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CM केजरीवाल की तुलना नपुंसक से! चुनाव से एक महीने पहले शशि थरूर ने क्यों की ऐसी बात?

राजधानी दिल्ली में 8 फरवरी को मतदान होने वाला है। इसको लेकर सियासी माहौल गर्माया हुआ है। इस बीच कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल पर तीखे हमले करते हुए कहा कि वो ‘बगैर जिम्मेदारी का सत्ता’ (power without responsibility) चाहते हैं।

उन्होंने यह बात एक इंटरव्यू के दौरान कही। उनसे जब दिल्ली चुनाव और नागरिकता संशोधन कानून (CAA) पर अरविंद केजरीवाल के रवैये को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने अरविंद केजरीवाल पर संशोधित नागरिकता अधिनियम के खिलाफ मजबूत रुख नहीं अपनाने का आरोप लगाया और कहा कि दिल्ली के मुख्यमंत्री कानून के समर्थक और विरोधियों दोनों को अपने पक्ष में करना चाहते थे। 

थरूर ने कहा कि केजरीवाल शायद नागरिकता संशोधन कानून के समर्थक और विरोधी दोनों लोगों को अपनी तरफ चाहते हैं, इसलिए उन्होंने इस पर कोई कड़ा रुख नहीं अपनाया। वो दोनों लोगों को अपनी तरफ करके वोट पाना चाहते हैं। आगे थरूर ने कहा कि केजरीवाल ने CAA और NRC को हटाने वाले बयान दिए हैं लेकिन उन्होंने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है। 

उन्होंने केजरीवाल पर तीखे हमले करते हुए कहा, “केजरीवाल ने अपने राज्य में हुई हिंसा के पीड़ितों के साथ वो सहानुभूति भी नहीं दिखाई, जो कि लोग एक मुख्यमंत्री से अपेक्षा रखते हैं। अगर किसी राज्य में छात्रों के साथ इस तरह की हिंसा होती तो मुख्यमंत्री जरूर उनसे मिलने जाते और सहानुभूति जताते। असल में केजरीवाल ‘जिम्मेदारी के बिना सत्ता’ चाहते हैं, जैसा कि नपुंसक हमेशा से चाहते हैं।”

थरूर के इस बयान पर उनकी काफी फजीहत हुई। जिसके बाद उन्होंने बिना ‘जिम्मेदारी के सत्ता’ का इस्तेमाल करने के लिए माफी माँगी है। उन्होंने इसे ब्रटिश पॉलिटिक्स का पुराना लाइन बताते हुए कहा कि हाल ही में इसका इस्तेमाल टॉम स्टॉपर्ड ने किया था। थरूर ने कहा कि इसका इस्तेमाल अनुचित था और वो अपने इस बयान को वापस लेते हैं।  

आश्चर्य की बात यह है कि थरूर ने अपने ‘बगैर जिम्मेदारी की सत्ता’ के लिए तो माफी माँगी लेकिन नपुंसक शब्द के लिए माफी नहीं माँगी। लोग कयास यह लगा रहे हैं कि शायद ‘बगैर जिम्मेदारी की सत्ता’ पर थरूर ने इसलिए माफी माँग ली होगी, क्योंकि कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी पर भी ‘बिना जिम्मेदारी के सत्ता का सुख भोगने’ का आरोप लगाया जाता रहा है। अब कॉन्ग्रेस नेता से नपुंसक शब्द के लिए भी माफी माँगने की माँग की जा रही है।

JNU हिंसा: लेफ्ट की पोल खोलते हुए ABVP ने जारी किए 8 वीडियो, दिखी CPI के बड़े नेता की बेटी

जेएनयू में भड़की हिंसा के बाद वामपंथी संगठनों ने मुखर होकर एबीवीपी कार्यकर्ताओं को पूरी घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया। हालाँकि, इस दौरान कई उपलब्ध साक्ष्यों ने लेफ्ट के दावों को खारिज किया। लेकिन, फिर भी सिर्फ़ और सिर्फ़ एबीवीपी पर आरोप मढ़े जाते रहे। इसी बीच अपना पक्ष स्पष्ट करने के लिए कल 13 जनवरी को एबीवीपी ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। जहाँ संगठन ने हिंसा में शामिल वामपंथ की परतों को सबूतों सहित खोलकर रख दिया।

कल प्रेस वार्ता में न केवल एबीवीपी ने लेफ्ट को 5 जनवरी की हिंसा के लिए उत्तरदायी बताया। बल्कि एक साथ 8 वीडियो जारी कर लेफ्ट का पर्दाफाश भी किया। जानकारी के अनुसार इन वीडियो में लेफ्ट कार्यकर्ताओं को स्पष्ट रूप से एबीवीपी कार्यकर्ताओं को मारते देखा जा सकता है। साथ ही उन लोगों को भी साफ देखा जा सकता है, जिनके नाम पुलिस ने हिंसा के मद्देनजर लिए। बता दें, पत्रकारों से बात करते हुए एबीवीपी नेताओं ने मामले में विस्तार से जाँच की माँग उठाई।

गौरतलब है कि इस कॉन्फ्रेंस में एक ओर जहाँ एबीवीपी के प्रदेश सचिव सिद्धार्थ यादव, वीडियो में सीपीआई नेता डी. राजा की बेटी अपराजिता के हाथ में डंडे पर ध्यान सबका आकर्षित करवाते दिखे। वहीं, अपराजिता की मां और सीपीआई लीडर ऐनी राजा ने कहा कि एबीवीपी जेएनयू कैंपस में हुए हमले से ध्यान हटाने के लिए इस तरह की बात कर रही है।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेता सिद्धार्थ यादव ने कहा कि लेफ्ट विंग के ऐक्टिविस्टिस और छात्र विडियो में मफलर पहने हुए रॉड और डंडे इकट्ठे करते दिख रहे हैं।

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एक अन्य वीडियो में आइशी घोष और जेएनयू स्टूडेंट यूनियन की पूर्व संयुक्त सचिव अमुथा जयदीप डंडे लेकर पेरियार हॉस्टल में जाती दिख रही हैं। वहीं, दूसरे वीडियो में वामपंथी प्रोफेसर बीएस बडोला को सुरक्षाकर्मियों को धमकी देते देखा जा सकता है। यहाँ साफ कर दें कि एबीवीपी द्वारा जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक बीएस बडोली वहीं प्रोफेसर हैं, जिन्होंने लेफ्ट गुंडों को परिसर में घुसाने में मदद की थी।

