Home Blog Page 5283

‘प्रज्ञा ठाकुर कभी MP आई तो उसका पुतला नहीं बल्कि उसे पूरा का पूरा जिंदा जला देंगे’

मध्य प्रदेश के एक कॉन्ग्रेस विधायक ने भोपाल की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को धमकी दी है। धमकी छोटी-मोटी नहीं। जिंदा जला डालने की धमकी। विधायक ने कहा – प्रज्ञा ठाकुर राज्य में प्रवेश करेंगी तो उन्हें ज़िंदा जला दिया जाएगा।

साध्वी प्रज्ञा के ख़िलाफ़ ज़हर उगलने वाले बियोरा के कॉन्ग्रेसी विधायक गोवर्धन दांगी ने गुरुवार (28 नवंबर) को यह धमकी दी है। विधायक की यह धमकी विशेष सुरक्षा समूह (एसपीजी) विधेयक पर संसद में चर्चा के दौरान संसद में प्रज्ञा ठाकुर की टिप्पणी के बाद आई है। शायद कॉन्ग्रेसी विधायक को अपने ‘आका’ पर की गई टिप्पणी पसंद न आई हो और उन्होंने अपनी मर्दवादी सोच के तहत एक महिला सांसद को धमकी दे डाली – “प्रज्ञा ठाकुर कभी आई तो उसका पुतला नहीं बल्कि उसे पूरा का पूरा जिंदा जला भी देंगे।”

हालाँकि कॉन्ग्रेस विधायक दांगी ने ‘गाँधी परिवार भक्ति’ से किनारा करते हुए महात्मा गाँधी और गोडसे पर साध्वी प्रज्ञा के कथित कमेंट को लेकर गुस्सा जाहिर किया। उन्होंने कहा कि एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा गाँधी की जयंती पर कई तरह के कार्यक्रम आयोजित किए और पूरे देश में शांति का संदेश दिया। वहीं, दूसरी तरफ भाजपा की सांसद संसद में बैठकर महात्मा गाँधी के हत्यारे को देशभक्त कह रही हैं, यह दोहरी नीति है।

लोकसभा सांसद द्वारा संसद में नाथूराम गोडसे का ज़िक्र किए जाने के एक दिन बाद भाजपा ने प्रज्ञा सिंह ठाकुर को शीतकालीन सत्र के बाकी दिनों के लिए सभी संसदीय दल की बैठकों में भाग लेने से रोक दिया।

दरअसल, भोपाल की सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के लोकसभा में दिए गए बयान से संसद में काफ़ी हंगामा मच गया था। गुरुवार को उनकी संसदीय सीट भोपाल में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए। जानकारी के अनुसार, सदन में द्रमुक सदस्य ए राजा ने चर्चा में भाग लेते हुए नकारात्मक मानसिकता को लेकर गोडसे का उदाहरण दिया तो प्रज्ञा ठाकुर अपने स्थान पर खड़ी हो गईं और कहा कि ‘देशभक्तों का उदाहरण मत दीजिए’।

इसके बाद प्रज्ञा ठाकुर ने ट्वीट किया, “कभी-कभी झूठ का बवंडर इतना गहरा होता है कि दिन में भी रात लगने लगती है. किंतु सूर्य अपना प्रकाश नहीं खोता, पलभर के बवंडर में लोग भ्रमित न हों, सूर्य का प्रकाश स्थाई है। सत्य यही है कि कल मैंने ऊधम सिंह जी का अपमान नहीं सहा, बस।”

यह भी पढ़ें: गाँधी को गोली मारने से गोडसे की देशभक्ति गायब हो जाती है? समय है इस पर खुली चर्चा का

यह भी पढ़ें: साध्वी प्रज्ञा: जिसने टूटी रीढ़ के साथ हिन्दू टेरर के नैरेटिव को छिन्न-भिन्न कर दिया

लौट के CM ठाकरे ‘हिंदुत्व’ को आए: गणपति बाप्पा की शरण में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री

हिंदूवाद को ‘डंप’ कर उद्धव ठाकरे ने कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ महा विकास अघाड़ी नाम के गठबंधन में सरकार तो बना ली है, लेकिन ऐसा लग रहा है कि उन्हें खुद भी इस सरकार के ज़्यादा चलने की उम्मीद है नहीं, और ‘हिन्दू आतंकवाद’ के आविष्कारकों के साथ इस गठबंधन से हिन्दू वोट छिटकने का डर उन्हें सताना शुरू कर चुका है। यह यूँ ही नहीं है कि ठाकरे के शपथ ग्रहण समारोह में उनके कपड़े ही नहीं, पूरा माहौल ही भगवा में रंगा हुआ था। यही नहीं, शिवाजी पार्क की जगह चुनने से लेकर शपथ लेने की महीन सूक्ष्मताओं और उसके बाद के उनके कार्यकलापों को ध्यान से देखें तो उद्धव ठाकरे की हिन्दू वोट सहेजने की जद्दोजहद सीएम बनने के कुछ ही घंटों में साफ दिख रही है। 

