बिहार के कैमूर में नाबालिग लड़की से गैंगरेप के बाद वीडियो वायरल मामले में चौथे दिन भी मोहनिया इलाके में लोगों का विरोध जारी है। गुरुवार (नवंबर 28, 2019) को शहर में तोड़फोड़, आगजनी, पथराव और फायरिंग हुई। जिसमें 3 लोगों के घायल होने की खबर अब तक सामने आई है। फिलहाल, घायलों को इलाज के लिए मोहनिया अनुमंडलीय अस्पताल में भर्ती कराया गया है। लेकिन, फिर भी स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई। पुलिस एसपी लगातार इलाके में माइक से शांति बहाल करने की अपील कर रहे हैं। मगर स्थिति में खासा फर्क नहीं दिख रहा। प्रशासन ने वहाँ धारा 144 लागू कर दी है।
प्रभात खबर के अनुसार, कैमूर के मोहनिया थाना क्षेत्र में मुख्य आरोपित अरबाज पर कार्रवाई होने के बाद भी इलाके में मामला शांत नहीं हो रहा हैं। सोमवार से ही वहाँ पर ऐसा माहौल जारी है। जिसके कारण वहाँ तोड़फोड़, पथराव और आगजनी लगातार हो रही है।
ताजा जानकारी के मुताबिक गुरुवार को भारी उपद्रव होने के कारण पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की है और सभी उपद्रवियों को खदेड़कर मोर्चा संभाल लिया है। माहौल को नियंत्रित करने के लिए वज्र वाहन, अग्नि शामक वाहन और भारी मात्रा में पुलिस को भी तैनात कर दिया गया है। साथ ही भभुआ पथ को भी पुलिस ने पूरी तरह से बंद कर दिया है। इस उपद्रव में अब तक करीब आधा दर्जन दुकानें आग के हवाले की जाने की खबर हैं।
बता दें बीते रविवार को नाबालिग लड़की के साथ गैंगरेप और उसका वीडियो वायरल होने के बाद से ही कैमूर में ऐसी स्थिति बनी हुई। जानकारी के मुताबिक सोमवार को तो प्रदर्शनकारी आरोपितों का घर जलाना चाहते थे, लेकिन मौक़े पर पहुँची पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर कर दिया। सुरक्षा के लिहाज से राज्य सरकार ने कैमूर में इंटरनेट सेवाओं को भी बंद कर दिया गया था। इसके बाद 4 आरोपितों में से 2 के गिरफ्तार होने की खबर सामने आई थी, जबकि अन्य 2 के लिए एसटीएफ छापेमारी कर रही थी।
पूरा मामला
पीड़िता के अनुसार, मुख्य आरोपित अरबाज उसका पहले से परिचित था। वह उसे उसकी कोचिंग आने-जाने के दौरान मिला था। इस बीच ही उसने उसे प्रेम जाल में फँसाया। फिर शादी का झाँसा देकर पिछले 5 महीने से वह उसका यौन शोषण करता रहा। मंगलवार (नवंबर 19) को पीड़िता को कलाम ने मोहनिया में मुंडेश्वरी गेट के पास बुलाया। वहाँ अरबाज और उसके साथी पहले ही गाड़ी लेकर मौजूद थे। लड़की के आते ही उसे गाड़ी में खींच लिया गया। जब लड़की ने चिल्ला कर विरोध किया तो उसके मुँह पर पट्टी बाँध दी गई और हत्या कर फेंकने की धमकी देकर रतवार नदी के पास ले गए। जहाँ चारों ने मिलकर उसके साथ पहले बलात्कार किया और फिर उसका वीडियो वायरल कर दिया।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूँ तो अपनी तमाम बेवकूफ़ियों के चलते हमेशा हँसी-ठहाकों का पात्र बने रहते हैं। इस बार वो चर्चा में छाए हैं अपने एक कोरे ज्ञान को लेकर। इसके चलते सोशल मीडिया पर उन्हें जमकर ट्रोल किया जा रहा है।
दरअसल, एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा, “दरख़्त रात में ऑक्सीजन देते हैं।” पाकिस्तान की पत्रकार, नाइला इनायत ने इस कार्यक्रम की 15 सेकंड की वीडियो क्लिप शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा, “पेड़ रात में ऑक्सीजन देते हैं: आइंस्टीन ख़ान मंत्री।”
वीडिया की शुरुआत में लोगों को संबोधित करते हुए इमरान ख़ान ने कहा,
“70 फ़ीसद जो ग्रीन कवर था, वो कम हुआ, 10 सालो के अंदर। उसके नतीजे तो आने थे, क्योंकि दरख़्त हवा को साफ़ करते हैं, ऑक्सीजन देते हैं रात को। कार्बन डाइऑक्साइड को अबज़ोर्ब करते हैं”
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने हाल ही में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी का मज़ाक उड़ाया था, जिसमें उन्होंने कहा था भारी वर्षा के कारण बाढ़ आती है। जियो टीवी के हवाले से लिखा गया, “बिलावल ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों को यह कहकर चौंका दिया था कि जब बरिश होती है तो पानी आता है।”
इसके लिए लोगों ने प्रधानमंत्री ख़ान को याद दिलाया कि उन्हें दूसरों का मज़ाक उड़ाने से पहले विज्ञान के अपने ज्ञान को जाँच-परख लेना चाहिए। कुछ लोगों ने सवाल किया कि एक ऑक्सफोर्ड स्नातक ऐसी ग़लती कैसे कर सकता है, जबकि अन्य ने ख़ान के लिए नोबेल पुरस्कार की माँग की 🙂
इस वीडियो के सामने आते ही सोशल मीडिया के यूज़र्स ने जमकर उनकी चुटकी ली।
Please, don’t underestimate the power of Imran Khan who is a champion of Naya Pakistan. If he says, trees produce Oxygen in Night, it means, they produce in Naya Pakistan.
