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रिजर्व बैंक ने मोदी को क्यों दिया ₹1.76 लाख करोड़? राहुल गाँधी इसे डकैती क्यों कह रहा है?

कल भारतीय रिजर्व बैंक ने, पूर्व गवर्नर बिमल जालान के नेतृत्व में बनी समिति के सुझावों पर अमल करते हुए, भारत सरकार को ₹1.76 लाख करोड़ दिए। इस पर दो तरह की प्रतिक्रियाएँ आईं। एक तरफ के लोगों ने इसे अच्छा कदम बताते हुए कहा कि सरकार को इसकी आवश्यकता थी और इसे सरकार कहाँ खर्च करती है इससे पता चलेगा कि अर्थव्यवस्था पर इसका कैसा असर पड़ेगा। वहीं दूसरी तरफ वाले लोगों ने कहा है कि ये डकैती है, मोदी रिजर्व बैंक से पैसा चुरा रहा है, लूट हो रही है।

फिर बीबीसी जैसे प्रोपेगेंडा गिरोह ने कनाडा में बैठे अर्थशास्त्रियों के बयान लेते हुए बताना शुरू किया कि यह रिजर्व बैंक की स्वायत्तता पर हमला है, और भारत सरकार ज्यादती कर रही है। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और पैसों के हेर-फेर के मामलों में फँसे राहुल गाँधी ने मोदी पर करारा हमला बोलते हुए बताया कि सरकार ने फंड चुरा लिया और ये गलत है। उन्होंने उदाहरण दिया कि मोदी सरकार बंदूक की गोली का घाव रोकने के लिए दवाखाने से बैंड-एड चुरा कर भागी है। यह बात अलग है कि जिन्हें रिजर्व बैंक के बारे में थोड़ी भी जानकारी है, और मोदी से घृणा न करते हों, वे जानते हैं कि न तो रिजर्व बैंक ने, और न ही सरकार ने कुछ भी गलत किया है।

पहली बात तो यह है कि रिजर्व बैंक है क्या?

सरल शब्दों में, भारतीय रिजर्व बैंक भारत सरकार की संपत्ति है। 1949 से यह बैंक भारत सरकार के पूर्ण स्वामित्व में आया। फिर स्वायत्तता का क्या संदर्भ है? स्वायत्त होने का मतलब यह नहीं होता कि आप सरकार के दायरे से बाहर हो जाते हैं, या एक स्वतंत्र कम्पनी बन जाते हैं। स्वायत्त होने का मतलब है कि पॉलिसी-संबंधित बातों पर बैंक के पास अपने अधिकार हैं कि वो अपने दायरे में संचालित होने वाले बैंकों, वित्तीय नीति आदि पर स्वयं निर्णय ले सके।

रिजर्व बैंक हमेशा सरकार के वित्त मंत्रालय के साथ मिल कर ही काम करता है। दोनों की नीतियाँ अलग हो सकतीं हैं, लेकिन विपरीत नहीं। कहने का अर्थ यह है कि दोनों ही संस्थाओं का लक्ष्य भारतीय अर्थव्यवस्था की बेहतरी है। दोनों के देखने का नजरिया अलग हो सकता है, लेकिन स्वायत्त होने के बावजूद रिजर्व बैंक भारतीय अर्थ-तंत्र का ही हिस्सा है, और वो सरकार के साथ मिल कर ही काम करता है।

रिजर्व बैंक का पैसा कहाँ से आता है, उसके लाभ का क्या होता है?

रिजर्व बैंक के पास देश का सोना है, भारत के विभिन्न बैंकों को पैसे देता है, सरकारी बॉन्ड में पैसा लगाती है, विदेशी मुद्रा की खरीद-बिक्री करती है। ये उसके आय के स्रोत हैं। जाहिर है कि अगर बैंक व्यवसाय करेगा तो उसे लाभ भी हो सकता है, हानि भी। सोने के दाम में अगर साल के शुरुआत से साल के अंत में अंतर आएगा, तो वो रिजर्व बैंक की आमदनी में जुड़ेगा (या घटेगा)। वैसे ही, अगर रिजर्व बैंक ने सरकारी बॉन्ड को बेचा और उससे पैसे आए तो वे पैसे भी आमदनी का हिस्सा बनेंगे। अगर रिजर्व बैंक ने अपने पास के विदेशी मुद्रा रिजर्व से डॉलर को कम दाम पर खरीदा, और ज्यादा दाम पर बेचा, तो भी उसे आमदनी होगी।

यह आमदनी आम तौर पर एक स्तर तक की होती है, जिससे वित्तीय वर्ष के अंत में रिजर्व बैंक अपने लाभ का एक हिस्सा अपने पास रख कर बाकी पैसे सरकार को दे देता है। जो हिस्सा बैंक अपने पास रखता है, वो पैसे वो अपने बुरे दिनों को लिए रखता है- जैसे कि कभी बैंकिंग सिस्टम में पैसे की कमी हो जाए, अर्थव्यवस्था पर वैश्विक मंदी का असर पड़ने लगे, या ऐसी समस्या आ जाए कि देश की इकॉनमी खतरे में पड़ जाए। ऐसे समय पर, जब सरकार के पास पैसों की कमी हो जाएगी, लोगों के हाथों में पैसा न होने के कारण खरीददारी करने की क्षमता कम होने लगेगी, तब रिजर्व बैंक बाजार और अर्थव्यवस्था की मदद के लिए कई कदम उठाता है।