सीएम बनने के बाद आनन फ़ानन में उद्धव ठाकरे बेटे आदित्य ठाकरे और परिवार समेत भगवान सिद्धि विनायक के दर पर मौजूद हैं। आम परिस्थितियों में यह आम ही बता होती- आखिर ठाकरे परिवार केवल हिंदूवादी राजनीति का मज़बूत धड़ा ही नहीं रहा है, बल्कि अपने दैनिक जीवन में भी हिन्दू धर्म का अनुयायी रहा है। बालासाहेब ठाकरे साल भर भले न निकल पाते रहे हों, विजयदशमी के दिन वे शिव सैनिकों को भाषण देते ही थे। लेकिन यह परिस्थितयाँ आम नहीं हैं। 

हिंदूवादी मानी जाने वाली भाजपा के साथ चुनाव लड़ने के बाद छटक कर अलग हो जाने को ही शिव सेना का वोटर इकलौता धोखा नहीं मान रहा है। जिस कॉन्ग्रेस के साथ आज उद्धव ने सरकार बनाई है, वह तो जानी ही हिन्दू-विरोधी नीतियों के लिए जाती रही है। इंदिरा गाँधी के समय तक तो कम-से-कम कॉन्ग्रेस नेताओं के व्यक्तिगत रूप से धर्म में निष्ठावान होने की छवि थी, लेकिन सोनिया गाँधी की कॉन्ग्रेस और उसकी यूपीए सरकार तो मतांतरण-माफ़िया की सबसे बड़ी सहयोगी बन कर उभरी। ऐसे में शिव सेना का हिंदूवादी वोटर ठगा महसूस कर रहा है, और ठाकरे यह महसूस कर रहे हैं। 

इसके अलावा सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ने उनके शपथ ग्रहण से कन्नी काट ली है। यह भी उद्धव के लिए शुभ संकेत नहीं है, क्योंकि सोनिया शायद इस गठबंधन के लिए शुरू से ही तैयार नहीं थीं, और कमलनाथ समेत दूसरे नेताओं ने मनाया। ऐसे में ऐसा भी हो सकता है कि आसन्न दिल्ली, बिहार, झारखंड चुनावों के मुस्लिम वोट बैंक के लालच में कॉन्ग्रेस कुछ दिन में इस सरकार से समर्थन ही वापिस ले ले। वहीं एनसीपी के अजित पवार को ढाई साल सीएम बनाने की माँग भी लाख अफवाह कही जाए, लेकिन इससे कोई आधिकारिक रूप से इंकार भी नहीं कर रहा है। 

इनमें से किसी भी कारण से उद्धव की कुर्सी चली गई तो सवाल यह होगा कि वे और उनके शिव सैनिक हिंदूवादी वोटरों के पास कौन सा मुँह लेकर पहुँचेंगे। इसलिए उनका आज सिद्धि विनायक मंदिर में दर्शन के लिए जाना महज़ गणपति बाप्पा के आशीष के लिए नहीं है, बल्कि बाप्पा के भक्तों को यह भी दिलासा दिलाने की कोशिश है कि बाला साहेब के शेर ने ‘इटैलियन पट्टा’ (जोकि बाला साहेब इस तरह से मिले सीएम पद को कहते) भले ही पहन लिया हो, लेकिन उसकी गुर्राहट आज भी भगवा है। 

न हमने हॉर्स ट्रेडिंग की न गठबंधन तोड़ा, कॉन्ग्रेस तो अपने साथ पूरा अस्तबल ही ले गई: अमित शाह

गुरुवार को राँची में आयोजित एक निजी टीवी चैनल के कार्यक्रम ‘एजेंडा झारखण्ड’ में गृहमंत्री अमित शाह ने कई सवालों के जवाब दिए। कई मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखते हुए शाह ने देश के सामने उन सभी सवालों का जवाब दिया जिसके लिए उनके आलोचक उनपर निशाना साधते हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने कश्मीर से लेकर संसद में प्रज्ञा सिंह ठाकुर के बयान और महाराष्ट्र को लेकर सवालों के जवाब दिए। महाराष्ट्र के सियासी घटनाक्रम पर बोलते हुए शाह ने कहा कि उन्होंने न तो किसी भी तरह से हॉर्स ट्रेडिंग की और न ही उन्होंने गठबंधन तोड़ा। उन्होंने कॉन्ग्रेस पार्टी पर आरोप लगाते हुए कहा कि यह पार्टी तो अपने साथ अस्तबल ही ले गई।

