जम्मू-कश्मीर में आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद की ओर से संभावित खतरे को देखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने गुरुवार को दिल्ली लौटने से पहले कश्मीर घाटी में सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की। बता दें कि अजीत डोभाल ने जम्मू एवं कश्मीर में बड़े आतंकी हमले की आशंका जताए जाने के बाद एक बार फिर इस केंद्र शासित राज्य का दौरा किया।
क्योंकि, हाल ही में मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, खुफिया एजेंसियों से मिली सूचना व अन्य रिपोर्टो में बताया गया है कि नियंत्रण रेखा और अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर पाकिस्तान की तरफ से 450 से 500 आतंकवादी राज्य में घुसने के लिए घात लगाए बैठे हैं। पाकिस्तान कश्मीर में अशांति फैलाने की लगातार कोशिश में लगा है। डोभाल ने सुरक्षा एजेंसियों को हाई अलर्ट रहने और काउंटर इंफिल्ट्रेशन ग्रिड को मजबूत रखने का आदेश दिया।
Jammu & Kashmir: National Security Advisor (NSA), Ajit Doval also asked security forces to be on high alert on the borders and strengthen the counter infiltration grid in view of reports about large scale infiltration attempts. https://t.co/TVMMUTKvdQ
रिपोर्ट्स के अनुसार, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने गुरुवार को कश्मीर में अधिकारियों के साथ उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता की और सुरक्षा अधिकारियों को निर्देश दिए कि आतंकवाद निरोधक अभियान में और तेजी लाएँ। साथ ही जम्मू-कश्मीर के आम लोगों के जीवन में सुधार के लिए भी काम करें।
Jammu & Kashmir: National Security Advisor (NSA), Ajit Doval, who was on one and a half day visit to Kashmir Valley, chaired a high-level meeting in Srinagar today. He reviewed the law and order situation, and position of essential services and supplies in Kashmir valley. pic.twitter.com/g2Mu7bDwwC
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बुधवार को कश्मीर पहुँचे डोभाल ने सुरक्षा अधिकारियों और नौकरशाहों के साथ कई बैठकें कीं। जिस दौरान उन्होंने यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए कि आतंकवादी समूहों से भयभीत हुए बगैर आम आदमी अपनी दिनचर्या का ठीक तरीके से पालन कर सके इसका खयाल रखा जाए।
रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों ने बताया कि एनएसए ने सुरक्षा स्थिति की समीक्षा की और अधिकारियों को निर्देश दिए कि आतंकवाद के खिलाफ अभियान के दौरान सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि नागरिकों के जानमाल को नुकसान नहीं पहुँचे। उन्होंने कहा कि यह पहल इन खबरों के बाद की गई है कि आतंकवादी नागरिकों, सेब उत्पादकों को धमका रहे हैं, दुकानों को बंद रखने के लिए कहकर, जबर्दस्ती कर्फ्यू जैसी स्थिति पैदा कर रहे हैं।
बता दें कि नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने की घोषणा करने के बाद एनएसए ने अपनी पहली यात्रा के दौरान कश्मीर में 11 दिनों तक डेरा डाला था। उस दौरान डोभाल ने सुनिश्चित किया था कि सरकार के निर्णय के बाद जम्मू-कश्मीर में हिंसा की कोई घटना नहीं हो।
केरल के एक चर्च पर नियंत्रण को लेकर ईसाई समुदायों की लड़ाई थमने का नाम नहीं ले रही है। एर्नाकुलम ज़िले के पिरवोम स्थित सेंट मेरी चर्च में उस समय अफ़रा-तफ़री मच गई जब सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार पुलिस ने चर्च में प्रवेश करने की कोशिश की।
पिरवोम में स्थित चर्च में गुरुवार को उस समय हालात बिगड़ गए जब ऑर्थोडॉक्स ग्रुप ने नियंत्रण लेने की कोशिश की और जैकबाइट्स ने नियंत्रण देने से इनकार कर दिया। आत्महत्या की धमकियों के बीच, जिला कलेक्टर एस सुहास मौके पर पहुँचे और प्रदर्शनकारियों के साथ उन्होंने बात की। उन्होंने कहा कि पुलिस प्रशासन शीर्ष अदालत के आदेशों का पालन कर रही है। आख़िरकार, पुलिस ने चर्च में प्रवेश किया और प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार करना शुरू कर दिया। दरअसल पुलिस इतनी मुस्तैदी इसलिए दिखा रही है क्योंकि कोर्ट ने अपने आदेश पर की गई कार्रवाई की गुरुवार दोपहर 1.45 बजे तक रिपोर्ट माँगी थी।
दरअसल, चर्च का संचालन अपने हाथ में लेने के लिए जैकोबाइट ईसाई और ऑर्थोडॉक्स ईसाई एक-दूसरे से लड़ रहे हैं। फ़िलहाल चर्च पर जैकोबाइट ईसाइयों का नियंत्रण है।
बता दें कि 3 जुलाई 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने चर्च प्रशासन को ऑर्थोडॉक्स ईसाइयों को देने का आदेश दिया था। इस आदेश के चलते 1,100 चर्च का नियंत्रण ऑर्थोडॉक्स ईसाइयों के पास चला गया।
