Home Blog Page 517

14 साल की नाबालिग हिंदू लड़की से रेप के आरोप में उम्रकैद काट रहा था शाहजहाँ: हाई कोर्ट ने निचली अदालत का पलटा आदेश, किया बरी

दिल्ली हाईकोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के तहत उम्रकैद की सजा काट रहे एक युवक को बरी कर दिया है। अपने फैसले में उच्च न्यायलय ने कहा कि शारीरिक संबंध को यौन उत्पीड़न नहीं कहा जा सकता है। बरी किए गए युवक का नाम शाहजहाँ अली है, जिसे बरी करने के पीछे अदालत ने हिंदू नाबालिग पीड़िता के बयान को आधार बनाया है। यह आदेश सोमवार (23 दिसंबर 2024) को दिया गया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला दिल्ली के थाना क्षेत्र मधु विहार का है। 17 मार्च 2017 को एक महिला यहाँ अपनी 14 वर्षीया बेटी की गुमशुदगी पुलिस में दर्ज करवाती है। घटना के समय पीड़िता कक्षा 8 में पढ़ती थी। वह स्कूल गई लेकिन घर नहीं लौटी थी। पुलिस ने केस दर्ज कर के इसी दिन शाहजहाँ अली को फरीदाबाद से गिरफ्तार कर लिया। पीड़िता को भी इसी दिन बरामद कर लिया गया।

मेडिकल जाँच में पीड़िता के शरीर पर कोई बाहरी चोट के निशान नहीं पाए गए। 20 मार्च 2017 को कोर्ट में पीड़िता के 164 के बयान दर्ज हुए। पीड़िता ने बयान में शाहजहाँ अली से शारीरिक संबंध की बात कही। पीड़िता ने यह भी कहा कि वो अपनी मर्जी से आरोपित के साथ गई थी। शाहजहाँ ने पीड़िता को शाम तक घर छोड़ने का वादा किया था।

लगभग 22 साल का शाहजहाँ पीड़िता से लगभग डेढ़ साल से परिचित था। पीड़िता के बयान के बाद पुलिस ने इस केस में अपहरण, रेप के साथ पॉक्सो एक्ट की भी धारा बढ़ा दी थी। पुलिस ने जाँच पूरी करके 16 जुलाई 2018 को न्यायालय में चार्जशीट दाखिल कर दी। ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने 7 गवाहों के बयान दर्ज करवाए।

बहस के दौरान पीड़िता ने बचाव पक्ष के वकील ने शाहजहाँ अली को अपना बॉयफ्रेंड बताया। इसी दौरान लड़की ने यह भी कहा कि शाहजहाँ ने उसको किसी तरह की शारीरिक प्रताड़ना नहीं दी। आखिरकार निचली अदालत से शाहजहाँ अली को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। तब से शाहजहाँ अली जेल में ही था। ट्रायल कोर्ट के इस फैसले को शाहजहाँ ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी।

मामले की सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस अमित शर्मा की अदालत में हुई। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने कहा कि शारीरिक संबंध को यौन उत्पीड़न नहीं कहा जा सकता है। हाईकोर्ट का मानना है कि पीड़िता का बयान उसके साथ किसी प्रकार की प्रताड़ना न होने का संकेत देता है। आखिरकार शाहजहाँ अली को बरी करने के आदेश जारी कर दिए गए।

गाँधी परिवार के गैर-वफादारों के साथ नाइंसाफी: मनमोहन सिंह की समाधि के लिए जगह माँगने वाली कॉन्ग्रेस नरसिम्हा राव और प्रणब मुखर्जी के साथ नहीं किया न्याय, शर्मिष्ठा ने उठाई आवाज

कॉन्ग्रेस पार्टी का इतिहास भारत की स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा हुआ है और यह पार्टी एक समय देश के राजनीतिक परिदृश्य पर छाई रही। लेकिन बीते कुछ दशकों में पार्टी के भीतर की राजनीति और उसके फैसले कई सवाल खड़े करते हैं। गाँधी परिवार के प्रति वफादारी और उसके इर्द-गिर्द घूमती नीतियों ने पार्टी को कहीं न कहीं सीमित कर दिया है। यह स्थिति तब और स्पष्ट हो जाती है जिसमें कॉन्ग्रेस पार्टी के भीतर उन नेताओं को अनदेखा किया जाता है जिन्होंने संगठन और देश के लिए अपना अहम योगदान दिया, लेकिन गाँधी परिवार के वफादार नहीं माने गए।

अभी डॉ. मनमोहन सिंह के निधन के बाद कॉन्ग्रेस द्वारा उनके स्मारक की माँग ने इस मुद्दे को फिर से उजागर किया। दो बार के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का 26 दिसंबर 2024 को निधन हो गया। उनके निधन के बाद कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर दिल्ली में उनके नाम पर एक स्मारक बनाने की माँग की। खड़गे ने अपने पत्र में मनमोहन सिंह के योगदान का उल्लेख करते हुए इसे देश के लिए सम्मान की बात बताया। यह माँग सुनने में भले ही संवेदनशील और जायज लगे, लेकिन इसने एक बार फिर पार्टी की राजनीति और उसके असली उद्देश्यों पर सवाल खड़े कर दिए।

प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि जब उनके पिता पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का निधन हुआ था, तब कॉन्ग्रेस ने उनके सम्मान में एक शोक सभा तक आयोजित नहीं की। उन्होंने कहा कि उन्हें यह कहकर गुमराह किया गया, कि राष्ट्रपति बन चुके लोगों के निधन पर कॉन्ग्रेस सीडब्ल्यूसी (कॉन्ग्रेस वर्किंग ग्रुप) की बैठक नहीं बुलाती, जबकि खुद प्रणब मुखर्जी ने अपनी डायरी में ये बात लिखी है कि पूर्व राष्ट्रपति डॉ केआर नारायणन के निधन पर न सिर्फ बैठक बुलाई गई थी, बल्कि खुद प्रणब मुखर्जी ने ही संदेश भी लिया था। शर्मिष्ठा मुखर्जी का यह आरोप कॉन्ग्रेस नेतृत्व की प्राथमिकताओं और गाँधी परिवार के प्रति उसकी वफादारी को दर्शाता है।

इससे पहले भी कॉन्ग्रेस की इस नीति का उदाहरण पी.वी. नरसिम्हा राव के मामले में देखा गया। राव साहब, जो 1991 से 1996 तक देश के प्रधानमंत्री रहे और जिनके कार्यकाल में देश में आर्थिक उदारीकरण की नींव पड़ी, उनके निधन के बाद पार्टी ने उन्हें पूरी तरह अनदेखा किया। 2004 में उनके निधन के समय कॉन्ग्रेस की सरकार थी, लेकिन उनके पार्थिव शरीर को पार्टी मुख्यालय में अंतिम दर्शन के लिए नहीं रखा गया। यहाँ तक कि उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में करने की अनुमति भी नहीं दी गई और उनके परिवार को मजबूरन उनका पार्थिव शरीर हैदराबाद ले जाना पड़ा।

