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6 दिसंबर ‘शौर्य दिवस’ से शुरू हो जाएगा अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण: BJP सांसद ने किया दावा

भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने घोषणा की है कि राम मंदिर का निर्माण जन्मभूमि स्थल पर 6 दिसंबर से शुरू हो जाएगा। उन्नाव के दो बार के सांसद साक्षी महाराज सुप्रीम कोर्ट में जन्मभूमि विवाद की सुनवाई पूरी होने के मौके पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे। मालूम हो कि सुनवाई पूरी कर अदालत ने फैसला सुरक्षित कर लिया है। सीजेआई ने कहा है कि सुनवाई समाप्त होने के बाद अदालत को फ़ैसला लिखने के लिए कुछ समय चाहिए होगा।

6 दिसंबर है बाबरी दिवस

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना अभी बाकी है (फैसला सीजेआई रंजन गोगोई के 18 नवम्बर को रिटायर होने के एक-दो दिन पहले आने की उम्मीद है) लेकिन साक्षी महाराज की घोषणा से यह साफ़ है कि हिंदूवादी धड़ा मामले में अपनी जीत तय मानकर चल रहा है। इसीलिए साक्षी महाराज ने मंदिर निर्माण प्रारंभ करने की तारीख के तौर पर 6 दिसंबर की घोषणा की है। 1992 में इसी दिन जन्मभूमि पर खड़ी बाबरी मस्जिद को वहाँ जुटी कारसेवकों की भीड़ ने ढहा दिया था। जहाँ भाजपा-संघ परिवार-हिंदूवादी इसे ‘शौर्य दिवस’ के रूप में मनाते हैं, वहीं लिबरल लॉबी और समुदाय विशेष वाले इसे ‘काला दिवस’ कहते हैं।

जलेंगे 5.5 लाख दीपक फ़ैसले के पहले ही

राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट 23 दिनों के भीतर अपना फ़ैसला सुना देगा। सीजेआई रंजन गोगोई 18 नवम्बर को रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में पहले से ही कयास लगाए जा रहे थे कि वह रिटायरमेंट से पहले इस बहुप्रतीक्षित फ़ैसले की सुनवाई पूरी कर देंगे और फ़ैसला सुना देंगे। अयोध्या में भी हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है और यूपी में पुलिस एवं प्रशासन के सभी अधिकारियों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गई हैं। अयोध्या में भव्य दीपोत्सव की तैयारी में लगी योगी आदित्यनाथ सरकार दीपोत्सव के दौरान 5.5 लाख दीपक जलाने की तैयारी में है, जो गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में शामिल होगा।

अधिकारियों की छुट्टियाँ रद्द, चाक-चौबंद तैयारी

अयोध्या में भव्य दीपोत्सव की तैयारी में जुटी योगी आदित्यनाथ सरकार ने सभी अधिकारियों की छुट्टियाँ 30 नवंबर तक रद्द कर दी है। पुलिस को किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए तैयार रहने का निर्देश देते हुए उन्हें चौकन्ना रहने को कहा गया है। सरकार ने कहा है कि केवल किसी ‘अत्यधिक अपरिहार्य’ की ही स्थिति में अधिकारियों को छुट्टी दी जाएगी।

कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद केसी मूर्ति ने उप राष्ट्रपति को सौंपा इस्तीफा, BJP में शामिल होने के कयास

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस से राज्यसभा सांसद केसी राममूर्ति ने बुधवार (अक्टूबर 16, 2019) को उपराष्ट्रपति सचिवालय में अपनी सदस्यता से इस्तीफा दिया। उनका इस्तीफा उप राष्ट्रपति एवं राज्यसभा अध्यक्ष वैंकया नायडू ने स्वीकार कर लिया।

उल्लेखनीय है कि कॉन्ग्रेस सांसद ने अपनी सदस्यता से ये इस्तीफा उस समय दिया है, जब कयास लगाए जा रहे थे कि वो भाजपा में शामिल होने वाले हैं। कहा जा रहा है कि लंबे समय से कॉन्ग्रेस बैठकों और आयोजनों से नदारद चल रहे थे। इस बीच अपना इस्तीफा देने से पहले वो भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं से भी मिल रहे थे। बता दें के सी राममूर्ति से पहले कॉन्ग्रेस नेता भुवनेश्वर कालिता और संजय सिंह भी उच्च सदन से इस्तीफा दे चुके हैं।

के सी राममूर्ति के बारे में बता दें कि वे कर्नाटक में और उसके आस-पास के कई शैक्षणिक संस्थानों के मालिक हैं। उन्हें साल 2016 में राज्य इकाई के विरोध के बावजूद भी पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय सचिव ने दिग्विजय सिंह राज्यसभा का सदस्य बनाया था। लेकिन अब वह इस सदस्यता से इस्तीफा दे चुके हैं। इसके अलावा के सी राममूर्ति पूर्व आईपीएस ऑफिसर हैं। उन्हें इस साल सितंबर में कर्मियों, सार्वजनिक शिकायतों, कानून और न्याय पर संसदीय समिति का सदस्य नियुक्त किया गया था।

हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, नाम न बताने की शर्त पर भाजपा कर्नाटक के नेताओं ने बताया है कि इसकी कम संभावना है कि पार्टी अभी से राममूर्ति को उच्च सदन का सदस्य बनाए।

‘अंग्रेज तो इसे राम का जन्मस्थान मान चुके थे, रिकॉर्ड में घपला कर जोड़ा बाबरी मस्जिद’

इतिहासविद् और लेखिका मीनाक्षी जैन ने अयोध्या विवाद पर दो किताबें Rama and Ayodhya (2013) और The Battle for Rama: Case of the Temple at Ayodhya (2017) लिखीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज में इतिहास की एसोसिएट प्रोफ़ेसर और भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद की सदस्या डॉ. जैन ने ऑपइंडिया के संपादक अजीत भारती से बातचीत में इस विवाद को लेकर कई ऐतिहासिक पहलुओं पर प्रकाश डाला। इस मामले में डीएन झा, रोमिला थापर जैसे वामपंथी इतिहासकारों की भूमिका, सरकारी दस्तावेज़ों से छेड़छाड़ जैसे मुद्दों पर विस्तार से बात की। साक्षात्कार का अंश;

पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) पर मुस्लिम पक्ष के वकीलों से लेकर वामपंथी इतिहासकारों द्वारा उठाए गए सवालों को जैन ने सिरे से ख़ारिज कर दिया। उन्होंने साफ़ किया कि कमल का फ़ूल, वराहमूर्ति, संस्कृत में दीवारों पर शिलालेख आदि से साफ़ तौर पर उस स्थल के हिन्दू होने को प्रमाणित करते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि न तो ASI के खुदाई और सर्वेक्षण कार्य में कोई कमी थी, न ही उनकी रिपोर्ट में। खुदाई इलाहबाद उच्च न्यायालय के आदेशानुसार हिन्दू और मुस्लिम पक्षों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में की गई थी। खुदाई में मिली एक-एक चीज़ का हिसाब उसी दिन रजिस्टर में लिखा गया, और उस दिन के अंत में दोनों पार्टियों ने उस पर हस्ताक्षर किए हैं।

जैन के मुताबिक खुदाई में मिले साक्ष्यों से यह साफ़ है कि न केवल मस्जिद मंदिर तोड़कर बनी, बल्कि यह स्थल मस्जिद के सैकड़ों, हज़ारों साल पहले से धार्मिक स्थल यानी मंदिर रहा है। उस स्थान पर लगातार किसी-न-किसी मंदिर के उपस्थित होने के सबूत ASI की खुदाई ने दिए हैं।

उन्होंने बताया कि वामपंथी इतिहासकार इरफ़ान हबीब की इस विवाद को बढ़ने में अहम भूमिका रही। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उस समय कार्यरत हबीब ने खटराग अलापना शुरू किया कि यह शिलालेख एक ‘निजी संग्रह’ का हिस्सा है, जिसे बाबरी ध्वंस के समय गुपचुप वहाँ ‘तस्करी कर’ लाया गया और मलबे के बीच रख दिया गया। मीनाक्षी जैन बतातीं हैं कि जब हबीब से सवाल पूछा गया कि वह शिलालेख आखिर किस व्यक्ति के ‘निजी संग्रह’ का हिस्सा है, तो उन्होंने रंग बदल कर इसे ‘त्रेता के ठाकुर’ नामक अयोध्या में ही स्थित एक दूसरे मंदिर से मिला शिलालेख बता दिया। (‘त्रेता के ठाकुर’ मंदिर हालाँकि अयोध्या में ही स्थित है,लेकिन उसका जन्मभूमि से कोई सरोकार नहीं है। यह औरंगज़ेब द्वारा तोड़ा गया एक दूसरा मंदिर है/) उनके मुताबिक लखनऊ संग्रहालय से ‘त्रेता के ठाकुर’ शिलालेख को जन्मभूमि स्थल पर लाया गया और मलबे में ‘विष्णु हरि’ शिलालेख के नाम से ‘प्लांट’ कर दिया गया।

लेकिन उनका यह प्रोपेगंडा भी उनके दुर्भाग्य और हिन्दुओं के अच्छे कर्मों से तब ध्वस्त हो गया, जब किशोर कुणाल नामक एक संस्कृत विद्वान और रिटायर्ड आईपीएस ने लखनऊ के संग्रहालय में से वह शिलालेख खोज निकाला और उसकी तस्वीर प्रकाशित कर दी। ‘त्रेता के ठाकुर’ शिलालेख बेहद टूटा-फूटा और क्षतिग्रस्त है, जिसमें से बमुश्किल 2-3 शब्द पढ़े जा सकते हैं। वहीं ‘विष्णु हरि’ शिलालेख न केवल स्पष्ट और ठीक-ठाक हालत में है, बल्कि उसका अधिकाँश भाग पूरी तरह सुरक्षित और पठनीय भी है।