संसद में प्रज्ञा सिंह ठाकुर के बयान को लेकर उपजे हंगामे पर बोलते हुए गृहमंत्री ने कहा कि उनपर कार्रवाई की जाएगी। केंद्र सरकार को लम्बे समय से कश्मीर के मामले पर घेरने वालों को जवाब देते हुए उन्होंने राज्य में लगे प्रतिबंधों पर कहा कि इन्टरनेट कभी भी 40 हज़ार लोगों की जान से ज्यादा कीमती नहीं हो सकता। उल्टे उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में खून की नदियाँ बहने के दावे करने वाले गुलाम नबी आज़ाद आज कहाँ हैं? वे बोले कि इस पूरी कार्रवाई के दौरान सुरक्षाबालों की गोली से एक भी व्यक्ति की मौत नहीं हुई, कहीं भी कर्फ्यू नहीं लगाया गया है।

कार्यक्रम के दौरान शाह ने गाँधी परिवार की सुरक्षा को लेकर भी सरकार का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि गाँधी परिवार के सुरक्षा के स्तर को बदल दिया गया है। शाह बोले कि इस परिवार को देश की सबसे अच्छी सुरक्षा मुहैय्या कराई गई है। उन्होंने कहा कि जब पूर्व प्रधानमंत्रियों की एसपीजी सुरक्षा हटा ली गई तब तो कोई कॉन्ग्रेसी नेता नहीं बोला मगर अब फेरबदल पर भी हाय-तौबा मची हुई है। वहीं आर्टिकल 370 पर बात करते हुए उन्होंने 1990 के नरसंहार की भी याद दिलाई जब 40 हज़ार लोगों की जान चली गई थी। उन्होंने कहा कि देश की जनता मोदी सरकार को इसके लिए धन्यवाद दे रही है।

बंगाल में महिला BJP नेता के घर घुसकर टीएमसी वालों की गुंडई, बीच-बचाव में आए लोग भी घायल

पश्चिम बंगाल के चुनावों पर हमेशा से ही हिंसा का आरोप लगता रहा है। बंगाल में उपचुनाव के नतीजों की घोषणा होने के साथ ही आज एक बार फिर यह राज्य हिंसा और मारपीट की वारदात से दहल उठा। नतीजे आने के बाद भाजपा जिलाध्यक्ष फाल्गुनी पात्रा के घर TMC के गुंडों ने हमला बोल दिया। इसमें उनके घर और गाड़ी दोनों को भारी क्षति पहुँची। फाल्गुनी ने हमले की इस घटना के लिए सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराया है।

बता दें कि पात्रा बैरकपुर इलाके की रहने वाली हैं, समाचार एजेंसी एएनआई ने फाल्गुनी के बयान का हवाला देते हुए बताया कि इस हमले में फाल्गुनी के घर और गाड़ी को काफी नुकसान पहुँचा है। इस सम्बन्ध में कुछ तस्वीरें भी शेयर की गईं। बता दें कि 25 नवम्बर को पश्चिम बंगाल के करीमपुर क्षेत्र में उपचुनाव के दौरान भाजपा के उम्मीदवार जयप्रकाश मजूमदार को भी ऐसी ही पारिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उनके साथ मारपीट कर उन्हें इस्लामपुर स्कूल बूथ के बाहर झाड़ियों में फेंक दिया गया। इस मामले में भी आरोप सत्तारूढ़ दल पर ही लगे थे।

वहीं दूसरी ओर राज्य की भाजपा कार्यकारिणी के सदस्य शिशिर बाजोरिया ने ट्विटर के ज़रिए यह जानकारी दी कि मुकुल रॉय की अगुवाई में एक दल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मिलने गया था जिसने नाडिया के डीएम और एसपी को अपनी ज़िम्मेदारी न निभाने के लिए तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर गिरफ्तार करने की माँग रखी थी। हाल ही में दो पक्षों के बीच खड़गपुर में हुई एक भिडंत में तीन लोग बुरी तरह ज़ख़्मी हो गए थे। राज्य में होने वाले सियासी क़त्ल भी अपने चरम पर हैं। अब तक भाजपा के कई कार्यकर्ताओं को मारा जा चुका है। जबकि राज्य सरकार इस माहौल को रोकने के सम्बन्ध में कोई भी ठोस निर्णय लेने की हिम्मत नहीं दिखा रहा।

‘ज़रूर बनेगा भारत सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य, इस दिशा में तेजी से प्रगति हो रही है’