डॉ. मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे डॉ. संजय बारू ने अपनी किताब ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ में इस घटना का जिक्र करते हुए लिखा कि नरसिम्हा राव को गाँधी परिवार के प्रभाव से बाहर होने के कारण पार्टी में कभी स्वीकार नहीं किया गया। यह केवल नरसिम्हा राव या प्रणब मुखर्जी तक सीमित नहीं है, बल्कि लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेताओं के साथ भी पार्टी ने ऐसा ही व्यवहार किया। शास्त्री जी, जो देश के दूसरे प्रधानमंत्री थे और जिनका ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा आज भी लोगों के दिलों में बसा है, को भी पार्टी के भीतर वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे।

कॉन्ग्रेस की राजनीति हमेशा से गाँधी परिवार के प्रति वफादारी पर आधारित रही है। जिन नेताओं ने परिवार के प्रति अपनी निष्ठा नहीं दिखाई, उन्हें पार्टी के भीतर हाशिये पर डाल दिया गया। प्रणब मुखर्जी का उदाहरण इसका प्रमाण है। दशकों तक कॉन्ग्रेस में अपनी सेवाएँ देने और देश के राष्ट्रपति पद तक पहुँचने के बावजूद उनके निधन पर पार्टी ने शोक सभा तक आयोजित नहीं की। यह विडंबना ही है कि जिस पार्टी ने अपने वरिष्ठ नेताओं को उचित सम्मान नहीं दिया, वह आज डॉ. मनमोहन सिंह के लिए स्मारक की माँग कर रही है।

भाजपा ने भी इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस को आड़े हाथों लिया। भाजपा प्रवक्ता सी.आर. केसवन ने कहा कि यह विडंबना है कि जो पार्टी अपने ही नेताओं को उचित सम्मान नहीं दे सकी, वह अब स्मारकों की राजनीति कर रही है। केसवन ने कॉन्ग्रेस पर तंज कसते हुए कहा कि पार्टी का इतिहास अपने गैर-वफादार नेताओं की उपेक्षा से भरा पड़ा है।

डॉ. मनमोहन सिंह के निधन के बाद जिस तरह से कॉन्ग्रेस ने स्मारक की माँग की, उससे यह सवाल उठता है कि क्या यह कदम वास्तव में उनके योगदान के प्रति सम्मान का प्रतीक है या फिर एक राजनीतिक रणनीति? कॉन्ग्रेस का इतिहास यह दर्शाता है कि पार्टी ने हमेशा गाँधी परिवार को प्राथमिकता दी है। जिन नेताओं ने गाँधी परिवार के प्रति अपनी निष्ठा नहीं दिखाई, उन्हें या तो अनदेखा कर दिया गया या फिर पार्टी से बाहर कर दिया गया।

डॉ. मनमोहन सिंह, जिन्होंने देश के प्रधानमंत्री रहते हुए कई महत्वपूर्ण नीतियाँ बनाई और भारत को वैश्विक मंच पर स्थापित किया, का योगदान निस्संदेह प्रशंसनीय है। लेकिन उनके निधन के बाद स्मारक की माँग करने वाली पार्टी को यह भी सोचना चाहिए कि उसने अन्य नेताओं के साथ कैसा व्यवहार किया है। हालाँकि मोदी सरकार ने कहा है कि डॉ मनमोहन सिंह के अंतिम संस्कार के बाद उनका स्मारक बनाने के लिए जगह की पहचान की जाएगी, सरकार ने कभी नहीं कहा कि वो डॉ मनमोहन सिंह के स्मारक के लिए जगह नहीं देगी।

वैसे, यहाँ एक बात बताना जरूरी है कि साल 2013 में डॉ मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए ही कॉन्ग्रेस की सरकार ने एक नियम बनाया था कि राजघाट पर अब किसी पूर्व प्रधानमंत्री को जगह नहीं दी जाएगी और न ही नया स्मारक बनाया जाएगा।

पी.वी. नरसिम्हा राव का उदाहरण सबसे प्रासंगिक है। आर्थिक सुधारों के जनक कहे जाने वाले राव को कॉन्ग्रेस ने हमेशा हाशिये पर रखा। यह केवल उनके निधन के समय तक सीमित नहीं था, बल्कि उनके जीवनकाल में भी पार्टी ने उन्हें वह सम्मान नहीं दिया जिसके वे हकदार थे। वहीं, मोदी सरकार ने नरसिम्हा राव का न सिर्फ स्मारक बनवाया, बल्कि उन्हें पूरा सम्मान भी दिया।

इसी तरह प्रणब मुखर्जी, जिन्होंने दशकों तक पार्टी की सेवा की और देश के वित्त मंत्री, विदेश मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए देश की नीतियों को आकार दिया, को भी गाँधी परिवार के प्रति वफादारी न दिखाने के कारण अनदेखा किया गया। उनकी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने यह आरोप लगाकर इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है।

कॉन्ग्रेस को अपने भीतर झाँकने की जरूरत है। पार्टी को यह समझना होगा कि केवल गाँधी परिवार के इर्द-गिर्द घूमने वाली राजनीति लंबे समय तक उसे जिंदा नहीं रख सकती। डॉ. मनमोहन सिंह के स्मारक की माँग करना एक सकारात्मक कदम हो सकता है, लेकिन इसे केवल दिखावे के लिए करना पार्टी की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है। क्योंकि देश की जनता अब जागरूक हो चुकी है और राजनीतिक पाखंड को समझने लगी है।

बेटी का हिन्दू प्रेमी से शादी करना मुस्लिम परिवार को नहीं आया रास, शमा को उठा ले गए उसके अम्मी-अब्बा: कोर्ट बोला- जल्दी खोजे मुजफ्फरपुर पुलिस

बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर जिले में हिन्दू युवक से शादी करने वाली एक मुस्लिम लड़की लापता हो गई है। शमा परवीन नाम की इस लड़की को गायब करने का आरोप उसके अब्बा पर लगा है। शमा के पति लोकेश कुमार ने अपनी बीवी को खोजने की गुहार कोर्ट से लगाई है। अदालत ने पुलिस को शमा को खोजने का आदेश दिया है। शमा का सोमवार (23 दिसंबर 2024) के बाद से कुछ भी अता-पता नहीं है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामला मुजफ्फरपुर के औराई थाना क्षेत्र का है। यहाँ के एक गाँव में लोकेश कुमार और शमा परवीन पड़ोस में रहते हैं। दोनों बचपन से दोस्त थे। यही दोस्ती आगे चलकर प्यार में बदल गई। लोकेश और शमा शादी करना चाहते थे। हालाँकि शमा के परिजन इसके लिए तैयार नहीं थे। लोकेश से दूर रखने के लिए शमा को 8 अगस्त 2024 को सूरत में उसकी मौसी के पास भेज दिया गया।

