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Pak की कंगाली: जिहादियों को हथियार तक नहीं दे पा रहा, कश्मीर पुलिस को लूट कर काम चलाने को उकसाया

हिन्दुस्तानी सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता और पाकिस्तान की कंगाली ने कश्मीर के जिहादियों को बड़ी मुश्किल में डाल दिया है। मुश्किल यह है कि अब उनके पास लड़ने के लिए हथियारों की कमी होती जा रही है, और यही कमी उन्हें कश्मीर में पुलिस के हथियारों पर डाका डालने के लिए उकसा रही है। यह खुलासा सेना की उत्तरी कमांड के लेफ्टिनेंट जनरल रणबीर सिंह ने किया

हमले के लिए तैयार 500 जिहादी

सेना की उत्तरी कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ (जीओसी) लेफ्टिनेंट जनरल सिंह हालिया पाकिस्तानी ड्रोन की बरामदगी और हिंदुस्तान में उनके जरिए हथियारों की तस्करी के बारे में बात कर रहे थे। टाइम्स नाउ ने इंटेलिजेंस के सूत्रों के हवाले से 10 किलोग्राम हथियार, विस्फ़ोटक और संचार यंत्रों की स्मगलिंग ड्रोनों के ज़रिए पाकिस्तान से पंजाब के रास्ते होने का दावा किया है। सिंह ने बताया कि आंतरिक समस्याओं से दो-चार होने के बावजूद पाकिस्तान हिंदुस्तान के जिहादियों को हथियार सप्लाई करने की कोशिश में लगा हुआ है। और उसकी यही कोशिशें जब असफ़ल हो रहीं हैं, तो जिहादी पुलिस के हथियार लूटने की कोशिश का रुख कर रहे हैं।

उन्होंने इसके अलावा इसकी भी पुष्टि की कि पाकिस्तान में आतंकी ट्रेनिंग कैम्पों और जिहादियों की नई पौध तैयार है। करीब 500 आतंकी सर्दियाँ शुरू होने के पहले कश्मीर में घुस आने की फ़िराक में हैं। गौरतलब है कि सर्दियों में भारी बर्फ़बारी के चलते नवंबर से जनवरी तक के समय में घुसपैठ करना जिहादियों के लिए खासा मुश्किल होता है। इसी लिए पाकिस्तान ने LOC के पास 20 आतंकी कैम्पों के लिए 20 ही लॉन्च पैड भी सक्रिय कर दिए हैं।

जिन कट्टरपंथी लड़कों ने दी जान से मारने की धमकी, उन्हें मोदी ने किया माफ: मोदी ‘फ़ासिस्ट’ है या अति-लिबरल?

मोदी सरकार को दमनकारी और मोदी को ‘फ़ासिस्ट’ कहने वालों को न ही मोदी या भाजपा के बारे में कुछ पता है और न ही फ़ासिस्ट के मायने पता हैं। हाल ही में एक ट्रायल कोर्ट ने 49 सेलेब्रिटियों पर जो केस करने का निर्देश दिया, उसका ठीकरा भी मोदी के ही सर फोड़ दिया गया। लेकिन विरोध करने वालों को लेकर मोदी का नज़रिया क्या है, इस पर राय कायम करने के पहले दो ऐसी घटनाओं की जानकारी ले लेना ज़रूरी है, जब कट्टरपंथियों ने मोदी को जान से मारने की धमकी दी, लेकिन नरेंद्र मोदी ने उनके गिरफ्तार होने के बाद उन्हें माफ़ कर दिया ताकि उनकी ज़िंदगी न खराब हो। यही नहीं, उनमें से एक को तो नौकरी से निकाले जाने पर तत्कालीन गुजरात सीएम ने आरोपित को दोबारा नौकरी दिए जाने की सिफ़ारिश करते हुए खुद पत्र लिखा

‘मैंने उसे नई ज़िंदगी दी’

2002 के दिसंबर में तब गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी ने उन्हें मारने की धमकी भरा ईमेल लिखने वाले एक दूसरे समुदाय के युवक को माफ़ी दी थी। उस समय इस खबर को रिपोर्ट करने वाले Rediff.com के अनुसार, “गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी ने महाराष्ट्र राज्य सरकार से कहा कि वह रज़ाक नाज़िर कासिम के खिलाफ सभी मामले बंद कर दें। उसे ATS ने गिरफ्तार किया था, जब उसने उन्हें एक ‘धमकी भरा’ ईमेल भेजा था। मुख्यमंत्री (महाराष्ट्र के तत्कालीन सीएम विलास राव देशमुख) का कहना है कि जाँच एजेंसी के पास रज़ाक को पाँच साल के लिए जेल भेजने और 1 लाख रुपए का जुर्माना लगाने के लिए पर्याप्त सबूत हैं।“ यह राज्य में साइबर क्राइम का पहला मामला था। लेकिन मोदी ने उसे न केवल जाने दिया, बल्कि इसे रज़ाक को दी गई एक नई ज़िंदगी भी बताया। मोदी ने तब कहा था, “इससे उसकी ज़िंदगी बर्बाद हो जाती। चूँकि उसने धमकी मेरी जान को लेकर दी थी, इसलिए मैंने उसे माफ़ कर एक नई ज़िंदगी देने का निर्णय लिया है।”

रज़ाक मुंबई के अँधेरी स्थित एक निजी आईटी फर्म में प्रोजेक्ट लीडर था। कंपनी ने उसे इस मामले के बाद नौकरी से निकाल दिया था। मोदी ने उसे वापस नौकरी पर रखने की गुज़ारिश भी आईटी फर्म से की थी। यही नहीं, 2006 में भी उन्होंने एक दूसरे मजहब के युवक को ऐसा ही एक पत्र लिखने के लिए माफ़ी दे दी थी, क्योंकि उन्हें लगा था कि लिखने वाले लड़के ने बिना सोचे-समझे भूल कर दी थी, जिसके लिए उसने अपने पश्चाताप का प्रदर्शन किया था।

