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49 सेलेब्स पर नहीं चलेगा देशद्रोह का केस, आरोप ‘शरारतपूर्ण’, अब वकील पर दर्ज होगा FIR

भीड़ हिंसा के विरोध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुला पत्र लिखने वाले 49 हस्तियों के ख़िलाफ़ दर्ज देशद्रोह के मामले को पुलिस ने बुधवार को बंद करने का फैसला किया है। इस मामले पर आदेश मुजफ्फरपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मनोज सिन्हा ने दिया है। उन्होंने कहा है कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि अब तक की जाँच में इस बात का खुलासा हुआ है कि आरोपितों के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोप “शरारतपूर्ण हैं” और उनमें कोई ठोस आधार नहीं हैं।

उल्लेखनीय है कि इस मामले के संबंध में स्थानीय अधिवक्ता सुधीर कुमार ओझा की एक याचिका पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेस के आदेश के बाद पिछले हफ्ते सदर पुलिस थाने में प्राथमिकी दर्ज हुई थी, जिसपर काफी बवाल हुआ था। कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेताओं से लेकर अभिनेता से राजनेता बने कमल हासन ने भी इसका विरोध किया था। वहीं, वकील ओझा का कहना था कि उनके द्वारा 2 महीने पहले दाखिल की गई याचिका को सीजेएम ने 20 अगस्त को स्वीकार कर लिया था। इसके बाद मुजफ्फरपुर के सदर पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज हुई।

मामला बंद होने पर एडीजी हेडक्वार्टर जीतेंद्र कुमार का कहना है कि शिकायतकर्ता, सबूत उपलब्ध करा पाने में नाकाम रहा। इतना ही नहीं, वह उस पत्र को दिखाने में अक्षम रहा जिसके आधार पर उसने इन हस्तियों पर केस करवाया था। इसके अलावा पुलिस ने जाँच में ये भी पाया कि याचिका दायर करने के पीछे के उद्देश्य उचित नहीं थे। इसलिए वकील के खिलाफ आईपीसी धारा 182 और 211 के तहत मुकदमा दर्ज किया जाएगा।

बिहार पुलिस के इस फैसले के बाद कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता के वेणुगोपाल ने ट्वीट करके अपनी खुशी जाहिर की है। उन्होंने ट्वीट करके बताया है कि उन्हें खुशी है कि बिहार पुलिस ने इन हस्तियों के ख़िलाफ़ दर्ज देशद्रोह के मामले को वापस लेने का आदेश दिया है। उन्होंने कहा, “कोई भी ताकत उन लोगों की आवाज को चुप नहीं करवा सकती जो सच बोलते हैं। जितना वो तुम्हें दबाएँगे उतना तुम मजबूत होगे।”

वहीं बता दें कि इस एफआईआर के दर्ज होने के बाद से कई लोग अफवाह उड़ा रहे थे कि ये केस भाजपा के कारण इन सेलेब्स पर हुआ है, लेकिन केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और बिहार डिप्टी सीएम ने आधिकारिक रूप से बयान देकर स्पष्ट किया कि इससे भाजपा का कोई वास्ता नहीं हैं। केंद्रीय मंत्री जावडेकर ने जहाँ बुद्धिजीवियों और कलाकारों के ख़िलाफ देशद्रोह के मुकदमे के लिए विपक्ष द्वारा मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराना पूरी तरह से गलत बताया है और कहा है कि ये अफवाह निहित स्वार्थ वाले लोगों एवं टुकड़े-टुकड़े गिरोह द्वारा फैलाई जा रही है। वहीं सुशील मोदी ने इसपर बयान देते हुए कहा था कि भाजपा कभी भी भीड़ हिंसा का समर्थन नहीं करती हैं। प्रधानमंत्री को पत्र लिखने वालों के विरुद्ध दायर मामले से बीजेपी या संघ परिवार का कोई वास्ता नहीं है।

गौरतलब है कि इसी वर्ष जुलाई महीने में कुछ अभिनेता-अभिनेत्रियों-फिल्मकार-सामाजिक कार्यकर्ता-इतिहासकार समेत विभिन्न क्षेत्रों के 49 हस्तियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुला पत्र लिखा था। इस पत्र में दलित व अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा बढ़ने का दावा करते हुए प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की माँग की गई थी। इस पत्र में लिखा गया था, “अफसोस की बात है कि जय श्रीराम का इस्तेमाल आज उकसाने के लिए किया जा रहा है। यह युद्धोन्मादी और भड़काऊ नारा है। अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को राम के नाम पर डराया जा रहा है।”

बंगाल: संघ से जुड़े शिक्षक, गर्भवती पत्नी और 8 साल के बेटे की घर में घुसकर हत्या

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में घर में घुसकर अपराधियों ने एक शिक्षक की हत्या कर दी। हत्यारों ने शिक्षक की गर्भवती पत्नी और आठ साल के बेटे को भी नहीं छोड़ा। पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल किए गए धारदार हथियार को मौके से बरामद किया है।

दिल दहलाने वाली यह घटना विजयादशमी के दिन हुई। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार हत्या की वजह अब तक सामने नहीं आई है। पुलिस मामले की छानबीन में जुटी है। संदेह के आधार पर पुलिस ने आसपास के लोगों से पूछताछ भी की है। स्थानीय लोगों ने इस मामले की सीबीआई जाँच की माँग की है।

सूत्रों के अनुसार मृतक बन्धु प्रकाश पाल मुर्शीदाबाद में सागरदीघी इलाके के रहने वाले थे जो कि 17 नम्बर सहपुर प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी जुड़े थे। एक पड़ोसी ने बताया कि विजयादशमी वाले दिन प्रकाश सुबह करीब 10 बजे बाज़ार से लौटे थे। तकरीबन 11 उनके घर से चीखने चिल्लाने की आवाज़ सुनाई पड़ी। इसके बाद एक युवक को उनके घर से बाहर निकलकर भागते देखा गया था।

पड़ोस के लोग जब घर के अन्दर पहुँचे तो वहां का नज़ारा देखकर उनके होश फाख्ता हो गए। पुलिस इस मामले को संपत्ति विवाद से भी जोड़ कर देख रही है। बन्धु प्रकाश के फेसबुक प्रोफाइल पर दुर्गा पूजा पंडाल के वीडियो और परिवार के साथ ली गई तस्वीरों की भरमार है।

सोशल मीडिया में कुछ लोग इसे समुदाय विशेष की करतूत बता रहे हैं, हालाँकि अभी तक ऑपइंडिया इस खबर की पुष्टि नहीं कर पाया है जिसके लिए हमारी टीम प्रयासरत है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, मुर्शिदाबाद समुदाय विशेष के अपराध के लिए कुख्यात रहा है। साथ ही बंगाल में भाजपा और संघ से जुड़े लोगों को निशाना बनाने वाली राजनीतिक हिंसा की घटनाओं में भी हाल में काफी तेजी देखने को मिली है।

