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मोहम्मद मुबारक ने बीमा का पैसा हड़पने के लिए अपनी मौत का रचा नाटक, सोनू को शराब पिलाकर गाड़ी में जिंदा जलाया: हाल में लोन और गाड़ी कराया था फाइनेंस, पुलिस ने दबोचा

उत्तर प्रदेश एक सहारनपुर में मोहम्मद मुबारिक ने कर्ज चुकाने से बचने के लिए अपनी मौत का नाटक रचा। उसने अपनी ही कद काठी के एक युवक सोनू को गाड़ी में शराब पिला कर जला दिया। इसके लिए उसने क्राइम पेट्रोल के एपिसोड को देख कर साजिश रची। पुलिस ने मुबारिक को गिरफ्तार कर लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सहारनपुर में हरियाणा के यमुनानगर से आकर रहने वाला युवक सोनू बीते कुछ दिनों से लापता था। उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट उसके मामा ने दी थी। वहीं सहारनपुर में पुलिस को एक जली हुई लाश गाड़ी के भीतर मिली। पुलिस ने इसके बाद इस मामले की जाँच चालू की तो इसका कनेक्शन यूनानी का डॉक्टर बताने वाले मुबारिक से निकला।

पुलिस ने मुबारिक से पूछताछ की तो पूरा मामला खुला। मुबारिक ने बताया कि उसने कुछ महीने पहले दो बाइक और एक कार फाइनेंस पर ली थी। इसके चलते उस पर लगभग लाखों का कर्ज हो गया था। उसने एक और व्यक्ति से भी ₹9 लाख जमीन दिलाने के नाम पर लिए।

मुबारिक ने ₹10 लाख बैंक से पर्सनल लोन के नाम पर लिए थे। अब उन्हें चुकाना इसके लिए मुश्किल हो रहा था। इसके बाद उसने सोचा कि यदि वह अपनी मौत दिखा दे तो एक लोन माफ़ हो जाएगा और साथ ही उसकी पत्नी को बीमा का पैसा भी मिला जाएगा जिससे लोन चुकाए जा सकेंगे। यह आईडिया उसे क्राइम पेट्रोल के एक एपिसोड से मिला था।

मुबारिक ने सोचा था था कि वह किसी लावारिस लाश को एक गाड़ी में जला कर अपनी मौत का नाटक रचेगा। इसके लिए उसने ₹26000 में एक मारुति 800 खरीदी थी। हालाँकि, मुबारिक को महीने भर तक लाश नहीं मिली। इसके बाद उसने अपने बहनोई की फैक्ट्री में काम करने वाले सोनू को निशाना बनाया।

उसने सोनू से पहले दोस्ती गांठी। इसके बाद उसे 22 दिसम्बर, 2024 को बुलाया। मुबारिक ने इसके बाद सोनू को शराब पिलाई। शराब में उसने दवाई मिला दी थी, जिसके चलते वह बेसुध हो गया। इसके बाद सहारनपुर के बिजोपुर में एक नहर के पास सूनसान जगह पर गाड़ी ले गया और उसमें आग लगा दी। इसके बाद वह गायब हो गया।

पुलिस को इसके बाद जब गाड़ी में जली लाश की सूचना मिली तो उसने जाँच चालू की। इसी बीच सोनू की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवाई गई। मुबारिक इसके एक-दो दिन बाद यह देखने पहुँचा कि सोनू सही से जला है या नही, तब उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस ने मुबारिक की इस घटना में संलिप्तता का पता उसके द्वारा खरीदी गई गाड़ी और CCTV के माध्यम से लगाया। मुबारिक वर्तमान में खुद को यूनानी डॉक्टर बता कर एक क्लीनिक चला रहा था। पुलिस इस मामले में अब आगे जाँच कर रही है।

प्रदीप सोलंकी बन मोहसिन ने हिंदू लड़की को फँसाया, रेप के बाद बनाया अश्लील वीडियो: ब्लैकमेल कर निकाह का बनाता था दबाव, दरगाह में हुई थी मुलाकात

मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में मोहसिन नाम के एक युवक ने प्रदीप सोलंकी बनकर जनजातीय समुदाय की हिन्दू लड़की को पहले अपने जाल में फँसा लिया। इसके बाद उससे रेप कर उसकी अश्लील वीडियो भी बनाई और इसके जरिए पीड़िता को ब्लैकमेल और पैसे की उगाही की। दोनों की जान-पहचान करवाने में पीड़िता की एक सहेली का भी हाथ बताया जा रहा है। पुलिस ने 28 दिसंबर को मामला दर्ज कर लिया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना खरगोन के कोतवाली नगर इलाके की है। यहाँ शनिवार को बेकरी में काम करने वाली 23 वर्षीया पीड़िता ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है। शिकायत में पीड़िता ने कहा कि लगभग 3 साल पहले उसकी सहेली सुनीता ने धार जिले के एक लड़के से उसकी बातचीत करवाई थी। सुनीता ने लड़के को हिन्दू बताया था। उस लड़के ने अपना परिचय प्रदीप सोलंकी के तौर पर दिया।

पहली बार दोनों की मुलाकात एक दरगाह में करवाई गई। पीड़िता की तबीयत ठीक नहीं रहती थी। तब उसकी सहेली उसको दरगाह लेकर जाती थी। कुछ दिनों की बातचीत में पीड़िता और प्रदीप एक दूसरे के करीब आ गए। प्रदीप बना मोहसिन पीड़िता के किराये वाले मकान पर आने-जाने लगा। उसने मौका देखकर पीड़िता से रेप किया और इसकी वीडियो भी बना ली।

