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बाबा नागार्जुन पर बाल यौन शोषण और हिंदी वालों की स्थिति… न उगलते बने, न निगलते

मैथिली लोककथाओं में एक छोटे से परिवार की कहानी आती है। जी हाँ, आम तौर पर जैसा स्थापित मिथकों को गढ़ने वाले बताते हैं, वैसा नहीं होता। हो सकता है विदेशों में कहीं किस्से-कहानियाँ या लोककथाएँ और किम्वदंतियाँ राजा-रानियों की होती हों, मगर भारत में मामला बिलकुल अलग रहा है। हमारी लोककथाएँ आम आदमी के जीवन के ही चारों ओर घूमती हैं। राजा और आम आदमी के रहन सहन में संभवतः ज्यादा अंतर भी नहीं था। इसलिए जितने राजा हुए होंगे, उतने महल भी खुदाई में नहीं निकलते।

खैर तो हमारी कहानी थी एक छोटे से परिवार की, जहाँ पति-पत्नी और एक बच्चा होते हैं। एक रोज सुबह-सुबह खाना पकाने के लिए वो साधारण सा आदमी कुछ मांस ले आता है। साधारण सा परिवार था और लोग भी कम थे तो वो पाव भर (250 ग्राम) मांस लाया और पकाने के लिए पत्नी को देकर काम पर चला गया। मांस पकाती पत्नी ने एक टुकड़ा चखकर देखना चाहा कि वो ठीक से पका है या नहीं। उसने पहले एक टुकड़ा खाकर देखा, फिर दूसरा, और भुनते-भुनते ही सारा मांस ख़त्म हो गया!

पाव भर मांस में टुकड़े ही कितने होते हैं! अब तो बेचारी की बरी बुरी दशा हुई। लौटकर पति को नजर आता कि वो सारा मांस अकेले खा गई है तो भूखे आदमी को गुस्सा तो आता ही। जो कहीं बात हंसी-मजाक में आस-पड़ोस, देवर-भाभियों तक पहुँचती तो पूरी जिन्दगी के लिए भुक्खड़ होने का ठप्पा भी लगता। महिला ने आस-पास देखा और उसे वहीं खेलता एक कुत्ते का पिल्ला नजर आया। उसने आव देखा ना ताव और उसे ही काटकर पका डाला। जब पति लौटा तो उसे वो वही पिल्ला परोसकर बैठ गई।

घर का बच्चा जो सारी घटना देख रहा था, वो अब घबराने लगा। अगर वो बताता कि हुआ क्या है तो बाद में उसकी पिटाई निश्चित थी। अभी बताता तो पिल्ला काटकर परोस देने पर उसकी माँ पिटे बिना नहीं रहती। वो बाप को पिल्ला खाते भी नहीं देख सकता था तो आखिर उसने गाना शुरू किया “कही त मैय मारल जै, नै कही त बाप पिल्ला खाय… कही त मैय मारल जै, नै कही त बाप पिल्ला खाय…” (कह दूँ तो माँ मारी जाएगी, ना कहूँ तो बाप पिल्ला खाएगा)! तो ये कहावत के पीछे की कहानी थी।

आज के दौर में देखें तो उर्दू शायरी में “इक तरफ उसका घर, एक तरफ मैकदा” या “ना बोलूँ कुछ तो कलेजा फूँके, जो बोल दूँ तो जबाँ जले है” जैसे वाक्यों में ऐसा ही भाव दोहराया जाता है। अफ़सोस कि हिन्दी में इसकी टक्कर का कुछ इतनी आसानी से याद नहीं आता। ऐसा शायद इसलिए भी है क्योंकि कविताएँ और भाव शायद हिन्दी कवियों को राजनैतिक विचारधारा से कम महत्वपूर्ण लगे। उन्होंने किसी दौर में छंद के बदले एजेंडा परोसना शुरू कर दिया।

संभवतः यही वजह है कि आज हम अगर हिन्दी काव्य की चर्चा करने बैठ जाएँ तो कवि अपनी रचनाओं के कारण नहीं बल्कि विवादों के कारण याद आते हैं। इस क्रम में विदेशों से शुरू हुए अभियान #मीटू की भी खासी भूमिका रही है। इसके लपेटे में तो कई दिग्गज और मठाधीश अपने ऊँचे सिंहासनों से गिरकर कीचड़ में लोटते पाए गए। जब #मीटू की आँधी कुछ थमने लगी थी तभी एक नया विवाद सामने आया है। गुनगुन थानवी नामक किसी कम ख्यात स्त्री ने जाने-माने जनवादी कवि बाबा नागार्जुन पर बाल यौन शोषण का अभियोग मढ़ दिया है।

आरोप बरसों पहले का है और कुछ लोगों का मानना है कि बाबा नागार्जुन उस समय भी अस्सी वर्ष से ऊपर की अवस्था के और अशक्तता से ग्रस्त रहे होंगे। वहीं दूसरे धड़े (और अधिकांश महिलाओं) का मानना है कि आरोप सच भी हो सकते हैं। इस पूरे मामले में हिन्दी की राजनीति करने और उसे बेच-बेच खाने वालों की जरूर “कही त मैय मारल जै…” वाली दशा हो गई है। अगर वो चुप रहें तो उन पर स्त्री-विरोधी और जरूरत के समय नारीवाद के साथ खड़े ना दिखने का अभियोग ठहरता है। जो बोल पड़ें तो इतने दिन जिसे जनवादी और क्रांतिदूत कहते आ रहे हैं वो आइकन ही ढह जाएगा!