इसके अलवा जेएनयू छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष गीता कुमारी को नकाबपोशों के साथ बैठा देखा जा सकता है और चुनचुनकुमार को हाथ में डंडा लेकर छात्रों को दौड़ाते, हमला करते देखा जा सकता है।

बता दें कि एबीवीपी ने इस वार्ता में बताया कि जेएनयू का माहौल 28 अक्टूबर से ही तनावपूर्ण था। संगठन का आरोप है कि वामपंथियों ने छात्रों की भावनाओं को भड़काया, उनका दुरुपयोग किया। लेकिन जब छात्र उनके झाँसे में ज्यादा दिन नहीं फँसे रहे तो उन्होंने हिंसा का प्रयोग किया और विश्वविद्यालय में सभी शैक्षणिक गतिविधियों को बाधित किया। एबीवीपी का कहना है कि जेएनयू में पिछले 2 महीने से कक्षाएँ नहीं चल रहीं थी। वामपंथी परीक्षा भी नहीं होने दे रहे थे। ऐसे में अब पंजीकरण करने से रोकने के लिए छात्रों पर भी हमला कर दिया।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का आरोप है कि वामपंथी छात्र उन वामपंथी प्रोफेसरों के निर्देशों पर ये सब कर रहे हैं, जो राजनीति से प्रेरित हैं और अपनी भयानक राजनीति खेलने के लिए ऐसा कर रहे हैं।

यहाँ स्पष्ट कर दें कि एबीवीपी ने पुलिस को सभी वीडियो साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किए हैं। साथ ही 28 अक्टूबर से शुरू होने वाली घटनाों की श्रृंखला की निष्पक्ष और विस्तृत जाँच की माँग की है।

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मकर संक्रांति: जीवन की गतिशीलता का विज्ञान, चरम बोध और अप्रतिम आनंद का उत्सव

‘मकर संक्रांति’ का त्यौहार वैसे तो दही-चूड़ा, लाई, गुड़ और तिल की मिठाइयों और पतंगबाजी के भक्काटे, अगर आप गुजरात निकल गए हैं तो ‘काए पो छे’ के शोर के लिए मशहूर है। हो सकता है, आप खो भी गए हों कि आख़िरी बार कब आपने लम्बे नख से किसी की पतंग काटी थी। बनारस में कटी पतंग के साथ ‘भक्काटे’ का शोर बच्चों के लिए तो महादेव की डमरू से गूँजा अनहद नाद ही है। वहाँ तो हर शरारत को महादेव से जोड़कर बच निकलने का चलन है। बड़े कितना भी डांटे लेकिन मकर संक्रांति जिसे बनारस में खिचड़ी भी कहते हैं बच्चों के लिए ‘पतंग उत्सव’ ही हो जाता है। गुजरात में तो पतंगबाजी पूरे परिवार के लिए प्रेम का उत्सव भी हो जाता है।

भारत की सांस्कृतिक विरासत यूँ ही इतनी विविधताओं से आच्छादित नहीं है। इन सबके पीछे छिपा है जीवन का सनातन सिद्धांत। भारत की इस अति प्राचीन धरा पर हर कार्य से पहले उसके सफलतापूर्वक सम्पन्न होने की मंगल कामना का विधान है। और, पूरा होने के बाद उत्सवों का दौर अर्थात जीवन के अप्रतिम आनन्द का भोग, तत्पश्चात ही अगले कार्य की तैयारी। मेहनत पहले और आनंद बाद में, भागवत गीता के शब्दों में कहा जाए तो कर्म पहले और फल बाद में, इस तरह आनंद/मंगल/ख़ुशहाली और कर्म का चक्र निरंतर चलता रहता है।

आम तौर पर उत्तर भारत में 14 जनवरी को मकर संक्रांति और उसके एक दिन पहले लोहड़ी मनाया जाता है। लेकिन ज्योतिषीय गणना के अनुसार भारतीय त्योहारों के पीछे एक विज्ञान है। उसी के अनुसार हर त्यौहार की तिथि एक लम्बी-चौड़ी गड़ना के उपरांत ही तय होती है। तो इस बार मकर संक्रांति के लिए कौन सी तिथि तय है और क्यों? इसे जान लेते हैं। शास्त्रों में सूर्य के गोचर को संक्रांति कहा जाता है। कहते हैं, मकर संक्रांति से अग्नि तत्त्व की शुरुआत होती है और कर्क संक्रांति से जल तत्त्व की। इस दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तराय़ण में प्रवेश करते हैं। सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं। और इस वर्ष ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, सूर्य, मकर राशि में 14 जनवरी 2020 की रात 02:07 बजे प्रवेश करेगा। फलस्वरूप, मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जाएगी।

आज जब वामपंथी प्रकोप से हमारे सभी पर्व त्यौहार उनके विषवमन का शिकार होते जा रहे हैं। ऐसे में अपनी भावी पीढ़ियों को हर त्यौहार की न सिर्फ ऐतिहासिकता बल्कि परंपरा और उसके पीछे की गूढ़ वैज्ञानिकता को भी समझाना ज़रूरी हो जाता है ताकि विषैले वामपंथ की हर विषबेल को काटा जा सके।

ऐसे में यह समझना ज़रूरी है कि लेख के शुरुआत में मकर संक्रांति का जो सामान्य परिचय दिया गया है तो क्या मकर संक्रांति का मतलब इतना ही है? चलिए इसी बहाने मकर संक्रांति के पीछे छिपे गहरे रहस्यों पर भी प्रकाश डालता हूँ। किस तरह मकर संक्रांति का पर्व ब्रह्मांडीय और मानव ज्यामिति की एक गहरी समझ पर आधारित है। मकर संक्रांति फ़सल कटाई के उपरांत आनंद का उत्सव भी है। मकर संक्रांति को फ़सलों से जुड़े त्यौहार या पर्व के रूप में भी बहुतायत कृषक परिवारों में जाना व पहचाना जाता है।

लोकपर्व मकर संक्रांति

दरअसल, यही वह समय है, जब फ़सल तैयार हो चुकी है और कृषि प्रधान देश का कृषक समाज उसी की ख़ुशी व उत्सव मना रहे होते हैं। इस दिन हम हर उस चीज के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं, जिसने खेती करने व फ़सल उगाने में मदद की है। कृषि से जुड़े संसाधनों व पशुओं का भी जिनका खेती में बड़ा योगदान होता है। इन सबसे भी परे, इस त्यौहार का खगोलीय और आध्यात्मिक महत्व ज़्यादा है।