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारत की विदेश नीति के सबसे बड़े सपने को लेकर बड़ा बयान दिया है। राज्य सभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि भारत सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के लिए सतत रूप से प्रयासरत है, इसमें प्रगति भी लगातार हो रही है, और मोदी सरकार इस मामले को लेकर धैर्य, आकांक्षा और मेहनत में कोई कोताही नहीं कर रही है। “मैं इतना यथार्थवादी हूँ कि यह समझ सकूँ कि यह एक लम्बा और धैर्य वाला काम है… हम एक दिन वहाँ ज़रूर पहुँचेंगे।”

गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बनना भारतीय विदेश नीति की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण आकाँक्षाओं में से एक रहा है। संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना, आतंकवाद की परिभाषा, दूसरे देशों पर आतंकी गतिविधियों के लिए प्रतिबंध लगाने जैसे मामलों में निर्णय यही संस्था लेती है। इसमें मौजूदा 5 स्थाई सदस्य हैं- अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन और फ़्रांस। इन्हें वीटो शक्ति मिली है- यानी इनमें से कोई एक चाहे तो सुरक्षा परिषद में बाकी सभी की सर्वसम्मति से लिए गए किसी भी फैसले को रोक सकता है।

पाँचों सदस्य देशों में से 4 भारत को इसका सदस्य बनाने के लिए राज़ी हैं, और अलग-अलग मौकों पर इसके लिए प्रतिबद्धता जता चुके हैं। केवल चीन हर महत्वपूर्ण मंच की तरह इस पर भी भारत का विरोध कर रहा है।

इसके पहले अक्टूबर में भी जयशंकर ने सुरक्षा परिषद के मामले पर इसके स्थाई सदस्यों को खरी-खरी नसीहत दोटूक दी थी। उन्होंने कहा था कि भारत का सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता में न होना इस संस्था की ही खुद की विश्वसनीयता को सवालिया घेरे में खड़ा कर देता है। उन्होंने तर्क दिया था कि दुनिया की सुरक्षा के बारे में फैसला लेते समय अन्य देश उस देश (भारत) को कैसे बाहर रख सकते हैं जो 15 सालों के भीतर दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का घर बनने जा रहा है और दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था पहले ही बन चुका है।

यही नहीं, जयशंकर अपने राजनयिक जीवन के दिनों से ही भारत की सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के मुद्दे से जुड़े रहे हैं।

मी, उद्धव बालासाहेब ठाकरे, महाराष्ट्र राज्याचा मुख्यमंत्री: हिंदूवाद को ना, मराठी माणूस को हाँ, राहुल-सोनिया नदारद

महा विकास अघाड़ी के विधायक दल के नेता के रूप में शिव सेना सुप्रीमो उद्धव बालासाहेब ठाकरे ने महाराष्ट्र के 18वें मुख़्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली है। वे अपनी पार्टी से तीसरे (मनोहर जोशी और नारायण राणे के बाद) और महाराष्ट्र पर मज़बूत पकड़ रखने वाले अपने परिवार के पहले मुख्यमंत्री हैं।

रणभेरी और तालियों की गड़गड़ाहट के बीच शिवाजी पार्क में हुए शपथ ग्रहण समारोह में राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी द्वारा शपथ और पदभार ग्रहण करने के लिए बुलाए जाने पर मराठी माणूस राजनीति के खुल कर पैरोकार बने उद्धव ठाकरे ने छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा के चरण स्पर्श किए, और उसके बाद मराठी में ही शपथ ली। उन्होंने अपनी सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम में भी 80% नौकरियों का आरक्षण स्थानीय और मराठी युवाओं के लिए करने का ऐलान किया हुआ है

अपनी शपथ में पहला शब्द ही हिन्दू पदपादशाही के नायक “छत्रपति शिवाजी” के नाम को रखने वाले महाराष्ट्र के माननीय मुख्यमंत्री के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस बेमेल गठबंधन का औचित्य जनता के सामने साबित करने का होगा। लेकिन ऐसा लग नहीं रहा है कि इस चुनौती में उनके नए-नए संगी बने कॉन्ग्रेस नेता उनकी अधिक सहायता करेंगे। कॉन्ग्रेस के दोनों ही आलाकमान सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ने उनके शपथ ग्रहण से किनारा कर लिया है। दोनों ने महज़ पत्र लिखकर उन्हें शुभकामना देने और सहयोग के आश्वासन की खानापूर्ति कर डाली।

और यह हाल तब है जब उद्धव के बेटे आदित्य ठाकरे खुद सोनिया गाँधी को न्यौता देने गए थे।

जहाँ साथ में सरकार बनाने के बावजूद सोनिया-राहुल ने उद्धव के शपथ ग्रहण में आना ज़रूरी नहीं समझा, वहीं नाराज़ चल रहे चचेरे भाई और उद्धव के प्रमोशन से ही बिफर कर शिव सेना छोड़ने वाले महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे भाई के लिए महत्वपूर्ण मौके पर मौजूद रहे।