बाकी भाषा और साहित्य को राजनीति का अखाड़ा बनाने से खुद के लिए ही क्या-क्या विकट समस्याएँ उपजती हैं, ये भी साथियों, कॉमरेडों को अब खूब समझ आ रहा होगा! “दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना”

अंग्रेजी गीत की जगह ‘वंदे मातरम’ से होगा गणतंत्र दिवस का समापन, सरकार का फैसला

गणतंत्र दिवस के अवसर पर होने वाले तीन दिवसीय समारोह के अंतिम दिन विजय चौक पर आयोजित होती आई बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी में बदलाव की खबर है। बताया जा रहा है कि अब बीटिंग रिट्रीट समारोह ‘वंदे मातरम’ की धुन के साथ समाप्त होगा। बता दें इससे पहले तक समारोह का समापन महात्मा गाँधी के पसंदीदा ईसाई गीत ‘एबाइड विद मी’ के साथ होता रहा है जिसे स्कॉटिश हेनरी फ्रांसिस लाइट ने लिखा था।

डेक्कन हेरॉल्ड की रिपोर्ट के अनुसार, रक्षा मंत्रालय ने बताया है कि वे केवल इस समारोह में नई धुनों को शामिल कर रहे हैं। जो कि एक सामान्य बदलाव है। लेकिन कुछ मीडिया रिपोर्ट का कहना है कि इस बदलाव से स्वदेशी और देशभक्ति की भावना बलवती होगी।

बीटिंग रिट्रीट समारोह में क्या होता है?

बीटिंग रिट्रीट का आयोजन राजधानी दिल्ली में रायसीना हिल स्थित विजय चौक पर मिलिट्री बैंड द्वारा गणतंत्र दिवस समारोह के तीसरे दिन 29 जनवरी की शाम को आयोजित किया जाता है। यह 26 जनवरी को शुरू हुए समारोह के समाप्‍त होने का सूचक है। इस दौरान थलसेना, वायुसेना और नौसेना के बैंड सैन्य-धुन बजाते हैं। समारोह के दौरान प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, रक्षा मंत्री और तीनों सेनाओं के प्रमुखों सहित देश-विदेश के गणमान्य अतिथि मौजूद रहते हैं। लेकिन इस बार चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानि सीडीएस भी मौजूद रहेंगे।

कहाँ से आई परंपरा?

बीटिंग रिट्रीट की परंपरा इंग्लैंड से आई है। इसका असल नाम “वॉच सेटिंग” है और सूरज डूबने के समय यह समारोह होता है। 18 जून 1690 में इंग्‍लैंड के राजा जेम्‍स टू ने अपनी सेनाओं को उनके ट्रूप्‍स के वापस आने पर ड्रम बजाने का आदेश दिया था। सन 1694 में विलियम थर्ड ने रेजीमेंट के कैप्‍टन को ट्रूप्‍स के वापस आने पर गलियों में ड्रम बजाकर उनका स्‍वागत करने का नया आदेश जारी किया था।

गणतंत्र दिवस के आखिरी दिन क्यों होता है आयोजन

कहा जाता है कि बीटिंग रिट्रीट समारोह प्राचीन काल से चली आ रही उस परंपरा का हिस्सा है जब युद्ध के मैदान में सेनाएँ दिन ढलने के बाद सैन्य-धुन पर अपने-अपने बैरक में लौट जाती थी। इसलिए गणतंत्र दिवस के दौरान जब तीनों सेनाओं की टुकड़ियाँ, हथियार और दूसरे सैन्य साजो सामान जब 26 जनवरी के बाद बैरक में लौटेंगे तो तीन दिन बाद यानि 29 जनवरी को दिन ढलने के समय बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी का आयोजन किया जाता है।

बता दें कि पिछले साल अलग-अलग रेजीमेंट की 18 मिलिट्री बैंड, 15 पाइप और ड्रम बैंड ने हिस्सा लिया था। वहीं इस साल इंटर सर्विस गार्ड की कमान विंग कमांडर विपुल गोयल संभालेंगे। वायुसेना मार्च की अगुवाई फ्लाइट लेफ्टिनेंट श्रीकांत शर्मा और तीन अन्य अधिकारी करेंगे। वायुसेना बैंड की टुकड़ी में 72 संगीतकार और तीन ड्रम मेजर होंगे

‘रावण’ ने कुछ ग़लत नहीं किया: ऐसा कहने वाली जज कामिनी झेल चुकी हैं हाईकोर्ट की अवमानना कार्रवाई

दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए कुछ अहम बातें कही। पब्लिक प्रोसिक्यूटर ने आरोप लगाया कि आज़ाद उर्फ़ ‘रावण’ ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट्स से हिंसा भड़काने का काम किया, इसीलिए उसे ज़मानत नहीं दी जा सकती। आज़ाद की तरफ से महमूद परचा ने जिरह की। जज ने कहा कि इन पोस्ट्स को शेयर किया जाना चाहिए, जब तक कोई विशेष बात न हो। इसके बाद प्रोसिक्यूटर ने कुछ पोस्ट्स पढ़ कर अदालत को सुनाया।

इन पोस्ट्स में जामा मस्जिद के नजदीक नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में धरना और विरोध प्रदर्शन की बातें कही गई थीं। अदालत ने इसे आपत्तिजनक नहीं माना। जज कामिनी लाऊ ने पूछा कि धरना प्रदर्शन में ग़लत क्या है? उन्होंने पब्लिक प्रोसिक्यूटर से पूछा कि क्या आपने संविधान नहीं पढ़ा है? जज ने आगे सवाल दागा कि ऐसा कौन कहता है कि किसी को विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार नहीं है? जज कामिनी ने कहा कि चंद्रशेखर आज़ाद के फेसबुक पोस्ट्स में कुछ भी ग़लत नहीं है।