‘मकर’ का अर्थ है शीतकालीन समय अर्थात ऐसा समय जब सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे नीचे होता है। और ‘संक्रांति’ का अर्थ है गति। मकर संक्रांति के दिन राशिचक्र में एक बड़ा बदलाव आता है। इस खगोलीय परिवर्तन से जो नए बदलाव होते हैं उन्हें हम धरती पर देख और महसूस कर सकते हैं। ये समय आध्यात्मिक साधना के लिए भी महत्वपूर्ण है। तमाम योगी, साधक एवं श्रद्धालु इस अवसर का उपयोग अपनी आत्मिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए करते हैं। सनातन परंपरा में महाकुम्भ, कुम्भ, अर्ध कुम्भ और मकर संक्रांति के स्नान का भी बड़ा महात्म्य है।इसलिए मकर संक्रांति पर खासतौर से गंगा स्नान करने को श्रद्धालु माँ गंगा के पावन तट पर उमड़ पड़ते हैं फिर चाहे वो हरिद्वार हो, संगम तट प्रयागराज या मोक्षदायिनी काशी सभी जगह भक्तों की भीड़ देखी जा सकती है।

वैसे तो साल भर में 12 संक्रान्तियाँ होती हैं। पर इनमें से दो संक्रातियों का विशेष महत्व है। पहली मकर संक्रांति और दूसरी, इससे बिल्कुल उलट, जून महीने में होने वाली मेष संक्रांति। इन दोनों के बीच में कई और संक्रान्तियाँ होती हैं। हर बार जब-जब राशि चक्र बदलता है तो उसे संक्रांति कहते हैं।

संक्रांति शब्द का मतलब हमें पृथ्वी की गतिशीलता के बारे में याद दिलाना है, और यह एहसास कराना है कि हमारा जीवन इसी गतिशीलता की देन है और इसी से पोषित और संवर्धित भी। कभी सोचा है आपने अगर यह गति रुक जाए तो क्या होगा? अगर ऐसा हुआ तो जीवन संचालन से जुड़ा हर आयाम ठहर जाएगा।

हर 22 दिसंबर को अयनांत (Solstice) होता है। सूर्य के संदर्भ में अगर कहूँ तो इस दिन पृथ्वी का झुकाव सूर्य की तरफ़ सबसे ज़्यादा होता है। फिर इस दिन के बाद से गति उत्तर की ओर बढ़ने लगती है। फलस्वरूप, धरती पर भौगोलिक परिवर्तन बढ़ जाता है। हर चीज़ बदलनी शुरू हो जाती है। यही गतिशीलता ही है, जो जीवन का आधार बनी। जीवन की प्रक्रिया, आदि और अंत भी इसी गतिशीलता की उपज है।

जब बात इस गतिशीलता के पीछे के कारणों को जानने की आएगी तो आदिदेव महादेव शिव ‘शंकर’ की विराटता और अनश्वरता की बात आएगी। शिवोहम की बात आएगी। इस चराचर ब्रह्माण्ड के पीछे जो है, वह है शिव। शिव अर्थात वह जो नहीं है। जो नहीं है, वही पूर्ण अचल है। कहा जाता है निश्चलता ही गति का आधार और मूल भी है। बात पहेली सी लग सकती है, इसे आम भाषा में समझाता हूँ।

जब कोई इंसान अपने भीतर की स्थिरता से संबंध बना लेता है, तभी वह गतिशीलता का आनंद ले सकता है। अन्यथा इंसान, जीवन की गतिशीलता से डर जाता है। मनुष्य के जीवन में आने वाला हर बदलाव या किसी भी तरह का परिवर्तन उसके लिए अक्सर दुःख या पीड़ा का कारण हो जाता है।

आज इस भागती-दौड़ती दुनिया का तथाकथित आधुनिक जीवन ही ऐसा हो चुका है। जिसके हर बदलाव में पीड़ा निहित है। आज जब भी बचपन एक तनाव बन चुका है, किशोरावस्था या युवावस्था उससे भी बड़ा दुख। प्रौढ़ावस्था असहनीय है। बुढ़ापा डरा और सकुचा-सहमा हुआ और मृत्यु या जीवन का अंत किसी घोर आतंक या ख़ौफ़ से कम नहीं है। आज पैदा होने से लेकर मृत्यु पर्यन्त जीवन के हर स्तर या चरण पर कुछ न कुछ समस्या है।

लोकपर्व मकर संक्रांति

वह इसलिए है, क्योंकि इंसान को हर बदलाव से दिक्कत है। ऐसा इसलिए है कि, इन्सान यह स्वीकार करने को ही तैयार नहीं कि जीवन की असली प्रकृति ही बदलाव है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। सदगुरु जग्गी वासुदेव कहते हैं, “आप गतिशीलता का तभी आनंद ले पाएँगे या उत्सव मना पाएँगे, जब आपका एक पैर स्थिरता में दृढ़ता से जमा होगा। और दूसरा गतिशील।” मकर संक्रांति का पर्व इस बात का भी उद्घोष है कि गतिशीलता का उत्सव मनाना तभी संभव है, जब आपको अपने भीतर स्थिरता का एहसास हो।

मकर संक्रांति के बाद से सर्दी धीरे-धारे कम होने लगती है। इस तथ्य से तो आप परिचित ही हैं कि हम सभी सौर ऊर्जा से संचालित हैं। तो मकर संक्रांति का महत्व ये समझने में भी है कि हमारे जीवन का स्रोत कहाँ है? इस ग्रह पर व्याप्त हर एक पौधा, पेड़, कीट, पतंगा, कीड़ा, जानवर, पशु-पक्षी, पुरुष, महिला, बच्चा, हर प्राणी सौर ऊर्जा से संचालित होता है। सौर ऊर्जा कोई नई तकनीक नहीं है। हम सभी सौर ऊर्जा से ही संचालित हैं, सौर ऊर्जा धरती पर जीवन के आरम्भ और उत्कर्ष का आधार भी है।