सर्वे रिपोर्ट: मोदी-राज में एक साल में 10% घटी रिश्वतखोरी, बिहार-राजस्थान टॉप पर

भ्रष्टाचार कॉन्ग्रेस शासित यूपीए की सत्ता जाने का सबसे बड़ा कारण बना, और नरेंद्र मोदी के 2014 में प्रधानमंत्री बनने और 2019 में बने रहने का सबसे बड़ा कारण इसी एक सामाजिक बीमारी पर नकेल कसना रहा। लेकिन इसके बाद भी कॉन्ग्रेस ही नहीं, अधिकांश अन्य गैर-भाजपा पार्टियाँ इससे कोई सबक सीखने में दिलचस्पी ले रही हों, ऐसा बिलकुल भी नहीं लग रहा है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था ट्रांस्परेंसी इंटरनेशनल के हालिया सर्वे में भारत ने तो 3 स्थानों की छलाँग और देश के भीतर रिश्वरतखोरी की कुल घटनाओं में 10% कमी आई है, लेकिन चोटी पर मौजूद राज्यों की हालत चिंताजनक है। रिपोर्ट के मुताबिक कॉन्ग्रेस के राज्य राजस्थान और भाजपा-जद(यू) के बिहार से सर्वे में हिस्सेदारी करने वालों में क्रमशः 78% और 75% लोगों को इस साल रिश्वत देनी पड़ी है। 180 देशों में भारत 2018 के 81 से इस साल 78 पर भले ही आ गया हो, लेकिन इन उपरोक्त और कुछ अन्य राज्यों की बदहाली चिंताजनक है।

तकरीबन 2 लाख जवाबों के आधार पर बने इस सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक जहाँ पिछले साल देश के 56% लोगों को रिश्वतखोरी का सामना करना पड़ा, वहीं इस साल ऐसे लोगों की हिस्सेदारी गिर कर 51% पर आ गई है। दक्षिण भारत की ओर रुख करें तो 67% भ्रष्टाचार के साथ तेलंगाना चोटी पर है। यही नहीं, इन 67% लोगों में से भी 56% को तो कई-कई बार रिश्वत के कुचक्र से गुज़रना पड़ा है। तेलंगाना के लिए सबसे चिंताजनक चीज़ यह है कि पिछले साल उसके केवल 43% नागरिकों को भ्रष्टाचार से रूबरू होना पड़ा था- यानी तेलंगाना में भ्रष्टाचार और रिश्वतख़ोरी में डेढ़ गुना बढ़ोतरी हुई है

वहीं इन अपेक्षाकृत ‘विकसित’ और ‘सभ्य’ माने जाने वाले प्रदेशों, और राजस्थान-बिहार की तरह राजनीतिक रूप से ‘ताकतवर’ राज्यों, के मुकाबले आदिवासी-बहुल, पिछड़े-बीमारू और लोक सभा में केवल 22 सांसद भेजने वाले ओडिशा में भ्रष्टाचार बेहद कम रहा है

इसके अलावा भाजपा-शासित हरियाणा, गुजरात, गोवा भी सबसे कम भ्रष्ट सूबों में हैं। सबसे अधिक भ्रष्ट सूबों में कॉन्ग्रेस का ‘योगदान’ केवल राजस्थान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कर्नाटक (जहाँ कुछ समय पहले तक उसी का शासन रहा) और पंजाब में भी घूसखोरी प्रचलित पाई गई।

गौरतलब है कि मोदी सरकार के आने के बाद से घूसखोरी पर लगाम लगाने के प्रयासों में बहुत तेज़ी आई है। सरकार ने सब्सिडी लीकेज रोकने के लिए तो कदम उठाए ही हैं, रिश्वतखोरों पर भी कार्रवाई बार-बार की है। हाल ही में पाँचवीं बार मोदी सरकार ने सरकारी अधिकारियों के एक पूरे समूह को भ्रष्टाचार के लिए सरकारी सेवा से बाहर कर दिया।

‘सीरिया की जेलों में बंद ISIS जिहादियों को बिना किसी मुकदमे के दी जा सकती है फाँसी’

सीरिया में जेलों में बंद जिहादियों को बिना किसी मुक़दमे के फाँसी की सज़ा दी जा सकती है। राष्ट्रपति बशर अल-असद ने कहा कि वह विशेष आतंकवादी अदालतें स्थापित कर रहे हैं, जहाँ क़ैदियों को ‘सीरियाई क़ानून’ के अधीन किया जाएगा। सीरिया में इस्लामिक स्टेट (IS) का सदस्य होने पर फाँसी की सज़ा का प्रावधान है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, हज़ारों क़ैदियों को गुपचुप तरीके से कुख्यात सैदनया जेल के अंदर दमिश्क के पास मार दिया गया है। कहा जाता है कि यातना और भुखमरी से हज़ारों लोग वहाँ मारे गए थे।

