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नागरिकता विधेयक से मुस्लिम बाहर: वामपंथियो! हम ‘sick a**hole’ भले हों, लेकिन चलेगी हमारी ही

अल्पसंख्यक की परिभाषा क्या है? जो संख्या में ‘अल्प’ हो, कम हो। क्या 20 करोड़ की आबादी होने, देश की दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या होने के बाद भी किसी को ‘अल्पसंख्यक’ कहा जा सकता है? अगर हाँ, तो 2-3% ईसाई, 1.5-2% सिख या बमुश्किल एक लाख से भी कम ईरानी, पारसी या यहूदी समुदाय क्या होंगे?

अल्पसंख्यक की अवधारणा के पीछे की विचारधारा को देखें तो उसमें यह पूर्वग्रह है कि जो संख्या में अधिक होगा (यानि ‘बहुसंख्यक’ होगा), ज़ाहिर सी बात है कि अल्पसंख्यक को ही उससे ‘दब’ कर रहना पड़ेगा। इसी पूर्वग्रह से, बिना इसकी ज़मीनी सत्यता जाँचे-परखे, बिना यह देखे कि यह पूर्वग्रह भारत के समकालीन समाज में कितना सच है और कितना गलत, एक पूरा ‘अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय’ बना हुआ है।

इसका काम ही इस दुराग्रह के साथ काम करना है कि जहाँ कहीं हिन्दू और गैर-हिन्दू के बीच विवाद होंगे, वहाँ गैर-हिन्दू के ही न्यायपूर्ण हित खतरे में होंगे। लेकिन भारत के बहुसंख्यक हिन्दुओं पर लागू इसी अवधारणा, कि “प्रताड़ित तो केवल बहुसंख्यक कर सकता है, अल्पसंख्यक नहीं”, का इस्तेमाल जब नागरिकता अधिनियम संशोधन विधेयक में इस्तेमाल होता है, तो लिबरल गिरोह और पत्रकारिता के समुदाय विशेष को याद यह आने लगता है कि नहीं-नहीं, प्रताड़ित तो हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई सभी हो सकते हैं- बशर्ते वे भारत के नागरिक न हों। भारत के नागरिक बनने के बाद हिन्दू हुए तो दुष्ट, शोषक और सताने वाले, गैर-हिन्दू हुए तो बेचारे, शोषित, सहानुभूति के पात्र।

सबसे पहला मानदण्ड- भारत के हितों की रक्षा

भारत के हर एक कानून का सबसे पहला मानदण्ड भारत की, यहाँ रह रहे नागरिकों, और यहाँ की मूल संस्कृति की रक्षा होता है- चाहे यह किसी कानून में अलग से लिखित हो या न हो। आज भारत हर तरफ़ से (चीन और श्री लंका को छोड़कर) कट्टरपंथी इस्लामियों, जिहादियों के आतंकी संगठनों से घिरा हुआ है। पाकिस्तान में तो पूरा एक देश ही उन्हें अपना कहर बरपाने के लिए मिला हुआ है, अफ़ग़ानिस्तान में भी तालिबान को अमेरिका की पूरी ताकत केवल सत्ता के मुहाने से दूर रख पा रही है, और बांग्लादेश में भी सत्ता चाहे जिसकी आए-जाए, इस्लामी प्रभुत्व और जनसंख्या में हिस्सेदारी बढ़ते ही जा रहे हैं, गैर-मुस्लिमों की आबादी कम हो रही है, और देश कट्टरपंथ-कठमुल्लावाद की ही गर्त में और गहरा धँसता जा रहा है। 

ऐसे में जब हमें पता है कि बाहर से आना चाह रहे किसी एक समुदाय के लोग एक बहुत ही हिंसक और भयानक विचारधारा के समर्थक हैं, और उनके इस देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी के साथ गहरे मज़हबी और सांस्कृतिक ताल्लुक हैं, तो उन्हें ला कर यहाँ की कमोबेश शांतिप्रिय आबादी को कट्टरपंथ की ओर धकेलने की ज़मीन तैयार करने का क्या औचित्य है? यह भारत के हितों के खिलाफ है, खतरनाक है- और अपने न्यूनतम हितों (अपनी वर्तमान आबादी की शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करना) किसी भी विदेश नीति या विदेशी के प्रति नीति का पहला दायित्व होता है।

यह खतरा किसी भी अन्य गैर-इस्लामी समुदाय के साथ नहीं होता है- न ही हिन्दू ‘जय श्री राम’ कह कर छाती पर बाँधे हुए बम बाज़ार में फोड़ लेते हैं, क्योंकि रामायण में राम ने गैर-हिन्दुओं की हत्या का आदेश दिया हो, न ही बौद्ध, सिख या ईसाई किसी अन्य देश में अपने पंथ के लोगों के मुद्दे पर भारत में मोपला सामूहिक हत्याकाण्ड, या फिलिस्तीन के समर्थन में अमर जवान ज्योति पर हमला जैसा कुछ कर दें, इसका खतरा भारत के इतिहास में हुआ है। जैन तो खैर बेचारे ज़िंदगी भर इंसान क्या, किसी चींटी को भी चोट न लगे, ऐसे बच-बचाकर चलते हैं, और सल्लेखना कर बुढ़ापे में प्राण भी शांति से ही त्याग देते हैं।

अतः यह कहना कि किसी के साथ हो रही कथित प्रताड़ना को रोकने के लिए भारत अपनी खुद की शांति और सुरक्षा को खतरे में रख ले, यह साफ़ तौर पर भारत के हितों के विरोध की पैरवी करना होगा- जैसा कि राहुल कँवल कर रहे हैं। 

आस्था के आधार पर नागरिकता नहीं तय हो रही, खतरे का आकलन हो रहा है 

पता नहीं वामपंथी गैंग के लोगों को सही में कानून पढ़ना-लिखना नहीं आता, या इन्हें ऐसा लगता है कि बाकी जनता अनपढ़-मूर्ख है, जो ऐसी अनर्गल बातें करते फिर रहे हैं कि नागरिकता का आधार आस्था को बनाया जा रहा है। 

आस्था को खतरे के आकलन का आधार बनाया जा रहा है, न कि नागरिकता का। जब कोई भी देश किसी भी बाहरी को अपने यहाँ का नागरिक या स्थाई निवासी बनने की अनुमति देता है तो इसमें हमेशा एक जोखिम होता है- पता नहीं वह इंसान इस देश के नियम-कायदे-कानून, सभ्यता, नागरिक मूल्य और संस्कृति इत्यादि के साथ सामंजस्य बिठा पाएगा या नहीं। अगर ऐसा लगता है कि हाँ, प्रार्थी ऐसा कर सकता है, तो एक सतर्कता बरतते हुए जोखिम लेकर उसे नागरिकता दे दी जाती है। 

लेकिन अगर इन तीन देशों के मुस्लिम प्रार्थियों पर गौर करें तो एक समाज, एक समूह के तौर पर उन्होंने अपने व्यवहार में ऐसा कुछ नहीं किया जिससे भारत आश्वस्त हो सके कि वे भारत के बहुलतावाद में सामंजस्य बिठा पाएँगे। तीनों ही देशों में हिन्दू ही नहीं, सभी गैर-मुस्लिम समुदाय असुरक्षित हैं और संख्या में सिकुड़ रहे हैं, इन देशों में जिहादियों को स्थानीय लोगों का समर्थन है, भारत-विरोधी बातें करने वाले ही पाकिस्तान में तो हमेशा चुनाव में जीतते हैं, और अफ़ग़ानिस्तान-बांग्लादेश में भी भारत के समर्थक नेता को शक की निगाह से ही देखा जाता है। तो ज़ाहिर है कि इन देशों के बहुसंख्यक समुदाय, जिसे खुश करने के लिए भारत-विरोधी रवैया इन देशों के नेता रखते हैं, का मिजाज़ भी भारत-विरोधी ही है। तो ऐसे में सवाल फिर से लौटकर यह आ जाता है कि भारत ऐसे भारत-विरोधी मिजाज़ का प्रदर्शन करने वालों को भारत का नागरिक बनाने का खतरा क्यों ले?

