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कॉन्ग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने की पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने की माँग

लोकसभा में कॉन्ग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने की माँग की है। उन्होंने कहा है कि पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था की हालत काफी खराब है। वहीं कॉन्ग्रेस नेता ने इस संबंध में भाजपा की गंभीरता पर भी सवाल उठाए।  

चौधरी ने कहा, “राज्य के भाजपा नेता पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने की माँग कर रहे हैं। यदि स्थिति ऐसी होती है, और समय की माँग है, तो निश्चित रूप से राष्ट्रपति शासन लगाया जाना चाहिए। लेकिन हमारा सवाल यह है कि क्या भाजपा के नेता इस मुद्दे को लेकर उतने ही गंभीर हैं जितना कि वे दिखाई देते हैं?”

कॉन्ग्रेस नेता ने कहा पश्चिम बंगाल में कानून और व्यवस्था की स्थिति बहुत खराब है। यदि केंद्र चाहता है ओर स्थिति ऐसी है, तो वे राष्ट्रपति शासन लगा सकते हैं। लेकिन राज्य में वे (बीजेपी) राष्ट्रपति शासन के लिए कहते हैं और दिल्ली में वे (बीजेपी-टीएमसी) एक-दूसरे के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करते हैं।

गौरतलब है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) मुर्शिदाबाद जिले में अपने एक कार्यकर्ता उसकी गर्भवती पत्नी और बच्चे की नृशंस हत्या को लेकर सीएम बनर्जी को निशाने पर ले रहा है। आरएसएस नेताओं ने केंद्र से विचार करने के लिए कहा कि क्या राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का समय आ गया है या नहीं?

आरएसएस के वरिष्ठ नेता और विश्व हिंदू परिषद के कार्यवाहक अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा, “ऐसा लगता है कि पश्चिम बंगाल में कोई कानून व्यवस्था नहीं है। वे अपने विरोधियों के साथ बर्बरता, लूट, बलात्कार और हत्या को ही एकमात्र तरीका मानते हैं।”

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के पास यह विचार करने का समय है कि क्या पश्चिम बंगाल में शासन भारतीय संविधान के अनुसार चल सकता है या राष्ट्रपति शासन लागू करने पर विचार करने का समय आ गया है। आरएसएस नेता ने कहा कि पश्चिम बंगाल की जनता आने वाले विधानसभा चुनावों में तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) को करारा जवाब देगी। उल्लेखनीय है कि विजयादशमी (अक्टूबर 8, 2019) के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े शिक्षक बंधु प्रकाश पाल, उनकी गर्भवती पत्नी और 8 वर्षीय बेटे की घर में धारदार हथियार से नृशंस हत्या कर दी गई।

Pak हिन्दू बच्चों को दिल्ली के स्कूल में दाखिला देने पर केजरीवाल सरकार को क्या दिक्कत? HC ने दिखाई सख्ती

दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश राजीव शकधर ने दिल्ली सरकार को आज (अक्टूबर 11, 2019) नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने आप सरकार को ये नोटिस पाकिस्तानी हिन्दू बच्चों को दिल्ली के स्कूल में दाखिला न दिए जाने वाले मामले में किया है। इस संबंध में हाईकोर्ट में याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील अशोक अग्रवाल द्वारा दायर की गई थी।

ऑपइंडिया से वकील अशोक अग्रवाल ने बात करते हुए बताया कि दिल्ली सरकार तीन में से एक बच्चे का दाखिला स्कूल में लेने को तैयार है। दिल्ली सरकार के वकील ने हाई कोर्ट को बताया कि बाकी दो बच्चों के बारे में निर्णय 17 अक्टूबर को लिया जाएगा। जबकि कोर्ट ने दिल्ली सरकार के वकील को सभी तीनों बच्चों के दाखिले करने के लिए बोला है। कोर्ट ने यह भी पूछा कि आखिर बच्चों के स्कूल में दाखिले से राज्य सरकार को क्या दिक्कत हो सकती है? अंतिम फैसला आने तक उन दो बच्चों के स्कूली भविष्य पर संशय बरकरार रहेगा।

अशोक अग्रवाल ने खुद अपने ट्विटर पर इस मामले में हुई कार्रवाई के बारे में बताया। उन्होंने बताया, “वकील अशोक अग्रवाल द्वारा छतरपुर के भाटी माइन्स में रहने वाले पाक के 3 हिन्दू बच्चों को कक्षा 9वीं में दाखिला न देने के मामले में दायर याचिका पर न्यायाधीश राजीव शकधर ने दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया। अगली सुनवाई 17 अक्टूबर 2019 को होनी है।

गौरतलब है कि पाकिस्तान के जुल्मों सितम से परेशान होकर भारत की शरण में आने वाला एक पाकिस्तानी हिन्दू परिवार दिल्ली में दर-दर की ठोकरे खाने को महीनों से मजबूर है। इसी साल 14 मई को पाक से भागकर भारत आए गुलशेर ने अपने 3 बच्चों को तालीम दिलवाने के लिए यहाँ के स्कूल प्रशासन, क्षेत्र विधायक एवं वरिष्ठ अधिकारियों के पास जा जाकर कई दिनों तक मदद की गुहार लगाई, किंतु फिर भी उनकी फरियाद अनसुनी ही रही।

