हैदराबाद में पशु चिकित्सक प्रीति रेड्डी (बदला हुआ नाम) के साथ हुई दरिंदगी ने पूरे देश को झकझोर रखा है। लेकिन, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इतने संवेदनशील मामले में भी ओछी हकरतें करने से बाज नहीं आ रहे। हैदराबाद की साइबर क्राइम पुलिस ने निजामाबाद से ऐसे ही एक युवक को गिरफ्तार किया है। युवक की पहचान 22 वर्षीय चवन श्रीराम के तौर पर की गई है।
इस युवक ने फेसबुक पर प्रीति रेड्डी को लेकर अश्लील टिप्पणी की थी। सोशल मीडिया पर यह पोस्ट तेजी से वायरल हुआ था। इस पोस्ट को कुछ लोग शेयर कर रहे थे, तो कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कर रहे थे। इसके बाद साइबर क्राइम पुलिस ने स्वत: संज्ञान लेते हुए 30 नवंबर को मामला दर्ज किया। इसके बाद लोकेशन तलाश कर गिरफ्तारी की गई।
हैदराबाद पुलिस द्वारा जारी प्रेस रिलीज
पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार प्रीति रेड्डी की तस्वीर अपलोड करके बेहद शर्मनाक और अश्लील पोस्ट बनाई गई थी। जाँच के दौरान पुलिस ने सख्त रुख दिखाते हुए आरोपित को धर दबोचा। इस बीच साइबराबाद पुलिस ने कुछ मीडिया समूहों को आगाह किया है कि वे पीड़िता का नाम, पहचान, फोटो और दस्तावेज जाहिर न करें। न ही मामले से संबंधित वीडियो क्लीपिंग चलाएँ।
इसके साथ ही हैदराबाद पुलिस ने एक एडवाइजरी जारी की है, जिसमें बताया गया है कि महिलाओं को क्या करना है और क्या नहीं। पुलिस ने कुल 14 सलाह जारी किए हैं, जिनका महिलाओं को पालन करने के लिए कहा गया है। सोशल मीडिया पर इस एडवाइजरी को लेकर लोगों में काफी गुस्सा देखने को मिल रहा है। लोगों ने पूछा कि अगर सब कुछ आम नागरिकों व महिलाओं को ही करना है तो फिर पुलिस क्या करेगी?
गौरलतब है कि गैंगरेप के बाद प्रीति की हत्या कर दी गई थी। फिर उनके शव को आरोपितों ने जला दिया था। इस मामले में पुलिस ने सभी आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। शनिवार को मजिस्ट्रेट ने चरों आरोपितों मोहम्मद आरिफ (26 साल), जोल्लू शिवा (20 साल), जोल्लू नवीन कुमार (20 साल), चिन्ताकुट्टा चेन्ना केशवुलु (21 साल) को 14 दिनों की हिरासत में भेज दिया था।
महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस की सरकार बने अभी 1 सप्ताह भी नहीं हुए हैं। लेकिन साझेदारों के बीच तल्खी की खबरें आने लगी है। मामला मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की एक बैठक से जुड़ा है। उद्धव ठाकरे ने मंत्रालय और सचिवालय के कुछ अधिकारियों की बैठक बुलाई थी। उस बैठक में उनके बेटे आदित्य ठाकरे भी मौजूद थे। लेकिन हंगामा इसे लेकर नहीं हुआ क्योंकि आदित्य विधायक भी हैं। उस बैठक में उद्धव की पत्नी रश्मि ठाकरे के भतीजे वरुण सरदेसाई की मौजूदगी ने सबको हैरान कर दिया। लोगों ने पूछा कि वरुण ने बिना किसी पद पर रहते हुए मीटिंग कैसे अटेंड किया? एनसीपी ने भी इसके लिए उद्धव को खरी-खरी सुनाई है।
सरदेसाई ने सफाई देते हुए कहा कि बैठक में किसी संवेदनशील मुद्दे पर बातचीत नहीं की गई। वरुण ने कहा कि बैठक में किसे बुलाना है और किसे नहीं, ये तय करना सीएम का अधिकार है। साथ ही उन्होंने बताया कि वो सीएम उद्धव की ओर से उस बैठक में हिस्सा ले रहे थे। एनसीपी को ये सफाई नहीं पसंद आई। एनसीपी ने कहा कि भले ही यह बहुत बड़ी ग़लती नहीं हो, लेकिन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की अनुभव की कमी साफ़ दिख रही है।
एनसीपी के प्रवक्ता नवाब मलिक ने कहा कि उद्धव ठाकरे के पास किसी प्रकार का प्रशासनिक अनुभव नहीं है और वो इससे पहले किसी पद पर नहीं रहे हैं, इसीलिए ये ग़लती हुई। साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री को चेतावनी देते हुए कहा कि उद्धव इस बात का ध्यान रखें कि भविष्य में ऐसी घटनाएँ दोबारा न हो। कॉन्ग्रेस भी वरुण के बैठक में शामिल होने से ख़ुश नहीं दिखी। पार्टी ने इसपर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। शिवसेना ने डैमेज कंट्रोल करते हुए कहा कि वरुण उत्सुकतावश उस बैठक में चले गए होंगे।
देश-विदेशातील पर्यटकांना आकर्षित करण्याच्या दृष्टीने बँकॉक येथील सिॲम ओशन वर्ल्डच्या धर्तीवर मुंबईत जागतिक दर्जाचे मत्स्यालय उभारण्यासाठी प्रस्ताव सादर करण्याच्या मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे यांच्या पर्यटन विभागाला सूचनाhttps://t.co/5609JnIkRopic.twitter.com/Z4W7BSXJPv
उद्धव ठाकरे ने ये बैठक मुंबई में समुद्री किनारे वाले इलाक़ों व अन्य क्षेत्रों में पर्यटन के बारे में चर्चा करने के लिए बुलाई थी। एक सरकारी अधिकारी ने ‘मिड-डे’ से कहा:
“कोई ऐसा व्यक्ति सरकारी बैठक में कैसे भाग ले सकता है, जो न तो सरकार का हिस्सा है और न ही कोई जनप्रतिनिधि है? वरुण पर्यटन के विशेषज्ञ भी नहीं हैं। ऐसे में उनका इस बैठक में शामिल होने के कोई तुक नहीं है।”
