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कर्नाटक में भाजपा सांसद को गाँव में घुसने से रोका, कहा दलित है, नहीं आ सकता

कर्नाटक में जातिगत भेदभाव और छुआछूत का एक शर्मनाक वाकया सामने आ रहा है। भाजपा के सांसद को अपने ही निर्वाचन क्षेत्र के गाँव में इसलिए घुसने से रोक दिया गया क्योंकि वे दलित हैं, और वह गाँव ओबीसी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले लोगों का है। घटना से आहत सांसद ने पुलिस को इत्तला कर दी है

‘गोला’ समुदाय के बताए जा रहे आरोपित

बताया जा रहा है कि आरोपित लोग चित्रदुर्ग लोक सभा क्षेत्र के गोलाराहट्टी गाँव के निवासी हैं, जो गोला नामक जाति के ओबीसी समाज के लोगों का गाँव है। जब चित्रदुर्ग के सांसद ए नारायणस्वामी ने सोमवार को टुमकुर जिले के पवगाड़ा तालुक स्थित इस गाँव में घुसने की कोशिश की तो गोला समुदाय के कुछ लोगों ने उन्हें ‘अछूत’ बताते हुए उनका रास्ता रोक लिया। उन्होंने नारायणस्वामी को वापिस चले जाने को कहा और साथ में जोड़ा कि उस गाँव में आज तक कोई भी दलित दाखिल नहीं हुआ है। विवाद बढ़ता देख कर नारायणस्वामी अपनी कार में बैठकर वापिस हो लिए, और पुलिस ने जाँच शुरू कर दी है।

डिप्टी सीएम ने की निंदा, सांसद का बलप्रयोग से इंकार

राज्य के उपमुख्यमंत्रियों में से एक सीएन अश्वत नारायण ने घटना की निंदा करते हुए कहा कि अगर यह सच है तो वे इसकी निंदा करते हैं, और इस पर कार्रवाई होगी। वहीं क्षेत्र के एसपी का कहना है कि नारायणस्वामी को रोकने वाले व्यक्तियों की अभी तक पहचान नहीं हो पाई है।

लेकिन सांसद ने पुलिस का इस्तेमाल कर गाँव में प्रवेश से इंकार कर दिया है। उनके अनुसार वे अपमानित अवश्य महसूस कर रहे हैं, लेकिन वे पुलिस की सहायता नहीं लेना चाहते थे। लोगों के अंदर से जातिवादी और छुआछूत की मानसिकता बदलना ज़रूरी है, और यह काम कानून नहीं कर सकते।

भारी चालान से परेशान लोगों के लिए गडकरी ने दी राहत भरी खबर, अब जुर्माने की राशि 500-5000 के बीच

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भारी-भरकम चालान से परेशान लोगों के लिए एक राहतभरी खबर दी है। उन्‍होंने कहा है कि नए मोटर वाहन अधिनियम-2019 (New Traffic Rules-2019) को  पब्‍लिक और पार्टी लाइन से हटकर लोगों से समर्थन मिला है। जो लोग जुर्माना देने से नाखुश थे, वे भी सहमत हैं। उन्होंने कहा कि जुर्माना राज्‍य सरकारों द्वारा लगाया जाता है और वही इसे कलेक्‍ट करते हैं, केंद्र सरकार के पास जुर्माने का पैसा नहीं आता। यह केंद्र के राजस्व संग्रह का कोई मुद्दा नहीं है। राज्य सरकारें जुर्माना राशि 500 से 5000 रुपए के बीच रख सकते हैं, ऐसा करने का उन्हें अधिकार है।

बता दें नितिन गडकरी ने न्यूज नेशन के साथ दिए अपने इंटरव्‍यू में कहा था कि नए कानून के मुताबिक पहली गलती पर 500 रुपए तक का जुर्माना लगेगा, और दूसरी गलती पर 1500 तक का फाइन लगेगा। लेकिन राज्य सरकार को ये अधिकार है कि वो 500 या 1500 रुपए के फाइन को 100, 200 या 500 भी कर सकती है।

गौरतलब है कि 1 सितंबर 2019 से लागू हुए नए ट्रैफिक रूल के बाद से चालान के रोजाना नए रिकॉर्ड बन और टूट रहे हैं। दिल्ली से लेकर अन्य राज्यों में कई भारी-भरकम चालान काटे गए जो मीडिया में छाए रहे जिसे देखकर कुछ राज्य सरकारों ने पहले ही जुर्माने की राशि में बदलाव कर दिया था। अगर हैवी चालान की बात करें तो ओडिशा के संबलपुर में ट्रैफिक पुलिस ने एक ट्रक का 6 लाख से अधिक रुपए का चालान काट दिया था। संबलपुर में ओडिशा की ट्रैफिक पुलिस ने करीब 6,53,100 रुपए का जुर्माना लगाया था।  