थक हारकर कुछ दिन पहले उन्होंने इंसाफ के लिए दिल्ली के हाई कोर्ट का रुख किया। उनकी ओर से वकील अशोक अग्रवाल ने अदालत में याचिका डाली। जिसपर संज्ञान लेते हुए आज अदालत ने दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया। इससे पहले इस परिवार की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वकील अशोक अग्रवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पूरे मामले से अवगत करवाते हुए पत्र लिख चुके हैं।

बता दें कि फिलहाल गुलशेर, दिल्ली के भाटी माइन्स में अपने तीनों बच्चों के साथ रहते हैं। वे 14 मई 2019 को अपने तीनों बच्चों के साथ पाकिस्तान से भारत आए थे। यहाँ इन्होंने आगे की पढ़ाई के लिए 5 जुलाई को अपने बच्चों का नाम सफलतापूर्वक एक स्कूल में पंजीकृत करवाया और 8 जुलाई से इन बच्चों को क्लास अटेंड करने की भी अनुमति दे दी गई। लेकिन 14 सितम्बर को अचानक बच्चों को बड़ी उम्र का हवाला देकर स्कूल से निकाल दिया गया। तीनों बच्चे तब से 9 वीं कक्षा में दाखिले के लिए दर-दर भटक रहे हैं।

बाबरी हिन्दुओं के देने की बात करने वाले मुस्लिम गुमनाम, उन्हें बोलने का हक़ नहीं: मस्जिद के वकील

बाबरी मस्जिद के वकील और ऑल इंडिया बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक ज़फ़रयाब जीलानी ने मुस्लिम बौद्धिकों के संगठन ‘इंडियन मुस्लिम फॉर पीस’ की साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए जन्मभूमि की जमीन हिन्दुओं को देने की अपील ठुकरा दी। उनकी कम लोकप्रियता का मज़ाक उड़ाते हुए जीलानी ने कहा, “मैं लेफ्टिनेंट जनरल ज़मीर शाह (संगठन के सदस्य, पूर्व सैन्य उप-प्रमुख) को जानता हूँ…. लेकिन और कौन जानता है? वे कौन होते हैं सद्भावना के नाम पर पेशकश करने वाले? क्या वृहत्तर मुस्लिम जनसंख्या उन लोगों के बारे में कुछ जानती है? मुझे नहीं पता कि उनका एजेंडा क्या है, और मुझे परवाह नहीं कि उन्हें इस मामले में क्या कहना है। 0.1% मुसलमानों को भी उनके बारे में मालूम नहीं है।”

मध्यस्थता पैनल के पास मामला दोबारा ले जाने की कोशिश  

‘इंडियन मुस्लिम फॉर पीस’ नाम के संगठन ने गुरुवार (10 अक्टूबर) को बैठक की थी। इस बैठक में प्रस्ताव पारित किया गया कि करोड़ो हिन्दुओं की आस्था को देखते हुए विवादित ज़मीन राम मंदिर के निर्माण के लिए दे दी जाए। बैठक में कुल चार प्रस्ताव पारित किए गए, जिन्हें बाबरी मस्जिद के पक्षकार सुन्नी वक़्फ बोर्ड के ज़रिए सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता कमेटी को भेजे जाने की बात थी। 

वे प्रस्ताव थे:

  1. मंदिर-मस्जिद मसले का हल कोर्ट के बाहर हो।
  2. मस्जिद बनाने के लिए कोई अच्छी जगह दी जाए।
  3. प्रोटेक्शन ऑफ़ रिलीजन क़ानून-1991 के तहत तीन महीने की सज़ा को बढ़ाकर तीन साल या उम्र क़ैद की जाए।
  4. अयोध्या के रास्ते में जितनी भी मस्जिदें, दरगाह या इमामबाड़े हैं, उनकी मरम्मत की सरकार अनुमति दे।

वक्फ़ बोर्ड का भी ठेंगा

बैठक में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के पूर्व कुलपति रिटायर्ड लेफ़्टिनेंट जनरल ज़मीरउद्दीन शाह ने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला हमारे पक्ष में आ भी जाए तो मस्जिद बनना मुमकिन नहीं है। इसलिए बहुसंख्यक हिन्दुओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए ज़मीन उन्हें दे दी जाए। इससे सौहार्द बना रहेगा। उन्होंने दावा किया कि इस बात पर सुन्नी सेंट्रल बोर्ड भी उनके साथ है। लेकिन सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के पदाधिकारियों ने इस तरह की किसी भी बातचीत से इनकार कर दिया था। और अब बाबरी मस्जिद के क़ानूनी पक्षकारों के मुखिया जीलानी ने भी उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया है।

जेल में बंद पाकिस्तानी PM को वहाँ से निकाला… छोड़ने के लिए नहीं, फिर से अरेस्ट करने के लिए

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को NAB (National Accountability Bureau) ने चौधरी शुगर मिल्स मामले में गिरफ़्तार कर लिया है। पाकिस्तानी अख़बार डॉन के अनुसार, ब्यूरो की एक टीम ने शुक्रवार (11 अक्टूबर 2019) को कोट लखपत जेल में शुक्रवार की सुबह नवाज़ शरीफ़ से मुलााक़ात की। इसके बाद उन्हें फिज़िकल रिमांड के लिए कोर्ट ले जाया गया। अल-जीजिया मिल्स भ्रष्टाचार के मामले में पहले से जेल में सात साल की सज़ा काट रहे शरीफ़ को अब 25 अक्टूबर को कोर्ट में पेश होना है।