उत्तरप्रदेश के चित्रकूट के एक गाँव से नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार की घटना सामने आई है। जहाँ आरोपितों की पहचान इस्लाम और सलीम के रूप में हुई है। जानकारी के अनुसार दोनों आरोपितों ने लड़की को उस समय उसके घर से उठाया, जब वह अपने घर में सो रही थी और उसके पिता खेतों में पानी डालने गए थे।
अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक, रैपुरा थानाक्षेत्र के निवासी और पीड़िता के पिता ने पुलिस को शिकायत दर्ज कराते हुए बताया कि बुधवार (नवंबर 27, 2019) की रात को वह सब खेत में पानी लगाने गए थे। इस दौरान घर में उनकी 17 वर्षीय पुत्री व अन्य बच्चे सो रहे थे। तभी सलीम और इस्लाम ने अपहरण को अंजाम दिया।
वहीं, आरोपितों की चंगुल से भागकर आई किशोरी ने बताया कि बुधवार की देर रात गाँव के ही 2 युवक सलीम और इस्लाम उसके घर आए थे। दोनों को देखकर उसने चिल्लाने का भी प्रयास किया था, लेकिन उन दोनों ने उसका मुँह बंद कर दिया।
इसके बाद सलीम उसे पकड़कर अपने कमरे में ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया। जबकि वहीं, खड़ा इस्लाम उसे लगातार धमकी दे रहा था। काफी मशक्कत के बाद जब किशोरी दोनों के चंगुल से किसी तरह भागने में सफल हुई, तो सीधा अपने घर पहुँची। जहाँ उसने अपने परिजनों को पूरी घटना की जानकारी दी।
बता दें, इस मामले में आज यानी गुरुवार को किशोरी के पिता ने दोनों आरोपितों के ख़िलाफ थाने में तहरीर दी है। जिसके बाद थाना प्रभारी राजेश कुमार ने बताया कि सलीम के खिलाफ दुष्कर्म व इस्लाम के खिलाफ पकड़कर धमकी देने की रिपोर्ट दर्ज की गई है। अभी आरोपित फरार हैं और किशोरी को मेडिकल टेस्ट के लिए जिला अस्पताल भेजा है।
गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले ऐसा ही एक मामला यूपी के एटा से भी आया था, जब आरिफ खान, इसरार और कलुआ नाम के पशु चोरों ने पशु न मिलने के कारण सोती बच्ची का अपहरण कर लिया था और फिर खेत में ले जाकर उसका रेप किया था।
महाराष्ट्र में सत्ता को लेकर चली लम्बी खींचतान उस वक़्त ख़त्म हुई जब सूबे में सरकार बनाने के लिए शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस एक हो गए। शिवसेना के नेतृत्व में बनने वाली सरकार को समर्थन देने के लिए दोनों दलों ने अपनी-अपनी कुछ शर्तों के साथ हामी भर दी। महाराष्ट्र में एक त्रिशंकु सरकार का खाका भी तैयार हो गया।
शिवसेना जिस कॉन्ग्रेस और एनसीपी के समर्थन से सरकार बनाने जा रही है वह तो हमेशा से उनके छद्म सेकुलरिज्म के खिलाफ राजनीति करती रही। शिवसेना संस्थापक बालासाहेब खुद हिंदुत्व के प्रबल पक्षधर थे। उनके बेटे और मौजूदा शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने भी कभी ऐसी छवि से इनकार नहीं किया। हालाँकि, जबसे महाराष्ट्र में सरकार बनाने की कवायद में तीनों पार्टियाँ एक मंच पर आईं तो इनके सुर ही बदल गए। अब कॉमन मिनिमम प्रोग्राम की बात होती है। हिन्दू आतंकवाद जैसे शब्द गढ़ने वाली कॉन्ग्रेस शिवसेना को सेक्युलर साबित करने में जुट गई है।
Since it is inevitable that #ShivSena will be secularised and portrayed as those who fought for Marathi pride, I think we should crowd source a reality check thread. Here’s my first contribution: https://t.co/6tOAQwpVDF
इन्ही बातों को लेकर एक ट्विटर यूज़र ने अपने सिलसिलेवार ट्वीट से इन पार्टियों के बदलते हुए सुर को लेकर कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ साझा कीं। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक उद्धव ने गोडसे की तारीफ करते हुए कहा था कि “जो गोडसे में विश्वास नहीं रखता उन्हें सरे-आम पीट देना चाहिए” मगर जबसे महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए यह गठबंधन बना, कॉन्ग्रेस यह दर्शाने में जुट गई है कि शिवसेना तो अपने स्वभाव से बेहद सेक्युलर है, उसने तो बस मराठी अस्मिता के लिए जंग लड़ी है।
महाराष्ट्र में तीन पार्टियों का महाअघाड़ी गठबंधन सरकार बनाने जा रहा है इसमें दो पार्टियाँ ऐसी हैं जो खुदको सेक्युलर कहती आई हैं। वहीं एक पार्टी शिवसेना है जिसपर कॉन्ग्रेस, एनसीपी जैसे दल कम्युनल का ठप्पा लगाते आए हैं लेकिन अब यही पार्टी राज्य में इनके गठबंधन की सरकार का नेतृत्व करेगी।
शिवसेना के नेता संजय राउत ने बयान दिया था “मुस्लिमों का मताधिकार छीन लेना चाहिए”- वही मुस्लिम, जिन्हें कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके जैसे दलों ने वोट बैंक बनाकर सत्ता में रहने के लिए भरपूर इस्तेमाल किया और समय-समय पर इस करतूत को ढँकने के लिए सेक्युलर शब्द उठा लिया।
राउत ने शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ के सम्पादकीय में कहा था कि जो भी गोडसे से नफरत करते हैं, वह ज़रूर इशरत से मोहब्बत करते हैं। सामना के सम्पादकीय में लिखा था कि गोडसे के स्मारक की जगह क्या इशरत का स्मारक बनाया जाए? @TweetinderKaul हैंडल वाले इस ट्विटर यूजर ने ट्वीट कर कहा कि सोनिया गाँधी से इस बात को लेकर भी सवाल होना चाहिए। बता दें कि सोनिया वर्तमान में उस कॉन्ग्रेस पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष हैं जिसके भरोसे पर शिवसेना सरकार बनाने जा रही है।
More from Sanjay Bhau Raut. So maybe the media should ask Soniaji (imagine asking Soniaji a fucking question) whether she condones these views of the #ShivSena and as to how different they are from #PragyaPraisesGodsepic.twitter.com/vEvDtZvsB2
यूज़र ने ज़िक्र किया कि 1991 में भाजपा-शिवसेना गठबंधन के लिए प्रचार करते वक़्त बालासाहेब ने खुलकर नाथूराम गोडसे का समर्थन किया था। उन्होंने कहा था कि “नाथूराम ने महात्मा गाँधी को उनके विश्वासघात के लिए मारा था, वह कोई भाड़े का शूटर नहीं था”
Let’s just stick to the modern #ShivSena shall we? Lest we’re told Uddhav/Aditya are the Renaissance to Balasaheb’s Dark Ages and we’re too short-sighted to recognize this. Here’s an absolute beauty: Sanjay Raut: We demolished Babri Masjid in 17 minutes: https://t.co/E9i8h46ueJ
शिवसेना का नाता बाबरी विध्वंस से भी जोड़ा जाता रहा है। एक समय बालासाहेब ने खुद इसका श्रेय अपनी पार्टी के शिवसैनिकों को दिया था, इस पर भी संजय राउत का एक बयान शेयर करते हुए अपने ट्वीट में निखिल ने शिवसेना के उस दौर की याद दिलाई जब बाल ठाकरे जीवित थे। मीडिया की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए निखिल मेहरा नामक इस ट्विटर यूज़र ने बताया कि शिवसेना ने बाबरी मस्जिद को 17 मिनट में ही ध्वस्त कर दिया था। यह बयान संजय राउत ने दिया था और उन्होंने कहा था, “हमने बाबरी मस्जिद को 17 मिनट में ध्वस्त कर दिया था मगर मोदी सरकार मंदिर बनाने में इतना समय क्यों लगा रही है।”
