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BJP का मिशन कश्मीर: PDP नेता हाजी इनायत अली ने थामा कमल, कहा- अभी और आएँगे

जम्मू-कश्मीर में पीडीपी को बड़ा झटका लगा है। महबूबा मुफ्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के वरिष्ठ नेता व जम्मू एवं कश्मीर विधान परिषद के अध्यक्ष हाजी इनायत अली सहित कारगिल के कई प्रमुख नेताओं ने भाजपा का दामन थाम लिया है। उन्होंने सोमवार (अगस्त 26, 2019) को केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और गजेंद्र सिंह की मौजूदगी में भाजपा की सदस्यता ग्रहण की।

इनायत अली के अलावा लद्दाख स्वायत्तशासी पर्वतीय विकास परिषद, कारगिल के कार्यकारी पार्षद मोहम्मद अली हसन और 6 अन्य नेताओं ने भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा से मुलाकात की और पार्टी में शामिल हो गए। इनायत अली समेत अधिकतर नेता पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) से हैं। बीजेपी में शामिल होने के बाद इनायत अली ने कहा, “दो सालों में आप बदलाव देखेंगे। कई लोग जो भाजपा का आज विरोध कर रहे हैं, वे पार्टी को ज्वाइन करेंगे। उनके पास हमारे साथ आने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा।”

उनका स्वागत करते हुए लद्दाख के सांसद जामयांग सेरिंग नामग्याल ने कहा कि केंद्र शासित क्षेत्र बनाए जाने के निर्णय से लेह और कारगिल जिलों सहित पूरा क्षेत्र खुश है। 

इनायत अली ने संवाददाताओं से बात करते हुए कहा कि मुस्लिम बहुल जिले कारगिल के लोगों ने भले ही लद्दाख के लिए केंद्र शासित क्षेत्र का दर्जा नहीं माँगा हो, लेकिन घोषणा के बाद वे खुश हैं क्योंकि इससे केंद्र मामलों को सीधे तौर पर देखेगा। जिसमें विकास परियोजनाएँ भी शामिल हैं।

भाजपा ने बताया कि पार्टी में शामिल अन्य नेताओं में मोहसीन अली, जहीर हुसैन बाबर, काचो गुलजार हुसैन, असदुल्ला मुंशी, मोहम्मद इब्राहिम और ताशी सेरिंग शामिल हैं।

जम्मू-कश्मीर में सियासी उथल-पुथल के बीच हाजी इनायत अली का बीजेपी में जाना महबूबा मुफ्ती के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। कभी उसकी सहयोगी रही बीजेपी धीरे-धीरे घाटी में अपनी जड़ें मजबूत कर रही है। इससे पहले जुलाई में भी पीडीपी के बड़े नेता ने पार्टी का दामन छोड़ दिया था। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पुलवामा जिला अध्यक्ष मोहम्मद खलील बंद ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद महबूबा पर पार्टी के मूल सिद्धांतों के साथ समझौते का आरोप लगाया था।

केजरीवाल के कारनामे: नए खुले नहीं, 37 बंद हो गए फिर भी दिल्ली में बढ़ गए ठेके

हिटलर के प्रचार मंत्री जोसेफ़ गोयबल्स का मशहूर कथन है- अगर किसी झूठ को बार-बार बोला जाए तो वह सच लगने लगता है। हालाँकि मनोवैज्ञानिक इस ख़याल को सही नहीं मानते। वे इसे सच का भ्रम बताते हैं। लेकिन, दिल्ली की आप सरकार को देख लगता है कि गोयबल्स ने जो कहा था वह आज भी प्रासंगिक है।

भारतीय राजनीति में गोयबल्स के कथन को सही साबित करने वाली बहुत सी मिसालें मिल जाएँगी। लेकिन, सत्ता में आने के बाद इस पर जिस तरह आप ने अमल किया है, वैसी मिसालें कम ही मिलेंगी। पार्टी और उसके नेता एक ही झूठ को इतनी बार दोहराते हैं कि वह सच लगने लगता है! दिल्ली सरकार की आबकारी नीति का भी कुछ ऐसा ही हाल है।

हाल ही में आप विधायक अलका लांबा ने विधानसभा में इस मुद्दे पर केजरीवाल सरकार को घेरा था। उन्होंने पूछा था कि आखिर जब आम आदमी पार्टी शराबबंदी का नारा देकर सत्ता में आई थी तो उसने आते ही 2015-16 में 133 नए ठेके खोले जाने की अनुमति क्यों दी? लांबा का सवाल वाजिब था क्योंकि 2014 में शराबबंदी आम आदमी पार्टी के वादों में प्रमुख था।

लांबा के सवाल का साफ़-साफ़ जवाब देने की बजाय सदन में दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, आँकड़ों का हवाला देकर उसे उलझाते रहे। उन्होंने इस दौरान अपनी पार्टी द्वारा शराबबंदी पर लिए 2016 के आदेश का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि उनका मकसद कभी भी शराब की दुकानें खोलना नहीं रहा। उनकी सरकार ने कभी इसे तवज्जो नहीं दी। डिप्टी सीएम सिसोदिया ने इस बात पर भी जोर डाला कि उन्होंने 2015 से लेकर 2019 तक 37 दुकानें बंद की हैं।