जहाँ उद्धव ठाकरे के परिवार के सदस्य बिना किसी पद पर रहे मुख्यमंत्री की बैठक में हिस्सा ले रहे हैं, आम कार्यकर्ताओं को ये छूट नहीं है। शिवसेना की यूथ विंग ‘युवा सेना’ की बैठक में सभी कार्यकर्ताओं को स्पष्ट हिदायत दी गई कि शिवसेना का कोई भी सदस्य मंत्रालय में कोई काम करवाने के लिए न जाए, क्योंकि पार्टी अब सत्ता में है। वहीं वरुण ने कहा कि उन्होंने बैठक में जाकर कोई ग़लती नहीं की है। उस बैठक में उद्धव ने मुंबई में मछलीघर बनाने और संजय गाँधी नेशनल पार्क में ‘नाइट सफारी’ को विकसित करने को लेकर चर्चा की।
भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे और पूर्व मंत्री पंकजा मुंडे ने पार्टी छोड़ने की अटकलों को खारिज कर दिया है। पंकजा मुंडे ने मंगलवार (दिसंबर 3, 2019) को कहा कि वह पार्टी नहीं छोड़ रही हैं। उन्होंने संवाददाताओं से बात करते हुए कहा, ‘‘मैं पार्टी नहीं छोड़ रही हूँ। दलबदल मेरे खून में नहीं है। मैं पार्टी की सच्ची और समर्पित कार्यकर्ता हूँ।”
पंकजा मुंडे ने सोमवार (दिसंबर 2, 2019) को ट्विटर पर अपने ‘बॉयो’ से भाजपा का नाम हटा दिया। इसके बाद उनके भाजपा छोड़ने की अटकलों ने जोर पकड़ लिया था। इससे पहले उन्होंने रविवार (दिसंबर 1, 2019) को एक फेसबुक पोस्ट करते हुए अपने पिता गोपीनाथ मुंडे के जन्मदिवस पर 12 दिसंबर को समर्थकों को बीड के गोपीनाथगढ़ पहुँचने की अपील की थी। इसमें उन्होंने लिखा था, ‘‘अब सोचने और निर्णय लेने की जरूरत है कि आगे क्या किया जाए?”
पंकजा ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखी बातों को मीडिया के एक वर्ग द्वारा ट्विस्ट करने का आरोप लगाया। इससे पहले मंगलवार दोपहर भाजपा के पूर्व मंत्री विनोद तावड़े ने पंकजा मुंडे से मुलाकात की। दोनों के बीच करीब एक घंटे तक बातचीत हुई। मुलाकात के बाद तावड़े ने कहा, ‘‘रविवार को उनके फेसबुक पोस्ट का विरोधियों ने गलत मतलब निकाला, इसलिए वह बहुत आहत थीं। उन्होंने खुद मुझे बताया कि वह पार्टी से नाखुश नहीं हैं।”
इसके अलावा पंकजा ने उन अफवाहों का भी खंडन किया, जिनमें कहा गया था कि उनके ट्विटर परिचय से ‘‘भाजपा’’ को हटाने का मकसद अपनी पार्टी पर दबाव बनाना था। बता दें कि पंकजा के फेसबुक अकाउंट के ‘अबाउट’ सेक्शन में उनका राजनीतिक संबंध अब भी भाजपा के साथ ही दिख रहा है। इसके साथ ही सोमवार को पंकजा ने अपने फेसबुक पेज पर भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित की और साथ में ‘कमल’ (भाजपा का चिह्न) की एक तस्वीर पोस्ट की।
Pankaja Munde: I have been an honest worker of the party (BJP), I have worked for the party. And I am distressed at allegations against me. I will speak on December 12 now, wouldn’t want to say more right now. pic.twitter.com/IkEFTxQsLi
पार्टी छोड़ने की अटकलों पर बात करते हुए पंकजा मुंडे ने कहा, “मैं पार्टी (भाजपा) की ईमानदार कार्यकर्ता रही हूँ, मैंने पार्टी के लिए काम किया है। मैं अपने ऊपर लगे आरोपों से दुखी हूँ। मैं अब 12 दिसंबर को बोलूँगी, अभी और कुछ नहीं कहना चाहती।”
गौरतलब है कि शिवसेना नेता संजय राउत ने दावा किया था कि कई नेता उद्धव ठाकरे नीत पार्टी में शामिल होने के इच्छुक हैं। हालाँकि बीजेपी की महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने राउत के दावे को सोमवार को खारिज किया था। साथ ही उन्होंने पंकजा मुंडे के बीजेपी छोड़ने की खबरों का भी खंडन किया था।
उन्होंने कहा था, “महाराष्ट्र में दुर्घटनावश बनी सरकार निराधार खबरें फैला रही है। उनके ठाकरे परिवार से अच्छे पारिवारिक रिश्ते हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वह शिवसेना में शामिल होने जा रही हैं। वह हार के बाद आत्मनिरीक्षण कर रही हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह भाजपा छोड़ रही हैं।”
महाराष्ट्र में 23 नवंबर को राष्ट्रपति शासन हटने के बाद तड़के सुबह भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस ने एनसीपी से बगावत करने वाले अजित पवार की मदद से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। हालाँकि, शरद पवार भतीजे को वापस अपने कुनबे में लाने में कामयाब हुए। अजित पवार के बगावत के बारे में एनसीपी अध्यक्ष ने कहा कि इसका कारण कॉन्ग्रेस है। बकौल पवार, कॉन्ग्रेस सरकार गठन पर हो रही बातचीत को काफ़ी लम्बा खींच रही थी, इसलिए अजित ने चिढ कर भाजपा के साथ जाने का फ़ैसला लिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी की चिढ़ के कारण अजित ने बगावत की।
शरद पवार ने बताया कि अजित मानते थे कि कॉन्ग्रेस बातचीत को कुछ ज्यादा ही लम्बा खींच रही है और शिवसेना विचार-विमर्श में ठीक से हिस्सा नहीं ले रही है। शरद पवार ने चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया कि उन्हें पता था कि अजित पवार और देवेंद्र फडणवीस की बातचीत चल रही है। हालाँकि, पवार ने यह भी कहा कि उन्हें इसका तनिक भी आभास नहीं था कि अजित भाजपा से जा मिलेंगे। शरद पवार ने बताया कि फडणवीस के शपथ लेने से 1 दिन पहले 22 नवंबर की शाम को हुई बैठक में कॉन्ग्रेस से काफ़ी गर्मागर्म बहस हुई थी।