शमा सूरत से भी लोकेश से फोन पर जुड़ी रही। इस बीच 6 दिसंबर को लोकेश पूरी प्लानिंग के तहत शमा से मिलने सूरत गया। यहाँ से दोनों दिल्ली आ गए। 9 दिसंबर को दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में दोनों ने शादी कर कर ली। इसके बाद मंदिर में हिंदू रीति-रिवाज से शादी की। फिर दोनों आगरा और पटना घूमने के लिए गए। अंत में 16 दिसंबर को लोकेश अपनी बीवी शमा को लेकर अपने गाँव पहुँचा।

इधर शमा के सूरत से जाने के बाद उसके अब्बा ने अपनी बेटी की गुमशुदगी की रिपोर्ट गायघाट थाने में दर्ज करा दी। उसके अब्बा ने शिकायत में कहा कि दरभंगा जाते समय उसकी बेटी रास्ते से ही गायब हो गई। घर जाते ही शमा का बयान लेने गायघाट थाने की पुलिस पहुँची। 17 दिसंबर को पुलिस ने कोर्ट में उसके अब्बा द्वारा दर्ज करवाई गई गुमशुदगी के केस में बयान दर्ज किए।

पुलिस और कोर्ट के आगे शमा ने खुद को बालिग़ बताया और बताया कि उसने लोकेश कुमार के ही साथ शादी कर ली है। उसने लोकेश के साथ ही रहने की इच्छा जताई। अदालत ने शमा के बयान पर उसे लोकेश के साथ घर भेज दिया। इस बीच शमा के अम्मी-अब्बा ने नया पैंतरा खेला। 23 दिसंबर को इन दोनों ने अपनी बेटी को मिलने के लिए सीतामढ़ी बुलवाया।

शमा को लगा कि उसके अम्मी-अब्बू इस विवाह को मानने के लिए तैयार हो गए हैं। यहीं उसकी गलती हो गई। शमा अपने पति लोकेश कुमार को साथ लेकर अपने अम्मी-अब्बू से मिलने के लिए सीतामढ़ी गई। वहाँ एक कार में शमा के अम्मी-अब्बा आए। इन्होंने शमा को कार में जबरन बैठा लिया और लेकर अपने साथ चले गए। लोकेश ने इसकी शिकायत दर्ज करवाई है।

डुमरा थाने में दी गई लोकेश की शिकायत में शमा के अम्मी-अब्बा पर उसकी पत्नी के अपहरण का आरोप लगाया गया है। लोकेश ने शमा के साथ किसी अनहोनी की भी आशंका जताई है। थाना स्तर से लेकर SSP और DGP तक शिकायत के बाद कोई फर्क नहीं पड़ा तो लोकेश ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। मुजफ्फरपुर कोर्ट ने पुलिस को शमा को खोजने का आदेश दिया है।

बांग्लादेश में हिंदू महिला से गैंगरेप, मौत: भागे हिंदुओं ने कहा- घर में घुसकर महिलाओं से करते हैं बलात्कार, अल्पसंख्यकों के लिए माँगा अलग इलाका

बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय पर हिंसा का दौर जारी है। हिंदुओं के धार्मिक स्थलों को ही नहीं निशाना बनाया जा रहा है, बल्कि हत्या और महिलाओं के साथ रेप को भी अंजाम दिया जा रहा है। अब नरैल में 52 साल की हिंदू महिला बसना मलिक की रहस्यमय तरीके से मौत हो गई है। बसना के साथ गैंग रेप किया गया था। वहीं, भारत आए कुछ बांग्लादेशी हिंदुओं ने हिंसा की दर्दनाक कहानी सुनाई।

पीड़ित परिवार के लोगों का कहना है कि बसना मलिक 24 दिसंबर की रात को करीब 8 बजे घर लौटी थी। इसके बाद से उसे लगातार उल्टियाँ हो रही थीं। उस रात वह खाना खाने के बाद परिवार से कुछ कहे बिना ही सो गई। अगले दिन 25 दिसंबर की सुबह महिला की हालत बिगड़ गई। इसके बाद उसे जेसोर जनरल अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहाँ 26 दिसंबर की रात को महिला की मौत हो गई।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, एक स्थानीय युवक ने डर के कारण नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया था कि बसना के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था। इसके साथ ही उसे शारीरिक के साथ-साथ मानसिक रूप से भी परेशान भी किया गया था, जिसके कारण वह लगातार तनाव में रह रही है। यही कारण है कि उसने शर्म और तनाव के मारे कीटनाशक पीकर आत्महत्या कर ली।

मृतक महिला के बेटे रिंकू मलिक का कहना है कि उसकी माँ के साथ बहुत ‘गंदा’ व्यवहार किया गया था। उसके साथ दरिंदगी की गई थी। इससे वह परेशान हो गई थीं। महिला की मौत के बाद शव का पोस्टमार्टम किया गया। इसके बाद मैजपारा के पोराडांगा गाँव में स्थित श्मशान में महिला का अंतिम संस्कार कर दिया गया।

इस घटना को लेकर स्थानीय हिंदुओं में आक्रोश है। इस मामले में बांग्लादेश की पुलिस महिला को बदनाम कर लीपापोती करने में जुट गई है। सदर थाने के ओसी मोहम्मद साजेदुल इस्लाम का कहना है कि कुछ लोगों बताया कि बसना का गाँव के ही लडके के साथ संबंध था। उस रात स्थानीय लोगों ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया था।

बांग्लादेशी हिंदुओं ने साझा किया दर्द

वहीं, बांग्लादेश से भागकर वाराणसी पहुँचे 12 हिंदुओं ने वहाँ हो रहे अत्याचार की कहानी साझा की। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से मुलाकात कर उन लोगों ने बताया, “वहाँ के लोग हमसे कहते हैं कि तुम लोग पाकिस्तान चले जाओ। अब बांग्लादेश में हिंदुओं के लिए रहने लायक हालात नहीं रहे। हर वक्त जान का खतरा बना हुआ है।”

अपना चेहरा ढँके एक हिंदू व्यक्ति ने कहा कि बांग्लादेश का अब एक ही एजेंडा है और वह है बांग्लादेश को मुस्लिम राष्ट्र घोषित करने का। बांग्लादेश में जहाँ भी हिंदू दिखाई दे रहे हैं, उनके साथ हिंसा की जा रही है। मंदिरों पर कब्जा किया जा रहा है। एक हिंदू महिला ने कहा कि वहाँ के मुस्लिम घरों में घुसकर हिंदू महिलाओं से मारपीट और उनके साथ बलात्कार कर रहे हैं।