प्रति व्यक्ति आय होगी दोगुनी, 2024 तक देश के औसत से अमीर होगा यूपी का आदमी: योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दावा किया कि उनकी सरकार प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय को न केवल 2024 तक दोगुना करने की तैयारी कर रही है, बल्कि लक्ष्य देश के औसत को भी पीछे छोड़ने और प्रदेश को ₹10 खरब की अर्थव्यवस्था बनाने का है। इसके लिए उन्होंने आधारभूत ढाँचे, कृषि और उद्योग जगत को धार देने की बात की। साथ ही उम्मीद जताई कि अगले चार वर्षों में ₹40 लाख करोड़ का निवेश प्रदेश में कराना उनका लक्ष्य है। उन्होंने यह सब बातें दैनिक जागरण को दिए गए विशेष साक्षात्कार में कहीं।

गोरखधाम पहुँचे गोरखनाथ के उत्तराधिकारी

योगी आदित्यनाथ बीती शाम (16 सितंबर, 2019) को गोरखपुर के गोरखधाम मंदिर के महंत के तौर पर शहर में मौजूद थे। गोरक्ष पीठ के नाम से जाने जाने वाले गोरखपुर में गोरक्ष पीठ के गुरुओं की स्मृति में नाथ सम्प्रदाय के धार्मिक आयोजन का हिस्सा बनने योगी वहाँ पहुँचे थे। माना जाता है कि गोरखधाम मंदिर के मुख्य महंत (वर्तमान में आदित्यनाथ) नाथ सम्प्रदाय के संस्थापक गुरु गोरखनाथ और उनके गुरु मत्स्येन्द्रनाथ के उत्तराधिकारी होते हैं।

2030 का लक्ष्य 2024 में करना है हासिल

योगी आदित्यनाथ ने दावा किया कि फ़िलहाल 8% की दर से विकास कर रही प्रदेश की अर्थव्यवस्था अपने आप ही 2030 तक ₹10 खरब के आकार को पा लेगी, लेकिन उनका लक्ष्य रफ़्तार बढ़ाकर यह लक्ष्य 2024 तक पा लेने का है। उन्होंने इसके लिए अगले 4 सालों में प्रदेश में ₹40 लाख करोड़ का निवेश, कोऑपरेटिव खेती को बढ़ावा, आधारभूत ढाँचा, औद्योगिक विकास आदि उपायों की योजनाएँ गिनाईं। साथ ही निवेश का माहौल सुधरने के लिए बेहतर कानून-व्यवस्था के साथ पुलिस के आधुनिकीकरण पर ज़ोर देने का वादा किया।

आधारभूत ढाँचा होगा फ़ोकस में

योगी की योजना आधारभूत ढाँचे में तीन वर्ष में ₹25 लाख करोड़ निवेश लाने की है। इसका प्रयोग सड़कों का जाल बिछाने से लेकर सभी बु़नियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराकर कृषि और उद्योग को भी ‘बूस्टर शॉट’ देने का है। इसके अलावा गंगा एक्सप्रेस-वे, पूर्वाचल एक्सप्रेस-वे के दोनों तरफ एग्रीकल्चर आधारित उद्योग और बुंदेलखंड एक्सप्रेस के दोनों तरफ डिफेंस कारीडोर का भी उन्होंने ज़िक्र किया।

क्रमिक विकास बाहरियों को ही अधिक दिखता है

योगी ने यह माना कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और लखनऊ के मुकाबले ग्रामीण और पूर्वांचल के इलाकों में विकास बहुत कम हुआ है, लेकिन ज़ोर दिया कि अब सभी जिलों में बिना भेदभाव विकास कार्य ज़ोर पकड़ रहे हैं। स्थानीय निवासियों को विकास महसूस न होने की बात पर उन्होंने कहा, “ये शहर स्वयं विकास प्रक्रिया का हिस्सा हैं इसलिए वहाँ के निवासियों को यह चीज समझ में नहीं आती। हो सकता है गोरखपुर में रहने वालों को ही यह लग रहा हो कि शहर में विकास कार्य नहीं हो रहा है लेकिन बाहर से आने वालों का यह स्पष्ट मत है कि इस शहर में बहुत विकास हुआ है।”

नोएडा के लिए प्राधिकरण ही ज़िम्मेदार

योगी आदित्यनाथ ने साफ किया कि नोएडा और आसपास के 81 गांवों के विकास के लिए प्राधिकरण ही जवाबदेह है, और वहाँ की स्थिति की वे विशेष समीक्षा खुद कर रहे हैं। सवाल दरअसल यह था कि सरकार ने नोएडा के आसपास बसे गाँवों में से कई में ग्राम प्रधान का चुनाव न कराकर वहाँ के विकास की ज़िम्मेदारी प्राधिकरण पर ही डाल दी थी।