मीनाक्षी जैन कुछ चौंकाने वाले खुलासे भी करतीं हैं। वह बतातीं हैं कि 1857 के विद्रोह के बाद बने ब्रिटिश राजस्व रिकॉर्डों में विवादित स्थल को केवल ‘जन्मभूमि’ के नाम से दर्ज किया गया था, जो बाद में (अदालत में रिकॉर्ड मँगाए जाने पर?) बदला गया। जहाँ-जहाँ पुराने रिकॉर्ड में केवल जन्मभूमि का उल्लेख था, वहाँ “*” लगाकर ऊपर की ओर “और बाबरी मस्जिद” लिखा गया, ताकि यह दिखाया जा सके कि दूसरे मजहब का भी उस भूभाग पर दावा उतना ही पुराना रहा है, जितने समय पहले से हिंदू इसे मंदिर स्थल बताते हैं। उन्होंने बताया कि न केवल वामपंथी इतिहासकारों ने ही मुस्लिमों को झूठा “तुम ये मुकदमा जीत सकते हो” का दिलासा देकर सुलझते-सुलझते मामले को दोबारा उलझा दिया, बल्कि उन्होंने अदालत को भी अपनी ‘राय’ को तथ्य बताकर बरगलाने की कोशिश की। हाई कोर्ट के पास समय की कमी नहीं थी, क्योंकि उस समय मामला ‘गर्म’ नहीं था- इसलिए उच्च न्यायालय ने उन्हें आराम से सुनकर ख़ारिज कर दिया और वहीं सुप्रीम कोर्ट ने समय की कमी के चलते उन्हें दो टूक किनारे कर दिया।

इसके अलावा डॉ. जैन ने 1947 के बाद के भारतीय इतिहास लेखन के “Big Four” माने जाने वाले रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब, आरएस शर्मा और डीएन झा के प्रपंच की भी पोल-पट्टी खोली। उन्होंने बताया कि कैसे ये चारों खुद अदालत में अपने झूठ की लानत-मलालमत से बचने के लिए अपने छात्रों को भेजते रहे, और खुद ‘निष्पक्षता’ का चोला ओढ़कर अख़बारों के कॉलम से लेकर किताबें तक लिख-लिख कर बिना पाँव के झूठ की पालकी ढोते रहे।

एक ट्विटर यूज़र के सवाल के जवाब में डॉ. जैन ने यह भी बताया कि वह अयोध्या की ही तरह मथुरा और काशी पर भी वह अध्ययन कर रहीं हैं। इन मामलों पर भी वे किताब लिखेंगी। इसके अलावा एक दूसरे सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि हालाँकि तथाकथित ‘दक्षिणपंथ’ ने राजनीतिक लड़ाई जीत ली है, लेकिन भाजपा की सरकार में भी अकादमिक जगत जस-का-तस है। आज भी बौद्धिक वर्ग पर कब्ज़ा वामपंथियों का है, और दक्षिणपंथी या हिंदूवादी होना तो दूर, उनसे भिन्न, गैर-वामपंथी मत वाला तक होना आज भी अकादमिक जगत में मुश्किल है।

ईरान के बाद अब वेनेजुएला पर अमेरिकी प्रतिबंध, निर्मला सीतारमण ने कहा- नहीं कुर्बान कर सकते भारतीय हित

रॉयटर्स को दिए गए एक हालिया साक्षात्कार में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ़ कर दिया कि भारत के आर्थिक हितों को अमेरिकी प्रतिबंधों के लिए कुर्बान नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि वेनेज़ुएला और रूस जैसे देशों पर लगाए गए वैश्विक प्रतिबंधों का भारत पालन करना चाहता है, लेकिन उसे अपने रणनीतिक हितों और शक्ति को भी बनाए रखने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय सरकार ने अमेरिका को अपने निर्णय से अवगत करा दिया है।

अमेरिका को ताकतवर सहयोगी चाहिए या कमज़ोर?

