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सड़े हुए सिस्टम से लड़ो नामर्दों, 73 साल के डॉ. देबेन दत्ता की मॉब लिंचिंग से खाक मिलेगा

“कोई भी फिज़िशियन, कितना भी कर्मवीर या ध्यान से काम करने वाला क्यों न हो, यह नहीं बता सकता कि किस घड़ी या किस दिन उसके ऊपर अकारण हमला हो सकता है, दुर्भावनापूर्ण आरोप लगाए जा सकते हैं, ब्लैकमेल किया जा सकता है या फिर क्षतिपूर्ति का मुक़दमा किया जा सकता है।”

यह अंश 136 साल पुराने ‘द जर्नल आफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (जेएएमए) के 10 जून 1992 को प्रकाशित अंक ‘असॉल्ट अपॉन मेडिकल मेन’ से लिया गया है। 73 साल के डॉ. देबेन दत्ता की मॉब लिंचिंग बताती है कि 27 साल में मेडिकल जगत ने भले बहुत तरक्की कर ली हो, लेकिन डॉक्टरों पर वही खतरा आज भी मॅंडरा रहा है, जिसके बारे में करीब तीन दशक पहले जिक्र किया गया था।

असम के एक चाय बागान के अस्पताल में इलाज के दौरान एक मजदूर की मौत हो गई। उसके नाराज रिश्तेदारों और अन्य मजदूरों ने डॉ. दत्ता के साथ मारपीट की। बाद में दत्ता की जान चली गई। इसी साल जून में देश के करीब आठ लाख डॉक्टरों के हड़ताल पर जाने से स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई थी। हड़ताल कोलकाता के एक अस्पताल में मोहम्मद सईद की मौत के बाद उनके परिजनों द्वारा जूनियर डॉक्टरों की पिटाई के विरोध में था। जिन डॉक्टरों को निशाना बनाया गया वे सईद के इलाज में शामिल तक नहीं थे।

देश के हर कोने में मरीज की मौत के बाद डॉक्टर या अस्पताल के कर्मचारियों के साथ मारपीट की घटना सामान्य होती जा रही है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के प्रेसीडेंट डॉ. राजन शर्मा ने कोलकाता की घटना के बाद कहा था, “यह सिलसिला अरसे से चला आ रहा। किसी भी सभ्य समाज में डॉक्टरों के खिलाफ ऐसी हिंसा बर्दाश्त नहीं की जा सकती।” डॉक्टरों को भगवान माने जाने को लेकर पूछे जाने पर उन्होंने कहा था, “भगवान हड़ताल पर नहीं जाते, लेकिन भगवान पर हमले भी नहीं होते हैं।”

यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट्स आफ हेल्थस नेशनल लाइब्रेरी आफ मेडिसिन (NIH/NLM) के जर्नल पबमेड सेंट्रल (PMC) की अगस्त 2018 की रिपोर्ट बताती है कि पश्चिमी देशों में बीते 40 साल में इस खतरे का दायरा सीमित हुआ है। इसके उलट डॉक्टरों को भगवान मानने वाले देश भारत में यह खतरा रोज बढ़ता जा रहा है।

पीएमसी की रिपोर्ट बताती है कि पश्चिमी देशों में इस खतरे के सीमित होने का मुख्य कारण इलाज की समुचित और बेहतर सरकारी चिकित्सा व्यवस्था है। ज्यादातर यूरोपीय देशों में इलाज पर होने वाला खर्च सरकार उठाती है। भारत में हालात इसके ठीक उलट हैं।

अमेरिकी संस्था सेंटर फॉर डिजीज डाइनेमिक्स, इकोनॉमिक्स एन्ड पॉलिसी का अध्ययन बताता है कि भारत में 65 फीसदी लोग इलाज के लिए अपने जेब से खर्च करते हैं। इसके कारण हर साल 5.70 करोड़ लोग गरीबी के दलदल में धँस जाते हैं। इस अध्ययन के अनुसार देश में 6 लाख डॉक्टर और 20 लाख नर्सों की कमी है। 10,189 लोगों पर एक सरकारी डॉक्टर हैं, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार 1,000 लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए।

सामाजिक कार्यकर्ता और सुप्रीम कोर्ट के वकील अशोक अग्रवाल ने ऑप इंडिया को बताया, “देश की 70 फीसदी आबादी इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों पर आश्रित है। निजी अस्पतालों के मुकाबले संख्या और संसाधन के लिहाज से सरकारी अस्पताल मुश्किल से 10 फीसदी होंगे। इलाज के लिए आश्रित आबादी और सरकारी अस्पतालों के बीच का असंतुलन इस खतरे का एक बड़ा कारण है। सरकारी अस्पतालों को बेहतर बनाने में सरकारों की भी रूचि नहीं है। यहॉं तक कि सरकारी अस्पताल मुफ्त में उपचार नहीं मुहैया कराते। ऐसे में गरीब भला क्या करे, कहॉं जाए?”