जब आमदनी अच्छी होती है, लाभ होता है, और लाभ में से खतरे के समय के लिए बैंक के पास एक तय पैसा अलग रख लिया जाता है (contigency fund, कंटिंजेंसी फंड), तब उसके बाद जो पैसा बचता है, उसे सरप्लस कहते हैं। यह हर कम्पनी के साथ होता है, हर व्यक्ति के साथ होता है। आपकी जितनी सैलरी है, उसमें से आप अपने सारे खर्च और निवेश के बाद कुछ पैसा जो बचा पाते हैं, वो सरप्लस होता है। इसका उपयोग आप घर के किसी ऐसे कार्य को करने के लिए करते हैं, जो आपके सामान्य जरूरतों से शायद अलग होता है।

पिछले कुछ सालों में रिजर्व बैंक ने भारत सरकार को अपना सरप्लस लगातार दिया है। कई साल सारा सरप्लस सरकार को दिया है। ये बात और है कि सामान्य तौर पर यह सरप्लस लगभग ₹40-50,000 करोड़ के आस-पास रहा है। इस बार यह सरप्लस असामान्य है क्योंकि इस साल का सरप्लस उस संख्या का लगभग तीन गुना है।

इस साल सरप्लस इतना ज्यादा कैसे हो गया?

रिजर्व बैंक ने पिछले साल अप्रत्याशित कारोबार किया, जिसमें अच्छे फायदे पर डॉलर और सरकारी बॉन्ड को बेचना शामिल है। ऐसा कार्य रिजर्व बैंक ने पिछले कई सालों से नहीं किया था, इसलिए लाभ हमेशा एक नियत संख्या के आस-पास ही दिखता था।

इसी बिक्री के कारण बैंक ने अप्रत्याशित मुनाफा कमाया। इस मुनाफे से बुरे दिनों के लिए बचाए गए फंड का हर समस्या से जूझने की स्थिति का आकलन करने के बाद, बिमल जालान समिति ने सुझाव दिया कि इस लाभ को सरकार को दे देना चाहिए क्योंकि राष्ट्र को अभी इस फंड की आवश्यकता है। आप सब जानते हैं कि बजट में सरकार देश पर हुए खर्च और टैक्स से हुई आमदनी का लेखा-जोखा रखने के बाद, अगले साल में खर्च होने वाले आँकड़े रखती है।

अगर यह आँकड़े आमदनी से कम होते हैं, तो उसे वित्तीय घाटा या फिस्कल डेफिसिट कहा जाता है। यह घाटा अगर बहुत ज्यादा हो जाएगा तो सरकार को कहीं से कर्ज लेना होगा। लेकिन सरकार के पास रिजर्व बैंक है, जिसके पास कुछ पैसा है। वह पैसा, जिसका अगर कहीं पड़े रहने से ज्यादा उपयोग नहीं है, तो वह पैसा सरकार को बैंक दे सकता है। इसलिए दे सकता है क्योंकि अंततः बैंक का स्वामित्व सरकार के पास ही होता है। यही बिमल जालान इंदिरा गाँधी से लेकर मनमोहन के समय तक महान अर्थशास्त्री माने जाते थे, और अब यही जालान “मोदी के गुलाम” हो गए हैं।

जालान समिति ने सुझाव दिया कि रिजर्व बैंक अपने बुरे दिनों के लिए लाभ का एक हिस्सा रखने के बाद पूरा सरप्लस सरकार को दे दे। इस सुझाव तक पहुँचने से पहले समिति ने बैंक के ऊपर आने वाले खतरों, पहले के समय के सबसे बुरे दौर आदि को संदर्भ में रखते हुए निर्णय लिया कि उसके अपने बचाव के लिए कम-से-कम कितने पैसों की ज़रूरत है। उसके बाद जो बचा, वो सरकार को दे देने की सिफारिश समिति ने की।

रिजर्व बैंक के लिए रिस्क क्या है? खतरे वाले दिनों से क्या मतलब है?

रिजर्व बैंक को विदेशी या अप्रत्याशित कारणों से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए उसके अपने पास एक प्रक्रिया होनी चाहिए- जैसे कि अगर डॉलर के मुकाबले रुपए का दाम बढ़ने लगे, या अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का भाव गिरने लगे। इससे रिजर्व बैंक की संपत्ति पर सीधा असर पड़ता है। इसका मतलब है कि आमदनी घटेगी। आमदनी अगर घटेगी तो उसका असर सीधा देश के बैंकों और वित्तीय व्यवस्था पर पड़ेगा। लेकिन यह असर वित्तीय तंत्र पर न पड़े, उसके लिए रिजर्व बैंक एक फंड रखता है।

मान लीजिए कि अमेरिका ने अचानक से भारत पर कुछ वित्तीय प्रतिबंध लगा दिए। या ऐसा हो कि एक ऐसी सरकार आ जाए जिसकी नीतियों के कारण अर्थव्यवस्था हिल जाए। ऐसे समय में भी तंत्र को सुचारू रूप से चलाते रहने के लिए रिजर्व बैंक के पास कुछ अलग फंड होना चाहिए, ताकि इस तरह की स्थिति में वित्तीय तंत्र में अपने पास के पैसे लगा कर उसे गिरने से बचाया जा सके।