हिंदुस्तान टाइम्स में दर्शाए आँकड़े।

फिर क्या? एक ही पार्टी के दो नेताओं द्वारा आँकड़ो का ब्यौरा अपने-अपने पक्ष को मजबूत दिखाने के लिए दिया गया। इसमें पता चला कि 2012-13 में दिल्ली में कुल शराब की दुकानों की संख्या 682 थी। जो 2014-15 में 768 हुई और 2015-16 में 862 पहुँच गई।

2016 के अगस्त में केजरीवाल सरकार एक पॉलिसी लेकर आई जिसमें कहा गया था कि अब शराब की कोई नई दुकान नहीं खुलेंगी। साथ ही किसी क्षेत्र में वहाँ के निवासियों को शराब के ठेके से दिक्कत होने पर उसे बंद करने की बात भी कही गई थी।

लेकिन हैरानी वाली बात ये रही कि इस फैसले के बाद भी 2016-17 में ठेकों की संख्या बढ़कर 879 हो गई। बाद में कहीं वर्ष 2017-2018 में इन ठेकों की संख्या में 13 दुकानों की गिरावट दिखी और ये 866 रह गए। इसके बाद 2018-19 में दावा किया जा रहा है कि इनकी संख्या 863 है।

इस बीच घटते-बढ़ते आँकड़ों में शराब बिक्री से राज्य को प्राप्त होने वाले राजस्व (करोड़ो में) में बिना उतार-चढ़ाव भारी इजाफा हुआ। साल 2015-16 में जहाँ राज्य को 862 ठेकों से 4,238.32 करोड़ रुपए राजस्व प्राप्त हो रहा था वो साल 2018-19 में 863 दुकानों से 5,028.17 करोड़ रुपए हो गया।

इस राजस्व में और बिक्री में इतनी बढ़त कैसे हुई इसका अंदाजा हाल ही में एम्स द्वारा कराए एक सर्वे से लगाया जा सकता है। जो स्पष्ट करता है कि दिल्ली वाले महीने भर में 5,00,00 लीटर शराब गटक जाते हैं, जिसकी कुल कीमत 60 मिलियन के आसपास पड़ती है। शराब की जितनी तलब दिल्ली वालों को है, उससे साफ़ है कि आने वाले सालों में 20-30 दुकान और भी बंद हो जाएँ, तो भी राजस्व में पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

लेकिन, सवाल राजस्व में आए उछाल का नहीं है। मसला है चुनाव के दौरान आप का किया वादा और सत्ता मिलने के बाद उसे भूल जाना। केजरीवाल सरकार अगर चुनाव के समय इसे एजेंडा नहीं बनाती तो न शायद पार्टी नेतृत्व से नाराज चल रही अलका लांबा को सवाल करने और न ही सिसोदिया को जवाब देने की जरूरत होती।

लांबा के सीधे से सवाल पर कि 2015 में 133 ठेकों को खोलने की अनुमति क्यों दी गई? मनीष सिसोदिया बताते हैं कि दुकान खुलने में लंबा समय लगता है, जो पुरानी सरकार के कार्यकाल के दौरान प्रोसेस में थे, वो ही खोले गए हैं।

हो सकता है इस जवाब से कई लोग संतुष्ट हो जाएँ, लेकिन ये विचार का विषय है कि चुनावों से पहले शराबबंदी पर कड़ा रुख दर्शाने वाली आप सरकार अगर इच्छाशक्ति रखती तो उन 133 दुकानों को खुलने से रोक सकती थी, क्योंकि शीला सरकार में उन्हें खोले जाने को लेकर अप्रुवल नहीं मिला था।

मनीष सिसोदिया ने अपनी सफाई में जिन 37 दुकानों के बंद होने के जिक्र किया, उन्हें भी आँकड़ों से जोड़कर एक बार देखिए… साल 2015 में 133 दुकानें खुलने के बाद ठेकों की संख्या 862 थी। 2016 में फैसला आया कोई दुकान नहीं खुलेगी। इस बीच 37 दुकान बंद हुई, लेकिन बावजूद फिलहाल दिल्ली में ठेकों की संख्या 863 है। कैसे???

स्पष्ट है आधे-अधूरे आँकड़ों से दिल्ली सरकार या तो लोगों को बरगला रही है या फिर ये समझाने की कोशिश की जा रही है कि ” हमने कुछ तो किया ही नहीं है”।

गौरतलब है कि बीते दिनों अरविंद केजरीवाल बिजली कंपनियों को दी जाने वाली सब्सिडी को भी चर्चा का मुद्दा बन चुके हैं। जिस पर अलका लांबा ने शराबबंदी को लेकर किए ट्वीट से पहले एक ट्वीट किया था कि अगर शीला दीक्षित सरकार निजी बिजली कम्पनियों को 210 करोड़ की सब्सिडी देकर कम्पनियों को लाभ पहुँचा रही थीं, तो आज केजरीवाल सरकार उन्हीं बिजली कम्पनियों को 1699.29 करोड़ की सब्सिडी देकर कैसे जनता को लाभ पहुँचा रही है?