शरीफ़ परिवार के सदस्यों पर चौधरी शुगर मिल्स लिमिटेड के शेयरों की बिक्री/ख़रीद की आड़ में मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल होने का आरोप लगा है। चौधरी शुगर मिल्स मामले में पाकिस्तान की जाँच एजेंसी NAB पहले ही नवाज़ की बेटी मरियम नवाज़ और उसके चचेरे भाई यूसुफ़ अब्बास को गिरफ़्तार कर चुकी है। NBA के अनुसार, वो 2008 में मिल्स की सबसे बड़ी शेयरधारक बन गईं, जिनके पास 1.2 करोड़ से अधिक के शेयर थे। फ़िलहाल, ये दोनों ही 23 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में हैं। 

डॉन ने सूत्रों के हवाले से लिखा कि जनवरी 2018 में, यह ख़ुलासा किया गया था कि तत्कालीन पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) यानी PML (N) सरकार की वित्तीय निगरानी इकाई ने NBA को चौधरी शुगर मिल्स में अरबों रुपए के लेनदेन से जुड़े एक बड़े संदिग्ध लेनदेन की सूचना दी थी।

ख़बर के अनुसार, 2018 में पाकिस्तान की एक अकाउंटबिलिटी कोर्ट ने एवेनफील्ड भ्रष्टाचार मामले में पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को 10 साल और उनकी बेटी मरियम को 7 साल की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने शरीफ़ पर 73 करोड़ रुपए (80 लाख पाउंड) और मरियम पर 18 करोड़ 24 लाख रुपए (20 लाख पाउंड) का जुर्माना भी लगाया था। साथ ही नवाज़ शरीफ़ के दामाद कैप्टन (सेवानिवृत) सफ़दर को एक साल की सजा सुनाई थी।

ग़ौरतलब है कि इससे पहले भी पाकिस्तान की मीडिया में नवाज़ शरीफ़ से डील की ख़बरें सामने आ रही हैं। दरअसल, पाकिस्तान में ब्लड मनी क़ानून है। इस क़ानून के अनुसार, अगर दोषी और पीड़ित के बीच समझौता हो जाता है तो दोषी की सजा रद्द हो जाती है। इसमें दोषी पक्ष पीड़ित को डील के हिसाब से निर्धारित रक़म अदा करता है। बता दें कि प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (PTI) के नेता हिमायूं अख़्तर ने डील के पीछे इसी क़ानून का हवाला दिया है। हालाँकि, इमरान सरकार ने इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है।

आपसी सहमति से यौन संबंध के बावजूद गर्लफ्रेंड को छोड़ देना अपराध नहीं: दिल्ली HC

दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रेम संबंध को अचानक खत्म करने पर एक बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि सहमति से लंबे समय तक शारीरिक संबंध होने के बावजूद रिश्ते को समाप्त करना अपराध नहीं है। कोर्ट ने शादी का झाँसा देकर दुष्कर्म करने के एक केस की सुनवाई के दौरान यह फैसला दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में माना कि एक लंबे समय तक के सहमति से बनाए गए अंतरंग संबंध, जिसमें यौन संबंध भी शामिल है, ये नहीं कहा जा सकता कि दूसरे पक्ष ने शादी का वादा करके उसके साथ रेप किया।

कोर्ट ने मामले में बलात्कार आरोपित को अरोप से मुक्त कर दिया है। न्यायमूर्ति विभू बाखरू की कोर्ट ने अपने फैसले में आरोपी को बरी करने के फैसला सुनाते हुए कहा कि दोषी को अरोप मुक्त करने वाले निचली अदालत के फैसले में कोई त्रुटि नहीं है। सहमति से शारीरिक संबंध बनाना अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रेम संबंध को समाप्त करने के लिए किसी को अपराधी नहीं करार दिया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता महिला की उन दलीलों को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है, जिसमें उसने कहा था कि यौन संबंध के लिए उसकी सहमति स्वैच्छिक नहीं थी बल्कि शादी का वादा करके ली गई थी। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने दूसरे पक्ष का शोषण करने के इरादे से भारतीय दंड संहिता के तहत बलात्कार को अपराध मानने वाले कानून का गलत इस्तेमाल करते हुए झूठा केस दर्ज कराया। इस दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत बलात्कार अभी भी अपराध की ही श्रेणी में आता है।

MP कॉन्ग्रेस में रार तेज: कमलनाथ के विरोध में उतरे सिंधिया, कहा- कर्जमाफी पर पूरा नहीं हुआ वादा

मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस में गुटबाजी और गहरी होती जा रही है। कर्जमाफी पर दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह के बाद अब गुना से पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी सवाल उठाए हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने माना कि उनकी सरकार का किया हुआ कर्जमाफी का वादा पूरा नहीं हुआ है। 

कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने किसानों की कर्जमाफी को लेकर अपनी ही सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, “किसानों का कर्ज पूरी तरह से माफ नहीं किया गया है। केवल 50 हजार रुपए का कर्ज माफ किया गया है, जबकि हमने कहा था कि 2 लाख तक का कर्ज माफ किया जाएगा। 2 लाख रुपए तक के कर्ज को माफ किया जाना चाहिए।” सिंधिया ने कहा कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वो अन्नदाताओं के साथ कंधा मिलाकर खड़ी रहे। उन्होंने कहा कि बाढ़ से प्रभावित किसानों को प्रति बीघे के हिसाब से 8-30 हजार रुपए तक का मुआवजा मिलना चाहिए। 