क़ैदियों को नियमित रूप से बेरहमी से पीटा जाता है, उन पर विद्युत और यौन हमले किए जाते हैं। कुछ को जानवरों की तरह काम करने और एक दूसरे को मारने तक के लिए मजबूर किया गया।

असद की इस टिप्पणी का ज़िक्र पेरिस मैच पत्रिका में उनके एक साक्षात्कार में की गई थी। सीरियन डेमोक्रेटिक फ़ोर्सेस, जिन्होंने मार्च में अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन की मदद से ISIS को हराया था, वर्तमान में 2,000 विदेशियों सहित 10,000 से अधिक आतंकवादियों को पकड़ रखा है।

ख़बर के अनुसार, अधिकांश सीरियाई और इराक़ी हैं, जिन्हें जेलों के भीतर रखा जा रहा है, जिनमें तथाकथित जिहादी जैक सहित लगभग 2,000 विदेशी शामिल हैं।

अक्टूबर में, एक आतंकी को टीवी समाचार रिपोर्ट में सीरियाई नरकहोल जेल की फ़र्श पर धमाके करते देखा गया था। उसे उसके माता-पिता ने भी देखा था। जैक लेट्स नाम के इस शख़्स का फुटेज भी सामने आया था, जिसमें उसने ख़ुद को “ब्रिटेन का दुश्मन” घोषित कर दिया था। 23 वर्षीय जैक ने सीरिया में ISIS में शामिल होने के लिए एक आलीशान मध्यवर्गीय जीवन छोड़ दिया था। लेकिन, उसे कुर्द बलों द्वारा पकड़ लिया गया था।

पकड़े जाने के बाद, उसने नम्रतापूर्वक अपने ऑक्सफ़ोर्ड शायर घर में यह कहते हुए वापस जाने की गुहार लगाई कि उसका “ब्रिटेनियों को उड़ाने का कोई इरादा नहीं है।”

हालाँकि, ब्रिटेन लौटने की उसकी संभावनाओं पर ज़ोरदार प्रहार हुआ, जब एसडीएफ ने अमेरिका द्वारा त्याग दिए जाने के बाद मदद के लिए असद का रुख़ किया। अधिकांश यूरोपीय देश अपने नागरिकों को वापस लेने से इनकार कर रहे हैं और इराक में कई फ्रांसीसी ISIS क़ैदियों को पहले ही मौत की सज़ा दी जा चुकी है।

कॉन्ग्रेस जिस कारण से शिवसेना से बचना चाहती थी, उसी हिंदुत्व का लालच बना गठबंधन का गोंद?

अगर मीडिया में आ रही खबरों और मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस के नेताओं के दावो पर यकीन करें तो महाराष्ट्र में ‘महा विकास अघाड़ी’ का असली चाणक्य तो इस पूरे शतरंजनुमा खेल के दौरान महाराष्ट्र में आया ही नहीं। कमलनाथ ने भोपाल में बैठकर ही कथित तौर पर ऐसी लॉबिंग की कि मातोश्री के ‘महल’ से निकल कर सरकार बनाने के लालच में होटलों के पिछले दरवाजे तक पहुँच गए उद्धव ठाकरे की सीएम पद की गोटी फिट हो गई।

‘वादाखिलाफ़ी’ का ताव देकर बेटे की राजनीति में ओपनिंग ही सीएम पद से कराने के इच्छुक उद्धव ठाकरे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से निकल तो आए थे, लेकिन समस्या यह थी कि महज़ 56 विधायक लेकर जाएँ किसके दर पर। हिंदुत्व के नाम से उल्टियाँ करने वाली कॉन्ग्रेस (44 विधायक) के पास जाने का विकल्प (उस समय तक) था नहीं, एनसीपी (54) भी उसी खेमे की थी, और निर्दलीय और अन्य केवल 30 थे- वे भी फडणवीस के पाले में अधिक दिख रहे थे। उनमें भी एक नाराज़ भाई राज ठाकरे की मनसे का था, दो हिन्दुओं के सबसे बड़े विरोधी ओवैसी की पार्टी के। और अगर कहीं न जाते तो भी दिक्कत थी- भाजपा (105 विधायक) देर-सबेर येद्दियुरप्पा फॉर्मूले के तहत किसी न किसी पार्टी के विधायकों से सदन में इस्तीफ़ा दिलाकर बहुमत के लिए ज़रूरी संख्या गिराकर सरकार बना लेती, और इस्तीफ़ा देने वालों को अपने टिकट पर स्थिर सरकार और नैतिक-ईमानदार राजनीति के हवाले से जिता कर पूर्ण सदन में भी संख्याबल का पाला छू लेती।