शंकराचार्य से मुलाकात करने वाले बांग्लादेशी हिंदुओं ने अपनी कुछ माँगें रखीं। उनका कहना है कि हिंदुओं के लिए बांग्लादेश में एक अलग जगह दी जाए, जो भारत की सीमा से लगी हो। इसके साथ ही भारत और बांग्लादेश के बीच आबादी की अदला-बदली। बांग्लादेश से भारत आने वाले हिंदुओं की संख्या के बराबर मुस्लिमों को वहाँ भेजा जाए।

उनका यह भी कहना है कि दुनिया में कहीं भी जन्म लेने वाले हिंदू को इजरायल की तरह स्वाभाविक रूप से भारत का नागरिक माना जाए। इसके साथ ही 5 अगस्त 2024 को तख्तापलट से पहले भारत आए बांग्लादेशियों की वीजा अवधि को बढ़ाई जाए और उन्हें जबरन बांग्लादेश ना भेजी जाए। इसके साथ ही उन्हें भारत में रोजगार मुहैया कराई जाए।

डॉक्टर मनमोहन सिंह को आज महानायक बता रही है जो कॉन्ग्रेस, उसने बार-बार उन्हें किया अपमानित: कभी ‘जोकर’ तो कभी अध्यादेश फाड़कर उछाली इज्जत, पढ़ें- चार घटनाएँ

मनमोहन सिंह का जीवन भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था में उनका योगदान एक अविस्मरणीय अध्याय है। 92 वर्षीय डॉ. मनमोहन सिंह का दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन हो गया। कॉन्ग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने उनके निधन को ‘निजी क्षति‘ बताते हुए उनके साथ बिताए समय को याद किया है।

एक कुशल अर्थशास्त्री और समर्पित राजनेता के रूप में उनकी पहचान थी। लेकिन उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल को विवादों और अपमानजनक घटनाओं से भी जोड़कर देखा जाता है। देश के प्रति उनकी निष्ठा और समर्पण ने उन्हें राजनीतिक दबावों और व्यक्तिगत अपमान के बावजूद राष्ट्रहित के लिए काम करने की प्रेरणा दी।

आज कॉन्ग्रेस पार्टी उनके योगदान का गुणगान कर रही है, जबकि वही पार्टी कई मौकों पर उन्हें अपमानित करने का कारण भी बनी। इस लेख में डॉ. मनमोहन सिंह के जीवन की उन चार प्रमुख घटनाक्रमों के बारे में बताया जा रहा है, जब उन्होंने अपमान सहते हुए भी देश के लिए काम किया।

राजीव गाँधी ने योजना आयोग की तुलना जोकर आयोग से की

ये बात साल 1986 की है। राजीव गाँधी भारत के प्रधानमंत्री थे और डॉ. मनमोहन सिंह योजना आयोग के उपाध्यक्ष। मनमोहन सिंह ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर एक प्रजेंटेशन दिया। राजीव गाँधी इससे नाराज हुए और अगले दिन सार्वजनिक रूप से योजना आयोग को ‘जोकर आयोग’ की संज्ञा दे डाली। यह टिप्पणी मनमोहन सिंह के लिए बेहद अपमानजनक थी। कहा जाता है कि उन्होंने इस्तीफा देने का मन बना लिया था, लेकिन दोस्तों और सहकर्मियों की समझाइश के बाद वे अपने पद पर बने रहे।

आज वही कॉन्ग्रेस पार्टी उन्हें देश का महानायक बता रही है, जबकि अतीत में उसने हमेशा डॉ. मनमोहन सिंह का अपमान ही किया।

कॉन्ग्रेस सांसदों ने वित्त मंत्री के तौर पर भी किया विरोध

इन अपमानों की श्रृंखला बहुत लंबी है। हम चुनिंदा मामलों को सामने रख रहे हैं, जिसमें साल 1991 में पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाया गया। उन्होंने आर्थिक सुधारों की दिशा में साहसिक कदम उठाए और लाइसेंस राज खत्म करने जैसे अहम फैसले लिए। लेकिन कॉन्ग्रेस के सांसदों ने इन नीतियों का जमकर विरोध किया। संसदीय दल की बैठक में मनमोहन सिंह को सांसदों की कड़ी नाराजगी झेलनी पड़ी। यहाँ तक कि पार्टी के अखबार नेशनल हेराल्ड ने भी उनकी नीतियों को मिडिल क्लास विरोधी बताया। यह मनमोहन की दृढ़ता ही थी कि उन्होंने देश की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए अपमान का यह घूँट पी लिया।

प्रधानमंत्री की कुर्सी, लेकिन ताकत सोनिया के पास

साल 2004 में जब कथित तौर पर सोनिया गाँधी ने प्रधानमंत्री पद ठुकराकर मनमोहन सिंह को यह जिम्मेदारी सौंपी, तब देश के लोगों को उम्मीद थी कि यह एक स्वतंत्र प्रधानमंत्री का कार्यकाल होगा। लेकिन हकीकत इससे अलग थी। मनमोहन सिंह को कई अहम फैसलों में नजरअंदाज किया गया। द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर किताब के मुताबिक, वे वित्त मंत्रालय खुद रखना चाहते थे, लेकिन कॉन्ग्रेस हाईकमान के दबाव में यह मंत्रालय पी. चिदंबरम को दिया गया। प्रधानमंत्री होते हुए भी उन्हें अक्सर पार्टी के निर्देशों का पालन करना पड़ता था।

साल 2012 में जब मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने संसद के बाहर ‘हजारों जवाब से अच्छी मेरी खामोशी है, न जाने कितने सवालों की आबरू रखी’ शेर सुनाकर सुर्खियाँ बटोरी थीं। वैसे, आज जब सोनिया गाँधी डॉ मनमोहन सिंह के निधन को निजी क्षति बता रही हैं, तब जाने क्यों ये तस्वीर और ऐसे वो तमाम लेख सामने आ रहे हैं, जिसमें सोनिया गाँधी के सुपर पीएम और डॉ मनमोहन सिंह के ‘कठपुतली‘ होने के बारे में लिखा होता था।

सोनिया गाँधी से नमस्ते करते डॉ मनमोहन सिंह (फोटो साभार: NBT)

राहुल गाँधी ने संसद में फाड़ा अध्यादेश, किया अपमान

साल 2013 में मनमोहन सिंह सरकार ने सजायाफ्ता अपराधियों को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए एक अध्यादेश लाने का फैसला किया। यह अध्यादेश कैबिनेट से पारित हो चुका था। लेकिन राहुल गाँधी ने इसे सरेआम ‘बकवास’ कहकर फाड़ डाला। राहुल के इस काम और बयान ने न केवल मनमोहन की सरकार को शर्मिंदा किया, बल्कि प्रधानमंत्री पद की गरिमा को भी ठेस पहुँचाई। कहा जाता है कि मनमोहन सिंह इस घटना से इतने आहत हुए कि उन्होंने इस्तीफा देने का मन बना लिया था, लेकिन अंततः उन्होंने पद पर बने रहकर देश की स्थिरता को प्राथमिकता दी।