भारत का ‘फैब्रिक’ और ‘ईथोस’ आत्महत्या पर नहीं टिके 

आजतक और इंडिया टुडे के कार्यकारी सम्पादक साहिल जोशी का कहना है कि इस बिल से भारत का ‘फैब्रिक’ बदल जाएगा, भारत के ‘ऐथोस’ के खिलाफ है यह बिल। उनके लिए शायद यह बहुत बड़े धक्के की और चौंकाने वाली बात होगी, लेकिन भारत के किसी ‘फैब्रिक’ या ‘ऐथोस’ में आत्महत्या को बढ़ावा देने का ज़िक्र नहीं है- और जैसा कि ऊपर प्रदर्शित किया गया है, जिस समुदाय से जिहादी और आतंकवादी निकल रहे हैं, उसकी संख्या भारत में गैर-ज़रूरी तरीके से बढ़ाना आत्महत्या ही है। हाँ, अगर भारत से हिन्दुओं, के खात्मे के एजेंडे को ही वे भारत का फैब्रिक, उसका ‘ऐथोस’ मानते हैं तो बात अलग है। यह सेक्युलरासुर, आसुरिक, जड़ संविधान के रूप में एक और ‘पवित्र किताब’-पूजक सरकारी तंत्र का फैब्रिक और ऐथोस हो सकता है, इस देश के जनसामान्य का नहीं। 

अगर वो भारत के मूल्यों को ही जानना चाहते हैं तो उन्हें पता होना चाहिए कि भारत के शासक हमेशा ठोंक-बजाकर ही शरण देते थे। जब पारसी ईरान में उसी समुदाय के लोगों अत्याचार से जान बचाकर भारत पहुँचे, जिन्हें नागरिकता के लिए मना करने को जोशी जी भारत की अवधारणा के खिलाफ बता रहे हैं, तो भारत में जिस राजा के पास वे पहुँचे, उसने ऐसे ही शरण नहीं दे दी- उसने पहले उनके मज़हब को समझा, फिर उनके सामने शर्त रखी कि मूल उपासना-पद्धति के अलावा बाकी सारी संस्कृति हिन्दू ही अपनानी पड़ेगी, फिर शरण दी। महाभारत में भी जब अपना रथ निकालने में जुटे कर्ण ने सुविधानुसार शरणागति माँगी, तो भगवान श्री कृष्ण ने शर्त रखी कि वह हथियार छोड़ दे और हमेशा जिस राजा युद्धिष्ठिर की शरण में आ रहा है उसकी दासता में रहना स्वीकार करे। क्या साहिल जोशी इसका समर्थन करेंगे कि समुदाय विशेष के शरणार्थी से वंदे मातरम गाने, कभी फिलिस्तीन का समर्थन न करने, कश्मीर में हिन्दुओं की संख्या बढ़ाने जैसे मुद्दों का विरोध न करने, हिन्दुओं का मतांतरण न करने और हिन्दू लड़कियों से शादी करने पर उनका मज़हब न बदलवाने पर लिखित और हमेशा के लिए समर्थन की शर्त रख दी जाए? 

संविधान उनके लिए है जो नागरिक बन चुके हैं- उनके लिए नहीं जो बनना चाहते हैं 

स्वाति चतुर्वेदी वायर के लिए लिखतीं हैं, और वायर उन्हें बदले में शायद कुछ मेहनताना देता होगा। अब अगर मैं, जिसने न कभी वायर के लिए लिखा, न कोई लेना-देना, वायर के दफ़्तर में घुस जाऊँ और चिल्लाने लगूँ कि सिद्धार्थ वरदराजन (वायर के सम्पादक) मुझे भी उतना पैसा क्यों नहीं दे रहे जितना स्वाति को मिल रहा है, तो यह माँग पागलपन के अलावा क्या होगी? स्वाति का यह कहना कि यह अधिनियम संविधान का उल्लंघन है, कमोबेश ऐसा ही कथन है।

संविधान देश के वर्तमान  नागरिकों (न कि भावी, इच्छुक नागरिकों) का देश की सरकारी मशीनरी, देश के समाज के साथ अनुबंध होता है। इसका हिस्सा वही इंसान हो सकता है जो इन दोनों पक्षों (सरकार या नागरिक) में से किसी एक का सदस्य बन चुका  हो- वह नहीं, जो बनने का इच्छुक हो। सेक्युलरिज़्म भारत राष्ट्र का अपने देश के लोगों के साथ जो समझौता है, उसका एक हिस्सा है। जब समझौता ही नागरिकता से बाहर के लोगों पर तब तक लागू नहीं होगा जब तक कि वे नागरिक बन नहीं जाते, तो उसका कोई हिस्सा अलग से कैसे लागू हो सकता है? 

हिन्दुओं को ‘सेक्युलर इंडिया’ ने दिया क्या है, जो उसकी मौत से चिंतित हों?

हिन्दुओं की जैसी दुर्दशा सेक्युलर भारत सरकार ने कर रखी है, उसमें हिन्दुओं को ‘सेक्युलरिज़्म’ की दुहाई देना वैसे ही है, जैसे कोई किसी नाज़ी यातना शिविर में पड़े यहूदी, चीनी यातना शिविर में बंद उइगर या हान मुस्लिम, इस्लामिक स्टेट के हाथों सर कलम होने का इंतज़ार कर रहे (और गला न रेता जाए, इसकी प्रार्थना कर रहे) ईसाई से यह प्रार्थना करे कि वह अपने शोषकों को जिलाए रखने के लिए कुछ कर दे। क्यों कर दें, भई अशोक स्वाइन?

हमारे मंदिर का चढ़ावा तुम लूटो, हमारे पुजारियों को पगार के नाम पर टुकड़ों से भी कम फेंक कर भूखा मरने पर तुम मजबूर करो, सबरीमाला से लेकर शनि शिगनापुर तक मंदिर तुम्हारा सेक्युलरिज़्म अपवित्र करे, संविधान में अनुच्छेद 25-30 के पंथिक संरक्षण से केवल हम बाहर, RTE के नाम पर आर्थिक बोझ बढ़ाकर स्कूल केवल हमारे बंद हों, और सेक्युलरिज़्म भी हम ही बचाएँ? माथे पर कोई खास अक्षर जो लिखा हुआ था, उसे मिटा चुके हैं हिन्दू।

https://twitter.com/ashoswai/status/1202165315980972032

शशि थरूर की संविधान की जानकारी स्वाति चतुर्वेदी जितनी- दुःखद परन्तु सत्य 

शशि थरूर ने ले-देकर वही घिसी-पिटी “ये संविधान के खिलाफ है” की लाइन दोहरा दी। स्वाति चतुर्वेदी के लिए तो यह कॉलर ऊँची करने वाली बात हो सकती है कि विपक्ष का सबसे चर्चित और सम्मानित सांसद, व मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए चुनौती दे सकने में दूर-दूर तक सक्षम इकलौते चेहरे का संविधान-ज्ञान उनके बराबर है, लेकिन शशि थरूर के लिए इससे ‘बुरे दिन’ हो नहीं सकते। कहाँ आईएफएस अफ़सर, 19 बेस्टसेलर किताबों के लेखक, संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी कुर्सी के एक इंच पास तक पहुँच जाने वाले वे, और कहाँ… स्वाति चतुर्वेदी!! 

जहाँ तक संविधान की भारत की अवधारणा बनाम पाकिस्तान की अवधारणा की बात है, तो शशि थरूर खुद यह कई मौकों पर मान चुके हैं कि गाँधी और नेहरू के “आईडिया ऑफ़ इंडिया” की स्वीकार्यता घटती जा रही है- बल्कि आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा गाँधी का कोई बड़ा नामलेवा नहीं है, और नेहरू को तो कॉन्ग्रेस भी याद नहीं करती। अगर मोदी गाँधी का नाम न लें तो कुछ सालों में “हिंदुओं को अपना गला प्लेट पर रख कर मुस्लिम भाईयों के आगे हाजिर रहना चाहिए” पढ़ाने वाले गाँधी कब बिसर जाएँगे, किसी को याद भी नहीं रहेगा। नेहरू ने मृत/निर्जीव ढाँचों बाँधों को “आधुनिक भारत के मंदिर” कहा था- यह आध्यात्मिक रूप से सजीव और सप्राण मंदिरों का ही अपमान नहीं था,साथ में इस बात की भी तस्दीक थी कि भारत का प्रधानमंत्री देश की उस करोड़ों जनता से कटा हुआ है, जो एक मंदिर बचाने के लिए आखिरी बच्चे तक पूरा-का-पूरा गाँव मरने-मारने के लिए प्रस्तुत रहती थी। 