2017 में, सुप्रीम कोर्ट ने मलंकरा चर्च के 1934 के संविधान को बरक़रार रखा था जिसके तहत केरल में 1,100 पैरिश (पादरी का इलाक़ा) और चर्चों के नियंत्रण को ऑर्थोडॉक्स समूह के नियंत्रण में देना था, लेकिन अधिकांश चर्चों को नियंत्रित करने वाले जैकबाइट्स इस बात के लिए तैयार नहीं थे।
केरल में इस तनाव को लेकर राजनीति भी गरमा गई है। राज्य में उपचुनाव होने हैं और नेतागण दोनों ही समुदायों की जनसंख्या को देखते हुए उन्हें अपनी तरह लुभाने में लगे हैं। जैकोबाइट पादरियों ने ऑर्थोडॉक्स ईसाई मानवाधिकार उल्लंघन करने का आरोप लगाया। जैकोबाइट ईसाई ने विरोध में धरना दिया, जिसमें केरल सरकार और विपक्ष के कई नेता शामिल हुए। वहीं, जैकोबाइट धड़े का आरोप है कि ऑर्थोडॉक्स उनके मृत रिश्तेदारों की अंतिम क्रिया में भी बाधा पहुँचा रहे हैं और यहाँ तक कि मरे हुए लोगों को भी शांति से नहीं रहने दे रहे।
इसी मामले में केरल हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ जाते हुए यथास्थिति बहाल रखने का निर्णय दिया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उच्च न्यायालय को उच्चतम न्यायालय के आदेश के साथ छेड़छाड़ करने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने जोड़ा था कि केरल के जजों को यह बताया जाना चाहिए कि वे भी भारत के ही अंग हैं। एक बुजुर्ग महिला की मृत्यु के बाद चर्च के ऑर्थोडॉक्स गुट ने परिवार की बात न मानते हुए जैकोबाइट पादरी से अंतिम क्रिया-कर्म की प्रक्रिया संपन्न कराने से मना कर दिया था, जिसके बाद दोनों गुट भिड़ गए थे।
मीडिया खबरों के मुताबिक गाज़ीपुर के पूर्व सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा को दिवंगत नेता अरुण जेटली की जगह पर राज्य सभा में भेजा जा सकता है। पूर्व वित्त और कॉर्पोरेट मंत्री जेटली का लम्बी बीमारी के बाद 24 अगस्त को निधन हो गया था। वहीं मोदी सरकार 1.0 में मंत्री रहे मनोज सिन्हा 1.2 लाख मतों से 2019 में बसपा के अफ़ज़ल अंसारी से हार गए थे।
2024 तक रहेंगे सांसद
केंद्रीय निर्वाचन आयोग ने 26 सितंबर को जेटली और पूर्व कानून मंत्री राम जेठमलानी के निधन से खाली हुई सीटों पर चुनाव की घोषणा की है। 16 अक्टूबर को यह चुनाव होंगे। अगर मनोज सिन्हा अरुण जेटली की सीट पर काबिज़ होने में सफल रहते हैं तो वे अप्रैल 2024 तक इस पद पर बने रहेंगे। जेटली उत्तर प्रदेश और जेठमलानी बिहार के सांसद थे। मीडिया खबरों के मुताबिक इस बाबत सिन्हा ने भाजपा के पूर्णकालिक अध्यक्ष अमित शाह और कार्यकारी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा से मुलाकात आज (26 सितंबर को) मुलाकात की है।
18 को परिणाम, यूपी में भाजपा प्रत्याशी की जीत तय
उत्तर प्रदेश विधानसभा में भाजपा के पास 325 विधायकों के साथ तीन-चौथाई से अधिक बहुमत है। इसलिए वहाँ के भाजपा प्रत्याशी की जीत तय है।
निर्वाचन आयोग के आदेश के अनुसार 27 सितंबर (कल) से चुनाव की घोषणा अधिसूचित मानी जाएगी, और उसी दिन से नामांकन प्रक्रिया भी प्रारंभ हो जाएगी। नामांकन की अंतिम तिथि 4 अक्टूबर है। इसके बाद 5 तारीख को छँटनी होगी, और 9 अक्टूबर तक प्रत्याशी अपना नाम वापिस ले सकते हैं। 16 अक्टूबर को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक मतदान, और उसके बाद मतगणना कर 18 को परिणाम घोषित कर दिए जाएँगे।
Election Commission of India announces by polls for two Rajya Sabha seats, one each from Uttar Pradesh and Bihar, on October 16.The seats have been vacated after the deaths of former Finance Minister Arun Jaitley&senior Supreme Court Advocate&former Union Minister,Ram Jethmalani. pic.twitter.com/fNeFlAfIkn
कर्नाटक में 21 अक्टूबर को होने जा रहे 15 विधानसभा सीटों के उपचुनाव को निर्वाचन आयोग ने फ़िलहाल स्थगित करने का निर्णय लिया है। ऐसा सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के इंतज़ार में किया गया है, ताकि अयोग्य घोषित हुए विधायकों की याचिका पर उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले से स्थिति स्पष्ट हो सके। केंद्रीय निर्वाचन आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने यह बात सुप्रीम कोर्ट में आज (26 सितंबर) को कही।
संविधान के दुरुपयोग की याचिका