सेक्युलरिज़्म के कुली मुस्लिम नहीं, हिन्दू हैं ओवैसी जी, यही हमारी ताकत है और यही अभिशाप

AIMIM अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा, “बीजेपी की सरकार भारत के मुस्लिमों को सेकंड क्लास नागरिक बनाना चाहती है और भारत के मुस्लिम इस बात का एहसास नहीं करते। भारत के मुस्लिमों को इस बात का एहसास होना चाहिए कि हम बहुत समय तक सेकुलरिज्म के कुली नहीं बन सकते तो हमारा वोट सेक्युलर पार्टियों के पास क्यों जाना चाहिए? मुस्लिमों को अपने समुदाय में राजनीतिक नेतृत्व खोजना चाहिए। यह इकलौता ऐसा रास्ता है जिससे यह सुनिश्चित होगा कि हमें संवैधानिक अधिकार दिए गए हैं।”

हिंदी में इसके लिए दो कहावतें हैं: ‘एक तो चोरी, ऊपर से सीनाज़ोरी’, और ‘ज़ख्म पर नमक छिड़कना’। ओवैसी इस बयान से हिन्दुओं के साथ जो कर रहे हैं, उस पर यह दोनों कहावतें बखूबी फिर बैठतीं हैं। 500 साल आक्रमण, 800 साल गुलामी और उसके बाद से आजतक सेक्युलरिज़्म के नाम पर सेक्युलर-समाजवादी भारतीय गणराज्य का लक्षित (targeted) भेद-भाव हिन्दू झेल रहे हैं, मंदिरों पर हमारे कब्ज़ा है, 1947 में खीर-भवानी, हिंगलाज जैसे शक्ति पीठ हमने गँवाए, सरकारें-अदालतें हस्तक्षेप करने के स्वतंत्र हमारे उत्तराधिकार से लेकर मंदिर के नियम-कानून में हैं, कश्मीर के मुस्लिम-बहुल होने के चलते भगाए ब्राह्मण गए (मारे गए और बलात्कृत हुए; लेकिन उसकी तो हिन्दुओं को आदत पड़ चुकी है), RTE हमारे समुदाय के ही स्कूल ढोते हैं, CBSE/ NCERT की रोमिला थापर-मार्का हिन्दूफ़ोबिक किताबें इतिहास हमारा स्याह करतीं हैं, और सेक्युलरिज़्म के कुली मुस्लिम हो गए?

किसने माँगा पाकिस्तान, किसने दिए 1946 में मुस्लिमों को वोट?

ओवैसी को चूँकि हर बात पर यह याद दिलाने का शौक है कि पाकिस्तान के बन जाने के बाद भी अधिकाँश मुस्लिमों ने पाकिस्तान जाना नहीं, भारत में रहना पसंद किया। अगर यह सच है कि अधिकाँश मुस्लिम पाकिस्तान-समर्थक नहीं थे, तो ओवैसी को यह बताना चाहिए कि प्रांतीय चुनावों में मुस्लिमों के लिए आरक्षित सीटों पर 90% जीत कैसे हासिल की? कैसे उसे 6 करोड़ मुस्लिम वोटरों में से 4.5 करोड़ के वोट हासिल हो गए?

उनके पास इसके जवाब में केवल एक बोगस लिबरल तर्क होगा कि केवल ‘एलीट’ मुस्लिमों को वोटिंग का अधिकार प्राप्त था, और उन मुस्लिमों के जिहादीपन को सभी मुस्लिमों पर लागू नहीं माना जा सकता। लेकिन अगर इसी तर्क को हिन्दुओं पर लागू किया जाए, तो इसका मतलब होगा कि केवल ‘एलीट’ हिन्दुओं ने ही नर्म, केंद्रपंथी (centrist) कॉन्ग्रेस को चुना, धुर-दक्षिणपंथी हिन्दू महासभा के मुकाबले। उन्हीं प्रांतीय असेम्बलियों ने संविधान सभा बनाई, जिसने निश्चय किया कि न ही भारत पाकिस्तान के बनने के जवाब में हिंदूवादी देश बनेगा, और न ही पाकिस्तान बनाने का वोट देने वाले और सड़कों पर जिन्ना की पुकार पर खून की होली खेल रहे मुस्लिमों को पाकिस्तान भेजेगा। यह फैसला ‘एलीट हिन्दुओं’ से लिया था, तो इसे आम हिन्दुओं पर क्यों थोपा जा रहा है, यह ओवैसी को बताना चाहिए। और इस मामले में कौन बना सेक्युलरिज़्म का कुली?

‘कश्मीरियत’ का कैंसर किसने भुगता?

राजा हरि सिंह ने जो समझौता जिसके साथ किया, उस technicality में घुसे बगैर सीधा सवाल पूछता हूँ: 1947 में राजशाही का व्यवहारिक रूप से खात्मा हो जाने के बाद कठमुल्ला शेख अब्दुल्ला और उनके गुंडे समर्थक, जो कि मुस्लिम ही थे, ने किस नैतिक आधार पर 370 की माँग रखी? जवाब अगर कश्मीरियत होगा, तो ओवैसी को बताना चाहिए कि ये ‘कश्मीरियत’ है क्या? ऐसी कौन सी सुर्खाब के परों वाली स्थानीय संस्कृति थी खाली कश्मीर में ‘बाहरियों’ के बसने से खत्म हो जाती, लेकिन बिहार, कर्नाटक, भोपाल में न होती? “नमस्ते शारदे देवी काश्मीरपुरवासिनि।” वाली संस्कृति तो न खत्म होती। जिहादी संस्कृति हमारी थी ही नहीं।

उसके बावजूद कश्मीर के मुस्लिमों का कट्टरपंथ हिन्दुओं ने 7 दशक से अधिक समय तक भुगता, कश्मीरी पंडितों ने जान-माल-इज़्ज़त सब खोया। कौन हुआ सेक्युलरिज़्म का कुली?