इसी आपत्तिजनक वीडियो को दिखाकर उसने कई बार पीड़िता से रेप किया। इतना ही नहीं, वह पीड़िता से पैसे भी उगाही करने लगा। इसी बीच पीड़िता ने पता लगा लिया कि प्रदीप सोलंकी का वास्तव में मुस्लिम है और उसका नाम मोहसिन है। इसके दा पीड़िता ने उससे दूरी बनानी शुरू कर दी। आरोप है कि पीड़िता द्वारा दूरी बनाने की कोशिशों से मोहसिन भड़क गया।

मोहसिन आते-जाते पीड़िता को रोककर खुद से निकाह करने का दबाव बनाने लगा। इंकार करने पर वह पीड़िता का अश्लील वीडियो वायरल करने की धमकियाँ देता था। कोई रास्ता न देख कर पीड़िता ने मोहसिन के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवाने का फैसला किया। शनिवार को वह हिन्दू संगठनों के तमाम सदस्यों के साथ कोतवाली नगर थाने पहुँच गई।

पीड़िता के साथ मौजूद हिंदू संगठन के लोगों ने पुलिस से मोहसिन को लव जिहादी बताया और कड़ी कार्रवाई की माँग की। पुलिस ने मोहसिन के खिलाफ SC/ST एक्ट व मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2021 सहित अन्य धाराओं में दर्ज किया है। केस दर्ज होते ही मोहसिन फरार हो गया है, जिसकी तलाश में पुलिस दबिश दे रही है। मोहसिन के साथ इसी केस में पीड़िता की सहेली सुनीता भी नामजद है।

400 से अधिक किताबें लिखीं, 80 करोड़ की संपत्ति: वाराणसी के साहित्यकार का वृद्धाश्रम में निधन, मुखाग्नि देने भी नहीं आए प्रोफेशनल बेटा-बेटी, दूसरे लोगों ने किया अंतिम संस्कार

वाराणसी के मशहूर साहित्यकार श्रीनाथ खंडेलवाल का जीवन किसी उपन्यास की करुण कहानी जैसा बन गया। 400 से अधिक किताबें लिखने वाले और 80 करोड़ की संपत्ति के मालिक खंडेलवाल का शनिवार (28 दिसंबर 2024) को निधन हो गया। यह विडंबना ही है कि जिन्होंने अपनी लेखनी से हजारों दिलों को छुआ, उन महान साहित्यकार का जीवन उनके ही बेटे-बेटी की बेरुखी के कारण वृद्धाश्रम में खत्म हुआ, क्योंकि वो अपनी अंतिम साँसें एक वृद्धाश्रम में अकेले गिन रहे थे।

श्रीनाथ खंडेलवाल का जीवन कभी वैभवशाली था। श्रीनाथ खंडेलवाल ने अपनी लेखनी से भारतीय साहित्य को समृद्ध किया। उन्होंने शिव पुराण और मत्स्य पुराण जैसे अनमोल ग्रंथों का हिंदी अनुवाद किया। उनकी लिखी 3000 पन्नों की मत्स्य पुराण की रचना आज भी विद्वानों के बीच चर्चित है। उन्होंने न केवल धार्मिक ग्रंथों पर काम किया, बल्कि आधुनिक साहित्य और इतिहास पर भी कई किताबें लिखीं। उनकी पुस्तकें हिंदी, संस्कृत, असमिया और बांग्ला जैसी भाषाओं में उपलब्ध हैं। जीवन के अंतिम दिनों में वे नरसिंह पुराण का अनुवाद पूरा करना चाहते थे, लेकिन उनकी यह अंतिम इच्छा अधूरी रह गई। यही नहीं, उन्होंने अपने जिस बेटे-बेटी पर अपनी जिंदगी निछावर कर दी, उन्होंने ही उन्हें घर से निकाल दिया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 17 मार्च 2024 को उनके बेटे-बेटी ने उन्हें घर से निकाल दिया था, जिसके बाद से वो काशी कुष्ठ सेवा संघ के वृद्धाश्रम में रह रहे थे। कुछ महीने पहले उनका एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने अपनी दर्द भरी दास्तान साझा की थी। उन्होंने कहा था, “मैंने अपनी पूरी जिंदगी अपने बच्चों के लिए लगाई, लेकिन अब वे मेरे लिए अजनबी बन गए हैं। मेरे पास सब कुछ था, लेकिन आज मैं अकेला हूँ।”

साहित्य के प्रति उनका समर्पण अद्वितीय था। मात्र 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने लेखन शुरू किया और अपने जीवन को पूरी तरह से साहित्य के लिए समर्पित कर दिया। लेकिन विडंबना देखिए, जिनके शब्दों ने समाज को दिशा दी, उनके ही बच्चे उन्हें अपने घर में जगह नहीं दे सके। उनका बेटा एक व्यवसायी है और बेटी सुप्रीम कोर्ट में वकील, लेकिन उन्हों ने अपने पिता से मुँह मोड़ लिया। 80 करोड़ की संपत्ति के मालिक श्रीनाथ खंडेलवाल को वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर होना पड़ा। शनिवार सुबह जब उनकी हालत बिगड़ी, तो अस्पताल से परिजनों को सूचित किया गया। लेकिन बेटा ‘बाहर’ होने का बहाना बनाकर नहीं आया, और बेटी ने फोन तक नहीं उठाया।

आखिरकार सामाजिक कार्यकर्ता अमन कबीर और उनके साथी रमेश श्रीवास्तव, आलोक और शैलेंद्र दुबे ने उनकी जिम्मेदारी ली। अमन और उनके साथियों ने उनके शव को मणिकर्णिका घाट तक पहुँचाया और विधि-विधान के साथ अंतिम संस्कार किया। अमन ने कहा, “काश, उनकी संतान ने यह देखा होता कि एक समय जो उनके लिए पहाड़ सा खड़ा था, उसे हमने कंधों पर उठाया।” अमन कबीर ने ही उन्हें वृद्धाश्रम में भी रखवाया था, ऐसे में डॉक्टरों ने उनसे संपर्क किया और वो साथियों समेत आगे आए।

श्रीनाथ खंडेलवाल की रचनाएँ आज भी हमें प्रेरणा देती हैं, लेकिन उनका जीवन हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर क्यों समाज में माता-पिता को उनके ही बच्चों के द्वारा इस तरह त्याग दिया जाता है। काशी ने एक महान साहित्यकार को खो दिया, लेकिन उनकी दर्दभरी कहानी हर दिल को झकझोरने के लिए काफी है। ऐसे में काशी में हर किसी की जुबान पर अब यही सवाल है-क्या ऐसी संतानों को ‘संपत्ति’ के लिए अपने माता-पिता को त्यागने का अधिकार है?