कॉन्ग्रेस के 13, जदएस के 3 और एक स्वतंत्र विधायक को कर्नाटक विधान सोउधा (विधान सभा) के तत्कालीन अध्यक्ष केआर रमेश कुमार ने जुलाई में सदन के लिए अयोग्य करार दिया था। इन विधायकों के हट जाने से एचडी कुमारास्वामी की कॉन्ग्रेस-जदएस सरकार गिर गई थी, और बीएस येद्दियुरप्पा 26 जुलाई को कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने थे। उसके बाद स्पीकर केआर रमेश कुमार ने भी सदन की अध्यक्षता से त्यागपत्र दे दिया था। कॉन्ग्रेस और जेडीएस दोनों ने ही भाजपा पर विधायकों को पैसे और मंत्रिपद का लालच देकर उनके इस्तीफ़े लेने का आरोप लगाया था।
तत्पश्चात निष्कासित विधायकों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था। उन्होंने दावा किया था कि कुमार का निर्णय पूरी तरह अवैध, स्वेच्छाचारी और संविधान की 10वीं अनुसूची में मिली शक्तियों का दुरुपयोग था। इसके अलावा उनके खुद से दिए गए इस्तीफ़ों को ‘बेईमान’ और ‘स्वेच्छा से नहीं’ करार देने के स्पीकर के फैसले पर भी पूर्व-विधायकों ने सवाल उठाया।
‘आप ही दे दीजिए दिशानिर्देश’
सुप्रीम कोर्ट से ही दिशानिर्देश की माँग करते हुए कर्नाटक विधान सोउधा अध्यक्ष के कार्यालय ने कहा कि इस्तीफ़ा देना विधायकों का लोकतान्त्रिक अधिकार है, और न्यायपालिका को स्पीकरों के लिए एक दिशानिर्देश तय कर देने चाहिए। विधानसभा अध्यक्ष के वकील सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जस्टिस एनवी रमण की अध्यक्षता वाली तीन-सदस्यीय पीठ को बताया कि विधायकों को अयोग्य पार्टी से इस्तीफ़ा देने पर करार दिया जा सकता है, लेकिन सदन से इस्तीफ़ा देने पर नहीं। निर्वाचन आयोग ने तीन दिन पहले (23 सितंबर को) अदालत को बताया था कि इन 17 विधायकों को उपचुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
कभी ब्रिटिश मुस्लिम ऑफ द ईयर अवॉर्ड के लिए नामांकित होने वाली सुमैरा फारुख के खिलाफ पुलिस ने जाँच शुरू कर दिया है। दरअसल, सुमैरा ने जम्मू कश्मीर से आर्टिकल 370 के निरस्त होने के बाद पिछले महीने बर्मिंघम में विरोध रैली का आयोजन किया था। इसमें सैकड़ों की संख्या में लोग शामिल हुए थे, जो कश्मीर से 370 निरस्त होने का विरोध कर रहे थे। इस दौरान सुमैरा खान ने लोगों को संबोधित करते हुए बयान दिया था कि ‘जिहाद ही इसका एकमात्र उपाय है।’ बता दें कि वह 2017 में ब्रिटिश मुस्लिम ऑफ द ईयर अवार्ड्स में ‘बिज़नेसवुमन ऑफ़ द ईयर’ कैटेगरी में हारने वाली फाइनलिस्ट थीं।
सुमैरा फारुख, जो पहले प्रिंस चार्ल्स के साथ फोटो खिंचवा चुकी हैं, ने सैकड़ों लोगों की भीड़ से कहा कि कश्मीर से कर्फ्यू हटाने के लिए आज एक सिर्फ एक ही नारा है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय को एक बात सच-सच बताना है कि इसका केवल एक ही समाधान है, और वो है जिहाद। कोई विरोध नहीं, कुछ भी नहीं, बस जिहाद।
बता दें कि सुमैरा फारूख, एक बिजनेसवुमैन होने के साथ ही एक पत्रकार भी हैं। उन्होंने भारतीय संघ के साथ जम्मू और कश्मीर को पूरी तरह से एकीकृत करने के भारत के फैसले के खिलाफ कार्रवाई की माँग की थी। ठीक 24 घंटे पहले, वहाँ के उप नेता टॉम वाटसन, जैक ड्रोमी और लियाम बायरन समेत शीर्ष श्रम सांसदों के एक मेजबान ने उसी स्थान पर एकसमान विरोध में भाषण दिए थे।
अपने ऊपर लगे आरोपों पर बचाव करते हुए समैरा फारुख ने हिंसा भड़काने से इनकार किया और दावा किया कि उन्हें इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वह एक मुखर महिला हैं। अपनी टिप्पणियों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “जिहाद का कोई विशेष अर्थ नहीं है। यदि आपको यूके की सरकार के साथ कोई समस्या है और आप अपनी आवाज उठाना चाहते हैं, तो इस्लाम के अर्थ में संघर्ष को जिहाद कहा जाता है। मुस्लिम उस संदर्भ में शब्द का अर्थ जानते हैं। क्या आपको लगता है कि मैं ऐसी इंसान हूँ, जो उस शब्द का उपयोग लोगों को लड़ने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए करूँगी? मैं समुदायों और ब्रिटिश सेना के साथ काम करती हूँ, जो एशियाई समुदाय को सेना में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करता है। मैं हिंसा को कैसे प्रोत्साहित कर सकती हूँ?”
वहीं, जब सुमैरा फारूख से पूछा गया कि उन्होंने जिस शब्द का इस्तेमाल किया है, क्या उन्हें करना चाहिए था, तो उन्होंने इसके जवाब में कहा, “जो लोग मेरी आलोचना कर रहे हैं, वे वही हैं जो नहीं चाहते हैं कि एक महिला बोले। वहाँ लोग कह रहे हैं कि हम बंदूकों के साथ आज़ादी पाने जा रहे हैं। लोग बुरे शब्दों का उच्चारण कर रहे हैं, कह रहे हैं बाहर आओ और लड़ो, लेकिन वे जाँच नहीं करते हैं। लोग हमेशा मुझ पर हमला करते हैं क्योंकि मैं एक मुखर महिला हूँ।”
पुलिस ने इस बात की पुष्टि की है कि वे इस मामले की जाँच कर रहे हैं। वेस्ट मिडलैंड्स पुलिस के एक प्रवक्ता ने कहा, “हम यह देखने के लिए उपलब्ध कॉन्टेंट का आकलन कर रहे हैं कि क्या कोई अपराध किया गया है।”