जज ने कहा कि विरोध प्रदर्शन करना और धरना देना किसी का भी संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने पूछा कि इन पोस्ट्स में हिंसा की बात कहाँ है? जज ने पब्लिक प्रोसिक्यूटर से कहा कि वो ऐसी बातें कर रहे हैं जैसे लगता है कि वो जामा न होकर मस्जिद पाकिस्तान हो। जज कामिनी ने कहा कि अगर जामा मस्जिद पाकिस्तान हो तो भी वहाँ जाकर विरोध प्रदर्शन किया जा सकता है। उन्होंने याद दिलाया कि आखिर पाकिस्तान भी तो कभी भारत का ही एक हिस्सा था।

अदालत ने कहा कि चंद्रशेखर आज़ाद उर्फ़ ‘रावण’ के किसी भी फेसबुक पोस्ट में कुछ भी ग़लत नहीं है। हालाँकि, पब्लिक प्रोसिक्यूटर ने भी याद दिलाया कि विरोध व धरना प्रदर्शन के लिए भी अनुमति लेनी पड़ती है। इस पर जज ने पूछा कि ये अनुमति क्या होता है? उन्होंने दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि धारा-144 बार-बार लगाना ग़लत है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर पर सुनवाई करते हुए ऐसा कहा था। जज ने दावा किया कि संसद के आगे प्रदर्शन करने वाले कई लोग आगे जाकर मंत्री व बड़े नेता बने। उन्होंने कहा कि आज़ाद भी नेता बन रहे हैं, उन्हें प्रदर्शन का अधिकार है।

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जज कामिनी लाऊ के ख़िलाफ़ कभी दिल्ली हाईकोर्ट ने अवमानना की कार्रवाई शुरू की थी। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच के हस्तक्षेप के बाद ये कार्रवाई रोक दी गई थी। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने जज कामिनी ने कहा था कि वो बिना शर्त माफ़ी माँगें। दरअसल, कुछ सिविल अपील्स में दिल्ली हाईकोर्ट ने फ़ैसले सुनाए थे, जिसपर कामिनी लाऊ ने आपत्ति जताई थी। उन्होंने उन फ़ैसलों में से कुछ बातों को हटाने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट को एप्लीकेशन लिखा था, जिसमें आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग करने का आरोप लगा था। इसके लिए उन्हें माफ़ी माँगनी पड़ी थी।

मैंने गूगल पर देखी थी जमीन, पैसा कहाँ से आया याद नहीं: वाड्रा की बेजोड़ दलील

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद और बिजनेसमैन रॉबर्ट वाड्रा इन दिनों बीकानेर लैंड डील में जाँच का सामना कर रहे है। मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जाँच में एक नई बात निकलकर सामने आई है। जानकारी के मुताबिक रॉबर्ट वाड्रा ने ED से कहा कि उन्होंने बीकानेर के दो गाँवों में जो जमीन खरीदी, उसके लिए पैसा कहाँ से आया, ये उन्हें याद नहीं आ रहा है। उनका कहना है कि उन्होंने तो बस गूगल मैप पर जमीन देखी थी। बता दें कि जमीन की इस खरीददारी से उनके बिजनेस को काफी फायदा पहुँचा है।

अगस्त 2017 में राजस्थान सरकार द्वारा बीकानेर जमीन घोटाला की जाँच केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) को सौंपने के बाद ED और CBI दोनों ही इस मामले की जाँच कर रही है। जाँच एजेंसी ED के मुताबिक जब बीकानेर के दो गाँवों में धोखाधड़ी करके जमीन खरीदी गई थी, उस समय वाड्रा M/s Skylight Hospitality Pvt Ltd कंपनी के ‘एक्टिव डायरेक्टर’ थे। Skylight कंपनी में 99% शेयर वाड्रा का है और इसी वजह से उन्हें कंपनी के सारे फैसले लेने का अधिकार है।

ED ने आरोप लगाया कि बीकानेर के जगनेर और गोयलरी में स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी द्वारा 2010 में 72 लाख रुपए में जमीन खरीदी गई और फिर 2012 में उसे M/s Allegeny Finlease (P) Ltd को 5.15 करोड़ रुपए में बेच दी गई। इस दौरान कथित तौर पर 4.43 करोड़ रुपए का लाभ पहुँचा। ED ने आरोप लगाया कि वाड्रा की कंपनी ने इस पैसे का इस्तेमाल दिल्ली के सुखदेव विहार में घर खरीदने में किया। जो कि ED ने जाँच के लिए कुर्क कर लिया है।

ED ने जब वाड्रा से उनकी कंपनी द्वारा जमीन की खरीद के लिए फंड के सोर्स के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्हें फंड का सोर्स याद नहीं है। वाड्रा ने कहा कि फंड की व्यवस्था कंपनी के इनकम से की गई होगी और इसका भुगतान बैंकिंग चैनलों के माध्यम से किया गया है, लोगों को पता है। वाड्रा ने ईडी से कि उन्होंने केवल “गूगल मैप” पर जमीन देखी थी, जो कि कंपनी के एक अधिकृत प्रतिनिधि महेश नागर ने उन्हें दिखाया था। 

वहीं यह पूछे जाने पर कि क्या जमीन की खरीद-बिक्री से पहले वह बीकानेर गए थे, तो उन्होंने इसका जवाब नहीं में दिया। साथ ही वाड्रा ने यह भी कहा कि वह जमीन के कागजात के बारे में भी नहीं जानते क्योंकि वेरिफिकेशन का काम राजेश खुराना को सौंपा गया था।