जहाँ तक बात स्वायत्तता की आती है तो उसमें रिजर्व बैंक के पास अपने लिए काम करने वाले लोगों और अपने कार्य को सही तरह से चलाने के लिए होने वाले खर्च के मामले में स्वतंत्रता है। लेकिन स्वायत्त होने का मतलब यह बिलकुल नहीं कि भले ही हमारा स्वामित्व भारत सरकार के पास है, लेकिन अर्थव्यवस्था को जब ज़रूरत पड़े तो हम अपनी मर्जी से सरप्लस फंड रोक लेंगे।

कुछ लोग रिजर्व बैंक के संपत्ति के आधार पर रखे जा रहे रिजर्व के प्रतिशत पर आ कर अटक गए हैं। इसे अंग्रेजी में ‘असेट-टू-रिजर्व रेशियो’ कहा जाता है। अगर अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर चलें तो इस रिजर्व का मीडियन प्रतिशत 16 है जबकि भारतीय रिजर्व बैंक उससे बहुत ऊपर 26% का रिजर्व रखता है। ये अनुपात भी अर्थव्यवस्था के हिसाब से रखा जाता है ताकि बुरे-से-बुरे दौर में भी आपके पास इतना पैसा हो कि इकॉनमी पूरी तरह से गिर न जाए।

राहुल गाँधी रो क्यों रहे हैं? कॉन्ग्रेस इसे डकैती क्यों कह रही है?

राहुल गाँधी समेत पूरे कॉन्ग्रेस के पास सिवाय फर्जीवाड़े के कुछ बचा नहीं। इन्होंने राफेल के मुद्दे पर भारतीय आम जनता की अनभिज्ञता का लाभ उठाते हुए हर जिले में प्रेस कॉन्फ़्रेंस करने से लेकर हर रैली में राफेल-राफेल चिल्लाने की योजना बनाई थी, वह योजना काफी हद तक सफल रही क्योंकि अचानक से जो लोग मोदी को भ्रष्टाचार से बिलकुल अलग मानते थे, उन्हों रवीश वाला रोग लग गया और वो भी रवीश टाइप कहने लगे: जाँच करवाने में क्या जाता है?

हालाँकि रवीश भी जानते थे और राहुल भी कि रक्षा मामलों में उसकी पूरी जानकारी पब्लिक में नहीं दी जा सकती क्योंकि उसमें उस कम्पनी द्वारा विकसित तकनीकों के पब्लिक हो जाने का खतरा है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में मोदी सरकार को सही पाया। फिर भी, मीडिया और कॉन्ग्रेस लगातार राफेल-राफेल करते रहे। यह सब सिर्फ इसलिए संभव हो पाया क्योंकि लोगों को इतनी डीटेल्स पता नहीं होतीं कि रक्षा सौदों में क्या शर्तें होती हैं। साथ ही, अगर घोटालों के खानदान में पले-बढ़े लोग अगर घोटाले होने की बातें करने लगते हैं तो आदमी को लगता है कि यार इसके तो बाप, माँ, परनाना तक घोटालेबाज रहे हैं, इसको तो आयडिया होगा ही!

तो रिजर्व बैंक को लेकर भी इन्होंने यही रणनीति अपनाई है। आम आदमी को रिजर्व बैंक या उसी कार्यशैली का कुछ पता नहीं होता। इसलिए, उसे मूर्ख बनाना आसान होता है कि देखो मोदी रिजर्व बैंक को लूट रहा है। जबकि राहुल गाँधी ये नहीं बता पाएँगे कि 2013-14, 14-15, 15-16 और उसके पहले भी रिजर्व बैंक ने सरप्लस भारत सरकार को दिया या नहीं। दिया तो कितने प्रतिशत दिया। वो इसलिए नहीं बता पाएँगे क्योंकि आम आदमी को मूर्ख समझना एक बात है, और रिजर्व बैंक के बारे में पता लगाना बिलकुल अलग। वो राहुल के वश का तो नहीं लगता।

आपकी कम्पनी है। उसने लाभ कमाया है। लाभ का एक हिस्सा अपने पास रखने के बाद, बाकी का पैसा परिवार पर खर्च के लिए घर के मुखिया को दे दिया है। कम्पनी ने अपने बचाव का भी पूरा ध्यान रखा, और परिवार को भी जरूरत के समय में मदद की। इसमें गलत क्या है? वो भी तब, जब कम्पनी का स्वामित्व परिवार के पास ही है।

राहुल गाँधी, अपने दावे के अनुसार, कैम्ब्रिज से पढ़े हैं। उनकी चुनावी टीम में अभिजीत बनर्जी जैसे MIT के अर्थशास्त्री थे। हाल ही में जेल चले जाने से पहले तक चिदंबरम के रूप में एक और अर्थशास्त्री था उनके पास। RBI गवर्नर रहे मनमोहन सिंह (पूर्व प्रधानमंत्री भी रहे हैं) आज भी उनका फ़ोन उठा ही लेंगे, ऐसी उम्मीद की जा सकती है। तो राहुल गाँधी ऐसे हास्यास्पद दावे करने के पहले कम-से-कम इन लोगों से ही पूछ लेते, तो पता चल जाता कितनी मूर्खता भरी बातें वे कर आए हैं।