मोदी ही नहीं, पूरी भाजपा माफ़ी-मोड में

और ऐसा भी नहीं है कि यह उदारता की प्रवृत्ति केवल नरेंद्र मोदी की है। अमित शाह को सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में बदनाम किया गया, और उनके खिलाफ़ जस्टिस लोया की हत्या कराने का प्रोपेगंडा कारवाँ पत्रिका ने रचा। The Wire ने उनके बेटे जय शाह तक को नहीं छोड़ा, और भ्रष्टाचार का झूठा आरोप मढ़ दिया। अमित शाह और मोदी पर 2014 के लोकसभा चुनावों के कुछ ही समय पहले एक लड़की की पुलिसिया अमले से ‘स्टॉकिंग’ कराने को लेकर ‘स्नूपगेट’ कांड नामक प्रपंच की रचना तक की गई। लेकिन इस मामले पर न मोदी कुछ बोले न शाह।

ऐसे में यह सवाल उठाना लाज़मी है कि मोदी-शाह, और पूरी भाजपा ही, फ़ासिस्ट हैं या अति-उदारवादी?

Note: इसके लेखक “गुजरात दंगे: द ट्रू स्टोरी” पुस्तक के लेखक हैं। इस किताब में 2002 गुजरात दंगों – गोधरा और उसके बाद जो कुछ भी हुआ, उसके बारे में सभी विवरण हैं। www.gujaratriots.com के ऐडमिन भी हैं लेखक। इस लेख को आप विस्तार में यहाँ पढ़ सकते हैं

Winnie the pooh की तरह दिखते हैं चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग! बैन करने के पीछे क्या रही वजह?

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत के दौरे पर हैं। इस बीच चीनी राष्ट्रपति सोशल मीडिया पर छाए कुछ मीम्स को लेकर चर्चा में बने हुए हैं। यह चर्चा किसी इंसान या वस्तु विशेष की नहीं है बल्कि एक कार्टून कैरेक्टर को लेकर की जा रही है।

चीन एक ऐसा देश है, जो अपने तानाशाही रवैये के लिए जाना जाता है। चीन की हरक़तें कभी-कभी अमानवीय तो कभी हास्यास्पद भी होती है, जिससे वो मखौल या उपहास का पात्र भी बन जाता है।

उदाहरण के लिए, एक लोकप्रिय कार्टून विनी द पू (Winnie the pooh) को सिर्फ़ इसलिए प्रतिबंधित कर दिया गया क्योंकि उसके साथ शी जिनपिंग की तुलना की जाने लगी थी, मीम्स बनने लगे थे। नीचे की तस्वीर में आप इसका उदाहरण देख सकते हैं।

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जापानी प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे के साथ शी की बैठक के दौरान भी सोशल मीडिया पर एक मीम छाया रहा, जिसमें शी जिनपिंग को पू कार्टून के रूप में चित्रित किया गया, जबकि शिंज़ो आबे को एक निराशावादी गधे के रूप में।

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चीनी राष्ट्रपति को कार्टून के रूप में चित्रित करने का सिलसिला यहीं नहीं थमा। एक अन्य मीम में, हॉन्गकॉन्ग की नेता कैरी लैम को पिगलेट यानी सुअर के बच्चे के रूप मेें चित्रित किया गया जबकि शी जिनपिंग को फिर से पू कार्टून के ज़रिए चित्रित किया गया।

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जैसे-जैसे ये मीम्स लोकप्रिय होते गए, चीनी सेंसर बोर्ड ने इन्हें इंटरनेट पर प्रतिबंधित करना शुरू कर दिया। यहाँ तक ​​कि कॉमेडियन जॉन ओलिवर द्वारा कार्टून के ज़रिए चीनी शासन की संवेदनशीलता का मजाक उड़ाने पर HBO वेबसाइट को भी चीन में प्रतिबंधित कर दिया गया था।

चीन के इस रवैये से साफ़ पता चलता है कि उसे इन कार्टून्स से काफ़ी चिढ़ है, तभी तो वो बिना देरी किए इसे गंभीरता से लेता है और तुरंत प्रतिबंधित कर देता है। वैसे भी चीन के तानाशाही शासन से तो पूरी दुनिया वाक़िफ़ है। चीन के मामले में यह कहना ग़लत नहीं होगा कि चीन का यह तानाशाही रवैया इसलिए भी है क्योंकि वो आर्थिक रूप से मज़बूत है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उसकी धाक है, फिर भले ही उसने अपने यहाँ लाखों उइगरों को क़ैद करके उन पर अत्याचार किया हो, इससे कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता।

कश्मीर में हिन्दुओं पर नज़र रखते हैं ‘आतंकवादी’, बीयर पीने पर भेजते हैं धमकी भरे पत्र

एक रोज़ मेरे चाचा ने माँ को फोन किया, उनकी बातें सुनकर मैं समझ गया कि कश्मीर में हालात कुछ ठीक नहीं हैं। पता चला कि चाचा के बेटे और मेरे भाई को एक धमकी भरा पत्र मिला है। एमबीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद एक लम्बे संघर्ष से जूझते हुए मेरे भाई को केंद्र सरकार के अंतर्गत कश्मीर में एक नौकरी मिली। यह नौकरी भी उसे सरकार की उस नीति के चलते मिल पाई जिसे कश्मीर से विस्थापित हिन्दुओं के लिए बनाया गया था, यह वही नीति है जो लोगों के बीच ‘पीएम की सौगात’ के नाम से लोकप्रिय है। घर वालों की इच्छा न होने के बाद भी मेरे भाई ने कश्मीर जाने का फैसला किया क्योंकि नौकरी के लिए उसके पास ज्यादा ज्यादा विकल्प नहीं थे।