ऑपइंडिया Exclusive: बलरामपुर में दुर्गा पूजा जुलूस पर हमला करने वाले लगा रहे थे ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा

जब सारे देश के हिन्दू दुर्गा पूजा मना रहे थे तो उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में एक दूसरे समुदाय के इलाके से गुजर रहे दुर्गा विसर्जन जुलूस पर पत्थरबाजी की घटना हुई। कथित तौर पर तलवार समेत अन्य हथियार भी चले और हिन्दू घायल हुए। ऑपइंडिया से बातचीत में पुलिस अधीक्षक (एसपी) ने एक ओर हमले के पूर्व-निर्धारित होने की आशंका जताई, जिसकी तस्दीक सोशल मीडिया पर वायरल घटना के वीडियो देखकर की जा सकती है, वहीं दूसरी ओर पुलिस ने घटना के पीछे कारण हिन्दुओं द्वारा मस्जिद के सामने डीजे बजाए जाने के चलते समुदाय विशेष के भड़क जाने की बात भी कही है।

ऑपइंडिया ने वहाँ के एक स्थानीय निवासी और हमले में घायल हिन्दू पीड़ित से बात की। घायल प्रत्यक्षदर्शी सूरज पांडे के मुताबिक ही हिन्दू समाज ने जुलूस निकालने के पहले ही दूसरे मजहब वालों से इस बारे में बातचीत की थी। उस समय दूसरे मजहब ने शांतिपूर्वक जुलूस को निकलने देने के आश्वासन भी दिया था, लेकिन बाद में हिन्दुओं पर हमला कर दिया।

‘हर साल का’ नहीं है

सूरज ने दावा किया कि यह तनाव और हिंसा गाँव में कोई ‘आम बात’ नहीं है, जिसे बेवजह तूल दी जा रही है। गाँव में ऐसे किसी साम्प्रदायिक तनाव या हिंसा का कोई इतिहास नहीं रहा है। दुर्गा पूजा का जुलूस निकलता भी प्रति वर्ष उसी रास्ते से था। यही नहीं, हिंसा और पत्थरबाज़ी के पहले समुदाय विशेष के प्रतिनिधि हिन्दुओं से “भाईचारे वाली बात’ कर के गए थे और ऐसा कोई भाव प्रकट नहीं किया था कि उन्हें हर साल होने वाले इस जलसे से कोई दिक्कत या आपत्ति है।

सूरज ने हमें यह भी बताया कि हमले की शुरुआत हिन्दुओं पर, देवी के विग्रह पर कचरा फेंक कर अपवित्र करने से हुई। उसके बाद मस्जिद से हिन्दुओं पर ईंट-पत्थर से हमला होने लगा, जिसके बाद दूसरे मजहब के लोग लाठी-डंडों के इस्तेमाल पर उतर आए। चूँकि हिन्दू दूसरे मजहब वालों द्वारा शांति बनाए रखने के आश्वासन से निश्चिन्त थे और गाँव में किसी तरह के साम्प्रदायिक तनाव का इतिहास भी नहीं था, तो हिन्दुओं के पास आत्मरक्षा करने या हमले का जवाब देने के लिए कोई साधन मौजूद नहीं था।  

गलती की, जो जुल्फिकार को जाने दिया

सूरज आगे अपने जुल्फिकार नामक पड़ोसी के हिंसक बर्ताव का ज़िक्र करते हैं, जिसके बारे में उन्होंने माहौल न बिगड़ने देने के लिए किसी और को नहीं बताया था- और बाद में वह न बताना गलती साबित हुआ। हिंसा वाली गली में ही रहने वाले सूरज के अनुसार जब वे सुबह अपने घर से पूजा स्थल की तरफ़ देवी के जुलूस की शुरुआत करने जा रहे थे, तो उनके पड़ोसी जुल्फिकार ने उन पर ईंट फेंकी। उस समय उन्होंने उस चीज़ पर नाराज़गी जताई, लेकिन जब उसकी बूढ़ी माँ बेटे की तरफ़ से माफ़ी माँगने लगी तो उन्होंने माहौल न बिगाड़ने के लिए मामले को तूल नहीं दिया और इस घटना का ज़िक्र अन्य हिन्दुओं से नहीं किया। लेकिन उन्हें शक हो गया था और बाद में वह सही निकला।

पहले मूर्ति के साथ आए, फिर ‘पाकिस्तान ज़िन्दाबाद’

सूरज ने यह भी बताया कि हमले के समय भीड़ ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे भी लगा रहे थे। उन्होंने एक और चौंकाने वाला दावा यह भी किया कि दूसरे मजहब के कुछ लोग दुर्गा पूजा के जुलूस में सुबह शामिल भी हुए। वे जुलूस के साथ चलते हुए मस्जिद वाली गली तक भी आए और बाद में पथराव करने वाले अन्य मजहबी लोग भीड़ का हिस्सा बन गए। सूरज मुख्य दंगाई के तौर पर हाजी मकबूल, ‘लंगड़’, और नाजिम का नाम लेते हैं।

सूरज के अनुसार दंगा एवं पत्थरबाज़ी करने में “मोहम्मडन” मर्दों के अलावा औरतें और बच्चे भी शामिल थे। उनके पास केवल ईंटें ही नहीं, तलवार जैसे घातक हथियार भी पहले से ही जमा कर के रखे हुए थे। सूरज ने खुद के सर पर तलवार से ही घाव लगने की बात कही। उनके अनुसार उनके सर पर “कम से कम एक इंच” गहरा घाव लगा है।  

हम तो म्यूज़िक पहले ही बंद कर देते हैं

सूरज ने पुलिस के “म्यूज़िक बजाने की वजह से दूसरे मजहब के भड़क गए” के दावे को भी सिरे से ख़ारिज कर दिया। उनके मुताबिक़ पहली बात तो हिन्दू समुदाय ने डीजे और लाउडस्पीकर के लिए अनुमति प्रशासन से ले रखी थी- यानि उन्हें पूरे रास्ते डीजे बजाने का कानूनी हक़ था। यह हक़ होने के बावजूद हिन्दू समुदाय हमेशा से ही आपसी समझदारी के तकाज़े में मस्जिद के पास डीजे बंद कर देता है। इसके लिए बाकायदा गली में एक निशान (“चीना”, चिह्न) बना हुआ है कि इसके आगे नहीं बजाना है, जब तक कि मस्जिद के आगे नहीं बढ़ जाते। इस बार भी हिन्दुओं का डीजे बंद कर देने का पूरा इरादा था- लेकिन दूसरे समुदाय ने उस निशान के पहले ही हमला बोल दिया और डीजे वाले की गाड़ी, म्यूज़िक सिस्टम आदि को क्षतिग्रस्त कर दिया। डीजे गाड़ी का ड्राइवर भी घायल हो गया।