टैक्स चोरी के लिए जिलेवार जीडीपी पर ज़ोर, भाजपा में बाहरियों की खातिरदारी पर काटी कन्नी

योगी ने जहाँ जीएसटी की चोरी रोकने के लिए हर जिले और नगर की जीडीपी तय कर उसके हिसाब से निगरानी की बात की, वहीं भाजपा में संजय सिंह, सुरेन्द्र नागर और संजय सेठ जैसे बाहरी नेताओं को राज्यसभा भेजे जाने पर कन्नी काटते नज़र आए। कार्यकर्ताओं की उपेक्षा पर उन्होंने “हमारा कार्यकर्ता समझदार है।” कहकर बात खत्म कर दी।

कानपुर के लिए अलग कपड़ा नीति

योगी आदित्यनाथ ने केंद्र के साथ मिलकर कानपुर के मृतप्राय कपड़ा उद्योग में जान फूँकने के लिए कानपुर के लिए विशेष बनी अलग कपड़ा नीति लाने की बात की। चमड़ा उद्योग के बारे में कहा कि प्रदेश सरकार ने न केवल चमड़ा कारखानों के औद्योगिक कचरे के लिए एसटीपी की सुविधा उपलब्ध करा दी है, बल्कि उसके लिए अपना हिस्सा भी दे दिया है। अब चमड़ा उद्योग से जुड़े लोगों को अपना हिस्सा देना है। उन्होंने साफ़ किया कि चमड़ा उद्योग को राहत के नाम पर गंगा को फिर से प्रदूषित करने की इजाज़त फिर से कतई नहीं दी जाएगी। उन्होंने कानपुर की औद्योगिक स्थिति पर IIT-कानपुर के साथ मिलकर एक श्वेत पत्र लाने के लिए भी बातचीत चालू होने का ज़िक्र किया।

अयोध्या दीपोत्सव, कुंभ की सफलता सबसे बड़ी

योगी ने अपनी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ पूछे जाने पर अयोध्या में दीपोत्सव और पर्यटन उद्योग को बढ़ावा, कुंभ की सफलता और प्रयागराज, वाराणसी, मथुरा में पर्यटन की संभावना और उद्योगों की आवक को बताया।

₹800 करोड़ की बेनामी संपत्ति के मालिक कॉन्ग्रेस नेता शिवकुमार 1 Oct तक न्यायिक हिरासत में तिहाड़ भेजे गए

दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में गिरफ्तार दिग्गज कॉन्ग्रेस नेता डीके शिवकुमार को 1 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि जेल भेजने से पहले उन्हें अस्पताल ले जाया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर डॉक्टर कहते हैं कि डीके शिवकुमार को अस्पताल में भर्ती करने की ज़रूरत है, तो उन्हें भर्ती किया जा सकता है, अन्यथा उन्हें छुट्टी दी जा सकती है। जिसके बाद उन्हें तिहाड़ जेल में ले जाया जा सकता है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, प्रवर्तन निदेशालय ने अदालत से शिवकुमार को पूछताछ के लिए न्यायिक हिरासत में भेजने की माँग की थी। ED की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल के.एम. नटराज ने अदालत से कहा कि पूछताछ अब तक पूरी नहीं हो सकी क्योंकि उनके स्वास्थ्य की स्थिति के चलते कारगर पूछताछ नहीं हो पाई। नटराज ने अदालत से यह भी कहा कि धन शोधन शिवकुमार और उनके परिवार के सदस्यों के बैंक खातों के जरिए ही हुआ।

बता दें कि इससे पहले ED ने शिवकुमार और उनके परिवार से जुड़े 317 खातों का जिक्र किया था जिनके माध्यम से मनी लॉन्डरिंग की घटना अंजाम दी गई थी। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अदालत को बताया था कि शिवकुमार की कई संपत्तियाँ बेनामी हैं और 317 बैंक खातों के जरिए धन शोधन किया गया है। ईडी ने कहा कि शिवकुमार के खिलाफ जाँच के अनुसार, शोधित धन 200 करोड़ रुपए से अधिक है और करीब 800 करोड़ रुपए मूल्य की बेनामी संपत्ति है।

बता दें कि वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने शिवकुमार की ओर से पेश होते हुए अदालत में दलील दी थी कि कॉन्ग्रेस नेता की स्थिति बहुत गंभीर है और वह दिल का दौरा पड़ने के करीब पहुँच गए थे, इसलिए उन्हें जमानत दे दी जाए। हमने पिछली बार भी कहा था इनकी तबीयत खराब है पर ईडी ने तब भी इनकी रिमांड ले ली अब ये कह रहे हैं कि इनकी जाँच पूरी नहीं हुई ईडी ने पूरे 15 दिन गुजार दिए फिर भी कह रहे हैं कि पूछताछ नहीं पूरी की गई। सिंघवी ने आगे कहा कि शिवकुमार की तबीयत बहुत खराब है इन्हें किसी प्रकार की कोई पूछताछ की इजाजत नहीं दी जाए हम माँग करते हैं कि शिवकुमार को जमानत पर रिहा कर दिया जाए।