तो ऐसे लोगों के आईडिया ऑफ़ इंडिया से तो भारत जितना दूर हो रहा है, हिंदुओं के लिए तो उतनी ख़ुशी की बात है। 

हम ‘sick a**hole’ भले हों, लेकिन चलेगी हमारी ही 

संयुक्ता बासु जैसे लोग सत्ता की, हनक की भाषा ही समझते हैं, इसलिए उन्हें तो केवल इतना जवाब देना ही मुनासिब होगा, “मेरा चौकीदार, मेरी सरकार, मेरी मर्जी।” जब आइएगा वापिस सत्ता में किसी दिन, तो पलटने की हिम्मत या कोशिश कर लीजियेगा। या दो-चार गालियाँ और दे कर देखिए, वो भी बिना स्टार के- क्या पता अमित शाह शर्म और विषाद में ही बिल पलट दें। 

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आप जिन्दा रहिए, वरना जेल कैसे जाइएगा: सुब्रमण्यम स्वामी ने किया गाँधी परिवार पर हमला

भारतीय जनता पार्टी के राज्य सभा सांसद और मशहूर अर्थशास्त्री डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने एसपीजी बिल पर बहस के दौरान कल (मंगलवार, 3 दिसंबर, 2019 को) कॉन्ग्रेस के ‘प्रथम परिवार’ यानि गाँधी-नेहरू परिवार पर हमला बोला। एसपीजी बिल पर राज्य सभा में चर्चा के दौरान उन्होंने गाँधी परिवार पर चल रहे भ्रष्टाचार के विंभिन्न मामलों पर तंज़ कसते हुए कहा कि भाजपा बिलकुल नहीं चाहती कि गाँधी परिवार को कोई शारीरिक हानि पहुँचे, क्योंकि उन लोगों को तो अभी जेल भी जाना है।

गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्षा सोनिया गाँधी और वायनाड के सांसद व पार्टी के भूतपूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी जहाँ नेशनल हेराल्ड मामले में भ्रष्टाचार के मुकदमों में जमानत पर हैं, वहीं परिवार के दामाद तथा सोनिया गाँधी के बेटी प्रियंका गाँधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा कई ज़मीन घोटालों के आरोपी हैं। यही नहीं, डॉ, स्वामी के आरोपों को अगर सही मान लें तो अगस्ता-वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घोटाले में भी सोनिया गाँधी के करीबी लोग शामिल थे।

इसके अलावा डॉ. स्वामी ने कॉन्ग्रेस के अन्य तर्कों की भी धज्जियाँ उड़ा कर रख दीं। उन्होंने कॉन्ग्रेस की सदन में पैरवी कर रहे सुप्रीम कोर्ट वकील केटीएस तुलसी के उस आरोप का भी जवाब दिया जिसमें तुलसी ने इंदिरा गाँधी-राजीव गाँधी की हत्या के लिए मुहैया कराई गई सुरक्षा में कमी को ज़िम्मेदार ठहराया था।

इंदिरा गाँधी के मामले में स्वामी ने दावा किया कि इंदिरा गाँधी ने अपनी राजनीतिक छवि के चक्कर में अपने सुरक्षा कर्मियों के आतंकी गुटों से मिल जाने की रिपोर्ट के बाद भी सुरक्षा कर्मी नहीं बदले- और बाद में उन्हीं सुरक्षा कर्मियों ने इंदिरा की हत्या कर दी। राजीव गाँधी की हत्या के बाद उस हत्याकांड की जाँच करने वाले कमीशन की रिपोर्ट के हवाले से डॉ. स्वामी ने कहा कि राजीव की हत्या के वाकये में कॉन्ग्रेसियों ने मौजूद सुरक्षा व्यवस्था का खुद मज़ाक बनाते हुए न ही पुलिस को ठीक से राजीव के इर्द-गिर्द सुरक्षा घेरा बनाने दिया (इससे आम लोग भी राजीव तक न पहुँच पाते, और जननेता की छवि बनाने के प्रोजेक्ट को धक्का लगता), न ही सुरक्षा एजेंसियों के साथ अनन्य सहयोग किए। यहाँ तक कि इस हत्याकाण्ड के बाद सरकारी सुरक्षा प्राप्त नेताओं वाली पार्टियों के व्यवहार को लेकर जाँच आयोग ने कुछ सुझाव भी दिए थे, जिसे नरसिम्हा राव की कॉन्ग्रेस सरकार ने स्वीकार किया।

स्वामी ने इन सबके बाद इस आरोप का भी जवाब दिया कि मोदी सरकार कॉन्ग्रेस के ‘प्रथम परिवार’ से राजनीतिक रूप से डरकर उनकी जान खतरे में डाल रही है। उन्होंने कहा कि सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है, क्योंकि सरकार तो चाहती है कि वे अपने भ्रष्टाचार के लिए सजा पाने जेल जाएँ।

स्वामी की इस चुटकी को सोशल मीडिया पर बहुत तालियाँ मिल रहीं हैं। एक यूज़र ने लिखा कि मोदी-शाह के खिलाफ खड़े होते रहने के बावजूद इसीलिए भाजपा में स्वामी को इतनी छूट मिली हुई है, क्योंकि भाजपा में इस प्रकार के अप्रिय सत्य जस-के-तस बोलने वाला कोई दूसरा नहीं है।

एक अन्य ने डॉ. स्वामी के इस हमले को ‘विस्फ़ोटक’ करार दिया।

डॉ. स्वामी का वह पूरा भाषण सुनें यहाँ:

फिल्ममेकर डेनियल श्रवण का शर्मनाक बयान, कहा- रेपिस्ट्स के लिए कॉन्डो‍म लेकर चलें लड़कियाँ, सहयोग करें

जहाँ देश एक के बाद एक जघन्य गैंगरेप और वीभत्स मर्डर की घटनाओं से आक्रोशित हो उबल रहा है ऐसे में खुद को फिल्ममेकर कहने वाले एक शख्स डेनियल श्रवण ने बहुत ही शर्मनाक बयान देकर रेप पीड़िताओं और समाज की भावनाओं को ठेस पहुँचाया है।

तथाकथित फिल्ममेकर डेनियल श्रवण ने देश में रेप को लीगल करने की वकालत की है। डेनियल के ऐसे शर्मनाक बयान पर लोगों ने उसे आड़े-हाथों लिया है। इतना ही नहीं डेनियल श्रवण ने फेसबुक पर एक के बाद एक लंबे-लंबे पोस्ट लिखकर कहा है कि लड़कियों और महिलाओं को कॉन्‍डोम लेकर चलना चाहिए। बल्कि रेपिस्ट्स की सेक्सुअल इच्छाओं को नकारने और रेप के बाद हत्या के लिए उकसाने के बजाए इसे कानूनी मान्यता दी जानी चाहिए। रिपोर्ट्स के अनुसार, खुद को फिल्ममेकर कहने वाला यह शख्स साउथ की सी ग्रेड फिल्मों का डायरेक्टर है।

डेनियल के लिखे फेसबुक पोस्ट पर लोगों ने जमकर उसकी जमकर क्लास ली। हालाँकि, सोशल मीडिया यूजर की प्रतिक्रियाओं पर कुछ देर उलझने के बाद डेनियल ने अपनी पोस्ट को डिलीट कर दिया था लेकिन उसके पोस्ट के स्‍क्रीनशॉट्स सोशल मीडिया पर वायरल हो गए।

हाल ही में हैदराबाद गैंगरेप के बाद तेलंगाना और उसके बाद बक्सर गैंगरेप की घटना से लोग व्यथित है तो डेनियल ने जो कहा उसे किसी भी कीमत पर सभ्य अभिव्यक्ति नहीं कही जा सकती लेकिन जिनके लिए लड़कियाँ सिर्फ देह हों, भोग का सामान हों उनसे क्या उम्मीदें रखी जाएँ।

रेप के बारे में फेसबुक पर डेनियल श्रवण ने लिखा, “सरकार को बिना हिंसा वाले रेप मामलों को कानूनी मान्यता दे देनी चाहिए। रेप के बाद हत्या को रोकिए। 18 साल से ज्यादा की सभी लड़कियों को रेप के बारे में विस्तार से बताया जाना चाहिए। उन्हें मर्दों की सेक्सुअल इच्छाओं को नकारना नहीं चाहिए। बल्कि उन्हें कॉन्‍डोम का इस्तेमाल करना चाहिए। केवल तभी ऐसी हिंसात्मक घटनाओं को रोका जा सकता है। ऐसा सोचना मूर्खतापूर्ण है कि वीरप्पन को मार देने से तस्करी पर लगाम लग जाएगी या फिर लादेन को मार देने से आतंकवाद पर काबू पा लिया जाएगा। ठीक उसी तरह से निर्भया एक्ट भी रेप और रेप के दौरान हिंसा को नहीं रोक पाएगा।”