धमकी मिलने की बात सुनकर घर के लोग जैसे सहम गए, घबरा गए थे। पिछले दो दशक में पहली बार यह एक ऐसा मौका था जब घर के बड़े-बुज़ुर्ग इस विषय पर खुलकर चर्चा कर रहे थे कि किन परिस्थितियों में हमें कश्मीर को छोड़ना पड़ा था, क्योंकि घर में इस विषय को लेकर इससे पहले कभी किसी को हमने इतना खुलकर बात करते नहीं सुना था यकीन मानो जैसे यह चर्चा बच्चों के लिए हो ही नहीं। हालाँकि जान की धमकी मिलने के बावजूद मेरे भाई के लिए बाक़ी दिनों की तरह वह दिन भी किसी आम दिन जैसा ही था।

किसी भी इन्सान के लिए जान सबसे कीमती चीज़ होती है, कहते हैं जान है तो जहान है लेकिन इस सब के बावजूद में जान से मारने की धमकी मिलने के बावजूद नौकरी पर अड़े रहने की मेरे भाई की जिद मेरी समझ से बाहर थी। एक दिन फेसबुक पर ‘कश्मीर में रहने वाले हिन्दुओं’ की चर्चा में लोगों की चिट्ठियाँ देखीं, कुछ पोस्ट्स देखे कि फिर एक ऐसी पोस्ट ने मेरा ध्यान अपनी और खींच लिया जो शायद मेरे भाई की ही तरह कश्मीर में केंद्र सरकार की नौकरी करने वाले एक शख्स ने लिखी थी। केंद्र सरकार की उस नीति के तहत कैसे विस्थापित हिन्दुओं को एक जाल में फँसा दिया जाता है और मजबूरी में उन्हें कैसे हालातों का सामना करना पड़ता है- उस इन्सान ने इस बारे में वहाँ मिलने वाली सरकारी नौकरी की असलियत लिखकर अपनी विवशता ज़ाहिर कर दी।

दरसल उस पोस्ट में एक गुमनाम शख्स ने लिखा था, “कश्मीर में हिन्दुओं के नौकरी करने के लिए हालात इतने खराब हैं कि उन्हें घाटी में वापस आकर नौकरी करने तक पर धमकाया जाता है, वहाँ काम करने को लेकर परिस्थितयाँ इतनी खराब हैं कि उनकी जान पर बन आती है। कश्मीर से विस्थापित हिन्दुओं को केंद्र सरकार जिस नीति के तहत नौकरी के लिए कश्मीर भेजती है, वह दरअसल एक ऐसा कॉन्ट्रैक्ट है जिसमें हमको फँसाया गया है, लेकिन विपरीत परिस्थितियों के चलते नौकरी छोड़ने के बाद उसका ‘विस्पथित हिन्दू’ होने दर्जा भी छिन जाता है।”

मैं समझ गया कि क्यों मेरे भाई ने जान से मारने की धमकी मिलने के बावजूद कश्मीर में ही रहकर नौकरी करने का फैसला किया। इसके बाद मैंने कश्मीर जाने का फैसला किया, सबसे ज़रूरी था कि घर वालों को मनाया जाए, किसी तरह से मैंने उनको विश्वास में लिया और बताया कि मै कश्मीर होते हुए लद्दाख की ओर जाऊँगा और वापस लौट आऊँगा। मैंने उन्हें कहा कि वहाँ जाते वक़्त मै कश्मीर से होकर जाऊँगा तो अपने भाई को कश्मीर से वापस आने के लिए ज़रूर मानाने की कोशिश करूँगा।

अगले दिन जब मैं कश्मीर पहुँचा तो पता चला कि मेरा भाई घर पर नहीं था, वह एक प्रतिनिधिमंडल के साथ पास में रहने वाले एक स्थानीय हुर्रियत नेता से मिलने गया है। उसके आते ही सबसे पहला सवाल मैंने यही पूछा- “तुम लोगों को एक अलगाववादी नेता से मिलने की क्या ज़रूरत पड़ी?”

वह धीरे से मुस्कुराकर बोला, “यह तुम्हारे फेसबुक वाले डिस्कशन की जगह नहीं है, न ही ये अमेरिका है, यहाँ हालत बहुत अलग हैं, अगर यहाँ कोई सनी देओल बनने की कोशिश करे तो अगले दिन उसकी लाश नदी में तैरती हुई पाई जाती है। हम अब यहाँ कोई सैलानी नहीं हैं, यहीं कमाते हैं, यहीं खाते हैं इसलिए यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि हर कोई हमारे साथ हो, अलगाववादी भी !”

