियाँ वितरित की गई थीं।

इस कार्ड के जरिए ग्रामीण लोग अब अपनी संपत्ति के आधार पर बैंक से ऋण ले सकते हैं, जमीन से जुड़े विवाद कम होते हैं और गाँवों में संपत्ति कर तय करने में भी आसानी होती है। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि जिन ग्रामीण परिवारों के पास पीढ़ियों से जमीन पर रहने के बावजूद कोई पक्का कागज नहीं था, उन्हें पहली बार कानूनी पहचान और संपत्ति का आधिकारिक अधिकार मिल रहा है।

भू-माफिया टास्क फोर्स का गठन- 65000 एकड़ भूमि मुक्त

2017 में सत्ता में आते ही योगी सरकार ने एंटी भू माफिया टास्क फोर्स का गठन किया। CM योगी आदित्यनाथ खुद यह कह चुके हैं कि जब उन्होंने 2017 में सत्ता संभाली तो उत्तर प्रदेश में कोई लैंड बैंक उपलब्ध नहीं था क्योंकि बड़े भूखंड माफियाओं द्वारा अतिक्रमित थे। टास्क फोर्स ने अवैध अतिक्रमणकारियों की पहचान की और सार्वजनिक भूमि वापस ली।

CM योगी ने कुछ दिनों पहले एक कार्यक्रम के दौरान बताया था कि एंटी-लैंड माफिया टास्क फोर्स ने राजस्व विभाग की करीब 65,000 एकड़ भूमि अब तक मुक्त कराई है। इस जमीन का इस्तेमाल गरीबों के लिए आवास, बुनियादी ढाँचे और उद्योग के लिए आवंटित किया जा रहा है। मुक्त कराई गई भूमि पर खेल मैदान, युवा कल्याण और MGNREGA कार्यों को प्राथमिकता दी गई।

भूमि माफिया अभियान केवल राजस्व भूमि तक सीमित नहीं रहा। योगी सरकार के सत्ता में आते ही 2017-18 में ही 19 जिलों में 1,870.664 हेक्टेयर वन भूमि अतिक्रमण से मुक्त कराई गई, जिसका उपयोग वार्षिक वृक्षारोपण अभियान में किया गया। वन विभाग ने जिला स्तरीय भू-माफिया सेल के साथ समन्वय करते हुए यह कार्यवाही की।

संपत्ति पंजीकरण में सुधार: फर्जी रजिस्ट्री अब लगभग असंभव, लोगों को शुल्क में भी राहत

2026 तक उत्तर प्रदेश में संपत्ति रजिस्ट्री की व्यवस्था काफी डिजिटल और पारदर्शी हो गई है। अब IGRSUP पोर्टल पर स्टांप ड्यूटी भुगतान, संपत्ति खोज, रजिस्ट्री अपॉइंटमेंट और जरूरी दस्तावेज एक ही जगह मिल जाते हैं। 1 फरवरी 2026 से संपत्ति पंजीकरण में आधार आधारित पहचान और बायोमेट्रिक सत्यापन (फिंगरप्रिंट/आईरिस) अनिवार्य कर दिया गया है।

सरकार पंजीकरण में मदद के लिए ‘निबंधन मित्र’ नियुक्त करने और कई नए उप-पंजीयक कार्यालय खोलने की तैयारी कर रही है ताकि लोगों को आसानी हो। योगी सरकार ने रिश्तेदारों के बीच संपत्ति हस्तांतरण पर स्टांप ड्यूटी घटाकर सिर्फ ₹5,000 कर दी जिससे लाखों परिवारों को राहत मिली।

जुलाई 2025 में महिलाओं को 1 करोड़ रुपए तक की संपत्ति खरीदने पर 1% स्टांप ड्यूटी छूट देने का फैसला भी लिया गया। पहले यह छूट सिर्फ ₹10 लाख तक की संपत्ति पर (अधिकतम ₹10,000) थी। साथ ही सरकार ने बिना पंजीकृत संपत्तियों और बकाया स्टांप ड्यूटी की वसूली के लिए अभियान चलाया जिसमें करोड़ों रुपये की वसूली का लक्ष्य रखा गया।

1960 से 1975 के बीच पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में धार्मिक हिंसा और उत्पीड़न के कारण कई हिंदू परिवार अपना घर छोड़कर भारत आए और उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बिजनौर और रामपुर जैसे जिलों में बस गए। इसके अलावा अलग-अलग समय पर पाकिस्तान से आए सिंधी और पंजाबी हिंदू, बांग्लादेश से आए हिंदू परिवार और हाल के वर्षों में तालिबान शासन के बाद अफगानिस्तान से आए हिंदू-सिख परिवार भी उत्तर प्रदेश में शरण लेकर बसे।

इनमें खासकर बंगाली हिंदू परिवार 1970 के आसपास पूर्वी पाकिस्तान से आए थे और मेरठ-हस्तिनापुर इलाके में वर्षों तक रह रहे थे लेकिन उनके पास स्थायी जमीन या कानूनी अधिकार नहीं थे।

साल 2021 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार ने इन बंगाली हिंदू परिवारों के पुनर्वास की दिशा में बड़ा फैसला लिया। 63 हिंदू बंगाली परिवारों के लिए कानपुर देहात के रसूलाबाद तहसील के ग्राम भँसाया में 121.41 हेक्टेयर जमीन पुनर्वास विभाग को दी गई ताकि इन परिवारों को बसाया जा सके। सरकार ने मुख्यमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत हर परिवार को मकान बनाने के लिए ₹1.20 लाख की मदद दी। साथ ही मनरेगा के तहत बस्ती के आसपास जमीन सुधार और सिंचाई जैसी सुविधाएँ देने की भी योजना बनाई गई।

इसके बाद जनवरी 2026 में उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने मेरठ जिले में दशकों से रह रहे 99 बंगाली हिंदू परिवारों के लिए एक और बड़ा पुनर्वास पैकेज मंजूर किया। ये परिवार मवाना तहसील के नंगला गुसाई गाँव में झील के लिए आरक्षित जमीन पर अस्थायी बस्ती बनाकर रह रहे थे। सरकार ने फैसला लिया कि इन्हें कानपुर देहात के रसूलाबाद क्षेत्र में स्थायी रूप से बसाया जाएगा ताकि उन्हें सुरक्षित और स्थायी जीवन मिल सके।

जुलाई 2025 में मुख्यमंत्री योगी ने एक उच्च स्तरीय बैठक में अधिकारियों को निर्देश दिया कि हिंदू शरणार्थियों को जमीन का मालिकाना हक दिया जाए। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ पुनर्वास नहीं बल्कि सामाजिक न्याय, मानवता और राष्ट्रीय जिम्मेदारी का मामला है। इसके तहत पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बिजनौर और रामपुर में 1960-1975 के बीच बसे करीब 10 हजार परिवारों के जमीन संबंधी मामलों की जाँच के निर्देश दिए गए।

जिन परिवारों को पहले खेती या रहने की जमीन मिली थी, उनके अधिकारों को कानूनी रूप से मजबूत करने और जहाँ जमीन उपलब्ध नहीं है वहाँ दूसरी जमीन देने की बात कही गई। इस अभियान में 2,500 से ज्यादा बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थी परिवारों को कानूनी भूमि स्वामित्व देने की प्रक्रिया शामिल है।

अप्रैल 2026 में सीएम योगी ने पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से विस्थापित कुल 331 हिंदू परिवारों को लखीमपुर खीरी जिले में पुनर्वासित किया था। इन 331 परिवारों का बँटवारा करने के लिए तहसील धौरहरा के गाँव सुतकुईया में 97 परिवार बसाए गए। तहसील गोला के ग्राम संख्या-3 में 37 परिवारों को जगह मिली। इसके अलावा तहसील मोहम्मदी के गाँव मोहनगंज (कॉलोनी) में 41 परिवारों की बसाहट की गई।

पीलीभीत जिले में लगभग 2,196 परिवार पूर्वी पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों के रूप में दर्ज हैं, जो 25 गाँवों में बसे हुए हैं। इन्हें 1960 के दशक में आवास और खेती के लिए जमीन दी गई थी, पर कानूनी मालिकाना हक नहीं मिला। रिकॉर्ड में कहीं जमीन वन विभाग के अधीन दर्ज हो गई, कहीं म्यूटेशन (नामांतरण) नहीं हुआ।

पीलीभीत के जिलाधिकारी ने बताया कि 2,196 में से 1,466 परिवारों की सत्यापन रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी जा चुकी है और अंतिम दिशानिर्देश मिलते ही उन्हें कागज देने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। यह प्रक्रिया केवल पीलीभीत तक सीमित नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के उन सभी जिलों में लागू की जा रही है, जहाँ ऐसे शरणार्थी बसाए गए थे।

हिंदुओं को जमीन देने और उनके लिए पुनर्वास की व्यवस्था करने का सिलसिला लगातार जारी है। बीते 2 जून 2026 को ही सीएम योगी ने पाकिस्तान से विस्थापित 1645 परिवारों और पूर्व सैनिकों और लीजधारकों को भूमिधरी अधिकार पत्र वितरित किए।

चुनौतियाँ और भविष्य की राह

हालाँकि, इन सुधारों के बीच कुछ चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं। सबसे बड़ी समस्या डिजिटल व्यवस्था को लेकर है। ग्रामीण इलाकों के बुजुर्गों और कम पढ़े-लिखे या निरक्षर भूमि-मालिकों के लिए ऑनलाइन प्रणाली का इस्तेमाल करना आसान नहीं है। सरकार की ‘निबंधन मित्र’ योजना इसी परेशानी को कम करने के लिए लाई जा रही है, जिसमें प्रशिक्षित लोग दस्तावेज और पंजीकरण प्रक्रिया में मदद करेंगे लेकिन यह व्यवस्था अभी पूरी तरह लागू नहीं हुई है।

इसी तरह जमीन से जुड़े मामलों में डिजिटल पोर्टल आने के बावजूद लेखपाल की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। कई जगहों पर लोगों को अब भी जमीन से जुड़े कामों के लिए लेखपाल पर निर्भर रहना पड़ता है जिससे भ्रष्टाचार और मनमानी की शिकायतों की संभावना बनी रहती है।

दूसरी ओर, शरणार्थियों के पुनर्वास को लेकर भी कुछ परिवारों ने अपनी चिंता जताई। उनका कहना था कि उन्हें मेरठ जिले के भीतर ही बसाया जाए क्योंकि कानपुर देहात जैसे दूसरे जिलों में जाने से रोजगार, पुराने सामाजिक संबंध और रोजमर्रा के जीवन पर असर पड़ सकता है। इस दिशा में भी सरकार काम कर रही है।

इंडिया टुडे की जिस खबर को पढ़ लहालोट हो रही थी मोहम्मद जुबैर एंड वामपंथी गैंग, वो निकली फर्जी: UP में 5 दिन में नहीं हुई 8056 मौतें, जानिए क्या है सच्चाई

उत्तर प्रदेश में भीषण गर्मी को लेकर इंडिया टुडे ने फर्जी खबर चलाई है। खबर में दावा किया गया कि लू (हीटवेव) चलने के कारण राज्य में 5 दिन में 8,056 लोगों की मौत हो गई। इंडिया टुडे ने यह दावा केवल ‘फ्रंटियर्स इन एनवायरमेंटल हेल्थ’ के एक अध्ययन के आधार पर किया है। इस रिपोर्ट में लिए गए ‘आँकड़ों’ का कोई स्रोत नहीं है।

इंडिया टुडे ने यह रिपोर्ट ‘5 दिनों में 8056 मौतें: हीटवेव के दौरान उत्तर प्रदेश सबसे घातक राज्य बनकर उभरा है’ (8056 deaths in 5 days: UP emerges as India’s deadliest state during heatwaves) हेडलाइन के साथ प्रकाशित की थी। हालाँकि, अब इस रिपोर्ट को डिलीट कर दिया गया है।

(स्क्रीनशॉट साभार: X-IndiaToday)

इस हेडलाइन में साफ तौर पर उत्तर प्रदेश में 5 दिन में 8,056 मौत का आँकड़ा दिया जा रहा है। यह रिपोर्ट अध्ययन पर टिकी हुई है। अध्ययन का सोर्स विश्वसनीय है, लेकिन अध्ययन में भी सटीक आँकड़ा नहीं दिया गया है। क्योंकि हकीकत कुछ और है। इस रिपोर्ट से केवल लोगों के बीच भ्रम फैलाने का काम किया जा रहा है।

इंडिया टुडे ने किस आधार पर गढ़ी फर्जी खबर?