इस्लामिक स्टेट (आईएस) से छिटके जिहाद सेल और अल-कायदा भारत पर जिहादी हमले की तैयारी कर रहे हैं। निशाने पर होंगे यहूदी, और अन्य इज़राइली नागरिक। इंटेलिजेंस एजेंसियों के मुताबिक यह हमला उनके त्यौहारों और छुट्टियों के समय यानि सितंबर-अक्टूबर में किए जाए सकते हैं। सुरक्षा एजेंसियों ने इस बाबत बड़ी यहूदी आबादी वाले राज्यों को सतर्क करना शुरू कर दिया है।
तीन यहूदी त्यौहार होंगे अगले एक महीने में
अगले एक महीने में यहूदियों के तीन महत्वपूर्ण त्यौहार होंगे। शुरूआत 29 सितंबर से 1 अक्टूबर तक रोष हाशानह से होगी, उसके बाद यहूदियों का पवित्रतम दिन योम किप्पुर 8-9 अक्टूबर को पड़ेगा, और 13 से 22 अक्टूबर तक सुक्कोत मनाया जाएगा। इस कालखंड में एक बड़ी संख्या में यहूदी समुदाय के लोग अक्सर साल-दर-साल खास जगहों पर इकठ्ठा होते हैं। भारत में इज़राइल से इसके लिए बड़ी संख्या में सैलानी आते हैं।
गौरतलब है कि संयोगवश इसी बीच हिन्दुओं के लिए महत्वपूर्ण शारदीय नवरात्रि (29 सितंबर-7 अक्टूबर), दुर्गा पूजा/काली पूजो (5-7 अक्टूबर) और दशहरा (8 अक्टूबर) भी पड़ रहे हैं।
ANI की एक रिपोर्ट के अनुसार, दूसरे देशों की जासूसी एजेंसियों ने जो इनपुट भारत भेजा है, उसके मुताबिक निशाने पर नई दिल्ली में इज़राइली दूतावास भी है। इसके अलावा इज़राइलियों और यहूदियों द्वारा चलाए जाने वाले स्कूल और होटल भी निशाने पर हैं। यह जानकारियाँ 26/11 जैसे जिहादी हमले की याद दिलातीं हैं, जब कसाब और उसके साथियों के निशाने पर आए मुंबई के 10 इलाकों में से दो विशेष तौर पर यहूदियों को निशाना बनाने के लिए ही चुने गए थे। लियोपॉल्ड कैफ़े यहूदियों के बीच खासा मशहूर था, और नरीमन हाउस भारत में यहूदियों के महत्वपूर्ण स्थलों में गिना जाता है।
कश्मीर का बदला इज़राइल से
मीडिया सूत्रों के मुताबिक इज़राइल के कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के मुद्दे पर भारत के समर्थन से जिहादियों में नाराज़गी फैली हुई है। जिहादी आतंकी हमले में भारत की ज़मीन पर यहूदियों को मार कर इज़राइल को ‘सबक’ सिखाना चाहते हैं। इसीलिए इंटेलिजेंस एजेंसियों ने स्थानीय पुलिस और इंटेलिजेंस को सूचित कर दिया है, ताकि जिहादी मंसूबों को कामयाब होने से रोका जा सके। यहूदियों के आवास, यहूदी और इज़राइली संस्थानों और दिल्ली स्थित चबड हाउस की सुरक्षा और कड़ी कर दी गई है।
हरियाणा विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ओलंपिक खेलों में देश का नाम रोशन करने वाले पहलवान योगेश्वर दत्त भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। योगेश्वर दत्त के साथ-साथ भारतीय हॉकी टीम के पूर्व कप्तान संदीप सिंह भी बीजेपी में शामिल हो गए हैं। दोनों ने हरियाणा बीजेपी प्रमुख सुभाष बराला की मौजूदगी में बीजेपी की सदस्यता ली।
Delhi: Olympic Medallist Yogeshwar Dutt joins BJP (Bharatiya Janata Party), in presence of Haryana Bharatiya Janata Party (BJP) Chief Subhash Barala. pic.twitter.com/9cWmO4Vxe5
बता दें कि ओलंपिक पदक विजेता योगेश्वर दत्त की भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की खबर पहले से ही चल रही थी। बताया जा रहा है कि योगेश्वर दत्त अगले महीने होने वाले हरियाणा विधानसभा चुनावों में पार्टी के उम्मीदवार बन सकते हैं। हरियाणा के रहने वाले कुश्ती खिलाड़ी ने बुधवार (सितंबर 25, 2019) को यहाँ राज्य भाजपा के अध्यक्ष सुभाष बराला से मुलाकात की थी और उन्हें सूचित किया था कि उन्होंने हरियाणा पुलिस से इस्तीफा दे दिया है। दत्त ने 2014 के राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता था और उन्हें 2013 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।
Delhi: Former Indian Hockey captain Sandeep Singh joins BJP (Bharatiya Janata Party), in presence of Haryana Bharatiya Janata Party (BJP) Chief Subhash Barala. pic.twitter.com/PAPOiwIO3j
वहीं खबर है कि संदीप सिंह को आगामी हरियाणा विधानसभा चुनाव में बीजेपी कुरूक्षेत्र के पेहोवा विधानसभा क्षेत्र से टिकट दे सकती है। संदीप पिछले कई दिनों से पेहोवा में काफी सक्रिय भी रहे हैं। पूर्व भारतीय कप्तान संदीप सिंह को उनके शानदार फ्लिक के लिए फ्लिकर सिंह के नाम से जाता है। संदीप सिंह को उनके शानदार खेल के लिए 2010 में अर्जुन अवॉर्ड से नवाजा गया था। वह 2004 से 2012 तक भारत की हॉकी टीम का हिस्सा रहे हैं। वह 2009 में भारत की हॉकी टीम के कप्तान बनाए गए थे। उनके जीवन पर 2018 में ‘सूरमा’ नाम की एक फिल्म भी बन चुकी है।