सदगुरु जग्गी वासुदेव का मकर संक्रांति को लेकर कहना है कि भारतीय संस्कृति में हम साल के इस नए पड़ाव का, जब हमारे पास सर्वाधिक सौर ऊर्जा होती है, हम इसे ‘मकर संक्रांति’ के रूप में मनाते हैं। इसलिए हम सूरज का स्वागत करते हैं। जैसे-जैसे हम हिमालय से दूर जाते हैं। उन जगहों पर आज से ही सूर्य की प्रचंडता बढ़ने लगती है। लोग ग्रीष्म ऋतु के आगमन की आहट पा परेशान होने लगते हैं। उनकी बढ़ती परेशानी की वज़ह ग्लोबल वार्मिंग भी है। आने वाली पीढ़ियों के लिए ज़रूरत है एक ऐसा माहौल बनाने की, जहाँ हम अपने जीवन के स्रोत का अधिकतम लाभ उठा सकें। ये त्यौहार हमें ये भी याद दिलाते हैं कि हमें अपने वर्तमान और भविष्य को पूरी चैतन्यता और जागरूकता के साथ गढ़ने की ज़रूरत है।

यदि आप चाहते हैं कि इस देश की भावी पीढ़ियाँ आने वाली गर्मी का स्वागत करने एवं आनंद लेने के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम हो, तो यह तभी संभव है जब हम प्रकृति के साथ एक अनुकूलन पैदा करें। धरती, वनस्पतियों, जल संसाधनों से समृद्ध और मिट्टी में पानी को सोखने में सक्षम हो। तभी हम सही मायने में मकर संक्रांति का जश्न मना सकते हैं।

प्रोफेसरों व वामपंथी छात्रों ने मिल कर किया प्रताड़ित: JNU के छात्र मनीष ने बताया कैसे ‘मीडिया’ भी है साज़िश में शामिल

ऑपइंडिया ने कुछ ऐसे छात्रों से बातचीत की, जिन्हें जेएनयू में जनवरी 5, 2020 के दिन हुई हिंसा के दौरान वामपंथियों ने निशाना बनाया। इन छात्रों में एक मनीष जांगिड़ भी हैं, जिनका हाथ टूट गया। उनके हाथ पर प्लास्टर अभी भी देखा जा सकता है। वो अलग बात है कि जेएनयू छात्र संगठन की अध्यक्ष आइशी घोष के पूरे सिर में लगी हुई मरहम-पट्टी अब बस एक स्टीच तक सिमित हो गई है। मनीष एबीवीपी के छात्र नेता हैं। उन्होंने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया कि जेएनयू में नवंबर 28, 2019 को हॉस्टल फी बढ़ाने के ख़िलाफ़ छात्रों ने आंदोलन शुरू किया।

उन्होंने बताया कि एबीवीपी ने भी आम छात्रों के उस आंदोलन को समर्थन दिया, जो एबीवीपी को रास नहीं आया। उन्होंने कहा कि जब आम छात्रों को वामपंथियों की सच्चाई का पता चलने लगा, तो उन्होंने हॉस्टल वार्डन्स के घरों पर हमला शुरू कर दिया। उनके परिवारों को परेशान किया गया। बकौल मनीष, एक गर्भवती महिला के घर को भी निशाना बनाया गया और उनके घर में शीशे के बोतल फेंके गए। वो महिला वार्डन थी। कुल 500 वामपंथी छात्रों ने मिल कर ये सब किया। मनीष ने आगे बताया कि इसी तरह 8-9 नवंबर को डीन वंदना मिश्रा जब क्लास लेने गईं, तब उन्हें 30 घंटे तक बंधक बना कर रखा गया। उनके कपड़े फाड़े गए और उन पर दबाव बनाया गया कि वो इस्तीफा दें और यूनिवर्सिटी छोड़ कर जाएँ।

मनीष ने मुख्यधारा की मीडिया के एक बड़े वर्ग से नाराज़गी जताते हुए कहा कि उन्होंने पूरे मुद्दे को कवर करने में पक्षपात किया। उन्होंने वामपंथियों के आंदोलन के आपत्तिजनक नारों, जैसे- “भगवा जलेगा” और “हिंदुत्व की कब्र खुदेगी” पर आपत्ति जताई। मनीष ने याद दिलाया कि कैसे स्वामी विवेकानंद की उस प्रतिमा के साथ छेड़छाड़ की गई, जिसका अभी अनावरण भी नहीं हुआ था। उन्होंने कहा कि फी हाइक को लेकर हुए आंदोलन को सीएए विरोधी आंदोलन में बदल दिया गया और बाद में परीक्षाओं का बहिष्कार किया जाने लगा।

मनीष ने कुछ प्रोफेसरों के बारे में भी बड़ा खुलासा करते हुए कहा कि उन प्रोफेसरों ने वामपंथियों का साथ देते हुए बाकी छात्रों को डराया-धमकाया और उन्हें पढ़ाना बंद कर दिया। इन प्रोफेसरों ने परीक्षाओं और असाइनमेंट्स लेने बंद कर दिए। जब ऑनलाइन परीक्षा का प्रावधान आया, तब उन स्कूलों में परीक्षाएँ सही से नहीं हो पाईं, जहाँ वामपंथी शिक्षकों की तादाद ज़्यादा थी। मनीष ने इसी तरह आगे बताया कि नए सेमेस्टर के रजिस्ट्रेशन में भी व्यवधान डाला गया। उन्होंने बताया कि कम्युनिकेशन सेंटर में वामपंथी छात्र नेता गीता कुमारी और अपेक्षा प्रियदर्शनी सहित अन्य वामपंथी छात्रों ने सर्वर रूम को तोड़ डाला।

वामपंथी छात्रों ने आख़िर इंटरनेट बंद क्यों किया? मनीष ने इसका जवाब देते हुए बताया कि सर्वर रूम में ही वो सारी सीसीटीवी फुटेज थी, जिनसे वामपंथियों की पोल खुल सकती थी कि उन्होंने कैसे तोड़फोड़ मचाई व गुंडागर्दी की। इसीलिए, उन्होंने सर्वर रूम को ही क्षतिग्रस्त कर दिया। अर्थात, जम्मू कश्मीर में ‘फ्री इंटरनेट’ की माँग करने वालों को जेएनयू में इंटरनेट रास नहीं आया। इन छात्रों में जेएनयूएसयू की अध्यक्ष आईसी घोष भी शामिल थीं। इसके बाद वामपंथियों ने ‘पीस मार्च’ के नाम पर 500 छात्रों का हुजूम जुटाया और सर्वर रूम में फिर तोड़फोड़ मचाई।