काफिर किसी मुस्लिम की विरासत का हकदार नहीं: लाहौर कोर्ट ने शरिया के हवाले से दिया फैसला, हिन्दू-सिख या अहमदिया नहीं पा सकता मुस्लिम की सम्पत्ति

पाकिस्तान के लाहौर हाई कोर्ट ने फैसला दिया है कि किसी मुस्लिम की सम्पत्ति का वारिस गैर-मुस्लिम नहीं हो सकता। लाहौर हाई कोर्ट के इस फैसले का अर्थ है कि पाकिस्तान में कोई हिन्दू-सिख या फिर किसी अन्य धर्म का अनुयायी मुस्लिम व्यक्ति की सम्पत्ति विरासत में नहीं पा सकता। हाई कोर्ट ने यह फैसला शरिया के हवाले से दिया है।

लाहौर हाई कोर्ट ने एक सम्पत्ति की विरासत मामले में डाली गई याचिका की सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया। लाहौर हाई कोर्ट ने एक हदीस की किताब सहीह मुस्लिम का हवाला दिया जिसमें कहा गया, “एक मुसलमान को काफिर से विरासत नहीं मिलती और एक काफिर को मुसलमान से विरासत नहीं मिलती।”

यह मामला पाकिस्तान के टोबा टेक सिंह जिले के एक सम्पत्ति विवाद से जुड़ा हुआ था। यहाँ रहने वाले एक मुस्लिम शख्स की सम्पत्ति उसके तीन बेटों और दो बेटियों में मौत के बाद बराबर बाँट दी गई थी। हालाँकि, इस बँटवारे को मृतक के पोते ने कोर्ट में चुनौती दी।

पोते ने कोर्ट में दावा किया कि उसका एक चाचा/मामा असल में मुस्लिम ना होकर अहमदिया समुदाय है और वह ऐसे में सम्पत्ति का हिस्सा पाने का हकदार नहीं है। पोते ने कोर्ट से माँग की थी कि उसके चाचा/मामा को दी गई सम्पत्ति की विरासत रद्द कर दी जाए।

इस मामले में निचली अदालत ने पोते के हक़ में फैसला दिया था और अहमदी होने के चलते उसके चाचा/मामा से सम्पत्ति वापस ले ली थी। हालाँकि, इस फैसले को लाहौर हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। हाई कोर्ट ने इस फैसले को बरकरार रखा और सम्पत्ति का वारिस उसे मानने से इनकार कर दिया।

लाहौर हाई कोर्ट ने कहा कि सम्पत्ति पाने वाले शख्स ने यह माना है कि वह अहमदिया है लेकिन उसने अपने पिता की सम्पत्ति पाते वक्त यह बात छुपाई। ऐसे में उसे सम्पत्ति का वारिस घोषित नहीं किया जा सकता। लाहौर हाई कोर्ट ने इस मामले में पुराने कानूनों और मुस्लिम पर्सनल लॉ का हवाला भी दिया।

गौरतलब है कि अहमदिया समुदाय को कई संवैधानिक अधिकारों से वंचित रखा गया है और उन्हें मुस्लिम का दर्जा नहीं दिया जाता। उनको मस्जिदों में जाने और कुरान पढ़ने का अधिकार नहीं है । अहमदिया समुदाय पर पाकिस्तान में लगातार हमले भी होते हैं।

लाहौर हाई कोर्ट के इस फैसले का असर पाकिस्तान में ऐसे बाकी मामलों पर पड़ेगा। इसका अर्थ है कि अब पाकिस्तान में कोई भी हिन्दू-सिख या गैर मुस्लिम किसी मुस्लिम की सम्पत्ति विरासत में नहीं पा सकेगा।

अन्ना यूनिवर्सिटी में छात्रा से रेप, तमिलनाडु पुलिस ने पीड़िता पर ही मढ़ दिया दोष: मद्रास हाई कोर्ट ने FIR लीक होने पर DMK सरकार को लताड़ा, जाँच के लिए SIT बनाने का आदेश

चेन्नई के अन्ना यूनिवर्सिटी में हाल ही में 19 वर्षीय छात्रा के साथ हुए रेप के मामले में मद्रास हाई कोर्ट ने राज्य की DMK सरकार को लताड़ा है। हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि पीड़िता को ₹25 लाख मुआवजा दिया जाए और घटना की जाँच के लिए एक SIT गठित की जाए। इस मामले में राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी एक जाँच टीम बनाई है।

मद्रास हाई कोर्ट ने अन्ना यूनिवर्सिटी रेप मामले में दायर याचिकाओं की सुनवाई शनिवार (28 दिसम्बर, 2024) को सुनवाई की। इस दौरान हाई कोर्ट ने रेप की FIR के लीक होने को लेकर सवाल खड़े किए। हाई कोर्ट ने कहा कि यह FIR लीक होने के चलते पीड़िता मानसिक तौर पर प्रताड़ित हुई।