कारगिल के 8 नेता BJP में शामिल, महबूबा की पार्टी से हैं अधिकतर मुस्लिम चेहरे

जम्मू-कश्मीर विधान परिषद् के सभापति हाजी अनायत अली सहित कारगिल के कई प्रमुख नेता सोमवार (अगस्त 26, 2019) को भाजपा में शामिल हो गए।

अनायत अली के अलावा, लद्दाख स्वायत्तशासी पर्वतीय विकास परिषद, कारगिल के कार्यकारी पार्षद मोहम्मद अली हसन और 6 अन्य नेताओं ने भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा से मुलाकात की और पार्टी में शामिल हो गए। अनायत अली सहित अधिकतर नेता महबूबा मुफ़्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) से हैं।

उनका स्वागत करते हुए लद्दाख के सांसद जामयांग सेरिंग नामग्याल ने कहा कि केंद्र शासित क्षेत्र बनाए जाने के निर्णय से लेह और कारगिल जिलों सहित पूरा क्षेत्र खुश है।

अनायत अली ने संवाददाताओं से कहा कि मुस्लिम बहुल जिले कारगिल के लोगों ने भले ही लद्दाख के लिए केंद्र शासित क्षेत्र का दर्जा नहीं माँगा हो, लेकिन घोषणा के बाद वे खुश हैं क्योंकि इससे केंद्र मामलों को सीधे तौर पर देखेगा, जिसमें विकास परियोजनाएँ भी शामिल हैं।

भाजपा ने बताया कि पार्टी में शामिल अन्य नेताओं में मोहसीन अली, जहीर हुसैन बाबर, काचो गुलजार हुसैन, असदुल्ला मुंशी, मोहम्मद इब्राहिम और ताशी सेरिंग शामिल हैं।

RBI से सरकार को पैसा देने की सिफारिश करने वाले बिमल जालान इंदिरा गाँधी के ‘लाए हुए’ हैं, मोदी के नहीं

‘RBI की स्वायत्ता पर हमला’ का बोगस तर्क देकर मोदी सरकार के RBI से ₹1.76 लाख करोड़ लेने का विरोध कर रहे लोग वही हैं, जो चीखते हैं कि ‘मोदी सरकार संस्थानों की आज़ादी खत्म कर रही है’; “मोदी सरकार अपने लोगों को, संघियों को भरकर संस्थाओं की ‘क्वालिटी डाउन’ कर रही है।” लेकिन यह लोग इस मामले में या तो भूल गए हैं या लोगों से बात छिपा रहे हैं कि बिमल जालान को सरकार में लाने वाले मोदी नहीं, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी हैं।

1970 के दशक में इंदिरा गाँधी ने 4-5 उभरते हुए आर्थिक और सार्वजनिक नीति (पब्लिक पॉलिसी) के विद्वानों को सरकारी तंत्र का हिस्सा बनाया था। बिमल जालान को लाने में उनके साथ काम कर चुके आर वेंकटरमन का बड़ा हाथ था। इसके अलावा इंदिरा गाँधी के समय के ताकतवर नौकरशाह पीएन हक्सर और डीपी धर भी जालान और उसी योजना के अंतर्गत आने वाले विजय केलकर, नितिन देसाई, अरुण शौरी आदि को लाने वालों में प्रमुख थे। यानी जालान के ‘मोदी का आदमी’ होने का मिथक गलत है।

इसके बाद अगर स्वायत्ता की बात करें तो जालान खुद रिजर्व बैंक की स्वायत्ता में कटौती न करने और उसे अक्षुण्ण रखने के पक्षधर रहे हैं- मोदी सरकार के दौरान भी। तो ऐसे आदमी के नेतृत्व में बनी कमिटी क्या RBI की स्वायत्ता पर कोई खतरा बन सकती है, यह सवाल इस फैसले पर सवाल उठाने वालों से पूछा जाना चाहिए।

‘मोदी का सबसे बड़ा आलोचक रहा हूँ, अगर कॉन्ग्रेस सहमत न हो, तो भी मेरे विचारों का सम्मान करे’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करने के कारण कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर अपनी पार्टी के निशाने पर आ गए हैं। लेकिन लगता नहीं है कि शशि थरूर पीएम मोदी को लेकर अपने मत पर पीछे हटने वाले हैं।

केरल प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी द्वारा इस मामले पर स्पष्टीकरण माँगने के बाद शशि थरूर ने अपनी ही पार्टी के नेताओं को राय दे डाली है। शशि थरूर ने स्पष्टीकरण माँगने वालों को कड़ा जवाब देते हुए कहा है कि यदि कॉन्ग्रेस नेता उनकी राय से सहमत नहीं भी हैं तब भी उन्हें उनके विचार की कद्र करनी चाहिए।

कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा- “मैं नरेंद्र मोदी सरकार का एक कठोर आलोचक रहा हूँ और मुझे उम्मीद है कि सकारात्मक आलोचक रहा हूँ। समावेशी मूल्यों और संवैधानिक सिद्धांतों के कारण ही मैंने लगातार 3 बार चुनाव जीता है। मैं अपने कॉन्ग्रेस के साथियों से निवेदन करता हूँ कि मेरे विचारों की कद्र करें, यदि वे उससे सहमत नहीं हैं, तब भी।”