अभिषेक मनु सिंघवी ने आगे कहा कि ईडी ये सब कुछ शिवकुमार को परेशान करने की नीयत से कर रही है। ईडी कोर्ट में झूठ बोल रही है इन्होंने कहा कि इन्होंने शिवकुमार के बयान लिए पर मेरी जानकारी में उनको तो पूछताछ के लिए बुलाया ही नहीं इन्होंने दूसरे लोगों की भी रिकवरी शिवकुमार के नाम पर दिखा दिया। ईडी ने कहा कि शिवकुमार की मेडिकल स्थिति का जाँच एजेंसी ने ध्यान रखा है और जमानत याचिका का विरोध किया।

गौरतलब है कि शिवकुमार को ईडी ने धन शोधन के मामले में तीन सितंबर को गिरफ्तार किया था। हिरासत में पूछताछ की अवधि खत्म होने पर अदालत में उन्हें पेश किया गया था।

ED ने विवादित बीफ निर्यातक मोईन कुरैशी की 4 राज्यों में 9.35 करोड़ रुपए की संपत्ति अटैच की

प्रवर्तन निदेशालय ने मीट कारोबारी मोईन कुरैशी की संपत्ति अटैच की है। दिल्ली, राजस्थान, देहरादून और गोवा में विवादित मीट कारोबारी की 9.35 करोड़ रुपए की संपत्ति अटैच की गई। ज़ी न्यूज़ के क्राइम एडिटर जीतेन्द्र शर्मा ने ट्विटर पर इसकी जानकारी देते हुए लिखा कि मोईन कुरैशी सीबीआई के अधिकारियों से मिल कर आरोपियों के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों को सेटल करने का काम करता था।

इससे पहले भी ED मोईन कुरैशी की 3.34 करोड़ रुपए की संपत्ति अटैच कर चुकी है। मोईन कुरैशी का नाम तब चर्चा में आया था, जब यह पता चला था कि 2014 में वह तत्कालीन सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा के घर पर 70 बार उनसे मिलने गया गया। तब नाराज़ सुप्रीम कोर्ट ने भी सिन्हा को इस बात के लिए फटकार लगाई थी। आपको बता दें कि मोईन कुरैशी की बेटी की शादी में परफॉर्म करने के लिए पाकिस्तानी सूफी गायक रहत फ़तेह अली ख़ान भारत आए थे। हालाँकि, लौटते वक़्त राजस्व अधिकारियों ने उन्हें 56 लाख रुपयों के साथ धर दबोचा था।

सीबीआई के निदेशक बदलते गए लेकिन मोईन कुरैशी से उन सबके संपर्क रहे और राकेश अस्थाना – आलोक वर्मा विवाद के दौरान भी कुरैशी का नाम उछला था। 2014 लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मोईन कुरैशी और कॉन्ग्रेस के साथ उनके लिंक की बात करते हुए इसे चुनावी मुद्दा बनाया था।

मोईन कुरैशी देश के सबसे बड़े बूचड़खानों का मालिक है और उसका व्यवसाय देश-विदेश तक फैला हुआ है। वह देश का सबसे बड़ा मीट निर्यातक है। वह दुबई और लंदन से लेकर यूरोप तक के हवाला कारोबार में संलग्न रहा है। केंद्र सरकार के कई बड़े अधिकारियों का कहना है कि कॉन्ग्रेस के बड़े नेताओं ने मोईन कुरैशी को बचाने के लिए पूरा जोर लगाया और उसे संरक्षण दिया।

जिसने घर-घर तक गीता पहुँचाया, धर्म की सेवा ‘घाटे का सौदा’ नहीं की सीख दी, उनकी जयंती पर नमन

गीता प्रेस गोरखपुर आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है- धर्मशास्त्रों के मुद्रण (छपाई) और वितरण में अग्रणी इस प्रकाशक की माली हालत भले ऊपर-नीचे चलती रहती हो, जो किसी भी व्यवसायिक संस्थान के साथ होता ही रहता है, लेकिन हिन्दू समाज में इसके जितना सम्मान शायद ही किसी संस्थान का हो। और गीता प्रेस को इस मुकाम तक पहुँचाने में जिनका योगदान सबसे अधिक रहा, उनमें से एक हैं हनुमान प्रसाद पोद्दार- गीताप्रेस की मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ के संस्थापक सम्पादक, और इसे अखिल-भारतीय विस्तार देने वाले स्वप्नदृष्टा, जिन्होंने यह मिथक तोड़ा कि धर्म के प्रचार-प्रसार के काम में आर्थिक हानि ही होती है, या इसमें पैसे का निवेश घाटे का सौदा ही होता है।