यह पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस के अंदर ही कर्जमाफी को लेकर सवाल उठे हों। इससे पहले राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह भी कमलनाथ सरकार की इस योजना पर सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने किसानों की पूरी तरह से कर्जमाफी न होने पर राहुल गाँधी को जनता से माफी माँगने तक के लिए कह दिया था।

कॉन्ग्रेस नेता लक्ष्मण सिंह ने भोपाल में कहा था, “हम राज्य में किसानों से किया कर्जमाफी का वादा पूरा करने में सफल नहीं रहे हैं। राहुल गाँधी को किसानों से माफी माँगनी चाहिए और उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि कर्जमाफी में कितना समय लगेगा। इससे उन किसानों के बीच अच्छा संदेश जाएगा, जो नाराज हैं।”

बता दें कि मध्यप्रदेश में पिछले साल कॉन्ग्रेस सरकार किसानों की कर्जमाफी का वादा करके सत्ता में आई थी। सरकार ने कर्जमाफी के तहत कुछ किसानों का कर्ज माफ किया है लेकिन कितनों को इस योजना का फायदा असल में मिला इसके आँकड़े स्पष्ट नहीं हैं। राज्य के किसानों की एक बड़ी संख्या अब भी इस योजना से अछूती है। यही कारण है कि उसके अंदर कमलनाथ सरकार के प्रति नाराजगी है।

कॉन्ग्रेस के अंदर उठ रही बागी आवाज पर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा था कि कॉन्ग्रेस को आत्मचिंतन की जरूरत है और पार्टी की आज जो स्थिति है, उसका जायजा लेकर सुधार करना समय की माँग है।

जेपी जन्मदिन पर: उनकी अव्यवहारिक क्रांति के चेले आज भी प्रयोग के मूड में रहते हैं

यूँ तो 11 अक्टूबर का मतलब सिर्फ अमिताभ बच्चन ही रह जाता है क्योंकि बीते चार दशक से ज्यादा समय से इस देश में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति रहा होगा जो उनके व्यक्तित्व की जद में न आया हो। और इसलिए आज उनके जन्मदिन पर बहुत कुछ है लिखने को, कोशिश करूँगा कि कुछ नया लिखूँ या फिर जो पहले थोड़ा-बहुत लिखा है, उसी को झाड़-पोंछकर, सजाकर अपनी वाल पर चस्पा कर लूँ, लेकिन आज जय प्रकाश नारायण का भी जन्मदिन है, जिन्हें जेपी और लोकनायक भी कहा जाता है।

चूँकि मेरी रूचि राजनीति में है और राजनीति भी उस भारत की, जो सन 47 के बाद अस्तित्व में आया। बेशक 1947 से लेकर 2017 का ये कालखंड 70 वर्षों को समेटे हुए है, लेकिन इसके बारे में जितना आप जानते हैं, उतना ही अधिक जानने का मन करता है। इस दौर की और इस राजनीति का सबसे खास बात यह है कि इसमें आजादी के लम्बे संघर्ष, उससे उपजे आदर्शवाद और उम्मीदों के एवरेस्ट को दरकिनार कर दिया गया था, और ऐसा प्रतीत होता है मानो कि 15 अगस्त 1947 के नेताओं का 15 अगस्त 1947 से कोई वास्ता ही नहीं है।

आज के समय में हम अक्सर राजनीतिक दलों के कॉन्ग्रेसीकरण की बात करते हैं। कॉन्ग्रेसीकरण अर्थात सत्ता में बैठकर तमाम नियम, कायदे-कानूनों को अपने पक्ष में करके या उन्हें धता बताते हुए अधिकतम लाभ स्वयं के लिए अथवा स्वयं के भाई-भतीजों के लिए सुनिश्चित करना तथापि गाँधी टोपी और नेहरू जैकेट के आधार पर जनता में देशभक्त और आदर्शवादी होने का ढोंग करना।

लेकिन कभी अपने सोचा है कि कॉन्ग्रेस का कॉन्ग्रेसीकरण कैसे हुआ? दरअसल, नेहरू जी प्रधानमंत्री तो सन 47 में बन गए थे लेकिन उन्होंने जनता का सामना पहली बार, प्रथम आम चुनाव 1952 में किया था। यह पाँच साल का एक लम्बा पीरियड था। लोकतंत्र में, वह भी भारत जैसे बहुदलीय लोकतंत्र में एंटी-इनकम्बेंसी एक फैशन भी है और नेहरू जी भी उसकी जद से बचे नहीं। सरदार पटेल रहे नहीं थे, अम्बेडकर नेहरू से अलग हो गए थे और भी तमाम अन्य नेता जो आजादी की लड़ाई में नेहरू के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे, वे भी नेहरू से तमाम मनभेद और मतभेदों के चलते अलग हो गए थे, इस नाते यह चुनाव नेहरू जी के लिए एक कठिन चुनौती था क्योंकि अब वे वन मैन आर्मी रह गए थे।

यह किस्सा क्योंकि बहुत लम्बा खिंच जाएगा और जिक्र मुझे यहाँ जेपी का करना है तो संक्षिप्त में यही कहूँगा कि नेहरू ने सत्ता की आकंठ महत्वकांक्षा के चलते कॉन्ग्रेस का ‘कॉन्ग्रेसीकरण’ किया लेकिन साथ में यह भी कहूँगा कि राजनीति में महत्वकांक्षा रखना कभी भी अनैतिकता की श्रेणी में नहीं आता है।