यह बात सही है कि इंडिया टुडे ने अपनी इस रिपोर्ट को विश्वसनीय सोर्स के हवाले से प्रकाशित किया है। इसका सोर्स ‘फ्रंटियर्स’ है, जिसने पर्यावरण स्वास्थ्य पर अध्ययन के आधार पर भारत के 10 शहरों में लू के चलते ‘अनुमानित’ मौतों के बारे में बताया है, जो कि हेडलाइन से भी साफ है-भारत के जिलों में लू के कारण होने वाली अतिरिक्त मौतों का अनुमान।

इस रिपोर्ट में बताया गया कि अध्ययन के अनुसार, ‘अनुमान’ लगाया गया कि एक दिन की भीषण गर्मी से राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 3,400 अतिरिक्त मौतें होती हैं, जबकि पाँच दिनों की लू से लगभग 30,000 मौतें होती हैं। इसमें उत्तर प्रदेश का ‘अनुमान’ लगाया गया कि राज्य में लू के दौरान पाँच दिनों में लगभग 8,100 अतिरिक्त मौते होती हैं। इसके अलावा अहमदाबाद, जयपुर और सूरत जैसे जिलों में इसे 250 से अधिक अतिरिक्त मौते बताई गईं।

(फोटो साभार: Frontiers)

यानी मौत की जो संख्या बताई जा रही है वह कहीं दर्ज नहीं है, यह केवल अनुमान है जो साल 2024 में भीषण गर्मी से हुई मौत के अध्ययन के आधार पर लिखे गए हैं। यहाँ सबसे अहम फर्क है कि वास्तव नें ‘मौत का आँकड़ा’ नहीं बताया जा रहा है बल्कि ‘अत्यधिक मृत्यु दर’ की बात हो रही है मतलब कि 5 दिन में कितनी अतिरिक्त मौत हो सकती हैं। यह अध्ययन रिपोर्ट में भी साफ लिया गया है।

रिपोर्ट में साफ लिखा गया है, “अत्यधिक मौतें और गर्मी से हुई मौतों के आधिकारिक आंकड़े अलग-अलग चीजें मापते हैं। अत्यधिक मौतें लू के दौरान सामान्य से ज्यादा हुईं सभी मौतों को गिनती हैं, चाहे मरने का कारण कुछ भी लिखा हो। वहीं गर्मी से हुई मौतों में सिर्फ वही मामले गिने जाते हैं जहाँ मौत दर्ज करते समय डॉक्टर ने साफ लिखा हो कि मौत गर्मी की वजह से हुई है। इसलिए ये दोनों आँकड़े सीधे तौर पर एक-दूसरे से तुलना करने लायक नहीं हैं।”

(फोटो साभार: Frontiers)

ऋचा चड्ढा से लेकर ‘फैक्टचेकर’ जुबैर ने भी फैलाई फर्जी खबर

इंडिया टुडे की इस फर्जी खबर को फैलाने में वाले ‘फैक्टचेकर’ जुबैर से लेकर भारतीय सेना को अपमानित करने वाली वामपंथी फिल्म एक्ट्रेस ऋचा चड्ढा का भी हाथ रहा। दोनों ने अपने ‘एक्स’ अकाउंट पर इंडिया टुडे की खबर को रीपोस्ट करते हुए उत्तर प्रदेश की सरकार पर सवाल उठाए।

(फोटो साभार: X-RichaChadha)

ऋचा चड्ढा ने लिखा, “क्या किसी ने इस बात पर चर्चा की कि सिर्फ एक राज्य में लू से 8000 से ज्यादा लोग मर गए हैं? ये न सामान्य है, न ही सही है। लोगों, जाग जाओ, वरना तुम्हारी जिंदगी भी बस एक आँकड़ा बनकर रह जाएगी।”

(फोटो साभार: X-zoo_bear)

इसके अलावा जुबैर ने इंडिया टुडे की हेडलाइन को लिखकर इसे रीपोस्ट किया था।

क्या है हकीकत?

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने भी इंडिया टुडे की रिपोर्ट का खंडन किया है। सरकार के आपदा प्रबंधन और राहत विभाग ने कहा कि पिछले 5 दिनों से उत्तर प्रदेश के किसी भी जिले में तापमान 42 डिग्री से ऊपर नहीं गया है।

उन्होंने यह भी बताया कि सिर्फ 5 जिलों में 28 मई 2026 को तापमान 45 डिग्री से ज्यादा रहा था और सबसे ज्यादा 47.5 डिग्री रिकॉर्ड हुआ था। रिपोर्ट को लेकर विभाग ने कहा कि यह गलत है और इसमें यह भी नहीं बताया गया कि डेटा कहाँ से लिया गया है।

‘फोर्स्ड लेबर’ के नाम पर भारत पर 12.5% टैरिफ का USTR प्रस्ताव: क्या सुप्रीम कोर्ट से झटका खाने के बाद ट्रंप खोज रहे नया रास्ता?

अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि (USTR) ने करीब 60 व्यापारिक साझेदार देशों पर नए टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने का प्रस्ताव रखा है। इन देशों पर ‘जबरन मजदूरी’ (Forced Labour) जैसे कारणों का हवाला देते हुए शुल्क लगाने की बात कही गई है। USTR ने 3 जून को 98 पन्नों की एक रिपोर्ट जारी की जिसमें भारत, चीन, जापान, पाकिस्तान, दक्षिण कोरिया, ब्राजील और स्विट्जरलैंड समेत कई देशों पर 10% से 12.5% तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव दिया गया है।

रिपोर्ट में कनाडा, मैक्सिको, ताइवान और यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन) पर 10% टैरिफ लगाने की भी सिफारिश की गई है। आरोप है कि इन देशों ने जबरन मजदूरी से जुड़े सामानों के आयात पर प्रतिबंध को सही तरीके से लागू नहीं किया।

“जबरन मजदूरी से बने सामानों के आयात पर प्रतिबंध लगाने और उसे प्रभावी तरीके से लागू करने में विभिन्न देशों की विफलता से जुड़ी नीतियाँ, कार्य और प्रथाएँ” (Acts, Policies, and Practices of Various Economies Related to the Failure to Impose and Effectively Enforce a Prohibition on the Importation of Goods Produced with Forced Labor) शीर्षक वाली रिपोर्ट में USTR ने अपनी जाँच के निष्कर्षों को विस्तार से बताया है। यह जाँच अमेरिका के 1974 के व्यापार कानून (Trade Act of 1974) की धारा 301 (b)(1) के तहत अमेरिका के व्यापारिक साझेदार देशों के खिलाफ शुरू की गई थी।

गौरतलब है कि ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 302(b)(1)(A) अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि को यह अधिकार देती है कि वह किसी विदेशी देश की नीतियों, कार्यों या प्रथाओं की जाँच शुरू कर सके और यह तय कर सके कि वे धारा 301 के तहत कार्रवाई योग्य हैं या नहीं।

धारा 301 के तहत वे नीतियाँ और प्रथाएँ कार्रवाई योग्य मानी जाती हैं जो अमेरिकी व्यापार के लिए ‘अनुचित’ या ‘भेदभावपूर्ण’ हों और अमेरिकी कारोबार पर बोझ डालती हों या उसे सीमित करती हों।

‘भारत: जाँच के निष्कर्ष’ (India: Findings of Investigation) शीर्षक वाले हिस्से में USTR ने दावा किया है कि भारत जबरन मजदूरी से बने सामानों के आयात पर प्रतिबंध को प्रभावी तरीके से लागू करने में विफल रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया, “खंड III.A.7 और III.B.7 में USTR ने पाया कि भारत जबरन मजदूरी से बने सामानों के आयात पर प्रभावी प्रतिबंध लगाने और उसे लागू करने में असफल रहा है। खंड IV में हमने पाया कि ऐसा न करना अनुचित (Unreasonable) है। वहीं, खंड V में यह पाया गया कि जबरन मजदूरी से जुड़े आयात पर प्रभावी रोक न लगाने से अमेरिकी व्यापार (U.S. Commerce) पर बोझ पड़ता है या उस पर प्रतिबंधात्मक असर होता है।”

रिपोर्ट आगे कहती है, “उपरोक्त कारणों के आधार पर जाँच के नतीजे यह संकेत देते हैं कि जबरन मजदूरी से जुड़े आयात प्रतिबंध को लागू न करने से संबंधित भारत की नीतियाँ और प्रथाएँ अनुचित हैं और अमेरिकी व्यापार पर बोझ डालती हैं या उसे सीमित करती हैं।”

प्रस्तावित टैरिफ के दायरे की बात करें तो अगर 10% से 12.5% तक के ये शुल्क मंजूर हो जाते हैं, तो ये अमेरिका में आने वाले लगभग सभी आयातित सामानों पर लागू हो सकते हैं। हालाँकि, करीब 70 उत्पादों को इससे छूट देने का प्रस्ताव रखा गया है। इनमें विमान, बीफ, कॉफी समेत कुछ अन्य सामान शामिल हैं।

इसके अलावा, USTR ने कपड़ा और परिधान (टेक्सटाइल और अपैरल) क्षेत्र के लिए सीमित मात्रा में राहत देने हेतु एक कोटा व्यवस्था (Quota Mechanism) का भी प्रस्ताव रखा है, ताकि तय सीमा तक आयात पर कुछ राहत मिल सके।

फोटो साभार : संबंधित रजिस्ट्री नोटिस

हालाँकि, USTR की इस रिपोर्ट को लेकर भारत में बहस और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि फिलहाल यह सिर्फ एक प्रस्ताव है जिसे मंजूरी मिलेगी या नहीं, यह अभी तय नहीं है।

इसके बावजूद विपक्ष के कई नेताओं और उनसे जुड़े मीडिया वर्ग ने भारत पर नए टैरिफ लगाने के USTR के प्रस्ताव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘विफलता’ के रूप में पेश करना शुरू कर दिया है। इस प्रस्ताव पर आम लोगों और संबंधित पक्षों की टिप्पणियाँ 6 जुलाई तक माँगी गई हैं जिसके बाद आगे का फैसला लिया जाएगा।

भारत के खिलाफ ट्रंप  की टैरिफ मुहिम, बिगड़ते रिश्ते और अमेरिकी अदालत का बड़ा झटका

अगस्त 2025 में ट्रंप प्रशासन ने भारतीय उत्पादों पर ‘रिसिप्रोकल टैरिफ’ लगाया था और बाद में उसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया था। रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत को ‘सजा’ देने के लिए यह अतिरिक्त टैरिफ लगाया गया था।

पहले भी रिपोर्ट्स में बताया गया था कि मई 2025 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष को खत्म कराने का श्रेय ट्रंप को देने से भारत के इनकार ने अमेरिकी राष्ट्रपति को नाराज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने भारत के खिलाफ टैरिफ और तीखे बयान देने शुरू कर दिए।

भारत और अमेरिका कभी भी बहुत घनिष्ठ मित्र नहीं रहे हैं। सच कहें तो अमेरिका किसी का स्थायी मित्र नहीं रहा। 1796 में अपने विदाई भाषण में राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन ने कहा था कि अमेरिका को दुनिया के किसी भी हिस्से के साथ स्थायी गठबंधन बनाने से बचना चाहिए।