अंग्रेजों ने मोड़ा राष्ट्रवाद की ओर

17 सितंबर, 1892 को जन्मे हनुमान प्रसाद पोद्दार की राष्ट्रवादी और राजनीतिक गतिविधियों में भागीदारी जीवन के शुरुआती दौर में न के बराबर थी। जैसा कि उनके मारवाड़ी समुदाय में उस समय का प्रचलन था, उन्होंने कम उम्र में ही शादी की, पत्नी को माँ-बाप की सेवा में बिठाया और काम-धंधा सीखने कलकत्ते निकल पड़े। लेकिन उन दिनों का कलकत्ता राष्ट्रवादी क्रांतिकारी आन्दोलन का गढ़ था। युवा पोद्दार के हॉस्टल के भी कुछ युवक क्रांतिकारी निकले, और अंग्रेज़ पुलिस ने लगभग पूरे हॉस्टल के नौजवानों को बिना चार्ज जेल में ठूँस दिया- अंडरट्रायल के नाम पर सड़ने के लिए। इस अन्याय, और जेल में क्रांतिकारियों-राष्ट्रवादियों की संगति, ने पोद्दार को बदल दिया- वे जेल से छूटने के बाद शुरू में तो व्यापार के सिलसिले में बम्बई चले गए, लेकिन उनकी रुचि धीरे-धीरे अर्थ से अधिक धर्म और राष्ट्र की तरफ झुकने लगी थी।

बाइबिल के बराबर गीता का प्रसार करने के लिए शुरू की प्रेस

अलीपुर जेल में श्री ऑरोबिंदो (उस समय बाबू ऑरोबिंदो घोष) के साथ बंद रहे पोद्दार ने जेल में ही गीता का अध्ययन शुरू कर दिया था। वहाँ से छूटने के बाद उन्होंने ध्यान दिया कि कैसे कलकत्ता ईसाई मिशनरी गतिविधियों का केंद्र बना हुआ था, जहाँ बाइबिल के अलावा ईसाईयों की अन्य किताबें भी, जिनमें हिन्दुओं की धार्मिक परम्पराओं के लिए अनादर से लेकर झूठ तक भरा होता था, सहज उपलब्ध थीं। लेकिन गीता- जो हिन्दुओं का सर्वाधिक जाना-माना ग्रन्थ था, उसकी तक ढंग की प्रतियाँ उपलब्ध नहीं थीं। इसीलिए बंगाली तेज़ी से हिन्दू से ईसाई बनते जा रहे थे।

मारवाड़ी अधिवेशन में पड़ी कल्याण की नींव

1926 में हुए मारवाड़ी अग्रवाल महासभा के दिल्ली अधिवेशन में पोद्दार की मुलाकात सेठ घनश्यामदास बिड़ला से हुई, जिन्होंने आध्यात्म में पहले ही गहरी रुचि रखने वाले पोद्दार को सलाह दी कि जन-सामान्य तक आध्यात्मिक विचारों और धर्म के मर्म को पहुँचाने के लिए आम भाषा (आज हिंदी, उस समय की ‘हिन्दुस्तानी’) में एक सम्पूर्ण पत्रिका प्रकाशित होनी चाहिए। पोद्दार ने उनके इस विचार की चर्चा जयदयाल गोयनका से की, जो उस समय तक गोबिंद भवन कार्यालय के अंतर्गत गीता प्रेस नामक प्रकाशन का रजिस्ट्रेशन करा चुके थे। गोयनका ने पोद्दार को अपनी प्रेस से यह पत्रिका निकालने की ज़िम्मेदारी दे दी, और इस तरह ‘कल्याण’ पत्रिका का उद्भव हुआ, जो तेज़ी से हिन्दू घरों में प्रचारित-प्रसारित होने लगी। आज कल्याण के मासिक अंक लगभग हर प्रचलित भारतीय भाषा और इंग्लिश में आने के अलावा पत्रिका का एक वार्षिक अंक भी प्रकाशित होता है, जो अमूमन किसी-न-किसी एक पुराण या अन्य धर्मशास्त्र पर आधारित होता है।

गीता प्रेस की स्थापना के पीछे का दर्शन स्पष्ट था- प्रकाशन और सामग्री/जानकारी की गुणवत्ता के साथ समझौता किए बिना न्यूनतम मूल्य और सरलतम भाषा में धर्मशास्त्रों को जन-जन की पहुँच तक ले जाना। हालाँकि गीता प्रेस की स्थापना गैर-लाभकारी संस्था के रूप में हुई, लेकिन गोयनका-पोद्दार ने इसके लिए चंदा लेने से भी इंकार कर दिया, और न्यूनतम लाभ के सिद्धांत पर ही इसे चलाने का निर्णय न केवल लिया, बल्कि उसे सही भी साबित करके दिखाया। 5 साल के भीतर गीता प्रेस देश भर में फ़ैल चुकी थी, और विभिन्न धर्मग्रंथों का अनुवाद और प्रकाशन कर रही थी। गरुड़पुराण, कूर्मपुराण, विष्णुपुराण जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों का प्रकाशन ही नहीं, पहला शुद्ध और सही अनुवाद भी गीता प्रेस ने ही किया।