हाई कोर्ट ने FIR में घटना को लेकर लिखी गई भाषा को लेकर भी पुलिस को लताड़ लगाई। उसने पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा कि उन्होंने पीड़ित पर ही सारा दोष मढ़ दिया है। हाई कोर्ट ने कहा कि यह विक्टिम ब्लेमिंग का एक उदाहरण है। कोर्ट ने कहा कि FIR की भाषा के चलते पीड़िता की गरिमा को ठेस पहुँची।

मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि पीड़िता को ही FIR में ब्लेम किया जाना महिलाविरोधी था और जब संविधान पुरुष और महिला में अंतर नहीं रखता तब समाज को महिलाओं को नीचा दिखाने के शर्मिन्दा होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की आलोचना समाज की गलती थी।

हाई कोर्ट ने कहा कि मामले में लापरवाही के चलते पीड़िता को संविधान में अनुच्छेद 21 में दिए गए अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। ऐसे में उसको ₹25 लाख का मुआवजा राज्य सरकार दे। हाई कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि पीड़िता और उसके परिजनों को पुलिस सुरक्षा प्रदान की जाए और साथ ही तीन IPS अधिकारियों की एक SIT बनाई जाए।

वहीं DMK सरकार ने FIR लीक में अपनी गलती मानने से मना किया और भारतीय दंड संहिता (IPC) से भारतीय न्याय संहिता (BNS) में व्यवस्था के बदलाव को गड़बड़ी का कारण बताया। इसे कोर्ट ने स्वीकार करने से मना कर दिया। कोर्ट ने कहा कि कानूनों में बदलाव जुलाई में हुआ था और यह गड़बड़ी अब हुई।

DMK सरकार ने इसके बाद खुद को बचाने के लिए उन लोगों को कठघरे में खड़ा किया, जिन्होंने यह FIR पुलिस की वेबसाइट से एक्सेस की थी। DMK सरकार ने कहा कि पुलिस और राज्य की जिम्मेदारी एक तरफ है, लेकिन मीडिया और नागरिकों को भी ध्यान रखना चाहिए था।

मद्रास हाई कोर्ट के अलावा राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी इस मामले का संज्ञान ले लिया है। आयोग ने इस संबंध में एक दो सदस्यीय कमिटी का गठन किया है। कमिटी में महाराष्ट्र के पूर्व DGP प्रवीण दीक्षित और महिला आयोग की सदस्य ममता कुमारी हैं। माहिला आयोग की यह कमिटी सोमवार (30 दिसम्बर, 2024) को जाँच के लिए तमिलनाडु जाएगी।

यह कमिटी पीड़िता और उसके परिवार से मिलेगी। इसके अलावा यह पीड़िता दोस्तों और पुलिस से भी मुलाक़ात करेगी। गौरतलब है कि चेन्नई स्थित अन्ना यूनिवर्सिटी में 23 दिसम्बर, 2024 को इंजीनियरिंग की एक 19 वर्षीय छात्रा से एक ठेले वाले ने रेप किया।

अपने दोस्त से मिलने गई एक लड़की का उसने पहले वीडियो बनाया और फिर उसके दोस्त को मारपीट कर भगा दिया। इसके बाद उसके साथ रेप किया और फोन नम्बर लेकर कहा कि जब जहाँ बुलाए वहाँ वह लड़की आ जाए। लड़की ने जब इस घटना की रिपोर्ट दर्ज करवाई तब यह मामला खुला।

घटना का आरोपित ज्ञानशेखरन गिरफ्तार कर लिया गया है। 37 वर्षीय ज्ञानशेखरन कैम्पस में ही बिरयानी बेचता है। भाजपा ने आरोप लगाया कि ज्ञानशेखरन सत्ताधारी DMK का पदाधिकारी है। उसकी तस्वीरें भी DMK के बड़े नेताओं के साथ मौजूद हैं।

बदले का ऐलान कर पाकिस्तानी सीमा में घुसे तालिबानी, मार गिराए 19 फौजी: अंग्रेजों की खींची डूरंड लाइन को भी सीमा मानने से किया इनकार

अफगानिस्तान में तालिबान शासन ने शनिवार (27 दिसंबर 2024) को पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों पर बड़े हमले किए, जिसमें अब तक 19 पाकिस्तानी फौजियों के मारे जाने की खबर है। तालिबान ने यह हमला पाकिस्तान द्वारा 26 दिसंबर को अफगान सीमा पर की गई बमबारी के जवाब में किया है। पाकिस्तानी हमलों में अफगानिस्तान के 46 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें कई बच्चे भी शामिल थे। अपने एक आधिकारिक बयान में तालिबान ने खुल कर पाकिस्तान का नाम तो नहीं लिया लेकिन इशारों में परोक्ष तौर पर बताया कि उन्होंने सीमा पार हमले किए हैं।

अल जजीरा के मुताबिक, अफगानिस्तान के प्रवक्ता ने कथित ‘काल्पनिक रेखा’ (डूरंड लाइन) पर हमले की बात कबूली है। काल्पनिक रेखा नाम का यह शब्द अफगानिस्तान के अधिकारियों द्वारा उस बॉर्डर से संबंधित है जिसका विवाद पाकिस्तान से चल रहा है। तालिबान ने इन हमलों को सही ठहराते हुए कहा कि यह उनकी रक्षा और अफगान विरोधी ताकतों को खत्म करने के लिए जरूरी था।

तालिबान के प्रवक्ता इनायतुल्लाह खोवाराज़मी ने बयान देते हुए कहा, “हम इसे पाकिस्तान का क्षेत्र नहीं मानते। यह हमारी सैन्य कार्रवाई का हिस्सा था।” तालिबान डूरंड लाइन को काल्पनिक रेखा मानता है, जिसे 19वीं सदी में अंग्रेजों ने खींचा था। यह सीमा अफगानिस्तान और पाकिस्तान को अलग करती है, लेकिन तालिबान इसे कभी स्वीकार नहीं करता।