अग्रवाल सोशल ज्यूरिस्ट नामक संस्था चलाते हैं। निजी अस्पतालों में आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए कोटा पाने की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में इसी संस्था ने लड़ी थी। वे बताते हैं, “कोई संदेह नहीं कि सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों पर बोझ बहुत ज्यादा है। ओपीडी में कभी-कभी एक डॉक्टर 300 मरीजों का इलाज करते हैं। डॉक्टरों के साथ मारपीट की घटना भी अमूमन सरकारी अस्पतालों में ही होती है। ज्यादातर मामलों में इसका कारण सुविधाओं की कमी है, जिसे पूरा करना डॉक्टरों के वश में नहीं है। अस्पताल के कर्मचारियों और मरीजों के परिजनों के बीच बढ़ता अविश्वास इसका एक और कारण है।”

आईएमए का एक सर्वे बताता है कि 75 फीसदी डॉक्टरों को जुबानी और 12 फीसदी को शारीरिक हिंसा का शिकार होना पड़ता है। इस ट्रेंड से डॉक्टर इतने भयभीत हैं कि देश के शीर्ष मेडिकल संस्थान ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) दिल्ली के रेजीडेंट डॉक्टरों के एसोसिएशन ने 2017 में सदस्यों के लिए सेल्फ डिफेंस क्लासेज की शुरुआत तक कर डाली।

जून में हुए हड़ताल को लेकर इसी साल जुलाई में लोकसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में सरकार ने कहा था कि स्वास्थ्य राज्य का विषय है, इसलिए मरीजों के परिजनों और डॉक्टरों के बीच विवाद का केंद्र सरकार ब्यौरा नहीं रखती। इसी जवाब में बताया गया है कि इस कारण से इस साल 12 जुलाई तक दिल्ली स्थित केंद्रीय अस्पतालों सफदरजंग, लेडी हार्डिंग और राम मनोहर लोहिया में क्रमश: 4, 1 और 2 दिनों की हड़ताल हो चुकी थी।

इस हिंसा के मूल में है डॉक्टरों, अस्पतालों, उपकरणों और संरचना की कमी। खासकर, सरकारी क्षेत्र में। देश के ज्यादातर सरकारी अस्पतालों में पीने के पानी और शौचालय की तरीके से व्यवस्था नहीं है। हर अस्पताल में लंबी लाइन तो दिख जाती है, लेकिन बैठने की जगह कहीं नहीं होती।

इन अस्पतालों में डॉक्टर भी मरीजों की लंबी कतार से जूझ रहे होते हैं। लम्बे समय तक उन्हें काम करना पड़ता है। उनके लिए भी अस्पतालों में थोड़ी देर बैठकर सॉंस लेने की जगह नहीं होती। गिनती के सरकारी अस्पतालों को छोड़ दें तो डॉक्टरों को बैठने के लिए कायदे की कुर्सी भी नसीब नहीं होती। मरीज के साथ-साथ उनके 20-30 परिजन और दोस्तों से भी उन्हें जूझना पड़ता है।

यानी, संकट दोनों तरफ है। इस तरह के हालात में जब बेड, डायलिसिस मशीन, वेंटिलेटर या अन्य किसी कारण से मरीज को दूसरे अस्पताल ले जाने के लिए उनके परिजनों या दोस्तों से कहा जाता है तो भावनाओं पर काबू नहीं रहता और गुस्सा फूट पड़ता है।

लेकिन, इसमें डॉक्टरों का क्या दोष? फिर सरकारों की नाकामी का खीझ हम उन पर क्यों निकालते हैं?

सरकारें कितनी गंभीर

कोलकाता की घटना के बाद जब डॉक्टर हड़ताल पर गए तो वहॉं की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुरक्षा का भरोसा दिलाने की बजाए उन्हें काम पर लौटने के लिए धमकाया। जब हड़ताल देशव्यापी हो गया तो पश्चिम बंगाल की सरकार मजबूरी में बातचीत के लिए राजी हुई। हालॉंकि, ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों और चिकित्सा व्यवस्था से जुड़े अन्य लोगों पर बढ़ते हमलों को देख केंद्र सरकार नया कानून लाने जा रही है। इसके मसौदे के मुताबिक हिंसा में शामिल लोगों को 10 साल तक की जेल हो सकती है और 10 लाख रुपए तक जुर्माना देना पड़ सकता है।

आँकड़ों की ये कैसी बाजीगरी

एक तरफ सरकार डॉक्टरों की कमी दूर करने वादा करती है, दूसरी तरफ दावा करती है कि देश में डॉक्टर-मरीज का अनुपात डब्ल्यूएचओ के मानदंड से बेहतर है। केंद्र सरकार ने इसी साल जुलाई में लोकसभा में बताया था कि डॉक्टरों की कमी दूर करने के लिए 2017-18 से लेकर 2019-20 के बीच अंडर ग्रेजुएट की 15,815 और पोस्ट ग्रेजुएट की 8,883 सीटें बढ़ाई गई हैं। उससे पहले 28 जूून को लोकसभा में बताया था कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) के अनुसार 31 जनवरी 2019 तक देश में 11,57,771 डॉक्टर स्टेट मेडिकल काउंसिल और एमसीआई के तहत पंजीकृत थे। सरकार का अनुमान है कि इनमें से 9.26 लाख डॉक्टर सेवा के लिए उपलब्ध हैं। इस आधार पर 1,457 मरीज पर 1 डॉक्टर का अनुपात बैठता है। लेकिन, इसी जवाब में सरकार आयुर्वेदिक, यूनानी और होम्योपैथिक चिकित्सकों की संख्या बता कर यह दावा भी करती है कि 867 मरीज पर 1 डॉक्टर हैं।