डेनियल ने आगे लिखा, “खासतौर पर भारतीय लड़कियों को सेक्स एजुकेशन दी जानी चाहिए। खासतौर पर 18 साल की उम्र में आते ही उन्हें कॉन्‍डोम साथ लेकर चलना चाहिए। बहुत आम तर्क है, अगर मर्दों की इच्छाएँ पूरी होंगी तो वे महिलाओं को नहीं मारेंगे। सरकार को कुछ इस तरह की योजना बनानी चाहिए।”

लोगों ने जमकर डेनियल को लताड़ा है डेनियल ने अपनी फेसबुक पोस्ट डिलीट कर दी है लेकिन सोशल मीडिया यूजर का कहना है कि ऐसे लोग शायद ही अपनी हरकतों से बाज आएँ। इनकी घृणित सोंच और हरकतें जब-तब बाहर आती रहेगी।

कॉन्ग्रेसी मंत्री ने किया ‘मुझको राणा जी माफ करना गलती…’ गानें पर डांस: VIDEO हुआ वायरल

मध्य प्रदेश के कमलनाथ सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री इमरती देवी का एक डांस सोशल मीडिया में खूब वायरल हो रहा है। अपने इस डांस से कॉन्ग्रेसी मंत्री इमरती देवी एक बार फिर सुर्खियों में आ गईं हैं। बता दें कि मंत्री इमरती देवी ने बॉलीवुड के मशहूर गाने ‘मुझको राणा जी माफ करना गलती मारे से हो गई’ पर डांस किया है।

मंत्री जी का ये डांस वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है तो वहीं, मध्य प्रदेश की भाजपा मंत्री के डांस पर तंज भी किया है। जबकि, मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस ने इमरती देवी का बचाव करते हुए कहा कि किसी के डांस करने में क्या गलत है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, वायरल डांस वीडियो मध्य प्रदेश के डबरा विधानसभा क्षेत्र में हो रहे एक शादी समारोह का बताया जा रहा है।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश के कमलनाथ सरकार में मंत्री इमरती देवी अक्सर सुर्खियों में बनी रहती हैं। पहले भी गणतंत्र दिवस के दौरान अपने एक भाषण को लेकर इमरती देवी चर्चा में रह चुकी हैं। जिसमें अपना भाषण पढ़ते-पढ़ते उन्होंने कहा था कि अब कलेक्टर साहब पढ़ेंगे।

बता दें कि इसके बाद तो इमरती देवी के ऐसे कई वीडियो वायरल हो चुके हैं। कॉन्ग्रेसी मंत्री इमरती देवी ऐसे ही एक वायरल वीडियो में कह रही थीं कि डॉक्टर का ट्रांसफर नहीं कराएँगे। इसमें पैसा लगता है, इसलिए उसे सस्पेंड ही कर देते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, डॉक्टर के ट्रांसफर वाला वीडियो 24 सितंबर का बताया जा रहा था। तब इमरती देवी डबरा में ही एक अस्पताल के दौरे पर गईं थीं।

हालाँकि, इस वायरल वीडियो पर अभी तक उनका कोई बयान नहीं आया है लेकिन सोशल मीडिया पर इसे खूब शेयर किया जा रहा है।

मुंबई में 6 साल की बच्ची के साथ बलात्कार: 60 वर्षीय अब्दुल हामिद अंसारी गिरफ़्तार

मुंबई में एक 60 वर्षीय व्यक्ति को बलात्कार के जुर्म में गिरफ़्तार किया गया है। आरोप है कि कुर्ला वेस्ट में ग्रोसरी की दुकान चलाने वाले अब्दुल हामिद बहादुर अंसारी ने 6 साल की बच्ची का बलात्कार किया। विनोबा भावे पुलिस स्टेशन में उसके ख़िलाफ़ नाबालिग के साथ बलात्कार का मामला दर्ज किया गया है। शिकायत में कहा गया है कि अंसारी 1 दिसंबर से ही नाबालिग पीड़िता के साथ यौन दुर्व्यवहार कर रहा था। बच्ची उसके यहाँ अंडे लेने जाती थी। अंसारी उसे चॉकलेट देने के बहाने दुकान के अंदर बुलाता था और फिर उसके साथ अश्लील हरकतें करता था।

एक बार बच्ची के पेट में अचानक से जोर का दर्द हुआ तो उसने अपने माता-पिता को इस बारे में बताया। बच्ची ने अपने पैरेंट्स को मंगलवार (दिसंबर 3, 2019) को हुई घटना के बारे में बताया। बच्ची ने अब्दुल हामिद बहादुर अंसारी के कुकृत्यों के बारे में बताया, तो माता-पिता ने पुलिस में केस दर्ज कराया। आरोपित के ख़िलाफ़ पोस्को एक्ट के तहत भी मामला दर्ज किया गया है। उसे बुधवार को अदालत में पेश किया गया।

ये घटना तब हुई है, जब देश में डॉक्टर प्रीति रेड्डी (बदला हुआ नाम) के गैंगरेप और हत्या के बाद जनाक्रोश का माहौल है। हैदराबाद में हुई इस घटना के तुरंत बाद तेलंगाना का एक और मामला सामने आया, जहाँ एक गुब्बारे बेचने वाली महिला के साथ गैंगरेप किया गया और फिर उसकी हत्या कर दी गई। बलात्कार की घटनाओं को लेकर संसद में भी चर्चा हुई और कई सांसदों ने जल्द से जल्द सुनवाई के बाद दोषियों को फाँसी दिए जाने की माँग की।

बलात्कार आरोपित बिशप फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ दिए बयान बदलने के लिए दबाव बनाया जा रहा: सिस्टर लिसी

बलात्कार के आरोपित बिशप फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ बयान देने के लिए फ्रांसिसन क्लेरिस्ट कॉन्ग्रेगेशन (एफसीसी) द्वारा अप्राकृतिक और अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करने वाली सिस्टर लिसी वडक्केल पर अब बिशप फ्रैंको के खिलाफ दिए गए बयान को बदलने का दबाव डाला जा रहा है।

बता दें कि जालंधर बिशप फ्रैंको मुलक्कल द्वारा केरल नन का कथित तौर पर कई बार बलात्कार किया गया था और सिस्टर लिसी इस मामले की प्रमुख गवाहों में से एक हैं। द न्यूज मिनट से बात करते हुए सिस्टर लिसी ने कहा कि उनके वरिष्ठ लोग लगातार उन पर फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ दिए गए बयान को बदलने के लिए दबाव डाल रहे हैं।

फिलहाल मामले में आरोपितों के खिलाफ आरोप तय करने की कार्यवाही को अदालत ने 6 जनवरी तक के लिए स्थगित कर दिया है। नन ने कहा कि वो खुद को बहुत असुरक्षित महसूस कर रही हैं। उन्होंने बताया कि बिशप की जमानत की अवधि हाल ही में अदालत ने बढ़ाई थी और फिलहाल कार्यवाही इस सप्ताह के अंत तक के लिए स्थगित कर दी गई हैं। बता दें कि 56 वर्षीय नन पिछले कई महीनों से केरल के मुवत्तुपुझा के कॉन्वेंट में पुलिस संरक्षण में रह रही हैं। उन्होंने कॉन्वेंट के अंदर बुरा व्यवहार का आरोप लगाते हुए कहा कि हाउस अरेस्ट के दौरान लगातार उन पर बयानों को बदलने के लिए दवाब डाल रहे हैं।

सिस्टर लिसी ने CNN News18 से बात करते हुए कहा, “यह हाउस अरेस्ट है। मैं एक प्रचारक हूँ लेकिन मैं कहीं भी नहीं जा सकती और ना ही प्रार्थना कर सकती। मेरे कॉन्वेंट में लोग मुझे किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं कर रहे हैं … वे ऐसा व्यवहार करते हैं कि जैसे मैं इसका हिस्सा नहीं हूँ। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि पादरी, फ्रैंको मुलक्कल के करीबी हैं। मैंने अदालत से कहा था कि मुझे मुकदमे के अंत तक यहाँ रहने दिया जाए और उन्होंने मुझे गवाह सुरक्षा के तहत यहाँ रहने की अनुमति दी।”