उसके यह कहने के बाद भी हमारे बीच चर्चा चलती रही।

दरअसल पड़ोस के इलाके में बने एक अपार्टमेंट के कुछ लड़के पास की एक शराब की दुकान से बियर खरीदकर ले गए थे। कुछ ही दिन बाद उस इलाके को गाली-गलौच वाली अभद्र भाषा में एक पत्र मिला जिसमें एक चेतावनी के साथ लिखा था कि ‘गैर-इस्लामिक’ कामों में पड़ने का अंजाम बहुत बुरा होगा, जो भी ऐसा करेगा उसे भविष्य में इसे भुगतना भी पड़ेगा। पूरे इलाके के लिए यह हैरान करने और उससे भी ज्यादा डरा देने वाली बात थी। यह डर ही असली वजह है कि लोग यहाँ मंदिर में पूजा-पाठ भी इतना धीरे से करते हैं कि जिससे किसी तरह का कोई विवाद पैदा न हो।

अपार्टमेंट वाली टाउनशिप में जब उस चिट्ठी को लेकर आपात मीटिंग में लड़कों ने बताया कि कुछ दिन पहले वे बाज़ार से बियर खरीदने गए थे। यह देखकर सभी सहम गए क्योंकि कोई उनके टाउनशिप में हो रही गतिविधियों पर नज़र रख रहा था।

हर कोई इतना डर गया था कि उन्होंने सबसे पहले उनके एक प्रतिनिधिमंडल ने एक स्थानीय अलगाववादी नेता से मिलने का फैसला किया। नेता ने सरहद पार तक फैले अपने अपने नेटवर्क में सभी से जानकारी तो एक आतंकवादी संगठन के मुखिया ने लाउडस्पीकर पर यह बताया कि ऐसी कोई भी चिट्ठी नहीं भेजी गई है, उसने कहा कि हो सकता है यह किसी स्थानीय लड़के ने शरारत में लगा दी होगी। प्रतिनिधिमंडल में गए लोग इस बात को कहते हैं कि पूरी मीटिंग का नतीजा यही निकला कि भले कश्मीरी हिन्दू यहाँ काम कर रहे हैं रह रहे हैं, मगर कोई उन पर पूरी नज़र ज़रूर रख रहा है जिससे वे किसी गैर-इस्लामिक हरकत में न पड़ें।

अगले कुछ हफ्ते यही प्रतिनिधिमंडल पुलिस के उच्चाधिकारियों से भी मिलने पहुँचा, उन्होंने कश्मीर और उससे बाहर कई वरिष्ठ राजनेताओं से बातचीत भी की, मगर कोई मदद के लिए आगे नहीं आया। किसी को भी इस बात की परवाह नहीं थी कि उस धमकी भरे पत्र के उन लोगों के लिए क्या मायने हैं जिन्होंने कश्मीर घाटी में हिन्दुओं के नरसंहार के करीब दो दशक के बाद कश्मीर जाने की कोशिश की थी।

हालाँकि कुछ मीडिया वालों ने शुरुआत में इसपर ध्यान दिया, यह घटना औसत से भी निचले दर्जे की जिंदगी जी रहे लोगों के लिए एक निर्णायक मोड़ की तरह हो गईं। अगले कुछ महीनों में मैंने महसूस किया कि कैसे एक क्लास में कम उम्र के लड़के टीचर तक को धमका दिया करते थे। जब भारत-पाकिस्तान का मैच होता था तो लगता जैसे पाकिस्तान जीते तो ही बेहतर है क्योंकि अन्यथा होता तो हालात बहुत खराब हो जाया करते। हमने सीख लिया था कि हमें सेलिब्रेट नहीं करना है। उस बीयर वाली घटना ने जैसे सब कुछ बदल कर रख दिया, उनकी ओर से यह एक चेतवानी है कि हमें उन्ही की शर्तों पर जीना पड़ेगा तभी सब ठीक रहेगा।

तीन हफ्ते से भी ज्यादा समय तक वहाँ रहने के दौरान मैंने सीखा कि फेसबुक और उसकी चर्चाओं में हम कैसे चीज़ों को सही या गलत के तौर पर कैसे देखते हैं। 18 घंटे से भी ज्यादा बिजली कटने, कोई बहरी मदद न मिलने और इकलौते सिक्योरिटी गार्ड के भरोसे पूरी टाउनशिप को आतंकवादी हमले से सुरक्षा जैसी चिंता कितने ही लोगों को असहाय महसूस करा रही थी। राजनेता ऐसे हैं जो किसी की मदद नहीं करते, प्रशासन ऐसा जिसकी प्राथमिकताएँ जनता की सुरक्षा छोड़कर कुछ और ही हैं कि स्थानीय लड़के घर से काम पर जाती लड़कियों से छेड़खानी करते हैं तो भी वह कुछ नहीं करता। कश्मीर में हिन्दुओं की टाउनशिप के लिए अपना अस्तित्व बचाए रखना ही एक बड़ी चुनौती है, किसी नयी उम्मीद की कोई किरण दिखना तो नामुमकिन है।

‘देवी’ से ‘चुप चुड़ैल’: वामपंथी जोकर देवदत्त पटनायक ने महिलाओं को लिखे बेहूदे ट्वीट, दी गाली

फर्जी माइथोलॉजी एक्सपर्ट देवदत्त पटनायक ने 10 अक्टूबर को मानसिक स्वास्थ्य दिवस (Mental Health Day) के अवसर पर सोशल मीडिया पर अपनी गिरी हुई मानसिकता का परिचय दिया। देवदत्त ने सोशल मीडिया पर जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया है, उसे उनके बिगड़ते मानसिक स्वास्थ्य के प्रमाण के रूप में लिया जा सकता है।

विचारों में अंतर होने को लेकर किसी महिला को ‘चुड़ैल’ कहना बेहद ही अशिष्ट और नीचतापूर्ण व्यवहार है। हालाँकि, यह सब बातें पटनायक के पल्ले नहीं पड़ने वाली है, क्योंकि बहुत सारे वामपंथी-उदारवादी जोकर हैं, जो महिलाओं के साथ तब तक ही सही तरीके से बात कर सकते हैं, जब तक कि बात उनके मन मुताबिक हो, जैसे ही कोई महिला इनके विचार के विपरीत रुख अपनाती है तो वो उनके साथ बदतमीजी से पेश आने से जरा भी नहीं हिचकते।