समाचार पोर्टल ‘द प्रिंट’ पर एक लेख में शशि थरूर ने इस पूरे मामले पर अपनी बात कही है। थरूर ने लिखा है- “पहले मेरे साथी और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश, जिनकी विश्वसनीयता पर संदेह नहीं किया जा सकता, ने कहा कि पीएम मोदी को हर समय ‘खलनायक’ की तरह पेश करना गलत है। इसके बाद सीनियर वकील और कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने भी जयराम के बयान से सहमति जताते हुए यही बात कही थी। जब मुझसे इस संबंध में राय माँगी गई थी, तो मैंने ट्वीट कर कहा कि मैं पिछले 6 साल से यह बात कह रहा हूँ कि जब पीएम मोदी कोई अच्छी बात कहें या करें, तो उसकी तारीफ होनी चाहिए।”

केरल कॉन्ग्रेस पर तीखा कटाक्ष करते हुए शशि थरूर ने लिखा है- “मेरे इस बयान पर ही मेरे खिलाफ सार्वजनिक आलोचना की जा रही हैं, सोनिया गाँधी को पत्र लिखे गए, मुझे भाजपा ज्वाइन करने की राय दी जा रही है।”   

थरूर ने लिखा है कि इसी तरह से 2014 में मोदी की तारीफ कर देने की वजह से उन्हें पार्टी प्रवक्ता पद से हटा दिया गया और उन पर नरेंद्र मोदी से नजदीकियाँ बढ़ाने के आरोप लगाए गए। दरअसल, इस बारे में थरूर ने सफाई भी दी थी कि मोदी पर उनके बयानों को सही ढंग से नहीं समझा गया है। उन्होंने कहा था कि क्लीन इंडिया कैंपेन से जुड़ने का यह मतलब नहीं कि वह बीजेपी के हिंदुत्व के अजेंडे का समर्थन करते हैं। उन्होंने खुद को एक स्वाभिमानी कॉन्ग्रेसी करार दिया था। लेकिन, फिर भी आखिरकार पार्टी ने उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए प्रवक्ता के पद से हटा दिया था।

अपने लेख में थरूर ने यह भी लिखा है कि वो चाहते हैं कि कॉन्ग्रेस और सेक्युलर दलों को जनता का विश्वास जीतना चाहिए।

बता दें कि केरल प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी ने पीएम मोदी की प्रशंसा करने पर शशि थरूर से स्‍पष्‍टीकरण माँगा है। यही नहीं, राज्‍य नेतृत्‍व ने कॉन्ग्रेस आलाकमान से भी थरूर की शिकायत करने का फैसला किया है। केपीसीसी के अध्‍यक्ष मुल्‍लाप्‍पल्‍ली रामचंद्रन और राज्‍य में विपक्ष के नेता रमेश चेन्नितला ने थरूर के बयान का खुलकर विरोध किया। इसके बाद ही शशि थरूर की यह प्रतिक्रिया आई है।

पूर्व CM अजीत जोगी नहीं हैं आदिवासी, विधायकी खतरे में: जाति के पेंच पर कॉन्ग्रेस-BJP दोनों खफा!

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के आदिवासी के दर्जे के दावे को सरकार द्वारा नियुक्त समिति ने खारिज कर दिया है। जोगी की जाति के मामले की जाँच कर रही हाई-पावर कमिटी ने अपनी रिपोर्ट तैयार कर ली है। कमिटी ने जोगी को आदिवासी नहीं माना है। कमिटी ने यह भी साफ किया है कि सरकारी जाँच में यह साबित होने के बाद उनका जाति प्रमाण पत्र और अनुसूचित जनजाति के तहत उन्हें मिल रहे सभी लाभों को निरस्त कर दिया गया है। 

फरवरी 2018 में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के आदेश पर डीडी सिंह की अध्यक्षता में बनी समिति ने 21 अगस्त को अपनी जाँच रिपोर्ट सरकार के समक्ष रखी। रिपोर्ट में कहा गया है कि अजीत जोगी कोई भी ऐसा प्रमाण नहीं दे सके जिससे वह यह साबित कर सकें कि वह आदिवासी जाति से ताल्लुक रखते हैं। लिहाजा बिलासपुर के कलेक्टर को छत्तीसगढ़ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी नियम 2013 के तहत उन पर एक्शन लेने के लिए कहा गया है। अजीत जोगी मारवाही से विधायक हैं और अगर इस रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई होती है, तो मारवाही से अजीत जोगी की विधायकी को रद्द किया जा सकता है। क्योंकि ये विधानसभा सीट आदिवासी प्रत्याशी के लिए आरक्षित है।