मनीष ने बताया कि रजिस्ट्रेशन करने गए अन्य छात्रों पर लाठी-डंडे और पत्थर से हमला कर दिया गया। उन्होंने बताया कि वामपंथी भीड़ ने रजिस्ट्रेशन करने गए छात्रों पर हमला कर दिया लेकिन वहाँ गार्ड्स के हस्तक्षेप के बाद मामला सुलझ गया। उन्होंने बताया कि पेरियार हॉस्टल में, साबरमती और माही-मांडवी में हमले किए गए। इन तीनों हॉस्टलों को इसीलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वहाँ एबीवीपी के छात्र अच्छी संख्या में हैं। मनीष ने उस दिन को याद करते हुए बताया कि जम्मू कश्मीर के उपद्रवियों के तर्ज पर नकाबपोश लोगों ने पत्थरबाजी शुरू कर दी। मनीष ने बताया कि वो अपने साथियों के साथ एक कमरे में छिप गए।

मनीष ने भीड़ का नेतृत्व करने वाले सतीश चंद्र यादव का नाम लिया, जो जेएनयू छात्र संघ में जनरल सेक्रेटरी हैं। मनीष ने बताया कि भीड़ ने आईशी, सुचेता सहित अन्य छात्रों ने डंडे से उन पर हमला कर दिया और भागने के क्रम में उनकी इतनी पिटाई की गई कि वो बेहोश हो गए। बकौल मनीष, जब उनको होश आया तो उन्हें लोग एम्स में लेकर गए। वहाँ जेएनयू के कुछ प्रॉफेसर और वामपंथी नेता वृंदा करात पहले से ही मौजूद थें, जो इलाज के कार्य में बाधा डाल रहे थे। मनीष ने बताया कि उनके साथ शिवम चौरसिया और उज्जवल का सिर फूट गया। इसी तरह उनके साथी शेषमणि साहू भी काफ़ी घायल हो गए थे।

इसके बाद प्रियंका गाँधी और कमलनाथ सहित कॉन्ग्रेस के कई नेता वहाँ पहुँचे। कई वकीलों ने भी अपने आप को जेएनयू का पूर्व-छात्र बताते हुए ट्रामा सेंटर में घुस गए। मनीष ने बताया कि जब उन्होंने वामपंथियों के उत्पात की बात प्रियंका को बताई तो उन्होंने मुँह फेर लिया और चली गईं। मनीष ने बताया कि जहाँ एक तरफ़ घायल छात्रों को प्रियंका ने नज़रअंदाज़ किया, वामपंथी छात्रों को घायल बताते हुए मरहम-पट्टी के साथ हॉस्पिटल बेड पर सुला दिया गया। इनमें एक सूरी नामक छात्र भी है, जो इस घटना के बाद केरल गया और वहाँ उसका फूल-मालाओं से स्वागत हुआ। इसी तरह जिन वामपंथी छात्रों को खरोंच तक नहीं आई थी, उन्हें घायल बता कर लिटा दिया गया।

मनीष ने बताया कि योगेंद्र यादव, डी राजा और सीताराम येचुरी सहित कई नेता तुरंत पहुँच गए। मनीष ने कहा कि मीडिया का एक वर्ग भी उपद्रवियों से मिला हुआ था। उन्होंने सवाल दागा कि आख़िर इतने वामपंथी नेता जेएनयू में तुरंत कैसे पहुँच गए? मनीष ने कहा कि जामिया के कई छात्रों ने जेएनयू में डेरा डाला था और नकाबपोश गुंडों में अधिकतर जेएनयू के थे। मनीष व उनके साथियों ने जामिया के छात्रों की कैम्पस में संदिग्ध उपस्थिति को लेकर प्रशासन से शिकायत भी दर्ज कराई थी।

राहुल कँवल के बारे में मनीष ने बताया कि वो आईशी घोष सहित 33 छात्रों के घायल होने की बात करते हैं लेकिन उन्हें बस आइशी का नाम ही मालूम होता है। मनीष ने आरोप लगाया कि आईशी की मेडिकल रिपोर्ट में धाँधली हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि गीता कुमारी का नाम आया, तब मीडिया वालों ने उनके बारे में ये नहीं बताय कि वो जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष रह चुकी हैं और वामपंथी नेता हैं, उन्हें आम छात्र बना कर पेश किया गया। मनीष ने दिल्ली पुलिस की प्रेस कॉन्फ्रेंस का जिक्र करते हुए कहा कि पुलिस ने आइसा, एसएफआई, डीएफएस और एआईएसएफ को पूरी साज़िश का रणनीतिकार बताया।

जिस छात्र के हवाले से एबीवीपी को दोषी ठहराया जा रहा है, उसका स्टिंग करने वालों का आम आदमी पार्टी से कनेक्शन निकल कर सामने आ रहा है। ऐसे में मनीष ने अंदेशा जताया कि इस पूरी साज़िश के पीछे आगामी दिल्ली चुनाव कहीं न कहीं केंद्र में है। उन्होंने अवस्थी को लेकर राहुल कँवल के दोहरे रवैये पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि विश्व के सबसे बड़े छात्र संगठन पर आरोप लगाने वाले कँवल के एकमात्र उद्देश्य ये है कि दिल्ली पुलिस को लेकर ग़लतफ़हमी फैला सकें। मनीष ने आरोप लगाया कि ‘इंडिया टुडे’ ने उनसे बातचीत की लेकिन सोशल मीडिया में हर जगह से उस वीडियो को हटा दिया गया।

मनीष ने आरोप लगाया कि राहुल कँवल और उनका चैनल पहले सब सेट करता है कि किसे क्या बोलना है, फिर कैमरे से शूट कर के टीवी पर दिखाया जाता है। मनीष ने इतिहास की याद दिलाते हुए कहा कि 1983 में किस तरह वामपंथी संगठनों ने तत्कालीन वीसी और एक हॉस्टल वार्डन के घर में घुस कर आतंक मचाया गया। मनीष ने कहा कि उस समय एबीवीपी का कोई अस्तित्व नहीं था और जेएनयू में पक्ष से लेकर विपक्ष तक वामपंथियों का ही दबदबा था। उन्होंने याद दिलाया कि उस घटना के बाद जेएनयू को 1 वर्ष के लिए बंद कर दिया गया था।

मनीष ने बताया कि वामपंथी जेएनयू में वही कर रहे हैं, जैसा उन्होंने चीन और इजरायल में अपना अस्तित्व बचाने के लिए हिंसा की। मनीष ने कहा कि उनके नाम पर परचा बाँट कर कहा गया कि एबीवीपी वालों का बॉयकॉट किया जाए। मनीष ने कहा कि जब तक जेएनयू में एबीवीपी के कार्यकर्ता मौजूद हैं, वो जेएनयू को बदनाम नहीं होने देंगे।