यह पहली बार नहीं है जब पटनायक की बेहूदगी सोशल मीडिया पर दिखी हो। ऐसा बराबर ही होता रहता है। पद्मावत विवाद के दौरान, पटनायक का मानना था कि उस समाज के मर्दों को राक्षस सदृश बताया जाए जिसमें महिलाओं को जौहर करना पड़ता है भले ही वो इस्लामी आक्रांताओं के अत्याचार से बचने के लिए किया गया था। उन्होंने उन हिंदुओं पर आरोप लगाया और दावा किया कि उन्हें सिर्फ जलती हुई महिलाएँ पसंद हैं और यहाँ तक कहा कि वो वैवाहिक बलात्कार में लिप्त रहते हैं।

देवदत्त पटनायक की अभद्रता बार-बार ट्विटर पर देखने को मिलती है। हाल ही में ‘माइथोलॉजी एक्सपर्ट’ ने ट्विटर पर एक यूजर से पूछा कि क्या उसके साथ एक बच्चे के रूप में दुर्व्यवहार किया गया था।

एक अन्य ट्वीट में जब एक महिला ने उन्हें सुझाव दिया कि उन्हें अपने जीवन में कुछ सकारात्मक ऊर्जा की आवश्यकता है तो पटनायक ने इसका जवाब देते हुए लिखा कि वो उनकी तरह की ‘नकारात्मक शक्तियों’ को गाली दे रहे हैं।

पटनायक दूसरों की माताओं को गाली देने में भी काफी रुचि दिखाते रहे हैं। एक यूजर ने जब उनसे कुछ पूछा तो उन्होंने बेहद ही घटिया भाषा शैली का इस्तेमाल करते हुए ट्वीट किया, “मैं तुम्हारी माँ से पूछकर बताऊँगा।”

ऐसा लगता है कि पटनायक को सोशल मीडिया पर उनका मजाक उड़ाने वाले लोगों की माताओं को शामिल करने की आदत है। भगवान जाने उन्हें ये आदत कहाँ से लगी, मगर ये बहुत ही गंदी आदत है।

देवदत्त पटनायक को लोगों पर महिलाओं के जलाने का आरोप लगाना खासा पसंद है। उन्होंने 17 नवंबर 2017 को “आप सिर्फ जलती महिलाओं को पसंद करते हैं” वाक्य को लेकर एक साथ कई सारे ट्वीट किए। इस दौरान उन्होंने अपने शब्दों को बदलने की जहमत भी नहीं उठाई और बस प्रवाह के साथ सबको एक ही जवाब देते चले गए।

सोशल मीडिया पर उनके घटिया आचरण के अलावा, त्रुटियों, जोड़तोड़ और एकमुश्त झूठ के लिए उनके काम की काफी आलोचना की गई। उन पर संस्कृत ग्रंथों की गलत व्याख्या करने का आरोप लगाया गया है और कई लोगों का मानना है कि वह एक घटिया तरह के वामपंथी अजेंडे के तहत ऐसा करते हैं।

पटनायक ने वामपंथी हठधर्मिता के कुछ रुग्ण पहलुओं का मुकाबला करने का भी प्रयास किया है, जिसके लिए उन्हें उस तरह के लोगों से आलोचनाएँ भी सुनने को मिली।

पटनायक ने वामपंथियों में व्याप्त ब्राह्मण विरोध पर भी बोला है और कई बार इस्लामी असहिष्णुता पर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की है जिसे हमेशा वामपंथियों द्वारा अनदेखा किया जाता है।

जबकि देवदत्त पट्टनायक खुद को किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में देखना चाहेंगे, जिसने वास्तव में वाम-अधिकार विभाजन की बाधाओं को पार कर लिया है, लेकिन वह वास्तव में वाम-उदारवादी जोकर संसार का एक और प्रमुख चेहरा बन गए हैं। उनके एक या दो ट्वीट ही ऐसे होंगे, जिसमें उनके विचार से समझदार लोग सहमत होंगे। उनके अधिकांश ट्वीट ये दर्शाते हैं कि वो मानसिक तौर पर अस्थिर और विक्षिप्त हैं।

हैरानी की बात ये है कि पटनायक ने ‘देवी’, ‘लक्ष्मी’ और ‘बुक ऑफ काली’ नाम की पुस्तकें लिखी हैं और इसके बावजूद वो महिलाओं और दूसरों की माताओं को लेकर बेहूदा और शर्मनाक ट्वीट करते रहते हैं।

‘एजाज यंग और हॉट हैं, वो MLA का चुनाव जरूर जीतेंगे और एक दिन देश के PM भी बनेंगे’

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। सभी पार्टियाँ जीतने के लिए मेहनत कर रही हैं। भाजपा, कॉन्ग्रेस, एनसीपी, ओवैसी तक अपनी पार्टी के लिए जुटे हुए हैं। इनमें एक दिलचस्प नाम और जुड़ गया है – एजाज खान।

एजाज खान की अपनी एक पहचान है – गालीबाज अभिनेता के तौर पर। मायानगरी मुंबई में कुछ जमा नहीं तो सोचा अभिनेता से नेता बनने को। बस मुँह उठाए और चल दिए ओवैसी भाईजान के पास MLA का टिकट माँगने। ओवैसी ने अपनी पार्टी AIMIM से उन्हें टिकट देने से मना कर दिया

गैस सिलिंडर से बनेंगे विधायक एजाज खान!

बस ‘शेर’ एजाज खान ने ठान लिया कि चाहे कोई साथ दे या ना दे, उन्हें तो चुनाव लड़ना है। फिर क्या था, गैस सिलिंडर छाप के चुनाव चिन्ह के साथ कूद गए मैदान में। लेकिन एजाज के राजनीति में आने से ज्यादा बड़ा भूचाल आना अभी बाकी था। और यह भूचाल आया माहिका शर्मा के रूप में!