जिन सेक्युलर पार्टियों के गठबंधन में शिवसेना शामिल हुई वह बाबरी विध्वंस को सही नहीं मानतीं। आज की शिवसेना की तुलना बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना से करते हुए ट्विटर यूज़र ने बताया कि बालासाहेब ठाकरे ने ढाँचा तोड़े जाने की घटना पर जमकर तारीफ की थी। वहीं इसी घटना के लिए सेक्युलर कॉन्ग्रेस ने अपने एक प्रधानमंत्री को उचित सम्मान तक नहीं दिया। वही कॉन्ग्रेस आज शिवसेना को सरकार बनाने के लिए महाराष्ट्र में गठबंधन को समर्थन देने जा रही है।
This is one of my favourites. #ShivSena demanding burqa ban in India for that most reviled of things – the national security exception. And the Bee Jay Peeeee – the effin’ Gaumutrawalas – saying NO! https://t.co/ILDgEvTXMZ
इतना ही नहीं! ट्विटर यूज़र ने उस खबर को भी शेयर किया जिसमें शिवसेना ने बुर्का बैन की माँग की थी।
My memory was right. #ShivSena has always been the more kattar group. If Hindutva was a football team, BJP would be the “prawn sandwich brigade” (use Google) and the #ShivSena would be the ultras. For ex: https://t.co/FHLPPu7M1l
कॉन्ग्रेस पार्टी अगर खुद को नैतिक साबित करती है तो वह उस शिवसेना को समर्थन कैसे दे सकती है जो उसके एजेंडे के उलट राष्ट्रवाद की बात करती है। एक अन्य ट्वीट में @TweetinderKaul ने उस मीडिया रिपोर्ट का ज़िक्र भी किया जिसमें लिखा है कि शिवसेना ने आरएसएस और भाजपा को राष्ट्रवाद पर सुदृढ़ रहने की नसीहत दी। इस सब को देखते हुए लगता है कि पिछले कई सालों से हार का मुँह देख रही कॉन्ग्रेस पार्टी अब सत्ता की चाहत में कुछ भी करने पर उतर आई है।
महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी का न्यूनतम साझा कार्यक्रम आ गया है। इसमें मौजूद एक प्रावधान स्तब्ध कर देने वाला है। कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में स्थानीय लोगों के लिए महाराष्ट्र की 80 प्रतिशत नौकरियों को आरक्षित करने के लिए कानून बनाने की बात कही गई है। 4 पन्नों के दस्तावेज़ में मुख्यमंत्री-निर्धारित (सीएम-डेज़िग्नेट) उद्धव ठाकरे के हस्ताक्षर साफ़-साफ़ पढ़े जा सकते हैं। इसके अलावा इस पर दो और हस्ताक्षर हैं जो कॉन्ग्रेस और एनसीपी के क्रमशः व्हिप बाला साहब थोराट और जयंत पाटिल (जो अजित पवार के पार्टी में लौटने के बाद भी विधायक दल के नेता के तौर पर बरकरार हैं) के होने की संभावना है।
मराठी माणूस शिव सेना का मुद्दा भले ही बाला साहेब के समय से रहा हो, और ऐसा लग रहा है कि उनके दूसरे मुद्दे हिंदूवाद को कुर्बान कर शिव सेना अपने क्षेत्रवाद पर लौट आई है, लेकिन कॉन्ग्रेस का ऐसे प्रस्ताव पर हस्ताक्षर चौंकाने वाला है। खुद को ‘लिबरल’ यानी उदारवादी और किसी भी तरह के ‘भेदभाव’ के खिलाफ बताने वाली कॉन्ग्रेस के इतिहास में यह सबसे बड़े विचारधारा के समझौतों में से एक है।
गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस और शिव सेना के इस गठबंधन को बेमेल ही नहीं, विचारधारा के साथ समझौता और वोटरों के साथ धोखा माना जा रहा था। अभी तक इसमें ज़्यादातर गुस्सा शिव सेना के खिलाफ केंद्रित रहा है, जिसके वोटर ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं और नेता पार्टी छोड़ रहे हैं। लेकिन इस फैसले के समर्थन के बाद कॉन्ग्रेस भी ऐसे ही सवालों में उतनी ही घिरती नज़र आ रही है।
साध्वी प्रज्ञा भोपाल से लोकसभा सांसद हैं। साध्वी प्रज्ञा पर ‘भगवा आतंक’ की लॉबी ने आतंकी गतिविधियों में शामिल रहने के आरोप भी लगाए हैं, और इस संदर्भ में कोर्ट में मामले चल रहे हैं। साध्वी प्रज्ञा भगवा रंग का परिधान पहनती है, जो कई लोगों की आँखों में खटकता है। जबकि दूसरे मजहबी चिह्नों के साथ संसद में पहुँचने वालों को उसी आँख का तारा माना जाता है क्योंकि देश में सेकुलर बयार बह रही है।
कल लोकसभा में महात्मा गाँधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे को कथित तौर पर साध्वी प्रज्ञा ने देशभक्त कहा, इस पर खूब बवाल हुआ। साध्वी ने बताया कि वो बलिदानी उधम सिंह का समर्थन कर रही थीं, न कि गोडसे का। हालाँकि, इससे पहले भी गोडसे को साध्वी प्रज्ञा द्वारा देशभक्त कहा जा चुका है। उस समय लोकसभा चुनावों की कैम्पेनिंग के दौरान उन्होंने कहा था कि गोडसे देशभक्त थे, हैं, और रहेंगे। तब प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि साध्वी प्रज्ञा ने उनसे माफी तो माँगी है लेकिन वो मन से माफ नहीं कर पाएँगे।
संसद में कल जो हुआ, और उसके बाद जिस तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं, उस पर बातचीत और चर्चा आवश्यक है। इसी संसद में वो लोग भी आते रहे हैं जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा फाँसी की सजा पाने वाले आतंकियों के समर्थन में बातें कही हैं। उन पार्टियों के नेता यहाँ आते हैं जिनके लिए कश्मीरी आतंकी ‘माटी के सपूत’ हैं। इसी संसद में संविधान फाड़ने वाले लोग आए हैं। इसी संसद में याकूब और अफजल गुरु को शहीद बताने वाले सांसद भी रहे हैं। और इसी संसद में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसी बातों को ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ और ‘विरोध का स्वर’ कह कर, इस पर सवाल पूछने वालों को ही मूर्ख बता दिया गया।
लेकिन इससे साध्वी प्रज्ञा के गोडसे को ले कर कही गई बातों को सही या गलत नहीं माना जा सकता। साध्वी ने कुछ बोला, किसी संदर्भ में बोला, और ये सुनने वालों के हाथ में है कि उसे वो किस संदर्भ में देखते हैं, और अपनी विचारधारा या आस्था के आधार पर गोडसे को क्या मानते हैं। फिर भी, अगर यह संसद याकूब, अफजल, बुरहान जैसे आतंकियों के हिमायतियों को बर्दाश्त करता रहा है तो उसे कोई हक नहीं है कि साध्वी प्रज्ञा पर बवाल करे। ये पूरा तंत्र इन्हीं पार्टियों ने बनाया है जहाँ ‘संसद की गरिमा’ कूड़ेदान में फेंकी जाती रही है क्योंकि आतंकी, जो कि लगभग हर वक्त ही मजहब विशेष से है और उसके समर्थन में बोलने वाला सांसद भी उसी मजहब विशेष से, तब वो किसी तरह का बवाल नहीं करते। तब चुप रहे, तो अब भी चुप रहो, सहना सीखो क्योंकि इस खेल के नियम तुम्हीं ने बनाए हैं।
गोडसे देशभक्त है या आतंकी?
नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या की, इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन इसमें भी कोई संदेह नहीं कि पिस्तौल से गोलियाँ चलाने से पहले तक गोडसे भी इस राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार थे। आखिर कोई क्रातंकारी, अपने ही देश की आजादी के लिए काम करने वाले दूसरे सेनानी की हत्या क्यों कर देता है? आखिर गाँधी ने, जिनकी गोडसे बहुत इज्जत करते थे, ऐसा क्या किया था उस काल और परिस्थिति में कि गोडसे ने गोली मार कर उनकी हत्या कर दी?