उल्लेखनीय है कि सिस्टर लिसी उन कुछ लोगों में से एक है, जिनके साथ पीड़ित नन ने उन यौन विकृतियों के बारे में बात की थी। सिस्टर लिसी ने उस समय पुलिस को अपना बयान दिया था। जिसके बाद उसे एफसीसी द्वारा अपमानित किया गया था और केरल छोड़ने और विजयवाड़ा में एक कॉन्वेंट में रहने के लिए कहा गया था।

वहीं सिस्टर लिसी ने एक बार फिर से अपनी बात दोहराते हुए कहा कि वह अपना बयान नहीं बदलेंगी। उन्होंने कहा, “मैं बयान दे रही हूँ क्योंकि मैं सच्चाई जानती हूँ। शिकायतकर्ता नन के साथ 2011 से मेरा व्यक्तिगत संबंध है। नन को न्याय मिलना चाहिए, मैं उसके साथ हूँ। मैं प्रार्थना करती हूँ कि उसे न्याय मिले।”

गौरतलब है कि जालंधर सूबा से ताल्लुक रखने वाले मुलक्कल को कोट्टायम कॉन्वेंट में 13 बार नन के साथ बलात्कार के आरोप में पुलिस जाँच का सामना करना पड़ रहा है। जून 2018 में पीड़िता की शिकायत के बाद कई अन्य ननों ने सामने आकर मुलक्कल पर यौन दुराचार का आरोप लगाया था।

BHU प्रशासन का सफ़ेद झूठ: क्या VC गैर-हिन्दुओं से जुड़े इन ‘संवैधानिक बिंदुओं’ का जवाब दे पाएँगे?

काशी हिन्दू विश्विद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय (SVDV) के आंदोलनकारी छात्रों का अनिश्चित कालीन धरना संकाय के प्रवेश द्वार पर जारी है। बता दें कि BHU प्रशासन के बिना प्रमाण के दिए जवाबों से SVDV के छात्रों में घोर असंतुष्टि है। चक्रपाणि ओझा, शशिकांत मिश्र, आनंद मोहन झा, कृष्ण कुमार, शुभम सहित सभी धरनारत छात्रों ने कुलपति राकेश भटनागर के समक्ष कई गंभीर प्रश्न उठाए हैं। छात्रों ने इससे पहले SVDV के साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर उमाकांत चतुर्वेदी द्वारा दिए गए आधे-अधूरे जवाबों पर भी कई काउंटर सवाल (प्रति-प्रश्न) किए थे और BHU प्रशासन से सभी प्रश्नों का समुचित जवाब माँगा था।

प्रशासन ने तो कोई प्रमाण नहीं दिया लेकिन आज संकाय के छात्रों की तरफ से ऑपइंडिया को कई महत्वपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध कराए गए हैं जिन्हें देखकर संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में किसी गैर हिन्दू की नियुक्ति से छात्रों को क्यों आपत्ति है? क्यों वे सनातन परम्पराओं और मालवीय मूल्यों की लड़ाई लड़ रहे हैं? क्यों वे संकाय में एक मुस्लिम प्रोफ़ेसर डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध कर रहे हैं और क्यों किसी गैर हिन्दू को अपना गुरु नहीं मानना चाहते हैं?

SVDV के छात्रों के BHU प्रशासन पर आरोप, आपत्तियाँ और प्रमाण

धरनारत आंदोलनकारी छात्रों का कहना है, “संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों ने संकाय में नियम, विधि, परंपरा एवं बीएचयू एक्ट के विरुद्ध जाकर कुलपति से एक गैर हिन्दू अध्यापक की नियुक्ति का कारण पूछा तो कुलपति राकेश भटनागर और उनके झूठे प्रशासन ने अपनी गर्दन बचाने के लिए 10 दिन की मोहलत माँगने के बावजूद एक झूठ का पुलिंदा जवाब के रूप में छात्रों के हाथ में थमाकर पूरे मामले से इस तरह पल्ला झाड़ लिया कि मानो सब कुछ यूजीसी के नियमों के अन्तर्गत हुआ है जिसे बीएचयू एक्ट की स्वीकृति भी प्राप्त है।”

छात्रों ने कुलपति से सवाल किया:

  • प्रशासन के पास इस सवाल का क्या जवाब है कि आखिर बीएचयू एक्ट की धारा 4 में जो परन्तुक या अपवाद ‘धार्मिक शिक्षा’ अर्थात ‘religious instruction’ को लेकर लिखा गया है उसका तात्पर्य वास्तव में क्या है?
  • इस परन्तुक या अपवाद के आधार पर बीएचयू में धार्मिक शिक्षा किस संकाय द्वारा, किसे व किस रूप में दी जा रही है?
  • यह परन्तुक या अपवाद आज भी बीएचयू एक्ट का हिस्सा क्यों है?

छात्रों का कहना है, “आज सारा विश्वविद्यालय प्रशासन जो कुलपति राकेश भटनागर के डर से चुप है लेकिन वह दबी जुबान जानता है और मानता भी है कि इस परन्तुक या अपवाद के आधार पर ही बीएचयू का धार्मिक शिक्षा का मामला सभी मत-मजहब के लिए नहीं खुला है, इसी के कारण धर्मविज्ञान संकाय में विगत 100 साल से किसी गैरहिन्दू शिक्षक की नियुक्ति नहीं हो सकी थी। इस नियम को दोबारा पढ़ना और प्रशासन को पढ़ाना और समझाना आवश्यक हो गया है।”

BHU Act-1951 एवं सभी संशोधनों में सम्मिलित नियम के अनुसार:

SVDV के छात्रों का कहना है, “कुलपति प्रो. राकेश भटनागर जेएनयू से आए हैं और इन्हें अंग्रेजी भी बहुत अच्छी आती है तो क्या उन्हें मालूम है कि धारा चार धार्मिक शिक्षा के मामले में बीएचयू को विशेष अधिकार दे रहा है कि धार्मिक शिक्षा सभी मत-मजहब के लिए नहीं खुली है। इस अनुच्छेद के अनुसार, इस धारा की कोई भी बात पूर्वादेश से दी जा रही धार्मिक शिक्षा पर लागू नहीं होती है। पूर्वादेश यानी अध्यादेश अर्थात कुलपति प्रो. राकेश भटनागर इस अनुच्छेद की पंक्तियों में लिखे “Ordinances” शब्द की मनमानी व्याख्या कर रहे हैं कि यह तो संसद का अध्यादेश है, और संसद ने यूजीसी के द्वारा हमें नियुक्ति का अधिकार भी दिया है। कुलपति महोदय को बीएचयू एक्ट की धारा दो (2-परिभाषा) जिसमें विधिक शब्दों की परिभाषा दी गई है, इसमें ऑर्डिनेंस की परिभाषा भी वर्णित है जिसका तात्पर्य है कि विश्वविद्यालय के द्वारा लागू किया जाने वाला पूर्वादेश।”

अंग्रेजी में लिखा है:



छात्रों का यहाँ कहना है, “अब प्रश्न है कि विश्वविद्यालय का वह ऑर्डिनेंस कौन सा है? कब जारी किया गया है? किसने जारी किया था जिसके द्वारा बीएचयू एक्ट-1951 में लिखा गया है कि….”