अजित पवार उस बैठक में हुई बातचीत से काफ़ी नाराज़ थे। वो चिढ़ गए थे। शरद पवार ने आगे बताया कि कॉन्ग्रेस अपने लिए अधिक संख्या में मनपसंद मंत्रालयों की माँग कर रही थी। शरद पवार उस बैठक से निकल गए थे। उसके बाद अजित पवार भी गुस्से में उस बैठक से निकल गए थे और उन्होंने एनसीपी नेताओं से कहा कि वो शायद इस तरह से काम करने में सक्षम नहीं हो पाएँगे। उसी रात देवेंद्र फडणवीस के साथ उनकी बैठक हुई। शरद पवार ने इस बात को नकार दिया कि उनके इशारे पर ही अजित ने फडणवीस को समर्थन दिया था।
एबीपी न्यूज़ के साथ इंटरव्यू में शरद पवार ने बताई ‘अंदर की बात’
गठबंधन के लिए भाजपा की बजाय शिवसेना को तरजीह देने के सवाल पर शरद पवार ने कहा कि भाजपा के मुक़ाबले शिवसेना के साथ काम करना ज्यादा आसान है। शरद पवार ने कहा कि वो शिवसेना के साथ गठबंधन करने को तभी राज़ी हुए जब उन्हें पक्का यकीन हो गया कि ठाकरे सरकार कहीं भी हिंदुत्व को बीच में लेकर नहीं आएगी। शरद पवार ने यह भी माना कि पार्टी में उनके भतीजे की पकड़ ख़ासी मजबूत है। पवार ने कहा कि अजित की बगावत के बाद उनसे मुलाकात हुई तो उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हो गया और उन्होंने अपना फ़ैसला बदल लिया।
हालाँकि, शारद पवार इस सवाल से कन्नी काट गए कि अजित नई सरकार में उपमुख्यमंत्री का पद संभालेंगे या नहीं? उन्होंने कहा कि एनसीपी, कॉन्ग्रेस और शिवसेना की गठबंधन में ‘पूर्ण समझदारी’ है और सरकार 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा करेगी।
जमीयत उलमा ए हिन्द के राम जन्मभूमि मंदिर पर आए निर्णय को चुनौती देने के फैसले को मुस्लिम समुदाय के भीतर से ही समर्थन नहीं मिल पा रहा है। केंद्रीय शिया वक़्फ़ बोर्ड के मुखिया वसीम रिज़वी ने मंगलवार (3 दिसंबर, 2019) को बयान दिया है कि यह कदम जमीयत ने केवल साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के लिए उठाया है।
“हर किसी को पता है कि इस पुनर्विचार याचिका पर कोई फैसला नहीं आएगा, क्योंकि कोई भी फ़ैसला इस आए हुए फ़ैसले से बेहतर नहीं हो सकता था। यह पुनर्विचार याचिका केवल नफ़रत के बीज बोने के लिए डाली गई है।”
Just to sow a seed of hatred: Waseem Rizvi after Jamiat Ulema-e-Hind files review plea against Ayodhya verdict.https://t.co/TTVm3FcCgc
गौरतलब है कि कल (सोमवार, 2 दिसंबर, 2019 को) सुप्रीम कोर्ट में जमीयत ने सुप्रीम कोर्ट के ही द्वारा दिए गए रामजन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद विवाद पर फैसले के खिलाफ़ पुनर्विचार याचिका दायर की है। 9 नवंबर, 2019 को आए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में पूर्व में विवादित रहे रामजन्मभूमि मंदिर परिसर के पूरे 2.77 एकड़ का मालिकाना हक मंदिर के देवता रामलला विराजमान को दे दिया था, और उनके मंदिर के निर्माण के लिए केंद्र सरकार को तीन महीने में न्यास का गठन कर अदालत को सूचित करने का आदेश दिया था।
अदालत ने मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही 5 एकड़ जमीन देने का भी आदेश दिया था, क्योंकि मंदिर स्थल पर खड़ी बाबरी मस्जिद को 6 दिसंबर, 1992 को अवैध रूप से ढहा दिया गया था।
टाइम्स नाउ ने अपने पास मौजूद जमीयत की याचिका की कॉपी के आधार पर दावा किया है कि जमीयत ने इस फैसले को त्रुटिपूर्ण बताया है। उनके मुताबिक इससे अन्य के अलावा बाबरी मस्जिद तोड़ने वालों को (दंड की जगह) राहत मिल गई। इसके अलावा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी आगामी सोमवार को पुनर्विचार याचिका दायर कर सकता है। गौरतलब है कि आगामी सोमवार (9 दिसंबर, 2019) को ही एक महीने के भीतर पुनर्विचार याचिका दायर करने की अंतिम तिथि समाप्त हो रही है। कुछ दिन पहले ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी (बीएमसी) के संयोजक एडवोकेट ज़फ़रयाब जीलानी ने इस आशय से जानकारी मीडिया को दी थी।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए गए अपने इंटरव्यू में उन्होंने सवाल उठाया था कि “अवैध रूप से घुस आई” मूर्ति को भला अदालत देवता कैसे मान सकती है। उन्होंने दावा किया कि इस तरह ‘जबरन’ मूर्ति को (उस समय, 1949 में) विवादित रहे ढाँचे में स्थापित कर वहाँ बनी बाबरी मस्जिद का अपमान किया गया है।”
जीलानी का दावा है कि उनकी याचिका तत्कालीन मस्जिद के मुख्य गुंबद में रखी गई मूर्ति को देवता का दर्जा देने के विरोध पर आधारित होगी। उनका मानना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस बिंदु पर ध्यान दिया होता तो उनका फैसला अलग होता। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी याचिका समयसीमा 9 दिसंबर से पहले ही आएगी।
हरियाणा में लगातार हो रही गौहत्या रोकने को लेकर पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में अजीब टिप्पणी सुनने को मिली है। स्वराज्य पत्रिका की सम्पादक स्वाति गोयल शर्मा के अनुसार मामले में अदालत की सहायता के लिए ‘न्यायमित्र’ (एमाइकस क्युरे) नियुक्त हुए हरियाणा सरकार के एडिशनल एडवोकेट जनरल दीपक बाल्यान ने अदालत से कहा कि गौहत्या रोकने के लिए प्रस्तावित टास्क फ़ोर्स का जो मुखिया चुना जाए, उसका ‘सेक्युलर’ विचारधारा का होना आवश्यक है। यह शायद पहली बार है जब किसी सरकारी पद पर नियुक्ति के लिए एक खास राजनीतिक विचारधारा का ही होना अनिवार्य करने की बात किसी सरकारी अमले के अधिकारी की ओर से कही गई है।