कौन से ‘बाबा’ दिखाए गए बलात्कारी?

बड़े ओवैसी अपने छोटे भाई की तरह खाली पूरी ज़िंदगी हिन्दुओं को 15 मिनट पुलिस हटा देने की चुनौती देते बिता देने वाले जाहिल नहीं हैं; पढ़े-लिखे हैं, पूर्व क्रिकेटर हैं। उम्मीद है फिल्मों का भी शौक रखते होंगे, क्योंकि फिल्म-जगत और क्रिकेट मौसेरे भाई हैं, और फ़िल्में और राजनीति साढ़ू-भाई। तो ज़रा ओवैसी याद करें कि आखिरी बार किस समकालीन फिल्म में मुस्लिम मौलवी या ओझा-दरवेश-सूफ़ी संत को ढोंगी-पाखंडी-बलात्कारी दिखाया गया था? जबकि लगभग सारे प्रोड्यूसर हिन्दू होते थे, अभिनेता-लेखक-निर्देशक से लेकर स्पॉटबॉय तक सब हिन्दू, लेकिन फिल्मों में मंदिर का पुजारी बलात्कारी और फ़क़ीर-औलिया को चमत्कारी दिखाया गया। किसके चलते? OMG में मिथुन चक्रवर्ती, गोविन्द नामदेव ने जैसा मज़ाक हिन्दू बाबाओं का उड़ाया, वैसा मुहम्मद का करना तो दूर की बात, मुहम्मद का रोल किसी पोस्टर में भी कर लेते तो हिंदुस्तान में गर्दन सर पर लेकर नहीं चल पाते। फिल्म में अपनी मूर्ति तोड़ने के रूपक अलंकार की आड़ में हिन्दू देवताओं की प्रतिमा तोड़ने वाले परेश रावल को भाजपा ने हिन्दू-राष्ट्रवाद के उबाल वाले 2014 लोकसभा चुनाव में टिकट दिया और वे जीते भी।

ओवैसी कभी तस्लीमा नसरीन या सलमान रुश्दी को टिकट देने की बात हँसी-हँसी में भी कह कर देखें। या तो वहीं मॉब-लिंचिंग हो जाएगी या घर पहुँचते-पहुँचते दाढ़ी नोंच लेने से लेकर सर उड़ा देने तक का फतवा जारी हो जाएगा। कौन हुआ ओवैसी जी सेक्युलरिज़्म का कुली?

नेता क्षेत्र का बनता है प्रतिनिधि, समुदाय का नहीं

मैं ऐसे दर्जन-भर उदाहरण दे सकता हूँ एक साँस में, लेकिन अगर बात सच में समझनी हो तो इतने उदाहरण काफी हैं। अब आते हैं ओवैसी की इस अपील पर कि मुस्लिम अब ‘अपने समुदाय’ में राजनीतिक नेतृत्व खोजें। तो हर बात में ‘संविधान में कहाँ लिखा है?’ का राग अलापने वाले ओवैसी को यह पता होना चाहिए कि संविधान में और कानून में हर जनप्रतिनिधि अपने भौगोलिक क्षेत्र का प्रतिनिधि होता है, किसी समुदाय विशेष का नहीं। यह वही ‘आईडिया ऑफ़ इंडिया’ है जिसकी दुहाई वे और उनके मित्र देते रहते हैं। तो वे ये बताएँ कि ‘मुस्लिमों का वोट मुस्लिमों को ही मिलना चाहिए’ की लाइन पकड़ने वाले वे और विभाजन कराने वाले जिन्ना-इक़बाल-लियाकत अली खान कम-से-कम भाषा के अंतर पर कहाँ अलग हैं?

सच्चाई यही है ओवैसी जी कि सेक्युलरिज़्म के कुली मुस्लिम नहीं, हिन्दू हैं। अपने खून से, अपनी संस्कृति-सभ्यता, अपने धर्म और अपनी आत्मा की कीमत पर हिन्दुओं ने ही सेक्युलरिज़्म को जिला रखा है। “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और “एकं सद्” का हवाला देकर हमने आपके पूर्वज मुस्लिमों (क्योंकि आप लोग तो खुद को अरबी नस्ल मानते हैं, हिंदुस्तानी नहीं) को स्वीकार किया, राजा दाहर, पृथ्वीराज चौहान जैसे झटके और धोखे खाने के बाद भी। और आज भी केवल 15-20% होने के बाद भी मुस्लिम शांति से रात को सो पाते हैं तो इसलिए क्योंकि जानते हैं कि 79% हिन्दू आबादी के बावजूद कोई हिन्दू साम्प्रदायिक होकर कोई पागलपन करने, हिंसा करने दौड़ पड़ा तो उसे रोकने आज के ‘डर का माहौल’ में भी पहले हिन्दू ही खड़े होंगे। हिन्दुओं का दुर्भाग्य यह है कि हम अपनी प्रकृति से ही सेक्युलरिज़्म के कुली हैं।