धरनारत छात्रों का सवाल है, “बीएचयू प्रशासन को उस ऑर्डिनेंस को देश के सामने प्रस्तुत करना चाहिए जिसके जरिए बीएचयू में धार्मिक शिक्षा बीएचयू एक्ट-1951 में संशोधन के पूर्व से दी जा रही थी, इसीलिए संसद को संशोधन के समय लिखना पड़ा कि “religious instruction being given.” अर्थात वह धार्मिक शिक्षा अर्थात, दी जा रही धार्मिक शिक्षा रोकी नहीं जाएगी। बीएचयू एक्ट-1915 में हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी-1904 को उसकी सभी शक्ति, नियम एवं संपत्ति के साथ विलीन किया गया था। बीएचयू एक्ट में अब तक जितने भी संशोधन हुए हैं, सभी में सबसे पहले इस तथ्य का वर्णन आता है।”

इसे निम्नांकित रूप से समझ सकते हैं:

“इस प्रकार से बीएचयू एक्ट के प्रथम अध्याय में ही उपर्युक्त पंक्तियाँ सबसे ऊपर वर्णित हैं कि बीएचयू एक्ट में हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी का विलय उसकी संपूर्ण शक्तियों और संपत्ति के साथ हो गया है। यूनिवर्सिटी सोसायटी-1904 में बीएचयू की स्थापना के जो उद्देश्य निर्धारित किए गए थे, वह आज भी बीएचयू की उद्देशिका हैं।”

इसके अनुसार:

छात्रों ने आगे बताया, “बीएचयू की स्थापना के उपर्युक्त चार उद्देश्य आज भी यथावत हैं। इस सोसायटी के नियम क्रमांक-8 में लिखा है कि- संस्कृत महाविद्यालय का धर्मशास्त्र विभाग धर्मशास्त्र संकाय के नियंत्रण में रहेगा और इसका संचालन शास्त्रों द्वारा यथानिर्धारित हिन्दू धर्म के सिद्धांतों के अनुसार न्यासी परिषद द्वारा बनाए गए नियमों के अन्तर्गत होगा। नियम क्रमांक-9 के अनुसार, धर्मशास्त्र संकाय में प्रवेश, परीक्षा एवं उपाधि हेतु सभी नियम संकाय द्वारा स्वयं ही निर्धारित किया जाएगा। सोसायटी के नियम क्रमांक-11 में लिखा है कि धर्मशास्त्र संकाय को छोड़कर विश्वविद्यालय के समस्त महाविद्यालय, विद्यालय एवं संस्थान सभी मत-मजहबों एवं वर्गों के लोगों के लिए खुले रहेंगे।”

“काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में सनातन हिन्दू धर्म की धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाला संस्थान विशेष रूप से होना चाहिए, इसका वर्णन हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी-1904 के साथ-साथ बीएचयू एक्ट-1915 में भी भलीभाँति वर्णित है। बीएचयू एक्ट-1915 के अनुच्छेद चार में लिखा है कि- विनियमों के अधीन, यह विश्वविद्यालय सभी वर्ग, जाति और पंथ के व्यक्तियों के लिए खुला होगा किन्तु, केवल हिन्दू धर्म से संबंधित धार्मिक शिक्षा प्रदान करने और तत्सबंधी परीक्षा संचालित करने के लिए विशेष प्रावधान किया जाएगा।”

“बीएचयू के संशोधित एक्ट-1951 ने बीएचयू के मूल एक्ट-1915 के इसी प्रावधान को, जिसे 1917 में ही अमलीजामा पहनाते हुए फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी अर्थात धर्मविज्ञान संकाय के रूप में क्रियान्वित कर दिया गया था, के अन्तर्गत प्रदान की जा रही धार्मिक शिक्षा को सभी मत-पंथों के लिए खुला रखने वाले अनुदेश से अलग कर स्पष्टतया रेखांकित कर दिया था कि बीएचयू सभी मत-मजहब के लिए खुला रहेगा किन्तु यह बात धार्मिक शिक्षा पर लागू नहीं होगी। धार्मिक शिक्षा के प्रावधान को संसद द्वारा पारित बीएचयू एक्ट-1915 के अन्तर्गत बीएचयू की अनेक विधिक समितियों ने, तत्कालीन बीएचयू कोर्ट (सर्वोच्च नीति निर्धारिक समिति) और बीएचयू कार्यकारिणी और सीनेट ने अपनी बैठकों, संकल्पों के द्वारा स्पष्ट किया है।”

BHU एक्ट-1915 के अन्तर्गत पारित स्टेट्यूट-65 के अनुसार:

आंदोलनकारी छात्रों का कहना है कि उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट है कि बीएचयू की स्थापना के समय से ही धर्म की शिक्षा का विषय सनातन हिन्दू वैदिक, जैन-सिख और बौद्ध आदि के लिए विशेष रूप से निर्मित किया गया था। इसके लिए विशेष रूप से धर्मविज्ञान संकाय की स्थापना भी सबसे पहले संकाय के रूप में की गई। इस संकाय में अध्यापकों की नियुक्ति के विषय में भी समय-समय पर नियम-निर्देश किए गए।”

बीएचयू के पोर्टल पर संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय की स्थापना का जो उद्देश्य लिखा है उसमें वर्णित है:

“इसमें लिखा है कि संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय की स्थापना विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा विश्वविद्यालय स्थापना के मुख्य उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए की गई थी; प्राचीन भारतीय शास्त्रों के अध्ययन को संरक्षित एवं उन्नत करने के लिए। इस प्रकार यह संकाय अपनी प्रकृति में विलक्षण है। यहाँ शास्त्रीय ग्रंथों का अध्ययन-अध्यापन प्राचीन ज्ञान परंपरा की पद्धति के अनुसार,- वाचिक और लिखित परंपरा दोनों समेत, कड़ाई से परंपरा का पालन करते हुए किया जाता है।”

छात्रों का कहना है, “अब यहाँ प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि प्राचीन परंपरा और उससे जुड़े कर्मकांड, वाचिक एवं अन्य धार्मिक पद्धतियों का पालन क्या गैरहिन्दू भी उसी भाव-भावना से कर सकेगा जिस भाव-भावना से इस संकाय की स्थापना का उद्देश्य विश्वविद्यालय ने स्थान-स्थान पर घोषित कर रखा है।”

“किसी गैर-हिन्दू की शिक्षण कार्य में नियुक्ति किस कारण से प्रतिबंधित रखी गई थी, क्या विश्वविद्यालय के उद्देश्य और संकाय की स्थापना के उद्देश्य को पढ़ने के बाद इसमें कोई शंका शेष रह जाती है? इस सन्दर्भ में 1919 में उठे एक विवाद का सन्दर्भ देखना समीचीन है। 7 मार्च 1919 को धर्मविज्ञान संकाय द्वारा संकाय में अध्यापकों की नियुक्ति के सन्दर्भ में पारित प्रस्ताव में कहा गया था कि- केवल प्राचीन परंपरा से सदाचार और धार्मिक नियमों का पालन करने वाले आचार निष्ठ ब्राह्मण ही धर्म की शिक्षा देने के लिए संकाय में नियुक्त किए जा सकते हैं।”

“धर्म विज्ञान संकाय के उपर्युक्त प्रस्ताव के विरुद्ध डॉ. भगवान दास एवं स्वयं महामना मालवीय जी ने प्रश्न उठाया कि योग्य गैर ब्राह्मण हिन्दू भी अगर उपलब्ध होते हैं तो उन्हें धार्मिक शिक्षा से जोड़ा जाना चाहिए। इस प्रकार 14 दिसंबर 1921 को बीएचयू कोर्ट के द्वारा संकल्प पारित किया गया कि धर्मविज्ञान संकाय में अध्यापकों की नियुक्ति हिन्दू धर्म में से उदारतापूर्वक (आचारनिष्ठ ब्राह्मण के साथ आचारनिष्ठ गैर ब्राह्मण हिन्दू समुदाय में से भी) मानव धर्मशास्त्र के अनुसार, बिना किसी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाए की जाएगी।”

“इस प्रकार से धर्मविज्ञान संकाय में प्रवेश, नियुक्ति एवं अध्ययन की पाठ्य सामग्री हेतु विश्वविद्यालय ने ऑर्डिनेंस पारित किया जिसका उल्लेख आजतक सभी संशोधित बीएचयू एक्ट में सम्मिलित है। प्रश्न है कि उक्त ऑर्डिनेंस की पूरे सत्य स्वरूप में सभी के सामने रखने के बजाए बीएचयू के कुलपति राकेश भटनागर यूजीसी आदि के सर्कुलर का हवाला देकर देश को भ्रमित कर रहे हैं। जबकि सच्चाई यही है कि धर्मविज्ञान संकाय के मामले में संसद द्वारा पारित बीएचयू एक्ट के अनुच्छेद चार में उल्लिखित धार्मिक शिक्षा यानी religious instruction ही वास्तविक विधि है जिसके द्वारा गैर हिन्दू शिक्षक की धर्मविज्ञान संकाय में नियुक्ति प्रतिबंधित है क्योंकि अनुच्छेद चार के द्वारा धार्मिक शिक्षा का क्षेत्र सभी मत-मजहबों के लिए अधिकृत नहीं है।”