अमेरिका ने कभी किसी देश के साथ स्थायी गठबंधन नहीं बनाया। हालाँकि, परिस्थितियों के अनुसार उसने विभिन्न देशों के साथ संबंध विकसित किए। 1971 के युद्ध के दौरान अमेरिका ने भारत के बजाय पाकिस्तान का समर्थन किया था।

भारत के सफल परमाणु परीक्षणों के बाद भी अमेरिका ने उस पर प्रतिबंध लगाए थे। लंबे समय तक अमेरिका भारत को कमजोर करने की कोशिश करता रहा। हालाँकि, पिछले दो दशकों में चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए अमेरिका ने भारत को अपने करीब लाने की कोशिश की।

यह प्रयास किसी प्रेम या पुराने व्यवहार पर पछतावे की वजह से नहीं था बल्कि चीन के मुकाबले एक लोकतांत्रिक शक्ति के रूप में भारत को साथ लाने की रणनीति थी।

फिर डोनाल्ड ट्रंप आए और उन्होंने भारत को अपने पाले में लाने के लिए अमेरिका द्वारा वर्षों से किए गए प्रयासों को नुकसान पहुँचाया। लगभग 3 वर्षों तक भारत ने रियायती रूसी तेल खरीदा, उसे रिफाइन किया और दुनिया के कई देशों तक पहुँचाकर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को बनाए रखने में मदद की जबकि रूस पर यूक्रेन युद्ध को लेकर प्रतिबंध लगे हुए थे।

उस समय अमेरिका भी भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने के खिलाफ नहीं था। यहाँ तक कि मई 2025 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष तक ट्रंप को भी इससे कोई बड़ी आपत्ति नहीं थी। लेकिन जब भारत ने ट्रंप की शांति दूत वाली छवि को स्वीकार नहीं किया तो अमेरिकी राष्ट्रपति ने पाकिस्तान के प्रति नरम और भारत के प्रति आक्रामक रुख अपनाना शुरू कर दिया।

ट्रंप का रवैया काफी विरोधाभासी रहा। एक तरफ वह प्रधानमंत्री मोदी को अपना अच्छा मित्र और पसंदीदा नेता बताते रहे तो वहीं दूसरी तरफ भारत को ‘डेड इकोनॉमी’  कहकर आलोचना करते रहे। उनके अधिकारी हॉवर्ड लुटनिक, पीटर नवारो और अन्य लोग लगातार भारत पर रूस के युद्ध प्रयासों को बढ़ावा देने का आरोप लगाते रहे।

इसी दौरान भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत भी जारी रही। लेकिन जब मोदी सरकार ने भारत के डेयरी क्षेत्र को अमेरिकी उत्पादों के लिए खोलने से इनकार कर दिया तो ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों की भारत-विरोधी बयानबाजी और तेज हो गई।

इस वर्ष फरवरी में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद होने से ऊर्जा संकट पैदा हो गया। तब ट्रंप प्रशासन ने भारत को रूसी तेल खरीदने की कथित ‘अनुमति’ दी ताकि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बनी रहे और कीमतें नियंत्रण में रहें।

जबकि पहले भारत के इसी कदम की आलोचना की जाती थी। लेकिन जब दुनिया को ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखने की जरूरत पड़ी और अमेरिका खुद वैश्विक आलोचना से बचना चाहता था, तब उसने भारत की ओर रुख किया।

हालाँकि, भारत ने साफ कर दिया कि वह अमेरिकी अनुमति हो या न हो, अपनी जरूरत के अनुसार रूसी तेल खरीदता रहेगा। इसके बावजूद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने हाल ही में कहा कि अमेरिका चाहता है कि भारत जैसे देशों को रूसी तेल खरीदने की जो छूट मिली है, उसे जल्द से जल्द समाप्त किया जाए।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि ट्रंप एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी और भारत की तारीफ करते रहे और दूसरी तरफ भारत को लेकर नस्लीय टिप्पणियों को भी बढ़ावा देते रहे। हाल ही में उन्होंने एक अमेरिकी पॉडकास्टर द्वारा भारत के लिए इस्तेमाल किए गए ‘Hellhole’ (नरक) शब्द को भी अपने सोशल मीडिया पर शेयर किया था।

पिछले महीने दो दिन की भारत यात्रा पर आए मार्को रुबियो का काफी ठंडा स्वागत किया गया। भारतीय मीडिया ने उनसे भारत के खिलाफ बढ़ते नस्लवाद, रूसी तेल और पाकिस्तान के प्रति अमेरिका के बदले रुख को लेकर कई सवाल पूछे।

महीनों तक भारत पर रूसी तेल खरीदने को लेकर निशाना साधने के बाद रुबियो ने कहा कि यह मुद्दा कभी विशेष रूप से भारत के बारे में नहीं था। हालाँकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि यदि ऐसा था तो फिर चीन, जो रूसी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, उसके बजाय भारत को बार-बार क्यों निशाना बनाया गया।

भारत पर सबसे ज्यादा दंडात्मक टैरिफ क्यों लगाए गए? क्या इसकी वजह यह है कि अमेरिका चीन के खिलाफ उतना कठोर कदम नहीं उठा सकता क्योंकि चीन के पास दुर्लभ खनिज तत्वों (Rare Earth Elements) पर मजबूत पकड़ है, जो सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए बेहद जरूरी हैं?

दुनिया ने देखा कि ट्रंप की हालिया चीन यात्रा कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं कर सकी। चीन ने ताइवान मुद्दे पर अमेरिका को सीधे संघर्ष की चेतावनी तक दे दी थी। पूरे घटनाक्रम में अमेरिका का दोहरा रवैया और कमजोरी साफ दिखाई देती है।

जैसे-जैसे भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की बातचीत आगे बढ़ी, अमेरिका ने अधिकांश भारतीय उत्पादों पर प्रभावी टैरिफ दर घटाकर 18 प्रतिशत कर दी और रूसी तेल से जुड़े 25 प्रतिशत अतिरिक्त दंडात्मक टैरिफ को भी हटा दिया।

अमेरिका ने दावा किया कि भारत अमेरिकी ऊर्जा की खरीद बढ़ाने और रूस पर निर्भरता कम करने के लिए सहमत हो गया है। हालाँकि, भारत लगातार कहता रहा है कि वह अपनी जरूरतों के अनुसार रूसी तेल खरीदना जारी रखेगा और व्यवहार में उसने ऐसा किया भी है।

नई दिल्ली में रुबियो के साथ संयुक्त प्रेस वार्ता के दौरान विदेश मंत्री एस जयशंकर ने साफ कहा था कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न स्रोतों से आपूर्ति सुनिश्चित करता रहेगा। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि ट्रंप प्रशासन ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति पर चलता है, तो भारत की विदेश नीति ‘इंडिया फर्स्ट’ है।

स्पष्ट रूप से अमेरिका इस बात से खुश नहीं दिखता कि भारत किसी दूसरे दर्जे के आश्रित देश की तरह व्यवहार करने के बजाय अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखे हुए है। कई विश्लेषकों का मानना है कि 70 उत्पादों को छूट देने वाला यह नया टैरिफ प्रस्ताव भारत के साथ चल रही व्यापार वार्ताओं के दौरान दबाव बनाने का एक तरीका हो सकता है।

फरवरी 2026 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के टैरिफ को अवैध बताते हुए रद्द कर दिया था। अदालत के इस फैसले ने दूसरे देशों पर दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ट्रंप के सबसे बड़े हथियार को कमजोर कर दिया।

इसके बाद से ट्रंप प्रशासन नए रास्ते तलाश रहा था और अब जबरन मजदूरी के मुद्दे को आधार बनाकर टैरिफ लगाने की कोशिश करता दिखाई दे रहा है। मंजूरी मिले या न मिले, भारत के खिलाफ यह प्रस्ताव दोनों देशों के बीच बढ़ते अविश्वास को और गहरा ही करेगा।

भारत समेत दो दर्जन से ज्यादा देशों पर ‘जबरन मजदूरी’ के नाम पर टैरिफ लगाने का यह प्रस्ताव दिखाता है कि अमेरिका अभी भी इस सोच से पूरी तरह बाहर नहीं निकला है कि वह दुनिया का ठेकेदार है और बाकी देशों को अनुशासित करने का अधिकार उसी के पास है।

भारत की प्रतिक्रिया: प्रस्ताव अंतिम नहीं, बातचीत जारी

भारत ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि रिपोर्ट को लेकर राजनीतिक चर्चा भले हो रही हो लेकिन प्रस्तावित टैरिफ अभी अंतिम नहीं हैं। मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने एक बयान में कहा, “रिपोर्ट के अनुसार प्रस्तावित टैरिफ अभी अंतिम नहीं हैं और इच्छुक पक्ष 22 जून 2026 तक सार्वजनिक सुनवाई में भाग लेने के लिए आवेदन कर सकते हैं। लिखित टिप्पणियाँ 6 जुलाई 2026 तक जमा की जा सकती हैं। सार्वजनिक सुनवाई 7 जुलाई 2026 को आयोजित होगी। प्राप्त टिप्पणियों और गवाही पर विचार करने के बाद ही USTR अंतिम फैसला करेगा।”

भारत ने सेक्शन 301 की प्रक्रिया के तहत अमेरिका के साथ औपचारिक रूप से बातचीत शुरू कर दी है और उम्मीद है कि वह बातचीत के दौरान अपना पक्ष रखेगा। इसी के साथ नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच व्यापक व्यापार समझौते को लेकर बातचीत भी जारी है, जिसकी घोषणा 2 फरवरी 2026 को की गई थी और जिसकी पुष्टि 7 फरवरी 2026 के संयुक्त बयान में भी की गई थी।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

टिंडर से दोस्ती, ₹50 लाख की फिरौती और हथौड़े से कत्ल: DU के छात्र आयुष नौटियाल की हत्या केस में इश्तियाक अली दोषी, पढ़ें- 2018 के केस की पूरी डिटेल्स

यह मामला मार्च 2018 में 21 वर्षीय बीकॉम छात्र आयुष नौटियाल के अपहरण और हत्या से जुड़ा है। आयुष का लगभग डिकंपोज हो चुका शव दिल्ली के द्वारका सेक्टर-13 स्थित एक नाले में मिला था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया कि आयुष की हत्या किसी हथौड़े जैसी वस्तु से की गई थी। आरोपित और पीड़ित एक-दूसरे को जानते थे। दोनों को आयुष के लापता होने से एक दिन पहले घटना स्थल के पास स्थित एक मैकडॉनल्ड्स आउटलेट में साथ घूमते हुए भी देखा गया था।

अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूतों, तथ्यों और दलीलों की जाँच के बाद अदालत ने कहा कि अभियोजन ने इश्तियाक अली के खिलाफ लगाए गए तीनों आरोप साबित कर दिए हैं। अदालत ने माना कि अली ने आयुष का अपहरण किया था और उसके पिता से 50 लाख रुपए की फिरौती माँगी थी। इतना ही नहीं, आयुष की हत्या करने के बाद भी आरोपित उसके पिता को यह विश्वास दिलाता रहा कि उनका बेटा जिंदा है और फिरौती की रकम मिलने पर उसे छोड़ दिया जाएगा।

अदालत ने अपने फैसले में कहा, “घटनास्थल से लिए गए खून के नमूनों में मृतक का DNA मिला है। मृतक के लैपटॉप के जले हुए अवशेष आरोपित की निशानदेही पर बरामद किए गए। आरोपित के कपड़े भी उसकी निशानदेही पर बरामद हुए, जिनमें मृतक के DNA से मेल खाने वाला DNA पाया गया। यह तथ्य आरोपित के खिलाफ IPC की धारा 302 के तहत हत्या के आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त है।”

अदालत ने आगे कहा, “मृतक की ऑल्टो कार (नंबर DL-2CAL-2553) से लिए गए खून के नमूनों में भी मृतक का DNA पाया गया। इसी कार का इस्तेमाल शव को ठिकाने लगाने के लिए किया गया था और यह भी आरोपित की निशानदेही पर बरामद की गई।”