स्वाति गोयल शर्मा स्वराज्य के लिए पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में चल रही उस सुनवाई को कवर कर रहीं हैं, जिसमें हरियाणा गौवंश संरक्षण और गौसंवर्धन एक्ट, 2015 को प्रभावी रूप से लागू कर पाने में राज्य सरकार की नाकामी पर सुनवाई हो रही है। इस एक्ट के अंतर्गत गौवंश की तस्करी, हत्या के अलावा बीफ़ खाना या अपने पास रखना हरियाणा में प्रतिबंधित है। मार्च में जस्टिस महाबीर सिंह संधू ने इस पर सवाल खड़ा किया था कि इतने सारे मामलों में आरोपित गिरफ़्तारी से बच कर निकल कैसे जाते हैं। उन्होंने बाल्यान को मामले के लिए न्यायमित्र नियुक्त करने के अलावा हरियाणा के डीजीपी मनोज यादव को इस एक्ट के तहत दर्ज मामलों का अध्ययन करने का निर्देश दिया।
इसके बाद सामने आया यह चौंका देने वाला आँकड़ा कि इस एक्ट के तहत केवल मेवात जिले में (हरियाणा में कुल 22 जिले हैं) 792 एफआईआर लिखे जाने के बाद भी नवंबर, 2015 से मार्च 2019 के बीच एक भी गिरफ़्तारी नहीं हुई!!
इस ढीलाढाली पर अदालत की फटकार के बाद न केवल डीजीपी ने मेवात में ऐसे केसों से निबटने के लिए पुलिस वालों को विशेष ट्रेनिंग दिए जाने के निर्देश दिए, बल्कि हरियाणा की खट्टर सरकार ने भी इस एक्ट में संशोधन कर पुलिस वालों को भी विशेष अधिकार दिए। यह अधिकार थे बीफ़ या हत्या के लिए ले जाई जा रहीं गायों के संदिग्ध वाहनों की तलाशी और उन्हें जब्त करने का अधिकार। इसके अलावा राज्य सरकार के एक प्रतिनिधि ने अदालत को बताया कि सरकार गायों के एक जगह से दूसरी जगह ले जाए जाने का समय सुबह 7 से शाम 5 बजे के बीच निर्धारित करने पर भी विचार कर रही है। यह भी एमाइकस क्युरे बाल्यान का ही सुझाव था। इसके बाद अदालत ने बाल्यान को मेवात (अब नूह) के सभी पुलिस थानों का दौरा कर इस एक्ट को ढंग से लागू करने के सुझाव तैयार करने का निर्देश दे दिया था। बाल्यान का ‘सेक्युलर’ पुलिस अधिकारी वाला सुझाव इसी संदर्भ में था।
28 नवंबर, 2019 को बाल्यान द्वारा जमा रिपोर्ट के हवाले से स्वाति गोयल शर्मा का दावा है कि इस एक्ट के अंतर्गत दायर किए गए मुकदमों को पुलिस के काम करने के आम ढर्रे पर नहीं सुलझाया जा सकता है। बकौल स्वाति, बालियान ने गौहत्या और गौ-तस्करी रोकने के लिए एक विशेष टास्क फ़ोर्स के गठन का सुझाव दिया है, जिसका मुखिया कम-से-कम एसएसपी रैंक का अधिकारी हो। फ़िलहाल इसकी जिम्मेदारी एक डीएसपी रैंक अफ़सर के पास है, लेकिन उनके पास दो अन्य पुलिस थानों का भी कार्यभार है। इसके अलावा बाल्यान ने यह भी बताया था कि जो ‘स्पेशल सेल’ इन मामलों को देख रही है, उसके पास आधारभूत ढाँचे, पर्याप्त संख्या में लोगों समेत सुविधाओं का बेहद अभाव है।
इसी रिपोर्ट में उन्होंने मेवात में गौहत्या रोकने के लिए त्वरित रूप से टास्क फ़ोर्स के गठन की सिफ़ारिश करते हुए बाल्यान ने इसके मुखिया की जो वांछित खूबियाँ गिनाई हैं, उनमें ऐसे अपराधों के विशेषज्ञ होने, बिना डर या लालच के निर्णय लेने की क्षमता के अलावा ‘सेक्युलर विचारधारा’ की अनिवार्यता शामिल है। इसके अलावा उन्होंने संवेदनशील इलाकों में चेक पॉइंट बनाए जाने के साथ ही एक और महत्वपूर्ण सुझाव की वकालत की है। उन्होंने कहा है कि पुलिस वालों के पास एक ‘मोबाइल’ (चलती-फिरती) लैब होनी चाहिए, ताकि घटनास्थल पर ही बरामद मीट की जाँच कर यह बताया जा सके कि यह गाय का है या नहीं। रिपोर्ट के मुताबिक, उपरोक्त भारी संख्या में मामले दर्ज होने के बावजूद किसी को दोषी इसलिए नहीं करार दिया जा पाता है क्योंकि माँस के बीफ़ होने का पता उसके सड़ने के पहले ही लगाया जा सकता है।
इसके अलावा रिपोर्ट में नूह में स्थानीय ‘सौहार्द’ को गौहत्या रोकने के लिए ज़रूरी बताया गया है। इसका कारण यह कहा गया है कि वहाँ की बहुसंख्य जनता मुस्लिम है, जो बीफ़ के मामलों की जाँच में पुलिस के साथ सहयोग नहीं करती है, क्योंकि उसे तथाकथित रूप से पुलिस पर भरोसा नहीं है।
काशी हिन्दू विश्विद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान (SVDV) संकाय में डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति की उच्च-स्तरीय जाँच की माँग तेज हो गई है। बता दें कि विश्विद्यालय प्रशासन द्वारा छात्रों से माँगी गई 10 दिन की समय-सीमा समाप्त होने के बाद छात्र संकाय प्रमुख के पास अपनी माँगों के लिखित जवाब के लिए के लिए पहुँचे थे। वहाँ प्रशासन ने पहले तो उन्हें अनसुना कर दिया, फिर संकाय के गेट का घेराव कर बैठे छात्रों को SVDV के ही साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष उमाकांत चतुर्वेदी द्वारा कुछ जवाब लिखित में दिए गए- लेकिन आधे-अधूरे, और वह भी प्रशासन के कहने पर। इससे नाराज और असंतुष्ट छात्र प्रशासन के खिलाफ उचित कार्रवाई के लिए फिर से धरने पर बैठ गए थे। और आज भी उनका धरना जारी है।
#SVDV के छात्रों को #BHU प्रशासन ने दिया बिना प्रमाण के जवाब, असंतुष्ट छात्रों ने उठाए कई गंभीर सवाल, अनिश्चित काल तक आन्दोलन जारी रखने पर अड़े धरनारत छात्र….