माथे पर हमेशा रहा ‘कठपुतली’ का कलंक

डॉ. मनमोहन सिंह का कार्यकाल इस बात का प्रतीक बन गया कि किस तरह सत्ता का केंद्र कहीं और होता है और प्रधानमंत्री केवल एक प्रतीक बनकर रह जाता है। 10 साल तक देश का नेतृत्व करने वाले मनमोहन को उनके निर्णय लेने की शक्ति से वंचित रखा गया। द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर और अन्य कई किताबों व संस्मरणों ने इस बात को उजागर किया कि 10 जनपथ (सोनिया गाँधी का आवास) से मनमोहन सरकार को नियंत्रित किया जाता था।

आज कॉन्ग्रेस पार्टी मनमोहन सिंह को महानायक बता रही है। लेकिन इतिहास यह नहीं भूल सकता कि वही पार्टी, जिसने उन्हें प्रधानमंत्री बनाया, कई बार उनके सम्मान को ठेस पहुँचाने का भी कारण बनी। इन कलंकों के बावजूद उन्होंने देश के विकास के लिए काम किया और कई महत्वपूर्ण नीतियाँ लागू करने में अहम भूमिका निभाई। मनमोहन सिंह के जीवन की इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि वे न केवल एक कुशल अर्थशास्त्री और समर्पित राजनेता थे, बल्कि अपमान सहने और देशहित में काम करते रहने की मिसाल भी थे।

हालाँकि उनके निधन के बाद कॉन्ग्रेस का उनके प्रति सम्मान दिखाना कितना सच्चा है, यह एक बड़ा सवाल है। आखिर किस मुँह से वही पार्टी उनके योगदान का गुणगान कर रही है, जिसने उन्हें ‘कठपुतली’ बनने पर मजबूर किया?

उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने मनमोहन सिंह को ‘हिजड़ा’ कहकर उड़ाया था मजाक: अब प्रियंका चतुर्वेदी पूर्व पीएम को ‘बदनाम’ करने का आरोप मोदी सरकार पर मढ़ रही

मनमोहन सिंह के निधन के कुछ घंटों बाद ही शिवसेना (UBT) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने गुरुवार (26 दिसंबर 2024) को पूर्व प्रधानमंत्री की मृत्यु को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का मुद्दा बना दिया और राजनीतिक रोटियाँ सेंकने की कोशिश की।

प्रियंका चतुर्वेदी ने ट्वीट कर आरोप लगाया कि बीजेपी सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मनमोहन सिंह की छवि खराब करने की कोशिश की। उन्होंने दावा किया कि बीजेपी नेताओं द्वारा व्यक्त किए गए शोक के शब्द ‘पाखंड’ को दर्शाते हैं।

प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा, “प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली यह कैबिनेट डॉ. मनमोहन सिंह के निधन पर शोक प्रकट करने के लिए शब्द भले ही कहे, लेकिन उनके खिलाफ किए गए कृत्य और आरोप कभी नहीं भुलाए जा सकते – उनकी छवि खराब करने, शर्मनाक आरोप लगाने, चरित्र हनन करने और एक महान व्यक्ति को परेशान करने का प्रयास।”

उन्होंने आगे कहा, “बाकी कल वे जो भी कहेंगे, वह केवल पाखंड होगा। इतिहास उनके इस व्यवहार का सही फैसला करेगा।”

हालाँकि, प्रियंका चतुर्वेदी ने इस मौके को राजनीतिक बहस का मुद्दा बना दिया, लेकिन यह साफ हो गया कि शिवसेना (UBT) नेता ने अपनी ही पार्टी द्वारा मनमोहन सिंह पर की गई टिप्पणियों को नजरअंदाज कर दिया। खासकर तब, जब वो खुद कॉन्ग्रेस की प्रवक्ता रही थी और बाद में शिवसेना में शामिल हुई थी।

साल 2012 में उद्धव ठाकरे ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का मजाक उड़ाते हुए उन्हें ‘मोम का पुतला’ कहा था।

महँगाई के मुद्दे पर उन्होंने कहा था, “पिछले 7-8 सालों से हम देख रहे हैं कि उनमें (मनमोहन सिंह) और मोम के पुतले में ज्यादा फर्क नहीं है।”

एक साल बाद ही साल 2013 में उद्धव ठाकरे ने मनमोहन सिंह को ‘हिजड़ा’ (Eunuch) कहकर उनकी कड़ी आलोचना की थी।

DNA की 2013 की एक रिपोर्ट के अनुसार, ठाकरे ने पुणे के लोगों के साथ हुई बातचीत का हवाला देते हुए कहा था कि उन्होंने पूछा था कि मौजूदा सरकार के बारे में उनकी क्या राय है। जवाब में लोगों ने कथित तौर पर कहा कि प्रधानमंत्री सिंह एक अक्षम नेता और ‘हिजड़ा’ हैं।

वहीं, साल 2017 में शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा था, “मुझे नहीं लगता कि देश ने कभी इतना कमजोर प्रधानमंत्री देखा है।” उन्होंने यह भी बयान दिया था कि मनमोहन सिंह को अपनी पार्टी (कॉन्ग्रेस) से भी सम्मान नहीं मिला।

बता दें कि कभी शिवसेना के दिवंगत नेता और संस्थापक बाल ठाकरे ने मनमोहन सिंह को ‘राजनीतिक रूप से नपुंसक‘ (Politically Impotent) तक कह दिया था।

‘शारीरिक संबंध का अर्थ सिर्फ संभोग नहीं, यौन उत्पीड़न की तो बात ही छोड़िए’: दिल्ली हाई कोर्ट ने नाबालिग लड़की से रेप के आरोपित को किया बरी, मिली थी उम्रकैद

दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम और भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत 14 साल की लड़की का रेप और यौन उत्पीड़न के आरोप में आजीवन कारावास की सजा काट रहे एक व्यक्ति को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि शारीरिक संबंध का अर्थ सिर्फ संभोग नहीं हो सकता, यौन उत्पीड़न की तो बात ही छोड़ दीजिए।

न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह और न्यायमूर्ति अमित शर्मा की खंडपीठ ने कहा, “पीड़िता ने ‘शारीरिक संबंध’ शब्द का इस्तेमाल किया था, लेकिन इस बात की कोई स्पष्टता नहीं है कि उसने इस शब्द का इस्तेमाल करके क्या कहा था। यहाँ तक ​​कि ‘संबंध बनाया’ शब्द का इस्तेमाल भी POCSO अधिनियम की धारा 3 या IPC की धारा 376 के तहत अपराध स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