तालिबान ने कहा कि उनकी सैन्य कार्रवाई 26 दिसंबर को उनके इलाकों में पाकिस्तान की तरफ से की गई बमबारी का जवाब है। अफगानिस्तान के अधिकारियों का दावा है कि सीमा के उस पार बने ठिकानों पर कार्रवाई जरूरी थी क्योंकि ये अफगान विरोधी ताकतों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे थे। पाकिस्तानी फ़ौज के इन हमलों में अफगानिस्तान के 46 लोगों की मौत हुई थी।

पाकिस्तान ने साधी चुप्पी

इन हमलों में अब तक 19 पाकिस्तानी फौजियों की मौत का दावा किया जा रहा है। हालाँकि आधिकारिक आँकड़े अभी आना बाकी हैं। तालिबान की इस कार्रवाई के बाद पाकिस्तान की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है। गौरतलब है कि डूरंड लाइन को लेकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच दशकों से विवाद जारी है।

तालिबान इसे मानने से इंकार करता है, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। तालिबान का कहना है कि डूरंड लाइन के उस पार के क्षेत्र को वह पाकिस्तान का हिस्सा नहीं मानता। बहरहाल, यह हमला सीमा विवाद को और गहरा कर सकता है और अफगानिस्तान-पाकिस्तान संबंधों में नई मुश्किलें खड़ी कर सकता है।

महिला कैदियों को हर महीने मिलेगा हेयर रिमूवर क्रीम, सप्ताह में एक बार शैंपू: मध्य प्रदेश की जेलों में बंद कैदियों की सुविधाओं में वृद्धि, खाने के साथ अब ले सकेंगे सलाद का मजा

मध्य प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद महिला कैदियों को नए साल से मिलने वाली सुविधाओं में बढ़ोतरी होने जा रही है। बुधवार (1 जनवरी 2025) से उन्हें हर माह हेयर रिमूवल क्रीम और सप्ताह में एक बार शैम्पू दिया जाएगा। इस बदलाव के पीछे की मंशा साफ़-सफाई को बढ़ावा देने की है। इसके अलावा सभी कैदियों को खाने में सलाद भी मिलेगा। उनके चाय, दूध, तेल और दाल की मात्रा भी बढ़ाई जाएगी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मध्य प्रदेश के जेल मैन्युअल में कई बदलाव किए गए हैं। ये परिवर्तन एमपी करेक्शनल सर्विसेज एंड प्रिज़न्स एक्ट 2024 के तहत हुए हैं। नियमों में यह बदलाव 2024 की गाँधी जयंती यानी 2 अक्टूबर को होना था। तब कुछ जरूरी चीजें छूट गई थीं। साफ़-सफाई और सेहत के अलावा कोशिश इस बात की भी जारी है कि जेलों में कैदियों की भीड़ को कम किया जाए।

बताते चलें कि 36,000 कैदियों की कुल क्षमता वाले मध्य प्रदेश की जेलों में फिलहाल 43,000 कैदी बंद हैं। इनमें महिलाओं की संख्या लगभग 1,900 है। नए नियमों के अनुसार जेलों में सुरक्षा आदि के लिए तकनीकी सिस्टम को और बेहतर और प्रशासनिक कामों को डिजिटल बनाया जाएगा। जेलों में तैनात कर्मचारियों और अधिकारियों को कैदियों से अच्छे व्यवहार की भी ट्रेनिंग दी जाएगी।

सभी सेन्ट्रल व जिला जेलों के साथ ‘करेक्शनल इंस्टीट्यूशन’ शब्द भी जोड़ा जाएगा, जिसे हिंदी में ‘सुधार स्थल’ कहा जाता है। जेलरों को समय-समय पर जेल की तलाशी और छापेमारी के निर्देश दिए गए हैं। हाईरिस्क वाले कैदियों के पास एडवांस जैमर लगेंगे। वहीं, कैदियों की इलाज के लिए अस्पतालों की संख्या में बढ़ोतरी की जाएगी।

नाबालिग लड़की से रेप के बाद पैदा हुआ बच्चा: कोर्ट ने देखभाल के लिए आरोपित को दी बेल, कहा- बाल आश्रय में पलने वाले शिशु का क्या दोष? देना होगा ₹10000 महीना

दिल्ली की एक अदालत ने नाबालिग से रेप के मामले में 22 वर्षीय एक आरोपित को अग्रिम जमानत दे दी है। अदालत ने आरोपित और पीड़िता से जन्मे 5 माह के बच्चे के भरण-पोषण को पहली प्राथमिकता माना है। बच्चा फिलहाल सरिता विहार के आश्रय गृह में है। उसके पिता को बच्चे के लिए 10,000 रुपए प्रतिमाह देने और 2 लाख रुपए की FD (फिक्स डिपॉजिट) भी करवाने का आदेश दिया है।

न्यायालय ने न सिर्फ आरोपित व्यक्ति, बल्कि पीड़िता पर भी नाराजगी दिखाई और कहा कि दोनों में से कोई भी बच्चे के लिए चिंतित नहीं था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामले की सुनवाई साकेत कोर्ट में न्यायाधीश अनु अग्रवाल ने की। यहाँ नाबालिग लड़की से रेप के आरोपित एक व्यक्ति द्वारा 29 अगस्त 2024 को अग्रिम जमानत की अर्जी दाखिल की गई थी।

उस समय आरोपित ने खुद को पीड़िता से शादी करने के लिए तैयार बताया था और इसी आधार पर जमानत की माँग की थी। दोनों पक्षों ने 5 माह के अपने बच्चे को साथ रखने की इच्छा नहीं जताई थी। यह बच्चा फिलहाल दिल्ली के सरिता विहार स्थित आश्रय गृह में है। जब अदालत ने दोनों पक्षों से बच्चे के भविष्य को लेकर सवाल किया तब उन्होंने उसे अपने पास रखने की हामी भरी।