सूरज ने कहा कि वे पुलिस कार्रवाई से संतुष्ट हैं। पुलिस ने सूरज की तहरीर में नामित 24 व्यक्तियों में से 8 को गिरफ्तार कर लिया है और बाकी की सरगर्मी से तलाश जारी है। पुलिस ने इस कार्य के लिए 4 यूनिटें विशेष तैनात की हैं।

सूरज पांडे द्वारा पुलिस को दी गई तहरीर

रफ़ीकुल अली ने माँ लक्ष्मी की मूर्ति जलाई, आभूषण चुराए, पुलिस के हत्थे चढ़ा

असम के बारपेटा में एक और हिन्दू मन्दिर पर हमले की खबर सामने आ रही है। खबर के अनुसार मंगलवार (8 अक्टूबर, 2019) को रफीकुल अली नामक मुस्लिम हमलावर ने लक्ष्मी मन्दिर में घुस कर मन्दिर में आग लगा दी। उस पर इसके अलावा देवी के सोने-चाँदी के आभूषण चुराने, मन्दिर की फ़र्श तोड़ने और मन्दिर में लगे आगामी लक्ष्मी पूजा की जानकारी देने वाले पोस्टर फाड़ने का भी आरोप हैस्थानीय मीडिया के अनुसार लोगों ने हमलावर को पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया।

बताया जा रहा है कि आरोपित रफीकुल पर पहले भी स्कूल-कॉलेज के छात्रों के साथ दुर्व्यवहार करने के आरोप लग चुके हैं। न्यूज़ 18 असम के मुताबिक स्थानीय लोगों ने उस पर ‘बुलींग’ (bullying, गुंडागर्दी और दुर्व्यवहार) का आरोप लगाया है और बताया है कि उसके व्यवहार से क्षेत्र के काफ़ी लोग परेशान थे। उसके खिलाफ़ पुलिस ने तहरीर दर्ज कर ली है और जाँच शुरू हो गई है। लक्ष्मी मन्दिर बारपेटा के उत्कुची इलाके में स्थित है।

लगातार दूसरे साल नवरात्रि पर हिन्दू मन्दिरों पर हमला

यह पहली बार नहीं है कि शारदीय नवरात्रि/दुर्गा पूजा पर असम में मन्दिर और मूर्तियों पर हमला हुआ है। पिछले साल भी दुर्गा पूजा के दौरान दो-दो बार मूर्तियों पर हमले हुए थे। 17 अक्टूबर, 2018 को बारपेटा के ही हाउली में किसी ने दुर्गा पंडाल में घुसकर देवी दुर्गा की मूर्ति के चेहरे के साथ छेड़छाड़ की थी। इलाके में इतना तनाव हो गया कि CRPF तैनात कर धारा 144 लगाने की नौबत आ गई थी। इस घटना के तीन दिन पहले गुवाहाटी के पलटन बाज़ार में किसी ने गणेश और दुर्गा की प्रतिमाओं को खंडित करने की कोशिश की गई थी।

अरुणाचल में माँ दुर्गा की प्रतिमाओं को तोड़ा, तीन गिरफ्तार

अरुणाचल प्रदेश के डोइमुख में मॉं दुर्गा की प्रतिमाओं को तोड़ने की घटना सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक घटना शनिवार-रविवार (5-6 अक्टूबर) की दरम्यानी रात हुई। तोड़फोड़ डोइमुख बाजार वेलफेयर कमिटी के पूजा पंडाल में की गई है

कमिटी के अध्यक्ष डोबम रोबी ने बताया कि इस तरह की घटना पहली बार देखने को मिली है। घटना की निंदा करते हुए उन्होंने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की। इस मामले में पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। डोइमुख बाजार राज्य की सबसे पुरानी टाउनशिपों में से एक है।

गिरफ्तार आरोपित नबाम अचुमा, नबाम सोनाम और ताना चांगरिआंग सोशल मीडिया पर ईसाई समुदाय से ताल्लुक रखने वाले बताए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि मज़हबी द्वेष के चलते इस घटना को अंजाम दिया गया। लेकिन पापुम पारे के पुलिस अधीक्षक (एसपी) जिमी चिरम ने इसे ‘निजी विवाद’ की घटना बताते हुए साम्प्रदायिक एंगल से इंकार किया है। उन्होंने तीनों की उम्र 25-30 वर्ष के बीच की होने की बात कही है। चौथे आरोपित ताम गुमीन की पुलिस सरगर्मी से तलाश कर रही है। स्थानीय मीडिया ने सभी आरोपितों को पापुम पारे का ही बताया है

स्थानीय पुलिस अधिकारी वाईपी यूपिया के मुताबिक मूर्तियाँ तोड़ने के बाद उपद्रवी एक टाटा टियागो कार में बैठकर भाग निकले थे। इसी सूचना के आधार पर पुलिस ने आरोपितों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। पूजा समिति के एक सदस्य ने बताया कि वे सभी वर्गों और संप्रदाय के लोगों के लिए तमाम मेले और त्योहार आयोजित करते हैं। लेकिन ऐसी घटना पहले कभी नहीं हुई।

सुश्री शेहला जी, राजनीति तो आपने घंटा नहीं छोड़ी है और किसी को फर्क भी घंटा नहीं पड़ता

सुश्री शेहला जी ने आवाम को बताया कि वो आने वाले चुनावों से स्वयं को अलग कर रही हैं, क्योंकि ये सब एक दिखावा है। सुश्री रशीद ने यह भी कहा कि भारत सरकार सब-कुछ स्टेज-मैनेज्ड तरीके से दुनिया को बरगलाने के लिए कर रही है। सुश्री रशीद काफी क्षुब्ध थीं और इस अवस्था में भी उन्होंने अंग्रेजी में लम्बा पोस्ट टाइप किया, इसके लिए उन्हें मैं निजी तौर पर साधुवाद देना चाहता हूँ।

सुश्री शेहला जी कश्मीरन है, वामपंथन भी हैं, और श्री कन्हैया कुमार जी की सहयोगी भी रही हैं। साथ ही, कई बार इन्हें उमर ‘टुकड़े-टुकड़े’ खालिद के समर्थन में भी देखा गया है। सुश्री शेहला जी का बहुत छोटा इतिहास फेक न्यूज फैलाने, भारत-विरोधी गतिविधियों को हवा देने और भारत सरकार द्वारा अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने जैसे घिसे-पिटे जुमलों से पटा पड़ा है। लोग इन्हें सिर्फ इसलिए भी जानते हैं कि ‘भैंस पूँछ उठाएगी, तो गाना नहीं गाएगी, गोबर ही करेगी’। ये सिर्फ एक फिल्मी मुहावरा है, जिसका उद्देश्य भैंस प्रजाति का अपमान नहीं है, अतः पेटा एक्टिविस्ट शांत रहें।