अब बात यह है कि इन बातों पर कभी कोई चर्चा हुई ही नहीं क्योंकि गाँधी को महात्मा बनाने के चक्कर में इस देश की सत्ताओं ने उनके दूसरे पहलुओं को राष्ट्रीय चर्चा से दूर रखा। कोई अगर इस पर बात करने की कोशिश भी करता है तो उसे ऐसे देखा जाता है जैसे वो देशद्रोह कर रहा हो। महात्मा होने का मतलब यह नहीं है कि आपकी हर नीति सही ही थी, और आपसे होने वाले नुकसान या खतरे पर कोई चर्चा ही न की जाए।
गाँधी की तुष्टिकरण की नीतियों की इंतिहा यह थी कि मंदिर में वो कुरान बाँचते पाए जाते थे, और स्वामी श्रद्धानंद के हत्यारे अब्दुल को माफ करने की बातें करते थे कि वो भाई है, उसे माफ कर दो। ये सब गाँधी इसलिए करते रहे क्योंकि वो सामाजिक सद्भाव बढ़ाना चाहते थे। हर झटका बहुसंख्यक हिन्दू ही सहे, और उसके मंदिरों में इस्लाम के प्रवचन चलें, लेकिन गाँधी की यह हिम्मत कभी नहीं हुई कि वो इसी सद्भाव के नाम पर किसी मस्जिद के अहाते में रामकथा पर चर्चा करते। गाँधी के इन विचित्र तरीकों पर बहुत हिन्दू नाराज थे।
गाँधी की इन नीतियों पर जी डी खोसला की किताबों से पता चलता है, जो कि गाँधी की हत्या के मुकदमे पर फैसला सुनाने वाले जजों में से एक थे। उनकी पुस्तक से पता चलता है कि गोडसे की समस्या सिर्फ और सिर्फ गाँधी से ही थी, किसी और से नहीं। गोडसे कहीं से आए नहीं थे, बल्कि इसी देश में, उसी समय मौजूद थे जहाँ भंगी कॉलोनी के हिन्दू मंदिर में कुरान की आयतें पढ़ीं जा रही थी और हत्यारे अब्दुल को भाई बताया जा रहा था। गोडसे ने लाखों हिन्दुओं की हत्याओं को देखा था, उस रक्तपात को देखा था जिसमें हिन्दुओं के कटे अंग सड़कों और रेल की पटरियों पर बिखरे पड़े थे। गोडसे उस समय जिंदा थे जब लाखों हिन्दुओं को अपना घर त्यागना पड़ा था। और हाँ, गोडसे को लगा कि इसके जिम्मेदार महात्मा गाँधी थे, जिनकी हत्या उसने पूरे होशो-हवास में की और कहा कि उसे इसका कोई मलाल नहीं।
गोडसे एक जगह कहते हैं कि अंग्रेजों की ‘फूट डालो, शासन करो’ की नीति को गाँधी जी ने सफल बनाया क्योंकि लगातार हिन्दुओं की सहिष्णुता का मजाक बनाते हुए गाँधी जी ने एक पूरे समुदाय को दूसरे से अलग-थलग कर दिया था।
गाँधी को अम्बेडकर ने राष्ट्र के लिए एक ‘पॉजिटिव डेंजर’ बताया था। लक्ष्मी कबीर (जो बाद में उनकी पत्नी बनीं) को गाँधी के बारे में लिखते हुए, अम्बेडकर ने कहा था, “मेरा मानना है कि महान लोग राष्ट्र के लिए एक धरोहर की तरह होते हैं, लेकिन कई बार वो देश के विकास की राह में अवरोध की तरह भी होते हैं। गाँधी आज के दौर में एक सकारात्मक खतरा बन गए हैं। उन्होंने हर तरह के विचारों पर शिंकजा कस रखा है। गाँधी ने उस कॉन्ग्रेस पर अपनी पकड़ बना रखी है जिसमें हर तरह के, बेकार और स्वार्थी लोगों का जमावड़ा है जो किसी भी नैतिक या सामाजिक आदर्शों को मान कर जीने वाले न हो कर, बस गाँधी की जय-जयकार और चाटुकारिता में लगे रहते हैं।”
अम्बेडकर आगे लिखते हैं, “ऐसी संस्था किसी भी राष्ट्र को चलाने के लिए सही नहीं है। जैसा कि बाइबिल में लिखा है कि कभी-कभी किसी बुराई से भी अच्छाई निकल आती है, वैसे ही मुझे लगता है कि गाँधी की मृत्यु से भी कुछ सकारात्मक घटित होगा। हो सकता है लोग एक सुपरमैन, या महात्मा, की अवधारणा के शिकंजों से आजाद होंगे और वो अपने लिए सोचने के साथ-साथ, अपने विश्वास को लेकर आगे बढ़ना सीखेंगे।”
अब सवाल यह है कि क्या गाँधी पर पिस्तौल तानने वाले गोडसे को राष्ट्रभक्त कहा जा सकता है? इसके जवाब में सवाल यह है कि किसी के द्वारा किसी अपराध में लिप्त होने पर उसकी देशभक्ति क्या उससे छीनी जा सकती है? आप गोडसे को देशद्रोही कहें या राष्ट्रभक्त मानें, यह आपकी वर्तमान विचारधारा पर निर्भर करता है, लेकिन इस पूरे प्रकरण को चर्चा से बाहर रखना बताता है कि इसके पीछे के उद्देश्य राजनैतिक थे, सामाजिक या राष्ट्रीय नहीं।
इसलिए, गोली मार कर किसी की हत्या करना एक अपराध अवश्य है, लेकिन उस अपराध के आधार पर किसी की राष्ट्रभक्ति पर ही सवाल खड़े कर देना भी गलत ही कहा जाएगा। ‘देशभक्त था इसलिए गोली चलाई’, इससे गोडसे अपराधमुक्त नहीं होते, उसी तरह ‘गोली चलाई, जान ले ली, तो देशभक्त कैसा’ कहना भी अनुचित ही है।
ये चर्चा जरूरी है, क्योंकि राजनीति में इसका फायदा उठाया जा रहा है
अब बात आती है कि ये लोग जो टची-फीली महसूस करने लगते हैं इन बातों और बयानों पर, वो क्या वाकई गाँधी के मूल्यों और आदर्शों की चिंता करते हैं? बिलकुल नहीं। गाँधी महामानव थे, तो उनमें खामियाँ भी थीं जो कि उनके समकालीन लोगों ने बताई हैं, उस पर लिखा है। गाँधी का चेहरा नोट पर रख देने से वो आलोचना से परे नहीं हो जाते, वस्तुतः कोई भी व्यक्ति आलोचना से परे नहीं हो सकता। राजनैतिक लाभ के लिए इस देश में राम के अस्तित्व पर भी सवाल उठे हैं, और आस्था को कल्पना तक कह दिया गया।
सीता के साथ राम ने एक राजा के तौर पर जो व्यवहार किया, लेकिन पति के तौर पर वो मन ही मन घुटते रहे, उसका प्रतिफल राम को, विष्णु के अवतार को, मर्यादा पुरुषोत्तम को, अपनी आँखों के सामने माता सीता को धरती की गोद में समाते देख कर सहना पड़ा था। गाँधी राम से बड़े नहीं, और मर्यादा पुरुषोत्तम के ‘म’ भी नहीं हैं। गाँधी की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता को भुनाने के लिए कॉन्ग्रेस ने उनके आइकोनिफिकेशन, यानी अवतारपुरुष बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी।
इस प्रक्रिया में महान गाँधी को महानतम बनाने के लिए कितने ही महापुरुषों की बलि दी गई जब उनके चरित्र को, उनके योगदान को भारतीय इतिहास में कुछ अनुच्छेदों में समेट दिया गया। सुभाष चंद्र बोस से ले कर भगत सिंह, आजाद, सरदार पटेल जैसी विभूतियों की कहानियों को पाठ्यक्रम में न सिर्फ हाशिए पर ढकेला गया बल्कि हर किताब के आवरण के भीतरी पन्नों पर गाँधी की गाथाएँ छापी गईं। गाँधी के नाम पर सड़कें, स्टेडियम, भवन, कार्यालय, संस्थाएँ… हर संभव जगह पर गाँधी का ब्रांड स्थापित किया गया।
इससे समस्या नहीं है, क्योंकि गाँधी इसके लिए अयोग्य नहीं हैं, लेकिन अयोग्य तो बाकी भी नहीं थे। लेकिन एक व्यक्ति को अपना बनाने के लिए कॉन्ग्रेस ने अंबेडकर से ले कर तमाम महात्माओं को नकारा, और व्यवस्थित तरीके से उन्हें इस तरह से आम लोगों तक पहुँचाया कि ‘हाँ भैया, ये भी थे उस समय, लेकिन गाँधी में जो बात थी, वो नहीं थी इनमें!’