जेपी की बात करते हैं, क्योंकि आजादी की लड़ाई में पूरा देश एकजुट था। इसलिए इसमें नायकों की कमी नहीं थी। न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि प्रान्तीय और कस्बाई स्तर पर आजादी के संघर्ष से नायक उपजे। इसलिए आजादी के परिप्रेक्ष्य में, मुझे लगता है कि जयप्रकाश नारायण का इतना बड़ा योगदान नहीं था कि उन्हें जेपी और लोकनायक की उपाधि यहाँ से मिल सकती थी और जैसा कि हम जानते हैं उन्हें यह उपाधियाँ आपतकाल के संघर्ष और सम्पूर्ण क्रांति में उनकी भूमिका से मिली।

सम्पूर्ण क्रांति, आपातकाल और जनता शासन भारतीय राजनीति का इतना रोचक दौर है कि लोगों ने कभी इसको निरपेक्ष तरीके से देखने की कोशिश नहीं की है। हम इससे बहुधा सपाट और ब्लैक एंड व्हाईट की तर्ज पर देखते हैं। कॉन्ग्रेसी इसके लिए शर्मिंदा रहते हैं या मौन रहते हैं। वहीं, गैरकॉन्ग्रेसी दल इसे आजादी की दूसरी लड़ाई, लोकतंत्र की हत्या, सत्ता की निरंकुशता और इसके खिलाफ अपने संघर्ष को महानतम और पवित्रतम मानते हैं। यह सभी बातें लम्बे विमर्श का विषय हैं, लेकिन एक बात तय है कि दोनों पक्षों में दूध का धुला कोई नहीं है। विशेषकर जेपी।

जेपी, इंदिरा गाँधी के पिता नेहरू के मित्र थे, दोनों परिवारों के घनिष्ठ सम्बन्ध थे। इंदिरा की माँ कमला नेहरू का जेपी की पत्नी से खूब पत्राचार भी होता था, जिसमें वो अपने जीवन से जुड़े तमाम विषयों पर उनको खुलकर लिखती थीं, आपातकाल के हटने के बाद इंदिरा गाँधी जब बीमार जेपी से मिलने गईं तो ये सारे पत्र उन्होंने इंदिरा को सौंप दिए थे।

लेकिन वह जेपी ही थे, जिन्होंने आपातकाल लगाए जाने की भूमिका का सूत्रपात किया। 1971 में रायबरेली से इंदिरा गाँधी ने एक लाख से ज्यादा मतों से जीत दर्ज की, उनके खिलाफ़ खड़े हुए राज नारायण ने मुकदमा दर्ज कर दिया कि चुनाव में धाँधली हुई है, 1974 में इलाहबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस जगमोहन सिन्हा ने इस केस पर फैसला देते हुए इंदिरा को दोषी करार दिया कि उन्होंने चुनाव में सरकारी वाहन का उपयोग किया और उनके एक निजी सहायक यशपाल जो सरकार के कर्मचारी थे, लेकिन वे चुनाव में इंदिरा गाँधी के साथ ड्यूटी कर रहे थे।

अदालत ने उनका चुनाव रद्द कर दिया और छ: साल तक उनके द्वारा किसी भी सार्वजनिक पद को ग्रहण करने पर रोक लगा दी तथा उन्हें इसके कार्यान्वयन हेतु बीस दिन का समय दिया। इस पर इंग्लैंड के अखबार गार्जियन ने लिखा था कि यह फैसला बिलकुल वैसे ही जैसे ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर किसी प्रधानमंत्री को उसके पद से हटा देना।

इंदिरा गाँधी ने कोर्ट से स्टे ले लिया, लेकिन बीते कुछ वर्षों में पाकिस्तान से युद्ध, पूर्वी पाकिस्तान से आए लाखों शरणार्थियों, तेल के महँगे आयात से अर्थव्यवस्था पर दबाव बहुत बढ़ गया था, बिहार में छात्र कॉलेजों में चुनाव करवाने को लेकर आन्दोलन कर रहे थे, इसी बीच गुजरात में हुए चुनाव में विपक्षी दलों के गठबंधन ने कॉन्ग्रेस को परास्त कर दिया था, और इस तमाम असंतोष की कमान जेपी ने थाम ली या उनको थमा दी गई। जेपी ने सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान कर दिया जो आदर्शवाद की सोच में पगा हुआ था कि दलीय प्रणाली को भंग करके बहुदलीय सरकार बनाई जाए, जिसमें कोई विपक्ष न हो। इंदिरा गाँधी ने इस बारे में उनसे बात भी की लेकिन उनके इस्तीफे और सम्पूर्ण क्रांति के अमल से कुछ भी नहीं चाहते थे।

कॉन्ग्रेस और इंदिरा का दशकों से विरोध कर रही तमाम राजनैतिक जमातों के लिए यह अवसर एक सुअवसर के रूप में आया, उन्होंने इंदिरा के इस्तीफे के लिए हड़तालें, धरना, आगजनी, हिंसक प्रदर्शन शुरू कर दिए। रेल यूनियनों को रेल के पहिए जाम करने के लिए मना लिया गया, जिसका इंदिरा गाँधी ने सख्ती से दमन किया। जैसा कि होता है नेता भीड़ देखकर भगवान बन जाता है, भीड़ उसे सपेरा बना देती है, जिसे वह अपने इशारों पर नचाना चाहता है, जेपी उम्र के उस पड़ाव पर ऐसा जनसमर्थन पाकर अभिभूत थे, सारे गैर कॉन्ग्रेसी दल उनके पीछे लामबंद हो गए थे, जैसे-जैसे इंदिरा का विरोध हो रहा था, उन्हें सत्ता उतनी ही नजदीक दिख रही थी। इंदिरा से लड़ने के लिए जनता पार्टी का गठन किया गया।