वित्त मंत्री ने मंगलवार को समाचार एजेंसी से कहा, “हम अमेरिका के साथ अपने रिश्तों की कदर करते हैं, लेकिन हमें उतनी ही आज़ादी एक सशक्त अर्थव्यवस्था बनने की भी होनी चाहिए।” गौरतलब है कि वेनेज़ुएला के कच्चे तेल व्यापार की कमर तोड़ने के लिए अमेरिका ने जनवरी में उस पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे। इससे उसके कुछ ग्राहक देश तो ठिठके, लेकिन प्रभावी विकल्प के अभाव में रिलायंस इंडस्ट्रीज़ 4 महीने तक रूसी कंपनी रोसनेफ्ट से खरीदारी करने के बाद फिर से वेनेज़ुएला का रुख करने की तैयारी में है।

“वो मुद्दे विशेष जो भारत के रणनीतिक हितों के लिए महत्वपूर्ण हैं, उनको लेकर के हमने अमेरिका को यह समझाया है कि भारत अमेरिका का रणनीतिक साझेदार है, और आप अपने रणनीतिक सहयोगी को शक्तिशाली चाहेंगे, न कि कमज़ोर।”

ईरान पर प्रतिबंध पहले ही सिरदर्द

भारत पहले ही अमेरिकी प्रतिबंधों की आर्थिक कीमत चुका रहा है। गिरती अर्थव्यवस्था के बीच पिछले एक साल से ईरान से सस्ता मिल रहा क्रूड भी भारत ने खरीदना कम कर दिया है। पहले ईरान भारत को तीसरा सबसे बड़ा तेल निर्यातक था, अब वह पहले दस से भी बाहर है। तिस पर से सऊदी अरब के अरामको तेल संयंत्रों पर हुए हमलों के बाद अचानक से आई दामों में तेज़ी ने भारत के लिए और परेशानी बढ़ा दी थी। ऐसे में अब वेनेज़ुएला प्रतिबंध को और झेलना भारत के लिए मुश्किल लग रहा है।

अयोध्या विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने 40 दिन सुनी दलीलें, 23 दिन के भीतर राम मंदिर पर आ जाएगा फैसला

सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर मामले की सुनवाई पूरी हो गई है। 6 अगस्त से शुरू हुई नियमित सुनवाई बुधवार (अक्टूबर 16, 2019) तक चली। कुल मिला कर देखें तो लगभग 2 महीने में 40 दिन तक इस मामले की नियमित सुनवाई चली। दशकों से सुप्रीम कोर्ट में लंबित राम मंदिर मसले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के लिए अब आपको बस 23 दिन और इंतजार करना पड़ेगा। हिन्दू महासभा के वकील विकास सिंह ने जानकारी दी है कि सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर मामले में फ़ैसला सुरक्षित रख लिया है और 23 दिनों के भीतर निर्णय सुना दिया जाएगा।

राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट 23 दिनों के भीतर अपना फ़ैसला सुना देगा। सीजेआई रंजन गोगोई 18 नवम्बर को रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में पहले से ही कयास लगाए जा रहे थे कि वह रिटायरमेंट से पहले इस बहुप्रतीक्षित फ़ैसले की सुनवाई पूरी कर देंगे और फ़ैसला सुना देंगे। अयोध्या में भी हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है और यूपी में पुलिस एवं प्रशासन के सभी अधिकारियों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गई हैं। भव्य दीपोत्सव की तयारी में लगी योगी आदित्यनाथ सरकार दीपोत्सव के दौरान 5.5 लाख दीपक जलाने की तैयारी में है, जो गिनीज बुक वर्ल्ड रिकार्ड्स में शामिल होगा।

अयोध्या मामले में नियमित सुनवाई की बात करें तो सभी पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें पेश की और इस दौरान कई बार नोंक-झोंक भी देखने को मिली। जहाँ सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कोर्ट से शिकायत करते हुए कहा कि केवल उनसे ही सवाल पूछे जाते हैं। मुस्लिम पक्ष के वकील वराह की मूर्ति से लेकर पुरातत्व विभाग को ग़लत बताने तक, कई बार फँसे। हिन्दू पक्ष की ओर से सीएस वैद्यनाथन, रंजीत कुमार और सुशील जैन ने दलीलें पेश की। उसके बाद धवन ने अपनी जिरह पूरी की। अयोध्या मामले की सुनवाई 40 दिन चली है जो न्यायिक इतिहास में दूसरी सबसे लंबी सुनवाई है।

अयोध्या मामले में ताज़ा अपडेट्स की बात करें तो योगी सरकार भी एक्शन में आ गई है और 30 नवम्बर तक सभी अधिकारियों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गई हैं। तेजी से बदले घटनाक्रम में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने विवादित जमीन पर अपना दावा छोड़ दिया है। सुन्नी वक्फ बोर्ड इस संबंध में शीर्ष अदालत में हलफनामा दायर कर सकती है। कहा गया था कि बोर्ड की साधु-संतों के साथ बैठक भी हुई। विवादित जमीन पर मालिकाना हक़ का दावा छोड़ने के एवज में बोर्ड ने 3 विचित्र माँगें रखते हुए कहा है कि अयोध्या में 22 मस्जिदों के रख-रखाव की जिम्मेदारी सरकार उठाए।


NDTV और Scroll ने बाबरी मस्जिद के पैरोकार राजीव धवन की करतूत छिपाने के लिए हेडलाइंस में किया खेल

सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर मामले की अंतिम दिन की सुनवाई के दौरान बुधवार (अक्टूबर 16, 2019) को राजीव धवन ने हिन्दू महासभा द्वारा पेश किए गए कागज़ात को फाड़ डाला। सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने बौखलाहट में एक-एक कर कागज़ात के पन्नों व नक़्शे के भी चिथड़े उड़ा दिए। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने उन्हें फटकारते हुए कहा कि अगर ऐसी ही स्थिति बनी रही तो सभी जज सुनवाई छोड़ कर चले जाएँगे। उन्होंने धवन से साफ़-साफ़ कहा कि चीखना-चिल्लाना व्यर्थ है। राजीव धवन इससे पहले कई बार ‘लोकतंत्र में बोलने की आज़ादी’ को लेकर मोदी सरकार को घेर चुके हैं।

धवन इस मामले में सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड की तरफ से बाबरी मस्जिद की पैरवी कर रहे हैं। शायद यही कारण है कि एनडीटीवी ने सोशल मीडिया पर अपनी ख़बर में राजीव धवन का नाम लेने से परहेज किया। अगर हिन्दू पक्ष के किसी वकील ने ऐसा या फिर इस तरह का कोई भी व्यवहार किया होता तो उनकी ख़बरें शायद कुछ ज्यादा ही सुर्खियाँ बनतीं। देखिए एनडीटीवी ने किस तरह इस ख़बर से जुड़े 2 ट्वीट्स किए, लेकिन राजीव धवन के नाम की जगह ‘वकील’ और सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड की जगह ‘याचिकाकर्ता’ शब्द का प्रयोग कर उनकी पहचान छिपाई।

हालाँकि, ख़बर के भीतर राजीव धवन का नाम था और घटना का जिक्र भी था लेकिन ट्विटर पर दोनों ट्वीट में ऐसी बातें लिखी गईं, जिसे देख कर न तो याचिकाकर्ता की पहचान उजागर हो और न ही वकील की। इसी तरह स्क्रॉल ने भी अपनी ख़बर की हेडलाइन और सोशल मीडिया पर शेयर किया गया टेक्स्ट ऐसा रखा, जिससे बाबरी मस्जिद के पैरोकार राजीव धवन की पहचान उजागर न हो।

ऐसा नहीं है कि स्क्रॉल राजीव धवन का नाम हेडलाइंस में या सोशल मीडिया टेक्स्ट्स में नहीं डालता है। उसने इसी ट्विटर थ्रेड में एक अन्य ट्वीट में राजीव धवन के बयान को उनके नाम और पहचान के साथ छापा। लेकिन, जब उन्होंने अदालत में ऐसा व्यवहार किया, तब उनका नाम हैडलाइन या सोशल एमडीए टेक्स्ट में छिपाया गया। हालाँकि, एक घंटे बाद जब ये ख़बर वायरल हो गई, तब स्क्रॉल ने उनके नाम के साथ इस ख़बर को प्रकाशित किया।

इसी तरह ‘आउटलुक’ ने भी सोशल मीडिया पर शेयर की गई ख़बर या उसके साथ वाले टेक्स्ट में कहीं भी राजीव धवन, सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड या फिर बाबरी पैरोकार का जिक्र नहीं किया और सीधा लिखा कि ‘वकील’ द्वारा कागज़ात फाड़ने के कारण सीजेआई ने नाराज़ होकर चले जाने की बात कही।

इसी तरह ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने भी यही कलाकारी की। धवन ने जिस नक़्शे को फाड़ा वह किशोर कुणाल की पुस्तक ‘अयोध्या रीविजिटेड’ में प्रकाशित है। बिहार धार्मिक न्यास बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष कुणाल ने कहा कि धवन ने नक्शा इसीलिए फाड़ दिया क्योंकि उन्हें पता था कि कोर्ट के सामने इस नक़्शे के आते ही इस केस में कोई दम नहीं रह जाएगा।

अयोध्या मामले में ताज़ा अपडेट्स की बात करें तो योगी सरकार भी एक्शन में आ गई है और 30 नवम्बर तक सभी अधिकारियों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गई हैं। तेजी से बदले घटनाक्रम में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने विवादित जमीन पर अपना दावा छोड़ दिया है। सुन्नी वक्फ बोर्ड इस संबंध में शीर्ष अदालत में हलफनामा दायर कर सकती है। कहा गया था कि बोर्ड की साधु-संतों के साथ बैठक भी हुई। राम मंदिर की जमीन पर मालिकाना हक़ वाला दावा छोड़ने के एवज में बोर्ड ने 3 विचित्र माँगें रखते हुए कहा है कि अयोध्या में 22 मस्जिदों के रख-रखाव की जिम्मेदारी सरकार उठाए।