इसलिए, कॉन्ग्रेस आज भी बिदक जाती है गाँधी के नाम को ले कर। लेकिन इससे वो भावनात्मक तौर पर दुख महसूस नहीं करती, जैसा कि नेहरू की नाकामियों और नीतिगत असफलताओं की चर्चा होने पर उन्हें महसूस होता है। गाँधी पर उँगली उठाने वालों से कॉन्ग्रेस को अलग तरह का दुख होता है, वो दुख है कि गाँधी ब्रांड पर तो बस इन्हीं का अकेला हक था, और वो ही उनके आधिकारिक उत्तराधिकारी हैं।
गोडसे को नकारने, या उसकी देशभक्ति पर सवाल उठाने के पीछे के कारण गोडसे नामक व्यक्ति को ले कर नहीं हैं, बल्कि उसी से किसी न किसी तरह से जुड़ी संस्था आज सत्ता में है, इसलिए इन नामों पर चिल्लाने से कॉन्ग्रेस को थोड़ा माइलेज मिल जाता है। जिस राजवंश का राजकुमार संसद में दो सवाल नहीं पूछ पाता क्योंकि वो तैयारी कर के नहीं आया था, और दो लाइन में यह बोल कर निकल जाता है कि लोकतंत्र की हत्या हो गई है, अब सवाल पूछने का क्या फायदा, उस राजवंश के चाटुकार गोडसे के नाम पर तो हल्ला करेंगे ही।
राहुल गाँधी ने गोडसे का आतंकवादी कहा है। राहुल गाँधी ने भारत के प्रधानमंत्री, अपने पिता और अपने पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राजीव गाँधी के हत्यारों को भी माफी दे दी थी। आतंकी तो वो भी हैं, उन्होंने तो देश के प्रधानमंत्री की ही हत्या नहीं की थी, तुम्हारे पिता की भी हत्या की थी, लेकिन गोडसे पर बिलबिला क्यों जाते हो? कहाँ गई तुम्हारी करूणा?
बात यह है कि राहुल गाँधी की डोरियाँ जो भी खींच रहा है उसे यह बखूबी पता है कि घोटालेबाज़ राजीव गाँधी के नाम पर, उसके हत्यारों को माफ करने से तमिल वोट ही मिलेगा, लेकिन मोहनदास करमचंद गाँधी जो है, वो बड़ी चीज है, और उस पर तो पार्टी का कॉपीराइट टाइप का मामला है, तो उस पर चिहुँकना दूसरे तरह के राजनैतिक फायदे पहुँचा सकता है।
यहाँ अपने पिता को ही राजनीति के कारण जिस आदमी ने हाशिए पर डाल दिया हो, वो गाँधी के नाम पर क्यों खेल रहा है? माफ कर दो न गोडसे को, महात्मा गाँधी ने ही कहा था कि पाप से घृणा करो, पापी से नहीं। तो माफ कर दो गोडसे को, बात खत्म। सबको समझ में आ जाएगा कि तमिल आतंकियों को तुमने सच में माफ किया है, न कि तमिलनाडु में पार्टी की जरूरत के हिसाब से पिता के हत्यारों को भुला दिया। फर्जी के जीसस क्राइस्ट मत बनो राहुल गाँधी, तुम्हारा सच हर दूसरे दिन सामने आता रहता है।
इसलिए, गाँधी को उसी रोशनी में देखा जाए जिसमें हमने बाकी लोगों को देखा है। गाँधी की महानता बनी रहे, उनका ब्रांड चमकता रहे, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि हम आँख मूँद कर उनके समकालीन लोगों द्वारा रखी गई बातों की उपेक्षा कर दें। आखिर इस विषय को ऐसे क्यों देखा जाता है जैसे कोई अपराध हो गया हो? क्या इसी देश में वामपंथी और लिबरल गिरोह गाँधी को जातिवादी नहीं कहा गया है? लेकिन वामपंथियों का क्या कहना क्योंकि वो आज कल न तो सत्ता में हैं, न ही उनकी बातों पर कोई ज्यादा ध्यान दे रहा है।
सम्यक् चर्चा समय की माँग
गाँधी की पुण्यतिथि मनाई जाए, सड़कें बनती रहें, रुपयों पर उनका चेहरा रंग बदल कर छपता रहे, कोई आपत्ति नहीं। वो राष्ट्रपिता हैं, महात्मा हैं, लेकिन एक वयस्क होते लोकतंत्र में हर दृष्टिकोण को चर्चा में आने का पूरा हक है। यहाँ जब विश्वविद्यालयों में आतंकवादियों की बरसी मनाई जाती है, तो फिर वहीं महात्मा गाँधी को ले कर बाकी चर्चाएँ भी आयोजित होनी चाहिए। लोकतंत्र में तो सबका पक्ष सुना जाता है, फिर गोडसे ने गाँधी की हत्या क्यों की, यह पक्ष भी जानने की आवश्यकता है।
अगर इस पर चर्चा नहीं हुई तो हम आँख मूँद कर उसी दिशा में बढ़ते रहेंगे जिस पर भीम राव अम्बेडकर जैसे महापुरुषों ने कहा था कि गाँधी के दौर में बस गाँधी की चाटुकारिता ही हो रही थी, बाकी हर तरह की आवाज और हर तरह के विचारों को दबा दिया गया था जैसे कि अलग विचार रखना कोई अपराध हो। किसी को महामानव बना देने से समाज के लोगों की वैयक्तिक सोच दब जाती है, खास कर तब जब आप उस महामानव के विचारों या कृत्यों की आलोचना करने लगते हैं।
गाँधी की हत्या के बाद अम्बेडकर जिस तरह की वैचारिक स्वतंत्रता की उम्मीद लगाए बैठे थे, उसे कॉन्ग्रेस के चाटुकारों ने पूरी तरह से कुचल दिया। उन्होंने दूसरी तरह की विचारधारा को पूरी तरह से खारिज कर दिया और लम्बे समय तक सत्ता में रहने का परिणाम यह हुआ कि दो पीढ़ी बीतने के बाद नोट पर गाँधी का मुस्कुराता चेहरा देखते हुए, कोई भी गाँधी की नीतियों की समालोचना तो छोड़िए, उनके चश्मे, लाठी और ‘रघुपति राघव राजा राम’ एवं ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ से बाहर ही नहीं आ पाया है।
इसलिए, अगर वो लोग जो गोडसे को आतंकी मानते हैं, लेकिन अब्दुल, अफजल और याकूब पर चुप हो जाते हैं, उन्हें अब बर्दाश्त करना सीखना चाहिए। भाजपा ने भले ही साध्वी प्रज्ञा पर त्वरित कार्रवाई की हो, लेकिन बदले हुए युद्धक्षेत्र में दुश्मन के नियमों से खेलने की बजाय, भाजपा को अपने नियम तय करने चाहिए और आतंकियों के हिमायतियों को आँख में आँख डाल कर बताना चाहिए कि ‘हाँ, हम ऐसे ही हैं, क्या उखाड़ लोगे’।
लेकिन, देश के राइट विंग की यही समस्या है कि उसे दीर्घकालिक युद्ध भी लड़ना है, लेफ्ट विंग की स्वीकार्यता भी चाहिए और अपनी नैतिकता भी बचानी है। जबकि, समय बदल गया है और सामने वाले कोर्ट के ऊपर जनेऊ पहन कर हिन्दू बने घूम रहे हैं, और दूसरे ही पल हिन्दुओं को नीचा दिखाने में कसर नहीं छोड़ रहे, और तुम्हें नैतिकता और आदर्शों की पड़ी है कि तुमने न तो संदर्भ देखा, न सुनवाई की, बस विरोधियों के जाल में उलझ कर तुमने साध्वी प्रज्ञा को संसदीय समिति की बैठकों से भी बाहर कर दिया, डिफेंस वाली कमिटी से बाहर कर दिया और तुम्हारे सारे नेता माफी माँगते दिख रहे हैं। यही सब करना था तो उसे चुनाव क्यों लड़वाया?