इतना ही नहीं वाड्रा ने उन चार लोगों को भी पहचानने से इनकार कर दिया, जिन पर ED ने बीकानेर जमीन घोटाले के संबंध में मामला दर्ज किया है। भुगतान के तरीके के बारे में पूछे जाने पर वाड्रा ने कहा कि उन्होंने महेश नागर के नाम चेक जारी किए थे और डॉक्यूमेंट्स की जाँच राजेश खुराना ने की थी। वाड्रा ने कहा कि वह जमीन के मालिक को नहीं जानते। उन्होंने कहा कि महेश नागर के कहने पर भुगतान किया गया।

जब वाड्रा को स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी के बैंक स्टेटमेंट और सेल डीड दिखाए गए तो उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि M/s Allegeny Finlease Pvt Ltd को भुगतान किया गया है और फिर इसका इस्तेमाल नई दिल्ली के सुखदेव विहार में प्रॉपर्टी खरीदने में किया गया है। वाड्रा ने लगातार मामले में किसी भी तरह के फर्जी काम से इनकार किया। ED ने रॉबर्ट वाड्रा की माँ मौरीन वाड्रा और स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड के तत्कालीन निदेशक और अब कंपनी में पार्टनर से भी पूछताछ की थी। मौरीन ने कहा कि उस कंपनी में उनकी सिर्फ एक फीसदी की हिस्सेदारी थी।

₹10 करोड़ का घर, रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी और ED द्वारा कब्जे की माँग: बीकानेर जमीन घोटाले से जुड़ा है तार

प्रियंका की सुरक्षा में ‘सेल्फी वाली’ चूक रॉबर्ट वाड्रा के लिए बलात्कार, यौन अपराध जैसे?

क़ानून व्यवस्था बहाल करे पुलिस: शाहीन बाग़ में पिकनिक मना रहे लोगों पर हाई कोर्ट हुआ सख़्त

दिल्ली हाईकोर्ट ने शाहीन बाग़ में हो रहे विरोध प्रदर्शनों को लेकर पुलिस से कहा है कि वो जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए काम करे। कोर्ट ने कहा कि बड़े स्तर पर जनता के हित को देखते हुए क़ानून-व्यवस्था बहाल किए जाने की दिशा में प्रयास किए जाएँ। सीएए विरोधी प्रदर्शनों के कारण कालिंदी कुंज-शाहीन बाग़ रास्ता दिसंबर 15, 2020 से ही बंद पड़ा है और इसीलिए स्थानीय जनता को ख़ासी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वहाँ विरोध प्रदर्शन के नाम पर जमे लोग बिरयानी व अंडे खा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों के पिकनिक मनाने पर भी स्थानीय लोगों ने आपत्ति जताई है।

मंगलवार (जनवरी 14, 2020) को दिल्ली हाईकोर्ट ने उस याचिका पर सुनवाई की, जिसमें बंद रास्ते को खोलने के लिए दिल्ली पुलिस को निर्देशित करने की माँग की गई थी। इस याचिका में कहा गया है कि शाहीन बाग़ में हो रहे प्रदर्शन के कारण ऐसे लाखों लोगों को परेशानी का समाना करना पड़ रहा हुई, जो रोज़ाना उस रास्ते से ही सफर करते रहे हैं। पिछले 1 महीने से ऐसे लोग अलग रास्तों से आते-जाते हैं, जिसके कारण उनके कई अतिरिक्त घंटे बर्बाद हो जाते हैं।

इस याचिका को सामाजिक कार्यकर्ता और वकील अमित साहनी ने दायर किया था। याचिका में ओखला अंडरपास को भी खोलने की बात कही गई है, जो कई दिनों से बंद पड़ा है। पहले इन रास्तों को अस्थायी रूप से बंद किया गया था लेकिन बाद में इसकी अवधि बढ़ती चली गई क्योंकि शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारी उठने का नाम नहीं ले रहे हैं। मंगलवार को लोहड़ी के दिन भी वहाँ काफ़ी ख़ुशी का माहौल था और लोगों ने आग जला कर नाच-गान में हिस्सा लिया। कन्हैया कुमार, बरखा दत्त और योगेंद्र यादव सरीखे नेता व पत्रकार भी वहाँ पहुँच कर फोटो क्लिक करवाने में लगे हुए थे।

सड़क जाम के कारण सबसे ज्यादा परेशानी बच्चों को हो रही है। उन्हें स्कूल जाने में 2 घंटे का अतिरिक्त समय लग रहा है। प्रदर्शनकारियों के कारण दिल्ली, यूपी और हरियाणा- तीन राज्यों के लोगों को परेशानी का समाना करना पड़ रहा है। आश्रम क्षेत्र में स्थिति ये है कि जाम की वजह से सिर्फ़ 1 ट्रैफिक सिग्नल को पार करने में 20 मिनट का समय लग रहा है। इस याचिका में कहा गया है कि जहाँ पहले इस रास्ते से प्रतिदिन 30,000 गाड़ियाँ जाती थीं, शाहीन बाग़ इलाक़े वाला रास्ता बंद होने का कारण 1 लाख अतिरिक्त गाड़ियों की संख्या बढ़ गई है।

बता दें कि शाहीन बाग़ प्रदर्शन को मीडिया का भी बड़ा कवरेज मिल रहा है और इसे मुस्लिम महिलाओं की ज़ंग बता कर प्रचारित किया जा रहा है। यहाँ एक 20 दिन की नवजात बच्ची को आंदोलन का चेहरा बताया गया था। कुछ बूढ़ी महिलाओं को एनडीटीवी ने अपने स्टूडियो में बुला कर इस प्रदर्शन के महिमामंडन का प्रयास किया था।

‘शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारी खा रहे बिरयानी, मना रहे पिकनिक’ – जाम से परेशान स्थानीय लोग सड़क पर