मध्यप्रदेश में हनी ट्रैप कांड के खुलासे के बाद जाँच टीम को इस मामले में हर सिरे पर नई जानकारी मिल रही है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक इस पूरे कांड में 40 काल गर्ल्स के शामिल होने की खबर है, जिनमें बॉलीवुड की कुछ हिरोइनों के नाम भी सामने आ रहे हैं। लेकिन अब गिरोह को चलाने वाली श्वेता जैन ने एसआइटी के सामने खुलासा किया है कि उसने करीब 2 दर्जन कॉलेज जाने वाली लड़कियों को सेक्स जाल का हिस्सा बनाया, जिसमें अधिकतर मिडिल क्लास परिवार की लड़कियाँ शामिल थीं।
इस हनी ट्रैप रैकेट में गिरफ्तार महिलाओं में श्वेता विजय जैन, बरखा सोनी, श्वेता स्वप्निल जैन, आरती दयाल, और एक 18 वर्षीय लड़की शामिल है। आरती दयाल के ड्राइवर को भी गिरफ्तार किया गया है।
इंदौर की पहली महिला एसएसपी रुचि वर्धन सिंह ने इस संबंध में बताया कि श्वेता और उसकी साथी आरती ने कॉलेज जाने वाली लड़कियों को फँसाकर, उन्हें मॉडर्न लाइफस्टाइल का लालच दिखाकर हनी ट्रैप गैंग में घसीटा था।
वहीं, श्वेता ने अपने मनसूबों के बारे में खुलासा करते हुए बताया कि हनी ट्रैप का मकसद वीआईपी लोगों को इसमें फँसाकर उनसे करोड़ों रुपए के आकर्षक सरकारी कॉन्ट्रैक्ट की खरीद करना था। जिनमें से कई कॉन्ट्रैक्ट श्वेता जैन और उनकी साथी आरती दयाल की कंपनियों को कमीशन के आधार पर दिए गए थे। हनी ट्रैप में फँसाकर कॉन्ट्रैक्ट खरीदने के अलावा श्वेता मध्यप्रदेश में आईएस और आईपीएस अधिकारियों की पोस्टिंग भी मैनेज करती थीं।
पूछताछ में श्वेता ने एसआईटी को बताया कि अधिकारियों की डिमांड पर वह आर्थिक रूप से कमजोर कॉलेज जाने वाली छात्राओं को रैकेट में फँसाती थी और बाद में नामी हस्तियों के साथ बिस्तर पर जाने के लिए मजबूर करती थी। जिन लोगों के साथ लड़कियों को रात गुजारने के लिए कहा जाता था, उनमें अधिकतर लोग लड़कियों की पिता के उम्र के होते थे।
एसआईटी के सामने पेश हुई एक लड़की ने खुलासा किया कि प्रतिष्ठित कॉलेज में एडमिशन लेने की मंशा से वह श्वेता के संपर्क में आई थी। लेकिन श्वेता ने किसी तरह लड़की को इस गिरोह का हिस्सा बना लिया और उसे भोपाल ले गई। वहाँ उसकी पहचान तीन अधिकारियों से करवाई गई, जहाँ शुरू में लड़की ने ये काम करने से मना कर दिया और अपने घर लौट आई। किंतु बाद में श्वेता की साथी आरती दयाल उसके घर गई और लड़की के पिता से बताया कि अगर वह अपनी बच्ची को भोपाल भेजेंगे तो उनका एनजीओ लड़की की पढ़ाई का पूरा खर्चा उठाएगा।
लड़की के मुताबिक आरती ने उसे श्वेता का एक एमएमएस भी दिखाया, जिसमें वो एक अधिकारी के साथ शारीरिक संबंध बना रही थी। आरती ने कहा कि बड़े पद पर पहुँचने के लिए ये सब करना पड़ता है।
इसके बाद आरती और श्वेता लड़की को एक लग्जरी कार में इंदौर लेकर चली गईं, वे वहाँ पॉश इंफिनिटी होटल में ठहरे। अगले दिन शाम को 60 वर्षीय इंजिनियर हरभजन सिंह की पहचान लड़की से कराई गई और पूरी रात लड़की को अपने पिता की उम्र के व्यक्ति के साथ रुककर सेक्स करना पड़ा। इस बीच आरती ने हरभजन का लड़की के साथ चुपके से वीडियो बना लिया। जिसे बाद में दिखाकर श्वेता ने हरभजन से 3 करोड़ रुपए माँगे और लड़की को भी धमकी मिली थी कि अगर उसने अपने पैरेंट्स को कुछ भी बताया तो वह उसकी वीडियो इंटरनेट पर डाल देंगे।
जाँच में खुलासा हुआ कि लोअर मिडिल क्लास परिवारों की लड़कियों को नौकरी का लालच देकर पहले फँसाया जाता था, फिर फाइव स्टार होटल का ग्लैमर और लग्जरी कल्चर दिखाया जाता था। बाद में उन्हें बहला-फुसला कर अधिकारियों को हनी ट्रैप में फँसाने के लिए बड़ी कीमत दी जाती थी।
इस पूरे कांड में बता दें कि आज जाँच टीम को एक हिट लिस्ट हाथ लगी है, जिसमें 13 आइएस अधिकारियों के नाम सामने आए हैं, जिन्हें लड़कियों ने प्रेम में फँसा लिया था और उनकी सेक्स वीडियो दिखाकर उनसे पैसे माँगने वाले थे। पुलिस को इस ब्लैकमेल करने वाले गिरोह से अभी तक 90 वीडियो मिल चुके हैं। जिनमें सियासत से जुड़े लोगों से लेकर कई ब्यूरोक्रेट्स के चेहरे उजागर हुए हैं। गिरोह में शामिल महिलाओं के पास से 8 सिम कार्ड भी मिले हैं, बाकी रिकॉर्ड अभी खंगाले जा रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ह्यूस्टन में हुए ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम की तारीफ़ करने वाले मिलिंद देवड़ा ने ट्विटर पर एक वीडियो अपलोड किया है। इसमें उन्होंने लिखा कि जो नेता पार्टी हित को देशहित से पहले रखते हैं वे देश के लिए सबसे ज़्यादा ख़तरनाक हैं।
During an @iimunofficial meet yesterday, I was asked about @narendramodi ji’s gracious acknowledgement of my father’s diplomatic efforts & the controversy thereafter.