हकीकत कुछ ऐसी है

सच्चाई यह है कि ज्यादातर डॉक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे या प्राइवेट हॉस्पिटल में काम करते हैं। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कितनी घोर कमी है, इसका अंदाजा देश के शीर्ष संस्थान एम्स की स्थिति से लगाया जा सकता है। एम्स दिल्ली में ​संकाय और गैर संकाय चिकित्सकों को 2,200 से ज्यादा पद खाली हैं। 10 नए एम्स में जूनियर और रेजीडेंट डॉक्टरों के 1,350 से ज्यादा तो संकाय चिकित्सकों के आधे से ज्यादा यानी 2,395 सृजित पदों में से 1,364 खाली हैं। जबकि एम्स दिल्ली की वार्षिक रिपोर्ट बताती है कि साल भर में मरीजों की संख्या 17 फीसदी बढ़ी है। उसके ओपीडी में औसतन 9,300 मरीज रोज इलाज कराते हैं। वेटिंग पीरियड छह महीने से दो साल तक का है। हालत यह है कि इस साल मार्च में एम्स ने बिहार से आए 66 साल के बहादुर राम को हार्ट सर्जरी के 13 जनवरी 2021 को आने के लिए कहा।

नीति आयोग की इस साल ‘स्वस्थ राज्य, प्रगतिशील भारत’ शीर्षक से जारी दूसरी स्वास्थ्य सूचकांक से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की स्वास्थ्य सेवा देश में सबसे खराब है। देश के ज्यादातर राज्यों में सालों से डॉक्टरों की बहाली नहीं हुई है या वे अनुबंध पर काम कर रहे हैं। जब इलाज करने वालों की ऐसी कमी हो, एम्स जैसे संस्थानों के पास पर्याप्त संसाधन ना हो तो अन्य अस्पतालों में उपकरणों, इलाज की अन्य सुविधाओं और संसाधनों की कमी का अंदाजा लगाया ही जा सकता है।

क्यूँ ऐसे हालात

मौजूदा हालात का सबसे बड़ा कारण केंद्र और राज्य सरकारों के बजट में स्वास्थ्य के लिए बेहद कम आवंटन का होना है। नेशनल हेल्थ पॉलिसी में 2025 तक स्वास्थ्य बजट जीडीपी का 2.5 फीसदी करने का लक्ष्य तय किया गया है। फिलहाल यह 1.7 फीसदी है। विकसित देशों में यह 6 फीसदी है।

चाहे किसी दल की सरकार हो, किसी भी प्रदेश की बात हो स्वास्थ्य पर खर्च कमोबेश ऐसा ही है। यह स्वास्थ्य को लेकर हमारे राजनीतिक दलों की गंभीरता को बयॉं करने के लिए काफी है। इसलिए, अगली बार जब भी भावनात्मक रूप से टूटे तो गुस्सा बचाकर रखिएगा। सिस्टम से, जिम्मेदारों से सवाल करने के लिए। उन नामर्दों की भीड़ में मत शामिल हो जाइएगा जिसका गुस्सा लाचार डॉक्टरों को निशाना बना शांत हो जाता है। आप की तरह डॉक्टर भी सिस्टम के ही मारे हैं। बेबसी और लाचारी ही उनका भी सत्य है।

‘राम मंदिर मामले में तुम ईश्वर से धोखा कर रहे’ – 88 वर्षीय प्रोफेसर ने मुस्लिम पक्षकार धवन को लिखा पत्र

राम मंदिर सुनवाई में सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उन्हें एक धमकी भरा पत्र मिला है। इस पत्र में धवन से पूछा गया था कि वे एक हिन्दू होकर राम मंदिर के विरुद्ध जिरह कैसे कर सकते हैं? राजीव धवन ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष इस मामले को उठाया, जिसके बाद पत्र लिखने वाले के ख़िलाफ़ अवमानना का मामला दर्ज किया गया है। पत्र भेजने वाले की पहचान का भी खुलासा हुआ है।

मुस्लिम पक्षकार राजीव धवन को यह पत्र चेन्नई के प्रोफेसर एन शानमुगम ने लिखा था। प्रोफेसर शानमुगम की उम्र 88 वर्ष है। इस पत्र में उन्होंने राजीव धवन से पूछा था कि वह अपनी आस्था के साथ विश्वासघात कैसे कर सकते हैं? प्रोफेसर ने लिखा था कि धवन को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे क्योंकि उन्होंने ईश्वर की अवहेलना की है। इसके अलावा उन्होंने राजीव धवन को श्राप भी दिए।

राजीव धवन को इसके अलावा व्हाट्सप्प पर भी धमकी भरे मैसेज मिले हैं। बता दें कि राम मंदिर मामले में जहाँ हिन्दू पक्ष की तरफ से के पराशरण वकील हैं, वहीं राजीव धवन मुस्लिम पक्षकार हैं। सुप्रीम कोर्ट में अब राम मंदिर मामले की नियमित सुनवाई चल रही है।

कर्नाटक कॉन्ग्रेस के कद्दावर नेता डीके शिवकुमार गिरफ़्तार, ED की बड़ी कार्रवाई

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस के कद्दावर नेता डीके शिवकुमार को गिरफ़्तार कर लिया गया है। प्रवर्तन निदेशालय ने यह कार्रवाई ‘Prevention of Money Laundering Act (PMLA)’ के तहत की गई है। लगातार 4 दिनों तक चली मैराथन पूछताछ के बाद ईडी ने उन्हें गिरफ़्तार किया है।