‘जिन्ना वाली आजादी’ के नारे से गूँजा शाहीन बाग: CAA के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन का पर्दाफाश, Video Viral

शाहीन बाग़ की आवारा भीड़ पर बावली हुई जा रही मीडिया की नज़र में कोटा के बच्चों की जान सस्ती

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी 8वाँ अजूबा: मात्र 6 दिन में कमाए ₹3.8 करोड़, 1 साल में ₹82 करोड़

गुजरात के वडोदरा से 100 किलोमीटर दूर नर्मदा जिले में ‘लौह पुरुष’ सरदार वल्लभ भाई पटेल की 182 मीटर ऊँची प्रतिमा को दुनिया के आठ अजूबों में शामिल कर लिया गया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने खुद सोमवार (जनवरी 13, 2019) को इसकी जानकारी दी। उन्होंने ट्वीट कर बताया कि स्टैच्यू ऑफ यूनिटी को शंघाई कॉपरेशन ऑर्गनाइजेशन की 8 अजूबों की लिस्ट में शामिल किया गया है। जिसके लिए वह एससीओ के कदम की सराहना करते हैं। उनके मुताबिक इस कदम को एक प्रेरणा की तरह देखा जाएगा।

भारत के लिए यह एक उपलब्धि की बात है कि न्यूयॉर्क स्थित ‘स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी’ से दोगुने लंबे सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा को मात्र एक साल में ही इतनी ख्याति मिल गई। लेकिन अफसोस! अपने ही देश में ध्रुव राठी की तरह कुछ लोग ऐसे हैं, जो मोदी सरकार पर सवाल उठाने के लिहाज से शायद आज भी इसकी आलोचना करने से नहीं थकें।

उल्लेखनीय है कि साल 2018 में मोदी सरकार द्वारा प्रतिमा अनावरण के बाद कुछ विरोधियों ने बारिश के मौसम में दावा किया था कि मात्र 2 साल में ये प्रतिमा खराब हो जाएगी।

लेकिन, अब परिस्थितियाँ और आँकड़े देखकर लगता है कि मोदी सरकार की ये देन विरोधियों के मुँह पर एक तमाचा है। जिससे देश में न केवल पर्यटन क्षेत्र का विस्तार हुआ, बल्कि राजस्व में भी बढ़ोतरी हुई है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार मात्र क्रिसमस वीक में ही 1.77 लाख पर्यटक स्टैच्यू ऑफ यूनिटी देखने आए और सिर्फ़ 6 दिन के अंदर ₹3.8 करोड़ की कमाई हुई।

इसके अलावा प्रतिमा अनावरण के बाद से अब तक 38 लाख पर्यटक इस जगह आकर घूम चुके हैं। नवंबर महीने में तो यहाँ आने वाले पर्यटकों की संख्या ने स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी को भी पछाड़ दिया था। स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी में जहाँ पर्यटकों की संख्या 10,000 गिनी गई थी, वहीं नवंबर महीने में ही लौह पुरुष की इस प्रतिमा को देखने 15,036 लोग पहुँचे थे।

इसके अलावा बता दें कि मात्र एक साल के भीतर स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से ₹82 करोड़ राजस्व प्राप्ति हुई है। जबकि 1632 में बने ताजमहल की कमाई ₹86 करोड़ हुई। इसके अतिरिक्त 1 नवंबर 2019 से 12 सितंबर 2019 तक के आँकड़ों के अनुसार इस स्थल को देखने पहुँचे लोगों की तादाद ने ताजमहल को देखने पहुँचने वाले लोगों की संख्या को पछाड़ दिया था। जानकारी के अनुसार इस अंतराल में 26 लाख लोग इसे देखने पहुँचे थे और कमाई 57 करोड़ रुपए हुई थी। इसके अलावा टाइम्स मैग्जीन के द्वारा सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा को दुनिया की 100 महानतम जगहों में शामिल किया गया था।

सरदार पटेल के स्टैच्यू ऑफ यूनिटी ने तोड़ डाला अमेरिका के स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी का रिकॉर्ड

‘तुम बहुत छोटे कर्मचारी हो, बाहर भागो’ – डॉक्टर को सरेआम धमकाया अखिलेश यादव ने, वीडियो हो गया Viral

कन्नौज हादसे में घायलों से मिलने अस्पताल पहुँचे उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने अस्पताल के मेडिकल ऑफिसर को ही जमकर हड़काया। इसका वीडियो भी सामने आया है। जिसमें वो अस्पताल के इमरजेंसी मेडिकल ऑफिसर को सरेआम धमकाते, डाँटते और बदसलूकी से बात करते नज़र आ रहे हैं।

तिलमिलाए अखिलेश यादव ने चीफ मेडिकल ऑफिसर से यहाँ तक कह दिया कि ‘बाहर भागो यहाँ से।’ इस वीडियो में नजर आ रहा है कि अखिलेश यादव कन्नौज के छिबरामऊ स्थित अस्पताल में घायलों से मिलने पहुँचे थे और उनका हालचाल पूछ रहे थे। इसी बीच इलाज करा रहे एक मरीज के परिजन ने कहा कि ‘अभी तक इसको चेक तक नहीं दिया गया है।’ 