वैचारिक युद्ध के दौर में, जब नैरेटिव को अपने नियंत्रण में लेना है तो इन छोटी, अनावश्यक बातों पर जवाबी कार्रवाई तो छोड़िए, आधे सेकेंड की प्रतिक्रिया भी देना बेकार में समय खराब करना है। नैरेटिव में तुम्हें हमेशा नकारा गया है, तुम्हारी पूरी विचारधारा को बिना सुने-जाने खारिज किया गया है, और दुर्भाग्य यह है कि तुम्हें उन्हीं लोगों से ‘सर हमने ठीक बोला ना?’ पूछ कर शाबाशी लेनी है।
ये विजेताओं का एटीट्यूड नहीं है, ये हारे हुए लोगों का पतनोन्मुखी एटीट्यूड है जिससे तुम्हारे पीछे खड़ी सेना को प्रेरणा नहीं मिलेगी। तुम उनसे लड़ रहे हो जो हर मूल्य से समझौता कर लेते हैं, शिव सेना के साथ सरकार बना लेते हैं ताकि तुम्हारे ही वोटबैंक को लगे कि ये पार्टी तो हिन्दू-विरोधी नहीं है। और तुम, साध्वी प्रज्ञा के बयान पर बिना संदर्भ जाने, बस फाँसी की सजा नहीं सुना पाते, बाकी हर गलत चाल चल देते हो ताकि तुम्हारे ही समर्थकों में यह संदेश जाए कि उसे संसद में पहुँचाना एक भूल थी।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धार संकाय के छात्रों द्वारा डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध जारी है। एक ओर इस आंदोलन के तहत एक ओर छात्र कक्षाओं का बहिष्कार कर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं तो दूसरी ओर विवि प्रशासन की ओर से किसी नतीजे पर नहीं पहुँचने से संकाय में पठन-पाठन पूरी तरह प्रभावित है।
बीएचयू प्रशासन द्वारा अब तक छात्रों की माँग पूरी न होने पर यहाँ तक कि क़ानूनी लड़ाई लड़ने और महामना के सम्मान की रक्षा के लिए संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों द्वारा संचालित आंदोलन के अगले क्रम में आज गुरुवार को सामान्य जनता का समर्थन लेने के लिए दोपहर दो बजे से ही लंका सिंह द्वार से भिक्षाटन किया जा रहा है।
संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के प्रदर्शनकारी छात्रों से ऑपइंडिया ने बात कि तो शशिकांत मिश्र ने बताया कि विवि की ओर से कोई हल न निकाले जाने की वजह से छात्र अब भिक्षाटन कर आम जनता को इस पूरे प्रकरण के बारे में अवगत करा रहे हैं ताकि आम लोग भी हमारे धर्म की रक्षार्थ चलाए जा रहे आंदोलन को समझे और खुद को जोड़ सकें। वहीं छात्रों के लगातार विरोध प्रदर्शन से BHU परिसर का माहौल एक बार फिर से गरम होने लगा है। क्योंकि अब प्रशासन द्वारा माँगे गए 10 दिन में से मात्र 2 दिन शेष हैं।
भिक्षाटन करते SVDV के छात्र
बता दें कि संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में डॉ. फ़िरोज़ की नियुक्ति के विरोध में 15 दिन तक चले धरने के बाद कार्यवाही के लिए BHU प्रशासन द्वारा माँगे गए 10 दिन के समय मे से आंदोलन के कल सातवें दिन छात्रों द्वारा मशाल जुलूस निकाला गया था। जुलूस में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों का समर्थन करने के लिए कला संकाय व सामाजिक विज्ञान संकाय के भी छात्र और SVDV के पूर्व छात्र भी बड़ी पहुँचे थे। मशाल जुलूस सिंह द्वार से जयघोष करते हुए रविदास गेट तक गया और पुनः वहाँ से सिंहद्वार पर आकर सभा के बाद समाप्त हुआ।
#BHU प्रशासन द्वारा माँगे गए 10 दिन के समय मे से आंदोलन के आज सातवें दिन #SVDV के छात्रों द्वारा मशाल जुलूस निकाला गया। जुलूस में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों का समर्थन करने के लिए कला संकाय व सामाजिक विज्ञान संकाय के भी छात्र भारी संख्या में पहुँचे। #ferozekhanpic.twitter.com/cgvv8KYcJH
सभा में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र व डॉ. अरविंद शुक्ल ने कहा, “महामना के मूल्यों व उनके सपनों को कभी मिटने नहीं दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि BHU के छात्रों के दिल में महामना के प्रति कितना सम्मान है, इसका इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहाँ से पढ़े हुए लगभग हर छात्र चाहे वह जहाँ हो ऑफिस या घर में महामना की प्रतिमा अवश्य रखता है।”
सभा को संबोधित करते हुए डॉ. मुनीश मिश्र ने प्रशासन को आगाह करते हुए कहा, “अगर प्रशासन ने छात्रों की बात नहीं मानी और अपना वादा पूरा नहीं किया तो धर्म की रक्षा के लिए काशी विद्वत परिषद, शंकराचार्यों, पूर्व प्रोफेसरों, आचार्यों सहित देश के कोने-कोने में रह रहे संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के पूर्व छात्र भी विशाल आंदोलन में शामिल होने को तैयार हैं।”
सभा में #BHU के पूर्व छात्र व डॉ. अरविंद शुक्ल ने कहा कि महामना के मूल्यों व उनके सपनों को कभी मिटने नहीं दिया जाएगा। डॉ. मुनीश मिश्र ने प्रशासन को चेताते हुए कहा, “अगर प्रशासन #SVDV के नियमों को नहीं मानता है तो धर्म की रक्षा हेतु एक विशाल आंदोलन के लिए पूर्व छात्र भी तैयार हैं। pic.twitter.com/mm0fLqsAXH
कला संकाय के इतिहास विभाग के अभिषेक सिंह ने कहा, “हमारे इतिहास में शिलालेख के आधार पर ही संस्कृति व सभ्यता का प्रमाणीकरण किया जाता है। महामना के शिलालेख को फर्जी कहने वाले उसकी जाँच करा लें, खुद ही पता चल जाएगा, कितना पुराना है। उसको न मानना महामना का अपमान है और महामना के सम्मान के लिए पूरा कला संकाय जरूरत पड़ने पर साथ खड़े होने के लिए तैयार है।”
बता दें कि धर्म विज्ञान के छात्रों के समर्थन में अब तमाम विद्वानों के साथ ही अयोध्या के साधु-संत, आचार्य भी समर्थन में आ गए हैं। काशी विद्वत परिषद, शंकराचार्यों और पूर्व प्रोफेसरों आचार्यों के साथ काशी के कई सनातन धर्म संरक्षकों का साथ भी छात्रों को मिला है। काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष और SVDV के पूर्व प्रोफ़ेसर आचार्य रामयत्न शुक्ल के नेतृत्व में कई विद्वानों ने संघ कार्यवाहक भैया जी जोशी से मिलकर इस बात पर आवश्यक कार्रवाई और उनको पूरे मामले से अवगत कराया। उन्होंने कहा, “कुलपति (VC) राकेश भटनागर ने मालवीय मूल्यों और धर्म विज्ञान संकाय के नियमों का ध्यान नहीं रखा, जिससे आज विश्विद्यालय का माहौल ख़राब हो गया है।”
बता दें कि कुछ दिन पहले ही संघ के वाराणसी मंडल के एक प्रचारक की तरफ से फिरोज खान के समर्थन में बयान आया था जिसे मीडिया ने संघ का बयान कहकर चलाया था क्योंकि वहाँ भी उन्हें पूरा मुद्दा न बताकर मीडिया ने ‘संस्कृत भाषा’ को लेकर प्रश्न किया गया था। जिसका छात्रों ने विरोध करते हुए संघ के पदाधिकारियों से पूरे मामले का संज्ञान लेने का अनुरोध किया था।
आज अयोध्या में स्वामी राघवचार्य जी की अध्यक्षता में अनेको मंदिरों के महंतों व लगभग 30 संस्कृत विद्यालयों के अध्यापकों ने भी छात्रों के आंदोलन का समर्थन किया और कहा, “यदि प्रशासन निर्धारित समय के अंदर आवश्यक निर्णय नहीं लेता है तो एक बड़े आंदोलन के लिए हम संत समाज के लोग भी आपके साथ हैं।”
पिछले दिनों संत समाज के कई लोगों ने भी मामले की जानकारी न होने के कारण मीडिया द्वारा संस्कृत भाषा को लेकर सवाल पूछने पर उसी सन्दर्भ में बयान दे दिया था। आज जब सुबह छात्र उनसे मिलाने गए थे तो स्वामी राघवाचार्य ने कहा कि संयोग वश धर्म विज्ञान संकाय के एक महत्त्वपूर्ण इतिहास व परम्परा से परिचय हुआ। उन्होंने एक सस्मरण सुनते हुए कहा, “तोताद्री मठ के पीठाधीश्वर स्वामी अनन्ताचार्य जी से ज्ञात हुआ था कि तोताद्री मठ के द्वितीय पीठाधीश्वर स्वामी राम प्रपन्नाचार्य जी संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के ही छात्र रहे हैं। मिथिला में कभी शास्त्रार्थ हुआ था, महामना जी निर्णायक थे उस सभा मे निर्णय की स्थिति नहीं हो पाई तब प्रपन्नाचार्य जी ने कहा कि काशी स्वयं में प्रमाण है, काशी के व्यक्ति का वक्तव्य ही निर्णय व प्रमाण है। जिसकी सहमति स्वयं महामना ने ही की।”