कॉन्ग्रेस-जेडीएस सरकार के दौरान डीके शिवकुमार अपनी पार्टी के लिए मुख्य भूमिका में थे। उन्होंने विधायकों को रिसोर्ट में ठहराने से लेकर बस से आवागमन तक की व्यवस्था की थी। उन्हें शनिवार (अगस्त 31, 2019) को ही ईडी ने हिरासत में ले लिया था, जिसके बाद उनसे पूछताछ जारी थी।

कॉन्ग्रेस ने इस मामले में भाजपा पर बदले की राजनीति करने का आरोप लगाया है। डीके शिवकुमार ने पूछताछ से पहले मीडिया से बात करते हुए कहा था कि वह निर्दोष हैं और जाँच एजेंसियों के साथ सहयोग करने के लिए तैयार हैं।

नकली IPS बन कर रिक्शा चालक जावेद ने बनाए 3000 गर्लफ्रेंड, माँगता था न्यूड तस्वीरें

उत्तर प्रदेश के बरेली में एक रिक्शे वाले ने ऐसा खेल खेला कि इसके जाल में न सिर्फ़ लड़कियाँ बल्कि पुलिस ऑफिसर तक फँस गए। 52 वर्षीय जावेद पहले से ही शादीशुदा है और सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पर सक्रिय है। जहाँ लोग एक गर्लफ्रेंड बनाने के लिए तरसते हैं, जावेद ने 3000 लड़कियों को न सिर्फ़ अपने प्रेम-पाश में फँसाया बल्कि उनमें से कई के साथ शादी का वादा तक कर दिया।

इस काम के लिए जावेद ने पुलिस का ही सहारा लिया। उसने साफ-सुथरे छवि वाले लोकप्रिय आईपीएस ऑफिसर नुरूल हसन के नाम से फेसबुक आईडी बनाई और फोटो भी उन्हीं की लगा दी। महाराष्ट्र में एसपी के पद पर तैनात हसन काफ़ी संघर्ष कर के इस पद पर पहुँचे हैं और ग़रीब परिवार से होने के बावजूद यहाँ तक का सफर तय करने के कारण लोग उनकी इज्जत करते हैं। जावेद ने उनकी फोटो का जुगाड़ किया और सोशल मीडिया पर पहचान बदल कर अपने काम में जुट गया।

वह ख़ुद को आईपीएस अफसर नुरूल हसन बताता था। उसने फेसबुक पर कई हज़ार मित्र बना लिए और लड़कियों के साथ चैटिंग करने लगा। बरेली से लेकर मुंबई तक की कई लड़कियों ने उसे शादी के प्रस्ताव भी भेजे। वह लड़कियों से न्यूड तस्वीरें भी माँगता था। मामले की पोल तब खुली जब एक लड़की ने अपनी माँ के साथ मिल कर असली आईपीएस हसन को ही ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया।

उन्होंने आईपीएस से अवैध वसूली की भी कोशिश की। ख़बर के अनुसार, जावेद ने नकली आईपीएस बन कर न सिर्फ़ आम लड़कियों बल्कि कई महिला आईपीएस अधिकारियों तक को अपने जाल में फँसाया था। ब्लैकमेलिंग में लगी माँ-बेटी के अलावा रिक्शा चालक जावेद को भी गिरफ़्तार कर लिया गया है। उसने कुल 16 लड़कियों से अश्लील चैटिंग की थी।

जावेद को जब कोई युवती वीडियो कॉल करती थी तो वह भेद खुलने के डर से रिसीव नहीं करता था। जावेद की पत्नी अपने शौहर की इस हरकत से तंग आ चुकी थी और गुस्से में उसने उसके 5 फोन फोड़ डाले थे। जावेद की बीवी ने उसके फोन में कई नंगी लड़कियों की तस्वीरें देख ली थीं। एक जवान बेटे का बाप होने के बावजूद उसकी ऐसी हरकत से वह क्षुब्ध हो चुकी थी। जावेद को जेल भेज दिया गया है।

पत्रकार वीडियो बनाएगा तो उस पर मुक़दमा हो जाएगा! लोगों ने पूछा – पटेल साहब आपको DM किसने बनाया?

पश्चिम बंगाल के हुगली स्थित एक विद्यालय में छात्रों को मिड डे मील के नाम पर नून-रोटी खिलाए जाने की बात सामने आई थी। इसके बाद उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर से भी ऐसा ही मामला सामने आया। बच्चों को मिड डील मील के नाम पर रोटी-नमक खिलाया जा रहा था। जब ख़बर हमारे-आपके पास पहुँची, लाजिमी है कि किसी व्यक्ति ने ही वहाँ जाकर इस चीज का पता लगाया होगा और जनता को बच्चों के साथ हो रहे इस अन्याय से अवगत कराया होगा। क्यों? ताकि प्रशासन की नींद खुले, दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई हो और सरकार अन्य स्कूलों में भी छानबीन करे कि ऐसा नहीं हो रहा।

इस मामले को पत्रकार पवन जायसवाल ने जनता के सामने लाया। एक पत्रकार का यही तो कर्तव्य होता है। प्रशासन द्वारा अगर ग़लत किया जा रहा है तो पत्रकार उस सच्चाई को सार्वजनिक करता है। पत्रकार ही क्यों, आजकल सोशल मीडिया के ज़माने में कोई भी ऐसा कर सकता है। चीजें वायरल होने के बाद उचित कार्रवाई होती है। लेकिन, यूपी में उसी पत्रकार के ख़िलाफ़ केस दर्ज कर लिया गया। लेकिन, इसके पीछे जो तर्क दिए गए वह अजीबोगरीब थे।