ईसाईयों के ‘मुक्ति’ कार्यक्रम को विहिप की शिकायत पर पुलिस ने किया रद्द

बेंगलुरु में होने वाले ईसाइयों के एक छ: दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षण पर विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा आपात्ति ज़ाहिर करते हुए शिकायत करने के बाद बंगलुरु पुलिस ने तत्काल प्रभाव से एक्शन लेते हुए रोक लगा दी। इस कार्यक्रम में लोगों को ‘मुक्ति’ का कार्यक्रम बताकर उसमें झाड़-फूँक जैसी चीज़ों का प्रसार करने का उद्देश्य था जिस पर विहिप के गिरीश भारद्वाज ने पुलिस में इसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई।

बेंगलुरु की क्रिस्चियन कोवेनेंट कम्युनिटी द्वारा आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम को 13 अक्टूबर से 19 अक्टूबर तक होना था। बताया जा रहा है की इसमें माल्टा के एक जादू-टोना के विश्व-विख्यात पुरोधा को मुख्य भाषण देना था वहीं इसमें भाग लेने के लिए दुबई, मलेशिया,रोम और सिंगापुर से आने की उम्मीद थी।

बता दें कि गिरीश भारद्वाज ने बंगलुरु पुलिस से अपनी शिकायत में यह कहा था कि यह कार्यक्रम न सिर्फ भारतीय वीसा नियमों का उल्लंघन है बल्कि कर्नाटक के अन्धविश्वास निर्मूलन कानून के भी खिलाफ है। वीसा नियमों के मुताबिक वीसा लेकर भारत आने वालों के लिए उपदेश देना या प्रचार करना प्रतिबंधित है, नियमों के खिलाफ है और इसीलिए उपदेशकों को भारत का वीसा नहीं दिया जाता जो हिंदुस्तान में किसी उपदेश या प्रचार के उद्देश्य से आना चाहते हैं।

बता दें कि शिकायतकर्ता गिरीश भारद्वाज ने ट्विटर पर अपने अकाउंट से इस मामले की जानकारी देते हुए भी इस बारे में लिखा साथ ही उन्होंने उस तस्वीर को भी शेयर किया जिसमें इस बात की पुष्टि होती है कि यह कार्यक्रम अब नहीं कराया जाएगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 2017 में कर्नाटक सरकार ने अन्धविश्वास के निर्मूलन के लिए ‘एंटी सुपरस्टिशन बिल 2017’ को केबिनेट की मंजूरी मिल गई थी। इसके पीछे का कारण न सिर्फ काले जादू की आड़ में चलने वाले गैर-कानूनी कामों पर रोक लगाना था बल्कि मानव गरिमा को आहत करने वाली ऐसी किसी भी रीतियों को कानूनी दायरे में लाना भी एक अहम कारण था। समाज में लंबे वक्त से पाखण्ड और अंधविश्वास ने अपनी पैठ बनाई हुई थी जिसके बाद इस तरह के कानून के बारे में विचार किया गया।

शिवसेना सांसद पर भरी सभा में चाकू से हमला, 13 साल पहले पिता को गोलियों से भून डाला था

महाराष्ट्र के उस्मानाबाद में बुधवार (अक्टूबर 16, 2019) को चुनावी रैली को संबोधित करने पहुँचे शिवसेना सांसद ओम राजे निंबालकर पर भीड़ से निकलकर किसी ने चाकू से हमला कर दिया। इस घटना में सांसद गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती करवाया गया। बता दें 13 वर्ष पहले ऐसे ही उनके पिता पर जानलेवा हमला भी हुआ था, जिसमें उनकी मौत हो गई थी। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के लिए 21 अक्टूबर को वोट डाले जाएँगे।

ओम राजे के साथ ये घटना पडौली नायगाँव में चुनावी रैली के दौरान कलंब तालुका ग्राम में घटी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अभिवादन करने के लिए एक समूह शिवसेना सांसद के करीब पहुँचा। इसी दौरान किसी ने उन पर चाकू से हमला कर दिया। चाकू उनके हाथ में घुस गया। भीड़ का फायदा उठाकर हमलावर मौक़े से फरार हो गया। पुलिस उसकी तलाश कर रही है।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक पुलिस अधिकारी के हवाले से बताया है, “अभिवादन के वक़्त हमलावर ने सांसद पर चाकू से हमला किया और तुरंत भाग गया। निंबालकर को हाथ में इससे गहरी चोट आई।” उल्लेखनीय है कि सांसद ओम राजे के पिता पवन राजे निंबालकर कॉन्ग्रेस के नेता थे। साल 2006 में 13 जून को मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे के पास उन्हें गोली मार दी गई थी। इस मामले में लोकसभा के पूर्व सांसद पद्मसिंह पाटिल आरोपित हैं।