इस पर अखिलेश यादव पूछते हैं कि काहे जी… तभी ही वहाँ मौजूद इमरजेंसी मेडिकल ऑफिसर कहते हैं कि मिल गई है भैया… इसके बाद अखिलेश यादव डॉक्टर से मुखातिब होते हुए कहते हैं, “तुम मत बोलो, तुम सरकारी आदमी हो। हम जानते हैं, सरकार क्या होती है। तुम मत बोलो, इसलिए मत बोलो क्योंकि तुम सरकार के आदमी हो। तुम्हें नहीं बोलना चाहिए। तुम सरकार का पक्ष नहीं ले सकते। तुम बहुत छोटे अधिकारी हो। बहुत छोटे कर्मचारी हो। आरएसएस के हो सकते हो, बीजेपी के हो सकते हो, लेकिन ये बात नहीं कह सकते कि वो क्या कह रहा है, तुम मुझे नहीं समझा सकते। दूर हो जाओ एकदम… एकदम दूर हो जाओ… एकदम हट जाओ यहाँ से, भाग जाइए यहाँ से, बाहर भागो यहाँ से।”

इसके बाद अखिलेश यादव अस्पताल के कमरे में मौजूद लोगों से पूछते हैं कि ‘क्या पोस्ट है इसकी? और वहाँ मौजूद लोगों में से कोई कहता है कि ईएमओ (इमरजेंसी मेडिकल ऑफिसर) हैं। इस पर अखिलेश यादव कहते हैं कि इमरजेंसी मेडिकल ऑफिसर हैं तो कहाँ के रहने वाले हैं। तभी एक शख्स जवाब देता है ‘गोरखपुर’। तब अखिलेश यादव फिर कहते हैं कि गोरखपुर के हैं, इसलिए सरकार की साइड ले रहे हैं।

इस संबंध में इमरजेंसी मेडिकल ऑफिसर डॉ डीएस मिश्रा का कहना है कि पूर्व सीएम ने उनके साथ अभद्रता की है। उन्हें भाजपा व आरएसएस का व्यक्ति बताकर कमरे से बाहर निकाल दिया। वह इमरजेंसी ड्यूटी पर तैनात थे। डीएस मिश्रा ने बताया कि जब अखिलेश यादव अस्पताल पहुँचे थे तो वो वहाँ पर मरीजों का इलाज कर रहे थे। अखिलेश यादव के आने पर एक मरीज ने कहा कि उसे मुआवजे का चेक नहीं मिला है। जिसके बाद उन्होंने स्पष्ट करने की कोशिश की कि चेक दिया गया है। इस पर पूर्व सीएम अखिलेश यादव भड़क गए और उन्हें कमरे से बाहर जाने के लिए कह दिया।

…जब 14 साल पहले राजदीप सरदेसाई ने फर्जी स्टिंग ऑपरेशन से एक डॉक्टर की जिंदगी कर दी थी बर्बाद

जेएनयू हिंसा मामले पर कथित स्टिंग ऑपरेशन को लेकर मीडिया ग्रुप इंडिया टुडे लगातार सुर्खियाँ बटोर रहा है। वही फर्जी स्टिंग ऑपरेशन, जिसका न सिर है और न ही पाँव। दरअसल इंडिया टुडे के पत्रकारों का फर्जी स्टिंग ऑपरेशन को लेकर पुराना इतिहास रहा है या फिर यूँ कहें कि इनका इससे गहरा नाता रहा है। आइए बताते हैं कि ये ‘पत्रकार’ किस तरह से ‘पत्रकारिता’ के नाम पर कारनामा करते हैं और आम लोगों की जिंदगी बर्बाद करते हैं।

इसमें प्रमुख नाम है: बार-बार अपनी फजीहत कराने वाले अविश्वसनीय पत्रकार राजदीप सरदेसाई का। जिन्होंने अभी हाल ही में 2007 में किए गए फर्जी स्टिंग ऑपरेशन को लेकर कोर्ट के समक्ष माफी माँगी थी। हालाँकि राजदीप सरदेसाई तो यह कभी नहीं चाहते होंगे कि उनके द्वारा कोर्ट के समक्ष माफी माँगने की घटना सामने आए, लेकिन ऐसा हो नहीं सका।

खैर, फर्जी स्टिंग ऑपरेशन के मामले में इनकी फेहरिस्त लंबी है और इन्हें इसका अच्छा-खासा अनुभव भी है। अब हम आपको उनके 2006 में किए गए उस ‘कारनामे’ से भी रूबरू करवाते हैं, जिसने एक आम आदमी की जिंदगी को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया। यहाँ पर हम आपको बता दें कि राजदीप अकेले ही इसमें शामिल नहीं हैं। इनका पूरा गिरोह ही इस मामले में काफी सक्रिय रहा है। राजदीप के इस गिरोह में उनके अलावा पत्रकार से नेता और फिर भाव न मिलने पर पत्रकार बने आशुतोष, राघव बहल (तब IBN के थे, अब Quint के मालिक) और जमशेद खान भी शामिल है। ये वही जमशेद खान हैं, जिन्होंने जेएनयू के फर्जी स्टिंग ऑपरेशन में भी अहम भूमिका निभाई है।

‘मीडिया’ और ‘पत्रकार’ किस तरह से माफिया की तरह काम करता है, इसका उदाहरण है यह मामला। दरअसल यह मामला 2006 का है, जब नोएडा के सरकारी अस्पताल के डॉक्टर अजय अग्रवाल के खिलाफ IBN-7 और CNN-IBN चैनल ने ‘शैतान डॉक्टर’ नाम से एक ‘स्टिंग ऑपरेशन’ किया था। इस तथाकथित स्टिंग ऑपरेशन में दावा किया गया था कि डॉक्टर अग्रवाल भीख मँगवाने वाले गिरोहों के लिए बच्चों के हाथ-पैर काटने का काम करते हैं। इस स्टिंग ऑपरेशन के बाद डॉक्टर अग्रवाल की जिंदगी में तूफान आ गया। उनका घर से निकलना मुश्किल हो गया। जिंदगी नर्क बन गई। लोगों ने उनके घर पर पथराव भी किया।