“स्पष्ट है कि यह विधिमान्य नियम परंपरा के रूप में चला आ रहा है कि संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के शिक्षकों की नियुक्ति में गैर-हिन्दू हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी एवं बीएचयू एक्ट-1915 के प्रावधानों के कारण नियमतः अवसर नहीं पा सकते। ये नियम आज भी अस्तित्व में हैं और बीएचयू के सभी संशोधित एक्ट में इनकी उपस्थिति का संकेत सीधे तौर पर अनुच्छेद चार में किया गया है। यह अवश्य है कि बीएचयू एक्ट के अन्तर्गत गैरहिन्दू अध्यापक संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय छोड़कर कला संकाय, आयुर्वेद संकाय, संगीत संकाय समेत अन्य दूसरे संकायों और महाविद्यालयों के संस्कृत से जुड़े विभाग में अध्ययन-अध्यापन कर सकते हैं।”

संस्कृत विद्या धर्म संकाय के बाहर डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध कर रहे धरनारत छात्रों ने BHU प्रशासन एवं कुलपति राकेश भटनागर से इन प्रमाणों के मद्देनजर कुछ और महत्वपूर्ण सवाल पूछे हैं, जिनका जवाब उन्हें प्रशासन से चाहिए।

SVDV के छात्रों का कुलपति से सवाल

  1. बीएचयू प्रशासन को यदि यह तथ्य अभी भी नहीं स्वीकार हैं तो उसे स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर बीएचयू एक्ट-1951 एवं सभी संशोधित अधिनियमों के अन्तर्गत उल्लिखित ‘धार्मिक शिक्षा’ का स्वरूप क्या है?
  2. एक्ट में उल्लिखित ‘धार्मिक शिक्षा’ का ‘ऑर्डिनेंस’ अथवा पूर्वादेश या नियम बीएचयू में कहाँ किस संकाय के तत्वावधान में क्रियान्वित किया जा रहा है?
  3. कौन क्रियान्वित कर रहा है?
  4. कहाँ और किस प्रकार से क्रियान्वित कर रहा है?
  5. किसे ‘धार्मिक शिक्षा’ बीएचयू में आज भी दी जा रही है?
  6. किसके द्वारा दी जा रही है?
  7. कब से दी जा रही है?
  8. नहीं दी जा रही है तो क्यों नहीं दी जा रही है?
  9. कुलपति और बीएचयू प्रशासन बताए कि बीएचयू की स्थापना के उद्देश्यों की प्रथम पंक्ति के प्रथम वाक्यांश में उल्लिखित हिन्दू शास्त्रों की उन्नति, हिन्दू विचार और संस्कृति के संरक्षण के उद्देश्य का परिपालन परिसर में किस रूप में और कहाँ पर किया जा रहा है?
  10. अगर संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय ‘धार्मिक शिक्षा’ के नियम के अन्तर्गत नहीं आता है तो बीएचयू का कौन सा संकाय या विभाग ‘धार्मिक शिक्षा’ के नियम के दायरे में आता है?
  11. अगर कोई भी संकाय या विभाग ‘धार्मिक शिक्षा’ के नियम के दायरे में नहीं आता है तो फिर धार्मिक शिक्षा दिए जाने का उल्लेख बीएचयू एक्ट में आज भी क्यों उल्लिखित है?

गौरतलब है कि इससे पहले डॉ. फिरोज खान की SVDV में नियुक्ति में गड़बड़ी और BHU प्रशासन और कुलपति राकेश भटनागर, साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष उमाकांत चतुर्वेदी द्वारा नियुक्ति में की गई लापरवाही सहित धाँधली तक जैसे कई आरोपों के विरोध में 7 से 21 नवंबर तक पहले भी कुलपति आवास के सामने छात्र धरने पर बैठे थे। छात्रों से धरना समाप्त करने के अनुरोध के साथ प्रशासन ने उनकी माँगों पर दस दिन के भीतर जवाब देने की लिखित सहमति दी थी।

30 नवंबर को दस दिन बीतने के बाद सोमवार (दिसंबर 2, 2019) को साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष ने जो अधूरा जवाब दिया था, उससे छात्र सहमत नहीं हुए, और विरोध में पुनः धरने पर बैठ गए। BHU प्रशासन के बिना किसी प्रमाण के आधेअधूरे जवाब से असंतुष्ट हैं और प्रशासन से कई काउंटर प्रश्न कर चुके हैं। SVDV संकाय में पठन-पाठन पहले से ही बंद है। साथ ही छात्रों ने 5 दिसंबर से होने वाली परीक्षा का बहिष्कार करने की भी चेतावनी दी है, जिसके मद्देनजर अभी परीक्षा की नई तिथि 10 दिसंबर कर दी गई है।

जब ऑपइंडिया ने छात्रों से इस नए परीक्षा की तिथि पर बात की तो छात्रों की तरफ से शशिकांत मिश्र ने बताया, “यदि BHU प्रशासन इस समस्या का उपरोक्त वर्णित प्रमाणों, BHU एक्ट, मालवीय जी के मूल्यों, संकाय के उद्देश्यों के अनरूप कोई समाधान नहीं निकालता है तो हम सभी छात्र इस परीक्षा की तिथि का भी बहिष्कार करने पर अडिग हैं। हमारा धरना इस बार किसी आश्वासन पर नहीं बल्कि इस समस्या के पूर्ण समाधान के साथ ख़त्म होगा।”

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2 साल में 629 पाकिस्तानी लड़कियों को खरीद कर ले गए चीनी, देह के धंधे पर पाक चुप

पाकिस्तान की महिलाओं को खरीद कर चीन के लोग अपने घर ले जा रहे हैं। पाकिस्तानी महिलाओं को बेचने का धंधा बड़े पैमाने पर हो रहा है। पाकिस्तान के अधिकतर इलाके गरीब हैं। वहॉं के लोग आर्थिक और सामाजिक तौर पर पिछड़े हैं। इसका फायदा उठाकर ह्यूमन ट्रैफिकिंग नेटवर्क ने जाल बिछा लिया है। ‘एसोसिएट प्रेस’ के आँकड़ों के अनुसार, 2018 से अब तक 629 पाकिस्तानी महिलाओं को बेचा जा चुका है। पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसियों को इसकी जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई नहीं की जा रही है।

पाकिस्तान के एक ख़ुफ़िया अधिकारी ने बताया कि चीन को ख़ुश रखने के चक्कर में पाकिस्तान सरकार देह व्यापार के इस धंधे पर कार्रवाई करने के लिए हरी झंडी नहीं दिखा रही है। इन देह व्यापारियों के ख़िलाफ़ अदालत में मामला दर्ज कराया गया था। कुल 31 चीनी नागरिकों के ख़िलाफ़ सुनवाई चल रही थी। अदालत ने सभी चीनी नागरिकों को बाइज्जत बरी कर दिया। पीड़ित महिलाओं ने बयान देने से इनकार कर दिया, क्योंकि या तो उन्हें प्रलोभन दिया गया था या फिर उन्हें डराया-धमकाया गया। इन महिलाओं को दुल्हन बना कर चीन ले जाया जाता है, लेकिन वहाँ जाकर इनका सामना क्रूर हकीकत से होता है।

2 पीड़ित महिलाओं ने पहचान न उजागर करने की शर्त पर ‘एसोसिएट प्रेस’ को बताया कि ह्यूमन ट्रैफिकिंग करने वालों के ख़िलाफ़ बयान देने पर उनका बहुत बुरा अंजाम होता, इसीलिए वो हिम्मत नहीं जुटा पाईं। एक ईसाई एक्टिविस्ट ने कई पाकिस्तानी महिलाओं को चीन के लोगों को बेचे जाने के ख़िलाफ़ अभियान चलाया। इस मामले की जाँच कर रहे कई ख़ुफ़िया अधिकारियों का तबादला कर दिया गया और पाकिस्तान की सरकार ने इसके पीछे कोई कारण भी नहीं बताया। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है। न सिर्फ़ ख़ुफ़िया अधिकारियों पर शिकंजा कसा गया है, बल्कि मीडिया को भी ह्यूमन ट्रैफिकिंग व इससे जुड़े लोगों के बारे में लिखने से मना कर दिया गया है।