बम्बई से आई गोरखपुर, गोरखधाम बना संरक्षक

गीता प्रेस ने श्रीमद्भागवत गीता और रामचरितमानस की करोड़ों प्रतियाँ प्रकाशित और वितरित की हैं। इसका पहला अंक वेंकटेश्वर प्रेस बम्बई से प्रकाशित हुआ, और एक साल बाद इसे गोरखपुर से ही प्रकाशित किया जाने लगा। उसी समय गोरखधाम मन्दिर के प्रमुख और नाथ सम्प्रदाय के सिरमौर की पदवी को प्रेस का मानद संरक्षक भी नामित किया गया- यानी आज उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और नाथ सम्प्रदाय के मुखिया योगी आदित्यनाथ गीता प्रेस के संरक्षक हैं

गीता प्रेस की सबसे खास बात है कि इतने वर्षों में कभी भी उस पर न ही सामग्री (‘content’) की गुणवत्ता के साथ समझौते का इलज़ाम लगा, न ही प्रकाशन के पहलुओं के साथ- वह भी तब जब 60 करोड़ से अधिक प्रतियाँ प्रेस से प्रकाशित हो चुकीं हैं। 96 वर्षों से अधिक समय से इसका प्रकाशन उच्च गुणवत्ता के कागज़ पर ही होता है, छपाई साफ़ और स्पष्ट, अनुवाद या मुद्रण (printing) में शायद ही कभी कोई त्रुटि रही हो, और subscription लिए हुए ग्राहकों को यह अमूमन समय पर पहुँच ही जाती है- और यह सब तब, जबकि पोद्दार ने इसे न्यूनतम ज़रूरी मुनाफे के सिद्धांत पर चलाया, और यही सिद्धांत आज तक वर्तमान में 200 कर्मचारियों के साथ काम कर रही गीता प्रेस गोरखपुर में पालित होता है। न ही गीता प्रेस पाठकों से बहुत अधिक मुनाफ़ा लेती है, न ही चंदा- और उसके बावजूद गुणवत्ता में कोई कमी नहीं।

‘भाई जी’ कहलाने वाले पोद्दार ने ऐसा सिस्टम बना और चला कर यह मिथक तोड़ दिया कि धर्म का काम करने में या तो धन की हानि होती है (क्योंकि मुनाफ़ा कमाया जा नहीं सकता), या फिर गुणवत्ता की (क्योंकि बिना ‘पैसा पीटे’ उच्च गुणवत्ता वाला काम होता नहीं है)। उन्होंने मुनाफ़ाखोरी और फकीरी के दोनों चरम छोरों पर जाने से गीता प्रेस को रोककर, ethical business और धर्म-आधारित entrepreneurship का उदाहरण प्रस्तुत किया।

ठुकराया राय बहादुर और भारत रत्न, आज भी जारी अखंड रामचरित मानस पाठ

हनुमान प्रसाद पोद्दार उन चुनिन्दा सार्वजनिक हस्तियों में रहे, जिन्होंने अंग्रेजों का राय बहादुर और आज़ादी के बाद भारत सरकार का भारत रत्न दोनों ही मना कर दिए। 22 मार्च, 1971 को उनकी मृत्यु हो जाने के बाद प्रेस के जिस कमरे में, जिस डेस्क पर बैठकर वह प्रेस के संचालन और ‘कल्याण’ के सम्पादन के साथ-साथ ‘शिव’ के छद्म नाम से पत्रिका में लेखन भी करते थे, वह डेस्क और कमरा आज भी अक्षुण्ण रखे गए हैं। उनके कमरे में आज भी अखंड रामचरित मानस पाठ बदस्तूर चलता रहता है, जिसके लिए लोग पालियों में भागीदारी करते हैं।

नहीं मिली सारधा के आरोपित, ममता के करीबी पूर्व-कमिश्नर को जमानत, ढूँढ़ने के लिए CBI की विशेष टीम

सारधा घोटाले में आरोपित कोलकाता के पूर्व पुलिस आयुक्त राजीव कुमार की मुश्किलें लगातार बढ़ रहीं हैं। एक ओर अदालत ने उन्हें अग्रिम जमानत देने से मना कर दिया है, और दूसरी ओर सीबीआई ने सारधा घोटाले में उनकी गिरफ़्तारी के लिए विशेष टीम गठित कर दी है। यह टीम उन्हें मंगलवार सुबह 10 बजे तक सीबीआई के सामने खुद हाज़िर हो जाने की समयसीमा निकलने के बाद बनाई गई है।