आरोपित द्वारा पीड़िता से शादी करने के लिए भरी गई हामी पर न्यायालय ने कहा कि इससे लगता है कि दोनों के बीच संबंध सहमति से बने होंगे। कोर्ट ने आगे कहा कि शिकायतकर्ता ने आरोपित को अपनी कितनी उम्र बताई थी, ये ट्रायल का विषय है। पीड़िता से अदालत ने कहा कि इस केस में दूसरा पीड़ित वो बच्चा है, जिसका कोई दोष नहीं है।

अदालत ने बाल कल्याण गृह को बच्चे के नाम से अलग खाता खोलने का आदेश दिया गया। बच्चे के पिता को हर माह उस खाते में 10,000 रुपए पालन-पोषण के लिए जमा करने होंगे। बाल कल्याण गृह को भी निर्देश दिया कि खाते में से कोई भी पैसा निकालने से पहले कोर्ट की अनुमति ली जाए। प्रभारी को एम्स से बच्चे का स्वास्थ्य जाँच करवाकर 15 दिन में रिपोर्ट देने का आदेश दिया है।

मनमोहन सिंह के समय ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ = मंत्री बनाने-हटाने वाले + मुफ्त विदेश यात्रा करने वाले एलीट पत्रकारों का इकोसिस्टम: जनता से संवाद का वो स्वर्णकाल नहीं था लुटियन ठेकेदारों

पूर्व पीएम डॉक्टर मनमोहन सिंह नहीं रहे। ईश्वर उनकी आत्मा को सद्गति दें। उनके जाने के बाद कमोबेश हर तबका उन्हें अच्छे शब्दों में याद कर रहा है, जो डॉक्टर साहब के सौहार्द्रपूर्ण व्यक्तित्व के लिए उचित भी है। मनमोहन सिंह को याद करने वाले पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्ट किस्म के लोगों के शोक संदेश में एक खास पैटर्न देखने को मिला है।

जैसे कि ‘हमने मनमोहन सिंह को JNU में काले झंडे दिखाए थे, हम उनके साथ विदेश यात्रा पर गए, संसद की कैंटीन या किसी पार्टी में चाय पर मिले, वे रेगुलर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते थे, हमारे मुश्किल सवाल पर सिंह साहब नाराज नहीं हुए’ वगैरह-वगैरह।

इसका निष्कर्ष यह निकाला जाता है कि मनमोहन सिंह अभिव्यक्ति की आजादी के बहुत बड़े पैरोकार थे, लेकिन क्या यह वाकई अभिव्यक्ति की आजादी थी? या फिर यह बड़े मीडिया संस्थान के गिने-चुने पत्रकारों और राजधानी के खास एक्टिविस्टों को मिलने वाली टोकन छूट थी? 

क्या JNU की जगह पटना यूनिवर्सिटी में बिहार के किसी मंत्री को काले झंडे दिखाकर छात्र बच सकते थे? क्या गाँव का आम आदमी अपने प्रधान या तहसीलदार से मुश्किल सवाल पूछ कर बिना पिटे घर लौट सकता था? सबका जवाब ‘नहीं’ ही है।

पीएम को काले झंडे दिखाने वाले गिरफ्तार नहीं हुए, क्योंकि उनके साथ JNU की लिगेसी जुड़ी थी और दुलारे पत्रकारों के साथ उनके बड़े मीडिया संस्थानों की लेगसी जुड़ी थी। यही लेगेसी और एलीटिज्म उन्हें टोकन छूट दिलाती थी, जिसे उन्होंने ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम से प्रचारित किया।

साल 2004 से 2014 के बीच अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ‘टोकन छूट’ वाला स्वर्णकाल था, जिसमें सरकार एलीट लेगेसी के सामने नतमस्तक होती रही। जहाँ बड़े पत्रकार शराब के नशे में मंत्री बनाने-हटाने का दावा करते थे। लाखों करोड़ का घोटाला करने वाले मंत्रियों से साथ उनकी गलबहियाँ होती थी। उनसे नीचे वाले पीएम के साथ सरकारी खर्चे पर विदेश यात्रा जाते थे।

उनसे भी नीचे वाले सरकारी खर्चे से चलने वाली सभाओं-गोष्ठियों में गाल बजाते थे। कुल मिलाकर एलीट पत्रकारों-बुद्धिजीवियों का पूरा इकोसिस्टम तैयार था, जो नेताओं के लिए सेफ्टी वॉल्व की तरह काम करते थे और बदले में संचारतंत्र पर एकाधिकार पाते थे। रवीश कुमार जैसे पत्रकारों ने इसी टोकन छूट की बदौलत अहंकारपूर्ण जुमले गढ़े कि ‘डरा हुआ पत्रकार मरा हुआ लोकतंत्र पैदा करता है’।

हालाँकि, पत्रकार और नेता दोनों लोकतंत्र की पैदाइश हैं, जिसका बीजारोपण जनता करती है। लेकिन, बड़े नेताओं की सोहबत से मिलने वाली छूट एलीट पत्रकारों को लोकतंत्र का ‘बाप’ होने का एहसास कराती रही। यह बिल्कुल ऐसा ही है, जैसे मस्जिद की मुंडेर पर बैठा कौआ खुद को मुअज्जन समझने लगे।