पढ़ें: ‘शेर’ एजाज खान आया जेल से लँगड़ाते हुए बाहर, लोगों ने पूछा- सब ठीक तो है?

माहिका शर्मा अभिनेत्री हैं, मॉडल भी है। एजाज की विधायक वाली दावेदारी पर माहिका ने मुहर लगा दी। मतलब अपनी ओर से उनकी जीत पक्की कर दी। और इसके लिए उन्होंने तर्क भी गिनाए। माहिका ने बड़े ही राजनीतिक अंदाज में कहा, “एजाज यंग और हॉट हैं। वो यंग लोगों की बात समझेंगे और शहर को बेहतर विकास देंगे। उनके नेतृत्व में रेप होना बंद हो जाएगा। महिलाओं की पूजा की जाएगी। वो जाति के आधार पर भेदभाव भी खत्म कर देंगे। प्लीज उनको सभी लोग जीत सुनिश्चित करें।”

अपने तर्कों को आगे बढ़ाते हुए माहिका ने एजाज को अभी ही बधाई भी दे डाली। इसके बाद जो उन्होंने कहा, वह भारतीय राजनीति में हिस्सा लेने वाले हर एक नेता का ख्वाब होता है – “एजाज अपने हार्ड वर्क और लगन से बहुत आगे तक जाएँगे। मैं तो उन्हें अभी से ही एक न एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनते देख रही हूँ।”

पढ़ें: जेल से छूटे एजाज खान का बदला सुर, जमकर की मोदी-शाह की प्रशंसा

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि माहिका शर्मा की एक फिल्म आने वाली है – द मॉडर्न कल्चर। इस फिल्म में उनके साथ उनके बॉयफ्रेंड और एडल्ट फिल्मों के स्टार डैनी डी भी होंगे।

मुर्शिदाबाद हत्याकांड: सरकारी ढीलेपन की आलोचना करते हुए बंगाल राज्यपाल ने माँगी रिपोर्ट

पश्चिम बंगाल के गवर्नर जगदीप धनखड़ ने मुर्शिदाबाद में 8 साल के बच्चे समेत परिवार की नृशंस हत्या पर बृहस्पतिवार (10 अक्टूबर) को राज्य सरकार से रिपोर्ट तलब की है। उन्होंने इस पर सरकारी अमले के ढीले-ढाले रवैये की आलोचना करते हुए कहा कि हत्याकांड के बाद इतना समय बीत जाने के बाद भी पुलिस और राज्य मशीनरी की ओर से अपेक्षित गंभीरता का प्रदर्शन नहीं किया गया है। इस बीच अब भाजपा के बाद कॉन्ग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने भी राज्य की ममता बनर्जी सरकार की जगह राष्ट्रपति शासन की माँग कर दी है।

DGP, मुख्य सचिव से की बात    

मामूली स्कूल शिक्षक बन्धु गोपाल पाल, उनकी गर्भवती पत्नी और 8 साल के बेटे की धारदार हथियार से हत्या के मामले को हृदयविदारक बताते हुए राज्यपाल ने DGP और राज्य के मुख्य सचिव से उन्हें यथाशीघ्र मामले पर अपडेट देने के लिए कहा है। साथ ही जाँच में पूरी तरह निष्पक्षता से काम करने का निर्देश दिया है। धनखड़ के मुताबिक इस हत्याकांड की वीभत्सता अंतर्मन को झकझोर कर रख देने वाली है। यह राज्य की बिगड़ती कानून-व्यवस्था का परिचायक है।

‘भाजपा गम्भीर है तो बर्खास्त क्यों नहीं करती ममता सरकार’

इस बीच लोकसभा में कॉन्ग्रेस सांसदों के मुखिया अधीर रंजन चौधरी ने ममता बनर्जी की सरकार को हटा कर राष्ट्रपति शासन लगाने की वकालत की है। साथ ही उन्होंने इस संबंध में भाजपा की गंभीरता पर भी सवाल उठाए।  चौधरी ने कहा, “राज्य के भाजपा नेता पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने की माँग कर रहे हैं। यदि स्थिति ऐसी होती है, और समय की माँग है, तो निश्चित रूप से राष्ट्रपति शासन लगाया जाना चाहिए। लेकिन हमारा सवाल यह है कि क्या भाजपा के नेता इस मुद्दे को लेकर उतने ही गंभीर हैं जितना कि वे दिखाई देते हैं?”

कॉन्ग्रेस नेता ने कहा कि राज्य में वे (भाजपा) राष्ट्रपति शासन के लिए कहते हैं और दिल्ली में वे (भाजपा-तृणमूल) एक-दूसरे के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करते हैं।

MP, राजस्थान के बाद कॉन्ग्रेस ने हरियाणा में भी किया ऋण माफ करने का वादा

हरियाणा विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कॉन्ग्रेस ने आज (अक्टूबर 11,2019) अपना घोषणा पत्र जारी कर दिया। कॉन्ग्रेस ने इस घोषणा पत्र का नाम संकल्प पत्र-2019 दिया है। इस घोषणा पत्र में कॉन्ग्रेस ने एक बार फिर साल 2018 की भाँति जनता को तरह-तरह के वादे करके लुभाने का प्रयास किया है।

हरियाण कॉन्ग्रेस अध्यक्ष कुमारी शैलजा ने बताया कि विधानसभा चुनाव के लिए जारी घोषणा पत्र में सरकारी और निजी नौकरियों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का वादा किया गया है। साथ ही, चुनावी घोषणा पत्र में किसानों एवं गरीब लोगों के लिए ऋण माफी का भी वादा किया गया है।