सरकार को ₹1.76 लाख करोड़ हस्तांतरित करेगा रिज़र्व बैंक, जालान समिति की सिफारिश पर मुहर

रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने केंद्र सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपए (24 बिलियन डॉलर) हस्तांतरित करने का निर्णय लिया है। आरबीआई यह रक़म अपने सरप्लस और मुनाफे में से सरकार को देगी। इसमें से 1.23 लाख करोड़ रुपए डिविडेंड अर्थात लाभांश के रूप में और बाकी के 52,640 करोड़ रुपए अपने सरप्लस कैपिटल में से दिया जाएगा। डिविडेंड पेमेंट के अंतर्गत 28,000 करोड़ रुपए सरकार को इसी वर्ष फरवरी में हस्तांतरित किए जा चुके हैं।

आरबीआई ने अपने इकोनॉमिक कैपिटल फ्रेमवर्क के अध्ययन के लिए एक पैनल का गठन किया था, जिसकी रिपोर्ट आने के बाद यह निर्णय लिया गया। डिविडेंड और सरप्लस कैपिटल का यह डोज सरकार के लिए राहत का कार्य करेगा क्योंकि वित्त मंत्रालय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए पहले ही कई क़दम उठाने की घोषणा कर चुका है। सरकार के सामने अपने राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में रखना भी एक बड़ी चुनौती है।

पूर्व आरबीआई गवर्नर विमल जालान की अध्यक्षता वाली समिति की अनुशंसा पर रिज़र्व बैंक ने यह निर्णय लिया कि आरबीआई को रिज़र्व में कितना फंड रखना चाहिए और कितना सरकार को ट्रांसफर कर देना चाहिए। सरकार और रिज़र्व बैंक के बीच कई दिनों से इस पर विवाद चल रहा था। केंद्र सरकार ने कई अन्य देशों का उदाहरण दिया था, जहाँ के केंद्रीय बैंक अपने कुल एसेट का 14% ही रिज़र्व में रखते हैं जबकि आरबीआई के मामले में यह आँकड़ा 28% का हो जाता है।

सरकार वित्तीय घाटे को जीडीपी का 3.3% रखने का लक्ष्य लेकर चल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस रेकॉर्ड ट्रांसफर से सरकारी बैंकों में कैपिटल डाले जाने की उम्मीद है। इससे इंफ्रास्ट्रक्चर और शेयर बाजार को भी बूस्ट मिलने की संभावना है।

‘समुद्र के रास्ते हमले की तैयारी कर रहे पाक आतंकी, ऐसी कोई भी घुसपैठ रोकने के लिए हम पूरी तरह तैयार’

हर स्तर पर भारत से मात खा चुका पाकिस्तान अब पानी के जरिए आतंकी हमले की योजना बना रहा है। पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का एक ‘अंडरवाटर विंग’ भी है, जो आतंकियों को जलमार्ग से हमले करने का प्रशिक्षण दे रहा है। लेकिन, भारतीय नौसेना ने साफ़ कर दिया है कि ऐसे किसी भी हमले को रोकने में वो सक्षम है। चीफ ऑफ नेवल स्टाफ एडमिरल करमबीर सिंह ने स्पष्ट कहा कि समुद्री इलाक़ों की सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार सभी लोग ऐसी किसी भी घुसपैठ को रोकने के लिए तैयार हैं।

एडमिरल सिंह ने जानकारी दी कि लश्कर द्वारा समुद्री रास्तों के जरिए आतंकी हमले की योजना बनाए जाने की ख़ुफ़िया सूचना मिली है। बता दें कि 26/11 मुंबई हमले के दौरान भी आतंकियों ने भारत में घुसने के लिए समुद्री रास्तों का ही उपयोग किया था। इसके बाद भारत ने समुद्री मार्गों व तटीय इलाक़ों में सुरक्षा के लिए विशेष योजनाएँ तैयार की।

एडमिरल सिंह ने कहा कि तटवर्ती पुलिस और नौसेना मिल कर यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि समुद्र के द्वारा भारत में घुसपैठ की हर कोशिश नाकाम साबित हो। हाल ही में मध्य प्रदेश और राजस्थान में आईएसआई समर्थित आतंकियों के घुसने की खबर आई थी, जिसके बाद इन राज्यों की पुलिस को हाई अलर्ट पर रखा गया है। तमिलनाडु में कई लोगों को हिरासत में भी लिया गया है।

केरल के कोच्चि में रक्षा प्रवक्ता ने बताया कि ख़ुफ़िया सूचना के आधार पर भारतीय नौसेना समुद्र में और तटीय क्षेत्रों में स्थिति पर कड़ी नज़र रखे हुए है।

G7 समिट के मंच से भी पाक को तगड़ा झटका, मोदी-ट्रंप के बीच फिर दिखा ज़बरदस्त याराना