ऑपइंडिया के पास मौजूद कोर्ट के 30 मई 2026 के फैसले के मुताबिक, “अभियोजन पक्ष ने साबित कर दिया है कि आरोपित ने वही अपराध किए हैं, जिनके लिए उस पर आरोप तय किए गए थे, यानी IPC की धारा 364A, 302 और 201।”

बचाव पक्ष ने अभियोजन के मामले का विरोध करते हुए पुलिस जाँच में खामियों का आरोप लगाया। हालाँकि, अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि अभियोजन द्वारा पेश किए गए सबूत आरोपी के दोष को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं।

अदालत ने कहा, “जाँच अधिकारियों के बेहतरीन प्रयासों के बाद कभी-कभी जाँच में कुछ छोटी-मोटी खामियाँ रह सकती हैं। लेकिन केवल जाँच में कुछ कमियों के आधार पर किसी आरोपित को कानून से बचने नहीं दिया जा सकता। यह स्थापित कानून है कि हर त्रुटिपूर्ण जाँच या सबूतों में कमी अपने आप में अभियोजन के पूरे मामले को खत्म नहीं कर देती यदि बाकी सबूत इन मजबूत हों। यदि जाँच में मामूली कमियाँ हों तब भी आरोपित को बरी करने का आधार नहीं बन सकतीं, जब उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत मौजूद हों।”

क्या है पूरा मामला

दिल्ली विश्वविद्यालय के राम लाल आनंद कॉलेज में पढ़ने वाला आयुष नौटियाल 22 मार्च 2018 को अपने घर से निकला था लेकिन फिर कभी वापस नहीं लौटा। उसने अपने परिवार को बताया था कि वह कॉलेज के एक फेस्ट में शामिल होने जा रहा है और देर से घर लौटेगा। घर से निकलते समय वह अपने साथ एक बैग लेकर गया था जिसमें उसका लैपटॉप था।

शाम करीब 7:45 बजे आयुष नौटियाल के पिता दिनेश चंद्र को उनके बेटे के फोन से एक SMS मिला जिसमें उन्हें वॉट्सऐप चेक करने के लिए कहा गया था। जब उन्होंने वॉट्सऐप खोला तो उन्होंने एक तस्वीर देखी जिसमें उनके बेटे आयुष की आँखों पर पट्टी बँधी हुई थी और उसके हाथ-पैर बँधे हुए थे। तस्वीर के साथ 50 लाख रुपए की फिरौती माँगी गई थी और चेतावनी दी गई थी कि इस बारे में किसी रिश्तेदार या पुलिस को कुछ न बताया जाए।

संदेश मिलने के बाद पीड़ित के पिता ने तुरंत पुलिस को सूचना दी और शिकायत दर्ज कराई। उनकी शिकायत के आधार पर पालम विलेज थाने में FIR दर्ज की गई। पुलिस तुरंत हरकत में आई और पीड़ित के मोबाइल फोन को सर्विलांस पर लगाया गया। साथ ही उसके फोन नंबर की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) भी निकलवाई गई।

जब पुलिस पीड़ित की लोकेशन का पता लगाने की कोशिश कर रही थी उसी दौरान 24 मार्च 2018 को उसके पिता को एक और संदेश मिला जिसमें पूछा गया कि क्या उन्होंने फिरौती की रकम का इंतजाम कर लिया है। इस पर पिता ने जवाब दिया कि वह केवल 10 लाख रुपए का इंतजाम कर सकते हैं। इसके बाद सामने वाले व्यक्ति ने 50 लाख रुपए की माँग दोहराई और 26 मार्च 2018 तक की समयसीमा दी। हालाँकि, 24 मार्च 2018 को बातचीत के दौरान पिता ने फिरौती की रकम घटाकर 12 लाख रुपए तक तय करवा ली।

इसके बाद पीड़ित के पिता आरोपित द्वारा तय की गई जगह पर फिरौती की रकम पहुँचाने के लिए गए। शुरुआत में आरोपी ने उन्हें उत्तम नगर स्थित नजफगढ़ नाले के पास पैसे छोड़ने को कहा था। बाद में उसने जगह बदलते हुए दिल्ली के वसंत विहार स्थित मुनिरका में अनुपम रेस्टोरेंट के पास एक कूड़ेदान में रकम रखने को कहा। पुलिस ने दोनों जगहों पर छापेमारी टीम तैनात कर दी लेकिन किसी भी जगह पर पैसे लेने कोई नहीं आया।

28 मार्च 2018 को द्वारका सेक्टर-13 स्थित मेट्रो व्यू अपार्टमेंट्स के पीछे एक नाले पॉलीथिन में लिपटा एक युवक का अत्यधिक सड़ा-गला शव बरामद हुआ। पीड़ित के पिता ने शव की पहचान अपने बेटे आयुष नौटियाल के रूप में की। शव के पास पड़े चश्मे को भी उन्होंने अपने बेटे का बताया।

आसपास के इलाकों के CCTV फुटेज की जाँच में पता चला कि पीड़ित को द्वारका सेक्टर-14 स्थित एक मैकडॉनल्ड्स आउटलेट में एक दाढ़ी वाले व्यक्ति के साथ देखा गया था। पुलिस इसके बाद पीड़ित के जीमेल और फेसबुक अकाउंट्स तक पहुँची और तस्वीरों का विश्लेषण किया। जाँच के बाद पुलिस ने पाया कि मैकडॉनल्ड्स में आयुष के साथ दिख रहा दाढ़ी वाला व्यक्ति दिल्ली के उत्तम नगर निवासी इश्तियाक अली था।

पुलिस पूछताछ के दौरान इश्तियाक अली ने आयुष नौटियाल की हत्या करने और उसका लैपटॉप जलाने की बात कबूल की। उसने बताया कि उसकी मुलाकात आयुष से टिंडर ऐप के जरिए हुई थी। पुलिस ने अली की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल किया गया हथौड़ा समेत कई अहम सबूत बरामद किए। पुलिस को अली के घर के बाहर खड़ी उसकी ऑल्टो कार भी मिली जिसका इस्तेमाल उसने आयुष के शव को ठिकाने लगाने में किया था। आयुष के अपहरण और हत्या के मामले में अली पर मुकदमा चलाया गया और अदालत ने उसे दोषी करार दिया।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

रामशरण रस्तोगी को दुकान से उठाया, तराजू-बाट बाँध कुएँ में फेंक दिया शव: 48 साल बाद पीड़ित परिवार को संभल में बसाएगी UP सरकार, ‘मस्जिद में पूजा’ की अफवाह फैला हुआ था हिंदुओं का नरसंहार

उत्तर प्रदेश के संभल में हिंदुओं को मिटाने का दौर अब खत्म होने जा रहा है। राज्य की योगी सरकार इन हिंदुओं को दोबारा ‘अपने घर’ बसाने की तैयारी कर रही है। इसी कड़ी में योगी सरकार 1978 के सांप्रदायिक दंगों में मारे गए रामशरण दास रस्तोगी के परिवार को जमीन देने जा रही है। प्रशासन ने आलम सराय में तीन बीघा सरकारी जमीन पर बने कब्रिस्तान पर बुलडोजर चलाकर कब्जामुक्त कराई गई थी, अब उसमें से 100 गज जमीन को पीड़ित परिवार को लीज (पट्टे) पर दिया जा रहा है।

03 जून 2026 को संभल के डीएम अंकित खंडेलवाल और एसपी कृष्ण कुमार विश्नोई की मौजूदगी में आलम सराय गाँव की इस 100 गज जमीन का पट्टा पीड़ित परिवार को सौंपेंगे। जहाँ पीड़ित परिवार दोबारा अपना घर बसा सकेगा। इसके लिए पीड़ित रस्तोगी परिवार ने योगी सरकार और प्रशासन से गुहार लगाई थी।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी पिछले दिनों मथुरा के एक कार्यक्रम में 1978 के संभल दंगों में सैंकड़ों हिंदुओं की हत्या का जिक्र करते हुए पीड़ित रस्तोगी परिवार से मिलने की बात कही थी। सीएम ने बताया था कि रस्तोगी परिवार ने उनसे मिलकर अपनी संपत्ति लूटे जाने का दर्द सुनाया था। तब सीएम ने परिवार को जमीन वापस देने का आश्वासन दिया था।

कैसे प्रशासन और सरकार ने मिलकर रस्तोगी परिवार को लौटाई जमीन

पिछले साल रामशरण रस्तोगी के पौत्र कपिल रस्तोगी ने अपनी बुजुर्ग माँ के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर न्याय और पुनर्वास की माँग की थी। संज्ञान लेते हुए पीड़ित परिवार को वापस लौटाने के लिए प्रशासन और सरकार ने मिलकर काम किया।

योगी सरकार ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संभल प्रशासन से मामले की जाँच कराई। जाँच में पता लगा कि रस्तोगी परिवार मूलरूप से संभल का निवासी था और दंगों में परिवार के मुखिया रामशरण रस्तोगी की हत्या के बाद पलायन को मजबूर हुआ था। फिर स्थानीय तहसीलदार धीरेंद्र कुमार सिंह ने पैमाइश पर पीड़ित परिवार के लिए जमीन तैयार की।

संभल के कोतवाली कस्बा क्षेत्र के आलम सराय देहात में स्थित तीन बीघा सरकारी जमीन का 100 गज पीड़ित परिवार को देने का फैसला किया गया। इस सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर कब्रिस्तान बना लिया गया था, जो ‘टीले वाली मस्जिद’ के नाम से जाना जाता था। लेकिन प्रशासन ने उस सरकारी जमीन को कब्जा मुक्त करवाया और जमीन पर बने कब्रिस्तान को बुलडोजर से ध्वस्त किया। अब इसमें से 100 गज जमीन पीड़ित रस्तोगी परिवार को सौंपी जा रहा है।

1978 में रामशरण रस्तोगी को दी थी दर्दनाक मौत

आज जिन रस्तोगी परिवार को जमीन दी जा रही है, उसका जख्म काफी गहरा है। योगी सरकार अब उन्हें जमीन देकर उनके जख्म पर मरहम लगाने का काम कर रही है। परिवार के मुखिया रामशरण रस्तोगी को 29 मार्च 1978 में भड़के सांप्रदायिक दंगों में बेरहमी से मार डाला था। रामशरण रस्तोगी की संभल कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला ठेर में परचूने की दुकान थी। यह दुकान पुलिस चौकी से महज 50 मीटर ही दूर थी। दंगाइयों ने उन्हें दुकान से उठा लिया और टुकड़े-टुकड़े कर दिए।

इतना ही नहीं दंगाइयों ने रामशरण के शव को दुकान कुआं मोहल्ला महमूद खान सराय कुएँ में तराजू-बाट से बाँधकर फेंक दिया था। रामशरण की दुकान भी दंगाइयों ने लूट ली थी और उसे आग के हवाले कर दिया था। बाद में जब तीन दिन बाद रामशरण का शव मिला, तो उस पर चाकू और कुल्हाड़ी के गहरे घाव थे। 

तब रामशरण रस्तोगी के बेटे स्वर्गीय सुभाष चंद्र रस्तोगी ने हत्या और सबूत मिटाने की धाराओं में अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR भी दर्ज कराई थी। लेकिन परिवार का कहना है कि मामले में जाँच आगे नहीं बढ़ी और न्याय की उम्मीद अधूरी रह गई। इस खौफनाक मंजर से डरकर पूरा परिवार संभल से विस्थापित होकर दिल्ली में बस गया।

इसी दंगे में मारे गए तुलसीराम को भी योगी सरकार ने दी जमीन

इससे पहले योगी सरकार इसी 1978 के संभल दंगों में अपनी जमीन से बेदखल हुए तुलसीराम के परिवार को भी जमीन वापस दिला चुकी है। पीड़ित परिवार को 46 साल बाद न्याय मिला। जब संभल प्रशासन ने 14 जनवरी 2025 को तुलसीराम के परिवार को 10,000 वर्गफुट जमीन का कब्जा दिलाया।