ये केस दर्ज कराया गया जमालपुर के प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी द्वारा। उन्होंने पत्रकार पवन जायसवाल पर गाँव के प्रतिनिधि के साथ मिल कर राज्य सरकार की इमेज ख़राब करने का आरोप लगाया। अब सवाल यह उठता है कि राज्य सरकार की इमेज बच्चों को नमक-रोटी दिए जाने से ख़राब होती है या व्यवस्था की खामी सामने आने के बावजूद उसे सुधारने के बजाय आरोप-प्रत्यारोप पर? जिस व्यक्ति ने पत्रकार पवन को इस सम्बन्ध में सूचना दी थी, उसे गिरफ़्तार भी कर लिया गया। राज कुमार पाल नामक उस व्यक्ति को जेल भेज दिया गया।

पवन जायसवाल सरकार से निवेदन कर रहे हैं कि वे पत्रकार हैं और अपने जीवनयापन के लिए उन्हें अपनी ड्यूटी करनी ज़रूरी है। एक वीडियो के माध्यम से उन्होंने बताया कि वह एक क्षेत्रीय पत्रकार हैं और एक दैनिक अख़बार के लिए लिखते हैं। उन्हें सूचना मिली कि सीयूर प्राथमिक विद्यालय में मिड डे मील कार्यक्रम में गड़बड़ियाँ हो रही हैं, जिसके बाद वह वहाँ पहुँचे। उन्होंने वहाँ जाने से पहले सम्बंधित अधिकारी को ख़बर तक कर दी कि वे वहाँ जा रहे हैं। वहीं उन्होंने देखा कि छात्रों को नमक-रोटी दिया जा रहा है। ये रहा पत्रकार पवन का बयान:

उन्होंने विद्यालय में मिड डे मील में हो रही गड़बड़ियों का वीडियो बनाया और सीनियर रिपोर्टरों को इससे अवगत कराया। इसके बाद डीएम को सूचना दी गई, जिन्होंने वहाँ पहुँच कर जाँच किया और कई अधिकारियों पर गाज गिरी। इसके बाद जिला प्रशासन ने किरकिरी से बचने के लिए पत्रकार पवन के ऊपर कई आपराधिक मामले दर्ज कर दिए। अगर ख़बर ग़लत निकलती तो पत्रकार को दोष दिया जा सकता था लेकिन विडम्बना यह है कि जिस डीएम ने इस सूचना को सही पाया था, अब वही पत्रकार पर कार्रवाई को सही ठहरा रहे हैं।

यहाँ 2 चीजें सामने आती हैं। आरोप लगाया गया है कि उक्त पत्रकार ने साज़िश के तहत प्रधान के प्रतिनिधि के साथ मिल कर राज्य सरकार को बदनाम करने के लिए छात्रों के बीच नमक-रोटी वितरित किया और इसका वीडियो बना कर वायरल कर दिया। अब सवाल फिर से – विद्यालय में दो आदमी (पत्रकार और प्रधान का प्रतिनिधि) आते हैं, ये दोनों ही विद्यालयी-व्यवस्था के कर्मचारी नहीं होते हैं, फिर भी बड़े आराम से छात्रों के बीच नमक-रोटी वितरित करते हैं, इतना सब कुछ हो जाता है और शिक्षक-कर्मचारी देखते रहते हैं! दूसरी बात यह है कि डीएम ने स्कूल पहुँच कर अधिकारियों का निलंबन तभी किया होगा जब उन्होंने सूचना को सही पाया होगा। क्या बिना गड़बड़ियाँ देखे अधिकारियों पर गाज गिराई गई होगी? आइए देखते हैं इस बारे में डीएम क्या सफाई देते हैं।

डीएम अनुराग पटेल का कहना है कि पत्रकार किसी और व्यक्ति को बुलाता दिख रहा है और कह रहा है कि वीडियो को वायरल करना है। जब उन्हें याद दिलाया गया कि वीडियो में ‘वायरल’ शब्द का कहीं इस्तेमाल ही नहीं किया गया है तो उन्होंने कहा कि वो वीडियो बनाने की बात तो कर रहे हैं। डीएम का कहना है कि प्रिंट मीडिया का पत्रकार वीडियो नहीं बना सकता। डीएम का कहना है कि पत्रकार पवन फोटो क्लिक कर लेते, ख़बर छाप देते लेकिन उन्हें वीडियो नहीं बनाना चाहिए था।

डीएम पटेल के अनुसार, वीडियो बना लेने के कारण पत्रकार की भूमिका संदिग्ध हो जाती है और इसीलिए उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा दायर किया गया है। जबकि, डीएम ने पहले ख़ुद कहा था कि नमक चावल देने की बात सामने आई है। अब टालमटोल करते हुए डीएम कहते हैं कि खिचड़ी में तो नमक, चावल होता ही है और दाल भी होती है। डीएम अनुराग पटेल के बयानों को देख कर साफ़ झलकता है कि प्रशासन इस मामले को दबाने में लगा है। एडिटर्स गिल्ड ने भी इस मामले की निंदा की है लेकिन गिल्ड के बयान का कोई महत्व नहीं है। देखें डीएम का बयान:

एडिटर्स गिल्ड के बयानों का कोई मतलब इसीलिए नहीं है क्योंकि वह पश्चिम बंगाल में पत्रकारों के सिर फोड़े जाने, कर्नाटक में तत्कालीन कुमारस्वामी सरकार द्वारा संपादक के ख़िलाफ़ केस दर्ज कराए जाने और लालू यादव सरीखे नेताओं द्वारा पत्रकारों के साथ बदतमीजी किए जाने पर चुप रहता है।

अगर मिर्ज़ापुर के डीएम के बयान पर ग़ौर करें तो सवाल उठता है कि प्रिंट का पत्रकार वीडियो क्यों नहीं बना सकता? आज जब अख़बारों के कंटेंट वेबसाइट पर भी प्रयोग किए जाते हैं तो वीडियो वेबसाइट के लिए भी तो बनाया जा सकता है? ये सारी चीजें हटा दीजिए फिर भी, किसी भी आम नागरिक को किसी भी प्रशासनिक गड़बड़ी का वीडियो बनाने का अधिकार है, जब तक उसमें किसी की प्राइवेसी का हनन न हो। प्रिंट का पत्रकार वीडियो नहीं बना सकता! कल को यह कहा जाएगा कि वेबसाइट का पत्रकार फिल्ड में रिपोर्टिंग के लिए नहीं जा सकता!

यूपीएससी के कई चरणों की परीक्षा और साक्षात्कार पास करने के बाद डीएम बनते हैं। जिलाधिकारी अर्थात पूरे जिले का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी। लेकिन अब वह इस आधार पर मुक़दमे ठोकने में लगा है कि प्रिंट के पत्रकार ने वीडियो क्यों बनाई, तो यह हास्यास्पद है। टीवी का पत्रकार वीडियो बनाएगा या फोटो क्लिक करेगा? रेडियो न्यूज़ का पत्रकार सिर्फ़ आवाज़ रिकॉर्ड करेगा? क्या अब इस देश में प्रशासन की सच्चाई उजागर करने के लिए इसी आधार पर मुक़दमे चलाए जाएँगे? सोशल मीडिया पर लोग ऐसे सवाल पूछ रहे हैं।

पाकिस्‍तान की हेकड़ी गायब: अब भारत से माँग रहा जीवन रक्षक दवाएँ, अस्‍पतालों में मरीजों को बुरा हाल

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 को हटाए जाने के बाद से बौखलाए पाकिस्तान ने जोश-जोश में भारत के साथ व्यापार तो रोक दिया, लेकिन उसका यह कदम उसके लिए ही भारी पड़ रहा है। संसाधनों की कमी से जूझ रहा पाकिस्तान अब जीवनरक्षक दवाओं की कमी से परेशान है। युद्ध की धमकी देकर रोज घुसपैठ की कोशिशों में लगा पाक अब घुटने टेकने को मजबूर हो गया है। पाकिस्तान ने फिलहाल सोमवार को भारत के साथ आंशिक रूप से व्यापार को बहाल करते हुए भारत से जीवनरक्षक दवाओं के आयात करने को मंजूरी दे दी है।

खाने के लाले पड़े पाकिस्तान ने अपने हवाई मार्ग भी बंद कर रखे हैं भारत के लिए लेकिन भारत के साथ व्‍यापार पर प्रतिबंध के 30 दिन गुजरते-गुजरते पाकिस्तान को अपने फैसले का असर साफ दिखने लगा। जबकि पाक के इन प्रतिबंधों का भारत पर कुछ खास असर नहीं हुआ, लेकिन पाकिस्तान घुटनों के बल आ गया।

जियो टीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत से दवाओं के आयात और निर्यात की अनुमति पाकिस्तान के वाणिज्य मंत्रालय के द्वारा सोमवार को दी गई। इसके संबंध में एक वैधानिक नियामक आदेश जारी किया गया है। बता दें कि पाकिस्तान बड़े स्तर पर भारतीय दवाओं का आयात करता है। हर तरह की दवाओं के लिए वो भारत पर आश्रित है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने पिछले 16 महीनों के दौरान भारत से 250 करोड़ रुपए से ज्यादा की केवल रेबीजरोधी और जहररोधी टीकों की खरीदारी की है।

गौरतलब है कि पाकिस्तान के दवा उद्योग का इस समय बुरा हाल है। अनुच्छेद-370 हटाए जाने के विरोध में पाकिस्तान ने जब भारत से व्यापारिक रिश्ते खत्म किए तो वहाँ के व्यापारियों को भारत से दवाएँ मँगवाना बंद करने की मजबूरी थी। जिससे चंद दिनों में ही पाकिस्तान के अस्पताल में जीवन रक्षक दवाओं की भी घोर किल्लत हो गई। दवाओं के अभाव में मरीज तड़पने लगे।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, फेडरेशन ऑफ पाकिस्तान चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के मुताबिक, पाकिस्तानी दवा कम्पनियाँ अपने उत्पादन के लिए भारत और चीन से 50 प्रतिशत से अधिक कच्चा माल आयात करती हैं। एफपीसीसीआई में दवा समिति के प्रमुख ख्वाजा शाहजेब अकरम ने बताया कि स्थानीय स्तर पर उत्पादित दवाओं में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल का एक बड़ा हिस्सा भारत से आयात किया जाता है, क्योंकि हमारे पड़ोसी देश में दवाओं के लिए कच्चे माल का एक स्थापित उद्योग है।