सुश्री रशीद ने अपने पोस्ट में कई बातें लिखी हैं, जिससे पोस्ट लम्बा ज़रूर हो गया, लेकिन उसका कसाव जाता रहा। कसाव से तात्पर्य अपनी मूल बात को कहने के लिए कम शब्दों के प्रयोग से है। अंग्रेजी में एक कहावत है, जो मैं जानता हूँ पर नहीं लिखूँगा। सुश्री शेहला जी ने इतना लम्बा लिखा है कि प्रतीत होता है कि अपने इस शाब्दिक दस्त के माध्यम से ‘बड़ा है तो बेहतर है’ को ध्येय वाक्य मानती हैं। जबकि कई बार ‘देखन में छोटन लगे, घाव करे गंभीर’ वाला तरीका बेहतर होता है।

सुश्री शेहला जी ने लेख के अंत में नाम के नीच ‘एक्टिविस्ट’ शब्द का प्रयोग किया है, जबकि आम जानकारी यही बताती है कि ‘एक्टिवा’ नामक दुपहिया वाहन पर बैठने भर से आप एक्टिविस्ट नहीं बन जाते। ख़ैर, हर लाइन में मारक मजा देने वाली वामपंथन ने एक पैराग्राफ में लिखी जा सकने वाली जहरीली बात को बहुत लम्बा खींच दिया है। लब्बोलुआब यह है कि भारत सरकार लाखों कश्मीरियों को सता रही है, बच्चों को किडनैप कर रही है, लोगों को एम्बुलेंस की सुविधा नहीं दे रही है और प्रखंड विकास समिति के चुनावों की घोषणा बाहरी दुनिया को ‘यहाँ सब सामान्य है’ बताने के लिए कर रही है।

भारत सरकार को किसी को कुछ नहीं दिखाना है

सुश्री शेहला कहती हैं कि ये पूरा उपक्रम भारत सिर्फ इसलिए कर रहा है ताकि दुनिया को दिखा सके कि यहाँ सब सामान्य है। यहाँ पर, पूरे लेख की तरह, सुश्री रशीद गलत हैं, क्योंकि कश्मीर पर भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ में आए तमाम देशों को, जिसमें अमेरिका भी शामिल है, सीधे शब्दों में कह दिया कि कश्मीर का मसला भारत का मसला है, और इस पर किसी को कोई राय रखने का, सुझाव देने का कोई हक नहीं है। भारत सरकार वहाँ जो भी कर रही है वो एक संप्रभु राष्ट्र का मामला है, जिसमें किसी भी तरह का विदेशी हस्तक्षेप अवांछनीय है।

इसलिए भारत किसको क्या दिखाने के लिए कर रहा है, ये सुश्री शेहला जी के कई भ्रमों मे से एक है। कश्मीर से लौटे एक डॉक्टर ने हमें बताया कि कश्मीर में सब कुछ सामान्य है, लोगों में उत्सुकता भी है, और कुछ आशंका भी। लेकिन यह कहना कि सारे लोग परेशान हैं, ऐसा मानना गलत है। ‘नेशनल मेडिकोज़ ऑर्गेनाइज़ेशन’ के बैनर तले डॉक्टर प्रशांत वत्स ने कहा कि वो कई संवेदनशील इलाकों में भी गए, जहाँ उन्होंने लोगों से बात भी की।

बातचीत से यह सामने आया कि अलगाववादी वहाँ के लोगों को धमकी दे रहे हैं कि अगर उन्होंने दुकान खोले तो अच्छा नहीं होगा। साथ ही, कई बड़े मॉल और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स इन्हीं अलगाववादियों के स्वामित्व में हैं तो उनके न खुलने से, लोगों की उपस्थिति कम जरूर है, लेकिन वो सरकार के कारण नहीं है। सुरक्षा-व्यवस्था थोड़ी कड़ी है, क्योंकि वहाँ आतंकी स्थिति को बिगाड़ने के लिए मौके की तलाश में हैं। इससे, आम लोगों को थोड़ी तकलीफ जरूर होगी, लेकिन ये उन्हीं की सुरक्षा के लिए हैं।

लेकिन, सुश्री शेहला और उनके गिरोह के लिए कलेजे में ठंढक तो ये खबर पहुँचाएगी कि ‘अनंतनाग में आतंकियों ने फेंका ग्रेनेड, 10 लोग घायल’ क्योंकि ‘लाखों लोग परेशान हैं’ के कोरस गाने के पीछे का लक्ष्य तो यही है कि दो महीने हो गए, और सुश्री रशीद के अरमानों के अनुसार घाटी में अशांति क्यों नहीं फैली? जबकि उम्मीद तो यह थी कि सड़कों पर पत्थरबाज निकलते और ट्रकों से आतंकी। घाटी में खूब रक्तपात होता, पाकिस्तान दुनिया को बताता कि भारत के कश्मीर विभाजन से नाखुश हैं लोग। फिर प्राइम टाइम डिबेट होता, कॉन्ग्रेस और वामपंथी नेता, छात्र नेता और उनके समर्थक बताते कि मोदी ने इस खूनखराबे की नींव रख दी है। मिशन पूरा!

लेकिन ऐसा हुआ नहीं, घाटी शांत रही

ये सब नहीं हुआ, और किसी को मौका ही नहीं मिला यह नैरेटिव बनाने का कि कश्मीरी इस विभाजन से दुखी हैं। वहाँ से लौटे लोग, जो वाकई में संवेदनशील इलाकों के लोगों से बातचीत कर चुके हैं, वो लोगों के बीच के भ्रम की स्थिति की ज़रूर बात करते हैं, लेकिन उन्होंने किसी भी मानवाधिकार के हनन का, या ‘वो भारत में नहीं रहना चाहते’ जैसी अलगाववादी बातों का समर्थन नहीं किया। इसलिए, जिनकी दाल नहीं गली, जिनका सपना पूरा नहीं हुआ, जो वाकई में इस विभाजन से नाराज हैं, उन मुट्ठी भर आतंकियों, जिहादियों या उनके हिमायतियों के स्थानविशेष में दर्द तो, उर्दू में नुक़्ता वाला एक शब्द है, लाज़मी है ना!