इमरजेंसी काल के बाद भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ठेकेदार पैदा हुए, जो अभिव्यक्ति की आजादी का दोहन करते हुए जनता के नाम पर बेलगाम हरकतें करते। हालाँकि, इस टोकन आजादी का एक कतरा भी आम जनता तक नहीं पहुँच पाता था। लुटियन दिल्ली से मिलने वाली टोकन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लुटियन के पत्रकारों और एक्टिविस्टों में ही बँट कर खत्म हो जाती थी। साल 2004 से 2014 के बीच दिल्ली के मुठ्ठी भर लोगों की अभिव्यक्ति ही पूरे देश की अभिव्यक्ति मान ली गई।

इस मामले में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यकाल अलग नजर आता है। 2014 में प्रधानमंत्री बनने के साथ ही उन्होंने सबसे पहले इन ठेकेदारों को किनारे किया। उन्होंने मन की बात, सोशल मीडिया और मास रैलियों के माध्यम से सीधे आम जनता से संपर्क किया। मीडिया एजुकेशन में इसे ही ‘मास लाइन कम्युनिकेशन’ कहते हैं। नरेंद्र मोदी से पहले महात्मा गाँधी और चीनी क्रांति के नेता माओ इस ‘मास लाइन कम्युनिकेशन’ का सफल प्रयोग कर चुके थे।

दूसरी ओर, मनमोहन सिंह अपने कार्यकाल में दिल्ली के कुछ दर्जन चुने हुए पत्रकारों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करते थे। उन्हें अपनी यात्राओं पर साथ ले जाते थे। डॉक्टर मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की संवाद शैली में सबसे बड़ा अंतर यही है। मनमोहन सिंह जनता तक अपनी बात पहुँचाने के लिए एलीट पत्रकारों को माध्यम बनाते थे। नरेंद्र मोदी सीधे जनता से संवाद करते हैं।

पीएम मोदी ने पत्रकारों की ‘गेट कीपिंग’ यानी मध्यस्थता को खत्म कर दिया। शायद यही कारण है कि एलीट पत्रकारों के लिए मनमोहन सिंह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के चैंपियन हैं और नरेंद्र मोदी ‘तानाशाह’। हालाँकि संचारशास्त्र की थोड़ी-बहुत जानकारी रखने वाला शख्स भी यह आसानी से समझ सकता है कि नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत की आम जनता संवाद के मामले में अधिक सबल और स्वतंत्र हुई है।

अब उसे अपनी बात रखने के लिए किसी मार्फत की जरूरत नहीं। हाँ, इस दौरान एलीट पत्रकारों को मिलने वाली विशेष सुविधाएँ जरूर कम हुई हैं। उनकी विदेश यात्राएँ, सस्ते दर पर मिलने वाले फ्लैट और प्लॉट भी नहीं मिल रहे। इस सिलसिले में बड़े यूट्यूबर्स, जो मनमोहन सिंह के जमाने में टीवी एंकर हुआ करते थे, उनके गुस्से का कारण आसानी से समझा जा सकता है।

मीडिया शिक्षण संस्थानों में सामान्यतः प्रेस के 4 सिद्धांत अथवा सिस्टम पढ़ाए जाते हैं, लेकिन इन 4 सिद्धांतों में मीडिया का लोकतांत्रीकरण सिद्धांत शामिल नहीं होता। यह सिद्धांत मीडिया की जगह आम जनता के हाथ में संचार के माध्यमों को सौंपने की बात कहती है। यह सिद्धांत मीडिया के ब्यूरोक्रेसी और प्रोड्यूसर कंट्रोल की निंदा करती है।

इस सिंद्धांत के अंतर्गत छोटे चौपाल, चर्चा समूह, कम्युनिटी रेडियो वगैरह को तरजीह दी जाती है। लैटीन अमेरिकी मीडिया रिसर्चर पाउलो फ्रेइरे ने अपनी रिसर्च में साबित किया है कि भारत जैसे विकासशील देशों में मीडिया को लोकतांत्रीकरण सिद्धांत का पालन करना चाहिए। हालाँकि, भारत का एलीट मीडिया हमेशा ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम पर संचार माध्यमों पर अपने एकाधिकार के लिए लड़ता रहा।

बड़े मीडिया टायकूंस, संपादक, बुद्धिजीवी और पूँजीपति नहीं चाहते कि आम जनता के हाथ में मीडियम की पहुँच हो। वे हमेशा से जनता को संचारतंत्र के ग्राहक के रूप में देखना चाहते हैं, ताकि उनका व्यापार और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का शगूफा चलता रहे।

पुनः अपने प्रारंभिक सवाल पर लौटते हैं। क्या वाकई मनमोहन सिंह जी का कार्यकाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का स्वर्णकाल था? मेरी राय में ऐसा बिल्कुल भी नहीं था। जो लोग भी मनमोहन सिंह साहब को श्रद्धांजलि देते हुए ऐसा लिख रहे हैं, वह उनके अधिकारों का स्वर्णकाल जरूर हो सकता है। यह दौर हमेशा मीडिया मोनोपॉली और एलीट पत्रकारों को मिलने वाली टोकन छूट के रूप में याद रखा जाएगा।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस मॉडल ने नीरा वाडिया जैसे लॉबिस्ट-बचौलियों को फायदा पहुँचाया। बाकी एक प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री और RBI गवर्नर के रूप में सेवाओं के लिए राष्ट्र डॉक्टर मनमोहन सिंह का आभारी रहेगा। खासतौर से उनकी वाणी की सौम्यता और उनका सौहार्द्रपूर्ण व्यक्तित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत होंगे।

‘मोहना’ के निधन से गाह के लोग भी दुखी: पाकिस्तान में मनमोहन सिंह के पैतृक गाँव से जुड़े वो किस्से, जिन्हें याद कर रहे हैं स्थानीय लोग

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह पंचतत्व में विलीन हो गए। उन्हें दिल्ली में अंतिम विदाई दी गई। उनके सम्मान में देश में 7 दिनों का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया है। लोग उन्हें तमाम तरीकों से याद कर रहे हैं। ऐसे में हम उनके बचपन, स्कूल, गाँव की कहानी आप तक पहुँचा रहे हैं।