बता दें कि भारत से पाकिस्तान मुख्‍य तौर पर चीनी, चाय, जीवन रक्षक दवाएँ, ऑयल, केक, पेट्रोलियम तेल, कच्चा कपास, सूती धागे, टायर, रबड, डाई, रसायन समेत 14 सामान आयात करता है।

स्वरा ने भाजपा सांसद को कहा बलात्कारी मानसिकता वाला, किया था ‘उंगली’ वाला ट्वीट लाइक

ट्विटर पर स्वरा भास्कर ने भाजपा सांसद लल्लू सिंह पर गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें बलात्कारी मानसिकता वाला बताते हुए उन्हें याद दिलाया कि उन्हें अपने आचरण में सुधार लाना चाहिए। हुआ यूँ कि स्वरा भास्कर ने अपनी एक तस्वीर ट्वीट की थी और उस पर किसी मनचले लड़के ने उनकी फिल्म (वीरे दी वेडिंग) के एक दृश्य को याद करते हुए भद्दी बात लिख दी। लल्लू सिंह के हैंडल ने उस ट्वीट को ‘लाइक’ कर दिया।

स्वरा ने उस ट्वीट को लल्लू सिंह द्वारा लाइक करने का स्क्रीनशॉट लेते हुए उन्हें पुरुष की मर्यादा का ध्यान कराते हुए लिखा, “मर्यादा पुरूषोत्तम श्री रामचंद्र की नगरी अयोध्या के सांसद @LalluSinghBJP आपके handle ने कल रात एक ट्वीट ‘like’ किया था! आपका वो छोटा सा action एक बहुत गहरी सामाजिक समस्या और मानसिकता को दर्शाता है। कृपया मेरा संदेश पढ़ने का कष्ट करें!” स्वरा ने कहा कि ये न तो ‘कूल’ है, न ही ‘ओके’।

स्वरा ने ट्वीट में सवाल करते हुए लिखा,

“माननीय सांसद महोदय श्री लल्लू सिंह जी… आप मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र की नगरी का प्रतिनिधित्व करते हैं लोक सभा में… महिलाओं के साथ छेड़खानी करती हुई, बलात्कारी मानसिकता दर्शाती हुई और इस देश के साइबर कानून के हिसाब से, साइबर यौन उत्पीड़न करती हुई इस घटिया ट्वीट को ‘लाइक’ करके आप ऐसी ओछी हरकतों को प्रोत्साहन दे रहे हैं…
आप मेरे पिता की उम्र के हैं, इस देश के संसद का हिस्सा हैं – आपको महिलाओं की इज्जत करने का उदाहरण बनना चाहिए, राम राज्य के संस्कारों का प्रतीक बनना चाहिए ना कि सड़क-छाप गुंडई की वाह-वाही करनी चाहिए। यह ना तो आपको शोभा देता है ना ही आपके पद के अनुकूल है।

सादर
स्वरा भास्कर”

स्वरा भास्कर ने जारी किया बयान

इस पर लल्लू सिंह ने माफ़ी माँगते हुए जो लिखा वो किसी को भी ठीक से संतुष्ट नहीं कर पा रहा कि उन्होंने स्क्रॉल करते वक़्त गलती से ट्वीट के उस बेहूदे रिप्लाई को लाइक कर दिया। उन्होंने लिखा, “यह कृत्य में अनजाने में scroll करते वक़्त हुआ होगा जिसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। मेरा इस तरह का कोई उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करने का कभी नही रहा है। आप मेरे सामाजिक व व्यक्तिगत जीवन के बारे में स्वयं पता कर सकती है।”

हालाँकि, स्वरा भास्कर ने उनके स्पष्टीकरण को स्वीकार कर लिया और उनका धन्यवाद किया, “बहुत धन्यवाद श्री @lallusinghbjp जी आपके स्पष्टीकरण के लिए। और इस शालीन प्रतिक्रिया के लिए भी आपका धन्यवाद।”

जाली नोट मामले में सपा नेता मुज़म्मिल हयात गिरफ़्तार, मायावती सरकार के दौरान बसपा में था शामिल

जाली नोटों के कारोबार पर शिकंजा कसने के लिए गोवा पुलिस को उत्तर प्रदेश के हापुड़ तक आना पड़ा। नकली नोटों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को काफ़ी नुक़सान पहुँचता है। गोवा पुलिस ने इसी से जुड़े एक मामले की तह तक जाने की कोशिश की तो हापुड़ के समाजवादी पार्टी नेता मुज़म्मिल हयात का नाम सामने आया। उसे गिरफ़्तार करने के लिए गोवा पुलिस पश्चिमी यूपी के हापुड़ पहुँची थी। सपा नेता का साथी पहले ही गिरफ़्तार किया जा चुका है।

सपा नेता के साथी शादाब की निशानदेही पर ही मुज़म्मिल हयात को गिरफ़्तार किया गया। पुलिस ने उससे कई घंटों तक पूछताछ की। देर रात उसका मेडिकल कराने के बाद पुलिस उसे रिमांड पर ले गई। मुज़म्मिल हयात व्यवसायी है। उसके क़रीबी शादाब के घर से 77 हज़ार रुपए के जाली नोट बरामद किए गए थे। जब पुलिस ने उससे गहनता से पूछताछ की तो भट्टा व्यवसायी मुज़म्मिल का नाम सामने आया।