रिपोर्ट के सामने आने पर अजीत जोगी ने कॉन्ग्रेस सरकार पर निशाना साधते हुए दावा किया कि उन्हें जरूरी दस्तावेज और सबूत पेश करने का मौका नहीं दिया गया। समिति को ‘भूपेश अधिकार प्राप्त समिति’ करार देते हुए उन्होंने कहा कि वो 1986 में नागरिक सेवाओं में शामिल हुए और 43 वर्षों में, न्यायपालिका ने 6 बार पहले भी उन्हें जातिगत पंक्ति में शामिल किया है। साथ ही उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी की नजरों में वो एक आदिवासी हैं, लेकिन सीएम भूपेश बघेल उन्हें आदिवासी नहीं मानते। 

बता दें कि बीते दो दशक से जोगी की जाति को लेकर कई सवाल खड़े होते रहे हैं। इससे पहले भी 2018 में भी  रीना बाबा कंगाले की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई थी और इस समिति की रिपोर्ट में भी यही बात सामने आई थी। बाब कंगाले की समिति ने भी अजीत जोगी को आदिवासी नहीं माना था।

गौरतलब है कि यह मामला 2001 का है, जब भाजपा के वरिष्ठ आदिवासी नेता नंद कुमार साय ने अजीत जोगी की जाति को चुनौती दी थी। जोगी ने हमेशा दावा किया है कि वह और उनका परिवार, जो एसटी आरक्षित सीटों पर भी चुनाव लड़ते हैं, कंवर जनजाति से हैं। 2011 में यह मामला उच्चतम न्यायालय में चला गया जिसने जोगी की जनजातीय स्थिति का निर्धारण करने के लिए एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति को आदेश दिया था।

26 बांग्लादेशी नागरिक पश्चिम बंगाल से गिरफ्तार, भारत-बांग्लादेश सीमा से देश में कर रहे थे घुसने की कोशिश

सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने मंगलवार (अगस्त 27, 2019) को पश्चिम बंगाल में भारत-बांग्लादेश सीमा के घौना मैदान क्षेत्र से 26 बांग्लादेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया है। ये सभी बांग्लादेशी भारत में घुसने की कोशिश कर रहे थे।

बीएसएफ ने इससे पहले सोमवार (अगस्त 26, 2019) को भारत में घुसने की कोशिश कर रहे 5 बांग्लादेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया था। बीएसएफ अधिकारियों ने सोमवार को इसके बारे में जानकारी देते हुए बताया था कि 5 बांग्लादेशी नागरिकों को भारत-बांग्लादेश सीमा पर उत्तरी 24 परगना जिले के स्वरूपनगर और गाईघाटा क्षेत्रों से गिरफ्तार किया गया। 

पुलिस द्वारा किए गए शुरुआती जाँच में पता चला है कि वो बिचौलिए की मदद से सीमापार करके भारत में आने की ताक में थे। बता दें कि बीएसएफ ने इस साल 15 भारतीय नागरिकों को और 731 अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को उस समय गिरफ्तार किया, जब वे अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर रहे थे।

गौरतलब है कि शनिवार (अगस्त 24, 2019) को भारत-बांग्लादेश सीमा पर बीएसएफ और पशु तस्करों के बीच मुठभेड़ हो गई थी, जिसमें बीएसएफ ने एक बांग्लादेशी गौ तस्कर को मार गिराया था। एसपी मानवेन्द्र देब रे ने बताया कि 40 से भी अधिक बांग्लादेशी भारत की सीमा में घुसने की कोशिश कर रहे थे, इसी दौरान मुठभेड़ हुई और एक पशु तस्कर की मौत हुई।

कोलकाता शहर अब किसी के लिए सुरक्षित नहीं रह गया है- बांग्ला एक्ट्रेस जूही सेनगुप्ता

टीवी सीरियल ‘भजो गोबिंदो’ से चर्चित होने वाली बांग्ला टीवी एक्ट्रेस जूही सेनगुप्ता अपने माता-पिता के साथ रविवार (25 अगस्त) को सुबह पेट्रोल पंप पर पेट्रोल भरवाने के लिए रुकी थी। उन्होंने पेट्रोल पंप के कर्मचारी से अपनी गाड़ी में 1500 रुपए का पेट्रोल भरने को कहा, लेकिन उसने 3000 रुपए का पेट्रोल भर दिया। इस बारे में जब एक्ट्रेस के पिता ने कर्मचारी से जवाब माँगा तो आपसी बहस एक विवाद में तब्दील हो गई।

एक्ट्रेस के अनुसार,

“जब मेरे पिता ने उनसे इस बारे में पूछा, तो विवाद हो गया और उन्होंने मेरे पिता जो कि एक सीनियर सिटिजन हैं, उनको धक्का मारा, उन्होंने हमारी कार की चाबियाँ भी छिन लीं।”

इस मामले में कोलकाता पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि पुलिस ने घटना-स्थल पर पहुँचकर मामले की जानकारी ली और फिर दोनों पक्षों को पुलिस स्टेशन ले आई जहाँ उन्हें समझाया गया। इसके बाद दोनों पक्षों में आपसी सहमति बन गई। इस मामले में किसी प्रकार की कोई शिक़ायत दर्ज नहीं हुई है। हालाँकि, टीवी एक्ट्रेस ने इस घटना से आहत होकर सोशल मीडिया पर कहा, “यह शहर अब किसी के लिए भी सुरक्षित नहीं रह गया है।”