ऐसे में उद्धव ने तो विचारधारा को तिलांजलि देकर कॉन्ग्रेस के साथ जाने का फैसला कर लिया था, लेकिन पेंच यह फँसा कि भले ही महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस कमेटी सबसे लचर प्रदर्शन के बावजूद मुफ्त में मिल रही सत्ता की मलाई के लिए लालयित थी, लेकिन इसमें राष्ट्रीय आलाकमान को फ़ायदा कम और नुकसान ज़्यादा दिख रहा था। चिंता यह थी कि हिंदुत्व वाली शिवसेना के साथ जाने से मोदी-शाह के राजनीतिक ‘नरसंहार’ में गाजर-मूली की तरह कट रहे कॉन्ग्रेसी वोटों में और कमी न हो जाए- बीच के एकाध अपवादों को छोड़ कर 2012-13 के मोदी-उदय के बाद से कॉन्ग्रेस का वोट-शेयर लगातार गोते खा रहा है, और मज़हब के आधार पर वोट करने वाले लोग भी कहीं ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ माने जाने वाले बाला साहेब की पार्टी देख कर अलविदा न कह दे। गोटी यहीं अटक गई थी। सामने दिल्ली, बिहार, झारखंड के चुनाव थे जहाँ कॉन्ग्रेस बिना ‘अल्पसंख्यक’ वोटबैंक के बहुत मुश्किल में होगी।

एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार जब ‘अस्थाई’ कॉन्ग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी से मिलने पहुँचे थे तो लोगों को उम्मीद थी कि इस पार या उस पार की कोई बात हो जाएगी- शरद पवार न केवल पुराने कॉन्ग्रेसी रह चुके हैं, बल्कि जिस सोनिया गाँधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर उन्होंने कॉन्ग्रेस छोड़ी, उन्हीं सोनिया ने यूपीए में डॉ. मनमोहन सिंह के बाद दूसरे नंबर का मंत्री बनाया, तत्कालीन गृह मंत्री को यह पद देने के प्रोटोकॉल को ताक पर रखते हुए। लेकिन वे भी सोनिया गाँधी को तैयार पूरी तरह नहीं कर पाए।

ऐसे में कथित तौर पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने कथित तौर पर तर्क यह दिया कि एक हिंदूवादी इतिहास वाली पार्टी के साथ गठबंधन कर लेने से कॉन्ग्रेस पर लगा ‘हिन्दू विरोधी’ का ठप्पा कमज़ोर पड़ जाएगा। उन्होंने अपना उदाहरण भी दिया कि कैसे उन्होंने शिवराज सिंह चौहान की पूर्ववर्ती भाजपा सरकार की लकीर छोटी करने के लिए एक साल में इतनी गौसेवा कर डाली है कि उन्हें ‘गौभक्त’ कमलनाथ के नाम से जाना जाने लगा है। यानी जिस हिंदूवाद के नाम से सोनिया गाँधी को एलर्जी हो रही थी, कमलनाथ ने समझाया कि उन्हीं हिंदूवादियों के साथ गठबंधन कर के कॉन्ग्रेस गाँधी-नेहरू के समय से चले आ रहे हिन्दू-विरोधी होने के दाग को हल्का कर सकती है।

मीडिया की खबरों के अनुसार इसके बाद भी सोनिया गाँधी को आश्वस्त होने में 4 दिन लग गए। कमलनाथ के बारे में यह जान लेना ज़रूरी है कि वे न केवल सोनिया गाँधी के खास हैं, बल्कि पूर्व प्रधानमंत्रियों राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी के भी नज़दीकी रहे। इंदिरा उन्हें राजीव-संजय के बाद अपना तीसरा बेटा कहतीं थीं, और उनकी हत्या के बाद हुए सिख दंगों में हत्यारी भीड़ का नेतृत्व करने का आरोप भी कमलनाथ पर लग चुका है

बहरहाल, येन-केन-प्रकारेण सोनिया गाँधी मान गईं- और आज सीएम की कुर्सी को ताकत का स्रोत नहीं बल्कि उस पर एक अवांछित बाँध मानने वाले बाला साहेब ठाकरे का बेटा उसी कुर्सी के लिए हिंदूवाद को ही राम-राम कर कॉन्ग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बनने जा रहा है। और इस अहसान के लिए उद्धव कमलनाथ के कृतज्ञ भी हैं। मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस के नेताओं का दावा है कि उन्होंने खुद फ़ोन कर के कमलनाथ को अपने शपथ ग्रहण समारोह में आने के लिए आमंत्रित किया है। और कमलनाथ मान भी गए हैं। फुटबॉल के नॉन-प्लेइंग कैप्टेन की तरह बिना मैदान में उतरे ही इस प्रकरण के अहम वार्ताकार के रूप में उनकी भूमिका पर शायद किसी दिन एक पूरी किताब लिखी जाएगी!