गढ़ कोतवाली का रहने वाला सपा नेता मुज़म्मिल के पार्टी के अन्य बड़े नेताओं से काफ़ी क़रीबी सम्बन्ध रहे हैं। हालाँकि, इस सम्बन्ध में समाजवादी पार्टी ने स्पष्टीकरण जारी किया है। समाजवादी पार्टी के पूर्व मंत्री मदन चौहान ने दावा किया कि मुज़म्मिल सपा का सदस्य नहीं है और उसके पास पार्टी में कोई पद नहीं है। चौहान ने कहा कि उक्त आरोपित सपा का सदस्य भी नहीं है।

शुक्रवार (अगस्त 30, 2019) को हुई इस कार्रवाई के दौरान पता चला कि इस धंधे में मुज़म्मिल और शादाब के कई और साथी भी लिप्त हैं। पुलिस सभी का पता लगाने के लिए जाँच कर रही है। गोवा पुलिस की पाँच सदस्यीय टीम ने मुज़म्मिल की गिरफ़्तारी के ऑपरेशन को अंजाम दिया। मुज़म्मिल के बारे में यह भी पता चला है कि वह मायावती सरकार के दौरान बसपा में शामिल था।

हमारे पास पाकिस्तान के ISIS से रिश्तों के पुख्ता सुबूत हैं- अफगानिस्तान के पूर्व खुफिया प्रमुख का दावा

भारत के पड़ोसी देश अफगानिस्तान में इस बार उपराष्ट्रपति के पद के लिए उम्मीदवार अमरुल्लाह सलेह ने भारतीय मीडिया सीएनएन न्यूज-18 से बातचीत में दावा किया कि पाकिस्तान के ISIS से संबंध हैं। सलेह के मुताबिक उनके पास अपने दावे के पुख्ता सबूत भी हैं कि पाकिस्तान ISIS आतंकियों को फंडिंग करता है।

इस साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि कुछ समय पहले काबुल में सुरक्षाबलों ने कुछ ISIS आतंकियों को पकड़ा था। जिन्होंने पूछताछ में खुलासा किया था कि उन्हें पाकिस्तान से फंडिंग मिलती हैं। पाकिस्तान इन्हें आतंक फैलाने के लिए हथियार भी मुहैया कराता है, जिसके अफगानिस्तान के पास पक्के सबूत हैं।

सलेह ने इस बातचीत में कश्मीर पर फैसला लेने पर मोदी सरकार की तारीफ़ भी की। साथ ही, उन्होंने भारत से खुन्नस खाए पाकिस्तान पर अफगान से बदला लेने का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान न सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सच्चा दोस्त मानता है, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ उनके द्वारा उठाए गए ठोस कदमों का भी समर्थन करता है।

न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबिक सलेह ने पाकिस्तान द्वारा कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने का पुरजोर विरोध किया और दावा किया कि पाक अफगानिस्तान से बदला लेने की कोशिश में है, जो कि अमानवीयता है और जिसे आतंकवाद कहते हैं।

कश्मीर मसले पर पूछे गए सवाल में सलेह ने कहा, “हमारे विचार से भारत एक देश है और जम्मू-कश्मीर उसके क्षेत्र में आता है। ऐसे में जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने का कदम भारत का आंतरिक मामला है। हमें नहीं लगता कि ये कोई ऐसा मामला है, जिस पर पाकिस्तान को मुद्दा बनाना चाहिए। साथ ही इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी नहीं ले जाना चाहिए।“

उल्लेखनीय है कि अमरुल्लाह सलेह ने इस दौरान पीएम मोदी को संदेश देते हुए ये भी कहा कि वो अफगानिस्तान के साथ और जुड़े ताकि दोनों देशों के बीच दोस्ती मजबूत और गहरी हो। साथ ही कामना की कि मोदी भारत और अफगानिस्तान दोनों के लिए एक मजबूत स्तंभ के रूप में खड़े रहें।

कमलनाथ के भांजे रतुल पुरी को बैंक धोखाधड़ी केस में अदालत ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के भांजे रतुल पुरी को दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट ने बैंक फर्जीवाड़ा केस में 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। यानी कि रतुल पुरी 14 सितंबर तक न्यायिक हिरासत में रहेंगे। रतुल पुरी के खिलाफ सीबीआई और ईडी दोनों संस्थाएँ जाँच कर रही हैं।

इससे पहले, 19 अगस्त को मोजर बेयर कंपनी के पूर्व निदेशक रतुल पुरी को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में दिल्ली से गिरफ्तार किया था। ईडी को 3 सिंतबर तक रतुल पुरी की कस्टडी मिली हुई थी। रतुल पुरी की गिरफ्तारी के बाद मोजर बिअर ने बयान जारी कर गिरफ्तारी को दुर्भाग्यपूर्ण बताया था। कंपनी का कहना था कि उसने सभी कानून का पालन किया है।

गौरतलब है कि, रतुल पुरी पर सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया को 354.51 करोड़ रुपए की चपत लगाने का आरोप है। CBI ने इस मामले में 17 अगस्त को FIR दर्ज की थी। बाद में ED की टीम ने उन्हें गिरफ्तार किया था। रतुल के अलावा एमबीआईएल के प्रबंध निदेशक दीपक पुरी (रतुल पुरी के पिता), कंपनी में पूर्णकालिक निदेशक उनकी पत्नी नीता पुरी (रतुल की माँ और कमलनाथ की बहन), निदेशक संजय जैन, विनीत शर्मा और अन्य अज्ञात सरकारी सेवकों और अन्य व्यक्तियों के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश रचने का मामला दर्ज किया जा चुका है।