फ्रांस के G7 सम्मेलन के दौरान गंभीर वैश्विक मुद्दों पर चर्चा के अलावा हँसी-मज़ाक का भी दौर चल रहा है, और वह भी वैश्विक स्तर पर सुर्खियाँ बटोर रहा है। ऐसा ही एक वाकया आज (26 अगस्त, 2019) को हुआ, जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बीच द्विपक्षीय वार्ता को लेकर मीडिया से बात चल रही थी।

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फ्रांस के शहर बिआरित्ज में मुलाकात की। बिआरित्ज में चल रही जी7 समिट में नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के बीच कश्मीर समेत कई मुद्दों को लेकर बातचीत हुई। इस मुलाकात के बाद एक प्रेस वार्ता हुई जिसमें दोनों देशों के नेताओं से कई गंभीर मामलों से जुड़े सवाल किए गए। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की ज़बरदस्त दोस्ती की झलक भी देखने को भी मिली।

इस प्रेस वार्ता में प्रधानमंत्री मोदी ने पत्रकारों से हिंदी में कहा कि मुझे लगता है हम दोनों को बात करने दीजिए, हम दोनों बात करते रहेंगे। जब ज़रूरत पड़ेगी आप लोगों को भी जानकारी दी जाएगी। इस पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि मोदी असल में काफी अच्छी अंग्रेजी बोल लेते हैं लेकिन वह अभी बोलना नहीं चाहते। इस पर पीएम मोदी और ट्रंप ने एक दूसरे के हाथ पकड़ लिए और दोनों नेताओं समेत वहाँ मौजूद सभी लोग ठहाके लगाने से खुद को रोक नहीं पाए।

इस प्रेस वार्ता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की गुंजाइश को सिरे से खारिज कर दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि दोनों देश द्विपक्षीय रूप से सभी मुद्दों पर चर्चा कर समाधान कर सकते हैं और हम किसी तीसरे देश को कष्ट नहीं देना चाहते।

इस बैठक के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस बैठक को लेकर एक ट्वीट किया है। ट्रंप ने लिखा कि अभी-अभी मैंने अपने दोस्त नरेंद्र मोदी के साथ जी7 समिट में एक बेहतरीन बैठक को खत्म किया।

खैर, ऐसा पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान को कश्मीर के मुद्दे पर वैश्विक तौर पर झटका लगा हो। इससे पहले भी जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने और राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बाँटने के भारत सरकार के फैलसे से बौखलाए पाकिस्तान ने दुनिया के बड़े देशों से इस मामले पर मध्यस्थता की पेशकश की थी। लेकिन चीन के अलावा दुनियाभर के सभी देशों ने इसे भारत और पाकिस्तान का आपसी मसला बताते हुए मध्यस्थता से इनकार कर दिया था।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी न केवल गैर-हिंदी भाषी क्षेत्र से आने के बावजूद हिन्दी पर बहुत अच्छी पकड़ रखते हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी में ही बात करने पर ज़ोर देने के लिए जाने जाते हैं। इसके अलावा मोदी को वैश्विक नेताओं के साथ वैसी ही व्यक्तिगत मित्रता बना लेने के लिए, जो आजकल उनके और ट्रम्प के बीच देखी जा रही है, और इसके पहले उनके और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच दिखी थी। यहाँ तक कि नेतन्याहू ने तो 2019 का चुनाव जीतने पर मोदी को ट्विटर पर एक वीडियो पोस्ट कर व्यक्तिगत बधाई भी दी थी।

पंचकुला जमीन मामला: ED ने मोतीलाल वोरा और भूपेंद्र हुड्डा के खिलाफ दायर की चार्जशीट

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने पंचकुला ज़मीन घोटाला मामले में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर कर दी है। यह चार्जशीट पंचकुला कोर्ट में दायर की गई। इन दोनों वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी नेताओं के अलावा एसोसिएट जनरल लिमिटेड (एजेेएल) के ख़िलाफ़ भी चार्जशीट दायर की गई। हुड्डा ने मुख्यमंत्री रहते एजेेएल को ग़लत तरीके से फायदा पहुँचाया था।

इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग से सम्बंधित मामला चल रहा है। एजेएल ही वह कम्पनी है जो नेशनल हेराल्ड का प्रकाशन करती है और इसमें गाँधी परिवार की अच्छी-ख़ासी हिस्सेदारी है। इससे पहले ED (प्रवर्तन निदेशालय) ने इस मामले में पंचकूला में स्थित प्रॉपर्टी जब्त कर ली थी। इसके पहले ED ने पिछले साल गुरुग्राम और पंचकूला में ₹64 करोड़ मूल्य की कई संपत्तियों को अटैच करने का आदेश दिया था।

इसी से जुड़े मामले में कॉन्ग्रेस के शीर्ष परिवार के लोग व उनके कई वफ़ादार आरोपित हैं। सोनिया-राहुल के ख़िलाफ़ चल रहे मामले में आरोप है कि यंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (YIL) ने एसोसिएट जर्नल प्राइवेट लिमिटेड (AJL) का अधिग्रहण किया, जिसमें कई अनियमितताएँ बरती गईं।

वाईआईएल के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में सोनिया और राहुल भी शामिल हैं। स्वामी के शिकायत में कहा गया है कि वाईआईएल में सोनिया-राहुल की 76% हिस्सेदारी है और एजेएल को कॉन्ग्रेस पार्टी के फंड्स में से लोन दिए गए, जो ग़ैर-क़ानूनी है