छात्रों को भिक्षा देते हुए स्वामी राघवाचार्य
शशिकांत मिश्र ने बताया, “स्वामी जी ने आज उनसे मिलाने गए चक्रपाणि ओझा, कृष्ण, डॉ. मुनीश मिश्र सहित सभी छात्रों से आंदोलन की सारी जानकारी ली और भावुक हो गए। उनको जब पता लगा कि आज आंदोलन में भिक्षाटन है तो स्वयं ही वह भिक्षा देने के लिए तैयार हो गए। भिक्षा देते समय उनका दर्द उनकी आंखों से छलक गया।” स्वामी जी ने कहा, “हर बार परीक्षा से सनातन धर्म गुजरा है और विजयी रहा है, इस बार भी विजय धर्म की होगी, सत्य की होगी, इसके लिए हम सभी संघर्ष के लिए तैयार हैं।”
गृह मंत्रालय द्वारा एक्शन लिए जाने के बाद पाकिस्तानी हिंदुओं को वापस पाकिस्तान भेजने का फैसला करने वाली राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार ने 21 पाकिस्तानी प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्रदान कर दी है। अधिकारियों ने बताया कि जिन पाकिस्तानी प्रवासियों को नागरिकता प्रदान की गई है, वो पिछले 19 साल से भारत में रह रहे थे। नागरिकता प्राप्त करने वाले लोगों में एक मासूम बच्ची समेत 21 लोग शामिल हैं। इन्होंने सालों से भारतीय नागरिकता का सपना संजोया हुआ था और अब जब उन्हें ये खुशखबरी मिली है, तो उनकी आँख से आँसू छलक पड़े। इस मौक़े पर हर कोई एक दूसरे से गले लगकर भावुक दिखा तो किसी ने अपने बच्ची को खूब दुलार दिया।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय नागरिकता मिलने के बाद इन लोगों ने असल में आजादी के मायने महसूस किए। यही कारण है कि इन्होंने इस दौरान ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदेमातरम’ के नारे भी लगाए।
सबसे पहले दो बहनों -निर्मला और चंद्रा की कहानी। दोनों साल 2000 में पाकिस्तान से टूरिस्ट वीजा लेकर भारत आईं और यहीं बस गईं। हालाँकि कुछ महीने पहले चंद्रा को भारतीय नागरिकता मिल गई थी, लेकिन उनकी सगी बहन निर्मला पर पाकिस्तानी नागरिक की मुहर थी। वे दोनों कई वर्षों से नागरिकता पाने के लिए प्रयासरत थीं। ऐसे में बुधवार को जब निर्मला को नागरिकता का सर्टिफिकेट मिला तो दोनों भावुक हों गई और एक दूसरे को गले लगाया।
इन बहनों के अनुसार, पाकिस्तान में न तो हिंदू लड़कियों को ज्यादा आजादी है और न ही वहाँ पढ़ाई का अच्छा माहौल है। वहाँ खुलकर जिंदगी नहीं जी जा सकती, इसलिए वे बेटियों की परवरिश के लिए भारत आई। उनके मुताबिक आज नागरिकता पाने के बाद ऐसा लग रहा है जैसे मानों उनका पुनर्जन्म हुआ हो।
इसी प्रकार भीष्म माहेश्वरी अपनी पत्नी व अन्य रिश्तेदारों के साथ करीब 21 वर्ष पहले भारत आए थे। यहाँ करीब पाँच साल पहले भीष्म माहेश्वरी व उनकी पत्नी को भारतीय नागरिकता मिल गई। लेकिन, 11 साल की उनकी बेटी प्रियांशी को यह सुविधा नहीं मिली। वह इसके लिए वर्षों से इंतजार कर रहे थे। ऐसे में अब जब उन्हें बुधवार को ये खुशी मिली, तो वे और उनकी पत्नी भावुक हो गए और अपनी बेटी प्रियांशी को गोद में उठाकर खूब लाड़ किया।
नागरिकता मिलने वाले लोगों में सांवलदास, उनकी पत्नी सोनिया, छोटा भाई नरेश और सांवलदास के 2 चचेरे भाई (भागचंद व विजय कुमार भी थे। ये पूरा परिवार 18 वर्ष पहले पाकिस्तान में खैरपुर मीरस सिंध से भारत आए थे। यहाँ इन्होंने शुरुआत में पेट पालने के लिए रेडिमेड दुकानों पर नौकरी की और घर का खर्चा चलाया। बुधवार को जब संभाय आयुक्त व जिला कलेक्टर जगरूप यादव ने सांवरदास व उनकी पत्नी सहित 3 भाईयों को नागरिकता का प्रमाण पत्र दिया तो पूरा परिवार ही खुशी से झूम उठा।
सांवलदास ने दैनिक भास्कर से बात करते हुए कि पाकिस्तान में हालत अच्छे नहीं हैं, इसलिए वे अब पूरे परिवार को भी ले आएँगे। इसके अलावा उनकी पत्नी तो नागरिकता मिलने के बाद भी कई देर तक रोती रहीं।
गौरतलब है कि इस मौक़े पर जयपुर के ज़िला कलेक्टर ने यह भी बताया कि 28 अन्य पाकिस्तानी प्रवासियों ने भी भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन किया है और उसके लिए प्रक्रिया चल रही है, इसके अलावा 63 अन्य मामलों में भी जाँच हो रही है और जल्द से जल्द उन सभी को भारतीय नागरिकता देने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। राजस्थान में जयपुर के अलावा जोधपुर और जैसलमेर के ज़िला कलेक्टरों को भी जाँच के बाद पाकिस्तानी प्रवासियों को भारतीय नागरिकता देने का अधिकार है।
पश्चिम बंगाल में राज्यपाल और सूबे की सरकार के बीच तीखी नोंक-झोंक देखने को मिल रही है। राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने बुधवार (27 नवंबर) को एक ट्वीट कर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर निशाना साधा है।
उन्होंने अपने ट्वीट में दावा करते हुए लिखा कि दीदी ने उनके बारे में ‘तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त’ कहा है। इसे प्रमाणित करने के लिए धनखड़ ने एक बंगाली अख़बार की ख़बर की तस्वीर भी शेयर की है। अपने ट्वीट में राज्यपाल ने कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन पर निशाना साधते हुए बॉलीवुड फ़िल्म का गाना गाया, ‘तू चीज है बड़ी मस्त-मस्त’।
Sungbad Pratidin daily on 27/11 carried this story (narrated to me by several others) as regards the Constitution Day at Assembly. Hon’ble CM for Governor said “तू चीज़ बड़ी है मस्त मस्त”. I refrain from any response given the personal regard for her and the office she holds. pic.twitter.com/KoyAolgur2
सोशल मीडिया पर उन्होंने ट्वीट किया, “…अख़बार में 27 नवंबर को ख़बर छपी, जिसमें विधानसभा में संविधान दिवस का ज़िक्र किया गया है। सम्मानीय मुख्यमंत्री ने राज्यपाल के लिए कहा, तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त। मैं इसका जवाब देना ही सही नहीं समझता क्योंकि मुझे उनके पद का सम्मान है।”
राज्यपाल धनखड़ ने बुधवार को ही अपने एक अन्य ट्वीट में एक वीडियो भी शेयर किया। इस वीडियो में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी संविधान दिवस पर कार्यक्रम के समापन के बाद संवाददाताओं से बात कर रही थीं।
The video on the Constitution Day would leave nothing to imagination as to what precedence is accorded to the Constitutional Head of State. Time to engage in introspection and not in disinformation. pic.twitter.com/Cjzty4qDHM
अपने एक अन्य ट्वीट में उन्होंने लिखा, “मैंने कभी सम्मान देने में कोई कमी नहीं की, चाहे वह माननीय मुख्यमंत्री ही क्यों न हों। मैं उनका व्यक्तिगत तौर पर काफ़ी सम्मान करता हूँ। आश्चर्य है कि उन्होंने कोई क़दम नहीं उठाया और मैं चकित रह गया। अमित मित्रा, पार्थो समेत सभी मंत्रियों, अब्दुल मनन और सभी विधायकों का मैंने अभिवादन किया।”
I would never ever compromise on extending courtesy to anyone, much less Hon’ble CM for whom I have enormous personal regard. Surprisingly she made no expected move, leaving me bewildered. Was stumped. All including Amit Mitra, Partho, Abdul Manan greeted by me as all MLAs.