हालाँकि जूही सेनगुप्ता और पेट्रोल पंप के कर्मचारियों के बीच हुआ आपसी विवाद सुलझ गया है। एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि पुलिस के हस्तक्षेप से इस मामले को सुलझा लिया गया है। जूही सेनगुप्ता ने भारत पेट्रोलियम कम्युनिकेशन लिमिटेड (BPCL) द्वारा की गई त्वरित प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद दिया है।

फेसबुक पर उन्होंने लिखा, “मैंने अब्बास अख्तर (महाप्रबंधक ब्रांड और पीआर टीम बीपीसीएल) और राजीव दत्ता (महाप्रबंधक खुदरा, पश्चिम बंगाल बीपीसीएल) के साथ बातचीत की। उन्होंने पूरी घटना के लिए BPCL की ओर से माफ़ी माँगी है।” उन्होंने लिखा कि BPCL ने उन कर्मचारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की है। मुझे BPCL के साथ कोई समस्या नहीं है। पूरे विवाद को सुलझा लिया गया है। इस घटना के बारे में ख़ुद जूही ने अपने फेसबुक पेज पर लाइव आकर सारी बातें बताई।

बांग्ला एक्ट्रेस ने फेसबुक पर जो वीडियो पोस्ट किया उसके कैप्शन में उन्होंने लिखा,

“Thanks for quick response from Bharat Petroleum Communication Limited.. I had a conversation with Mr. Abbas Akhtar (General Manager Brand and PR team BPCL) & Mr. Rajiv Dutta (General Manager Retail ,West Bengal BPCL).They apologised for the whole incident on behalf of Bharat Petroleum Corporation Limited .They have taken actions against those staff.I don’t have any issue with BPCL , had issue with their staff..So now everything has been sorted..”

12 देशों में है चिदंबरम का बैंक खाता: INX मनी लॉन्ड्रिंग केस में ED का दावा

INX मीडिया मनी लॉन्ड्रिंग केस में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने दावा किया है कि पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम की प्रॉपर्टी सिर्फ़ भारत में ही नहीं है बल्कि दुनिया के अन्य देशों में भी है। ED ने अपने दावे में यह बात भी स्पष्ट की कि वो विदेशों में सम्पत्ति को बेचने और विदेशी बैंक खातों को बंद करने के साक्ष्यों के साथ भी छेड़छाड़ कर रहे हैं। 

ख़बर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में दायर ऐफिडेविट में जाँच एजेंसी ने यह दावा किया कि चिदंबरम के कई देशों में बैंक खाते हैं। ED का कहना है कि चिदंबरम और इस मामले के सह-आरोपितों की 12 देशों में सम्पत्ति है। इन देशों में अर्जेंटीना, ऑस्ट्रिया, ब्रिटिश वर्जिन आइसलैंड, फ्रांस, ग्रीस, मलेशिया, मोनाको, फिलीपींस, सिंगापुर, साउथ अफ्रीका, स्पेन और श्री लंका शामिल है।

ED ने चिदंबरम की ज़मानत याचिका का विरोध करते हुए कहा, “आरोपित के ख़िलाफ़ हमारे पास मजबूत केस है और इस आधार पर बेल याचिका का विरोध कर रहे हैं। लेकिन, इसके साथ ही इनकी अग्रिम ज़मानत याचिका का विरोध करने का हमारे पास एक और मजबूत आधार है। हमें ऐसे संकेत मिले हैं कि आरोपी और सह-आरोपी न सिर्फ़ सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं बल्कि गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश भी कर रहे हैं।”

इसके अलावा ED ने कहा, “सबूतों की रक्षा के साथ गवाह की गरिमा और सुरक्षा की भी रक्षा होनी चाहिए। गवाह को प्रभावित किया जा रहा है और उनका अपमान हो रहा है। आरोपी बहुत ताकतवर और प्रभावशाली भी है।”

ग़ौरतलब है कि चिदंबरम की CBI की हिरासत को चार दिन बढ़ा दिया गया है, उन्हें अब 30 अगस्त को कोर्ट में पेश किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने INX मीडिया मामले में चिदंबरम की अग्रिम ज़मानत याचिका रद्द करने के हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ दायर याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया था।

कॉन्ग्रेस नेता ने 8 महीने में 3 बार कहा – ‘मैं नचनिया हूँ, नचनिया हूँ, नचनिया हूँ’

कॉन्ग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय झा ख़ुद को नचनिया मानते हैं। ऐसा उन्होंने एक बार नहीं बल्कि तीन बार कहा है। हाँ, नृत्य की विधा हर बार बदल जाती है। एक वित्त मंत्री के समय वे एक ही नृत्य विधा में पारंगत होते हैं और जैसे ही दूसरा वित्त मंत्री आता है, वह ख़ुद को किसी और नृत्य विधा में पारंगत बताते हैं। उदाहरण के लिए हम यहाँ तीन ट्वीट लेकर आए हैं। ये तीनों ट्वीट के समय देश के वित्त मंत्री अलग-अलग थे। लेकिन हाँ, सरकार राजग की ही थी।