My reply – politicians who fail to put national interest before party interest do a great disservice to India! pic.twitter.com/vpzXCLcQAN
इसके अलावा अपलोड किए गए वीडियो में उन्होंने कहा कि कोई भी चाहे वो बीजेपी में हो या कॉन्ग्रेस में हो या फिर किसी क्षेत्रीय पार्टी में हो, जो कोई भी इससे अलग सोचता है, देश के लिए सबसे अधिक ख़तरनाक है। उन्होंने कहा,
“मुझे गर्व है कि मैं जब संसद पहुँचा तो वहाँ पर अटल बिहारी वाजपेयी जैसे बड़े नेता थे, सोमनाथ चटर्जी स्पीकर थे। मुझे गर्व है कि जब मैं संसद पहुँचा तो मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे। यह सभी बड़े नेता थे, वे पार्टी से अलग जा सकते थे।”
दरअसल, मिलिंद देवड़ा उस बात को लेकर चर्चा में आए गए हैं, जब सोमवार (23 सितंबर) को उन्होंने अमेरिका में आयोजित ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम की तारीफ़ कर दी थी। तब उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी का संबोधन भारत की बौद्धिक और सांस्कृतिक ताक़त (सॉफ़्ट पॉवर डिप्लोमेसी) को दर्शाता है।
मिलिंद देवड़ा द्वारा की गई इस तारीफ़ पर आभार व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया, “आपने मेरे मित्र स्वर्गीय मुरली देवड़ा जी की अमेरिका के साथ मज़बूत संबंधों के प्रति प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हुए बिल्कुल सही कहा है। वह दोनों देशों के बीच संबंधों को मज़बूत होता देखकर वाकई बहुत ख़ुश होते।”
You are absolutely correct when you highlight my friend, late Murli Deora Ji’s commitment to strong ties with USA. He would have been really glad to see the strengthening of ties between our nations. The warmth and hospitality of @POTUS was outstanding. https://t.co/eyP1D3xRJo
इस पर मिलिंद देवड़ा ने ट्वीट कर पीएम मोदी को धन्यवाद दिया। उन्होंने ट्वीट किया कि मुरलीभाई ने भारत और अमेरिका में सभी सरकारों के साथ काम किया और हमारे देशों के बीच संबंधों को गहरा करने के लिए काम किया। दिलचस्प बात यह है कि मिलिंद का यह बयान उनकी पार्टी से अलग है।
22 सितंबर 2019 को कौशाम्बी में हुए एक बच्ची के सामूहिक बलात्कार की खबर आई। पता चला कि बच्ची दलित है, और आरोपित समुदाय विशेष से। जैसा कि आजकल के सेकुलर समाज में हो रहा है, इस खबर पर न कोई रोष प्रकट किया गया, न ही मानवता के शर्मसार होने की बात कही गई। जबकि, इसमें बच्ची दलित समाज से है, जो कि शायद किसी सवर्ण जाति के आरोपित का शिकार होती तो मीडिया कवरेज अलग होती।
ख़ैर, ऑपइंडिया ने इस खबर को उसी दिन उठाया। उसके बाद इससे जुड़ी और बातें सामने आई कि आरोपितों ने न सिर्फ ऐसा जघन्य अपराध किया बल्कि उस कुकृत्य की विडियो बनाते रहे, वो बच्ची उन्हें पहचानती थी और बार-बार विडियो में ‘भैया आप तो मुझे जानते हो, अल्लाह का वास्ता मुझे छोड़ दो’ कह कर गिड़गिड़ाती रही।
आदिल, जो कि ‘छोटका’ और ‘आतंकवादी’ जैसे उपनामों से जाना जाता है, अपने एक साथी नाजिक और एक अज्ञात लड़के के साथ इस अपराध में शामिल था। फिर खबर आई कि आदिल को एक मजार में पुलिस ने पकड़ लिया। नाजिक पहले ही पकड़ा जा चुका था, एक अभी भी फरार है। पुलिस को इस त्वरित कार्रवाई के लिए धन्यवाद।
अब बात आती है कि ऐसी खबरों को फेसबुक ‘कम्यूनिटी गाइडलाइन्स’ का हवाला दे कर न सिर्फ डिलीट करता है, बल्कि शेयर करने वालों के अकाउंट सस्पैंड कर देता है। ऑपइंडिया ने इस खबर को पोर्टल पर लगाने के बाद फेसबुक पेज के जरिए शेयर किया, जिसका स्क्रीनशॉट आप देख सकते हैं। हेडलाइन में कोई ऐसी बात नहीं है जो बनाई गई हो, घृणा फैलाने की मंशा दिखाती हो, या पत्रकारिता की स्वनिर्धारित नीतियों के खिलाफ हो।
इसी फेसबुक पर ‘जय श्री राम’ और ‘वह चिल्लाती रही कि भगवान के नाम पर छोड़ दो’ ऐसे हेडलाइन वाली खबरें आपको हमेशा दिख जाएँगी, फिर मजहबी नामों या मजहबी नारों पर फेसबुक इतना संवेदनशील कैसे हो जाता है? ये तो स्पष्ट तौर पर मजहबी अपराधियों को बचाने जैसा है।
जब हमने फेसबुक से बात करने की कोशिश की तो बताया गया कि शायद हमारी इमेज में कुछ समस्या है! जबकि आप तस्वीर को देखें तो वहाँ आरोपित का चेहरा दिख रहा है, लड़की को पूरी तरह से धुँधला किया गया है, और सिवाय इसके उसके कपड़े का रंग पीला है, आप न तो यह कह सकते हैं कि यहाँ कुछ हिंसक दृश्य है, या घृणा फैलाने की बात। जब तस्वीरों से लोग मतलब निकालते हैं, तो फिर ऐसी खबरों में कौन सी तस्वीर लगाई जाए?