बिहार के बेगूसराय ज़िले में 22 नवंबर को एक परिवार ने स्थानीय पुलिस स्टेशन में एक लिखित शिक़ायत दर्ज करवाई। शिकायत क्या थी – नाबालिग बेटी अचानक ग़ायब हो गई है, शक़ यह है कि उसका अपहरण उसे पढ़ाने वाले एक ट्यूटर ने किया है। लेकिन मामला इस दो लाइन से कहीं ज्यादा गंभीर है।
इस घटना के एक सप्ताह बीत जाने के बाद अब तक पुलिस ने इस मामले में किसी की गिरफ़्तारी नहीं की है। नाबालिग अभी भी ग़ायब है।
लड़की की माँ ने पुलिस को अपनी शिक़ायत में बताया कि 20 नवंबर को उसकी बेटी समीर कोचिंग सेंटर के लिए अपने दैनिक कार्यक्रम के अनुसार सुबह 9:30 बजे घर से निकली थी। जब वह 12:30 बजे तक वापस नहीं आई, तो वो कोचिंग सेंटर गईं। वहाँ उन्हें पता चला कि उनकी बेटी कोचिंग के मालिक मोहम्मद जसीम उर्फ़ समीर के साथ एक घंटे पहले ही सेंटर से जा चुकी है। तभी से, लड़की का कोई अता-पता नहीं है।
पुलिस को दिया लड़की की माँ का लिखित बयान (फोटो साभार: swarajyamag)
ख़बर के अनुसार, मुफ्फसिल थाना के डुमरी प्रखंड के स्टेशन हाउस ऑफि़सर (SHO) मनीष सिंह ने बताया कि इस मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) संख्या 612/19 में आरोपित के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा-366 (नाबालिग लड़की की खरीद, दस साल तक की कैद की सजा) और 364 (हत्या करने या अपहरण करने के लिए अपहरण, दस साल तक की कैद की सजा) के तहत मामला दर्ज किया गया है।
सिंह ने बताया कि इस मामले की जाँच चल रही है। इस दौरान न ही जसीम के बारे में कुछ पता चल सका है और न ही नाबालिग लड़की के बारे में कोई जानकारी मिल सकी है।
वहीं, लड़की के परिजनों ने पुलिस पर लापरवाही का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि पुलिस ने लड़की की तलाश करने में गंभीरता न दिखाते हुए बहुत कम प्रयास किए। परिजनों ने यहाँ तक कहा कि पुलिस इस मामले को नज़रअंदाज़ किया है।
लड़की के परिवारवालों ने कुछ ऐसे दस्तावेज दिखाए हैं, जो मामले की गंभीरता को दर्शाता है। एक दस्तावेज के अनुसार, लगभग एक साल पहले, लड़की का धर्म परिवर्तन करवा कर इस्लाम कबूल कराया गया था। उसका नाम भी बदल दिया गया था और तब उसने जसीम से निक़ाह कर लिया था। जबकि, लड़की हिन्दू है और महतो जाति की है।
परिजनों ने पिछले साल के उस हलफ़नामे को दिखाया, जिसमें लड़की की उम्र 19 साल है। इस हलफ़नामे में यह भी दिखाया गया कि उसने अपनी मर्ज़ी से इस्लाम क़बूल किया है। इसके बाद उसका नाम बदलकर नाज़मा खातून कर दिया गया और 28 अगस्त 2018 को लखमिनिया की एक मस्जिद में मोहम्मद जसीम के साथ उसका निक़ाह हो गया।
एक साल पहले लड़की की उम्र का फ़र्ज़ी दस्तावेज़ (साभार: swarajyamag)
वहीं, परिवार ने लड़की के असली आधार कार्ड को भी दिखाया, जिससे हलफनामे में किए गए फर्जीवाड़े का पता चलता है। आधार के अनुसार लड़की की जन्मतिथि 27 फरवरी 2002 है। इस हिसाब से लड़की की उम्र 17 साल की है। फ़र्जी हलफनामे में उसकी उम्र 27 फरवरी 2000 दर्शाई गई है।
लड़की के चाचा ने बताया, “जब हमें दो दिन तक लड़की नहीं मिली, तो हम ट्यूटर के घर गए और उसकी माँ से पूछताछ की। वह कागज़ों का एक ढेर ले आई, जिसमें हमें बताया गया कि जसीम ने लड़की से निक़ाह कर लिया है और कुछ समय में वापस आ जाएगा।”
लड़की के परिजनों द्वारा शेयर किया नाबालिग का आधार कार्ड (साभार: swarajyamag)
उन्होंने बताया कि कागज़ात में एक ऐसा दस्तावेज़ भी था, जिसमें दिखाया गया था कि 26 जून 2019 को जसीम ने लड़की के पिता के ख़िलाफ़ बेगूसराय ज़िला अदालत में एक रिपोर्ट दायर की गई थी, जिसमें कहा गया था कि लड़की के परिवार वाले उस जोड़े पर लड़की की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ अलग होने के लिए दबाव डाल रहे हैं। इस दस्तावेज़ के मुताबिक जसीम की उम्र 26 वर्ष थी।
लड़की के चाचा ने कहा, “यह बड़ी बेहुदी बात है। हमें जब लड़की के धर्मांतरण और निक़ाह की बात पता ही नहीं थी, तो हम दंपती पर किसी तरह का दबाव कैसे डाल सकते थे? लड़की तो हम सबके साथ ही रह रही थी।”
‘रिपोर्ट’ का पहला पृष्ठ (साभार: swarajyamag)
इसके आगे उन्होंने कहा, “जसीम का परिवार अब फ़रार हो चुका है और उसके घर पर अब ताला लगा हुआ है।”
लड़की के परिजनों ने बेगूसराय में बजरंग दल के 23 वर्षीय कार्यकर्ता शुभम भारद्वाज से सम्पर्क किया। उन्होंने बताया कि ज़िले में पहले भी ऐसे कई मामले देखे गए हैं, जहाँ नाबालिग लड़कियों के उम्र संबंधी फ़र्जी दस्तावेज़ बनाकर उनसे निक़ाह कर लिया गया है।
उन्होंने कहा, “पुलिस को मस्जिद और नोटरी अधिकारी से पूछताछ करनी चाहिए जिन्होंने ग़लत जानकारी के आधार पर इन दस्तावेज़ बनाए। लेकिन, उन्होंने (पुलिस) एक हफ़्ते के बाद भी में कुछ नहीं किया।”