हालाँकि आज BHU प्रशासन ने छात्रों के शेष सवालों (क्रमांक 4 और 5) का जवाब तो दिया, लेकिन छात्रों ने इन जवाबों को गैरजिम्मेदाराना बताते हुए इस पर असंतुष्टि जाहिर की। छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से कई गंभीर सवाल पूछते हुए सभी उत्तरों के पक्ष में प्रमाण भी माँगे हैं। साथ ही छात्रों ने प्रशासन पर कई आरोप लगाते हुए धरना जारी रखा है। पूछे जाने पर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे शशिकांत मिश्र ने बताया, “प्रशासन ने कुछ भी उल्टा-सीधा जवाब देकर मामले से पल्ला झड़ना चाहा, लेकिन उन्हें हमने अपने विरोध के माध्यम से कई प्रतिप्रश्न पूछे हैं और उनका जवाब प्रमाण सहित माँगा है। अब देखते हैं कि आगे वो क्या निर्णय लेते हैं।”
BHU प्रशासन द्वारा जारी किया गया कवरिंग लेटर
SVDV के छात्रों के प्रश्नों पर BHU प्रशासन का जवाब
संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान के साहित्य विभाग में क्या अन्य सभी विभागों के सदृश ही शॉर्ट-लिस्टिंग हुई?
विश्वविद्यालय में शिक्षकों की नियुक्ति हेतु आए आवेदनों की शार्टलिस्टिंग विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रतिपादित “विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में शिक्षकों और अन्य शैक्षिक कर्मचारियों की नियुक्ति हेतु न्यूनतम अर्हता तथा उच्चतर शिक्षा में मानकों के रखरखाव हेतु अन्य उपाय सम्बन्धी विनियम, 2018” के अनुसार की जाती है।
उपरोक्त विनियम के प्रावधानों के अंतर्गत ही संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के साहित्य विभाग में भी आवेदनों की शार्टलिस्टिंग अन्य विभागों के सदृश ही की गई है।
क्या-शॉर्ट लिस्टिंग में सम्मिलित व्यक्ति संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के पारंपरिक (सनातन धर्म) संबंधित नियमों को ध्यान में रखकर किया गया?
साहित्य विभाग में नियुक्ति हेतु आवेदनों की शॉर्ट लिस्टिंग विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में शिक्षकों और अन्य शैक्षिककर्मियों की नियुक्ति हेतु न्यूनतम अर्हता और उच्चतर शिक्षा में मानकों के रखरखाव हेतु अन्य उपाय संबंधी विनियम, 2018 के अनुसार की गई है।
(उपरोक्त उल्लिखित नियमों के अनुसार ही शार्टलिस्टिंग की गई है।)
इस शॉर्ट-लिस्टिंग में यूजीसी के किस नियम को अपनाया गया?
शॉर्ट-लिस्टिंग प्रक्रिया में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में शिक्षकों और अन्य शैक्षिक कर्मियों की नियुक्ति हेतु न्यूनतम अर्हता तथा उच्चतर शिक्षा में मानकों के रख-रखाव हेतु अन्य उपाय संबंधी विनियम, 2018 के खंड 3 एवं 4 और परिशिष्ट द्वितीय, तालिका 3 (ए) के प्रावधानों को अपनाया गया है।
इस नियुक्ति में क्या विश्वविद्यालय प्रशासन ने विश्वविद्यालय संविधान के अनुसार नियुक्ति प्रक्रिया संपन्न की है?
हाँ, इस नियुक्ति में भी विश्वविद्यालय के अधिनियमों एवं संविधियों में निर्धारित नियुक्ति प्रक्रिया का पालन किया गया है।
क्या बीएचयू संविधान के 1904, 1906, 1915, 1951, 1966 एवं 1969 संशोधनों को केंद्र में रखकर नियुक्ति की गई है?
संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान के साहित्य विभाग के शिक्षकों की विश्वविद्यालय में नियुक्ति वर्तमान BHU एक्ट के प्रावधानों तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के उपरोक्त विनियम 2018 के प्रावधानों के अंतर्गत की गई है।
BHU प्रशासन द्वारा SVDV के छात्रों के प्रश्नों का दिया गया जवाब
BHU प्रशासन के बिना प्रमाण के दिए जवाबों से SVDV के छात्रों में घोर असंतुष्टि है। चक्रपाणि ओझा, शशिकांत मिश्र, आनंद मोहन झा, कृष्ण कुमार सहित सभी धरनारत छात्रों ने कई गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। छात्रों ने इससे पहले कल SVDV के साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर उमाकांत चतुर्वेदी द्वारा दिए गए आधे-अधूरे जवाबों पर भी कई काउंटर सवाल (प्रति-प्रश्न) किए थे और BHU प्रशासन से सभी प्रश्नों का समुचित जवाब माँगा था।
SVDV संकाय के साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष को छात्रों का जवाब
आज BHU प्रशासन की तरफ से धरने पर बैठे आंदोलकारी छात्रों को जब जवाब दिया गया तो छात्रों ने उस पर भी कई काउंटर सवाल दाग दिए जिसका प्रशासन की तरफ से अभी तक कोई जवाब नहीं आया है।
SVDV के छात्रों द्वारा BHU प्रशासन से पूछे गए प्रति-प्रश्न
अगर हर विभागों में शॉर्टलिस्टिंग की एक ही प्रक्रिया अपनाई गई है तो, एक ही व्यक्ति की अलग-अलग विभागों में स्कोरिंग पॉइंट्स में अंतर क्यों है?
धर्म विज्ञान संकाय के पारंपरिक (सनातन धर्म) के नियमों को शॉर्ट-लिस्टिंग में ध्यान रखा गया या नहीं? इसके उत्तर में UGC 2018 के अधिनियम का हवाला दिया गया। मतलब पूछा आम और बताया इमली।
अगर UGC के 2018 अधिनियम के तहत नियुक्ति हुई तो साक्षात्कार में 0 व 100% नम्बर कैसे दिए गये? क्योंकि 0 व फुल नम्बर देने का कोई प्रावधान नहीं है।
अगर संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के साहित्य विभाग की नियुक्ति में विश्विद्यालय के अधिनियमों का पालन किया गया तो अधिनियम के वर्ष और उस अधिनियम की प्रति उपलब्ध कराई जाए जिसके तहत ये नियुक्ति की गई है।
कृपया वर्तमान BHU एक्ट के उन प्रावधानों की प्रति के साथ किस समय पूर्व के 1904, 1906, 1915, 1951, 1966, 1969 के एक्ट को कब संशोधित किया गया और क्यों किया गया? साक्ष्य सहित वर्तमान एक्ट की प्रति उपलब्ध कराने की कृपा करें।
SVDV के छात्रों ने ऑपइंडिया को बताया, “हमारे सवाल अभी भी वही हैं, और किसी भी प्रश्न का BHU प्रशासन ने प्रमाण के साथ जवाब नहीं दिया है- बस बिना प्रमाण के गोलमोल जवाब देकर हमें बहकाने की फिजूल कोशिश की गई है। हमने इन जवाबों पर प्रशासन से कुछ प्रति-प्रश्न किये हैं।”
चक्रपाणि ओझा और शशिकांत मिश्र, कृष्ण कुमार, शुभम आदि ने अपने बयान में कहा, “BHU प्रशासन द्वारा आज चौथे और पाँचवे प्रश्न का उत्तर दिया गया जो बहुत ही ग़ैर जिम्मेदाराना है। जवाबों से सभी छात्र संतुष्ट नहीं हैं और हम सबने संघर्ष का रास्ता चुनते हुए आंदोलन जारी रखे हैं। हमारा ये आंदोलन अनिश्चित काल तक चलेगा जब तक प्रशासन डॉ. फिरोज खान की SVDV में नियुक्ति पर प्रमाण के साथ अपनी बात नहीं रखता, हमारे कई और भी प्रश्न और आपत्तियाँ हैं जिसका जवाब प्रशासन को देना होगा।”
SVDV के छात्रों की आपत्तियाँ
धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों ने BHU प्रशासन से कई गंभीर सवाल पूछे हैं। साथ ही कुछ महत्वपूर्ण आपत्तियाँ दर्ज की हैं, जिन पर अभी तक प्रशासन का कोई जवाब नहीं आया है। वे आपत्तियाँ निम्न हैं:
बिना साक्ष्य के किसी चीज़ की प्रामाणिकता नहीं होती। उत्तर के साथ साक्ष्य भी देने चाहिए थे। लिख करके तो कोई भी कुछ दे सकता है, पर उसको प्रमाण नहीं माना जा सकता।
चौथे प्रश्न के उत्तर के साथ विश्वविद्यालय के जिस अधिनियम के तहत नियुक्ति हुई उसकी प्रति भी देनी चाहिए। कम से कम कुछ प्रमाणिकता के लिए वर्ष का ही उल्लेख कर दिए होते जिसके तहत नियुक्ति हुई।
1904, 1906, 1915, 1951 और 1969 के BHU के एक्ट में अगर धर्म विज्ञान संकाय के लिए विशेष अधिनियम बनाये गए थे तो उसको महामना के उद्देश्यों के विपरीत क्यों बदला गया?
किसकी अध्यक्षता में वह बैठक हुई जिसमें SVDV के विशेष एक्ट में संशोधन हुआ? बैठक में कौन-कौन था? किस सन (वर्ष) में व कहाँ पर हुई?
क्या उस बैठक में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के संकाय प्रमुख व विभागाध्यक्ष उपस्थित थे? क्या उनकी सहमति ली गई थी?
बैठक के मिनट्स व कमेंट्स को साक्ष्य के रूप में क्यों नहीं दिया गया?
अगर ग़ैर-हिन्दू BHU का कुलपति नहीं हो सकता और यह वर्तमान एक्ट में है, तो धर्म विज्ञान संकाय के लिए बनाए विशेष अधिनियम एक्ट से बाहर कैसे हो गए?
वर्तमान एक्ट की प्रति उत्तर के साथ क्यों नहीं दी गयी, साक्ष्य के तौर पर, जिसके तहत नियुक्ति हुई है?