डॉ. मनमोहन सिंह का जीवन संघर्ष और सफलता की प्रेरणादायक कहानी है। उनका जन्म 26 सितंबर 1932 को ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत के गाह गाँव में हुआ था, जो अब पाकिस्तान के चकवाल (पहले झेलम) जिले में स्थित है। साधारण परिवार में जन्मे मनमोहन सिंह को उनके दोस्त, घरवाले प्यार से ‘मोहना’ नाम से बुलाया करते थे। वो बचपन से ही पढ़ाई के प्रति गंभीर और मेहनती थे। उनके पिता गुरमुख सिंह कपड़े के व्यापारी थे और माता अमृत कौर गृहिणी थीं।

डॉ. सिंह ने अपनी प्राथमिक शिक्षा गाह गाँव के प्राथमिक स्कूल से शुरू की। मिट्टी के तेल के चिराग की रोशनी में पढ़ाई करते हुए उन्होंने अपने शिक्षक दौलत राम और हेडमास्टर अब्दुल करीम की सीखों को आत्मसात किया। उनके बचपन के मित्र शाह वली और गुलाम मोहम्मद खान बताते हैं कि मोहना पढ़ाई में अव्वल था और हमेशा दूसरों की मदद करता था। शाह वली ने एक इंटरव्यू में बताया था कि मोहना कक्षा का मॉनिटर था और अध्यापकों का प्रिय था। चौथी कक्षा तक पढ़ाई के बाद उनका परिवार चकवाल चला गया। विभाजन के समय, उनका परिवार भारत आकर अमृतसर में बस गया।

स्कूल में डॉ मनमोहन सिंह का रजिस्ट्रेशन नंबर – 187 था (फोटो साभार: X_kaamyabi)

डॉ. सिंह ने अपने पैतृक गाँव गाह के विकास के लिए हमेशा योगदान दिया। वो अपने मित्रों से भी जुड़े थे, भले ही वो कभी लौटकर गाह गाँव नहीं गए। उन्होंने अपने पुराने मित्र से दिल्ली में भेंट भी की थी। दरअसल, उनके बुलाने पर गाह गाँव के उनके पुराने मित्र राजा मोहम्मद अली साल 2008 में दिल्ली आए थे, तब वो प्रधानमंत्री थे। राजा अली ने डॉ. सिंह के लिए चकवाल की मशहूर जूती, शॉल, मिट्टी और पानी भेंट में दिया। बदले में डॉ. सिंह ने उन्हें पगड़ी, शॉल और घड़ी उपहार में दी। राजा अली की साल 2010 में मौत हो गई थी।

राजा मोहम्मद अली ने उस मुलाकात को याद करते हुए बताया था कि डॉ. सिंह का स्वभाव विनम्र और स्नेहपूर्ण था। मुलाकात के दौरान उन्होंने अपने बचपन की कई यादें साझा कीं। उन्होंने पाकिस्तान में अपने पैतृक गाँव भी आने का आमंत्रण स्वीकार किया था। इस मुलाकात के बारे में बताते हुए राजा अली ने कहा था कि मोहना को अपने गाँव की बहुत चिंता थी। इस मुलाकात के बाद उन्होंने गाह गाँव के विकास के लिए पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ से बात की। उन्होंने कहा कि गाँव को एक मॉडल गाँव के रूप में विकसित किया जाए।

गाह गाँव में डॉ मनमोहन सिंह के दूसरे दोस्त इंतजार कर रहे थे कि कब वह पाकिस्तान का दौरा करें और वह उनसे मिलें क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान आने की दावत तो कबूल कर ली थी, मगर किसी वजह से वह जा न सके। उन्हें ‘मोहना’ के आने की उम्मीद इसलिए भी थी कि मनमोहन सिंह की पत्नी गुरशरण सिंह का परिवार भी विभाजन से पहले पंजाब के ज़िला झेलम के गाँव ढक्कू में रहता था।

गाँव के हेडमास्टर गुलाम मुस्तफा ने कहा था कि डॉ. सिंह का योगदान गाँव को अंधेरे से उजाले में लाने जैसा है। डॉ. सिंह के निधन के बाद, गाँव में एक सभा आयोजित की गई, जहाँ लोगों ने उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। शिक्षक गुलाम मुस्तफा ने कहा, “मोहना के जाने के बाद, हम चाहते हैं कि उनकी पत्नी या उनके बच्चे कम से कम एक बार उनके पैतृक गाँव आएँ। यह उनकी जड़ों से जुड़ने का एक तरीका होगा।”

पत्रकार दानियल कुबलई खान ने 2012 में पिक मैगज़ीन में लिखा था कि गाह गाँव के लोग मोहना को एक परिवार के सदस्य के रूप में देखते हैं। गाँव के निवासी मोहम्मद अशरफ ने बताया कि कैसे मोहना ने अपने जीवन में शिक्षा और मेहनत को प्राथमिकता दी। उन्होंने एक घटना याद की जब परीक्षा के बाद मोहना ने जामुन के पेड़ से फल तोड़े, लेकिन अशरफ ने सब खा लिए। मोहना ने इस पर गुस्सा किया, लेकिन बाद में मुस्कुराते हुए कहा, “चलो, मेहनत से और जामुन तोड़ेंगे।”

डॉ. मनमोहन सिंह का जीवन एक संदेश देता है कि शिक्षा, विनम्रता और सेवा भाव से हर मुश्किल को पार किया जा सकता है। उनका पैतृक गाँव गाह, उनकी स्मृतियों और उनकी विरासत को सहेजते हुए, हमेशा उन्हें आदरपूर्वक याद करता रहेगा।