माली समाज के तुलसीराम की 1978 के दंगों में हत्या कर दी गई थी और उनके तीन बेटे और परिवार को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा था। इस जमीन पर मौजूदा समय में जन्नत निशा नाम का स्कूल चलाया जा रहा था। हालाँकि अब ये जमीन तुलसीराम के वंशजों को मिल गई है। यह कार्रवाई राजस्व विभाग और पुलिस प्रशासन की देखरेख में हुई, जिसमें भारी सुरक्षा बल तैनात किया गया था।

जब बनवारी लाल को दंगाई ‘भाइयों’ ने मौत के घाट सुलाया

रामशरण की हत्या इकलौती दर्दनाक कहानी नहीं है। इसी 1978 में हुए संभल दंगों में कई खौफनाक कहानियाँ सामने आई। एक कहानी है बनवारी लाल की। संभल के जाने माने कारोबारी बनवारी लाल गोयल की तड़पा-तड़पाकर हत्या की गई थी। ऑपइंडिया के पास मौजूद इंटरनल रिपोर्ट बताती है कि दंगे भड़कने की सूचना मिलने पर बनवारी लाल गोयल प्रभावित इलाके में उनकी पत्नी और बेटे के रोके जाने के बावजूद यह कहते हुए चले गए, “सारे मुस्लिम मेरे मित्र और भाई जैसे हैं। सब मेरे साथ काम करते हैं। मुझे कुछ नहीं होगा।”

लेकिन बनवारी लाल गोयल को मुस्लिम दंगाइयों ने पकड़ लिया। उनसे कहा कि तुम इन पैरों से पैसे लेने आए हो और उनके पैर काट दिए। फिर कहा कि तुम इन हाथों से पैसे लेने आए हो और हाथ भी काट दिए। इसके बाद गर्दन काट कर उनकी हत्या कर दी गई। इस दौरान मुस्लिम दंगाइयों के सामने बनवारी लाल गिड़गिड़ाते रहे कि मुझे काटो मत, गोली मार दो। पर किसी ने नहीं सुनी।

इरफान, वाजिद, जाहिद, मंजर, शाहिद, कामिल, अच्छन जैसे नाम आरोपित थे। लेकिन 2010 में यह केस बंद करना पड़ा, क्योंकि गवाह ही हाजिर नहीं हुए। जज ने यह टिप्पणी करते हुए केस बंद किया कि मैं सोच भी नहीं सकता कि इनलोगों (आरोपितों) को फाँसी नहीं हो रही है। इंटरनल रिपोर्ट के अनुसार बनवारी लाल के परिवार पर डॉक्टर शफीकुर रहमान बर्क की ओर से भी दबाव डाला गया था।

बर्क संभल से समाजवादी पार्टी से सांसद रहे हैं। फिलहाल उनके पोते जियाउर्रहमान बर्क इस सीट से सपा के सांसद हैं। जामा मस्जिद में सर्वे के दौरान हुई हिंसा में जियाउर्रहमान बर्क के खिलाफ भी केस दर्ज किया गया। इसके बाद 1995 के आसपास बनवारी लाल गोयल के परिवार ने संभल ही छोड़ दिया। 2024 में संभल हिंसा के बाद बनवारी लाल के बेटे विनीत गोयल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिले थे। तब मुख्यमंत्री ने उनसे कहा था कि अब आप वापस संभल आकर बसिएगा, क्योंकि माहौल सुरक्षित हो गया। परिवार नेभी वापस लौटने पर विचार किया था।

गन्ने की खोई और टायर का ढेर लगाकर 24 हिंदुओं को जलाया

दंगे भड़कने के बाद बनवारी लाल गोयल ने कई हिंदू दुकानदारों को अपने साले मुरारी लाल की कोठी में छिप जाने को कहा था। मुस्लिम आढ़तियों ने इसकी सूचना दंगाइयों को दी। इसके बाद मुस्लिम दंगाइयों की भीड़ ने ट्रैक्टर लगाकर मुरारी लाल की कोठी का गेट तोड़ दिया।

यहाँ 24 हिंदुओं की हत्या कर उन्हें गन्ने की खोई और टायर का ढेर लगाकर मुस्लिम दंगाइयों ने जला दिया। हालात इतने बदतर थे कि अधिकतर हिंदुओं ने कपड़ों के पुतले बनाकर बृजघाट पर अपनों का अंतिम संस्कार किया था। दैनिक भास्कर ने संभल के इतिहास के जानकार 58 साल के संजय शंखधर के हवाले से भी इस घटना के बारे में बताया है। 

इसी दंगे के दौरान एक हिंदू शिक्षक की बेटी और पत्नी को मंजर शफी ने उठा लिया था। इस दंगे को भड़काने के पीछे भी शफी की बड़ी भूमिका थी। हिंदू शिक्षक की बेटी को बलात्कार के बाद छोड़ा गया। उनकी पत्नी को हिंदुओं ने बचा लिया था। आज न तो इस शिक्षक और न ही बनवारी लाल गोयल का परिवार संभल में रहता है।

वहीं बनवारी लाल की हत्या को हरद्वारी लाल शर्मा और सुभाष चंद्र रस्तोगी ने अपनी आँखों से देखा था। इस कत्लेआम के दौरान दोनों ने एक ड्रम में छिपकर अपनी जान बचाई थी। हाई स्कूल में पढ़ने वाले हरद्वारी लाल के सगे भाई को भी मुस्लिम दंगाइयों ने चाकू से गोदकर इसी दौरान मार डाला था। शर्मा और रस्तोगी भी इस बनवारी लाल के कत्लेआम के गवाह थे।

1978 का संभल दंगा और तत्कालीन सपा सरकार का अँधापन

संभल के इतिहास में काले पन्नों में दर्ज दंगा भयानक था। 29 मार्च 1978 को उत्तर प्रदेश के संभल जिले में एक भयानक सांप्रदायिक दंगा हुआ, जो कई दिनों तक चला और जिसमें 184 लोगों की मौत हुई थी। दंगे के बाद दो महीने तक कर्फ्यू लगा रहा और पुलिस-प्रशासन मूकदर्शक बना रहा।

दंगे की शुरुआत मंजर अली नाम के व्यक्ति ने की, जो डिग्री कॉलेज की प्रबंधन समिति में सदस्यता नहीं मिलने पर नाखुश था। उसने 28 मार्च को मुस्लिम छात्राओं के साथ मिलकर बाजार में उत्तेजक नारेबाजी शुरू की और जबरन दुकानें बंद करवाईं। जब कुछ दुकानदारों ने विरोध किया, तो लूटपाट, आगजनी और हत्या का सिलसिला शुरू हो गया ।

अफवाहें फैलाई गईं कि ‘मस्जिद में पूजा‘ की जा रही है और इमाम को मार दिया गया, जिससे इस्लामी भीड़ और अधिक आक्रोशित हो गया। दंगे के दौरान खग्गूसराय, सर्राफा बाजार और गंज क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। मुरारीलाल नाम के व्यक्ति की दुकान में आग लगाई गई, जिसकी फड़ पर 24 हिंदुओं को जिंदा जला दिया गया था। लोगों को चाकुओं से गोदा गया, सिर कटे गए, हाथ-पैर अलग किए गए। किसी के पिता को जिंदा जलाया गया और शवों को टायर से जलाया गया।

इन दंगों में कुल 169 मुकदमे दर्ज हुए थे, जिनमें 3 पुलिस की तरफ से और बाकी दोनों पक्षों की तरफ से लगाए गए। दंगों में पुलिस और प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। पूरे संभल में दो महीने तक कर्फ्यू लगा रहा।

दंगे के बाद हिंदू परिवारों पर पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा। आँकड़ों के मुताबिक, 40 हिंदू परिवार विस्थापित हुए। इन परिवारों को जान बचाने के लिए मंदिरों की तालाबंदी करनी पड़ी और अपना घर-बार और कारोबार छोड़कर जाना पड़ा। इसके बाद संभल में हिंदू आबादी 45 प्रतिशत से घटकर 15 प्रतिशत रह गई।

तत्कालीन सपा सरकार ने भी दंगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। NDTV को मिली एक फाइल के अनुसार, 23 दिसंबर 1993 को मुलायम सिंह यादव की सरकार ने 8 मुकदमे वापस लेने का फैसला किया था। उत्तर प्रदेश सरकार के न्याय विभाग के विशेष सचिव ने जिला मजिस्ट्रेट को लिखा था कि 8 मुकदमों को वापस लिया जाए। वहीं दंगों 10 केस की फाइल खंगालने से पता चला कि हत्या जैसे संगीन मामलों को भी तत्कालीन सपा सरकार ने ठीक से हैंडल नहीं किया था। सभी 48 आरोपितों को बरी कर दिया गया था।

इससे पहले 1978 में हुए संभल दंगों को तब याद किया गया जब उत्तर प्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र के पहले दिन (15 दिसंबर 2024) CM योगी आदित्यनाथ ने बड़ा बयान दिया। उन्होंने बताया कि संभल मे 1947 से अब तक 209 हिंदुओं की हत्या हुई। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष ने हिंदुओं के खिलाफ हिंसा पर अंधापन दिखाया।

TCS नासिक कांड: 1500+ पन्नों की चार्जशीट में AIMIM के पूर्व सांसद इम्तियाज जलील का भी जिक्र, निदा खान की फरारी के बाद उसके परिवार से मिलने की बात कबूली; जानिए सब कुछ

महाराष्ट्र के नासिक में स्थित टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) की यूनिट से एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया था, जहाँ हिंदू महिला-पुरुष कर्मचारियों के साथ यौन उत्पीड़न और जबरन धर्मांतरण की कोशिश के आरोप लगे थे। इस हाई-प्रोफाइल मामले की जाँच कर रही स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने अब कोर्ट में अपनी चार्जशीट दाखिल की है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा ‘कॉर्पोरेट जिहाद’ और ‘लव जिहाद’ करार दिए गए इस मामले में 1500 से अधिक पन्नों की चार्जशीट पेश होते ही कई बड़े खुलासे हुए हैं, जिसने पूरे राज्य की राजनीति और सामाजिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।

पहली चार्जशीट में क्या है और कौन-कौन हैं आरोपित?