हमारा विश्वास क़ुरान में, RSS इसके उलट है: इमरान ने ख़ुद को घोषित किया ‘कश्मीर का प्रतिनिधि’

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने अपने देश को सम्बोधित करते समय ऐसे-ऐसे बयान दिए, जो भारत में एक ख़ास वर्ग द्वारा बार-बार दुहराए जाते हैं। उनके बयान में कुछ भी नया नहीं था। हाँ, इस्लामिक देशों द्वारा भारत को समर्थन दिए जाने से वह ख़फ़ा और निराश दिखे। उनके बयान में वही आरएसएस, भाजपा, नेहरू और गाँधी थे। पाक पीएम ने कहा कि उनका देश कुरानशरीफ में विश्वास रखता है जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसकी उलटी विचारधारा पर चलता है।

महात्मा गाँधी की हत्या के लिए भी इमरान ख़ान ने आरएसएस को ज़िम्मेदार ठहराया। हालाँकि, उनका यह बयान तथ्यों से परे है क्योंकि संघ का राष्ट्रपिता की हत्या में कोई रोल नहीं था। भारत में ‘गिरोह विशेष’ के कई लोग भी यही रोना रोते हैं। इसके बाद उन्होंने संघ के बारे में कई झूठे दावे किए। इमरान ने कहा कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद संघ की पकड़ मजबूत होती चली गई। जबकि, सच्चाई यह है कि आजादी से पहले भी संघ के कैडर ने अंग्रेजों से लोहा लिया था, जिस कारण ब्रिटिशर्स ने उसे प्रतिबंधित कर दिया था।

इमरान ख़ान ने दावा किया कि संघ हिन्दुओं के अलावा बाकी सभी लोगों को दोयम दर्जे का नागरिक मानता है। उन्होंने यह भी झूठ बोला कि पिछली सरकारों ने आरएसएस को ‘आतंकवादी संगठन’ मान कर प्रतिबंधित कर दिया था। कुल मिला कर देखें तो राष्ट्र को सम्बोधित करने के नाम पर इमरान ने पाकिस्तान की कूटनीतिक खामियों को छिपाने के लिए संघ और भाजपा को जम कर गालियाँ दी। उन्होंने दावा किया कि पीएम मोदी ने अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटा कर ‘बहुत बड़ी ग़लती’ कर दी है और ‘कश्मीर की आज़ादी’ के लिए रास्ते खोल दिए हैं।

इमरान ख़ान ने कहा कि पश्चिमी मीडिया भारत की आलोचना कर रहा है। यह अजीब है कि कूटनीतिक स्तर पर पूरी तरह फेल हो चुका एक देश का मुखिया मीडिया रिपोर्ट्स में ही अपनी ख़ुशी ढूँढ रहा है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र पर भी सवाल खड़े करते हुए कहा कि वैश्विक संस्थाएँ शक्तिशाली का ही साथ देती हैं लेकिन आज 125 करोड़ मुस्लिम यूएन की तरफ देख रहे हैं। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि पाकिस्तान की जनसंख्या 20 करोड़ के क़रीब है। ऐसे में इमरान अपने आप को 105 करोड़ अतिरिक्त लोगों का नुमाइंदा किस आधार पर बता रहे हैं, यह कहना मुश्किल है।

इतना ही नहीं, इमरान ने ख़ुद को कश्मीर की जनता का प्रतिनिधि भी घोषित कर डाला। उन्होंने वैश्विक समुदाय को धमकी देते हुए कहा कि अगर परमाणु युद्ध हुआ तो कोई नहीं जीतेगा लेकिन दुनिया को इसके दुष्प्रभाव झेलने पड़ेंगे। कश्मीर पर पाकिस्तान की कूटनीतिक जीत का दावा करते हुए इमरान ने कहा कि वे इस मसले के अंतरराष्ट्रीयकरण में सफल रहे हैं। इमरान ख़ान का यह सम्बोधन झूठ, विरोधाभासी, खोटी धमकियों और बहानों से भरा पड़ा है।

ये बडे साँड़ों के खेल है, ग्रामसिंहों का नहीं: ट्रम्प-मोदी की जुगलबंदी पर कुमार विश्वास ने इमरान खान को दिखाया आईना

फ्रांस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की जुगलबंदी पर मंचीय कवि और आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता कुमार विश्वास ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान पर निशाना साधा है। पाकिस्तान को ‘ग्रामसिंह’ (गीदड़) की संज्ञा देते हुए नसीहत दी कि अगर पाकिस्तान पीछे नहीं हटा तो बलूचिस्तान खोना पड़ सकता है।

हिंदुस्तान-पाकिस्तान के मुद्दों में तीसरे को तंग क्यों करना?