तो कॉन्ग्रेस ने ‘आतंकी’ के हिमायतियों से ही गठबंधन कर लिया… क्यों?

संसद में साध्वी प्रज्ञा के नाथूराम गोडसे को देशभक्त कहने से नया हंगामा खड़ा हो गया है। नाथूराम गोडसे को महात्मा गाँधी की हत्यारे के रूप में जाना जाता है। इस बीच एक नया विवाद तब सामने आ गया जब कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने पलटकर साध्वी प्रज्ञा को ही आतंकवादी कह डाला। अपने एक ट्वीट में राहुल ने लिखा “भारत के संसदीय इतिहास में यह एक काला दिन है। आतंकी प्रज्ञा ने आतंकवादी गोडसे को देशभक्त कहा है।”

राहुल अपने इस बयान में उसी महिला का ज़िक्र कर रहे थे जिसे यूपीए के शासनकाल में “हिन्दू आतंकवाद” को साबित करने के लिए जेल में बंद कर प्रताड़ित किया गया। वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस पार्टी गोडसे को सम्मान देने वाली पार्टी शिवसेना को समर्थन दे रही है।

राहुल या उनकी कॉन्ग्रेस पार्टी के नेताओं से इस बात की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वह राष्ट्रवादियों की सलाह पर ध्यान भी देंगे। मगर उन्हें अब अपने नए सहयोगी दल ‘शिवसेना’ की तो सुननी चाहिए।

शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में 2010 में छपे एक सम्पादकीय में नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताया था। उसमें कहा गया था कि गोडसे इटली से नहीं आए थे बल्कि एक देशभक्त थे जो बँटवारे के वक़्त हिन्दुओं के कत्लेआम से बहुत आहत थे।

सामना में नाथूराम गोडसे पर यह सम्पादकीय उस वक़्त लिखा गया था जब ठाणे लिटरेरी मीट की एक स्मारिका में गोडसे को फीचर किया गया था। इसके बाद एनसीपी और कॉन्ग्रेस दोनों ही पार्टियों ने इसका जमकर विरोध किया था। जिसपर सामना के सम्पादकीय में लिखा गया कि, “उनका ज़िक्र किया गया यह कॉन्ग्रेस और एनसीपी के दुखी होने का कारण तो नहीं” इसके अलावा सम्पादकीय में यह भी कहा गया कि उस स्मारिका में गोडसे को गाँधी के हत्यारे के तौर पर नही दर्शाया गया।”

इस सम्बन्ध में ही एक एडिटोरियल में कहा गया था कि “जो लोग गोडसे को नहीं मानते वह क्या इशरत से प्रेम करते हैं? क्या स्मारिका पर इशरत की तस्वीर छापी जाती? गोडसे एक देशभक्त थे जो हमेशा अखंड भारत के लिए जिए। उनके लिए भावना होना क्या एंटी-नेशनल होना है? “

साध्वी ने भी लगभग वही कहा जो शिवसेना की ओर से पहले भी कहा जा चुका है। वही शिवसेना जो महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस का एक सहयोगी दल है। मगर क्या प्रज्ञा को आतंकवादी बोलने वाले राहुल की कॉन्ग्रेस शिवसेना को आतंकवादी से सहानुभूति रखने वाला बोल सकती है? गोडसे और साध्वी के लिए ‘आतंकवादी’ शब्द का इस्तेमाल करने वाले राहुल का तो जैसे इस शब्द पर एकाधिकार है।

एक लम्बे समय से कई राजनेताओं ने नाथूराम के नाम को ऐसा मोहरा बनाया है जिसके ज़रिए वह हिन्दुत्ववादियों को निशाना बना रहे हैं। यह कॉन्ग्रेस और गाँधी परिवार की भ्रष्टता नहीं तो और क्या है कि इन्होने देश के प्रधानमंत्री रहे इनके अपने परिवार के सदस्य राजीव गाँधी के हत्यारों को चुनाव में फायदे के लिए माफ़ कर दिया। जबकि कॉन्ग्रेस पार्टी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि गोडसे को लेकर आम जनता क्या सोचती है क्योंकि अगर उन्हें इसका फर्क पड़ता तो महाराष्ट्र में वह उस शिवसेना से गठबंधन नहीं करती जो हमेशा से गोडसे के प्रति सम्मान का भाव प्रकट करती रही है। उनके खुद के ही बयानों का सार देखें तो कॉन्ग्रेस पार्टी इस समय आतंकवादी के हिमायती संग गठजोड़ कर के बैठी है।