इसी सबके बीच 25 जून की सुबह इंदिरा गाँधी को खुफिया विभाग की रिपोर्ट मिलती है कि रामलीला मैदान में होने वाली रैली में जेपी सेना और पुलिस से इंदिरा सरकार के खिलाफ विद्रोह करने की कह सकते हैं। यह बहुत भयावह स्थति थी और भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसे सोचा ही नहीं जा सकता था, लेकिन इसकी सम्भावना इस बात से बलवती हो रही थी, भारत से अलग हुए पाकिस्तान में यह सब प्रैक्टिस में आ चुका था और पाकिस्तान से अलग हुए बांग्लादेश में वहाँ की सेना द्वारा वहाँ के राष्ट्रपति मुजीबुर्रहमान की उनके घर में उनके परिवार सहित हत्या कर दी गई थी, जिसके बारे में कहा गया कि यह अमेरिकी की सीआईए की शह पर हुआ था।

1971 में अमेरिका के मर्जी के विरुद्ध पाकिस्तान से युद्ध कर इंदिरा ने अमेरिका से भी अदावत मोल ले ली थी, तत्कालीन अमेरिकन प्रेसिडेंट निक्सन ने इंदिरा की हठधर्मिता के लिए न केवल भारत के लिए की जाने वाले तमाम मदद पर रोक लगा दी थी, बल्कि खुलेआम उन्हें ‘ओल्ड बिच’ भी कहा था।

इसके अलावा इंदिरा कॉन्ग्रेस में नेतृत्व किसी और को सौंपने को लेकर भी सहज नहीं थीं, स्वयं उनके राजनैतिक उत्तराधिकारी संजय गाँधी ऐसा नहीं चाहते थे। इसके अलावा यह स्थिति थी जहाँ हम न आगे जा सकते हैं और न ही पीछे और एक ही स्थान पर जड़ हो जाते हैं कि जो होगा सो देखा जाएगा और इंदिरा द्वारा इन हालातों में लिया गया आपातकाल का निर्णय इसी जड़ता के तहत था, जहाँ उनके कुछ अपने हित भी जुड़े हुए थे। वहीं, यह भी सच था कि सत्ता के दरवाजे के बाहर अराजक लोगों की भीड़ लगी थी, जो लंगूरों की तरह सत्ता के कंगूरों पर चढ़ने को बेताब थे। और इंदिरा यह हरगिज भी नहीं होने देना चाहतीं थी।

मैं यह सब में इसलिए कह पा रहा हूँ कि आपातकाल के हवन कुंड से निकले नेताओं की सोच और राजनीति ने जनता पार्टी की सरकार के माध्यम से न केवल इस आन्दोलन को असफल कर दिया बल्कि यह भी दिखा दिया कि इनकी सत्तालोलुपता को लेकर इंदिरा गाँधी के तमाम कयास भी सच ही थे। मोरारजी देसाई, चरण सिंह, जगजीवन राम सरीखे नेता सत्ता के लिए के दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे थे और इस सब में जेपी कहीं नहीं थे। ऐसा लगता है मानो उन्होंने इंदिरा से सत्ता छीन कर एक झुण्ड अथवा गिरोह को चिथड़े-चिथड़े करने के लिए सौंप दी है।

और वही वजह रही कि जनता पार्टी सरकार द्वारा इंदिरा और संजय गाँधी के खिलाफ आपातकाल की ज्यादतियों की जाँच के लिए बनाए गए आयोगों ने कुछ भी ऐसा ठोस सबूत नहीं पाया जिसके बल पर जनता पार्टी सरकार और उसके नेता इंदिरा गाँधी की राजनीति का खात्मा कर सकते, दोनों को क्लीन चिट दी गई बल्कि संजय गाँधी को जिस एक मामले में प्रत्यक्ष दोषी पाया गया, वह एक फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’, जो आपातकाल में इंदिरा गाँधी और संजय गाँधी की भूमिका को केंद्र में रखकर बनाई गई थी, उन्हें सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ला के साथ षडयन्त्र करके इस फिल्म के प्रिंट नष्ट करने का दोषी पाया गया था।

इसके बाद इंदिरा गाँधी ने देश भर के दौरे किए, हर जगह आपातकाल के लिए देश की जनता से माफी माँगी और 1980 महज तीन साल के भीतर फिर से सत्ता में वापसी की। मैं इस समूचे विमर्श में जेपी को इसलिए केंद्र में रख रहा हूँ कि उन्होंने अव्यवहारिक राजनीति की, वे ऐसी मसीहाई भूमिका में आ गए थे, जो अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई और अपने ही लोगों के खिलाफ लड़ाई को एक ही तराजू में तौल रहे थे। उन्हें उम्र के उस अंतिम पड़ाव में जरा भी भान नहीं हुआ कि जो लोग उनकी पालकी उठा रहे हैं, उनकी मंशा क्या है? और मेरे इस कथन का समर्थन जनता युग के बाद से जनता परिवार की राजनीति का चरित्र चित्रण है।