खंडपीठ ने कहा, “अगर लड़की POCSO अधिनियम के तहत नाबालिग है तो सहमति मायने नहीं रखती, लेकिन ‘शारीरिक संबंध’ शब्द को यौन उत्पीड़न तो दूर, यौन संभोग में भी नहीं बदला जा सकता है।” न्यायालय ने आगे कहा कि नाबालिग ने स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा कि उसके साथ कोई यौन उत्पीड़न हुआ था, तथा इस बात के समर्थन में कोई साक्ष्य भी नहीं था।

अदालत ने कहा, “यह तथ्य कि वह (पीड़िता) स्वेच्छा से अपीलकर्ता के साथ गई थी, इस पर भी कोई विवाद नहीं है। हालाँकि, शारीरिक संबंध या संबंध बनाने से यौन उत्पीड़न की बता करना, एक ऐसी चीज है जिसे साक्ष्य के माध्यम से रिकॉर्ड पर स्थापित किया जाना चाहिए और इसको लेकर अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। ऐसे मामलों में संदेह का लाभ अभियुक्त के पक्ष में होना चाहिए।”

दरअसल, इस मामले में पीड़ित नाबालिग लड़की की माँ ने एक शिकायत दर्ज कराई थी। उस शिकायत में पीड़िता की माँ ने कहा था कि उसकी बेटी को एक अज्ञात व्यक्ति बहला-फुसलाकर घर से अगवा कर ले गया। नाबालिग ने बाद में पुलिस को बताया कि उनके बीच ‘शारीरिक संबंध’ थे। इस बयान के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने उस व्यक्ति को दोषी ठहराया और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

दोषी ठहराए गए व्यक्ति ने हाई कोर्ट में अपील की। हाई कोर्ट ने पाया कि अपनी जिरह में नाबालिग लड़की ने कहा था कि आरोपित ने न तो उस पर कोई शारीरिक हमला किया और न ही उसके साथ कोई गलत काम किया। मेडिकल जाँच में भी कोई बाहरी चोट या यौन हमले के निशान नहीं मिले। हाई कोर्ट ने यह भी पाया कि आरोपित को आजीवन कारावास की सजा देने के लिए कोई उचित तर्क नहीं दिया।

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा, “इस प्रकार यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रायल कोर्ट किस तरह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि अपीलकर्ता द्वारा कोई यौन उत्पीड़न किया गया था। केवल इस तथ्य से कि पीड़िता 18 वर्ष से कम है, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि यौन उत्पीड़न हुआ था।” इसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने आरोपित को बरी कर दिया।

बायडेन मरने वाले, 9/11 ‘अंदर की साजिश’ और कोविड एक घोटाला: ये सब मानने वाली लॉरा लूमर ने भारतीयों के खिलाफ चलाया घृणा अभियान, ट्रम्प के भारतीय को चुनने के बाद सामने आई खीझ

अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में घोषणा की कि श्रीराम कृष्णन व्हाइट हाउस ऑफ़िस ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी पॉलिसी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के लिए नीतियाँ बनाने में उनकी सहायता करेंगे। इसके बाद एक्स (पहले ट्विटर) पर भारतीयों के खिलाफ ट्रम्प समर्थक एक धड़े ने भारतीयों के खिलाफ अभियान चला दिया। इस मुहिम को अमेरिकी पत्रकार और रोज नई साजिश का दावा करने वाली लॉरा लूमर ने चालू किया।

इन लोगों ने भारतीयों के रहन-सहन, खानपान और भारत का मजाक उड़ाया कहा कि उनके देश को भारतीयों की कोई जरूरत नहीं है। लूमर ने H1-B वीज़ा पर श्रीराम के रुख़ को गलत तरीके से पेश किया। इसमें दावा किया गया श्रीराम ने कहा है कि अमेरिकियों की तुलना में बाहरी देशों के कामगारों को काम पर लगाएँगे। इसके बाद भारतीयों पर ऑनलाइन हमले चालू हो गए।

भारतीयों पर नस्लभेदी टिप्पणी

लॉरा लूमर ने उनकी नियुक्ति को ‘निराशाजनक’ करार दिया। लॉरा लूमर ने अपने जहरीले ट्वीट में कृष्णन की नियुक्ति को ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति पर सवाल उठाने वाला बता दिया लॉरा लूमर ने भारतीयों को तीसरी दुनिया से आने वाले हमलावर तक बता डाला। जहर उगलने के क्रम में लॉरा लूमर ने कहा कि भारतीय साफ़ सफाई नहीं रखते। लॉरा लूमर ने यहाँ तक कि कहा कि अगर भारतीय इतने सक्षम हैं तो वह अमेरिका क्यों आते हैं। इसके बाद लॉरा लूमर की काफी आलोचना हुई।

जब लॉरा लूमर को एक व्यक्ति ने इस बात का जवाब दिया कि कैसे अमेरिका की प्रगति में बड़ा हाथ बाहर से आने वाले लोगों और विशेषकर भारतीयों का भी है, तो वह नीचता पर उतर आई। लॉरा ने इसके बाद तर्क से जवाब देने के बजाय भारतीयों के लिए अभद्र भाषा लिखी। लॉरा ने दावा किया कि भारतीय उसी पानी में शौच करते हैं, जिसे वह पीते और नहाते हैं। लॉरा ने कहा कि इसके उलट अमेरिका में पानी नल से आता है। लॉरा को इस बीच उन अमेरिकियों से समर्थन मिला जो खुद को पूरी दुनिया से श्रेष्ठ समझते हैं।

कमला हैरिस के खिलाफ भी की थी टिप्पणी

यह पहली बार नहीं है जब लॉरा ने भारत या भारतीय मूल के लोगों पर नस्लवादी टिप्पणी की हो। इससे पहले उसने डेमोक्रेट राष्ट्रपति उम्मीदवार कमला हैरिस को लेकर भी यही टिप्पणी की थी। उसने कहा था कि अगर कमला हैरिस राष्ट्रपति चुनाव जीत गईं तो व्हाइट हाउस भारतीय सब्जियों की तरह महकेगा और उनके भाषण कॉल सेंटर से चलेंगे। गौरतलब है कि ‘करी‘ (सब्जी) और ‘कॉल सेंटर’ को अमेरिका में भारतीयों पर नस्लभेदी टिप्पणी करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

बाद में लॉरा लूमर ने इस मामले में माफ़ी माँगी और कहा कि यह राजनीतिक व्यंग्य था। हालाँकि, दिन रात भारतीयों के खिलाफ प्रलाप करने वाली लॉरा लूमर मात्र ऐसे हवा हवाई दावे ही कर सकती है, इसके इतर चुनावी राजनीति में वह फेल है। उसने दो बार अमेरिकी कॉन्ग्रेस में जाने के लिए चुनाव लड़ा लेकिन हार चुकी है। उसने यह चुनाव फ्लोरिडा से लड़े थे।