पाकिस्तान के ही अधिकारी मानते हैं कि वहाँ ह्यूमन ट्रैफिकिंग का नेटवर्क लगातार फैलता जा रहा है और इस पर कोई एक्शन नहीं लिया जा रहा। इसके लिए झूठी शादी का सहारा लेकर ग़रीब परिवारों को झाँसा दिया जाता है। अधिकारियों व पुलिस पर दबाव बनाया जा रहा है कि वो ह्यूमन ट्रैफिकिंग से जुड़े अपराधों की जाँच न करें। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि वो दोनों देशों के नियमों का पालन करते हुए पाकिस्तान और चीन के बीच होने वाली शादियों का ‘हैप्पी फैमिली फॉर्मेशन’ के अंतर्गत समर्थन करता है। साथ ही मंत्रालय ने जोड़ा कि अवैध शादियों के ख़िलाफ़ चीन ने कड़ा रुख अपनाया हुआ है।

इससे पहले ख़बर आई थी कि देह-व्यापार के इस धंधे में सबसे ज्यादा पाकिस्तान की ईसाई लड़कियों को शिकार बनाया जा रहा है। ग़रीब ईसाई परिवार की महिलाओं को चीनी नागरिकों के हाथों बेच दिया जाता है और वो उन्हें अपने देश ले जाते हैं। चीनी नागरिक इन ईसाई महिलाओं के साथ शादी करते हैं और चीन ले जाकर उन्हें वेश्यावृत्ति में ढकेल देते हैं। ह्यूमन ट्रैफिकिंग के दलाल चीनी नागरिकों से तो 50 लाख रुपए तक वसूल लेते हैं लेकिन पाकिस्तान परिवारों को इसका मात्र 20-25% ही दिया जाता है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के पास 50 से भी अधिक ऐसी महिलाओं की सूची भेजी गई है, जिन्हें चीनियों के हाथों बेच डाला गया। पाकिस्तान को चीन से हर साल मदद के रूप में अरबों रुपए मिल रहे हैं। चीन ने अपने बेल्ट्स एन्ड रोड प्रोजेक्ट में भी पाकिस्तान को साझीदार बनाया हुआ है। वह पाकिस्तान के कई इलाक़ों में विकास कार्य कर रहा है। इन सबको देखते हुए पाकिस्तान अपनी महिलाओं की ख़रीद-बिक्री पर चुप रहना ही बेहतर समझ रहा है।

पाकिस्तान की डूबती नैया को चीन ने दिया 2.2 बिलियन डॉलर का सहारा

कॉन्स्टेबल रहमान खान ने 5 साथी जवानों के कत्ल के बाद की ख़ुदकुशी, विदेशी अख़बार ने चलाया भारत-विरोधी प्रोपेगेंडा

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में भारत-तिब्बत पुलिस फ़ोर्स (आईटीबीपी) के कॉन्स्टेबल रहमान खान की 5 (समाचार एजेंसी एएनआई के दावे के मुताबिक 6) साथी जवानों की हत्या के बाद आत्महत्या की खबर अपने आप में कम कष्टकारक नहीं थी। उसके ऊपर से वॉशिंगटन पोस्ट नामक अमेरिकी अख़बार ने अपनी हेडलाइन में ऐसे दिखाया कि यह आपसी झड़प में हुई हत्याएँ हैं।

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में तैनात आईटीबीपी की 45वीं बटालियन के कॉन्स्टेबल रहमान खान ने अपने साथी सुरक्षाकर्मियों पर फायरिंग कर दी, जिसके चलते 5 (या 6) जवानों की मौत हो गई और तीन अन्य घायल हो गए थे। घायलों को इलाज के लिए आनन-फानन में हेलीकॉप्टर से राजधानी रायपुर भेजा गया। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक सभी मृतक और घायल भी कॉन्स्टेबल रैंक के ही हैं।

घटना के बारे में एएनआई से बात करते हुए बस्तर के इंस्पेक्टर जनरल पी सुंदरराज ने बताया कि प्राथमिक जाँच में फायरिंग करने वाले कॉन्स्टेबल रहमान खान के मानसिक रूप से बीमार रोगी होने की बात सामने आती दिख रही है।

रक्षा क्षेत्र की खबरें कवर करने वाले पोर्टल इंडियन डिफेंस न्यूज़ ने स्थानीय पुलिस के हवाले से यह भी दावा किया है कि रहमान खान ने इस हमले में अपनी निजी बंदूक का इस्तेमाल किया था। घटना सुबह 9.30 बजे कडेनर कैम्प की बताई जा रही है। खबरों के मुताबिक बंगाल के रहने वाले रहमान ने 2009 में सुरक्षा बल में प्रवेश लिया था।

लेकिन इस खबर की रिपोर्टिंग वॉशिंगटन पोस्ट ने जिस तरीके से की है, वह अत्यंत घृणास्पद और साफ तौर पर भारत को बदनाम करने का एक प्रोपेगेंडा है। अपनी हेडलाइन को इस तरह से लिखा है कि इसे पढ़ने से ऐसा लगे मानो जवानों के दो गुटों में झड़प हो गई, वह हिंसक हो गई, दोनों ओर से फायरिंग हुई और 6 लोग मारे गए (यानी, भारतीय सुरक्षा बल बहुत ही गैर-अनुशासित हैं), जबकि सच्चाई इस हेडलाइन से कोसों दूर है।

पवार ने मोदी की तारीफ में पढ़े कसीदे, बेटी सुप्रिया सुले ने कहा- ये PM का बड़प्पन

राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (एनसीपी) प्रमुख शरद पवार ने बीते दिनों एक इंटरव्यू के दौरान दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें साथ मिलकर काम करने का ऑफर दिया था। पवार के मुताबिक महाराष्ट्र में मिलकर सरकार बनाने की सूरत में प्रधानमंत्री ने उनकी बेटी सुप्रिया सुले को केंद्रीय कैबिनेट में जगह देने की भी पेशकश की थी। बारामती से लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले ने अब इसके लिए प्रधानमंत्री का आभार जताया है।

मंगलवार (दिसंबर 3, 2019) को सुप्रिया सुले ने कहा, “ये प्रधानमंत्री जी का बड़प्पन है कि उन्होंने ऐसा सुझाव दिया। मैं उनकी आभारी हूँ उन्होंने कहा, लेकिन वो हो नहीं पाया।” उन्होंने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा, “मैं उस चर्चा (NCP अध्यक्ष शरद पवार और मोदी के बीच) में नहीं थी। मुझमें ऐसा भरोसा और विश्वास जताने के लिए मैं प्रधानमंत्री को अपने दिल की गहराइयों से शुक्रिया अदा करती हूँ। उन्होंने जो कुछ कहा, उससे मैं अभिभूत हूँ। लेकिन पवार ने स्पष्ट रूप से बेहद विनम्रतापूर्वक प्रधानमंत्री को बता दिया कि यह संभव नहीं है।”

वहीं पवार ने इंटरव्यू के दौरान राष्ट्रहित पर पीएम मोदी के साथ होने की बात कही। उन्होंने पीएम मोदी की तरफ इशारा करते हुए कहा, “हमारे उनके साथ कल भी रिश्ते अच्छे थे। आज भी हैं और आगे भी रहेंगे। जब तक वे देश के हित की बात करेंगे, भलाई की बात करेंगे, तो राजनीति में इसका विरोध करने की कोई आवश्यकता नहीं है। राजनीतिक मुद्दों पर जो असहमति रहती है वो रहेगी। इसमें कोई बदलाव नहीं आएगा। लेकिन जब बात राष्ट्रीय हित की होगी, तो मेरा सहयोग उनके साथ रहेगा। इसमें कोई दोराय नहीं है।”

गौरतलब है कि एनसीपी, कॉन्ग्रेस और शिवसेना में महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए चल रही बातचीत के बीच पिछले महीने पवार ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी। बाद में उनके भतीजे अजित ने पार्टी निर्देश से इतर जाते हुए बीजेपी से हाथ मिला लिया था। अजित पवार ने 23 नवंबर को महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। हालाँकि बाद में उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया और फिर पार्टी में वापस लौट आए।

इसके बाद महाराष्ट्र में शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी की सरकार बन गई। नई सरकार में अजित पवार की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर सुप्रिया ने कहा कि वह एनसीपी के वरिष्ठ नेता हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि अजित पवार बीजेपी में शामिल नहीं हुए थे। सुप्रिया ने कहा, “यह हमारी पार्टी और परिवार का आंतरिक मामला है। वह (अजित पवार) मेरे बड़े भाई और हमेशा एनसीपी के वरिष्ठ नेता बने रहेंगे।”

शरद पवार ने खोल दिए राज: कॉन्ग्रेस से चिढ़ा था अजित, फडणवीस से चल रही बात का पता था

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