शरद यादव, रामविलास पासवान, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, जॉर्ज फर्नांडीज और तमाम अन्य नेता जो उस दौर की राजनीति से निकले, वह आज तलक भी प्रयोग के मूड में हैं, ये लोग हमेशा सफर में हैं, क्योंकि इनकी कोई मंजिल नहीं है। तब इस एब को सम्पूर्ण क्रांति कहा जाता है, अब इसे तीसरा मोर्चा, थर्ड फोर्स, वैकल्पिक राजनीति और गैर कॉन्ग्रेस-भाजपा की राजनीति कहा जाता है।

अन्ना भी हमारे दौर के हल्के-फुल्के जेपी हैं, जिनमें कुछ फ्लेवर गँधी जी का भी है। पीछे जब यशवंत सिन्हा ने अपनी ही सरकार को आर्थिक मोर्चे पर आईना दिखाया तो कुछ कुम्भकर्णी मोड में पड़े लोग उनमें भी जेपी की छवि देखने लगे और ये विचार अभी जीवित है, नष्ट नहीं हुआ है।

यही वजह है कि अक्सर केसी त्यागी जैसे नेताओं को या फिर जिन्होंने देश में घोषित इमरजेंसी लगाई थी उन्हें अघोषित इमरजेंसी का माहौल नजर आने लगता है। फिर उन्हें कोई क्रांति सूझती है, फिर उनके आँखें कहीं आउटडेटेड पड़े जेपी को तलाशती हैं। लेकिन यहाँ मुझे लगता है कि सरकार का स्ट्राइक रेट और हाल में घटित हुई मिनी क्रांति जिसने अरविन्द केजरीवाल जैसे एक्टिविस्ट को दिल्ली का सीएम बना दिया; अगली किसी भी क्रांति के लिए इतनी आसानी से रास्ता क्लियर नहीं करेंगे।

‘सिंदूर खेला’ से लाल होकर निकलीं नुसरत जहां, कहा – ‘मैं बहुत खुश हूँ, लोग क्या कहते हैं फर्क नहीं पड़ता’

तृणमूल कॉन्ग्रेस सांसद नुसरत जहां ने आज पारंपरिक बंगाली बहु का फर्ज निभाते हुए सिंदूर खेला में हिस्सा लिया। सिंदूर खेला के लिए अपने पति निखिल जैन के साथ वो चलताबागान दुर्गा पूजा पंडाल में आई थीं।

इस उत्सव के बाद उन्होंने मीडिया से कहा, “मैं भगवान की सबसे प्यारी बच्ची हूँ। मैं सभी पर्व का आनंद उठा सकती हूँ। मैं अन्य बातों की अपेक्षा प्यार और मानवता को ज्यादा इज्जत देती हूँ। मैं बहुत खुश हूँ और विवादों से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।”

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शादी के बाद पहली बार सिंदूर खेला में आई सुहागन ‘विवादित’ जैसे शब्द क्यों प्रयोग करती है, इसके लिए आपको सांसद नुसरत के साथ हाल में हुए वाकये जानने होंगे। दरअसल जब से उन्होंने निखिल जैन (जो एक बिजनेसमैन हैं और धर्म से हिंदू हैं) से शादी की है, कट्टरपंथियों ने उन्हें हर छोटी से छोटी चीज के लिए ट्रोल किया है। सिंदूर-चूड़ा पहन संसद गईं तो ट्रोल, झुककर पैर छूकर प्रणाम किया तो ट्रोल! देवी दुर्गा के लिए एक वीडियो में डांस किया तो ट्रोल!

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ट्रोलिंग तक बात होती तो शायद समझ में आती। लेकिन यह बहुत आगे बढ़कर उन्हें जान से मारने तक पहुँच गई है। और यह किसी आम सोशल मीडिया यूजर ने नहीं कही है। यह बात कही है कॉन्ग्रेस के एक समर्थक ने। उसने कहा था, “नुसरत जहां ने बुर्के की बजाय सिंदूर-मंगलसूत्र को इसलिए चुना क्योंकि यह उसकी ‘आजादी’ है। इसके लिए नुसरत को तुरंत मार दिया जाना चाहिए। वरना पूरा समुदाय खतरे में आ जाएगा।” क्यों कहा था? क्योंकि नुसरत ने परंपरा निभाते हुए दुर्गा अष्टमी के दिन देवी दुर्गा की पूजा की थी।

आपको बता दें कि बंगाली संस्कृति में दुर्गा पूजा और उसके बाद सिंदूर खेला का महत्व बहुत ज्यादा है। शादीशुदा बंगाली महिलाएँ इस दिन अपने माँग में सिंदूर लेकर देवी दुर्गा के चरणों में भी सिंदूर अर्पित करती हैं। इसके बाद वो आपस में एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सिंदूर खेला का उत्सव मनाती हैं।

पहले तसलीम से शौहर अयूब ने माँगा फ्रेंच किस, फिर चाकू से काट दी जीभ, फरार

गुजरात के अहमदाबाद से एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहाँ 37 वर्षीय तसलीम मंसूरी नामक महिला को अपने शौहर की बातों में आना महंगा पड़ गया। जानकारी के मुताबिक अयूब नाम के शख्स ने काफी झगड़े के बाद अपनी पत्नी तसलीम ने फ्रेंच किस माँगा। महिला को लगा कि उसे वह सारे झगड़े भूल गया है और समझौते के लिए तैयार हैं। लेकिन जैसे ही तसलीम ने अपनी जीभ बाहर निकाली, अयूब ने उसकी जीब पकड़ी और उसे चाकू से काट दिया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार ये घटना जुहापुरा में महराज फ्लैट्स में बुधवार की रात घटी। पुलिस ने बताया कि तसलीम का निकाह मार्च 2008 में हुई थी। जो तसलीम का तीसरी और अयूब का दूसरा निकाह था। महिला के अनुसार उनके निकाह के बाद शुरुआती 2-3 महीने तो खुशी-खुशी बीते लेकिन उसके बाद उसका शौहर उससे छोटी-छोटी बातों पर लड़ने लगा।