सुश्री शेहला जी कहती हैं कि ये सब कहना उनकी नैतिक जिम्मेदारी है। सही बात है, प्रोपेगेंडा फैलाना, झूठ बोलना और फर्जी जानकारी फैलाना उनकी नैतिक जिम्मेदारी तब से है जब से वो इस ‘जिहाद’ में कूदी हैं। अगर एक अलगाववादी, जो पता नहीं किस तर्क से यह मानती है कि कश्मीर के लोगों को ‘आजादी’ का अधिकार है, उस स्थान के विभाजन के बाद शांतिपूर्ण होने, किसी बड़े हिंसक हमले का शिकार न होने, गृहयुद्ध जैसी स्थिति की अनुपस्थिति पर प्रपंच नहीं फैलाएगी तो और क्या करेगी?

इन्होंने हाल ही में, देहरादून में कश्मीरी लड़कियों के बंधक बना लिए जाने की फेक न्यूज फैलाई थी। इसी तरह, आज के पोस्ट में उनके तमाम आरोप बेबुनियाद हैं कि सरकार बच्चों को किडनैप कर रही है, एम्बुलेंस नहीं आ रहे, लाखों लोग बंदी बन कर रहे रहे हैं। ये बातें किसी कमरे में बैठ कर टाइप की गई हैं, क्योंकि अलगाववादियों ने खुद ही डर का माहौल बनाया हुआ है कि कश्मीर के चार जिलों के लोग बाहर न निकलें, दुकानें न खोले वरना उनकी जान ले ली जाएगी। सरकार ने तो सुनिश्चित किया है कि आतंकी और उनके मौसेरे भाई सड़कों पर एके47 ले कर न घूमें, और पत्थरबाजों को एक दिन के पांच सौ रूपए की दिहाड़ी न दें।

सब नाटक है जी!

सुश्री शेहला जी बताती हैं कि जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय दबाव भारत पर बढ़ रहा है, भारत सरकार उन्हें एक चुनाव प्रक्रिया दिखा कर बताना चाहती है कि सब कुछ सही है। मैं भी खबरें पढ़ता हूँ और सिवाय चार-पाँच यूजूअल सस्पैक्ट्स की काल्पनिक कहानियों के, जिसमें न तो नाम होते हैं, न ही कोई सबूत, बस यह लिखा जाता है कि ‘कुछ लोगों ने बताया’, ‘सूत्रों के अनुसार’, ‘नाम न छापने की शर्त पर’, कश्मीर पर कोई भी खबर अब नहीं दिखती। वो इसलिए नहीं दिखती कि सीधा तर्क यह है कि जो कश्मीरी कट्टरपंथी नाराज ही है, वो अपना नाम क्यों नहीं बताता, उसकी वीडियो ये पत्रकार क्यों नहीं लगाते? शुरू में बीबीसी, वाशिंगटन पोस्ट, अल जजीरा, आदि ने फेक न्यूज फैलाई थीं, लेकिन अब किसी भी राष्ट्राध्यक्ष या किसी भी काम के नेता का स्टेटमेंट नहीं आ रहा।

चुनाव इसलिए हो रहे हैं क्योंकि चुनाव ज़रूरी हैं। वहाँ की पूर्व सरकारों ने पंचायत चुनाव तक बंद कर रखे थे और कश्मीर को एक अलग तरह से विकास से दूर रखा गया। बाकी प्रदेशों की तुलना में दस-गुणा फंड पाने के बावजूद कश्मीर में विचित्र तरह की उदासीनता व्याप्त है। सरकारी पैसों को परिवारों और आतंकियों की भेंट चढ़ा कर, आम लोगों को ‘आजादी’ और ‘स्पेशल स्टेटस’ का झुनझुना पकड़ा कर इन नेताओं ने खूब मूर्ख बनाया है। मोदी सरकार ने लोगों को लोकतान्त्रिक प्रकिया का हिस्सा बनाने के लिए एक अस्थाई बात को निरस्त किया और वहाँ के लोगों को सही मायनों में भारतीय बनाने के लिए एक पहल की। इसलिए कुछ जिहादियों को दर्द हो रहा है।

हम तो पैदा भी नहीं हुए थे

सुश्री शेहला जी को लगता है कि कश्मीर भारत से अलग है, या कश्मीर भारत में कुछ अलग जगह है। कश्मीर ने भारत में जुड़ना स्वीकारा, वहीं से उसकी अपनी स्वायत्तता खत्म हो जाती है। आप एक संप्रभु राष्ट्र के भीतर, स्वयं एक अलग राष्ट्र मान कर नहीं रह सकते। सुश्री रशीद ने अपने बापों-दादाओं के पाप से यह कह कर हाथ धो लिया कि कश्मीरी पंडितों का ‘पलायन’ दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी, लेकिन वर्तमान पीढ़ी तो उस वक्त पैदा भी नहीं हुई थी।

ये पंक्ति सुश्री शेहला रशीद के नेतागीरी की तरह ही वाहियात है, क्योंकि आप जब कश्मीरी पंडितों के मार-काट को ‘पलायन’ जैसे सुविधाजनक शब्द में नाप देती हैं, और वर्तमान पीढ़ी की बात करती हैं, तो फिर वर्तमान में जो हो रहा है उसको क्यों नहीं स्वीकार रहीं? आपको अपने बापों-दादाओं के पाप सर पर नहीं लेने, लेकिन उनका अजेंडा पूरा लेना है कि ‘हमको चाहिए आजादी’। ये तरीका वैचारिक दोमुँहेपन वाली गली से हो कर जाता है।

सुश्री शेहला जी इतनी क्यूट हो जाती हैं कि वो कह बैठती हैं कि अभी तक की हर सरकार ने कश्मीर में बस कठपुतलियों को राज करने के लिए बिठाया था। इसमें प्रमुख कठपुतलियाँ शेख अब्दुल्ला, फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, मुफ्ती मोहम्मद सईद और वो महबूबा मुफ्ती हो जाएँगी जिन्होंने उनके ट्वीट को रीट्वीट किया है। फिर, राज कौन करेगा?

इनके हिसाब से वो मुट्ठी भर आतंकी कश्मीर घाटी के लाखों लोगों का भविष्य तय करेंगे क्योंकि उनको ‘आजादी’ चाहिए। अगर आजादी सबको चाहिए होती तो फिर विधानसभा चुनाव में इतने लोग कहाँ से आते हैं? क्या हम ये मान लें कि पूरी दुनिया में चलने वाला लोकतंत्र कश्मीर के लिए अलगाववादतंत्र के हिसाब से चले? क्योंकि कश्मीर स्पेशल है? और जेएनयू में हजार वोट पाकर विद्यार्थी संघ की वाइस प्रेसिडेंट बनना उसे यह अधिकार दे देता है कि वो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर सके?