SIT ने TCS नासिक कांड में अपनी पहली चार्जशीट नासिक की कोर्ट में दाखिल की, जो करीब 1500 पन्नों की है। यह चार्जशीट देवलाली कैंप पुलिस स्टेशन में दर्ज पहली FIR के आधार पर तैयार की गई है। इस पहली चार्जशीट में मुख्य रूप से चार लोगों को आरोपित बनाया गया है। इनके नाम दानिश एजाज शेख, तौसीफ बिलाल अत्तर, निदा एजाज खान और AIMIM के कॉर्पोरेट मतीन मजीद पटेल हैं।

इन आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की सख्त धाराओं जैसे- आपराधिक साजिश, बलात्कार, धोखे से शारीरिक संबंध बनाना, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचना और आरोपितों को शरण देना जैसी धाराएँ लगाई गई है। इसके अलावा, मामले में अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम यानि SC/ST एक्ट भी जोड़ा गया है।

पूर्व सांसद इम्तियाज जलील का नाम क्यों आया?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इस 1500 पन्नों की चार्जशीट में AIMIM के पूर्व सांसद इम्तियाज जलील का नाम सामने आया। चार्जशीट में यह जिक्र उस समय का है जब पुलिस इस मामले की मुख्य महिला आरोपित निदा खान की तलाश कर रही थी और वह फरार चल रही थी। पुलिस ने जब निदा खान को छुपाने के आरोप में AIMIM का कॉर्पोरेटर मतीन पटेल को हिरासत में लेकर पूछताछ की, तो मतीन ने बार-बार पुलिस के सामने एक ही बात दोहराई और कहा, “इम्तियाज जलील साहब को पूछना पड़ेगा।”

मतीन के इस बयान को पुलिस ने अपनी चार्जशीट का हिस्सा बनाया है, जिसके बाद से ही पूर्व सांसद इम्तियाज जलील का नाम इस पूरे विवाद से सीधे जुड़ गया है। इम्तियाज जलील AIMIM का एक कद्दावर नेता हैं और छत्रपति संभाजीनगर से पूर्व सांसद रह चुका है। मतीन पटेल जो कि इस पार्टी का कॉर्पोरेटर हैं, वो इम्तियाज जलील को अपना राजनीतिक बॉस मानता हैं।

चार्जशीट के मुताबिक, जब निदा खान की अग्रिम जमानत याचिका नासिक कोर्ट ने खारिज की थी, तब मतीन पटेल ने जानते-बूझते हुए भी निदा और उसके पूरे परिवार (अम्मी-अब्बू, भाई-चाची) को छत्रपति संभाजीनगर के नरेगाँव-कौसर सिडको इलाके में छिपाकर रखा था। कड़ी पूछताछ के बाद जब मतीन ने पुलिस को उस जगह का पता बताया, तो पुलिस ने छापेमारी कर निदा खान को गिरफ्तार किया। इसके बाद प्रशासन ने मतीन पटेल की उस अवैध संपत्ति को भी बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया जहाँ मतीन पटेल ने निदा खान को छुपाया था। बता दें कि इम्तियाज जलील ने अपने समर्थकों से एक वादा किया था कि AIMIM उसी स्थान पर मतीन पटेल को एक बेहतर और बड़ा स्थान बनाएगी, जहाँ ध्वस्त हुआ।

बातचीत में इम्तियाज जलील ने क्या बताया?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस पूरे मामले और चार्जशीट में नाम आने को लेकर इम्तियाज जलील से बातचीत की गई। इम्तियाज जलील उस समय सऊदी अरब में हज यात्रा पर था। उसने फोन पर बातचीत में कहा कि उसे चार्जशीट में अपना नाम शामिल होने की कोई जानकारी नहीं है। इम्तियाज जलील ने कहा, “मैं किसी भी तरह की जाँच का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार हूँ। मैंने पहले भी सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया था कि मैं लड़की (निदा) के परिवार से मिला था और जो मुझे सही लगता है, मैं उसके लिए अपनी लड़ाई जारी रखूँगा।”

इम्तियाज जलील ने निदा के परिवार से मुलाकात की बात भी बताई और मतीन पटेल के घर पर चले बुलडोजर के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व भी किया था। वहीं, मतीन पटेल के वकील अभयसिंह भोसले का कहना है कि मतीन ने इस मुख्य विवाद से कोई लेना-देना नहीं है और इस पर सिर्फ राजनीति की जा रही है।

चार्जशीट का विस्तार: WhatsApp चैट, Email और डराने-धमकाने का खेल

SIT की इस चार्जशीट में आरोपितों के खिलाफ तकनीकी और डिजिटल सबूतों की भरमार है। पुलिस ने पीड़ितों और आरोपितों के मोबाइल फोन से महत्वपूर्ण WhatsApp चैट के स्क्रीनशॉट और Email ट्रेल बरामद किए हैं। पहली FIR की पीड़िता ने आरोप लगाया है कि मुख्य आरोपित दानिश शेख ने साल 2022 से ही उसका शोषण शुरू कर दिया था। उसने शादी का झांसा देकर हिंदू पीड़िता के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए। इसके साथ ही उसने पीड़िता का आर्थिक शोषण भी किया।

आरोपित दानिश ने पीड़िता के पैसों पर ऐश किया

आरोपित दानिश ने पीड़िता के पैसों पर खूब ऐश किया। पीड़िता का आरोप है कि दानिश अपने घूमने-फिरने, होटल और कैफे जाने से लेकर घर के राशन तक का पूरा खर्च उसी से कराता था और उसने दानिश को महँगे बैग और घड़ियाँ भी गिफ्ट की थीं। इतना ही नहीं, दानिश ने कभी घर के नाम पर 10 हजार, कभी ट्रिप के लिए 5 हजार, तो कभी सेविंग्स स्कीम के बहाने हर महीने 5 हजार रुपए उससे ऐंठे। पीड़िता के अनुसार, इस रिश्ते के दौरान उसने दानिश पर कुल मिलाकर 2.2 लाख रुपए से ज्यादा खर्च कर दिए थे।

यह लव जिहाद और कॉर्पोरेट जिहाद है- देवेंद्र फडणवीस

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस मामले पर बेहद आक्रामक रुख अपनाया। एक मीडिया मंच पर बोलते हुए CM फडणवीस ने स्पष्ट किया कि पुलिस जाँच में इस बात के पुख्ता सबूत मिले हैं कि TCS नासिक कांड यूनिट में जबरन धर्मांतरण कराने की सुनियोजित कोशिशें की जा रही थीं। CM फडणवीस ने कहा, “हमें अंतरधार्मिक विवाह से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन जब किसी खास मकसद के तहत एक तय पैटर्न बनाकर हिंदू महिलाओं को निशाना बनाया जाता है, तो यह साफ तौर पर ‘लव जिहाद’ का मामला बनता हैं।” CM फडणवीस ने इसे ‘कॉर्पोरेट जिहाद’ की संज्ञा भी दी और चेतावनी दी कि महाराष्ट्र सरकार के पास ऐसे कृत्य से निपटने के लिए बेहद सख्त कानून मौजूद है और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।

निदा खान की भूमिका और ‘जहन्नुम’ का डर

चार्जशीट के अनुसार, निदा खान का काम पीड़ित हिंदू महिला को इस्लामिक रीति-रिवाजों की तरफ धकेलना था। निदा ने पीड़िता के फोन में ‘मुस्लिम प्रो’ नाम का ऐप डाउनलोड करवाया, उसे सोशल मीडिया पर इस्लाम से जुड़े Video भेजे और जबरन ‘अल-फातिहा’ और ‘कलमा’ पढ़वाया। निदा ने पीड़िता को धमकी दी थी कि अगर उसने इस्लाम नहीं कबूला तो ‘अल्लाह तुम्हारे परिवार को जहन्नुम (नरक) में भेज देगा।’

हिंदू पीड़िता को जहन्नुम भेजने की धमकी

जून 2025 से जनवरी 2026 के बीच, निदा खान अक्सर हिंदू पीड़िता को ऑफिस के बाद अपने घर ले जाती थी, जहाँ उसे बुर्का और हिजाब पहनना सिखाया जाता था और नमाज पढ़ने के लिए मजबूर किया जाता था। निदा खान का परिवार भी इसमें शामिल था और उसकी अम्मी हिंदू पीड़िता को किसी मदरसे में भेजने की योजना बना रही थी।

क्या है TCS नासिक कांड?

यह पूरा विवाद महाराष्ट्र के नासिक के अशोका मार्ग में TCS के BPO यूनिट से शुरू हुआ था। इस यूनिट में काम करने वाली कई हिंदू महिला कर्मचारियों ने अपने ही मुस्लिम सहयोगियों पर गंभीर आरोप लगाए थे। हिंदू महिलाओं का कहना था कि वहाँ काम करने वाले कुछ मुस्लिम पुरुष कर्मचारियों ने उनका मानसिक और शारीरिक शोषण किया।

आरोपितों ने दफ्तर के भीतर ही एक WhatsApp ग्रुप बना रखा था, जिसके जरिए हिंदू महिला कर्मचारियों पर निशाना साधा जाता था। उन पर मुस्लिम मजहबी प्रथाओं को अपनाने, नमाज पढ़ने, हिजाब पहनने और जबरन मांस खाने का दबाव बनाया जाता था। जब हिंदू पीड़ित महिलाओं ने हिम्मत दिखाकर आवाज उठाई, तब जाकर पुलिस ने अलग-अलग पुलिस स्टेशनों में कुल 9 FIR दर्ज कीं और मामले की गंभीरता को देखते हुए SIT का गठन किया गया।

TCS की कार्रवाई और मामले की वर्तमान स्थिति

इस मामले के उजागर होने के बाद, देश की दिग्गज IT कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) ने तुरंत एक्शन लिया। कंपनी ने एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि उनकी कार्यस्थल पर उत्पीड़न और प्रताड़ना को लेकर ‘जीरो-टोलरेंस’ की नीति है। कंपनी ने आंतरिक जाँच के बाद मामले में संलिप्त पाए गए सभी 8 मुस्लिम कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से नौकरी से सस्पेंड कर दिया है।

वर्तमान में, 8 आरोपित गिरफ्तार है। मुंबई नाका पुलिस स्टेशन में दर्ज अन्य 8 FIR के सिलसिले में भी एक दूसरी बड़ी चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की जा चुकी है, जिसमें रजा मेमन, शाहरुख कुरैशी और अश्विनी चैनानी जैसे अन्य आरोपितों के नाम शामिल हैं। पुलिस अब आरोपितों के वॉयस सैंपल इकट्ठा कर रही है और उनके कॉल रिकॉर्ड्स की गहन जाँच कर रही है ताकि यह साफ हो सके कि फरार रहने के दौरान वे राजनीतिक रूप से किन-किन लोगों के संपर्क में थे।

जापान में गिराई जाएगी वो अवैध मस्जिद, जिसका पाकिस्तानी राजदूत ने किया उद्घाटन: विवाद के बाद इस्लामी मुल्क ने झाड़ा पल्ला, मुस्लिम-मस्जिद बने ‘उगते हुए सूरज वाली भूमि’ का संकट

पाकिस्तान ने जापान में मस्जिद का उद्घाटन किया। इसे जापान ने गैर-कानूनी कहा और ध्वस्त करने का आदेश दिया। जापान में बढ़ रही मुस्लिम आबादी, डेमोग्राफी में बदलाव, सार्वजनिक नमाज और कब्रिस्तान की बढ़ती माँग, जन्मदर में कमी और मस्जिदों की बढ़ती संख्या के बीच इस मुद्दे ने इसलिए ध्यान खींचा है, क्योंकि जापान में पाकिस्तान के राजदूत अब्दुल हमीद इस साल की शुरुआत में मस्जिद के उद्घाटन में शामिल हुए थे।

क्या है कोवागो विवाद

कावागो में गैरकानूनी तरीके से मस्जिद बनाई गई थी, जिसके खिलाफ स्थानीय लोगों ने आवाज भी बुलंद की थी। ‘जापान जामे मस्जिद रमजान’ नाम की यह मस्जिद 4500 स्क्वेयर मीटर के प्लॉट पर बनी है, जिसे पहाड़ पर मौजूद ‘वनभूमि’ माना जाता है। यह साइट अर्बनाइजेशन कंट्रोल एरिया में आती है, जहाँ लोकल अधिकारियों से इजाजत लिए बिना कंस्ट्रक्शन पर आम तौर पर रोक होती है।

द असाही शिंबुन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, प्रॉपर्टी रिकॉर्ड से पता चलता है कि मार्च 2025 में जमीन का मालिकाना हक बदला गया। पहले यह फुजीमी की एक रियल एस्टेट कंपनी की थी, जिसे कावागो पर रजिस्टर्ड एक फर्म को दे दी गई। कावागो शहर के अधिकारियों ने कहा कि मस्जिद जरूरी मंजूरी के बिना बनाई गई थी। यहाँ 2000 में एक फैक्ट्री बनी थी, 2007 में इसका मालिकाना हक बदल गया था और रियल एस्ट्रेट कॉर्पोरेशन बन गया। इसके बाद 2025 में स्थिति में बदलाव आया, लेकिन मस्जिद बनाने की अनुमति यहाँ नहीं थी।