क्या एक सहमी सी लड़की को कोने में बिठा कर ही ऐसे जघन्य अपराधों की प्रस्तुति की जाए? क्या इस तस्वीर को देख कर बलात्कार जैसे अपराध की जघन्यता कम हो जाती है, या ज्यादा हो जाती है? इससे घृणा कैसे फैल रही है, या ये डिस्टर्बिंग कैसे है? शायद अब से हर बलात्कार की खबर पर फेसबुक का ही लोगो लगाया जाए, तब वो न्यूट्रल होगा, किसी के खिलाफ नहीं होगा।
पंद्रह साल की बच्ची का बलात्कार कर रहे हैं दरिंदे और ये खबर फेसबुक की कम्यूनिटी गाइडलाइन्स के खिलाफ है! साथ ही, ये लोग कभी भी आपको सटीक कारण नहीं बताते। आपको ‘कम्यूनिटी गाइडलाइन’ का लिंक थमा दिया जाता है, आप खोजते रहिए कि कौन से अनुच्छेद का कौन सा सब-सेक्शन आपने तोड़ा है।
फिर भी, आप कोशिश करते हैं, अपने स्तर से समझना चाहते हैं कि किस बात पर नाराज हैं फेसबुक वाले। घूम-फिर कर, आपको सिवाय इस बात के कि त्रिशूल पर कंडोम लगा दो, हिन्दू देवी की योनि में कुछ लगा दो, हिन्दुओं के देवताओं को अश्लील तरीके से दिखाओ, आप अगर मजहबी नाम या मजहबी नारों को लिख रहे हैं तो इन्हें स्थानविशेष में दर्द होने लगता है।
हिन्दू धर्म और हिन्दूविरोध धड़ल्ले से चल रहा है फेसबुक पर, गंदी गालियाँ, शिवलिंग पर पेशाब करने की बातें, मंदिरों को तोड़ने की बातें, भगवान हनुमान की तस्वीर पर जूते मारते लोगों की खबरें, ये इनके कम्यूनिटी गाइडलाइन्स के किसी अनुच्छेद, सेक्शन, सब-सेक्शन, वाक्य, शब्द, विचार, किसी चीज को किसी हिस्से को वायलेट नहीं करती।
तब आदमी सोचने लगता है कि इनकी कम्यूनिटी क्या चौदहवीं शताब्दी के इस्लामी लुटेरों की है, या उनके डीएनए लिए लोग वहाँ बैठे हैं जो ऐसी नीतियाँ बनाते हैं जहाँ हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं का मजाक बनाना, अश्लीलता से प्रदर्शित करना सही हो जाता है, लेकिन इन मजहबी नाम वाले किसी पंद्रह साल की बच्ची का बलात्कार करें, विडियो बनाएँ, तो इन्हें मरोड़ें उठती हैं!
फेसबुक हो या यूट्यूब, ये लोग हमेशा कम्यूनिटी गाइडलाइन्स के कंबल तले आपस में कूची-कूची-कू करते रहते हैं। ये लोग अघोषित तौर पर चाहते हैं कि खास समुदाय के अपराधों को ‘राम (बदला हुआ नाम)’ के शाब्दिक जाल में उलझा कर लिखा जाए ताकि एक समुदाय की भावनाएँ आहत न हों। जबकि, कोई समुदाय, हिन्दू या दूसरे मजहब का, किसी बलात्कारी के नाम लिखने से आहत होता है, तो लानत है ऐसे समुदाय पर। ऐसे लोगों को हथेली पर थूक कर, नाक डुबा कर डूब मरना चाहिए।
कौन करता है ऐसे कांड: कम्प्यूटर या आदमी?
इसी से जुड़ी दूसरी बात इस शक को गहरा करती है कि सब कुछ कम्प्यूटर या एल्गोरिदम से नहीं होता, शायद कुछ लोग, कुछ संस्थानों को टार्गेट करने में व्यस्त रहते हैं। इसी खबर को हमने पेज पर शेयर किया तो थोड़ी देर में फेसबुक का संदेश आ गया कि हमने कम्यूनिटी गाइडलाइन्स को तोड़ा है। आप अपील भी नहीं कर सकते ऐसे मामलों में जबकि आम तौर पर अपील करने के लिए ‘डीटेल्स’ नाम का एक बटन होता है। वो बटन इन्होंने इस मामले में बंद कर रखा था।
जाहिर सी बात है कि इस पर आप जानना चाहेंगे कि हुआ क्या है। हमने फेसबुक से बात करने के लिए मेल किया तो बताया गया कि हमें अपील करना चाहिए, और यह भी कि हेडलाइन को ऐसे नहीं लिखना चाहिए। मैं एक एडिटर हूँ मीडिया इंडस्ट्री का और मुझे फेसबुक में काम करने वाले लोग बता रहे हैं, जिनका पत्रकारिता का अनुभव शून्य है, कि हम हेडलाइन कैसे रखें!
वो शायद चाहते हैं कि ये हेडलाइन ऐसे होती: ‘लड़की के साथ कुछ लोगों ने कुछ किया, पुलिस कुछ कर रही है’। भीतर में हम ये लिखते कि पंद्रह साल की लड़की कहीं गई थी, उसे ‘राम, श्याम और कन्हैया (तीनों नाम बदले हुए), कहीं ले गए और उसके साथ बहुत गलत किया। आप बदले हुए नाम कभी भी ‘सलीम-राशिद-परवेज’ देखे हैं? क्योंकि मजहबी अपराधियों को मीडिया ने हमेशा ‘समुदाय विशेष’ के नाम पर ढका है, और उनके नामों को हिन्दू नामों से।
समस्या यह नहीं है कि ऐसे अपराधियों का नाम लिखना क्यों जरूरी है। समस्या यह है कि हिन्दुओं का नाम लिखना अगर प्रचलन में है, मजहब विशेष के अपराध का भी बोझ जब मीडिया हिन्दू नामों पर डालती है, तो फिर मजहब विशेष का नाम लिखने में क्या हर्ज है? क्या कोर्ट ने ऐसा करने से मना किया है?