उन्होंने बताया कि कॉन्ग्रेस सरकार के राज्य में आने पर हरियाणा रोडवेज की बसों मेंं मुफ्त यात्रा की सुविधा मिलेगी। इसके अलावा पार्टी ने अपने घोषण पत्र में अनुसूचित जाति और अत्यंत पिछड़ा वर्ग समुदाय से आने वाले कक्षा 1 से 10 वीं तक के छात्रों को 12 हजार रुपये सालाना और कक्षा 11 और 12 के विद्यार्थियों के लिए 15 हजार रुपये सालाना वजीफा देने का भी वादा किया है। पार्टी ने इस घोषणा पत्र में नगर निगमों और नगर परिषदों में भी 50 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा किया है।

पार्टी ने हरियाणा में नशीली दवाओं के प्रभाव को रोकने के लिए STF के गठन का भी वादा किया है और कहा है कि भाजपा के नेतृत्व में सरकार में हुए सभी कथित घोटालों की जाँच के लिए वह विशेष जाँच पैनल का गठन करेगी। इस संकल्प पत्र-2019 को जारी करने से दौरान हरियाणा के कॉन्ग्रेस प्रभारी गुलाम नबी आजाद, राज्य कॉन्ग्रेस अध्यक्ष कुमारी शैलजा और पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा मौजूद रहे।

गौरतलब है कि साल 2019 के विधानसभा चुनावों से पहले कॉन्ग्रेस ने गत वर्ष के विधानसभा चुनावों में भी राजस्थान और मध्यप्रदेश की जनता से कई तरह के वादे किए थे। लेकिन नतीजा आज सबके सामने हैं। किसान अब भी ऋण माफी की गुहार लगा रहे हैं और महिलाएँ अब भी वहाँ असुरक्षित हैं।

दोनों राज्यों में कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेताओं के बीच ठनी रहने की अक्सर खबरें आती हैं। राजस्थान में गहलोत और पॉयलट के पक्ष में गुट बँटे रहते हैं तो मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और मुख्यमंत्री कमलनाथ एक दूसरे के ख़िलाफ़ ही प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बयानबाजी करने लगते हैं।

हरियाणा में भी इसी तरह कॉन्ग्रेस की स्थिति सुधरी नहीं हैं। घोषणा पत्र में वादे भले ही लुभावने हों, लेकिन चुनावों के आते ही पार्टी के भीतर की कलह साफ दिखने लगी हैं। अभी कुछ दिन पहले का ही यदि उदाहरण लें तो मालूम चलेगा कि अभी पार्टी ने चुनाव लड़ा भी नहीं और अशोक तंवर जैसे नेता कॉन्ग्रेस हेडक्वार्टर के बाहर पार्टी में हो रही गुटबाजी के ख़िलाफ़ नारेबाजी कर रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि राहुल गाँधी के ‘करीबियों की हत्या’ की जा रही हैं। तंवर की मानें तो जिन नेताओं ने राहुल गाँधी को चुना और आगे बढ़ाया, उन्हें एक-एक करके किनारे किया जा रहा है। तंवर हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा और राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आज़ाद पर गुटबाजी भी आरोप लगा चुके हैं।

ऐसी आपसी कलह के बाद अगर दोनों राज्यों (मध्य प्रदेश और राजस्थान) में कॉन्ग्रेस के किए वादों के कार्यान्वयन की बात की जाए तो ज्ञात होगा, दोनों राज्यों में प्रशासन व्यवस्था से लेकर कानून व्यवस्था दिन पर दिन चरमराती जा रही हैं। जिसे खुद पार्टी के नेता भी मानते हैं। बच्चों से लेकर महिलाओं तक और दलित से लेकर किसान तक कॉन्ग्रेस राज से असंतुष्ट हैं।

आए दिन सांप्रदायिक मामलों की बढ़ती घटनाएँ, किसानों की आत्महत्या, प्रशासन की लापरवाही, महिलाओं के बलात्कार उनकी असुरक्षा, बच्चों से क्रूरता की कई खबरें हमें इन राज्यों से सुनने को मिलती हैं, लेकिन चुनावी घोषणा पत्र में किए वादों को पूरा करने की खबर कभी-कभी ही देखने को मिलती हैं। ऐसे में हरियाणा के विधानसभा चुनावों के लिए किए गए वादे पार्टी के लिए बड़े चुनौती हैं, जो उनकी विश्वसनीयता और किए वादों पर सवालिया निशान लगाते हैं।

इलाज का ख़र्च उठाने में असमर्थ दंपति ने 1 साल की बेटी की ‘इच्छा मृत्यु’ के लिए माँगी कोर्ट से अनुमति

आंध्र प्रदेश में एक दंपति ने अदालत में अर्ज़ी दाखिल कर अपनी एक साल की बेटी की इच्छा मृत्यु की अनुमति माँगी क्योंकि वो उसके इलाज का ख़र्च उठाने में असमर्थ है। दरअसल, बावजान और शबाना ने अपनी बेटी सुहाना के लिए इच्छा मृत्यु की अनुमति माँगते हुए गुरुवार (10 अक्टूबर) को चित्तूर ज़िले के मदनापल्ले शहर की एक पारिवारिक अदालत में याचिका दायर की।

दंपति ने अपनी दया याचिका में कहा कि उनकी बेटी सुहाना जन्म के बाद से ही हाइपोग्लाइसीमिया से पीड़ित है। अब तक विभिन्न अस्पतालों में हुए उसके इलाज में 12 लाख रुपए तक ख़र्च हो चुके हैं, लेकिन उसकी हालत में कोई सुधार नहीं है।