जापान में सिटी प्लानिंग एक्ट के तहत बिल्डिंग बनाने पर सख्त पाबंदियाँ हैं। हालाँकि, जैसा कि दुनिया भर के इस्लामिस्टों के साथ होता है, इस्लामी विस्तार और कब्जे के मामलों में उनके लिए स्थानीय कानूनों का कोई मतलब नहीं होता है। मस्जिद को एक पाकिस्तानी कंपनी की जमीन पर गैर-कानूनी तरीके से बनाया गया था। जापानी मीडिया की रिपोर्ट है कि रियल एस्टेट रजिस्ट्री ने उस जमीन को ‘वन भूमि’ बताया है।

अक्टूबर 2024 में स्थानीय निवासियों ने लगभग पूरी हो चुकी मस्जिद के ढाँचे का विरोध किया। शहर के प्रशासनिक अधिकारियों ने कई बार काम रोकने के आदेश जारी किए। लेकिन, मुस्लिम समुदाय ने बात नहीं मानी और कंस्ट्रक्शन का काम जारी रखा। शुरुआत में कहा जाता है कि मजदूरों ने कहा कि वे जापानी भाषा नहीं समझ सकते, इसलिए काम नहीं रोका। चाहे जो भी हो मस्जिद बनकर तैयार भी हो गई और इस मस्जिद के उद्घाटन में पाकिस्तान के राजदूत भी शामिल हुए, जिसके बाद मामला और अधिक चर्चित हो गया। बाद में पाकिस्तान दूतावास को सार्वजनिक स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा।

पाकिस्तान दूतावास ने जापानी कानून मानने की सलाह दी

जापान स्थित पाकिस्तान दूतावास ने बयान जारी कर कहा कि जापान में रहने वाले सभी पाकिस्तानियों को जापानी कानूनों का पूरी तरह पालन करना चाहिए। मस्जिद या मदरसे का निर्माण स्थानीय प्रशासन से आवश्यक अनुमति लेने के बाद ही किया जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि पाकिस्तानी दूतावास का उन परियोजनाओं से कोई संबंध नहीं है, जो स्थानीय कानूनों का पालन नहीं करती।

इसमें कहा गया है कि कावागो की मस्जिद के उद्घाटन में राजदूत इसलिए गए थे, क्योंकि उन्हें बताया गया था कि कानून के मुताबिक जरूरी अनुमति ले ली गई है। इसमें कहा गया कि पाकिस्तानी समुदाय को स्थानीय निवासियों और प्रशासन के साथ पारदर्शिता रखनी चाहिए और अधिकारियों के साथ सहयोग करना चाहिए।

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पाकिस्तानी एम्बेसी ने कहा, “ऐसे प्रोजेक्ट्स के लिए कानूनी नियमों के पालन से जुड़ी जानकारी जापान में रहने वाले सभी पाकिस्तानियों और आस-पास के लोगों के साथ ट्रांसपेरेंट तरीके से शेयर की जानी चाहिए। इसके अलावा, प्लानिंग के दौरान और उसके बाद भी, हर हाल में जापानी कानूनों और नियमों का पालन किया जाना चाहिए।”

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कावागो जापान का पहला मामला नहीं है। इससे पहले मई 2026 में फुजिसावा शहर में एक मस्जिद बनाने को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुआ। 440000 लोगों वाले इस शहर में मुस्लिम आबादी में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है। जिस मस्जिद की बात हो रही है, उसे एक श्रीलंकाई बिजनेसमैन मोहम्मद खलील ने बनाया था। उसका कहना था कि वह एक मस्जिद बनाना चाहते हैं, क्योंकि 20 किलोमीटर दूर एबिना मस्जिद फुजिसावा में बढ़ती मुस्लिम आबादी के लिए काफी नहीं है।

खास बात यह है कि खलील भी 2021 में फुजिसावा के उत्तरी बाहरी इलाके में एक बंद पड़ी फैक्ट्री की 980-स्क्वायर मीटर की जगह पर ही बस गए थे। उन्होंने फटाफट फुजिसावा मस्जिद NPO बनाया। पैसे जमा किए और जमीन खरीदी और मस्जिद बनाने के लिए मंजूरी ले ली।

ये इतनी तेजी से हुआ कि 4 साल के अंदर ही एक मस्जिद बना दी। जापानी भी इससे परेशान हैं कि कैसे मुस्लिम इमिग्रेंट्स पूरे जापान में अपनी धार्मिक पहचान बढ़ा रहे हैं। ये बता रहे हैं कि जानबूझकर साजिश के तहत ये किया जा रहा है। एक तरफ तो बड़ी संख्या में प्रवासी मुस्लिम यहाँ आ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय लोगों का ब्रेनवॉश करके उन्हें इस्लाम कबूल करवाया जा रहा है।

सोशल मीडिया पर भी जापानियों ने अपनी बात रखी है। इनका कहना है कि तब्लीगी जमात से संबंध रखने वाले इस अवैध मस्जिद के उद्घाटन में पाकिस्तानी राजदूत अब्दुल हमीद का शामिल होना ये बताता है कि इसे पाकिस्तानी शासन का समर्थन है।

सोशल मीडिया पर जापानियों का विरोध

सोशल मीडिया पर कई जापानी लोगों ने इस्लामी संगठन तब्लीगी जमात से कथित संबंध वाले मस्जिद के उद्घाटन समारोह में शामिल होने वाले पाकिस्तानी राजदूत अब्दुल हमीद पर गुस्सा हुए।

एक्स पर उन्होंने लिखा, “जापानी भाषा के बयान के 12 घंटे बाद उर्दू में एक बयान पोस्ट किया गया। भले ही राजदूत इस बात से अनजान थे कि यह अवैध है। बात यह है कि उन्होंने इस मस्जिद के उद्घाटन समारोह में भाग लिया, जहाँ सऊदी अरब जैसे देशों द्वारा प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन ‘तबलीगी जमात’ से जुड़े लोग भी आते-जाते हैं। राजदूत को तो सतर्क रहना ही चाहिए था, इतना बिजी रहने के बावजूद भी वो इसमें क्यों शामिल हुए? क्या वह केवल इस बात से खुश थे कि जापान में मस्जिदें बढ़ रही हैं? क्या वह जापान के मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाला इसे मान रहे थे?”

एक और जापानी यूजर ने लिखा कि हो सकता है इस मस्जिद को पाकिस्तानी मदद मिल रही हो। इसे जापान के बारे में जानकारी इक्ट्ठा कर चीन को देने के मिशन पर लगाया गया हो। मीडिया में इस एंगल से रिपोर्टिंग क्यों नहीं हो रही है

जापानी X यूजर ने लिखा, “साइतामा प्रीफेक्चर, कावागो सिटी, ओजा शिमोशिमोआकासाका, जहाँ कावागो सिटी में एक गैर-कानूनी तरीके से बनी मस्जिद है। ऐसा इसलिए किया गया है क्योंकि यह मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस के इन्फॉर्मेशन हेडक्वार्टर ओई रेडियो स्टेशन के पास है। स्पेशल ऑब्जर्वेशन जोन को ‘इम्पॉर्टेंट लैंड सर्वे एक्ट’ के तहत बनाया गया है, ताकि जरूरी सिक्योरिटी सुविधाओं के काम में रुकावट डालने वालों को रोका सके।”

पाकिस्तानी फर्जी फुटबॉल टीम भी पहुँच गई थी जापान

पाकिस्तानी अवैध तरीके से जापान जाने के लिए भी जाने जाते हैं। हाल ही में पाकिस्तान की फर्जी फुटबॉल टीम जापान पहुँच गई थी। इसके लिए बाकायदा फर्जी फुटबॉल क्लब बनाया गया, जिसे पाकिस्तानी फुटबॉल एसोसिएशन से संबद्ध दिखाया गया। जापान पहुँचे पाकिस्तानियों से 40-40 लाख लिए गए थे।

जापान पहुँचने पर एयरपोर्ट पर इनका फर्जीवाड़ा सामने आ गया और पाकिस्तानी दूतावास से बात कर इनलोगों को वापस भेजा गया। इसी तरह 2024 में 17 पाकिस्तानियों को जापानी क्लब बोविस्टा एफसी के फर्जी आमंत्रण पत्र के जरिए जापान भेजा गया था। 15 दिनों का वीजा था, लेकिन ये लोग जापान जाकर आज तक वापस नहीं लौटे।

15 सालों में 4 गुणा बढ़ी मुस्लिम आबादी, 149 बने मस्जिद

ये सिर्फ एक शहर की बात नहीं है जापान में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी है। जापान के 47 प्रांतों में 2.3 लाख से 4.2 लाख आबादी इस्लाम को मानने वालों की है। 2016 के आंकड़ों के मुताबिक, जापान में मुस्लिम आबादी करीब 1.30 लाख थी। इनमें से 1.20 लाख विदेशी मुस्लिम और 10 हजार जापानी मुस्लिम रहते थे। लेकिन अब इस्लाम को माननेवालों की संख्या तेजी से बढ़ी है।

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुस्लिमों की कुल आबादी जापान की आबादी का 0.33 फीसदी है, जो साल-दर-साल बढ़ रही हैं। हाल ही में कब्रिस्तान को बनाने के लिए जगह देने को लेकर जापानी संसद में सवाल पूछे गए। इसके बाद मुस्लिम आबादी का मामला सुर्खियों में आ गया।

मुस्लिमों की बढ़ी आबादी मजदूरी करती है। इसके अलावा बिजनेस, तकनीक और शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ लोग योगदान दे रहे हैं। जापान में मुसलमानों पर स्टडी करने वाले वासेदा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एमेरिटस हिरोफुमी तनाडा के एक सर्वे में सामने आया कि देश में इनकी जनसंख्या 200000 से ज्यादा है।

मार्च 2021 तक यहाँ 113 मस्जिद बन चुके थे, जो 1999 में मात्र 15 थे। 2024 की बात करें तो यहाँ मस्जिदों की संख्या 149 हो गई थी, जो एक साल बाद यानी 2025 में 164 हो गई। इनमें से कई मस्जिदें बहुमंजिला हैं।

2024 के आखिर तक, जापानी मीडिया और रिसर्चर्स ने अंदाजा लगाया कि देश में विदेशी मुसलमानों की संख्या 360000 थी, जबकि मुसलमानों की कुल संख्या लगभग 420000 थी। इनमें करीब 55000 जापानी लोगों ने इस्लाम कबूला था। 2010-2020 के बीच ऐसे इस्लामी जापानियों की संख्या 110000 से बढ़कर 230000 हो गई। आसान शब्दों में कहें तो, जापान में मुस्लिम आबादी सिर्फ 15 से 20 सालों में चार गुना बढ़ गई है।

जापान में घटती आबादी और बढ़ता ‘इस्लाम’

जापान इन दिनों आबादी में कमी की समस्या से जूझ रहा है। यहाँ दुनिया में सबसे कम फर्टिलिटी रेट है और जन्म दर में रिकॉर्ड-कमी आई है। जापान का टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) 2024 में घटकर 1:15 हो गया, जो लगातार नौवें साल गिरावट का संकेत है। 2023 में यह 1.0 से नीचे चला गया था।

जापानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकारी डेटा का हवाला देते हुए, जापान में 2025 में 705,809 जन्म दर्ज किए गए, जो 2024 में लगभग 721000 से कम है। कुल मिलाकर जापान दशकों से कम जन्मदर की वजह से ‘बूढा’ होता जा रहा है।

इस संकट की वजह से मजदूरों की हर क्षेत्र में कमी हो गई है, जिसका असर इकोनॉमिक ग्रोथ और इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी पड़ रहा है।

गाँवों से आबादी कम होने, स्कूल बंद होने और यहाँ तक ​​कि ‘घोस्ट टाउन’ या ‘मरते हुए गाँव’ बनने की भी खबरें आई हैं। इन इलाकों में बूढ़ी होती आबादी की वजह से वीरान होते जा रहे हैं। कई इंडस्ट्रियल हब पूरी तरह बर्बाद हो गए हैं।

जापानी सरकार कई फाइनेंशियल इंसेंटिव स्कीम देकर नौजवानों को बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। वर्क-लाइफ रिफॉर्म किया जा रहा है, लेकिन देर से शादियाँ, बच्चों को पालने का बढ़ता खर्च और आर्थिक अनिश्चितताओं की वजह से उत्साहजनकर परिणाम नहीं आए हैं।