मैं अपने लोगों के दमन का भागी नहीं हूँ

नहीं, हम इन जिहादियों और आतंकियों के हिमायतियों को यह हक नहीं दे सकते। ज़रूरत है कि इन्हें पनपने से पहले गर्म लोहे से दाग दिया जाए। क्योंकि ये नासूर कैंसर बन कर फैल रहा है, इसे काट कर हटाना ही एकमात्र उपाय है। आज शेहला रशीद अपने आप को, पता नहीं किस तरीके से, सारे कश्मीरियों का प्रतिनिधि मान कर यह कहती फिर रही है कि वो इस चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बन कर ‘अपने लोगों’ के दमन का भागीदार नहीं बनना चाहती।

पहली बात तो यह है कि आखिर किसने, और कब, सुश्री शेहला जी को अपना प्रतिनिधि माना? कोई रैली हो, जहाँ उन्हें ध्वनि मत से कश्मीरियों की नेत्री मान लिया गया हो, किसी मस्जिद में बड़े नेताओं की बैठक में उन्हें हायर टेबल की हेड घोषित किया गया हो, किसी पत्थरबाजों की महासभा ने उन्हें पवित्र पत्थर दे कर अपने नेतृत्व की बागडोर दे दी हो? ऐसा कभी हुआ नहीं, लेकिन वामपंथी मीडिया गिरोह और लम्पट महासभा के लोगों ने इन्हें हवा दी और ये स्वयं ही खुद को अतिगम्भीरता से लेते हुए, पूरी दुनिया, और ब्रह्मांड के जीवों को बता रही हैं कि सात महीने पहले जो राजनैतिक जीवन इन्होंने बिना तेल के दिए शाह फैजल के साथ हो कर शुरू किया था, वो सतमासु हो कर मर गया है।

इसलिए, इन बातों का कोई औचित्य नहीं है। फिर भी, चूँकि वामपंथी मीडिया गिरोह अपनी अघोषित कश्मीरी प्रवक्ता को इतनी तवज्जो देकर, लेखों के जरिए दुनिया को यह बताना चाहता है कि देखो, कश्मीर की एक्टिविस्ट क्या कह रही है, तो ऐसे चम्पुओं पर भी लिखना ज़रूरी हो जाता है। चूँकि, मीडिया का एक धरा और वामपंथी लम्पट समूह इन बातों को ऐसे दिखाना चाहते हैं कि लोकतंत्र की हत्या हो रही है, तो यह बताना ज़रूरी हो जाता है कि लोकतंत्र वास्तव में है क्या।

लोकतंत्र हर नागरिक को अपने मत रखने का अधिकार देता है। मत न रखना भी एक तरह का मत रखना ही है। आप वो अल्पसंख्यक हो सकते हैं जो कहें कि उन्हें कोई भी पसंद नहीं। आप यह भी मत रख सकते हैं कि आपको यह देश ही पसंद नहीं, यहाँ के नियम पसंद नहीं। लेकिन नियम और कानून, संवैधानिक व्यवस्थाएँ, देश के करोड़ों लोगों के प्रतिनिधि तय करते हैं। आपके मतलब के लोग जब प्रतिनिधि बन कर जाएँ, तो बेशक वो आपकी मनोदशा को तरजीह दें, लेकिन यह मानना कि आपके या आपके जैसे सौ लोगों के विचारों की अहमियत उन लाखों कश्मीरियों के विचारों से ज़्यादा मायने रखते हैं तो जान लीजिए कि वो विचार नहीं, विकार हैं, जिनका उपचार आवश्यक है।

लिखना ही तो है, कुछ भी लिख दो कि सरकार युवाओं को लिए कुछ नहीं कर रही, लोकतंत्र की हत्या हो रही है, बच्चों को किडनैप किया जा रहा है। कोई सबूत रखने की जरूरत नहीं, क्योंकि जब इस देश के इतिहास को लिखते वक्त किसी ने सबूत नहीं माँगा कि विलियम जोन्स महोदय, ये जो आपने बेहूदगी की है, वो कल्पनाशीलता है या तथ्य, तो फिर शेहला रशीद जैसों से, जो कि वामपंथी मीडिया गिरोह की लाडली है, उससे कोई सबूत क्यों माँगेगा?

इसलिए, वो बेखौफ लिख सकती है कि भारत सरकार बच्चों को उठा रही है, लोगों को मुख्यधारा से बाहर कर रही है, और मूढ़मति इन बातों को मान लेते हैं। आप यह सोचिए कि ‘स्पेशल स्टेटस’ की चाह, और मुख्यधारा में आना, दोनों में विरोधाभास है कि नहीं? आप स्पेशल भी होना चाहते हैं, और आपको बाकियों की तरह भी होना है!

भारत सरकार ने पहली बार कश्मीरियों की सुरक्षा, विकास और अस्मिता का ख्याल करते हुए, एक अभूतपूर्व कदम उठाया है ताकि वो लाखों लोग जो लगातार आतंक के साये में जीने को मजबूर थे, भारत के हो कर भी, भारत के नहीं थे, जिन्होंने सोते-जागते मानसिक सीमाओं का आकलन किया है, जिनके लिए नेताओं द्वारा उनके हक का पैसा मार लेना एक सामान्य व्यवस्था बन चुकी थी, जहाँ जम्मू के हिन्दुओं और लद्दाख के बौद्धों को दोयम दर्जे का मान कर भेदभाव होता रहा, उन सबके साथ न्याय हो सके।

यही कारण है कि शेहला रशीद जैसे जिहादियों और आतंकियों को हिमायतियों, अलगाववादियों की भाषा बोलने वालों को उन्हीं की भाषा में जवाब देना आवश्यक है। अगर आप हर दिन यह रट रहे हों कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है, कश्मीरियों का दमन हो रहा है, लोकतंत्र की हत्या हो रही है, और सरकार आपके साथ कुछ भी बुरा नहीं कर रही, तो मतलब साफ है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी है, कश्मीरी लोग भी सुरक्षित हैं, और लोकतंत्र भी बरकरार है।

इसलिए अटेंशन पाने के लिए जो भी लम्बे, ढीले, कसावरहित लेख लिख लीजिए, बात तो यही है कि ये कहना भी कि आप चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनना चाहतीं, एक अलग तरह की राजनीति ही है। ये बात और है कि इस ऐलान से मोदी सरकार डर कर चुनाव बंद कराने से तो रही। फिर भी, ‘दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है’।