सबसे पहले इस ट्वीट को देखिए। यह उनका ताज़ा ट्वीट है, जिसमें उन्होंने ख़ुद को नचनिया घोषित किया है। सोमवार (अगस्त 26, 2019) को उन्होंने लिखा कि अगर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अर्थशास्त्री हैं तो वो एक बेली डांसर हैं। बेली डांस को अरबी डांस भी कहा जाता है, जिसकी शुरुआत मिस्र से हुई थी। इस नृत्य विधा में सारा ज़ोर नृत्य करने वाले की धड़ पर होता है क्योंकि सारे मूवमेंट्स उसके प्रयोग से ही किए जाते हैं। ये रहा संजय झा का ट्वीट:

ऑल इंडिया प्रोफेशनल कॉन्ग्रेस, महाराष्ट्र के अध्यक्ष संजय झा के अब दूसरे ट्वीट पर गौर कीजिए। यह ट्वीट उन्होंने मार्च 26, 2019 को किया था। उस समय वित्तमंत्री अरुण जेटली थे, जिनका हाल ही में निधन हो गया। इस ट्वीट में झा ने लिखा कि अगर अरुण जेटली अर्थशास्त्री हैं तो वो एक बैलेट डांसर हैं। बैलेट डांस 15वीं सदी में इटली के उद्भव के साथ लोकप्रिय हुआ और फ्रांस एवं रूस में जाकर इसने कॉन्सर्ट डांस का रूप ले लिया। खैर, आप ट्वीट देखिए:

अब आते हैं फ़रवरी 3, 2019 को उनके द्वारा किए गए ट्वीट पर। उस दौरान पीयूष गोयल ने कार्यवाहक वित्त मंत्री के रूप में अंतरिम बजट पेश किया था। पूर्ण बजट चुनाव के बाद नई वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पेश किया। पूर्णकालिक बजट के दौरान संजय झा ने फिर ख़ुद को नचनिया घोषित किया। हाँ, उनकी डांस विधा बदल कर अबकी स्वदेशी हो गई। हो सकता है कि कई लोगों को इसमें अच्छे दिन भी नज़र आएँ क्योंकि अरब और फ्रांस से डांस विधा लाने वाले संजय झा ने अबकी स्वदेशी डांस का जिक्र किया।

संजय झा ने लिखा कि अगर पीयूष गोयल अर्थशास्त्री हैं तो वो कथक डांसर हैं। उत्तर भारत के कथाकारों और पौराणिक कहानीकारों ने इस नृत्य विधा को लोकप्रिय बनाया। वे इस नृत्य के माध्यम से पौराणिक कहानियों को पेश करते थे। यह भारतीय क्लासिक डांस के अंतर्गत आता है। ये रहा संजय झा का ट्वीट:

राजनीति और नृत्य में पारंगत होने के अलावा संजय झा क्रिकेट नेक्स्ट नामक वेबसाइट के संस्थापक भी हैं। हो सकता है कि कल को अगर देश को नया वित्त मंत्री मिल जाए तो वह ख़ुद को स्ट्रिपटीज डांस में ही पारंगत न घोषित कर दें! या फिर वह अबकी पोल डांस भी चुन सकते हैं। खैर, आपने टीवी पर अक्सर उन्हें न्यूज़ डिबेट्स में भाग लेते देखा होगा और वह पहले से ही सुर्ख़ियों में रहते आए हैं।

फिरोजशाह कोटला का नाम अब होगा अरुण जेटली स्टेडियम, लंबे समय तक रहे थे DDCA के अध्यक्ष

दिल्ली एवं जिला क्रिकेट संघ (DDCA) ने मंगलवार (अगस्त 27, 2019) को फिरोजशाह कोटला स्टेडियम का नाम अपने पूर्व अध्यक्ष अरुण जेटली के नाम पर रखने का फैसला किया है। भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली का गत शनिवार (अगस्त 24, 2019) को निधन हो गया था। इस स्टेडियम को अब अरुण जेटली स्टेडियम के नाम से जाना जाएगा। इसका नया नामकरण 12 सितंबर को एक समारोह में किया जाएगा।

डीडीसीए ने ट्विटर पर स्टेडियम का नाम बदलने की जानकारी दी। डीडीसीए ने ट्वीट किया, “कोटला का नाम अब बदल कर अरुण जेटली स्टेडियम कर दिया जाएगा। दिल्ली के ऐतिहासिक क्रिकेट स्टेडियम के नाम बदलने का समारोह 12 सिंतबर को आयोजित किया जाएगा और इसी दिन स्टेडियम के एक स्टैंड का नाम विराट कोहली के नाम पर रखा जाएगा।”

डीडीसीए अध्यक्ष रजत शर्मा ने कहा, “वह अरुण जेटली का सहयोग और प्रोत्साहन था जिसने कि विराट कोहली, वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर, आशीष नेहरा, ऋषभ पंत और कई अन्य खिलाड़ियों ने भारत को गौरवान्वित किया।”

अरुण जेटली को इस स्टेडियम को आधुनिक सुविधाओं से युक्त बनाने और दर्शक क्षमता बढ़ाने के साथ विश्वस्तरीय ड्रेसिंग रूम बनवाने का श्रेय जाता है। इसमें एक स्टैंड का नाम भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली के नाम पर भी रखा जाएगा, जिसकी पूर्व में घोषणा की गई थी। यह समारोह जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में होगा, जिसमें गृह मंत्री अमित शाह और खेल मंत्री किरन रिजिजू भी हिस्सा लेंगे।