साफ है, जापान की घटती आबादी इस्लामिक माइग्रेंट्स के लिए काफी फायदेमंद है। मजदूरों को पाकिस्तान, बांग्लादेश और इंडोनेशिया जैसे देशों से लाया जा रहा है। इनमें से ज्यादातर मुस्लिम हैं। बहुत सारे मुस्लिम जापान की इमिग्रेशन पॉलिसी का फायदा उठाकर वहीं बसते जा रहे हैं।

ऐसी खबरें आई हैं कि मुस्लिम माइग्रेंट वर्कर इस्लाम का प्रचार कर रहे हैं, जापानी लोकल लोगों का धर्म बदल रहे हैं, स्थानीय लोगों से निकाह कर रहे हैं, ताकि इस्लाम को फैला सके और अपनी आबादी बढ़ा सकें।

जापानियों को ‘लुभाने’ की मस्जिदों से होती है कोशिश

आम लोगों को लुभाने के लिए मस्जिदों में कई तरह की इस्लामी गतिविधियाँ चलाई जाती है। एक खास तरह की आवाज लगा कर लोगों को मस्जिद के सामने जमा किया जाता है और नमाज का समय बताया जाता है। यहाँ तक कहा जाता है कि “मस्जिद घर जैसी है। अल्लाहु अकबर।” इतना ही नहीं यूनिवर्सिटी में भी मस्जिद बनाने की खबरें सामने आयी हैं।

टोक्यो के वासेदा विश्वविद्यालय के टोकोरोजावा परिसर में ऐसी ही एक इमारत को मस्जिद में तब्दील कर दिया गया। यहाँ इस्लाम के प्रचार प्रसार के लिए भी इस्लामिक देशों से लोग आते रहते हैं। 90 के दशक से ऐसे कार्यक्रम बढ़े हैं, जहाँ बाहरी मालवी आकर इस्लाम को लेकर बढ़े बढ़े दावे करते हैं और स्थानीय जनता को आकर्षित करते हैं।

जापान में मुस्लिम की बढ़ती आबादी का मुद्दा काफी संवेदनशील बन गया है। जापानी मीडिया और स्थानीय लोग के बीच यह बहस केवल एक मस्जिद की वैधता को लेकर नहीं है। बल्कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया, ईरान, इराक जैसे देशों से लोगों का बेहिसाब आना और मस्जिदों, कब्रिस्तानों का निर्माण बड़ी समस्या बन गई है। जन्मदर की कमी से ‘बूढ़ा हो रहे जापान’ में मजदूरों की भारी कमी हो गई है। इनलोगों यहाँ काम मिल जाता है। धीरे धीरे ये लोग सुविधाओं की माँग करते हैं, मस्जिद और मदरसे बनने लगते हैं। इससे जापान त्रस्त हो गया है।

दुनिया में कहीं भी मस्जिद से जुड़ा विवाद हो, मुस्लिम दावा करते हैं कि वहाँ पहले से ही मस्जिद थी। इसके बाद जोड़ते हैं कि कयामत तक मस्जिद रहेगी। एक तरह से वे गैर-कानूनी तरीके से कब्जा कर मस्जिदें बनाते हैं और स्थानीय प्रशासन को चुनौती देते हैं कि अगर टूट गई, तो देख लेना क्या होगा।

कावागो जामे मस्जिद मामले में भी जमीन के मालिकों ने कथित तौर पर दावा किया था कि यह गैर-कानूनी मस्जिद ‘हमेशा से वहां थी।’ स्थानीय जापानी अधिकारियों ने इन दावों को खारिज कर दिया, क्योंकि रिकॉर्ड में मस्जिद तो दूर, पहले का आर्किटेक्चर भी मौजूद था। कई जापानी लोगों ने उसी जगह की पुरानी तस्वीरें भी दिखाई हैं, जहाँ अब गैर-कानूनी मस्जिद है।

इससे पता चलता है कि जमीन के पाकिस्तानी मुस्लिम मालिक गैर-कानूनी तरीके से बनाए गए मस्जिद को भी पुरानी बताने की कोशिश कर रहे हैं।तब जबकि यहाँ का पूरा इतिहास जापानियों को पता है। इसलिए अधिकारियों ने गैर-कानूनी मस्जिद को गिराने का आदेश दिया है, जिसकी वजह से पाकिस्तानी दूतावास को अपनी नसीहत प्रवासियों को देनी पड़ी और खुद को अलग करने की कोशिश करनी पड़ी।

दुनिया के कई देश जूझ रहे हैं इस्लामी संकट से

मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा मानता है कि इस्लाम का फैलाव और काफिरों या गैर-इस्लामिक लोगों का धर्मांतरण करना उनका ‘इस्लामी फर्ज’ है। पहले युद्ध के जरिए जीत कर इस्लाम को बढ़ाया करते थे, अब बहलाकर, फुसलाकर, लालच देकर या धमकी देकर ये काम करते हैं। इसके लिए दूसरे देशों में बसना भी पड़े तो इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। इनका ‘मिशन’ चलता रहता है।

एक धर्मनिरपेक्ष देश जापान में शिंटो-बौद्ध परंपराएँ मानने वाले लोग सबसे ज्यादा हैं। यहाँ दाह संस्कार की परंपरा है। शवों को दफनाने और कब्रिस्तान को लेकर यहाँ हंगामा भी हुआ है, क्योंकि इस्लामिक परंपरा लोकल जापानियों की परंपरा से मेल नहीं खाती है। लेकिन, मुस्लिम कट्टरपंथियों को लोकल कल्चर को अपनाना और उसका सम्मान तो कभी आया ही नहीं।

इस्लामी कट्टरपंथियों का एक पैटर्न है, पहले कुछ मुस्लिम आबादी को बसाओ, आसपास वैध-अवैध तरीके से मस्जिद बनाओ और फिर आबादी बढ़ा बढ़ा कर सार्वजनिक स्थानों पर नमाज अदा करने लगो और स्थानीय लोगों पर अपना दबदबा बनाने लगो और धर्मांतरण के लिए सारे साम-दाम- दंड-भेद अपनाओ।

इनलोगों को लोकल कानूनों को तोड़ने और इस्लामी दबदबा बनाने के लिए नियम कानून तोड़ने में कोई हिचक नहीं होती। यही काम इनलोगों ने यूरोप में भी किया है। यूरोप के विकसित सहिष्णु देशों के कानून का फायदा उठाकर वहाँ पहुँचे और धीरे-धीरे अपना दावा करने लगे।

यूरोप में अपराध काफी बढ़ गए हैं। अपने रीति-रिवाज और परंपरा को ये लोग उनपर थोप रहे हैं और लगातार खूनखराब, आतंकवाद की घटनाएँ बढ़ रही हैं। यहाँ डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है। यही वजह है कि अनुमान लगाया गया है कि अगले 200 सालों में 6 यूरोपीय देशों- फ्रांस, बेल्जियम, बुल्गारिया,साइप्रस,स्वीडन और ब्रिटेन इस्लाम बहुल देश हो जाएगा।

झाँसी में NSUI नेता पर हत्या का केस, घर में फंदे से लटकी मिली पत्नी: याद आई नैना साहनी, दिल्ली में कॉन्ग्रेस नेता ने टुकड़े-टुकड़े कर तंदूर में झोंक दिया था

उत्तर प्रदेश के झाँसी में दहेज हत्या का मामला सामने आया है। यहाँ कॉन्ग्रेस के छात्र संगठन नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) के प्रदेश उपाध्यक्ष भरत व्यास की पत्नी प्रिया मिश्रा की संदिग्ध परिस्थितियों में फाँसी के फंदे पर लाश लटकी मिली। प्रिया के परिवार ने NSUI नेता पर दहेज उत्पीड़न और हत्या का मामले में FIR दर्ज की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, घटना 31 मई 2026 की रात की है। प्रिया ने रात 12 बजे अपने पिता विनोद मिश्रा को फोन भी किया था लेकिन देररात होने के चलते वह फोन नहीं उठा सके। इसके बाद सुबह जब प्रिया के ससुराल से कॉल आया तो बेटी की मौत की खबर सुनने को मिली।

प्रिया मिश्रा के परिवार का आरोप

प्रिया के परिवार ने बेटी की मौत को खुदकुशी मानने से इनकार किया है। प्रिया के परिवार ने बताया कि शुरुआत में सबकुछ ठीक था, लेकिन कुछ समय बाद भरत व्यास और उसके घरवाले ज्यादा दहेज की डिमांड करने लगे। परिवार का कहना है कि कई बाद नकदी और ऑनलाइन माध्यम से पैसे भी दिए गएं, इसके बावजूद प्रिया को परेशान किया जाता रहा है।

परिजनों ने भरत व्यास और उसके घरवालों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न और हत्या का मुकदमा भी दर्ज करवाया है। पुलिस ने मामले की जाँच शुरू कर दी है। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है। पुलिस का कहना है कि हर पहलुओं से जाँच जारी है।

कॉन्ग्रेस की राजनीति में सक्रिय हैं भरत व्यास

NSUI नेता भरत व्यास और प्रिया की शादी 14 फरवरी 2025 को हुई थी। भरत व्यास राजनीति में काफी सक्रिय है। उसके कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी सहित पार्टी के तमाम नेताओं के साथ तस्वीर भी है। फेसबुक पर भी वे काफी एक्टिव हैं और आए दिन कॉन्ग्रेस समर्थित पोस्ट शेयर करते रहते हैं। भरत ने कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थन में भी पोस्ट किया हुआ है।

कॉन्ग्रेस नेता के कांड, नंबर वन पर नैना साहनी हत्याकांड

यह पहली बार नहीं है कॉन्ग्रेस के किसी युवा नेता का अपराध में नाम सामने आय़ा है। चर्चित नैना साहनी हत्याकांड, जिसे तंदूर कांड भी कहा जाता है, उसमें भी यूथ कॉन्ग्रेस का नेता ही शामिल था। यह कांड 1995 में दिल्ली में हुआ था।

इस मामले में मुख्य आरोपित सुशील शर्मा था, जो उस समय दिल्ली युवा कॉन्ग्रेस का बड़ा नेता माना जाता था। हत्या कर नैना को तंदूर की भट्ठी में झोंकने वाला उसका ही प्रेमी सुशील शर्मा था। दोनों लिव इन में रहते थे। कई लोगों का दावा है कि चुपचाप दोनों ने शादी भी कर रखी थ। सुशील यूथ कॉन्ग्रेस का उस समय उभरता हुआ नेता था। बताते हैं कि सीधे हाईकमान तक पहुॅंच थी उसकी।

सुशील के इस कारनामे की दुनिया को भनक भी नहीं लगती यदि 2 जुलाई 1995 की उस रात दिल्ली पुलिस के कॉन्स्टेबल अब्दुल नज़ीर कुंजू और होमगार्ड चंदर पाल गश्त पर ना होते। रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे। होटल अशोक यात्री निवास में स्थित बगिया रेस्टोरेंट से दोनों ने आग और धुआँ निकलता देखा। मौके पर पहुॅंचे तो बताया गया कि कॉन्ग्रेस पार्टी के पुराने बैनर पोस्टर जलाए जा रहे हैं। पर वे नहीं माने। पुलिस बुलाई। फायर ब्रिगेड को बुलाया गया और पता चला कि तंदूर में एक महिला की लाश जल रही है।

उस महिला की पहचान नैना साहनी के तौर पर हुई। नैना को घर में गोली मारने के बाद सुशील शर्मा जलाने के लिए लाया था। मामला खुलने के बाद सुशील ने पुलिस से बचे रहने के लिए अपने राजनीतिक संपर्कों का भरपूर इस्तेमाल किया। लेकिन, जनआक्रोश की वजह से उसे सरेंडर करना पड़ा और बाद में सजा भी हुई।