कश्मीर में शेहला रशीद बनना चाहती थीं नेता, मगर लोकतंत्र की दुहाई दे भाग गईं

समय-समय पर कश्मीर की आज़ादी के लिए आवाज़ उठाने वाली जेएनयू की शेहला रशीद ने चुनावी राजनीति से आजादी का ऐलान कर दिया है। शेहला हाल में कश्मीर को लेकर सनसनीखेज दावें कर सुर्खियों में आई थीं। उन्होंने कहा था कि आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद सेना लोगों को प्रताड़ित कर रही है। इस मामले को लेकर उनके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा किया गया था।

अब उन्होंने कश्मीर की चुनावी राजनीति से अलग रहने का ऐलान किया है। उन्होंने यह घोषणा ऐसे वक्त में की है जब जम्मू-कश्मीर में बीडीसी यानी ब्लॉक डेवलपमेंट कौंसिल के चुनाव होने हैं। राजनीति से तौबा करने का दोष भी उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार पर ही मढ़ा है। उन्होंने कहा है कि कश्मीर में जो कुछ हो रहा है उसे वह बर्दाश्त नहीं कर पा रही, इसलिए चुनावी राजनीति से दूर करने का फैसला किया है। ट्वीट कर उन्होंने बकायदा इसकी जानकारी दी है।

शेहला ने इस साल की शुरुआत में पूर्व आईएएस और जम्मू-कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट (जेकेपीएम) के नेता शाह फैसल की पार्टी भी ज्वाइन की थी। लेकिन, केंद्र सरकार ने 5 अगस्त को अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया। इसके बाद से आतंकवाद की दुकान बंद होने के गम में देशभर के वामपंथी गिरोह तमाम तरीकों से छाती कूटकर कर अपना गुस्सा ज़ाहिर कर रहे हैं। मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर राज्य को दो नए केंद्र शासित जम्मू/कश्मीर और लद्दाख प्रान्त में बाँट दिया है। इनमे से एक (लद्दाख) को पूर्ण केंद्र शासित प्रदेश होगा, जबकि दूसरा (जम्मू-कश्मीर) में विधानसभा के साथ केंद्र शासित प्रदेश होगा।

UN में जेहादी ऐलान का इमरान को इनाम: जॉर्डन की संस्था ने ‘मुस्लिम मैन ऑफ द ईयर’ से नवाजा

जम्मू-कश्मीर के मसले पर भारत के ख़िलाफ़ लगातार जहर उगलने के बीच और संयुक्त राष्ट्र में जाकर इस्लामी देशों की एकता की बात करने के बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान को एक बड़ा अवॉर्ड मिला है। इस अवॉर्ड का नाम ‘मुस्लिम मैन ऑफ द ईयर’ है। उन्हें ये सम्मान उस दौरान दिया गया है जब यूएन में उन्होने खुलकर अपने भाषण के दौरान जिहाद की बात की और परमाणु युद्ध की धमकी दी।

जॉर्डन की रॉयल इस्लामिक स्ट्रेटेजिक स्टडीज़ सेंटर नाम की संस्था ने इमरान को ये अवॉर्ड दिया है। इसमें उनके क्रिकेट के क्षेत्र में दिए योगदान और राजनैतिक करियर को अहम बताया गया है। इमरान के अलावा इस संस्था की ओर से अमेरिकी नेता राशिदा तैलब को वुमेन ऑफ द ईयर का अवॉर्ड मिला।

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जॉर्डन के इस संस्था ने प्रेस रिलीज जारी कर कहा है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने पहले खेल की दुनिया में अपना और देश का नाम रोशन करते हुए वर्ल्ड कप जीता। उसके बाद राजनीति में आए तो सीधे प्रधानमंत्री बन गए, इसलिए उनका जीवन मुस्लिम लोगों के लिए प्रेरणादायी है।

कश्मीर मुद्दे का जिक्र करते हुए जॉर्डन ने इमरान सरकार की तारीफ़ की। दावा किया गया है कि इमरान ने इस मसले पर भारत से बात करने का प्रयास किया है, लेकिन अभी तक उनके मनमुताबिक नतीजा सामने नहीं आया है।

अब जॉर्डन की इस संस्था इस्लामिक स्ट्रेटेजिक स्टडीज़ सेंटर की बात करें तो बता दें कि ये हर साल प्रभावशाली मुस्लिमों की लिस्ट निकालती है। जिनमें टॉप 500 मुस्लिमों के नाम होते हैं, इसी में इस वर्ष इमरान खान का भी नाम आया है। संस्था द्वारा जारी लिस्ट में महिलाओं और पुरुषों दोनों का नाम होता है। गत वर्ष इस संस्था ने तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोगन को मुस्लिम मैन ऑफ द ईयर का अवॉर्ड दिया था।

गौरतलब है कि इमरान खान को यह अवॉर्ड मिलने की जानकारी उनकी पार्टी ने अपने ट्विटर हैंडल से भी दी है। जिसके बाद कुछ यूजर्स ने उन्हें इसके लिए बधाई दी और उन्हें इस अवॉर्ड के लिए सबसे योग्य बताया, तो कुछ ने मीम्स शेयर करते हुए उनकी खिल्ली उड़ाई है।

एक यूजर ने उनके ट्वीट पर कमेंट किया है कि इस अवॉर्ड से बेहतर उन्हें ‘बेगर ऑफ द ईयर’ कहना बेहतर रहेगा, जिसने पूरे मुल्क को बेगर बना दिया।

वहीं, एक यूजर ने लिखा जबसे पाकिस्तान अस्त्तिव में आया तबसे ये अवॉर्ड उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। बहुत खूब पाकिस्तान।

POK से आए 5300 परिवारों को मिलेगा ₹5.5 लाख, 370 के कारण जीना था दुश्वार

पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (POK) छोड़ कर हिंदुस्तान में ‘रिफ्यूजी’ की ज़िंदगी बसर करने को मजबूर 5,300 परिवारों को भारत सरकार ₹5.5 लाख प्रति परिवार का मुआवजा देगी। इन परिवारों को सालों से कश्मीर में रहने के बावजूद पीओके से भारत आए शरणार्थियों को मिलने वाली सामान्य धनराशि इसलिए उपलब्ध नहीं हो पा रही थी, क्योंकि 370 के तहत उनको कश्मीर के ‘डोमिसाइल’ का सर्टिफ़िकेट नहीं मिला हुआ था। अब 370 हटने के बाद इस सर्टिफ़िकेट का कोई औचित्य ही नहीं है।

केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने आज (बुधवार, 9 अक्टूबर 2019) प्रेस को सम्बोधित करते हुए केंद्र सरकार के इस कदम की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जिन परिवारों को यह आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है, वे POK से आने के बाद पहले तो जम्मू-कश्मीर के बाहर देश के दूसरे हिस्सों में बसे। बाद में वे जम्मू-कश्मीर चले गए।