हैती के लोगों को बताया जानवर खाने वाला

सितंबर में राष्ट्रपति पद की बहस के दौरान, डोनाल्ड ट्रम्प ने आरोप लगाया कि हैती से आए अवैध अप्रवासी ओहायो शहर में पालतू जानवरों को खा रहे हैं, जिससे अमेरिकी सोशल मीडिया पर मीम की बाढ़ आ गई। इसी बहस से एक दिन पहले लॉरा लूमर ने एक्स पर कहा कि “नरभक्षी हैती के लोग अब लोगों के पालतू जानवरों को मार रहे हैं और ओहायो की सड़कों पर पालतू जानवरों का शिकार कर रहे हैं।” लॉरा ने इसको लेकर एक ट्वीट किया था और कहा था कि डेमोक्रेट सरकार ने 20,000 हैती के नरभक्षी अमेरिका में बढ़ा दिए हैं।

लूमर की साजिश वाली थ्योरी

जुलाई में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन के राष्ट्रपति पद की दौड़ से बाहर होने के ठीक दो दिन बाद, लूमर ने एक्स पर पोस्ट किया कि वह मरने वाले हैं हैं और उन्होंने अपने कुछ काम को दूसरों को सौंपना शुरू कर दिया है। लूमर ने दावा किया कि ‘उनका समय सीमित है’ और उनका परिवार और कर्मचारी ‘अभी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।’ लूमर ने यह दावा व्हाइट हाउस द्वारा की गई एक प्रेस रिलीज पर किया।

लेकिन लूमर के एक्स पोस्ट पर कम्युनिटी नोट लगा दिए गए। इनमें बताया गया कि लूमर जैसी साजिश का इशारा कर रही हैं वैसा कुछ नहीं है और ऐसी ही घटनाएँ ट्रम्प के पहले कार्यकाल के दौर भी हुई हैं। लूमर ने एक और मौके पर बायडेन के विमान की लैंडिंग के बारे में झूठ फैलाया और कहा कि उन्हें मेडिकल इमरजेंसी थी। जो बाद में गलत साबित हुआ।

लूमर इससे पहले 9/11 के हमले पर भी शक जता चुकी है। लूमर का दावा है कि 9/11 के हमले अल-कायदा के इस्लामी आतंकी की बजाय अंदर के किसी आदमी ने किए। लूमर ने कोविड महामारी को भी साजिश और घोटाला बताया था। हालाँकि, बाद में उसे खुद ही कोविड झेलना पड़ा और इसके चलते उसकी हालत बिगड़ गई।

गिरफ्तार भी हो चुकी है लॉरा लूमर

लॉरा लूमर जून 2017 में भी सुर्खियों में आई थी, उसने न्यूयॉर्क शहर के पब्लिक थिएटर के शेक्सपियर इन द पार्क में शेक्सपियर के “जूलियस सीज़र” नाटक के शूट में बाधा डाली थी। इस शो पर विवाद था क्योंकि इसमें जूलियस सीज़र को डोनाल्ड ट्रम्प जैसे व्यक्ति के रूप में दिखाया गया था, जिसे बाद में कहानी के अनुसार मार दिया जाता है। लूमर को सुरक्षाकर्मियों ने मंच से उतार कर गिरफ्तार कर लिया था। बाद में उसे अदालत में पेश किया गया था।

लॉरा लूमर को जहाँ एक ओर दिन भर साजिश की बातें रटने वालों का समर्थन है तो वहीं बड़ी संख्या में उसके एजेंडे की आलोचना भी हुई है। लूमर की नस्लवादी और विभाजनकारी बयानबाजी ने अक्सर रिपब्लिकन नेताओं को न्नुक्सान ही पहुँचाया है। लूमर अब ट्रम्प की सहायता करने के बजाय मणिशंकर अय्यर जैसे बन गई है।

यह लेख अंग्रेजी में श्रद्धा पांडेय ने लिखा है। इसे आप यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

प्रार्थना सभा के नाम पर लोगों का धर्मांतरण कराने की कोशिश, पादरी समेत 10 गिरफ्तार: ओडिशा से लेकर उत्तर प्रदेश तक फैला मिशनरियों का जाल

देशभर में धर्मांतरण के खिलाफ की जा रही गतिविधियों ने चार प्रमुख घटनाओं को उजागर किया है। इन घटनाओं में अब तक कई लोगों के खिलाफ केस दर्ज हुआ है, तो पादरी समेत कम से कम 9 को गिरफ्तार किया गया है। वहीं, कई अन्य लोगों से पूछताछ जारी है। कार्रवाई में पादरियों सहित अन्य आरोपित शामिल हैं।

उन्नाव में क्रिसमस प्रार्थना सभा की आड़ में धर्मांतरण, 6 गिरफ्तार

उन्नाव जिले के बिहार थानाक्षेत्र के खेसुआ गाँव में बुधवार (25 दिसंबर 2024) को क्रिसमस प्रार्थना सभा के दौरान धर्मांतरण कराने की शिकायत पर पुलिस ने छह लोगों पर केस दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया है। आरोप है कि प्रार्थना सभा का आयोजन शारदा नाम की महिला ने किया था, जो स्थानीय जमीन पर कब्जा कर वहाँ धर्मांतरण गतिविधियाँ चला रही थी। ग्रामीणों ने इसका विरोध किया तो मारपीट की गई।

बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने मौके पर पहुँचकर सभा बंद कराई और पुलिस को सूचित किया। पुलिस ने शारदा, उसके बेटों राहुल, अजय, विजय, आशीष और मनीष के साथ दो अन्य सहयोगियों रमेश और राजेश को गिरफ्तार किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए एसडीएम और अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी मौके पर पहुँचे।

सीतापुर में पादरी एल्गिन सिंह गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के कटसरैया गाँव में धर्मांतरण कराने के आरोप में पादरी एल्गिन सिंह को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने उन्हें गुरुवार (26 दिसंबर 2024) सुबह मनवा तिराहा से पकड़ा। पादरी पर उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन अधिनियम 2021 के तहत मामला दर्ज किया गया था। पुलिस ने बताया कि एल्गिन सिंह कई स्थानीय लोगों को धर्मांतरण के लिए प्रेरित कर रहा था। इस मामले में अन्य संदिग्धों से पूछताछ की जा रही है। पादरी को न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया है।

ओडिशा में धर्मांतरण के प्रयास में तीन लोगों को पेड़ों से बाँधा

बालासोर जिले के गोबरधनपुर गाँव में स्थानीय ग्रामीणों ने तीन लोगों को धर्मांतरण के प्रयास के आरोप में पकड़कर पेड़ों से बांध दिया। आरोपों के मुताबिक, छनाखानपुर गाँव के गोबिंद सिंह, मित्रपुर मखापड़ा गाँव के सुबासिनी सिंह और मुखुरा पंचायत और रेमुना पुलिस सीमा के रेमुना मुखुरा के सुकांति सिंह ने कथित तौर पर आदिवासी परिवारों को धर्मांतरण के लिए तैयार किया था।