इनकी टूटी हड्डियाँ भी देखो रवीश! अजीत भारती का वीडियो | Stop propaganda on JNU

रवीश कुमार का मुख्य लक्ष्य जेएनयू की हिंसा और उसकी जाँच है और इसमें भी कैसे इनकी जाँच, ऑल्ट न्यूज वाले की जाँच और तीन-चार टूटपूँजिया पोर्टल की जाँच पुलिस की जाँच से बेहतर है। शुरू में रवीश जी कह रहे थे कि पुलिस केस क्यों नहीं दर्ज कर रही, पुलिस दोषियों को पकड़ क्यों नहीं कर रही है? और जब पुलिस ने उन्हें पकड़ा है तो रवीश जी ने लंबे-लंबे प्रपंची पोस्ट लिखे हैं।

एबीवीपी के बच्चों के हाथ तोड़े गए, कलाई तोड़ी गई, ऊँगलियाँ तोड़ी गई, सर पर 6-6 टाँके हैं, गर्दन पर रॉड से मारा गया और एक बच्चे को इतना मारा गया कि वो वहीं पर बेहोश हो गया। उसे याद नहीं था कि बेहोश होने के बाद उसे कौन उठाकर ले गया। जिन मीडिया वालों के पास करोड़ों का इंफ्रास्ट्रक्चर है, वो इन बच्चों तक पहुँच नहीं पा रहे हैं। जो बच्चे अपनी आवाज पहुँचाने के लिए ऑपइंडिया जैसी छोटी संस्थान के पास आ रहे हैं, क्या एनडीटीवी की टीम उन बच्चों तक नहीं पहुँच सकती? 

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FACT CHECK: क्या CAA के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रही है पुलिस? जानें इन तस्वीरों का सच

नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध के नाम पर जहाँ एक तरफ़ खुल कर हिन्दू विरोधी अजेंडे को आगे बढ़ाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ वामपंथियों की मंडली दुष्प्रचार व अफवाह फैलाने में भी लगी हुई है। इसी क्रम में कुछ फोटो वायरल हो रहे हैं, जिनमें कुछ पुलिसवालों को सीएए विरोधी तख्तियाँ लेकर सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करते हुए देखा जा सकता है। इन तस्वीरों में पुलिसकर्मी “नो सीएए, नो एनआरसी”, “वी अपोज एनआरसी एन्ड सीएए”, “मासूमों पर लाठीचार्ज अब हमसे न हो पाएगा” और “नो एनआरसी, नो कैब” लिखी तख्तियाँ लेकर धरना देते हुए दिख रहे हैं।

इन तस्वीरों को फेसबुक और ट्विटर पर हज़ारों बार शेयर किया गया। दरअसल, इन तस्वीरों को फोटोशॉप किया गया है। तख्तियों में लिखी गई बातों को एडिट कर के पूरी तरह बदल दिया गया है। ये फोटो तब का है, जब वकीलों और दिल्ली पुलिस के बीच संघर्ष भड़क गया था। वकीलों ने दिल्ली पुलिस पर हमला कर दिया था और उन पर पत्थरबाजी की थी। यहाँ तक कि इस फोटोशॉप्ड तस्वीर को फ़िल्म निर्माता अपर्णा सेन ने भी शेयर किया:

इस फोटो को ‘द वीक’ ने नवंबर 5, 2019 को शेयर किया गया था। ख़बर थी कि वकीलों द्वारा की गई हिंसा के ख़िलाफ़ पुलिसकर्मियों के प्रदर्शन पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने रिपोर्ट तलब की है। इस तरह से नवंबर 2019 की ख़बर को जनवरी 2020 में बदल कर पेश किया जा रहा है। असली तस्वीर में तख्तियों पर लिखा हुआ है- “Policemen are also humans” और एक वकील के फोटो साथ “Arrest Him” भी लिखा हुआ है। असली तस्वीर को यहाँ देखें:

असली फोटो: वकीलों के ख़िलाफ़ धरना देती पुलिस

उस समय दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में पार्किंग को लेकर दिल्ली पुलिस और वकीलों के बीच विवाद हो गया था, जिसमें बाद में हिंसक संघर्ष के रूप ले लिया था। उसके बाद वकीलों ने पुलिसकर्मियों को पीटना शुरू कर दिया था। इसीलिए, ये सीएए विरोधी पोस्ट की फोटो नहीं है।

CM पद से इस्तीफा दे देंगे उद्धव ठाकरे: महाराष्ट्र गठबंधन में बढ़ती कलह के बीच कॉन्ग्रेस नेता का बयान

क्या महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे राज्य की सत्ताधारी गठबंधन में चल रही कलह से परेशान होकर CM पद से इस्तीफा देने की सोच रहे हैं? ये किसी विपक्षी नेता ने नहीं बल्कि उनकी ही सहयोगी पार्टी के नेता ने दावा किया है। कॉन्ग्रेस के पूर्व सांसद यशवंत राव गडाख ने कहा है कि अगर शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस गठबंधन के नेता इस तरह लड़ते रहे तो उद्धव मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे देंगे। उन्होंने इस दौरान अपनी ही पार्टी पर निशाना साधा। यशवंतराव ने कहा कि कॉन्ग्रेस और एनसीपी के नेतागण बँगलों और विभागों के आवंटन में लगातार बाधा डाल रहे हैं।

ख़ुद शिवसेना नेताओं ने भी स्वीकारा है कि गठबंधन में मंत्रियों को विभाग आवंटन के मुद्दे पर खींचतान चल रही है। महाराष्ट्र में हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में 36 नए मंत्री बनाए गए थे, जिसके बाद से ही तीनों दलों में कई नेताओं के नाराज़ होने का दौर जारी है। ऑपइंडिया ने एक ख़बर में बताया था कि कॉन्ग्रेस के अधिकतर विधायक ग्रामीण इलाक़ों से जीत कर आए हैं। ऐसे में, पार्टी को सहकारिता, कृषि और ग्रामीण सम्बन्धी एक भी विभाग न मिलना पार्टी नेताओं के बीच नाराज़गी की वजह बन रही है।