25 तक छुट्टी पर होने का किया था दावा

राजीव कुमार के वकील ने पश्चिम बंगाल के डीजीपी को सूचित किया था कि 25 सितम्बर तक वे छुट्टी पर हैं। सोमवार को डीजीपी द्वारा सीबीआई को भेजे गए पत्र में यह जानकारी भी गई कि राजीव का जवाब उनके घर पर सीबीआई की नोटिस पहुँचने पर मिला था।

‘हमारे अधिकार क्षेत्र के बाहर’

राजीव कुमार ने अग्रिम जमानत याचिका जनप्रतिनिधियों के खिलाफ मामले चलाने के लिए गठित विशेष अदालत में दायर की थी। लेकिन विशेष अदालत के जज संजीब तालुकदार ने मना कर दिया कि उनका मामला सुनना विशेष अदालत के अधिकार क्षेत्र के बाहर है। विशेष अदालत के जज ने राजीव कुमार को बारासात जिला जज के सामने अर्ज़ी लगाने की सलाह दी। फ़िलहाल राजीव कुमार लापता चल रहे हैं। उनके मामले में बताया जा रहा है कि कलकत्ता उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के आदेश भी लंबित हैं

फ़िलहाल पश्चिम बंगाल CID के अतिरिक्त महानिदेशक राजीव कुमार सारधा चिटफंड घोटाले की जाँच के लिए बनी राज्य सरकार की SIT के सदस्य थे। बाद में वह केस, और चिट फंड घोटालों के अन्य मामले, उनसे लेकर 2014 में सीबीआई को सौंप दिए गए थे।

NCP छोड़ निकल लिए सारे संस्थापक, अकेले रह गए शरद पवार, अस्तित्व के संकट से जूझती पार्टी

महाराष्ट्र में शरद पवार की पार्टी राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (एनसीपी) के सभी संस्थापकों ने पार्टी का साथ छोड़ दिया है और संस्थापक सदस्यों में अब अकेले पवार ही बच गए हैं। महाराष्ट्र में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी को हार मिली थी। पिछले दोनों लोकसभा चुनाव में भी पार्टी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में विफल साबित हुई है। पूर्व में एनसीपी की महाराष्ट्र के अलावा बिहार और उत्तर पूर्व के राज्यों में भी अच्छी उपस्थिति थी लेकिन अब अपने गढ़ में ही पार्टी संघर्ष कर रही है।

20 वर्ष पूर्व कॉन्ग्रेस नेतृत्व के साथ संघर्ष के बाद शरद पवार ने पूर्व लोक सभाध्यक्ष पी. संगमा और बिहार के तारिक़ अनवर के साथ मिल कर एनसीपी की स्थापना की थी। पवार और संगमा की राहें तो 2004 में ही जुदा हो गई थीं और 2019 लोकसभा चुनाव से पहले तारिक़ अनवर ने भी पवार को झटका दिया और वापस कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए। इन्हें एनसीपी के गठन का त्रिदेव कहा गया था। अब स्थिति यह है कि शरद पवार ने 2019 में लोकसभा चुनाव ही नहीं लड़ा।

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के संस्थापक सदस्य गणेश नाइक, मधुकर पिचड़, अकोला से विधायक और पिचड़ के पुत्र वैभव पिचड़, विजय सिंह मोहिते पाटिल और उनके बेटे रणजीत सिंह पाटिल, पद्मा सिंह पाटिल और सचिन अहीर सहित कई नेताओं ने पवार का साथ छोड़ दिया है। इनमें से अधिकतर नेता भाजपा का दामन थाम रहे हैं। कई शिवसेना में भी गए हैं। ऐसे में, पवार की ढलती उम्र और गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए एनसीपी अस्तित्व के संकट से जूझ रही है।

अगर चर्चित चेहरों की बात करें तो शरद पवार के परिवार के अलावा पार्टी में दूर-दूर तक कोई नाम नज़र नहीं आता। उनकी बेटी सुप्रिया पवार बारामती से सांसद हैं और फ़िलहाल 2019 लोकसभा चुनाव में अपने पिता का पारम्परिक गढ़ बचाने में कामयाब रही हैं। मावल लोकसभा क्षेत्र से शरद पवार के भतीजे अजीत पवार के बेटे पार्थ अजीत पवार हार गए। ऐसे में, कभी महाराष्ट्र की राजनीति के केंद्र में रहा पवार परिवार आज हाशिए पर जाने के कगार पर है।

पहले कई बार ऐसा देखा जाता था कि विपक्षी नेता भी सीधे तौर पर शरद पवार पर हमला करने से बचते थे लेकिन 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान अमित शाह ने शरद पवार के पारम्परिक गढ़ बारामती जीतने की बात कह कर सीधा उन पर हमला किया था। पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार एनसीपी छोड़ कर जाने वाले नेताओं को कायर बताते हैं।