राम मंदिर पर एक्शन में योगी सरकार: अयोध्या में हाई अलर्ट, अधिकारियों की छुट्टियाँ रद्द

राम मंदिर मामले में उत्तर प्रदेश सरकार सारी तैयारियाँ कर के रखना चाहती है ताकि क़ानून-व्यवस्था पर कुछ भी आँच नहीं आए। अयोध्या में भव्य दीपोत्सव की तैयारी में जुटी योगी आदित्यनाथ सरकार ने सभी अधिकारियों की छुट्टियाँ 30 नवंबर तक रद्द कर दी है। अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की रोजाना सुनवाई बुधवार (अक्टूबर 16, 2019) को शाम 5 बजे समाप्त होने की उम्मीद है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई 18 नवंबर को रिटायर होने वाले हैं। इससे पहले फैसला आने की उम्मीद है। सीजेआई ने कहा है कि सुनवाई समाप्त होने के बाद अदालत को फ़ैसला लिखने के लिए कुछ समय चाहिए होगा।

दीपावली के भव्य त्योहार और अयोध्या मामले में फ़ैसले की घड़ी करीब आने के साथ ही यूपी सरकार सजग हो गई है। सभी अधिकारियों को अपने मुख्यालय में ही रहने के निर्देश दिए गए हैं। पुलिस को किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए तैयार रहने का निर्देश देते हुए उन्हें चौकन्ना रहने को कहा गया है। पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों की छुट्टियाँ रद्द की गई हैं। हालाँकि, सरकार ने कहा है कि अगर कोई ‘अत्यधिक अपरिहार्य’ कारण आ खड़ा होता है तो उसी स्थिति में अधिकारियों को छुट्टी दी जाएगी।

अधिकारियों को भेजे गए पत्र में इस आदेश का कड़ाई से पालन करने की हिदायत दी गई है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव आरके तिवारी ने बताया था कि दीपोत्सव के दौरान साढ़े 5 लाख दीपक जलाए जाएँगे। इससे कुम्हारों के चाक जगमग हो उठे हैं और उन्होंने योगी सरकार को धन्यवाद भी दिया है। उन्हें रोजगार के नए अवसर मिले हैं। यूपी सरकार अयोध्या को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने और इसे विश्व पटल पर पहचान दिलाने की बातें भी कह रही है। ख़ुद मुख्यमंत्री ने कहा है कि इस सम्बन्ध में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।

अयोध्या मामले में ताज़ा घटनाक्रम की बात करें तो सुन्नी वक्फ बोर्ड ने विवादित जमीन पर अपना दावा छोड़ दिया है। सुन्नी वक्फ बोर्ड इस संबंध में शीर्ष अदालत में हलफनामा दायर कर सकती है। इसके लिए सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने विचित्र शर्तें रखते हुए माँग की है कि अयोध्या में 22 मस्जिदों के रख-रखाव की जिम्मेदारी सरकार उठाए।

यूपी सरकार ने पत्र जारी कर दिया अहम आदेश

सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई के दौरान सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के 72 वर्षीय वकील राजीव धवन ने हिन्दू महासभा के कुछ कागज़ात फाड़ डाले। हिन्दू महासभा ने उन्हें कुछ कागज़ात और नक़्शे दिए थे। अदालत में ही धवन ने उन्हें एक-एक कर फाड़ना शुरू कर दिया। इसे लेकर सीजेआई गोगोई ने उन्हें फटकार भी लगाई।

फ़ैसले के मद्देनजर प्रशासन पहले से हाई अलर्ट पर है। अयोध्या में धारा 13 अक्टूबर को ही धारा 144 लागू कर दी गई थी। 10 दिसंबर तक धारा-144 लागू रहेगी। भारी संख्या में सुरक्षाबल की तैनाती का फ़ैसला भी लिया गया है।

हैरी पॉटर फ़िल्म के Blood Pact जैसा है लूण-लोटा, चुनाव में इस कसम के डर से नहीं खिसकते वोट

हैरी पॉटर फ़िल्म श्रृंखला में Blood Pact (अटूट कसम) जैसी घटना देखने को मिली थी, जिसमें दो लोग एक दूसरे से खून की शपथ से बंधकर किए गए वायदे को निभाने की कसम खाते थे। इसी से मिलता-जुलता एक उदाहरण उत्तराखंड के पंचायत चुनावों में भी नजर आता है।

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पंचायती चुनावों में पहाड़ी लोगों की आस्था और विश्वास का प्रभाव देखने को मिलता है। जनजातीय इलाके होने के कारण यहाँ के लोग अभी भी कुछ पौराणिक प्रथाओं से जुड़े हुए हैं, जिनमें से “लूण (नमक) लोटा” भी एक है। ग्राम्य देवताओं का भय दिखाकर और कसमें लेकर मतदाताओ को अपने समर्थन में करने की कुछ प्रथाओं में से ही एक है लूण-लोटा!