कुछ दिनों पहले पुणे के कॉन्ग्रेस नेताओं ने अपनी ही पार्टी के दफ्तर में जम कर तोड़फोड़ मचाई थी। वहीं शिवसेना के नाराज़ विधायकों की संख्या भी एक दर्जन के क़रीब बताई जा रही है। कई मंत्री इसीलिए भी परेशान हैं कि उन्हें मलाईदार मंत्रालय नहीं दिए गए। रामदास कदम, रवींद्र वायकर, शिवसेना नेता दिवाकर रावते और दीपक केसरकर पिछली राजग सरकार में मंत्री थे और इस बार उन्हें किनारे कर दिया गया है।

सारे मलाईदार मंत्रालय शरद पवार की पार्टी के पास चले गए हैं, ऐसे में कॉन्ग्रेस और शिवसेना नेताओं में नाराज़गी का कारण स्पष्ट है। कुछ विधायक मंत्रिमंडल विस्तार में परिवारवाद को बढ़ावा दिए जाने के कारण भी नाराज़ हैं। इन्हीं कारणों से कॉन्ग्रेस नेता यशवंतराव ने कहा कि उद्धव ठाकरे क्रोधित होकर इस्तीफा दे सकते हैं।

दिल्ली में सरकारी जमीनों पर बनी ‘अवैध’ मस्जिदों का टूटना निश्चित: BJP सांसद का दावा

पश्चिमी दिल्ली से भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा ने एक बार फिर दिल्ली में सरकारी जमीन पर बनी मस्जिदों के टूटने की बात की है। उन्होंने प्रदेश कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए ये मुद्दा उठाया

उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दावा किया कि सरकारी जमीन पर बनी मस्जिदों का टूटना निश्चित है। इसके अलवा उन्होंने कहा अगर दिल्ली में भाजपा सत्ता में आती है तो गरीबों को सिर्फ एक रुपए प्रति माह में बिजली और पानी दिया जाएगा। साथ ही उन्‍होंने बताया, “200 यूनिट प्रति माह की बाध्यता नहीं रहेगी, जरूरत के अनुसार बिजली मिलेगी। अमीरों को इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा।”

गौरतलब है कि ये पहली बार नहीं है जब प्रवेश वर्मा ने ‘अवैध’ मस्जिदों से जुड़े मुद्दे को सार्वजनिक तौर पर उठाया। इससे पहले वे इस संबंध में 18 जून को दिल्ली के उपराज्यपाल को पत्र लिख चुके हैं। उस पत्र में उन्होंने आरोप लगाया था कि देश की राजधानी में कई मस्जिदों का निर्माण सरकारी जमीन पर अवैध रूप से किया गया है।

भाजपा सांसद ने उस दौरान माँग की थी कि ऐसी मस्जिदों को सरकारी जमीन से हटाया जाए। हालाँकि, दिल्ली माइनॉरिटी कमिशन (डीएमसी) ने दावा किया था कि प्रवेश वर्मा के आरोप में कोई सच्‍चाई नहीं है।

बता दें, साल 2019 के जून महीने में आधिकारिक रूप से ये मामला उठाने के बाद प्रवेश वर्मा ने धमकियाँ तक मिलीं। जिसके मद्देनजर उन्हें जून 20, 2019 को पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक को चिट्ठी लिखकर जानकारी देनी पड़ी कि उन्हें फोन पर एसएमएस भेजकर और सोशल मीडिया के जरिए जान से मारने की धमकियाँ दी गई

उन्होंने उस समय इस मामले की जाँच कर आरोपितों का पता लगाने और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की माँग की थी। साथ ही सरकारी जमीनों पर लगातार हो रहे अतिक्रमण को लेकर उपराज्यपाल अनिल बैजल से जुलाई में मुलाकात की थी।

उपराज्यपाल से मुलाकात के दौरान 54 ऐसी सरकारी जमीनों की लिस्ट उपराज्यपाल को सौंपी गई थी, जिन पर अवैध रूप से मजार, मस्जिद और कब्रिस्तान बनाए गए। जिसके बाद उपराज्यपाल ने आश्वासन दिया था कि इन सभी जगहों की पड़ताल की जाएगी और अगर ऐसा कुछ पाया जाएगा तो उन कब्जों को हटाया जाएगा।

अवैध कब्जे वाली जगह (लिस्ट-1)
लिस्ट-2

काशी विश्वनाथ मंदिर में फिलहाल कोई ड्रेस कोड नहीं लागू: प्रशासन ने किया खंडन

सोमवार (जनवरी 13, 2020) को ख़बर आई थी कि काशी विश्वनाथ मंदिर में स्पर्श दर्शन के लिए ड्रेस कोड लागू किया गया है। कई बड़े संस्थानों ने इस ख़बर को चलाया था। अब, वाराणसी के कमिश्नर दीपक अग्रवाल ने इस ख़बर को नकार दिया है। सभी मीडिया संस्थानों को वीडियो के माध्यम से सम्बोधित करते हुए अग्रवाल ने कहा कि एक औपचारिक बैठक के दौरान ऐसा सुझाव दिया गया था लेकिन इसे लागू नहीं किया गया है। कमिश्नर अग्रवाल ने कहा कि मीडिया में चल रही ख़बरें ग़लत हैं और वो उनका खंडन करते हैं।

मीडिया ने ख़बरें चलाई थीं कि पुरुषों के लिए कुर्ता-धोती और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है, अगर वो स्पर्श दर्शन करना चाहते हैं। सच्चाई ये है कि अधिकारियों के साथ हुई बैठक में सुबह 4-11 बजे तक होने वाली स्पर्श दर्शन में ऐसा ड्रेस कोड लागू करने का प्रस्ताव दिया गया था। अभी तक ये प्रस्ताव लागू नहीं किया गया है और न ही ऐसा कोई नियम बना है। इस बैठक में वाराणसी के डीएम कौशल राज शर्मा शामिल थे। वो मंदिर न्यास के सीईओ भी हैं।

काशी विद्वत परिषद के रामनारायण द्विवेदी ने ऑपइंडिया को बताया कि परिषद की बैठक में ये प्रस्ताव रखा गया था कि सुबह की आरती और दर्शन के समय जो लोग शिवलिंग का स्पर्श दर्शन करना चाहते हैं या फिर स्पर्श कर के पूजन करना चाहते हैं, उनके लिए ड्रेस कोड तय किए जाएँ। प्रस्ताव के अनुसार, स्पर्श दर्शन के लिए ड्रेस कोड तय करने पर चर्चा हुई है। लेकिन सामान्य दर्शन के लिए साड़ी या धोती-कुर्ते जैसे ड्रेस कोड तय करने की बात नहीं हुई।

इस बैठक में काशी विद्वत परिषद के प्रोफेसर वशिष्ठ त्रिपाठी, प्रोफेसर रामचंद्र पांडेय, प्रोफेसर रामकिशोर, प्रोफेसर दिनेश गर्ग और प्रोफेसर रामनारायण द्विवेदी शामिल थे। साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार के धर्मार्थ मंत्री नीलकंठ त्रिपाठी और न्यास के सीईओ भी शामिल थे। प्रोफ़ेसर रामनारायण द्विवेदी ने ऑपइंडिया को बताया कि परिषद का काम सुझाव देना है और मंदिर प्रशासन नियम को लागू करता है।

फ़र्ज़ी स्टिंग वाली ‘इंडिया टुडे’ के झूठ का वजन भारी हो गया है, सवालों से कब तक भागते फिरेंगे कँवल?