शूटर वर्तिका की याचिका पर कोर्ट ने दिया मुस्लिम पक्षकार के ख़िलाफ़ केस दर्ज करने का आदेश

राम मंदिर मामले में अंतराष्ट्रीय शूटर वर्तिका सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने मुस्लिम पक्षकार इकबाल अंसारी के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने थाना राम जन्मभूमि को आदेश देते हुए कहा है कि वो 3 दिन के भीतर इस केस को दर्ज करके न्यायालय को सूचना दें।

उल्लेखनीय है कि अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज वर्तिका सिंह ने धारा 156/3 के तहत मामला दर्ज करवाया था, जिसमें इकबाल अंसारी पर देशद्रोह और कई अन्य मामलों में केस दर्ज करने की माँग हुई थी।

ये पूरा मामला 3 सितंबर को हुई घटना को लेकर है, जब वर्तिका सिंह मुस्लिम पक्षकार इकबाल अंसारी से राम मंदिर को लेकर बात करने पहुँची थी। इस दौरान अंसारी ने उनपर हाथापाई के आरोप लगाए थे और उनके ख़िलाफ़ पुलिस में केस दर्ज करवाया था।

जिसके बाद इकबाल की इस शिकायत पर पुलिस ने वर्तिका से 4 घंटे बैठाकर पूछताछ की थी और बाद में उन्हें लखनऊ भेजा था।

इस घटना के मद्देनजर ही वर्तिका की ओर से सर्वोच्च न्यायालय की वकील संगीता सिंह ने उनकी पैरवी की। वकील संगीता सिंह ने कहा कि अंसारी ने वर्तिका पर फर्जी आरोप में केस दर्ज कर उन्हें उत्पीड़ित किया और साथ ही वर्तिका के साथ बातचीत में देश के खिलाफ (पाकिस्तान जिंदाबाद आदि) कई बातें कहीं।

वकील संगीता ने ये भी आरोप लगाया कि वर्तिका की शिकायत पर पुलिस ने मामले को दर्ज नहीं किया था। जिसके कारण उनकी शिकायत को धारा 156(3) के तहत याचिका JM, 2nd, के कोर्ट में दायर किया गया, और इसी कोर्ट ने अंसारी के खिलाफ केस दर्ज करने का आदेश दिया है।

BSP जिलाध्यक्ष पर 12 साल के बालक का अपहरण कर दुष्कर्म का आरोप, मुकदमा दर्ज

उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के जिलाध्यक्ष जयवीर सिंह और उसके साथी चंद्रभान पर 12 वर्षीय किशोर के साथ अप्राकृतिक कृत्य करने का आरोप लगा है। बच्चे के साथ हुई घटना की तहरीर परिजन ने पुलिस को दी। जिसके आधार पर पुलिस ने जिलाध्यक्ष जयवीर सिंह के खिलाफ अप्राकृतिक कृत्य के आरोप में मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है।

जानकारी के मुताबिक, पीड़ित बालक 7 सितंबर को अचानक से गायब हो गया। उसके पिता का कहना है कि कुछ दिनों पहले राधाष्टमी के मौके पर अपने भाई के पास गया था। जहाँ से वो लापता हो गया था। कुछ लोगों ने पीड़ित को बसपा जिलाध्यक्ष जयवीर सिंह और सुरवारी गाँव के पूर्व प्रधान चंद्रभान को बाइक पर ले जाते देखा।

जिसके बाद खोजबीन करने पर बालक गाँव के बाहर के एक झोपड़ी में मिला। शरीर पर खरोंच के निशान थे। जिसे वह उपचार के लिए सीएचसी कोसीकलाँ के सामुदायिक अस्पताल ले गए, जहाँ से उसे जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। होश आने पर बालक ने परिजनों को बताया कि आरोपित उसे बहला-फुसलाकर अपने साथ एक झोपड़ी में ले गए थे। जहाँ उन्होंने उसके साथ यह कृत्य किया।

प्रभारी निरीक्षक दुर्गेश कुमार ने बताया कि पीड़ित रविवार (सितंबर 15, 2019) की रात को थाने पहुँचे, जहाँ उनकी तहरीर पर दोनों आरोपितों के खिलाफ धारा 377 एवं पॉक्सो एक्ट में मुकदमा दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है। मामले में पूर्व प्रधान को भी नामजद किया गया है। वहीं, बसपा जिलाध्यक्ष जयवीर सिंह का कहना है कि उनका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि गाँव में चल रहे एक मुकदमे के मामले में दबाव बनाने के लिए उन्हें साजिश के तहत फँसाया जा रहा है। पीड़ित बालक द्वारा लगाए गए आरोप निराधार हैं।