देबसेना की नीलगिरि शाखा के अध्यक्ष बादल कुमार पांडा ने कहा कि गोबिंद सिंह के घर पर भोजन की व्यवस्था थी, जिसमें माँस और चावल शामिल थे। ‘मेरी क्रिसमस’ वाक्यांश से सजा एक केक भी मिला, जिससे संदेह पैदा हुआ कि धर्मांतरण समारोह चल रहा था। ग्रामीणों को संदेह था कि आरोपित परिवारों का धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए उन्होंने उन्हें पेड़ों से बाँध दिया। सूचना मिलने पर पुलिस ने तीनों आरोपितों को हिरासत में ले लिया। घटना के बाद इलाके में तनाव बना हुआ है।

सहारनपुर में धर्मांतरण के आरोपों पर हंगामा

सहारनपुर के नानौता क्षेत्र के ओलरी गाँव में एक घर के अंदर धर्मांतरण गतिविधियों की सूचना पर बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद ने हंगामा किया। आरोप है कि मकान मालिक अपने बेटे के साथ मिलकर प्रलोभन देकर धर्मांतरण करवा रहा था। पुलिस ने मौके पर पहुँचकर दोनों पक्षों को समझा-बुझाकर मामला शांत कराया।

विश्व हिंदू परिषद जिलाध्यक्ष दिग्विजय त्यागी ने आरोप लगाया कि एक घर में काफी संख्या में लोगों को एकत्रित कर प्रलोभन देते हुए धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित किया जा रहा था। वहीं, थाना पुलिस ने बताया कि धर्मांतरण का मामला नहीं है। निजी कार्यक्रम था। आयोजकों को भविष्य में अनुमति लेकर कार्यक्रम करने की हिदायत दी गई है।

गौरतलब है कि देशभर में धर्मांतरण को लेकर बढ़ती घटनाएँ प्रशासन और जनता के बीच गंभीर चर्चा का विषय बन गई हैं। स्थानीय संगठनों और पुलिस की सक्रियता से ऐसे मामलों में कार्रवाई हो रही है, लेकिन आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला भी जारी है। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि धर्मांतरण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सतर्कता और पारदर्शिता जरूरी है, ताकि कानून का पालन सुनिश्चित हो और सामुदायिक तनाव न बढ़े। ऐसे में स्थानीय प्रशासन को भी चाहिए कि वो धर्मांतरण की गतिविधियों में शामिल लोगों की पहचान कर उनपर सख्त कार्रवाई करे।

100+ भारतीयों को मारने वाला आतंकी अब्दुल रहमान मक्की अज्ञात मौत मरा: लश्कर का था डिप्टी चीफ, हाफिज सईद का भाई भी था और सगा बहनोई भी

पाकिस्तान में भारत के दुश्मनों की फेहरिस्त से एक और नाम हमेशा के लिए मिट गया। कुख्यात आतंकी और लश्कर-ए-तैयबा का नायब अमीर (डिप्टी चीफ) अब्दुल रहमान मक्की ने लाहौर के एक अस्पताल में दम तोड़ दिया। उसकी मौत को रहस्यमयी माना जा रहा है। हालाँकि, पाकिस्तानी अधिकारियों ने दावा किया है कि उसकी मौत हार्ट अटैक से हुई।

रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत. छिपाकर रखता था पाकिस्तान

मक्की की मौत को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। पिछले साल संयुक्त राष्ट्र द्वारा उसे अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किए जाने के बाद पाकिस्तान ने उसे सार्वजनिक नजरों से छुपा दिया था। वह रहस्यमयी तरीके से गायब कर दिया गया था, जबकि अफवाहें थीं कि कुछ अज्ञात बंदूकधारियों ने उसे उठा लिया। पाकिस्तान सरकार उसे लगातार एक जगह से दूसरी जगह छुपाकर रख रही थी। अब उसकी मौत का समय और परिस्थितियाँ सवाल खड़े कर रही हैं। क्योंकि अभी तक यही जानकारी आ रही है कि उसकी मौत अस्पताल में हुई है।

भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों का मास्टरमाइंड

मक्की ने भारत के खिलाफ कई आतंकी हमलों की योजना बनाई थी। 26/11 मुंबई हमले के अलावा 2000 में लाल किले पर हमला, 2008 में रामपुर सीआरपीएफ कैंप पर हमला और 2018 में गुरेज़ हमले में उसकी संलिप्तता पाई गई थी। इन हमलों में सैकड़ों निर्दोष लोगों ने अपनी जान गँवाई। मक्की लश्कर-ए-तैयबा और उसकी राजनीतिक शाखा जमात-उद-दावा का प्रमुख सदस्य था। वह भारत में आतंक फैलाने के लिए युवाओं को बरगलाकर आतंकी गतिविधियों में शामिल करता था। जम्मू-कश्मीर में आतंकी फंडिंग, हमलों की योजना और युवाओं की भर्ती में उसकी अहम भूमिका थी।

हाफिज सईद का चचेरा भाई और सगा बहनोई था मक्की

अब्दुल रहमान मक्की आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद का चचेरा भाई और सगा बहनोई था। यह रिश्ता उसे संगठन में ऊपरी जगह दिलाने में सहायक रहा। अमेरिका और भारत ने उसे मोस्ट वांटेड आतंकवादी घोषित किया था। 2023 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने मक्की को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किया था। इसके तहत उसकी संपत्तियाँ जब्त कर ली गईं, यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया गया, और हथियारों की खरीद-बिक्री पर रोक लगा दी गई। इससे पहले चीन ने इस प्रस्ताव पर तकनीकी रोक लगाई थी, लेकिन वैश्विक दबाव के कारण उसे यह रोक हटानी पड़ी।

भारत के सबसे बड़े दुश्मनों में से एक

बता दें कि मक्की की सबसे बड़ी करतूतों में शामिल था 2000 का लाल किला हमला, जिसमें तीन लोग मारे गए थे। इसके अलावा, 26/11 मुंबई हमले में उसकी भूमिका ने उसे भारत के इतिहास में सबसे बड़े दुश्मनों में शुमार कर दिया। इस हमले में 175 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। मक्की की मौत भले ही राहत की बात हो, लेकिन यह भी याद रखना जरूरी है कि पाकिस्तान में आतंकी संगठनों का नेटवर्क आज भी सक्रिय है। मक्की जैसे आतंकियों की जगह लेने वाले और भी लोग हो सकते हैं। भारत को सतर्क रहने की जरूरत है।