हालाँकि, अभी तक की जाँचों में डॉक्टर अग्रवाल को निर्दोष पाया गया है। लेकिन इसके बावजूद इन लोगों ने डॉक्टर अग्रवाल से माफी नहीं माँगी है। बता दें कि इस फर्जी स्टिंग ऑपरेशन के कर्ता-धर्ता थे राजदीप सरदेसाई, जो कि उस समय IBN-7 के एडिटर इन चीफ थे और आशुतोष चैनल के एडिटर थे। डॉक्टर अग्रवाल ने फर्जी केस में फँसाने को लेकर राजदीप सरदेसाई, आशुतोष, चैनल के मालिक राघव बहल और रिपोर्टर जमशेद खान, अरुणोदय मुखर्जी समेत कई अन्य के खिलाफ मानहानि का केस दर्ज कराया था। केस अभी भी कोर्ट में लंबित है। इन पर केस चल रहा है।

टीवी पर बैठकर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले ये तथाकथित पत्रकार किस कदर शातिर हैं, ये इसी बात से पता चलता है कि उन्होंने गलती पकड़े जाने के बावजूद कभी माफी नहीं माँगी। जब उन्हें कोर्ट का नोटिस आया, तो वो उसकी भी कई सालों तक अनदेखी करते रहे। आखिरकार जब अदालत ने उनके खिलाफ वारंट जारी किया, तब जाकर 12 साल बाद 2018 में राजदीप सरदेसाई, आशुतोष और अरुणोदय मुखर्जी ने सरेंडर किया। हालाँकि इन्हें जेल से बेल मिल गई।

डॉक्टर अग्रवाल ने आरोप लगाया कि राजदीप सरदेसाई, आशुतोष और राघव बहल ने चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिए उनकी जिंदगी बर्बाद कर दी। 2006 में चैनल के शुरू होने के कुछ दिन बाद ही ये स्टिंग ऑपरेशन दिखाया गया था। ये कार्यक्रम पूरे एक सप्ताह तक चला गया था। डॉक्टर अग्रवाल तब नोएडा के सरकारी अस्पताल में ऑर्थोपेडिक सर्जन के तौर पर तैनात थे। डॉक्टर अग्रवाल ने जमशेद खान को ब्लैकमेलकर करार देते हुए आरोप लगाया था कि उसी ने फर्जी स्टिंग ऑपरेशन को अंजाम दिया था और फिर इसे IBN7 को दिया था।

उन्होंने आगे आरोप लगाते हुए कहा था कि उस समय IBN7 और CNN-IBN चैनल नए लॉन्च किए गए थे और वे किसी सनसनीखेज स्टोरीज की तलाश में थे, ताकि चैनल को टीआरपी मिल सके। और यही वजह है कि उन्होंने जुलाई 2006 में लगभग एक सप्ताह तक लगातार इस फर्जी स्टिंग ऑपरेशन को प्रसारित किया। फिलहाल राघव बहल THE QUINT नाम के वेबसाइट से प्रोपेगेंडा फैलाने का काम कर रहे हैं, जो बीजेपी और भारतीय सेना के खिलाफ फर्जी खबरें छापती है।

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TikTok पर युवराज सिंह ने जीता सबका दिल: अमिताभ बच्चन, ऋतिक रोशन को करनी पड़ी तारीफ

पिछले कुछ समय में टिकटॉक के जरिए कई लोगों ने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर अपनी एक अलग पहचान बनाई। कुछ ने इसके जरिए अच्छी कमाई की, तो कुछ ने इसे सिर्फ मनोरंजन समझा। कई बार टिकटॉक स्टार्स बहुत फेमस भी हुए। लेकिन कई बार कुछ लोग चंद फॉलोवर्स में सिमट गए। ऐसे में इस बीच एक नाम राजस्थान के रहने वाले युवराज सिंह का छाया। जिनके डांस वीडियो टिकटॉक पर देखकर न केवल दर्शक बल्कि बड़े-बड़े बॉलीवुड स्टार भी उनके फैन हो गए और पूछने लगे कि ये शख्स कौन है। इन स्टार्स की सूची में अमिताभ बच्चन, अनुपम खेर, सुनील शेट्टी और ऋतिक रौशन जैसे जाने-माने कलाकार हैं।

बता दें कि युवराज अपनी एक वीडियो के आखिर में ‘औकात’ की बात करते हैं और बड़ी सादगी से दिखाते हैं कि कैसे वे खुद ही अपनी वीडियो बनाते हैं। जिसके बाद शशांक नामक यूजर उन्हें फेमस करने की ठानते हैं और सोशल मीडिया पर उनकी वीडियो को अपने अकॉउंट से शेयर करते हैं। जिसके बाद देखते-देखते ही ये वायरल हो जाती है। युवराज के वीडियो को अब तक शशांक के अकॉउंट से 15 हजार से ज्यादा बार रीट्वीट किया जा चुका है और अनगिनत लोग उनकी प्रतिभा के लिए उनकी तारीफ कर रहे हैं।

ऋतिक रौशन ने उन्हें ‘Smoothest Airwalker’ कहा है और पूछा है कि ये शख्स कौन है?