तसलीम के अनुसार उसका शौहर अपने काम के प्रति बहुत लापरवाह था, लेकिन जब भी वह उसे कुछ समझाने की कोशिश करती तो वह उसके साथ मारपीट करता। पीड़िता काफी समय अपनी शादी बचाने के लिए ये सब बर्दाशत करती रही। लेकिन बुधवार की रात अयूब ने सब सीमा पार कर दी।

महिला के मुताबिक वह उस रात अपने कमरे में सोए हुए थे, तभी अयूब ने तसलीम से फ्रेंच किस के लिए कहा। उसे लगा अयूब सभी झगड़ों को भुलाकर पैचअप करना चाहता है। लेकिन जैसे ही उसने अपनी जीभ बाहर निकाली, अयूब ने उसकी जीभ को हाथ से पकड़ लिया और उसे चाकू से काट दिया। इसके बाद आरोपित शौहर तसलीम को कमरे में बाहर से लॉक करके फरार हो गया।

घायल हालत में महिला ने किसी तरह अपनी बहन तबस्सुम से मदद माँगते हुए उसे फोन करके पूरी घटना के बारे में जानकारी दी और बाद में शोर करके कॉलोनी के सभी लोगों को इकट्ठा किया। ड्यूप्लिकेट चाभी की मदद से वो कमरे से बाहर आई और पूरे वाकये के बारे में बताया।

नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक तसलीम को एसवीपी अस्पताल में भर्ती करवाया गया है और उसके जीभ की सर्जरी की है। वेजलपुर के पुलिस अधिकारी एलडी ओडेडरा ने बताया है कि शुरुआत में तो ये मामला अयूब की बेरोजगारी को लेकर होने वाले झगड़े को लग रहा है। दोनों में इसे लेकर झगड़े भी होते थे, लेकिन पिछले दिनों उनमें कोई बड़ी बहस लड़ाई नहीं हुई थी। पुलिस के अनुसार आरोपित फरार है और पुलिस उसे पकड़ने की कोशिश में लगी हुई है।

कॉन्ग्रेस नेता जी परमेश्वर के ठिकानों पर दूसरे दिन भी छापेमारी जारी, 4.52 करोड़ रुपए बरामद

कर्नाटक के पूर्व डिप्टी सीएम और कॉन्ग्रेस नेता जी परमेश्वर के ठिकानों पर आयकर विभाग की छापेमारी के बाद अब तक 4.52 करोड़ रुपए की नकदी बरामद हुई है। बता दें कि कर्नाटक के पूर्व उपमुख्यमंत्री के करीब 30 ठिकानों पर आईटी विभाग ने छापे मारे। ये छापेमारी आज भी जारी है।

आईटी विभाग ने कहा कि आज भी बेंगलुरु में सिद्धार्थ मेडिकल कॉलेज के परिसर में छापेमारी जारी रहेगी। यह मेडिकल कॉलेज जी परमेश्वर से संबंधित ट्रस्ट के जरिए चलाया जाता है। इसके अलावा जी परमेश्वर के भाई के बेटे आनंद के घर पर भी छापा पड़ा है।

उनके निजी सहायक रमेश के आवास की भी तलाशी ली गई। कल भी आईटी विभाग ने जी परमेश्वरा से जुड़े विभिन्न ठिकानों पर छापे मारे। खबर के अनुसार ये छापे NEET परीक्षा से जुड़े बहु-करोड़ टैक्स चोरी मामले से संबंधित है। पहले दिन की छापेमारी में आयकर विभाग को कई अहम दस्तावेज भी हाथ लगे थे।

हालाँकि, इस मामले में छापेमारी के पहले दिन जी परमेश्वर का कहना था, “मुझे छापेमारी की जानकारी नहीं है। मुझे नहीं पता कि वे छापेमारी कहाँ कर रहे हैं। उन्हें तलाशी लेने दें, मुझे कोई दिक्कत नहीं है। अगर हमारी तरफ से कोई गलती होगी तो इसे सुधारेंगे।”

आयकर विभाग ने उनसे संबंधित ट्रस्ट द्वारा संचालित मेडिकल कॉलेज में कुछ अनियमितताएँ पाई हैं। परमेश्‍वर के ठिकानों पर विभाग की छापेमारी का सिद्धारमैया ने विरोध किया है। उन्‍होंने इस छापेमारी को राजनीति से प्रेरित बताया है। उनका आरोप है कि कर्नाटक के कॉन्ग्रेस नेताओं को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने ट्वीट किया, “परमेश्वर और आरएल जलप्पा और अन्य पर की गई छापेमारी राजनीति से प्रेरित और दुर्भावनापूर्ण हैं। वे केवल कर्नाटक के नेताओं को निशाना बना रहे हैं जैसा कि वह नीति और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर असफल हो चुके हैं। हम ऐसे किसी चाल से पीछे हटने वाले नहीं हैं।”