शायद इन प्रश्नों का साक्ष्य सहित विश्वविद्यालय प्रशासन के पास कोई उत्तर नहीं है तभी तो बार-बार UGC के एक्ट का हवाला दिया जा रहा है।
आपके साक्ष्य सहित जबाब का इंतजार हमारे सहित देश की पूरी जनता को है।
बता दें कि इससे पहले डॉ. फिरोज खान की SVDV में नियुक्ति में गड़बड़ी के विरोध में 7 से 21 नवंबर तक पहले भी कुलपति आवास के सामने छात्र धरने पर बैठे थे। छात्रों से धरना समाप्त करने के अनुरोध के साथ प्रशासन ने उनकी माँगों पर दस दिन के भीतर जवाब देने की लिखित सहमति दी थी। 30 नवंबर को दस दिन बीतने के बाद सोमवार (दिसंबर 2, 2019) को संकाय प्रमुख ने जो अधूरा जवाब दिया था, उससे छात्र सहमत नहीं हुए, और विरोध में पुनः धरने पर बैठ गए। संकाय में पठन-पाठन पहले से ही बंद है। साथ ही छात्रों ने 5 दिसंबर से होने वाली परीक्षा का बहिष्कार करने की भी चेतावनी दी है, जिसके मद्देनजर अभी परीक्षा की नई तिथि 10 दिसंबर कर दी गई है।
#SVDV के छात्रों को #BHU प्रशासन ने दिया बिना प्रमाण के जवाब, असंतुष्ट छात्रों ने उठाए कई गंभीर सवाल, परीक्षा के बहिष्कार के साथ अनिश्चित काल तक आन्दोलन जारी रखने पर अड़े धरनारत छात्र….#Ferojkhanpic.twitter.com/rnUDRB9zWm
जब ऑपइंडिया ने छात्रों से इस नए परीक्षा की तिथि पर बात की तो छात्रों की तरफ से शशिकांत मिश्र ने बताया, “यदि BHU प्रशासन इस समस्या का मालवीय जी के मूल्यों, संकाय के उद्देश्यों के अनरूप कोई समाधान नहीं निकालता है तो हम सभी छात्र इस परीक्षा की तिथि का भी बहिष्कार करने पर अडिग हैं। हमारा धरना इस बार किसी आश्वासन पर नहीं बल्कि इस समस्या के पूर्ण समाधान के साथ ख़त्म होगा।”
केरल में एक ऐसा चौंका देने वाला मामला सामने आया है जिससे या तो पुलिस की लापरवाही ज़ाहिर होती है, या फिर यह कि सत्ताधारी वामपंथियों ने किस तरह कानून ही नहीं, कानून के रखवालों को भी अपनी मुट्ठी में दबोच रखा है। केरल में पुलिस के सामने एक ऐसा वामपंथी छात्र नेता खड़ा होकर घंटों ज़ोर ज़ोर से नारे लगाता रहा, अपनी तरफ़ ध्यान आकर्षित करता रहा, जिस पर हत्या के प्रयास का इलज़ाम है। और पुलिस ने उसे कुछ भी नहीं कहा। कुछ कहना तो दूर, जब स्थानीय मलयाली मीडिया ने इस बारे में जानना चाहा, तो पुलिस वालों के हावभाव से ऐसा प्रतीत हुआ मानो उन्हें इस घटना के बारे में पता ही नहीं है।
मामला केरल स्टूडेंट्स यूनियन (केएसयू, कॉन्ग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई का केरल वाला धड़ा) और एसएफआई (स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया, माकपा का छात्र संगठन) के बीच गत शुक्रवार (28 नवंबर, 2019 को) को हुए हिंसक टकराव का है, जिसमें पुलिस पर भी हमला किया गया था। इस मामले में केरल पुलिस ने केएसयू की तहरीर पर जो मुकदमा दर्ज किया था, उसमें एसएफआई के नेता कर तिरुवनंतपुरम यूनिवर्सिटी के छात्र संघ के अध्यक्ष रियास का नाम पहले आरोपित के तौर पर था। चूँकि मामले की धाराएँ भी गंभीर थीं और हमले के पीड़ितों में पुलिस वाले भी थे, इसलिए मामला भी गैर-जमानती था।
लेकिन इसके बावजूद रियास ने उसी पुलिस थाने, कैंटोनमेंट पुलिस थाना, के सामने छात्रों का मार्च निकाला, जिसमें वह हत्या के प्रयास के आरोप में वांछित था। रियास का दुस्साहस यहीं पर नहीं रुका। उसने वहाँ पर पुलिस से सम्पर्क भी किया, और बहस भी की- वह भी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से। रियास ने अपने मार्च के बाद असिस्टेंट कमिश्नर से काफी लम्बे समय तक बात की, इस मुद्दे पर की एसएफआई कार्यकर्ताओं के खिलाफ इस मामले में दायर मुकदमे वापिस लिए जाएँ। इस दौरान या तो उस पूरे थाने को ही पता नहीं था कि जिस व्यक्ति की इसी थाने में दर्ज हत्या के प्रयास के मुकदमे में तलाश है, वह सामने ही खड़ा है या फिर सत्ताधारी माकपा के डर से पुलिस वालों ने इस बात को नज़रअंदाज़ किया।
मलयालम न्यूज़ पोर्टल मातृभूमि के अनुसार जब केएसयू कार्यकर्ताओं ने इसके बाबत पुलिस का ध्यान आकर्षित किया, तो भी पुलिस ने कोई हरकत नहीं की- बावजूद इसके कि 6 एसएफआई कार्यकर्ता पहले ही पुलिस की हिरासत में हैं। इसके पहले जब मीडिया ने हमलों के बारे में पूछा था तो इसी पुलिस ने कहा था कि वह हमलावरों की तलाश में हैं।
नेहरू-गाँधी परिवार के दामाद रॉबर्ड वाड्रा ने संवेदनहीनता की पराकाष्ठा का प्रदर्शन करते हुए अपनी पत्नी प्रियंका गाँधी वाड्रा के घर पर कथित सुरक्षा उल्लंघन की तुलना यौन अपराधों की क्रूरता के साथ की है। रॉबर्ट वाड्रा ने एक फेसबुक पोस्ट में यौन अपराधों में राजनीति को घुसाते हुए केंद्र सरकार को इन अपराधों के लिए दोषी ठहराया। जबकि कानून-व्यवस्था एक राज्य का विषय होता है।
रॉबर्ट वाड्रा ने फेसबुक पर लिखा, “यह प्रियंका की सुरक्षा के लिए नहीं है और ना ही मेरी बेटा-बेटी या फिर गाँधी परिवार के लिए है। यह हमारे नागरिकों के लिए है विशेषकर देश की महिलाओं को सुरक्षा देने की बात है ताकि वो खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें। देश भर में महिलाओं को सही तरीके से सुरक्षा नहीं मिल रही है… लड़कियों से छेड़खानी और दुष्कर्म हो रहा है… किस तरह का समाज हम बना रहे हैं। हर नागरिक की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की है। अगर हम अपने देश, अपने घर, सड़क पर या फिर दिन या रात के वक्त महफूज नहीं है तो फिर आखिर कहाँ और कब हम सुरक्षित रह सकते हैं?”