अनुपम खेर ने युवराज सिंह की वीडियो शेयर करते हुए उन्हें बेमिसाल बताया है और अपने फॉलोवर्स से उन्हें देखने को कहा है।

वहीं सुनील शेट्टी और अरशद वारसी ने भी युवराज की तारीफ की है।

बता दें कि दिग्गज कलाकारों से तारीफ पाने के बाद सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने भी ‘wow’ लिखकर उनके वीडियो को शेयर किया।

इसके बाद युवराज काफी भावुक हो गए और एक मीडिया संस्थान से बात करते हुए उन्होंने अमिताभ बच्चन को धन्यवाद दिया। युवराज ने कहा कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि लेजेंडरी अभिनेता उनकी वीडियो शेयर करेंगे।

शशांक सिंह जिन्होंने युवराज की वीडियो शेयर करके उन्हें फेमस बनाया, उन्होंने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया कि उनका टिकटॉक पर अकॉउंट नहीं है, लेकिन वो अपने खाली समय में इस पर वीडियो देखते हैं। उनके मुताबिक युवराज के वीडियो मिलने से पहले भी वो टिकटॉक वीडियोज़ स्क्रॉल कर रहे थे, कि तभी उन्होंने युवराज का डांस देखा।

उन्होंने बताया, “वीडियो देखने के बाद मैं युवराज की प्रोफाइल पर गया और एक-एक कर सारी वीडियो देखने लगा। मैं इस दौरान उसके पैरों से अपनी आँखें नहीं हटा पाया।” शशांक के अनुसार जब उन्होंने एक वीडियो में देखा कि शशांक कैसे पत्थर पर रखकर अपने वीडियो बनाते हैं, तो उन्होंने तय किया कि युवराज को वो मिलना चाहिए, जिसके वो हकदार हैं। बता दें कि शशांक के अनुसार उनके दोस्तों ने इस वीडियो को आगे बढ़ाने में बहुत मदद की। वो उम्मीद करते हैं, युवराज जिस काबिल हैं, वो उसे जरूर मिले।

Tanhaji उत्तर प्रदेश में हुई टैक्स फ्री, अजय देवगन ने CM योगी आदित्यनाथ से की फिल्म देखने की गुजारिश

17वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी के सेनापति सूबेदार तानाजी मालुसरे की विजयगाथा पर आधारित फिल्म ‘तानाजी: द अनसंग वॉरियर’ को योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश में आज आधिकारिक रूप से टैक्स फ्री कर दिया। बता दें कि अजय देवगन ने खुद इसके लिए सीएम योगी से अनुरोध किया था।

उत्तर प्रदेश सरकार के निर्णय की कॉपी

तानाजी के अभिनेता अजय देवगन ने ट्वीट करके मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को धन्यवाद दिया। साथ ही उनसे गुजारिश भी किया कि अगर संभव है तो वो इस मूवी को जरूर देखें।

इस फिल्म में मुख्यत: सिंहगढ़ का युद्ध दर्शाया गया है। जिसे छत्रपति शिवाजी की ओर से उनके सेनापति सूबेदार तानाजी मालुसरे और मुगलों की ओर से उदय सिंह भान ने लड़ा था। युद्ध का कारण कोंढाना का किला था। जिसे मालुसरे की अगुवाई में जीतकर मराठाओं ने भगवे की शान को डगमगाने नहीं दिया था।

इस युद्ध में तानाजी ने अपनी जान गवा दी थी। जिसके बाद छत्रपति शिवाजी ने उनके सम्मान में कोंढाना किले का नाम सिंहागढ़ कर दिया था। और उनकी वीरगति की खबर सुनकर कहा था “गढ़ आला, पण सिंह गेला” यानी मराठाओं ने तो किला जीत लिया, लेकिन अपना शेर खो दिया।

फिल्म में सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भों को शानदार तरीके से पेश किया गया है। भगवे की शान को दृश्यों के साथ-साथ डॉयलॉग डिलीवरी ने बरकरार रखा है। जिसके कारण कई वामंपथी इस फिल्म की आलोचना कर रहे हैं। इन वामपंथियों का कहना है कि फिल्म हिंदुत्व को बढ़ावा दे रही है और इस्लामोफोबिक है।

द वायर जैसे संस्थान इस फिल्म को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह से जोड़कर पेश कर रहे हैं और इसे ‘हिंदू राष्ट्र’ के लिए ट्रिब्यूट बताकर इस पर तंज कस रहे हैं। द क्विंट भी इस सूची में पीछे नहीं हैं। ट्रेलर देखकर लंबा चौड़ा पोस्ट लिखने वाला ये संस्थान अब फिल्म आने के बाद इसमें मौजूद गीत ‘मॉय भवानी से लेकर शंकरा रे शंकरा’ से भी आहत है।

गौरतलब है कि, बीते शुक्रवार को बड़े पर्दे पर आ चुकी इस फिल्म ने शरुआत में ही 16 करोड़ की कमाई कर ली है। जबकि उसी दिन आई छपाक मात्र 4,75 करोड़ की कमाई कर पाई। लेकिन बता दें, 10 जनवरी को तानाजी के साथ पर्दे पर आई फिल्म छपाक फिल्म किन्हीं भी मायनों में कम नहीं है। ये फिल्म एक एसिड सर्वाइवर की कहानी है। जिसने हार मानकर चुप बैठने से बेहतर समाज में बदलाव लाने को समझा और सब के लिए प्रेरणा बनी। दोनों फिल्मों की स्टोरी लाइन बिलकुल अलग है और काबिल-ए-तारीफ है। लेकिन, मुमकिन है फिल्म में लक्ष्मी अग्रवाल का किरदार निभाने वाली दीपिका पादुकोण के विवादों में आने के कारण फिल्म की कमाई पर असर पड़ा।

शवयात्रा में भी नहीं थी राम नाम लेने की इजाजत, Tanhaji ने बताया औरंगज़ेब कितना ‘महान’

तानाजी की वीरता से वामपंथी पोर्टल मूर्छित, खुन्नस में देश के अस्तित्व को ही नकारा

Tanhaji से आहत वामपंथी मीडिया: मजहबी वीरों पर रेटिंग देने वाला हिंदू शासकों की शौर्य-कथा पर बिलबिलाया