उनकी शोचनीय स्थिति और आर्थिक तंगी के बारे में अनुच्छेद 370 हटने के तुरंत बाद 13 अगस्त 2019 को इकोनॉमिक टाइम्स में भी एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। उस रिपोर्ट के अनुसार करीब 1.5 लाख परिवार, यानी 10 लाख शरणार्थी आज भी शिविरों में रहने के लिए मजबूर हैं। रिपोर्ट में यह भी उल्लिखित था कि नवंबर, 2015 में केंद्र ने ₹2,000 करोड़ के एक “वन-टाइम सेटेलमेंट” पैकेज की घोषणा की थी। उसे भी यह शरणार्थी इसलिए नहीं ले पाए क्योंकि उनके पास डोमिसाइल सर्टिफ़िकेट नहीं था।

विधानसभा सीटों की भी माँग

उस समय एक और महत्वपूर्ण माँग थी, जिस पर अभी भी केंद्र का निर्णय लंबित है। वह माँग थी कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा में खाली छोड़ी जा रहीं POK के हिस्से की 24 सीटों में से कम-से-कम एक-तिहाई POK के शरणार्थियों से भरीं जाएँ। 5 अगस्त को अनुच्छेद 370 हटने के बाद से यह माँग कई बार विभिन्न मौकों पर की जा चुकी है।

उइगर मुस्लिम के कब्र की जगह लॉलीपॉप लिए पांडा: चीन ने 5 साल में तबाह कर दिए कई इस्लामी कब्रगाह

उइगर मुस्लिमों पर अत्याचार के लिए चीन हमेशा नए-नए तरीके अपनाता रहा है। अब चीन ने उइगर मुस्लिमों के मरने के बाद भी उनकी शांति छीनने वाला काम शुरू किया है। चीन में उइगर मुस्लिमों के कई कब्रगाहों को तबाह कर दिया गया है। ये वो कब्रगाह थे, जहाँ उइगर मुस्लिमों की कई पीढ़ियों के लोगों को मरने के बाद दफ़न किया जाता रहा है। मृतकों की हड्डियाँ बिखरी पड़ी हैं और कब्रों को तहस-नहस कर दिया गया है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि चीन ने उइगर मुस्लिमों को पूरी तरह मिटाने की ठान ली है। शिनजियांग में केवल 2 सालों में ही कई दर्जन कब्रगाहों को तबाह कर दिया गया है।

सैटेलाइट इमेज के अनुसार हुए खुलासे से इस बात का पता चला है। एएफपी ने कई फोटो जारी किए हैं, जिसमें देखा जा सकता है कि मृतकों की हड्डियाँ इधर-उधर बिखरी पड़ी हैं और कब्रगाहों की ईंटें फैली हुई हैं। यह दिखाता है कि चीन ने इन कब्रगाहों को तबाह करने में जरा सी भी संवेदनशीलता का परिचय नहीं दिया और मृतकों तक को नहीं बख़्शा।

उइगर मुस्लिमों के कब्रगाह में चीन की तबाही का आलम: बिखरी पड़ी हड्डियाँ

चीन ने इन कब्रगाहों को विकास की आड़ में तबाह किया है। कई कब्रगाहों को तबाह करने के पीछे विकास और इंडस्ट्री बिठाने जैसे कारण आधिकारिक रूप से बताए गए। वहीं कई अन्य कब्रगाहों को तबाह करने के पीछे का कारण उन्हें मॉडर्न बनाने का प्रयास बताया गया। उइगर मुस्लिमों का कहना है कि चीन की सरकार उनके जीवन के हर एक क्षेत्र पर कब्ज़ा करना चाहती है। एक उइगर कार्यकर्ता ने बताया कि चीन उनके समाज की हर एक निशानी को मिटा रहा है ताकि कुछ दिनों बाद वे लोग ख़ुद के बारे में ही अनजान बन जाएँ।

एक उइगर कार्यकर्ता ने बताया कि उसके दादा के दादा जिस कब्रगाह में दफ़न किए गए थे, उस कब्रगाह को तबाह कर दिया गया है। उइगर कार्यकर्ताओं ने बताया कि उनके इतिहास, उनकी पहचान और उनकी पूर्वजों की हर एक निशानी मिटाई जा रही है। लगभग 10 लाख उइगर मुस्लिमों को पकड़ कर शिक्षा देने के नाम पर चीन के डिटेंशन कैम्पस में रखा गया है। वहाँ उन्हें अपने मजहब का कोई भी चीज प्रैक्टिस नहीं करने दिया जाता। अगर कुछ उइगर मुस्लिम बाहर भी हैं तो उन्हें वही सब करना होता है, जो चीन की सरकार चाहती है। खुले में नमाज पढ़ने से लेकर क़ुरान रखने तक, उन पर कई पाबंदियाँ हैं।

उइगर मुस्लिमों के कब्र की तबाही के बाद ऐसी हालत हो गई है

विश्व भर में चल रही आलोचना के बाद भी चीन अपनी हरकतों पर अडिग है। मानवाधिकार के मुद्दे को लेकर अमेरिका ने भी कई चीनी अधिकारियों को वीजा देने से इनकार कर दिया है। अगर आँकड़ों की बात करें तो 2014 से लेकर अब तक चीन ने 45 उइगर कब्रगाहों को तबाह कर दिया है। पिछले दो साल की बात करें तो यह आँकड़ा 30 हो जाता है। शिनजियांग के उइगर कार्यकर्ताओं ने बताया कि यह सिर्फ़ मजहब को लेकर अत्याचार नहीं है बल्कि इसकी जड़ें और भी गहरी हैं। एक उइगर कवि के कब्र का तो कोई अता-पता ही नहीं है। उनके कब्र की जगह वहाँ हाथ में लॉलीपॉप लिए एक पांडा की मूर्ति है।

कई लोकप्रिय उइगर नेताओं या स्थानीय वरिष्ठ लोगों के मरने के बाद उनके कब्र पर उनका विवरण और तस्वीरें लगाई जाती हैं। चीन ने इन सब तक को भी तबाह कर दिया। चीन की सरकार ने कई उइगर कब्रगाहों को कहीं और शिफ्ट कर दिया है। हर कब्रगाह को तबाह करने के पीछे अलग-अलग आधिकारिक कारण गिनाए गए हैं। चीन ने जहाँ नए कब्रगाह बनाए हैं, वहाँ लिखा गया है कि ये कब्रगाह वातावरण को नुकसान नहीं पहुँचाता है और यहाँ सभ्य तरीके से अंतिम क्रिया संपन्न की जाएगी। इसका अर्थ यह है कि उइगर अब किस रीति-रिवाज से अपने समाज के मृतकों को दफ़नाएँगे, यह भी चीन ही तय करेगा।