‘इंडिया टुडे’ अपनी पत्रकार तनुश्री पांडेय के साथ ‘खड़ा’ है। 2016 में जेएनयू छात्र संगठन के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ चुका सन्नी धीमन वाकर कहता है कि पांडेय ‘गोदी मीडिया’ को बेनकाब करने के लिए खड़ी हैं। लेकिन, ऑपइंडिया आपको बता चुका है कि किस तरह तनुश्री वामपंथी छात्र नेता साकेत मून के सर्वर रूम तोड़ने के बयान के साथ खड़ी दिखती हैं। वही साकेत मून, जिसने अफवाह फैलाई थी कि जेएनयू में सीआरपीएफ को तैनात कर दिया गया है, 8500 छात्रों को गिरफ़्तार किया गया है। उधर राहुल कँवल अपने फ़र्ज़ी स्टिंग ऑपरेशन के साथ खड़े हैं, जिसका न सिर है और न पाँव।

‘इंडिया टुडे’ ने तनुश्री और वामपंथी छात्र नेताओं के बीच हुई कानाफूसी को एक ‘सामान्य प्रक्रिया’ बताया है। अगर ऐसा है तो शायद चैनल की हर स्टोरी पर संदेह किया जाना चाहिए क्योंकि सामने वाले को कोचिंग देकर और उसके साथ पूरी सेटिंग कर के ख़बर बनाने को उसने अपने लिए एक समान्य प्रक्रिया कहा है। स्टिंग भी ऐसा, जिसमें एक 19-20 साल के छात्र को अपने सीनियर को निर्देशित करने की बात बता कर, उसे ABVP का घोषित करने की पूरी कवायद की गई। जो थोड़ी देर में ही फेल हो गया।

अपनी पीठ थपथपाते हुए ‘इंडिया टुडे’ ने अपने कथित इन्वेस्टीगेशन को ‘पाथ ब्रेकिंग’ करार दिया है। जब ऑपइंडिया ने उनसे संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि ‘वो लोग’ किसी दूसरे पब्लिकेशन को बयान नहीं देते। बाद में इन्हीं कँवल ने दावा किया कि कई चैनलों के पत्रकारों से उनकी बात हुई है और उन सभी ने उन्हें बधाइयाँ दी हैं। बात भी नहीं करते हैं, निष्पक्षता का दावा भी करते हैं और बधाइयाँ भी लेते हैं। सवालों का जवाब टालना तो भला कोई उनसे सीखे।

ऑपइंडिया को सूत्रों से यहाँ तक पता चला है कि जेएनयू की हिंसा में जामिया के छात्रों के भी हाथ हैं। जामिया वाला नाटक फेल हो गया, लदीदा-फरज़ाना की ब्रांडिंग के पीछे की साज़िश बेनकाब हो गई, जेएनयू हॉस्टल फी वाला आंदोलन निष्फल हो गया और सीएए पर सरकार ने डट कर अफवाहों को काटा। क्या इससे बौखलाए वामपंथियों ने जेएनयू में हिंसा की साज़िश रची?

‘इंडिया टुडे’ ने कहा है कि उसकी छवि ख़राब करने के लिए तनुश्री वाली वीडियो का सहारा लिया जा रहा है। अगर ऐसा है तो कोई ऑडियो या वीडियो क्लिप जारी कर के चैनल को हमारे सारे सवालों के जवाब दे देने चाहिए। क्या खुसुर-पुसुर हो रहा था? एबीवीपी की छवि ख़राब करने के लिए फ़र्ज़ी स्टिंग करने वालों को अब अपनी छवि की पड़ी है। एबीवीपी के छात्रों की पिटाई की गई। महिला छात्रों तक को नहीं बख्शा गया। नेत्रहीन छात्र को भी मारा-पीटा गया

जेएनयू छात्र संगठन की वर्तमान अध्यक्ष आइशी घोश, पूर्व अध्यक्ष गीता के नकाबपोशों के साथ वीडियो वायरल हुए। लठैत कॉमरेड चुनचुन पत्थरबाजी करता देखा गया। प्रमाण को परदे के पीछे ले जाने के लिए फालतू के फ़र्ज़ी खुलासे किए जा रहे हैं और ऊपर से चैनल अपने ही मुँह मियाँ मिट्ठू भी बन रहा है।

जब जेएनयू छात्र संघ का कार्यकर्ता अक्षत ही एबीवीपी का नहीं है तो फिर उसी को आधार बना कर स्टिंग करने और कथित खुलासा करने वाले ‘इंडिया टुडे’ को माफ़ी नहीं माँगनी चाहिए क्या? जेएनयू हॉस्टल फी बढ़ोतरी को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शन में अक्षत की फोटो निकाल कर इसे एबीवीपी की रैली बताया गया। हिंसा वाले दिन दोपहर 3 बजे जब वेलेंटिना ब्रह्मा को मारा जा रहा था, तब यही अक्षत वामपंथी गुंडों के साथ देखा जाता है। सबकुछ प्रमाण के साथ प्रत्यक्ष हो चुका है लेकिन कँवल को रवीश वाली थेथरई का बुख़ार कई गुना ज़्यादा इंटेंसिटी के साथ चढ़ गया है।

दावे कीजिए लेकिन सवालों के जवाब भी दीजिए। दूसरे पब्लिकेशंस से सवाल न लेने का दावा करना और उनसे ही फिर बधाई मिलने का प्रचार करना, ऐसे दोहरे रवैये के सामने तो पुराने वामपंथी भी चित हो जाएँ। तभी कुछ लोग अब आपको ‘कॉमरेड राहुल कँवल’ कह रहे हैं।