प्रधानमंत्री मोदी G7 देशों के सम्मेलन में भाग लेने फ्रान्स पहुँचे हुए हैं। इस शिखर सम्मेलन के इतर उन्होंने ट्रम्प के साथ द्विपक्षीय वार्ता भी की। ट्रम्प भी इसी सम्मेलन के लिए आए हुए थे। इसी दौरान मोदी ने यह बयान दिया कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान के सभी मुद्दे द्विपक्षीय हैं, इसीलिए हम अन्य देशों को उन्हें लेकर ‘परेशान’ नहीं करते।

मोदी का यह बयान और इसका समय बहुत महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान के जम्मू-कश्मीर को लेकर हिंदुस्तान-विरोधी प्रोपेगंडा पर ट्रम्प से बात करने की खबरें आने के बाद से मोदी देश में विपक्षी दलों और आलोचकों के निशाने पर थे, जो उनसे पूछ रहे थे कि क्या ट्रम्प से इमरान खान की ‘शिकायत’ कर मोदी हिंदुस्तान की वह स्थिति बदलने की ओर अग्रसर हैं, जिसके अंतर्गत हिंदुस्तान कश्मीर समेत सभी विवादित भौगोलिक मुद्दों पर तीसरे पक्षों के दखल के खिलाफ रहता है। मोदी के इस बयान को पाकिस्तान पर कटाक्ष के साथ-साथ उस हलके को लक्षित करके भी दिया गया माना जा रहा है।

विश्वास की चुटकी

इस बीच मंचीय कवि और हिंदी के पूर्व प्राध्यापक डॉ. कुमार विश्वास ने भी इस मुद्दे पर ट्वीट कर पाकिस्तान और उसके प्रधानमंत्री इमरान खान की चुटकी ली। उन्होंने कटाक्ष किया कि यह दो ‘बड़े साँड़ों’ (हिंदुस्तान और अमेरिका) का खेल है, और इसमें “फ़ालतू की सहभागिता” की कीमत ‘गीदड़’ पाकिस्तान को बलूचिस्तान के रूप में चुकानी पड़ सकती है।

कुमार विश्वास ने ट्वीट किया, “मोदी और ट्रम्प दोनों मिलकर तुम्हारा “वो ही” बना रहे हैं इमरान साहब जो तुम समझ रहे हो। कहा था ना, ज़्यादा टाँग मत अड़ाओ! ये बडे साँड़ों के खेल है, ग्रामसिंहों का नहीं, फ़ालतू की सहभागिता “बलूचिस्तान” छिनवा देगी।

J&K में लोगों से मिलकर लौटे NC के 2 सांसद, कॉन्ग्रेस के ‘लोकतंत्र की हत्या’ वाले आरोप की निकली हवा

जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने और राज्य के पुनर्गठन का निर्णय लिए जाने के बाद विपक्षी दलों ने जम कर राजनीति की। कॉन्ग्रेस ने तो इसे अंतरराष्ट्रीय मसला तक बता दिया। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी और जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद के साथ कई विपक्षी नेतागण श्रीनगर पहुँचे लेकिन उन्हें एयरपोर्ट से ही वापस दिल्ली भेज दिया गया। राज्यपाल सत्यपाल मलिक का कहना है कि ये नेता राजनीति करने यहाँ आए थे और इससे माहौल बिगड़ सकता था।

इसके बाद विपक्षी दलों ने यह कहना शुरू कर दिया कि जम्मू कश्मीर में सबकुछ ठीक नहीं है। हालाँकि, बसपा सुप्रीमो मायावती ने इन नेताओं को फटकार लगाते हुए केंद्र सरकार को समय देने की बात कही। नवीन पटनायक की बीजद, चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी और जगन रेड्डी की वाईएसआरसीपी सही कई विपक्षी दलों ने अनुच्छेद 370 पर संसद में सरकार का साथ भी दिया था। लेकिन, क्या आपको पता है कि जम्मू कश्मीर में कुछ विपक्षी नेता न सिर्फ़ घूम रहे हैं बल्कि लोगों से मिल भी रहे हैं।

ये नेतागण केंद्र सरकार और भाजपा के ख़िलाफ़ बयान भी दे रहे हैं लेकिन उन्हें पुलिस ने गिरफ़्तार नहीं किया। इससे विपक्षी पार्टियों के आरोपों की पोल भी खुल जाती है। मोदी सरकार पहले से ही कहती आ रही है कि जम्मू कश्मीर को 2 परिवारों के चंगुल से मुक्त कराना है।

अब्दुल्ला परिवार की पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस के 2 सांसदों ने जम्मू कश्मीर का दौरा किया और अब वे दिल्ली लौट आए हैं। दोनों नेताओं ने पूरी सक्रियता से घाटी में लोगों से मुलाक़ातें की। एनसी के वरिष्ठ नेताओं मोहम्मद अकबर लोन और जस्टिस (रिटायर्ड) हसनैन मसूदी ने कश्मीर का दौरा किया।

दोनों नेताओं ने एनसी के श्रीनगर स्थित मुख्यालय में बैठकें की और सिविल सोसाइटी से संवाद किया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, केंद्र सरकार कुछ स्थानीय नेताओं के माध्यम से जनता से संवाद कर हालात को सामान्य बनाए रखने की जुगत में लगी है। इसके लिए स्थानीय नेताओं की मदद ली जा रही है। हालाँकि, यह भी याद होना चाहिए कि अकबर लोन कभी पाकिस्तान का समर्थन कर चुके हैं और विधानसभा में भारत-विरोधी नारेबाजी भी कर चुके हैं।