रॉबर्ट वाड्रा का फेसबुक पोस्ट
बता दें कि कुछ ही दिनों प्रियंका गाँधी के आवास पर कथित तौर पर कुछ अज्ञात लोग सेल्फी लेने के लिए घुस आए थे। प्रियंका गाँधी की सुरक्षा में हुई इस चूक का मुद्दा सीआरपीएफ के सामने भी उठाया गया था। देश भर में हो रहे यौन अपराधों के साथ इसकी तुलना करना बेहद संवेदनहीनता है। प्रियंका गाँधी के पास जेड-प्लस सुरक्षा कवर भी है, जिसमें उनके सुरक्षा में सीआरपीएफ कमांडो शामिल हैं। कथित तौर पर हुई सुरक्षा चूक के लिए सरकार को टारगेट करना कतई सही नहीं है।
बहरहाल, प्रियंका गाँधी जिस सुरक्षा चूक की बात कर रही थीं, वो उनके जानबूझकर किया गया ड्रामा साबित हुआ, क्योंकि जिस गाड़ी के प्रियंका के घर में ‘घुस आने’ को उन्हें मिली ज़ेड प्लस सुरक्षा की खामी बताया जा रहा है, उस गाड़ी में बैठी महिला को प्रियंका के ही निजी सचिव ने मिलने का समय दिया था। और तो और वो महिला कॉन्ग्रेस के टिकट पर चुनाव भी लड़ चुकीं हैं।
प्रियंका गाँधी की सुरक्षा में कथित चूक के साथ यौन अपराधों की तुलना करके रॉबर्ट वाड्रा ने कॉन्ग्रेस पार्टी के नैतिक अवहेलना की विरासत का परिचय दिया है। यह घटना न केवल यह दिखाता है कि क्यों हाल ही में हुए चुनाव में पार्टी को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ रहा था, बल्कि इससे यह बात भी सामने आ रही है कि पार्टी पर राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में अप्रासंगिक होने का गंभीर खतरा है। फिलहाल पार्टी जिस तरह की राजनीति कर रही है, उसमें पार्टी को आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है, अन्यथा भविष्य में पार्टी की हालत और भी खराब होने वाली है।
बिहार और झारखण्ड में भाजपा नक्सलियों के लिए सिरदर्द बन गई है। नक्सली संगठन भाजपा ही नहीं बल्कि राष्ट्रोय स्वयंसेवक संघ, बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद और वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संगठनों के लगातार बढ़ते प्रभाव से सकते में हैं। नक्सलियों को लगातार मजबूत होती भाजयुमो (भारतीय जनता युवा मोर्चा) का भी डर सता रहा है। नक्सली इन हिंदूवादी संगठनों के ख़िलाफ़ बड़ी साज़िश रच रहे हैं। ख़ुफ़िया विभाग को इस सम्बन्ध में सूचना मिली है। इसके बाद पुलिस महानिरीक्षक (स्पेशल ब्रांच) ने सभी जिले को सतर्क करते हुए नक्सलियों की साज़िश विफल करने के लिए लिखा है।
सरकार की जन-कल्याणकारी नीतियों की सफलता से नक्सली निराश हैं। वो उत्पीड़ित लोगों को खोज कर संगठन में भर्ती करना चाह रहे हैं ताकि सरकार के ख़िलाफ़ लड़ाई को धार दे सकें। ‘हिंदुस्तान’ की एक्सक्लूसिव ख़बर के अनुसार, नक्सली हिंदूवादी संगठनों के विस्तार को रोकने के लिए बड़ी साज़िश कर रहे हैं। इसके लिए गुरिल्ला युद्धनीति और लैंडमाइंस का प्रयोग करने की योजना नक्सलियों द्वारा बनाई जा रही है। नक्सली बिहार के विभिन्न जिलों में घूम कर संगठन को मजबूत करने में लगे हुए हैं।
‘हिंदुस्तान’ ने अपनी ख़बर में बताया है कि पूर्वी बिहार, पूर्वोत्तर झारखंड स्पेशल एरिया कमेटी के सचिव सहदेव सोरेन उर्फ प्रवेश दा उर्फ अनुज का दस्ता मुंगेर जिले के खड़गपुर थाना क्षेत्र के कंदनी जंगल के अलावा जमुई के बरहट दुधपनिया आदि जगहों पर भ्रमणशील है। नक्सलियों के स्पेशल पलटन के कमांडर सिद्धू कोड़ा को जमुई के गिद्धेश्वर पहाड़ पर देखा गया है। एक अन्य नक्सली नेता पिंटू राणा जमुई व नवादा में देखा गया है। गया और औरंगाबाद में कई बड़े नक्सली लगातार भ्रमणशील हैं।
नक्सलियों के टॉप कमांडर अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में भाजपा और आरएसएस के विस्तार को रोकने की कोशिश में लग गये हैं। पढ़ें पूरी खबर…https://t.co/6iB35nhWw3
नक्सली संगठन 2 से 8 दिसंबर तक गुरिल्ला आर्मी (PLF) की 19वीं वर्षगाँठ मनाएँगे। इस दौरान उन्होंने ‘जुझारू सप्ताह’ मनाने का फ़ैसला लिया है। ग्रामीण व शहरी इलाक़ों में लड़कों को इसके लिए तैयारियाँ करने के लिए लगाया गया है। आशंका है कि नक्सली इस दौरान किसी बड़ी हिंसक वारदात को अंजाम दे सकते हैं। मुंगेर रेंज के डीआईजी मनु महाराज ने बताया कि हाल ही में पुलिस व नक्सलियों की मुठभेड़ हुई है। उन्होंने बताया कि पुलिस लगातार पहाड़ों पर अभियान चला रही है, जिससे नक्सलियों के मंसूबों को नाकाम किया जा सके।