जब पेज से पोस्ट डिलीट किया गया और कहा गया कि अब आपके पेज की पहुँच घटा दी जाएगी, तो मैंने मेल किया कि जब यही खबर पेज पर है जो कम्यूनिटी गाइडलाइन्स तोड़ती दिखती है, जो कि कोई कम्प्यूटर तय करता है, या निष्पक्ष लोग तय करते हैं, तो फिर यही खबर तीस हजार लोगों द्वारा फेसबुक पर ही पढ़ी और शेयर की गई, वो वहाँ कैसे है? डिलीट तो हर पोस्ट को करना चाहिए। तो इन्होंने आठ घंटे बाद, मेरा निजी अकाउंट सस्पैंड कर दिया क्योंकि मैंने वो पोस्ट शेयर किया था। मतलब ऑटोमेटिक तो नहीं है कुछ भी। मैंने जब खुद ही बताया कि मैंने शेयर किया है, तब मेरा अकाउंट सस्पैंड हो जाता है। शायद इतना कम नहीं था कि किसी ने ट्विटर पर भी मेरे उस ट्वीट को रिपोर्ट किया लेकिन ट्विटर ने मुझे बताया कि इसमें कोई समस्या नहीं।
वही खबर, ट्विटर के लिए सही है, फेसबुक के लिए गलत है
सवाल यह कि खास समुदाय के अपराधी होने पर फेसबुक की इतनी क्यों जलती है कि बदबू हर तरफ फैल जाती है? ऐसा क्या है उनमें कि उनके द्वारा किए गए ऐसे जघन्य अपराध किसी राम के नाम लिख दिए जाएँ? क्या फेसबुक इन मजहबी बलात्कारियों का समर्थक है? क्या फेसबुक की कम्यूनिटी गाइडलाइन्स किसी खास किताब के उन हिस्सों को तो शामिल नहीं करती जहाँ काफिरों का बलात्कार जायज बताया गया हो?
अगर ऐसा है तो फिर कम्यूनिटी गाइडलाइन्स का हवाला देने की बजाय यही कह दिया जाए कि हमारी गाइडलाइन्स तो आसमान से उतरी है और जुकरबर्ग को समय-समय पर हवाई आईलैंड की गुफा में मिलती रही है। इसलिए, हम तो हिन्दुओं के देवी-देवताओं पर किए गए अश्लील कमेंट्स, पोस्ट्स, टिप्पणियाँ फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन के नाम पर जाने देंगे लेकिन मजहब विशेष वालों के बलात्कार करने पर, तथ्यात्मक खबरों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा क्योंकि वो फेसबुक की इस गाइडलाइन्स के खिलाफ जाता है।
मतलब ये प्लेटफॉर्म कमाएँ लेकिन सेेसरशिप के नाम पर आपको चूना लगाएँ
फैसला आपको करना है कि यहाँ क्या हो रहा है। यूट्यूब पर आप कुछ भी पोलिटिकल बोलिए, ‘वामपंथी’ शब्द लिख दीजिए और आपका विडियो अपलोड होने से पहले ही ‘पीला डॉलर’ चिह्न दिखाने लगता है, मतलब ये एडवर्टाइजर फ्रेंडली नहीं है। आप रिव्यू के लिए उसे डालते हैं। इसके लिए उन्हें सात दिन चाहिए। दो दिन बाद आपका विडियो अडवर्टाइजर फ्रेंडली हो जाता है, और ‘डॉलर’ फिर से हरा दिखने लगता है। लेकिन तब तक आपने दो और विडियो डाल दिया, उस प्रतिबंधित विडियो पर जो व्यू आना था, पहले दो दिन में आ गया। आपके पैसे उसमें गायब हो गए। बाद में हरा हो जाए, या लाल, आपको कोई फायदा नहीं हुआ।
फेसबुक हमारा डेटा लेता है, हमारी पसंद-नापसंद, हमारी तस्वीरों को, हमारे लेखों को, लिखने के तरीके को, हमारे कहीं आने-जाने को, हर बात को अपने डेटा सेंटर में रखता है। ये डेटा वो किसी पोलिटिकल पार्टी को बेचता है, किसी फूड चेन को, कपड़े की कम्पनी को, कॉस्मेटिक्स बनाने वाले को, बैंकों को, किसी को भी बेचता है।
इसलिए, कोई यह नहीं कह सकता कि तुम देते क्या हो? या यह कि, वो प्राइवेट कम्पनी है, वो अपनी नीतियाँ तय कर सकती है। बिलकुल तय कर सकती है, अगर वो अपने उपभोक्ताओं से डेटा लेना बंद कर दे। हम इस कम्पनी को भुगतान कर रहे हैं, और वो हमारे लिए उत्तरदायी है क्योंकि जब इसके मालिक लम्बी-लम्बी छोड़ते हैं, और दुनिया बदलने की बातें करते हैं, तब उनके लिए यही उपभोक्ता एक टूल की तरह काम करते हैं।
यही कम्पनियाँ अपनी करतूतों से किसी देश में सत्ता परिवर्तन कराने की फिराक में रहती हैं, और कहीं ‘ऑर्गेनिक ट्रेंड’ के नाम पर अपने मालिक की विचारधारा को न्यूज ट्रेंड वाले सेक्शन में सबसे ऊपर दिखाती है। वहाँ वैसी खबरों को जगह दी जाती थी जो किसी विचारधारा, पार्टी या व्यक्ति के खिलाफ हों।
इसलिए, फेसबुक को अपना दोगलापन त्याग कर, दुनिया को यह बात साफ शब्दों में बताना चाहिए कि वो मजहबी बलात्कारियों की तरफदारी क्यों कर रहा है? फेसबुक को बताना चाहिए कि क्या फेसबुक पर शरियत के हिसाब से चलते हुए खबरें शेयर होनी चाहिए? फेसबुक को खुल कर कहना चाहिए कि क्या किसी मीडिया संस्थान को मक्का की तरफ सर करके, हर पोस्ट लिखने से पहले नमाज भी पढ़ना ज़रूरी है? फेसबुक को बताना चाहिए कि क्या अब पत्रकारिता भी ‘हलाल सर्टिफ़ाइड’ होनी चाहिए?