इर बार के पंचायत चुनाव में लूण-लोटा का अहम रोल माना गया है। वोट पक्का करने के लिए वायदे से फिसलने वाले मतदाताओं को चुनाव मैदान में उतरे प्रत्याशी और उनके कार्यकर्ता लोटे में पानी डालकर कसम दिलवाते हैं। ऐसे में अगर यह कसम खाने वाला मतदाता वायदे से हट जाए, तो उसको देवता से होने वाले नुकसान होने का डर सताता है। यानी, अगर लूण-लोटा हुआ तो वोट पक्का माना जाता है।

लूण-लोटा

एक शख्स हाथ में पानी से भरे लोटे को पकड़ता है। दूसरे हाथ से उसमें नमक डालता है। इस दौरान वह अपनी जुबान से एक वादा या वचन देता है, जिसे पूरा करने की वो कसम खाता है। लोटे में नमक डालने के बाद वो किसी भी सूरत में अपने वचन को पूरा करने से पीछे नहीं हट सकता है। यही प्रथा कहलाती है- लूण लोटा। हिमाचल प्रदेश के कई भागों में यह प्रथा आज भी प्रचलित है।

लूण लोटा में लूण का अर्थ नमक होता है। यह सब सुनने में यह बात भले ही अजीब लगे मगर हिमाचल प्रदेश के दूर-दराज के पिछड़े हुए पहाड़ी इलाक़ों में इस तरह की परंपरा अब भी मौजूद होने के संकेत जब-तब सामने आते रहते हैं।

उत्तराखंड, शिमला-सिरमौर के आंतरिक इलाकों में इसे ‘लूण-लोटा’ कहा जाता है। इस प्रथा में ग्रामीण देवी-देवाताओं के नाम पर कसम खिलाई जाती है। ये देवी-देवता गाँव के इष्ट होते हैं जिन्हें ग्राम्य देवता के नाम से जाना जाता है।

लूण-लोटा यानी – “अटूट-कसम”

दरअसल, जब एक शख्स पानी से भरे लोटे में नमक डालते हुए कसम लेता है, तब वह एक वादा कर रहा होता, जिसे उसे निभाना ही होगा। अगर उसने नहीं निभाया तो जिस तरह पानी में नमक घुल गया और खत्म हो गया। उसी तरह अगर वचन अथवा वादा पूरा नहीं किया तो वचन देने वाला शख्स भी इसी तरह खत्म हो जाएगा।

जिन देवताओं के नाम पर क़सम या शपथ दिलाए जाने की बात आती है, वे मुख्यत: गाँवों के देवता हैं। इन देवताओं के अपने मंदिर होते हैं और श्रद्धालु उन्हें पालकी से त्योहारों, मेलों और उत्सवों में लेकर जाते हैं।

इन प्रथाओं की जब शुरुआत हुई थी, तब इनका इस्तेमाल विवादों का निपटारा करने के लिए किया गया। विवादों को सुलझाने का यह एक शांतिपूर्ण तरीका था। लेकिन वक़्त के साथ लोगों ने इसका गलत इस्तेमाल भी करना शुरू कर दिया। हालाँकि, हमारी पीढ़ी में यह प्रथा मात्र एक कहानी बनकर रह गयी है, लेकिन अभी भी कई दूरस्थ इलाकों में यह जीवित है और चुनावों में सबसे ज्यादा इसका गलत इस्तेमाल देखने को मिलता है।

सिर्फ उत्तराखंड तक सीमित नहीं है यह प्रथा

लूण लोटा की यह प्रथा सिर्फ उत्तराखंड के चुनावों तक ही सीमित नहीं है। लूण लोटा के अलावा कई और तरीके हैं, जिनके जरिए एक शख्स को कसम खिलवाई जाती है। हिमाचल प्रदेश के सिरमौर और शिमला में भी लूण लोटा की परंपरा है। ठीक इसी तर्ज पर, मंडी, कुल्लू जैसी जगहों पर मंदिर के सामने पानी पिलाने और चावल देने की प्रथा है।

इसके आगे लाहौल-स्पीति की तरफ बढ़ेंगे तो वहाँ पर बौद्ध और हिंदू परंपराओं का समायोजन देखने को मिलता है। इन जगहों पर पर जाप के लिए इस्तेमाल की जाने वाली माला के माध्यम से कसम दिलाई जाती है।

उत्तराखंड पंचायत चुनावों के बीच यह प्रथा हमेशा ऊपर आ जाती है। मतदाताओं को रिझाने के लिए सियासी दल मतदान की पहली रात कई दाँव खेलने को तैयार रहते हैं और इन टोटकों को इस्तेमाल करने से भी नही चूकते। इस बार भी कहीं मंदिरों में कसमें तो कहीं लूण-लोटा करने की तैयारियाँ सुनिश्चित की गईं।