एक स्थानीय मीडिया आउटलेट से बात करते हुए, बावजान ने कहा,

“मैं एक दिहाड़ी मज़दूर हूँ और मुझे एक दिन के काम के लिए 300 रुपए मिलते हैं। ज़्यादातर, मुझे यह काम साल में केवल चार महीने के लिए मिलता है। मेरी स्थिति ऐसी है कि मेरे पास कोई अन्य विकल्प नहीं है।”

उन्होंने बताया कि अपनी बेटी के इलाज के लिए उन्होंने अपनी संपत्ति और गहने तक बेच दिए, लेकिन अब उनके पास इलाज के लिए पैसा नहीं है, इसलिए हमने दया की भीख़ के माँगते हुए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। 2016 में, आंध्र के पाँच वर्षीय महेश, जो जन्म से हड्डी के कैंसर से पीड़ित था, बेंगलुरु के इंदिरा अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मृत्यु हो गई थी।

उसकी मृत्यु से ठीक एक सप्ताह पहले, लड़के के पिता बुट्टैया ने आंध्र के चित्तूर में एक स्थानीय अदालत में एक याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने अपने बेटे के लिए इच्छामृत्यु की माँग की थी।

मार्च 2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि गरिमा के साथ मृत्यु एक मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को क़ानूनन वैध ठहराया था। एक विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करते हुए कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि जब तक सरकार इस संबंध में क़ानून नहीं बना देती तब तक ये दिशा-निर्देश लागू रहेंगे। 

निष्क्रिय इच्छा मृत्यु (Passive euthanasia) एक ऐसी स्थिति है जिसमें रोगी कभी ठीक ना हो पाने वाली बीमारी से पीड़ित हों और घोर पीड़ा के दंश को झेल रहे हों। उन्हें सम्मान के साथ अपना जीवन ख़त्म करने की अनुमति है। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली पाँच जजों की संवैधानिक बेंच ने ‘निष्क्रिय इच्छा मृत्यु’ और ‘लिविंग विल’ को कुछ शर्तों के साथ अनुमति दी थी।

‘लिविंग विल’ एक तरह का लिखित दस्तावेज़ होता है जिसमें कोई रोगी पहले से यह निर्देश देता है कि मरणासन्न स्थिति में पहुँचने या रज़ामंदी नहीं दे पाने की स्थिति में पहुँचने पर उसे किस तरह का इलाज दिया जाए। वहीं, निष्क्रिय ‘इच्छा मृत्यु’ की स्थिति एक ऐसी स्थिति होती है जब किसी मरणासन्न व्यक्ति के जीवनरक्षक सपोर्ट को रोक दिया जाए या बंद कर दिया जाए।

अपनी चौथी माँ, और पिता की 13वीं सन्तान हैं शांति नोबेल विजेता अहमद, 20 साल की जंग का किया अंत

2019 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबिय अहमद अली को यह पुरस्कार इरीट्रिया के साथ उनके देश की 20 साल से चली आ रही जंग और सीमा विवाद का अंत करके ‘हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका’ के नाम से जाने जाने वाले क्षेत्र में शांति को बढ़ावा देने के लिए दिया जा रहा है। बाडमे (Badme) नामक एक कस्बे के नियंत्रण का विवाद पिछले 18 साला से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव का केंद्र बना हुआ था। यही मसला 1998-2000 तक चले युद्ध के बाद इरीट्रिया और इथियोपिया के बीच हुई आल्जिएर्स संधि को भी लागू करने में रोड़ा था। अबिय अली ने इस कस्बे का नियंत्रण इरीट्रिया को सौंप दिया

खत्म की अपने देश की हठधर्मिता   

आल्जिएर्स समझौते के अनुसार अंतरराष्ट्रीय सीमा आयोग के निर्णय को लागू करते हुए इथियोपिया को बाडमे इरीट्रिया को सौंप देना था। लेकिन उसने आयोग के निर्णय को नकारते हुए ऐसा करने से मना कर दिया था, जिससे दुनिया के सबसे गरीब देशों में गिने जाने वाले दोनों देशों के बीच ‘शीत संघर्ष’ (frozen conflict) की स्थिति बनी हुई थी

अबिय अहमद अली ने इस संघर्ष की स्थिति का अंत किया और दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध दोबारा शुरू हुए। 8 जुलाई, 2018 को अली इरीट्रिया के राष्ट्राध्यक्ष से मिलने वाले पिछले दो दशकों के पहले इथियोपियाई प्रधानमंत्री बने। दोनों देशों के बीच सीधे दूरसंचार संबंध तक नहीं थे, जो इस मुलाकात के अगले दिन “साझा शांति और मित्रता उद्घोषणा” (Joint Declaration of Peace and Friendship) पर हस्ताक्षर होने के बाद शुरू हुए। इसके अलावा इससे पूरी तरह जमीनी रेखाओं वाले और समुद्र से कटे इथियोपिया को इरीट्रिया के मसावा और आसेब बन्दरगाहों के इस्तेमाल का अधिकार भी मिला।

ईसाईयों-मजहब विशेष में शांति की स्थापना  

खुद ईसाई माँ और चार शादियाँ करने वाले पिता की सन्तान अबिय अहमद अली ने अपने देश में दोनों समुदायों के बीच शांति की स्थापना में भी महती भूमिका का निर्वहन किया है। इथियोपियाई ऑर्थोडॉक्स तेवाहेदो चर्च और इथियोपियाई इलामिक काउंसिल के बीच कई तरह के संघर्ष हैं। सत्ता पर काबिज़ होने के पहले ही साल में अली ने इनका निपटारा करने के लिए कई कदम उठाए। इसके लिए उन्हें दोनों ही समुदायों के मज़हबी संगठनों ने अपने सर्वोच्च शांति पुरस्कारों से नवाज़ा है।